छत्तीसगढ़ काँग्रेस की कार्यकारणी में फिर से जान फूंकने की कवायद

छत्तीसगढ़ काँग्रेस की कार्यकारणी में फिर से जान फूंकने की कवायद

12-Jan-2018

खुलासा पोस्ट मैगजीन का लेख 

जिस तरह से अखिल भारतीय कांग्रेस के हवाले से छत्तीसगढ़ के प्रभारी महासचिव श्री पी. एल. पूनिया के द्वारा छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की नए टीम की घोषणा की गई जो निश्चित ही स्वागत योग्य है, लेकिन समझने वाले को इतना ही इशारा काफी है की श्री राहुल गाँधी अभी-अभी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने है और उन्होंने अभी AICC  के अपनी पूरी टीम की घोषणा अभी नहीं की है,  तो फिर छत्तीसगढ़ काँग्रेस की कार्यकारणी केवल जान फूंकने की कवायद ही मानी जाएगी ।

अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्वेदी के 6 जनवरी के पत्र के हवाले से राहुल गाँधी जी के आदेश के अनुसार अभी वे सभी प्रदेशो के अध्यक्ष बने रहेंगे, उनके सक्रियता और कार्यो के हिसाब से ही उनकी आगे की जिम्मेदारी तय किया जाना है ऐसे में अभी चुनाव को 1 वर्ष है और कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय क्या होंगे ये समय बताएगा | वैसे प्रभारी महासचिव जी के द्वारा किया गया ये ऐलान बड़े दम खम के साथ किया गया है जो काँग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए उत्साहित करने वाला है |

लेकिन अब भी एक सवाल छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के लिये खड़ा हुआ है,  क्या कार्यकर्ताओ को पुरे  सम्मान के साथ जिम्मेदारी दी जा रही है ?  यहाँ PCC  में तो चन्द गिनती के चेहरे ही काँग्रेस भवन में मँडराते दिखाई देते हैं, और जो वास्तविक में असरदार लोग है जो की ज़मीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता है उनकी पूछ परख अभी भी संगठन में नहीं हो रही है |  कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इनके इस निर्णय से नाराज़ दिख रहे है जिन्हें मनाने की अब भी ज़रुरत है, जो इनके कार्यक्रमों से भी दूरी बनाते जा रहे है, जो की संगठन के लिए नुकसान दायक है ?

 श्री पुनिया जी को शायद वास्तविकता का सही-सही पता नही है लगता है, और उन्होंने चुनावी 20 -20  मैच के लिये टीम की घोषणा भी कर दी है जो की हैरान करने वाला है, जो कप्तानी करना चाहते थे उन्हें कोच बना कर रिटायर कर दिया और मैच से बाहर का रास्ता दिखा दिया और 2  बड़े बड़े आल राउंडर टीम में है जो मैच जिताने का पूरा दम रखते थे उन्हें मैच से पहले ही टीम के लिये अयोग्य ठहरा दिया गया है,  और डमी उपकप्तानो पर भरोसा कर रहे है, और जो जीत के परिणाम को पलटने की हिम्मत रखते है उन्हें मैच से बाहर रख कर मैच जितना चाहते है

जो की आत्मघाती कदम हो सकता है क्योकि वर्तमान कप्तान के नेतृत्व को कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग बिलकुल भी नहीं पसन्द करता है खैर अभी शुरुवाती दौर है और चुनावी मैच शुरू होने में अभी समय है अभी तो बहुत से रंग बदलेंगे, अभी कार्यकारणी में खींच-तान टिकटों का बंटवारा और भी तोड़ जोड़ और भी बहुत कुछ अभी होना बाकी है | प्रभारी महासचिव 2019 में हमारी यही सलाह आपको काम आएगी !

 
 

धर्मो को लेकर बंटती दुनिया !

धर्मो को लेकर बंटती दुनिया !

09-Jan-2018

लेख : एम.एच. जकरीया 

आज ये समस्या केवल भारत की ही नही बल्के पूरे विश्व की बनती जा रही हैं - अब जहाँ देखो वहां सिर्फ धर्म के नाम पर ही इंसान इंसान को मारे जा रहा है ,चाहे फ्रांस हो या जर्मनी या अमेरिका का रंग भेद या इस्लाम के नाम पर मार काट हो, चाहे पाकिस्तान में शिया समुदाय का सुन्नी मुसलमानों के साथ लड़ाई हो या अफगानिस्तान में धार्मिक कट्टरता के नाम पर तालिबानों का जुल्म हो। 

इतिहास बताता है की कैसे सत्ता पाने के शासक वर्ग अधिक से अधिक सत्ता अपने हाथों में केंद्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया करते थे. इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि राजाओं ने अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराना शुरू कर दिया था  अगर कोई ईसाई राजा अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था तो उसके लिए किए जाने वाले युद्ध को वह ‘क्रूसेड’  बताता था. इसी तरह, मुस्लिम राजा कभी युद्ध नहीं करते थे, वे हमेशा जिहाद करते थे. हिंदू राजाओं की हर लड़ाई धर्मयुद्ध हुआ करती थी. और धीरे धीरे यही धर्मयुध्द ने साम्प्रदायिकता का ज़ामा पहन लिया

समय के साथ-साथ पूरी दुनिया में सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया है. भारत में वह हिंदू धर्म का चोला ओढ़े है तो बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस्लाम का. श्रीलंका और म्यांमार में वह बौद्ध धर्म के वेश में है. इज़राइल और फलस्तीन में यहूदी और मुस्लमान का इंग्लैंड और अमेरिका में काले और गोरो पर  इस हिंसा इनसभी का मात्र एक  लक्ष्य और एजेंडा है किसी तरीके से भी सत्ता को पाना धर्म के बारे में सामान्य रूप से कहा जाता है कि यह जीवन जीने का रास्ता बताता है। सभी धर्मों में इसी बात को लेकर अलग-अलग व्याख्या है।

मैं विभिन्न धर्मों व पंथों के बारे में व उनके मतों के बारे में गहराई में नहीं कहना चाहता। पर मेरा मानना है कि धर्म के नाम पर राजनीती और गुमराह करना अब खतरनाक रूप लेता जा रहा है , अभी-अभी की कुछ घटनाओं को समझें तो आप खुद ही बेहतर समझ जायेंगे कुछ चालक किस्म के लोग हम सब को धर्म के नाम पर गुमराह करने में लगे है | 

धर्म केवल नियम कानूनों में बँधना नहीं बल्कि धर्म इंसान को एक-दूसरे इंसान के साथ इंसानियत का भाव बनाए रखने में मदद करता है। आज के परिप्रेक्ष्य में यही जरूरी है। हम न केवल धर्म को बल्कि साधारण सी समस्याओं का भी राजनीतिकरण करने से नहीं चूकते। लगभग सभी धर्म, अपने-अपने संदर्भों में, मानवतावाद की बात करते हैं परंतु न जाने क्यों, धर्मों के दार्शनिक पक्ष की बजाए उनके रीतिरिवाज, सामुदायिक कार्यक्रम और पुरोहित–मौलवी उनकी पहचान बन गए है और अब तो फ़रमान – और फतवों ने धर्म का आड़ लेकर इन्सान को इन्सान से जुदा करने में लगा है !

धर्म के नाम पर हिंसा के संदर्भ में इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है. जहां खोमैनी के बाद इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताया गया, वहीं 9/11 के बाद खुलकर, इस्लामिक आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल होने लगा. समय के साथ अलकायदा उभरा जो मध्य व पश्चिम एशिया में आतंकवादी हिंसा की अधिकतर वारदातों के पीछे था. 
बोको हराम, आईसिस और अलकायदा की तिकड़ी, इस्लामिक पहचान को केंद्र में रखकर वीभत्स हिंसा कर रही है.

यह प्रक्रिया शुरू हुई थी अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों को काफिर बताकर उन पर हमला करने के आह्वान से. अब हालत यह है कि मुसलमानों का एक पंथ ही दूसरे पंथ के सदस्यों को काफिर बता रहा है और अत्यंत क्रूर व दिल दहलाने वाले तरीकों से लोगों की जान ली जा रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तिकड़ी द्वारा जिन लोगों की जान ली गई है, उनमें से सबसे ज्यादा मुसलमान ही मारे गए अन्य कोई और नहीं !


कब तक बंटते रहेंगे हम जाति और धर्म के नाम पर ?

कब तक बंटते रहेंगे हम जाति और धर्म के नाम पर ?

05-Jan-2018

By : khulasapost magazine story

Writer : Akash Bhatt

अभी हाल ही में महाराष्ट्र के कोरे गांव में दलितों पर हमले हुए आखिर इन सभी घटनाओं के पीछे एक ही कारण हैं राजनीति , हर शक्तिशाली वर्ग कमज़ोरों पर हावी होना चाहता हैं | और यह सदियों से होता आ रहा है ,पर इसका वर्तमान स्वरूप काफी व्यथित करने वाला और भयावाह है। भीमा-कोरे गांव लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर हुई हिंसा से पूरे महाराष्ट्र में तनाव का माहौल बना हुआ है अखबारों के पन्नो और न्यूज चैनलों में इस हिंसा की खबर देखने के बाद दिमाग में कई सवाल उपजते हैं की आखिर यह भीमा-कोरे गांव लड़ाई की सालगिरह क्या है, क्यों दलित इस लड़ाई की सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं ? इन सवालों के जवाब के लिए हमें इतिहास के पन्नो पर झाँकना होगा की आखिर भीमा-कोरे गांव लड़ाई क्या है. 

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई आज से 200 साल 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी. यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी. अंग्रेजों की तरफ से महार समुदाय के 500 लड़ाकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 सैनिकों को हराया था. यह बात आपको सोचने के लिए जरुर मजबूर करेगा की आखिर महारों ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ाई क्यों लड़ी तो इस संबंध में दलित मामलों के जानकार डॉ. शैलेंद्र लेंडे के मुताबिक, 

Image may contain: text

“जब शिवाजी ने मराठा राज्य स्थापित किया तब उनकी सेना में दलित भी हुआ करते थे. बाद में जब पेशवा शासकों के हाथ सत्ता आई तो दलितों का शोषण होने लगा. उस वक्त दलित चाहते थे कि वो पेशवा की सेना में शामिल हों, लेकिन जाति प्रथा और सामाजिक धारणाओं के कारण उन्हें सेना में शामिल नहीं किया गया. बता दें कि पेशवा ब्राह्मण समाज से आते थे. छूआछूत जैसी प्रथा के कारण दलित और ब्राह्मणों में हमेशा मतभेद रहा” 

इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए. वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

उस समय अंग्रेज भारत में दमनकारी नीति के तहत सभी सियासतों पर कब्ज़ा चाहते थे. उस दौर में पुणे में पेशवा शक्तिशाली माने जाते थे. अंग्रेजों ने उनपर कई बार हमले किये, इसके बावजूद वे कामयाब नहीं हो पा रहे थे. बाद में जब महार समुदाय की बगावत सामने आई तो अंग्रेजों ने उन्हें अपने साथ मिलाया और कोरेगांव युद्ध में जीत हासिल की. ऐसा कहा जाता है कि इस हार के बाद पेशवाओं का बाकी इलाकों में राज कमजोर हो गया.

उस लड़ाई में मारे गए महार सैनिकों को उनकी वीरता और साहस के लिए सम्मानित किया गया और उनके सम्मान में भीमा कोरेगांव में स्मारक भी बनवाया, जिन पर महारों के नाम लिखे गए. इसके बाद से पिछले कई दशकों से भीमा कोरेगांव की इस लड़ाई का महाराष्ट्र के दलित जश्न मनाते आ रहे हैं. हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं. 

