बच्चों पर बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण हो

बच्चों पर बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण हो

06-Oct-2021

बच्चों पर बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण हो
-ललित गर्ग-

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कोरोना काल के पूर्णबंदी के दौरान बाल विवाह, यौन शोषण, अपराध और आॅनलाइन दुव्र्यवहार के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज हुई। नए आंकड़ों के अनुसार पिछले साल रोज करीब साढ़े तीन सौ बच्चों के साथ आपराधिक घटनाएं घटीं। हालांकि अध्ययनकर्ताओं और राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो ने इसके पीछे बड़ी वजह कोरोना काल में हुई बंदी और कामकाज के ठप पड़ जाने, परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाने को माना है। बच्चें समाज में ही नहीं, अपने घरों में भी असुरक्षित है। बच्चों पर हो रहे अपराध एक सभ्य समाज पर बदनुमा दाग है। जबकि एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि उसमें बच्चों के साथ कैसा व्यवहार होता है, वे खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं। इस दृष्टि से हम सदा से पिछड़े नजर आते रहे हैं। कहते हैं कि समाज में शिक्षा के प्रसार से हिंसा और अपराध जैसी घटनाएं स्वतः कम होने लगती हैं। भारत में शिक्षा की दर तो बढ़ रही है, मगर हिंसा और अपराध के मामले भी उसी अनुपात में बढ़े हुए दर्ज होते हैं, यह शिक्षा की विसंगति का ही परिणाम है। सबसे चिंता की बात है कि भारत में बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार, यौन अत्याचार एवं उनके अधिकारों के हनन पर अंकुश नहीं लग पा रहा, जो चिन्ताजनक होने के साथ शासन-व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
हाल ही में स्कूल ऑफ बिजनेस में सैंटर फॉर इनोवेशन एटरप्रेन्योरशिप की मदद से एक सर्वे आॅनलाइन शिक्षा की स्थिति का आकलन करने के लिये किया गया था। इस सर्वे में समभागी बने लोगों में से 93 फीसदी लोगों ने यही माना है कि ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों के सीखने और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ा है, घरों में कैद होकर भी वे आॅनलाइन अपराधों के शिकार हुए, उनमें मानसिक विकृतियां पनपी। इससे बच्चों पर नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ा, जिससे उनकी सुप्त शक्तियों का जागरण एवं जागृत शक्तियों का संरक्षण एवं संवर्धन अवरूद्ध हुआ है। बच्चों के समग्र विकास की संभावनाओं का प्रकटीकरण रूका है। लाखों छात्रों के लिए स्कूलों का बंद होना उनकी शिक्षा में अस्थाई व्यवधान बना है जिसके दूरगामी प्रभाव का आकलन धीरे-धीरे सामने आने लगा है। बच्चों का शिक्षा से मोहभंग हो गया। बच्चें अपराध एवं यौन शोषण के शिकार हुए है। ये स्थितियां गंभीर एवं घातक होने के साथ चुनौतीपूर्ण बनी है। सत्य को ढका जाता है या नंगा किया जाता है पर स्वीकारा नहीं जाता। और जो सत्य के दीपक को पीछे रखते हैं वे मार्ग में अपनी ही छाया डालते हैं। बच्चों के साथ होने वाले अपराधों के संबंध में ऐसा ही देखने को मिला है।
भले ही ताजा आंकड़ों में पहले की तुलना में आपराधिक मामलों में कुछ कमी दर्ज हुई है, मगर वह संतोषजनक नहीं है। कई मामलों में बच्चों के साथ दुव्र्यवहार की घटनाएं बढ़ी हैं। मनोचिकित्सक अरुणा ब्रूटा के अनुसार, “बच्चों के साथ यौन शोषण करने वाले लोग सेक्शुअल डिसऑर्डर का शिकार होते हैं। उन्हें बच्चों के यौन शोषण से मज़ा मिलता है और अपनी इन हरकतों का सबूत मिटाने के लिए वे बच्चों की हत्या तक कर देते हैं।“ बच्चों को टारगेट करने वाले लोगों को पीडोफाइल कहा जाता है। इनका रुझान शुरू से बच्चों की तरफ़ होता है। वे वयस्कों के बजाय बच्चों को देखकर उत्तेजित होते हैं। ऐसे ही बीमार मानसिकता के लोगों ने पूर्णबंदी के दौरान बच्चों पर विकृत मानसिकता के हमले जहां-जैसे मौके मिले किये। जब कल-कारखाने बंद रहने और उसके बाद भी बहुत सारे रोजगार सुचारुरूप से बहुत दिनों तक नहीं चल पाने की स्थिति में बच्चों के साथ काम की जगहों पर दुव्र्यवहार की घटनाएं नहीं होने पाईं, इसलिए आंकड़े पहले की तुलना में कुछ घटे हुए दर्ज हुए। बंदी की वजह से बच्चों को घरों में बंद रहने पर मजबूर होना पड़ा था, ऐसे में उनके माता-पिता का अनुशासन और हिंसक व्यवहार कुछ अधिक देखा गया। यह खुलासा बंदी के दौरान हुए अन्य अध्ययनों से हो चुका है। ऐसे में बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और सरकारी महकमों के लिए यह चुनौती बनी हुई है कि इस पर कैसे काबू पाया जाए। यों बाल अपराध, बाल अधिकारों के हनन, बेवजह प्रताड़ना, बाल मजदूरी, यौन शोषण आदि के खिलाफ कड़े कानून हैं, मगर उनका कितना पालन हो पा रहा है, इसका अंदाजा ताजा आंकड़ों से लगाया जा सकता है। बच्चों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं के मामले में मध्यप्रदेश अव्वल है, फिर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार हैं।
पीडोफाइल ख़ास योजना के तहत बच्चों पर अपराधों को अंजाम देते हैं। वे अक्सर बच्चों के आस-पास रहने कोशिश करते हैं। वे ज्यादातर स्कूलों या ऐसी जगहों को चुनते हैं, जहां बच्चों का आना-जाना ज्यादा हो। ज्यादातर मामलों में बच्चों को शिकार बनाने वाले उनके करीबी ही होते हैं। ये स्कूल बस का ड्राइवर, कंडक्टर, शिक्षक या स्कूल का कोई कर्मचारी हो सकते हंै। दूसरी तरह के लोग घर के भी हो सकते हैं चाहे वे चाचा, मामा, पड़ोसी भी हो सकता है। दूसरी तरह के ये लोग ज्यादा ख़तरनाक होते हैं। ऐसे लोग आसानी से शक के दायरे में नहीं आते। कई बार बच्चों के शिकायत करने पर भी अभिभावक बच्चों का यकीन नहीं करते। भारतीय समाज में बच्चों के प्रति यौन व्यवहार एक आम चलन की तरह देखा जाता है। बच्चों के यौन शोषण पर काबू पाना तो दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है। इसलिए हर बार की तरह महज आंकड़ों पर चिंता जाहिर करने के बजाय ऐसे अपराधों की जड़ों पर प्रहार करने के उपायों पर विचार करने की जरूरत है।
बहुत सारे गरीब परिवारों के बच्चे कानूनी प्रतिबंध के बावजूद कालीन, पटाखे बनाने वाले कारखानों, चाय की दुकानों, ढाबों और घरेलू नौकर के रूप में काम करते पाए जाते हैं। वहां उनके मालिक न तो उनकी बुनियादी और अनिवार्य सुविधाओं का ध्यान रखते हैं और न खाने-पीने का। ऊपर से उनके साथ मार-पिटाई भी करते हैं। बच्चें अपने अभिभावकों की पिटाई के भी शिकार होते हैं। बहुत सारे लोगों की धारणा है कि मारने-पीटने से बच्चे अनुशासित होते हैं, जबकि अनेक मौकों पर, अनेक अध्ययनों से उजागर है कि मार-पीट का बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उनमें अपराध बोध पनपता है।
बच्चों के खि़लाफ़ हो रहे अपराध, ख़ासतौर पर यौन अपराध के ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते, क्योंकि बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ गलत हो रहा है। अगर वे समझते भी हैं तो डांट के डर से अभिभावकों से इस बारे में बात नहीं करते हैं। महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय के अध्ययन में भी यही बात सामने आई है। बच्चों पर बढ़ रहे अपराधों पर नियंत्रण पाने के लिये व्यापक प्रयत्नों की अपेक्षा है। बच्चों से खुलकर बात करें। उनकी बात सुने और समझें। अगर बच्चा कुछ ऐसा बताता है तो उसे गंभीरता से लें। इस समस्या को हल करने की कोशिश करें। पुलिस में बेझिझक शिकायत करें। बच्चों को ’गुड टच-बैड टच’ के बारे में बताएं- बच्चों को बताएं कि किस तरह किसी का उनको छूना ग़लत है। बच्चों के आस-पास काम करने वाले लोगों की पुलिस वेरिफिकेशन होनी चाहिए। जब कोई अपराध करता हुआ पकड़ा जाता है तो उसे फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के ज़रिए जल्द से जल्द सज़ा मिलनी चाहिए। अपराधियों को जल्द सज़ा समाज में सख्त संदेश देती है कि ऐसा अपराध करने वाले बच नहीं सकते। बाल यौन अपराधियों को सज़ा देने के लिए खास कानून है- पॉक्सो यानि प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस। इस कानून का मकसद बच्चों के साथ यौन अपराध करने वालों को जल्द से जल्द सजा दिलाना है, इस कानून का सही परिप्रेक्ष्य में तत्परता से पालन होना चाहिए। बच्चों के खि़लाफ अपराध के ज्यादा मामले बाल सुरक्षा अधिनियम 2012 आने के बाद सामने आए हैं। पहले अपराधों को दर्ज नहीं कराया जाता था लेकिन अब लोगों में जागरूकता आने के कारण बच्चों के खि़लाफ़ अपराध के दर्ज मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133 


छत्तीसगढ़ सरकार का अहम् फैसला गोधन न्याय योजना अब मिशन मोड में !

छत्तीसगढ़ सरकार का अहम् फैसला गोधन न्याय योजना अब मिशन मोड में !

05-Oct-2021

छत्तीसगढ़ सरकार का अहम् फैसला गोधन न्याय योजना अब मिशन मोड में !

गोधन न्याय योजना: गोबर विक्रेताओं को 6वीं किश्त के रूप में 9.12 करोड़ रूपए  का हुआ ऑनलाइन भुगतान

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल  ने ‘गोधन न्याय मिशन‘ गठित करने के दिए निर्देश
वैज्ञानिकों और प्रबंधन-विपणन में विशेषज्ञता रखने वाली संस्थाओं की ली जाएंगी सेवाएं

छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना को मिशन मोड पर संचालित करने के लिए मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने ‘गोधन न्याय मिशन‘ का गठन करने के निर्देश दिए हैं। कृषि मंत्री श्री रविन्द्र चौबे इसके अध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री प्रदीप शर्मा उपाध्यक्ष होंगे।
राज्य में पशुपालन और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2020 से गोधन न्याय योजना का संचालन किया जा रहा है। इसके तहत पशुपालकों एवं किसानों से दो रूपए प्रति किलो की दर से गोबर की खरीदी की जाती है। इस गोबर से महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा सुराजी गांव योजना के तहत स्थापित गौठानों में जैविक खाद का निर्माण किया जा रहा है। अभी तक 50 लाख क्विंटल से भी अधिक गोबर का क्रय किया जा चुका है। क्रय किए गए गोबर से कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, सुपर कम्पोस्ट के अतिरिक्त विद्युत उत्पादन तथा अन्य अनेक प्रकार की वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने गोबर से जैविक खाद उत्पादन के साथ-साथ विद्युत उत्पादन की परियोजना का भी शुभारंभ किया है। पहले चरण में रायपुर, दुर्ग और बेमेतरा जिलों के तीन गौठानों में विद्युत उत्पादन शुरू भी हो गया है। श्री बघेल ने इस परियोजना को राज्य के सभी गौठानों में लागू करने के निर्देश दिए हैं। राज्य में अब तक 10 हजार से ज्यादा गौठान स्वीकृत हो चुके हैं। इनमें से 6 हजार से ज्यादा गौठान निर्मित होकर सक्रिय भी हो चुके हैं। सम्पूर्ण व्यवस्था का प्रबंधन स्थानीय स्तर पर किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा है कि गोबर संग्राहकों को योजना से अधिक से अधिक लाभ मिले और गोबर के अधिकतम लाभकारी उपयोग के लिए आवश्यक है कि इसका प्रबंधन व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ किया जाए। इसके लिए मिशन मोड में कार्य किया जाए जिसमें वैज्ञानिकों, प्रबंधन एवं विपणन विशेषज्ञता रखने वाली संस्थाओं, एनजीओ, कम्पनियों के कन्सलटेंट आदि की सेवाएं ली जाएं।
गोधन न्याय मिशन में मुख्य सचिव श्री अमिताभ जैन, कृषि उत्पादन आयुक्त डॉ. कमलप्रीत सिंह और सचिव वित्त श्रीमती अलरमेलमंगई डी. सदस्य होंगी। विशेष सचिव कृषि डॉ. एस. भारतीदासन मिशन के प्रबंध संचालक तथा उप सचिव कृषि अतिरिक्त प्रबंध संचालक होंगे। मिशन में प्रतिनिधि के रूप में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ तथा दो अन्य अनुभवी एवं विशेषज्ञ को सदस्य के रूप में गोधन न्याय मिशन के अध्यक्ष द्वारा मनोनीत किया जाएगा।

 


शिक्षक ऐसे हों जो सारे विश्व तोड़े नहीं, बल्कि जोड़े

शिक्षक ऐसे हों जो सारे विश्व तोड़े नहीं, बल्कि जोड़े

04-Oct-2021

विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर, 2021 पर विशेष
शिक्षक ऐसे हों जो सारे विश्व तोड़े नहीं, बल्कि जोड़े
  - ललित गर्ग-

