मदारिस-ए-दीनीया उर्दू के माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल के ज़ामिन हैं: एम. डब्ल्यू. अन्सारी (रिटायर्ड, आई.पी.एस)

यह सवाल अक्सर ज़ेहनों में उभरता है कि अगर मदारिस-ए-दीनीया न होते तो उर्दू ज़बान का हाल आज के दौर में क्या होता, जबकि खुद हुकूमत मुख़ालिफ़ है और उर्दू दाँ हज़रात की मजबूरी है या बे-हिसी — तो कौन पुरसाने-हाल होता? क्या वाक़ई यह ज़बान सिर्फ़ मुशायरों की महफ़िलों और

मदारिस-ए-दीनीया उर्दू के माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल के ज़ामिन हैं: एम. डब्ल्यू. अन्सारी (रिटायर्ड, आई.पी.एस)

यह सवाल अक्सर ज़ेहनों में उभरता है कि अगर मदारिस-ए-दीनीया न होते तो उर्दू ज़बान का हाल आज के दौर में क्या होता, जबकि खुद हुकूमत मुख़ालिफ़ है और उर्दू दाँ हज़रात की मजबूरी है या बे-हिसी — तो कौन पुरसाने-हाल होता? क्या वाक़ई यह ज़बान सिर्फ़ मुशायरों की महफ़िलों और चन्द नुमाइशी इदारों के सहारे ज़िन्दा रह पाती? तारीख़ का मुताला और मौजूदः हालात का जायज़ा बताता है कि उर्दू का अस्ल सहारा हमेशा वही इदारे रहे हैं जिन्हें हम मदरसे कहते हैं। यह मदरसे न सिर्फ़ दीनी उलूम के मराकिज़ हैं बल्कि ज़बान-ओ-अदब के ऐसे क़िले हैं जहाँ उर्दू साँस लेती है, परवान चढ़ती है और अपनी अस्ल रूह के साथ ज़िन्दा रहती है, नेज़ यही मदारिस हैं जो अरबी और फ़ारसी विरासत को भी बचाए हुए हैं।

यह महज़ दावा नहीं, हक़ीक़त है कि आज भी उर्दू सहाफ़त, तराजिम और अदब की एक बड़ी तादाद मदारिस के फ़ुज़ला ही तैयार कर रहे हैं। अख़बारात हों या रसाइल — हर मैदान में फ़ुज़ला-ए-मदारिस के मज़ामीन ज़रूर देखने को मिल जाएँगे। यही फ़ुज़ला न सिर्फ़ मज़हबी मुतून को आम-फहम ज़बान में मुन्तक़िल करते हैं बल्कि अस्री मज़ामीन और इल्मी मबाहिस को भी क़ाबिल-ए-फहम बनाते हैं। हैरत की बात यह है कि यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों से डिग्री-याफ़्ता अफ़राद की एक बड़ी तादाद बाज़ाब्ता उर्दू ख़त-ओ-किताबत में कमज़ोर दिखाई देती है, लेकिन मदरसे से पढ़ा हुआ तालिबे-इल्म कम-अज़-कम उर्दू को दुरुस्त रस्मुल-ख़त के साथ लिखने-पढ़ने पर क़ुदरत तो रखता ही है।

दूसरी तरफ़, वह तबक़ा जो खुद को उर्दू का आलमबरदार और नुमाइन्दा कहलवाता है, अक्सर मुशायरों तक महदूद है। आज के मुशायरे ज़बान के फ़रोग़ के बजाय बाज़ार की शकल इख़्तियार कर चुके हैं। स्पॉन्सरशिप और इश्तिहारात के बल पर चलने वाले यह इज्तिमाआत ज़बान को मज़बूत करने के बजाय महज़ तफ़रीह और शौहरत का ज़रिया बन गए हैं। शा'इर हज़रात अक्सर अपने कलाम को हिन्दी या रोमन रस्मुल-ख़त में मोबाइल से पढ़ते हैं। यह मनज़र न सिर्फ़ अफ़सोसनाक है बल्कि इस बात का ऐलान भी है कि उर्दू की अस्ल पासबानी इन महफ़िलों से नहीं हो सकती बल्कि यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन इदारों से पूरी हो सकती है जहाँ निसाब, तद्रीस और रोज़ाना की मश्क़ के ज़रिए ज़बान को नई नस्ल तक पहुँचाया जाता है, यानी मदारिस से।

हमारे सामने एक और कड़वी हक़ीक़त यह है कि नई नस्ल की एक बड़ी तादाद उर्दू रस्मुल-ख़त से नावाकिफ़ है। सोशल मीडिया ने इस सूरत-ए-हाल को मज़ीद संगीन कर दिया है। बच्चे और नौजवान रोमन उर्दू में पैग़ाम भेजने को सहल समझते हैं। नतीजा यह है कि उर्दू की किताबत और ख़त्ताती रोज़-ब-रोज़ कमज़ोर हो रही है। यूनिवर्सिटियों में पढ़ने वाले तलबा भी उर्दू को सिर्फ़ "मोहब्बत और शायरी की ज़बान" समझते हैं, जबकि इल्मी ज़बान के तौर पर इसकी इफ़ादियत नज़रअंदाज़ कर दी गई है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यूनिवर्सिटियों और स्कूलों में उर्दू को अमली सतह पर इस्तेमाल करने के मौक़े न होने के बराबर हैं, निसाब और तद्रीस में भी उर्दू का वह वक़ार बाकी नहीं रहा जो होना चाहिए था।

