Previous123Next
 लोकसभा चुनाव की हार और भूपेश बघेल के नेतृव पर सवाल क्यों ?

लोकसभा चुनाव की हार और भूपेश बघेल के नेतृव पर सवाल क्यों ?

24-May-2019

एम.एच.जकरीया, TNIS

लोकसभा चुनाव 2019 में जिस तरह से बीजेपी ने बम्पर जीत हासिल की है वह विपक्षी पार्टियों के गले ही नहीं उतर रही है विपक्ष के द्वारा कई मुद्दों को जोर शोर से उठाने के बावजूद बीजेपी ने आश्चर्यजनक तरीके से जीत दर्ज कर सभी को हैरान कर दिया है अंतिम चरण के मतदान के दिन के बाद दूसरे दिन अधिकतर न्यूज चैनलों ने अपने एग्जिट पोल पर बीजेपी को पूर्ण बहुमत प्राप्त करते हुए भी दिखाया था लेकिन विपक्ष ने इसे खारिज कर दिया और मतगणना के दिन बीजेपी ने बहुमत से भी ज्यादा सीटें पाई इसी तरह बीजेपी ने छत्तीसगढ़ में भी 11 लोकसभा सीटो में से 9 सीटें हासिल की वही कांग्रेस 2 सीटो पर सिमट कर रह गई

प्रदेश में पांच महीने पहले ही विधानसभा चुनाव हुए हैं जिसमे छत्तीसगढ़ की जनता ने 15 सालो से छत्तीसगढ़ की सत्ता पर जमे रमन सरकार को बेदखल कर कांग्रेस को भरपूर प्यार दिया और इसी वजह से कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में 90 में से 68 सीटें मिली वही 15 वर्षो से प्रदेश में राज करने वाली बीजेपी 15 सीटो पर सिमट गई. पांच महीनो के बाद ही लोकसभा चुनाव परिणाम में प्रदेश में कांग्रेस को केवल 2 सीटें मिलने से कई कांग्रेसी दिग्गज आश्चर्य में है वही पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी भूपेश सरकार पर हमला बोला तो कुछ ऐसे भी लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव हुए जिन्होंने कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. हाँ भूपेश सरकार को लोकसभा चुनाव में प्रदेश में आए इस परिणाम पर आत्मचिंतन करने की जरुरत है लेकिन कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को भी यह समझना होगा कि जनता हमेशा मुद्दों पर ही किसी राजनीतिक पार्टी को वोट देती है

विधानसभा चुनाव में जनता ने पूर्व सरकार के कई वादाखिलाफी वादों की वजह से बीजेपी के खिलाफ वोट किया था वही अगर लोकसभा चुनाव में देखें तो कह सकते हैं शायद विपक्ष कई महत्वपूर्ण मुद्दों को भुना नहीं सकी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी अपने अधिकतर सभाओं में केवल राफेल डील की बात पर ज्यादा बोले जबकि उन्हें बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम, डॉलर के मुकाबले रुपया का कमजोर होना, बढ़ते रसोई गैस के दाम जैसे मुद्दों पर ज्यादा फोकस करना था.

फिलहाल चुनाव परिणाम सबके सामने है और बीजेपी दोबारा पूर्ण बहुमत से भी ज्यादा सीटें पाकर एक बार फिर सरकार बना रही है चुनाव हो या मैच सभी में हार जीत लगी रहती है ऐसे में बीजेपी की जीत की वजह से कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर उंगली उठाना तर्क संगत नहीं माना जा सकता है क्योंकि सभी को पता है कि प्रदेश और राष्ट्र के चुनाव में मुद्दे अलग हो जाते है. प्रदेश के विधानसभा चुनाव में आम जनता, किसान लगभग हर वर्ग रमन सरकार के दमनात्मक राज से त्रस्त हो चुका था इसलिए उन्होंने सत्ता परिवर्तन किया लेकिन  लोकसभा चुनाव को भी उसी तारतम्य में देखा जाना सही नहीं कहा जा सकता है सोशल मीडिया में कुछ हताश और घबराये हुए लोग मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर हमला बोल रहे है. हमला बोलने वालों को समझने की ज़रूरत है और यह छत्तीसगढ़ की जनता इसे बेहतर समझ भी रही है कि यह वही लोग है जो भूपेश सरकार के द्वारा पिछली सरकार की फाइलें खोल कर जाँच शुरू करवाने और पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार के दोषियो  की जांच कराने और उन्हें बेनक़ाब कर सजा दिलवाने में तत्परता दिखाने पर अपनी खीज़ इस तरह से निकाल रहे है. हालांकि केंद्र में फिर से मोदी सरकार आई है इसके बावजूद छत्तीसगढ़ सरकार के नेतृत्व को कमज़ोर समझने की गलती इन्हें नहीं करना चाहिए ।

खुलासा पोस्ट न्यूज नेटवर्क को मिली जानकारी के अनुसार लोगों के बीच ऐसी भी चर्चा है कि यह एक बड़ी साजिश के तहत छत्तीसगढ़ की सरकार और भूपेश बघेल को परेशान करने की कोशिश की जा रही हो और सम्भवता उसमे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शामिल है क्योकि लोकसभा चुनाव में कुछ बाते देखी गई थी जिसे जानबूझ कर अनदेखा किया गया फिलहाल भूपेश सरकार के पास जनता का विश्वास जीतने के लिए पांच साल है चुनाव में अपने किए गए वादों के अनुसार छत्तीसगढ़ की सत्ता संभालते ही कांग्रेस ने किसानो के कर्जमाफ किए वही बिजली के दाम भी आधे किए भूपेश सरकार अपने और भी वादों को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं छत्तीसगढ़ में अभी नई सरकार को केवल पांच महीने हुए हैं और ऐसे में लोकसभा चुनाव की हार को लेकर भूपेश बघेल के नेतृव पर सवाल नहीं उठाया जा सकता ।  

 

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की राह नहीं आसां, पांच लाख मुस्लिम वोटर्स तय करेंगे भोपाल लोकसभा का भविष्य !

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की राह नहीं आसां, पांच लाख मुस्लिम वोटर्स तय करेंगे भोपाल लोकसभा का भविष्य !

11-May-2019

भोपाल :मध्यप्रदेश के  पूर्व मुख्यमंत्री  और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कड़े इम्तिहान से गुजर रहे है । किसी समय में  हिंदू आतंकवाद का मुद्दा उठाने वाले दिग्गी राजा  भोपाल में साधुओं की मदद से बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं।
दिग्विजय सिंह जानते हैं कि करीब 19.75 लाख वोटरों वाली भोपाल लोकसभा में मुसलमान उनके साथ खड़े रहेंगे। भोपाल में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब पांच लाख है। बाकी के वोटरों को अपनी तरफ करना दिग्विजय सिंह की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।
 डब्ल्यू हिन्दी पर छपी खबर के अनुसार, भोपाल लोकसभा सीट में अंतर्गत कुल आठ विधानसभा सीटें आती हैं। 2018 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने इन आठ में से पांच सीटें जीती थीं। बाकी वोटरों को अपनी तरफ खींचने के लिए दिग्विजय सिंह अपनी छवि में बदलाव करते भी दिख रहे हैं।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, दिग्विजय सिंह को भी अपनी राजनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। 26/11 के मुंबई हमलों और दिल्ली के बटला हाउस इनकाउंटर जैसे मुद्दों पर विवादित बयान देने वाले दिग्विजय सिंह अब बहुत संभल संभल कर बोल रहे हैं।
दिग्विजय सिंह, भोपाल में अपनी हिंदू विरोधी छवि को बदलने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। भोपाल में उनके चुनाव प्रचार में साधु संत दिखाई पड़ रहे हैं।
दिग्विजय सिंह को 40-42 डिग्री की गर्मी में यज्ञ और हवन भी करने पड़ रहे हैं। दिग्विजय बीजेपी के हिंदुत्व का जवाब अपने सॉफ्ट हिंदुत्व से देने की कोशिश कर रहे हैं। संत यात्रा, हवन, नर्मदा यात्रा इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को बीजेपी का गढ़ समझा जाता है। 1989 से बीजेपी यह लोकसभा सीट लगातार जीतती आ रही है। क्या दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और दिग्गज कांग्रेसी नेता बीजेपी के इस रथ को रोक सकेंगे। 

{मीडिया इन पुट }


श्रमजीवी के नाम पर पत्रकारों के अधिकारों का हनन !

श्रमजीवी के नाम पर पत्रकारों के अधिकारों का हनन !

01-May-2019

एम.एच.जकरीया 

मई माह का पहला दिन यानि आज 1 मई को श्रमिक दिवस के नाम से जानते हैं कभी पत्रकार भी श्रमजीवी कहलाया करते थे लेकिन आज के बदलते वक्त में अब श्रमजीवी पत्रकार मीडियाकर्मी बन गए हैं. भले ही शब्द बदल गए हो लेकिन आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो खुद को श्रमजीवी पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं श्रमजीवी कहलाने का अर्थ वे लोग बखूबी जानते हैं, जो आज भी श्रमजीवी बने हुए हैं किन्तु जो लोग मीडियाकर्मी बन गये हैं उन्हें एक श्रमजीवी होने का सुख भला कैसे मिल सकता है। एक श्रमजीवी और एक कर्मचारी के काम में ही नहीं, व्यवहार में भी अंतर होता है।

एक मीडियाकर्मी या कर्मचारी का लक्ष्य और उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ एक निश्चित कार्य को पूर्ण कर अधिकाधिक पैसा कमाना होता है किन्तु एक श्रमजीवी का अर्थ बहुत विस्तार लिये हुए है । उसका उद्देश्य और लक्ष्य पैसा कमाना नहीं होता पत्रकारिता में आने का ध्येय रूपये कमाना नहीं बल्कि सुख कमाना है अपनी लिखी खबर से निकम्मों के खिलाफ, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्यवाही होते देखना है कह सकते हैं ऐसे बेबाक एवं वास्तविक श्रमजीवी पत्रकार इसीलिए गरीबी में जीते हैं और गरीबी में ही मर जाते हैं । यही पत्रकार सेवा  भाव से कार्य करते हैं न कि कर्मचारी के भाव से।

कुछ ऐसे भी श्रमजीवी पत्रकार या पत्रकार संगठन के नेता हुए हैं जो वास्तविक श्रमजीवी  पत्रकारों का शोषण करते हैं इसका बड़ा उदहारण छत्तीसगढ़ में ही देखने को मिल जाएगा. ये पिछली सरकार के द्वारा पोषित थे, ये पत्रकार नेता संगठन का दबाव दिखाकर जनसम्पर्क विभाग से लम्बी चौड़ी राशि एजेंसी के नाम पर वसूल करते रहे यहां पर सवाल यह है कि यदि ये पत्रकार नेता खुद का न्यूज एजेंसी चलाते थे तो फिर ये श्रमजीवी पत्रकार कैसे हुए ?

कह सकते हैं तत्कालीन सरकार ने आँखे बंद कर फर्जी तरीके से चलने वाले न्यूज एजेंसियों जो कभी खुलते ही नहीं थे उन्हें आँख बंद कर पैसे बाँटे थे यही श्रमजीवी पत्रकार संगठन का नेता पत्रकारों का कम अपना हित ज्यादा साधते थे वे सरकार को संगठन का धौंस दिखाकर अपना काम निकलवाते रहे हैं. जिसे सीधे साधे पत्रकार बंधू समझ नहीं पाते है साल में एक दो बार किसी मंत्री या  मुख्यमंत्री  के आतिथ्य में सम्मेलन कराने के नाम पर पिछली सरकार से मोटा पैकेज और व्यापारियों से चंदा उगाही करते थे और सम्मलेन के नाम पर पत्रकारों से भी वसूली करके ये पत्रकारों के नेता अपनी जेबे भरते रहे वैसे इनमे से अधिकतर या तो पूर्व पत्रकार है  या पत्रकार ही नहीं है

जहाँ तक मेरी जानकारी है इन तथाकथित पत्रकारों के ना एक भी लेख प्रकाशित होते है और ना ही समाचार दिखाई देते है ये केवल वास्तविक पत्रकारों का शोषण करते है जागरूक पत्रकार भाइयो को समझना होगा और ऐसे फर्जी पत्रकार नेताओ को बे-नकाब किया जाना चाहिए तभी छत्तीसगढ़ में साफ सुथरी पत्रकारिता हो सकेगी !

 

धार्मिक हिंसा या राजनीतिक बदला? विश्लेषकों ने श्रीलंका हमले के पीछे छिपे संदेश को समझाया

धार्मिक हिंसा या राजनीतिक बदला? विश्लेषकों ने श्रीलंका हमले के पीछे छिपे संदेश को समझाया

28-Apr-2019

21 अप्रैल को हुए श्रीलंका के हमले ने कई सवाल खड़े किए हैं। रूसी न्यूज एजेंसी स्पुतनिक से बात करते हुए, विश्लेषकों ने चर्चा की कि खुनखराबा दुनिया को क्या संदेश दिया और हमलों से कौन लाभान्वित हो सकता है। ईस्टर की छुट्टी के दौरान श्रीलंका में तीन ईसाई चर्चों और होटलों की बमबारी ने कई लोगों को आश्चर्य में डाल दिया। 1983-2009 के गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से, राष्ट्र को धार्मिक उत्पीड़न या उग्रवादी इस्लामी हिंसा के अधीन नहीं किया गया है।

धार्मिक हिंसा या राजनीतिक बदला?

एक पूर्व आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञ और सीआईए सैन्य खुफिया अधिकारी फिलिप गिराल्डी ने इस बात पर सहमति जताई कि छोटे द्वीप श्रीलंका के ईसाई अल्पसंख्यक के खिलाफ धार्मिक हिंसा के अचानक प्रकोप ने बहुत भ्रम पैदा कर दिया है। देश के 2011 की जनगणना के अनुसार, श्रीलंका के 70 प्रतिशत लोग बौद्ध हैं और 13 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि क्रमशः 9.7 और 7.4 प्रतिशत ही मुस्लिम और ईसाई हैं।

भूराजनीतिक विश्लेषक और यूरेशिया फ्यूचर के निदेशक एडम गैरी का मानना है कि धार्मिक हिंसा के मकसद के अलावा, कुछ ताकतें राष्ट्र को आंतरिक हिंसा में वापस लाने की कोशिश कर रही हैं। विश्लेषक ने उल्लेख किया कि “तथ्य यह है कि श्रीलंका की मुस्लिम आबादी बहुत छोटी है और लंबे समय से बौद्ध बहुमत के साथ मेल खाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह आतंकवादियों को लाभ नहीं देती है” विश्लेषक ने नोट किया कि श्रीलंका में हमलावरों के लिए यह एक विश्वसनीय मकसद नहीं है”।
भूराजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि “लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) आतंकी समूह द्वारा श्रीलंकाई अधिकारियों द्वारा पराजित किए जाने के दस साल बाद श्रीलंका को आंतरिक युद्ध पर वापस लाने के लिए हमला किया गया था।” एलटीटीई की स्थापना मई 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरन ने की थी और श्रीलंका के उत्तर और पूर्व में तमिल ईलम का एक स्वतंत्र राज्य बनाने की मांग की थी।

देश के यात्रा उद्योग के एक स्पष्ट संदर्भ में, भू राजनीतिक विश्लेषक ने सुझाव दिया, कि “यह ओवरराइडिंग संदेश लगता है कि वे आतंकवादी भेजना चाहते थे। एक दशक की शांति के बाद, श्रीलंका के दुश्मन अब शांतिप्रिय श्रीलंकाई लोगों को सुरक्षित महसूस नहीं करना चाहते हैं। आतंकवादियों का भी श्रीलंका को नुकसान पहुंचाने का एक स्व-स्पष्ट उद्देश्य था जो राष्ट्र के लिए धन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है।”

23 अप्रैल को, ISIS ने कथित रूप से घातक हमलों के लिए जिम्मेदारी का दावा किया, जबकि श्रीलंकाई रक्षा मंत्री रुवेन विजेवर्देने ने सुझाव दिया कि मार्च में न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों में ट्रांसप्लांट किए गए बड़े पैमाने पर गोलीबारी के लिए जवाबी कार्रवाई में श्रीलंका में बम विस्फोट किए गए।

बीजिंग स्थित राजनीतिक विश्लेषक और चीन के राष्ट्रीय प्रसारक सीसीटीवी के वरिष्ठ संपादक और कमेंटेटर टॉम मैकग्रेगर ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह हमला इस्लामवादियों द्वारा “सामाजिक व्यवस्था को बाधित करने और ईसाइयों को निशाना बनाने की कोशिश” द्वारा किया गया था।

मैकग्रेगर ने विरोध किया, कहा “जाहिर है, यह कट्टरपंथी इस्लामवादियों द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बाधित करने और ईसाइयों को लक्षित करने के लिए किया गया एक हमला था। मीडिया रिपोर्टों ने पहले ही खुलासा कर दिया है कि और हमें जल्द ही और अधिक विवरण सुनने की संभावना है। माना जा रहा है कि कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि यह शूटिंग क्राइस्टचर्च पर बदला है। लेकिन असली कहानी यह केवल अवसर का अपराध है”.

