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सोनभद्र में जमीन विवाद में 9 लोगों की हत्या, 3 महिलाएं भी शामिल, 25 जख्मी

सोनभद्र में जमीन विवाद में 9 लोगों की हत्या, 3 महिलाएं भी शामिल, 25 जख्मी

17-Jul-2019

सोनभद्र। सोनभद्र जिले के घोरावल थाना क्षेत्र में बुधवार की शाम जमीनी विवाद में दो पक्षों में खूनी संघर्ष हो गया। ताबड़तोड़ फायरिंग में दोनों पक्ष से 9 लोगों की मौत हो गई और 25 लोग घायल हो गए। खूनी संघर्ष की सूचना मिलते ही घोरावल समेत आसपास के अन्य थानों की फोर्स मौके पर पहुंची। पुलिस ने मारपीट कर रहे लोगों को रोकने की कोशिश की। 

घोरावल थाना क्षेत्र के उभा गांव में दो पक्षों में कई सालों से जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। बुधवार की शाम को एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के लोगों की पिटाई कर दी। इतने में आक्रोशित दूसरे पक्ष के लोगों ने फायरिंग करनी शुरू कर दी। फायरिंग होता देख दूसरे पक्ष के लोगों ने भी हथियार निकाल कर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू की, जिसमें दोनों पक्षों के 9 लोगों की मौत हो गई और 25 लोग घायल हो गए। 

अंधाधुंध फायरिंग से 9 लोगों की मौत और घायलों की सूचना मिलते ही घोरावल थाना क्षेत्र समेत अन्य थाना क्षेत्रों की पुलिस मौके पर पहुंच गई। एसपी सलमान ताज पाटिल मौके पर पहुंचकर संघर्ष को रोकने में लगे रहे। मृतकों में रामचन्द्र पुत्र लालशाह, राजेश गौड़ पुत्र गोविंद, अशोक पुत्र ननकू रामधारी पुत्र हीरा साह, 45 वर्षीय अज्ञात महिला पत्नी नंदलाल, दुर्गावती पत्नी रंगीलाल, राम सुंदर पुत्र तेज सिंह, जवाहिर पुत्र जयकरण सुखवंत पुत्री रामनाथ हैं। 


आरटीई के तहत दाखिला पाने की मांग वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया खारिज, याचिकाकर्ता से कहा -

आरटीई के तहत दाखिला पाने की मांग वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया खारिज, याचिकाकर्ता से कहा -

16-Jul-2019

बाॅम्बे हाईकोर्ट ने पिछले दिनों फर्जी याचिकाएं/जनहित याचिकाओं के खिलाफ कठोर कदम उठाते हुए एक सपन श्रीवास्तव की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। सपन ने मांग की थी कि उसके बेटे को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत दाखिला दिया जाए। सपन,जिसने खुद माना कि वह अब तक हाईकोर्ट के समक्ष 25 याचिकाएं दायर कर चुका है,जबकि उसने खुद को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंधित बताने का दावा किया। जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस एन.एम जामदार की पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि शुरूआत से अब तक कितनी याचिकाएं दायर कर चुका है।

जिस पर याचिकाकर्ता ने बताया कि उसे एकदम सही से संख्या तो नहीं पता,परंतु ''25 से कम तो नहीं होगी''। याचिका में सपन ने दावा किया था कि वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंध रखता है क्योंकि उसकी वार्षिक आय एक लाख रूपए से भी कम है।

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दलील दी गई कि सपन का बेटा निजी स्कूल में उस 25 प्रतिशत के कोटे के तहत दाखिला पाने का हकदार है,जो उन माता-पिताओं के बच्चों के लिए बनाया गया है,जिनकी वार्षिक आय एक लाख रूपए से कम है। पीठ इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई और कहा कि- '' ऐसा नहीं हो सकता है कि याचिकाकर्ता के पास सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने और 25 जनहित याचिकाओं दायर करने के लिए धन का भुगतान करने के साधन है और दूसरी तरफ समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से होने का दावा करता है। यह भी देखा गया है कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई सभी जनहित याचिकाओं के दौरान,कोर्ट के नियमों के तहत उसने शपथ लेते हुए बताया था कि सभी जनहित याचिकाओं को दायर करने और केस लड़ने का खर्च उसने खुद वहन किया है।

जो उसने अपने आय से स्रोत से दिया है। ऐसे में हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता की आय को एक लाख रूपए वार्षिक से कम नहीं माना जा सकता है,यह गलत है। इसलिए याचिकाकर्ता के बेटे को किसी निजी स्कूल में उस 25 प्रतिशत कोटे के तहत दाखिला नहीं दिया जा सकता है,जो उन माता-पिता के बच्चों के लिए बनाया गया है,जिनकी वार्षिक आय एक लाख रुपए से कम है। ऐसे में याचिका को खारिज किया जाता है।'' 

साभार : livelaw से 


शिरडी में कई भक्तों का दावा- साक्षात दिखे मुस्कुराते हुए साईं बाबा

शिरडी में कई भक्तों का दावा- साक्षात दिखे मुस्कुराते हुए साईं बाबा

13-Jul-2019

नई दिल्ली। शिरडी के साईं बाबा की प्रसिद्धि देश के कोने-कोने तक है। अलग-अलग राज्यों से हर रोज हजारों की संख्या में श्रद्धालु शिरडी के साईं बाबा के दर्शनों के लिए आते हैं। मान्यता है कि साईं बाबा के दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता और यहां सभी की मुरादें पूरी होती हैं। अब शिरडी के साईं धाम में भक्तों ने एक और चमत्कार देखा है। खबर है कि शिरडी में साईं बाबा की एक दिव्य तस्वीर द्वारकामाई मंदिर की दीवार पर दिखाई दी है। यह दीवार साईं बाबा की कब्र के बेहद नजदीक स्थित है। साईं बाबा के दर्शनों के लिए पहुंचे कई श्रद्धालुओं ने दीवार पर उनकी दिव्य तस्वीर देखे जाने का दावा किया है। 

जानकारी के मुताबिक, गुरुवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु साईं बाबा के दर्शनों के लिए शिरडी धाम पहुंचे थे। इस दौरान रात करीब 11:30 बजे जैसे ही आरती शुरू हुई, श्रद्धालुओं को द्वारकामाई मंदिर की दीवार पर साईं बाबा की दिव्य आकृति दिखाई दी। आरती में मौजूद कई श्रद्धालुओं ने साईं बाबा की तस्वीर देखे जाने का दावा किया। साईं बाबा की आकृति देखकर श्रद्धालुओं ने उनके जयकारे लगाने शुरू कर दिए। इस दौरान कुछ श्रद्धालु भावुक होकर वहीं बैठ गए। 

दीवार पर साईं बाबा की तस्वीर दिखने की खबर जैसे ही फैली, लोग द्वारकामाई मंदिर की तरफ दौड़ने लगे। भक्तों ने दावा किया कि दीवार पर साईं बाबा की मुस्कुराती हुई छवि थी, जो कुछ समय के लिए दिखाई दी। श्रद्धालुओं का दावा है कि साईं बाबा की दिव्य आकृति उस दीवार पर दिखाई दी, जहां वो बैठकर अपने अनुयायियों को प्रवचन दिया करते थे। आपको बता दें कि यह दूसरी बार है जब साईं बाबा के भक्तों ने उनकी आकृति को द्वारकामाई की दीवार पर देखने का दावा किया है। 

