10 अगस्त 2025 को पूरे भारत में दलित ईसाई और दलित मुस्लिम "यौम-ए-एहतजाज" के तौर पर मनाएं: एम डब्ल्यू अंसारी (आईपीएस)

10/अगस्त 1950 के दिन को दलित मुस्लिम और दलित क्रिश्चियन अगर "यौम-ए-सियाह" कहें तो शायद बे-जा न होगा। जमीहूरी मुल्क में जिस तरह आईनी तफ़रीक़ इस दिन की गई वो क़ाबिल-ए-अफ़सोस है और उस से बढ़ कर शर्मनाक बात यह है

10 अगस्त 2025 को पूरे भारत में दलित ईसाई और दलित मुस्लिम "यौम-ए-एहतजाज" के तौर पर मनाएं: एम डब्ल्यू अंसारी (आईपीएस)

10/अगस्त 1950 के दिन को दलित मुस्लिम और दलित क्रिश्चियन अगर "यौम-ए-सियाह" कहें तो शायद बे-जा न होगा। जमीहूरी मुल्क में जिस तरह आईनी तफ़रीक़ इस दिन की गई वो क़ाबिल-ए-अफ़सोस है और उस से बढ़ कर शर्मनाक बात यह है कि आज तक किसी ने भी — यहाँ तक कि नाम-निहाद सेक्युलर पार्टियों ने भी — इसे ख़त्म करने की बात नहीं की। जो दलित मुस्लिम और दलित क्रिश्चियन के साथ हुआ है।

जी हाँ! भारत के सभी अकलियत समाज जिन्हें SC-ST ज़मरे में होना चाहिए था, आईनी तफ़रीक़ की बुनियाद पर 10/अगस्त 1950 ही को संविधान की दफ़ा 341 के तहत ख़ास कर मुस्लिम दलित, क्रिश्चन दलित को महरूम कर दिया गया। आज जो भी सियासी पार्टियाँ "जय संविधान" और "संविधान बचाओ" का नारा लगाते हैं, जब SC-ST, दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम के हक़ूक़ की बात की जाती है तो अंधे, बहरे और गूंगे बन जाते हैं। इसका मतलब ये है कि "संविधान बचाओ" महज़ एक नारा है जिसकी आड़ में अकलियत, SC-ST और दलित पसमांदा का इस्तेहसाल किया जा रहा है और इन तबक़ात की हैसियत इस मुल्क में महज़ वोट बैंक की रह गई है।

मालूमात के मुताबिक़ अभी हाल ही में बड़े-बड़े नेता और लीडरान पार्लियामेंट में संविधान को पेशानी से लगाए हुए देखे गए लेकिन इन्हीं लोगों ने NCERT की किताबों से भारत की प्रस्तावना को हटा दिया है जिसमें ये तमाम बातें कही गई थीं कि यह मुल्क जमीहूरी है, इसमें मज़हब की बुनियाद पर, ज़बान की बुनियाद पर किसी के साथ तफ़रीक़ नहीं की जाएगी, सबको बराबर के हक़ दिए जाएँगे लेकिन अब इस प्रीफेस को ही किताबों से हटा दिया गया है जिस पर कोई आवाज़ बुलंद करने वाला नहीं है और ना ही कोई एहतजाज कर रहा है।

एक तरफ़ जहाँ SC-ST, दलित व पसमांदा मुस्लिम और क्रिश्चियन को आईनी हुक़ूक़ से महरूम किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ SC-ST MP जिन्हें ये तमाम तबक़ात अपना भाई कहते हैं, वो भी उनके लिए आवाज़ बुलंद नहीं कर रहे हैं। ये बात भी क़ाबिल-ए-ज़िक्र है कि ये MP भी इन्हीं पसमांदा तबक़ात की मदद से बने हैं लेकिन आज वो भी उन्हें नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जिससे ये साबित होता है कि:

दलित दलित एक समान — चाहे हिंदू हो या मुसलमान

यह महज़ एक नारा है, जिसे अमली जामा पहनाने की कोई बात नहीं कर रहा है। दलित मुस्लिम, ओबीसी मुस्लिम को इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ बहुत ज़रूरी है, जिसके लिए ज़रूरी है कि वो एक साथ मिल कर तालीम, तिजारत, रोज़गार, रोज़ी रोटी और अपने तहफ़्फ़ुज़ के लिए एक-दूसरे का तआवुन करें और एक साथ एक प्लेटफॉर्म पर आकर समाजी और सियासी शऊर का मज़ाहिरा करें और उसके साथ-साथ अपनी लीडरशिप तैयार करें। आने वाले इंतिख़ाबात के एजेंडे में 1950 के सदारती ऑर्डर को ख़त्म करने का मुतालबा शामिल करें। ज़ाती मर्दम शुमारी की बात की जाए और आईनी हुक़ूक़ के लिए आवाज़ बुलंद की जाए और आने वाली 10 अगस्त को पूरे भारत में दलित क्रिश्चियन और दलित मुस्लिम "यौम-ए-एहतजाज" के तौर पर मनाएं ताकि 1950 के सदारती हुक्म को मंसूख किया जाए।

10 अगस्त के दिन महज़ रस्मी एहतजाज से कुछ नहीं होगा बल्कि यह एक तहरीक बननी चाहिए—ऐसी तहरीक जो पसमांदा तबक़ात को बेदार करे, खुद-एहतसाबी पर मजबूर करे, और नफ़रत के जवाब में मोहब्बत फैलाए।

