स्वामी दयानन्द सरस्वतीः राष्ट्रक्रांति के उन्नायक

स्वामी दयानन्द सरस्वतीः राष्ट्रक्रांति के उन्नायक

11-Feb-2021

स्वामी दयानन्द सरस्वती जन्म जयन्ती-12 फरवरी 2021 पर विशेष
-ः ललित गर्ग:-

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महापुरुषों की कीर्ति किसी एक युग तक सीमित नहीं रहती। उनका लोकहितकारी चिन्तन त्रैकालिक, सार्वभैमिक एवं सार्वदेशिक होता है और युग-युगों तक समाज का पथदर्शन करता है। स्वामी दयानंद सरस्वती हमारे समाज एवं राष्ट्र के ऐसे ही एक प्रकाश स्तंभ हैं, जिन्होंने न केवल धर्मक्रांति की बल्कि राष्ट्रक्रांति के भी वे प्रेरक बने। जिस युग में उन्होंने जन्म लिया उस समय देशी-विदेशी प्रभाव से भारतीय संस्कृति संक्रमण के दौर से गुजर रही थी और उसका पतन आरंभ हो गया था। उन्होंने भयाक्रांत, आडम्बरों में जकड़ी और धर्म से विमुख जनता को अपनी आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक एकता से संबल प्रदान किया। वे उन महान संतों-महापुरुषों में अग्रणी हैं जिन्होंने देश में प्रचलित अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, विभिन्न प्रकार के आडंबरों व सभी अमानवीय आचरणों का विरोध किया। वे आधुनिक भारत के महान् चिन्तक, समाज सुधारक, क्रांतिकारी धर्मगुरु व देशभक्त थे। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने तथा हिंदू धर्म के उत्थान व इसके स्वाभिमान को जगाने हेतु स्वामीजी के महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारतीय जनमानस सदैव उनका ऋणी रहेगा।
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी सन् 1824 में काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में टंकरा नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम कृष्णजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित-मनीषी बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए।
महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा भारतीय जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा की परवाह किये बिना हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है, संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। स्वामीजी ने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। सत्यार्थ प्रकाश के लेखन में उन्होंने भक्ति-ज्ञान के अतिरिक्त समाज के नैतिक उत्थान एवं समाज-सुधार पर भी जोर दिया उन्होंने समाज की कपट वृत्ति, दंभ, क्रूरता, अनाचार, आडम्बर, एवं महिला अत्याचार की भत्र्सना करने में संकोच नहीं किया। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों एवं ढकोसलों का विरोध किया और धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्थापित किया। उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर से जुड़ी भ्रान्त धारणाओं को बदलने के लिये विवश किया।
एक बार शिवरात्रि को स्वामी दयानन्द सरस्वती ने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए। अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और वे 1846 में सत्य की खोज मे निकल पड़े। गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजलि-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा- विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत-मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।
महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। केशवचन्द्र सेन ने स्वामीजी को यह सलाह दे डाली कि यदि आप संस्कृत छोड़ कर हिन्दी में बोलना आरम्भ करें, तो देश का असीम उपकार हो सकता है। तभी से स्वामीजी ने हिन्दी में उपदेश देना प्रारंभ किया, इससे विभिन्न प्रान्तों में उन्हंे असंख्य अनुयायी मिलने लगे।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। उन्होंने ईसाइयत और इस्लाम के विरूद्ध मोर्चा खोला, सनातनधर्मी हिंदुओं के खिलाफ संघर्ष किया। इस कारण स्वामीजी को तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी, अपमान, कलंक और कष्ट झेलने पड़े। संघर्ष उनके लिये अभिशाप नहीं, वरदान साबित हुआ। आंतरिक आवाज वही प्रकट कर सकता है जो दृढ़ मनोबली और आत्म-विजेता हो। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलायी थी, उसका कोई जवाब नहीं था। वे जो कुछ कह रहे थे, उसका उत्तर न तो मुसलमान दे सकते थे, न ईसाई, न पुराणों पर पलने वाले हिन्दू पण्डित और विद्वान। हिन्दू नवोत्थान अब पूरे प्रकाश में आ गया था और अनेक समझदार लोग मन ही मन अनुभव करने लगे थे कि वास्तव में पौराणिक धर्म की पोंगापंथी में कोई सार नहीं है। इस तरह धर्म के वास्तविक स्वरूप से जन-जन को प्रेरित करके उन्होंने एक महान् क्रांति घटित की। उनकी इस धर्मक्रांति का सार था कि न तो धर्मग्रंथों में उलझे और न ही धर्म स्थानों में। उनके धर्म में न स्वर्ग का प्रलोभन था और न नरक का भय, बल्कि जीवन की सहजता और मानवीय आचार संहिता का ध्रूवीकरण था।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने न केवल धर्मक्रांति की बल्कि परतंत्रता में जकड़े देश को आजादी दिलाने के लिये राष्ट्रक्रांति का बिगुल भी बजा दिया। इसके लिये उन्होंने हरिद्वार पहुँच कर वहां एक पहाड़ी के एकान्त स्थान पर अपना डेरा जमाया। वहीं पर उन्होंने पाँच ऐसे व्यक्तियों से मुलाकात की, जो आगे चलकर सन् 1857 की क्रान्ति के कर्णधार बने। ये पांच व्यक्ति थे नाना साहेब, अजीमुल्ला खां, बाला साहब, तात्या टोपे तथा बाबू कुंवर सिंह। बातचीत काफी लम्बी चली और यहीं पर यह तय किया गया कि फिरंगी सरकार के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में सशस्त्र क्रान्ति के लिए आधारभूमि तैयार की जाए और उसके बाद एक निश्चित दिन सम्पूर्ण देश में एक साथ क्रान्ति का बिगुल बजा दिया जाए। सन् 1857 की क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना भी स्वामीजी के नेतृत्व में ही तैयार की गई थी और वही उसके प्रमुख सूत्रधार भी थे। वे अपने प्रवचनों में श्रोताओं को प्रायः राष्ट्रवाद का उपदेश देते और देश के लिए मर मिटने की भावना भरते थे। उन्होंने यह अनुभव किया कि लोग अब अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके हैं और देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने को आतुर हो उठे हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से समाज-सुधार के अनेक कार्य किए। छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि, धार्मिक संकीर्णता तथा अन्धविश्वासों के विरुद्ध उन्होंने जमकर प्रचार किया और विधवा विवाह, धार्मिक उदारता तथा आपसी भाईचारे का उन्होंने समर्थन किया। इन सबके साथ स्वामीजी लोगों में देशभक्ति की भावना भरने से भी कभी नहीं चूकते थे। प्रारम्भ में अनेक व्यक्तियों ने स्वामीजी के समाज सुधार के कार्यों में विभिन्न प्रकार के विघ्न डाले और उनका विरोध किया। धीरे-धीरे उनके तर्क लोगों की समझ में आने लगे और विरोध कम हुआ। उनकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ने लगी। उनके विराट व्यक्तित्व को किसी उपमा से उपमित करना उनके व्यक्तित्व को ससीम बनाना होगा। उनकी जन्म जयन्ती मनाने की सार्थकता तभी है जब हम उनके बताये मार्ग पर चलते हुए गुणवत्ता एवं जीवनमूल्यों को जीवनशैली बनाये।
प्रेषक

 

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


नई दिल्ली के राजपथ पर छाया रहा छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य यंत्रों का जादू

नई दिल्ली के राजपथ पर छाया रहा छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य यंत्रों का जादू

10-Feb-2021

नई दिल्ली के राजपथ पर छाया रहा छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य यंत्रों का जादू

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देश के लोगों ने 26 जनवरी 2021 नई दिल्ली के राजपथ पर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों पर आधारित निकली झांकी को न केवल बड़ी उत्सुकता के साथ देखा बल्कि इसकी उन्मुक्त कंठो से सराहना भी की। यह झांकी नेशनल मीडिया के साथ ही लोगों के दिलो-दिमाग में छा गई। गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर आधारित राज्य की झांकी देश भर के लोगों का आकर्षण का केन्द्र बनी वहीं यह सोशल मीडिया पर भी छायी रही। देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार इसको सराहना मिल रही है।

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नेशनल मीडिया टाइम्स नाउ ने अपने ट्विटर हेण्डल में इसकी सराहना करते हुए लिखा है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता आज पूरे वैभव के साथ राजपथ पर दिखी। हिन्दुस्तान टाईम्स ने लिखा कि झांकी में छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी नृत्य और संगीत परम्परा को प्रदर्शित किया गया। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने अपने ट्विटर हेण्डल में लिखा कि छत्तीसगढ़ राज्य की झांकी में संगीत के विविध वाद्य यंत्रों को बहुत खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया है।

गौरतलब है कि यह झांकी छत्तीसगढ़ जनसम्पर्क विभाग के द्वारा तैयार की गई है। इस झांकी के निर्माण के लिए पिछले तीन माह से तैयारी की जा रही थी। कई प्रस्तावों पर विचार करने के बार इस झांकी का निर्णय लिया गया है। छत्तीसगढ़ की झांकी में छत्तीसगढ़ के लोक संगीत का वाद्य वैभव को प्रदर्शित किया गया है। छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले लोक वाद्यों को उनके सांस्कृतिक परिवेश के साथ बडे़ ही खूबसूरत ढंग से इसे दिखाया गया है। प्रस्तुत झांकी में छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित बस्तर से लेकर उत्तर में स्थित सरगुजा तक विभिन्न अवसरों पर प्रयुक्त होने वाले लोक वाद्य शामिल किए गए हैं। इनके माध्यम से छत्तीसगढ़ के स्थानीय तीज त्योहारों तथा रीति रिवाजों में निहित सांस्कृतिक मूल्यों को भी रेखांकित किया गया है।

झांकी के ठीक सामने वाले हिस्से में एक जनजाति महिला बैठी है जो बस्तर का प्रसिद्ध लोक वाद्य धनकुल बजा रही है। धनकुल वाद्य यंत्र, धनुष, सूप और मटके से बना होता है। जगार गीतों में इसे बजाया जाता है। झांकी के मध्य भाग में तुरही है। ये फूँक कर बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है, इसे मांगलिक कार्यों के दौरान बजाया जाता है। तुरही के ऊपर गौर नृत्य प्रस्तुत करते जनजाति हैं। झांकी के अंत में माँदर बजाता हुआ युवक है। झांकी में इनके अलावा अलगोजा, खंजेरी, नगाड़ा, टासक, बांस बाजा, नकदेवन, बाना, चिकारा, टुड़बुड़ी, डांहक, मिरदिन, मांडिया ढोल, गुजरी, सिंह बाजा या लोहाटी, टमरिया, घसिया ढोल, तम्बुरा को शामिल किया गया है।

छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति प्रस्तुत करने में संस्था लोक रागनी में दुर्ग एवं बालोद जिले के कलाकारों का अहम भूमिका रही

संस्था लोक रागिनी व कुहुकी के संचालक रिखी क्षत्रीय की टीम में बालोद व दुर्ग जिले के विभिन्न कलाकारों ने सम्मालित होकर अपना बहुमूल्य योगदान दिया, जिसमें गुंडरदेही विकासखंड के रंगकटेरा से कुलदीप सार्वा, सरेखा से उग्रसेन देवदास, रनचिरई से रामकुमार पाटिल, तमोरा से डोरे लाल साहू, बालोद विकासखंड से प्रदीप ठाकुर, जयालक्ष्मी ठाकुर, गुरूर विकासखंड के ग्राम दरर्रा निवासी कु. केवरा सिन्हा, दुर्ग से संजीव राजपूत, पारस रजक, नेहा विश्वकर्मा, कुम्हारी से साधना शामिल हुए। छत्तीसगढ़ शासन, जनसंपर्क विभाग की ओर से नोडल अधिकारी, अपर संचालक श्री उमेश मिश्रा के मार्गदर्शन एवम छत्तीसगढ़ के लीडर के रूप में श्री तेजबहादुर सिंह भुवाल द्वारा दिल्ली में झांकी का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया गया।

छत्तीसगढ़ की कलाकार टीम द्वारा राष्ट्रीय रंगशाला कैम्प में आयोजित ‘‘झंकार’’ में छत्तीसगढ़ की लोक कला, संस्कृति को नृत्य के माध्यम से प्रदर्शित किया, जिसे विशेषज्ञ समिति ने बहुत सराहना भी। इसी प्रकार केन्द्रीय जनजाति कार्य मंत्री श्री अर्जुन मुण्डा के यहां आयोजित सम्मान समारोह में छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने आदिवासी नृत्य का जबरदस्त प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में उपस्थित देश के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे सांसदगण एवं विधायक सहित बड़ी संख्या में आगंतुकों ने ताली बजाकर सम्मान किया। इस अवसर पर केन्द्रीय राज्य मंत्री श्रीमती रेणुका सिंह ने भी छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति एवं गुरतुर बोली की सराहना की। छत्तीसगढ़ से टीम लीडर के रूप में तेजबहादुर सिंह भुवाल को राष्ट्रीय रंगशाला कैम्प, रक्षा मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ लीडर का सम्मान दिया गया। 

प्रेषित- तेज सिंह भुवाल 


राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग तेज

राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग तेज

09-Feb-2021

नई दिल्ली, कांग्रेस शासित राज्यों में एक बार फिर से राहुल गांधी को दोबारा पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने की मांग जोर पकड़ रही है। पार्टी की प्रदेश इकाइयां इस संबंध में प्रस्ताव भी पास करने लगी हैं। अब सबकी निगाहें मई में होने वाले संगठन के चुनाव पर टिकी हैं।

दिल्ली और छत्तीसगढ़ के बाद अब तेलंगाना भी इस मांग के समर्थन में आवाज बुलंद करने वाला तीसरा राज्य बन गया है।

एक बैठक में सर्वसम्मति से इस बाबत एक प्रस्ताव पारित किया गया। बैठक में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के तेलंगाना प्रभारी व सांसद मणिकम टैगोर और 33 जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष एन. उत्तम कुमार रेड्डी और सीएलपी लीडर भट्टी विक्ररमार्का ने भी हिस्सा लिया।

इससे पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य इकाई ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा प्रस्तावित और राज्य इकाई के अध्यक्ष मोहन मरकाम व प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया द्वारा अनुमोदित एक प्रस्ताव पारित किया था।

दिल्ली कांग्रेस ने भी राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था।

दिल्ली कांग्रेस के प्रमुख चौधरी अनिल कुमार ने राहुल गांधी से अनुरोध किया कि वे जल्द से जल्द कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करें।

उन्होंने कहा, देश में खतरनाक राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस को सांप्रदायिक, सत्तावादी और अलोकतांत्रिक ताकतों का मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी जैसे ऊर्जावान और शक्तिशाली नेता की आवश्यकता है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि राहुल गांधी मोदी सरकार के गलत कामों का पदार्फाश करने के लिए दृढ़ निश्चय कर रहे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनका आत्मविश्वास कार्यकर्ताओं के आत्मविश्वास और मनोबल को बढ़ाने के लिए जरूरी है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने संसद के अंदर और बाहर किसान विरोधी कानूनों का जबरदस्त विरोध किया था और देश में कृषि क्षेत्र को बर्बाद करने वाले कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर किसान आंदोलन का समर्थन किया था, क्योंकि इन कानूनों का उद्देश्य मोदी सरकार के कुछ अमीर कॉर्पोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाना है।

गौरतलब है कि आम चुनावों में पराजय के बाद राहुल गांधी ने मई 2019 में पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और सोनिया गांधी को अगस्त में अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

यह मुद्दा कांग्रेस नेताओं द्वारा उठाया गया था जिन्होंने अगस्त 2020 में पार्टी और ब्लॉक से सीडब्ल्यूसी स्तर तक चुनावों में व्यापक सुधार की मांग की थी। लेकिन, पार्टी ने पांच राज्यों के चुनावों के बाद मई में संगठन का चुनाव कराने का फैसला किया है।