पत्रकार मैकग्रेगर के अनुसार, आतंकवादी “श्रीलंका को एक आसान लक्ष्य के रूप में देखते हैं”। मैकग्रेगर ने समझाया कि “यह एक गरीब देश है और यहां सार्वजनिक सुरक्षा अपेक्षाकृत कमजोर है”, उन्होंने कहा कि “मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है, कि कोलंबो में कैथोलिक चर्च सुरक्षा गार्डों को नियुक्त करने में विफल रहे थे, जबकि सरकार ने एक पूर्व आतंकी अलर्ट जारी करते हुए कहा था कि योजनाबद्ध हमलों में ईसाइयों को लक्षित किया जा सकता है।”

उन्होंने अपराध की जटिलता का उल्लेख किया और श्रीलंकाई पुलिस की व्यावसायिकता पर संदेह व्यक्त किया: “श्रीलंका की सार्वजनिक सुरक्षा में इतनी खामियां देखकर आतंकवादियों के पास बम और हथियार रखने का पर्याप्त समय और क्षमता थी, जो गहराई से परेशान करने वाला है”.

श्रीलंकाई अधिकारियों ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय तौहीद जमाल, एक छोटी ज्ञात इस्लामी आतंकवादी संगठन है, जो पहले बौद्ध प्रतिमाओं के साथ बर्बरता करने के लिए जाना जाता था, और यह हमलों में शामिल था। गैरी के अनुसार, “इस छोटे और अस्पष्ट समूह के बारे में जो कुछ भी जाना जाता है, उसके आधार पर, यह आतंक के एक बड़े एजेंट के लिए एक मोर्चे से थोड़ा अधिक प्रतीत होता है, सबसे अधिक संभावना एक विदेशी राज्य खुफिया एजेंसी है जो जमीन पर आतंकवादियों के साथ काम कर रही है “।

भू-राजनीतिक विश्लेषक ने जोर देकर कहा कि “यह मुश्किल ही नहीं बल्कि यह विश्वास करना असंभव है कि इस तरह का एक छोटा समूह इस तरह के राष्ट्रव्यापी और अत्याचार के अत्यधिक समन्वित सेट को खींच सकता है”। यह लगभग तय है कि जमीन पर आतंकवादियों को बाहरी सहायता मिली थी”। मैकग्रेगर ने चेतावनी दी कि “देश में कई आतंकवादी कोशिकाएं अभी भी बिना किसी बाधा के काम कर रही हैं, जबकि अन्य पहले से ही बहुत हस्तक्षेप के बिना देश से भाग गए हैं”। पत्रकार ने कहा, “यह निकट भविष्य में और अधिक आतंकवाद के हमलों के लिए तैयार है और इन अपराधियों को बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए वे संभवतः ईसाई और चर्च पर टार्गेट करेंगे।”

और अंत में बता दें कि 21 अप्रैल को, कोलंबो के उत्तर में एक शहर, नेगोंबो (कोलंबो के एक शहर) और पूर्वी तट पर एक शहर, बटलिकलोआ में 359 लोगों मारे गए जिसमें ईसाई चर्च और होटल प्राथमिक लक्ष्य थे। Agence France Presse के अनुसार, श्रीलंकाई पुलिस ने हमलों से 10 दिन पहले एक खुफिया अलर्ट जारी किया, जिसमें कहा गया कि आत्मघाती हमलावरों ने “प्रमुख चर्चों” को विस्फोट करने की योजना बनाई है। जैसा कि 23 अप्रैल को सीएनएन ने उल्लेख किया, कि प्रारंभिक चेतावनी एक संदिग्ध आइएस से प्राप्त जानकारी पर आधारित थी।

मीडिया इन पुट 


पल्टुओं से सावधान

पल्टुओं से सावधान

10-Apr-2019

एम.एच. जकरीया 

सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस प्रवेश करने वाले पल्टूओ की बाढ़ सी आ गई है । जनता के दिल तक पहुँचने के लिए  भूपेश बघेल ने जो कुर्बानियां दी है आज उसी का प्रतिफल है छत्तीसगढ़ मे कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन सत्ता के भूखे पद लोलुप तथाकथित नेता अब उसी कांग्रेस मे जुड़ कर सत्ता सुख भोगना चाहते हैं, क्या ये उन कांग्रेस कार्यकर्ताओ को मंजूर होगा  ?  जिस संगठन के लिये भूपेश बघेल के साथ-साथ कांग्रेस के एक एक कार्यकर्ताओं  ने अपना खून पसीना एक कर दिया, अब कामयाबी का मजा तथाकथित नेता जोगी कांग्रेस के एक नेता का पत्र  कल से सोशल मीडिया मे घूम रहा है.

उनका कहना है की जोगी कांग्रेस में जाना मेरी सबसे बड़ी भूल थी, सोशल मीडिया में  कुछ लोग  कह रहे है  घर का भुला की  घर वापसी जैसी संज्ञा दी जा रही है ? लेकिन  जिसे वो अपनी भूल बता रहे हैं ये वही अवसर वादी लोग है जिन्होंने  एक समय मे चरण छूने वाली परंपरा आगे बढ़ाया था, मुझे अच्छी तरह से याद है एक समय में चरण छूने वाले को ही तरजीह मिलती थी उस समय कांग्रेस की ऐसी ही परम्परा बना दी गई थी ।  

जिसे  भूपेश बघेल जैसे नेताओ ने तोड़ा और कार्यकर्ताओ को  बराबरी का सम्मान दिया और कंधे से कंधा मिलाकर बराबरी का अहसास दिलाया, आज मुझे उस पत्र को लेकर ही  लिखने के लिए विवश होना पड़ा है ! ये नेता किसी समय मे एक कद्दावर नेता के पिछलग्गू रहे है उनकी मेहरबानी से विधायक और फिर मंत्री बने कांग्रेस के संघर्ष काल मे जोगी जी से जुड़े और कांग्रेस को कोसने लगे जब सत्ता तक नही पहुँच पाए तो अब पछतावा और अपनी भूल बता रहे हैं । ऐसे लोगो को फिर से कांग्रेस मे लिया जाना उन कार्यकर्ताओ के आत्म सम्मान का मजाक बनाना होगा !

ये वही लोग है जो पिछली सरकार की सांठ गांठ  करके सत्ता सुख के लिए  अलग अलग तरीके से भूपेश बघेल  और  कांग्रेस संगठन को  हर तरह  से नुकसान पहुँचाते रहे जिसके लिये भूपेश बघेल और उनके परिवार ने यातनाएं सही, अब यही लोग फिर से भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके इर्द गिर्द मंडराने लगे हैं ।

ये बात सही है कि कांग्रेस संगठन एक समुद्र है, जो सभी को पनाह देता रहा है कुछ लोगो का लोकसभा चुनाव के चलते संगठन मे वापसी भी हुई है लेकिन जिन कार्यकर्ताओ ने कांग्रेस के संघर्ष काल के समय बिना किसी उम्मीद के कांग्रेस संगठन को जिताने में अपना सब कुछ लगाया है और सरकार बनने के बाद उनकी कई उम्मीदे हैं जिनका पूरा ख्याल भूपेश बघेल  और उनके मंत्रियो को रखना होगा और ऐसे अवसर वादी बहरूपिये नेताओं को जीवन भर कांग्रेस संगठन मे प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए

 

        काश!  मैं होता सांसद

काश! मैं होता सांसद

17-Mar-2019

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक)

       काश! मैं होता सांसद यह प्रश्न बार-बार मेरे जेहन में कौंधकर रहा है कि मुझे अब सांसद बनने जनता की अदालत में जाना चाहिए। इसलिए की मेरे सांसद ने मुझे, क्षेत्र और मूल्क को धोखा देकर विकास व समृद्धि को रोका है। यहां तक कि झोली में आई सांसद निधी मुंह दिखाई के नाम पर रेवड़ियों की तरह बांटी गई वह भी आधी-अधूरी। भेड़चाल इनकी मौजूदगी के कोई मयाने नहीं रहे, रवानगी ही समय की मांग और आवश्यकता है। विपद ये ज्यादा देर टीके रहे तो बचा-कचा भी बेड़ागर्ग हो जाएगा। दुर्भाग्यवश! असलियत कहें या हकीकत अधिकतर सांसदों के आलम यही है। बतौर इनके प्रति बढ़ता जनाक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है मद्देनजर नकारों को नकारने मुस्तैदी से बदलाव की बयार लाना ही एकमेव विकल्प है। 

       संकल्प, जरूरत पड़ी तो लोकशाही के मैदान में उतरना भी पड़े तो जिम्मेदारी से मुंह नहीं फेरेंगे बल्कि जमकर मुकाबला करेंगे। महासमर में मैं कमर कसकर  खड़ा हूँ, क्यां आप भी तैयार है। याद रहें बागडोर अपने कांधों में लेकर ही व्यवस्था सुधारी जा सकती है। मत और ज्ञान दान से ही नहीं, उसका दौर खत्म सा होते चला। यथा बिना वक्त गवाये संसद का रास्ता अख्तियार करने जुट जाए। भागीदारी मूलक हम सांसद का मूलाधार प्राचीन, विशाल और जनतांत्रिक संसदीय प्रणाली को अक्षुण्ण रखने में मददगार साबित होगा।

       बहरहाल चलिए, बधाई हो 16 वीं लोकसभा का पूर्ण कालिन पंचवर्षीय कार्यकाल बे-रोकटोक समाप्त हुआ। अब कुछ ही दिनों में 17 वीं लोकसभा के लिए हमें फिर से मतदान करना होगा। वह भी सौ टका, तब जाकर एक मनवांछित बहुमती सरकार जनता की पहरेदार बनेगी। अन्यथा मतलबी अयारों की बैसाखी पर बैठी अल्पमति सरकार के दुखड़े जनआकांक्षाओं के टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ेंगी। जैसा हम कई मर्तबा देखते और भोगते आए है, विभीषिका विकसीत भारत का सपना आज भी अधूरा ही है।  शुक्र है निवृतमान में ऐसा नहीं हुआ फलीभूत जनमत सलामत रहा। 

     . मतलब, स्पष्टतौर पर कहा जा सकता है कि वतन की तरक्की में स्थाई सरकारों की खासी दरकार है। जिसमें हमारे सांसदों की विशेष भूमिका रही है लेकिन इनमें से बहुतों ने इसे अदा करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। नाफरमानी पदलोलुप्ता व सत्ता-सुख की लालसा में अपने स्वार्थ को साधा जिसकी सजा आमजन को मिली। लिहाजा ऐसे नुमांईदों से बचाव ही एक रास्ता है, राहबर आगामी लोकसभा में ऐसे सांसदों का चुनाव करे जो अपने लिए कम देश के बारे में अधिक सोचे। ताकि देश में और एक बार स्थिर सरकार सफलता के झंडे गाड़े क्योंकि ढूलमूल गठबंधन में बे-मेल, दलों का दलदल रसातल के सिवाय और कुछ नहीं है। 

      सचेत इसके वास्ते हमें बढ़ी सजगता से सदन में सांसद भेजने की जिम्मेवारी मन से निभानी पड़ेगी। रवैया पवित्र संसद को नीर-क्षीर बनाकर गुलेगुलजार करेगा। महफूज मुश्किलों के दौर में निष्ठी सांसद कहां से ढूंढेंगे या चुनेंगे ये बहुत बड़ी चुनौती बनेगी। रवायत दर्द का मर्ज हमारे हाथ में है जरूरत है तो इस्तमाल करने की। वह हर हाल में अब करना ही होगा वरना हमारी विशाल राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नेस्तनाबूत होते देर नहीं लगेगी। अफसोस जनक हालातों से वाकिफ सांसद जिम्मेदारी लेने के बजाए बढ़ावा देने पर तुले हुए है। 

      अलबत्ता निष्क्रिय, ठगियों को बॉय-बॉय और सक्रिय, उपयोगियों को हाय-हाय करने की बारी अब हमारी है। नहीं करेंगे तो समझिए आने वाली पुश्तें हमें कदापि माफी नहीं करेंगी । बेहतरतीब, बेलगाम व्यवस्था और दुशवारियों के कारक हमीं बने रहेंगे। मिथक को तोड़ते हुए मनपसंद की जगह हर पसंद के सांसद को नुमाईंदगी का मौका मिले येही देश के खातिर हितकारी होगा। आखिर संसद में सांसद देश का भविष्य लिखते है उन पर पैनी नजर रखना हम सबका नैतिक कर्तव्य व दायित्व है। अमलीजामा खुले-सच्चे मन से निरीही और निस्पृही सांसद बनकर या बनाकर काश! मैं होता सांसद आत्मोन्नति की मनोवृति परिवर्तित होकर सांसद-सांसद का घनघोर गुंजार करेंगी। बेहतर बे-पटरी होते जनतांत्रिक आधार स्तंभ चुस्त-दुरूस्त होने लगेंगे। यथेष्ठ एक राष्ट्र, श्रेष्ट्र राष्ट्र सदा सर्वदा बना रहेगा।

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक)

 


विधायक हराते-हराते, सरकार ही गवां दी

विधायक हराते-हराते, सरकार ही गवां दी

17-Dec-2018

(हेमेन्द्र क्षीरसगर, पत्रकार, लेखक व विचारक)

       उन्हें नजरअंदाज ना करों जो तुम्हारी बहुत परवहा करते है, वरना एक दिन पत्थर चुनते-चुनते हीरा गवा दोगें।  ये कहावत तब चरितार्थ हुई जब मध्यप्रदेश में विधान सभा चुनाव के परिणाम सामने आए। यहां विधायक हराते-हराते लोगों नेे अपनी सरकार ही गवां दी। वह सरकार हरा दी जिसे बनाये रखना चाहती थी। पर करे कोई और भरे कोई के चक्कर में अपने चेहते शिवराज सिंह चौहान को ही खो दिया। और अब पछताये क्यां जब चिडिय़ा चुक गई खेत। देना था वनवास  विधायक को और दे दिये मुख्यमंत्री को। उस मुख्यमंत्री को जिसने पैदा लेने से लेकर मरने तक योजना बनाकर सदा जन कल्याण ही किया। आखिर ! इनसे क्यां खता हुई जो सजा इनको मिली। आज भी प्रदेश की जनता यह मानने को तैयार नहीं हो रही है कि मामा हमारे मुख्यमंत्री नहीं रहे। यह इनके लिए सब्जबाग की तरह लग रहा है लेकिन सच तो सच है इसे मानना ही पड़ेगा कि शिवराज पक्ष में नहीं अपितु विपक्ष में रहकर काम करेंगे। 

        चलो, कहीं भी रहेंगे पर रहेंगे हमारे साथ। यही सही मायनों में लोकतंत्र है जहां सरकारों का आना-जाना लगा रहता है। दौर में जो याद रहतें है वह दिलों पर राज करते है ऐसे ही आम आदमी के आम नेता है शिवराज। जिनकी कमी आज लोगों को कूट-कूटकर खल रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो शिवराज सिंह ने मध्यप्रदेश को नहीं गवाया बल्कि मध्यप्रदेश ने शिवराज को गवा दिया।  इतिहास में ऐसे मौके बिरले ही आए होगें जब एक जननेता की रवानगी के लिए आमजन ने खुशी के बजाए गम बनाया हो। बहरहाल, इसी का नाम तो राजनीति जहां रातों सत्ता बदल जाती है और नायक से खलनायक बनते देर नहीं लगती क्योंकि आज भी हमारे यहां दिमाग से नहीं वरन् दिल से मतदान होता जो सही गलत का चुनाव विचार से कम  भावनाओं से ज्यादा करता है।  
       अलबत्ता, कारण कुछ भी रहे हो जनादेश को नतमस्तक हर हाल में करना पड़ेगा यही वक्त की नजाकत और सच्चाई है। लिहाजा, गिनने चले तो मध्यप्रदेश में अफरशाही, लालफिताशाही, गलत टिकट वितरण, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, मनगढ़त मांई के लाल तथा मंत्रियों विधायकों और नेतागिरी की पराकाष्ठा इत्यादि बेरूखी की वजह सतारूढ़ दल के लिए हार का सबब बनी। दूसरी ओर लोक लुभावन वादें, सही उम्मीदवारों का चयन, संगठित चुनावी रणनीति और अन्य दलों का आंतरिक समर्थन कांग्रेस के वास्ते सत्ता वापसी का कारक बना जिसके लिए ये बधाई के पात्र बनकर  जीत के द्वार तक पहुंचेे।  यहां यह देखना यह लाजिमी होगा कि नवगठित सरकार अपने वादे-इरादे पर कितनी खरी उतरती है। उतर जाए तो जनमत के बल्ले-बल्ले नहीं तो भाजपा से महज 5 कदम आगे रही कांग्रेस को 50 कदम पीछे रहने में देर नहीं लगेगी क्योंकि यह पब्लिक है सब जानती बनाना और बिगडऩा भी।

            इसीलिए जनता की भलाई में सर्वस्त्र न्योछावर करने की बारी अब कांगेंस की है वह क्यां कर गुजरती है ये आने वाला वक्त ही बताएंगा अभी से इसकी चर्चा करना नागवार है। इसमें एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने की जवाबदारी भाजपा को उठानी पड़ेगी क्योंकि जनता ने इन्हें भी नकारा नहीं है। हां संख्या बल में जरूर थोड़ा सा कम कर दिया है, जिसकी चौकीदारी  की जिम्मेदारी शिवाराज सिंह चौहान ने ले रखी है। इन शुभ संकेतों से दोनों ही हालातों में प्रदेश की 7.27 करोड़ जनता का भला और सूबे का विकास  ही होगा।  काश! ऐसा हो जाए यह तो सोने पे सुहागा हो जाएगा और देश के लिए एक मिशाल। जहां पक्ष व  विपक्ष दोनों कांधे से कांधा मिलाकर बहुमत के मान-सम्मान के लिए है तत्पर। बानगी में स्वच्छ और स्वस्थ लोकतंत्र के असली हकदार कहलाएगें हमारे राजनीतिक पहरेदार। तब जाकर हार-जीत पर कोई असर नहीं पड़ेगा और सत्ता के साथ व्यवस्था बदलते रहेंगी येही हम सबकी चाहत हैं। 
(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार,  लेखक व विचारक)

Type aSeen by Shoaib Zakariya at 12:34 PM
 

क्यों बदहाल एवं उपेक्षित है बचपन?

