छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगला विकल्प कौन ?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगला विकल्प कौन ?

27-Apr-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

छत्तीसगढ़ की राजनीती में 2 ही विकल्प नज़र आ रहे हैं बीजेपी से मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह या अजित जोगी की जोगी कांग्रेस, क्योंकि भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस के प्रदर्शन का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है? समय रहते कांग्रेस आलाकमान अगर ध्यान नहीं देता है तो परिणाम निश्चित रूप से कांग्रेस का प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में तीसरे स्थान में होने की संभावनाओ से इंकार नहीं किया जा सकता है! हमारे "खुलासा पोस्ट" और ''गरजा छत्तीसगढ़ न्यूज़'' की संयुक्त पड़ताल में जिस तरह से आम जनता की राय सामने आ रही है वह कांग्रेस के लिए चौंकाने वाले हो सकते है, इस सर्वे में कांग्रेस के कई दिग्गज कार्यकर्ताओ का भी अभि-मत शामिल किया गया है |

अभी छत्तीसगढ़ राज्य चुनावी रंग में नहीं रंगा है, लेकिन चुनावी धमक ज़रूर दिखाई देने लगा है, सत्ताधारी पार्टी के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के द्वारा लोक सुराज अभियान के माध्यम से जनता से सीधा संवाद और उनके समाधान का निराकरण करने का प्रयास किया गया है वहीँ दूसरी ओर अजित जोगी और उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ में लगातार सभाओं और जनसंपर्क के माध्यम से जनता से रुबरू हो रहे है, ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजनीति में 2 ही सितारे चमकते दिखाई दे रहे है, वर्तमान में ऐसा अभी दिखाई दे रहा है ? और वहीं मुख्य विपक्ष कही जाने वाले कांग्रेस के सभी नेता मुगालते में अभी कुछ दिखाई दे रहे हैं ! कांग्रेस के बड़े नेता भले ही कितने भी एक जुटता या यूँ कहें आपस में सगे भाईचारा दिखाने की कोशिश कर रहे हो लेकिन अन्दर खाने में आक्रोश है, यही कारण है की डॉ चरणदास महंत और सत्यनारायण शर्मा जैसे दिग्गज नेताओ को भी बैकफूट में डालने से गुरेज नहीं किया जा रहा है | 

कुल मिलाकर वर्तमान में कांग्रेस संगठन में बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष दिख रहा है और इसकी सबसे बड़ी वज़ह है कांग्रेस के मुखिया का अड़ियल रवैय्या ? वहीं कांग्रेस के एक दिग्गज प्रभारी कहते नज़र आ रहे है की जोगी जी के पास फंड ही नहीं है तो चुनाव क्या खाक लड़ायेंगे ? आइये हम आपको बताने जा रहे है, छत्तीसगढ़ में क्या चुनावी सम्भावना हो सकती है | 

कांग्रेस पार्टी ने जोगी जी पर हमेशा कांग्रेस में रहकर कांग्रेस को हराने का आरोप लगाती रही है ! और उसी कारण से कांग्रेस सत्ता से 15 साल से दूर रही है | वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी स्वच्छ छवि और अपने कार्यशैली और अच्छे प्रशासनिक क्षमता के लिए जाने जाते रहे है और एक बेहतरीन राजनीतिक सूझबुझ से अपना तीसरा निर्विवादित कार्यकाल पूरा करने जा रहे है | जिसमे उनके विरोधियो के द्वारा कई आरोप ज़रूर लगाये गए, लेकिन अभी तक साबित कुछ भी नहीं कर सके | वहीं दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी जी ने अब खुद अपनी पार्टी जोगी कांग्रेस बना ली है और प्रमुख प्रतिद्वंदी बनकर बराबरी का टक्कर देने की तैय्यारी में है ! जिसमे नुकसान कांग्रेस को ही होने वाला है |

ऐसे में “क्या“ ?  छत्तीसगढ़ में टक्कर भाजपा और जोगी कांग्रेस के बीच ही होने वाला है ? अभी तक छत्तीसगढ़ में जितने भी सर्वे हुए है उसमे स्पष्ट संकेत मिल रहे है, की कांग्रेस के प्रदर्शन का ग्राफ छत्तीसगढ़ में लगातार गिरता ही चला जा रहा है और कांग्रेस के प्रदर्शन का ग्राफ 3 रे, स्थान पर होने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता? इसका सबसे बड़ा कारण है वर्तमान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल की तोड़ने की नीति चाहे कार्यकर्ता हो या विधायक उन्होंने सिर्फ कांग्रेस में तोड़ फोड़ ज्यादा किया है, कांग्रेस की टिकट से जितने वाले जन प्रतिनिधियों को कांग्रेस से बाहर करने का कार्य इनके द्वारा किया गया है, वह चाहे देवरात सिंह हो, रेणु जोगी हो या आर.के. राय हो फेरहिस्त लम्बी है, कांग्रेस अध्यक्ष के निजी दुश्मनी भंजाने के चलते कांग्रेस पार्टी का सर्वनाश हो रहा है, जिसे कांग्रेस आलाकमान को समय रहते समझना होगा नहीं तो छत्तीसगढ़ में 2018 में वापसी की उम्मीद कांग्रेस को छोड़ देना चाहिए ?

वहीँ डॉ. रमन सिंह के लगभग 15 साल के कार्यकाल में सत्ता में रहने के बाद भी ना कोई गुरुर ना कोई घमण्ड आज भी वही चिर परिचित मुस्कुराता चेहरा नजर आता है, ठीक इसके उलट भूपेश बघेल हमेशा तनावग्रस्त और गुस्से में दिखाई देते है कार्यकर्ताओ से सीधे मुंह बात नहीं करते ऐसा कार्यकर्ताओं का कहना है वहीं अजित जोगी की जोगी कांग्रेस, कांग्रेस के उपेक्षा के शिकार कार्यकर्ताओ को गले लगा रहे है और अपनी पार्टी में सम्मान दे रहे है | कांग्रेस संगठन सभी वर्गों को सम्मान के साथ जोड़ने की बात ज़रूर करता है लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस में ठीक इसका उलटा हो रहा  है ! 

सब को मालूम है सच हमेशा कड़वा होता है और यही बातें कांग्रेस के साथियों को शायद बुरी लगती है जब की उन्हें इसमें सुधार की सम्भावना को तलाश करना चाहिए ! वही वर्तमान में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा कड़वा सच यही है की कई कांग्रेस के दिग्गज नेता और कार्यकर्ता घर बैठे हुए हैं क्योंकि उन्हें ना जिम्मेदारी दी जाती है ना उन्हें पूछा जाता है अगर वर्तमान में चुनाव हो जाये तो जोगी कांग्रेस, कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचा सकती है और कांग्रेस के कई बड़े नेता जिनकी टिकट हमेशा से तय रहती है वो निश्चित रूप से हार सकते है क्योंकि इस त्रिकोणीय मुकाबले में लाभ भाजपा और जोगी कांग्रेस का होने वाला है जिसे अध्यक्ष की मंडली को छोड़ कांग्रेस के सभी दिग्गज नेता बड़े अच्छे से समझ रहे है, लेकिन इनके जिद्द के सामने विवश हो कर खामोश बैठे है !

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है कांग्रेस हाई कमान चाहे तो प्रदेश में कोई नया नेतृत्व दे कर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार कर सकता है बशर्ते नया नेतृत्व सभी को जोड़कर नई सम्भावना के साथ विधानसभा का चुनाव लड़े ? क्योंकि वर्तमान अध्यक्ष महोदय जी जाति की राजनीति में कांग्रेस पार्टी को दाँव पर लगा रहे हैं और कांग्रेस आला कमान चुप्पी साधे हुए है और खामोश है, जिसका भयानक परिणाम कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता जिन्होंने कई उम्मीदे लगा रखीं है और सब की उम्मीद एक आदमी के झूठे अहंकार की वज़ह से फिर से मिट्टी में मिल जाने वाला है !

छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा क्षेत्र है, जिसमें अधिकतर विधानसभाओ में विधायकों के प्रदर्शन पर ही आने वाले विधानसभा चुनाव का परिणाम आएगा, भारतीय जनता पार्टी के लिए भी सीधे संकेत मिल रहे है की कई विधानसभा क्षेत्र में वर्तमान विधायको का प्रदर्शन संतोषप्रद नहीं है, भारतीय जनता पार्टी के 60 % विधायकों को बदले जाने पर ही चुनावी समर में कुछ अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है वहीं जोगी कांग्रेस अभी नये दल के रुप मे इस विधानसभा में चुनाव लड़ने जा रही है और उनकी सभाओं में अच्छी ख़ासी भीड़ जुट रही है, लेकिन भीड़ को देखकर परिणाम का आंकलन अभी करना बेमानी होगा लेकिन जोगी कांग्रेस के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी राजनीती के मंजे हुए खिलाडी है शह और मात का खेल बेहतर जानते है. अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनके राजनितिक भविष्य की अग्नि परीक्षा है जिसमे सभी की नज़रे टिकी हुई है अब आगे क्या होने वाला है ये तो आने वाले चुनाव के परिणाम ही बताएगा ?

कांग्रेस का हाथ छोड़ते जा रहे है दलित और मुस्लिम ? 

भारत का दलित और मुस्लिम वोट बैंक अब कांग्रेस का हाथ और साथ क्यों छोड़ता जा रहा है ? एक समय था जब इन्हे कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक समझा जाता था, समय समय पर दलित समाज के वोट तो अन्य दूसरे दलों के साथ जुड़ते रहे है जिस तरह की लीडरशीप उन्हें मिली, लेकिन मुस्लिम समाज नेतृत्व के आभाव में इधर-उधर भटकते रहे है ?  क्योंकि मुस्लिम लीडर शिप कांग्रेस परस्त रही है, मुस्लिम लीडर छोटे छोटे पदों में ही सिमट कर रह गए उन्होंने मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए सार्थक कोशिशे नहीं की जिसका नतीजा सच्चर कमेटी जैसी रिपोर्ट के रूप में सामने आया,  और इन समस्त दुर्दशा का कारण बनी कांग्रेस जिसने संघ और भा.ज.पा. के दंगो का भय और आतंक दिखा कर मुसलमानो से वोट तो लेते रही लेकिन उसने मुसलमानो का कभी भला नहीं सोंचा आज तक भा.ज.पा को मुस्लिम विरोधी बताया जाता है हम पूरे देश की बात तो नहीं करते लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में भाजपा का चेहरा कुछ और ही है देश में बीजेपी को खलनायक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ में यही बीजेपी एक नायक की तरह है ।

यह वर्ष चुनावी वर्ष है सभी पार्टियाँ अपने अपने जीत के दावे कर रही हो लेकिन जनता जनार्दन का समर्थन किसे जाता है यह भविष्य तय करेगा, हमने यह रिपोर्ट अपने निजी स्त्रोतों के द्वारा किए गए सर्वे और कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी के द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर कांग्रेस की दशा को प्रदर्शित किया है ।

अभी जंग का आगाज़ भी नही और तख़्त में बैठने का ख्वाब !

जी हाँ छत्तीसगढ़ काँग्रेस की राजनीतिक उथल पुथल में कुछ ऐसी ही बातें सामने निकल कर आ रही है , नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंह देव (बाबा) के बयान के बाद काँग्रेस में बवाल मचा है  । पूर्व प्रदेशकांग्रेस अध्यक्ष डॉ चरण दास महन्त ने भी मीडिया में बयान देते हुए यह कहा है की मैं क्यों मुख्यमंत्री नहीं बन सकता? बात में दम तो है लेकिन इसके लिए विधानसभा के चुनाव को जितना भी आवश्यक हैं ,अभी तो वर्तमान अध्यक्ष महोदय काँग्रेस को तोड़ने का काम कर रहे हैं , और चुनाव में जीत के लिए कार्यकर्ताओ का दिल  जितना पड़ता हैं जो वर्तमान में दूर - दूर तक कही दिखाई नहीं दे रहा है और  चाटुकारों के दम पर चुनाव नहीं जीता जाता , पिछले चुनाव में ऐसा ही कुछ देखा गया था उस चुनाव में नेतृत्व महन्त जी के हाथ में था और जितने की संभावना भी बनी लेकिन उनके इर्दगिर्द जो चाटुकारों का घेरा है उन्होंने उस जीत में पानी फेर दिया ,इसमें कोई संदेह नही है कि चरण दास महन्त वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं साफ सुथरी छवि भी है उनकी  लेकिन उनके मैनेजर उनके करीब  कार्यकर्ताओ को पहुँचने नहीं देते हैं ।

और पिछले विधानसभा चुनाव में यही देखा गया था , क्योंकि कांग्रेस में हार जीत के मंथन की परंपरा नही है और छोटे कद के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुनी नहीं जाती वैसे महन्त जी के  प्रदेशकांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल निर्विवादित रहा हैं । लेकिन उनके इर्दगिर्द के साथी जो कूट राजनीति में माहीर माने जाते हैं वो इनके तरक्की के लिये सबसे बड़े बाधक बने हुए है । वैसे कांग्रेस में दिग्गज नेताओं की कमी नहीं है लेकिन बिचौलियों के चलते कांग्रेस हमेशा  नुकसान में रहती हैं ,अब देखना ये हैं कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व समय रहते सही कदम उठता है या आँख मूंदकर संगठन का भट्टा बैठाने वालों पर ही भरोसा करता है ये तो आने वाला समय ही बता पायेगा ?