द न्यूज़ इंडिया से 


गिधवा-परसदा पक्षी विहार’ बनेगा विश्व स्तरीय  पर्यटन स्थल : श्री भूपेश बघेल

गिधवा-परसदा पक्षी विहार’ बनेगा विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल : श्री भूपेश बघेल

03-Feb-2021

 मुख्यमंत्री ने की अनेक महत्वपूर्ण घोषणाएं: गिधवा-परसदा क्षेत्र में पक्षी जागरूकता एवं प्रशिक्षण केन्द्र की होगी स्थापना

राज्य के समस्त वेटलैंड का होगा संरक्षण एवं प्रबंधन 

छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड बनाएगा 
प्रवासी पक्षियों के संरक्षण की योजना

मुख्यंत्री पहुंचे गिधवा-परसदा जलाशय: पक्षियों को कैमरे में किया कैद

मुख्यमंत्री ‘गिधवा-परसदा पक्षी विहार महोत्सव’ में हुए शामिल: छत्तीसगढ़ में पहली बार पक्षी महोत्सव का आयोजन

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 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने कहा है कि ‘गिधवा-परसदा पक्षी विहार’ को विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। छत्तीसगढ़ के इस पक्षी विहार को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र में स्थापित करने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे। पक्षी विज्ञानियों, प्रकृति प्रेमियों और यहां आने वाले सैलानियों के लिए विभिन्न सुविधाएं विकसित की जाएंगी। यहां विश्व के विभिन्न प्रवासी पक्षियों का आवागमन होता हैं। विशेषकर साल के माह नवम्बर से मार्च (05 माह) में यहां ये पक्षी रहवास करते हैं। मुख्यमंत्री श्री बघेल बेमेतरा जिले के नवागढ़ विकासखण्ड के नगधा गांव में आयोजित ‘गिधवा-परसदा पक्षी विहार महोत्सव’ को सम्बोधित कर रहे थे। इसके पहले श्री बघेल ने गिधवा-परसदा जलाशय का भ्रमण किया और वहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों और जलाशय के मनोरम और विहंगम दृश्यों को कैमरे में कैद किया। इस अवसर पर वन एवं परिवहन मंत्री श्री मोहम्मद अकबर, संसदीय सचिव श्री गुरुदयाल बंजारे, विधायक श्री आशीष छाबड़ा, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री राकेश चतुर्वेदी, आईजी श्री विवेकानंद सिन्हा, कलेक्टर श्री शिवअनंत तायल सहित अनेक जनप्रतिनिधि और अधिकारी उपस्थित थे।

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    मुख्यमंत्री ने पक्षी महोत्सव में जैव विविधता के संरक्षण के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण घोषणाएं करते हुए कहा कि गिधवा एवं परसदा ग्रामों के आस-पास जिन क्षेत्रों में प्रवासी पक्षी आते हैं, उसके संरक्षण की योजना बनाकर छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा कार्य किया जाएगा। साथ ही क्षेत्र में एक पक्षी जागरूकता एवं प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया जाएगा। यहां राज्य के प्रवासी एवं स्थानीय पक्षियों की जैव विविधता संबंधी जानकारी एवं प्रशिक्षण जन सामान्य को दी जाएगी। राज्य के समस्त ऐसे वेटलैंड जिसमें प्रवासी पक्षी आते हैं एवं जैव विविधता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, उनके संरक्षण एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड को दी जाएगी। 
    उल्लेखनीय है कि गिधवा-परसदा के जलाशयों को विश्व स्तरीय पक्षी पर्यटन स्थलों में स्थान दिलाने के लिए यहॉं 31 जनवरी से 02 फरवरी 2021 तक पक्षी विहार महोत्सव का आयोजन किया गया। पक्षियों के संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण तथा स्थानीय लोगों को ईको-पर्यटन के माध्यम से होम, विलेज स्टे से रोजगार उपलब्ध होगा।
    बेमेतरा जिले के गिधवा-परसदा, नगधा, एरमशाही क्षेत्र जलीय एवं स्थल जैव विविधता से भरपूर है। यह क्षेत्र पारिस्थितिकीय व स्वस्थ्य पर्यावरण के लिये उपयुक्त है। गिधवा-परसदा स्थल मुख्यतः जलीय नमी युक्त क्षेत्र है। इसका भौगोलिक विस्तार लगभग 06 कि.मी. क्षेत्र में है। गिधवा परसदा में मुख्य 02 बड़े तथा 02 मध्यम आकार के जलाशय हैं, नजदीकी ग्राम एरमशाही में 05 जलाशय भी स्थित हैं। गिधवा-परसदा जलीय तंत्र में भरपूर जलीय खाद्य वनस्पति व जीव होने के कारण यहां पक्षियों के लिए अच्छा रहवास है। यहां किए गए अध्ययनों में पक्षियों की कुल 143 प्रजातियां जिसमें कुल 26 स्थानीय प्रवासी प्रजातियां, 11 विदेशी प्रवासी प्रजातियां तथा 106 स्थानीय आवासीय प्रजातियां पक्षी पायी गयी है। 

 


CM केजरीवाल ने 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया!

CM केजरीवाल ने 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया!

28-Jan-2021

एजेंसी 

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी का देश के अन्य राज्यों में विस्तार करने का ऐलान किया है। उन्होंने गुरुवार को 6 राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया। अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में इस बाबत जानकारी दी।

उनके बयान का सीधा मतलब यह है कि पार्टी दिल्ली में अपनी कुर्सी सुरक्षित करने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार करना चाहती है। पार्टी AAP नेताओं को राज्यवार जिम्मेदारियां देने की तैयारी में है जिसके मद्देनजर आप नेता राघव चड्ढा को पंजाब का प्रभार बनाया गया है और आतिशी मार्लेन को गुजरात में पार्टी का विस्तार करने की जिम्मेदारी दी गई है।

दिल्ली के विधायक दिनेश मोहनिया उत्तराखंड के प्रभारी बनाए गए हैं। मालूम हो कि इन सभी राज्यों में 2022 में चुनाव होने हैं। दिसंबर में केजरीवाल ने ऐलान किया था कि उनकी पार्टी 2022 में उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में हिस्सा लेगी।

केजरीवाल ने गुरुवार को दिल्ली के कापसहेड़ा में हुई आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में कहा, "पूरे देश की जनता दिल्ली में सुशासन की चर्चा करती है। पूरा देश दिल्ली की तरह बिजली और पानी पर सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाएं चाहता है। हमें इस खाई को पाटने की जरूरत है। उसके लिए, हमें एक मजबूत संगठन बनाने की जरूरत है अगले दो वर्षों में, हमारी पार्टी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव लड़ेगी... लोग तैयार हैं और अब हमें बस उन तक पहुंचना है।"


गणतंत्र दिवस हो गया गंदी राजनीति का शिकार

गणतंत्र दिवस हो गया गंदी राजनीति का शिकार

27-Jan-2021

सैय्यद एम अली तक़वी

गणतंत्र दिवस भारत के गौरव का प्रतीक है पिछले 71 सालों से भारतीय गणतंत्र पूरी दुनिया में अपना सर ऊंचा किये था। गणतंत्र दिवस के अवसर पर विदेशी मीडिया द्वारा भी भारतीय गौरव की व्याख्या की जाती थी लेकिन इस बार पूरी दुनिया में भारतीय गणतंत्र की जो तस्वीर पेश की गई वह बहुत ज्यादा चिंताजनक है। पिछले 62 दिनों से चल रहा किसान आंदोलन 72वें गणतंत्र दिवस पर जिस रूप और शक्ल में सामने आया वह विचार के योग्य है।

हर तरफ मीडिया के माध्यम से यही चर्चा की जा रही है कि किसान आंदोलन उग्र हो गया किसानों ने हिंसक प्रदर्शन किया किसानों ने लाल किले में घुसकर झंडा फहराया लेकिन इसमें शांत भाव और शांत मन से सोचने की जरूरत है। जो किसान पिछले 62 दिन से शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहा था गणतंत्र दिवस के अवसर पर उसको ऐसा करने की क्या जरूरत थी यह एक सवाल है।

 इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में तो बात करना बेकार है उसकी तस्वीर पूरी दुनिया जाती है। लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से जो चीजें उभर करके सामने आई है उसमें यह साफ जाहिर है कि दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा और लाल किले पर हुए प्रदर्शन के बाद पंजाबी अभिनेता दीप सिद्धू का चेहरा सामने आया है। दिल्ली में लालकिले पर निशान साहिब फहराने के बाद सिद्धू का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था, जिसमें उसने कहा, 'हमने सिर्फ लालकिले पर निशान साहिब फहराया है जो कि हमारा लोकतांत्रिक हक है। वहां पर तिरंगा नहीं हटाया गया था।' सवाल तिरंगा हटाने या झंडा फहराने का नहीं है। सवाल यह है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर जहां सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक और चौबंद होती है ऐसे में लोग लाल किले के अंदर प्रवेश कैसे कर गये। यह दिल्ली पुलिस और सरकार की पूरी तरह विफलता है। 

इससे भी बड़ा एक सवाल और है कि दिल्ली में मंगलवार को मचे उत्पात और पुलिस पर हमले को लेकर सरकार इतनी खामोश क्यूं है? क्या सरकार की यह कोशिश है कि किसी भी तरह से उसकी छवि किसान विरोधी न बने क्यूं कि इससे दूसरे हिस्सों में रह रहे कृषि समुदाय के लोग नाराज हो सकते हैं। शायद यही वजह है कि कल गणतंत्र दिवस की घटना पर अभी तक किसी केंद्रीय मंत्री का बयान नहीं आया है। सब ख़ामोश क्यूं हैं?

 सोशल मीडिया पर दीप सिद्धू की तस्वीर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री इत्यादि के साथ वायरल हो रही है। सवाल?  क्या यह इन दोनों का करीबी था? अगर करीबी था तो क्या इसके किये गये काम की जानकारी इनको थी? जब हर माध्यम से साबित है कि सिद्धू इसमें शामिल था तो तुरंत कार्रवाई क्यूं नहीं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि दो महीने से भी ज्यादा समय से चल रहे आंदोलन का क्या होगा? क्या गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा को आधार बनाते हुए सरकार इस आंदोलन को बंद करवा देगी या फिर किसान आंदोलन और उग्र हो जाएगा?
 हिंसा किसी भी चीज का समाधान नहीं है। नुकसान अपने देश का ही होगा । हमें इससे बचना चाहिए।
 बहरहाल सत्तर सालों में जो नहीं हुआ वह अब हो रहा है। 

जयहिंद।


सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com


धान खरीदी पर झूट और भ्रम फैला रही है भाजपा!

धान खरीदी पर झूट और भ्रम फैला रही है भाजपा!

25-Jan-2021

खुलासा पोस्ट न्यूज़ नेटवर्क टीम...

रायपुर : छत्तीसगढ़ मे हो रहे धान खरीदी पर भारतीय जनता पार्टी राज्य में झूट और भ्रम फैलाने का काम कर रही है. जब से छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने किसानों से समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी की है तब से भाजपाइयों के पेट मे दर्द हो रहे है |क्योकि इनके पास राज्य की सरकार को घेरने का कोई मौका और मुद्दा नही मिल रहा है इस लिये ये धान खरीदी पर झूठ फैलाने और धान खरीदी केन्द्रों में  किसानों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे है. लेकिन सच तो ये है की राज्य सरकार की धान खरीदी में आज तक एक भी किसान की न तो सिकायत आयी न किसानों को दिक्कत हुई है. फिर भी भाजपा द्वारा धान खरीदी पर राज्य में झूट और भ्रम फैलाना एक ओंछी राजनीति ही कहा जा सकता है. जब भाजपा के कई बड़े नेताओं ने अपना धान बेचा तो इन बीजेपी नेताओं को सरकार की धान खरीदी में कोई अनियमिता और असुविधा नजर नहीं आई लेकिन आज धान खरीदी को लेकर जनता में झूट और भ्रम फैला रहे है जो की सोचने और समझाने की बात है. पर राज्य की जनता भाजपा की इन खोखले दावे को समझ रही है और सरकार की महती योजना का जमकर लाभ उठा रहे है. जिसका नतीजा है की छत्तीसगढ़ राज्य धान की खरीदी में निरंतर नई कीर्तिमान बना रहे है| 

खुलासा पोस्ट न्यूज़ नेटवर्क ने खोली भाजपा नेताओं की पोल-
आज खुलासा पोस्ट न्यूज़ नेटवर्क छत्तीसगढ़ राज्य में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जो धान बेचा है उसे प्रस्तुत करते हुए इनकी पोल खोल दी है 
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी मे व्याप्त अनियमितता व बारदाना की कमी से प्रभावित धान खरीदी सहित कई मुद्दों के लेकर भाजपा के प्रदेशव्यापी आंदोलन करने की बात करते है जबकि हक़ीकत कुछ और ही बयाँ कर रही हैं ये हम नही तथ्य बता रहे है इन लोगो के धान विक्रय के पोल अब खुल गई है|

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और ये किसान हितैसी तो वैसे भी नही है आज देश का किसान दिल्ली की सीमा पर ठंड से तड़प रहे हैं उनकी सुनाने की छोड़ झूठ और भ्रम की राजनितिक करने में लगे हुए है| कृषि कानून को लेकर आंदोलनरत दर्जनों किसानों ने अपनी जान गवा दी है और इनकी पार्टी अपने हठ पर अड़े हुए है इस पर ये किसान हितैसी नेता मौन क्यों है ये लोग इन किसानों की हालातों पर टिप्पणी क्यों नहीं करते ये नेता किसानों की जखम भरने की बजाय घाव में नमक डालने का काम ना करे क्योकि छत्तीसगढ़ का किसान 2019 मे भारतीय जनता पार्टी की किसान विरोधी नीतियो समझ लिया था इस लिए सत्ता से बाहर है अब देश समझ जायेगा इनकी किसान विरोधी नीतियो को अब ये देश की सत्ता से बेदखल होने वाले है|


अर्नब की  व्हाट्सएप चैट पर बोले सोनिया गांधी- राष्ट्रवाद-देशभक्ति का सर्टिफिकेट देने वाले बेनकाब हुए

अर्नब की व्हाट्सएप चैट पर बोले सोनिया गांधी- राष्ट्रवाद-देशभक्ति का सर्टिफिकेट देने वाले बेनकाब हुए

22-Jan-2021

नई दिल्ली : कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर अर्नब गोस्वामी के व्हाट्सएप चैट लीक पर हमला बोला है। सोनिया गांधी ने कहा कि टीवी एंकर अर्नब गोस्वामी का बालाकोट एयर स्ट्राइक पर जो व्हाट्सएप चैट लीक हुआ है, उसपर सरकार की चुप्पी शोर मचा रही है। सोनिया गांधी ने आरोप लगाया देश की सुरक्षा के साथ समझौता हुआ है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में बोलते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि हाल ही में जिस तरह से देश की सुरक्षा के साथ समझौता हुआ है वह बहुत ही चिंता का विषय है। मुझे लगता है कि कुछ दिन पहले एंटनी जी ने कहा था कि देश की सेना के आधिकारिक मैसेज को लीक करना गद्दारी है। लेकिन बावजूद इसके जो चैट लीक हुई है उसपर केंद्र सरकार की चुप्पी शोर मचा रही है।

सोनिया गांधी ने कहा कि जो लोग राष्ट्रवाद और देशभक्ति के सर्टिफिकेट देते थे आज वो पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं। बता दें कि मुंबई पुलिस ने हाल ही में कोर्ट में टीआरपी स्कैम को लेकर जो चार्जशीट दायर की है उसमे व्हाट्सएप पर लीक हुए मैसेज को भी दायर किया गया है। यह लीक रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्नब गोस्वामी और रेटिंग एजेंसी बार्क के पूर्व सीईओ पार्थो दासगुप्ता के बीच है। लीक मैसेज में बालाकोट स्ट्राइक के तीन दिन पहले गोस्वामी कहते हैं कि कुछ बड़ा होने वाला है, जोकि सामान्य स्ट्राइक से भी बड़ा होगा। सरकार इस तरह से हमला करने वाली है कि लोग खुश हो जाएंगे।