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विश्व शिक्षक दिवस प्रतिवर्ष दुनिया के लगभग एक सौ देशों में 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस दिवस को आयोजित करने का उद्देश्य विश्वभर के शिक्षकों द्वारा विश्व के लगभग दो अरब पचास करोड़ बच्चों के जीवन निर्माण मंे दिये जा रहे महत्वपूर्ण योगदान पर विचार-विमर्श करना है। इस दिवस को मनाते हुए यूनेस्को अपने कार्यक्रमों एवं प्रेरणाओं के द्वारा विश्व को शिक्षा, विज्ञान, शांति एवं प्रगति का सन्देश देने के लिए कृत संकल्पित है। प्राचीन भारत ने गुरुकुल शिक्षा के माध्यम से संसार में जगत गुरू की भूमिका निभाई है। दुनिया के सबसे सशक्त एवं प्रभावी संगठन के रूप में विद्या भारती अपने करीब 25 हजार स्कूलों एवं डेढ़ लाख शिक्षकों के माध्यम से देश एवं दुनिया को परिष्कृत करनेे और जिम्मेदार व्यक्तियों का निर्माण करने के अनूठे एवं अनुकरणीय प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 घोषित की है जिसमें शिक्षकों को अधिक सशक्त, जिम्मेदार एवं राष्ट्र- व्यक्ति निर्माण में उनकी भूमिका पर विशेष बल दिया गया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में अब तक भारत में गुरु एवं शिक्षक श्रद्धा का पात्र न होकर वेतन-भोगी नौकर बन गया था, शिक्षक की भूमिका गौण हो गयी थी। इस बड़ी विसंगति को दूर करने की दृष्टि से वर्ततान शिक्षा नीति में व्यापक चिन्तन-मंथन किया गया है।
विश्व स्तर पर नयी शिक्षा एवं शिक्षकों के निर्माण की नीति बनायी जानी चाहिए, जिसके अन्तर्गत भारतीय संस्कृति के आदर्श वसुधैव कुटुम्बकम् को विश्व संस्कृति के रूप में विकसित करना चाहिए, जिससे विश्वव्यापी समस्याओं हिंसा, युद्ध एवं आतंकवाद के समाधान निकाले जा सकते हैं। आदर्श शिक्षकों का निर्माण दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि एक शिक्षक द्वारा दी गई शिक्षा के बल से ही छात्र आगे चलकर देश सहित विश्व के कर्णधार बनते हैं। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर यूं तो शिक्षक दिवस पांच सितंबर को प्रतिवर्ष मनाया जाता है लेकिन यूनेस्को के आह्वान पर पांच अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस भी मनाया जाता है।  इस दिवस का मुख्य उद्देश्य एक छात्र की जिंदगी में शिक्षकों के महत्व को रेखांकित करना है। उनका महत्व एवं व्यक्तित्व-निर्माण की जिम्मेदारी अधिक प्रासंगिक हुई है। क्योंकि सर्वतोमुखी योग्यता की अभिवृद्धि के बिना युग के साथ चलना और अपने आपको टिकाए रखना अत्यंत कठिन होता है। फौलाद-सा संकल्प और सब कुछ करने का सामथ्र्य ही व्यक्तित्व में निखार ला सकता है। शिक्षक ही ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करते हैं।
किसी भी समाज और राष्ट्र के विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा ही वह सेतु है, जो व्यक्ति-चेतना और समूह चेतना को वैश्विक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से अनुप्राणित करती है। भारत के सामने जो समस्याएं सिर उठाए खड़ी हैं, उनमें मूल्यहीन शिक्षानीति एक बड़ा कारण रही है। शिक्षा ही जब मूल्यहीन हो जाए, तो देश एवं दुनिया में मूल्यों की संस्कृति कैसे फलेगी? वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य जीवन को उन्नत बनाना नहीं, अपितु आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाना हो गया है। विद्या भारती का मंतव्य है- ‘‘यदि भारत के भविष्य को बदलना है तो भावी पीढ़ी पर ध्यान देना ही होगा, उन्हें अपनी संस्कृति एवं मूल्यों से जोड़ना होगा।’’ महात्मा गांधी के अनुसार सर्वांगीण विकास का तात्पर्य है- आत्मा, मस्तिष्क, वाणी और कर्म-इन सबके विकास में संतुलन बना रहे। स्वामी विवेकानंद के अनुसार सर्वांगीण विकास का अर्थ है- हृदय से विशाल, मन से उच्च और कर्म से महान। भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास हेतु शिक्षक एवं गुरु आचार, संस्कार, व्यवहार और विचार- इन सबका परिमार्जन एवं विकास करने का प्रयत्न करते रहते थे।
बाल एवं युवा छात्रों में ढेरांे क्षमताएँ तथा ऊर्जा होती हैं। इसे सही दिशा की ओर मोड़ने की आवश्यकता है ताकि उनकी क्षमताओं का दुरूपयोग न हो। अतः आज बालक केे सामाजिक, राष्ट्रीय एवं आध्यात्मिक गुणों को बाल्यावस्था से ही विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है जितना उसको पुस्तकीय ज्ञान देना। इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य प्र्रत्येक बालक को भौतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा आध्यात्मिक चारों प्रकार की उद्देश्यपूर्ण शिक्षा देकर उसे संतुलित, चरित्रसम्पन्न और पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बनाना होना चाहिए। भारत के मिसाइल मैन, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा है कि अगर कोई देश भ्रष्टाचार मुक्त है और सुंदर दिमाग का राष्ट्र बन गया है, तो मुझे दृढ़ता से लगता है कि उसके लिये तीन प्रमुख सामाजिक सदस्य हैं वे पिता, माता और शिक्षक हैं।” डाॅ. कलाम की यह शानदार उक्ति प्रत्येक व्यक्ति के दिमाग में आज भी गूंज रही हैं। शिक्षण इस दुनिया में सबसे प्रेरक काम और एक बड़ी जिम्मेदारी है। शिक्षक ज्ञान का भंडार हैं जो अपने शिष्यों को अपना ज्ञान देने में विश्वास करते हैं जिससे उनके शिष्य भविष्य में दुनिया को बेहतर बनाने में सहायता कर सकेंगे। इससे ऐसी पीढ़ी निर्मित होगी जो उज्ज्वल और बुद्धिमान हो तथा वह जो दुनिया को उसी तरीके से समझे जैसी यह है और जो भावनाओं से नहीं बल्कि तर्क और तथ्यों से प्रेरित हो। डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, शिक्षक देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसी वजह से वे अधिक सम्मान के योग्य होते हैं।’ विद्या भारती की शिक्षा एवं नयी शिक्षा नीति में ऐसी संभावनाएं है कि देश एवं दुनिया के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका अधिक प्रभावी बनकर प्रस्तुत होगी। अब शिक्षा से मानव को योग्य, राष्ट्र-निर्माता एवं चरित्रवान बनाने का वास्तविक लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अब शिक्षक एवं शिक्षा-नीति एक क्रांतिकारी बदलाव की ओर अग्रसर हुई है।
हिंसा और अपराधों की वृद्धि में शिक्षा प्रणाली एवं शिक्षक भी अपूर्णता एक सीमा तक जिम्मेदार है। अशिक्षित और मूर्ख की अपेक्षा शिक्षित और बुद्धिमान अधिक अपराध करते रहे हैं। मानव ने ज्ञान-विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परन्तु अपने और औरों के जीवन के प्रति सम्मान में कमी आई है। विचार-क्रान्तियां बहुत हुईं, किन्तु आचार-स्तर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन कम हुए। शान्ति, अहिंसा और मानवाधिकारों की बातें संसार में बहुत हो रही हैं, किन्तु सम्यक्-आचरण का अभाव अखरता है। अब नयी शिक्षा नीति से सम्यक् चरित्र, सम्यक् सोच एवं सम्यक् आचरण का प्रादुर्भाव होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव डा0 कोफी अन्नान ने कहा था कि ‘‘मानव इतिहास में बीसवीं सदी सबसे खूनी तथा हिंसक सदी रही है।’’ बीसवीं सदी में विश्व में दो विश्व महायुद्धों, हिरोशिमा तथा नागाशाकी पर दो परमाणु बमांे का हमला तथा अनेक युद्धों की विनाश लीला के ताण्डवों को देखा है, जिसके लिए सबसे अधिक दोषी हमारी शिक्षा है। विश्व के सभी देशों के स्कूल अपने-अपने देश के बच्चों को अपने देश से प्रेम करने की शिक्षा तो देते हैं लेकिन शिक्षा के द्वारा सारे विश्व से प्रेम करना नहीं सिखाते हैं। भारत ही ऐसा देश है जो वसुधैव कुटुम्बकम की शिक्षा देता, यदि विश्व सुरक्षित रहेगा तभी देश सुरक्षित रहेंगे।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नेल्सन मंडेला ने कहा था कि ‘‘संसार में शिक्षा ही सबसे शक्तिशाली हथियार है जो दुनिया को बदल सकती है।’’ युद्ध के विचार मानव मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के विचार ग्रहण करने की सबसे श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। मानव मस्तिष्क में शान्ति, अहिंसा, सह-अस्तित्व के विचार बचपन से ही डालना होगा। इक्कीसवीं सदी की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को सारे विश्व से प्रेम करने के विश्वव्यापी दृष्टिकोण को विकसित करें। ग्लोबल विलेज के युग में सारे विश्व की एक जैसी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए। विश्व एकता की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ‘सा विद्या या विमुक्तये’, यह भारतीय शिक्षा जगत का प्रमुख सुभाषित है, जो दुनिया के लिये भी आदर्श है। इस सुभाषित के अनुसार सच्ची शिक्षा वह है जो विद्यार्थी को नकारात्मक भावों और प्रवृत्तियों के बंधनों से मुक्ति प्रदान करें। पर ंिचंता का विषय बना रहा कि भारत के शिक्षक ही आज इसकी उपेक्षा करते रहे हैं। अब नयी शिक्षा नीति में शिक्षक के लिये शिक्षा एक मिशन होगा, स्वदेशी, सार्थक, मानवतावादी और मूल्य आधारित शिक्षा के माध्यम से उन्नत पीढ़ी का निर्माण होगा। अब भारत की नयी शिक्षा नीति में शिक्षक का चरित्र एवं साख दुनिया के लिये प्रेरक एवं अनुकरणीय बनकर प्रस्तुत होगा, जिसमें भारतीय संस्कारों एवं संस्कृति का समावेश दिखाई देगा। अतः विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर विश्व के सभी शिक्षकों को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे संसार के प्रत्येक बच्चे को संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्रदान करके सारे विश्व में आध्यात्मिक, अहिंसक एवं शांतिपूर्ण सभ्यता की स्थापना करेंगे।
प्रेषकः

 

 (ललित गर्ग)
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खुद से युद्ध की प्रेरणा देने वाले अहिंसक गांधी

खुद से युद्ध की प्रेरणा देने वाले अहिंसक गांधी

02-Oct-2021

गांधी जयन्ती-2 अक्टूबर 2021 पर विशेष
खुद से युद्ध की प्रेरणा देने वाले अहिंसक गांधी

-ललित गर्ग -

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन 2 अक्टूबर अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। गांधी की अहिंसा ने भारत को गौरवान्वित किया है, भारत ही नहीं, दुनियाभर में अब उनकी जयन्ती को बड़े पैमाने पर अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। गांधी के अनुयायियों एवं उनमें आस्था रखने वाले उन तमाम लोगों को इससे हार्दिक प्रसन्नता हुई है जो बापू के सिद्वान्तों से गहरे रूप में प्रभावित हैं, अहिंसा के प्रचार-प्रसार में निरन्तर प्रयत्नशील हैं। यह बापू की अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता का  बड़ा प्रमाण है। यह एक तरह से गांधीजी को दुनिया की एक विनम्र श्रद्वांजलि है। यह अहिंसा के प्रति समूची दुनिया की स्वीकृति भी कही जा सकती है। पडोसी देश पाकिस्तान को भी अहिंसा की प्रासंगिकता और ताकत को समझते हुए आतंकवाद को प्रोत्साहन देना बन्द करना चाहिए।
आज विज्ञान ने भौगोलिक दूरी पर विजय प्राप्त की है। सारा संसार एक गंेद के समान छोटा हो गया है, पर दूसरी ओर भाई-भाई में मानसिक खाई चौड़ी होती जा रही है। इस विरोधाभास के कारण पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और  अन्तर्राष्ट्रीय जीवन में बिखराव और तनाव बढ़ रहा है। यदि अहिंसा, शांति और समता की व्यापक प्रतिष्ठा नहीं होगी तो भौतिक सुख-साधनों का विस्तार होने पर भी मानव शांति की नींद नहीं सोे सकेगा। अध्यात्म के आचार्यों ने हिंसा और युद्ध की मनोवृत्ति को बदलने के लिए मनोवैज्ञानिक भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने कहा है- युद्ध करना परम धर्म है, पर सच्चा योद्धा वह है, जो दूसरों से नहीं स्वयं से युद्ध करता है, अपने विकारों और आवेगों पर विजय प्राप्त करता है। जो इस सत्य को आत्मसात कर लेता है, उसके जीवन की सारी दिशाएं बदल जाती हैं। वह अपनी शक्तियों का उपयोग स्व-पर कल्याण के लिए करता है। जबकि एक हिंसक अपनी बुद्धि और शक्ति का उपयोग विनाश और विध्वंस के लिए करता है। पडौसी देश को अपनी अवाम के बारे में सोचना चाहिए। शायद वह कभी भी हिंसा एवं युद्ध नहीं चाहती है।
हमारे लिये यह सन्तोष का विषय इसलिये हैे कि अहिंसा का जो प्रयोग भारत की भूमि से शुरू हुआ उसे संसार की सर्वोच्च संस्था ने जीवन के एक मूलभूत सूत्र के रूप में मान्यता दी। हम देशवासियों के लिये अपूर्व प्रसन्नता की बात है कि गांधी की प्रासंगिकता चमत्कारिक ढंग से बढ़ रही है। दुनिया उन्हें नए सिरे से खोज रही है। उनको खोजने का अर्थ है अपनी समस्याओं के समाधान खोजना, हिंसा एवं आतंकवाद की बढ़ती समस्या का समाधान खोजना। शायद इसीलिये कई विश्वविद्यालयों में उनके विचारों को पढ़ाया जा रहा है, उन पर शोध हो रहे हैं। आज भी भारत के लोग गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए अहिंसा का समर्थन करते है। पडौसी देश के साथ भी लगातार अहिंसा से पेश आते रहे हैं, लेकिन उन्होंने हमारी अहिंसा को कायरता समझने की भूल की है।
गांधीजी आज संसार के सबसे लोकप्रिय भारतीय बन गये हैं, जिन्हें कोई हैरत से देख रहा है तो कोई कौतुक से। इन स्थितियों के बावजूद उनका विरोध भी जारी है। उनके व्यक्तित्व के कई अनजान और अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हुए उन्हें पतित साबित करने के भी लगातार प्रयास होते रहे हैं, लेकिन वे हर बार ज्यादा निखर कर सामने आए हैं, उनके सिद्धान्तों की चमक और भी बढ़ी है। वैसे यह लम्बे शोध का विषय है कि आज जब हिंसा और शस्त्र की ताकत बढ़ रही है, बड़ी शक्तियां हिंसा को तीक्ष्ण बनाने पर तुली हुई हैं, उस समय अहिंसा की ताकत को भी स्वीकारा जा रहा है। यह बात भी थोड़ी अजीब सी लगती है कि पूंजी केन्द्रित विकास के इस तूफान में एक ऐसा शख्स हमें क्यों महत्वपूर्ण लगता है जो आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की वकालत करता रहा, जो छोटी पूंजी या लघु उत्पादन प्रणाली की बात करता रहा। सवाल यह भी उठता है कि मनुष्यता के पतन की बड़ी-बड़ी दास्तानों के बीच आदमी के हृदय परिवर्तन के प्रति विश्वास का क्या मतलब है? जब हथियार ही व्यवस्थाओं के नियामक बन गये हों तब अहिंसा की आवाज कितना असर डाल पाएगी? एक वैकल्पिक व्यवस्था और जीवन की तलाश में सक्रिय लोगों को गांधीवाद से ज्यादा मदद मिल रही है।
आज जबकि समूची दुनिया में संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं, हर कोई विकास की दौड़ में स्वयं को शामिल करने के लिये लड़ने की मुद्रा में है, कहीं सम्प्रदाय के नाम पर तो कहीं जातीयता के नाम पर, कहीं अधिकारों के नाम पर तो कहीं भाषा के नाम पर संघर्ष हो रहे हैं, ऐसे जटिल दौर में भी संघर्षरत लोगों के लिये गांधी का सत्याग्रह ही सबसे माकूल हथियार नजर आ रहा है। पर्यावरणवादी हों या अपने विस्थापन के विरुद्ध लड़ रहे लोग, सबको गांधीजी से ही रोशनी मिल रही है। क्योंकि अहिंसा ही एक ऐसा शस्त्र है जिसमें तमाम तरह की समस्याओं के समाधान निहित हैं। भारत की भूमि से यह स्वर लगातार उठता रहा है कि दुनिया की नई-नई उभरने वाली समस्याओं के समाधान भारत के पास हैं। ऐसा इसलिये भी कहा जाता रहा है क्योंकि भारत के पास महावीर, बुद्ध, गांधी जैसे महापुरुषों की एक समृद्ध विरासत है।
भगवान महावीर कितना सरल किन्तु सटीक कहते हैं- सुख सबको प्रिय है, दुःख अप्रिय। सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। हम जैसा व्यवहार स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। यही मानवता है और मानवता का आधार भी। मानवता बचाने में है, मारने में नहीं। किसी भी मानव, पशु-पक्षी या प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना स्पष्टतः अमानवीय है, क्रूरतापूर्ण है। हिंसा-हत्या और खून-खच्चर का मानवीय मूल्यों से कभी कोई सरोकार नहीं हो सकता। मूल्यों का सम्बन्ध तो ‘जियो और जीने दो’ जैसे सरल श्रेष्ठ उद्घोष से है।
सह-अस्तित्व के लिए अहिंसा अनिवार्य है। दूसरों का अस्तित्व मिटाकर अपना अस्तित्व बचाए रखने की कोशिशें व्यर्थ और अन्ततः घातक होती हैं। आचार्य श्री उमास्वाति की प्रसिद्ध सूक्ति है- ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ अर्थात् सभी एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं। पारस्परिक उपकार-अनुग्रह से ही जीवन गतिमान रहता है। समाज और सामाजिकता का विकास भी अहिंसा की इसी अवधारणा पर हुआ। इस प्रकार अहिंसा से सहयोग, सहकार, सहकारिता, समता और समन्वय जैसे उत्तम व उपयोगी मानवीय मूल्य जीवन्त होते हैं। केन्द्र से परिधि तक परिव्याप्त अहिंसा व्यक्ति से लेकर विश्व तक को आनन्द और अमृत प्रदान करती है। दुनिया में मानवीय-मूल्यों का ह्रास हो, मानवाधिकारों का हनन हो या अन्य समस्याएं-एक शब्द में ‘हिंसा’ प्रमुखतम और मूलभूत समस्या है अथवा समस्याओं का कारण है। और समस्त समस्याओं का समाधान भी एक ही है, वह है-अहिंसा। अहिंसा व्यक्ति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विराट भावना का संचार करती है। मनुष्य जाति युद्ध, हिंसा और आतंकवाद के भयंकर दुष्परिणाम भोग चुकी है, भोग रही है और किसी भी तरह के खतरे का भय हमेशा बना हुआ है। मनुष्य, मनुष्यता और दुनिया को बचाने के लिए अहिंसा से बढ़कर कोई उपाय-आश्रय नहीं हो सकता। इस दृष्टि से अहिंसा दिवस सम्पूर्ण विश्व को अहिंसा की ताकत और प्रासंगिकता से अवगत कराने का सशक्त माध्यम है।
यह स्पष्ट है कि हिंसा मनुष्यता के भव्य प्रासाद को नींव  से हिला देती है। मनुष्य जब दूसरे को मारता है तो स्वयं को ही मारता है, स्वयं की श्रेष्ठताओं को समाप्त करता है। एक हिंसा, हिंसा के अन्तहीन दुष्चक्र को गतिमान करती है। अहिंसा सबको अभय प्रदान करती है। वह सर्जनात्मक और समृद्धदायिनी है। मानवता का जन्म अहिंसा के गर्भ से हुआ। सारे मानवीय-मूल्य अहिंसा की आबोहवा में पल्लवित, विकसित होते हैं एवं जिन्दा रहते हैं। वस्तुतः अहिंसा मनुष्यता की प्राण-वायु ऑक्सीजन है। प्रकृति, पर्यावरण पृथ्वी, पानी और प्राणिमात्र की रक्षा करने वाली अहिंसा ही है।
मानव ने ज्ञान-विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परन्तु अपने और औरों के जीवन के प्रति सम्मान में कमी आई है। विचार-क्रान्तियां बहुत हुईं, किन्तु आचार-स्तर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन कम हुए। शान्ति, अहिंसा और मानवाधिकारों की बातें संसार में बहुत हो रही हैं, किन्तु सम्यक्-आचरण का अभाव अखरता है। गांधीजी ने इन स्थितियों को गहराई से समझा और अहिंसा को अपने जीवन का मूल सूत्र बनाया। आज यदि विश्व 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है, तो इसमें कोई अचंभे वाली बात नहीं है। यह गांधीजी का नहीं बल्कि अहिंसा का सम्मान है।


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(ललित गर्ग)
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आत्महत्या की धमकी देकर युवती को घर बुलाकर किया दुष्कर्म बनाया अश्लील विडिओ