क्यों बदहाल एवं उपेक्षित है बचपन?

22-Nov-2018

लेख : ललित गर्ग

संपूर्ण विश्व में ‘सार्वभौमिक बाल दिवस’  20 नवंबर को मनाया गया। उल्लेखनीय है कि इस दिवस की स्थापना वर्ष 1954 में हुई थी। बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूकता तथा बच्चों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए यह दिवस मनाया जाता है।बच्चों का मौलिक अधिकार उन्हें प्रदान करना इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें शिक्षा, सुरक्षा, चिकित्सा मुख्य रूप से हैं। आज ही बाल अधिकार दिवस भी है, विश्वस्तर पर बालकों के उन्नत जीवन के ऐसे आयोजनों के बावजूद आज भी बचपन उपेक्षित, प्रताड़ित एवं नारकीय बना हुआ है, आज बच्चों की इन बदहाल स्थिति की जो प्रमुख वजहें देखने में आ रही है वे हैं-सरकारी योजनाओं का कागज तक ही सीमित रहना, बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, इनके प्रति समाज का संवेदनहीन होना एवं गरीबी, शिक्षा व जागरुकता का अभाव है। 

सार्वभौमिक बाल दिवस पर बच्चों के अधिकार, कल्याण, सम्पूर्ण सुधार, देखभाल और शिक्षा के बारे में लोगों को जागरूक किया जाता है। दुनिया में सभी जगहों पर बच्चों को देश के भविष्य की तरह देखते थे। लेकिन उनका यह बचपन रूपी भविष्य आज अभाव एवं उपेक्षा, नशे एवं अपराध की दुनिया में धंसता चला जा रहा है। बचपन इतना डरावना एवं भयावह हो जायेगा, किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। आखिर क्या कारण है कि बचपन बदहाल होता जा रहा है? बचपन इतना उपेक्षित क्यों हो रहा है? बचपन के प्रति न केवल अभिभावक, बल्कि समाज और सरकार इतनी बेपरवाह कैसे हो गयी है? यह प्रश्न सार्वभौमिक बाल दिवस मनाते हुए हमें झकझोर रहे हैं। 

जब हम किसी गली, चैराहे, बाजार, सड़क और हाईवे से गुजरते हैं और किसी दुकान, कारखाने, रैस्टोरैंट या ढाबे पर 4-5 से लेकर 12-14 साल के बच्चे को टायर में हवा भरते, पंक्चर लगाते, चिमनी में मुंह से या नली में हवा फूंकते, जूठे बर्तन साफ करते या खाना परोसते देखते हैं और जरा-सी भी कमी होने पर उसके मालिक से लेकर ग्राहक द्वारा गाली देने से लेकर, धकियाने, मारने-पीटने और दुव्र्यवहार होते देखते हैं तो अक्सर ‘हमें क्या लेना है’ या ज्यादा से ज्यादा मालिक से दबे शब्दों में उस मासूम पर थोड़ा रहम करने के लिए कहकर अपने रास्ते हो लेते हैं।

ऐसा भी देखने में आता है कि गंदे, फटे कपड़े पहने ये बच्चे अपने व परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए सुबह से लेकर देर शाम तक बजबजाते कूड़ों के ढेर पर इन्हें देखा जा सकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों व गरीबी के मार से बेहाल होकर इस नारकीय कार्य करने को विवश है। कूड़ों के ढेर से शीशी, लोहा, प्लास्टिक, कागज आदि इकट्ठा करके कबाड़ की दुकानों पर बेचते हैं। इससे प्राप्त पैसों से वह अपने व परिवार का जीविकोपार्जन करते हैं। लेकिन कब तक हम बचपन को इस तरह बदहाल, प्रताड़ित एवं उपेक्षा का शिकार होने देंगे। 

किसी भी राष्ट्र का भावी विकास और निर्माण वर्तमान पीढ़ी के मनुष्यों पर उतना अवलम्बित नहीं है जितना कि आने वाली कल की नई पीढ़ी पर। अर्थात् आज का बालक ही कल के समाज का सृजनहार बनेगा। बालक का नैतिक रूझान व अभिरूचि जैसी होगी निश्चित तौर पर भावी समाज भी वैसा ही बनेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि बालक नैतिक रूप से जिसे सही समझेगा, आने वाले कल के समाज में उन्हीं गुणों की भरमार का होना लाजिमी है। ऐसी स्थितियों में हम बचपन को शिक्षा की ओर अग्रसर न करके उनसे बंधुआ मजदूरी कराते हैं, इन स्थितियों का उन पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता है, और इन कमजोर नींवों पर हम कैसे एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं?

हमारे देश में भी कैसा विरोधाभास है कि हमारा समाज, सरकार और राजनीतिज्ञ बच्चों को देश का भविष्य मानते नहीं थकते लेकिन क्या इस उम्र के लगभग 25 से 30 करोड़ बच्चों से बाल मजदूरी के जरिए उनका बचपन और उनसे पढने का अधिकार छीनने का यह सुनियोजित षड्यंत्र नहीं लगता?  मिसाल के तौर पर एक कानून बनाकर हमने बच्चों से उनका बचपन छिनने की कुचेष्टा की है। इस कानून में हमने यदि पारिवारिक कामधंधा या रोजगार है तो 4 से 14 की उम्र के बच्चों से कानूनन काम कराया जा सकता है और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह कैसी विडम्बना है कि जब इस उम्र के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, खानदानी व्यवसाय के नाम पर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षा, खेलकूद और सामान्य बाल्य सुलभ व्यवहार से वंचित किया जा रहा है और हम अपनी पीठ थपथपाए जा रहे हैं। बच्चों को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर हकीकत में हम उन्हें पैसा कमाकर लाने की मशीन बनाकर अंधकार में धकेल रहे हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए अपना विरोध व्यक्त किया है। क्योंकि पारिवारिक काम के नाम पर अब बचपन की जरूरतों को दरकिनार कर खुलेआम बच्चों से काम कराया जा सकता है। कुछ बच्चें अपनी मजबूरी से काम करते हैं तो कुछ बच्चों से जबरन काम कराया जाता है। यदि गौर करें तो हम पाएंगे कि किसी भी माता-पिता का सपना अपने बच्चों से काम कराना नहीं होता। हालात और परिस्थितियां उन्हें अपने बच्चों से काम कराने को मजबूर कर देती हैं। पर क्या इसी आधार पर उनसे उनका बचपन छीनना और पढने-लिखने की उम्र को काम की भट्टी में झोंक देना उचित है? ऐसे बच्चे अपनी उम्र और समझ से कहीं अधिक जोखिम भरे काम करने लगते हैं। वहीं कुछ बच्चे ऐसी जगह काम करते हैं जो उनके लिए असुरक्षित और खतरनाक होती है जैसे कि माचिस और पटाखे की फैक्टरियां जहां इन बच्चों से जबरन काम कराया जाता है। इतना ही नहीं, लगभग 1.2 लाख बच्चों की तस्करी कर उन्हें काम करने के लिए दूसरे शहरों में भेजा जाता है। 

इतना ही नहीं, हम अपने स्वार्थ एवं आर्थिक प्रलोभन में इन बच्चों से या तो भीख मंगवाते हैं या वेश्यावृत्ति में लगा देते हैं। देश में सबसे ज्यादा खराब स्थिति है बंधुआ मजदूरों की जो आज भी परिवार की समस्याओं की भेंट चढ़ रहे हैं। चंद रुपयों की उधारी और जीवनभर की गुलामी बच्चों के नसीब में आ जाती है। महज लिंग भेद के कारण कम पढ़े-लिखे और यहां तक कि शहरों में भी लड़कियों से कम उम्र में ही काम कराना शुरू कर दिया जाता है या घरों में काम करने वाली महिलाएं अपनी बेटियों को अपनी मदद के लिए साथ ले जाना शुरू कर देती हैं।  कम उम्र में काम करने वाले बच्चे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। साथ ही उनकी सेहत पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

इतना ही नहीं, कभी-कभी उनका शारीरिक विकास समय से पहले होने लगता है जिससे उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इन बच्चों को न पारिवारिक सुरक्षा दी जाती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। बाल मजदूरी से बच्चों का भविष्य अंधकार में जाता ही है, देश भी इससे अछूता नहीं रहता क्योंकि जो बच्चे काम करते हैं वे पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर हो जाते हैं और जब ये बच्चे शिक्षा ही नहीं लेंगे तो देश की बागडोर क्या खाक संभालेंगे? इस तरह एक स्वस्थ बाल मस्तिष्क विकृति की अंधेरी और संकरी गली में पहुँच जाता है और अपराधी की श्रेणी में उसकी गिनती शुरू हो जाती हैं। महान विचारक कोलरिज के ये शब्द-‘पीड़ा भरा होगा यह विश्व बच्चों के बिना और कितना अमानवीय होगा यह वृद्धों के बिना?’ वर्तमान संदर्भ में आधुनिक पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन शैली पर यह एक ऐसी टिप्पणी है जिसमें बचपन की उपेक्षा को एक अभिशाप के रूप में चित्रित किया गया है।

सच्चाई यह है कि देश में बाल अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बच्चे अपराधी न बने इसके लिए आवश्यक है कि अभिभावकों और बच्चों के बीच बर्फ-सी जमी संवादहीनता एवं संवेदनशीलता को फिर से पिघलाया जाये। फिर से उनके बीच स्नेह, आत्मीयता और विश्वास का भरा-पूरा वातावरण पैदा किया जाए। श्रेष्ठ संस्कार बच्चों के व्यक्तित्व को नई पहचान देने में सक्षम होते हैं। अतः शिक्षा पद्धति भी ऐसी ही होनी चाहिए। सरकार को बच्चों से जुड़े कानूनों पर पुनर्विचार करना चाहिए एवं बच्चों के समुचित विकास के लिये योजनाएं बनानी चाहिए। ताकि इस बिगड़ते बचपन और भटकते राष्ट्र के नव पीढ़ी के कर्णधारों का भाग्य और भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। ऐसा करके ही हम सार्वभौम बाल दिवस को मनाने की सार्थकता हासिल कर सकेंगे। 
 

 


बेदाग राजनीति के लिये संसद जागें

बेदाग राजनीति के लिये संसद जागें

27-Sep-2018

लेख : ललित गर्ग 

आज सबकी आंखें एवं काल सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिदिन दिये जाने वाले निर्णयों पर लगे रहते हैं। उसकी सक्रियता यह अहसास कराती है कि वह राष्ट्र के अस्तित्व एवं अस्मिता के विपरीत जब भी और जहां भी कुछ होगा, वह उसे रोकेंगी। हमारे चुनाव एवं इन चुनावों में आपराधिक तत्वों का चुना जाना, देश का दुर्भाग्य है। राजनीति में आपराधिक तत्वों का वर्चस्व बढ़ना कैंसर की तरह है, जिसका इलाज होना जरूरी है। इस कैंसररूपी महामारी से मुक्ति मिलने पर ही हमारा लोकतंत्र पवित्र एवं सशक्त बन सकेगा। अपराधी एवं दागी नेताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भारतीय लोकतंत्र के रिसते हुए जख्मों पर मरहम लगाने जैसा है। कोर्ट ने कहा है कि दागी सांसद, विधायक और नेता आरोप तय होने के बाद भी चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें खुद पर निर्धारित आरोप भी प्रचारित करने होंगे।

लम्बे समय से दागी नेताओं के चुनाव लड़ने पर पाबंदी की मांग उठती रही है, पिछले दिनों याचिका दायर कर मांग भी की गई थी कि गंभीर अपराधों में, यानी जिनमें 5 साल से अधिक की सजा संभावित हो, यदि व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय होता है तो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए। अदालत ने कहा कि केवल चार्जशीट के आधार पर जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। लेकिन चुनाव लड़ने से पहले उम्मीदवारों को अपना आपराधिक रिकॉर्ड चुनाव आयोग के सामने घोषित करना होगा। कोर्ट ने सरकार और संसद के पाले में यह गेंद खिसका कर देश की राजनीति को बदलाव का अवसर भी दिया है, जिसे गंवाया नहीं जाना चाहिए।

राजनीति का अपराधीकरण जटिज समस्या है। अपराधियों का राजनीति में महिमामंडन नई दूषित संस्कृति को प्रतिष्ठापित कर रहा है, वह सर्वाधिक गंभीर मसला है। राजनीति की इन दूषित हवाओं ने देश की चेतना को प्रदूषित कर दिया है, सत्ता के गलियारों में दागी, अपराधी एवं स्वार्थी तत्वों की धमाचैकड़ी एवं घूसपैठ लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच को दमघोंटू बना दिया है। यह समस्या स्वयं राजनीतिज्ञों और राजनैतिक दलों ने पैदा की है। अतः इसका समाधान भी इसी स्तर पर ढूंढना होगा और जो भी हल इस स्तर से निकलेगा वही स्थायी रूप से राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कर पायेगा। अतः राजनीति की शुचिता यानी राजनेताओं के आचरण और चारित्रिक उत्थान-पतन की बहस अब किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचनी ही चाहिए। राजनेताओं या चुने हुए जन-प्रतिनिधियों को अपनी चारित्रिक शुचिता को प्राथमिकता देनी ही चाहिए।

आपराधिक पृष्ठभूमि के जनप्रतिनिधियों को राष्ट्रहित में स्वयं ही चुनाव लड़ने से इंकार कर देना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे ऐसे लोगों को टिकट न दें।  इस ज्वलंत एवं महत्वपूर्ण मुद्दे पर मंगलवार को सुप्रीम कोेर्ट में खासी पुरानी बहस और ऐसे ही पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा, उसका यही निहितार्थ है। सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताओं के चुनावी भविष्य पर कोई सीधा फैसला भले न दिया हो, लेकिन यह कहकर कि इसके लिए संसद को खुद कानून बनाना चाहिए, राजनीति के शीर्ष लोगों को एक जिम्मेदारी का काम सौंप दिया है। अदालत ने माना कि महज चार्जशीट के आधार पर न तो जन-प्रतिनिधियों पर कोई कार्रवाई की जा सकती है, न उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। यह तो संसद को कानून बनाकर तय करना होगा कि वह जन-प्रतिनिधियों के आपराधिक या भ्रष्टाचार के मामलों में क्या और कैसा रुख अपनाना चाहती है?