प्रसिद्ध द्वारकामाई मंदिर को बुधवार रात से ही दर्शनों के लिए खोला गया था, जिसके बाद हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने यहां दर्शन किए। यहां हर साल बड़ी संख्या में लोग दर्शनों के लिए आते हैं। इस घटना के बाद कई साईं भक्तों का कहना है कि बाबा खुद उन्हें दर्शन देने के लिए मंदिर में आए थे। दिल्ली से दर्शनों के लिए शिरडी पहुंचे एक भक्त ने दावा किया कि वह उस वक्त वहां मौजूद था, जब दीवार पर साईं बाबा की तस्वीर दिखाई दी। शिरडी के द्वारकामाई मंदिर की दीवार पर साईं बाबा की तस्वीर दिखाई देने की खबर सोशल मीडिया पर काफी शेयर की जा रही है। 

इससे पहले 12 जुलाई को साईं बाबा की छवि दिखने की बात सामने आई थी। दिलचस्प बात यह है कि दोनों घटनाएं यहां साईं बाबा मेमोरियल के 100 साल पूरे होने के उत्सव से कुछ दिन पहले ही घटित हुई हैं। आपको बता दें कि महाराष्ट्र में शिरडी साईं बाबा मंदिर, तिरुपति बाला जी मंदिर के बाद देश का दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से 296 किलोमीटर की दूरी पर स्थित साईं मंदिर में हर साल लाखों की संख्या में भक्त दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। साईं बाबा को लेकर आज भी कई सवाल रहस्य बने हुए हैं। 

साभार : hindi.oneindia


जातिवादियों और समाजवादियों को अपनी जड़ों की ओर लौटने की मजबूरी

जातिवादियों और समाजवादियों को अपनी जड़ों की ओर लौटने की मजबूरी

11-Jul-2019

 कृष्ण देव सिंह (कें डी सिंह, बुधवार समाचार पत्रिका )

भारत में सक्रिय समाजवादी और जातिवादी पृष्ठभूमि वाले राजनीतिक दल इन दिनों चौराहे पर खड़ा हैं। उन्हें समझ में नही आ रहा है कि आखिर अब वे किधर जाएं ? कुछ नेता कह रहे हैं कि हम जनता के बीच जाएंगे। पर, क्या लेकर उसके पास जाएंगे ? यह प्रश्न है  जब कुछ देने के लिए आपके पास सरकार थीं तो जिसको जो कुछ दिया या नहीं दिया,उसका परिणाम तो लोकसभा चुनाव में मिल गया। दरअसल जब वे सत्ता में होते हैं तो उनके पास देने के लिए एक सरकार होती है। उस समय जब वे अंधे की रेवड़ी की तरह अपनों को ही बांटने में लगे रहे तो अब उनके पास व्यापक जनता का विश्वास पाने के क्या उपाय हैं ? अब तो उस  स्थिति पर उनको विचार करना होगा कि वे व्यापक जनता से सिमट कर सीमित वोट बैंक तक क्यों सिमट गए।यदि ऐसा ही बना रहा तो देर -सवेर वही हाल होगा जो हाल की चुनाव कुछ राजनीतिक दलों का इस देश में हो चुका है।  इन वर्षो में कई दल समय के साथ विलुप्त हो गए।

बड़ा सवाल है कि क्या उनकी मौजूदा कार्य नीति-रणनीति के सहारे उनके पुराने दिन लौट सकते हैं ? लगता तो नहीं है। अब उनको यानी समाजवादी जिन्हे जातिवादी व पारिवारवादी धारा भी कहते  हैं, के दलों को राजग खासकर भाजपा से मुकाबला कर उससे वह वोट छीनना है, इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी शैली बदलें। समाजवादी धारा की राजनीति और उसके भटकाव  को पहले समझना होगा। स्वात्रंत्तोतर समाजवादी राजनीति को तीन कालावधियों में बांटा जा सकता है। आजादी के तत्काल बाद की समाजवादी राजनीति मुख्यतः आचार्य नरेंद्र देव ,जय प्रकाश नारायण डा.राम मनोहर लोहिया की आदर्शवादी राजनीति थीआजादी के बाद उसी अवधि में समाजवादी कार्यकर्ताओं का सबसे अधिक निर्माण हुआ।

1967 में डा.लोहिया के निधन के बाद राज नारायण,कर्पूरी ठाकुर और मधु लिमये की कालावधि की समाजवादी राजनीति रही। इस अवधि में समाजवादियों में कर्म व  नैतिकता की कसावट आचार्य नरेंद्र देव-जेपी-लोहिया युग जैसी तो नहीं रही,पर सत्ताधारी कांग्रेसियों से वे साफ-साफ अलग नजर आते थे। पर कर्पूरी ठाकुर के 1988 में निधन के बाद बिहार में समाजवादी राजनीति की शैली ही पूरी तरह बदल गई।उत्तर प्रदेश में राजनारायण के बाद मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी राजनीति की कमान संभाल ली।मुलायम-लालू की राजनीति कमोवेश एक समान रही है।

1990 का मंडल आरक्षण का जमाना था।मंदिर आंदोलन भी उसी दौरान चला।वह भावनाओं का भी दौर था। आरक्षण विरोधियों के आंदोलन का बिहार में मुख्य मंत्री के रूप में लालू प्रसाद ने बहादुरी से मुकाबला किया । वह सामाजिक न्याय का आंदोलन था जिसमें सफलता का लाभ लालू प्रसाद को सबसे अधिक मिला।इससे लालू प्रसाद गैर कुर्मी  पिछड़ों के बीच  लोकप्रिय हो गए।मुलायम सिंह यादव को भी उस दौर का लाभ मिला हलांकि मुलायम को सामाजिक न्याय के लिये कभी सघर्ष करते हुए नही देखे गये।लालू प्रसाद की सरकार ने लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को  रोका और उन्हें समस्ती पुर में गिरफ्तार करवाया । इसका लाभ भी  मिला।1991 के लोक सभा चुनाव और 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले दल को भारी सफलता मिली  पर उसी सफलता के साथ भटकाव भी शुरू हो गया।समय के साथ भटकाव बढ़ता ही चला गया।यादव और मुस्लिम मतदाता तो फिर भी लालू प्रसाद के साथ बने रहे,पर अन्य वोटर धीरे-धीरे  कटने लगे।

 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव के समय तो जदयू से चुनावी तालमेल का लाभ राजद को बिहार में मिल गया,पर इस बार उसकी अनुपस्थिति में लोक सभा चुनाव में राजद जीरो पर आउट हो गया। इन विषम राजनीतिक परिस्थितियों से समाजवादी धारा वाले इस दल को कठिन मार्ग से गुजर कर अपने लिए रास्ता बनाना है।देखना है कि वह उसे कैसे पार करती है। पर बिहार आंदोलनों की भूमि रहा है।अब तो  रास्ता जन आंदोलन का ही बचा है। आंदोलन के जरिए ही जनता से जुड़ने का विकल्प बचता  है। हलाकिं राजद के पास एक ही बड़ी पूंजी है।वह है 1990 में मंडल आरक्षण के बचाव में किया गया जोरदार आंदोलन।