आईना हमने दिखाया तो बुरा मान गए

आईना हमने दिखाया तो बुरा मान गए

23-Apr-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

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सामन्तवादी सोंच और तानाशाही रवैये का ताज़ातरीन उदाहरण है कांग्रेस का मीडिया विभाग-काँग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष द्वय शिव डहरिया और रामदयाल उइके के साथ हुई अपमान जनक घटना से इसे देखा जा सकता हैं, नेता द्वय को दलित और आदिवासी के मामले में बोलने नही दिया गया और वे दोनों प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर चले गए क्या ? ये अपमान जनक घटना नही है ! जिन  दलित और आदिवासियों के वोटों से ये सत्ता में बैठने का सपना देख रहे है उन्ही के साथ भेदभाव  का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा, यहाँ लगता तो ऐसे ही हैं | की छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का संचार और  मीडिया विभाग जाती और धर्म के हिसाब से बोलने का अधिकार देता है ? 
और इनसे उम्मीद भी क्या की जा सकती हैं !

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छत्तीसगढ़ में दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज अपना वोट क्यों दे कांग्रेस को ?  वोट हमारा और राज तुम्हारा अब ये नहीं चलने वाला है | जब संगठन में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इन्हें नहीं दिया गया तो इनसे सत्ता में भागीदारी की क्या उम्मीद की जा सकती है? आज का ये सबसे बड़ा सवाल है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है छत्तीसगढ़ की प्रदेश की वर्तमान कार्यकारिणी का प्रतिनिधित्व, जिसमे अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपनों को दे वाली कहावत चरितार्थ हो रही है, जिसमे 1 ही परिवार के 6 सदस्य बड़े ही आश्चर्य की बात है.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस संगठन इन सभी वर्गों के पीठ में छुरा घोंपने का काम कर रही है और इन समाजों की अंधभक्ति और अशिक्षा का नाजायज फायदा उठा रही है, क्योकि कांग्रेस की परंपरा ही चरण छूने वालो की रही है, अगर किसी ने इनके खिलाफ बोलने या लिखने की कोशिश भी की तो इनके चंदा खोर चमचो की टीम लिखने वाले को गरियाने लग जाते है, शायद इसलिए की चंदा वसूली से इनका घर चलता है ?

संगठन की भलाई के लिए कहने वालो को कांग्रेस का दुश्मन समझते है ? अभी हाल ही में मेरे द्वारा एक समाचार प्रकाशित किया गया जिससे कुछ लोगों को काफी बुरा लग गया और वे सोशल मीडिया में मुझे ट्रोल करने लगे और जिस प्रकार के शब्द की उम्मीद नहीं की थी वे भी कमेन्ट बॉक्स में डाले गए. 

मै आपको बता दूँ कि मै किसी भी पार्टी या संगठन की तरफदारी नहीं कर रहा हूँ बल्कि वास्तविकता से वाकिफ करा रहा हूँ? अभिव्यक्ति की आजादी सभी को है कांग्रेस किसी के बाप की जागीर नहीं है कुछ ऐसे ही दो कौड़ी के चमचो के कारण कांग्रेस का ये हाल हुआ है !इन फूल छाप कांग्रेसी नेताओ की वज़ह से दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के लोगो को संगठन की मुख्यधारा में कभी भी आगे आने नहीं दिया, बल्कि मोर्चा–प्रकोष्ठ जैसे पद या यूँ कहे तो टुकड़े फेक कर इनके जुबान को बंद करने की कोशिश हमेशा से करते आये हैं, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में ये नहीं चलने वाला है, अब छत्तीसगढ़ की जनता समझ गई है की हमारा कौन भला चाहने वाला है ! अब दाऊ गिरी का जमाना लद गया समाज जागृत हो गया है पहले की तरह छत्तीसगढ़ की जनता दाऊ जी के दरबार में हाथ जोड़े अब नहीं खड़ी होने वाली है !

आज उत्तरप्रदेश,बिहार,आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, दिल्ली में अब ये समाज जागरूक हुआ तो पिछले 25 -30 सालों से कांग्रेस को सत्ता के लाले पड़ गए है और तब भी ये समझना नहीं चाहते, तो क्या कर सकते है ?  छत्तीसगढ़ की राजनीति में तीसरी ताकत बनकर उभर रहे अजित जोगी की पार्टी इन  समाज के लोगो का हाथ बड़े सम्मान के साथ थाम रही है और इन्हें जिम्मेदारी भी दे रही है और इनके अधिकारों को उन्हें बताने का काम भी कर रहे है ! 

कभी कांग्रेस के लिए समर्पित अजित जोगी और उनका परिवार इनके ही राजनीतिक साजिशों का शिकार हुए है, क्योंकि जोगी जी ने दलितों, पिछड़ो, अल्पसंख्यक और आदिवासियों के हितो की बात की, जिसे कांग्रेस के सामंतवादी विचारधारा रखने वाले नेता हज़म नहीं कर पाए और साजिशे कर के उनको और उनके परिवार को कांग्रेस छोड़ने के लिए मज़बूर किया, झूठा टेलीफोन टेप काण्ड का आरोप लगाया, जो की ये कांग्रेस के नेता साबित भी नहीं कर पाए और राहुल गाँधी जी को अँधेरे में रख कर इन्हें कांग्रेस छोड़ने विवश करते रहे और प्रदेश के एक कद्दावर मन्त्री की फ़र्ज़ी सेक्स सी.डी. को लेकर हो हल्ला मचाते रहे यह कांग्रेस की परम्परा को लज्जित करने जैसा है जिस सेक्स सीडी की बात कहकर नेता जी हो हल्ला मचा रहे थे वह अभी साबित भी नहीं हुआ और इस मामले में एक पत्रकार को जेल भी भुगतना पड़ा

इस सीडी को लेकर कांग्रेस जिस तरह हल्ला मचा रही थी यह सीडी फर्जी साबित होने के बाद कांग्रेस की छवि पर जो बुरा प्रभाव पड़ा है उसका जवाबदार कौन होगा ? छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के मान सम्मान को कौन धूमिल कर रहा है? कौन जातपात के भेदभाव की राजनीति कर रहा है जनता और सच्चे कांग्रेस के कार्यकर्ता जानते समझते है, अगर कोई सच लिखता है और इन्हें आईना दिखाता है तो इन चंदाखोर चमचा बाबू लोगो को बुरा लगता है क्योकि इनकी निष्ठा संगठन के प्रति ना होकर अपना भला करने में अधिक है |


राजनीति पर जातिगत राजनीति बड़ा धब्बा

राजनीति पर जातिगत राजनीति बड़ा धब्बा

08-Mar-2018

By : khulasapost magazine story

देश की राजनीति पर जातिगत राजनीति सबसे बड़ा धब्बा है. चुनाव सुधार और सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों के अलावा आम राजनीतिक बहसों पर भी गौर करें तो जातिगत राजनीति को देश के लिए सबसे मुश्किल कड़ी बताया जाता है. विडंबना देखिए कि पिछले तकरीबन 60-70 वर्षों से हमारे देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही लगभग इसी आधार पर खड़ी हुई है. उत्तर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में जातिगत राजनीती की विचार धारा आम बात है,  लेकिन आपको जानकर आश्चीर्य होगा कि दक्षिण भारतीय राज्यों में भी पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर लड़ी जाती है. हालांकि, भारत की जनता जातियों के आधार पर संगठित है । अत: न चाहते भी राजनीति को जातिगत व्यवस्था के साथ जोड़ा जाना सामाजिक विवशता है अतः राजनीतिक दलों को इस व्यवस्था का उपयोग करना ही पड़ता है अत: राजनीति मे जातिवाद का अर्थ जाति का राजनीतिकरण है ।

जाति को अपने दायरे में खींचकर राजनीति उसे अपने काम में लाने का प्रयत्न करती है । दूसरी ओर राजनीति द्वारा जाति या बिरादरी को देश की व्यवस्था में भाग लेने का मौका मिलता है । नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय संगठन का उपयोग करते हैं और जातियों के रूप में उनको बना-बनाया संगठन मिल जाता है जिससे राजनीतिक संगठन मे आसानी होती है भारत में जाति और राजनीति में आपसी सम्बध को समझने हेतु इन चार तथ्यों पर विचार आवश्यक है ।

धर्म के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण किए जाने की कोशिश होती रही है और अब देश में धर्म के नाम पर युवाओं का ध्रुवीकरण जोरों से किया जा रहा है. राजनीति के गलियारों में चलने वाली साम्प्रदायिकता की ज़हरीली हवा समाज में इस कदर घुल रही है कि इसका प्रभाव युवाओं पर हो रहा है. सभी समुदायों के धार्मिक और राजनीतिक नेता इस बात को अच्छे से जानते हैं कि नौजवान पीढ़ी के बीच ध्रुवीकरण का बीज बोने से आने वाले वक्त में उनकी सियासी फसल बेहतर हो सकती है. 

अब हालात ये हो गए हैं कि युवाओं के बीच साजिश रचने वाले धार्मिक चेहरों की सक्रियता तेजी से बढ़ी है. कर्नाटक हो, महाराष्ट्र हो या फिर हरियाणा व उत्तर प्रदेश. सभी राज्यों में अचानक युवाओं को धर्म का पाठ पढ़ाने की घटनाएं बढ़ गई हैं, जाहिर है जिनके पीछे कुछ विघटनकारी साम्प्रदायिक ताकतों का हाथ होता है शिक्षण संस्थाओं के बाहर और सार्वजिनक कार्यक्रमों में धर्म के ये राजनीतिक ठेकेदार अपना काम कर रहे हैं. युवाओं में एक-दूसरे के प्रति धर्म के नाम पर नफरत बढ़ाने का काम किया जा रहा है. छोटी-छोटी बातों पर दंगे-फसाद हो रहे हैं. मामला कोई भी हो, उसे धर्म से जोड़कर देखा जाता है.

एक तरफ दक्षिण भारत में कई सांप्रदायिक संगठन न केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपनी आक्रमक कार्रवाई को तेज करते नजर आते हैं बल्कि वैज्ञानिक सोच रखने वाले विद्वानों को भी ठिकाने लगाने पर आमादा हैं, तो दूसरी तरफ हैदराबाद के एक विवादित नेता भड़काऊ बयान देकर उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमानों के बीच जगह बनाने के लिए नई सियासी जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. 

हम किस समाज में रह रहे हैं?  एक ऐसा समाज जहाँ केवल एक शक की वजह से बिना बात के एक आदमी की जान ले ली जाती है. जहां गाय को माता बुलाने वाली हिन्दुत्व की फ़ौज 80 वर्ष की बुजुर्ग महिला की छाती पर अपने पैरों से हमला करती है. उन्हें अपने जूतों के नीचे रौंदती है. उन्ही की आँखों के सामने उनकी जवान लड़कियों के साथ अश्लील हरकतें की जाती हैं. और गौ रक्षा के नाम पर पूरे परिवार और गाँव की हज़ारों की भीड़ के सामने एक व्यक्ति को दिन-दहाड़े मौत के घाट उतार दिया जाता है. क्या हमारे देश में कानून नाम की कोई चीज़ है या नहीं? क्या हम एक सभ्य समाज में रह रहे हैं?  

इस विराट लोकतंत्र के लिए यह बेहद शर्मनाक है कि चुनाव का मुद्दा जनता की बुनियादी आवश्यकताएं न होकर अब गौ मांस बन गया है. यह नागरिक पतन की चरम परिणति है. सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाज में जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है. आए दिन कोई न कोई विवादित पोस्ट समाज में साम्प्रदायिक तनाव की वजह बन जाती है. फेक आईडी बनाकर फेसबुक और ट्वीटर पर धार्मिक उन्माद भड़काने की कोशिशें की जा रही है. देश का युवा वर्ग सोशल मीडिया पर खासा सक्रिय है. वो इससे कहीं न कहीं प्रभावित होता है. सरकार हर घटना के पीछे सियासी फायदा तो तलाशती है. लेकिन कार्रवाई करने में अक्सर देरी करती नजर आती है. 