अर्नब गोस्वामी और पार्थो दासगुप्ता के बीच यह बातचीत 23 फरवरी 2019 की है, इसके तीन दिन बाद ही भारतीय वायुसेना के जेट्स ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के आतंकी ठिकानों पर हमला बोला था और आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया था। दरअसल पुलवामा में हुए आतंकी हमले में देश के 40 जवान शहीद हो गए थे, जिसके बाद भारत की ओर से यह जवाबी कार्रवाई की गई थी। वहीं किसानों के आंदोलन पर सोनिया गांधी ने कहा कि तीन कृषि कानून जिनके खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे हैं, यह बहुत ही जल्दबाजी में तैयार किए गए हैं। किसानों का आंदोलन जारी है लेकिन सरकार का अड़ियल और असंवेदनशील रुख चौंकाने वाला है। यह बिल्कुल साफ है कि तीनों ही कानून जल्दबाजी में तैयार किए गए हैं और जानबूझकर संसद को यह मौका नहीं दिया गया कि इन कानूनों की समीक्षआ की जा सके। हमारा रुख शुरुआत से बिल्कुल साफ है, हमने इस बिलों को नकारा था क्योंकि ये कानून देश में खाद्य सुरक्षा को नष्ट कर देंगे। खाद्य सुरक्षा के तीन मजबूत स्तंभ एमएसपी, पब्लिक प्रोक्यूरमेंट और पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम हैं। इन तीनों ही स्तंभ को नए कानून नष्ट कर देंगे।


रायपुर : गृह मंत्री श्री ताम्रध्वज साहू ने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह का किया शुभारंभ

रायपुर : गृह मंत्री श्री ताम्रध्वज साहू ने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह का किया शुभारंभ

19-Jan-2021

सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने लोगों को यातायात नियमों के प्रति अधिक से अधिक करें जागरूक: मंत्री श्री साहू

गृहमंत्री ने ‘सड़क सुरक्षा संगवारी‘ पुस्तिका का किया विमोचन

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गृह मंत्री श्री ताम्रध्वज साहू ने आज से शुरू होकर एक माह तक चलने वाले राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह का दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ किया। इसका आयोजन राजधानी रायपुर के बूढ़ा तालाब गार्डन में रायपुर यातायात पुलिस द्वारा किया गया है। राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह 2021 अभियान के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने हेतु आम-जन मानस को यातायात नियमों के प्रति अधिक से अधिक जागरूक किया जाना है। यह अभियान 18 जनवरी से 17 फरवरी एक माह तक चलेगा।

    गृहमंत्री श्री साहू ने कहा कि यातायात नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जीवन के प्रति स्वयं में चेतना लाएं। उन्होंने कहा कि नियमों को पढ़ते जरूर है पर पालन नहीं करते। उन्होंने कहा कि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें। दुर्घटना रोकने के लिए सरकार द्वारा पूरी कोशिश की जाती है। यातायात नियमों के प्रति जागरूक होना जरूरी है। उन्होंने सहजता और सरलता के साथ लोगों को यातायात नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करने के साथ ही स्कूलों में बच्चों और अभिभावकों को भी जागरूक करने की अपील की। इस अवसर पर गृहमंत्री ने यातायात के नियमों से संबंधित ‘सड़क सुरक्षा संगवारी‘ पुस्तिका का विमोचन भी किया। गृहमंत्री ने कार्यक्रम स्थल पर यातायात नियमों से संबंधित स्टॉलों को अवलोकन भी किया।

    कार्यक्रम में रायपुर नगर निगम के महापौर श्री एजाज ढेबर ने कहा कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जन जागरूकता और सहभागिता जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोगों में ट्रैफिक सेंस होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि गतवर्ष की तुलना में दुर्घटना में कमी आयी है। उन्होंने कोरोनाकाल में रायपुर पुलिस के कार्यों की सराहना की। रायपुर जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री अजय कुमार यादव ने जिले के यातायात प्रतिवेदन से अवगत कराया।

    कार्यक्रम में चौक-चौराहों पर स्टॉप लाइन का पालन, वाहन चलाते समय मोबाईल का उपयोग नहीं करने, दोपहिया चलते समय अनिवार्य रूप से हेलमेट लगाने, वाहन चलाते समय सीट बेल्ट लगाने, यातायात नियमों एवं संकेतों का पालन करने, नशे की हालत में, उतावलेपन में और खतरनाक तरीके से वाहन नहीं चलाने, निर्धारित गति पर ही वाहन चलाने और वाहन को हमेशा दुरुस्त रखने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। कार्यक्रम में यातायात नियमों से सम्बंधित प्रश्नों का सही जवाब देने वाले लोगों को रायपुर यातायात पुलिस द्वारा पुरस्कृत भी किया गया।

    इस अवसर पर रायपुर कलेक्टर डॉ. एस. भारतीदासन, पुलिस महानिरीक्षक रायपुर रेंज डॉ. आनंद छाबड़ा, रायपुर नगर निगम आयुक्त श्री सौरभ सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक यातायात श्री एम.आर. मंडावी, यातायात लीड एजेन्सी के श्री संजय शर्मा सहित बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित थे।

 


स्वदेशी तेजस विमानों से तेजस्विता की उड़ान

स्वदेशी तेजस विमानों से तेजस्विता की उड़ान

15-Jan-2021

स्वदेशी तेजस विमानों से तेजस्विता की उड़ान
- ललित गर्ग-

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सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की ओर से निर्मित किये जाने वाले हल्के लड़ाकू विमान की खरीद को मंजूरी देकर भारत के स्वदेशी रक्षा उद्योग को तेजस्विता एवं स्वावलंबन की नयी उड़ान दी है। पिछले साल भारतीय वायु सेना ने 48 हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत के इन 83 तेजस विमानों की खेप की खरीद के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसे स्वीकृति मिलना नये भारत, आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है। नरेन्द्र मोदी सरकार की आत्मनिर्भर भारत की पहल के क्रम में रक्षा मंत्रालय ने अनुकरणीय कदम उठाया है। स्वदेशी आयुध सामग्री एवं रक्षा उत्पादों के निर्माण से विदेशांे से आयात पर रोक लगेगी, जो न केवल आर्थिक दृष्टि से किफायती साबित होगी बल्कि भारत दुनिया में एक बड़ी ताकत बनकर भी उभरेगा। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि भारत की गिनती दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाले देशों में होती है। दूसरी ओर पाक व चीन की सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों में लगातार इजाफा हुआ है। वहीं विगत में हर बड़े रक्षा सौदों में बिचैलियों की भूमिका को लेकर जो विवाद उठते रहे हैं, उसका भी पटाक्षेप हो सकेगा। साथ ही जहां भारत में रक्षा उद्योग का विकास होगा, वहीं देश में रोजगार के अवसरों में आशातीत वृद्धि हो सकेगी, भारत का पैसा भारत में रहेगा।
रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह स्वदेशी रक्षा-उत्पादों के लिये सक्रिय है, अपनी दूरगामी सोच एवं निर्णायक क्षमता से उन्होंने तेजस के स्वदेशी विमानों की खरीद की स्वीकृति को बाजी पलटने वाला बताया। पूर्व में 40 तेजस विमानों की खरीद से पृथक है 83 तेजस विमानों की खरीद का निर्णय। इन विमानों की स्वीकृति इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत में निर्मित ये लड़ाकू विमान वायु सेना की कसौटी पर खरे उतरे हैं, यह एक शुभ एवं नये विश्वास का अभ्युदय है कि हम सेना की जरूरतों के लिये अब दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहेंगे। इसके लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगातार कोशिशों एवं संकल्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है।  यदि सधे हुए कदम से आगे बढ़ते जाये तो संभव है भविष्य में भारत हथियारों के निर्यातक देशों में भी शुमार हो जाये।
भारत में आजादी के बाद से ही सरकारी स्तर पर सेनाओं की जरूरत का सामान आयुधशालाओं में निर्मित होता रहा है, लेकिन सरकार की दोहरी नीतियों, आधुनिकीकरण के अभाव, नेताओं के स्वार्थ तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी न हो पाने के कारण हम रक्षा उत्पादों के मामले में दूसरे देशों पर ही निर्भर रहे। हमारा देश हथियारों की खरीद की दृष्टि से दूसरे देशों की निर्भरता का एक बड़ा कारण इसके लिये विदेशी कम्पनियों से मिलने वाला कमीशन भी रहा है। मोदी की पहल एवं राजनाथ सिंह की सूझबूझ एवं तत्परता से मौजूदा वक्त में रक्षा उत्पादों के स्वदेशीकरण से सेना को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलने लगी है। इसी का परिणाम है कि राजनाथ सिंह द्वारा लिया गया 101 रक्षा उत्पादों के आयात पर रोक का निर्णय।
भारत की बड़ी विडम्बना एवं विवशता यह भी रही है कि वह उन देशों में गिना जाता रहा है, जो अपनी तमाम रक्षा सामग्री का आयात करता रहा है, इस पराधीन स्थिति से मुक्ति एवं आयातक से निर्यायक बनने की सुखद स्थिति में पहुंचने के लिये अभी बड़े एवं प्रभावी निर्णय लेन एवं उन्हें क्रियान्वित करने की जरूरत है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बजत होगी, बल्कि भारत की गिनती सामथ्र्यवान, विकसित एवं शक्तिसम्पन्न देशों में होने लगेगी। भारत रक्षा उत्पादों की दृष्टि से शक्तिशाली एवं आत्मनिर्भर हो सकेगा। दुनिया की एक बड़ी ताकत बनकर उभरने के लिये भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपनी रक्षा जरूरतों को स्वयं की पूरा करने में सक्षम बनेगा और किसी भी राजनीति आग्रह-पूर्वाग्रह एवं भ्रष्टाचार को इसकी बाधा नहीं बनने देगा। तेजस लड़ाकू विमानों का संदेश है सरकार और कर्णधारों को कि शासन संचालन में एक रात में (ओवर नाईट) ही बहुत कुछ किया जा सकता है। अन्यथा ”जैसा चलता है-- चलने दो“ की पूर्व के नेताओं की मानसिकता और कमजोर नीति ने रक्षा-क्षेत्र की तकलीफें बढ़ाई एवं हमें पराधीन बनाये रखा हैं। ऐसे सोच वाले व्यक्तियांे को अपना राष्ट्र नहीं दिखता, उन्हें विश्व कैसे दिखता। वर्तमान सरकार का धन्यवाद है कि उन्हें देश भी दिख रहा है और विश्व भी।
भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा बजट वाला देश होने के बावजूद अपने 60 प्रतिशत हथियार प्रणालियों को विदेशी बाजारों से खरीदता है, जबकि भारत की तुलना में पाकिस्तान ने अपनी हथियार प्रणालियां ज्यादा विदेशी ग्राहकों को बेची हैं। इन स्थितियों की गंभीरता को देखते हुए भारत सैन्य उत्पादों के स्वावलम्बन की ओर कदम बढ़ा रहा है तो यह देश की जरूरत भी है और उचित दिशा भी है। इसी दृष्टि से रक्षा मंत्रालय द्वारा जिन उत्पादों के आयात पर रोक लगाने का निर्णय किया गया है, उनमें सामान्य वस्तुएं ही नहीं वरन सैन्य बलों की जरूरतों को पूरा करने वाली अत्याधुनिक तकनीक वाली असॉल्ट राइफलें, आर्टिलरी गन, रडार व ट्रांसपोर्ट एयरक्राप्ट एवं लड़ाकू विमान आदि रक्षा उत्पाद भी शामिल हैं। आगामी छह-सात सालों में घरेलू रक्षा उद्योग को लगभग चार लाख करोड़ के अनुबंध दिये जायेंगे, जिसमें पारंपरिक पनडुब्बियां, मालवाहक विमान, क्रूज मिसाइलें व हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर भी शामिल होंगे। वर्तमान वित्त वर्ष में घरेलू रक्षा उद्योग के लिये बावन हजार करोड़ के पृथक बजट का प्रावधान किया गया है। सेना में हथियारों की आपूर्ति बाधित न हो, इसलिये इसे चरणबद्ध तरीके से वर्ष 2020 से 2024 के मध्य क्रियान्वित करने की प्लानिंग है। इस रणनीति के तहत सेना व वायु सेना के लिये एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये तथा नौसेना के लिये एक लाख चालीस हजार करोड़ के उत्पाद तैयार किये जाने की योजना है।
हमें मौजूदा तथा भविष्य की रक्षा जरूरतों का गहराई से आकलन करना होगा। इसकी वजह यह भी है कि रक्षा उत्पादों के क्षेत्र में तकनीकों में तेजी से बदलाव होता रहता है। सभी उत्पादों की आपूर्ति निर्धारित समय सीमा में हो और सेना की जरूरतों में किसी तरह का कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। देश की रक्षा के मुद्दे पर किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। इसके लिये जरूरी है कि तीनों सेनाओं और रक्षा उद्योग के मध्य बेहतर तालमेल स्थापित हो। इसके लिये कारगर तंत्र विकसित किया जाना भी जरूरी है। अभी अन्य उत्पादों के बारे में भी मंथन की जरूरत है, जिनका निर्माण देश में करके दुर्लभ विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। साथ ही यह भी जरूरी है कि देश रक्षा उत्पाद गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतरे क्योंकि यह देश की सुरक्षा का प्रश्न है और हमारे सैनिकों की जीवन रक्षा का भी।
सरकारी नीतियों, बजट एवं कार्ययोजनाओं की घीमी रफ्तार का ही परिणाम है कि तेजस को विकसित करने में करीब तीस वर्ष लग गये। इसी तरह रक्षा क्षेत्र की अन्य परियोजनाएं भी लेट-लतीफी एवं सरकारी उदासीनता का शिकार होती रही है। इस तरह की स्थितियों का होना दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी हम सेना की सामान्य जरूरतों के साधारण उपकरण और छोटे हथियार भी देश में निर्मित करने में सक्षम नहीं हो पाये है। निःसंदेह तेजस एक कारगर एवं गुणवतापूर्ण लड़ाकू विमान साबित हो रहा है, लेकिन यह तथ्य भी हमारे ध्यान में रहना जरूरी है कि उसमें लगे कुछ उपकरण एवं तकनीक दूसरे देशों की है। हमारा अगला लक्ष्य उसे पूरी तरह स्वदेशी और साथ ही अधिक उन्नत एवं गुणवतापूर्ण बनाने का होना चाहिए। यह तभी संभव है कि हमारे विज्ञानियों और तकनीकी विशेषज्ञों को भरपूर प्रोत्साहन एवं साधन दिये जाये। यदि भारत दुनिया की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होते हुए अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी छाप छोड़ सकता है और हर तरह की मिसाइलों के निर्माण में सक्षम हो सकता है तो फिर ऐसी कोई वजह नहीं कि अन्य प्रकार की रक्षा सामग्री तैयार करने में पीछे रहे। वर्तमान मोदी सरकार ने जहां स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिये उन्नत एवं प्रोत्साहनपूर्ण नीतियांे को निर्मित किया है वहीं उचित बजट का भी प्रावधान किया है। अब समय है उनके सकारात्मक नतीजें जल्दी ही सामने आये। भारत न सिर्फ आयात के विकल्प के उद्देश्य से रक्षा उत्पादों का निर्माण करे, बल्कि भारत में निर्मित रक्षा उत्पादों का निर्यात अन्य देशों को करने के लिए भी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाये। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


मुस्लिम आईएएस, आईपीएस अधिकारियों ने 2002 में गुजरात दंगे के दौरान आंखें मूंद लीं, किताब में पूर्व डीजीपी का खुलासा!