बालाकोट अभियान के अलावा राजग सरकार ने अपने विकास व कल्याण के कामों के जरिए भी मतदाताओं को अपनी ओर खींचा है।अपवादों को छोड़ दें तो ऐसे सम्यक विकास कार्यों से समाजवादी धारा की राजनीति को कम ही मतलब रहा है।राजग शासन काल में बिजलीकरण का भारी विस्तार हुआ है।यह सब राजग को  अन्य दलों से अलग करता है। फिर भी राजद तथा अन्य गैर राजग दलों के लिए जनता से जुड़ने की राह बाकी  है। राजग की सरकार के कार्यकाल में  लोगों के  बैंक खातों में सीधे सरकारी मद के पैसे जा रहे हैं।पर इसमें भी कमीशनखोरी की खबरें आती रहती हैं।अन्य सरकारी योजनाओं में भी बिचैलिए हावी  हैं।उसमें संबंधित सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत है।थानों और अंचल कार्यालयों में शायद ही कोई काम पैसों के बिना हो रहा है।

साठ-सत्तर के दशक में  सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट दलों  के कार्यकर्त्तागण सरकारी लूट और अत्याचारों के खिलाफ आंदोलन करते थे।जेल जाते थे। परचे छपवा कर बांटते थे।जिला-जिला धरना देते थे।अन्य तरह से भी लोगों की मदद में शामिल रहते थे। सोशलिस्ट कार्यकर्त्ताअपने इलाकों के भूमिहीन लोगों को अंचल कार्यालय से बासगीत का परचा दिलवाता था। बिना किसी रिश्वत के। तब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी इस बात का ध्याान नहीं रखती थी कि यह तो सरकार का काम है,हम क्यों करें ? पर आज कुछ राजनीतिक कार्यकर्त्ता यह कह सकते हैं कि सरकार अपने कामों में विफल होगी तो उसका  चुनावी लाभ खुद ब खुद हमें मिल ही जाएगा। पर यह आलसी कार्यकर्त्ताओं का तर्क है।  दरअसल समाजवादी पृष्ठभूमि वाले दलों को अपने बीच से निःस्वार्थी व कर्मठ कार्यकत्र्ताओं की जमात तैयार करनी होगी। आज की पंच सितारा संस्कृति वाली राजनीति में यह काम कठिन है,पर असंभव भी नहीं।उन्हें स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाना होगा। 


अगर डाक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती तो सुप्रीम कोर्ट दिलाएगा मुआवजा

अगर डाक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती तो सुप्रीम कोर्ट दिलाएगा मुआवजा

08-Jul-2019

नई दिल्ली : अगर डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत हो जाती है या फिर उसको गंभीर समस्या पैदा हो जाती है, तो आपको डॉक्टर से लड़ने की जरूरत नहीं। ऐसे डॉक्टरों को कानून के दायरे में रहकर सबक सिखाया जा सकता है। आप डॉक्टर, हॉस्पिटल, नर्सिंग होम और हेल्थ सेंटर के खिलाफ केस कर सकते हैं।

जी हां, ऐसा ही एक मामला था बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा। सुप्रीम कोर्ट ने बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा के मामले में फैसला सुनाते हुए कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल के डॉक्टरों को इलाज में लापरवाही का दोषी ठहराया था। साथ ही पीड़ित कुणाल साहा को 6 करोड़ 8 लाख रुपये का मुआवजा 6 फीसदी सालाना की ब्याज दर से देने का आदेश दिया था।

अगर आप आपराधिक (क्रिमिनल) केस करते हैं, तो डॉक्टर को जेल हो सकती है। यदि आप दीवानी (सिविल) केस करते हैं, तो कोर्ट आपको मोटा मुआवजा दिला सकता है। ऐसे मामले में कोर्ट पीड़ित पक्ष को ज्यादा से ज्यादा मुआवजा दिलाने की कोशिश करता है, ताकि डॉक्टरों के अंदर अपनी ड्यूटी के प्रति लापरवाही बरतने पर डर पैदा हो सके।

बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ऐतिहासिक फैसला सुना चुका है। इसमें शीर्ष अदालत ने पीड़ित कुणाल साहा को 6 करोड़ रुपये 8 लाख रुपये का मुआवजा दिला चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुणाल साहा की पत्नी अनुराधा साहा के इलाज में डॉक्टरों ने लापरवाही बरती, जिसके चलते उनकी मौत हो गई। लिहाजा इलाज में लापरवाही बरतने के लिए कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल 6 फीसदी ब्याज के साथ 6 करोड़ रुपये 8 लाख रुपये का मुआवजा पीड़ित कुणाल साहा को दे।

यह कहता है कानून?

अगर आप इलाज में लापरवाही बरतने के लिए डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल केस करना चाहते हैं, तो भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 304-A, 337 और 338 के तहत प्रावधान किया गया है। इन धाराओं के तहत डॉक्टर को छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं।

डॉक्टर की लापरवाही के मामले में एडवोकेट कालिका प्रसाद काला ‘मानस’ का कहना है कि डॉक्टर की यह लीगल ड्यूटी है कि वो पूरी सावधानी और सतर्कता के साथ मरीज का इलाज करे। अगर डॉक्टर इलाज में लापरवाही करता है, तो उस (डॉक्टर) पर क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह की लायबिलिटी बनती है। मतलब इलाज में लापरवाही बरतने पर डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल कार्यवाही या फिर सिविल कार्यवाही की जा सकती है। इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत भी डॉक्टर के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में मुकदमा किया जा सकता है।

इस तरह जानें डॉक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती या नहीं

एडवोकेट कालिका प्रसाद काला का कहना है कि मरीज के केयर करने की डॉक्टर की लीगल ड्यूटी है। अगर डॉक्टर ने मरीज के केयर करने की ड्यूटी को नहीं निभाया, तो वह इलाज में लापरवाही का दोषी माना जाएगा। डॉक्टर ने अपनी ड्यूटी को निभाया या नहीं, इसको तीन प्वाइंट से समझा जा सकता है......

1. डॉक्टर ने जिस मरीज को इलाज के लिए भर्ती किया है, क्या वह उस मरीज का इलाज करने में सक्षम है या नहीं? मतलब यह कि क्या डॉक्टर के पास उस मरीज का इलाज करने की प्रोफेशनल स्किल है या नहीं? अगर उसके पास प्रोफेशनल स्किल नहीं है और उसने पैसे के लालच में या फिर किसी दूसरे इरादे से मरीज को भर्ती कर लिया है, तो डॉक्टर को इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार माना जाएगा।

2. क्या डॉक्टर ने मरीज की बीमारी के अनुसार इलाज किया है या नहीं? मतलब अगर मरीज को टीबी है, तो डॉक्टर को टीबी की ही दवा देनी चाहिए. वह टीबी के मरीज को कैंसर की नहीं दे सकता है. अगर वो ऐसे करता है, तो उसको इलाज में लापरवाही का दोषा माना जाएगा.

3. क्या डॉक्टर पूरी ईमारदारी और सावधानी के साथ मरीज का इलाज कर रहा है या नहीं? अगर डॉक्टर ने पूरी सावधानी के साथ मरीज का इलाज नहीं किया, तो वह इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार माना जाएगा.