लोकतन्त्र में जब अपराधी प्रवृत्ति के लोग जनता का समर्थन पाने में सफल हो जाते हैं तो दोष मतदाताओं का नहीं बल्कि उस राजनैतिक माहौल का होता है जो राजनैतिक दल और अपराधी तत्व मिलकर विभिन्न आर्थिक-सामाजिक प्रभावों से पैदा करते हैं। एक जनप्रतिनिधि स्वयं में बहुत जिम्मेदार पद होता है एवं एक संस्था होता है, जो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व कर उनकी आवाज बनता हैं। हर राष्ट्र का सर्वाेच्च मंच उस राष्ट्र की पार्लियामेंट होती है, जो पूरे राष्ट्र के लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती है, राष्ट्र-संचालन की रीति-नीति और नियम तय करती है, उनकी आवाज बनती है व उनके ही हित में कार्य करती है, इस सर्वोच्च मंच पर आपराधिक एवं दागी नेताओं का वर्चस्व होना विडम्बनापूर्ण है। राष्ट्र के व्यापक हितों के लिये गंभीर खतरा है। भ्रष्टाचार और राजनीति का अपराधीकरण भारतीय लोकतंत्र की नींव को खोखला कर रहा है। संसद को इस महामारी से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

अब तो हमारे राष्ट्र की लोकसभा को ही निर्णायक भूमिका अदा करनी होगी। वह कानून बनाकर आपराधिक रिकॉर्ड वालों को जनप्रतिनिधि न बनने दे। उसका यही पवित्र दायित्व है तथा सभी प्रतिनिधि भगवान् और आत्मा की साक्षी से इस दायित्व को निष्ठा व ईमानदारी से निभाने की शपथ लें। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय स्पष्ट कर दी है कि उसका यह तय करना कि कौन चुनाव लड़े? कौन नहीं? जनतंत्र के मूल्यों पर आघात होगा। सबसे आदर्श स्थिति यही होगी कि मतदाताओं को इतना जागरूक बनाया जाए कि वे खुद ही आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को नकार दें। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ऐसे लोगों को जनप्रतिनिधि न बनने देने की जिम्मेदारी संसद की है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस बार जो उपाय सुझाए हैं, उनकी सफल क्रियान्विति एवं उसका प्रभावी असर चुनाव आयोग ही सुनिश्चित कर सकता है। दरअसल भारत में चुनाव आयोग ऐसी स्वतन्त्र व संवैधानिक संस्था है जो इस देश की राजनैतिक संरचना के कानून सम्मत गठन की पूरी जिम्मेदारी लेती है और संसद द्वारा बनाये गये कानून ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951’ के तहत प्रत्याशियों की योग्यता व अयोग्यता तय करती है। चुनाव आयोग की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है, अतः उसे सशक्त, सक्रिय एवं जागरूक होने की जरूरत है। राजनीतिक दल चुनाव प्रचार में, अपनी साइटों पर और मीडिया में अपने उम्मीदवारों का आपराधिक रिकार्ड प्रस्तुत करने में कोताही बरतेंगे। इसलिये चुनाव आयोग को ही इन सभी कामों के लिए कुछ ठोस मानक तय करके उन पर अमल सुनिश्चित करना होगा। कई दागी नेता आज कानून-व्यवस्था के समूचे तंत्र को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

उनके खिलाफ मामले थाने पर ही निपटा दिए जाते हैं। किसी तरह वे अदालत पहुंच भी जाएं तो उनकी रफ्तार इतनी धीमी रखी जाती है कि आरोप तय होने से पहले ही आरोपी की सियासी पारी निपट जाती है। इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थितियों पर नियंत्रण जरूरी है क्योंकि लम्बे समय से देख रहे हैं कि हमारे इस सर्वोच्च मंच की पवित्रता और गरिमा को अनदेखा किया जाता रहा है। आजादी के बाद सात दशकों में भी हम अपने आचरण, पवित्रता और चारित्रिक उज्ज्वलता को एक स्तर तक भी नहीं उठा सके। हमारी आबादी करीब चार गुना हो गई पर देश 500 सुयोग्य राजनेता भी आगे नहीं ला सका।

नेता और नायक किसी कारखाने में पैदा करने की चीज नहीं हैं, इन्हें समाज में ही खोजना होता है। काबिलीयत और चरित्र वाले लोग बहुत हैं पर जातिवाद व कालाधन उन्हें आगे नहीं आने देता। राजनीतिक स्वार्थ, बाहुबल एवं वोटों की राजनीति बहुत बड़ी बाधा है। लोकसभा कुछ खम्भों पर टिकी एक सुन्दर ईमारत ही नहीं है, यह डेढ अरब जनता के दिलों की धड़कन है। उसमें नीति-निर्माता बनकर बैठने वाले हमारे प्रतिनिधि ईमानदार, चरित्रनिष्ठ एवं बेदाग छवि के नहीं होंगे तो समूचा राष्ट्र उनके दागों से प्रभावित होगा। इन स्थितियों में इस राष्ट्र की आम जनता सही और गलत, नैतिक और अनैतिक के बीच अन्तर करना ही छोड़ देगी। राष्ट्र में जब राष्ट्रीय, नैतिक एवं चारित्रिक मूल्य कमजोर हो जाते हैं और सिर्फ निजी हैसियत को ऊँचा करना ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है तो वह राष्ट्र निश्चित रूप से कमजोर हो जाता है।


‘पाकिस्तान पर भरोसा क्यों करें?’

‘पाकिस्तान पर भरोसा क्यों करें?’

22-Sep-2018
लेख : ललित गर्ग 
 
पाकिस्तान खौफनाक एवं वीभत्स आतंकवाद को प्रोत्साहन देता रहे और दुनिया को दिखाने के लिये शांति-वार्ता का स्वांग भी रचता रहे, इस विरोधाभास के होते हुए भी हम कब तक उदारता एवं सद्भावना दर्शाते रहे? जम्मू-कश्मीर में सीमा सुरक्षा बल के एक जवान को वीभत्स तरीके से मारे जाने और फिर तीन पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के अवसर पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री से भारतीय विदेश मंत्री की मुलाकात का कोई औचित्य नहीं रह गया था। भारत सरकार ने इस मुलाकात को स्थगित करके पडौसी देश को एक स्पष्ट सन्देश दिया है, लेकिन संदेश के साथ-साथ करारा जबाव भी दिया जाना जरूरी है। पाकिस्तानी सेना जैसा कहती है उसके उलट काम करती है। इसलिये पड़ोसी देश पर भरोसा करना अपने पांव पर कुल्हाड़ी चलाने के समान है। लेकिन भारत अपनी अहिंसक भावना, भाइचारे एवं सद्भावना के चलते ऐसे खतरे मौल लेता रहता है। हर बार उसे निराशा ही झेलनी पड़ती है, लेकिन कब तक? 
 
न्यूयार्क में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात तय होने की जानकारी सार्वजनिक होने के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर में सीमा पर और सीमा के अंदर पाकिस्तान प्रायोजित जैसा खौफनाक आतंक देखने को मिला, उससे आने वाले दिनों में पाकिस्तानी सेना के साथ-साथ उसके साये में पलते आतंकियों की ओर से किसी बड़े खून-खराबे एवं आतंकी घटना के होने की संभावनाएं बढ़ गयी है। हो सकता है कि पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात को लेकर गंभीर हों, लेकिन पाकिस्तानी सेना और उसकी बदनाम खुफिया एजेंसी के इरादे तो कुछ और ही बयां करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तानी सेना या तो इमरान की पहल को पटरी से उतारने पर तुली है या फिर भारत के प्रति अपनी नफरत का प्रदर्शन करने पर आमादा है। शायद इसी कारण उसने आतंकियों के साथ मिलकर सीमा सुरक्षा बल के एक जवान को धोखे से मारने के बाद पशुवत आचरण किया।
पाकिस्तानी सरकार एवं सेना का छल-छद्म से भरा रवैया नया नहीं है। वह हमेशा विश्वासघात करता रहा है। उसके रवैये से अच्छी तरह अवगत होने के बावजूद नए प्रधानमंत्री इमरान खान पर विश्वास क्यों किया गया? क्यों लगातार हो रही आतंकी घटनाओं के बावजूद भारत सरकार दोनों देशों के विदेशमंत्रियों की वार्ता के लिये सहमत हुई? पाकिस्तान के दुराग्रह एवं कूटिलता के कारण भारतीय सुरक्षा बलों को बार-बार कीमत चुकानी पड़ रही है।
 
यह सब पाकिस्तान पर भरोसा करने का ही परिणाम है। भारत के जवान ऐसी कीमत अनेक बार चुका चुके हैं। कम से कम अब तो सबक सीखना ही चाहिए। पाकिस्तान के पागलपन और धोखेबाजी की उसकी घातक एवं खौफनाक प्रवृति के दुष्परिणामों को कब तक झेलते रहे? पाकिस्तान की ओर से संघर्ष विराम का नियमित उल्लघंन किए जाने का एक दुष्परिणाम यह भी है कि सीमावर्ती क्षेत्र में रह रहे हजारों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों में शरण लेनी पड़ी है। समझदारी तो यही कहती है कि सभ्य समाज को विचलित करने वाली इन घटनाओं के बाद विदेश मंत्री स्तर की मुलाकात का प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं किया जाना चाहिए था। भारतीय नेतृत्व ने चाहे जो सोचकर विदेश मंत्री स्तर की मुलाकात के लिए हामी भरी हो, उसे इमरान खान का असली चेहरा तभी दिख जाना चाहिए था जब उनकी सरकार ने आतंकी बुरहान वानी के नाम पर डाक टिकट जारी किया था।
 
अच्छा होता कि जवाबी चिट्ठी के जरिये उनसे पूछा जाता कि क्यों वह आतंकियों का गुणगान करते हुए भारत से संबंध सुधारने की कल्पना कर रहा हैं? यह पहली बार नहीं जब भारत को पाकिस्तान से संबंध सुधार की अपनी पहल पर यकायक विराम लगाने के लिए विवश होना पड़ा हो। दशकों से ऐसा ही होता चला आ रहा है। पाकिस्तान वार्ता की गुहार लगाता है। इस पर देर-सबेर भारत अपने कदम आगे बढ़ाता है, लेकिन वह हर बार उससे धोखा खाता है। भारत को पाकिस्तान के हाथों धोखा खाने के इस सिलसिले को तोड़ना ही होगा। यह सिलसिला पाकिस्तान के ऐसे निरीह एवं कमजोर शासकों से बातचीत करने से नहीं टूटने वाला जिनके हाथ में वास्तविक सत्ता नहीं होती। आखिर भारतीय नेतृत्व इससे अपरिचित कैसे हो सकता है कि पाकिस्तान में सत्ता की असली कमान तो वहां की सेना के हाथ है और वह भारत से बदला लेने की सनक से बुरी तरह ग्रस्त है? 
 
पाकिस्तान अपनी अमानवीय एवं हिंसक धारणाओं से प्रतिबद्ध होकर जिस तरह की धोखेबाजी करता है, उससे शांति की कामना कैसे संभव है? अपने द्वारा अपना अहित साधने की दिशा में उठा हुआ उसका यह कदम उसे कहां तक ले जाएगा, अनुमान लगाना कठिन है। उसकी इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण हरकतों में उसका बौनापन ही दिखाई देता है। बात चले युद्ध विराम की, शांति की, भाईचारे की और कार्य हो अशांति के, द्वेष के, नफरत के, आतंक के तो शांति कैसे संभव होगी? ऐसी स्थिति में एक सघन प्रयत्न की जरूरत है, जो पाकिस्तान की चेतना पर जमी हुई धूर्तता एवं चालबाजी की परतों को हटाकर उसे सही रास्ता दिखा सके। यह किस तरह से औचित्यपूर्ण है कि भारत पाकिस्तानी सेना की सनक का इलाज करने के बजाय उसके दबाव में मजबूर प्रधानमंत्रियों से बात करने की पहल करता रहता है। निःसंदेह केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि भारत ने एक और बार पाकिस्तान से बातचीत करने से कदम पीछे खींच लिए। कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि कुछ समय बाद ऐसे ही हालात से फिर न दो-चार होना पड़े। इसके लिए किसी नई रणनीति पर काम करना होगा।
 
भारत की पाकिस्तान संबंधी नीति विकल्पहीनता से ग्रस्त होना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहरायी जा सकती। हमें पूर्व सरकारों को कोसने की बजाय वर्तमान सरकार के इरादों पर विश्वास करना होगा। यह भी सही है कि जब-जब पाकिस्तान की ओर से संघर्ष विराम का उल्लंघन किया जाता है तब-तब भारतीय सुरक्षा बल उसे करारा जवाब देते रहे हैं। यह भी एक तथ्य है कि भारतीय सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान को कहीं अधिक क्षति उठानी पड़ती है, लेकिन समस्या यह है कि वह अपनी शैतानी हरकतों से बाज नहीं आता।
 
इसका कारण यही है कि वह तमाम नुकसान उठाने के बाद भी भारत को नीचा दिखाने की मानसिकता से बुरी तरह ग्रस्त है। पाकिस्तान भारत के प्रति नफरत, द्वेष एवं अलगाव की आग में इस कदर झुलस रहा है कि वह सभ्य राष्ट्र की तरह व्यवहार करना ही भूल गया है। इसी कारण वह न केवल आतंकी संगठनों को पालने-पोसने का काम करता है, बल्कि उनके साथ मिलकर भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम भी देता है। भारत को पाकिस्तान से निपटने के लिए कुछ सख्त नए तौर-तरीके अपनाने होंगे। इस क्रम में यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान एक असामान्य देश है, हिंसक राष्ट्र है एवं आतंकवादी मानसिकता से ग्रस्त है और ऐसे देश सामान्य तौर-तरीकों से काबू में नहीं आते। यह न तो स्वाभाविक है और न ही सहज स्वीकार्य कि हमारे जवान पाकिस्तानी सेना की पागलपन भरी हरकतों का शिकार बनते रहें और फिर भी भारतीय नेतृत्व यह मानकर चलता रहे कि पाकिस्तान को एक न एक दिन अक्ल आ ही जायेगी। लेकिन यह संभव नहीं लगता।
 
पाकिस्तान ने संयम को छोड़ दिया है, वह मर्यादा और सिद्धान्तों के कपड़े उतार कर नंगा हो गया है। पूर्वाग्रह एवं तनाव को ओढ़कर विवेकशून्य हो गया है। तबले की डोरियां हर समय कसी रहंेगी तो उसकी आवाज ठीक नहीं होगी। उसकी रक्त धमनियों में जीवन है, लेकिन बाहर ज़हर। यह कारण है कि हमारे तमाम शांति प्रयत्नों पर वह पानी फेरता रहता है। लेकिन अब भारत को आर-पार की लड़ाई को अंजाम देना ही चाहिए। विचारणीय प्रश्न यह भी है कि हम अपने ही देश में पडौसी देश के हमलों के ही नहीं बल्कि अपने ही लोगों के हमलों के शिकार होकर कैसे सशक्त हो सकेगे? कैसे शत्रु के हमलों का मुकाबला कर सकेेंगे? ये भारत की एकता और अखण्डता के लिये, यहां की शांति के लिये गंभीर खतरे हैं। इन हिंसक हालातों में शांति की पौध नहीं उगायी जा सकती। राष्ट्रवादियों के आत्मबल को जगाने और सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाने के लिए आतंकवादियों पर पूरी शक्ति से प्रहार करना ही होगा। 

संघ की दस्तक सुनें

संघ की दस्तक सुनें

20-Sep-2018

लेख : ललित गर्ग 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तीन का ‘भविष्य का भारत’ विषयक विचार अनुष्ठान अनेक दृष्टियों से उपयोगी एवं प्रासंगिक बना। दिल्ली के विज्ञान भवन में देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों और लगभग सभी दलों के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित कर उन्हें न केवल संघ के दृष्टिकोण से अवगत कराया गया बल्कि एक सशक्त भारत के निर्माण में संघ की सकारात्मक भूमिका को भी प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुत किया। यह एक दस्तक है, एक आह्वान है जिससे न केवल सशक्त भारत का निर्माण होगा, बल्कि इस अनूठे काम में लगे संघ को लेकर बनी भ्रांतियांे एवं गलतफहमियों के निराकरण का वातावरण भी बनेगा। प्रश्न है कि संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को आखिर क्या जरूरत आ पड़ी कि उन्हें समाज के प्रबुद्ध लोगों के बीच संघ का एजेंडा रखना पड़ा? मोहन भागवत ने इस विचार अनुष्ठान से संघ की छवि सुधारने का साहसपूर्ण प्रयास किया गया है, जिससे राष्ट्रीयता एवं भारतीयता की शुभता की आहत सुनाई दी है।