यही वो जयस्तंभ है, जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी. कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं

जनरल थॉमस हिस्लोप ने इस युद्ध को "सेना के इतिहास में दर्ज किए गए सबसे वीर और शानदार उपलब्धियों में से एक" कहा। एमएस नारावने के अनुसार, "एक विशाल संख्या में मराठा सेना के खिलाफ कंपनी के सैनिकों की एक छोटी संख्या द्वारा दिखाई गई वीरता सही रूप में कंपनी की सेनाओं के इतिहास में वीरता और धैर्य का सबसे गौरवशाली उदाहरण माना जाता है।"

माना जाता है कि युद्ध में किसी भी पक्ष ने निर्णायक जीत हासिल नहीं की थी लेकिन पेशवा की बड़ी सेना को महारों की बहुलता वाली कंपनी की एक छोटी टुकड़ी से कड़ी टक्कर मिली, यह बात महत्व रखती है। हालांकि आज इस युद्ध को ऊंची जाति पेशवाओं पर निचली जाति की जीत के रूप में चित्रित किया जाता है । अभी ताजा संघर्ष की शुरुआत 1 जनवरी को हुई जब भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं बरसी पर दलित समुदाय ने हर साल की तरह जुलूस निकाला. जिस पर कुछ कथित हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पथराव करने का आरोप है. इससे हिंसा और भड़क गई और एक व्यक्ति की मौत हो गई. यह हिंसा एक क्षेत्र से निकल के लगभग पूरे महाराष्ट्र में फैल गई  

 

नारी उत्पीड़न क्यों ? क्योंकि महिला ही महिला की दुश्मन है !

नारी उत्पीड़न क्यों ? क्योंकि महिला ही महिला की दुश्मन है !

28-Dec-2017

लेख : एम.एच. जकरीया 

हमारी देश की संस्कृति में  औरत का मकाम सब से ऊंचा माना जाता है ,आज भी नारी को  परिवार व समाज की अस्मिता समझी जाती है । हमारे पूर्वजों और धार्मिक मान्यताओं में भी नारी जाती को देवी का स्थान प्राप्त है। लेकिन फिर भी आये दिन हमारे ही इस देश में महिलाओ के साथ उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाए बढ़ती जा रही है , हाल ही में एक  पत्रिका के संस्थापक और मुख्य सम्पादक  पर, बेटी की उम्र की सहयोगी महिला पत्रकार ने उत्पीड़न का आरोप लगाया और दूसरी घटना निर्भया की थी जैसे ही ये घटनाए हुई  मीडिया ने  चारों तरफ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया, टी वी चेनलो में डिबेट और गहन मंथन का कार्यक्रम चल पड़ा ।

कोई भारतीय परम्परा को ही दोषी बता रहा है, तो कोई कानून व्यवस्था पर ऊँगली उठा रहा है; कोई पुरुषों की मानसिकता को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई नारी की कमजोरी को इसके लिए दोषी मान रहा है। नारी अस्मिता की रक्षा पर चिंतन करने के बजाय दोष किसका, इसपर मंथन चल रहा है। यह चिंताजनक बात है। ऐसे में भारतीय समाज में महिला विषयक दृष्टिकोण पर विचार करना होगा।अश्लीलता के कारण ही महिलाओ पर अपराधों में बढ़ोतरी हुई है | 

नारी उत्पीड़न के लिए इमेज परिणाम

हमारे समृद्ध व प्रबुद्ध समाज ने स्वच्छंदता के नाम पर इन नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ीं है । विशेषकर समाज के पढ़े-लिखे लोग जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का ढोल पीटते हैं, उन्होंने  स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता नारी शक्ति को सरेआम तमाशा और मनोरंजन का साधना बना दिया। मॉडलिंग, एक्टिंग और डांसिंग के नाम पर नारी अस्मिता को सरेआम बेचा जाने लगा है। फैशन और प्रदर्शन  के नाम पर लोकलु भावन बनने की होड़ लग सी गई है और मशहूर होने के भ्रामक चाह ने नारी की तरफ देखने की पुरुषों की दृष्टि को कामुक बना दिया है ।

हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में नारी-अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते क्या अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखने वाले समाज का निर्माण होगा?
 
विश्व के सभी देशों में किसी न किसी रूप में नारी उत्पीडि़त है, चाहे व विकसित देश हों या विकासशील. पुरुषों की तरह अधिकार व स्वतंत्रता पाने के लिए महिलाएं संगठन बना कर आवाज भी उठाती हैं लेकिन  वह भी सिर्फ हो हल्ला मचा कर ख़ामोशी  . आज के समय में हमारा  समाज स्त्री के अधिकारों को मान्यता देने का ढोल ज़रूर पीटता  है लेकिन पुरुष प्रधान समाज आज भी महिलाओ को  आगे बढ़ने के समय वह रोड़े भी अटकाता है क्योंकि पुरुष खुद अपने वर्चस्व में कमी नहीं आने देना चाहता. हर साल 8 मार्च को पूरा विश्व महिला दिवस के रूप में मनाता ज़रूर है.

लेकिन फ़िर वही खड़े नज़र आते है यहाँ बड़ी बड़ी बातें ज़रूर की जाती हैं.लेकिन धरातल पर परिणाम कुछ भी नहीं निकलता ? मानवाधिकार आयोग व संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी अपनी रिपोर्ट पेश करते हैं. गलतियों को सुधारने के लिए पहले किए गए प्रण को फिर से दोहराया जाता है, पर होता कुछ नहीं. उदाहरण के लिए आज भी भारत में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल संसद में वर्षों से लटक रहा है.

नारी  ही  परिवार की रीढ़ होती है परन्तु फिर भी नारी का उत्पीड़न व शोषण होता हुआ आ रहा है, लेकिन क्यो? देश मे अनगिनत संस्थाऐ है जो महिला उत्थान के लिये प्रयासरत है और सरकार भी अनेकानेक प्रयास कर रही है परन्तु फिर भी अच्छा परिणाम नही मिलता। महिला उत्थान को समर्पित संस्थाएं महिलाओ को उनके अधिकार व शोषण के प्रति जागरूक कर रही है परन्तु अधिकतर गॉव-देहात मे नारियो की मानसिकता अभी भी वैसी ही है अर्थात पुरानी मानसिकता वाली महिलाऐ जिनकी वजह से आने वाली भावी नारियो के उत्पीड़न को बढ़ावा मिल रहा है क्योकि क्योकि वे चाहती है उनकी परम्परा चलती रहे या यह कह सकते है कि महिलाऐ ही महिलाओ के उत्पीड़न की जिममेदार है जिनके विचार पुरानी रिती रिवाजो वाले है जो अपनी बहू मे भी वो ही संस्कार देखना चाहती है

जो उन्होने झेले है, कुछ इन शब्दो मे कह सकते है जो उन पर जो बीती है वे वही सब कुछ अपनी बहु पर करना चाहती है। वो महिला चाहती है कि मेरी बहु बहु बनकर ही रहे। इसके साथ ही पुराने रिति रिवाजो वाले टी0वी0 सीरियल भी महिला उत्पीड़न को बढ़ावा दे रहे है जिसे अधिकतर महिला ही देखती हुई मिल जायेगी और उसके किरदार का असर घरेलू महिलाओ मे धीरे-धीरे घर करने लगा है उन्हे पता भी चलता कि कब वह उस किरदार के जैसी हो गई। शहरो मे भी पुरानी मानसिकता वाली महिलाऐ भी कम नही है आये दिन समाचार पत्रो, न्यूज चैनलो मे उत्पीड़न सम्बन्धी खबर पढ़ने को मिल जाती है।

महिलाओ की ये पुराने ख्यालो की सोच से सिर्फ देश के विकास को ही नही बल्कि स्वतन्त्र विचारो वाली महिला को भी कैद कर लिया है। ऐसी मानसिकता वाली महिलाऐ आज भी हर घर मे देखने को मिल जाएंगी। फिर भी आज का पुरूष महिला उत्थान को बढावा देने का प्रयास कर रहा है और उसको अपने बराबर का समझने की कोशिश कर रहा है परन्तु एक महिला जो रूढ़िवादी मानसिकता वाली है वह किसी ओर महिला आफिस जाते हुए या किसी महिला को बाहर काम करने को लेकर उसे बदनाम करने मे कोई कसर नही छोड़ती। छोटी छोटी बातो पर उसे बदचलन अवारा एवं अन्य गन्दी बातो से उसकी अवहेलना करना उनकी मानसिकता है। मेरे विचार से जो संस्थाऐ महिला उत्थान के लिये कार्य कर रही है उन्हे सर्वप्रथम महिलाओ की मानसिकता को बदलना होगा।

यह आम बात है कि जब कोई भी महिला अपने घर के काम से खाली हो जाती है तो वह सिर्फ मोहल्ले या गॉव मे इकटठी होकर कुछ भी ऐसा कार्य नही करती जो समाज या देश के लिये लाभदायक हो बल्कि इधर की उधर करना उनकी आदत मे शामिल होता है। देखियो रि उसकी शादी को अभी साल भर नही हुआ वो आफिस भी जाने लगी आदि। शादी के बाद लड़का न हो तो ससुरालियो की नजर मे अपशगुन मानी जाती है और सास नन्द की नजरो मे उसकी कोई इज्जत नही होती। इन सब बातो को लेकर पुरूष भी खुद को अपमानित महसूस करता है और महिला का उत्पीड़न करना शुरू कर देता है।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ पुरानी मानसिकता वाली सासो का ही है। यदि एक महिला चाहे तो यह सब कुछ बदल सकता है लेकिन क्यो उठाये ये कदम क्योकि उन्हे तो अपनी परम्परा निभानी है। ऐसी परम्परा का क्या फायदा जो ना समाज के उत्थान मे है और ना ही घर के उत्थान में ।

यदि कोई विधुर विवाह करता है तो समाज उसे सम्मानजनक दृष्टि से देखता है लेकिन कोई विधवा विवाह करती है तो उसे समाज टेढ़ी नजरो से देखता है। आस पडोस की महिलाऐ उस विधवा को कोसती है कि डायन होगी तभी तो पहले पति को खा गई? इसके पैर ही अपशगुन है जो पहला पति मर गया। कहने का तात्पर्य यह है कि महिला ही महिला के जान की दुश्मन बनी हुई है वो किसी दूसरी महिला के आगे बढने पर खुश नही है।


क्या गुजरात में बीजेपी का सबसे बड़ा अस्त्र छीन गया है !

क्या गुजरात में बीजेपी का सबसे बड़ा अस्त्र छीन गया है !

11-Dec-2017

लेख : एम.एच.जकरीया 

गुजरात में भीतर ही भीतर बदलाव की बयार बह रही है, लेकिन ‘कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि मतदान के दिन वोट किस पाले में गिरेगा ! गुजरात चुनाव के नतीजों के बारे में अभी से अनुमान लगाने में तो महारथियों के भी पसीने छूटने लगे है. गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों के सन्दर्भ में जिस तरह के अनुमान लगाये जा रहे है, उससे  असामंजस्य की स्थिति दिखाई दे रही है, अभी भी किसी भी पार्टी के लिए राह इतना आसां नहीं है, यहाँ हर दिन इतने बदलाव गुजरात की राजनीति में देखे जा रहे है उससे सारे अनुमान धरे के धरे रह जाते है ,इस बार के विधानसभा चुनाव में सब कुछ सीधा दिखाई जरुर दे रहा है लेकिन चुनाव में रोज जिस  तरह के समीकरण बदल रहे है, उससे कुछ भी समझना मुश्किल जान पड़ता है | चुनाव अभियान की शुरूआत के एक पखवाड़े बाद दो चीजें बिल्कुल साफ हैं | एक तो यह कि दोनों दल खुले मैदान में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं लेकिन अपने ऑफिस के एकांत में बिल्कुल असमंजस में हैं. दूसरी बात कि हिंदुत्व के जुमले की जगह जातिगत पहचान के मुहावरे ने ले ली है और इस तरह बीजेपी से उसका सबसे बड़ा हथियार छिन गया है !

चुनावी गुणा-भाग और समीकरण बैठाने के मामले में वीरता का कोई अवॉर्ड दिया जाता हो तो फिर शौर्य और पराक्रम के ऐसे सबसे ऊंचे अवार्ड के हकदार निश्चित ही अमित शाह होंगे. गुजरात के चुनाव में एक अकेले वही हैं जो बीजेपी को 150 सीट मिलने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. इसे दुर्भाग्य कहिए कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं तक को लग रहा है कि अमित शाह कुछ ऐसा देख पा रहे हैं जिसे हम माइक्रोस्कोप लगाकर भी ना देख पाएं.

