अमेरिका के Sea Drone से ईरान में तबाही, क्या भारत के पास है इसका जवाब?
नई दिल्ली : अमेरिका ने हाल ही में युद्ध में पहली बार समुद्री ड्रोन (अनमैन्ड सरफेस वेसल्स -यूएसवी) का इस्तेमाल करते हुए ईरान में भारी तबाही मचा दी है। 13 जुलाई को यूएस सेंट्रल कमांड (सैटकॉम) ने पुष्टि की कि तीन सारोनिक कोर्सेर नामक मानवरहित सतही
नई दिल्ली : अमेरिका ने हाल ही में युद्ध में पहली बार समुद्री ड्रोन (अनमैन्ड सरफेस वेसल्स -यूएसवी) का इस्तेमाल करते हुए ईरान में भारी तबाही मचा दी है। 13 जुलाई को यूएस सेंट्रल कमांड (सैटकॉम) ने पुष्टि की कि तीन सारोनिक कोर्सेर नामक मानवरहित सतही वाहनों ने ईरान के बंदर अब्बास नेवल बेस पर स्थित पनडुब्बी और जहाज-रखरखाव सर्विस सेंटर को नष्ट किया। यह हमला वन-वे अटैक रणनीति का पहला युद्धकालीन उपयोग था, जहाँ लड़ाकू विमानों के साथ समुद्री ड्रोन का समन्वय कर ईरान के हवाई रक्षा प्रणाली और नौसैनिक संपत्तियों को निशाना बनाया गया।
मानवरहित सतही वाहन (यूएसवी) ऐसी नावें या छोटे जहाज होते हैं जिसमें कोई मानवीय चालक दल सवार नहीं होता। इन्हें मीलों दूर स्थित बेस या बड़े नौसैनिक जहाज पर बैठे ऑपरेटर्स सैटेलाइट या रेडियो लिंक के जरिए नियंत्रित करते हैं। आधुनिक यूएसवी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेंसर्स लगे होते हैं, जो उन्हें खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी रखने, लॉजिस्टिक्स और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के साथ-साथ सीधे हमले के लिए भी उपयुक्त बनाते हैं। सारोनिक कोर्सेर एक 24 फुट का यूएसवी है जिसकी पेलोड क्षमता 1,000 पाउंड, रेंज 1,000 नॉटिकल मील से अधिक और गति 35 नॉट से ज्यादा है।
बंदर अब्बास हमले ने साफ किया हैं कि कैसे एक छोटी और अपेक्षाकृत सस्ती नाव भी दुश्मन के क्रू को खतरे में डाले बिना या बड़े युद्धपोत को जोखिम में डाले बिना सुरक्षित ठिकानों की सुरक्षा घेराबंदी को भेदकर बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। अमेरिकी नौसेना ने दिसंबर 2025 में सारोनिक को 392 मिलियन डॉलर का उत्पादन अनुबंध दिया था।
अमेरिका द्वारा समुद्री ड्रोन के सफल उपयोग के बाद, पाकिस्तान भी अपनी नौसेना के लिए इसतहर के मानवरहित सतही वाहन (यूएसवी) और स्वायत्त अंडरवाटर वाहन (एयूवी) विकसित कर रहा है। पाकिस्तान का उद्देश्य अरब सागर में भारतीय नौसेना या किसी अन्य चुनौती के खिलाफ कम लागत पर अपनी तटीय घेराबंदी को मजबूत करना है।
हालांकि, उसकी उत्पादन क्षमता और इन ड्रोन की परिचालन भूमिका पर गंभीर सवाल बने हुए हैं। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि भविष्य में कोई दुश्मन देश उसके मुख्य बंदरगाहों जैसे कराची या ग्वादर पोर्ट पर इसी तरह के घातक सी-ड्रोन से हमला करता है, तब पाकिस्तान उन्हें कैसे रोकेगा। ईरान की बंदर अब्बास में नाकामी यह दर्शाती है कि पारंपरिक तटीय सुरक्षा प्रणालियाँ इन छोटे और तेज ड्रोन्स को रोकने में अप्रभावी हो सकती हैं।
पाकिस्तानी विशेषज्ञों को इस बात की भी चिंता है कि यदि युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना ने जीपीएस जैमिंग कर दी या पाकिस्तान के कमांड सेंटर और ड्रोन के बीच संचार लिंक काट दिया, तब करोड़ों रुपये के ये ड्रोन पानी में अंधे और बेकार हो जाएंगे। पाकिस्तान के सामने अपने ड्रोन को जैमिंग जैसे खतरों से सुरक्षित बनाने और वास्तविक युद्ध में उनका प्रभावी ढंग से तालमेल बिठाने की बड़ी चुनौती है।(एजेंसी)
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