दरअसल,  मजहबी और सियासी ठेकेदारों की ये कोशिश समाज में एक बड़ा ध्रुवीकरण करने के लिए हो सकती है. अगर भाजपा यह बात प्रचारित करती है कि उसे गत लोकसभा चुनाव में सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए डाले गये वोटों में से जो मत मिले हैं वे राजनीतिक रूप से चेतन मतदाताओं द्वारा बिना किसी लोभ लालच से दिये गये हैं, तो उसे यह भी मान लेना चाहिए कि जागरूक मतदाता बँधुआ नहीं होता है. दलों के कारनामों के प्रभाव में उसकी दिशा बदल भी सकती है. उल्लेखनीय है कि उक्त चुनाव में भाजपा की जीत काँग्रेस की अलोकप्रियता, व्यापक पैमाने पर दल बदलुओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय लोगों को चुनाव में उतारकर संसाधनों के तीव्र प्रवाह के कारण भी थी और लोगों के भावनात्मक-सांप्रदायिक उत्प्रेरण के कारण भी. 

देश की जनसंख्या का एक भाग आज भी साम्प्रदायिकता की राजनीति से प्रभावित है लेकिन वहीँ एक बड़ा हिस्सा इसमें विश्वास नहीं रखता. इस जनसमूह को वास्तविकता से परिचित कराने की जिम्मेदारी सचेत नागरिकों का है. सरकार आज दूसरे छोर पर है. जनतंत्र में सरकारें जनता की मर्जी से चुनी जाती हैं. वे तभी बेहतर होंगीं जब हम उनपर काबू रख सकेंगे. आज सरकारें बेकाबू हैं क्योंकि हम उनके जाल में स्वेच्छा से फंसे हुए हैं. अब समय है कि बहेलियों के जाल ध्वस्त किये जाएं और यह तभी संभव है जब जनता खासकर युवा असल में जाग जाएं.


हम इतना डरे हुए क्यों हैं ?

हम इतना डरे हुए क्यों हैं ?

23-Feb-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

हम इतना डरे हुए क्यों हैं ? जी हाँ, यह सवाल आप पर, हम पर, हम सब पर लागू होता है,  आज एक आम इंसान जब भी घर से निकलता है तो उसे सही सलामत अपनी घर वापसी का भरोसा नहीं रह गया है चंद लोग सत्ता के मद में इतना चूर हो गए है कि इन्हें जानवर से ज़्यादा सस्ती इंसान की जिंदगी नज़र आने लगी है, किसी जमाने में हम तालिबानों को उनकी इन्ही हरकतों पर हँसते थे आज हमारे देश में धर्म के नाम पर उन मज़लूमों पर ज़ुल्म हुए है वो क्या तालिबानियों से बत्तर नही है ?

ये हो क्या रहा है ? इस देश मे.  कहाँ है कानून का राज ? क्या तालिबानी फरमानो से देश चलेगा ? शर्म करो सत्ताधीशो, तुम्हारे वोट बैंक की राजनीति ने इस देश को गृह युद्ध की कगार पर पहुंचा दिया है । जितने मरेंगे, कटेंगे उतना राजनीतिक फायदा की उम्मीद मत करो अब जनता समझने लगी है तुम्हें ?  इलाहाबाद का दलित युवक सड़को पर बेदर्दी से मार दिया जाता है, लेकिन हत्या के जिम्मेदारों के लिए सिंहासन पर बैठे लोगो ने कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी क्योकि वो एक गरीब दलित परिवार से था वोट लेने के समय तो इन्हे सर पर बिठाते है और सत्ता मिल जाने पर ‘डेटॉल’ और साबुन से हाथ धोकर छूने को कहते है ये इंसान ना हुए भगवान हो गए । धर्म के आडम्बर में इंसानियत का खून सफ़ेद हो गया 

दलित युवक की मौत दु:खद है, शर्मनाक है । लेकिन समाज के कुछ लोग खुलेआम हत्यारो को मारने की सुपारी दे रहे है ? अभी कुछ दिनो से तमाम जाति व समाज के लोग किसी को मारने उसका सिर काटने पर ईनाम की घोषणा कर रहे है । और वहां की राज्य सरकारे मूकदर्शक बनकर हाथो पर हाथ धरे बैठी है जो की शर्मनाक है !

आखिर कब तक डर और दहशत दिखा कर राज करोगे,  कहीं ऐसा ना हो जाए की जिनकी अटूट आस्था तुम पर थी वह भी तुम्हारे वहशियाना फैसलों से तुम से दूर भागने लगे,  जब भी कोई किसी पर अत्याचार करे हिंसा को जन्म दे तो वो ही आतंकवाद होता है आप माने या न माने मुझको इससे कोई फर्क नही पड़ता है, पर सच्चाई तो यही है। आपको जनता ने एक बार मौका दिया है क्या यही आप के लिए अंतिम अवसर मान कर चल रहे है, दोबारा क्या मुंह लेकर जाओगे जनता के पास क्योकि ये प्रजातंत्र है | धर्म के नाम पर ISIS, अल कायदा, LTT आदि आतंकवादी संगठनों का इतिहास को पढ़े तो आपको मालूम होगा के वे भी धर्म के नाम पर धर्म की रक्षा के लिए या अपनी रक्षा के लिए खड़े हुवे और फिर दिन प्रति दिन क्रूर होते चले गए यही हाल अब हमारे देश का है भारत देश में कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है यदि कोई देश भक्ति के नाम पर हिंसा, और आतंक फैला कर दहशत फैलाता है तो ऐसे लोग रक्षक नही राक्षस कहलाने के हकदार होंगे ।

यह कहना कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, अब हास्यास्पद ही लगता है। विभिन्नता में भी एकता है यह नारा भी अब चुभने लगा है। भारत में कोई भी सरकार रही हो, उसने भारत की समस्याओं के हल पर गंभीरता से विचार और कार्यवाही कभी नहीं की। गैर-जिम्मेदार राजनीति के फैसलों के चलते हर वर्ष ये सम्याएँ बढ़ती चली जा रही है । दादरी में अखलाक की हत्या, फिर 2016 में ऊना (गुजरात) में गाय का चमड़ा उतार रहे चार दलित युवकों की पिटाई, इसी वर्ष राजस्थान के अलवर में पहलू खान की हत्या हो या इलाहाबाद के युवक दिलीप सरोज़ की पीट पीटकर हत्या हो इसे कोई भी कानून जायज नहीं ठहरा सकता। भीड़ की मानसिकता वाले लोगों के हौसले क्यों बुलन्द हैं क्योंकि उनमें यह विश्वास है कि हम सड़क पर उतरकर जो चाहें कर सकते हैं। पुलिस हमारे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी, फिर अफवाहें, तथ्यों की अनदेखी, एक खास समुदाय के पहनावे पर धार्मिक विश्वासों के प्रति पूर्वाग्रह या घृणा जैसी कई चीजें सड़क पर तुरन्त मरने-मारने का फैसला करने को प्रेरित करती हैं।


दलित समुदाय पर ख़तम होती मायावती की ‘माया’

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16-Feb-2018

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बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ! यह नाम नहीं एक विचार है. वह सोच है जिसने भारत में सबसे पिछड़े समाज को भारत के मुख्य धारा में लाने का काम किया. आजादी के दशकों बाद भी दलित, समाज की मुख्यधारा से वंचित रखा गया , लेकिन बदलाव धीरे-धीरे आता है और आज भारत उस बदलाव के मोड़ पर खड़ा है, जब दलित खुद को दलित कहलाने से परहेज नहीं करता बल्कि उस पर फक्र करता है.

गुजरात के चुनावो में दलित एक ताक़त बनकर उभरे है जहां, इनकी एकता और ताक़त को दलितों की मसीहा कहलाने वाली मायावती ने रोकना चाहा उन्हें गुजरात के दलितों का साथ देना छोड़ खुद प्रत्याशी खड़े कर के दलितों और पिछडो को हराने का काम किया है | आपको याद दिला दे उत्तरप्रदेश सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलितों पर घटित ठाकुरों के दबंगई का ज़वाब भीम आर्मी ने दलितों की रोबिनहुड बन गयी. पिछले साल एक गांव में दलितों ने बोर्ड लगा दिया जिस पर लिख दिया- था (द ग्रेट चमार )

अपने आप को दलितों का मसीहा कहने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी की सुप्रीमो मायावती ही दलितों पिछडो और आदिवासियों की सब से बड़ी दुश्मन है, मायावती अपने झूठे अहंकार और वजूद को जिन्दा रखने के लिए अपनी ही जड़ो में मठा डालने का काम कर रही है, जिसे अब दलित और पिछड़ा समाज समझने लगा है जिसे अभी हाल ही के गुजरात विधानसभा सभा के हुए चुनावों से बेहतर समझा जा सकता 

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गुजरात चुनाव में दलित-पिछड़े और पाटीदार आन्दोलन को लेकर हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी – अल्पेश ठाकोर उभरे और उन लोगो ने जिस तरह से गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को टक्कर दी है यदि उसमे मायावती अपनी जिद में अड़ कर अपने प्रत्याशी ना खड़े किये होते और इनका समर्थन कर सहयोग करती तो चुनाव और भी दमदारी के साथ लड़ा जा सकता था ! लेकिन मायावती ने जानबूझ कर गुजरात चुनाव में वोट काटने के लिए अपने प्रत्याशी उतारे–जिससे दलित पिछड़े और आदिवासी क्षेत्र में कुछ वोट बंट गये शायद मायावती जी को ये गुमान हो चला है की पूरे देश के सर्वहारा बहुजन वर्ग इनकी निजी जागीर है – ये तब कहाँ चली गयी थी जब गुजरात में दलितों पर जुल्म ढहाया जा रहा था जिग्नेश और अल्पेश पर फर्जी केस दर्ज किये जा रहे थे.  मायावती जी की सोंच में दलितों के नाम पर अकेला खाउंगी  और किसी को खाने नहीं दूंगी वाली स्थिति है ? उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में ठाकुरों के द्वारा दलितों पर हमला किया गया और दलित समाज  की दलित आर्मी के युवा नेता रावण पर झूठे मुक़दमे बना कर जेल भेज दिया गया लेकिन उस पर कोई टिप्पणी नहीं और ना आन्दोलन और ना उसे छुड़ाने कोई प्रयास किया गया इसका सीधा सा मतलब है की दलितों में कोई नया नेतृत्व नहीं उभरने देना चाहती है मायावती ! दलितों को अपनी मुट्ठी में समझने वाली मायावती की झोली खाली हो गई 

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तीन दशक पहले बहुजन समाज पार्टी जिन मुद्दों, नारों, रणनीति, सामाजिक समीकरण और नेता के सहारे संसदीय राजनीति में उतरी थी, तीन दशक बाद भी उसी के सहारे खड़ी हैं। जबकि सच्चाई यह है कि तीन दशक में देश और प्रदेश की राजनीति और समाज में ढेर सारे परिवर्तन हो चुके हैं।

दलित और अति पिछड़े समाज में भी आर्थिक और शैक्षणिक उन्नति हुई है। लेकिन मायावती ने अपनी रणनीति में कोई ठोस बदलाव नहीं किया है। जो बदलाव किए, उसे महज सत्ता पाने तक सीमित रखा गया। पार्टी और संगठन के आंतरिक ढांचे में उन परिवर्तनों का कोई असर नहीं पड़ा।

चलिए चलते हैं 1996 में हुए वोटिंग पर जहाँ मायावती ने सहारनपुर के हरौड़ा और बदायूं की बिल्सी सीट से विधानसभा चुनाव जीता, मगर हरौड़ा से विधायकी कायम रखी। पहली बार 2007 में जब दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ के सहारे बसपा अपने बूते 206 सीटें जीती तो सहारनपुर की सात में पांच सीटें बसपा के खाते में गईं। लेकिन वर्तमान की राजनीति में इस बार हुए यूपी चुनाव में करीब 42 फीसदी मुस्लिम और 22 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी वाले सहारनपुर की सभी सीटों पर हार के साथ बसपा के भाईचारे का तिलिस्म टूट गया।

मायावती से यही मोहभंग ‘भीम आर्मी’ जैसे नए संगठनों की जमीन तैयार कर रहा है। लगातार तीन चुनाव में मायावती की नाकामी के बाद दलित भी सोचने पर मजबूर हुआ है। दलितों में अब जोश और जागृति आ चुकी है। इसी का नतीजा है कि सहारनपुर हिंसा के खिलाफ केवल सोशल मीडिया के जरिए 21 तारीख को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों की भीड़ उमड़ी। गुजरात में दलित नेता जिग्नेश मेवानी की जीत के बाद दलित राजनीति में एक नए दौर के आगाज के रूप में देखा जा रहा है। वक्त के साथ-साथ अब मायावती की ‘माया’ दलितों पर से खतम होती नजर आ रही है अब दलित समुदाय नए नेतृत्व को पसंद कर रहा है और अब वे युवा नेतृत्व पर भरोसा जता रहे हैं, हो सकता है समय बीतने के साथ-साथ मायावती भी बीते हुए समय की बात हो जाए ।


तो क्या बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होगा त्रिकोणीय मुकाबला ?