संघ ने भारत के भविष्य को लेकर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के साथ ही अपनी नीतियों, अपने क्रियाकलापों और उद्देश्यों के बारे में जिस तरह विस्तार से प्रकाश डाला उसके बाद कम से कम उन लोगों की उसके प्रति सोच बदलनी चाहिए जो उसे बिना जाने-समझे एवं तथाकथित पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों के चलते एक खास खांचे में फिट करके देखते रहते हैं। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संघ किस तरह बदलते समय के साथ खुद को बदल रहा है, इसका एक प्रमाण तो यही है कि उसने औरों और यहां तक कि अपने विरोधियों और आलोचकों को अपने ढंग के इस अनूठे कार्यक्रम में आमंत्रित किया। देश और शायद दुनिया के इस सबसे विशाल संगठन के नेतृत्व ने इन आमंत्रित लोगों के सवालों के जवाब भी दिए, उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने जो भाषण दिए, वे सचमुच नई लकीर खींचते हैं, एक नई सुबह का अहसास कराते हैं। उन्होंने हिंदुत्व और भारतीयता को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया है। उनके इस कथन ने उसे और अधिक स्पष्ट कर दिया कि मुसलमान लोग भी हिंदुत्व के दायरे के बाहर नहीं हैं। संघ के हिंदुत्व का अर्थ है, विविधता में एकता, उदारता, सहनशीलता, सह-जीवन आदि। उन्होंने हिंदुत्व को नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की है।

यह एक सुखद अनुभूति है कि संघ सबको साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है, पूर्ण समाज को जोड़ना चाहता है, इसलिए संघ के लिए कोई पराया नहीं, जो आज विरोध करते हैं, वे भी नहीं। संघ केवल यह चिंता करता है कि उनके विरोध से कोई क्षति नहीं हो। संघ  शोषण और स्वार्थ रहित समाज चाहता है। संघ ऐसा समाज चाहता है जिसमें सभी लोग समान हों। समाज में कोई भेदभाव न हो। दूसरों के अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता आदर्श जीवनशैली का आधार तत्व है और संघ इसे प्रश्रय देता है। इसके बिना अखण्ड राष्ट्रीयता एवं समतामूलक समाज की स्थापना संभव ही नहीं है। जब तक व्यक्ति अपने अस्तित्व की तरह दूसरे के अस्तित्व को अपनी सहमति नहीं देगा, तब तक वह उसके प्रति संवेदनशील नहीं बन पाएगा। जिस देश और संस्कृति में संवेदनशीलता का स्रोत सूख जाता है, वहाँ मानवीय रिश्तों में लिजलिजापन आने लगता है।

अपने अंग-प्रत्यंग पर कहीं प्रहार होता है तो आत्मा आहत होती है। किंतु दूसरों के साथ ऐसी घटना घटित होने पर मन का एक कोना भी प्रभावित नहीं होता। यह असंवेदनशीलता की निष्पत्ति है। संघ सबके अस्तित्व को स्वीकारता है, सबका विकास चाहता है। सहअस्तित्व की भावना संघ का दूसरा आधार तत्व है। भगवान महावीर ने वैचारिक और व्यावहारिक भेद में अभेद की स्थापना कर अनेकांत दर्शन का प्रतिपादन किया। अनेकांत के अनुसार अनेक विरोधी युगलों का सहअस्तित्व संभव है। अविरोधी विचारों वाले व्यक्ति एक साथ रहे, यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। विरोधी विचारों, नीतियों और लक्ष्यों वाले लोग भी साथ-साथ मिलें, बैठें, चिंतन करें और रहें, यह सह-अस्तित्व का फलित है और इसी बात को इस तीन दिन के विचार अनुष्ठान का फलित मान सकते हैं, संघ की सार्थक पहल के रूप में उसे स्वीकृति दे सकते हैं। 

संघ को राष्ट्र की चिंता है, उसके अनुरूप उसकी मानसिकता को दर्शाने वाले इस विचार-अनुष्ठान से निश्चित ही भारत के भविष्य की दिशाएं तय होगी। भारतीय जनता आजादी का सुख नहीं भोग सकी, आजाद कहलाने पर भी उसका लाभ नहीं उठा सकी, इसके लिए दोषी किसे ठहराया जाए? लोकतांत्रिक देश की जनता के महान आदर्शों को सीख नहीं पायी और इस बात को पहचान ही नहीं पायी कि राष्ट्रीयता के स्थान पर व्यक्तिवादिता एवं दलगत स्वार्थ उसके मन के किस हिस्से पर हस्ताक्षर कर रही है। जो संगठन आरएसएस को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने तो कभी यह बताने की जहमत मोल नहीं ली कि देश के विकास को लेकर, संसाधनों के बंटवारे को लेकर, अवसरों की समानता को लेकर उनकी अपनी क्या दृष्टि है? बेहतर होगा कि संघ की इस पहल से प्रेरणा लेकर अन्य दल और संगठन भी अपनी बुनियादी दृष्टि के बारे में आम देशवासियों की समझ साफ करें ताकि उनके समर्थकों और विरोधियों को ऐसी कसौटियां उपलब्ध हों, जिन पर उनके कामकाज को परखा जा सके। संघ ने सामूहिकता यानी संगठन का शंखनाद किया है तो इसका अर्थ संघ की सदस्यता वृद्धि नहीं है बल्कि भारत के निर्माण में रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्तियों को संगठित करना है।  

किसी व्यक्ति, वर्ग या संगठन पर दोषारोपण करने से कुछ होने वाला नहीं है। पर यह जरूर विचारणीय है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक इतने निस्तेज, इतने निराश और इतने कुंठित क्यों हो गए, जो अपने विश्वास और अपनी आस्थाओं को भी जिन्दा नहीं रख पाते? इस संदर्भ में सबसे पहली बात यह है कि स्वप्न वैसा ही देखना चाहिए जो पूरा हो सके। स्वप्न वैसा ही देखना चाहिए, जिसके अनुरूप पुरुषार्थ किया जा सके। कल्पना और आशा का अतिरंजन आदमी को भटकाने के सिवाय उसे क्या दे सकता है? संघप्रमुख ने राष्ट्रीयता, भारतीयता के साथ समाज एवं राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जिस तरह अपने विचार व्यक्त किए उससे यह स्पष्ट है कि इस संगठन की दिलचस्पी राजनीति में कम और राष्ट्रनीति में अधिक है। उन्होंने समाज निर्माण को अपना एक मात्र लक्ष्य बताया। इस क्रम में उन्होंने हिंदू और हिंदुत्व पर जोर देने के कारणों का भी उल्लेख किया।

क्योंकि हिंदुत्व सब को जोड़ता है और संघ एक पद्धति है जो व्यक्ति निर्माण का काम करती है। प्रत्येक गांव और गली में ऐसे स्वयंसेवक खड़े करना संघ का काम है, जो सबको समान नजर से देखता हो। उन्होंने कहा कि विविधताओं से डरने की बात नहीं है, बल्कि सबका उत्सव मनाने की जरूरत है। निश्चित ही इससे संघ और हिंदुत्व को लेकर व्याप्त तमाम भ्रांतियां दूर होंगी, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि अभी भी कुछ भ्रांतियां और संदेह बरकरार रहेंगे। यह सही है कि संघ के इस कार्यक्रम का प्रयोजन लोगों को अपनी बातों से सहमत करना नहीं, बल्कि अपने बारे में आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह को दूर करना एवं संघ के यथार्थ की जानकारी देना था, लेकिन उचित यही होगा कि वह इस तरह के आयोजन आगे भी करता रहे। निःसंदेह संघ को जानने-समझने का यह मतलब नहीं कि उसका अनुसरण किया जाए, लेकिन इसका भी कोई मतलब नहीं कि उसकी नीतियों को समाज एवं राष्ट्रविरोधी करार देकर उसे अवांछित संगठन की तरह से देखा जाए या फिर उसका हौवा खड़ा किया जाए।

भारत को स्वतंत्र हुए काल का एक बड़ा खंड पूरा हो रहा है। इतने वर्षों बाद भी यह सवाल उसी मुद्रा में उपस्थित है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिकों के अरमान पूरे क्यों नहीं हुए? इस अनुत्तरित प्रश्न का समाधान न आंदोलनों में है, न नारेबाजी में है और न अपनी-अपनी डफली पर अपना-अपना राग अलापने में है। इसके लिए तो एक सामूहिक प्रयोग की अपेक्षा है, जो जनता के चिंतन को बदल सके, लक्ष्य को बदल सके और कार्यपद्धति को बदल सके। इसी बड़ी सोच एवं दृष्टि को लेकर संघ आगे बढ़ रहा है तो यह स्वागत योग्य है। 

आज देश की जो दशा है, भ्रष्टाचार का जो बोलबाला है, महंगाई बढ़ रही है, पडौसी देश सदैव डराने-धमकाने का दुस्साहस करते रहते हैं, कालेधन और राजनीति का गठबंधन अनेक समस्याओं का कारण बन रहा है, इन सब सन्दर्भों में देश के नेतृ-वर्ग से एक प्रश्न है। वह चाणक्य के जीवन से शिक्षा कब लेगा? कब साहस एवं शक्तिशाली होने की हुंकार भरेगा? संघ केवल हिन्दुत्व की बात नहीं करता, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्रीयता की बात करता है। 

संघ शुचिता एवं ईमानदारी की संरचना भी चाहता है। इसी से हमारी स्वतंत्रता सफल और सार्थक बन सकती है। अन्यथा स्वतंत्रता के गीत गाते रहें और उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहें, इससे देश की नीतियों में बदलाव कैसे आएगा? मन्त्रिमंडल में जो लोग आते हैं, उनका यह नैतिक दायित्व है कि वे अपने इस्पाती चरित्र से देश को नयी दिशा दें। जनता की चारित्रिक शुचिता बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि नेतृवर्ग का चरित्र उज्ज्वल रहे। संघ ने इन बुनियादी बातों पर बल दिया है। इसके लिए आज से ही, अब से ही नये संकल्प के साथ काम शुरू किये जाने की आवश्यकता व्यक्त की है। उस संकल्प के साथ कृत्रिम प्रलोभन या हवाई कल्पनाएं नहीं होनी चाहिए। यथार्थ के ठोस धरातल पर कदम रखने वाला ही अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है। इसके लिए भगवान् बनने की धुन छोड़कर मनुष्य बनने का लक्ष्य सामने रहना चाहिए। मनुष्य, मनुष्य बनें, इसके लिए बहुत बड़े बलिदान की भी अपेक्षा नहीं है। 

संघ के विरोधी एवं उससे दूरी रखने वाले इस विचार-अनुष्ठान का जिस तरह बहिष्कार करते हुए उसे सगर्व सार्वजनिक भी किया उससे यही स्पष्ट हुआ कि जब संघ खुद में बदलाव लाने की तैयारी दिखा रहा तब उसके आलोचक और विरोधी जहां के तहां खड़े रहने में ही खुद की भलाई देख रहे हैं। वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन समझदारी तो इसी में है जो खुद को देश, काल और परिस्थितियों के हिसाब से बदलता है। सतत संवाद-संपर्क तमाम समस्याओं के समाधान की राह दिखाता है।

जब संघ हिंदुत्व को भारतीयता का पर्याय मानकर यह कह रहा है कि वह अन्य मत-पंथ-विचार से जुड़े लोगों को साथ लेकर चलना चाहता है तब फिर कोशिश यही होनी चाहिए कि इस राष्ट्र निर्माण में ऐसे लोगों का एक समवाय बने और उनकी शक्ति भारत को सशक्त बनाने में लगे। जब संघ यह चाह रहा है कि वह राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ना चाहता है तो फिर कोशिश होनी चाहिए कि समाज का हर वर्ग उसके साथ जुड़े, क्योंकि सबल और समरस समाज के जरिये राष्ट्र निर्माण का काम कहीं अधिक आसानी से किया जा सकता है। भागवतजी ने स्पष्ट किया कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और रहेगा। हिंदुत्व समाज को एकजुट रखता है, लेकिन हम समाज में संघ का वर्चस्व नहीं चाहते, बल्कि समाज के हर व्यक्ति का वर्चस्व चाहते हैं। यहां भी उनका संदेश साफ था- सबका साथ- सबका विकास। जब ऐसी ही निर्माण की आवाज उठेगी, पौरुष की मशाल जगेगी, सत्य की आंख खुलेगी तब हम, हमारा वो सब कुछ, जिससे हम जुड़े हैं, हमारे लिये कीमती तौहफा होगा।


कब तक पढाई और दवाई से रहेंगे दूर !

कब तक पढाई और दवाई से रहेंगे दूर !

10-Sep-2018

रोटी-कपडा-मकान जीवन के अनिवार्य तत्व थे,  दौर में दवाई-पढाई-कमाई-आवाजाई और वाई-फाई जुड गए हैं । क्या इनके बिना अब जीवन की कल्पना की जा सकती हैं, कदाचित नहीं ! हम बात करें शि‍क्षा और स्वास्थ्य की तो वह दयानतहारी बनी हुई हैं, उसमें सुधार की और अधि‍क गुजांईश है। गौरतलब संविधान में पढाई और दवाई मौलिक अधिकारों में शामिल हैं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ये दोनों ही मौलिक आवश्यकताऐं अभी भी आम आदमी से दूर ही हुए है। यह दूरी कब तक बनी रहेंगी यह यक्ष प्रश्न झंझकोरता है। हालातों में एक गरीब बेहतर इलाज और अच्छी तालीम के लिए तरसता है। आखिर! यह व्यथा इन्हें कब तक झेलनी पडेगी नामूलम है।

खोजबीन में मुख्य वजह शि‍क्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार की बार-बार बदलती नीतियां, भ्रष्टाचार और जिम्मेवारों की गैरजवाबदेही सामने आती हैं। कारणवश शि‍क्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी संस्थानों न तमाम लूट खसोट के बावजूद अपनी जडें जमा ली हैं। अब तो सरकार, सरकारी स्कूलों को भी निजी हाथों में सौपने की तैयारी में हैं। अमलीजामा में जरूरतमदों के लिए स्वास्थ्य के साथ-साथ शि‍क्षा भी दूभर हो जाएगी।

अलबत्ता, सरकारों ने भले ही शि‍क्षा का अधिकार अधिनियम, शि‍क्षा गारंटी, सर्वशि‍क्षा और स्कूल चलो अभियान जैसी महत्वकांक्षी योजनाएं तो बनाई पर वास्तविकता यह है कि सरकारी स्कूलों में न बैठने की जगह हैं, न शि‍क्षक, न आधुनिक शि‍क्षा के संसाधन। अब सरकारी स्कूलो के हालात यह हो गये हैं कि आम इंसान तो क्या एक राह चलता भिखारी भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतरा रहा हैं। 

फिलहाल, निजी शालाओं में जब लोग बच्चों को दाखिला दिलाने के लिये जाते हैं तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती हैं। सर्वाधिक लूटखसोट बडे समूह द्वारा संचालित ऑलीशान भवनों से सुस्सजित महिमा मंडितों से विभूषित राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय और बोर्डिंग नाम से युक्त सीबीसीई मान्यता प्राप्त व जैसी अग्रेंजी स्कूलों में होता हैं। जहॉ अनाप-शनाप शुल्क और विविध पोशाके, पुस्तकें, प्रतियोगिता, प्रवेश परीक्षा आदि गतिविधियुक्त स्कूलों में प्रवेश के लिए भारी जतन-यतन किये जाते हैं। विपरित स्थानीय आवश्कताएं आधारित ताम-झाम विहिन हिन्दी व अग्रेंजी माध्यम धारित स्कूलों में शि‍क्षा अध्ययन की लालसा कम होती जा रही हैं। मूलतः शि‍क्षा की चिंता किए बिना, अच्छा स्कूल चाहता है देश, स्कूल की चिंता किए बिना, अच्छा देश चाहते है लोग।।

     भांति ही सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नहीं अनेक योजनाएं तो बनाई हैं, लेकिन उन योजनाओं में कभी बजट नहीं रहता और रहता भी हैं तो अमल में नहीं लाया जाता, तो कभी उनका लाभ पात्रों को नहीं मिल पाता। इसी बीच चिकित्सकों, नर्सिग व पॅरामेडिकल कर्मीयों और पैथोलॉजी, रक्त व नेत्र बैंक, रेडियोलॉजी उपकरण की कमी सहित मूलभूत भवन, वाहन अनुलब्धता में आमजन सुलभ स्वास्थ्य उपचार से वंचित रह जाते हैं। तथापि पहुंच विहिन, असहाय अस्वस्थ्य का इलाज कैसे होगा यह गंभीर सवाल आह्रलादित करता हैं। वीभत्स, सरकारी अस्पतालों में बेबश, लाचार लोग ही इलाज कराने पहुंचते हैं वरना निजी चिकित्सालयों में मरीजों की लंबी कतार लगी रहती है। 

मद्देनजर, हालिया देश में औसतन 20 हजार की जनसंख्या में एक चिकित्सक उपलब्ध है। पूर्व में उल्लेखित वीओएचआर  (वोर) कमेटी की अनुशंसानुसार पांच हजार की आबादी पर एक चिकित्सक होना चाहिए, जो प्रभावी नही हुआ हैं। हिसाब से आज हजारों की संख्या में चिकित्सकों की आवश्कता है। इसकी पूर्ति चिकित्सकों की संख्या में भारी वृद्धि करके की जा सकती है। तब ही मांग के अनुसार पूर्ति होगी, इस अनापूर्ति से कैसे समग्र उपचार का लक्ष्य अर्जित होगा। यह एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है? यह तो ‘एक अनार सौ बीमार ‘ कथन का चरितार्थ है। इस पर शासन-प्रशासन को गंभरीता से विचार कर सर्वोचित हल निकालना ही होंगा। अन्यथा अस्पतालो, चिकित्सकों के अभाव में झोला छाप डॅाक्टर, झांड-फूंक या तंत्र-मंत्र पद्धति से आम जन अपना उपचार ग्रहण कर जान बचायेगें या देगें....! 