इस हुक्मनामे की वजह से सबसे ज़्यादा मुतास्सिर होने वाले पसमांदा तबक़ात के रहनुमाओं के लिए ज़रूरी है कि महज़ दूसरों पर तन्क़ीद करने के बजाय ख़ुद कुछ काम करके दिखाएँ, जिस तरह पसमांदा रहनुमा अली हुसैन आसिम बिहारी, अब्दुलक़य्यूम अंसारी, बख़्त मियाँ अंसारी वग़ैरा ने मुल्क व मिल्लत के लिए अपनी ज़िंदगी वक़्फ़ कर दी, उसी लगन और मेहनत के साथ आज के लीडरान को भी आवाज़ बुलंद करनी होगी। तमाम पसमांदा लीडर्स के लिए आवाज़ बुलंद करना चाहिए कि अब्दुलक़य्यूम अंसारी को भारत रत्न दिया जाए, अली हुसैन आसिम बिहारी को सही मुक़ाम व मर्तबा दिया जाए और बख़्त मियाँ अंसारी को 53 बीघा ज़मीन जिसका वादा सदर-ए-जम्हूरिया ने किया था, वो दी जाए।

आज पसमांदा बिरादरियों की एक दो नहीं बल्कि सैंकड़ों तंज़ीमें वजूद में आ चुकी हैं, लेकिन अफ़सोस कि इन तंज़ीमों की अकसरियत महज़ नुमाइशी सरगर्मियों तक महदूद होकर रह गई है। जलसे, सेमिनार, यादगार तक़रीबात और रस्मी बयाना तो अकसर देखने को मिलते हैं, मगर जब बात बुनियादी मसाइल—तालीम, रोज़गार, सियासी नुमाइंदगी, रिजर्वेशन, आबादी के तनासुब से टिकट की तक़सीम या 1950 के सदारती हुक्म जैसे अहम मुआमलात—पर दो टूक मौक़िफ़ अपनाने की आती है तो क़ियादत ख़ामोश दिखाई देती है।

इस ख़ामोशी की एक बड़ी वजह ये भी है कि अकसर पसमांदा रहनुमा जब किसी सियासी पार्टी का हिस्सा बनते हैं तो वो अपने तबक़े के मफ़ादात को तरजीह देने के बजाय पार्टी की ज़बान बोलने लगते हैं। उनकी सियासत अपनी बिरादरी की बजाय पार्टी की पालिसियों के गिर्द घूमने लगती है। नतीजतन वो अपनी पहचान खो बैठते हैं और उनकी क़ियादत नुमाइंदा क़ियादत नहीं रहती बल्कि महज़ पार्टी तरजुमान बन कर रह जाती है।

याद रखना चाहिए कि जिस तरह मनुवादी और पूंजीवादी अनासिर हर सतह पर न सिर्फ़ मुनज़्ज़म हैं बल्कि अपने नज़रीयाती एजेंडे पर सख़्ती से क़ायम भी हैं, उसी तरह पसमांदा बिरादरियों को भी बिखरे हुए जज़्बात से निकल कर एक मुत्तहिद, वाज़ेह और हक़ीक़त पसंदाना एजेंडा तैयार करना होगा। ऐसा एजेंडा जो सब का मुश्तरका हो। और हमें ऐसी क़ियादत पैदा करनी होगी जो वाक़ई में पार्टी वाबस्तगी से ऊपर उठ कर अपनी क़ौम, बिरादरी और तबक़े के इज्तिमाई मफ़ाद को मुक़द्दम रखे ना कि पैसों और ओहदों के एवज़ बिक जाए। क्योंकि जब तक हम अपने अंदर से ऐसी क़ियादत पैदा नहीं करेंगे, तब तक पसमांदा क़ियादत का क़ियाम महज़ एक ख़्वाब ही रहेगा।

वरना क्या वजह है कि आज हर तरफ़ पसमांदा तबक़ात पर ज़ुल्म व ज़्यादती हो रही है और कोई बोलने वाला नहीं है? मोहि-ए-गांधी बख़्त मियाँ उर्फ़ बतख मियाँ अंसारी को आज तक इंसाफ़ क्यों नहीं मिला? हुकूमत-ए-हिंद के सदर जम्हूरिया के ऑर्डर को आज तक कोई हुकूमत, कोई सरकार क्यों नहीं पूरा कर पा रही है? क्या पसमांदा की तमाम तंज़ीमों ने कभी अपने हुक़ूक़ के लिए आवाज़ बुलंद की? नहीं! क्योंकि पसमांदा तबक़ात का कोई मुश्तरका एजेंडा नहीं है।

वज़ीर-ए-आज़म ने भी दो साल क़ब्ल पसमांदा का ज़िक्र किया था और उनकी पसमांदगी पर अफ़सोस ज़ाहिर किया था लेकिन वो भी महज़ जुमला ही साबित हुआ, क्योंकि अगर वाक़ई वज़ीर-ए-आज़म अपनी फ़िक्र में सच्चे हैं तो फिर 1950 के सदारती हुक्म को ख़त्म करने की बात क्यों नहीं करते?

आज तमाम पसमांदा तबक़ात और तंज़ीमों को चाहिए कि जब तक आईनी तफ़रीक़ करने वाला 1950 का सदारती हुक्म ख़त्म न हो जाए, इसके लिए तहरीक चलाते रहें और आने वाले तमाम इंतिख़ाबात (Elections) में इसे मुद्दा बनाया जाए।