तो क्या बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होगा त्रिकोणीय मुकाबला ?

15-Feb-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

वर्ष 2018 के लगते ही छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है इस बार का चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने वाला है जहाँ कांग्रेस कह रही है की यह सीधे बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला है तो वहीँ जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस भी दावा कर रहा है की यह मुकाबला जोगी कांग्रेस और बीजेपी के बीच है. भले ही जनता कांग्रेस और कांग्रेस अपना पक्ष मजबूत बताए और जीत हासिल करने के दावे ठोके लेकिन सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भी इनसे टकराने के लिए एक तरह से चट्टान की तरह खड़ा हुआ है, बीजेपी पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनाव के परिणाम के आधार पर हर बूथ के लिए मंत्री, सांसद से लेकर वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर चुकी है.

हालाँकि इस बार बीजेपी के लिए यह चुनाव आसान नहीं होगा क्योंकि कुछ मंत्रियो का विवादों में फंसा रहना भी एक कारण है, लेकिन बीजेपी के लिए राहत की बात यह है की अभी विपक्ष और विपक्ष की ‘तुकड़ी’ (अलग हुई पार्टी) दोनों आपस में एक दूसरे पर हमला बोलने में जुटे हुए हैं वहीँ सत्ताधीश बीजेपी धीरे-धीरे अपने काम में लगा है और  चौथी पारी के लिए कमर कस ली है। बीजेपी अपनी तमाम खामियों को दुरुस्त करने में जुट गया है।

खासतौर पर उन सीटों पर जोर आजमाइश ज्यादा है, जहां बीजेपी कमजोर हो रही है। बीजेपी ने इस बार 66 सीटो पर जीत दर्ज करने का लक्ष्य रखा है चूंकि लक्ष्य बड़ा है और उस लक्ष्य को साधने संगठन के सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है, लिहाजा कवायद तेज हो गई है।  


कांग्रेस पार्टी में जहाँ गुटबाजी की खबरे आती रहती है वहीँ बीजेपी भी इसका कुछ-कुछ शिकार होते नजर आ रही है, ऐसा हम दावा नहीं करते परन्तु करीब 3-4 महीने पहले बीजेपी की राष्ट्रीय महासचिव सरोज पांडे ने यह कहकर माहौल गरमा दिया है कि अगले मुख्यमंत्री का चयन पार्टी आलाकमान तय करेगी. सरोज पांडे का यह बयान मुख्यमंत्री रमन सिंह को सीधे चुनौती देने वाला माना जा रहा है. सरोज पांडे ने बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में मुख्यमंत्री का राग छेड़कर बीजेपी नेताओं के बीच अच्छी-खासी बहस छेड़ दी.

इस बयान के पहले भी कोरबा में उन्होंने राज्य में बीजेपी नेतृत्व को लेकर ऐसा ही बयान दिया था. और वही बयान उन्होंने फिर दोहराया कि छत्तीसगढ़ में अगली सरकार बनने पर सीएम कौन बनेगा इसका फैसला चुनाव के बाद होगा. तो पार्टी महासचिव के सुर में सुर मिलाते हुए राज्य के गृह मंत्री राम सेवक पैकरा ने भी कहा कि चौथी बार मुख्यमंत्री कौन बनेगा इस पर फैसला राष्ट्रीय कार्यसमिति ही लेगी. 

दरअसल बीजेपी के भीतर नेताओं का एक दबाव समूह बन गया है. जो एन केन प्रकारेण मौजूदा मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने के लिए जोर आजमाइश में जुटा है. इसके लिए आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग पार्टी फोरम में उठाई जा रही है. इसके पीछे दलील दी जा रही है कि छत्तीसगढ़ का निर्माण ही आदिवासी राज्य के रूप में किया गया था. तत्कालीन समय इस वर्ग की भावनाओं का आदर करते हुए कांग्रेस आलाकमान ने बतौर आदिवासी मुख्यमंत्री अजित जोगी की ताजपोशी की थी. राज्य के आदिवासी नेता इसकी मिसाल देते हुए बीजेपी आलाकमान से भी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने लगातार तीसरी बार कांग्रेस को धूल चटाई है. हालांकि 2003, 2008 और 2013 में वोटों का अंतर लगातार घटता गया है. 2013 के विधानसभा चुनाव में यह अंतर घटकर एक फीसदी से भी कम हो गया. जहां बीजेपी को 42.34 फीसदी वोट मिले, वहीं कांग्रेस को 41.57 फीसदी. इस तरह से वोटों का अंतर सिमटकर 0.7 फीसदी तक आकर रह गया है.
अंतु-परंतु के बीच कुछ राजनीतिक परिस्थितियां भाजपा के भी अनुकूल है. इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की मौजूदगी. यह कांग्रेस की ही बी पार्टी है जिसे मुख्यमंत्री रमन सिंह तीसरी शक्ति मानते हैं तथा चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बताते हैं। यह स्थिति उनके लिए मुफीद है. चुनाव में इस पार्टी की उपस्थिति से भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन होगा जिससे पार्टी की राह आसान हो जाएगी।

बिलकुल वैसे ही जैसे वर्ष 2003 में हुआ था एक प्रकार से 2003 फिर अपने आप को दुहराएगा. उस चुनावी वर्ष में जो नए राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ का पहला विधानसभा चुनाव था, विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस के प्रतिबद्ध वोटों का ऐसा विभाजन किया कि भाजपा सत्ता में आ गई. एनसीपी प्रदेश में कांग्रेस की बी पार्टी थी जो भाजपा की जीत का कारण बनी. इस समय भी वही परिस्तिथियाँ है इस बार बी पार्टी का नेतृत्व अजीत जोगी कर रहे हैं. हो सकता है इसका लाभ फिर बीजेपी को मिले ऐसे में बीजेपी चाहेगी अगला चुनाव त्रिकोणीय हो ताकि उसकी संभावनाएं जीवंत रहे


नया रायपुर में कर्मचारियों के लिए प्रतिमाह रुपए 1817 में सिटी बसें अनुबंधित

नया रायपुर में कर्मचारियों के लिए प्रतिमाह रुपए 1817 में सिटी बसें अनुबंधित

15-Feb-2018

नया रायपुर में कर्मचारियों के लिए प्रतिमाह रुपए 1817 में सिटी बसें अनुबंधित । इस कार्य के लिए नया रायपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी और नगर निगम सिटी  बस लिमिटेड के मध्य अनुबंध संपन्न। उपरोक्त दरें राज्य शासन द्वारा अनुमोदित है जिसके लिए NRDA और नगर निगम के मध्य  एमओयू किया गया. यह अनुबंध 2 वर्ष के लिए किया गया है। वर्तमान में लगभग 5000 कर्मचारियों के लिए यह बसें चलेंगी। 75 बस इस अनुबंध के तहत चल रहे हैं ।बीआरटीएस की बसे इसके अतिरिक्त हैं। बीआरटीएस की बसों से लगभग 450 कर्मचारी आना जाना करते हैं। आम आदमी यदि रेलवे स्टेशन से नया रायपुर के जंगल सफारी तक सफ़र करता है तो उसे ₹35 किराया लगता है किराए की दर प्रति 5 किलोमीटर परिवर्तित होती हैं। तत्पर बीआरटीएस बसों में लगभग 3000 यात्री प्रतिदिन आवागमन कर रहे हैं


रमन सिंह के विरुद्ध जंग को तैयार जोगी

रमन सिंह के विरुद्ध जंग को तैयार जोगी

14-Feb-2018

लेख : एम.एच. जकरीया 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री और भाजपा का चेहरा डॉ रमन सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ने का फैसला किया है। जो की चौकाने वाला है, आज तक कांग्रेस के नेता अजित जोगी को डॉ रमन सिंह का साथ देने वाला सहयोगी बता कर आरोप लगाते रहे हैं,  अगर हकीकत में ऐसा होने वाला है तो राजनाँदगाँव का चुनाव पुरे भारत देश में कौतुहल का केन्द्र होगा !

वैसे भी कांग्रेस हमेशा से जोगी जी पर भाजपा को सहयोग देने का आरोप लगाते रहे हैं शायद उनका ये निर्णय अपने आप को राजनैतिक रूप से परखने का हो सकता है वैसे कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने इसे मिली जुली गीदड़ भबकी बता कर कटाक्ष किया है  | वैसे इस निर्णय पर जनता की मुहर लगाने और चुनावी शंखानंद करने, जोगी जी 11 फरवरी को रायपुर से राजनांदगांव जाने वाले है, ऐसा उनके द्वारा कहा जा रहा है की राजनांदगांव की जनता के बीच इस निर्णय की अधिकृत घोषणा करेंगे।

अजित जोगी ने फेसबुक लाइव में जनता को सम्बोधित करते हुए अपने बयान में उन्होंने कहा है की डॉ. रमन सिंह से छत्तीसगढ़ के दुखी किसानों का बदला, हताश, बेरोजगार युवाओं का बदला, पीड़ित महिलाओं का बदला और परेशान व्यापारियों का बदला लेने और इन वर्गों का भाग्य बदलने, अजीत जोगी ने, मुख्यमंत्री रमन सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार-मुक्त अत्याचार-मुक्त, बेरोजगारी-मुक्त और शराब-मुक्त बनाने के लिए, रमन-मुक्त करना आवश्यक है इसलिए अजीत जोगी  मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे और उन्हें पराजित कर छत्तीसगढ़ के नवनिर्माण की नींव रखेंगे ।

 वैसे चुनाव में हार जीत का फैसला तो जनता करती है लेकिन अचानक से इस तरह का ऐलान कई तरह से चौकाने वाला है | वैसे राजनैतिक हलको में ये भी चर्चा का विषय है की जोगी दबाव बनाने के लिए इस तरह की चौकाने वाली घोषणा करते रहते है, अब ये तो आने वाला समय ही बतायेगा की वहां किस तरह की राजनैतिक स्थिति बनती है, वैसे किसी भी तरह से डॉ. रमन सिंह को कमजोर समझना भी उनकी नादानी होगी क्योकि शुरुवात से ही राजनांदगांव उनका कर्म क्षेत्र रहा है छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने अपने विकास कार्यो के चलते राजनांदगांव का काया पलट कर दिया है अब वो 15 साल पहले वाला राजनांदगांव नहीं रहा और ना ही पहले वाली सोच वाली जनता, की इतनी आसानी से मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह को टक्कर दे सके और उन्हें हरा सके ये निश्चित तौर पर जोगी के लिए आत्मघाती कदम माना जायेगा, क्योकि उनकी नव निर्मित राजनैतिक पार्टी जोगी कांग्रेस छत्तीसगढ़ में पहली बार चुनावी मैदान में उतरने वाली है ऐसे में जोगी जी एक ही विधानसभा चुनाव क्षेत्र में घिरना नहीं चाहेंगे, वो अपनी पूरी ताक़त से छत्तीसगढ़ में अपनी राजनैतिक स्थिति को मज़बूत करने एड़ी–चोटी का जोर लगा देंगे, ऐसे में राजनांदगांव विधान सभा से मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के विरुद्ध उनका चुनाव लड़ना उनकी अपनी ही पार्टी के लिए घातक साबित हो सकता है !

अभी विधानसभा चुनाव में समय है अभी कई तरह के फैसले और समीकरण बदलेंगे क्योंकि  राजनीति में कुछ भी स्थिर नहीं होता, राजनेता अपने राजनैतिक फायदे के लिये इस तरह की घोषणाएं करते रहते है, वैसे जिस तरह से वर्तमान में राजनैतिक माहौल दिखाई दे रहा है कुछ भी कहना मुनासिब नहीं होगा !

छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस से अलग हुए अजित जोगी राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते रहे है पिछले 15 वर्षो से छत्तीसगढ़ की राजनीति में जितनी कठिनाई और विरोध तरह-तरह के आरोपों को झेलने के बाद भी उन्होंने सभी प्रतिकूल परिस्थियों  का डटकर मुकाबला किया है इसमें कोई दो राय नहीं है | आने वाले  वर्ष 2018 का विधानसभा चुनाव अजित जोगी का राजनैतिक भविष्य तय करेगा क्योकि ये उनके लिए अब आर-पार की लड़ाई है |

सोशल इंजिनियरिंग में माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले अजित जोगी को हल्का समझना कांग्रेस– भा जपा को फिर से भारी पड़ने वाला है, क्योकि पदयात्रा और रैली की भीड़ देख कर अति उत्साहित हो रहे कांग्रेस के बड़े नेता ये बेहतर समझते है की विधानसभा चुनाव आने पर टिकट बाँटने के बाद कई टिकट के दावेदार इधर से उधर होने वाले है क्योंकि उस समय संगठन की वफादारी नहीं वो अपना अस्तित्व बचाने में सारी निष्ठा भूल जायेंगे | वैसे भी कांग्रेस ने अपनी पुराने नेतृत्व पर भरोसा किया है, कई जिलाध्यक्ष और पदाधिकारियों के बदले जाने की सम्भावना है ऐसे में अभी बहुत कुछ अभी होना बाकि है, क्योकि राजनीती में कुछ भी नहीं कहा जा सकता |

वैसे देखा जाये तो कांग्रेसियों की नजर में यह बदलाव संभावनाओं से भरा नज़र आ रहा है और इसके कई सकारात्मक पक्ष भी हैं। वर्तमान में मैडम जोगी के कांग्रेस से जाने के बाद और जो बची खुची संभावनाएँ थी वो भी अब खतम हो गई है | पिछले 16 साल से चल रही कांग्रेस में नेतृत्व की लड़ाई का एक अध्याय तो निश्चित ही अब समाप्त हो गया है। वहीं अब दूसरी ओर जोगी के सामने खुद को  स्वतंत्र रूप से प्रदेश की राजनीति में अपनी ताक़त दिखाने का पूरा मौका मिला है ? अब देखना है की अजित जोगी अपनी पार्टी को स्थापित करने से लेकर एक-एक समर्थक जुटाने और उन्हें अपने मतदाता के रूप में तैयार करने और राजनैतिक चुनौती को सार्थक करने में कितना कामियाब हो पाते है ये तो आने वाला समय ही तय करेगा लेकिन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के लिए 2 की लड़ाई में फायेदा ज़रूर होने वाला है गुजरात की तरह छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है जिस पर जनता भरोसा कर सके ।

लेकिन भाजपा के लिए जोगी जी की नई पार्टी से  सतनामी समाज के प्रभाव वाले सीटों को बचाने की चिंता है। वहीं, कुछ आदिवासी सीटों पर भी जोगी के प्रभाव से कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में कही ऐसा ना हो की जोगी जी की राजनीती का उदय हो और वो किंग मेकर की भूमिका में आ जाये और कांग्रेस और भाजपा को उनसे ही आस लगानी पड़ जाये क्योकि जनता का मूड कब किस करवट पलट जाये ये तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन कांग्रेस और भाजपा की अब पहले जैसी स्थिति नहीं रह गई है और ना ही वो परम्परा गत वोट बैंक बचे है जो आँखे मूंदकर इन्हें वोट दे दिया करते थे ! इसका बहतर उदाहरण उत्तरप्रदेश -बिहार -गुजरात -मध्यप्रदेश – से समझ सकते है जहाँ इनकी गुटबाजी और  हठधर्मिता के कारण इनसे सत्ता इनके हाथ से चली गई ? राजनीतिक के प्रेक्षक अभी से इस आंकलन में जुट गए हैं कि जोगी छत्तीसगढ़ के चुनाव में कितने प्रभावी हो सकते हैं या रहेंगे । आंकलन की परीक्षा के लिए 2018 तक तो इंतजार करना ही होगा ?


पत्रकारिता बन गई अब केवल कॉर्पोरेट मीडिया !

पत्रकारिता बन गई अब केवल कॉर्पोरेट मीडिया !

08-Feb-2018

लेख : एम.एच. जकरीया 

वर्तमान समय में पत्रकारिता ने कॉर्पोरेट मीडिया का रूप ले लिया है और क्यों न हो ज़रूरते तो सभी की है,  चाहे पत्रकार हो या सम्पादक या मीडिया का मालिक सभी की अपनी तरह से अपनी ज़रूरते है जिसे पूरी करने के लिए वह काम करता है कोई कह दे की मै भूखे पेट रहकर काम कर लू तो ये बाते हजम नहीं होती,  हां ये ज़रूर है की पत्रकारिता में जो इमानदारी होनी चाहिये वह अब समाप्त  होती चली जा रही है । एक दौर था जब भारत के मीडिया हाउसो को संपादक चलाया करते थे जो आज कही न कही कॉर्पोरेट हाउस के मालिकों के हाथो में चला गया है जो अब मीडिया को अपने मन मुताबिक इस्तेमाल कर रहे हैं। और यही वजह है कि संपादक और पत्रकारों में एक किसम का डर सा समा गया है। जिसके चलते वो समाज से सरोकार रखने वाली ख़बरों को छोड़ कर अपने मालिक की कही गई बेमतलब की अफवाहों को ख़बरों में तब्दील कर रहे 

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 मीडिया हाउस के कॉर्पोरेट हाउस में बदलते ही उनमें राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप भी बढ़ने लगते हैं जिसका उदहारण आपको आपके टीवी में रोज दखने को मिल ही जाता है। कुछ मीडिया चैनलों ने तो मानो किसी न किसी राजनीतिक पार्टी और उसकी विचारधारा के प्रचार का पूरा ठेका ही उठा रखा है। देखा जा रहा है की पत्रकारिता ने आज के इस आधुनिक परिवेश में तुच्छ पत्रकारिता का रूप ले लिया है, वर्तमान न्यूज़ चैनलो में अब देश हित के मुद्दे और घटनाओ के स्थान पर बे मतलब की प्रायोजित बहसों ने ले लिया है जिससे समाज में एक नई मानसिकता को जन्म देने का काम कर रही है और यही मानसिकता लोगों को धर्म के आधार पर एक दुसरे से बाँटने का काम कर रही है, और यह मानसिकता अब क्रूरता का भयानक रूप लेते जा रही है,  हाल की दिल दहला देने वाली घटनाओ को देखे तो इंसानियत पर से भरोसा ही उठता चला जा रहा है और यह सवाल जहन में आता है की क्या यही लोकतंत्र है ?

वर्तमान में पत्रकारिता को पूंजीवाद ने ज़कड़ रखा है जिसका ताज़ातरीन उदाहरण है गुजरात का चुनाव जहां कॉर्पोरेट प्रायोजित मीडिया ने जिस तरह से भ्रम फ़ैलाने का काम किया उसे सभी ने महसूस किया है ? क्या यही पत्रकारिता है ? क्या पत्रकारिता का स्तर इतना नीचे गिरता जा रहा है, इन प्रयोजित मीडिया ने समाज में अपनी जड़ता बिखेरे दी है,  पैसे लेकर किसी एक पक्ष/राजनितिक पार्टी विशेष के हित में खबरों का प्रचार एवं प्रसार किया जा रहा है,  

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मीडिया चैनल भी दलगत विशेष हो चुके है, जिसका जीता जागता उदाहरण हमने हालिया चुनावो में देखा है जहाँ जनता और सच्चाई की आवाज़ को दबा दिया गया और कुछ राजनितिक दल इन चैनलो के मालिकों को पैसे, पद, प्रतिष्ठा का  लालच देकर अपना एवं अपनी राजनितिक दलों का काम आसानी से करवा रहीं है. और मन चाहा झूठ जनता के सामने खबरों के रूप में परोसने का काम कर रहे है ? अब पत्रकारों की विश्वसनीयता और पत्रकारिता के मूल्यों पर सवाल खड़े होने लगा है. अब लोग पत्रकारों को बड़े ही हेय दृष्टि से देखने लगे है | आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद अहम करार देने से हम नहीं हिचकिचाते. और कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के साथ हम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हवाला देकर  हम वे पत्रकार हैं जो उनसे सवाल पूछते हैं जो हम पर और देश पर राज करते हैं, उन्हें हर मौके पर चुनौती देते हैं. हम दिन भर के अहम मुद्दों पर सार्वजिनक बहस करते हैं, जब वही निर्णय करने वाले गलती करते हैं तो हम उनकी आलोचना करते नहीं थकते हैं और उन लोगों पर फैसला सुनाते हैं

लेकिन अब अपने आप को "निष्पक्ष" घोषित करने वाली मीडिया जगत से जुड़े हुए मठाधीशों को अब आंच महसूस होने लगी है, लगता है, जिनकी भाषा में अब बदलाव आने लगा है । कभी "असहिष्णुता" पर तीख़ी बहस और मन्दिर मस्जिद और 3 तलाक के नाम पर डिबेट करने वाले न्यूज़ चैनलो को भी अपनी खोती लोकप्रियता का अहसास होने लगा है ? आप हर रोज़ जनता को नाराज़ करने लायक हरकतें करते रहेंगे तो जनता आपको कब तक बर्दास्त करेगी । एक ना एक दिन तो जनता के सब्र का बाँध टूटने ही वाला है ! कब तक आप के अनर्गल प्रलाप को जनता देखेगी  ।   लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला भारतीय पत्रकारिता बस राजनेताओ की एक ताकत बन कर रह गया है। वर्तमान समाचार जगत- मीडिया, के हाव-भाव देखकर लगता नहीं कि अब इन्हें देश की कोई चिंता है। चिंता बची है तो केवल टीआरपी की।


कांग्रेस के ‘रण छोड़’ प्रत्याशियों को राहुल गाँधी की खरी-खरी

कांग्रेस के ‘रण छोड़’ प्रत्याशियों को राहुल गाँधी की खरी-खरी

03-Feb-2018

एम.एच. जकरीया  की कलम से 

कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी बुरी परम्परा चली आ रही है, कुछ धनाड्य और कथित ऊँची पहुँच वाले जुगाडू सेटिंग बाज़ नेता अपनी सुविधाओ के हिसाब से चुनाव लड़ने के लिए अपनी सीट बदलते रहते है ! वर्ष 2018  में छत्तीसगढ़ राज्य में आगामी विधान सभा के चुनाव होने जा रहे है ऐसे में कांग्रेस पार्टी में उम्मीदवारों में चुनाव में अपनी टिकट को लेकर उथल - पुथल मची हुई है | कुछ ही कांग्रेस के नेताओ को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर दिग्गज नेताओं की हालत इस चुनाव में पतली नज़र आ रही है ! और उनके जीत पाने की सम्भावना भी लगभग गौण है, ऐसे में कुछ कांग्रेस के हारे हुए पूर्व विधायक किसी और विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की जुगाड़ में लगे हुए है ! लेकिन कांग्रेस आला कमान के सूत्रों से सुनाई में आ रहा है की AICC के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गाँधी का स्पष्ट आदेश है की जो जहाँ से चुनाव लड़ा है उसे दूसरे विधानसभा से टिकट नहीं दिया जायेगा, तब से दूसरे के विधानसभा क्षेत्र में नज़र गड़ाए नेताओ के पसीने छूटने लगे है |

छत्तीसगढ़ में भी जैसे जैसे विधानसभा चुनाव 2018 निकट आते जा रहे हैं वैसे-वैसे राजनीतिक दलों की चुनावी तैयारियां तेज होते जा रही हैं. हालाँकि चुनाव वर्ष के अंतिम अक्टूबर-नवम्बर माह में होने को है लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ने चौतरफा मोर्चा बंदी करना शुरू कर दिया  है । इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के प्रभारी कांग्रेस पार्टी के महासचिव पी.एल. पुनिया ने अपनी रणनीति पर राहुल गाँधी से मुहर लगवाकर चुनावी जंग के लिए कमर कसने की घोषणा कर दी है । 

लेकिन कांग्रेस का मुख्यमंत्री का चेहरा स्पष्ट नहीं हो रहा है। क्यों की कांग्रेस में टिकट बॅटवारे के बाद ही स्थिति साफ होगी की कांग्रेस कितनी मज़बूती के साथ चुनावी समर में कामियाबी का डंका बजाने वाली है, क्योकि चुनाव लड़ने की  मह्त्वकांक्षा पाले हुए कई नेताओ की कांग्रेस के प्रति वफादारी तब स्पष्ट हो जाएगी और इनमे से कई जोगी कांग्रेस और भाजपा में पलटी मार सकते है क्योकि आज भी कांग्रेस के बड़े पदों पर वही फूल छाप कांग्रेसी है जिन्हे संगठन की वफादारी से कोई लेना देना नहीं है उन्हें केवल सत्ता सुख चाहिए वैसे इस टाइप के एक दो नेताओ ने तो अभी से अपने हारे हुए क्षेत्र को छोड़ कर दूसरे विधानसभा क्षेत्र में दौरा करना शुरू भी कर दिया है ऐसे में उन विधानसभा क्षेत्र के ज़मींन से जुड़े कार्यकर्ताओ का मनोबल टूटना स्वाभाविक है और पार्टी से पलायन और बगावत होने की पूरी सम्भावना है और कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण यह भी है कि, कांग्रेस में फूल छाप कांग्रेसी ही सत्ता सुख का आनंद लेते है बाकि निष्ठावान कार्यकर्ता मनमसोस कर रह जाते है, क्योकि कथित पूंजीपति रण-छोड़ दास फूल छाप कांग्रेसी अपने पैसो से टिकट खरीदते है और उस क्षेत्र के कार्यकर्ताओ को चंद पैसो में खरीदकर अपना गुलाम समझने लगते है ,जिससे वफादार कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता घर बैठना पसंद करते है और यही कांग्रेस पार्टी के पतन का कारण बनता जा रहा है |

छत्तीसगढ़ राज्य में पिछले करीब 15 वर्षो से कांग्रेस सत्ता से बाहर है, और बहुत हद तक कांग्रेस का सत्ता से बाहर रहने की वजह है की कांग्रेस अपनी परम्परागत वोट खोती चली जा रही है, एक समय इन्ही पूंजीपतियों और सामंतवादी नेताओ को दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यक और आदिवासी वोट आँख मूंदकर मिल जाते थे लेकिन अब ये समाज जागृत हो चूका है और अपने अधिकार अच्छे से समझता है और यही कांग्रेस की हार की वज़ह है अब वो समय लद गए की चंद पैसो से वोट खरीद लिये जाये ? 