इलाज पाना मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि सभी को इलाज पाने का मौलिक अधिकार है। इलाज पाने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की धारा के तहत आता है। लिहाजा सरकारी अस्पतालों, नर्सिंग होम और पोली-क्लीनिक सभी को बेहतरीन इलाज उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार हैं। आपको बता दें कि मौलिक अधिकारों के हनन पर कोई भी व्यक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाई कोर्ट या फिर अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।

साभार : uttamhindu


BJP सांसद कठेरिया के गार्ड ने की फायरिंग,टोलकर्मियों को पीटा

BJP सांसद कठेरिया के गार्ड ने की फायरिंग,टोलकर्मियों को पीटा

06-Jul-2019

इटावा से बीजेपी सांसद रामशंकर कठेरिया के सुरक्षाकर्मियों की गुंडागर्दी का मामला सामने आया है. कठेरिया के सुरक्षाकर्मियों ने आगरा के एक टोल प्लाजाकर्मियों के साथ बुरे तरीके से मारपीट की. विवाद में एक सुरक्षाकर्मी ने फायरिंग भी की. पूरी घटना सांसद कठेरिया के सामने हुई. घटना का वीडियो भी सामने आया है. मामला आगरा इनर रिंग रोड रहन कला टोल प्लाजा का बताया जा रहा. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कठेरिया के काफिले को वीआईपी एंट्री न दिए जाने के चलते विवाद हुआ है.

दरअसल कठेरिया के काफिले में उनकी गाड़ी के अलावा 5 छोटी गाड़ियां और एक बस शामिल थी. टोल कर्मियों ने इन गाड़ियों को वीआईपी की जगह आम लेन से निकलने को कहा. इसी बात पर कठेरिया के सुरक्षाकर्मियों का टोल कर्मियों से विवाद हो गया. बता दें रामशंकर कठेरिया नेशनल कमीशन फॉर एससी के अध्यक्ष भी हैं.

भाजपा सांसद रामशंकर कठेरिया की मौजूदगी में उनके गुर्गों की टोल प्लाजा पर गुंडई, घटना CCTV में कैद

कुछ दिन पहले ही इंदौर से बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय ने एक निगम अधिकारी की बैट से पिटाई कर दी थी. घटना का वीडियो वायरल होने के बाद बीजेपी और विजयवर्गीय की लोगों ने खूब आलोचना भी की थी.

हाल में प्रधानमंत्री ने घटना के बहाने नेताओं को गलत व्यवहार पर लगाम लगाने का इशारा किया था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने कहा था कि इस तरह की घटनाओं से पार्टी की छवि खराब होती है. कोई किसी का भी बेटा हो, उसे पार्टी से निकाल देना चाहिए. प्रधानमंत्री के बयान के बाद विजयवर्गीय का बचाव कर रहे नेता डिफेंसिव हो गए. बीजेपी की राज्य ईकाई पर भी विधायक पर कार्रवाई करने के लिए दवाब बढ़ा है.


अब दुबई के हवाई अड्डों पर अब रुपये में किया जा सकेगा लेन-देन

अब दुबई के हवाई अड्डों पर अब रुपये में किया जा सकेगा लेन-देन

05-Jul-2019

मीडिया रिपोर्ट 

नई दिल्ली: संयुक्त अरब अमीरात  के एक नामचीन समाचार पत्र के अनुसार दुबई के सभी हवाई अड्डों पर भारतीय रुपये में लेनदेन किया जा सकेगा. सूत्रों के अनुसार भारतीय मुद्रा को लेनदेन के लिये स्वीकार किया जाना भारत से आने वाले पर्यटकों के लिये अच्छी खबर है क्योंकि उन्हें रुपये को दूसरी मुद्राओं में परिवर्तित कराने के चलते बड़ी राशि गंवानी पड़ती थी. 'गल्फ न्यूज' समाचार पत्र की एक खबर के अनुसार, भारतीय मुद्रा दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के सभी तीनों टर्मिनल और अल मख्तूम हवाई अड्डे पर स्वीकार्य है.  हवाई अड्डे पर स्थित ड्यूटी फ्री दुकान के एक कर्मचारी ने समाचार पत्र को बताया, "हां, हमने भारतीय रुपया लेना शुरू कर दिया है." 

खबर में कहा गया है कि पिछले साल दुबई हवाई अड्डे से लगभग 9 करोड़ यात्री गुजरे थे, इनमें 1.22 करोड़ भारतीय थे. भारतीय यात्रियों को इससे पहले तक दुबई हवाई अड्डे पर ड्यूटी फ्री दुकानों से खरीददारी के लिए सामान की कीमत डॉलर, दिरहम या यूरो में चुकानी पड़ती थी. खबर में कहा गया है कि रुपया दुबई में ड्यूटी फ्री दुकानों पर स्वीकार की जाने वाली 16वीं मुद्रा है. दिसंबर 1983 में दूसरी मुद्राओं को स्वीकार किये जाने की शुरुआत हुई थी. 


पत्रकारिता की रक्षा करना सबसे जरूरी है

पत्रकारिता की रक्षा करना सबसे जरूरी है

03-Jul-2019

भाजपा द्वारा लखनऊ के होटल क्लार्क्स अवध  में पत्रकारों के लिए आम की आम दावत का आयोजन किया गया।  ऐसी दावत ऐसा आमंत्रण कि पूछिए मत।आम और ख़ास पत्रकारों के साथ कुछ पत्रकारों के झुंड के झुंड भाजपा की आम की दावत मे ऐसे पंहुच गये जैसे   आम की फ्री सेल लगी हो। नतीजा जो वास्तव में पढे लिखे अनुभवी और सज्जन पत्रकार थे उनको शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।

वरिष्ठ पत्रकार नावेद भाई ने बहुत अच्छा  लिखा कि पत्रकार समारोह में आम के गिफ्ट बांटने वाले भाजपाइयों और पत्रकारों के मन ही नहीं शरीर भी मिल गये। पत्रकार मन मिलन कार्यक्रम में मन मिला हो या ना मिला हो पर एक दूसरे का शरीर मिल गया।  पेड़ों से आम गिरने की बात तो सबने सुनी और देखी है। लेकिन यहां तो बग़ैर पेड़ के आम टपक रहे थे। और  भीड़ की लूट ऐसी जैसे आम न होके कोई अजूबा हो। 

इज्जतदार पत्रकारों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी।  पत्रकारिता की सूरत बदल चुकी है। जो वास्तव में पत्रकार हैं उनके लिए बहुत कठिन समय है क्योंकि आज के छुट्टा पत्रकार (पत्रकार कहते हैं मगर हैं नहीं) जो ना लिख सकते हैं ना किसी विषय की व्याख्या कर सकते हैं बस कुछ पैसे देकर कार्ड बनवा कर या अखबार, मैगजीन का रजिस्ट्रेशन करवाकर पत्रकार बन गये। ना भाषा पर पकड़, ना लिखने बोलने की क्षमता और ना सामाजिक विषयों को उठाने की क्षमता। नतीजा जो पत्रकार बरसों से मेहनत करके पत्रकारिता के मूल्यों को जिंदा रखे हैं उनको कष्ट का सामना करना पड़ रहा है।

पत्रकारिता करिये मगर मूल्यों से समझौता नहीं करिये। पत्रकारिता का जो दबदबा रहता था जो इज्ज़त थी वह अब कम होती जा रही है। पत्रकारिता के नाम पर जो फील्ड में हरकतें हो रही हैं उससे वरिष्ठ पत्रकारों और पत्रकारिता का नाम खराब हो रहा है। मेरा उन सभी दोस्तों से निवेदन है जो अखबार, मैगजीन, चैनल या पोर्टल चला रहे हैं कि अपनी टीम में पढे लिखे क्षमतावान लोगों को शामिल करें जिनके अंदर आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की भावना हो। शामिल करते समय शिक्षा एवं पिछला विवरण जरूर  चेक करें। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत बनाइये मजबूर नहीं।