आत्महत्या की धमकी देकर युवती को घर बुलाकर किया दुष्कर्म बनाया अश्लील विडिओ

01-Oct-2021

आत्महत्या की धमकी देकर युवती को घर बुलाकर किया दुष्कर्म बनाया अश्लील विडिओ 

ये घटना है मध्यप्रदेश के ग्वालियर की यहां एक युवक ने शातिराना अंदाज़ में आत्महत्या की धमकी देकर युवती को घर आने पर मज़बूर किया और बुला कर  उसका बलात्कार किया। बॉयफ्रेंड ने उसका अश्लील वीडियो भी बना लिया। लड़की ने आरोप लगाया कि उसने शादी का वादा उससे किया, लेकिन शादी कहीं और कर ली। जब लड़की की शादी तय हुई तो आरोपी ने उसके होने वाले पति को मोबाइल पर अश्लील वीडियो भेज दिया। अब लड़की का रिश्ता टूटने की स्थिति बन गई है। इससे तंग आकर लड़की ने हजीरा थाना पहुंचकर दुष्कर्म और ब्लैकमेलिंग की FIR दर्ज कराई है।
 
जानकारी के मुताबिक, भिंड जिले के गोहद की रहने वाली 20 साल की छात्रा ने हजीरा थाने में FIR कराई है। छात्रा के मुताबिक उनका एक घर ग्वालियर के गदाईपुरा में भी है। 2 साल पहले कोचिंग में पढ़ाई के दौरान शुभेंद से उसकी दोस्ती हो गई थी। ये दोस्ती प्यार में बदल गई। शुभेंद ने उससे शादी का वादा किया। दोनों एक ही समाज के हैं, इसलिए शादी में कोई अड़चन भी नहीं थी। लड़की शुभेंद के साथ घूमने भी जाती थी। छात्रा ने बताया कि साल 2020 में 22 नवंबर को शुभेंद ने उसे फोन कर तबीयत खराब होने की बात कही और दवा देने के बहाने मिलने बुलाया।
 
छात्रा ने बताया कि 22 नवंबर को जब शुभेंद ने उसे मिलने बुलाया तो उसने साफ मना कर दिया था। इस पर शुभेंद ने कहा कि वह नहीं आई तो फांसी लगाकर खुदकुशी कर लेगा। ये सुनकर छत्रा घबराकर शुभेंद के घर पहुंच गई। शुभेंद ने शादी का झांसा देकर छात्रा के साथ दुष्कर्म किया और अश्लील वीडियो बना लिया। छात्रा ने बताया कि शुभेंद ने उससे जल्द शादी का भरोसा दिया, लेकिन इस साल 30 अप्रैल शुभेंद ने दूसरी लड़की से शादी कर ली। इसके बाद उसने बात करना बंद कर दिया, लेकिन वह वीडियो वायरल करने की धमकी देकर मुझे ब्लैकमेल करने लगा। हजीरा पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। लड़की ने पुलिस को बताया कि आरोपी की शादी होने के बाद सबकुछ भुला दिया गया था। जिंदगी की नई शुरुआत करनी थी। इसलिए कहीं और शादी करने का मन बनाया। जब शादी तय हो गई तो लड़के ने होने वाले पति को उसका अश्लील वीडियो भेज दिया। इससे अब शादी टूटने की नौबत आ गई है। इससे घर में बवाल मचा हुआ है।


भारत को शक्तिशाली बनाने का शिक्षा अभियान

भारत को शक्तिशाली बनाने का शिक्षा अभियान

01-Oct-2021

भारत को शक्तिशाली बनाने का शिक्षा अभियान
ललित गर्ग 

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भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिलाने में प्राचीन शिक्षा ही मुख्य आधार थी, उसी विश्वगुरु भारत ने दीर्घकाल काल तक चले संघर्ष एवं चरित्र एवं नैतिक बल के कमजोर होने के फलस्वरूप अपना गुरुत्व खो दिया। अपना गुरुत्व खो देने से भारत कमजोर हुआ। एक षडयंत्र के तहत अंग्रेजों ने भारत की सशक्त प्राचीन शिक्षा प्रणाली को कमजोर किया। इसके श्रेष्ठ वेद ज्ञान को गड़रियों के गीत अर्थात् मिथक घोषित कर शिक्षा की मूल धारा को बाधित किया। आजादी के संघर्ष के दौरान स्वदेश प्रेमियों ने इस बात को गहराई से समझ लिया था, लेकिन आजादी के बाद बनी सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली को ही अपना लिया, जो भारतीयता के संस्कार मिटाकर पाश्चात्य संस्कारों एवं सोच को भरती रही है, जो देश के लिए घातक बनी।
अंग्रेजी शिक्षा के विरोधस्वरूप सबसे पहले रवीन्द्रनाथ ठाकुर उनके बाद महर्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानंद, भगिनी निवेदिता, स्वामी दयानंद सरस्वती, लाल-बाल-पाल तथा गांधीजी ने राष्ट्रीय शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। ऐसे ही समय में हिन्दू विचारधारा के अनुरूप विद्या भारती के रूप में प्राचीन एवं आधुनिक शिक्षा का एक समग्र एवं समन्वित अभियान प्रारंभ हुआ। जब आजाद भारत में भी अभारतीय शिक्षा ही दी जाती रही, तब विद्या भारती ने शिक्षा क्षेत्र में भारतीय मूल्यों की शिक्षा के अभियान का शंखनाद किया। सन् 1952 में विद्या भारती योजना का पहला सरस्वती शिशु मंदिर, गोरखपुर में प्रारम्भ हुआ। आज तो विद्या भारती के लगभग 25 हजार शिक्षा केन्द्र चल रहे हैं, जिनमें व्यक्ति निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण की शिक्षा दी जा रही है। नये भारत के निर्माण और जन चेतना को सर्वांग एवं सशक्त बनाने में शिक्षा क्रांति के अवदान विद्या भारती की जो भूमिका है, उसके समुचित परिचय और पहचान की सामथ्र्य न तो शब्दों में ही है, न किसी माध्यम में। राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय शिक्षा का यह अभियान न केवल विलक्षण, अद्भुत, चमत्कारी बल्कि विशाल है।
विद्या भारती जिसका पूरा नाम विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान है। इस संस्थान ने अपने नाम को सार्थक किया है। उत्तर में लेह से लेकर, दक्षिण के रामेश्वरम तक तथा पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा से लगे मुनाबाव से लेकर पूर्वोत्तर में हाफलांग तक विद्या भारती के विद्या मंदिर हैं। बड़े-बड़े महानगरों की समृद्ध कालोनियों से लेकर गिरिकन्दराओं में बसी छोटी-छोटी बस्तियों तक विद्या भारती के शिक्षा केन्द्र राष्ट्र निर्माण के इस महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए है। विद्या भारती ने संगठनात्मक दृष्टि से पूरे देश को ग्यारह क्षेत्रों में बाटा हुआ है। प्रत्येक क्षेत्र में एक क्षेत्रीय समिति है, जिसके निर्देशन में प्रान्तीय समितियां अपने-अपने प्रान्त के कार्यों की देखभाल करती है। इन प्रान्तीय समितियों के अन्तर्गत जिला समिति एवं विद्यालय समिति प्रत्यक्ष कार्य करती है। ये सभी ग्यारह समितियां केन्द्रीय समिति के मार्गदर्शन में कार्य करती है। केन्द्रीय समिति का प्रधान कार्यालय देश की राजधानी दिल्ली में है। देश में कुल जिले 711, इनमें कार्ययुक्त जिले 632 है। कुल औपचारिक विद्यालय 12,830, कुल अनौपचारिक केन्द्र 11,353, कुल शैक्षिक इकाइयां 24,183, देशभर में अध्ययनरत छात्रों की संख्या 34 लाख 47 हजार 856, कुल आचार्य 1.5 लाख हैं। इस सांख्यिकी के आधार पर कहा जा सकता है कि गैर सरकारी स्तर पर विद्या भारती देश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षा संस्थान है। विद्या भारती गैरसरकारी होते हुए भी सर्वाधिक असरकारी शिक्षा संस्थान भी है।
किसी भी समाज और राष्ट्र के विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा ही वह सेतु है, जो व्यक्ति-चेतना और समूह चेतना को राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से अनुप्राणित करती है। भारत के सामने जो समस्याएं सिर उठाए खड़ी हैं, उनमें पाश्चात्य पैटर्न पर दी जाने वाली मूल्यहीन शिक्षानीति एक ज्वलंत कारण रही है। शिक्षा ही जब मूल्यहीन हो जाए, तो देश में मूल्यों की संस्कृति कैसे फलेगी? वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य जीवन को उन्नत बनाना नहीं, अपितु आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाना हो गया है। विद्या भारती का मंतव्य है- ‘‘यदि भारत के भविष्य को बदलना है तो भावी पीढ़ी पर ध्यान देना ही होगा, उन्हें अपनी संस्कृति एवं मूल्यों से जोड़ना होगा।’’ आचार्य विनोबा भावे ने अंग्रेजी शिक्षा के स्थान पर भारतीय मूल्यों के अनुरूप शिक्षा देने की आवश्यकता को महसूस किया, लेकिन उनके सुझाव एवं विचारों को अनसूना किया गया। इतना ही नहीं देश की शिक्षा उन लोगों के हाथों में सौंपी जो अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त थे।
प्राचीनकाल में गुरुकुल में 24 घंटे शिक्षा चलती थी। हर समय गुरु के समक्ष रहने से विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास हो जाता था, लेकिन वर्तमान में मजदूरी, साक्षरता और आजीविका के तौर पर प्राप्त शिक्षा से जीवन पुष्ट और समर्थ नहीं बन रहा है। विद्या भारती की शिक्षा की आवश्यकता का कारण बना कि ‘‘वर्तमान की शिक्षा में जीविका के पहाड़े तो पढ़ाए जा रहे हैं, पर जीवन के पहाड़े नहीं पढ़ाए जाते। केवल जीविका की बात जुड़ने से समग्र व्यक्तित्व का निर्माण नहीं हो सकता।’’ अंग्रेजी भाषा पर बल दिया जाता है, स्वभाषाओं की उपेक्षा होती है। इन विसंगतियों का दूर करने के लिये अनेक आयोग गठिन होने पर भी देश की शिक्षण-पद्धति कार्यकारी सिद्ध नहीं हो सकी। इस स्थिति में विद्या भारती ने शिक्षा की कमियों को पूरा करने का बीड़ा उठाया। केवल पुस्तकीय शिक्षा से विद्यार्थियों के व्यक्तितव का निर्माण नहीं होता, उनके जीवन में चरित्र की शिक्षा देना भी अनिवार्य है। यदि प्रारंभ से विद्यार्थियों को अच्छे संस्कार दिये जाएं, मूल्यपरक शिक्षा से उनका मानस अनुप्राणित किया जाए तो वे देश के लिए श्रंृगार, हार और उपहार बन सकते हैं। समुचित प्रशिक्षण के अभाव में वे अशांति, उपद्रव और हिंसक प्रवृत्तियों में भाग लेकर अपने जीवन को विनाश के गर्त में भी डाल सकते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों के सर्वांगीण व्यक्तित्व-निर्माण के लिए विद्या भारती का प्रकल्प एक वरदान है। इसमें केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, अपितु प्रयोग के माध्यम से संतुलित और सर्वांगीण व्यक्तित्व-निर्माण की बात है। इस पद्धति से शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक विकास संभव है। विद्या भारती इस प्रकार की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास करना चाहती है, जिसके द्वारा ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो सके जो हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हो, शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण विकसित हो तथा जो जीवन की वर्तमान चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सके और उसका जीवन ग्रामों, वनों, गिरिकन्दराओं एवं झुग्गी-झोपडियों में निवास करने वाले दीन-दुखी, अभावग्रस्त अपने बान्धवों को सामाजिक कुरीतियों, शोषण एवं अन्याय से मुक्त कराकर राष्ट्र जीवन को समरस, सुसम्पन्न, एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए समर्पित हो। विद्या भारती के चार आयाम हैं- देश की विद्वत् शक्ति को इस ज्ञान यज्ञ में आहुति देने के लिए विद्वत परिषद है। शिक्षा में क्रिया शोध कर उसे और अधिक उपयोगी बनाने के लिए शोध विभाग है। भारतीय संस्कृति मय जीवन बनाने हेतु संस्कृति बोध परियोजना है और अपने पूर्व छात्रों में दिए गए संस्कार अमिट रहें, इसके लिए पूर्व छात्र परिषद है। अत्यन्त हर्ष का विषय है कि विद्या भारती के पूर्व छात्र परिषद ने अपने पोर्टल में आठ लाख से अधिक पूर्व छात्रों को जोड़ा है, जो विश्व कीर्तिमान बना है।
‘सा विद्या या विमुक्तये’ इस उक्ति को सार्थक करने की योग्यता विद्या भारती की शिक्षा में निहित है। यहां विद्यार्थी को शिक्षा केवल परीक्षा उत्तीर्ण कर अधिक अंक लाने के लिए नहीं दी जाती, बल्कि जीवन की चुनौतियों का डटकर मुकाबला करते हुए परिपक्व नागरिक बन राष्ट्र निर्माण करने के लिए तथा सम्पूर्ण मानवता के लिए जीवन खपाने हेतु दी जाती है। ऐसा जीवन केवल पुस्तकें पढ़ने से नहीं बनता अपितु क्रिया, अनुभव, विचार, विवेक तथा दायित्व बोध आधारित शिक्षा देने से बनता है। यही भारतीय शिक्षा है, इसी शिक्षा से योग्य, चरित्रसम्पन्न एवं निष्ठावान नागरिक निर्माण होते हैं, यह विद्या भारती का अनुभूत मत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिक्षा की इस अपेक्षा का महसूस करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 घोषित की है। इस प्रकार विद्या भारती देश में भारतीय शिक्षा की पुनप्र्रतिष्ठा करने के कार्य में अग्रसर है। इसी से भारत आत्मनिर्भर तो होगा ही, अपनी ज्ञान विरासत के बल पर पुनः एक बार विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर हो सकेगा।
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(ललित गर्ग)
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एक ब्रेन डेड हिंदू महिला का दिल मुंबई के डॉक्टरों ने एक मुस्लिम व्यक्ति को ट्रांसप्लांट किया दी मानवता की एक आदर्श मिसाल

एक ब्रेन डेड हिंदू महिला का दिल मुंबई के डॉक्टरों ने एक मुस्लिम व्यक्ति को ट्रांसप्लांट किया दी मानवता की एक आदर्श मिसाल

30-Sep-2021

धार्मिक सद्भाव और मानवता की एक आदर्श मिसाल कायम करते हुए, एक ब्रेन डेड हिंदू महिला का दिल मुंबई के एक निजी अस्पताल में एक मुस्लिम व्यक्ति को ट्रांसप्लांट किया गया। उसके गुर्दे, यकृत, अग्न्याशय और फेफड़े भी छह अलग-अलग व्यक्तियों को दान किए गए थे।

 

41 वर्षीय महिला को ब्रेन हैमरेज होने के बाद छह सितंबर को परेल के ग्लोबल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसे 12 सितंबर को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था।

जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन कमेटी (ZTCC) के अनुसार, उसके परिवार ने जब सलाह दी, तो उसके लीवर, किडनी, हृदय, फेफड़े और अग्न्याशय को दान करने की अनुमति दी।


ग्रीन कॉरिडोर का उपयोग करते हुए, फेफड़ों को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में ले जाया गया, और एक किडनी परेल के केईएम अस्पताल में अंतिम चरण के रोगी के पास गई। बाकी अंगों को ग्लोबल हॉस्पिटल में मरीजों को डोनेट किया गया।

ग्लोबल हॉस्पिटल ने अपनी तरह की पहली उन्नत इम्यूनोडायग्नोस्टिक तकनीक का उपयोग करके मुंबई में एक दर्जी के रूप में काम करने वाले 31 वर्षीय व्यक्ति का हृदय प्रत्यारोपण किया।

फरीद फनसोपकर गंभीर एलवी (लेफ्ट वेंट्रिकुलर) डिसफंक्शन के साथ डीसीएम (डिलेटेड कार्डियोमायोपैथी) से पीड़ित थे। फनसोपकर का एंटीबॉडी की पहचान के साथ-साथ तीन महीने से प्री-ट्रांसप्लांट और एंटीबॉडी स्क्रीनिंग की जा रही थी।

“एक युवा दाता, कम इस्किमिया समय (दाता के अंत में दिल के रुकने के बीच का समय प्राप्तकर्ता की तरफ से दिल की शुरुआत), उन्नत एचएलए और फ्लो साइटोमेट्री क्रॉस मैच और अच्छी नर्सिंग देखभाल के परिणामस्वरूप उत्कृष्ट नैदानिक ​​​​परिणाम मिले। फरीद की पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी बहुत सुचारू थी। इम्युनोसुप्रेशन शासन, द्रव संतुलन, एंटीबायोटिक्स और अन्य प्रोटोकॉल से, “ग्लोबल अस्पताल के प्रमुख हृदय प्रत्यारोपण सर्जन प्रवीण कुलकर्णी ने एक बयान में कहा।

डॉक्टर ने कहा कि फनसोपकर को ऑपरेशन के चौथे दिन सक्रिय किया गया था और नौवें पोस्टऑपरेटिव दिन पर छुट्टी दे दी गई थी, जो आम तौर पर हृदय प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं के मामले में 21 से 30 दिनों के बाद होता है।

“मैं दाता परिवार का बहुत आभारी हूं क्योंकि उनके बिना यह कभी संभव नहीं होता। मैं सभी से आग्रह करता हूं कि अंगदान को बढ़ावा दें, ताकि कई लोगों को नया जीवन मिल सके और अपने प्रियजनों को इतने सारे जीवन में जीवित रखा जा सके, ”फानसोपकर की मां जेहरुनिसा ने कहा।

 

स्वर-माधुर्य की साम्राज्ञी हैं लता मंगेशकर

स्वर-माधुर्य की साम्राज्ञी हैं लता मंगेशकर

27-Sep-2021

लता मंगेशकर के 92वें जन्म दिन, 28 सितम्बर 2021 पर विशेष
स्वर-माधुर्य की साम्राज्ञी हैं लता मंगेशकर
- ललित गर्ग-