वस्तुतः शासकीय स्कूलों और चिकित्सालयों की स्थिती में अमूल-चूल नव-परिवर्तन लाकर शासकीय योजनाओं को कागजों पर चिपकाये ना रखकर धरातल पर लाना ही एकमेव हल हैं। दायित्व मात्र सरकारी तंत्रों व पहरेदारों का ही नहीं वरन् हम सब का नैतिक कर्तव्य हैं, इसे हरहाल में निर्वहन करना पडेगा तभी दूरी नही अपितु नजदीकी बढेंगी। 
 

प्रस्तुत लेख श्री हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक के हैं 


विपदा का सामना ही समाधान हैं

विपदा का सामना ही समाधान हैं

03-Sep-2018

लेख : हेमेन्द्र क्षीरसागर 


आपदाएं सामान्य जीवन के साथ-साथ विकास की प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं और अचानक ही हमें ऐसी हिंसा का मुंह देखना पडता हैं। जो न केवल जिंदगियां और ढांचा को तबाह कर देता हैं बल्कि परिवारों को एक-दूसरे से अलग-अलग-थलग कर देती हैं। जनसंख्या के बढते दबाव, शहरी औद्योगिक विकास, वनों के कटाव तथा सीमांत भूमि पर खेती के साथ-साथ मानव अभिप्रेरित जोखिमों में भी वृद्धि हुई हैं। आपदाओं का प्रभाव बहु-विषयक है जो कि घरेलु, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आदि। आपदा विभिन्न प्रकार के संकटों जैसे: भूकंप , बाढ या तूफान, आग, कृत्रिम त्रासदी, संक्रामक रोगों का परिणाम होती हैं, जिसमें ऐसी नाजुक स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो समुदायी, शहरों या गांवों को घेर लेती हैं। 
दरअसल आपदा प्रबंधन के व्यापक मुद्दे जैसे कि निगरानी, मूल्यांकन, खोजबीन और बचाव, राहत, पुर्निर्माण और पुर्नवास आदि।

इसमें बहु-क्षेत्रीय शासन व्यवस्था, वैज्ञानिक, नियोजक, स्वंय सेवी और समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। इन भूमिकाओं और गतिविधियों में आपदा पूर्व आपदा के दौरान तथा आपदा उपरांत के चरण शामिल होते हैं। चूंकि इनकी गतिविधियां एक दूसरे की पूरक और अनुरूप हैं। अत: इनके बीच गतिविधियों में व्यापक समन्वय होने की आवश्यकता हैं। आपदा प्रबंधन अपने आप में कुछ नहीं हैं, बल्कि यह तो अपदाओं के नियत्रंण का कौशलपूर्ण मार्ग, तरीका तथा पद्धति हैं। जब लोगों को आपदाओं के बारे में जागरूकता और शिक्षा प्रदान की जाती हैं तो आपदा प्रबंधन एक आसान कार्य बन जाता हैं। 

लिहाजा, आपदा एक प्रतिकार के रूप में विकरालता धारण किये हुए हैं। वर्तमान परिदृष्य में संसार के चारो ओर कुछ ना कुछ अप्रिय आपदाएं घटित होन से जान-माल, सम्पदा और पर्यावरण को अपूर्णीय क्षति हो रही हैं। इस भीषण प्रतिकार स्वरूप समस्या, व्याधि का निरकाण करना होगा, क्योंकि यह समस्या तो घटते ही रहेगी। इसीलिए समस्या में ही समाधान खोजना होगा, हॉथ पर हॉथ पर रखकर बैठने की जरूरत नहीं हैं। यह भाव को बदलना होगा कि आपदा कुदरत का खेल है, हम क्या कर सकते है। हमारे हाथ में क्या हैं? जब समय आयेगा तब देखा जायेगा? परिवर्तन के लिए समय नहीं, संकल्प की आवश्यकता होती। सर्विदित है समय बता कर नहीं आता, समय पूर्व बुरे समय के निराकरण की राह खोज लेना चाहिए। यथा 'अब क्या पॅंछताये जब चिडिया चुग गई खेत' इस मनोवृति को बदलकर हॉथ खोलकर, हॉथ बढाकर विपदाएं से लडने की आवश्यकता है। 

मसलन निराकरण संभावित आपदाओं का पता लगाने और उन्हें रोकने की नीति तैयार करने से प्रारंभ होता हैं। अग्नि-जन सहयोग से आग बुझा कर अधिक फैलने से रोकना, स्थानीय फायर बिग्रेड को सूचित करना। भूकंप-जब भूकंप आए तो घर से बाहर खुल स्थान में आना, भूकंपरोधी मकानों का निर्माण, भूकंप के बाद आग लगने की संभावना को दृष्टिगत रखते हुए बचाव हेतु आवष्यक सामग्री जुटाकर रखना, भूकंप के समय धैर्य, अफवाहों से सावधान रहना, उचित स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी पर विष्वास रखकर सहायता करना, भूकंप की सटीक भविष्यवाणी करना संभव नहीं हैं, यह एक प्राकृतिक आपदा है, इसका धैर्य के साथ मुकाबला करना ही विकल्प हैं। बाढ रोकने नदी के किनारे व आस-पास सघन वृक्षारोपण किया जावे। बाढ आने की सूचना हेतु उचित प्रबंध बनाए जावें।

बाढ ग्रस्त क्षेत्र में पेयजल की व्यवस्था, महामारियों से बचाव हेतु साफ-सफाई, भोज्य सामग्री व दवाओं की  वस्तुत: क्या होती हैं ये घटनाएॅ? क्यों होती हैं ये घटनाएॅ? क्या हम इन्हें घटित होने से रोक सकते हैं? कुछ ऐसे ही प्रश्न हमारे मस्तिष्क में विचरण करते हैें, हम कम-कम इन आपदाओं के प्रभाव को तो कम कर सकते हैं। मनुष्य ने पर्यावरण में इतना परिवर्तन कर दिया हैं कि अनेकानेक समस्याएॅ बढती गई हैं। चाहे कृषि हो, निर्माण कार्य हों या वन विनाश, नाभिकीय ऊर्जा, उत्खन्न और जल व वायु प्रदूषण सभी घटनाएॅ पर्यावरण को अवश्य प्रभावित करती हैं। बढती जनसंख्या का प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र, पर्यावरणीय स्वच्छता, पेयजल, स्वास्थ सेवा, शिक्षा पर प्रतिकूल असर डाल रहा हैं।

ऐसे में लगता है काश! मनुष्य में भी अन्य जीवों की तरह अनुकूल क्षमता होती तो हम भी अपने आपको वातावरण के अनुरूप करते न कि वातावरण को अपने लालच, स्वार्थ व इच्छा प्राप्ति के लिए बार-बार रूपान्तरित करते। सारतत्व: प्रकृति की यथास्थिती और राहत, पुर्नवास का पूर्व व्यवस्थित नियोजन आपदा को अप्रभावी करने का उचित माध्यम और समाधान हैं।


 


ऑनलाइन प्लेटफार्मों में बाल दुर्व्यवहार खतरनाक रूप से बढ़ रहा है – रिपोर्ट

ऑनलाइन प्लेटफार्मों में बाल दुर्व्यवहार खतरनाक रूप से बढ़ रहा है – रिपोर्ट

30-Aug-2018

नई दिल्ली : भारत सरकार द्वारा प्रबंधित बच्चों की हेल्पलाइन 1098 ने बताया है कि परेशान बच्चों द्वारा प्राप्त कुल 187 कॉलों में से 39 ने ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर मानसिक और मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार का सामना किया है। 2016-17 में, बाल हेल्पलाइन को ऑनलाइन दुरुपयोग के 57 मामले प्राप्त हुए और पिछले एक साल में यह संख्या 187 हो गई। वर्चुअल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा भारतीय अधिकारियों द्वारा सामना की जाने वाली सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गई है। इंग्लिश डेली टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, हेल्पलाइन पर 2017-18 में 187 कॉलों में से, 39 कॉल ऑनलाइन गेम ‘ब्लू व्हेल’ से संबंधित थे, जिन्होंने प्रतिभागियों को अपने जीवन को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया।

हेल्पलाइन अथॉरिटीज के मुताबिक, एक हावी प्रशासक द्वारा उठाए गए चुनौती से जुड़े बच्चों ने 1098 डायल किया और उन आघातों की सूचना दी जिससे वो गुजर रहे थे। रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले साल सितंबर में, हेल्पलाइन टीम ने दो किशोर लड़कियों से कॉल प्राप्त की जो ब्लू व्हेल गेम एडमिनिस्ट्रेशन के निर्देशों के अनुसार आगरा से मुंबई पहुंच रहे थे। उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर वे “कार्य” नहीं करते हैं तो उनके माता-पिता मर जाएंगे।

“2017-18 में बच्चों की सभी 39 समान कॉलों ने ब्लू व्हेल चैलेंज के साथ एक लिंक का खुलासा किया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ लोगों ने खेल से उत्पन्न डर से निपटने के लिए भी कहा, दूसरों को परेशानी में बच्चों को शारीरिक हस्तक्षेप की आवश्यकता थी और फिर वे लोग इस खेल के बारे में जानकारी चाहते थे”। अन्य मामलों में बाल यौन दुर्व्यवहार सामग्री, शारीरिक दंड, अश्लील साहित्य और वीडियो शामिल हैं।

गौरतलब है कि चाइल्ड हेल्पलाइन को अप्रैल 2015 से लेकर इस साल मार्च तक 3.4 करोड़ से ज्यादा फोन कॉल्स रिसीव हुए, लेकिन इनमें से करीब 1.36 करोड़ फोन कॉल साइलंट थे। इन कॉल्स में बैकग्राउंड की ही आवाजें आती थीं, लेकिन कॉलर कुछ देरी तक फोन पर पहने के बाद भी चुप रहता था। पीछे से बच्चों के रोने की आवाजें आती थीं। चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन की हरलीन वालिया ने कहा, ‘इन साइलंट कॉल्स को हेल्पलाइन 1098 की ओर से बेहद गंभीरता से लिया गया है।’

डेटा के मुताबिक 2015-16 में हेल्पलाइन पर 27 लाख साइलेंट कॉल आए, जबकि 2016-17 में यह आंकड़ा 55 लाख तक पहुंच गया और 2017-18 में यह 53 लाख था। वालिया ने कहा, ‘साइलंट कॉल्स के मामले में हेल्पलाइन का काम देखने वालों यह कहा गया है कि वे ऐसे इनपुट्स दें, जिससे कॉलर में अपनी बात कहने और डिटेल शेयर करने का जज्बा पैदा हो सके।’ ये साइलंट कॉलर्स बच्चे या फिर वयस्क हो सकते हैं, जो दोबारा कॉल कर सकते हैं और किसी बच्चे की परेशानी के बारे में बताया जा सकता है।

वालिया ने कहा, ‘बच्चे पहले सेशन में कम ही बोलते हैं। काउंसलर लोगों में भरोसा जताने के लिए अपनी ओर से बात रखते हैं। साइलंट कॉलर्स का मामला भी ऐसा ही है और उन्हें लेकर भरोसा पैदा करना होगा ताकि वे अपनी बात रख सकें।’ इमोशनल सपॉर्ट के लिए आने वाले कॉल्स में भी इजाफा हुआ है। ऐसी कॉल्स की वजह से पैरेंट्स से अलग होना और घरों में स्थितियां असहज होना है। खासतौर पर आर्थिक तौर पर समृद्ध परिवारों में ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है।

चाइल्डकेयर कार्यकर्ताओं का मानना ​​है कि भारत को तत्काल खतरे से लड़ने के लिए गियर करना होगा। एक बाल संरक्षण संगठन जोविता इंडिया के छात्र परामर्शदाता और कार्यक्रम प्रमुख शनी एलियास ने कहा कि ज्यादातर मामलों में, माता-पिता खुद को समस्या की गुरुत्वाकर्षण से अवगत नहीं हैं और नियमित चिंता के रूप में बच्चों की परीक्षा लेते हैं।

शनी एलियास ने कहा “हम ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी महसूस कर रहे हैं, हमारे पास हमारे बच्चों के बीच तेजी से फैलने वाली घटना के बारे में माता-पिता और अभिभावकों को संवेदनशील बनाने का कोई तरीका नहीं है। समस्या को दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले हमें जल्दी करने की जरूरत है। अधिकतम मामले में जब बच्चे समस्या के बारे में अपने माता-पिता से संपर्क करते हैं, तो वे या तो इस मुद्दे की खिंचाव से अनजान होते हैं या बच्चों के बीच नियमित चिंता के रूप में इसे दूर ब्रश करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1098 साल के मामलों में सबसे ज्यादा प्रतिशत 11-18 साल के आयु वर्ग के बच्चों में से एक है।


क्या युवा वर्ग राजनीति में केवल ट्रोलिंग तक ही सीमित होगा ?

क्या युवा वर्ग राजनीति में केवल ट्रोलिंग तक ही सीमित होगा ?

25-Aug-2018

BY : KHULASAPOST MAGAZINE 

भारत युवाओं का विश्व में सबसे विशाल जनसंख्या वाला देश है। इसलिए भारत को अगर विकास की राह पर दूर तक ले जाना है तो हमें नौजवान आबादी को इसका इंजन बनाना होगा। देश की गाड़ी उसके हाथों में सौंपनी होगी। लेकिन वर्तमान में ऐसा होता कहीं से नजर नहीं आता। वह चाहे नीतियों और योजनाओं के निर्णय-स्थल यानी संसद की बात हो या फिर अन्य क्षेत्रों की, जरूरत के मुताबिक सही अनुपात में युवा वहां तक नहीं पहुंच पा रहे या फिर उसके लिए वह जगह खाली नहीं की जा रही। ऐसे में यह सोचने वाली बात है की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी आबादी युवाओं की राजनीति में क्या भूमिका होगी? क्या भारत अपने “डेमोग्राफिक डिविडेंड” का फ़ायदा उठाने में समर्थ होगा? क्या युवा देश प्रौढ़ एवं जर्जर हो चुकी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा संचालित होने को अभिशप्त होगा? क्या युवा उर्जा का इस्तेमाल ट्रोलिंग में किया जायेगा?