सैय्यद एम अली तक़वी ब्यूरो चीफ (The Revolution News)


महाराष्ट्र बीफ बैन केस : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सुनवाई से खुद को अलग किया

महाराष्ट्र बीफ बैन केस : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सुनवाई से खुद को अलग किया

02-Jul-2019

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में बीफ बैन के मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. वे पहले इस केस में बतौर वकील पेश हुई थीं. अब इस मामले को चीफ जस्टिस के पास भेजा गया है ताकि नई बेंच का गठन किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्‍ट्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. महाराष्ट्र के कुरैशी समाज समेत कई संगठनों ने महाराष्ट्र में बीफ बैन को चुनौती दी है. वहीं कुछ गैर सरकारी संगठनों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है, जो कि बीफ पर पूरी तरह बैन चाहते हैं. याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्‍यायालय ने नोटिस जारी किया था.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि 16 साल से बड़ी उम्र के बैल किसान के किसी काम के नहीं हैं. ऐसे में किसान उन्हें बेचकर पैसा भी कमा सकते हैं. इस पाबंदी से लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं, इसलिए राज्य में 16 साल से ऊपर के बैलों की स्‍लॉटरिंग की इजाजत दी जाए. याचिका में कहा गया है कि इस मुद्दे पर राजनीति की जा रही है.


आगे की पंक्ति में बैठी थीं महिलाएं, गुस्साए स्वामी जी बिना स्पीच दिए लौट गए

आगे की पंक्ति में बैठी थीं महिलाएं, गुस्साए स्वामी जी बिना स्पीच दिए लौट गए

02-Jul-2019

नई दिल्ली। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और अखिल राजस्थान सेवारत चिकित्सक संघ (अरिसदा) की ओर से जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में राजमेडिकॉन कांफ्रेंस आयोजित की गई थी। लेकिन इस कांफ्रेंस के आखिरी दिन रविवार को कुछ ऐसा हुआ कि सभी लोग हैरान रह गए। इस कांफ्रेंस में रविवार को स्वामी ज्ञानवत्सल्य बिना मोटिवेशनल स्पीच दिए बिड़ला सभागर से कार्यक्रम छोड़कर चले गए। इसके पीछे जो कारण सामने आया, वो काफी हैरान करने वाला है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्वामी ज्ञानवत्सल्य के सभा छोड़ के जाने के पीछे कारण आगे की 3 पंक्तियों में महिलाओं का बैठना बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि जब स्वामी ज्ञानवत्सल्य मोटिवेशनल स्पीच देने के लिए स्टेज के पीछे पहुंचे तो उन्होंने अनाउंस कराया था कि पहली तीन कतारों में महिलाएं नहीं बैठेंगी। जब गुरुजी द्वारा रखी गई इस शर्त के बारे में महिला डॉक्टरों को बताया गया तो उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। 

कुछ अन्य डॉक्टर भी इसमें शामिल हुए और स्वामी ज्ञानवत्सल्य के स्पीच का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। हालांकि, विरोध कर रही महिला डॉक्टरों और आयोजकों के बीच बातचीत के बाद इसका हल निकाला गया और यह तय किया गया था कि सामने की दो पंक्तियां खाली रहेंगी। लेकिन मोटिवेशनल गुरु ज्ञानवत्सल्य अपना भाषण दिए बिना कार्यक्रम से चले गए। डॉ. रितु चौधरी ने बताया कि कुछ महिला डॉक्टर आगे की पंक्ति में बैठी थीं और पहली तीन पंक्तियों में कई महिलाएं थीं। 

रितु चौधरी ने कहा कि सभी लोग स्वामी ज्ञानवत्सल्य के आने और उनके स्पीच देने का इंतजार कर रहे थे, तभी अचानक घोषणा की गई कि कोई भी महिला पहले की सात पंक्तियों में नहीं बैठेगी। इसके बाद फिर अनाउंस किया गया कि पहले की तीन पंक्तियों में कोई महिला नहीं बैठेगी। महिला डॉक्टर यह जानकर दंग रह गईं लेकिन उन्होंने स्वामी के प्रोटोकॉल का पालन करने का फैसला किया क्योंकि उनका भाषण हमेशा अच्छा होता है। डाक्टर्स का कहना था कि थोड़ी ही देर में अनाउंस हुआ कि स्वामीजी स्पीच नहीं देंगे। उन्होंने कहा कि ये अजीब बात लगी कि स्वामी जी भेदभाव क्यों कर रहे हैं? 


जयाप्रदा पर टिप्पणी को लेकर सांसद आजम खां समेत 11 सपा नेताओं पर मुकदमा दर्ज

जयाप्रदा पर टिप्पणी को लेकर सांसद आजम खां समेत 11 सपा नेताओं पर मुकदमा दर्ज

02-Jul-2019

पूर्व सांसद एवं भाजपा नेत्री जयाप्रदा पर अमर्यादित टिप्पणी करने के मामले में रामपुर के सांसद आजम खां समेत 11 सपा नेताओं के खिलाफ सिविल लाइन्स थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। भाजपा नेता आकाश सक्सेना की तहरीर पर पुलिस ने उक्त मामला दर्ज किया है।

खुशबू मैरिज हॉल में 29 जून को सेवन फाइट नाइट क्रिकेट ट्राफी का पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में सपा सांसद आजम खां बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित थे। भाजपा नेता आकाश सक्सेना ने आरोप लगाया है कि इस कार्यक्रम में आजम खां ने पूर्व सांसद जयाप्रदा को निशाना बनाते हुए अमर्यादित टिप्पणी की। इसका कार्यक्रम में मौजूद आयोजक शाहनवीं खां उर्फ रानू, आजम खां के बड़े बेटे अदीव आजम खां, अजहर खां, ओमेंद्र सिंह, सैयद असलम, आकिब, सलमान अहमद, मुराद खां, महबूब उर्फ हीरो, फैज आमि व कैप्टन वसीम आदि ने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल किया। भाजपा नेता ने तहरीर में आरोप लगाया कि इससे जयाप्रदा नाहटा के साथ ही महिला समाज को लज्जित होना पड़ा।
उधर, आजम खां की अमर्यादित टिप्पणी के जवाब में सोमवार को पूर्व सांसद जयाप्रदा ने प्रेस वार्ता में कहा कि वह इस मामले में एफआईआर दर्ज कराएंगी और मोदी-योगी से शिकायत भी करेंगी।

पुलिस अधीक्षक  ने बताया आकाश सक्सेना की ओर से तहरीर आयी थी, जिसमें जयाप्रदा के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल का आरोप था। इस मामले में आजम खां, कार्यक्रम के आयोजक और वीडियो सर्कुलेट करने के आरोपियों के खिलाफ सिविल लाइन्स थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।


क्रिकेट कमेंट्री करने के लिए युवक ने जैसे ही उठाई माइक, लगा जोरदार करंट, मौत

क्रिकेट कमेंट्री करने के लिए युवक ने जैसे ही उठाई माइक, लगा जोरदार करंट, मौत

01-Jul-2019

बेंगलुरु: क्रिकेट मैच के दौरान कमेंट्री के शौक ने एक युवक की जान ले ली. मामला नेलमंगला का है जहां एक क्रिकेट टूर्नामेंट खेला जा रहा है. 22 साल के बी.कॉम स्‍टूडेंट किरण कुमार ने कमेंट्री के लिए जैसे ही माइक उठाया, करंट की चपेट में आ गया. अस्‍पताल ले जाए जाने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया.