आज का जागरूक मतदाता अब समझदार हो गया है वो अब किसी भावना में बहने वाला नहीं है ,इसलिए पूरी समझदारी से प्रत्याशियों का चयन ही जीता सकता है कांग्रेस को आने वाले चुनाव में, नहीं तो चंद पैसो के लिए जैसे पद बेचा जा रहा है वैसे विधानसभा चुनाव के टिकटो की बोली लगी तो सत्ता में वापसी की उम्मीद छोड़ दो 


छत्तीसगढ़ काँग्रेस की कार्यकारणी में फिर से जान फूंकने की कवायद

छत्तीसगढ़ काँग्रेस की कार्यकारणी में फिर से जान फूंकने की कवायद

12-Jan-2018

खुलासा पोस्ट मैगजीन का लेख 

जिस तरह से अखिल भारतीय कांग्रेस के हवाले से छत्तीसगढ़ के प्रभारी महासचिव श्री पी. एल. पूनिया के द्वारा छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की नए टीम की घोषणा की गई जो निश्चित ही स्वागत योग्य है, लेकिन समझने वाले को इतना ही इशारा काफी है की श्री राहुल गाँधी अभी-अभी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने है और उन्होंने अभी AICC  के अपनी पूरी टीम की घोषणा अभी नहीं की है,  तो फिर छत्तीसगढ़ काँग्रेस की कार्यकारणी केवल जान फूंकने की कवायद ही मानी जाएगी ।

अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्वेदी के 6 जनवरी के पत्र के हवाले से राहुल गाँधी जी के आदेश के अनुसार अभी वे सभी प्रदेशो के अध्यक्ष बने रहेंगे, उनके सक्रियता और कार्यो के हिसाब से ही उनकी आगे की जिम्मेदारी तय किया जाना है ऐसे में अभी चुनाव को 1 वर्ष है और कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय क्या होंगे ये समय बताएगा | वैसे प्रभारी महासचिव जी के द्वारा किया गया ये ऐलान बड़े दम खम के साथ किया गया है जो काँग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए उत्साहित करने वाला है |

लेकिन अब भी एक सवाल छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के लिये खड़ा हुआ है,  क्या कार्यकर्ताओ को पुरे  सम्मान के साथ जिम्मेदारी दी जा रही है ?  यहाँ PCC  में तो चन्द गिनती के चेहरे ही काँग्रेस भवन में मँडराते दिखाई देते हैं, और जो वास्तविक में असरदार लोग है जो की ज़मीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता है उनकी पूछ परख अभी भी संगठन में नहीं हो रही है |  कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इनके इस निर्णय से नाराज़ दिख रहे है जिन्हें मनाने की अब भी ज़रुरत है, जो इनके कार्यक्रमों से भी दूरी बनाते जा रहे है, जो की संगठन के लिए नुकसान दायक है ?

 श्री पुनिया जी को शायद वास्तविकता का सही-सही पता नही है लगता है, और उन्होंने चुनावी 20 -20  मैच के लिये टीम की घोषणा भी कर दी है जो की हैरान करने वाला है, जो कप्तानी करना चाहते थे उन्हें कोच बना कर रिटायर कर दिया और मैच से बाहर का रास्ता दिखा दिया और 2  बड़े बड़े आल राउंडर टीम में है जो मैच जिताने का पूरा दम रखते थे उन्हें मैच से पहले ही टीम के लिये अयोग्य ठहरा दिया गया है,  और डमी उपकप्तानो पर भरोसा कर रहे है, और जो जीत के परिणाम को पलटने की हिम्मत रखते है उन्हें मैच से बाहर रख कर मैच जितना चाहते है

जो की आत्मघाती कदम हो सकता है क्योकि वर्तमान कप्तान के नेतृत्व को कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग बिलकुल भी नहीं पसन्द करता है खैर अभी शुरुवाती दौर है और चुनावी मैच शुरू होने में अभी समय है अभी तो बहुत से रंग बदलेंगे, अभी कार्यकारणी में खींच-तान टिकटों का बंटवारा और भी तोड़ जोड़ और भी बहुत कुछ अभी होना बाकी है | प्रभारी महासचिव 2019 में हमारी यही सलाह आपको काम आएगी !

 
 

धर्मो को लेकर बंटती दुनिया !

धर्मो को लेकर बंटती दुनिया !

09-Jan-2018

लेख : एम.एच. जकरीया 

आज ये समस्या केवल भारत की ही नही बल्के पूरे विश्व की बनती जा रही हैं - अब जहाँ देखो वहां सिर्फ धर्म के नाम पर ही इंसान इंसान को मारे जा रहा है ,चाहे फ्रांस हो या जर्मनी या अमेरिका का रंग भेद या इस्लाम के नाम पर मार काट हो, चाहे पाकिस्तान में शिया समुदाय का सुन्नी मुसलमानों के साथ लड़ाई हो या अफगानिस्तान में धार्मिक कट्टरता के नाम पर तालिबानों का जुल्म हो। 

इतिहास बताता है की कैसे सत्ता पाने के शासक वर्ग अधिक से अधिक सत्ता अपने हाथों में केंद्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया करते थे. इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि राजाओं ने अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराना शुरू कर दिया था  अगर कोई ईसाई राजा अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था तो उसके लिए किए जाने वाले युद्ध को वह ‘क्रूसेड’  बताता था. इसी तरह, मुस्लिम राजा कभी युद्ध नहीं करते थे, वे हमेशा जिहाद करते थे. हिंदू राजाओं की हर लड़ाई धर्मयुद्ध हुआ करती थी. और धीरे धीरे यही धर्मयुध्द ने साम्प्रदायिकता का ज़ामा पहन लिया

समय के साथ-साथ पूरी दुनिया में सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया है. भारत में वह हिंदू धर्म का चोला ओढ़े है तो बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस्लाम का. श्रीलंका और म्यांमार में वह बौद्ध धर्म के वेश में है. इज़राइल और फलस्तीन में यहूदी और मुस्लमान का इंग्लैंड और अमेरिका में काले और गोरो पर  इस हिंसा इनसभी का मात्र एक  लक्ष्य और एजेंडा है किसी तरीके से भी सत्ता को पाना धर्म के बारे में सामान्य रूप से कहा जाता है कि यह जीवन जीने का रास्ता बताता है। सभी धर्मों में इसी बात को लेकर अलग-अलग व्याख्या है।

मैं विभिन्न धर्मों व पंथों के बारे में व उनके मतों के बारे में गहराई में नहीं कहना चाहता। पर मेरा मानना है कि धर्म के नाम पर राजनीती और गुमराह करना अब खतरनाक रूप लेता जा रहा है , अभी-अभी की कुछ घटनाओं को समझें तो आप खुद ही बेहतर समझ जायेंगे कुछ चालक किस्म के लोग हम सब को धर्म के नाम पर गुमराह करने में लगे है | 

धर्म केवल नियम कानूनों में बँधना नहीं बल्कि धर्म इंसान को एक-दूसरे इंसान के साथ इंसानियत का भाव बनाए रखने में मदद करता है। आज के परिप्रेक्ष्य में यही जरूरी है। हम न केवल धर्म को बल्कि साधारण सी समस्याओं का भी राजनीतिकरण करने से नहीं चूकते। लगभग सभी धर्म, अपने-अपने संदर्भों में, मानवतावाद की बात करते हैं परंतु न जाने क्यों, धर्मों के दार्शनिक पक्ष की बजाए उनके रीतिरिवाज, सामुदायिक कार्यक्रम और पुरोहित–मौलवी उनकी पहचान बन गए है और अब तो फ़रमान – और फतवों ने धर्म का आड़ लेकर इन्सान को इन्सान से जुदा करने में लगा है !

धर्म के नाम पर हिंसा के संदर्भ में इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है. जहां खोमैनी के बाद इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताया गया, वहीं 9/11 के बाद खुलकर, इस्लामिक आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल होने लगा. समय के साथ अलकायदा उभरा जो मध्य व पश्चिम एशिया में आतंकवादी हिंसा की अधिकतर वारदातों के पीछे था. 
बोको हराम, आईसिस और अलकायदा की तिकड़ी, इस्लामिक पहचान को केंद्र में रखकर वीभत्स हिंसा कर रही है.

यह प्रक्रिया शुरू हुई थी अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों को काफिर बताकर उन पर हमला करने के आह्वान से. अब हालत यह है कि मुसलमानों का एक पंथ ही दूसरे पंथ के सदस्यों को काफिर बता रहा है और अत्यंत क्रूर व दिल दहलाने वाले तरीकों से लोगों की जान ली जा रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तिकड़ी द्वारा जिन लोगों की जान ली गई है, उनमें से सबसे ज्यादा मुसलमान ही मारे गए अन्य कोई और नहीं !


कब तक बंटते रहेंगे हम जाति और धर्म के नाम पर ?

कब तक बंटते रहेंगे हम जाति और धर्म के नाम पर ?

05-Jan-2018

By : khulasapost magazine story

Writer : Akash Bhatt

अभी हाल ही में महाराष्ट्र के कोरे गांव में दलितों पर हमले हुए आखिर इन सभी घटनाओं के पीछे एक ही कारण हैं राजनीति , हर शक्तिशाली वर्ग कमज़ोरों पर हावी होना चाहता हैं | और यह सदियों से होता आ रहा है ,पर इसका वर्तमान स्वरूप काफी व्यथित करने वाला और भयावाह है। भीमा-कोरे गांव लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर हुई हिंसा से पूरे महाराष्ट्र में तनाव का माहौल बना हुआ है अखबारों के पन्नो और न्यूज चैनलों में इस हिंसा की खबर देखने के बाद दिमाग में कई सवाल उपजते हैं की आखिर यह भीमा-कोरे गांव लड़ाई की सालगिरह क्या है, क्यों दलित इस लड़ाई की सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं ? इन सवालों के जवाब के लिए हमें इतिहास के पन्नो पर झाँकना होगा की आखिर भीमा-कोरे गांव लड़ाई क्या है. 

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई आज से 200 साल 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी. यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी. अंग्रेजों की तरफ से महार समुदाय के 500 लड़ाकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 सैनिकों को हराया था. यह बात आपको सोचने के लिए जरुर मजबूर करेगा की आखिर महारों ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ाई क्यों लड़ी तो इस संबंध में दलित मामलों के जानकार डॉ. शैलेंद्र लेंडे के मुताबिक, 

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“जब शिवाजी ने मराठा राज्य स्थापित किया तब उनकी सेना में दलित भी हुआ करते थे. बाद में जब पेशवा शासकों के हाथ सत्ता आई तो दलितों का शोषण होने लगा. उस वक्त दलित चाहते थे कि वो पेशवा की सेना में शामिल हों, लेकिन जाति प्रथा और सामाजिक धारणाओं के कारण उन्हें सेना में शामिल नहीं किया गया. बता दें कि पेशवा ब्राह्मण समाज से आते थे. छूआछूत जैसी प्रथा के कारण दलित और ब्राह्मणों में हमेशा मतभेद रहा” 

इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए. वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

उस समय अंग्रेज भारत में दमनकारी नीति के तहत सभी सियासतों पर कब्ज़ा चाहते थे. उस दौर में पुणे में पेशवा शक्तिशाली माने जाते थे. अंग्रेजों ने उनपर कई बार हमले किये, इसके बावजूद वे कामयाब नहीं हो पा रहे थे. बाद में जब महार समुदाय की बगावत सामने आई तो अंग्रेजों ने उन्हें अपने साथ मिलाया और कोरेगांव युद्ध में जीत हासिल की. ऐसा कहा जाता है कि इस हार के बाद पेशवाओं का बाकी इलाकों में राज कमजोर हो गया.