मोदी और शाह के लिए इमेज परिणाम

तो फिर, बीजेपी इतने असमंजस में क्यों है?  विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अभी जुमले बाज़ी से काम नहीं चलने वाला है क्योकि अभी सारे के सारे समीकरण पहले की तरह नहीं रह गए है, पटेल पाटीदार समाज दलित समाज और ओ.बी.सी. के मिजाज़ बदले हुए दिखाई दे रहे है | 

हाल ही में गुजरात के राजकोट विधानसभा में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय भाई रूपाणि के नामांकन सभा से हार्दिक पटेल की सभा की तुलना की जाये तो हार्दिक पटेल की सभा में जुटने वाली भीड़ की तादाद बहुत अधिक दिखाई दी वहीँ अल्पेश पटेल की सभा में भी उन्हें सुनने वालो की तादाद काफी संख्या में दिखाई दे रही है | अब कहा जा सकता है की बीजेपी 150 सीटें जीतने जा रही है,  वह दो महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी पर टिका है. एक तो यह कि राहुल गांधी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर को सुनने के लिए भारी भीड़ जुट रही है. यह तीन नेता बीजेपी के खिलाफ चुनावी जंग की अगुवाई कर रहे हैं. अब यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि नया नेता और नई बात सुनने के ख्याल से इतनी भारी भीड़ राहुल गांधी, हार्दिक पटेल या फिर अल्पेश ठाकोर की सभा में कैसे जुट रही है स्वस्फूर्त या लायी हुई भीड़ कहा जाये 

राहुल गांधी की सभा के बारे में तो यह बात निश्चित तौर पर गलत है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी की रैलियां कमाल आर खान की फिल्मों से भी ज्यादा फ्लॉप साबित हो रही थीं. जाहिर है, कोई ना कोई व्याख्या होनी चाहिए कि आखिर राहुल गांधी की राजनीति ने केआरके (कमाल आर खान) वाला चोला उतारकर एसआरके (शाहरुख खान) वाला बाना कैसे धारण कर लिया.

दूसरी बात यह कि बीजेपी अभी तक अपने चुनावी अभियान का मुहावरा नहीं तय कर पाई है. अब चाहे इसे बीजेपी के लिए आप अच्छा मानें या बुरा लेकिन फिलहाल बीजेपी राहुल, हार्दिक, अल्पेश और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की बातों पर सिर्फ प्रतिक्रिया करती नजर आ रही है. बीजेपी के लिए परेशानी का सबब यह भी है कि जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी और आरक्षण की मांग उसके चुनावी अभियान की राह में रोड़ा बनकर खड़े हैं. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ध्रुवीकरण या कह लें भावनाओं का उभार लोगों में जोर पकड़ता नहीं दिख रहा.

hardik patel jignesh mevani के लिए इमेज परिणाम

बीजेपी सियासत के आसमान में अपनी पसंद के गुब्बारे बेशक उड़ा रही है. वह कश्मीर, पाकिस्तान और रोहिंग्या जैसे विषयों के गुब्बारे बीच-बीच में चुनावी फिजां में तैराने में लगी है. नवसारी (सूरत के नजदीक) की सभा में अमित शाह ने तो यह भी कहा कि हम गुजरात को कर्फ्यू-मुक्त जिंदगी देंगे. बीजेपी की चुनावी रैलियों में हिंदुत्व के आगे बढ़ते जाने की टेक वाले गीत बजते सुने जा सकते हैं. इन गीतों के बोल हैं 'राजनीति की करो तैयारी, आते हैं अब भगवाधारी'. लेकिन अभी तक दिख यही रहा है कि हिंदुत्व के आगमन की सूचना देते ऐसे गीतों से लोगों को अब जम्हाई आ रही है.

कांग्रेस अपने बदले अवतार में हिंदुत्व की बहस से एकदम दूर है. कांग्रेस पर एक ठप्पा मुस्लिम समर्थक होने का है. इस ठप्पे से छुटकारा पाने के लिए राहुल गांधी मंदिरों में जा रहे हैं, भगवान शंकर का नाम ले रहे हैं और सभाओं में माथे पर सिंदूर तिलक लगाये नजर आ रहे हैं. वो अब भाषणों में गुजरात दंगे का जिक्र नहीं करते. उनके भाषणों में अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, दलित, पाटीदार और अन्य जाति समुदाय के लोगों के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का जिक्र आता है.

यह रणनीति चुनावी कथानक को अभी तक परंपरागत सांप्रदायिक लाइन पर जाने से रोक रखने में कामयाब हुई है. सूबे में बीते 22 वर्षों से चले आ रहे शासन के कारण कुछ जोर एंटी इंकंबेंसी का भी है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती और आरक्षण की मांग को लेकर उठे आंदोलन ने भी लोगों के मन में अपने लिए जगह बनाई है. इन तमाम बातों ने एक साथ मिलकर बीजेपी को चुनावी अभियान में हलाकान कर रखा है.

लेकिन बाजी मार ले जाने का भरोसा कांग्रेस को भी नहीं है. कांग्रेस के एक स्टार-प्रचारक ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने एक न्यूज वेबसाइट से बातचीत में बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि गुजरात में भीतर ही भीतर बदलाव की बयार बह रही है लेकिन ‘कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि मतदान के दिन वोट किस पाले में पड़ेगा.’
कांग्रेस इतने पसोपेश में क्यों हैं? एक बड़ी वजह है पार्टी में आत्मविश्वास की कमी. कांग्रेस को नहीं लगता कि वह अकेले अपने दम पर बीजेपी को हरा पाएगी. कांग्रेस की मनोदशा कुछ वैसी ही है जैसी कि 2003 के क्रिकेट वर्ल्डकप में केन्याई टीम की थी. जीत के करीब (सेमीफाइनल) पहुंचकर केन्या की टीम को लगा अरे इतनी लंबी दूरी तक आ गए, यहां तक तो सिर्फ क्रिकेट की धाकड़ मानी जाने वाली टीमें पहुंचती हैं. आत्मविश्वास की इसी कमी के कारण भारत के खिलाफ मैच में वो लड़ाई ठानने से पहले ही अखाड़े से बाहर हो गए.

कांग्रेस के पांव पीछे खींचने वाली एक और बात भी है. कांग्रेस अभी तक गुजरात में अपने नेता का नाम नहीं बता पाई है. लोग सड़क-चौराहे पर कहते-सुनते मिलते जाते हैं कि ‘कांग्रेस ने कोई नेता नथी जो मुख्यमंत्री बनी सके’. कई लोगों का मानना है कि अगर बापू (शंकर सिंह बाघेला) ने कांग्रेस नहीं छोड़ा होता तो वो लड़ाई में विपक्ष का चेहरा बनकर उभरते.
कांग्रेस में विश्वास की कमी और बीजेपी में भरोसे के अभाव के कारण गुजरात में एक कहावत चल पड़ी है कि इस बार बीजेपी की हजामत बनने वाली है. लेकिन कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि हजामत में उस्तरा किस हद तक चलेगा, वह कनपटी दुरुस्त करने तक सीमित रहेगा या बात आगे बढ़कर माथा मूड़ने तक पहुंचेगी. एक बात यह भी है कि गांवों में मतदाता एकदम से बीजेपी के खिलाफ है लेकिन शहरों में वह मोदी-समर्थक है.

शंकर सिंह बाघेला के लिए इमेज परिणाम

मतदान के रुझान से भी कांग्रेस को कुछ उम्मीद है. साल 2012 के गुजरात चुनाव में, जब नरेंद्र मोदी की नजर दिल्ली के सिंहासन पर थी, कांग्रेस को बीजेपी से 9 फीसदी कम वोट मिले थे. इस बार के चुनाव में कांग्रेस को अलग से तीन नेताओं का समर्थन हासिल है और यह नेता मतदान का रुख कांग्रेस की तरफ मोड़ सकते हैं. अल्पेश का दावा है कि वो गुजरात के 20 फीसद ठाकोर वोट का प्रतिनिधित्व करते हैं. हार्दिक पटेल का कहना है कि गुजरात की आबादी में 15 फीसद की तादाद में मौजूद पाटीदार उनको अपना नेता मानते हैं और जिग्नेश मेवाणी गुजरात की 7 फीसद दलित आबादी के नेता हैं. कागजी गणित के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की जीत पक्की लग रही है.

इसके उलट जमीनी माहौल कुछ और बयां कर रहा है. सरकार के आलोचक तक यह नहीं मान पा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को उनके ही घरेलू मैदान पर पटखनी देना मुमकिन है. ऐसे में बीजेपी की हार तकरीबन असंभव नजर आ रही है. शरलॉक होम्स का एक वाक्य बड़ा मशहूर है कि 'एक बार आप असंभव को नकार दें तो इसके बात जो कुछ बचता है, वह चाहे कितना भी हैरतअंगेज जान पड़े लेकिन होता वह सच ही है.' लेकिन गुजरात में शरलॉक होम्स के भी यह बताने में छक्के छूट जाएंगे कि नतीजों के लिहाज से क्या बात असंभव है और क्या कुछ हैरतअंगेज हकीकत. शरलॉक होम्स अपने साथी वाटसन से बस यही कह पायेगा- मामला बड़ा उलझा हुआ है!


निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

27-Nov-2017

देश के निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हालात बदतर एवं चिन्तनीय है ही, लेकिन ये लूटपाट एवं धन उगाने के ऐसे अड्डे बन गये हैं जो अधिक परेशानी का सबब है। हमारे देश में जगह-जगह छोटे शहरों से लेकर प्रान्त की राजधानियों एवं एनसीआर तक में निजी अस्पतालों में मरीजों की लूट-खसोट, इलाज में कोताही और मनमानापन कोई नई बात नहीं है। विशेषतः देश के नामी निजी अस्पतालों की श्रृंखला में इलाज एवं जांच परीक्षण के नाम पर जिस तरह से लाखों रूपये वसूले जा रहे हैं, वह तो इलाज के नाम पर जीवन की बजाय जान लेने के माध्यम बने हुए हैं।

Image result for डॉक्टर

इसका ताजा उदाहरण है गुरुग्राम का नामी अस्पताल फोर्टिस और उसका सात साल की एक डेंगू-पीड़ित बच्ची के इलाज का सोलह लाख रुपए का बिल। इतनी बढ़ी राशि लेकर भी पीड़ित बच्ची की जान नहीं बचायी जा सकी।  ऐसे महंगे इलाज की फिर क्या उपयोगिता? क्यों इस तरह की सरेआम लूटपाट इलाज के नाम पर हो रही है? लगता है कानून एवं प्रशासन नाम की चीज नहीं है, या उनकी मिलीभगत से जीवन के नाम पर मौत का व्यापार खुलेआम हो रहा है।  डेंगू पीड़ित नन्हीं बच्ची की मौत निजी अस्पतालों पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चिकित्सा व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग है। इलाज के नाम पर आम आदमी जाये तो कहां जाये? सरकारी अस्पतालों में मौत से जूझ रहे रोगी के लिये कोई जगह नहीं है तो उसके लिये निजी अस्पतालों में शरण जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं? निजी अस्पतालों ने लूट-खसोट मचा रखी है।

यहां तक कि इलाज के बगैर भी बिल वसूलने की घटनाएं नजर आती है। मरीजों पर महंगा टेस्ट करवाने के लिए दबाव डाला जाता है। बगैर जरूरत मरीज को वेंटिलेशन व ऑपरेशन थियेटर में डाल दिया जाता है। मरीजों को उनके मामले का विवरण नहीं दिया जाता है। तय पैकेज पर एक्सट्रा पैकेज लेने के मामले भी सामने आये हैंै। इससे बड़ा अनैतिक काम और नहीं हो सकता है। नर्सिंग होम एवं निजी अस्पताल वालों को यह ध्यान में रखना होगा कि चिकित्सा-सेवा उनके लिये ईंट व लकड़ी का व्यवसाय नहीं, बल्कि जिंदगी बचाने का काम है। सेवा को कभी बेचा नहीं जाता। मरीजों को मानवीय दृष्टि से देखना चाहिए। अस्पताल कल-कारखाना नहीं, यह सेवा-मूलक उपक्रम है। देखना यह है कि सरकार इसे मिशन बनाती है या व्यवसाय?  फोर्टिस में एक तरफ मरीज के परिवार से अतिशयोक्तिपूर्ण एवं आश्चर्य में डाल देने वाला बिल वसूला गया, और दूसरी तरफ, उपचार मानकों का पालन भी नहीं किया गया। गुरुग्राम की यह घटना कोई पहली या अकेली घटना नहीं है, इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं रोज-ब-रोज निजी अस्पतालों में दोहराई जाती हैं।