आज के अहद में उर्दू को बचाने के लिए महज़ किताबी मुताला काफ़ी नहीं। हमें टेक्नॉलजी को अपनाना होगा। उर्दू सॉफ़्टवेयर, ई-लाइब्रेरियाँ, मोबाइल ऐप्स और डिजिटल इशाअत वह रास्ते हैं जिनके बग़ैर उर्दू का वजूद ख़तरे में है। मदारिस के तलबा को इस हक़ीक़त से आगाह किया जाना चाहिए कि उर्दू टाइपिंग और कम्पोज़िंग सिर्फ़ एक हुनर नहीं बल्कि ज़बान की बक़ा की ज़ामिन है। जिसने कीबोर्ड पर दौड़ना सीख लिया, वही उर्दू के मुस्तक़बिल को महफ़ूज़ बना सकेगा।

वाज़ेह रहे कि ज़बानें उन इदारों से ज़िन्दा रहती हैं जहाँ पढ़ाई और लिखाई का सिलसिला जारी रहता है, जहाँ नस्ल दर नस्ल इसका ज़ाएक़ा और रस्मुल-ख़त मुन्तक़िल किया जाता है। मदारिस आज भी उर्दू, अरबी और फ़ारसी के वह मुस्तहकम स्तून हैं जिन पर हमारी तहज़ीबी शनाख़्त क़ायम है। लेकिन वक़्त का तक़ाज़ा है कि यह मदारिस सिर्फ़ माज़ी की हिफ़ाज़त न करें बल्कि मुस्तक़बिल की तैयारी भी करें।

फ़िलहाल मुल्क में मज़मूई तालीमी ढाँचे में मदारिस की शरह-ए-तालीम बहुत कम है, महज़ चार से पाँच फ़ीसद तलबा ही मदारिस में ज़ेरे-तालीम हैं। इसके बावजूद यह इदारे अपनी मेहनत और महदूद वसाइल के साथ ज़बान-ओ-तहज़ीब, तमद्दुन/विरासत को ज़िन्दा रखे हुए हैं। ज़रूरत इस बात की है कि मदारिस को अस्री तक़ाज़ों से हम-आहंग किया जाए, टेक्नॉलजी, लाइब्रेरी और जदीद तद्रीसी ज़राए से लैस किया जाए ताकि यह इदारे मज़ीद मोअस्सिर किरदार अदा कर सकें।

यह भी एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि आठवीं जमाअत के बाद बड़ी तादाद में मुस्लिम बच्चे किसी भी वजह से तालीम का सिलसिला मुनक़ता कर देते हैं। यह ड्रॉप-आउट तलबा अगर मुकम्मल तौर पर तालीम से कट गए तो आने वाले वक़्त में हमारी पसमांदगी मज़ीद बढ़ जाएगी। ऐसे में मदारिस ही इन बच्चों के लिए एक सहारा हैं कि वह बुनियादी तालीम और दीनी शऊर के साथ-साथ उर्दू ज़बान और तहज़ीब से जुड़े रहें। ग़रीब और महरूम तबक़े के बच्चे जब मदारिस में दाख़िल हो जाते हैं तो वह दीनी तालीम के साथ-साथ मुआशरती ज़िन्दगी भी सीख और समझ लेते हैं कि कैसे-कैसे चैलेंज का सामना इस्लाम और इस्लाम के मानने वालों को करना पड़ेगा, मुल्क में क्या कुछ हो रहा है और होगा और शरीअत इन हालात में क्या रहनुमाई करती है और यह बच्चे मुआशरे में मुसबत किरदार अदा करने के क़ाबिल हो जाते हैं।

मदारिस के निज़ाम को मुस्तहकम बनाने के लिए ज़रूरी है कि निसाब में बेहतरी लाई जाए, असातिज़ा की तर्बियत के बाक़ायदा इंतेज़ामात हों, बुनियादी सहूलतें फ़राहम की जाएँ और माली शफ़ाफ़ियत को यक़ीनी बनाया जाए, नेज़ सालाना ऑडिट रिपोर्ट के साथ-साथ तमाम ज़रूरी काग़ज़ात बरोक़्त तैयार किए जाएँ। जब यह इदारे मज़बूत बुनियादों पर खड़े होंगे तो न सिर्फ़ मज़हबी उलूम बल्कि उर्दू ज़बान-ओ-अदब की पासबानी भी बेहतर तरीक़े से कर सकेंगे।

अगर हमने वक़्त रहते कोई ठोस इक़दामात नहीं किए तो आने वाली नस्ल उर्दू को सिर्फ़ तर्जुमा की ज़बान समझेगी और वाक़ई उर्दू का जनाज़ा हिन्दी या रोमन रस्मुल-ख़त के ज़रिए निकाला जाएगा। यह हमारे लिए महज़ शर्मिंदगी नहीं बल्कि एक अज़ीम तहज़ीबी ख़सारा होगा जिसकी भरपाई करना हम सब के लिए मुश्किल होगा। इसलिए आज ही से हर एक अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए अपनी तहज़ीब, अपनी विरासत, अपनी शनाख़्त और अपनी ज़बान के तहफ़्फ़ुज़ के तईं ज़िम्मेदार बने, उर्दू पढ़े, उर्दू लिखे और अपने बच्चों को भी उर्दू रस्मुल-ख़त से वाक़िफ़ कराने की हर मुम्किन कोशिश करे। यही हमारी जानिब से उर्दू की बक़ा-ओ-फ़रोग़ और मदारिस के इस्तेहकाम में सबसे बड़ा तआवुन होगा।