मुस्लिम आईएएस, आईपीएस अधिकारियों ने 2002 में गुजरात दंगे के दौरान आंखें मूंद लीं, किताब में पूर्व डीजीपी का खुलासा!

14-Jan-2021

मुस्लिम आईएएस, आईपीएस अधिकारियों ने 2002 में गुजरात दंगे के दौरान आंखें मूंद लीं, किताब में पूर्व डीजीपी का खुलासा!

सियासत डॉट कॉम से साभार 
गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार ने अपनी 2016 की पुस्तक में दावा किया कि कम से कम 6 आईएएस और 7 आईपीएस मुस्लिम अधिकारी भगवा दंगाइयों के प्रति उदासीन थे जो 2002 में गुजरात के पोग्रोम्स का कारण बने और तत्कालीन प्रमुख द्वारा राज्य सरकार के नेतृत्व के साथ घनिष्ठ संबंध में काम कर रहे थे।

मंत्री नरेंद्र मोदी। : गुजरात: बिहाइंड द कर्टन ’नामक अपनी पुस्तक के माध्यम से, श्रीकुमार ने गुजरात पोग्रोम के समय राज्य पुलिस विभाग में काम करने के अपने अनुभवों का खुलासा किया। मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की जटिलता उस अवधि के दौरान भयावह वास्तविकताओं में से एक थी।

वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से याद करता है कि कैसे SRPF के एक कमांडेंट और उसके दूसरे कमांडर, एक DySP (मुस्लिम समुदाय से दोनों) के बाद 96 निर्दोष लोग मारे गए, SRPF बैरक के अंदर 500 मुस्लिम परिवारों को शरण देने के उनके लिखित आदेशों की अनदेखी की भीड़ से आश्रय लेना।

उन्होंने लिखा, “28 फरवरी, 2002 को जब मैं पद पर था, एसआरपीएफ के कमांडेंट खुर्शीद अहमद (आईपीएस, 1997 बैच), नरोदा पाटिया के पास सैजपुर बोगा में हेडक्वार्टर थे, जहां उस दिन की शाम तक 96 लोग मारे गए थे। लगभग 500 मुस्लिम परिवारों पर हमले की धमकी देने वाले फोन शिविर के अंदर शरण की मांग कर रहे थे, परिसर की दीवार और सशस्त्र संतरी द्वारा सुरक्षित थे।

वह इन निजी व्यक्तियों को SRPF बटालियन मुख्यालय के अंदर जाने के लिए विशिष्ट आदेश चाहते थे। जवाब में, मैंने तुरंत एक फैक्स संदेश भेजा जिसमें कमांडेंट को खाली बैरक में सुरक्षा की मांग करने वालों को समायोजित करने का निर्देश दिया गया … बाद में, मुझे पता चला कि कमांडेंट ने खाली एसआरपीएफ बैरक में शरण चाहने वालों के प्रवेश से इनकार कर दिया था और परिणामस्वरूप, वे दंगों के शिकार हो गए थे।

दलदल ब्रिगेड के हाथों में। नरोदा पाटिया में शाम को मारे गए 96 लोगों में से अधिकांश कथित रूप से मुस्लिमों के इस समूह से थे जिन्हें एसआरपीएफ परिसर में शरण देने से इनकार कर दिया गया था। ”

श्रीकुमार ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि बाद में खुर्शीद अहमद सूरत शहर के उपायुक्त और उनकी पत्नी शमीना हुसैन के रूप में वलसाड जिले के जिला विकास अधिकारी के रूप में और उसके बाद सुरेन्द्रनगर जिले के कलेक्टर के पद पर आसीन हुए।

डिसप कुरैशी (खुर्शीद का दूसरा कमांड) को विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया, जो एक पदक है जो शायद ही कभी एसआरपीएफ अधिकारियों को दिया जाता है।गुजरात पोग्रोम्स गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर निर्देशित सांप्रदायिक हिंसा की तीन दिवसीय अवधि थी।

राज्य सरकार और पुलिस पर बार-बार हिंसा में उलझने का आरोप लगाया गया है, तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर पोग्रोम्स को उकसाने और संघनित करने का आरोप लगाया गया है।

श्रीकुमार ने अपनी पुस्तक में यह भी आरोप लगाया कि 27 फरवरी, 2002 को, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आवास पर उच्च-स्तरीय अधिकारियों की एक बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने कहा कि पुलिस आमतौर पर मुसलमानों और हिंदुओं को एक समान इलाज देती है लेकिन इस बार हिंदुओं को एक दिया जाएगा उनके क्रोध को व्यक्त करने का मौका।

माना जाता है कि गोधरा में ट्रेन जलने के बाद पोग्रोम्स की शुरुआत हुई थी, जिसमें 58 हिंदू तीर्थयात्री मारे गए थे, जो बाबरी मस्जिद स्थल पर एक धार्मिक समारोह के बाद अयोध्या से लौट रहे थे। आधिकारिक कहानी यह थी कि ट्रेन को जलाने की योजना बनाई गई थी और पाकिस्तान के आदेश के तहत लोगों ने उसे मार डाला था।

हालांकि, 2003 में चिंतित नागरिक न्यायाधिकरण (सीसीटी) और 2005 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) की अगुवाई में केंद्र सरकार द्वारा गठित एक समिति दोनों ने निष्कर्ष निकाला कि आग एक दुर्घटना थी।

गुजरात दंगों के आधिकारिक आंकड़ों में 1,044 मौतें हुईं, जिनमें से 790 मुस्लिम और 254 हिंदू थे। दूसरी ओर सीसीटी ने एक रिपोर्ट में कहा कि हो सकता है कि 1,926 लोग मारे गए हों।


विरोध प्रदर्शन के बीच सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने मनाया लोहड़ी!

विरोध प्रदर्शन के बीच सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने मनाया लोहड़ी!

14-Jan-2021

उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर जिले में किसानों ने लोहड़ी पर्व के मौके पर नए कृषि कानूनों के खिलाफ अपना विरोध जताते हुए तीनों कानूनों की प्रतियां जलाईं। रुद्रपुर में तराई किसान संगठन की ओर से किसानों ने लोहड़ी पर्व पर तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां जलाईं।

अमर उजाला पर छपी खबर के अनुसार, गल्ला मंडी में सभा के आयोजन के बाद गांधी पार्क तक जुलूस निकाला गया। जुलूस में सैकड़ों किसान शामिल रहे।

रुद्रपुर में कृषि कानूनों के खिलाफ निकाले गए जुलूस में किसानों ने काले झंडे भी दिखाये। जुलूस से पहले रुद्रपुर में कृषि कानूनों के खिलाफ सभा का आयोजन किया गया।

जसपुर भारतीय किसान यूनियन के सदस्यों एवं कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संयुक्त रूप से कृषि कानूनों की प्रतियां फूंक कर कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की। बाजपुर शहीद भगत सिंह चौक पर लोहड़ी पर्व पर कृषि कानूनों की प्रतियां जलाईं गईं।

कृषि कानून को रद्द करने और दिल्ली जा रहे किसानों के समर्थन में नारे लगाए।

लोहड़ी के पर्व पर प्रदर्शन कर रहे किसानों ने उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार के खिलाफ खूब नारेबाजी की और कहा कि जब तक ये तीन कानून वापस नहीं लिए जाते आंदोलन खत्म नहीं होगा।

 

असदुद्दीन ओवैसी की यूपी में राजनीतिक एंट्री से खलबली

असदुद्दीन ओवैसी की यूपी में राजनीतिक एंट्री से खलबली

13-Jan-2021

असदुद्दीन ओवैसी की यूपी में राजनीतिक एंट्री से खलबली
तौसीफ कुरैशी लखनऊ 

राज्य मुख्यालय लखनऊ।उत्तर प्रदेश में वैसे तो विधानसभा चुनाव में एक साल से अधिक का समय है लेकिन यूपी की सियासत अभी से गर्म होने लगी हैं। उत्तर प्रदेश में जहाँ एक तरफ सपा कंपनी के सीईओ व पूर्व सीएम अखिलेश यादव कई जिलों का दौरा कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर अब AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की भी यूपी में राजनीतिक एंट्री हो गयी हैं जिसके बाद तथाकथित सेकुलर होने का लबाधा ओढ़े दलों की पेंट गीली हो रही हैं उनका कहना है कि ओवैसी सेकुलर वोटबैंक को बाँटने का काम कर रहे है अब सवाल उठता है कि अगर इन तथाकथित दलों की बात पर यक़ीन भी कर लिया जाए जबकि यक़ीन करने लायक़ हैं नहीं लेकिन चलों माना कि वह बँधवा मज़दूर मुसलमान को बाँट रहे है और तथाकथित सेकुलर दल बाँटने के ख़िलाफ़ हैं तो ओवैसी को अपने साथ लेकर चुनाव लड़ लीजिए न सेकुलर वोट बँटेगा न कोई सियासी नुक़सान होगा परन्तु यह फ़र्ज़ी सेकुलर दल ओवैसी को इस लिए टारगेट करते हैं क्योंकि जिस वोटबैंक पर वह सियासत कर रहे है जब उनको अपना सही नेतृत्व मिल जाएगा तब इनकी सियासत का एण्ड हो जाएगा इस लिए यह तथाकथित दल ओवैसी को पता नही क्या-क्या कहते है असल क़िस्सा मुसलमान है जिसके कंधों पर सवार होकर सांसद और विधायक या अन्य सियासी पद प्राप्त करते है उन दलों की दिक़्क़त बन रहे असदउद्दीन ओवैसी असल लड़ाई मुसलमान के वोटबैंक को लेकर हैं और कुछ नहीं।सियासी कंपनियों के सीईओ मुसलमान का वोट तो लेना चाहते है पर उसको देना कुछ नही चाहतें यह वजह बन रहा है असदउद्दीन ओवैसी का उदय।तीस साल से मुसलमान सपा कंपनी के साथ बँधवा मज़दूर की तरह लगा है सपा कंपनी बताती क्यों नही कि उसने मुसलमान की भलाई के लिए क्या किया है।मलाई यादवों ने खाईं बाक़ी जो बचा वह दूसरों ने खाईं मुसलमान को क्या मिला रिक्शा क्या मुसलमानों के बच्चे पीसीएस/पीसीएस जे के लायक़ नहीं है लेकिन नहीं वह यादव ही बनेंगे और वही यादव चुनाव के वक़्त मोदी की भाजपा में चले जाते हैं और इलज़ाम दलितों पर लगा देते है जबकि यह ग़लत है और बेबुनियाद आरोप है सही है यादवों ने ही गठबंधन को वोट नही किया जिसकी वजह से लोकसभा के चुनाव में गठबंधन को वह सफलता नहीं मिली जिसकी अपेक्षा की जा रही थी।

ख़ैर वाराणसी में असदउद्दीन ओवैसी का कार्यकर्ताओं ने जिस तरीक़े से जोरदार स्वागत किया उससे साफ़ कहा जा सकता है कि असदउद्दीन ओवैसी तथाकथित सेकुलर दलों पर भारी पड़ने जा रहे है सब ही सेकुलर दलों में खलबली है ख़ासतौर पर सपा कंपनी के सीईओ हमारे भरोसे के सूत्रों के अनुसार अखिलेश यादव अपने स्थानीय नेताओं से भीड़ और उत्साह को लेकर रिपोर्ट ले रहे थे उनकी रिपोर्ट के बाद सपा कंपनी के सीईओ की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ़ देखीं जा सकतीं थी।असदउद्दीन ओवैसी ने कहा कि चुनाव की तैयारी है और सभी कार्यकर्ता इसके लिए तैयार हैं। ओवैसी ने ये भी कहा कि सपा की सरकार ने यूपी आने के लिए उनका 28 बार परमिशन कैंसिल किया लेकिन अब उन्हें यूपी आने का मौका मिला हैं।ओवैसी उत्तर प्रदेश में राजभर वोटों में पैठ रखने वाली पार्टी सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर के आने वाले चुनाव में लड़ेंगे। पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ओवैसी पर बीजेपी की मदद का आरोप लगाते हुए कहते हैं, पहले महाराष्ट्र में ओवैसी ने बीजेपी की मदद की उसके बाद बिहार में वोट काट कर मदद की और अब यूपी आ रहे हैं। लेकिन यूपी नेहरू-गांधी का धर्मनिरपेक्ष प्रदेश है। वो ओवैसी के इरादों को समझता है।AIMIM प्रमुख ओवैसी की नजर यूपी में रहने वाली तकरीबन 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी पर हैं। मुस्लिमों के बीच ओवैसी की अच्छी पैठ है। यही कारण है कि वो यूपी में इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। ओवैसी की पार्टी बिहार में 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में अच्छा मत प्रतिशत हासिल करते हुए 5 सीटों पर चुनाव जीती थी। तो वहीं महाराष्ट्र में AIMIM के 2 और तेलंगाना में 7 विधायक हैं।यही चिंता यूपी में सियासत करने वालों को हो रही है कि कहीं मुसलमान असदउद्दीन ओवैसी के साथ न चला जाए जिसकी उम्मीद ज़्यादा मुसलमान अपनी उपेक्षाओं से हार चुका है अब वह सोच रहा है कि जब हमारी कोई बात ही नहीं करना चाहता तो फिर ओवैसी क्यों नहीं वह कम से कम हमारी आवाज़ तो बनेगा बस मिलना कुछ नही अपनी बात तो कह ही सकता है रही बात हारने के 2014 से हार ही रहे है एक बार और सही। 


