मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी के जन्म दिवस को पसमांदा यौम-ए-इत्तेहाद (Solidarity Day) के रूप में मनाया जाए: एम.डब्ल्यू. अंसारी (आई.पी.एस)

हर कौम की तारीख़ में कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जो सिर्फ अपने वक्त की नहीं, बल्कि आने वाले ज़मानों के लिए भी मशअल-ए-राह बन जाती हैं। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और बाबाए क़ौम मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ऐसी ही दो अज़ीम शख्सियतें हैं जिन्होंने महरूम तबक़ों, ग़रीबों, मज़दूरों और मज़लूमों के लिए अपनी ज़िंदगियाँ वक़्फ़ कर दीं।

मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी के जन्म दिवस को पसमांदा यौम-ए-इत्तेहाद (Solidarity Day) के रूप में मनाया जाए: एम.डब्ल्यू. अंसारी (आई.पी.एस)

हर कौम की तारीख़ में कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जो सिर्फ अपने वक्त की नहीं, बल्कि आने वाले ज़मानों के लिए भी मशअल-ए-राह बन जाती हैं। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और बाबाए क़ौम मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ऐसी ही दो अज़ीम शख्सियतें हैं जिन्होंने महरूम तबक़ों, ग़रीबों, मज़दूरों और मज़लूमों के लिए अपनी ज़िंदगियाँ वक़्फ़ कर दीं। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि एक मुक़द्दस हम - आहंगी है कि इन दोनों अज़ीम इंसानों की तारीख़-ए-पैदाइश एक-दूसरे से मुत्तसिल है। 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर का यौम-ए-पैदाइश और 15 अप्रैल को मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी का यौम-ए-पैदाइश है। इसी लिए अब पूरे मुल्क में 15 अप्रैल को "पसमांदा यूम-ए-इत्तेहाद " ( Solidarity Day) के तौर पर मनाया जाए।

मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी का नाम शायद हर आम ओ ख़ास की ज़ुबान पर इस तरह ना हो जिस तरह अंबेडकर का है, लेकिन उनकी जद्दोजहद की गूंज हर उस दिल में सुनाई देती है जो इंसाफ़, बराबरी और इंसानियत पर यक़ीन रखता है। बिहार की सरज़मीन से ताल्लुक रखने वाले मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ने हमेशा ग़रीबों, किसानों, मज़दूरों और पसमांदा तबक़ात के हुक़ूक़ के लिए आवाज़ बुलंद की। उनका इनक़िलाबी मिज़ाज एक रौशन चराग़ की मानिंद था जो अंधेरे में राह दिखाता था। उन्होंने यह साबित किया कि क़ौम की तामीर सिर्फ बड़े इदारों या हुकूमतों से नहीं, बल्कि अवाम के साथ खड़े होने से होती है और हर ख़ास ओ आम को आला से आला तालीम से आरास्ता करने की जद्दोजहद से होती है।

जब हम इन दोनों शख्सियतों को एक साथ याद करते हैं, तो सिर्फ तारीख़ नहीं दोहरा रहे, बल्कि एक ख़्वाब को ज़िंदा कर रहे हैं। वो ख़्वाब जिसमें जात, नस्ल, मज़हब या ज़बान की बुनियाद पर कोई फ़र्क़ नहीं होता, जहाँ हर इंसान को बराबर समझा जाता है, और जहाँ इंसाफ़ हर दरवाज़े पर दस्तक देता है।

आज भारत के कोने-कोने में डॉ. भीमराव अंबेडकर की गूंज तो है और सरकारी महकमा भी बड़े-बड़े इश्तेहारों के ज़रिए उन्हें याद करता है, लेकिन अली हुसैन आसिम बिहारी को सभी ने फ़रामोश कर दिया है। अब यह मुतालिबा किया जा रहा है कि अली हुसैन आसिम बिहारी के यौम-ए-पैदाइश के मौक़े पर पसमांदा

यूम-ए-इत्तेहाद' मनाया जाए। इस दिन के मनाने का मक़सद यह है कि भारत में हर इंसान को बराबरी का दर्जा दिया जाए, समाजी नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ तमाम लोग मुत्तहिद हो जाएं, तालीमी बेदारी और भाईचारे को फ़रोग़ दिया जाए, हर ख़ित्ते और हर तबके की आवाज़ को अहमियत दी जाए - यही इस दिन का अहम मक़सद है।

आज से दो साल क़ब्ल भारत के वज़ीर-ए-आज़म जनाब नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में अपनी तक़रीर के दौरान कहा था कि पसमांदा तबक़ों के साथ ज़ुल्म व नाइंसाफ़ी हो रही है और यह यकीन दिलाया था कि अब पसमांदा तबक़ों के साथ नाइंसाफी नहीं होगी, लेकिन आज भी सबसे ज़्यादा ज़ुल्म ओ जौर और नाइंसाफ़ी का शिकार पसमांदा ही हैं, चाहे मध्य प्रदेश हो, उत्तर प्रदेश हो, असम हो या उत्तराखंड हो। हर जगह पसमांदा तबक़ों को परेशान किया जा रहा है। बरसर- ए - इक्तिदार पार्टी (बीजेपी) खुद उन्हें टिकट नहीं देती। चाहे पार्लियामेंट्री इंतेख़ाबात हों, या सूबाई इंतेख़ाबात, लोकल बॉडी के चुनाव में भी पसमांदा तबक़ों को नुमाइंदगी नहीं दी जाती। पसमांदा के नाम पर ढेर सारी तंज़ीमें बनी हुई हैं जो सिर्फ और सिर्फ आपस में लड़ाने का काम करती हैं।

अब ज़रूरत है कि पसमांदा तबक़ात मुत्तहिद होकर समाजी और सियासी शऊर पैदा करें - यही वाहिद रास्ता है हर बिरादरी, हर तबके के लिए जिससे वो फ़लाह पा सकते हैं।

मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी का यौम-ए-पैदाइश हर साल हमें यह याद दिलाता है कि भारत के इस अज़ीम सपूत को सिर्फ याद करना काफ़ी नहीं, हमें उनके मिशन को आगे भी बढ़ाना है। आज भी लाखों लोग इंसाफ़, तालीम और रोज़गार से महरूम हैं। अगर हम वाक़ई डॉ. भीमराव अंबेडकर और अली हुसैन आसिम बिहारी के पैरोकार हैं, तो हमें उनके उसूलों पर अमल करना होगा। याद रखें अगर भारत का हर शख़्स एक- दूसरे के दुख को महसूस करने लगे, तो समाज खुद-ब-खुद बदल जाएगा।

आईए, इस साल 15 अप्रैल को सिर्फ यौम-ए-पैदाइश के तौर पर ना मनाएं, बल्कि इसे "यूम-ए-इत्तेहाद " बना दें। एक ऐसा दिन जो हमें यह सिखाए कि चाहे राह अलग हो, मक़सद एक हो सकता है। अंबेडकर और आसिम बिहारी की क़ुर्बानियों और कोशिशों को याद करते हुए हम अहद करें कि हम भी समाजी बराबरी, इंसाफ़ और इंसानी वक़ार के लिए हर सतह पर आवाज़ उठाएंगे। यह तभी मुमकिन होगा जब दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम और पसमांदा तबकात आला तालीम याफ़्ता होंगे, अपनी मजबूत तन्ज़ीम बनाकर बुनियादी और आइनी हुकूक़ के लिए मुत्तहिद होकर जद्दोजहद करेंगे।