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लता मंगेशकर 28 सितम्बर 2021 को 92 वर्ष की हो रही है। गायन के क्षेत्र में अब वे एक मिथक बन चुकी हैं। उनकी आवाज दुनिया के किसी हिस्से के भूगोल में कैद न होकर ब्रह्माण्डव्यापी बन चुकी हैं। उन्हें संगीत की दुनिया में सरस्वती का अवतार माना जाता है। हम कह सकते हैं कि हमारे पास एक चांद है, एक सूरज है तो एक लता मंगेशकर भी है। सचमुच अद्भुत, अकल्पित, आश्चर्यकारी है उनका रचना, स्वर एवं संगीत संसार। इसे चमत्कार नहीं माना जा सकता, इसे आवाज का कोई जादू भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यह हूनर, शोहरत एवं प्रसिद्धि एक लगातार संघर्ष एवं साधना की निष्पत्ति है। एक लंबी यात्रा है संघर्ष से सफलता की, नन्हीं लता से भारतरत्न स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर बनने तक की। संगीत की उच्चतम परंपराओं, संस्कारों एवं मूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान् व्यक्तित्व है-लता मंगेशकर।
लता मंगेशकर एक महान जीवन की अमर गाथा है। उनका जीवन अथाह ऊर्जा से संचालित एवं स्वप्रकाशी है। वह एक ऐसा प्रकाशपुंज है, जिससे निकलने वाली एक-एक रश्मि का संस्पर्श जड़ में चेतना का संचार कर सकता है। वो ब्रह्म है। कोई उससे बड़ा नहीं। वो प्रथम सत्य है और वही अंतिम सत्ता भी। वो स्वर है, ईश्वर है, यह केवल संगीत की किताबों में लिखी जाने वाली उक्ति नहीं, यह संगीत का सार है और इसी संगीत एवं स्वर-माधुर्य की साम्राज्ञी है लता मंगेशकर। गीत, संगीत, गायन और आवाज की जादूगरी की जब भी चर्चा होती है, सहज और बरबस ही एक नाम लोगों के होठों पर आ जाता है- लता मंगेशकर।
लताजी का जन्म 28 सितंबर, 1929 इंदौर, मध्यप्रदेश में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमंचीय गायक थे। लता का पहला नाम ‘हेमा’ था, मगर जन्म के 5 साल बाद माता-पिता ने इनका नाम ‘लता’ रख दिया था और इस समय दीनानाथजी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय एवं विलक्षण क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। लेकिन पांच वर्ष की छोटी आयु में ही आपको पहली बार एक नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला। शुरुआत अवश्य अभिनय से हुई किंतु आपकी दिलचस्पी तो संगीत में ही थी। इस शुभ्रवसना सरस्वती के विग्रह में एक दृढ़ निश्चयी, गहन अध्यवसायी, पुरुषार्थी और संवेदनशील संगीत-साधिका-आत्मा निवास करती है। उनकी संगीता-साधना, वैचारिक उदात्तता, ज्ञान की अगाधता, आत्मा की पवित्रता, सृजन-धर्मिता, अप्रमत्तता और विनम्रता उन्हें विशिष्ट श्रेणी में स्थापित करती है।
लताजी के पूर्वजों का पुण्य प्रबल था और उसी पुण्य की बदौलत बचपन के संघर्षपूर्ण हालातों में किसी सज्जन व्यक्ति की प्रेरणा से मास्टर विनायक की ‘प्रफुल्ल पिक्चर्स’ संस्था में लता को प्रवेश मिल गया। उस संस्था ने ‘राजाभाऊ’, ‘पहली मंगल गौर’ ‘चिमुक संसार’ जैसे मराठी चित्रों में छोटी-छोटी भूमिकाएं मिलीं, जिन्हें लताजी ने बड़ी खूबी से निभाया। लताजी का लक्ष्य अभिनय की दुनिया नहीं था, वे संगीत की दुनिया में जाना चाहती थी। सौभाग्य से उन्हें पितृतुल्य संरक्षण और स्नेह देनेवाले गुरु खां साहब अमान अली मिल गए। उन्होंने डेढ़ साल तक लताजी को तालीम दी। तब लताजी ने हिन्दी-उर्दू का अभ्यास कर उच्चारण-दोष दूर करने का प्रयास शुरू कर दिया उनकी इस श्रम-साधना ने ही उन्हें यशस्वी गायिका बनाकर सफलता के सुमेरु पर पहुंचाया। हैदर साहब ने उन्हीं दिनों बाम्बे टाकीज में बन रही फिल्म ‘मजबूर’ के लिए उन्हें पाश्र्वगायिका के रूप में लिया। ‘मजबूर’ के गाने बड़े लोकप्रिय हुए और यहीं से लताजी का भाग्योदय शुरू हुआ। एक गुलाम हैदर ही क्या, 1947 से 2021 तक शायद एक भी ऐसा संगीत-निर्देशक नहीं होगा, जिसने लता से कोई न कोई गीत गवाकर अपने आपको धन्य न किया हो।
लताजी के प्रशंसकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने लगी। इस बीच आपने उस समय के सभी प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया। अनिल विश्वास, सलिल चैधरी, शंकर जयकिशन, एस.डी.बर्मन, आर.डी.बर्मन, नौशाद, मदनमोहन, सी. रामचंद्र इत्यादि सभी संगीतकारों ने आपकी प्रतिभा का लोहा माना। लताजी ने दो आंखें बारह हाथ, दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, मुगल-ए-आजम आदि महान फिल्मों में गाने गाए हैं। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बड़ी बहन” आदि फिल्मों में अपनी आवाज के जादू से इन फिल्मों की लोकप्रियता में चार चांद लगाए।  
सात दशक की उनकी स्वर यात्रा में उनकी व्यक्तिगत ख्याति इतनी शिखरों पर आरुढ़ हो गई, कि लता अगर किसी संगीत-निर्देशक के लिए गाने से इंकार कर दें तो उसे फिल्म इंडस्ट्री से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ जाएगा। लता की एक सिद्धि और भी थी- जिसकी भाषा और उच्चारण की खिल्ली उड़ाई गई थी, एक दिन सभी भाषाओं पर उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया। लोग उनसे उच्चारण सीखने लगे। फिल्मी गीतों के अतिरिक्त गैर फिल्मी गीतों और भजनों की भी रिकार्डिंग होती रही। सरकारी सम्मान के लिए भी जहां-तहां लता को ही बुलाया जाता रहा। चीनी आक्रमण के समय पंडित प्रदीप के अमर गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी’ गाने के लिए लताजी को दिल्ली बुलवाया गया था। यह गीत सुनकर नेहरूजी रो पड़े थे। तो इतनी बड़ी मांग की आपूर्ति लता अकेले कैसे कर सकती थीं?
लताजी बहुत ही सादगीप्रिय एवं सरल स्वभाव की हैं। इतनी बड़ी कीर्ति और ऐश्वर्य के अभिमान का अहंकार उनमें कभी नहीं देखा गया। उनको आभूषणों का शौक नहीं, पहनने-ओढ़ने का शौक नहीं, खान-पान की भी शौकीन नहीं है। जीवन में दो ही बातों की उनमें लगन है, पहली अध्यात्म की, जिस पर वे विशेष ध्यान देती हैं और दूसरी शास्त्रीय संगीत सीखने की। लेकिन यह वे सब परमेश्वर की कृपा मानती है। लताजी को संगीत के अलावा खाना पकाने और फोटो खींचने का बहुत शौक है।
गीत और संगीत का प्रवाह थमा नहीं है, कभी थमेगा भी नहीं। नादब्रह्म अभी निनादित है। गायक-गायिकाओं की लंबी कतारें आगे-पीछे होती रहेंगी। शिखर को छूने के प्रयत्न होते रहेंगे, किंतु लता मंगेशकर जिस शिखर पर पहुंचती हैं, वहां तक पहुंचने के सपने देखना भी बड़ी बात है। सृष्टि के गहन शून्य में शिव के डमरू से निकला नाद, प्रथम स्वर, प्रथम सूत्र और जगत में जीवंत हो उठा संगीत का संसार। संपूर्ण जगत नाचने लगा एक स्वर, एक लय, एक ताल में बंधकर। यह लय जिससे भी जाकर मिली तो स्वयं ब्रह्म हो गया। हर कामना से रहित, आत्मस्थित, आत्मप्रज्ञ। किसी ने इसे समाधि कहा और किसी ने मोक्ष, लेकिन साधक के लिए यह शांति है, आनंद है। अपूर्व, आध्यात्मिक शांति। अक्षरों में इसकी खोज व्यर्थ है। इसे समझने के लिए स्वरों को साथी बनाना पड़ता है और लता के स्वर तो सरस्वती के कंठ हैं। लता की स्वर की संगत को किसी आध्यात्मिक समागम से कम नहीं आंका जा सकता। जिन्होंने लता को नहीं सुना तो कभी नहीं जान पाएंगे कि उन्होंने क्या खो दिया।
भारत रत्न लता मंगेशकर, भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका हैं, जिनका आठ दशकों का कार्यकाल विलक्षण एवं आश्चर्यकारी उपलब्धियों से भरा पड़ा है। हालांकि लताजी ने लगभग तीस से ज्यादा भाषाओं में 30 हजार से ज्यादा फिल्मी और गैर-फिल्मी गाने गाए हैं लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पाश्र्वगायक के रूप में रही है। सन 1974 में दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का ‘गिनीज बुक रिकॉर्ड’ उनके नाम पर दर्ज है। उनकी जादुई आवाज के दीवाने भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ पूरी दुनिया में हैं। टाईम पत्रिका ने उन्हें भारतीय पाश्र्वगायन की अपरिहार्य और एकछत्र साम्राज्ञी स्वीकार किया है। वे फिल्म इंडस्ट्री की पहली महिला हैं जिन्हें भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ। वर्ष 1974 में लंदन के सुप्रसिद्ध रॉयल अल्बर्ट हॉल में उन्हें पहली भारतीय गायिका के रूप में गाने का अवसर प्राप्त है। उनकी आवाज की दीवानी पूरी दुनिया है। उनकी आवाज को लेकर अमेरिका के वैज्ञानिकों ने भी कह दिया कि इतनी सुरीली आवाज न कभी थी और न कभी होगी। भारत की ‘स्वर कोकिला’ लता मंगेशकर की आवाज सुनकर कभी किसी की आंखों में आंसू आए, तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को हौंसला मिला। वे न केवल भारत बल्कि दुनिया के संगीत का गौरव एवं पहचान है। प्रेषकः

 

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UPSC CSE 2020 को क्रैक करने वाले मुस्लिम उम्मीदवारों की सूची

UPSC CSE 2020 को क्रैक करने वाले मुस्लिम उम्मीदवारों की सूची

25-Sep-2021

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2020 को पास करने वाले कुल 761 उम्मीदवारों में से 31 मुस्लिम हैं। सदफ चौधरी ने AIR-23 हासिल किया है जो सफल मुस्लिम उम्मीदवारों में सर्वश्रेष्ठ रैंक है।

सफल मुस्लिम उम्मीदवार अंतिम चयन सूची में कुल उम्मीदवारों का 4.07 प्रतिशत हैं।

परीक्षा में, आईआईटी बॉम्बे से बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (सिविल इंजीनियरिंग) स्नातक शुभम कुमार ने पहली रैंक हासिल की है। उनका वैकल्पिक पेपर एंथ्रोपोलॉजी था।

सिविल सेवा परीक्षा 2020 को क्रैक करने वाले मुस्लिम उम्मीदवारों की सूची इस प्रकार है:

 

 नारी कब तक बेचारगी का जीवन जीयेगी?

नारी कब तक बेचारगी का जीवन जीयेगी?

21-Sep-2021

नारी कब तक बेचारगी का जीवन जीयेगी?

-ललित गर्ग-

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हम तालिबान-अफगानिस्तान में बच्चियों एवं महिलाओं पर हो रही क्रूरता, बर्बरता शोषण की चर्चाओं में मशगूल दिखाई देते हैं लेकिन भारत में आए दिन नाबालिग बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं तक से होने वाली छेड़छाड़, बलात्कार, हिंसा की घटनाएं पर क्यों मौन साध लेते हैं? इस देश में जहां नवरात्र में कन्या पूजन किया जाता है, लोग कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोते हैं और उन्हें यथासंभव उपहार देकर देवी मां को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं वहीं इसी देश में बेटियों को गर्भ में ही मार दिये जाने एवं नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नौंचने की त्रासदी भी है। इन दोनों कृत्यों में कोई भी तो समानता नहीं बल्कि गज़ब का विरोधाभास दिखाई देता है।

दुनियाभर में महिलाओं के अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये जागरूकता एवं आन्दोलनों के बावजूद महिलाओं पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। हमारे देश में भी महिलाओं की स्थिति, कन्या भू्रण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गांवों में महिला की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर प्रभावी चर्चा एवं कठोर निर्णयों से एक सार्थक वातावरण का निर्माण किये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि एक टीस-सी मन में उठती है कि आखिर नारी कब तक भोग की वस्तु बनी रहेगी? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? कब तक उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नौचा जाता रहेगा?

दरअसल छोटी लड़कियों या महिलाओं की स्थिति अनेक मुस्लिम और अफ्रीकी देशों में दयनीय है। जबकि अनेक मुस्लिम देशों में महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के लिये सख्त सजा का प्रावधान है, अफगानिस्तान-तालिबान का अपवाद है। वहां के तालिबानी शासकों ने महिलाओं को लेकर जो फरमान जारी किए हैं वो महिला-विरोधी होने के साथ दिल को दहलाने वाले हैं। नये तालिबानी फरमानों के अनुसार महिलाएं आठ साल की उम्र के बाद पढ़ाई नहीं कर सकेंगी। आठ साल तक वे केवल कुरान ही पढ़ेंगी। 12 साल से बड़ी सभी लड़कियों और विधवाओं को जबरन तालिबानी लड़कों से निकाह करना पड़ेगा। बिना बुर्के या बिना अपने मर्द के साथ घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं को गोली मार दी जाएगी। महिलाएं कोई नौकरी नहीं करेंगी और शासन में भागीदारी नहीं करेंगी। दूसरे मर्द से रिश्ते बनाने वाली महिलाओं को कोडों से पीटा जाएगा। महिलाएं अपने घर की बालकनी में भी बाहर नहीं झांकेंगीं। इतने कठोर, क्रूर, बर्बर और अमानवीय कानून लागू हो जाने के बावजूद अफगानिस्तान की पढ़ी-लिखी और जागरूक महिलाएं बिना डरे सड़कों पर जगह-जगह प्रदर्शन कर रही हैं। दुनिया की बड़ी शक्तियों को इन महिलाओं स्वतंत्र अस्तित्व को बचाने के लिये आगे आना चाहिए।

तमाम जागरूकता एवं सरकारी प्रयासों के भारत में भी महिलाओं की स्थिति में यथोचित बदलाव नहीं आया है। भारत में भी जब कुछ धर्म के ठेकेदार हिंसात्मक और आक्रामक तरीकों से महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं तो वे भी तालिबानी ही नजर आते हैं। विरोधाभासी बात यह है कि जो लोग नारी को संस्कारों की सीख देते हैं, उनमें से बहुत से लोग, धर्मगुरु, राजनेता एवं समाजसुधारक महिलाओं के प्रति कितनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देते आए हैं, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। इनके चरित्र का दोहरापन जगजाहिर हो चुका है। कोई क्या पहने, क्या खाए, किससे प्रेम करे और किससे शादी करें, सह-शिक्षा का विरोधी नजरिया- इस तरह की पुरुषवादी सोच के तहत महिलाओं को उनके हकों से वंचित किया जा रहा है, उन पर तरह-तरह की बंदिशें एवं पहरे लगाये जा रहे हैं। वक्त बीतने के साथ सरकार को भी यह बात महसूस होने लगी है। शायद इसीलिए सरकारी योजनाओं में महिलाओं की भूमिका को अलग से चिह्नित किया जाने लगा है।

आये दिन कोई न कोई महिला अत्याचार, बलात्कार एवं शोषण की घटना सुनाई देती है जो दिल को दर्द से भर देती है और बहुत कुछ सोचने को विवश कर देती है। देश के किसी एक भाग में घटी कोई घटना सभी महिलाओं के लिए चिंता पैदा कर देती है। यूं तो महिलाओं के संरक्षण के लिए बहुत सारे कानून बने हैं लेकिन अपराधियों को इनका ज़रा भी खौफ क्यों नहीं? जब देश में ऐसी कोई घटना घटित होती है तो क्यों लंबे समय तक तारीख पर तारीख लगती रहती हैं? तुरंत फैसला क्यों नहीं हो जाता इन हैवानों एवं महिला अत्याचारियों का? इन आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए क्या हमें भी कुछ मुस्लिम देशों की जैसी क्रूर सज़ा का प्रावधान करना चाहिए? एक अपराधी से कानून को क्यों हमदर्दी हो जाती हैं जो उसे अपना पक्ष रखने का अवसर सालों साल मिलता रहता है। आश्चर्य इस बात का होता है कि इन अपराधियों के माता-पिता भी इन्हें बचाने के लिए जी जान से जुड़ जाते हैं। इस तरह कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई हारती रही है। लेकिन महिलाओं के प्रति एक अलग तरह का नजरिया इन सालों में बनने लगा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी के संपूर्ण विकास की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अनेक योजनाएं लागू की है, जिनमें अब नारी सशक्तीकरण और सुरक्षा के अलावा और भी कई आयाम जोडे़ गए हैं। सबसे अच्छी बात इस बार यह है कि समाज की तरक्की में महिलाओं की भूमिका को आत्मसात किया जाने लगा है।

