बंगाल का चुनावी गणित और वामपंथ के पुनरोदय की संभावना

बंगाल का चुनावी गणित और वामपंथ के पुनरोदय की संभावना

(इंडियन एक्सप्रेस में दीप्तिमान तिवारी, रविक भट्टाचार्य और अत्रि मित्रा की रिपोर्ट, अनुवाद : संजय पराते)

पश्चिम बंगाल में मतदान के दूसरे चरण में चुनावी मुक़ाबला उत्तर के सीमावर्ती ज़िलों से हटकर दक्षिण के घने शहरी-औद्योगिक क्षेत्र की ओर शिफ़्ट हो गया है। जहाँ एक ओर राजनीतिक आख्यान तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच दो-ध्रुवीय मुक़ाबले पर ही टिका हुआ है, वहीं एक और शांत पहलू — जिसे 2021 के बाद अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया गया था — अभी भी नतीजों पर असर डाल सकता है : लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन के बचे हुए वोट।

2021 के बंगाल चुनावों के लिए चुनाव आयोग के डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि संयुक्त मोर्चा — जिसमें लेफ्ट फ्रंट, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) शामिल थे — ने सिर्फ़ एक सीट जीती थी। फिर भी, 117 निर्वाचन क्षेत्रों में उसका वोट शेयर जीत के अंतर से ज़्यादा था। यह 294 सदस्यों वाली विधानसभा का लगभग 40% है।

इनमें से 74 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस विजयी रही थी, जबकि 43 सीटों पर भाजपा जीती थी। यह साफ़ था कि अपनी करारी हार में, वाम-कांग्रेस गठबंधन ने टीएमसी  विरोधी वोटों को बाँट दिया था। मोर्चे की एकमात्र सीट भांगर थी, जिसे आईएसएफ ने जीता था, जबकि वाम मोर्चा और कांग्रेस दोनों को शून्य सीटें मिलीं। आईएसएफ को हटा देने पर भी, अकेले वाम-कांग्रेस के वोट 108 सीटों पर जीत के अंतर से ज़्यादा थे। असल में, एक ऐसा गठबंधन, जो पिछली बार चुनावी तौर पर हाशिए पर था, वह गणित के हिसाब से आज भी केंद्र में बना हुआ है।

इस बार, टीएमसी का ध्यान सिर्फ़ अपने वोट बैंक को बनाए रखने पर ही नहीं है, बल्कि वह वाम और कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी पैनी नज़र रखे हुए है। जैसा कि चुनावों से पहले टीएमसी के एक नेता ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हम चाहते हैं कि लेफ्ट और कांग्रेस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करें। इससे हमें ही फ़ायदा होगा।”

इन 117 सीटों में से 54 सीटों पर दूसरे चरण में वोट डाले गए हैं। इस चरण में दक्षिण बंगाल का शहरी और औद्योगिक इलाका आता है, जिसमें कोलकाता, हावड़ा, हुगली, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, और बर्दवान और मेदिनीपुर के कुछ हिस्से शामिल हैं। यह भौगोलिक बनावट मायने रखती है। चुनाव के पहले चरण के उलट — जिसमें उत्तर बंगाल, जंगल महल और सीमावर्ती ज़िले शामिल थे, जहाँ मुकाबला काफ़ी हद तक ध्रुवीकृत हो चुका था — दूसरा चरण शहरी, अर्ध-शहरी इलाकों और औद्योगिक गलियारे की ओर बढ़ता है। ये ऐसे इलाके हैं, जहाँ वामपंथ की ऐतिहासिक रूप से ट्रेड यूनियनों, म्युनिसिपल नेटवर्क और शहरी कैडरों के ज़रिए गहरी सांगठनिक जड़ें रही हैं। यह इलाका शहरी शासन, रोज़गार और स्थानीय भ्रष्टाचार से जुड़ी बातों से ज़्यादा प्रभावित होता है — ये ऐसी चीज़ें हैं, जो वामपंथ के लिए फ़ायदेमंद हैं और जिनका वे फ़ायदा उठाने की भी कोशिश कर रहे हैं।

इसके अलावा, इन "स्पॉइलर" सीटों का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण बंगाल में है, जहाँ 2021 में टीएमसी ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था। उदाहरण के लिए, डायमंड हार्बर में माकपा को लगभग 17% वोट मिले थे, जबकि टीएमसी की जीत का अंतर सिर्फ़ 7% था। हावड़ा उत्तर में, वाम का लगभग 5% वोट शेयर, टीएमसी की जीत के 3% के छोटे से अंतर से भी ज़्यादा था। उत्तरपारा में, माकपा को लगभग 21% वोट मिले थे, जो उस 18% के अंतर से ज़्यादा था, जिससे तृणमूल से भाजपा हारी थी।