कोट्टनहल्‍ली गांव से आने वाले किरण का बड़ा भाई अरुण और उसके गांव के कई खिलाड़ी उस समय मैदान में ही थे, जब यह हादसा हुआ. वीकेंड्स पर अक्‍सर यह सभी मैच खेलने जाया करते थे. रविवार को चार टीमें यहां मैच खेलने इकट्ठा हुई थीं. नजदीक में लगे बिजली के एक खंभे से अवैध कनेक्‍शन लेकर साउंड सिस्‍टम का भी जुगाड़ किया गया था.

पुलिस को शक है कि युवक की मौत खराब वायरिंग के चलते हुए. पुलिस के अनुसार, किरण की मौत दोपहर 12.30 बजे हुई. पुलिस ने वह साउंड सिस्‍टम सीज कर दिया है. किरण की लाश अटॉप्‍सी के बाद परिवार को सौंप दी गई.

एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “यह कोई सुनियोजित टूर्नामेंट नहीं था. जितने खिलाड़ी होते, उस हिसाब से टीमें बनती थीं. गवाहों का कहना है कि किरण ने खुद माइक और साउंड सिस्‍टम लाने को कहा था. हम मामले की जांच कर रहे हैं.”

22 जून को उत्‍तर प्रदेश के सम्‍भल जिले में ट्यूबवेल के हौद में बिजली का तार गिरने से उसमें नहा रहे चार बच्चों की करंट लगने से दर्दनाक मौत हो गई थी. इससे पहले, 19 जून को बांदा में तार टूट कर करने से पिता-पुत्र की मौत हो गई थी, जबकि 5 घायल हो गए थे.


दुबई राजकुमार की पत्नी अरबों रुपये के साथ गायब, पुरी दुनिया में हड़कंप!

दुबई राजकुमार की पत्नी अरबों रुपये के साथ गायब, पुरी दुनिया में हड़कंप!

01-Jul-2019

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की रानी हया बिंत अल हुसैन के दो बच्चों और 31 मिलियन पाउंड (271 करोड़ रुपये) के साथ लापता होने की खबर है। हया दुबई के अरबपति शासक शेख मुहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की छठी बेगम हैं।
वह जॉर्डन के शाह (राजा) अब्दुल्ला की सौतेली बहन हैं। शेख मुहम्मद यूएई के उप राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं। वह दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक हैं. संभावना व्यक्त की जा रही है कि हया इस समय लंदन में कहीं पर हैं।
बताया गया है कि हया अपने शौहर शेख मुहम्मद से तलाक चाह रही हैं. पता चला है कि हया दुबई से पहले जर्मनी गईं। उनके साथ बेटी जलीला (11) और बेटा जायेद (7) हैं। वह नई जिंदगी की शुरुआत के लिए अपने साथ पर्याप्त मात्रा में धन लाई हैं। जर्मनी में उन्होंने सरकार से राजनीतिक शरण मांगी है।
ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ीं हया को सार्वजनिक रूप से और सोशल मीडिया अकाउंट पर 20 मई के बाद नहीं देखा गया। जबकि इससे पहले उनके सामाजिक कार्यो से जुड़े फोटो सोशल मीडिया अकाउंट में भरे रहते थे। वह सामाजिक कार्यो में भी फरवरी से दिखाई नहीं पड़ रही थीं।

 


राजस्थान का सबसे कुख्यात डकैत जगन गुर्जर ने किया सरेंडर

राजस्थान का सबसे कुख्यात डकैत जगन गुर्जर ने किया सरेंडर

28-Jun-2019

धौलपुर। राजस्थान का सबसे कुख्यात डकैत जगन गुर्जर ने शुक्रवार रात को सरेंडर कर दिया है। इसी 12 जून को महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाने समेत लूटपाट और डकैती की लगभग 100 वारदातों को अंजाम दे चुके जगन गुर्जर से धौलपुर जिले के बाड़ी सदर पुलिस थाना में पूछताछ की जा रही है। इस पर पुलिस ने 40 हजार रुपए का इनाम भी रखा हुआ था। 

धौलपुर एसपी अजय सिंह भी शनिवार सुबह बाड़ी सदर पुलिस थाना पहुंचे है। पुलिस पूछताछ के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी कि जगन गुर्जर ने खुद सरेंडर किया है या पुलिस टीम ने उसे गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की है। हालांकि फिलहाल यही माना जा रहा है कि जगन गुर्जर ने खुद आत्मसम्पर्ण किया है। 

बता दें कि जगन गुर्जर मूलरूप से धौलपुर के डांग इलाके के गांव भवुतीपुरा का रहने वाला है। वारदातों को अंजाम देने के बाद अक्सर अपनी टीम के साथ जगन चंबल के बीहड़ों में छुप जाता है। बीहड़ों में छुपे जगन व उसकी गैंग से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पुलिस की कई बार मुठभेड़ हो चुकी है। 

मीडिया रिपोर्टर्स में दावा किया जा रहा है कि जगन गुर्जर ने खुद सरेंडर किया है। 12 जून को धौलपुर के करनपुर-सायरा पुरा में बंदूकों बटों से मारपीट महिलाओं को नग्न अवस्था में घुमाने का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने जगन गुर्जर की तलाश तेज कर दी थी। उसकी तलाश में कई संभावित ठिकानों पर दबिश दी गई। 15 जून को तो जगन की गैंग ने पुलिस पर हथगोले तक फेंके। बताया जा रहा है कि पूर्व विधायक भैरो सिह गुर्जर सहित कई लाेग जगन गुर्जर के सरेंडर के संबंध में पुलिस और उसकी गैंग के बीच मध्यस्थता कर रहे थे। इससे पहले भी जगन गुर्जर तीन बार सरेंडर कर चुका है। 


मोदी सरकार ने विज्ञापन पर खर्च किए 5909 करोड़ रूपए, सूचना के अधिकार में खुलासा

मोदी सरकार ने विज्ञापन पर खर्च किए 5909 करोड़ रूपए, सूचना के अधिकार में खुलासा

27-Jun-2019

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की एनडीए 1 सरकार में सभी प्रकार के विज्ञापनों पर 5909 करोड़ 39 लाख 51 हजार रुपये खर्च किए हैं. आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली को केंद्र सरकार के ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्युनिकेशन विभाग ने आरटीआई के जवाब में यह जानकारी दी.

HWNEWS में प्रकाशित खबर के अनुसार आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने 22 मई 2019 को केंद्र सरकार से जानने की कोशिश की थी कि वर्ष 2014-15 से वर्ष 2018-19 इन 5 वर्ष के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और आउटडोर मीडिया पर कुल कितने पैसे खर्च किए हैं? केंद्र सरकार के ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्युनिकेशन विभाग ने अनिल गलगली को वर्ष 2014-15 से वर्ष 2018-19 इन 5 वर्ष के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और आउटडोर मीडिया पर कुल खर्च का एक पन्ने वाला चार्ट भेजा हैं. इस चार्ट में कुल 4 कैटेगरी में विज्ञापन को समाहित किया हैं. इसमें प्लान, नॉन प्लान, क्लाइंट डिपार्टमेंट और एडवांस डिपार्टमेंट हैं जिसे डिस्प्ले क्लास, रेडिओ स्पॉट और आउटडोर पब्लिसिटी पर कुल 5909 करोड़ 39 लाख 51 हजार रुपए खर्च किए गए हैं.