एक कहावत है कि औरत जन्मती नहीं, बना दी जाती है और कई कट्ट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं। इसीलिये आज की औरत को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए। पूरे पृष्ठ, जितने पुरुषों को प्राप्त हैं। पर विडम्बना है कि उसके हिस्से के पृष्ठों को धार्मिकता के नाम पर ‘धर्मग्रंथ’ एवं सामाजिकता के नाम पर ‘खाप पंचायते’ घेरे बैठे हैं। पुरुष-समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक अनियंत्रण हैं जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने एवं बेचारगी को जीने को विवश होना पड़ता है। पुरुषवर्ग नारी को देह रूप में स्वीकार करता है, लेकिन नारी को उनके सामने मस्तिष्क बनकर अपनी क्षमताओं का परिचय देना होगा, उसे अबला नहीं, सबला बनना होगा, बोझ नहीं शक्ति बनना होगा।

‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझकर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं शक्ल बदल-बदल कर काले अध्याय रच रही है। देश में गैंग रेप की वारदातों में कमी भले ही आयी हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है। आवश्यकता लोगों को इस सोच तक ले जाने की है कि जो होता आया है वह भी गलत है। महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कानूनों की कठोरता से अनुपालना एवं सरकारों में इच्छाशक्ति जरूरी है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरोध में लाए गए कानूनों से नारी उत्पीड़न में कितनी कमी आयी है, इसके कोई प्रभावी परिणाम देखने में नहीं आये हैं, लेकिन सामाजिक सोच में एक स्वतः परिवर्तन का वातावरण बन रहा है, यहां शुभ संकेत है।
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नयी राजनीतिक सोच के जन्म का सुखद संकेत

नयी राजनीतिक सोच के जन्म का सुखद संकेत

18-Sep-2021

नयी राजनीतिक सोच के जन्म का सुखद संकेत
-ललित गर्ग -

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गुजरात में मुख्यमंत्री बदले जाने के बाद जिस तरह सभी पुराने मंत्रियों को हटा कर नए चेहरों को मौका दिया गया, वह बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव ही नहीं बल्कि एक अभिनव राजनीतिक क्रांति का शंखनाद है। इसके पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मुख्यमंत्री को हटाए जाने के साथ ही पुराने सभी मंत्रियों की भी विदाई कर दी जाए। गुजरात में ऐसा हुआ तो इसका मतलब है कि भाजपा नेतृत्व राज्य की सरकार को नया रूप-स्वरूप प्रदान करना चाहता था और इसके जरिये लोगों को व्यापक बदलाव का संदेश देना चाहता था। राजनीति से परे भारतीय जनता को सदैव ही किसी न किसी स्रोत से संदेश मिलता रहा है। कभी हिमालय की चोटियों से, कभी गंगा के तटों से और कभी सागर की लहरों से। कभी ताज, कुतुब और अजन्ता से, तो कभी श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध और महावीर से। कभी गुरु नानक, कबीर, रहीम और गांधी से और कभी कुरान, गीता, रामायण, भगवत् और गुरुग्रंथों से। यहां तक कि हमारे पर्व होली, दीपावली भी संदेश देते रहते हैं। लेकिन कुछ मौलिक गढ़ने एवं रचने का सन्देश देने का काम भारतीय जनता पार्टी के शासन में देखने को मिल रहा है, जिससे राजनीति की दशा एवं दिशाएं बदलती हुई नजर आ रही है। ऐसे ही नये प्रयोगों एवं संदेशों से भारतीय जन-मानस की राष्ट्रीयता सम्भलती है, सजती है, कसौटी पर आती है तथा बचती है।
गुजरात सरकार में जो फेरबदल हुआ है, वह भले ही राजनैतिक अपेक्षाओं की मांग हो, लेकिन वह भारतीय राजनीति में एक नया प्रस्थान है, सत्तालोलुपता की पर्याय बन चुकी राजनीति को एक नई दिशा देने का सार्थक प्रयोग है। यूं तो बदलने के नाम पर समय, सरकार, उसकी नीतियां, योजनायें, उम्मीदें, मूल्य, राजनीतिक शैली एवं उद्देश्य तक बदलते रहे हैं। किन्तु सत्तालोलुपता के बीच राजनेताओं की मंत्री-पद की लालसा एवं आदत को बदल डालना न केवल साहस है बल्कि राजनीति को नयी दिशाओं की ओर अग्रसर करने का अनुष्ठान है। सत्ता में दो दशक से ज्यादा समय तक रहने के बाद भाजपा द्वारा किया गया यह प्रयोग सत्ता विरोधी लहर को रोकने की एक अभूतपूर्व एवं प्रेरक कोशिश है। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना कि मंत्री-पद किसी भी सांसद या विधायक या नेता की बपौती नहीं है, उसको जीने का सबको समान अधिकार है। अक्सर हमने देखा है कि जब किसी एक मंत्री का भी पद छिनता है, तो पूरा मंत्रिमंडल अस्थिर हो जाता है, भूचाल आ जाता है, सरकार पर खतरे के बादल मंडराने लगते हैं, लेकिन गुजरात में एक नहीं, बल्कि सभी मंत्रियों को बदल दिया गया और तब भी सरकार की सेहत बरकरार प्रतीत हो रही है। अगर यह प्रयोग वाकई सफल रहा और पार्टी में कमजोरी न आई, तो यह बदलाव एक मिसाल बन जाएगा, एक नजीर होगी, जिसे एक नई राजनीतिक सोच एवं सन्दर्भ का जनक माना जायेगा। जो राजनीतिक प्रयोग हुआ है, वह आम राजनीतिक सोच से परे है। शायद ऐसा प्रयोग केवल गुजरात जैसे राज्य में ही संभव हो, लेकिन इससे पूरे देश की राजनीति में एक सन्देश गया है। बीते दो दशकों में राजनीति के क्षेत्र में क्रांति करने वाले दलों में भाजपा पुरोधा है। अटल बिहारी वाजपेयी एवं नरेन्द्र मोदी के समय में राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव एवं प्रयोग की लहर उठी है, उसे तीव्रता से आगेे बढ़ाने की अपेक्षा है। इस राजनीतिक प्रयोग एवं व्यापक बदलाव को गुजरात की जनता किस रूप में लेती है, यह भविष्य के गर्भ में हैं। आशंका है कि जो मंत्री हटाए गए हैं, वे नई सरकार के लिए समस्याएं तो नहीं खड़ी करेंगे? वे इससे आशंकित हो सकते हैं कि कहीं उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट से तो वंचित नहीं कर दिया जाएगा? जो मंत्री हटाए गए हैं, उनका नाराज होना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि लंबे समय तक सत्ता में रहे लोगों से एक तरह की ऊब पैदा हो जाती है, थके चेहरों से जनता के कल्याण की आशाएं भी संदिग्ध हो जाती है। उम्मीद की जाती है कि गुजरात सरकार में नए मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक एक नई तरह की कार्यसंस्कृति, नई सोच और नई ऊर्जा का संचार करेंगे। इसके बिना बदलाव का उद्देश्य पूरा होने वाला नहीं है।
यह सही है कि भूपेंद्र पटेल सरकार में मंत्रियों के रूप में शामिल नए चेहरे बदलाव के साथ ताजगी का आभास कराने के साथ लक्ष्य पाने के लिये उन्हें इतनी तीव्र बेचैनी दिखानी होगी, जितनी नाव डूबते समय मल्लाह में उस पार पहुंचने की बेचैनी होती है। बदलाव से उपजी स्थितियों से बौखला कर न पुरुषार्थ के पांव रोकने है और न धैर्य की धड़कन को कमजोर पड़ने देना है। प्रतीक्षा करनी है प्रयत्नों को परिणामों तक पहुंचने की। जरूरत है विरासत से प्राप्त मूल्यों को सुरक्षा दें, नये निर्माण का दायित्व ओढ़े, तभी इस राजनीतिक बदलाव की संस्कृति को सार्थकता के साथ कामयाबी के पायदान चढ़ा पायेंगे।
गुजरात की भाजपा सरकार में एक नये सूरज की किरणें उतरी है, भले ही अनुभव का अभाव तब एक चुनौती बन सकता है, जब विधानसभा चुनाव सामने है। स्पष्ट है कि नए चेहरों वाली सरकार के सामने एक साथ दो चुनौतियां होंगी। एक तो सरकार का कामकाज प्रभावी ढंग से चलाना और दूसरे, भाजपा के पक्ष में चुनावी माहौल तैयार करना। नए मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के सामने एक चुनौती यह भी होगी कि शासन के कामकाज में नौकरशाही न हावी होने पाए। हालांकि, नए मंत्रियों के चयन में जातिगत समीकरणों का पूरा ध्यान रखा गया है, लेकिन कुछ ऐसे लोग छूट गए हो सकते हैं, जो मंत्री बनने की इच्छा रखते हों। जो भी हो, भाजपा की प्रयोगशाला कहे जाने वाले गुजरात में एक नया प्रयोग हुआ है। वहां पहले भी विपरीत स्थितियां आती रहीं, चुनौतियां आती रहीं पर इसी प्रांत से शाश्वत संदेश भी सदैव मिलते रहे हैं। गत आठ दशकों से समूचे राष्ट्र में जोड़-तोड़ की राजनीति चलती रही। पार्टियां बनाते रहे फिर तोड़ते रहे। राजनीतिक अनुशासन का अर्थ हम निजी सुविधानुसार निकालते रहे। जिसका विषैला असर प्रजातंत्र के सर्वोच्च मंच से लेकर नीचले स्तर की छोटी से छोटी इकाइयों तक देखा जा सकता है। क्रांति का मतलब मारना नहीं, राष्ट्र की व्यवस्था को बदलना होता है, राष्ट्र को नयी ऊर्जा से आप्लावित करना है।
किसी भी जाति या उसके लोगों को सत्ता में भागीदारी मिलनी चाहिए और जातिगत वोटों को किसी एक या दो नेताओं के पीछे नहीं खड़ा होना चाहिए। मतलब, मंत्री कोई रहे, जाति का प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है। यह बदलाव संकेत है कि लोगों को अपने नेता से नहीं, बल्कि अपनी भागीदारी से सरोकार रखना चाहिए। अगर ऐसा होने जा रहा है, तो फिर भारतीय राजनीति में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव होगा। वैसे भी आदर्श राजनीति में महत्व व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि सबकी भागीदारी और सेवा का है। वैसे भी राजनीति कोई स्वार्थ-सिद्धि का अखाड़ा एवं व्यवसाय नहीं, एक मिशन है। राजनीति को राजनेताओं से ऊपर नहीं रखेंगे तब तक राजनीति का सदैव गलत अर्थ निकलता रहेगा। रजनीति तो संजीवनी है पर इसे विष के रूप में प्रयोग किया जाता  रहा है। गुजरात के इस नये प्रयोग की सफलता-विफलता का निर्धारण भविष्य करेगा, लेकिन इसमें दोराय नहीं कि भारत में राजनीति से रिटायर होने की कोई परंपरा विकसित नहीं हो पाई है। यह परंपरा विकसित होनी चाहिए, क्योंकि इससे ही राजनीति में बदलाव की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी, नये एवं ऊर्जावान चेहरों को काम करने का अवसर प्राप्त हो सकेगा और इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि भारतीय राजनीति में बदलाव और सुधार की इस तरह की आवश्यकता लम्बे समय से महसूस की जाती रही है। एक दीपक जलाकर फसलें पैदा नहीं की जा सकतीं पर उगी हुई फसलों का अभिनंदन दीपक से अवश्य किया जा सकता है। गुजरात की भाजपारूपी गर्भिणी की सूखी और पीली देह नये जन्म का सुखद संकेत है।
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टाइम मैगज़ीन 2021 के  100 प्रभावशाली लोगो में  पीएम मोदी, ममता बनर्जी, अदार पूनावाला के साथ तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला बरादर को टाइम पत्रिका द्वारा प्रभावशाली लोगों में नामित किया है !

टाइम मैगज़ीन 2021 के 100 प्रभावशाली लोगो में पीएम मोदी, ममता बनर्जी, अदार पूनावाला के साथ तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला बरादर को टाइम पत्रिका द्वारा प्रभावशाली लोगों में नामित किया है !

16-Sep-2021

टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला को 2021 के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया है। तालिबान के सह-संस्थापक और समूह द्वारा घोषित कैबिनेट के उप प्रधान मंत्री मुल्ला बरादर को टाइम पत्रिका द्वारा 2021 के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में नामित किया है।

TIME ने बुधवार को 2021 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की अपनी वार्षिक सूची का अनावरण किया, एक वैश्विक सूची जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन, उपराष्ट्रपति कमला हैरिस, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ड्यूक और डचेस ऑफ ससेक्स प्रिंस हैरी और मेघन, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति शामिल हैं। डोनाल्ड ट्रम्प और तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर।

मोदी का टाइम प्रोफाइल कहता है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपने 74 वर्षों में, भारत के तीन प्रमुख नेता रहे हैं – जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और मोदी। “नरेंद्र मोदी तीसरे हैं, जो देश की राजनीति पर हावी हैं, जैसे उनके बाद किसी ने नहीं।

प्रसिद्ध सीएनएन पत्रकार फरीद जकारिया द्वारा लिखे गए प्रोफाइल में आरोप लगाया गया है कि मॉड ने “देश को धर्मनिरपेक्षता से और हिंदू राष्ट्रवाद की ओर धकेल दिया है।”

यह 69 वर्षीय नेता पर “भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों को खत्म करने और पत्रकारों को कैद करने और डराने-धमकाने का भी आरोप लगाता है।

बनर्जी पर, 100 सबसे प्रभावशाली सूची के लिए उनकी प्रोफ़ाइल कहती है कि 66 वर्षीय नेता “भारतीय राजनीति में उग्रता का चेहरा बन गए हैं।”

“बनर्जी के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व नहीं करतीं – वह पार्टी हैं। प्रोफ़ाइल कहती है कि पितृसत्तात्मक संस्कृति में सड़क पर लड़ने वाली भावना और स्व-निर्मित जीवन ने उसे अलग कर दिया।

पूनावाला के TIME प्रोफाइल में कहा गया है कि COVID19 महामारी की शुरुआत से, दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन निर्माता के 40 वर्षीय प्रमुख ने इस पल को पूरा करने की मांग की।

“महामारी अभी खत्म नहीं हुई है, और पूनावाला अभी भी इसे समाप्त करने में मदद कर सकता है। यह कहता है कि वैक्सीन असमानता गंभीर है, और दुनिया के एक हिस्से में टीकाकरण में देरी के वैश्विक परिणाम हो सकते हैं, जिसमें अधिक खतरनाक रूपों के उभरने का जोखिम भी शामिल है, यह कहता है।

द टाइम प्रोफाइल तालिबान के सह-संस्थापक बरादर को एक “शांत, गुप्त व्यक्ति के रूप में वर्णित करता है जो शायद ही कभी सार्वजनिक बयान या साक्षात्कार देता है।”

“बरादार फिर भी तालिबान के भीतर एक अधिक उदारवादी धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे पश्चिमी समर्थन जीतने के लिए सुर्खियों में लाया जाएगा और वित्तीय सहायता की सख्त जरूरत है। सवाल यह है कि क्या वह व्यक्ति जिसने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकियों को बहला-फुसलाकर बाहर निकाला, क्या वह अपने स्वयं के आंदोलन को प्रभावित कर सकता है, बरादर की प्रोफाइल कहती है।

सूची में टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका, रूसी विपक्षी कार्यकर्ता एलेक्सी नवलनी, संगीत आइकन ब्रिटनी स्पीयर्स, एशियाई प्रशांत नीति और योजना परिषद के कार्यकारी निदेशक मंजूशा पी. कुलकर्णी, ऐप्पल सीईओ टिम कुक, अभिनेता केट विंसलेट और पहली अफ्रीकी और पहली महिला भी शामिल हैं। विश्व व्यापार संगठन Ngozi Okonjo-Iweala का नेतृत्व करने के लिए।

 

स्वतंत्रता सेनानी को भी कर दिया एक जाति तक सीमित, जाट राजा के सहारे यूपी में चुनावी नैया पार करेगी भाजपा!

स्वतंत्रता सेनानी को भी कर दिया एक जाति तक सीमित, जाट राजा के सहारे यूपी में चुनावी नैया पार करेगी भाजपा!

15-Sep-2021

 तौसीफ़ क़ुरैशी, लखनऊ 

स्वतंत्रता सेनानी को भी कर दिया एक जाति तक सीमित, जाट राजा के सहारे यूपी में चुनावी नैया पार करेगी भाजपा!