ऐसा ही एक पैटर्न दूसरी जगहों पर भी देखने को मिला था। सिंगूर में, माकपा का 14% वोट शेयर, तृणमूल की जीत के 12% के अंतर से ज़्यादा था। चंदननगर में, उसे लगभग 19% वोट मिले थे, जबकि तृणमूल की जीत का अंतर 17% था। दुर्गापुर पूर्व में, वाम को लगभग 15% वोट मिले थे, जबकि टीएमसी सिर्फ़ 2% के अंतर से जीती थी। पांडुआ में भी, वाम का लगभग 19% वोट शेयर, जीत के अंतर से ज़्यादा था।

बर्धमान उत्तर में, माकपा का लगभग 12% वोट शेयर, भाजपा के टीएमसी से हारने के अंतर से ज़्यादा था। सोनारपुर दक्षिण में, सीपीआई को लगभग 14% वोट मिले थे, जबकि टीएमसी की जीत का अंतर लगभग 11% था।

जिन सीटों पर वाम-कांग्रेस गठबंधन का वोट शेयर जीत के अंतर से सीधे तौर पर ज़्यादा नहीं था, वहाँ भी उनकी मौजूदगी काफ़ी अहम रही थी। हावड़ा दक्षिण में माकपा  को लगभग 13% और संकराइल में 15% से ज़्यादा वोट मिले थे, जबकि शिबपुर में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक को लगभग 14% वोट मिले थे। पांचला और उलुबेरिया में, आईएसएफ के समर्थन वाले उम्मीदवारों को लगभग 16% वोट मिले थे। जाधवपुर में, माकपा को लगभग 27% वोट मिले थे,, जिससे भाजपा तीसरे स्थान पर खिसक गई थी।

इससे यह बात साफ़ होती है कि इस बार वाम मोर्चा और कांग्रेस के वोट शेयर में कोई भी बदलाव चुनावों के नतीजों पर असर डाल सकता है। ऐसे दौर में, जब जीत का अंतर बहुत कम रहने की उम्मीद है, 2-3% का बदलाव भी निर्णायक साबित हो सकता है। 2021 के चुनावों में संयुक्त मोर्चा को लगभग 9% वोट मिले थे।

2011 के चुनावों में, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने माकपा को सत्ता से बेदखल कर दिया, जिससे राज्य में वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हो गया। 2006 के चुनावों में, CPI(M) ने अकेले 176 सीटें जीती थीं, और 37.13% वोट शेयर हासिल किया था।

बहरहाल, 2011 के बाद से, माकपा की सीटों और वोट शेयर में लगातार गिरावट देखी गई है। 2011 में, माकपा  को 30.08% वोटों के साथ 40 सीटें मिली थीं। 2016 के चुनावों में, जब माकपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था, तो माकपा केवल 26 सीटें ही जीत पाई थी, जबकि उसके वोटों का प्रतिशत गिरकर 19.75% रह गया था। 2021 में, CPI(M) का खाता भी नहीं खुला, और उसके वोटों का प्रतिशत गिरकर महज़ 4.73% रह गया।

2022 के नगरपालिका चुनावों में, माकपा को बंगाल में लगभग 14% वोट मिले, जिसमें कोलकाता में उसे 12% वोट मिले थे। 2023 के पंचायत चुनावों में, जिसमें पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी, माकपा लगभग 14% वोट हासिल करने में कामयाब रही। बहरहाल, 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब वाम मोर्चा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, तो माकपा का वोट शेयर 6% से भी नीचे गिर गया। इतना ही नहीं, वाम अपना खाता खोलने में भी फिर से नाकाम रहा।

2021 में एक भी सीट न जीत पाने के बाद, माकपा ने पूरी तरह से वापसी करने के बजाय अपनी रणनीति में कुछ बदलाव करने की कोशिश की है। पार्टी ने अपने छात्र और युवा संगठनों के युवा नेताओं को आगे बढ़ाया है, बूथ-स्तर पर अपनी मौजूदगी को फिर से मज़बूत करने की कोशिश की है, और अपनी डिजिटल पहुँच का विस्तार किया है। इसका चुनावी अभियान रोज़गार, औद्योगिक गिरावट और भ्रष्टाचार जैसे आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहा है, और साथ ही इसने टीएमसी और भाजपा  दोनों को ही अपर्याप्त विकल्प के तौर पर पेश किया है।

माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने कहा, “लोग तृणमूल से नाराज़ हैं। लोगों का पार्टी से भरोसा उठ गया है। इसलिए लोग एक विकल्प की तलाश में हैं। पहले लोग भाजपा को एक विकल्प के तौर पर देख रहे थे। लेकिन जिस तरह से भाजपा चुनाव प्रचार कर रही है, उससे यह साफ़ है कि वह कोई विकल्प नहीं है। मोदी और शाह ने भवानीपुर में एक भी बैठक नहीं की है। वे कोलकाता में ही डेरा डाले हुए हैं।”

चक्रवर्ती ने ज़ोर देकर कहा कि वामपंथ का समर्थन बढ़ रहा है। "वामपंथी रैलियों में लोगों की भागीदारी बहुत ज़्यादा है। लाल झंडों की लहर-सी है। इससे लोगों का रवैया काफ़ी साफ़ है। पंचायत चुनावों में, वामपंथ ने भाजपा से बेहतर प्रदर्शन किया था। इस बार भी, लोगों के इरादे वही हैं। लोग वामपंथ के साथ चलने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं," उन्होंने कहा।

माकपा की युवा ब्रिगेड के जिन नेताओं ने चुनाव में ताल ठोकी है, उनमें मीनाक्षी मुखर्जी, मयूख बिस्वास, कलातन दासगुप्ता, दीपसिता धर और अफ़रीन बेगम शामिल हैं; ये नेता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और SIR जैसे “असली मुद्दों” को उठा रहे हैं।

हुगली के उत्तरपारा विधानसभा क्षेत्र में, हिंदमोटर स्थित माकपा कार्यालय में लकड़ी की मेज़ों के चारों ओर लाल प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे पार्टी कार्यकर्ता, अपनी उम्मीदवार मीनाक्षी मुखर्जी के लिए चुनाव प्रचार सामग्री व्यवस्थित कर रहे हैं। वे एक पोस्टकार्ड को ध्यान से देख रहे हैं, जिस पर मीनाक्षी का एक संदेश छपा है : यह संदेश स्थानीय निवासियों — विशेषकर युवा मतदाताओं— के बीच वितरित करने के लिए है।

“तो मैं यह कहना चाहती हूँ कि अपना वोट उन लोगों को न दें, जो धर्म के नाम पर वोट माँगते हैं। आप जानते हैं कि चावल और दाल, पेट्रोल और घरेलू गैस की कीमतें धर्म पर निर्भर नहीं करतीं। कीमतों में बढ़ोतरी का असर हम सभी पर पड़ता है।” मीनाक्षी के पत्र में यह बात कही गई है, जिसमें मुख्य विपक्षी दल भाजपा पर निशाना साधा गया है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पर हमला बोलते हुए पत्र में कहा गया है : “और वे लोग, जो पिछले 15 सालों से चुनाव जीतते आ रहे हैं और जिन्होंने सिर्फ़ पैसे चुराए हैं और रिश्वत ली है, उनसे पूछिए कि उन्होंने हमें धोखा क्यों दिया?”

पार्टी दफ़्तर के एक दूसरे कमरे में बैठीं, 40 वर्षीय माकपा केंद्रीय समिति की सदस्य मीनाक्षी मुखर्जी बताती हैं : “पोस्टकार्ड एक नई पहल है। हम युवाओं से अलग-अलग तरीकों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह फ़ैसला उन्हें ही करना है कि वे किसे वोट देंगे। हमने युवाओं के साथ सैकड़ों बैठकें की हैं, ताकि यह जान सकें कि वे क्या सोचते हैं।”

मीनाक्षी माकपा के कई प्रमुख युवा नेताओं में से एक हैं, जिन्हें पार्टी ने मौजूदा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में विभिन्न महत्वपूर्ण सीटों से मैदान में उतारा है। इनमें स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव मयूख बिस्वास (दमदम सीट), कलातन दासगुप्ता (पानीहाटी), दीपसिता धर (दमदम उत्तर) और अफ़रीन बेगम (बालीगंज) भी शामिल हैं। अपनी भाषण कला और जनसंपर्क कौशल के अलावा, ये सभी पार्टी कार्यकर्ता के तौर पर काम करने के लिए भी जाने जाते हैं।

माकपा के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा, इंडियन सेक्युलर फ्रंट  और सीपीआई (एमएल)-लिबरेशन के साथ गठबंधन में बंगाल चुनाव लड़ रहा है। माकपा राज्य की 294 सीटों में से 195 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