न खाता न बही, जो अड़ानी अंबानी कहें वही सही

न खाता न बही, जो अड़ानी अंबानी कहें वही सही

08-Jan-2021

गुजरात मॉडल पर विश्वास करने वाले पड़े है खुले आसमान के नीचे

सुप्रीम कोर्ट ने भी दिखाया कोरोना वायरस के फैलने का भय

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ।देखा जाए तो इस महीने में होने वाली बारिश की एक-एक बूँद को खुदा का इनाम माना जाता है और वास्तव में है भी क्योंकि आसमान से पड़ती हर एक बूँद गेहूँ की फसल के लिए अमृत होती है।पिछले साल भी और इस साल भी बारिश की हर एक बूँद दिलों दिमाग़ को परेशान करने वाली साबित हो रही हैं माना गेहूँ की फसल के लिए अमृत हैं लेकिन सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ जो लोग इस भयंकर हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में सड़क पर पड़े हैं जहाँ अब तक लगभग 60 किसानों की ठंड के चलते मौत हो गई लेकिन गूँगी बहरी अंधी सरकार अपने धन्नासेठों को मालामाल करने में इतनी अंधी हो गई है कि उसे उन किसानों की न मौत नज़र आ रही है और न दर्द महसूस हो रहा है उसे सिर्फ़ अड़ानी अंबानी समूहों को फ़ायदा पहुँचाना है अब उसके लिए कौन और किसकी बलि दी जाए वह देने को तैयार है और दे भी रही है।वैसे तो किसान को अन्नदाता कहा जाता है लेकिन लगता है यह जुमला सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है हक़ीक़त में इस जुमले के कोई मायने नहीं हैं अगर होते तो शायद मोदी की भाजपा अन्नदाता के साथ ऐसा सलूक न करती जिसको वही बड़ी उम्मीदों से सरकार में लाए थे कि चलों अब गुजरात मॉडल को देश की कमान सौंपी जाए जबकि गुजरात मॉडल की हक़ीक़त पर सवालिया निशान थे यह वही मॉडल है जिसने राजधर्म नही निभाया था तब प्रधानमंत्री रहे स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी ने नसीहत दी थी कि राजधर्म निभाओ लेकिन नहीं निभा पाए थे देखा जाए तो वह मॉडल नफ़रतों की बुनियाद पर तैयार किया गया था उस मॉडल से देश का भाईचारा छिन्न-भिन्न होने के कगार पर खड़ा हो गया है उसको दरकिनार कर गुजरात मॉडल पर ही भरोसा किया गया।गुजरात मॉडल धार्मिक धुर्वीकरण कर हिन्दू को मुसलमान से मुसलमान को हिन्दू से नफ़रत की दिवार खड़ी कर तैयार किया गया था शुरूआत तो इससे की गई लेकिन इसका अंत हर किसी को हर किसी से लड़ा कर किया जाएगा यह बात जितनी जल्दी समझ जाए उतना ही बेहतर है देश के लिए भी और हिन्दू , मुसलमान , सिख व ईसाई सबके लिए बेहतर हैं जब तक हम एक दूसरे को अपने से अलग समझते रहेंगे तब तक यही होता रहेगा।मोदी की भाजपा धार्मिक उन्माद भड़काकर सत्ता में आई है न कि देश की जनता ने इनको खुले दिमाग़ से सत्ता की चाबीं सौंपी है इसके परिणाम भी ऐसे ही होंगे।पिछले साल इन्हीं दिनों में CAA, NPR व संभावित NRC के विरोध में देशभर में आंदोलन किया जा रहा था जिसमें आंदोलन करने वाली महिलाएं थी लेकिन उसे मुसलमानों का आंदोलन कहकर कंट्रोल किया गया था जबकि वह भी ग़लत तरीक़े से बनाए गए क़ानून का विरोध था क्योंकि धार्मिक आधार पर क़ानून बनाना हमारे संविधान के विरूद्ध है लेकिन उसका विरोध मुसलमान कर रहा था इस लिए जिसको आधार बनाकर मोदी की भाजपा सत्ता में आई उसको हिन्दू मुसलमान कर दिया गया जो विरोध कर रहे थे न समर्थन कर रहे थे वह ख़ामोश थे इसकी क्या वजह थी यह तो साफ़ है कि वह इस तरह के हालात से सहमत है नहीं तो ग़लत तो ग़लत है उसका विरोध करना चाहिए यही लोकतंत्र है ,लेकिन जब हमारे हितों का नुक़सान हो तभी हम विरोध करेंगे अन्यथा नही उसका नतीजा यही होता है कल मुसलमान को आतंकी कहा जा रहा था आज किसान को नक्सली, खालिस्तानी,चीन परस्त, पाकिस्तान परस्त कहा गया यह बात अलग है ना CAA ,NPR व संभावित NRC का विरोध करने वाले आतंकी थे और न किसानों के हक़ों का नाम देकर अपने उद्योगपति दोस्तों अड़ानी अंबानी के फ़ायदे के लिए बनाए गए तीनों कृषि क़ानूनों का विरोध करने वाले किसान खालिस्तानी है न नक्सली और न चीन व पाकिस्तान परस्त वह भी भारतीय थे यह भी भारतीय है।मोदी सरकार के लिए न मुसलमान मायने रखता है और न किसान उसकी पहली प्राथमिकता अंबानी अड़ानी है न खाता न बही, जो अड़ानी अंबानी कहें वही सही और यही रहेंगे तुम चाहे कितना भी चिल्लाओ मोदी सरकार पर इसका कोई असर नही होता।लाखों किसान जिस तरीक़े से हाड़ कंपा देने वाली ठंड में अंधखुले टेंटों में नई दिल्ली की सीमाओं पर पड़े है इतनी सर्द हवाओं के बीच जिसमें रहना तो दूर कल्पना करने भर से कपड़े और सामान भीग जाए उसी बारिश के बीच रातें गुज़ारनी पड़े वह भी अपने द्वारा बनाए गए बादशाह की हठधर्मिता के चलते अब इस हालात में उस दिल पर क्या गुजर रही होंगी जिसको हमने ही पाल पोस कर बड़ा किया हो यह रेखांकित करना मेरे लिए मुश्किल है।ख़ैर जिसको यह सोच कर गद्दी सौंपी थी कि हम ही हम होंगे उसकी सरकार में हम कुछ भी नहीं।दिल्ली न देख रही है न सुन रही है और न बोल रही है बादशाह की आँखें ,कान बंद है और ज़बान सिल गई है जो चुनाव में बहुत बोलते है जुमले पर जुमला फेंकते है किसी की कपड़ों से पहचान करते है तो किसी को पकोड़े तलने को कहकर रोज़गार का नाम देते हैं और जनता उन जुमलों के साथ छह सालों से ख़ामोशी और निराशा से खेल रही है।वैसे तो किसानों को नेताओं के द्वारा अन्नदाता कहा जाता है किसान अन्नदाता है यह बात अलग है कि वह हैं या नहीं हैं इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।जिसने देश के गोदामों को खाद्यान्नों से लबरेज़ कर दिए भारत की छवि को आत्मनिर्भर बनाने में मदद की अपना सहयोग दिया उसको नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता वही किसान भीगता ठिठुरता हुआ सड़क पर खड़ा है किसकी वजह से और क्यों ? उस बेचारे की यही तो माँग है कि हमें भी आत्मनिर्भर रहने दो अड़ानी अंबानी जैसे धन्नासेठों का गुलाम मत बनाओ।साहूकारों का नाम आते ही हमारे देश के किसानों का दिल काँपने लगता है क्योंकि उनके साथ उनका बड़ा पुराना और कड़वा अनुभव है।किसानों और साहूकारों के बीच आज के उद्योगपतियों के साथ एक संबंध है शोषण और उत्पीडन का।साहूकारों और उद्योगपतियों के द्वारा किसानों को बरसों से लूट रहे है कोई ब्याज से,चक्रवर्ती ब्याज से कोई सस्ती फ़सल लेकर बढ़ी क़ीमतों में बेचकर अपना ख़ज़ाना भरने में मशगूल रहते है,मगर उनपर कोई अंकुश नहीं हो सकता क्योंकि वह आज के हुक्मरानों के मालिक है।आज के इन क़ानूनों में अड़ानी अंबानी समूहों के मालिकों ने पहले ही स्पष्ट करा लिया था कि किसान अदालत नहीं जा सकेगा हालाँकि विरोध के चलते सरकार ने अभी इस हक पर रोक लगा दी है।सरकार और किसानों के बीच में कोई समन्वय नहीं बन पा रहा हैं सरकार चाहती है विवादित तीनों कृषि क़ानून बने रहे और किसान किसी भी क़ीमत पर इन तीनों कृषि क़ानूनों को वापिस करने के अलावा किसी समझौते पर विचार करने को भी तैयार नहीं है इससे सरकार और किसानों के बीच आठ दौर की वार्ता के बाद भी कोई समाधान नहीं निकल पाया किसानों ने सरकार से सभी दौर की वार्ताओं में यश और नौ में बातचीत हुईं किसान अपना लंगर का खाना खाते है और सरकार पंच सितारा अशोका होटल से चाँदी की प्लेटों में परोसे जाने वाला खाना खाते है इतना फ़र्क़ है सरकार और किसानों की बीच में, मात्र एक दिन सरकार ने दिखावे के तौर पर लंगर का खाना खाया किसानों के साथ।किसान नेता राकेश टिकैत ने हमारे से बातचीत करते हुए कहा कि हम एक बात सरकार को समझाना चाहते है कि सरकार को इस ग़लतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए कि वह हमें यहाँ से किसी के आदेश से हटा देंगे हम किसी के आदेश से भी हटने वाले नही हैं उनका इसारा सुप्रीम कोर्ट की ओर था उनका कहने का अंदाज अलग ही था वह कह रहे थे कि समझ रहे हैं न हम क्या कहना चाह रहे है नाम लेना मुनासिब नहीं है।अब किसानों की आशंका लगता है सही साबित हो सकती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि किसानों के आंदोलन में कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन हो रहा हैं या नही अब सवाल उठता है कि क्या किसानों के आंदोलन को कोरोना को बहाना बनाकर ख़त्म कराने की सरकार की कोशिश होंगी ? सवाल यह भी है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को चुनावी भीड़ पर भी कोरोना की गाइडलाइन के पालन पर सरकार और विपक्ष से पूछना चाहिए था कोरोना वायरस की गाइडलाइन का पालन वहाँ भी होना चाहिए न कि सिर्फ़ आंदोलनों से ही कोरोना फैलता है यह ऐसा सवाल है जो हर किसी के ज़हन में घूम रहा है।सुप्रीम कोर्ट ने भी दिखाया कोरोना वायरस के फैलने का भय।इसके बाद टकराव के हालात पैदा हो सकते है क्योंकि सरकार पूरी तरीक़े से इस आंदोलन के सामने हताश और निराश खड़ी दिखाई दे रही है वह यहाँ बिलकुल फैल साबित हुई है असल में इस सरकार के छह साल हिन्दू मुसलमान के धुर्वीकरण करने में निकल गए किया कुछ नही कभी तीन तलाक़ का मामला लाकर हिन्दू मुसलमान कर देती कभी राममंदिर का मुद्दा लाकर इसके अलावा कोई सकारात्मक कार्य नही किया जिसकी बुनियाद पर जनता के बीच जा सके हिन्दुस्तान के इतिहास में अविश्वसनीय सरकार साबित हुईं है परन्तु हिन्दू मुसलमान करने में झूठ बोलने में इनका कोई मुक़ाबला नही कर सकता है यही सच है। 


: मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने मरवाही विकासखंड के ग्राम दानीकुंडी में आयोजित लोकार्पण : शिलान्यास समारोह में की कोटमी उपतहसील को तहसील बनाने की घोषणा

: मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने मरवाही विकासखंड के ग्राम दानीकुंडी में आयोजित लोकार्पण : शिलान्यास समारोह में की कोटमी उपतहसील को तहसील बनाने की घोषणा

07-Jan-2021

राजमेरगढ़ में 1 करोड़ 27 लाख की लागत से बैगा कुटीर निर्माण की घोषणा
जिले में ब्लड बैंक स्थापित किये जाने की घोषणा
ग्राम धनौली में वन प्रसंस्करण केंद्र की घोषणा
बचरवार-कोटखर्रा मार्ग निर्माण की घोषणा
निमधा से दरमोहली मार्ग निर्माण  की घोषणा
कोटखर्रा-बचरवार मार्ग में तिपान नदी में पुल निर्माण की घोषणा
गौरे
ला-पेंड्रा-मरवाही जिले के विकास के लिये किया जाएगा हरसंभव प्रयास - मुख्यमंत्री

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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज प्रदेश के नवगठित गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के प्रवास के दौरान मरवाही विकासखंड के ग्राम दानीकुण्डी में आयोजित विकास कार्यों के लोकार्पण शिलान्यास समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी सरकार का संकल्प यहां के किसानों, मजदूरों और गरीबों का विकास करना है। सरकार बनते ही किसानों के कर्ज माफ करने के साथ, समर्थन मूल्य में धान खरीदी, राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना और मनरेगा के माध्यम से किसानों, मजदूरों को लाभान्वित किया गया है।
    उन्होंने कहा कि गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही को जिला बनाकर इस क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास किया गया है। नए जिले के रूप में अस्तित्व में आते ही गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही क्षेत्र में अधिकारियों की नियुक्ति और नए कार्यालय स्थापित करने का कार्य बड़ी तेजी से हुआ है। उन्होंने कहा कि हमने नवगठित जिले के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ी है और जनभावनाओं के अनुरूप गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही के विकास के लिए आगे भी सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किया जाएगा।

    मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा कि गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिला प्राकृतिक दृष्टिकोण से बहुत ही सुंदर है, यहां अनेक ऐतिहासिक महत्व के धरोहर तथा पर्यटन एवं धार्मिक स्थल है। इस क्षेत्र के पर्यटन स्थलों को विकसित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जीवनदायिनी अरपा नदी इस जिले से निकलती है। उन्होंने कहा कि अरपा महोत्सव का जिले में आयोजन किया जाएगा। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने कोटमी उपतहसील को तहसील बनाने की घोषणा, राजमेरगढ़ में 1 करोड़ 27 लाख की लागत से बैगा कुटीर निर्माण की घोषणा, जिले में ब्लड बैंक स्थापित किये जाने, ग्राम धनौली में वन प्रसंस्करण केंद्र, बचरवार-कोटखर्रा मार्ग निर्माण, निमधा से दरमोहली मार्ग निर्माण  की घोषणा, कोटखर्रा बचरवार मार्ग में तिपान नदी में पुल निर्माण की घोषणा की।

    विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत ने इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि नवगठित जिले  के सर्वांगीण विकास हेतु शासन प्रयासरत है और भविष्य में भी जिले में विकास की गति तीव्र हो, यह प्रयास किया जाएगा। राजस्व व जिले के प्रभारी मंत्री श्री जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि गौरेला पेंड्रा मरवाही जिला बनने के बाद क्षेत्र के विकास की गति बेहद तीव्र हुई है और बहुत ही कम समय में जिले ने विकास की नई ऊंचाइयों को स्पर्श किया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ शासन क्षेत्र के विकास के लिए कटिबद्ध है और भविष्य में भी बड़ी तेजी से अंचल का विकास हो यह सुनिश्चित किया जाएगा।

    सांसद श्रीमती ज्योत्स्ना महंत ने जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि गौरेला-पेंड्रा-मरवाही  जिले के गठन की क्षेत्रवासियो की मांग को राज्य सरकार ने पूर्ण किया। अब यह जिला तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर है। मरवाही विधायक डॉ. के.के. धु्रव ने कहा कि जिला बनने के बाद विकासकार्यो की अनेक सौगात मिली है और हम सभी के प्रयास से हमारा क्षेत्र विकास के नए प्रतिमान गढ़ेगा। इस अवसर पर ग्रामीणों को शासन की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत हितग्राहीमूलक सामग्रियों का वितरण किया गया। इस अवसर पर कलेक्टर सुश्री नम्रता गांधी, पुलिस अधीक्षक श्री सूरज सिंह परिहार सहित अन्य अधिकारीगण एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

 