राज्य मुख्यालय लखनऊ। मोदी की भाजपा का यह रिकॉर्ड रहा है कि वह चुनाव जीतने के लिए शाम दाम दण्ड भेद का इस्तेमाल करने से गुरेज़ नहीं करती हैं वह हर उस हथकंडे को अपनाती हैं जो उसे जीत की दहलीज़ पर ले जाता हो।

तीन कृषि कानूनों से नाराज किसानों को मनाने के लिए जाटों पर लगा रही जुगत पश्चिमी यूपी में जाट बिगाड़ सकते हैं सत्ता का समीकरण पीएम मोदी ने किया जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास विपक्ष ने बोला हमला, कहा ढोंग कर रही है भाजपा।यूपी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तेजी से सक्रिय हो गया है। कृषि कानूनों से नाराज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसानों को मनाने के लिए भाजपा ने नया दांव चला है। 

जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर आज विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर पीएम नरेंद्र मोदी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों को संदेश देने की कोशिश की है। भाजपा नेतृत्व यह अच्छी तरह जानता है कि पश्चिमी यूपी के नाराज जाट उसका सत्ता समीकरण बिगाड़ देंगे।वहीं विपक्ष ने इसे भाजपा का ढोंग करार दिया है। तीनों कृषि कानूनों को लेकर किसान लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की कमान जाट किसान नेता राकेश टिकैत ने संभाल रखी हैं जबकि कुछ लोगों का मानना है कि राकेश टिकैत सरकार के द्वारा प्रायोजित नेता है। वे लगातार धरना-प्रदर्शन के माध्यम से कृषि कानूनों को खत्म करने की मांग करने का दिखावा कर रहे हैं।

किसानों को सपा, आप और कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का पूरा समर्थन भी प्राप्त है। यही नहीं पिछले दिनों मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में किसानों ने भाजपा के खिलाफ वोट देने का आह्वान भी किया था। किसानों की इस अपील के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बेहद घबराया हुआ है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों को खुश करने की जुगत में लग गया है।किसान आंदोलन को किसानों के साथ ही जाटों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है क्योंकि वह मूलरूप से किसान ही गौरतलब हो जब तक किसान किसान रहा तो उसकी अनदेखी करने की किसी सरकार की हिम्मत नहीं थी लेकिन अब वह 2014 से हिन्दू हो गया है यही वजह है कि वह आठ नौ महीने से सड़क पर पड़ा और उसकी सुनवाई करने वाला नहीं क्योंकि मामला नरेन्द्र मोदी के मित्रों का है अंबानी अड़ानी समूह को फ़ायदा पहुँचाने के लिए यह क़ानून लाए गए हैं समय रहते किसान समझ गया जिसके वह विरोध कर रहा है और वापसी होने तक करता रहेगा। लिहाजा आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर जाटों को अपने पाले में करने की कोशिश की।वहीं विपक्ष ने भाजपा पर राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाया है।कौन हैं राजा महेंद्र प्रताप सिंह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी संपत्ति दान कर दी थी लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को कोई स्थान नहीं मिला। 

विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर भी जो तथ्य दिए गए हैं, उसमें सैय्यद अहमद खान के योगदान का जिक्र तो है पर विश्वविद्यालय के लिए जमीन का एक बड़ा हिस्सा दान करने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह का कोई उल्लेख नहीं है। यह वही राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे जिन्होंने ब्रिटिश सरकार का विरोध किया था।वर्ष 1914 के प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अफगानिस्तान गए थे और 1915 में उन्होंने आजाद हिन्दुस्तान की पहली निर्वासित सरकार बनवाई थी।इन्हीं के नाम पर योगी सरकार ने विश्वविद्यालय बनवाने का ऐलान किया था। 

आजादी ही नहीं भारत के विकास की नींव रखने में भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह का रहा।यूपी में जाटों की आबादी 6 से 8 फीसदी के करीब है जबकि पश्चिमी यूपी में यह 17 फीसदी से ज्यादा है। लोकसभा सीटों सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी और फिरोजाबाद में जाट वोटबैंक चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता है। वहीं विधान सभा की 120 सीटें ऐसी हैं जहां जाट वोटबैंक असर रखता है।राजा महेन्द्र प्रताप सिंह आजीवन सांप्रदायिकता और संकीर्ण राजनीति के विरोधी रहे व भाजपा के पूर्वगामियों की जमानत जब्त कराने वाले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नाम पर नया विश्वविद्यालय बनाना भाजपाई ढोंग है जबकि उनके बनाए गुरुकुल विवि. वृंदावन को भाजपा सरकार ने नकली विवि घोषित करके उनका अपमान किया है। अखिलेश यादव, सपा प्रमुख राजा महेंद्र प्रताप सिंह को जाति के चश्मे से देखना दुर्भाग्यपूर्ण है। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने पहली सरकार अफगानिस्तान में बनाई थी हिंदुस्तान की और उसके प्रधानमंत्री बर्कुतुल्ला थे। ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को जाति के खांचे में रखकर भाजपा स्वतंत्रता सेनानियों के साथ घोर अन्याय कर रही है। वोटों की राजनीति के लिए भाजपा कितना गिरेगी? 

सुरेंद्र राजपूत, प्रवक्ता, कांग्रेस लोगों को गुमराह कर वोटों का फायदा लेना हो तो भाजपा राष्ट्रपति जैसे गरिमामयी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति तक की जाति का प्रचार करने से पीछे नहीं हटती। शहरों के नाम बदले लेकिन जनता की हालात बदहाल ही रही। विद्यालयों के नाम भी बदलेंगे लेकिन शिक्षा के हालात कब बदलेंगे। बुरे दिन का नाम अच्छे दिन रख कर भाजपा अपनी बीन बजा रही है। वैभव माहेश्वरी, प्रवक्ता, आप इसकी टाइमिंग गलत है। भाजपा के पास काम गिनाने के लिए कुछ नहीं है इसलिए अब वह जातिवाद की सियासत करने में जुटी हुई है। इससे अच्छा होता कि भाजपा सरकार किसानों की समस्याओं का समाधान करती। प्रदेश की जनता अब भाजपा की चालों को समझ चुकी है और वह विधान सभा चुनाव में उसको सबक सिखाएगी। अनुपम मिश्रा प्रवक्ता रालोद


हिन्दी है आत्मनिर्भर भारत का सशक्त आधार

हिन्दी है आत्मनिर्भर भारत का सशक्त आधार

13-Sep-2021

हिन्दी दिवस- 14 सितम्बर, 2021 पर विशेष
- ललित गर्ग-

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राष्ट्र आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, इस महोत्सव को मनाते हुए हमें राष्ट्रीय प्रतीकों एवं प्रसंगों को मजबूती देने की जरूरत है। जिनमें राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज आदि स्वामिमान के प्रतीकों को प्रतिष्ठा दिये जाने की अपेक्षा है। राष्ट्रीय अस्मिता एवं अस्तित्व की प्रतीक एवं सांस्कृतिक-राष्ट्रीय स्वाभिमान को एकसूत्रता मंें पिराने वाली हिन्दी की उपेक्षा पर विचार करने की जरूरत है। क्योंकि हिन्दी न सिर्फ स्वावलम्बन एवं स्वाभिमान का मस्तक है बल्कि यह आत्मनिर्भरता का सशक्त आधार भी है। हिन्दी दिवस मनाते हुए हमें हिन्दी की ताकत को समझना होगा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सशक्त भारत-आत्मनिर्भर भारत के आह्वान में हिन्दी की प्रासंगिकता एवं महती भूमिका के सच को स्वीकारना होगा। हिन्दी का देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने एवं आजादी दिलाने में बड़ा योगदान रहा है, क्यों आजाद भारत में उस हिन्दी पर राजनीति करते हुए उसे उपेक्षित किया जा रहा है, इस प्रश्न पर गंभीर मंथन की अपेक्षा है। एक प्रश्न और सामने है कि जब हिन्दी की विश्व में प्रतिष्ठा हो रही है, तो भारत में उपेक्षा क्यों है?
हाल ही में एथनोलॉग द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार हिंदी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन गयी है। वर्तमान में 637 मिलियन लोग हिंदी भाषा का उपयोग करते हैं। दुनिया के करीब 200 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है।  हिंदी भारत की राजभाषा है। सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व को समेट हिंदी अब विश्व में लगातार अपना फैलाव कर रही है, हिन्दी राष्ट्रीयता की प्रतीक भाषा है, उसको राजभाषा बनाने एवं राष्ट्रीयता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठापित करने के नाम पर भारत में उदासीनता एवं उपेक्षा की स्थितियां परेशान करने वाली है, विडम्बनापूर्ण है। विश्वस्तर पर प्रतिष्ठा पा रही हिंदी को देश में दबाने की नहीं, ऊपर उठाने की आवश्यकता है। हमने जिस त्वरता से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में पहल की, उसी त्वरा से राजनैतिक कारणों से हिन्दी की उपेक्षा भी है, यही कारण है कि आज भी देश में हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। देश-विदेश में इसे जानने-समझने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इंटरनेट के इस युग ने हिंदी को वैश्विक धाक जमाने में नया आसमान मुहैया कराया है। दुनियाभर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में पहला स्थान अंग्रेजी का है और पूरी दुनिया में 113.2 करोड़ लोग इस भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा दूसरे स्थान पर चीन में बोली जाने वाली मंदारिन भाषा है जिसे 111.7 करोड़ लोग बोलते हैं। तीसरे स्थान पर हिन्दी है। चौथे नंबर पर 53.4 करोड़ लोगों के साथ स्पेनिस और पांचवें नंबर पर 28 करोड़ लोगों के साथ फ्रेंच भाषा है।
दुनिया में हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता एवं विश्व की बहुसंख्य आबादी द्वारा इसे अपनाये जाने की स्थितियां हर भारतीय के लिये गर्व की बात है। देश की आजादी के पश्चात 14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। राष्ट्र भाषा हिन्दी सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। भारत का परिपक्व लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता, समृद्ध संस्कृति तथा अनूठा संविधान विश्व भर में एक उच्च स्थान रखता है, उसी तरह भारत की गरिमा एवं गौरव की प्रतीक राष्ट्र भाषा हिन्दी को हर कीमत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों, सरकारी कार्यालयों और सचिवालयों में कामकाज एवं लोकव्यवहार की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिलना चाहिए, इस दिशा में वर्तमान सरकार के प्रयास उल्लेखनीय एवं सराहनीय है, लेकिन उनमें तीव्र गति दिये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि इस दृष्टि से महात्मा गांधी की अन्तर्वेदना को समझना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाषा संबंधी आवश्यक परिवर्तन अर्थात हिन्दी को लागू करने में एक दिन का विलम्ब भी सांस्कृतिक हानि है। मेरा तर्क है कि जिस प्रकार हमने अंग्रेज लुटेरों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया, उसी प्रकार सांस्कृतिक लुटेरे रूपी अंग्रेजी को भी तत्काल निर्वासित करें।’ आजाद भारत के पचहतर वर्षों में भी हमने हिन्दी को उसका गरिमापूर्ण स्थान न दिला सके, यह विडम्बनापूर्ण एवं हमारी राष्ट्रीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है।
उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू ने हिन्दी के बारे में ऐसी ही बात पिछले दिनों कही थी, जिसे कहने की हिम्मत महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डॉ. राममनोहर लोहिया में ही थी। उन्होंने कहा कि ‘अंग्रेजी एक भयंकर बीमारी है, जिसे अंग्रेज छोड़ गए हैं।’’ वैंकय्या नायडू का हिन्दी को लेकर जो दर्द एवं संवेदना है, वही स्थिति सरकार से जुडे़ हर व्यक्ति के साथ-साथ जन-जन की होनी चाहिए। हिन्दी के लिये दर्द, संवेदना एवं अपनापन जागना जरूरी है। हम अपनी स्वभाषा को सम्मान देने के छोटे-छोटे प्रयासों द्वारा समाज में बड़े परिवर्तन ला सकते हैं, जो आने वाले समय में हिंदी के विकास में अपना महत्वपूर्ण स्थान दे सकता है। राष्ट्रभाषा को प्रतिष्ठापित करने एवं सांस्कृतिक सुरक्षा के लिये अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने व्यापक प्रयत्न किये जिनमें सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा और वर्तमान में वेदप्रताप वैदिक प्रमुख हैं। आगरा के सांसद सेठ गोविन्ददासजी ने तो अंग्रेजी के विरोध में अपनी पद्मभूषण की उपाधि केन्द्र सरकार को वापिस लौटा दी।
राष्ट्र के लिये जब तक हिन्दी की उपेक्षा जैसे निजी-स्वार्थ को विसर्जित करने की भावना पुष्ट नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उन्नयन एवं सशक्त भारत का नारा सार्थक नहीं होगा। हिन्दी को सम्मान एवं सुदृढ़ता दिलाने के लिये केन्द्र सरकार के साथ-साथ प्रांतों की सरकारों को संकल्पित होना ही होगा। नरेन्द्र मोदी ने विदेशों में हिन्दी की प्रतिष्ठा के अनेक प्रयास किये हैं, ऐसे ही प्रयासों का परिणाम है हिन्दी का दुनिया में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर आना। लेकिन उनके शासन में विदेशों में ही नहीं देश में भी हिन्दी की स्थिति सुदृढ़ बननी चाहिए। यदि उनके शासन में हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं किया जा सका तो भविष्य में इसकी उपेक्षा के बादल घनघोर ही होंगे, यह एक दिवास्वप्न बनकर रह जायेगा। हिन्दी के प्रति संकीर्णता न राष्ट्रीय एकता के हित में है और न ही प्रान्तों के हित में। प्रान्तीय भाषा के प्रेम को इतना उभार देना, जिससे राष्ट्रीय भाषा के साथ टकराहट पैदा हो जाये, यह देश के लिये उचित कैसे हो सकता है? राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा था - जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं! वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं!! हिन्दी भाषा का मामला भावुकता का नहीं, ठोस यथार्थ का है, राष्ट्रीयता का है।
हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।’ यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उसकी घोर उपेक्षा हो रही है, इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति को नरेन्द्र मोदी सरकार आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए कुछ ठोस संकल्पों एवं अनूठे प्रयोगों से दूर करने के लिये प्रतिबद्ध हो, हिन्दी को मूल्यवान अधिमान दिया जाये। ऐसा होना हमारी सांस्कृतिक परतंत्रता से मुक्ति का एक नया इतिहास होगा। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 

 


देश छोड़ती विदेशी कम्पनियाँ क्या ट्रिलियांन डॉलर एकानामि का दावा करने वालों के मुह में तमाचा नहीं ?

देश छोड़ती विदेशी कम्पनियाँ क्या ट्रिलियांन डॉलर एकानामि का दावा करने वालों के मुह में तमाचा नहीं ?

11-Sep-2021

देश छोड़ती विदेशी कम्पनियाँ क्या ट्रिलियांन डॉलर एकानामि का दावा करने वालों के मुह में तमाचा नहीं ?

प्रधान सम्पादक 
देश के लिए  दुःखद कहा जाये या गर्व की बात कही जाय ,बड़ी बड़ी कम्पनियां देश छोड़ कर जा रही हैं,भारत में सभी की दुकान बंद क्यों हो रही हैं,यहाँ बैंक बिक रहा है रेल बिक रहा है रिसर्व बैंक खाली हो रहा है वही अब फोर्ड अपना काम काज समेटने मे   लगा है इसकेपहले जनरल मोटर चला गया फिर हार्ले डेविडसन अब फ़ोर्ड प्लस …आप को बता दें जनरल मोटर हाज़र्डले डेविड सन् *Harley Davidson के बाद Ford तीसरी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी है जिसने भारत में काम नहीं करने का फ़ैसला लिया है। पिछले 5 साल में यह तीसरा बड़ा नुक़सान है। अकेले Ford के बंद होने से लगभग 4000 लोग बेरोज़गार होंगे सर्वे के मुताबिक़ भारत देश की एक साल में बेरोज़गारी दर 2.4% से बढ़कर 10.3% हुई है* !
क्या वास्तव में देश आत्मनिर्भर बन रहा है अंतर राष्ट्रिय स्तर पर भारत देश की साख गिर रही हैं और हैं ट्रिलियान डॉलर इकॉनमी  का रट लगाने वाले  गोदी मीडिया में बैठे लोग देश वासियो को झूठी धिराशा देने में लगे हुए  हैं!
हम कब समझेंगे अपने हाल को और  कब तक अंधे बने रहेंगे  आने वाला समय देश के लिये और खतर नाक हो ने वाला हैं किसान सड़क पर है देश में जाती गत वैमनस्यता शिखर पर है और हमारे देश की गोदी मीडिया तलीबांन - तालिबान का रट लगा कर  देश को दिग्भ्रमित कर रही ,इन्हे है पहले अपना गिरेबाँ तो झाँक लेना चाहिए धर्म के आफीम का नशा चढ़ा कर हम अपनों को  और अपने राष्ट्र को ही चोट पहुँचने में लगे हुए हैं  ऐसे में हम देश का विकास क्या ख़ाक करेंगे  उद्योग घरानो द्वारा संचालित गोदी मीडिया धर्म आधारित अफीम परोशने का काम कर रही है !