उस लड़ाई में मारे गए महार सैनिकों को उनकी वीरता और साहस के लिए सम्मानित किया गया और उनके सम्मान में भीमा कोरेगांव में स्मारक भी बनवाया, जिन पर महारों के नाम लिखे गए. इसके बाद से पिछले कई दशकों से भीमा कोरेगांव की इस लड़ाई का महाराष्ट्र के दलित जश्न मनाते आ रहे हैं. हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं. 

यही वो जयस्तंभ है, जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी. कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं

जनरल थॉमस हिस्लोप ने इस युद्ध को "सेना के इतिहास में दर्ज किए गए सबसे वीर और शानदार उपलब्धियों में से एक" कहा। एमएस नारावने के अनुसार, "एक विशाल संख्या में मराठा सेना के खिलाफ कंपनी के सैनिकों की एक छोटी संख्या द्वारा दिखाई गई वीरता सही रूप में कंपनी की सेनाओं के इतिहास में वीरता और धैर्य का सबसे गौरवशाली उदाहरण माना जाता है।"

माना जाता है कि युद्ध में किसी भी पक्ष ने निर्णायक जीत हासिल नहीं की थी लेकिन पेशवा की बड़ी सेना को महारों की बहुलता वाली कंपनी की एक छोटी टुकड़ी से कड़ी टक्कर मिली, यह बात महत्व रखती है। हालांकि आज इस युद्ध को ऊंची जाति पेशवाओं पर निचली जाति की जीत के रूप में चित्रित किया जाता है । अभी ताजा संघर्ष की शुरुआत 1 जनवरी को हुई जब भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं बरसी पर दलित समुदाय ने हर साल की तरह जुलूस निकाला. जिस पर कुछ कथित हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पथराव करने का आरोप है. इससे हिंसा और भड़क गई और एक व्यक्ति की मौत हो गई. यह हिंसा एक क्षेत्र से निकल के लगभग पूरे महाराष्ट्र में फैल गई  

 

नारी उत्पीड़न क्यों ? क्योंकि महिला ही महिला की दुश्मन है !

नारी उत्पीड़न क्यों ? क्योंकि महिला ही महिला की दुश्मन है !

28-Dec-2017

लेख : एम.एच. जकरीया 

हमारी देश की संस्कृति में  औरत का मकाम सब से ऊंचा माना जाता है ,आज भी नारी को  परिवार व समाज की अस्मिता समझी जाती है । हमारे पूर्वजों और धार्मिक मान्यताओं में भी नारी जाती को देवी का स्थान प्राप्त है। लेकिन फिर भी आये दिन हमारे ही इस देश में महिलाओ के साथ उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाए बढ़ती जा रही है , हाल ही में एक  पत्रिका के संस्थापक और मुख्य सम्पादक  पर, बेटी की उम्र की सहयोगी महिला पत्रकार ने उत्पीड़न का आरोप लगाया और दूसरी घटना निर्भया की थी जैसे ही ये घटनाए हुई  मीडिया ने  चारों तरफ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया, टी वी चेनलो में डिबेट और गहन मंथन का कार्यक्रम चल पड़ा ।

कोई भारतीय परम्परा को ही दोषी बता रहा है, तो कोई कानून व्यवस्था पर ऊँगली उठा रहा है; कोई पुरुषों की मानसिकता को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई नारी की कमजोरी को इसके लिए दोषी मान रहा है। नारी अस्मिता की रक्षा पर चिंतन करने के बजाय दोष किसका, इसपर मंथन चल रहा है। यह चिंताजनक बात है। ऐसे में भारतीय समाज में महिला विषयक दृष्टिकोण पर विचार करना होगा।अश्लीलता के कारण ही महिलाओ पर अपराधों में बढ़ोतरी हुई है | 

नारी उत्पीड़न के लिए इमेज परिणाम

हमारे समृद्ध व प्रबुद्ध समाज ने स्वच्छंदता के नाम पर इन नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ीं है । विशेषकर समाज के पढ़े-लिखे लोग जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का ढोल पीटते हैं, उन्होंने  स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता नारी शक्ति को सरेआम तमाशा और मनोरंजन का साधना बना दिया। मॉडलिंग, एक्टिंग और डांसिंग के नाम पर नारी अस्मिता को सरेआम बेचा जाने लगा है। फैशन और प्रदर्शन  के नाम पर लोकलु भावन बनने की होड़ लग सी गई है और मशहूर होने के भ्रामक चाह ने नारी की तरफ देखने की पुरुषों की दृष्टि को कामुक बना दिया है ।

हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में नारी-अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते क्या अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखने वाले समाज का निर्माण होगा?
 
विश्व के सभी देशों में किसी न किसी रूप में नारी उत्पीडि़त है, चाहे व विकसित देश हों या विकासशील. पुरुषों की तरह अधिकार व स्वतंत्रता पाने के लिए महिलाएं संगठन बना कर आवाज भी उठाती हैं लेकिन  वह भी सिर्फ हो हल्ला मचा कर ख़ामोशी  . आज के समय में हमारा  समाज स्त्री के अधिकारों को मान्यता देने का ढोल ज़रूर पीटता  है लेकिन पुरुष प्रधान समाज आज भी महिलाओ को  आगे बढ़ने के समय वह रोड़े भी अटकाता है क्योंकि पुरुष खुद अपने वर्चस्व में कमी नहीं आने देना चाहता. हर साल 8 मार्च को पूरा विश्व महिला दिवस के रूप में मनाता ज़रूर है.

लेकिन फ़िर वही खड़े नज़र आते है यहाँ बड़ी बड़ी बातें ज़रूर की जाती हैं.लेकिन धरातल पर परिणाम कुछ भी नहीं निकलता ? मानवाधिकार आयोग व संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी अपनी रिपोर्ट पेश करते हैं. गलतियों को सुधारने के लिए पहले किए गए प्रण को फिर से दोहराया जाता है, पर होता कुछ नहीं. उदाहरण के लिए आज भी भारत में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल संसद में वर्षों से लटक रहा है.

नारी  ही  परिवार की रीढ़ होती है परन्तु फिर भी नारी का उत्पीड़न व शोषण होता हुआ आ रहा है, लेकिन क्यो? देश मे अनगिनत संस्थाऐ है जो महिला उत्थान के लिये प्रयासरत है और सरकार भी अनेकानेक प्रयास कर रही है परन्तु फिर भी अच्छा परिणाम नही मिलता। महिला उत्थान को समर्पित संस्थाएं महिलाओ को उनके अधिकार व शोषण के प्रति जागरूक कर रही है परन्तु अधिकतर गॉव-देहात मे नारियो की मानसिकता अभी भी वैसी ही है अर्थात पुरानी मानसिकता वाली महिलाऐ जिनकी वजह से आने वाली भावी नारियो के उत्पीड़न को बढ़ावा मिल रहा है क्योकि क्योकि वे चाहती है उनकी परम्परा चलती रहे या यह कह सकते है कि महिलाऐ ही महिलाओ के उत्पीड़न की जिममेदार है जिनके विचार पुरानी रिती रिवाजो वाले है जो अपनी बहू मे भी वो ही संस्कार देखना चाहती है

जो उन्होने झेले है, कुछ इन शब्दो मे कह सकते है जो उन पर जो बीती है वे वही सब कुछ अपनी बहु पर करना चाहती है। वो महिला चाहती है कि मेरी बहु बहु बनकर ही रहे। इसके साथ ही पुराने रिति रिवाजो वाले टी0वी0 सीरियल भी महिला उत्पीड़न को बढ़ावा दे रहे है जिसे अधिकतर महिला ही देखती हुई मिल जायेगी और उसके किरदार का असर घरेलू महिलाओ मे धीरे-धीरे घर करने लगा है उन्हे पता भी चलता कि कब वह उस किरदार के जैसी हो गई। शहरो मे भी पुरानी मानसिकता वाली महिलाऐ भी कम नही है आये दिन समाचार पत्रो, न्यूज चैनलो मे उत्पीड़न सम्बन्धी खबर पढ़ने को मिल जाती है।

महिलाओ की ये पुराने ख्यालो की सोच से सिर्फ देश के विकास को ही नही बल्कि स्वतन्त्र विचारो वाली महिला को भी कैद कर लिया है। ऐसी मानसिकता वाली महिलाऐ आज भी हर घर मे देखने को मिल जाएंगी। फिर भी आज का पुरूष महिला उत्थान को बढावा देने का प्रयास कर रहा है और उसको अपने बराबर का समझने की कोशिश कर रहा है परन्तु एक महिला जो रूढ़िवादी मानसिकता वाली है वह किसी ओर महिला आफिस जाते हुए या किसी महिला को बाहर काम करने को लेकर उसे बदनाम करने मे कोई कसर नही छोड़ती। छोटी छोटी बातो पर उसे बदचलन अवारा एवं अन्य गन्दी बातो से उसकी अवहेलना करना उनकी मानसिकता है। मेरे विचार से जो संस्थाऐ महिला उत्थान के लिये कार्य कर रही है उन्हे सर्वप्रथम महिलाओ की मानसिकता को बदलना होगा।

यह आम बात है कि जब कोई भी महिला अपने घर के काम से खाली हो जाती है तो वह सिर्फ मोहल्ले या गॉव मे इकटठी होकर कुछ भी ऐसा कार्य नही करती जो समाज या देश के लिये लाभदायक हो बल्कि इधर की उधर करना उनकी आदत मे शामिल होता है। देखियो रि उसकी शादी को अभी साल भर नही हुआ वो आफिस भी जाने लगी आदि। शादी के बाद लड़का न हो तो ससुरालियो की नजर मे अपशगुन मानी जाती है और सास नन्द की नजरो मे उसकी कोई इज्जत नही होती। इन सब बातो को लेकर पुरूष भी खुद को अपमानित महसूस करता है और महिला का उत्पीड़न करना शुरू कर देता है।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ पुरानी मानसिकता वाली सासो का ही है। यदि एक महिला चाहे तो यह सब कुछ बदल सकता है लेकिन क्यो उठाये ये कदम क्योकि उन्हे तो अपनी परम्परा निभानी है। ऐसी परम्परा का क्या फायदा जो ना समाज के उत्थान मे है और ना ही घर के उत्थान में ।

यदि कोई विधुर विवाह करता है तो समाज उसे सम्मानजनक दृष्टि से देखता है लेकिन कोई विधवा विवाह करती है तो उसे समाज टेढ़ी नजरो से देखता है। आस पडोस की महिलाऐ उस विधवा को कोसती है कि डायन होगी तभी तो पहले पति को खा गई? इसके पैर ही अपशगुन है जो पहला पति मर गया। कहने का तात्पर्य यह है कि महिला ही महिला के जान की दुश्मन बनी हुई है वो किसी दूसरी महिला के आगे बढने पर खुश नही है।


क्या गुजरात में बीजेपी का सबसे बड़ा अस्त्र छीन गया है !

क्या गुजरात में बीजेपी का सबसे बड़ा अस्त्र छीन गया है !

11-Dec-2017

लेख : एम.एच.जकरीया 

गुजरात में भीतर ही भीतर बदलाव की बयार बह रही है, लेकिन ‘कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि मतदान के दिन वोट किस पाले में गिरेगा ! गुजरात चुनाव के नतीजों के बारे में अभी से अनुमान लगाने में तो महारथियों के भी पसीने छूटने लगे है. गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों के सन्दर्भ में जिस तरह के अनुमान लगाये जा रहे है, उससे  असामंजस्य की स्थिति दिखाई दे रही है, अभी भी किसी भी पार्टी के लिए राह इतना आसां नहीं है, यहाँ हर दिन इतने बदलाव गुजरात की राजनीति में देखे जा रहे है उससे सारे अनुमान धरे के धरे रह जाते है ,इस बार के विधानसभा चुनाव में सब कुछ सीधा दिखाई जरुर दे रहा है लेकिन चुनाव में रोज जिस  तरह के समीकरण बदल रहे है, उससे कुछ भी समझना मुश्किल जान पड़ता है | चुनाव अभियान की शुरूआत के एक पखवाड़े बाद दो चीजें बिल्कुल साफ हैं | एक तो यह कि दोनों दल खुले मैदान में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं लेकिन अपने ऑफिस के एकांत में बिल्कुल असमंजस में हैं. दूसरी बात कि हिंदुत्व के जुमले की जगह जातिगत पहचान के मुहावरे ने ले ली है और इस तरह बीजेपी से उसका सबसे बड़ा हथियार छिन गया है !