मीनाक्षी अपने सेल फ़ोन की ओर देखती है, जो लगातार बज रहा है। उसे पूरे दिन लोगों से मिलने के अलावा कई रैलियों को भी संबोधित करना है। मीनाक्षी का मुकाबला तृणमूल के सिरसन्या बंदोपाध्याय (जो पार्टी के कद्दावर सांसद कल्याण बनर्जी के बेटे हैं) और भाजपा के दीपंजन चक्रवर्ती और कांग्रेस के सुब्रत मुखोपाध्याय से है। "अगर हम प्रासंगिक नहीं हैं, तो फिर तृणमूल और भाजपा एक-दूसरे पर हमला करने के बजाय हम पर हमला करने में ज़्यादा समय क्यों बिता रहे हैं?" वह पूछती है।

लगभग 20 किलोमीटर दूर, उत्तरी 24 परगना के पानीहाटी में, माकपा के उम्मीदवार, 40 वर्षीय कलातन दासगुप्ता, चिलचिलाती धूप में सड़क किनारे प्रचार करते नज़र आ रहे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत एसएफआई  से की थी। सितंबर 2024 में, बंगाल पुलिस ने कलातन को एक वायरल ऑडियो क्लिप के सिलसिले में गिरफ़्तार किया था। यह क्लिप आरजी कर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में एक जूनियर डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और हत्या के विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी थी, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। कलकत्ता हाई कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद, कलातन अब आरजी कर मामले की पीड़िता की माँ, रत्ना देबनाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं ; रत्ना देबनाथ भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं।

सड़क के किनारे आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए, कलातन कई मुद्दों को उठाते हैं — जिनमें चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विवादास्पद 'विशेष गहन पुनरीक्षण' और टीएमसी नेताओं से जुड़े विभिन्न कथित घोटालों से लेकर, महिलाओं की सुरक्षा और पीने के पानी व जल निकासी (ड्रेनेज) जैसी स्थानीय नागरिक समस्याएँ शामिल हैं।

कोलकाता के बालीगंज में, माकपा ने वरिष्ठ टीएमसी  नेता और मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय और भाजपा की शतरूपा के खिलाफ अफ़रीन बेगम को मैदान में उतारा है। यह निर्वाचन क्षेत्र दिवंगत टीएमसी नेता सुब्रत मुखर्जी का गढ़ रहा था, जिन्होंने 2021 में भाजपा उम्मीदवार को 75,000 से ज़्यादा वोटों से हराया था। बहरहाल, उनके निधन के बाद, 2022 के उपचुनाव में, माकपा की सायरा शाह हलीम इस सीट पर दूसरे स्थान पर रहीं, और टीएमसी के बाबुल सुप्रियो से सिर्फ़ 20,000 वोटों से हार गईं थी।

जादवपुर यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च स्कॉलर, 29 साल की अफ़रीन कहती हैं: “हम यहाँ युवाओं के लिए रोज़गार और सबके लिए शिक्षा की माँग करने आए हैं। हम एक धर्मनिरपेक्ष और भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार चाहते हैं।”

इनमें से कुछ सीटों पर, माकपा खेमे को उम्मीद है कि उसकी युवा ब्रिगेड कोई बड़ी सफलता हासिल कर पाएगी और पार्टी को ये सीटें जीतने में मदद करेगी।

CPI(M) राज्य में अपनी खोई हुई ज़मीन वापस पाने के लिए पूरी ताक़त लगा रही है। उसके इन प्रयासों का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि माकपा के 85 वर्षीय वरिष्ठ नेता बिमान बोस भी चुनाव प्रचार में उतर आए हैं। उन्होंने कोलकाता, दक्षिण और उत्तर 24 परगना, हावड़ा और हुगली सहित विभिन्न ज़िलों में पार्टी की पदयात्रा में हिस्सा लिया है।

फिर भी, इन प्रयासों के बावजूद, चुनौतियाँ अभी भी बहुत बड़ी हैं। टीएमसी और भाजपा के बीच का सीधा मुकाबला मतदाताओं की सोच पर हावी बना हुआ है, और वामपंथियों के संगठन में आई कमज़ोरी — खासकर कुछ चुनिंदा शहरी और औद्योगिक इलाकों के बाहर —अभी तक दूर नहीं हो पाई है। इसके अलावा, इस बार कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है, जिससे एक मज़बूत तीसरे गुट के बनने की संभावना कमज़ोर पड़ गई है।