यह वाकया निजी अस्पतालों की बदनियति की मिसाल है। लेकिन सरकार, प्रशासन, प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की वजह से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। यहां तक कि अपने को स्वतंत्र कहने वाला मीडिया भी निजी अस्पतालों की अनियमितताओं और कमियों को दिखाने-बताने से परहेज ही करता है। निजी अस्पतालों में मरीजों के इलाज में लापरवाही व मनमानी ही नहीं की जाती, बल्कि मरीजों से अधिक बिल वसूलने के लिये हिंसक एवं अराजकता अपनाई जाती है। यहां तक कि पैसे नहीं दिये जाने पर अस्पताल प्रबंधन परिजनों को शव तक ले जाने नहीं देता है, अधिकांश मामलों में मरीज किसी दूसरे या सरकारी अस्तपाल में जाना चाहे तो भी अनेक बाधाएं खड़ी कर दी जाती है। मरीज के परिजनों के सामने इधर कुआं उधर खायी की स्थिति बन जाती है।

आम आदमी की दो मूलभूत जरूरतें हैं शिक्षा एवं स्वास्थ्य। दोनों की उपलब्धता कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आजादी के सात दशक में पहुंचते-पहुंचते सरकार अपनी इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने लगी है और इसका फायदा निजी अस्पतालों एवं निजी स्कूलों के द्वारा उठाया जा रहा है। अधिकांश निजी अस्पतालों एवं निजी स्कूलों  का स्वामित्व राजनीतिकों, पूंजीपतियों और अन्य ताकतवर लोगों के पास होने से उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत किसी सामान्य व्यक्ति की कैसे हो सकती है?  फोर्टिस अस्पताल के ताजा मामले में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जरूर संज्ञान लिया है और उसने सभी प्रदेशों और केंद्रशासित राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र भेज कर अस्पतालों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा की जाने वाली गड़बड़ियों से न केवल मरीज की स्थिति बल्कि स्वास्थ्य देखभाल और उपचार लागत में जवाबदेही को लेकर भी चिंताएं पैदा होती हैं।

पत्र में क्लीनिकल इस्टेब्लिस्मेंट रजिस्ट्रेशन एवं रेग्यूलेशन एक्ट, 2010 के क्रियान्वयन सुनिश्चित करने को कहा गया है। सवाल है कि यह पत्र कोरा दिखावा बन कर रह जायेगा या समस्या के समाधान की दिशा में कारगर साबित होगा? स्वास्थ्य मंत्रालय को ऐसी चिंता तभी क्यों सताती है, जब इस तरह की शर्मनाक एवं गैरकानूनी घटनाएं सुर्खियों में आ जाती है? जबकि बढ़ा-चढ़ा कर बिल बनाना निजी अस्पतालों का रोज का धंधा है। क्या मंत्रालय इससे अनजान रहा है?  गुरुग्राम की घटना को एक सबक के तौर पर लेने की आवश्यकता है और ताकि निजी अस्पतालों समेत सभी महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थानों में गलत कार्य करने पर कड़ी कार्रवाई तय की जाने की स्थितियां बन सके। लेकिन विडम्बनापूर्ण है कि देश में छोटे-छोटे अपराध एवं गैरकानूनी काम करने वाले के लिये तो सख्त कानून हैं और सरकार भी जागरूक है, लेकिन इन बड़े एवं सभ्य कहे जाने वाले लूटेरों के लिये सन्नाटा है। 

ये परिस्थितियां गुनाह करने वाले अस्पतालों के पक्ष में जाती हैं, जिसका फायदा वे उठाते रहते हैं। ऐसे में कानूनों और नियमों का पालन कौन कराएगा? सैकड़ों-हजारों मामलों में इक्का-दुक्का लोग ही न्यायालय का दरवाजा खटखटा पाते हैं। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, जिस तरह वे चिकित्सा-व्यवस्था को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ रही हैं और स्वास्थ्य बजट में कटौती कर रही हैं, उसी का नतीजा है कि निजी अस्पताल अनियंत्रित होते जा रहे हैं।  वे सोचते हैं कि सरकारें कुछ भी करें, मरीजों के पास उनकी पास आने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। सरकार अगर सचमुच गंभीर है और चाहती है कि फोर्टिस जैसी घटना फिर न दोहराई जाए तो उसे चाहिए कि ऐसी व्यवस्था और वातावरण तैयार करे, जिसमें कोई अस्पताल किसी भी मरीज को गैरकानूनी तरीकें से लूटने का साहस न कर सके।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत निर्मित कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी बातें हो रही है,  लेकिन भारत अपने हाथों से स्वास्थ्य के नाम पर आम आदमी की भाग्यलिपि में कौन-सा रंग भर रहा है, यह हमें आज पढ़ना है। भारत का सपना है आजाद देश में उन्नत एवं सर्वसुलभ चिकित्सा। लेकिन निजी अस्पतालों की बीतते कालखण्ड की कुछ वीभत्स एवं डरावनी घटनाओं ने विनाश के चित्र उकेरे हंै, जो ज्यादा भयावह एवं चिन्ता का कारण है।  तमाम निजी अस्पतालों के इन तथ्यों की सच्चाई स्वास्थ्य की दिनोंदिन बिगड़ती दशा और दिशा को प्रस्तुत करती है। इन निजी अस्पतालों के खिलाफ शिकायतों के अंबार है, लेकिन इनके निस्तारण की कोई पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था नहीं है। सवाल है कि मरीज अपना इलाज कराये या अपनी शिकायत लेकर दर-दर भटके? सवाल यह भी है अगर सरकार कुछ कारगर प्रयास कर पाती तो हालात इतने बदतर तो न होते। 

क्यों नहीं निजी अस्पतालों की इन ज्यादतियों की चर्चा प्रमुखता से की जाती? कब तक स्वास्थ्य को चैपट होते हुए एवं एक गौरखधंधा बनते हुए हम देखते रहेंगे? आखिर ये बुनियादी सवाल क्यों नहीं सरकार की नींद को उडा रहे हैं? यह केवल किसी एक प्रान्त के मरीजों की समस्या नहीं, पूरे देश का यह दर्द है।  लेकिन परिदृश्य ऐसा भी नहीं है जिसमें उम्मीद की कोई किरण नजर न आती हो। मोदी सरकार की कोशिशों और आम मरीजों की जागरूकता के कारण धीरे धीरे ही सही, मगर इन स्थितियों के खिलाफ एक वातावरण बना है। यह बदलाव शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के आंकड़ों में यदि दिखाई नहीं देगा तो नया भारत एक नारा भर बन कर रह जायेगा।

( प्रस्तुत लेख श्री ललित गर्ग जी के हैं ललित गर्ग जी अक्सर सामाजिक,राजनैतिक, व ज्वलंत मुद्दों पर अपने कलम चलाते रहते हैं ) 


 'चोर का माल चंडाल खाए' पत्रकार और वसूली

'चोर का माल चंडाल खाए' पत्रकार और वसूली

13-Nov-2017

KHULASAPOST MAGAZINE ARTICLE

आजकल गलत काम करने वालों से कुछ लोग पत्रकार बनकर जमकर वसूली करते हैं और गलत काम करने वाला मजबूरी में कुछ बोल भी नहीं पाता है. आगरा में एक ऐसे ही मामले का भंडा़फोड़ हुआ है जिसमें करीब दस लोग पत्रकार बनकर हर महीने नकली खाद्य तेल बेचने वाले एक कारोबारी से लाखों रुपये वसूलते थे. न देने पर कैमरा लेकर आते और रिकार्डिंग करने लग जाते. फिर धमकी देते कि वह शासन प्रशासन को दिखाकर नकली तेल के कारबोरा की पोल खोल देंगे. इससे डरा कारोबारी उन्हें मुंहमांगी रकम दे देता. 

पत्रकार के लिए चित्र परिणाम

चलिए हम आपको खबर को विस्तार से बताते हैं दरअसल मामला 14 अक्टूबर का आगरा शहर का है जहाँ नकली खाद्य तेल और घी के काले कारोबार के पकड़े जाने के बाद बड़े खेल का खुलासा हुआ नकली तेल-घी बनाने वाले एक कारोबारी ने खुलासा किया की नकली खाद्य बनाने का खुलासा नहीं करने के एवज में कथित पत्रकार उनसे हर महीने दो लाख रुपए वसूलते थे वे कथित पत्रकार कारोबारी को धमकी देते की अगर पैसे नहीं दिए तो हम तुम्हे फंसवा देंगे हमारी सेटिंग छापा मारने वाले टीम से है.   

नकली खाद्य के कारोबारी भी अपना भांडा न फूटे के डर से कथित पत्रकारों को रकम देता था और अपन काले कारोबार को आराम से अंजाम दे रहा था वह एक प्रकार से बेफिक्र हो गया था क्योंकि कथित पत्रकारों ने खाद्य विभाग के कुछ अधिकारियो से सेटिंग होने की बात कही थी 

लेकिन एफएसडीए की टीम ने नुनिहाई स्थित मार्को इंटरनेशनल नामक कंपनी पर छापा डालकर नकली घी का कारोबार पकड़ा और कारोबारी के खुलासे से अधिकारी भी दंग रह गए कारोबारी ने एफएसडीए के अधिकारीयों को एक सूची सौंपी जिसमें दस कथित पत्रकारों के नाम हैं ये कथित पत्रकार कारोबारी से हर महीने लाखों रूपये की वसूली करते थे और पैसा न देने पर कैमरा लेकर आते थे,वीडियो बनाते थे और प्रशासन को दिखाने की धमकी देते थे खैर "चोर का माल चंडाल खाए" यह कहावत कारोबारी और कथित पत्रकार पर बिलकुल फिट बैठता है क्योंकि कारोबारी चोरी यानि नकली घी बनाकर मार्केट में सप्लाई करता था तो उसे उस बेईमानी की कमाई में कथित पत्रकार भी चंडाल बनकर अपना हिस्सा लेने आ जाते थे और कारोबारी अपने कारनामो को छिपाने के लिए कथित पत्रकारों के मुंह में लाखों रुपए रकम ढूंस देता था कारोबारी ने रकम देने की बात को साबित करने के लिए अपने गोदाम और घर में लगे सीसीटीवी फुटेज दिखाने की भी बात कही खैर यह खबर तो यूपी की है

लेकिन ऐसा कदापि नहीं है की ये कथित पत्रकार केवल एक राज्य या शहर में पाएं जाते हो यह हर राज्य में है और किसी चोर यानि काले कारनामो को अंजाम देने वाले व्यापारी के साथ एक प्रकार से पार्टनर बनकर बैठे हुए हैं ।  

 ( आकाश भट्ट की कलम से )

 


पीत पत्रकारिता या गन्दी राजनीति

पीत पत्रकारिता या गन्दी राजनीति

10-Nov-2017

मैगजीन के लेख 

पत्रकारिता जगत में रोज़ एक नयी बातें पत्रकारों के संबंध में सुनाई दे जाती है, अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के एक मंत्री के सेक्स सी.डी. पर बवाल खड़े हुआ है और उस पत्रकार की गिरफ्तारी पर कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए है जिससे छत्तीसगढ़ की राजनीति और मीडिया में बवाल मचा हुआ है | 

 ज़ाहिर सी बात है की बिना किसी ठोस तथ्यों के किसी को पुलिस के द्वारा गिरफ्तार किया जाना कितना तर्क संगत है यह तो जाँच और आने वाला समय ही बताएगा लेकिन इस घटना में पत्रकार के साथ राजनीति का भी जुड़ना कथित सी.डी. की विश्वस्नीयता को सन्देह के कटघरे में लाकर खड़े कर देता है ? ऐसा जान पड़ता है यह कानूनी कार्रवाई कम इसमें मीडिया ट्रायल ज्यादा हुआ है !