आज के युवा अपना कैरियर डॉक्टर,इंजीनियर या अन्य पेशे में बनाना चाहते हैं आखिर युवा राजनीति को अपना कैरियर क्यों नहीं बनाना चाहते हैं ? इस सवाल का जवाब ढूँढना जरुरी है लोकतंत्र होने के बावजूद राजनीति में युवाओं के प्रवेश की सबसे बड़ी समस्या एंट्री पॉइंट की है। वंशवाद युवाओं को राजनीति में प्रवेश की राह में रोड़ा अटकाये है। यह वंशवाद लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को कमज़ोर करता है। आज देश की तमाम पार्टियां किसी-न-किसी परिवार या व्यक्ति की जेब में है। ऐसी कोई भी पार्टी नहीं है जिसको यह बीमारी लगी न हो। परिवारवाद और वंशवाद ने देश के युवाओं को एक तरह से जकड़े रखा है। यह एक ऐसा घुन है जो देश को भीतर ही भीतर खोखला किये जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में पार्टियों के चरित्र में व्यक्ति की भूमिका बढ़ी है। संसदीय प्रणाली को आधार बनाकर चलने वाले लोकतंत्र में व्यक्तिवाद जहाँ एक तरफ संघीय भावना के ख़िलाफ़ है, वहीँ दूसरी ओर राजनीति में अंधश्रद्धा को भी बढ़ावा देता है। पर्सनालिटी कल्ट की वजह से कुछ युवा स्वतः राजनीति से दूरी बना लेते हैं। यह व्यक्तिवाद संगठनों के लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रियाओं को सीधे-सीधे प्रभावित करता है। इस प्रकार वंशवाद, परिवारवाद, और व्यक्तिवाद लोकतंत्र की बुनियाद पर ख़तरा है जो प्रतिभावान, सक्षम, और योग्य युवाओं को राजनीति में आने के अवसर से वंचित करता है। जबकि धन-बल और रसूखदार आदमी चाहे कितना भी भ्रष्ट और अनैतिक हो, ऐसे पार्टियों में आसानी से जगह पा लेता है। फिर इन्हें संगठन में ऊंचे पद मिल जाते हैं, और अगर उस खास परिवार/व्यक्ति के वफादार रहे तो सरकार में मंत्री भी बन जाते हैं। आज सभी छोटी-बड़ी पार्टियों की निर्णय प्रक्रियाओं में आंतरिक लोकतंत्र का नितांत अभाव है।

स्थापित दलों में ऐसा कम ही है,जहाँ 35 वर्ष से कम उम्र के युवा को पार्टी में शीर्ष नेतृत्व मिला हो। यही कारण है कि दूसरे क्षेत्रों में अच्छा कर रहे युवा राजनीति को गले लगाना नहीं चाहता। यह युवा के लिए राजनीति का चुनाव करने की आदर्श स्थिति नहीं है।

कुछ युवा यक़ीनन राजनीति में दख़ल देना चाहते हैं, परन्तु इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध, महंगा होते चुनाव, पारदर्शिता का अभाव, अनुशासन की कमी, नैतिकता का गिरता स्तर और आंतरिक लोकतंत्र का न होना इसे काजल की कोठरी बनाता है। अभाव, असुरक्षा और अपमान युवा और राजनीति के बीच खाई बनाती है। पिछले वर्ष वर्ष 2017 में सीएसडीएस-लोकनीति द्वारा किये गए एक सर्वे में रोचक तथ्य सामने आये हैं। इस सर्वे के मुताबिक़ 46% युवा राजनीति में किसी भी प्रकार की रुचि नहीं रखते। जबकि देश के 75 प्रतिशत यानी तीन-चौथाई युवा किसी भी चुनावी गतिविधियों में शामिल नहीं होते हैं।

युवाओं की भागीदारी के बिना यथास्थिति में बदलाव की आशा बेमानी होगी।युवाओं को ट्रोल और भीड़ बनने के बजाये राजनीति का विकल्प बनना होगा। सृजन और निर्माण से जुड़ना होगा। राजनीति को  युगधर्म मानते हुए जीवन पद्धति का हिस्सा बनाना होगा और उस मार्ग पर चलना होगा। इन्हें अपने कन्धों पर राष्ट्र-राज्य के संचालन की जिम्मेदारी लेनी होगी। युवाओं को राजनीति की मुख्यधारा में लाना और निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाना आज की ज़रूरत है। अन्यथा आबादी का एक बड़ा तपका चुनाव मशीन बन रह गए पार्टियों के कल-पुर्जे बनकर रह जाएंगे, ट्रोलिंग का काम करेंगे और उन्माद पैदा करेंगें। उनकी ऊर्जा, जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने में जाती रहेगी।


देश देख रहा है

देश देख रहा है

02-Aug-2018

आज राजनीति केवल राज करने अथवा सत्ता हासिल करने मात्र की नीति बन कर रह गई है उसका राज्य या फिर उसके नागरिकों के उत्थान से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण है कि आज राजनीति का एकमात्र उद्देश्य अपनी सत्ता और वोट बैंक की सुरक्षा सुनिश्चित करना रह गया है न कि राज्य और उसके नागरिकों की सुरक्षा।
कम से कम असम में एनआरसी ड्राफ्ट जारी होने के बाद कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया तो इसी बात को सिद्ध कर रही है। चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या सपा, जद-एस, तेलुगु देसम या फिर आम आदमी पार्टी।

"विनाश काले विपरीत बुद्धि:"  शायद इसी कारण यह सभी विपक्षी दल इस  बात को भी नहीं समझ पा रहे कि देश की सुरक्षा से जुड़े ऐसे गंभीर मुद्दे पर इस प्रकार अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकना भविष्य में उन्हें ही भारी पड़ने वाला है। क्योंकि वे यह नहीं समझ पा रहे कि इस प्रकार की बयानबाजी करके ये देश को केवल यह दर्शा रहे हैं कि अपने स्वार्थों को हासिल करने के लिए ये लोग देश की सुरक्षा को भी ताक में रख सकते हैं।

क्योंकि आज जो काँग्रेस असम में एनआरसी का विरोध कर रही है वो सत्ता में रहते हुए पूरे देश में ही एनआरसी जैसी व्यवस्था चाहती थी। जी हाँ 2009 में, यूपीए के शासन काल में उनकी सरकार में तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने देश में होने वाली आतंकवादी गतिविधियों की रोकथाम के लिए इसी प्रकार की एक व्यवस्था की सिफारिश भी की थी। उन्होंने एनआरसी के ही समान एनपीआर अर्थात राष्ट्रीय जनसंख्या रिजिस्टर की कल्पना करते हुए 2011 तक देश के हर नागरिक को एक बहु उद्देश्यीय राष्ट्रीय पहचान पत्र दिए जाने का सुझाव दिया था ताकि देश में होने वाली आतंकवादी घटनाओं पर लगाम लग सके।

यही नहीं इसी कांग्रेस ने 2004 में राज्य में 1.2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी होने का अनुमान लगाया था। वह भी तब जब आज की तरह भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ नहीं हुई थी।  लेकिन खुद उनके द्वारा घुसपैठियों की समस्या को स्वीकार करने के बावजूद आज उन लोगों के अधिकारों की बात करना जो कि इस देश का नागरिक होने के लिए जरूरी दस्तावेज भी नहीं दे पाए, उनका यह आचरण न तो इस देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी के नाते उचित है और न ही इस देश के एक जिम्मेदार विपक्षी दल के नाते। क्योंकि क्या ये अपने इस व्यवहार से यह नहीं जता रहे कि इन संदिग्ध 40 लाख लोगों के अधिकारों के लिए, जो कि इस देश के नागरिक हैं भी कि नहीं, यह ही नहीं पता,  इन सभी विपक्षी दलों का वोट बैंक हैं ? यह समस्या देश की सुरक्षा की नजर से बहुत ही  गंभीर है  क्योंकि इस बात का अंदेशा है कि नौकरशाही के भ्रष्ट आचरण के चलते ये लोग बड़ी आसानी से अपने लिए राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेज हासिल कर चुके हों। शर्म का विषय है कि हमारे राजनैतिक दल इस देश के  2.89 करोड़ लोगों के अधिकारों से ज्यादा चिंतित गैर कानूनी रूप से रह रहे  40 लाख लोगों के अधिकारों के  लिए हैं।

ममता बैनर्जी ने तो दो कदम आगे बढ़ते हुए देश में गृहयुद्ध तक का खतरा जता दिया है ।
 
अभी कुछ दिनों पहले सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भी एक कार्यक्रम में  असम में बढ़ रही बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर बयान दिया था जो इस बात को पुख्ता करता है कि यह मुद्दा राजनैतिक नहीं देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

खास तौर पर तब जब असम में बाहरी लोगों का आकर बसने का इतिहास बहुत पुराना हो। 1947  से भी पहले से। लेकिन यह सरकारों की नाकामी ही कही जाएगी कि 1947 के विभाजन के बाद फिर 1971 में बांग्लादेश बनने की स्थिति में भी और आज तक भारी संख्या में बांग्लादेशियों का असम में गैरकानूनी तरीके से आने का सिलसिला लगातार जारी है। यही कारण है कि इस घुसपैठ से असम के मूलनिवासियों में असुरक्षा की भावना जागृत हुई जिसने 1980 के दशक में एक जन आक्रोश और फिर जन आन्दोलन का रूप ले लिया। खास तौर पर तब जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में स्थान दे दिया गया। आंदोलन कारियों का कहना था कि राज्य की जनसंख्या का 31-34% गैर कानूनी रूप से आए लोगों का है।

उन्होंने केन्द्र से मांग की कि बाहरी लोगों को असम में आने से रोकने के लिए सीमाओं को सील किया जाए और उनकी पहचान कर मतदाता सूची में से उनके नाम हटाए।  आज जो राहुल एनआरसी का विरोध कर रहे हैं वे शायद यह भूल रहे हैं कि उनके पिता, तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व राजीव गांधी ने 15 अगस्त 1985 को आन्दोलन करने वाले नेताओं के साथ असम समझौता किया था जिसके तहत यह तय किया गया था कि 1971 के बाद जो लोग असम में आए थे उन्हें वापस भेज दिया जाएगा।

इसके बाद समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन करके विधानसभा चुनाव कराए गए थे। इसे सत्ता का स्वार्थ ही कहा जाएगा कि जिस असम गण परिषद के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत इसी आन्दोलन की लहरों पर सवार हो कर दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जो प्रफुल्ल कुमार महंत आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले मुख्य संगठन आल असम स्टूडेन्ट यूनियन के अध्यक्ष भी थे वो भी राज्य का मुख्यमंत्री रहते हुए इस समस्या का समाधान करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाने की हिम्मत नहीं दिखा पाए।

और इसे क्या कहा जाए कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है और उसके आदेश पर उसकी निगरानी में एनआरसी बनता है तो विपक्षी दल एकजुट तो होते हैं लेकिन देश के हितों की रक्षा के लिए नहीं बल्कि अपने अपने हितों की रक्षा के लिए। वे एक तो होते हैं लेकिन देश की सुरक्षा को लेकर नहीं बल्कि अपनी राजनैतिक सत्ता की सुरक्षा को लेकर।
और अगर वे समझते हैं कि देश की जनता मूर्ख है, तो वे नादान हैं क्योंकि देश लगातार सालों से उन्हें देख रहा है।

देश देख रहा है कि जब बात इस देश के नागरिकों और गैर कानूनी रूप से यहाँ रहने वालों के हितों में से एक के हितों को चुनने की बारी आती है तो इन्हें गैर कानूनी रूप से रहने वालों की चिंता सताती है। देश देख रहा है कि इन घुसपैठियों को यह  "शरणार्थी" कह कर इनके "मानवाधिकारों" की दुहाई दे रहे हैं लेकिन  अपने ही देश में  शरणार्थी बनने को मजबूर कश्मीरी पंडितों का नाम भी आज तक अपनी जुबान पर नहीं लाए। देश देख रहा है कि इन्हें कश्मीर में सेना के जवानों पर पत्थर बरसा कर देशद्रोह के आचरण में लिप्त युवक  "भटके हुए नौजवान" दिखते हैं और इनके मानवाधिकार इन्हें सताने लगते हैं लेकिन  देश सेवा में घायल और शहीद होते सैनिकों और उनके परिवारों के कोई अधिकार इन्हें दिखाई नहीं देते?
देश देख रहा है कि ये लोग विपक्ष में रहते हुए सरकार के विरोध करने और देश का विरोध करने के अन्तर को भूल गए हैं।

काश की यह विपक्षी दल देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने आचरण से विपक्ष की गरिमा को उस ऊंचाई पर ले जाते कि देश की जनता पिछले चुनावों में दिए अपने फैसले पर दोबारा सोचने के मजबूर होती लेकिन उनका आज का आचरण तो देश की जनता को अपना फैसला दोहराने के लिए ही प्रेरित कर रहा है।


यह लेख लेखिका श्रीमती डॉ नीलम महेंद्र के निजी विचार हैं आप उनसे drneelammahendra@media.ind.in पर संपर्क कर सकते हैं 

 


आईना वही रहता है चेहरे बदल जाते हैं ! दलित-मुसलमान और कांग्रेस

आईना वही रहता है चेहरे बदल जाते हैं ! दलित-मुसलमान और कांग्रेस

20-Jul-2018

लेख : एम .एच.जकारिया (प्रधान संपादक) 

कांग्रेस से मुसलमान और दलितों का मोह भंग हो चुका है क्योंकि हमेशा से ही प्रतिनिधित्व (निज़ाम) से वंचित करने का काम तो कांग्रेस की उस सामंतवादी व्यवस्था ने किया जिन्हें कांग्रेस ने प्रशासन में दायित्व दे कर बिठाया और दलित-मुस्लिम भाजपा के डर से कांग्रेस को वोट देते रहे, ये चाल चली गई, कांग्रेस कि ये सोच हमेशा से रही है के इनके लिए हमें कुछ करने की क्या ज़रूरत है इनका वोट तो कांग्रेस को ही मिलने वाला है ! ऐसी सोच और विचारधारा काँग्रेस में रखने वाले वही लोग हैं जो शीर्ष पदों पर रहे हैं जो की भारतीय जनता पार्टी की उस विचारधारा से भी बराबर समानता रखते हैं ।

जहाँ दलित और मुस्लिम विरोधी भाजपा का खुला एजेंडा रहा हैं, वहीं काँग्रेस का ये छुपा हुआ एजेंडा है  वार्ना जगजीवन राम प्रधानमंत्री नही बन गए होते ? आपने देखा होगा जब–जब कांग्रेस का शासन होता हैं तब भी वही चेहरे और उसी विचारधारा के लोग सत्ता के मुख्य पदों पर विराजमान होते है और भाजपा के शासन काल मे भी वही लोग राज कर रहे होते है, क्या ये गंभीरता से सोचने वाली बात नहीं है !

पिछले 60 /70 सालों से कांग्रेस मुसलमानों को और दलितों को सिर्फ झूठे सपने दिखाती आई है जिसका नतीजा वह अब भुगत रही है ! पिछले 25 /30 सालों से उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ होता चला जा रहा है । मेरे पिछले लेख “प्रदेशों में सिमटती जा रही हैं कांग्रेस” इसका उदाहरण हैं, कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक माने जाने वाले मुसलमान और दलित अब अपने अधिकार को समझने लगे हैं और सच्चर कमेटी को कूड़े दान में डाल दिया गया है। आज जो अत्याचार गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितो पर हो रहा है उसके जिम्मेदार यही सामन्तवादी सोच रखने वाले वर्ग विशेष के लोग हैं जो वक्त पर कांग्रेस और वक्त पर भाजपा में आते-जाते रहते है और सत्ता में काबिज़ हो कर शासन को केंद्रित करते हैं मॉब लिचींग तो पहले भी होते रहे है |

लेकिन अब ये समाज समझने लगा हैं  दलितों के कांग्रेस के जय-जयकार या मुसलमानों के हम पंजा में ही वोट देंगे और कट्टर कांग्रेसी वाली मिथ्या अब टूटने लगी है क्योंकि छुटभैये नेताओं के चक्कर मे मुस्लिम और दलित शोषण का शिकार हो कर अपने अधिकारों से वंचित होते रहे क्योंकि कांग्रेस हमेशा मुसलमानों को RSS और भाजपा के दंगों का डर दिखाती रही, वहीँ दलितों को बहुजन समाज काशीराम और मायावती जैसे नेताओं ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिये जागरूक किया जिसका परिणाम था उत्तरप्रदेश में दलितों को पिछड़ो को अपनी ताकत मिली वही मुसलमानों के नेता काँग्रेस परस्ती में तलुवे चाटने के सिवा कुछ भी नही कर सके, ये दाताद में ज्यादा थे लेकिन अधिकारों की लड़ाई में पिछड़ गए क्योंकि मुसलमान फिरको और मसलको की लड़ाई से कभी बाहर नहीं निकल सके तो अधिकार की क्या बात करेंगें ?

कांग्रेस पार्टी मे मुसलमानों को बतौर हिस्सेदारी कुछ ओहदा देने की बात हो या फिर टिकट बंटवारे की बात हो इस तरह के अधिकांश मौकों पर पार्टी हाईकमान उन्हें केवल वोटर मानकर चलती है। हिस्सेदारी देने के लिये शायद मुसलमानों की काबिलियत पर वो हमेशा शक करते रहे या फिर नियत मे खोट रहता हो ?

आज तो बुरी से बुरी हालत मे भी कांग्रेस नेताओं का रुख मुसलमान के प्रति पहले से भी बुरा होता जा रहा है। राष्ट्रीय यूथ कांग्रेस ने अनेक प्रदेशो मे अपने मीडिया कोर्डिनेटर मनोनीत किये है क्या राजस्थान मे एक भी मुस्लिम युवा इस लायक नही मिला होगा, जिसका नाम बनाये आठ मिडिया कोर्डिनेटर की इस लिस्ट मे लिखा जा सकता हो ?