मुरादनगर की घटना को हल्के में न ले योगी सरकार:प्रमोद तिवारी

मुरादनगर की घटना को हल्के में न ले योगी सरकार:प्रमोद तिवारी

06-Jan-2021

मुरादनगर की घटना को हल्के में न ले योगी सरकार:प्रमोद तिवारी
तौसीफ कुरैशी 
राज्य मुख्यालय लखनऊ।रामराज्य का नारा देकर सत्ता में आई मोदी की भाजपा की सरकार में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो गई है कि शमशान भी उनकी हरामखोरी से बच नही रहे उसी का नतीजा है मुरादनगर की दिल दहला देने वाली घटना इसको लेकर योगी सरकार एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर आ गई है और आनी भी चाहिए यह बात अलग है संवेदनहीन योगी सरकार पर पूर्व की तरह इस घटना का भी कोई गंभीर असर नही हो रहा है इस घटना को भी लीपा पोती करने जुटी हुईं है।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ने गाजियाबाद के मुरादनगर में शमशान घाट के लिये बने कॉरिडोर में हुई मौत से दुःखी एवं आहत है कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य तथा आउट रीच एण्ड को-ऑडिनेशन कमेटी, उत्तर प्रदेश के प्रभारी श्री प्रमोद तिवारी ने प्रदेश के मुख्यमन्त्री को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि इस दर्दनाक एवं दुःखद घटना से सबक सीखा जाना चाहिए। 25 लोगों की मौत के जिम्मेदार ठेकेदार श्री अजय त्यागी का यह खुलासा कि उसने लगभग 30% रिश्वत देकर ठेका लिया था, इससे उत्तर प्रदेष में चल रही निर्माण प्रक्रियाओं में लूट का खुलासा उजागर हो गया है। रु. 55.00 लाख (पचपन लाख रुपये) के ठेके मेंउसने रु. 16.00 लाख (सोलह लाख रुपये) टेंडर के समय दिया था। बाकी का क्या होगा ? इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है ।
श्री तिवारी ने कहा है कि इसी तरह प्रदेश में निर्माणाधीन सेतुओं का गिरना भी यह दर्षााता है कि उत्तर प्रदेष में निर्माण कार्यो में कमिश्नखोरी अपने सबसे ज्यादा चिन्ताजनक दौर में पहुँच गयी है। चर्चा यह भी है कि उत्तर प्रदेष में बहुत सी निर्माण इकाइयां 40 से अधिक कमीशन  दे रही है।
24 मौतों से यही सबक लेना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जाय और निर्माण कार्यो की गुणवत्ता में सुधार लाया जाय, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।श्री तिवारी ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि प्रदेष में घट रही घटनाओं से सबक लेते हुये सुधारात्मक कदम उठाये जायें।श्री तिवारी ने भारतीय जनतापार्टी की विरोधाभासी बयानों के लिये निन्दा की है और उन्होंने कहा है कि एक ओर कोरोना काल में जब देष भयानक आर्थिक मंदी के दौर में है, किसानी, व्यापार और छोटे उद्योग धंधे चैपट हो रहे हैं, तो ऐसे समय में नये संसद भवन हेतु मोदी सरकार रु. 14000 करोड़ (चौदह हजार करोड़ रुपये) की लागत से सेण्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट बनाने को न्यायोचित ठहराने का प्रयास कर रही है, और मोदी सरकार एक ओर कह रही है कि यह ‘‘ब्रिट्रिष हुकूमत’’ की निषानी है। वही दूसरी ओर ब्रिट्रिष प्रधानमंत्री बोरिस जानसन को ‘‘गणतंत्र दिवस’’ की परेड में मुख्य अतिथि बनाकर भारतीय सेना से सलामी दिलाने जा रहे थे जो ब्रिटेन में दूसरे कोरोना के फैलने के कारण निरस्त हो गया है ।
श्री तिवारी ने कहा है कि गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि दूसरे देष के राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे हैं और बनते रहेंगे - यह एक परमपरा है। किन्तु यह कहां तक उचित है कि सलामी स्थल से ठीक सामने स्थित बिट्रिष हुकूमत की जिसे वह निषानी बता रहे हैं, वहांॅ पर रु.14000 करोड़ (चैदह हजार करोड़) देष के खजाने से खर्च करने जा रहे हैं, जबकि देष गम्भीर आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है।वायरस टीके के सवाल पर श्री तिवारी ने कहा है कि भारतीय वैज्ञानिक बधाई के पात्र है जिन्होंने इस महामारी से बचने के लिये टीका बनाया है, इसके लिये उन्हें कोटिशः बधाई। हमारा अनुरोध है कि यह विष्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों को पूरा करने वाले सभी ट्रायल, औपचारिकताओं तथा आवष्यक प्रतिरोध को पार करने के बाद ही इसे नि शुल्क सभी भारत वासियो के लिये लगााया जाना चाहिए जैसा कांगे्रस सरकार के कार्यकाल में हैजा, पोलियो और चेचक के टीके निःषुल्क सभी देषवासियों को लगाया गया है।

 


संगीता शुक्ला: न्यूमेरोलाॅजी की सिद्धहस्त हस्ताक्षर

संगीता शुक्ला: न्यूमेरोलाॅजी की सिद्धहस्त हस्ताक्षर

06-Jan-2021

-ः ललित गर्ग:-

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ज्योतिष एक विस्तृत विषय है और इसकी कई शाखाएं हैं, अंक ज्योतिष भी इसकी एक शाखा है। न्यूमेरोलाॅजी यानी अंक ज्योतिष और अंकों की दुनिया एक जादूई दुनिया है जिसमें आपके गुण, आपकी भविष्यवाणी और व्यक्तित्व की जानकारी बताने की अद्भुत शक्ति है। अंक ज्योतिष में प्रसिद्ध नाम है काउंट लुईस का जिसे ज्यादातर लोग कीरो के नाम से जानते हैं। कीरो की अनेक भविष्यवाणियां सत्य हुई हैं और इनके द्वारा लिखी हुई किताबें आज भी काफी बिकती हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि कीरो ने ही अंक ज्योतिष को मशहूर किया है। इनदिनों न्यूमेरोलाॅजी विशेषज्ञ के रूप में एक और नाम चर्चित है श्रीमती संगीता शुक्ला का। प्रख्यात लेखिका, समाजसेविका, विचारक एवं भाषाविद श्रीमती शुक्ला ने कम समय में न्यूमेरोलाॅजी के माध्यम  से अनेक महत्वपूर्ण घोषणाएं की है, जो सत्य साबित हुई है। वे नई दुनिया, जनसत्ता एवं नवभारत टाइम्स जैसे राष्ट्रीय दैनिकों के अलावा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभकार हंै, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ‘प्रेरणामूत्र्ति नरेन्द्र मोदी’ पुस्तक लिखी जो गुजराती, हिंदी एवं अंग्रेजी में छपी एवं चर्चित हुई। नरेन्द्र मोदी की पुस्तक ‘ज्योतिपूंज’ का गुजराती से हिन्दी में अनुवाद भी किया। अनेक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़ी श्रीमती शुक्ला न्यूमेरोलाॅजी की सिद्धहस्त हस्ताक्षर है, उनके लिये अंक ज्योतिष साधना है, मिशन है।
संगीता शुक्ला कैसा रहेगा वर्ष 2021 की चर्चा करते हुए कहती है कि वर्ष 2020 चला गया और 2021 का आगमन हो गया है। न्यूमेरोलाॅजी के अनुसार वर्ष 2020=4 नंबर जो कि ‘राहु’ का था, इसलिए बहुत ही ज्यादा परेशानियों वाला रहा, लेकिन खुश हो जाइए क्योंकि वर्ष 2021=5 यानी बुध का नंबर। जो सभी को बैलेंस रखता है और सभी के साथ मिलजुल कर रहता है। यही एक ऐसा नंबर है जिसका कोई भी शत्रु नंबर नहीं है। इसलिए यह वर्ष सभी जातकों के लिए जीवन मंे कुछ न कुछ अच्छा जरूर लेकर आएगा।
सुदीर्घ अध्ययन एवं अनुसंधान करने के बाद श्रीमती शुक्ला ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि अंक ज्योतिष यानी न्यूमेरोलाॅजी यह एक महत्वपूर्ण विद्या है, जिसके द्वारा अंकांे के माध्यम से व्यक्ति के विषय एवं उसके भविष्य को जानने का प्रयास किया जाता है। अंक ज्योतिष में अंकों के माध्यम द्वारा गणित के नियमों का व्यावहारिक उपयोग करके मनुष्य के विभिन्न पक्षों, उसकी विचारधारा, जीवन के विषय इत्यादि का विशद विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है। अंक ज्योतिष को अंक विद्या या अंक शास्त्र और संख्या शास्त्र इत्यादि के नाम से भी जाना जाता है। अंक शास्त्र में नौ ग्रहों को आधार बनाकर उनकी विशेषताओं के आधार पर गणना की जाती है। जिस तरह जन्म कुंडली में ग्रहों का प्रभाव कार्य करता है, उसी प्रकार अंक ज्योतिष में अंकों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। प्रत्येक नंबर किसी न किसी ग्रह से जुडा हुआ है, जैसे अंक 1 सूर्य का, अंक 2 चन्द्र का तथा अंक 3 बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है। अंक ज्योतिष में 1 से 9 तक के अंक को शामिल किया गया है, इसमें शून्य (०) को सम्मिलित नहीं किया गया है।
श्रीमती शुक्ला बताती है कि कौन से ग्रह पर किस अंक का असर होता है और यही नौ ग्रह मनुष्य के जीवन पर अपना प्रभाव डालते हैं। जन्म के समय ग्रहों की जो स्थिति होती है, उसी के अनुसार उस व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित हो जाता है। इसलिए, जन्म के पश्चात व्यक्ति पर उसी अंक का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, जो कि व्यक्ति का स्वामी होता है। यदि एक व्यक्ति का अंक किसी दूसरे के अंक के साथ मेल खा रहा हो तो दोनों व्यक्तियों के मध्य एक अच्छा संबंध बनता है।
श्रीमती शुक्ला बताती है कि अंक ज्योतिष के अनुसार, हमारे जीवन में मुख्यतः तीन तरह के अंक प्रभावित करते हैं- मूलांक, भाग्यांक और नामांक। किसी भी जातक का मूलांक उनकी जन्म तिथि को जोड़कर आता है। मूलांक तथा भाग्यांक स्थिर होते हैं, इनमें परिवर्तन सम्भव नहीं क्योंकि किसी भी तरीके से व्यक्ति की जन्म तारीख बदली नहीं जा सकती। नामांक बदले जा सकते हैं। अंक ज्योतिष में प्रत्येक अक्षर का एक अंक है जैसे A = 1, B =2 इत्यादि। अंक ज्योतिष में नाम के हिज्जे बदल कर नामांक को मूलांक और भाग्यांक के अनुसार लक्की बनाया जा सकता है। अंक ज्योतिष की सहायता से किस्मत को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है।
यदि हम अंक ज्योतिष के इतिहास को जानने का प्रयास करें तो श्रीमती शुक्ला के अनुसार पायेंगे कि इसका इतिहास 10,000 वर्ष पूर्व से भी पहले का रहा होगा, मिस्र, बेबीलोन और ग्रीस में इनकी जड़ों का पनपना आरंभ हुआ तथा पाइथागोरस के कार्यों द्वारा इन्हें प्रमुखता प्राप्त हुई। कोई भी दिन अंकों के बिना नहीं बीतता है। मिस्र के महान गणित शास्त्र पाइथागोरस ने अंकों की महत्ता के विषय में इस तथ्य का अनुमोदन किया कि ‘नंबर रूल दी यूनिवर्स’ अर्थात अंक ब्रह्मांड पर राज करते हैं।
देखा जाये तो पूरा जीवन ही अंकों का खेल है लेकिन अंक ज्योतिष के माध्यम से आपके भाग्य का सटीक आकलन किया जा सकता है। अंक ज्योतिष को अंक विज्ञान भी कहा जा सकता है। हर व्यक्ति का उसकी जन्म तिथि के हिसाब से कोई ना कोई मुख्य अंक होता है। वह अंक उसके जीवन में कहां कहां लाभ और कहां कहां नुकसान पहुँचा सकता है और अंक स्वामी किस समय आपको कहां और क्या लाभ दिला सकते हैं इन सबकी गणना बड़े वैज्ञानिक तरीके से अंक ज्योतिष में की जाती है।
संगीता शुक्ला के अनुसार अंक ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति के नाम के अक्षर अंग्रेजी में लिखकर प्रत्येक अक्षर की अंक गणना करके नाम का नामांक प्राप्त किया जाता है तथा जन्म, तारीख, माह एवं वर्ष के अंकों का योग करके भाग्यांक प्राप्त किया जाता है तथा उसके द्वारा भविष्यवाणी की जाती है। ज्योतिष शास्त्र जैसी कठिन गणना करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, अंकशास्त्र में जन्म के समय की जानकारी न भी हो तब भी जन्म तारीख व नाम के आधार पर ही व्यक्ति के व्यवसाय, मित्रों, भागीदारों, उसके जीवन के उतार-चढ़ावों तथा उसके जीवन के महत्वपूर्ण समय के लाभ व हानि संबंधी बहुत सी बातें अंकशास्त्र के ज्योतिष ज्ञान में निपुणता प्राप्त की जा सकती है। बहुत ही सरल उपायों के द्वारा जो ग्रह आपके अनुरूप नहीं है उसे अनुरूप बनाया जा सकता है और पाॅजिटीव परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में नाम का स्पेलिंग पर ध्यान नहीं दिया जाता है, लेकिन अंकशास्त्र में उसे भी पहचाना जाता है जो कि इस शास्त्र का मास्टर स्ट्रोक है, क्योंकि यदि आपके स्टार भी सही है, फिर भी आपको सफलता नहीं प्राप्त होती तो इसका मतलब है आपकी नाम की स्पेलिंग में गड़बड़ है। आपने देखा होगा कि कई फिल्मों के नाम की स्पेलिंग में कोई न कोई लेटर, ए, बी, सी...... या कुछ भी उसकी वेल्यू को बढ़ाने के लिए दो बार लिखते हैं। इससे उस नाम की वेल्यू बैलेंस हो जाती है और उसे सफलता मिलती है।
नाम की स्पेलिंग का एक अन्य उदाहरण टाटा की ‘नैनो’ गाड़ी क्यों पीटी। यह कार छोटी सी प्यारी सी, सब कुछ इसमें अच्छा था, दाम भी कम थे, साधारण लोग भी खरीद सकते थे, लेकिन इसकी नाम की स्पेलिंग में गड़बड़ थी, जिसके कारण वह मार खा गई और ज्यादा नहीं चल पाई और मारूति की ‘अल्टो’ गाड़ी जो नाम की स्पेलिंग परफेक्ट होने के कारण साधारण होते हुए भी खूब चली। इसलिए बिजनेस में प्रोडक्ट का नाम भी बहुत मायने रखता है।
इतना ही नहीं यदि मोबाइल नंबर का जोड़ भी गलत नंबर पर आता है, यानी शत्रु नंबर पर तो भी सफलता में वह अड़चन डालता है। यह सभी साधारण सी बाते हैं, लेकिन अगर आपको उसके बारे में पता होता है तो आप छोटा सा उपाय करके अपने नुकसान से बच सकते हैं और जीवन में सफलता प्राप्त  कर सकते हैं। जीवन में सफलता के लिए अपने ग्रहों को बैलेंस रखना बहुत जरूरी है और उसे हम न्यूमरोलाॅजी के साधारण उपायों से कर सकते हैं और सफलता के कदम चुम सकते हैं, इसके लिये संगीता शुक्ला की सेवाएं ली जा सकती है। 

संगीता शुक्ला के मो. न. 76784 27245 एवं 99682 56346 है

प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
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गुरु गोविन्द सिंह: सिख इतिहास का एक अमिट आलेख