Image may contain: 2 people, text

वैसे भी कांग्रेस की अपनी साफ सुथरी परम्परा रही है, जिसे अब कुछ लोग कलंकित करने में लगे हुए है | कांग्रेस ने इस तरह से कभी भी किसी के बैडरूम के अन्तरंग मामलो को उजागर करने में हमेशा से परहेज़ करता रहा है, ऐसे में कांग्रेस की छवि पर भी बुरा असर पड़ा है | लेकिन अब छत्तीसगढ़ में नई परंपरा कुछ अतिउत्साहित शीर्ष नेताओ ने अभी हाल के वर्षो से सत्ता पाने की लालसा में शुरू किया है जहाँ इस तरह से टेलीफोन टेप करना, किसी का चोरी छुपे वीडियो बनाने का काम किया जा रहा है ये वही लोग है जिन्होंने कुछ दिनों पहले एक टेलीफोन टेप काण्ड में हल्ला मचाया था, जिसमे मै आपको याद दिलाना चाहूंगा अंतागढ़ चुनाव से सम्बंधित एक टेलीफोन टेप पर खूब हो हल्ला मचा एक अंगेजी अख़बार पर मुकदमा भी किया गया और उसके बाद क्या हुआ ये सभी जानते है, अगर कही यही सी.डी. किसी पत्रकार के अन्तरंग दृश्यों की होती तो क्या होता लेकिन यहाँ मामला राजनीती के साथ पत्रकारिता से भी जुड़ा है, इसलिए ये बात महत्वपूर्ण हो जाती है की क्या पत्रकारिता किसी की निजी और अन्तरंग पहलू को दिखाने और बताने की इज़ाज़त देता है ?  और यदि खुदा ना खस्ता कथित सी.डी. में वो मंत्री और जो महिला ना हो तो उस व्यक्ति और महिला के भविष्य का क्या होगा और उस परिवार पर जो बीत रही होगी उसे भी मानवता के द्रष्टिकोण से देखना होगा समाज में उसके परिवार बच्चों का भविष्य समाप्त ही समझा जाये ये किस तरह की पत्रकारिता है, क्या वर्तमान राजनीति का इतना नैतिक पतन हो गया है और ये किस तरह की पत्रकारिता है क्या ऐसे ही किसी की चरित्र हत्या कर दिया जाये, क्या लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में यही सब करने की इजाज़त दी गई है ?

अब यहाँ सवाल ये उठता है की हक़ीक़त क्या है !  क्योकि वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा कांग्रेस के मुखिया के करीबी रिश्तेदार भी बताये जा रहे है, अगर ये मामला पत्रकारिता से जुड़ा होता तो पहले खबर बनती उसके बाद प्रतिक्रिया आती और ये राजनितिक उद्देश्य से किया गया स्टिंग था तो इसे बाकायदा मीडिया के सामने लाया जाना था जो की तर्क संगत नहीं लगता है, की इस तरह से किसी के भी अश्लील अंतरंग दृश्यों को दिखा कर राजनीति किया जाना कितना उचित है |  हाँ यहाँ ये ज़रूरी हो जाता है की हमारे जन प्रतिनिधियों का चरित्र साफ सुथरा हो लेकिन वीडियो में जिस तरह से क्लिपिंग में दिखाए गए है उससे स्पष्ट होता है की वीडियो के साथ छेड़ छाड़ किया गया है | अब ये तो जांच के बाद ही पता चलने वाला है. लेकिन राजनैतिक दलों और मीडिया के द्वारा इसे मंत्री का बताया जा रहा है |

लेकिन सवाल यहाँ ये उठता है की क्या किसी भी नागरिक के अन्तरंग दृश्य को यू इस तरह से सार्वजानिक रूप से दिखाया जा सकता है | क्या देश का कानून और पत्रकारिता में इसकी इज़ाज़त  है ? यहाँ मै किसी राजनैतिक दल या अपने पत्रकार बिरादरी का पक्ष नहीं ले रहा हु, बस मेरा कहना यही है की ये किस तरह की पत्रकारिता है जो किसी भी व्यक्ति के अन्तरंग दृश्यों को सार्वजानिक करे जिसे कई तरह के लोगो ने और बच्चों ने भी देखा हो सकता है क्योकि वीडियो व्हाट्सएप में सभी मोबाइलों में भेजा गया है | क्या देश का कानून इसकी इज़ाज़त देता है ? क्या कोई भी इस तरह के कृत्य की इज़ाज़त पत्रकारिता या किसी भी अन्य व्यक्ति को करने की इजाज़त देगा? तो फिर समाज में इसके  कितने भयानक परिणाम होंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है | 

अश्लीलता चाहे जैसी भी हो है तो वह अपराध ही यदि किसी भी व्यक्ति या जोड़े के द्वारा सहमती से सम्बन्ध बनाये जा रहे है उस पर किसी भी तरह से कोई अपराध नहीं बनता लेकिन किसी के अन्तरंग दृश्यों पर हमारा कानून क्या कहता है |

बनाये गए सेक्स सीडी की नकल करवाने का मामला आईटी एक्ट के तहत आता है. हालांकि आईटी एक्ट के तहत अश्लील वीडियो देखना अपराध नहीं है, लेकिन उसका प्रकाशन करना या इसमें सहायता करना अपराध की श्रेणी में माना जाता है.

सेक्स वीडियो देख कर मिटा देना दंडनीय अपराध नहीं है. सीडी देख कर उसे नष्ट कर देना अपराध नहीं है.
लेकिन सेक्स वीडियो को कंप्यूटर पर सेव करके रखना अपराध है क्योंकि इसे वीडियो प्रकाशित करना माना जाता है. ऐसे में आपको प्रकाशन करने में सहायता करने के संदर्भ में दोषी माना जा सकता है.

सेक्स वीडियो की नकल बनाना धारा 67 के तहत अपराध है. ये ज़मानती अपराध है और इसमें अधिकतम तीन साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है.
अगर वीडियो में अश्लील सामग्री है तो ये धारा 67-ए के तहत आ सकता है. इसमें आईटी एक्ट के तहत अधिकतम पांच साल की सज़ा है और ये गैर ज़मानती अपराध है.
अगर सेक्स वीडियो में 18 साल से कम उम्र का किशोर-किशोरी है तो ये चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी का मामला बन जाता है और इसके तहत पांच साल की सज़ा हो सकती है.
सुचना प्रौद्योगिकी अधिनयम 2000 (आई.टी. एक्ट 2000) संशोधन 2009

धारा- 66 क. - संसूचना सेवा इत्यादि के माध्यम से आपराधिक तथ्य भेजने के लिये दंड 
दंड - जो कि तीन वर्ष तक हो सकेगा और जुर्माने से दंडनीय होगा ।
धारा-67 ड. - अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशन के लिए दंड 
दंड  - जो तीन वर्ष तक हो सकेगा, या जुर्माने से, जो दो लाख रूपये से अधिक नहीं होगा या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा
धारा-67 - अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशन के लिए दंड 
दंड  - जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो एक लाख रूपये तक का हो सकेगा और दूसरी या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि की दशा में दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक ही हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो दो लाख रूपये तक हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा ।
धारा- 72 -गोपनीयता और एकांतता भंग के लिए शास्ति  
दंड  - जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक लाख रूपये तक का हो सकेगा अथवा दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।
धारा- 74 - कपटपूर्ण प्रयोजन के लिये प्रकाशन - 
दंड  - जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक लाख रूपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।
धारा- 84 ख- अपराध के दुष्प्रेरण के लिये दण्ड -  
दंड  - ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिये नहीं बनाया गया हो, तो इस अधिनियम के अधीन अपराध के लिये उपबंधित दण्ड से दण्डित किया जायेगा ।
धारा- 84 ग- अपराध कारित करने के प्रयास के लिये दंड - 
दंड  - अपराध के लिये उपबंधित किसी प्रकार के दंड की ऐसी अवधि से, जो उस अपराध के लिये उपबंधित कारावास की लम्बी अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जिसे अपराध के लिये उपबंधित किया गया हो, के आधे से, या दोनों से दण्डनीय होगा ।
धारा- 85 - कम्पनियों द्वारा अपराध -1.  : जहाँ कोई व्यक्ति जो एक कम्पनी है, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किये गए किसी निदेश या आदेश के किन्ही उपबंधो का उल्लंघन करता है, वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के किये जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएँगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने के भागी होंगे

 


जनदर्शन : मुख्यमंत्री ने दो हजार से ज्यादा लोगों से की मुलाकात : बैगा आदिवासियों के पट्टे की समस्या पर मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को तुरंत लगाया फोन

जनदर्शन : मुख्यमंत्री ने दो हजार से ज्यादा लोगों से की मुलाकात : बैगा आदिवासियों के पट्टे की समस्या पर मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को तुरंत लगाया फोन

09-Nov-2017

रायपुर : मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आज यहां अपने निवास परिसर में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में आम जनता से मुलाकात कर लोगों की समस्याएं सुनी। डॉ. सिंह ने कबीरधाम जिले से आए बैगा आदिवासियों के प्रतिनिधि मंडल के ज्ञापन को तत्काल संज्ञान में लिया और वहां के कलेक्टर को मोबाइल फोन पर इन आदिवासियों की पट्टे से संबंधित समस्या का उचित निराकरण जल्द सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री नेे आज के जनदर्शन में राजधानी रायपुर सहित राज्य के विभिन्न जिलों के दो हजार से अधिक लोगों सेे मुलाकात की। इनमें से 928 लोग विभिन्न प्रतिनिधि मंडलों में शामिल थे, जबकि एक हजार 151 लोगों ने मुख्यमंत्री को अपनी-अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में आवेदन दिए।

मुख्यमंत्री ने पंच-सरपंचों और अन्य जनप्रतिनिधियों के आग्रह पर आज के जनदर्शन में 25 आवेदनों  में लगभग 97 लाख रूपए के निर्माण कार्यों की स्वीकृति तत्काल प्रदान कर दी, जिनमें सीसी रोड, सामुदायिक भवन तथा पुल-पुलियों के कार्य भी शामिल हैं। डॉ. सिंह ने 62 मरीजों को संजीवनी कोष से सहायता राशि की मंजूरी दी और 57 मरीजों को मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अम्बेडकर अस्पताल में नि‘शुल्क इलाज  के लिए भिजवाया।

डॉ. सिंह ने कबीरधाम जिले से आए बैगा आदिवासियों के प्रतिनिधि मंडल के ज्ञापन को तत्काल संज्ञान में लिया और वहां के कलेक्टर को मोबाइल फोन पर इन आदिवासियों की समस्याओं का उचित निराकरण जल्द सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन में बताया कि कबीरधाम जिले के पंडरिया तहसील क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम दमगढ़ में बैगा आदिवासियों के लगभग 110 परिवार विगत 80 वर्षाें से निवासरत हैं और खेती भी कर रहे हैं।

न्हें वर्ष 1975 में शासन द्वारा जमीन का पट्टा दिया गया था, लेकिन वर्ष 2014 में क्षेत्र के तत्कालीन राजस्व अधिकारियों ने जांच करने के लिए उन सबके जमीन के पट्टे जमा करवा लिए और आज तक उनकों अपनी जमीनों का पट्टा वापस नहीं मिला।

मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधि मंडल को विश्वास दिलाया कि इस प्रकरण में बैगा आदिवासियों को न्याय दिलाया जाएगा। ग्राम पंचायत अर्जुनी, कोरगापार और देवरी (क) (विकासखंड-गुण्डरदेही) जिला बालोद के सरपंचों और अन्य प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर खपरी जलाशय से 10 गांवों के लिए पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था करवाने का आग्रह किया। उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया कि इस जलाशय से नल-जल योजना के लिए सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। इसका निर्माण होने पर अर्जुनी, सकरौद, गोरकापार, खपरी, सिरसिदा, परसदा सहित दस गांवों के लोगों को पर्याप्त पानी मिल सकेगा।

मुख्यमंत्री ने उनका ज्ञापन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सचिव को आवश्यक कार्रवाई के लिए भिजवाया। ग्राम पंचायत बड़ेदेवगांव (तहसील खरसिया) जिला रायगढ़ के ग्रामीणों ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात की। उन्होंने डॉ. सिंह को ज्ञापन सौंपकर ग्राम बड़े देवगांव के शासकीय हाई स्कूल का उन्नयन हायर सेकेण्डरी स्कूल के रूप में करने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने उनका ज्ञापन स्कूल शिक्षा मंत्री श्री केदार कश्यप को भिजवाया।

 


आप पत्रकार है तो क्या आपको सात खून माफ़ है ?

आप पत्रकार है तो क्या आपको सात खून माफ़ है ?