क्या कांग्रेस हाईकमान की नजर मे काबिलियत के हिसाब से मुसलमान सिर्फ ज़ीरो है ?

मुस्लिम समाज को ये समझ लेना चाहिये कि अगर समाज को पिछड़ने से बचाना है तो उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण रूप से निभानी होगी और जो अधिकार और साथ देने की बात करता हो ऐसे प्रत्याशी और दल का साथ देना होगा क्योंकि वोटों की जरुरत तो सभी राजनैतिक दलों को पड़ती है, सत्ता सभी को चाहिए आप में इतना दम होना चाहिए की अपनी बातो को मनवा सके, मत लड़िये चुनाव लेकिन अपने वोटो की ताकत को ज़रूर पहचानिए जब बात अधिकार की हो तो भूल जाये फिरकापरस्ती और मस्लाको को और अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाये । आज मुस्लिम समाज को जिस तरह से पेश किया जा रहा है आगे आने वाले समय मे हमारा वज़ूद भी नही रहेगा भारतीय लोकतंत्र में । मुस्लिम समाज का देश के लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिसे हमें बरकरार रखना होगा। देश के कई राज्यों मे मुस्लिम समाज के बिना कोई भी राजनैतिक पार्टी सरकार नही बना सकती । कांग्रेस पार्टी मुस्लिमो को नज़र अंदाज़ कर रही हे उसे छोड़कर नये विकल्प को पहचाने आने वाले चुनावों मे मुस्लिम वोट ही निर्णायक होगे ।


आदर्श नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुए विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव

आदर्श नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुए विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव

10-Jul-2018

खुलासा पोस्ट मैगजीन 

वर्तमान छत्तीसगढ़ विधानसभा का समापन हुआ | कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव, इन 5 वर्षो  में  नेता प्रतिपक्ष के कार्यकाल के दौरान एक आदर्श नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुए, जिन्होंने छत्तीसगढ़ विधानसभा में कांग्रेस के लिए एक आदर्श स्थापित किया  है |

श्री टी.एस.सिंहदेव (बाबा) ने जिस शालीनता के साथ नेता प्रतिपक्ष के रूप में छत्तीसगढ़ विधानसभा में जनहित के मुद्दो को उठाया और शालीनता का परिचय दिया और लोकतंत्र के मन्दिर की गरिमा को बनाये रखा उससे कांग्रेस का गौरव बढ़ा है जबकि ऐसा बहुत कम राजनीति में देखने और सुनने को मिलता है, नेता प्रतिपक्ष जिनके कार्यो की प्राशंसा खुद मुख्यमंत्री डॉ रमनसिंह ने विधानसभा के अंतिम सत्र में किया है | बीते दिन छत्तीसगढ़ की मौजूदा विधानसभा का 15वां सत्र समाप्त हुआ  वर्तमान सरकार का यह अंतिम बजट सत्र भी था। एक दिन पहले ही सत्र की समाप्ति की घोषणा करते हुए स्पीकर गौरीशंकर अग्रवाल ने कहा कि चौथी विधानसभा संसदीय मूल्यों के संरक्षण और परंपराओं के परिपालन में एक आदर्श प्रस्तुत करने में सफल रही उन्होंने कहा कि इस सदन के प्रत्येक सदस्य ने उन्हें प्रदत्त भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। 

स्पीकर ने सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आपकी इस बचनबद्धता का मैं सम्मान करता हूं। यह सदन पक्ष-प्रतिपक्ष के भावों से ऊपर रहा है, न केवल प्रतिपक्ष के अपितु पक्ष के कई सदस्यों ने कई अवसरों पर जिस संजीदगी से सरकार के कार्यों की समीक्षा की और  आलोचना की और सुझाव दिए वे सभी बिंदु भविष्य में नजीर होंगे। 
कांग्रेस के लिए ये गौरव की बात है की नेता प्रतीपक्ष टी एस सिंह देव जैसे शालीन और सौम्य व्यक्तित्व और मृदु भाषी नेता मिले है जिनकी सभी प्रशंसा करते है, जो की दिखावा और आडम्बर से दूर रहने वाले नेताओ में गिने जाते है. जबकि वर्तमान कांग्रेस संगठन लोगो के चरित्र हनन, स्केंडल और दुनिया भर के कांडों को उजागर करने में लगा हुआ है, ऐसे कठिन घड़ी में कांग्रेस को टी.एस. बाबा जैसे नेता ही उबार सकते है |

Image result for छत्तीसगढ़ विधानसभा
टी.एस. सिंहदेव विगत 5 वर्षो से नेता प्रतिपक्ष का दायित्व निभाते रहे और कांग्रेस की गौरवशाली परम्परा को बचाये रखा अन्यथा जिस तरह से कांग्रेस का प्रदेश नेतृव हथकंडे अपनाते आ रहा है उससे कांग्रेस की छवि को नुकसान उठाना पड़ रहा है ! इस बात में कोई दो राय नहीं है की टी.एस. बाबा छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के लिये वर्तमान में एक सर्वमान्य चेहरा और व्यक्तित्व हो सकते  है, जिन्होंने निर्विवाद रूप से नेता प्रतिपक्ष के दायित्व को निभाया जिस तरह की स्थिति से अभी कांग्रेस दो – चार हो रही है ऐसे समय में सभी कांग्रेसजनों और कार्यकर्ताओ को टी.एस. सिंहदेव जैसे निर्विवाद नेता ही मंज़ूर होगा क्योकि वे हमेशा गुटबाजी से दूर रहते हुए इन 5 वर्षो में अपनी अलग पहचान बनाई है |

टी एस बाबा ने कांग्रेस के लिए ईमानदारी और पूरी निष्ठा और समर्पण से अपने दायित्वों का निर्वहन किया है अब आगामी छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में टी.एस. सिंहदेव को यदि कांग्रेस आलाकमान पूरी जिम्मेदारी के साथ फ्री हैण्ड देकर उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ाया जाता है तो निश्चित ही कांग्रेस के लिए लाभदायक होगा और सभी कांग्रेस के कार्यकर्ता एक मत से इसे मानने को तैयार होंगे और निश्चित ही कांग्रेस के लिए आशाजनक परिणाम देखने को मिलेगा |


नशे का नशा, सबसे बडी बीमारी है

नशे का नशा, सबसे बडी बीमारी है

28-Jun-2018

दिल पे नशा ये भारी है, सबसे बडी बीमारी है। कुछ पल का नशा सारी उम्र की सजा। फिक्रमंदी बैगर अच्छे-अच्छों को नशे का नशा हो जाता है। नशा चीज ही ऐसी है भाई! फिर क्यों नशे का नशा ना हो। गुमानी में जिधर देखो ऊधर नशा ही है। रसास्वादन के चस्के से  चिपके रहना हर कोई चाहता है। आगोश में दिल का दस्तुर, दौलत का गुरूर, शिरत का शुरूर, ताकत का मगरूर और सुरत  का फित्तुर सिर चढकर बोलता है।

बरबस नशाखोरी की मदहोशी में अंगूर की बेटी हल्क में उतर जाए तो समझो सारी दुुनिया टल्लियों की मुठ्ठी में। मिला मौका हाथ से क्यों जाने दे, क्योंकि ये कोई दबाने की नहीं बल्कि रौब-रूदबे दिखाने की धधक का प्रदर्शन जो है। साथ बहाना भी बखुब है जनाब! मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ गम भुलाने को या मजे लेने को जो कुछ भी कहलिजिए मर्जी अपनी-अपनी। किन्तु खुदगर्जी में यह याद अवश्य रखे कि नशा, शान नहीं वरन् नाश का सबब है।

     बदसतुर, देश में नाबालिगों का नशे के प्रति बढता आकर्षण अंत्यत दुखदायी, चिंताजनक व विनाशकारी है। जिसकी कल्पना मात्र से ही रूहूं काप जाती है। मामला बहुत पेचीदा है। समस्या देखने में छोटी व सोचने में बडी और निपटारे में तगडी है। वजह साफ है लाखों जिंदगियों के साथ  घरों के घर बर्बाद होते जा रहे है। इसके कार्य-कारक और जिम्मेदार हम अपने आपको मानते है या नहीं यह यक्ष प्रश्न आज भी निरूत्तर बना हुआ है। आह्लादित फैशन व व्यसन से तरबतर आधुनिक युग में शादी-बरात का शराबी फुहड नाच हमारी सामाजिक मान-मर्यादा को जार-जार कर रहा है। बावजूद हम शान से नशे के नशा का बेशर्मी से लुत्फ उठा रहे है। जानते हुए कि नशा स्वंय के साथ परिवार, समाज और पूरे देश को निगल कर तबाह करते जा रहा है बाबजूद नशाखोरी की रनबेरी जोरों पर जारी है।

       गौरतलब हो कि नशे का आगाज आमतौर पर दोस्ती-यारी के कस्में वादों की मजबूरियोंं की बैशाखी पर कमसिन उम्र अच्छे-बुरे की सोच से बेखबर महफिल  की  खुशी और मर्दानगी के वास्ते होता है। जो आगे चलकर नासुर  लत बनकर आदतन अपराधी बनाने की कब्रगाह बन जाती है। निकला नशीला बारूद नशे की गुलामी में जकडकर सामाजिक-आर्थिक-मानसिक और शारीरिक तौर पर नशेडी को अपना निवाला बना लेता है। जो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फसकर आजादी की तमना लिए जमींजोद होकर रह जाता है। बजाए नशा का चलन घटने के अफरातीन शानो-शौकत से बढते ही जा रहा है। अफरातफरी में  कारगुजारी वाले नशे के कारोबार ने दिनदुनी रात चौगनी तरक्की कर सारी दुनिया में अपना डंका बजा दिया । तभी तो जिसे देखो वह एम्पोर्ट  और एक्सपोर्ट की दुहाई देते नहीं थकता। तरफदारी में एक का दो करने की जुगत में नशीले घातक पदार्थो के अंदर बाहर का खेल चरम पर है।

        जहां तक बात है, नशे के रूप की तो सौदागरों ने यहां भी बाजी मारी है। इनके तरकश के तीरों में पुरातन शराब, तम्बाखू, बीडी, सिगरेट, हुक्का, गांजा, अफीम, चरस के साथ ताजातरीन कोकिन, ब्राउन शुगर, हेरोइन, गुटका पाऊच, फेवीक्विक, सेलुसन, पेट्रोल, नींद-खांसी की दवायें और सर्प विष इत्यादि बेशुमार मादक असला है। उन्माद में नशे की लत जो जारी है ये बहुत ही अत्याचारी है, मेलें लगते है शमशानों में आज इसकी तो कल उसकी बारी है। ऐसे में चारों तरफ है, हाहाकार बंद नशे का हो बाजार। उम्मीदें हो रही तार-तार और नशा बनते जा रहा है विकराल व्याभिचार, चंगुल में फस गए बेगुनाह बीमार हजार। अलबत्ता परहेज करने के सरकारों ने तिजोरी भरने खुलेयाम बनाऐ रखे है ठेकेदार।

     सरोकार, अब अभिशाप बन चुके नशे को नाश करने जिदंगी को हां और नशे का ना हर हाल में कहना ही पडेगा। वरना घर बिखरते, बच्चे बिछडते, मांग उजडते, जहर फैलते, रोगी बनते, सम्मान घटते और भविष्य पिछडते देर नहीं लगेगी। बेहतर नशे को छोडो, रिश्ते जोडो और बीमारी को लताडो। तभी हर दिल की अब ये चाहत नशा मुक्त हो मेरा भारत सार्थक होगी।

( प्रस्तुत लेख श्री हेमेन्द्र क्षीरसागर जी के हैं वे लेखक व विचारक हैं )


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का खेवनहार कौन ?

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का खेवनहार कौन ?

26-Jun-2018

एम.एच.जकरीया  

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का खेवनहार कौन ? आने वाले विधानसभा चुनावों में ये यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा हुआ है, क्योंकि वर्तमान प्रदेश नेतृत्व जिस तरह से एकला चलो की रणनीति पर चल रही है उससे वरिष्ठ कांग्रेसजन और कार्यकर्ता संतुष्ट नहीं दिख रहे है ! छत्तीसगढ़ में CD काण्ड के बाद प्रदेश नेतृत्व का छिछा लेदर तो हुआ ही है जनता के बीच भी गलत सन्देश गया है, कांग्रेस जैसा महान संगठन और किसी दूसरे के बेडरूम का अन्तरंग CD बनाकर प्रचारित करना ये किस तरह का राजनैतिक सन्देश दिया गया है कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को क्या इन सब बातों से शर्मिंदगी महसूस नहीं होती होगी,  कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को क्या इन सब बातों से शर्मिंदगी महसूस नहीं होती होगी  ,क्या टेलीफोन टेप कांड और CD काण्ड जैसे मुद्दों से वर्तमान प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व चुनाव लड़ना  चाहती है ? 

विगत 15 वर्षो से कांग्रेस के कार्यकर्ता चुनाव जितने का सपना संजोये हुए है लेकिन जिस तरह से इन हारे हुए नेताओ को बार बार टिकट दिया जाता है ऐसे जान पड़ता है कांग्रेस की राजनीति में कोई और योग्य नेता है ही नहीं ! कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी से कुछ बदलाव की उम्मीद तो है लेकिन प्रदेश प्रभारी जी की ख़ामोशी और प्रदेश नेतृत्व का अड़ियल रवैय्या कार्यकर्ताओ को कही फिर निराश ना कर दे !

यकीनन आज कांग्रेस दोहरे संकट से गुजर रही है, यह संकट अंदरूनी और बाहरी दोनों है लेकिन अंदरूनी संकट ज्यादा गहरा है, संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि इसके घेरे में प्रदेश कांग्रेस के सभी नेता कही ना कही जिम्मेदार है। झीरम कांड के बाद पार्टी की विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की इच्छा शक्ति ही खत्म हो गई लगती है और सब-कुछ व्यक्ति विशेष लोगो के भरोसे छोड़ दिया गया है, बाकी सभी को इन नेताओ से वफ़ादारी दिखाने का ही विकल्प दिया गया है, लेकिन वर्तमान नेतृत्व  खुद अपना भरोसा खोता जा रहा है यहाँ जवाबदेही का घोर अभाव दिख रहा है | 

संगठन में बोलने की किसी को भी आज़ादी नहीं है क्योकि बोलने वाले प्रभावशाली लोगो को दरकिनार कर दिया गया है वर्तमान प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ एक तरफ़ा चल रहा है ! आज वास्तविकता में प्रदेश कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर काम नहीं कर पा रही है,  सब कुछ किसी चमत्कार के उम्मीद के भरोसे छोड़ दिया गया है। कांग्रेस को पुन: ताकतवर बनाना अकेले नेता के बस की बात नहीं होती इसमे पुरे संगठन को विश्वास में लेना होता है और छत्तीसगढ़ में संगठन में एक जुटता हर किसी के बस की बात नहीं है ।

प्रदेश में लोकतंत्र की मजबूती के लिए राज्य में कांग्रेस की मौजूदा हालत बेहद चिंतनीय है। सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की पहली शर्त है, लेकिन वास्तव में क्या ऐसा वर्तमान में हो रहा है ? इन बीते 5 वर्षों में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की जनता के लिए ऐसे कितने मुद्दे उठाये ये समझने वाली बात है लेकिन एक कमज़ोर विपक्ष के रूप में ज़रूर जाना जाएगा जिसने नीतिगत मुद्दे को छोड़ धरना - प्रदर्शन और हल्ला बाज़ारी के अलावा कुछ भी नहीं किया इससे जनता को क्या लाभ हुआ ये ज़रूर सोचने वाली बात है ? हाल ही में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी के छत्तीसगढ़ में आने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओ में उम्मीद की किरण जागी थी वो भी अब कही दिखाई नहीं दे रहा है, कांग्रेस को ज़रूर उम्मीद है कि घर वापसी अभियान उनके लिए कुछ कारगर साबित होगा.

लेकिन रूठो को मनाने की फ़ितरत पार्टी प्रमुख में नहीं है क्योकि उनका अहंकार इसकी इजाजत नहीं देता शायद ये उनके शान के खिलाफ है खैर कहा तो यही जा रहा है की कांग्रेस पार्टी ने अपने पुराने नेताओं को वापस कांग्रेस प्रवेश कराने के लिए प्लान तैयार किया है. लेकिन धरातल में यहाँ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है ? ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस चुनाव में कैसे उतरेगी ये तो आने वाला समय ही बता सकता है |

 


Previous123Next