गुरु गोविन्द सिंह: सिख इतिहास का एक अमिट आलेख

05-Jan-2021

गुरु गोविन्द सिंह के 354वें प्रकाश उत्सव- 5 जनवरी 2021
-ः ललित गर्ग:-

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 भारत की रत्नगर्भा माटी में संतपुरुषों, गुरुओें एवं महामनीषियों की श्रृंखला में एक महापुरुष हैं गुरु गोविन्द सिंह। जिनकी दुनिया के महान् तपस्वी, महान् कवि, महान् योद्धा, महान् संत सिपाही साहिब आदि स्वरूपों में पहचान होती है। जिन्होंने कर्तृत्ववाद का संदेश देकर औरों के भरोसे जीने वालों को स्वयं महल की नींव खोद ऊंचाई देने की बात सिखाई। भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित करने की जागृत प्रेरणा दी। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। सभ्यता और संस्कृति के वे प्रतीकपुरुष हैं, जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई। जिनको बहुत ही श्रद्धा व प्यार से कलगीयां, सरबंस दानी, नीले वाला, बाला प्रीतम, दशमेश पिता आदि नामों से पुकारा जाता है।
निर्भीकता, साहस एवं तत्परता के गुणों से युक्त श्री गुरु गोविन्द सिंहजी का जन्म संवत् 1723 विक्रम की पौष सुदी सप्तमी अर्थात 22 दिसम्बर सन् 1666 में हुआ। उनके पिता गुरु तेगबहादुर उस समय अपनी पत्नी गुजरी तथा कुछ शिष्यों के साथ पूर्वी भारत की यात्रा पर थे। अपनी गर्भवती पत्नी और कुछ शिष्यों को पटना छोड़कर वे असम रवाना हो गये थे। वहीं उन्हें पुत्र प्राप्ति का शुभ समाचार मिला। बालक गोविन्द सिंह के जीवन के प्रारंभिक 6 वर्ष पटना में ही बीते। अपने पिता के बलिदान के समय गुरु गोविन्द सिंह की आयु मात्र 9 वर्ष की थी। इतने कम उम्र में गुरु पद पर आसीन होकर उन्होंने गुरु पद को अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से और भी गौरवान्वित किया। शासक होकर भी उनकी नजर में सत्ता से ऊंचा समाज एवं मानवता का हित सर्वोपरि था। यूं लगता है वे जीवन-दर्शन के पुरोधा बन कर आए थे। उनका अथ से इति तक का पुरा सफर पुरुषार्थ एवं शौर्य की प्रेरणा है। वे सम्राट भी थे और संन्यासी भी। आज उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कर्तृत्व सिख इतिहास का एक अमिट आलेख बन चुका है। उन्हें हम तमस से ज्योति की ओर एक यात्रा एवं मानवता के अभ्युदय के सूर्योदय के रूप में देखते हैं।
गुरु गोविन्द सिंह बचपन से ही बहुत पराक्रमी व प्रसन्नचित व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें सिपाहियों का खेल खेलना बहुत पसंद था। बालक गोविन्द बचपन में ही जितने बुद्धिमान थे उतने ही अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी से भी लोहा लेने में पीछे नहीं हटते थे। वे एक कुशल संगठक थे। दूर-दूर तक फैले हुए सिख समुदाय को ‘हुक्मनामे’ भेजकर, उनसे धन और अस्त्र-शस्त्र का संग्रह उन्होंने किया था। एक छोटी-सी सेना एकत्र की और युद्ध नीति में उन्हें कुशल बनाया। उन्होंने सुदूर प्रदेशों से आये कवियों को अपने यहाँ आश्रय दिया। यद्यपि उन्हें बचपन में अपने पिता श्री गुरु तेगबहादुरजी से दूर ही रहना पड़ा था, तथापि तेगबहादुरजी ने उनकी शिक्षा का सुव्यवस्थित प्रबंध किया था। साहेबचंद खत्रीजी से उन्होंने संस्कृत एवं हिन्दी भाषा सीखी और काजी पीर मुहम्मदजी से उन्होंने फारसी भाषा की शिक्षा ली। कश्मीरी पंडित कृपारामजी ने उन्हें संस्कृत भाषा तथा गुरुमुखी लिपि में लेखन, इतिहास आदि विषयों के ज्ञान के साथ उन्हें तलवार, बंदूक तथा अन्य शस्त्र चलाने व घुड़सवारी की भी शिक्षा दी थी। श्री गोविन्द सिंहजी के हस्ताक्षर अत्यंत सुन्दर थे। वे चित्रकला में पारंगत थे। सिराद-एक प्रकार का तंतुवाद्य, मृदंग और छोटा तबला बजाने में वे अत्यंत कुशल थे। उनके काव्य में ध्वनि नाद और ताल का सुंदर संगम हुआ है। इस तरह गुरु गोविन्द सिंह कला, संगीत, संस्कृति एवं साहित्यप्रेमी थे।
जैसाकि खुद गुरु गोबिंद सिंह ने कहा था, कि जब-जब अत्याचार बढ़ता है, तब-तब भगवान मानव देह का धारण कर पीड़ितों व शोषितों के दुख हरने के लिए आते हैं। औरंगजेब के अत्याचार चरम सीमा पर थे। दिल्ली का शासक हिन्दू धर्म तथा संस्कृति को समाप्त कर देना चाहता था। हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया साथ ही हिन्दुओं को शस्त्र धारण करने पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था। ऐसे समय में कश्मीर प्रांत से पाँच सौ ब्राह्मणों का एक जत्था गुरु तेगबहादुरजी के पास पहुँचा। पंडित कृपाराम इस दल के मुखिया थे। कश्मीर में हिन्दुओं पर जो अत्याचार हो रहे थे, उनसे मुक्ति पाने के लिए वे गुरुजी की सहानुभूति व मार्गदर्शन प्राप्ति के उद्देश्य से आये थे। गुरु तेगबहादुर उन दुःखीजनों की समस्या सुन चिंतित हुए। बालक गोविन्द ने सहज एवं साहस भाव से इस्लाम धर्म स्वीकार न करने की बात कही। बालक के इन निर्भीक व स्पष्ट वचनों को सुनकर गुरु तेगबहादुर का हृदय गद्गद् हो गया। उन्हें इस समस्या का समाधान मिल गया। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा-‘‘आप औरंगजेब को संदेश भिजवा दें कि यदि गुरु तेगबहादुर इस्लाम स्वीकार लेंगे, तो हम सभी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे“ और फिर दिल्ली में गुरुजी का अमर बलिदान हुआ जो हिन्दू धर्म की रक्षा के महान अध्याय के रूप में भारतीय इतिहास में अंकित हो गया।
भारत में फैली दहशत, डर और जनता का हारा हुआ मनोबल देखकर गुरुजी ने कहा ‘‘मैं एक ऐसे पंथ का सृजन करूँगा जो सारे विश्व में विलक्षण होगा। जिससे मेरे शिष्य संसार के हजारों-लाखों लोगों में भी पहली नजर में ही पहचाने जा सकें। जैसे हिरनों के झुंड में शेर और बगुलों के झुंड में हंस। वह केवल बाहर से अलग न दिखे बल्कि आंतरिक रूप में भी ऊँचे और सच्चे विचारों वाला हो। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर गुरु गोविन्द सिंहजी ने सन् 1699 की बैसाखी वाले दिन जो दृश्य आनंदपुर साहिब की धरती पर दिखाया, उसका अंदाजा कोई भी नहीं लगा सकता था। अपने आदर्शों और सिद्धांतों को अंतिम और सम्पूर्ण स्वरूप देने के लिये गुरुजी ने एक बहुत बड़ा दीवान सजाया। सम्पूर्ण देश से हजारों लोग इकट्ठे हुये। चारों तरफ खुशी का वातावरण था। इसी दिन गुरुजी ने खालसा पंथ की स्थापना की और इस पंथ में ”सिंह“ उपनाम लगाने की परम्परा की शुरुआत की तथा इसके साथ ही एक नया नारा भी लगाया था- ‘वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फतेह’। यह नारा आज सिख धर्म का प्रसिद्ध नारा बन गया हैं। जिसका प्रयोग सिख धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति प्रत्येक कार्य को आरम्भ करने से पहले करते हैं। गुरुगोविन्द सिंह ने ‘खालसा’ को ‘गुरु’ का स्थान दिया और ‘गुरु’ को ‘खालसा’ का। गुरु ने उनके साथ बैठकर भोजन किया। उन पांचों को जो अधिकार उन्होंने दिये, उनसे अधिक कोई भी अधिकार अपने लिए नहीं रखे। जो प्रतिज्ञाएं उनसे कराईं, वे स्वयं भी की। इस प्रकार गुरुजी ने अपने पूर्व की नौ पीढ़ियों के सिख समुदाय को ‘खालसा’ में परिवर्तित किया। तभी से गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु का अंतिम स्वरूप माना जाता है तथा उन्हें गुरु के रूप में पूजा जाता हैं। ईश्वर के प्रति निश्चल प्रेम ही सर्वोपरि है, अतः तीर्थ, दान, दया, तप और संयम का गुण जिसमें है, जिसके हृदय में पूर्ण ज्योति का प्रकाश है वह पवित्र व्यक्ति ही ‘खालसा’ है। ऊंच, नीच, जात-पात का भेद नष्ट कर, सबके प्रति उन्होंने समानता की दृष्टि लाने की घोषणा की। यह धर्म की वह आदर्श आचार-संहिता है, जिसमें सर्वोदय- सबका अभ्युदय, सबका विकास निहित है। यह मनुष्यता का मंत्र है, उन्नति का तंत्र है। सर्वकल्याणकारी एवं सर्वहितकारी ध्येय को सामने रखकर इसने धार्मिकता को एक नई पहचान दी है।
गुरु गोबिंद सिंहजी एक साहसी योद्धा के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे। इन्होंने बेअंत वाणी के नाम से एक काव्य ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ की रचना करने का गोविन्दसिंहजी का मुख्य उद्देश्य पंडितों, योगियों तथा संतों के मन को एकाग्र करना था। इनके पिता श्री गुरु तेग बहादुरजी ने तथा इन्होंने मुगल शासकों के विरुद्ध काफी युद्ध लड़े थे। जिन युद्धों में इनके पिताजी शहीद हो गये थे। श्री तेगबहादुरजी के शहीद होने के बाद ही सन् 1699 में गुरु गोविन्द सिंहजी को दशवें गुरु का दर्जा दिया गया था। गुरु गोविन्द सिंहजी ने युद्ध लड़ने के लिए कुछ अनिवार्य ककार धारण करने की घोषणा भी की थी। सिख धर्म के ये पांच क-कार हैं- केश, कडा, कंघा, कच्छा और कटार। ये शौर्य, शुचिता तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प के प्रतीक है।
इस प्रकार गुरु गोविन्द सिंहजी का जीवन एक कर्मवीर की तरह था। भगवान श्रीकृष्ण की तरह उन्होंने भी समय को अच्छी तरह परखा और तदनुसार कार्य आरम्भ किया। उनकी प्रमुख शिक्षाओं में ब्रह्मचर्य, नशामुक्त जीवन, युद्ध-विद्या, सदा शस्त्र पास रखने और हिम्मत न हारने की शिक्षाएँ मुख्य हैं। उनकी इच्छा थी कि प्रत्येक भारतवासी सिंह की तरह एक प्रबल प्रतापी जाति में परिणत हो जाये और भारत का उद्धार करें। गुरुजी की सभी शिक्षाओं को यदि आज देश का प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में उतार ले तो देश का कायाकल्प हो जाए तथा अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो सकता है। गुरु गोविन्द सिंह जैसे महापुरुष इस धरती पर आये जिन्होंने सबको बदल देने का दंभ तो नहीं भरा पर अपने जीवन के साहस एवं शौर्य से डर एवं दहशत की जिन्दगी को विराम दिया। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
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घरेलू हिंसा की गहरी होती जड़े

घरेलू हिंसा की गहरी होती जड़े

04-Jan-2021

घरेलू हिंसा की गहरी होती जड़े
-ः ललित गर्ग :-

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कोरोना के संक्रमण पर काबू पाने के लिए लगाई गई पूर्णबंदी के दौर में व्यापक पैमाने पर लोगों को रोजगार और रोजी-रोटी से वंचित होना पड़ा और इसके साथ-साथ घर में कैद की स्थिति में असंतुलन, आक्रामकता एवं तनावपूर्ण रहने की नौबत आई। जाहिर है, यह दोतरफा दबाव की स्थिति थी, जिसने जीवन में अनेकानेक बदलावों के साथ व्यवहार में निराशा, हताशा और हिंसा की मानेवृत्ति को बढ़ाया। इस दौरान महिलाओं एवं बच्चों से मारपीट, उनकी प्रताड़ना, अपमान आदि की घटनाएं बढ़ी। पति-पत्नी और पूरा परिवार लम्बे समय तक घर के अंदर रहने को मजबूर हुआ, जिससे जीवन में ऊब, चिड़चिडापन एवं वैचारिक टकराव कुछ अधिक तीखे हुए और महिलाओं एवं बच्चों के साथ मारपीट की घटनाएं बढ़ीं।

इन नये बने त्रासद हालातों की पड़ताल करने के लिये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेेक्षण की ओर से देश के बाईस राज्यों और केंद्र प्रदेशों में एक अध्ययन कराया गया जिसमें घरेलू हिंसा के बीच महिलाओं की मौजूदा स्थिति को लेकर जो तस्वीर उभरी है, वह चिंताजनक है और हमारे अब तक के सामाजिक विकास पर सवालिया निशान है। महिलाओं की आजादी छीनने की कोशिशें और उससे जुड़ी हिंसक एवं त्रासदीपूर्ण घटनाओं ने बार-बार हम सबको शर्मसार किया है। भारत के विकास की गाथा पर यह नया अध्ययन किसी तमाचे से कम नहीं है। इस व्यापक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक कई राज्यों में तीस फीसद से ज्यादा महिलाएं अपने पति द्वारा शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार हुई हैं। सबसे बुरी दशा कर्नाटक, असम, मिजोरम, तेलंगाना और बिहार में है। कर्नाटक में पीड़ित महिलाओं की तादाद करीब पैंतालीस फीसद और बिहार में चालीस फीसद है। दूसरे राज्यों में भी स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है। कोविड-19 महामारी के मद्देनजर ऐसी घटनाओं में तेज इजाफा होने की आशंकाएं भावी पारिवारिक संरचना के लिये चिन्ताजनक है।  संयुक्त राष्ट्र भी कोरोना महाव्याधि के दौर में महिलाओं और लड़कियों के प्रति घरेलू हिंसा के मामलों में ‘भयावह बढ़ोतरी’ दर्ज किये जाने पर चिंता जता चुका है। यह बेहद अफसोसजनक है कि जिस महामारी की चुनौतियों से उपजी परिस्थितियों से पुरुषों और महिलाओं को बराबर स्तर पर जूझना पड़ रहा है, उसमें महिलाओं को इसकी दोहरी मार झेलनी पड़ी है।
कोरोना की पूर्णबंदी खुलने के बाद भी ऐसी घटनाएं चिंताजनक स्तर पर कायम रहना एक गंभीर स्थिति है। इसका मुख्य कारण आर्थिक तंगी, रोजगार और कामकाज का बाधित होना या छिन जाना था। महानगरीय जीवन में तनाव और हिंसा की स्थितियां सामान्यतया देखी जाती हैं। इसकी वजहों के कई कारण हैं। आर्थिक तंगी की वजह से कई लोग अपने भीतर का तनाव परिवार के सदस्यों पर निकालते हैं। महिलाएं और बच्चे उनका आसानी से शिकार बनते हैं। इसके अलावा महात्वाकांक्षाएं भी एक वजह है, जिसके चलते महानगरीय चमकदमक में कई लोग सपने तो बड़े पाल लेते हैं, पर जब वे पूरे होते नहीं दिखते तो उसकी खीझ पत्नी और बच्चों पर निकालते हंै। पूर्णबंदी के दौरान बालविकास मंत्रालय ने घरेलू हिंसा रोकने के उद्देश्य से जागरूकता कार्यक्रमों को और बढ़ाने का प्रयास शुरू कर दिया है। लेकिन सरकारी प्रयासों के अलावा जन सोच को बदलना होगा।