गणेशजी हैं वैभवता एवं शुभता देने वाले देव

गणेशजी हैं वैभवता एवं शुभता देने वाले देव

10-Sep-2021

गणेश चतुर्थी - 10 अगस्त, 2021 पर विशेष

गणेशजी हैं वैभवता एवं शुभता देने वाले देव
-ललित गर्ग-

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गणेश भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। वे सुख-समृद्धि, रिद्धि-सिद्धि, वैभव, आनन्द, ज्ञान एवं शुभता के अधिष्ठाता देव हैं। उनका जन्म भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को हुआ। गणेशजी शिव-पावर्ती के पुत्र के रूप में जन्म थे। उनके जन्म पर सभी देव उन्हें आशाीर्वाद देने आए थे। विष्णु ने उन्हें ज्ञान का, ब्रह्मा ने यश और पूजन का, धर्मदेव ने धर्म तथा दया का आशीर्वाद दिया। शिव ने उदारता, बुद्धि, शक्ति एवं आत्म संयम का आशीर्वाद दिया। लक्ष्मी ने  कहा कि जहां गणेश रहेंगे, वहां मैं रहूंगी।’ सरस्वती ने वाणी, स्मृति एवं वक्तृत्व-शक्ति प्रदान की। सावित्री ने बुद्धि दी। त्रिदेवों ने गणेश को अग्रपूज्य, प्रथम देव एवं रिद्धि-सिद्धि प्रदाता का वर प्रदान किया। इसलिये वे सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक लोकप्रियता वाले देव है।
ऋद्धि-सिद्धि गणेशजी की पत्नियाँ हैं। वे प्रजापति विश्वकर्ता की पुत्रियां हंै। गणेश की पूजा यदि विधिवत की जाए, तो इनकी पतिव्रता पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि भी प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख-शांति-समृद्धि और संतान को निर्मल विद्या-बुद्धि देती है। सिद्धि से ‘क्षेम’ और ऋद्धि से ‘लाभ’ नाम के शोभा सम्पन्न दो पुत्र हुए। जहां भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं, मंगलकर्ता हैं तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है। वहीं शुभ-लाभ हर सुख-सौभाग्य देने के साथ उसे स्थायी और सुरक्षित रखते हैं। जन-जन के कल्याण, धर्म के सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने एवं सुख-समृद्धि-निर्विघ्न शासन व्यवस्था स्थापित करने के कारण मानव-जाति सदा उनकी ऋणी रहेगी। आज के शासनकर्ताओं को गणेश के पदचिन्हों पर चलने की जरूरत है। गणेशजी भारत सहित सिंध और तिब्बत से लेकर जापान और श्रीलंका तक की संस्कृति में समाये हैं। वे जैन सम्प्रदाय में ज्ञान का संकलन करने वाले गणाध्यक्ष के रूप में मौजूद रहते हैं तो बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का विश्वास है कि गणेश की स्तुति के बिना मंत्र सिद्धि नहीं हो सकती। नेपाली एवं तिब्बती वज्रयानी बौद्ध अपने आराध्य तथागत की मूर्ति के बगल में गणेश को स्थापित करते हैं।
संसार में अनुकूल के साथ प्रतिकूल, शुभ के साथ अशुभ, ज्ञान के साथ अज्ञान, सुख के साथ दुःख घटित होता ही है। प्रतिकूल, अशुभ, अज्ञान एवं दुःख से परेशान मनुष्य के लिये गणेश ही तारणहार है। वे सात्विक देवता हैं। वे न केवल भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली के कण-कण में व्याप्त है बल्कि विदेशों में भी घर-कारों-कार्यालयों एवं उत्पाद केन्द्रों में विद्यमान हंै। हर तरफ गणेश ही गणेश छाए हुए है। मनुष्य के दैनिक कार्यों में सफलता, सुख-समृद्धि की कामना, बुद्धि एवं ज्ञान के विकास एवं किसी भी मंगल कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने हेतु गणेशजी को ही सर्वप्रथम पूजा जाता है, याद किया जाता है। प्रथम देव होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है, लोकनायक का चरित्र हंै।
प्राचीन काल से हिन्दू समाज कोई भी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए उसका प्रारम्भ गणपति की पूजा से ही करता आ रहा है। भारतीय संस्कृति एक ईश्वर की विशाल कल्पना के साथ अनेकानेक देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना से फलती-फूलती रही है। सब देवताओं की पूजा से प्रथम गणपति की पूजा का विधान है। बड़े एवं साधारण सभी प्रकार के लौकिक कार्यों का आरंभ उनके दिव्य स्वरूप का स्मरण करके किया जाता है। व्यापारी अपने बही-खातों पर ‘श्री गणेशाय नमः’ लिख कर नये वर्ष का आरंभ करते हैं। प्रत्येक कार्य का शुभारंभ गणपति पूजन एवं गणेश वंदना से किया जाता है। विवाह का मांगलिक अवसर हो या नए घर का शिलान्यास, मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा का उत्सव हो या जीवन में षोड्स संस्कार का प्रसंग, गणपति का स्मरण सर्वप्रथम किया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जो भक्ति-पूर्वक गणेश की पूजा-अर्चना करता है, उसके सम्मुख विघ्न कभी नहीं आते। गणपति गणेश अथवा विनायक सभी शब्दों का अर्थ है देवताओं का स्वामी अथवा अग्रणी।
गणेशजी की आकृति विचित्र है, किन्तु इस आकृति के आध्यात्मिक संकेतों के रहस्य को यदि समझने का प्रयास किया जाये तो सनातन लाभ प्राप्त हो सकता है। क्योंकि गणेश अर्थात् शिव पुत्र अर्थात शिवत्व प्राप्त करना होगा अन्यथा क्षेम एवं लाभ की कामना सफल नहीं होगी। गजानन गणेश की व्याख्या करें तो ज्ञात होगा कि ‘गज’ दो व्यंजनों से बना है। ‘ज’ जन्म अथवा उद्गम का प्रतीक है तो ‘ग’ प्रतीक है गति और गंतव्य का। अर्थात् गज शब्द उत्पत्ति और अंत का संकेत देता है-जहाँ से आये हो वहीं जाओगे। जो जन्म है वही मृत्यु भी है। ब्रह्म और जगत के यथार्थ को बनाने वाला ही गजानन गणेश है।
गणेशजी की सम्पूर्ण शारीरिक रचना के पीछे भगवान शिव की व्यापक सोच रही है। एक कुशल, न्यायप्रिय एवं सशक्त शासक एवं देव के समस्त गुण उनमें समाहित किये गये हैं। गणेशजी का गज मस्तक हैं अर्थात वह बुद्धि के देवता हैं। वे विवेकशील हैं। उनकी स्मरण शक्ति अत्यन्त कुशाग्र हंै। हाथी की भ्रांति उनकी प्रवृत्ति प्रेरणा का उद्गम स्थान धीर, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना में है। हाथी की आंखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती हैं और उन आँखों के भावों को समझ पाना बहुत कठिन होता है। दरअसल गणेश तत्ववेत्ता के आदर्श रूप हैं। गण के नेता में गुरुता और गंभीरता होनी चाहिए। उनके स्थूल शरीर में वह गुरुता निहित है। उनका विशाल शरीर सदैव सतर्क रहने तथा सभी परिस्थितियों एवं कठिनाइयों का सामना करने के लिए तत्पर रहने की भी प्रेरणा देता है। उनका लंबोदर दूसरों की बातों की गोपनीयता, बुराइयों, कमजोरियों को स्वयं में समाविष्ट कर लेने की शिक्षा देता है तथा सभी प्रकार की निंदा, आलोचना को अपने उदर में रख कर अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने को प्रेरित करता है। छोटा मुख कम, तर्कपूर्ण तथा मृदुभाषी होने का द्योतक है।
 गणेश का व्यक्तित्व रहस्यमय हैं, जिसे पढ़ पाना एवं समझ पाना हर किसी के लिये संभव नहीं है। शासक भी वही सफल होता है जिसके मनोभावों को पढ़ा और समझा न जा सके। इस प्रकार अच्छा शासक वही होता है जो दूसरों के मन को तो अच्छी तरह से पढ़ ले परन्तु उसके मन को कोई न समझ सके। दरअसल वे शौर्य, साहस तथा नेतृत्व के भी प्रतीक हैं। उनके हेरांब रूप में युद्धप्रियता का, विनायक रूप में यक्षों जैसी विकरालता का और विघ्नेश्वर रूप में लोकरंजक एवं परोपकारी स्वरूप का दर्शन होता है। गण का अर्थ है समूह। गणेश समूह के स्वामी हैं इसीलिए उन्हें गणाध्यक्ष, लोकनायक, गणपति आदि नामों से पुकारा जाता है।
गज मुख पर कान भी इस बात के प्रतीक हैं कि शासक जनता की बात को सुनने के लिए कान सदैव खुले रखें। यदि शासक जनता की ओर से अपने कान बंद कर लेगा तो वह कभी सफल नहीं हो सकेगा। शासक को हाथी की ही भांति शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी होना चाहिए। अपने एवं परिवार के पोषण के लिए शासक को न तो किसी पर निर्भर रहना चाहिए और न ही उसकी आय के स्रोत ज्ञात होने चाहिए। हाथी बिना झुके ही अपनी सूँड की सहायता से सब कुछ उठा कर अपना पोषण कर सकता है। शासक को किसी भी परिस्थिति में दूसरों के सामने झुकना नहीं चाहिए।
गणेशजी सात्विक देवता हैं उनके पैर छोटे हैं जो कर्मेन्द्रिय के सूचक और सत्व गुणों के प्रतीक हैं। मूषक गणपति का वाहन है जो चंचलता एवं दूसरों की छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रेरक है। दरअसल मूषक अत्यंत छोटा एवं क्षुद्र प्राणी है। इसे अपना वाहन बना कर गणपति ने उसकी गरिमा को बढ़ाया है और यह संदेश दिया है कि गणनायक को तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति के प्रति भी स्नेहभाव रखना चाहिए। गणेशजी की चार भुजाएँ चार प्रकार के भक्तों, चार प्रकार की सृष्टि और चार पुरुषार्थों का ज्ञान कराती है।
गणेशजी को प्रथम लिपिकार माना जाता है उन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर वेद व्यासजी द्वारा रचित महाभारत को लिपिबद्ध किया था। अनंतकाल से अनेक नामों से गणेश दुख, भय, चिन्ता इत्यादि विघ्न के हरणकर्ता के रूप में पूजित होकर मानवों का संताप हरते रहे हैं। वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए गणेशजी की पूजा और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साहपूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है।

प्रेषकः-
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


लुटेरी दुल्हन ने एक-दो नहीं, बल्कि आठ-आठ शादियां करके अपने पति और ससुराल पक्ष को लुटा किया HIV संक्रमित !

लुटेरी दुल्हन ने एक-दो नहीं, बल्कि आठ-आठ शादियां करके अपने पति और ससुराल पक्ष को लुटा किया HIV संक्रमित !

09-Sep-2021

लुटेरी दुल्हन ने एक-दो नहीं, बल्कि आठ-आठ शादियां करके अपने पति और ससुराल पक्ष को लुटा किया HIV संक्रमित !
चंडीगढ़। लुटेरी दुल्हन ने एक-दो नहीं, बल्कि आठ-आठ शादियां करके अपने पति और ससुराल पक्ष को तो लूटा ही। साथ-साथ अब उनकी जान को भी जोखिम में डाल दिया है। एक हफ्ते पहले पंजाब के पटियाला में पुलिस के हत्थे चढ़ी लुटेरी दुल्हन के साथ चार साथी भी पकड़े गए थे। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप गिरफ्तार लुटेरी दुल्हन का जब मेडिकल टेस्ट कराया गया, तो वह एचआईवी पॉजिटिव निकली। एचआईवी पीड़ित होने का खुलासा होने पर पंजाब पुलिस के होश उड़ गए। अब पुलिस लुटेरी दुल्हन के सभी पूर्व पतियों की तलाश कर रही है ताकि उनका भी मेडिकल टेस्ट करा एचआईवी की आशंका को निर्मूल किया जा सके। गौरतलब है कि पटियाला में पुलिस ने 8 शादियां कर ससुराल पक्ष से लूटपाट करने वाली लुटेरी दुल्हन को गिरफ्तार किया था। उसके चार साथी भी पुलिस के हत्थे चढ़े थे। पुलिसिया पूछताछ में खुलासा हुआ था कि लुटेरी दुल्हन शादी करने के बाद ससुराल पक्ष से गहने और नकदी लेकर भाग जाती थी। एक हफ्ते पहले पकड़ी गई इस लुटेरी दुल्हन का पुलिस ने एड्स टेस्ट कराया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव निकली। अब पुलिस लुटेरी दुल्हन के शिकार बने उसके सभी पूर्व पतियों की तलाश कर उनका भी एचआईवी टेस्ट कराने जा रही है।
 
लुटेरी दुल्हन की कार्य़प्रणाली बहुत अलग नहीं थी, बल्कि हिंदी फिल्मों की ही तरह लगती है। वह अपने साथियों के साथ गिरोह बनाकर शादी के इच्छुक युवकों को फंसाती थी। शादी होने के बाद युवती घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाकर झगड़ा करती थी और फिर पंचायत बुला लेती। राजीनामे के बाद वह मौका पाकर ससुराल परिवार के गहने और नगदी लेकर भाग निकलती। इस काम में उसकी मां भी साथ देती थी। पुलिस के मुताबिक लुटेरी दुल्हन के शिकार हुए 8 में से 3 दूल्हे हरियाणा के हैं। पटियाला के जुलका इलाके में 9वें दूल्हे की तलाश के वक्त वह पकड़ी गई। जहां भी उसने शादी की, वहां सुहागरात के बाद एक हफ्ते रहकर आई। ऐसे में उसके द्वारा ठगे गए दूल्हों पर भी एड्स का खतरा मंडरा रहा है।
 
लुटेरी दुल्हन हरियाणा के कैथल की रहने वाली है और उसकी उम्र 30 साल है। आरोपी महिला की असली शादी 2010 में पटियाला में हुई थी, जिससे उसे तीन बच्चे हुए। उनकी उम्र अब 7 से 9 साल के बीच है। इसके बाद अचानक उसका पति गायब हो गया। इस दुल्हन ने पति से तलाक भी नहीं लिया। चार साल पहले उसने लुटेरी दुल्हन का धंधा शुरू किया, जिसके बाद पंजाब व हरियाणा में कुंवारे, तलाकशुदा या विधुर मर्दों को फंसाकर ठगी करने लगी। फिलहाल वह 9वीं शादी की तैयारी कर रही थी। इस बार उसने देवीगढ़ के एक युवक को अपने जाल में फंसाने की कोशिश की थी, जहां वह अपनी हरकत को अंजाम देने से पहले ही पकड़ी गई। लुटेरी दुल्हन ने पंजाब औऱ हरियाणा के तलाकशुदा और कुंवारे लोगों को अपने जाल में फंसाया था। 

 


किसान महापंचायत मुजफ्फरनगर...

किसान महापंचायत मुजफ्फरनगर...

06-Sep-2021

किसान महापंचायत मुजफ्फरनगर...

तौसीफ कुरेशी

हिन्दोस्तान के इतिहास में एक बड़ी रैली के रूप में दर्ज इस किसान रैली ने सफलता के नए झंडे गाड़ दिए हैं 5 लाख से ज़्यादा किसान जिनमे बुजुर्ग नौजवान बच्चे और महिलाएं बराबर की हिस्सेदारी कर रहे थे भारत के अनेक राज्यो से आये लाखों अनुशासित किसान, ये वही किसान थे जिनपर रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी हेलीकॉप्टर से फूल बरसाना चाहते थे मगर ज़िला प्रशासन ने इसलिए इजाज़त नही दी कि इससे भीड़ भड़क सकती है हालांकि ये सब जानते हैं कि ये अनुमति रद्द करने का फेंसला भीड़ के भड़कने का अंदेशा कम राजनीतिक ज़्यादा था,बहरहाल देश भर के किसान और किसान संगठन और तमाम किसान नेता एक साथ मंच और मैदान में जमा हुवे और सरकार को बखूबी दिखाया कि तमामतर सरकारी इंतजामात और बसें ट्रेन लगाकर पैसे देकर भी इतनी भीड़ इकट्ठा करना आज के दौर में नामुमकिन है |

देश भर में अबसे पहले जब प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी उस दौर में भी उनकी ऐसी कोई रैली याद नही आती जिसमे इतनी भीड़ कभी इकट्ठा हुई हो जबकि  पी एम सी एम की रैलियों में तमाम परिवहन अधिकारी गाड़ियों बसों ट्रेन की लाइन लगा देते हैं और स्थानीय नेता अपने नम्बर बढ़ाने के लिए भीड़ इकट्ठा करने को ख़ज़ानों के मुह खोल देते है मगर ये भीड़ नसीब नही हो पाती |

खैर तमाम किसान नेताओं ने एक सुर में कहा कि अत्याचारी मोदी योगी सरकार को अब जाना होगा,तीनो काले कानून वापिस लेने ही होंगे उसके बगैर कोई समझौता हरगिज़ नही,वही तमाम किसान नेताओ ने कहा कि अब ऐसी महापंचायत पूरे राज्य और देश भर में होंगी किसानों के बीच जाएंगे उनको जागरूक करेंगे उनकी फसलों और उसके दामो को लेकर आंदोलन भी किये जायेंगे झुकने या रुकने का कोई सवाल ही पैदा नही होता |

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव बहुत नजदीक हैं और ऐसे में योगी सरकार के लिए ऐसी किसान पंचायत खतरे की घंटी साबित हो सकती हैं किसानों का बदला रुख भाजपाई राजनीति को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है और भाजपा के जो कथित किसान नेता विधायक या मंत्री बने बैठे हैं यकीन मानिये वो ताश के पत्तो की तरह साबित होंगे जो एक पल में बिखर जाएंगे पश्चिम के गांव देहातो में हुई हाल फिलहाल की कई घटनाओं से ये साबित भी हो चुका है,वहीं किसान नेता योगेंद्र यादव ने अपने भाषण में साफ कहा कि योगी सरकार मुजफ्फरनगर में हिन्दू मुस्लिम को लड़ाकर खून बहाकर सता में आई थी मगर अब हिन्दू मुस्लिम एक हो चुका है आपस मे लड़ेगा नही,अगर ऐसा हो जाता है तो आने वाले चुनाव का माहौल किया रहेगा इसका अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता है और इसकी बानगी आज मुजफ्फरनगर में देखने को भी मिली जहां तमाम मुसलमानों ने किसानों के लिए खाने के भंडारे लगाए हलवा पूरी बांटी और किसानों के आराम के लिए मस्जिदों और मदरसों के दरवाजे खोल दिये यानी शुरुआत हो चुकी हैं |

खैर आने वाला वक़्त किया करवट लेने वाला है और ये किसान एकता बरकरार रहती है या फिर साजिशों का शिकार होती है ये तो हम नही जानते मगर ये तय बात है कि अगर किसान नेताओ और किसानों की एकता कायम रहती है तो मोदी योगी सरकार को लेने के देने पड़ सकते हैं।

 


शिक्षा क्रांति ही नहीं, शिक्षक क्रांति हो

शिक्षा क्रांति ही नहीं, शिक्षक क्रांति हो

04-Sep-2021

शिक्षक दिवस- 5 सितम्बर 2021 पर विशेष
शिक्षा क्रांति ही नहीं, शिक्षक क्रांति हो
- ललित गर्ग-