08-Nov-2017

( आकाश भट्ट की कलम से )

पत्रकार ‌और पत्रकारिता के अब मायने बदल चुके है, आज़ादी के बाद लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को बनाये रखने के लिए पत्रकारिता को एक सम्मानजनक स्थान दिया गया था जो दिन बा दिन अपनी गरिमा को खोता जा रहा है | एक समय में, और स्वतंत्रता से पूर्व छापे खाने में छपने वाले समाचार पत्रों का चलन था उस समय के पत्रकार की एक धुंधली सी छवि खादी का कुर्ता पाजामा बाज़ू में थैली लटकाये कलम लिए समाचारों के लिए जद्दोजहद करने वाला वो पत्रकार ही तो थे जिन्होंने देश की आज़ादी और अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था, तब ना इतने साधन थे न ही ऐसी सुविधएं वो प्रेस के मालिक भी होते, संपादक भी और पत्रकार भी तब के समाचारों में एक सच्चाई और क्रांति हुआ करती थी जो बड़े-बड़ो को हिलाकर रख दिया करती थी |

उस समय साधन कम थे लेकिन पत्रकारिता को साधना की तरह पत्रकार अपने जीवन का एक हिस्सा बना कर समर्पित हो कर पत्रकारिता किया करते थे | समय बदलता गया साधन बढ़ते गए समाचारों के माध्यम समाचार जगत और कार्पोरेट में तब्दील होते चले गए, प्रिंट मडिया से टी.वी. और अब इन्टरनेट से सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के मूलभूत स्वरुप को ही बदल कर रख दिया है | एक समय में ब्लिट्ज़ के एक लेख और नागरवाला काण्ड ने उस समय ऐसा तहलका मचाया था कि सरकार की चूले हिल गई थी तब समाचारों में दूसरा माध्यम रेडियो के समाचारों का हुआ करता था विविध भारती से सरकारी समाचार और BBC रेडियो ही एक निष्पक्ष समाचार का माध्यम हुआ करते थे जिनके समाचारों की अपनी विश्वसनीयता और  ,एक सच्चाई हुआ करती थी | 

Image may contain: text

अब  का दौर ऐसा चल रहा है, जहाँ मीडिया और पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम अपनी दादागिरी भी बखूबी से चलाई है, चाहे अधिकारी हो या पुलिस या राज नेता  मीडिया के नाम पर धौसियाना और पत्रकार संगठन और क्लब के नाम पर डराना धमकाना और वसूली करना इनका शगल बन गया है |  ज़बकि वास्तविक में जो पत्रकारिता करते है उन्हें इन सब से कोई भी लेना देना नहीं रहता है | वास्तविकता में पत्रकारिता का सही उद्देश्य खबरों और घटनाओ को लोगो तक पहुँचाने का है लेकिन अब दौर बदल चूका है, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इन सभी को अब किनारे लगाना शुरू कर दिया है अब हर एक व्यक्ति पत्रकार की भूमिका अदाकार कर रहा है |

अब  समय के साथ अभिव्यक्ति का माध्यम भी बदल चूका है,  कुछ विशेष लोगो ने पत्रकारिता को अपने बाप की जागीर समझ लिया था उन्हें अब बोरिया बिस्तर बाँध ही लेना चाहिए क्योंकि अति का अन्त कभी ना कभी जरूर होता है। अब समय ई-पेपर डिजिटल मैगज़ीन का होता जा रहा है प्रिन्ट मीडिया भी दैनिक समाचारों से पहले खबरे तत्काल फेसबुक और ट्विटर, व्हाट्स एप पर वायरल कर दिए जाते है इस लिए अब दैनिक समाचारों को लोग लेट न्यूज़ के नाम से पढ़ते है, अब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारिता के नाम पर कुछ विशेष लोगों का ही मीडिया में दख़ल रहा है, वो अब समाप्त होना जरुरी है |
 
आप पत्रकार है और मीडिया से जुड़े है तो, क्या आपको सात ख़ून माफ़ है ? नियम और क़ानून सभी के लिए बराबर है संवैधानिक नियमो का पालन सभी को करना अनिवार्य है, लेकिन हमारे देश की ये कितनी बड़ी विडंबना है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के नाम पर कुछ लोगो को दादागिरी करने की खुली छूट मिली हुई है ।

चंद लोगों ने पत्रकारिता को शर्मसार किया हुआ है आये दिन ये तथाकथित पत्रकार मंत्रियों विधायकों के बंगलो के इर्दगिर्द खैरात के लिए घूमते है और होली दीवाली का लिफ़ाफ़ा माँगने वाले ये पत्रकार जिन्हें समाचार समूहों ने भी हर तरह से नकार दिया है और काम से निकाल/हटा दिए गए है ऐसे लोग  पत्रकार का लेबल लगाकर प्रेस संगठनो और क्लबो के पदाधिकारी बनकर पत्रकारिता जैसे पवित्र काम को बदनाम करने में लगें हुए है ।

आये दिन पत्रकार सुरक्षा का रोना रोने वाले ये पत्रकार हक़ीक़त में पत्रकारों के शोषण करने वाले और अपना जेब भरने वाले है जिन्हें बेनकाब किया जाना ज़रूरी है, इनकी और ये जिन संस्थाओ से जुड़े है  इनकी जाँच होनी चाहियें हम शासन और पुलिस प्रशासन से विनती करते है की इनकी गम्भीरता से जाँच होनी चाहिये और शासन से जो भी अधिमान्यता या अन्य सुविधाएं जो इनको शासन के द्वारा प्राप्त  है उन्हें वापस लिया जाना चाहियें और इनकी संस्थाओ का पंजीयन रद्द कर गंभीरता से जाँच की जानी चाहिए
 

 


लोकतंत्र में नेता मदारी और जनता मूक दर्शक बनकर रह गई !

लोकतंत्र में नेता मदारी और जनता मूक दर्शक बनकर रह गई !

17-Oct-2017

लेख : एम.एच.जकरीया (khulasapost magazine article)

आज लोकतंत्र में नेता मदारी और जनता मूक दर्शक बनकर तमाशा देख रही है, और ये मदारी बनाम नेता नित् नये-नये पैतरे दिखा कर जनता को हर दिन हसीन सपने दिखा कर बेवकूफ बना रहे है ! भारत में राजनीतिक नेता होना बड़े काम की चीज है आप जिंदगी भर भूखे नहीं मरेंगे। इसकी गारंटी कोई भी आंख बंद कर के दे सकता है। अगर आप किसी कद्दावर नेता के पोते-सोते हैं तो मानना पड़ेगा कि आप सोने का चमच्चा मुंह में लेकर पैदा हुए हैं।

आजादी के 70 वर्ष बाद भी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर वंशवाद की बेल अमरबेल कि तरह पनप रही है और भारतीय लोकतंत्र रूपी बटवृक्ष कि जीवन रेखा को निचोड़ दे रही है। भारतीय राजनीति में ये महत्वपूर्ण है कि आप किसके बेटे है या दामाद या बेटी, भतीजे हैं।

भारत के संविधान के अंतर्गत विधायिका और भारतीय नेतृत्व आता है, जो देश के नागरिकों के वोटों  के आधार पर जन प्रतिनधियों को चुनने का अधिकार देता है और यही जन-प्रतिनिधि जब चुन लिए जाते है तब सांसद और विधायक बनकर नियम-कानून बनाने का काम करता है, लेकिन वास्तविक में क्या ऐसा हो रहा है ! भारतीय संविधान में सभी व्यक्तियों को बराबर के अधिकार प्राप्त हैं पर दलितों, पिछड़ों, उपेक्षितों के साथ ही स्त्रियों को विशेषाधिकार दिए गए हैं लेकिन क्या हक़ीक़त में उन्हें इतने अधिकार मिल रहे है ! 

नेता के लिए चित्र परिणाम

वर्तमान भारतीय समाज में साम्प्रदायिक ताकतें अपने चरम पर हैं वो भारतीय संविधान के निर्माता भीम राव अम्बेडकर के चिन्तन को सिरे से नकारने और आलोचना में व्यस्त हैं. इसका ताज़ा तरीन उदाहरण उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जातीय संघर्ष से बेहतर देखा समझा जा सकता है, जो की ठाकुर बनाम दलित था दलितों के द्वारा की गई एफआईआर में कहा गया कि  “राजपूत समुदाय के लोग जुलूस निकाल रहे थे। उनके हाथों में तलवारें थी और वो ‘जय श्री राम’ व ‘अंबेडकर मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। जब हमने उन्हें ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने हमें पीटना शुरू कर दिया।

उन्होंने बाबा रविदास की मूर्ती तोड़ दी  हमारे घरों को लूटा, महिलाओं को प्रताड़ित किया, शब्बीरपुर और महेशपुर गांव में जानवरों को आग लगाई व दुकानों को लूटा। ” वहीं, पत्रकार अशोक पुंडीर ने आरोप लगाया कि जब वह इस मामले को कवर कर रहे थे तो उनपर हमला किया गया। पत्रकार ने कहा, “दलितों ने मुझे मारने की धमकी दी और मुझे पीटा। मेरे सिर और सीने में चोट आई है। हमलावरों ने मुझसे 20 हजार नकदी, सोने की अंगूठी और मेरा कैमरा भी छीन लिया।

 ऐसा पहले कभी भी नहीं देखा गया है ,दलितों पर सवर्णों ने अत्याचार किया और स्वतः स्फूर्त तरीके से कुछ दलितों ने भी प्रतिरोध का साहस किया। लेकिन सहारनपुर में पहली बार 9 मई को साफ तौर पर यह दिखा कि दलित नौजवानों ने प्रतीकात्मक तरीके से पुरजोर विरोध किया। भगवा रंग का जो अंगोछा वे अपनी शान और पहचान के लिए लगाए फिरते थे, वह उनके जान का जंजाल बन गया, अधिकांश ने डर के मारे अंगोछे फेंक दिए। गाड़ियों पर ‘राणा’ या ‘दी ग्रेट’ राजपूत लिखकर तथाकथित उंची जाति का होने के जिस दंभ का प्रदर्शन वे करते थे, उस दिन उनकों यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसका वे क्या करें, अपनी-अपनी गाड़ियाँ खड़ी करके भागे।

कुछ घटनाएं तो ऐसी भी हुईं कि दलित नौजवानों के झुंड़ को देखकर अपने आप को दलित साबित करने के लिए सवर्ण, खास करके राजपूत जय भीम नारा लगाने लगे, आंबेडकर जिंदाबाद बोलने लगे। पहली बार सवर्णों के दिल में यह खौफ समाया कि दलित सीधे उन पर हमला बोल कर अपने तथा अपने समुदाय पर हुए अत्याचार का प्रतिकार कर सकते हैं, जिस तरह हजारों साल से दलितों के मान-सम्मान को सवर्ण रौंदते आए हैं,  अब उनका भी मान-सम्मान खतरे में पड़ सकता है।

अब ऐसा नहीं रह गया है कि वे जैसे चाहें दलितों के साथ बर्ताव करते रहें और दलित चुपचाप सह लेंगे, या शासन-प्रशासन से न्याय की बाट जोहेंगे। सहारनपुर और उसके बाद 21 मई को जंतर-मंतर पर जुटान ने साबित किया कि अब दलित युवा जाति के आधार पर होने वाले अत्याचारों पर चुप नहीं बैठने वाले हैं।

पिछले कई युगों से पिछड़े और दलितो का दमन किया जाता रहा है । लेकिन आज़ादी के बाद भारतीय संविधान ने इस प्रकार के जातिगत भेदभाव को ख़ारिज कर दिया था, लेकिन 2013 -14  के बाद से जात पात और धर्म की राजनीती का रंग चढ़ने लग गया जो अलग अलग तरह से कभी गौ-रक्षा के नाम पर कभी एंटी रोमियो, कभी दलितों पर अत्याचार के रूप में फैलने लगा है जिसके भयानक अमानवीय परिणाम देखने को मिल रहे है । 

भारत की राजनीति में जातिगत राजनीति सबसे अधिक होती है यहाँ यादव, ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित आदि बटें हुए है और अधिकतर अपने जाति के उमीद्वार को ही वोट देते है. भले ही उस उमीद्वार पे कितने ही आपराधिक मामले दर्ज हो. इन्ही सब कारणों से समाज में विकास कहीं पीछे छुट गया है. हम यह पूरी तरह नही कह सकते की समाज में बदलाव की उम्मीद नही है क्योंकि हमने कई बार लोगो को जाति के इतर भी वोट करते देखा है. जैसे आपातकाल के बाद देश की पूरी जनता कांग्रेस विरोधी हो गई थी और जाति से हट कर उनके विरुद्ध वोट किया था. ऐसा ही बदलाव इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था जब कांग्रेस अब तक के सबसे ज्यादा सीटों के बाद सत्ता में लौटी थी. इसके बाद एक हाल ही का उदाहरण लोकसभा चुनाव 2014 है, जिसमे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यो में लोगो ने जाति से इतर वोट किया था.