एक टीस से मन में उठती है कि आखिर घरेलू हिंसा क्यों बढ़ रही है? नारी एवं मासूम बच्चों पर हिंसा का यह कहर क्यों बरपाया है? पतियों की हिंसा से बच भी जाये तो बलात्कार, छेड़खानी एवं सामाजिक विकृतियों की आग में वह भस्म होती है। हम भले ही समाज के अच्छे पहलुओं की चर्चा कर लें, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि महिलाओं के प्रति आम सामाजिक नजरिया बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। बल्कि कई बार घरेलू हिंसा तक को कई बार सहज और सामाजिक चलन का हिस्सा मानकर इसकी अनदेखी करके परिवार के हित में महिलाओं को समझौता कर लेने की सलाह भी दी जाती है। ऐसे में घरों की चारदिवारी में पलती हिंसा एक संस्कृति के रूप में ठोस शक्ल अख्तियार कर लेती है। महिलाओं पर हो रहे इस तरह के अन्याय, अत्याचारों की एक लंबी सूची रोज बन सकती है। न मालूम कितनी महिलाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती यह कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं, बच्चों को प्रताड़ित करते हैं। दरअसल, यह एक सामाजिक विकृति है, जिससे तत्काल दूर करने की जरूरत है। लेकिन यह तभी संभव है, जब सरकारों की नीतिगत प्राथमिकताओं में सामाजिक विकास और रूढ़ विचारों पर नजरिया और मानसिकता बदलने का काम शामिल हो। माना जाता है कि जिन समाजों में शिक्षा का प्रसार ठीक से नहीं हुआ है, उन्हीं में महिलाओं और बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार अधिक होता है। मगर यह धारणा अनेक घटनाओं से गलत साबित हो चुकी है। पढ़े-लिखे और सभ्य कहे जाने वाले समाजों में भी महिलाएं न तो सुरक्षित हैं और न उन्हें अपेक्षित सम्मान हासिल है।
कोरोना संक्रमण के दौरान ही नहीं बल्कि भारत में पिछले कुछ सालों में घर से लेकर सड़क और कार्यस्थल तक महिलाओं के उत्पीड़न एवं हिंसा का मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना है। मीटू आंदोलन ने इसे और ऊंचाई दी है और खासकर कामकाजी दायरे में यौन शोषण के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। लेकिन गौर करने की बात है कि अभी सारी बहस महिलाओं के सार्वजनिक जीवन को लेकर ही हो रही है। महिलाओं की घरेलू हिंसा के बारे में तो अभी बात शुरू भी नहीं हुई है कि घर के भीतर उन्हें कैसी त्रासद एवं हिंसक घटनाओं को झेलना पड़ रहा है। इस विषय पर चर्चा शायद इस लिए भी नहीं होती कि भारत में घर को एक पवित्र जगह के तौर पर देखा जाता है और इसके भीतरी माहौल को सार्वजनिक चर्चा के दायरे में लाना मर्यादा के खिलाफ समझा जाता है। पुरुष-प्रधान समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक अनियंत्रित हैं जिसका परिणाम है नारी एवं बच्चों पर हो रही घरेलू हिंसा, नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-प्रधान समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है।
यही वजह है कि आज भी महिलाओं को घर से लेकर कामकाज तक के मामले में सार्वजनिक स्थानों पर कई तरह की वंचनाओं, विकृत सोच और भेदभावों का शिकार होना पड़ता है। यह रवैया आगे बढ़ कर हिंसा की अलग-अलग शक्ल में सामने आता है, जिसे समाज में अघोषित तौर पर सहज माना जाता है। इस मामले पर चिंता तो लगातार जताई जाती रही है, लेकिन आज भी ऐसी संस्कृति नहीं विकसित की जा सकी है, जिसमें महिलाएं अपने अधिकार और गरिमा के साथ सहजता से जी सकें। विडंबना यह है कि इनमें से ज्यादातर महिलाओं को इस तरह की घरेलू हिंसा से कोई खास शिकायत भी नहीं है। मतलब यह कि उन्होंने इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया है। लेकिन क्यों?
घर-आंगन में पिस रही औरतों के अधिकार का प्रश्न बीच में एक बार उठा, जिससे निपटने के लिए घरेलू हिंसा कानून बनाया गया। लेकिन उसका भी अनुपालन इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि प्रायः स्वयं महिलाएं ही परिवार की मर्यादा पर आघात नहीं करना चाहतीं। फिर उन्हें यह भी लगता है कि पति के खिलाफ जाने से उनका जीवन संकट में पड़ सकता है। इसका एक कारण पति पर उनकी आर्थिक निर्भरता होती है लेकिन जो महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती हैं, वे भी घरेलू हिंसा कानून का सहारा नहीं लेतीं क्योंकि उन्हें यह डर सताता है कि परिवार से अलग होते ही वे न सिर्फ लंपट पुरुषों के बल्कि पूरे समाज के निशाने पर आ जाएंगी। सचाई यह है कि कोई अकेली आत्मनिर्भर महिला भी चैन से अपना जीवन गुजार सके, ऐसा माहौल हमारे यहां अभी नहीं बन पाया है। कुछ महिलाएं अपने बच्चों के भविष्य के लिए घरेलू हिंसा बर्दाश्त करती हैं।
हमें समाज को बदलने से पहले स्वयं को बदलना होगा। हम बदलना शुरू करें अपना चिंतन, विचार, व्यवहार, कर्म और भाव। मौलिकता को, स्वयं को एवं स्वतंत्र होकर जीने वालों को ही दुनिया सर-आंखों पर बिठाती है। घर-परिवार में महिलाओं पर होने वाली घरेलू हिंसा को रोकने के लिये जरूरी है कि एक ऐसे घर का निर्माण करे जिसमें प्यार की छत हो, विश्वास की दीवारें हों, सहयोग के दरवाजे हों, अनुशासन की खिड़कियाँ हों और समता की फुलवारी हो। प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133 

 

 

 

 

 


नए वर्ष में हो नयी जीवनशैली का सार्थक संकल्प

नए वर्ष में हो नयी जीवनशैली का सार्थक संकल्प

01-Jan-2021

नए वर्ष में हो नयी जीवनशैली का सार्थक संकल्प
- ललित गर्ग -

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नए वर्ष का स्वागत हम इस सोच और संकल्प के साथ करें कि हमें कोरोना महामारी को अलविदा कहते हुए कुछ नया करना है, नया बनना है, नये पदचिह्न स्थापित करने हैं। बीते वर्ष की पीड़ाओं, दर्द एवं प्रकोप पर नजर रखते हुए उन पर नियंत्रण पाने का संकल्प लेना है। हमें यह संकल्प करना और शपथ लेनी है कि आने वाले वर्ष में हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो हमारे उद्देश्यों, उम्मीदों, उमंगों और आदर्शों पर प्रश्नचिह्न टांग दे। हमें नये साल में अपनी जीवनशैली को नया रंग और आकार देना है।
कोरोना महामारी ने हमारे जीने के तौर-तरीके को अस्तव्यस्त कर दिया है। नववर्ष का स्वागत करते हुए हमारे द्वारा यह कामना करना अस्वाभाविक नहीं थी कि हमारे नष्ट हो गये आदर्श एवं संतुलित जीवन के गौरव को हम फिर से प्राप्त करेंगे और फिर एक बार हमारी जीवन-शैली में पूर्ण भारतीयता का सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित होगा। किंतु कोरोना के जटिल नौ  माह के बीतने एवं नये साल की अगवानी पर हालात का जायजा लें, तो हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक जीवन में जीवन-मूल्य एवं कार्यक्षमताएं खंड-खंड होते दृष्टिगोचर होते हैं। हर व्यक्ति जीवन को उन्नत बनाना चाहता है, लेकिन उन्नति उस दिन अवरुद्ध होनी शुरु हो जाती है जिस दिन हम अपनी कमियों एवं त्रुटियों पर ध्यान देना बन्द कर देते हैं। यह स्थिति आदमी से ऐसे-ऐसे काम करवाती है, जो आगे चलकर उसी के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं। रही-सही कसर पूरी कर देती है हमारी त्रुटिपूर्ण जीवनशैली। असंतुलित जीवन है तो आदमी सकारात्मक चिंतन कर नहीं सकता। विचारणीय बात यह है कि किस उद्देश्य से जीवन जीया जाए? यह प्रश्न हर व्यक्ति के सामने होना चाहिए कि मैं क्यों जी रहा हूं? जीवन के उद्देश्य पर विचार करेंगे तो एक नई सचाई सामने आएगी और जीवन की शैली का प्रश्न भी सामने आएगा।
हम मनुष्य जीवन की मूल्यवत्ता और उसके तात्पर्य को समझें। वह केवल पदार्थ भोग और सुविधा भोग के लिए नहीं बल्कि कर्म करते रहने के लिये है। मनुष्य जन्म तो किन्हीं महान उद्देश्यों के लिए हुआ है। हम अपना मूल्य कभी कम न होने दें। प्रयत्न यही रहे कि मूल्य बढ़ता जाए। लेकिन यह बात सदा ध्यान में रहे कि मूल्य जुड़ा हुआ है जीवनमूल्यों के साथ। अच्छी सोच एवं अच्छे उद्देश्यों के साथ। हायमैन रिकओवर ने कहा कि अच्छे विचारों को स्वतः ही नहीं अपनाया जाता है। उन्हें पराक्रमयुक्त धैर्य के साथ व्यवहार में लाया जाना चाहिए।
हमारे घर-परिवारों में ऐसे-ऐसे खान-पान, जीने के तौर-तरीके और परिधान घर कर चले हैं कि हमारी संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान ही धूमिल हो गई है। इंटरनेट एवं छोटे-परदे की आँधी ने समूची दुनिया को एक परिवार तो बना दिया है, लेकिन इस संस्कृति में भावना का रिश्ता, खून का रिश्ता या पारिवारिक संबंध जैसा कुछ दिखता ही नहीं है। यही नहीं इस जीवनशैली से अकर्मण्यता एवं उदासीनता भी पसर रही है। सभी अपने स्वार्थों के दीयों में तेल डालने में लगे हैं। संकीर्ण सोच के अँधेरे गलियारों में औंधे मुँह पड़े संबंध और मानवीय रिश्ते सिसक रहे हैं। भले ही हमारे देश की सांस्कृतिक परंपराएँ और आदर्श जीवन-मूल्य समृद्ध एवं सुदृढ़ रहे हैं किन्तु कोरोना महाव्याधि के प्रकोप की हवाओं ने हमारे जन-मानस में भावी जीवन के सन्दर्भ में भय एवं आशंकाओं का धुंधलका घोलकर हमारे रहन-सहन और आचार-विचार को असंतुलित किया है, और इससे हमारी संयुक्त परिवार, आदर्श जीवनशैली एवं प्रेरक संस्कृति की परंपरा बिखर रही है। ऐसे परिवार ढूँढ़ने पर भी मुश्किल से मिलते हैं, जो शांति और संतोष के साथ आनंदित जीवन जीते हैं। अर्थोपार्जन से जुड़ी गतिविधियों का हिसाब तो जीडीपी में आ जाता है, लेकिन देशवासियों का जो समय गैरआर्थिक गतिविधियों में लगता है, उसका अंदाजा लेने की कोई कोशिश नहीं की गई है। घरेलू महिलाओं के कामकाज एवं श्रम का मूल्यांकन कभी होता ही नहीं, यदि ऐसा आकलन हो तो जीडीपी में उनका योगदान कम नहीं है।
जन्मदिवस पर केक काटने और मोमबत्तियाँ जलाने और बुझाने की जगह अब हम दीपक कोरोना महामारी को भगानेे के लिये जलाते हैं, ताली भी उसी के विरुद्ध अपने संकल्प को दृढ़ करने के लिये बजाते हैं। रीति-रिवाजों के ही साथ नृत्य-संगीत की भी बात की जा सकती है। जन्मदिवस पर, विवाह समारोहों पर, खुशी के अन्य अवसरों पर मन की प्रसन्नता की अभिव्यक्ति कहां कर पा रहे हैं? हमारे यहाँ सारे विश्व को देने व सिखाने के लिए दीपक जलाने, ताली बजाने, लोकगीत, लोकनृत्य, शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य आदि की अति समृद्ध परंपरा है, जिनसे हमने विश्व को रू-ब-रू किया है। गरभा, भाँगड़ा, घूमर, भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी एवं भारतीय नृत्यों को प्रोत्साहन दें। यह देश तानसेन व बैजूबावरा का देश है। इस देश को कर्ण कटु एवं तेज-कर्कश संगीत उधार लेने की आवश्यकता क्यों है? हमारे नृत्य-संगीत सत्यम-शिवम्-सुंदरम के साक्षात् स्वरूप हैं। हमारी जीवनशैली में इनके लिये समय का नियोजन जरूरी है, क्योंकि ये हमारी समृद्धि, स्वास्थ्य एवं विकास के प्रेरक है।
समस्या यही है कि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, जीवन हमारा असन्तुलित एवं त्रुटिपूर्ण बना हुआ है। इस जीवन की सबसे बड़ी बाधा है जीवन में कार्यों एवं परम्पराओं के लिये समय का असंतुलित बंटवारा, असंतोष की मनोवृत्ति और अतृप्ति। जब मन की चंचलता बनी हुई है, तो मनोबल नहीं बढ़ सकता। मनोबल की साधना ही नहीं है तो संकल्पबल मजबूत कैसे होगा? मन में तो तरह-तरह की तरंगे उठ रही हैं। क्षण भर के लिए भी मन स्थिर होने के लिए तैयार नहीं है। तृप्ति कहीं नहीं है। देश के नम्बर एक औद्योगिक घरानों में गिने जाने वाले टाटा, बिड़ला, रिलायंस अब सब्जी-भाजी बेच रहे हैं। बड़े शहरों में इनके डिपार्टमेंटल स्टोर हैं। जिनमें तेल, लूण और रोज के काम में आने वाले सारी चीजें शामिल हैं। छोटे दुकानदार की रोजी-रोटी तो अब वे लोग हथिया रहे हैं। तृप्ति है कैसे? शांति, संतोष और तृप्ति का एक ही साधन है और वह है योग। श्रीकृष्ण अर्जुन से इसीलिए कहा हैं कि अब तुम तृप्त होकर योगी बन जाओ। इसी तृप्ति में जीवन की समृद्धि का स्रोत समाहित है, इसलिये दैनिक जीवन में योग का समावेश जरूरी है।
प्राचीन ऋषियों ने भी एक सूत्र दिया था-संतोषः परमं सुखं। संतोष परम सुख है और असंतोष का कहीं अंत नहीं है। जब तक इस सूत्र पर अमल होता रहा, स्थिति नियंत्रण में रही। जैसे ही संतोष की डोर कमजोर होना शुरू हुई, स्थिति तनावपूर्ण होती गई। यह बात व्यक्ति ही नहीं, समाज, राष्ट्र एवं विश्व व्यवस्था पर भी लागू होती है। महामात्य चाणक्य को राजनीति का द्रोणाचार्य माना जाता है। उनका दिया हुआ सूूत्र है-शासन को इन्द्रियजयी होना चाहिए। बात शासन से पहले व्यक्ति की है। व्यक्ति का जीवन ही राष्ट्र का निर्माण है। इसलिये प्रयास वहीं ंसे शुरु होने चाहिए और नया वर्ष एक अवसर है इस प्रयास के संकल्पों का।
नया वर्ष हर बार नया संदेश, नया संबोध, नया सवाल, नया लक्ष्य लेकर आता है कि बीते वर्ष में हमने क्या खोया, क्या पाया? पर जीवन की भी कैसी विडम्बना! हर वर्ष एक दिन के लिए ही हम स्वयं को स्वयं के द्वारा जानने की कोशिश इस संकल्प के साथ करते हैं कि ऐसा हम तीन सौ पैंसठ दिन करेंगे, लेकिन वर्ष की दूसरी तारीख ही हमें अपने संकल्प, अपनी शपथ से भटका देती है। नए वर्ष को सचमुच सफल और सार्थक बनाने के लिए हमें कुछ जीवन-मंत्र धारण करने होंगे। यूं तो हमारे धर्म-ग्रंथ जीवन-मंत्रों से भरे पड़े हैं। प्रत्येक मंत्र दिशा-दर्शक है। उसे पढ़कर ऐसा अनुभव होता है, मानो जीवन का राज-मार्ग प्रशस्त हो गया। उस मार्ग पर चलना कठिन होता है, पर जो चलते हैं वे बड़े मधुर फल पाते हैं। कठोपनिषद् का एक मंत्र है-‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’ इसका अर्थ किया गया है-उठो, जागो और नया रचो। ‘नए वर्ष का मंत्र यानी हमारा संकल्प’ हमारा ध्यान अच्छाइयों की ओर आकृष्ट करता है और उन्हें प्राप्त करने के लिए उद्योग करने को प्रोत्साहित करता है। इसे जीवन की किसी भी दिशा में प्रयुक्त किया जा सकता है।
बस, वही क्षण जीवन का सार्थक है जिसे हम पूरी जागरूकता के साथ जीते हैं और वही जागती आंखांे का सच है जिसे पाना हमारा मकसद है। सच और संवेदना की यह संपत्ति ही नए वर्ष में हमारी सफलता को सुनिश्चित कर सकती है। अतः आइए इस विश्वास और संकल्प को सचेतन करें कि अब कोरोना महामारी जैसे संकट नहीं रहेंगे। बिना किसी को मिटाये निर्माण की नई रेखाएं खींचें। यही साहसी सफर शक्ति, समय और श्रम को सार्थकता देगा।
प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133 मउंपसरू संसपजहंतह11/हउंपसण्बवउ