मोदी सरकार ने एनडीए 1 में पहले वर्ष यानी वर्ष 2014-15 के वित्तीय वर्ष में 979 करोड़ 66 लाख रुपए खर्च किए. वर्ष 2015-16 के वित्तीय वर्ष 1162 करोड़ 47 लाख रुपए खर्च किए. तीसरे वर्ष 2016-17 के वित्तीय वर्ष में इसमें इजाफा होकर यह खर्च 1258 करोड़ 32 लाख तक पहुंच गया।चौथें वर्ष 2017-18 के वित्तीय वर्ष में सर्वाधिक 1313 करोड़ 57 लाख विज्ञापनों पर खर्च हुए. पांचवे और अंतिम वर्ष 2018-19 में विज्ञापन पर मचा बवाल के बाद मोदी सरकार ने खर्च पर कुछ हद तक लगाम लगाने की कोशिश की थी। तो भी यह खर्च 1195 करोड़ 37 लाख 51 हजार हो ही गया था.

गत 5 वर्ष के विज्ञापनों पर नजर डाली जाए तो डिस्प्ले क्लास और रेडिओ स्पॉट मोदी सरकार की पहली पसंद थी. इसलिए इन दो प्रकार के विज्ञापनों पर क्रमशः 2109 करोड़ 30 लाख 62 हजार तथा 2172 करोड़ 7 लाख 47 हजार रुपए खर्च किए गए थे. जबकि आउटडोर पब्लिसिटी पर सिर्फ 612 करोड़ 18 लाख 42 हजार रुपए खर्च हुए हैं. अनिल गलगली के अनुसार रेडिओ स्पॉट और डिस्प्ले क्लास इन विज्ञापनों पर मोदी सरकार की पसंद यह दर्शाती हैं कि सरकार ने लोगों तक पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी और नब्ज़ को पहचाना.


अटल के अस्थि विसर्जन खर्च का भुगतान करेगी योगी सरकार

अटल के अस्थि विसर्जन खर्च का भुगतान करेगी योगी सरकार

27-Jun-2019

लखनऊ: उत्तर प्रदेश राज्य सूचना विभाग पिछले साल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अस्थि विसर्जन के आयोजन में खर्च हुए 2.5 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा. सूत्रों के अनुसार, लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने बिल के भुगतान का आश्वासन मिलने पर अस्थि विसर्जन का कार्यक्रम आयोजित किया था. बिल में मंच लगाने, साउंड सिस्टम, फूलों की सजावट, लाइट, बेरीकेडिंग आदि का खर्च शामिल है.

यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक समाचार पत्र में एलडीए के सचिव एम.पी. सिंह के हवाले से कहा गया कि राज्य सरकार ने बिलों का भुगतान नहीं किया है. इस मुद्दे पर सवाल करते ही वे अपने बयान से मुकर गए. रिपोर्ट्स में कहा गया कि बिलों के भुगतान के लिए एलडीए और राज्य सूचना विभाग की ओर से एक-दूसरे को कई पत्र लिखे गए.

विभाग ने 15 मई की तारीख में एक जवाब भेजा कि उसके बजट में ऐसे किसी कार्यक्रम को शामिल नहीं किया गया है. मामले को लेकर विवाद पैदा होने के बाद, राज्य सूचना निदेशक शिशिर सिंह ने एलडीए को एक पत्र भेजकर कहा कि विभाग इन बिलों का भुगतान करेगा और इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है.

वाजपेयी की अस्थियां विशेष विमान द्वारा केंद्रीय मंत्री और लखनऊ से सांसद राजनाथ सिंह के साथ लखनऊ लाई गई थीं. अस्थियों को गोमती नदी में प्रवाहित किया गया था. वाजपेयी पांच बार लखनऊ से सांसद रहे थे और लखनऊ के साथ उनका विशेष लगाव था.


फिल्मकार आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री Reason के प्रदर्शन पर नहीं लगेगी रोक, केंद्र सरकार की आपत्ति खारिज

फिल्मकार आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री Reason के प्रदर्शन पर नहीं लगेगी रोक, केंद्र सरकार की आपत्ति खारिज

26-Jun-2019

दिल्ली : केन्द्र सरकार की आपत्ति खारिज करते हुए आज केरल उच्च न्यायालय ने मशहूर फिल्मकार आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री ‘विवेक’ को केरल में चल रहे रहे इंटरनेशनल डॉक्यूमेंटरी एंड शार्ट फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अनुमति दे दी. आदेश को पारित करने वाले जस्टिस शाजी पी.चाली ने ये स्पष्ट किया कि डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग कहीं और नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा है कि कानून व्यवस्था के भंग होने का कारण देकर डॉक्यूमेंट्री को प्रदर्शित होने से रोका नहीं जा सकता है. अंग्रेजी में इस फिल्म का नाम ‘रीजन’ है.

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह कहते हुए केरल फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी कि इससे कानून-व्यवस्था में समस्या पैदा हो सकती है.

इस रोक के खिलाफ केरल राज्य चलचित्र अकादमी, फिल्म फेस्टिवल के आयोजनकर्ता ने अदालत में याचिका दायर की थी. आनंद पटवर्धन इस मामले में दूसरे नंबर पर याचिकाकर्ता थे. याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा था कि कानून व्यवस्था खराब होने की मात्र आशंका भर से अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया नहीं जा सकता है.

याचिकाकर्ताओं ने केरल उच्च न्यायालय के 2017 के एक फैसले पर भरोसा था जिसमें मार्च, मार्च, मार्च’ और ‘द बियेरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’ की प्रदर्शन पर केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई रोक को अदालत ने ख़ारिज कर दिया था.

चार घंटे की यह फिल्म नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे की हत्याओं और सनातन संस्था की भूमिका को दिखाते हुए दक्षिणपंथी उग्रवादी हिंसा फैलाने की कहानी से शुरू होती है. इसके बाद फिल्म में हाल के वर्षों में हुए दलित आंदोलन और दलित नेताओं के उत्थान की कहानी है. इस फिल्म का अंत दादरी गांव में मोहम्मद अखलाक की गोहत्या के शक में हुई हत्या की कहानी के साथ होता है.

आनंद पटवर्धन की इस फिल्म ने अनेक पुरस्कार जीता है जिनमें एम्स्टर्डम के 31वें अंतरराष्ट्रीय डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार शामिल है.

चलचित्रों के सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का प्रमाणपत्र लेना पड़ता है, जिनको यह प्रमाणपत्र नहीं मिलता उन्हें केंद्र सरकार से सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 कानून की धारा 9 के तहत विशेष छूट लेनी पड़ती है.