वर्तमान परोक्ष में यह तो सिद्ध है की कुछ लोग बदलाव चाहते है लेकिन या तो उनके पास कोई विकल्प नही है और है भी तो सही नही है. इसके विपरीत कुछ यह सोचते है की उनकी जाति का नेता उनके लिए अधिक सुविधाओं को उपलब्ध कराएगा जिससे की समाज में उनका दबदबा होगा. वहीँ एक कारण यह है की आज भी हम स्वर्ण, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, दलित आदि सामाजिक व्यवस्था में उलझे हुए है और हमारी इन कमजोरियों का फायदा उठा कर राजनेता जाति की राजनीति करते है और देश और समाज के विकास की कोई चर्चा नही करते है | इसलिए मेरा मानना है की हमें जाति, धर्म आदि से ऊपर उठकर अपने समाज के विकास के लिए वोट देना चाहिए. जो भी हमें धर्म या जाति में बाँटने की कोशिश करे उसका बहिष्कार करना चाहिए और यह बता देना चाहिए की हमें जाति, धर्म नही, रोटी, कपडा, मकान और विकास चाहिए..!!

किसी ने क्या खूब कहा है - इस भारत के भीतर भी एक भारत है जिसे हम उसके बाह्य रूप से भी अधिक अच्छी तरह जानते तो हैं पर न जानने का दिखावा करते हैं. क्योंकि ये वो भारत है जो हमारी वास्तविकता है, हमारी दुखती रग है, पर हम इस असलियत से शुतुरमुर्ग की तरह मुंह चुराते फिर रहे हैं. ये हमारी पुरानी आदत है जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते. 


छत्तीसगढ़ में राजनैतिक युद्ध का शंखनाद

छत्तीसगढ़ में राजनैतिक युद्ध का शंखनाद

16-Oct-2017

लेख : एम.एच.जकरीया (magazine cover story)

छत्तीसगढ़ में राजनैतिक युद्ध का शंखनाद हो चूका है ,वर्ष 2018 में विधानसभा का चुनाव होना है सभी राजनैतिक दलों ने अपने अपने तरीके से चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है ,मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह  ने 300 रूपया प्रति क्विंटल  के हिसाब से किसानों को 2100 करोड़ का बोनस देने की घोषणा करने के बाद बोनस तिहार के रूप में बाँटना भी प्रारम्भ कर दिया है वही छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के नेता अभी तक सिर्फ बगले झाँक रहे है ! जो कांग्रेस के कमज़ोर रणनीति को स्पष्ट तौर पर दर्शाता है | 

अभी छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस में संगठन चुनाव को लेकर जिस तरह की रस्साकशी देखि गयी है उसे जनता ने भी देखा और सुना है जब इनके आपस में ही इतने मतभेद और मनभेद है तो ये जनता के सामने किस मुँह से अपनी बातें रख पाएँगे ये सोचने वाली बात है , डॉ रमन सिंह के एक ही नहले पे दहला का  जवाब नहीं है इनके पास |

chhattisgarh congress के लिए चित्र परिणाम

अभी जिस तरह से प्रदेश कांग्रेस संगठन चुनाव में जो बातें सामने आई है ,उससे ऐसा लगने लगा है की छत्तीसगढ़ कांग्रेस में नेतृत्व शून्य है ? संगठन के मुखिया सिर्फ एक दूसरे को निपटाने में लगे है ,जब संगठन के चुनाव में इनका ये आलम  है तो फ़िर अपने विरोधियो से विधानसभा चुनाव में ये किस तरह से सामना कर पाएंगे ये सोचने और समझने वाली बात है | कांग्रेस हाइ कमान को अभी भी समय रहते समझ जाना चाहिए नहीं तो उत्तरप्रदेश से भी बुरा हाल होने वाला है छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का , यहाँ ये तो स्पष्ट है की छत्तीसगढ़ कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन अब ज़रूरी हो गया है |

वही छत्तीसगढ़ में भा ज पा के लिए भी रास्ता इतना आसान नहीं होगा ,क्योकि जनता का अपना मिज़ाज़ है कब बदल जाये मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने चुनाव की तैयारी शुरू करते हुए किसानों के बोनस से अपनी शुरुवात तो कर दी है लेकिन जिन्हे वर्तमान में टिकट दिया गया है  उनमे से अधिकतर जन प्रतनिधियों के प्रति उस  क्षेत्र की जनता में आक्रोश देखा जा रहा है जनता नाराज़ है उनसे इसका साफ मतलब है की जनता रमन सिंह के काम से तो संतुष्ट है लेकिन विधायकों से नाराज़ है ,खुलासा पोस्ट न्यूज़ नेटवर्क के एक सर्वे में सरायपाली ,बीजापुर , जगदलपुर  ,बस्तर , राजिम ,कवर्धा ,रायपुर उत्तर , बिलासपुर ,धरसीवा में यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम नुकसान दायक हो सकते है |

वही पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी 2018 विधानसभा चुनाव में चौकाने वाले परिणाम देने की तैयारी में जुट गए है अभी हाल ही में उन्होंने जोगी कांग्रेस के 11 प्रत्याशियों की  घोषणा भी कर दी है जिनमे प्रेमनगर से पंकज तिवारी, रायगढ़ से विभाष ठाकुर, रायपुर ग्रामीण  से ओमप्रकाश देवागंन, भानुप्रतापपुर से मानक दरपट्टी, तखतपुर से संतोष कौशिक, प्रतापपुर से डॉक्टर नरेंद्र सिंह, चंद्रपुर से गीताजंली पटेल, मानपुर मोहला से संजीव ठाकुर, भरतपुर सोनहत से गुलाब सिंह, भाठापारा से चैतराम साहू, पत्थलगांव से एमएस पैकरा को अपने उम्मीदवार के रूप में इनके नामों पर मुहर लगा दी है ।

अब इन प्रत्यासियो से राजनैतिक समीकरण में बदलाव निश्चित है कांग्रेस के एक दिग्गज नेता का हारना यहाँ अभी से तय माना जा रहा है ये हमारा सर्वे बता रहा है और बात स्पष्ट है की वर्ष 2018 में छत्तीसगढ़ समेत मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक इन चारों राज्यों में चुनाव होने वाले हैं छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की इज्जत अब  दांव पर लगी हुई है , क्योकि लगातार 3 चुनाव में कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में हार का सामना करना पड़ा है और बार-बार हार का ठीकरा जोगी पर ही कांग्रेस के नेता फोड़ते रहे है और अब इस बार जोगी कांग्रेस से अलग हो कर जोगी कांग्रेस बनाकर अलग चुनाव लड़ेंगे  मतलब साफ है मुकाबला त्रिकोणीय होने वाला है चुनाव में उतरने से पहले सभी पार्टियाँ अलग-अलग तरीकों से सर्वेक्षण कराती है। इसके लिए वे पेशेवर सर्वेक्षण कंपनियों की सेवा भी लेती हैं।

इसके अलावा पर्यवेक्षक भी क्षेत्रों का दौरा कर स्थानीय नेताओं, समर्थकों और क्षेत्र के प्रमुख लोगों से बात कर हालात को समझने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा संगइन स्थानीय इकाईयों से भी रिपोर्ट मंगाती है। आम आदमी पार्टी ने भी छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 में उतरने का ऐलान कर दिया है लेकिन सबकी निगाहें खासकर बीजेपी, कांग्रेस और जनता कांग्रेस जोगी (जे) पर होगी |

छत्तीसगढ़ की तीनो राजनीतिक दलों में कुछ न कुछ कमजोरियां हैं, अभी हाल ही के घटनाक्रम को देखें तो सभी पार्टियों के अन्दर कुछ नेता या विधायक मंत्री कई विवादों के बीच फंसे रहें हैं हालाँकि इन राजनीतिक घटनाओं पर कुछ देर के लिए हो-हल्ला मचाया गया और बाकी चुनाव के नजदीक आने पर शोर मचाया जाएगा सभी पार्टियाँ एक-दूसरे पर हमला बोलने के लिए सभी मुद्दों और मामलों की सूची  बनाकर रखे हुए हैं अब जैसे ही नए वर्ष की शुरुआत होगी वैसे ही विपक्षी दल सत्ताधारी पार्टी के विधायकों के कारनामो को लेकर हमला बोलेंगे तो वहीँ भाजपा भी विपक्षी दलों से भिड़ने तैयार नजर आ रही है

भाजपा के कद्दावर मंत्री और कांग्रेस के मुखिया के जमीन का मामला  हालाँकि मंत्री जी अपनी सफाई देते रहे लेकिन जितने दाग उनपर लगने थे वे तब तक लग चुके थे उनकी साफ-सुधरी  छबि इस जमीन मामले के बाद धुंधली हो गई राजनीती के गलियारों में तो ऐसी भी ख़बरें थी की शायद मंत्री जी से उनका इस्तीफा लिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ,

तो वहीँ भाजपा के बस्तर के एक युवा मंत्री की बात करते हैं उनके नाक के नीचे उनके विभाग में अधिकारी कई ऐसे घोटालों में संलिप्त रहे हैं और मंत्री जी इस मामले पर चुप्पी साधे बैठे हुए हैं जो की आने वाले चुनावो में उन पर भारी पड़ने वाला है राजनीतिक गलियारों में तो यहाँ तक कहा जा रहा है की इनके कारनामो का खुलासा होने के बाद भी इन अधिकारियो पर कार्यवाही नही करने के कारण इस बार मंत्री जी को अपनी सीट बचाने खासी मशक्कत करनी होगी.

बीजेपी और कांग्रेस के बाद प्रदेश की तीसरी बड़ी पार्टी जनता कांग्रेस की बात करते हैं जहाँ पार्टी के मुखिया और उसके बेटे श्री अजित जोगी और अमित जोगी पर अपनी जाति आदिवासी साबित करने का संकट मंडरा रहा है चुनाव के नजदीक आते ही ऐसे कई और दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिलेंगे फ़िलहाल चुनाव का समय अभी दूर है और हमारे खुलासापोस्ट न्यूज़ नेटवर्क की टीम ने छत्तीसगढ़ के वर्तमान राजनैतिक समीकरणों को आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ।

कांग्रेस के संगठन चुनाव में जमकर चला भाई - भतीजावाद 

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस में प्रदेश प्रतिनिधियों के चुनाव में कांग्रेस कार्यकर्ताओ के साथ जमकर भेदभाव होने की बातें सामने आ रही है ,कांग्रेस संगठन चुनाव में निष्ठावान और जिम्मेदार कार्यकर्ताओ को नज़रअंदाज़ कर के प्रदेश के बड़े नेता और पदाधिकारी अपने बेटों भतीजो और परिवार के सदस्यों को प्रदेश प्रतिनिधि बना रहे है जिससे कार्यकर्ताओ में जमकर आक्रोश देखा जा रहा है 

कहा तो यहाँ तक जा रहा है की जिन्होंने कांग्रेस की सदस्यता भी नहीं ली वो प्रदेश के प्रतिनिधि होंगे तो काम करने वाले निष्ठावान  कांग्रेस के कार्यकर्त्ता अपने घर बैठ जायेगे ! ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव 2018 में इनके भाई भतीजे और परिवार के लोग ही कांग्रेस को चुनाव जिताएंगे ऐसा लग रहा है , 3 बार करारी शिकस्त के बाद भी प्रदेशकांग्रेस के ये मट्टाधीश सुधरने का नाम नहीं ले रहे है और अपनी मनमानी करने से बाज़ नहीं आ रहे है ?

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं के रिश्तेदार जिनमे मोतीलाल वोरा और उनके पुत्र अरविन्द वोरा, अरुण वोरा भतीजे राजीव वोरा बरसों से कांग्रेस से गायब रहे पारस चोपड़ा सत्यनारायण शर्मा पंकज शर्मा अमीतेश शुक्ल के पुत्र भवानी शंकर शुक्ल रविन्द्र भेड़िया उनकी पत्नी अनिला भेड़िया दुर्ग से प्रतिमा चंद्राकर उनके भाई लक्ष्मण चंद्राकर दंतेवाड़ा से देवकी कर्मा की सुपुत्री पुलिका कर्मा इन्हें प्रदेश प्रतिनिधि बनाया गया   


स्वतंत्रता दिवस पर केंद्र का निर्देश नहीं मानेगी ममता सरकार

स्वतंत्रता दिवस पर केंद्र का निर्देश नहीं मानेगी ममता सरकार

26-Aug-2017

नई दिल्ली : स्वतंत्रता दिवस से पहले केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से देशभक्ति की भावना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यू इंडिया (नया भारत) की सोच को लेकर जोश जगाने के लिए स्कूलों में कार्यक्रम आयोजित करने को कहा है. हालांकि पश्चिम बंगाल की सरकार ने स्कूलों को केंद्र का सर्कुलर न मानने का निर्देश दिया है. केंद्रीय मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है. जावड़ेकर ने संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री के संकल्प सिद्धि का शपथ दिलाना या स्वतंत्रता संग्राम या विभिन्न युद्धों, आतंकी हमलों में शहीदों को याद करना स्कूलों के लिए बाध्यकारी नहीं है. यह सेक्यूलर एजेंडे का हिस्सा है, राजनीति पार्टी का एजेंडा नहीं.
उन्होंने पश्चिम बंगाल सर्व शिक्षा मिशन के राज्य परियोजना निदेशक का मेमो भी दिखाया. मेमो में स्कूल शिक्षा विभाग को केंद्र के सर्कुलर के आधार पर स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाने को कहा गया है. एचआरडी मंत्रालय के संयुक्त सचिव मनीष गर्ग ने स्कूलों में कार्यक्रम आयोजन के लिए राज्यों को पत्र लिखा है.