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गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। शिक्षक उस माली के समान है, जो एक बगीचे को अलग अलग रूप-रंग के फूलों से सजाता है। जो छात्रों को कांटों पर भी मुस्कुराकर चलने के लिए प्रेरित करता है। आज शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण एवं शिक्षा को हर घर तक पहुंचाने के लिए तमाम सरकारी प्रयास किए जा रहे हैं। इसकी सफलता के सशक्त माध्यम शिक्षक ही है और शिक्षकों को वह सम्मान मिलना चाहिए जिसके वे हकदार हैं। भारत के राष्ट्रपति, महान दार्शनिक, चिन्तक, शिक्षाशास्त्री डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस को 5 सितम्बर को पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गयी है, इसको लेकर देश में शिक्षा एवं शिक्षक पर व्यापक चर्चा आरंभ हो गई है। भारत की नई शिक्षा नीति में शिक्षा व्यवस्था के अलावा शिक्षकों की योग्यता एवं गुरुता पर विशेष ध्यान दिया गया है। पूरे देश में ‘एक जैसे शिक्षक और एक जैसी शिक्षा’ पॉलिसी पर काम किया जाएगा। इसके लिये अपेक्षित है कि केवल शिक्षा क्रांति ही नहीं, बल्कि शिक्षक क्रांति का शंखनाद हो।
आज की शिक्षा मिशन न होकर, व्यवसाय बन गयी है। तमाम शिक्षक एवं शिक्षालय अपने ज्ञान की बोली लगाने लगे हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो गुरु-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा छात्रों एवं छात्रों द्वारा शिक्षकों के साथ दुव्यर्वहार, मारपीट एवं अनुशासनहीनता की खबरें सुनने को मिलती हैं। इसे देखकर हमारी संस्कृति की इस अमूल्य गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगने लगे है। विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों का ही दायित्व है कि वे इस महान परंपरा को बेहतर ढंग से समझें और एक अच्छे समाज के निर्माण में अपना सहयोग प्रदान करें। शिक्षक दिवस एक अवसर है जब हम धुंधली होती शिक्षक की आदर्श परम्परा एवं शिक्षा को परिष्कृत करनेे और जिम्मेदार व्यक्तियों का निर्माण करने की दिशा में नयी शिक्षा नीति के अन्तर्गत ठोस कार्य करें।
‘गुरु‘ का हर किसी के जीवन में बहुत महत्व होता है। समाज में भी उनका अपना एक विशिष्ट स्थान होता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा में बहुत विश्वास रखते थे। वे एक महान दार्शनिक और शिक्षक थे। उन्हें अध्यापन से गहरा प्रेम था। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। एक बार उनके जन्मदिन पर उनके दोस्तों और कुछ छात्रों ने उन्हें जन्मदिन की बधाई देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया तो उन्होंने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से मनाने की जगह यदि शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाएगा तो मुझे गर्व महसूस होगा। तभी से देशभर में शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा।
वर्तमान समय में शिक्षक की भूमिका भले ही बदली हो, लेकिन उनका महत्व एवं व्यक्तित्व-निर्माण की जिम्मेदारी अधिक प्रासंगिक हुई है। क्योंकि सर्वतोमुखी योग्यता की अभिवृद्धि के बिना युग के साथ चलना और अपने आपको टिकाए रखना अत्यंत कठिन होता है। फौलाद-सा संकल्प और सब कुछ करने का सामथ्र्य ही व्यक्तित्व में निखार ला सकता है। शिक्षक ही ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करते हैं। महात्मा गांधी के अनुसार सर्वांगीण विकास का तात्पर्य है- आत्मा, मस्तिष्क, वाणी और कर्म-इन सबके विकास में संतुलन बना रहे। स्वामी विवेकानंद के अनुसार सर्वांगीण विकास का अर्थ है- हृदय से विशाल, मन से उच्च और कर्म से महान। सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास हेतु शिक्षक आचार, संस्कार, व्यवहार और विचार- इन सबका परिमार्जन करने का प्रयत्न करते रहते थे। इन्हीं सब चर्चाओं के मध्य हम देखेंगे कि 1986 की शिक्षा नीति में ऐसी क्या कमियाँ रह गई थीं जिन्हें दूर करने के लिये नई राष्ट्रीय शिक्षा नति को लाने की आवश्यकता पड़ी। साथ ही क्या यह नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति उन उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम होगी जिसका स्वप्न महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद ने देखा था? यह स्वप्न है जिसके माध्यम से मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का विकास, व्यवहार को परिष्कृत करना तथा ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि कर मनुष्य को योग्य नागरिक बनाना।
भारत के मिसाइल मैन, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा है कि अगर कोई देश भ्रष्टाचार मुक्त है और सुंदर दिमाग का राष्ट्र बन गया है, तो मुझे दृढ़ता से लगता है कि उसके लिये तीन प्रमुख सामाजिक सदस्य हैं जो कोई फर्क पा सकते हैं वे पिता, माता और शिक्षक हैं।” डाॅ. कलाम की यह शानदार उक्ति प्रत्येक व्यक्ति के दिमाग में आज भी गूंज रही हैं। यह उद्धरण समाज पर शिक्षकों के प्रभाव का प्रतीक है। नेतृत्व के रूप में माता-पिता के तुरंत बाद में खड़ा होना वाले शिक्षक वास्तव में हर किसी के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा होता है। शिक्षकों पर इस दुनिया में सबसे प्रेरक काम और एक बड़ी जिम्मेदारी है। शिक्षक ज्ञान का भंडार हैं जो अपने शिष्यों को अपना ज्ञान देने में विश्वास करते हैं जिससे उनके शिष्य भविष्य में दुनिया को बेहतर बनाने में सहायता कर सकेंगे। इससे ऐसी पीढ़ी निर्मित होगी जो उज्ज्वल और बुद्धिमान हो तथा वह जो दुनिया को उसी तरीके से समझे जैसी यह है और जो भावनाओं से नहीं बल्कि तर्क और तथ्यों से प्रेरित हो।
आदर्श अध्यापक के कर्तव्य है कि उनके व्यवहार में नम्रता एवं विनम्रता का भाव हो, उनमें सहजता गंभीरता एवं विद्वता झलकता हो ,उनकी वाणी ऐसी हो कि बच्चे के मन को जीत ले। वैसे तो शिक्षक का पद अत्यंत गरिमा पूर्ण होता है, क्योकिं ‘‘जिस प्रकार खेती के लिए बीज, खाद एवं उपकरण के रहते हुए, अगर किसान नहीं हैं, तो सब बेकार है। उसी प्रकार विद्यालय के भवन, शिक्षण सामग्री एवं छात्रों के होते हुए, शिक्षक नहीं हैं तो सब बेकार है।‘‘ एक शिल्पकार प्रतिमा बनाने के लिए जैसे पत्थर को कहीं काटता है, कहीं छांटता है, कहीं तल को चिकना करता है, कहीं तराशता है तथा कहीं आवृत को अनावृत करता है, वैसे ही हर शिक्षक अपने विद्यार्थी के व्यक्तित्व को तराशकर उसे महनीय और सुघड़ रूप प्रदान करतेे हैं। हर पल उनकी शिक्षाएं प्रेरणा के रूप में, शक्ति के रूप में, संस्कार के रूप में जीवंत रहती हैं। महान् दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ के शब्दों में -‘व्यक्तित्व-निर्माण का कार्य अत्यन्त कठिन है। निःस्वार्थी और जागरूक शिक्षक ही किसी दूसरे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है।’ हमने सुपर-30 फिल्म में एक शिक्षक के जुनून को देखा। इस फिल्म में प्रो. आनन्द के शिक्षा-आन्दोलन को प्रभावी ढंग से प्रस्तुति दी गयी है।
आज शिक्षक एवं शिक्षा का महत्व ज्यादा है। जैसाकि महात्मा गांधी ने कहा था-एक स्कूल खुलेगी तो सौ जेलें बंद होंगी। पर आज उल्टा हो रहा है। स्कूलों की संख्या बढ़ने के साथ जेलों के स्थान छोटे पड़ रहे हैं। जेलों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। स्पष्ट है- हिंसा और अपराधों की वृद्धि में वर्तमान शिक्षा प्रणाली एवं शिक्षक भी एक सीमा तक जिम्मेदार है। अशिक्षित और मूर्ख की अपेक्षा शिक्षित और बुद्धिमान अधिक अपराध कर रहे हैं। वह अपने पापों और दोषों पर आवरण डालने हेतु अधिक युक्तियां सोच सकते हंै। इस स्थिति के लिये शिक्षक ही जिम्मेदार है।
प्राचीन काल में शिक्षा का उद्देश्य ‘सा विद्या या विमुक्तये’ रहा अर्थात् विद्या वही है, जो मुक्ति दिलाए। आज शिक्षा का उद्देश्य ‘सा विद्या या नियुक्तये’ हो गया है अर्थात् विद्या वही जो नियुक्ति दिलाए। इस दृष्टि से  शिक्षा के  बदलते अर्थ ने समाज की मानसिकता को बदल दिया है। यही कारण है कि आज समाज में लोग केवल  शिक्षित होना चाहते हैं, सुशिक्षित नहीं बनना चाहते। वे चाहते हैं कि ज्ञान का सीधा संबंध उनके अर्थोपार्जन से ही है। जिस ज्ञान से अधिक से अधिक धन और उच्च पद को ग्रहण किया जाए वही शिक्षा कारगर है। पर चिंता का विषय है कि भारत के शिक्षक ही आज इसकी उपेक्षा कर रहे हैं। ऐसा लगता है, मानो उनका लक्ष्य केवल बौद्धिक विकास ही है। अब शिक्षक के लिये शिक्षा एक मिशन न होकर व्यवसाय हो गयी है। इन स्थितियों से शिक्षकों को बाहर निकलने में नई शिक्षा नीति से बहुत अपेक्षाएं है। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 

 

 


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स्वतंत्र भारत के सपने जो पूरे न हो सके  : राम पुनियानी का लेख

स्वतंत्र भारत के सपने जो पूरे न हो सके : राम पुनियानी का लेख

31-Aug-2021

स्वतंत्र भारत के सपने जो पूरे न हो सके  : राम पुनियानी का लेख

स्वाधीनता दिवस पर चिंतन

औपनिवेशिक शासन से भारत की मुक्ति के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं के सपनों और आकांक्षाओं का अत्यंत सारगर्भित वर्णन अपने प्रसिद्ध भाषण ‘ए ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ में किया था. उन्होंने कहा था, “जिस उपलब्धि का उत्सव हम आज मना रहे हैं वह बड़ी जीतों और उपलब्धियों की राह में एक छोटा सा कदम भर है”. अपने वायदों को पूरा करते हुए नेहरू ने भारत के प्रजातंत्र को मजबूत और गहन बनाने और एक व्यक्ति एक मत के सिद्धांत को साकार करने की दिशा में कई कदम उठाए. इसके समानांतर उन्होंने आधुनिक भारत की नींव भी रखी. जो नीतियां उन्होंने अपनाईं निःसंदेह उनमें कुछ कमियां रही होंगीं परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि उन नीतियों के कारण देश ने विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में आशातीत प्रगति की. सीएसआईआर, बार्क और आईआईटी इसके कुछ उदाहरण हैं. इन्हीं नीतियों के फलस्वरूप देश में हरित और फिर श्वेत क्रांति आई और औसत भारतीय के जीवनस्तर में सुधार हुआ. समय के साथ दलितों और पिछड़ों के सशक्तिकरण के लिए सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई गई और दूरस्थ आदिवासी इलाकों में भी विकास की बयार पहुंची.

ऐसा नहीं था कि सब कुछ एकदम बढ़िया था. नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन में कई बाधाएं आईं. वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन भले ही भारत के संवैधानिक लक्ष्यों में शामिल रहा हो परंतु देश परंपरानिष्ठ ही बना रहा और अंधश्रद्धा और अंधविश्वास से जनमानस की पूर्ण मुक्ति नहीं हो सकी. समाज पर धार्मिकता की पकड़ कमजोर भले हुई हो परंतु समाप्त नहीं हुई. इसी धार्मिकता को उभारकर साम्प्रदायिक ताकतों ने राममंदिर के मुद्दे को हवा दी और इस मुद्दे ने देश में साम्प्रदायिक ताकतों के प्रभाव क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि की. हमारे गणतंत्र की विकास यात्रा में यह पहली बड़ी बाधा थी. इसके बाद तो राज्य की प्राथमिकताएं ही बदल गईं. साम्प्रदायिक ताकतें, जो समाज के हाशिए पर थीं, केन्द्र में आ गईं और बाबरी मस्जिद के ढ़हाए जाने के बाद से उनके बोलबाला बहुत बढ़ गया. सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों के साथ देश में साम्प्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप लेना शुरू कर दिया. मुंबई (1992-93), गुजरात (2002), कंधमाल (2008), मुजफ्फरनगर (2013) और दिल्ली (2020) इसके उदाहरण हैं.

सिक्ख-विरोधी हिंसा एक बार घटित होने वाली त्रासदी थी परंतु मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का कोई अंत न था. वह बार-बार और देश के अलग-अलग इलाकों में जारी रही. पिछले कुछ दशकों में देश में ईसाई-विरोधी हिंसा भी जड़ें जमाने लगी है. यद्यपि यह हिंसा बहुत बड़े पैमाने पर नहीं होती परंतु यह अनवरत जारी रहती है. भाजपा के अपने बल पर केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से हालात बद से बदतर हो गए हैं. अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का भाव बढ़ता जा रहा है और सभी हाशियाकृत समुदाय निशाने पर हैं. इस सरकार का एजेंडा साम्प्रदायिक है और यही कारण है कि हाशियाकृत समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में लगातार गिरावट आ रही है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2019 की रपट के अनुसार अनुसूचित जातियां पर हमले की घटनाओं में 7.3 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों पर हमले की घटनाओं में 26.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. अल्पसंख्यक तेजी से अपने-अपने मोहल्लों में सिमट रहे हैं. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भारत के निवासियो में परस्पर बंधुत्व का जो भाव विकसित हुआ था उसका स्थान शत्रुता के भाव ने ले लिया है.

यद्यपि हमारी सरकार यह दावा करती है कि ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ उसकी नीति है परंतु सच यह है कि उसके राज में चंद कारपोरेट घराने और श्रेष्ठि वर्ग का एक तबका तो दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा है परंतु आम लोगों की जिंदगी दूभर होती जा रही है. जीवन के लिए आवश्यक चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं और पेट्रोल और डीजल के दाम रोजाना बढ़ रहे हैं.

प्रेस की स्वतंत्रता, भूख, रोजगार व अन्य सामाजिक सूचकांकों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति में सुधार हो रहा था परंतु अब हालात इसके ठीक उलट हो गए हैं. सेंटर फॉर इकानामिक डेटा एंड एनालिसिस के अनुसार भारत की वर्तमान बेरोजगारी दर, 1991 के बाद से सबसे ज्यादा है. सन् 2019 में यह दर 5.27 प्रतिशत थी जो 2020 में बढ़कर 7.11 प्रतिशत हो गई. इसके मुकाबले बांग्लादेश में यह दर 5.13, श्रीलंका में 4.84 और पाकिस्तान में 4.65 प्रतिशत है.

प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में विश्व के देशों में भारत का रेंक सन् 2016 के 133 से गिरकर सन् 2020 में 142 रह गया है. इस सूचकांक में नेपाल का रेंक 106, श्रीलंका का 127, पाकिस्तान का 145 और बांग्लादेश का 152 है. जहां तक धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल है, इतिहास में पहली बार यूएस कमीशन आन इंटरनेशनल फ्रीडम ने भारत को सबसे निचली श्रेणी ‘कंट्रीज ऑफ पर्टीक्युलर कन्सर्न’ (वे देश जो विशेष चिंता का विषय हैं) में रखा है. देश में सीएए व एनआरसी को लागू किए जाने की चर्चा और दिल्ली व अन्य इलाकों में अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा के प्रकाश में भारत को इस श्रेणी में स्थान दिया गया है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट, 2019 में 117 देशों में भारत का दर्जा 102वां है. भारत की सरकार की विरोधियों और आंदोलनकारियों के खिलाफ असहिष्णुता का आलम यह है कि पिछले 8 महीने से राष्ट्रीय राजधानी की सीमा पर बैठे किसानों से सरकार कोई सार्थक संवाद प्रारंभ तक नहीं कर सकी है.

पिछले सात वर्षों में गौमांस, लव जिहाद, घर वापिसी आदि जैसे मुद्दों के चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध नफरत और हिंसा का वातावरण बना है और देश के नागरिकों की मूलभूत समस्याओं पर से लोगों का ध्यान हटाने के भरपूर प्रयास हुए हैं. आज देश में जीवनयापन के साधनों, कृषि, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाएं और बेहतर शैक्षणिक संस्थानों पर बात नहीं होती. बात होती है उन भावनात्मक मुद्दों पर जिन्हें सरकार अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय विमर्श के केन्द्र में बनाए रखना चाहती है. देश अब भी नोटबंदी के झटके से उबर नहीं सका है. छोटे व्यापारी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है.

सरकार देश की शासन व्यवस्था के संघीय चरित्र को नष्ट करने पर आमादा है. अनेक राज्यों के राज्यपाल सत्ताधारी पार्टी के नेताओं जैसा व्यवहार कर रहे हैं. कोविड महामारी से जिस तरह निपटा गया और जिस प्रकार बिना किसी चेतावनी के देश में लॉकडाउन लागू किया गया उससे जाहिर होता है कि हमारी सरकार को आम लोगों की जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है. पेगासस मामले में खुलासों ने देश की अर्न्तात्मा को झकझोर कर रख दिया है.

वर्तमान सरकार और उसके पथप्रदर्शक आरएसएस ने हमारे देश को प्रजातंत्र, बंधुत्व और जनकल्याण के मामलों में कई दशक पीछे धकेल दिया है. और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है क्योंकि इस सरकार का एजेंडा धार्मिक अल्पसंख्यकों के बहिष्करण और जातिगत व लैंगिक पदक्रम को बनाए रखना है ताकि उन धर्मग्रंथों की शिक्षाओं का अक्षरशः पालन हो सके जो इस सरकार की राजनैतिक विचारधारा का आधार हैं. हम केवल यह उम्मीद कर सकते हैं कि जल्द से जल्द इस विचारधारा की बजाए हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम के मूल्य हमारे पथप्रदर्शक बनें.