मोदी सरकार का बड़ा फैसला, घाटे में चल रही 19 सरकारी कंपनियां होंगी बंद, लिस्ट देखें

मोदी सरकार का बड़ा फैसला, घाटे में चल रही 19 सरकारी कंपनियां होंगी बंद, लिस्ट देखें

26-Jun-2019

नई दिल्ली। मोदी सरकार ने घाटे में चल रही 19 कंपनियों को बंद करने की मंजूरी दे दी है। सरकार ने एचएमटी, हिंदुस्तान केबल्स और इंडियन ड्रग्स जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की 15 से अधिक कंपनियों को बंद करने की मंजूरी दे दी है। ये सभी कंपनियां घाटे में चल रही हैं। मंगलवार को कांग्रेस के लोकसभा सांसद अदूर प्रकाश के एक सवाल के जवाब में सरकार की तरफ से ये जानकारी दी गई है।

कांग्रेस के लोकसभा सांसद अदूर प्रकाश ने भारी उद्योग और लोक उद्यम मंत्रालय से पब्लिक सेक्टर की कंपनियों का ब्यौरा मांगा था। उन्होंने सवाल किया था कि क्या सरकार घाटे में चल रहे PSU को बंद करने या उनके निजीकरण पर विचार कर रही है। उन्होंने ये भी पूछा था कि क्या नीति आयोग ने निजीकरण के लिए पीएसयू की नई सूची तैयार की है? भारी उद्योग और लोक उद्यम मंत्री अरविंद गणपत सावंत ने अलग-अलग विभागों की घाटे में चल रही कंपनियों के बारे में सदन में जानकारी दी।

कांग्रेस सांसद के सवाल पर सरकार ने दी जानकारी

अरविंद सावंत ने 19 PSU कंपनियों की सूची भी दी जिसे बंद करने की कवायद चल रही है। मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, भारी उद्योग विभाग- तुंगभद्रा स्टील प्रोडक्ट्स लिमिटेड, एमएमटी वॉचेज लिमिटेड, एचएमटी चिनार वॉचेज लिमिटेड, एचएमटी बियरिंग्स लिमिटेड, हिंदुस्‍तान केबल्‍स लिमिटेड, एचएमटी लिमिटेड की ट्रैक्‍टर यूनिट और इंस्‍ट्रूमेंटेशन लिमिटेड की कोटा यूनिट को बंद करने की मंजूरी दे दी गई है। इसी प्रकार जहाजरानी मंत्रालय के अधीन केंद्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन निगम लिमिटेड भी घाटे में चल रही है, जबकि इंडियन ड्रग्‍स और राजस्‍थान ड्रग्‍स एंड फार्मास्‍युटिकल्‍स लिमिटेड की बंदी के लिए सरकार अनुमोदित कर चुकी है।

इसके अतिरिक्त, IOCL-क्रेडा बायोफ्यूल्स लिमिटेड, क्रेडा HPCL बायोफ्यूल्स लिमिटेड, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह वन और वृक्षारोपण विकास निगम लिमिटेड, भारत वैगन एंड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड, बर्न स्टैंडर्ड कंपनी लिमिटेड, सीएनए/एन2 ओ 4 प्लांट को छोड़कर हिंदुस्तान ऑर्गेनिक केमिकल्स लिमिटेड की रसायनी ईकाई में सभी संयत्रों के संचालन को बंद करना, नेशनल जूट मैन्यूफैक्चरर्स कार्पो. लिमिटेड, बर्ड्स जूट एंड एक्सपोर्ट लिमिटेड और एसटीसीएल लिमिटेड को बंद करने की मंजूरी दे दी गई है।


आप MLA मनोज कुमार को कोर्ट ने सुनाई 3 महीने की सजा

आप MLA मनोज कुमार को कोर्ट ने सुनाई 3 महीने की सजा

25-Jun-2019

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली की एक अदालत ने आम आदमी पार्टी (आप) विधायक मनोज कुमार को साल 2013 के एक मामले में 3 महीने की सजा सुनाई है। हालांकि, उन्हें इन केस में तुरंत जमानत भी मिल गई। इसके अलावा कोर्ट ने मनोज कुमार के उपर 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। मामला वर्ष 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में कल्याणपुरी थाने में दर्ज कराया गया था। अदालत ने 4 जून के अपने एक फैसले में मनोज कुमार को दोषी ठहराया था। 

राउज एवेन्यू की एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल ने कुमार को लोक सेवक को सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन करने में बाधा पहुंचाने और मतदान केंद्र के निकट अव्यवस्था फैलाने का दोषी पाया। अदलात ने चुनाव केंद्र में माहौल खराब करने की धाराओं में 4 जून को दोषी करार दिया था। कुमार पर आरोप था कि साल 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में एमसीडी स्कूल के मुख्य द्वार पर 50 लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन किया जिससे मतदाताओं को परेशानी का सामना करना पड़ा। 

2013 के चुनाव के दौरान मनोज कुमार की अगुवाई में 50 से ज्यादा आप कार्यकर्ताओं के एमसीडी स्कूल के गेट पर हंगामा किया था।इससे मतदाताओं को परेशानी का सामना करना पड़ा था। इन लोगों ने स्कूल का मेन गेट भी बंद कर दिया था, जिससे पुलिसकर्मी व चुनाव में लगा स्टाफ भी अंदर बंद हो गया।पुलिस के मुताबिक, मतदान समाप्त होने के बाद दोषियों मतपेटियों को बाहर नहीं लेकर जाने देने की बात कहते हुए गेट बंद कराकर उसके सामने बैठ गया। इसके बाद मतपेटियों को दूसरे रास्ते से बाहर निकाला गया था। 


धर्म और इंसानियत को शर्मसार ना करें

धर्म और इंसानियत को शर्मसार ना करें

25-Jun-2019

हिंदुस्तान का माहौल बदल चुका है। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, आपस में सब भाई भाई। इस कथन के अर्थ को कुछ लोग  तार तार कर रहे हैं। नफ़रत की खाई बढ़ती जा रही है। अब हिंदुस्तान में इंसान नहीं हिंदू- मुसलमान, यादव, दलित, ब्रह्मण रहते हैं। क्या हो गया है हमारे देश को। कौन सी सोच पर हम चल पड़े हैं। हमारे देश की सबसे बड़ी कमी है राजनीति का गन्दा होना। लोभ लालच, आस्थाओं के मकड़जाल में हम इतना फंस चुके हैं कि हमको उठने बैठने खाने पीने कपड़े भाषा सब में धर्म दिखने लगा है।

जब एक नवजवान को घेर कर मारा जाता है तो कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं मरता एक मां का बेटा, एक बहन का भाई, एक भाई का भाई, एक पत्नी का पति मरता है। एक हिंदुस्तानी मरता है। हम कहते हैं हिंदू मरा या मुसलमान मरा। ग़लत है। कोई भी इंसान मंदिर और मस्जिद में जाने पर हिंदू या मुसलमान हो सकता है लेकिन सार्वजनिक जीवन में वह इंसान है।
सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास इस नारे में खोखलापन दिखाई दे रहा है। सरकार को चाहिए कि इस खोखलेपन को भरे। 

यह कैसा साथ है, कैसा विकास है और कैसा विश्वास है कि जिसका जो चाहता है कर देता है। कभी पत्रकार को प्रताणित किया गया, कभी किसी की खंबे से बांधकर हत्या कर दी गई। कभी हेलमेट चेकिंग के नाम पर गन प्वाइंट पर लिया जाता है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। प्रशासन को सख़्त करने की जरूरत है। 

याद रखिए जब इंसान इस दुनिया में आता है तो नंगा आता है और जब जाता है तो उसे मामूली कपड़ा (कफ़न) मिलता है चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान या कोई और। इसलिए इंसान बनकर इंसानियत के बारे में सोचिए। क्योंकि आपको ईश्वर/अल्लाह के सामने हिसाब देना है।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी, चीफ़ ब्यूरो (हम्दे मुल्क उर्दू)
        (The Revolution News)


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