पत्र में कहा गया है कि उम्मीद है देश भर में त्योहार और देशभक्ति की भावना जगाने के उद्देश्य से इस महत्वपूर्ण अवसर को मनाया जाएगा. यह नए भारत की सोच के मिशन में देश के हर नागरिक को शामिल करने के लिए आंदोलन है. नए भारत की सोच गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, सांप्रदायिकता और जातिवाद मुक्त भारत है. पत्र में सभी राज्यों से नौ से 30 अगस्त तक चलने वाले कार्यक्रम का प्रचार करने को कहा गया है ताकि मिशन को लेकर लोगों में उत्साह जागे.

गर्ग ने कहा कि सीबीएसई से संबद्ध स्कूल समेत सभी स्कूलों को शपथ ग्रहण के अलावा स्वतंत्रता संग्राम और देश के विकास पर क्विज प्रतियोगिता कराने को भी कहा गया है. इन्हीं विषयों पर पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाएगा


कैसा ये झोल, लाल किले से पीएम ने बताया कुछ और आंकड़े और नोटबंदी पर सरकार ने बताए थे कुछ और !

कैसा ये झोल, लाल किले से पीएम ने बताया कुछ और आंकड़े और नोटबंदी पर सरकार ने बताए थे कुछ और !

26-Aug-2017

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (15 अगस्त) को चौथी बार लाल किले से देश को स्वतंत्रता दिवस पर संबोधित किया। पीएम मोदी के भाषण के प्रति सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोगों को उनका भाषण पसंद आया तो बहुतों ने कहा कि लग रहा था जैसे पीएम आगामी लोक सभा चुनाव के लिए प्रचार कर रहे हैं। आरोपों-प्रत्यारोपों से इतर कुछ रिपोर्ट में पीएम मोदी के भाषण में दिए आंकड़ों की भी पड़ताल की गई। द स्क्रॉल ने अपनी खास रिपोर्ट में लाल किले से पीएम मोदी के दिए आंकड़ों को आधिकारिक आंकड़ो के बरक्स परखा है। पीएम मोदी ने अपने भाषण में कालाधन, नोटबंदी और रोजगार तैयार करने से जुड़े आंकड़े दिए। आइए देखते हैं उनके दावे तथ्यों की रोशनी में कितने खरे उतरते हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि सरकार बनने के बाद उन्होंने सबसे पहला कम एसआईटी (विशेष जांच दल) बनाने का किया। पीएम ने कहा कि तीन साल बाद उन्हें देशवासियों को ये बताते हुए गर्व हो रहा है कि 1.25 लाख करोड़ का कालाधन जब्त किया जा चुका है। पीएम ने ये भी कहा कि दोषियों को सजा भी दिलायी जाएगी। स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने पिछले तीन साल में इससे ज्यादा रकम बरामद की है लेकिन ये सारी रकम सरकार को नहीं मिलेगी। 

ज्यादा संभावना इस बात की है कि दोषियों पर टैक्स पेनाल्टी लगायी जाएगी। लोक सभा में सरकार ने बताया था कि 2016 तक आयकर विभाग ने कुल 1.35 लाख करोड़ रुपये की अघोषित आय बरामद की है।

पीएम मोदी ने नवंबर 2016 में लागू की गई नोटबंदी का भी अपने भाषण में जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि बाहरी विशेषज्ञों के अनुसार नोटबंदी से करीब तीन लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में आए। पीएम ने बताया कि नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा की गई 1.75 लाख करोड़ रुपये की राशि जांच के दायरे में है। पीएम मोदी के अनुसार करीब दो लाख करोड़ रुपये का कालाधन बैंकों में हुआ। पीएम मोदी के इन दावों का स्रोत भी अस्पष्ट है। ये भी साफ नहीं है कि अगर दो लाख करोड़ रुपये कालाधन जमा हुआ तो केवल 1.75 लाख करोड़ की ही जांच क्यों हो रही है।

तीन लाख करोड़ रुपये अघोषित राशि के बैंकों में जमा होने के दावे पर भी स्क्रॉल ने सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। पीटीआई ने इस साल की शुरुआत में एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से कहा था कि नोटबंदी के बाद 3-4 लाख करोड़ रुपये अघोषित राशि सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार “अतिरिक्त जमा” ( न कि अघोषित आय) 2.7 लाख करोड़ रुपये से 4.3 लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है।

पीएम मोदी ने दावा किया कि नोटबंदी के बाद डाटा माइनिंग करके तीन लाख जाली कंपनियों का पता लगाया गया। ये कंपनियां हवाला का कारोबार करती थीं। पीएम मोदी ने कहा कि सरकार ने इनमें से 1.75 लाख जाली कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया है। स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने इसी साल 12 जुलाई को लोक सभा में बताया था कि मंत्रालय ने 1.62,618 कंपनियों को कंपनीज एक्ट 2013 की धारा 248 के तहत कंपनी रजिस्ट्रार से हटा दिया है। मंत्रालय ने अपने जवाब में इन कंपनियों को हटाने के लिए नोटबंदी के बाद की गई डाटा माइनिंग को वजह नहीं बताया था। लोक सभा में ही केंद्र सरकार ने बताया था कि आयकर विभाग को पिछले तीन सालों के दौरान विभिन्न जांचों में 1155 जाली कंपनियों का पता चला है।


पीएम मोदी को पड़ोसी की चिंता ! नेपाल की बाढ़ पर ट्वीट कर हुए ट्रोल

पीएम मोदी को पड़ोसी की चिंता ! नेपाल की बाढ़ पर ट्वीट कर हुए ट्रोल

24-Aug-2017

नई दिल्ली : इन दिनों बिहार, यूपी सहित देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति भयावह होती जा रही है। राज्य के कई जिलों में तो घरों में पानी घुस गया है, जिससे लाखों लोख बेघर हो गए हैं। बता दें कि, इन दिनों नेपाल में भी बाढ़ से बड़ी तबाही मचा रखी है। बाढ़ के कारण नेपाल में अब तक करीब 130 लोगों की जान जा चुकी है।

इसी बीच पीएम मोदी ने नेपाल में बाढ़ से मची तबाही पर अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि इस संकट की घड़ी में भारत नेपाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।

पीएम मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा कि, मैंने नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा से बात की और वहां इस विनाशकारी बाढ़ में मारे गए लोगों के प्रति अपनी संवेदना जताई। साथ ही उन्होंने अपने अगले ट्वीट में नेपाल के हालात पर अपनी चिंता जाहिर की है। पीएम मोदी के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी आलोचना करनी शुरू कर दी। जिसके बाद पीएम मोदी सोशल मीडिया यूजर्स के निशाने पर आ गए और ट्रोल हो गए।

बता दें कि बिहार के सीमांचल जिलों पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, किशनगंज, कटिहार, सीतामढ़ी, पूर्वी चम्पारण और पछ्चिमी चंपारण जिलों के करीब दो दर्जन से ज्यादा प्रखंडों में स्थिति भयावह है। इसके अलावा अररिया, किशनगंज, कटिहार और पूर्वी चंपारण में कई जगहों पर रेल ट्रैक पर बाढ़ का पानी बह रहा है।

कुछ यूजर्स कह रहे है कि आपको नेपाल की चिंता है ये बहुत अच्छी बात है लेकिन एक बार अपने देश में बाढ़ से मर रहे लोगों के प्रति भी संवेदना व्यक्त कर देते।

नई दिल्ली : इन दिनों बिहार, यूपी सहित देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति भयावह होती जा रही है। राज्य के कई जिलों में तो घरों में पानी घुस गया है, जिससे लाखों लोख बेघर हो गए हैं। बता दें कि, इन दिनों नेपाल में भी बाढ़ से बड़ी तबाही मचा रखी है। बाढ़ के कारण नेपाल में अब तक करीब 130 लोगों की जान जा चुकी है।

इसी बीच पीएम मोदी ने नेपाल में बाढ़ से मची तबाही पर अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि इस संकट की घड़ी में भारत नेपाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।

पीएम मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा कि, मैंने नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा से बात की और वहां इस विनाशकारी बाढ़ में मारे गए लोगों के प्रति अपनी संवेदना जताई। साथ ही उन्होंने अपने अगले ट्वीट में नेपाल के हालात पर अपनी चिंता जाहिर की है। पीएम मोदी के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी आलोचना करनी शुरू कर दी। जिसके बाद पीएम मोदी सोशल मीडिया यूजर्स के निशाने पर आ गए और ट्रोल हो गए।

बता दें कि बिहार के सीमांचल जिलों पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, किशनगंज, कटिहार, सीतामढ़ी, पूर्वी चम्पारण और पछ्चिमी चंपारण जिलों के करीब दो दर्जन से ज्यादा प्रखंडों में स्थिति भयावह है। इसके अलावा अररिया, किशनगंज, कटिहार और पूर्वी चंपारण में कई जगहों पर रेल ट्रैक पर बाढ़ का पानी बह रहा है।

कुछ यूजर्स कह रहे है कि आपको नेपाल की चिंता है ये बहुत अच्छी बात है लेकिन एक बार अपने देश में बाढ़ से मर रहे लोगों के प्रति भी संवेदना व्यक्त कर देते।


BJP दफ्तर खोलने के लिए राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे ने किया जमीनों में फर्जीवाड़ा

BJP दफ्तर खोलने के लिए राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे ने किया जमीनों में फर्जीवाड़ा

24-Aug-2017

नई दिल्ली : राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार पर बीजेपी दफ्तरों की जमीन को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार वसुंधरा राजे सरकार पर आरोप है उसने राजस्थान के सभी जिलों में बीजेपी दफ्तर बनाने के लिए लैंड यूज बदला, जो राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है. 

न्यूज़ चैनल आजतक की रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी राज्य के सभी 33 जिलों में अपना दफ्तर खोलना चाहती है. इसके लिए 28 जिलों में सरकार जमीनों का आवंटन कर रही है. जिसमें से 14 जिलों में जमीन आवंटित कर दी गई है. जो जमीन बीजेपी दफ्तरों के लिए दी गई है, वह आवासीय और वाणिज्यिक जमीन हैं. मगर राजस्थान सरकार ने इस जमीन का लैंड यूज ही बदल दिया और इसे संस्थानिक किया जा रहा है.

बीजेपी राजस्थान के इन जिलों में अपने दफ्तर प्राइम लोकेशन पर खुओलना चाहती है. जबकि राजस्थान हाई कोर्ट का आदेश है कि जब तक कोई व्यापक जनहित का मामला न हो, तब तक लैंड यूज नहीं बदला जा सकता है. जिन शहरों में जमीन आवंटन हो चुका है, उनमें नागौर, राजसमंद, हनुमानगढ़, सिरोही, जैसलमेर, चित्तौड़गढ़, धौलपुर, बूंदी, दौसा, करौली, झुंझनूं, टोंक, किशनगढ़, डूंगरपुर शामिल हैं.

हालाँकि बीजेपी सरकार का तर्क है कि बीजेपी के दफ्तर भी जनता के हित के लिए हैं, वहां जनता से जुड़े काम होते हैं. बीजेपी यह भी मानती है कि राजस्थान भू—आवंटन नीति, 2015 के तहत राजनैतिक दलों को जमीन आवंटन का प्रावधान है. और बीजेपी को आरक्षित दर के अलावा 15 प्रतिशत दर पर जमीन आवंटन किया जा रहा है. 

INPUT : INDIASAMVAD.CO.IN