चुनावी गुणा-भाग और समीकरण बैठाने के मामले में वीरता का कोई अवॉर्ड दिया जाता हो तो फिर शौर्य और पराक्रम के ऐसे सबसे ऊंचे अवार्ड के हकदार निश्चित ही अमित शाह होंगे. गुजरात के चुनाव में एक अकेले वही हैं जो बीजेपी को 150 सीट मिलने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. इसे दुर्भाग्य कहिए कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं तक को लग रहा है कि अमित शाह कुछ ऐसा देख पा रहे हैं जिसे हम माइक्रोस्कोप लगाकर भी ना देख पाएं.

मोदी और शाह के लिए इमेज परिणाम

तो फिर, बीजेपी इतने असमंजस में क्यों है?  विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अभी जुमले बाज़ी से काम नहीं चलने वाला है क्योकि अभी सारे के सारे समीकरण पहले की तरह नहीं रह गए है, पटेल पाटीदार समाज दलित समाज और ओ.बी.सी. के मिजाज़ बदले हुए दिखाई दे रहे है | 

हाल ही में गुजरात के राजकोट विधानसभा में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय भाई रूपाणि के नामांकन सभा से हार्दिक पटेल की सभा की तुलना की जाये तो हार्दिक पटेल की सभा में जुटने वाली भीड़ की तादाद बहुत अधिक दिखाई दी वहीँ अल्पेश पटेल की सभा में भी उन्हें सुनने वालो की तादाद काफी संख्या में दिखाई दे रही है | अब कहा जा सकता है की बीजेपी 150 सीटें जीतने जा रही है,  वह दो महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी पर टिका है. एक तो यह कि राहुल गांधी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर को सुनने के लिए भारी भीड़ जुट रही है. यह तीन नेता बीजेपी के खिलाफ चुनावी जंग की अगुवाई कर रहे हैं. अब यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि नया नेता और नई बात सुनने के ख्याल से इतनी भारी भीड़ राहुल गांधी, हार्दिक पटेल या फिर अल्पेश ठाकोर की सभा में कैसे जुट रही है स्वस्फूर्त या लायी हुई भीड़ कहा जाये 

राहुल गांधी की सभा के बारे में तो यह बात निश्चित तौर पर गलत है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी की रैलियां कमाल आर खान की फिल्मों से भी ज्यादा फ्लॉप साबित हो रही थीं. जाहिर है, कोई ना कोई व्याख्या होनी चाहिए कि आखिर राहुल गांधी की राजनीति ने केआरके (कमाल आर खान) वाला चोला उतारकर एसआरके (शाहरुख खान) वाला बाना कैसे धारण कर लिया.

दूसरी बात यह कि बीजेपी अभी तक अपने चुनावी अभियान का मुहावरा नहीं तय कर पाई है. अब चाहे इसे बीजेपी के लिए आप अच्छा मानें या बुरा लेकिन फिलहाल बीजेपी राहुल, हार्दिक, अल्पेश और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की बातों पर सिर्फ प्रतिक्रिया करती नजर आ रही है. बीजेपी के लिए परेशानी का सबब यह भी है कि जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी और आरक्षण की मांग उसके चुनावी अभियान की राह में रोड़ा बनकर खड़े हैं. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ध्रुवीकरण या कह लें भावनाओं का उभार लोगों में जोर पकड़ता नहीं दिख रहा.

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बीजेपी सियासत के आसमान में अपनी पसंद के गुब्बारे बेशक उड़ा रही है. वह कश्मीर, पाकिस्तान और रोहिंग्या जैसे विषयों के गुब्बारे बीच-बीच में चुनावी फिजां में तैराने में लगी है. नवसारी (सूरत के नजदीक) की सभा में अमित शाह ने तो यह भी कहा कि हम गुजरात को कर्फ्यू-मुक्त जिंदगी देंगे. बीजेपी की चुनावी रैलियों में हिंदुत्व के आगे बढ़ते जाने की टेक वाले गीत बजते सुने जा सकते हैं. इन गीतों के बोल हैं 'राजनीति की करो तैयारी, आते हैं अब भगवाधारी'. लेकिन अभी तक दिख यही रहा है कि हिंदुत्व के आगमन की सूचना देते ऐसे गीतों से लोगों को अब जम्हाई आ रही है.

कांग्रेस अपने बदले अवतार में हिंदुत्व की बहस से एकदम दूर है. कांग्रेस पर एक ठप्पा मुस्लिम समर्थक होने का है. इस ठप्पे से छुटकारा पाने के लिए राहुल गांधी मंदिरों में जा रहे हैं, भगवान शंकर का नाम ले रहे हैं और सभाओं में माथे पर सिंदूर तिलक लगाये नजर आ रहे हैं. वो अब भाषणों में गुजरात दंगे का जिक्र नहीं करते. उनके भाषणों में अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, दलित, पाटीदार और अन्य जाति समुदाय के लोगों के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का जिक्र आता है.

यह रणनीति चुनावी कथानक को अभी तक परंपरागत सांप्रदायिक लाइन पर जाने से रोक रखने में कामयाब हुई है. सूबे में बीते 22 वर्षों से चले आ रहे शासन के कारण कुछ जोर एंटी इंकंबेंसी का भी है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती और आरक्षण की मांग को लेकर उठे आंदोलन ने भी लोगों के मन में अपने लिए जगह बनाई है. इन तमाम बातों ने एक साथ मिलकर बीजेपी को चुनावी अभियान में हलाकान कर रखा है.

लेकिन बाजी मार ले जाने का भरोसा कांग्रेस को भी नहीं है. कांग्रेस के एक स्टार-प्रचारक ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने एक न्यूज वेबसाइट से बातचीत में बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि गुजरात में भीतर ही भीतर बदलाव की बयार बह रही है लेकिन ‘कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि मतदान के दिन वोट किस पाले में पड़ेगा.’
कांग्रेस इतने पसोपेश में क्यों हैं? एक बड़ी वजह है पार्टी में आत्मविश्वास की कमी. कांग्रेस को नहीं लगता कि वह अकेले अपने दम पर बीजेपी को हरा पाएगी. कांग्रेस की मनोदशा कुछ वैसी ही है जैसी कि 2003 के क्रिकेट वर्ल्डकप में केन्याई टीम की थी. जीत के करीब (सेमीफाइनल) पहुंचकर केन्या की टीम को लगा अरे इतनी लंबी दूरी तक आ गए, यहां तक तो सिर्फ क्रिकेट की धाकड़ मानी जाने वाली टीमें पहुंचती हैं. आत्मविश्वास की इसी कमी के कारण भारत के खिलाफ मैच में वो लड़ाई ठानने से पहले ही अखाड़े से बाहर हो गए.

कांग्रेस के पांव पीछे खींचने वाली एक और बात भी है. कांग्रेस अभी तक गुजरात में अपने नेता का नाम नहीं बता पाई है. लोग सड़क-चौराहे पर कहते-सुनते मिलते जाते हैं कि ‘कांग्रेस ने कोई नेता नथी जो मुख्यमंत्री बनी सके’. कई लोगों का मानना है कि अगर बापू (शंकर सिंह बाघेला) ने कांग्रेस नहीं छोड़ा होता तो वो लड़ाई में विपक्ष का चेहरा बनकर उभरते.
कांग्रेस में विश्वास की कमी और बीजेपी में भरोसे के अभाव के कारण गुजरात में एक कहावत चल पड़ी है कि इस बार बीजेपी की हजामत बनने वाली है. लेकिन कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि हजामत में उस्तरा किस हद तक चलेगा, वह कनपटी दुरुस्त करने तक सीमित रहेगा या बात आगे बढ़कर माथा मूड़ने तक पहुंचेगी. एक बात यह भी है कि गांवों में मतदाता एकदम से बीजेपी के खिलाफ है लेकिन शहरों में वह मोदी-समर्थक है.

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मतदान के रुझान से भी कांग्रेस को कुछ उम्मीद है. साल 2012 के गुजरात चुनाव में, जब नरेंद्र मोदी की नजर दिल्ली के सिंहासन पर थी, कांग्रेस को बीजेपी से 9 फीसदी कम वोट मिले थे. इस बार के चुनाव में कांग्रेस को अलग से तीन नेताओं का समर्थन हासिल है और यह नेता मतदान का रुख कांग्रेस की तरफ मोड़ सकते हैं. अल्पेश का दावा है कि वो गुजरात के 20 फीसद ठाकोर वोट का प्रतिनिधित्व करते हैं. हार्दिक पटेल का कहना है कि गुजरात की आबादी में 15 फीसद की तादाद में मौजूद पाटीदार उनको अपना नेता मानते हैं और जिग्नेश मेवाणी गुजरात की 7 फीसद दलित आबादी के नेता हैं. कागजी गणित के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की जीत पक्की लग रही है.

इसके उलट जमीनी माहौल कुछ और बयां कर रहा है. सरकार के आलोचक तक यह नहीं मान पा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को उनके ही घरेलू मैदान पर पटखनी देना मुमकिन है. ऐसे में बीजेपी की हार तकरीबन असंभव नजर आ रही है. शरलॉक होम्स का एक वाक्य बड़ा मशहूर है कि 'एक बार आप असंभव को नकार दें तो इसके बात जो कुछ बचता है, वह चाहे कितना भी हैरतअंगेज जान पड़े लेकिन होता वह सच ही है.' लेकिन गुजरात में शरलॉक होम्स के भी यह बताने में छक्के छूट जाएंगे कि नतीजों के लिहाज से क्या बात असंभव है और क्या कुछ हैरतअंगेज हकीकत. शरलॉक होम्स अपने साथी वाटसन से बस यही कह पायेगा- मामला बड़ा उलझा हुआ है!


निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

27-Nov-2017

देश के निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हालात बदतर एवं चिन्तनीय है ही, लेकिन ये लूटपाट एवं धन उगाने के ऐसे अड्डे बन गये हैं जो अधिक परेशानी का सबब है। हमारे देश में जगह-जगह छोटे शहरों से लेकर प्रान्त की राजधानियों एवं एनसीआर तक में निजी अस्पतालों में मरीजों की लूट-खसोट, इलाज में कोताही और मनमानापन कोई नई बात नहीं है। विशेषतः देश के नामी निजी अस्पतालों की श्रृंखला में इलाज एवं जांच परीक्षण के नाम पर जिस तरह से लाखों रूपये वसूले जा रहे हैं, वह तो इलाज के नाम पर जीवन की बजाय जान लेने के माध्यम बने हुए हैं।

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इसका ताजा उदाहरण है गुरुग्राम का नामी अस्पताल फोर्टिस और उसका सात साल की एक डेंगू-पीड़ित बच्ची के इलाज का सोलह लाख रुपए का बिल। इतनी बढ़ी राशि लेकर भी पीड़ित बच्ची की जान नहीं बचायी जा सकी।  ऐसे महंगे इलाज की फिर क्या उपयोगिता? क्यों इस तरह की सरेआम लूटपाट इलाज के नाम पर हो रही है? लगता है कानून एवं प्रशासन नाम की चीज नहीं है, या उनकी मिलीभगत से जीवन के नाम पर मौत का व्यापार खुलेआम हो रहा है।  डेंगू पीड़ित नन्हीं बच्ची की मौत निजी अस्पतालों पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चिकित्सा व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग है। इलाज के नाम पर आम आदमी जाये तो कहां जाये? सरकारी अस्पतालों में मौत से जूझ रहे रोगी के लिये कोई जगह नहीं है तो उसके लिये निजी अस्पतालों में शरण जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं? निजी अस्पतालों ने लूट-खसोट मचा रखी है।

यहां तक कि इलाज के बगैर भी बिल वसूलने की घटनाएं नजर आती है। मरीजों पर महंगा टेस्ट करवाने के लिए दबाव डाला जाता है। बगैर जरूरत मरीज को वेंटिलेशन व ऑपरेशन थियेटर में डाल दिया जाता है। मरीजों को उनके मामले का विवरण नहीं दिया जाता है। तय पैकेज पर एक्सट्रा पैकेज लेने के मामले भी सामने आये हैंै। इससे बड़ा अनैतिक काम और नहीं हो सकता है। नर्सिंग होम एवं निजी अस्पताल वालों को यह ध्यान में रखना होगा कि चिकित्सा-सेवा उनके लिये ईंट व लकड़ी का व्यवसाय नहीं, बल्कि जिंदगी बचाने का काम है। सेवा को कभी बेचा नहीं जाता। मरीजों को मानवीय दृष्टि से देखना चाहिए। अस्पताल कल-कारखाना नहीं, यह सेवा-मूलक उपक्रम है। देखना यह है कि सरकार इसे मिशन बनाती है या व्यवसाय?  फोर्टिस में एक तरफ मरीज के परिवार से अतिशयोक्तिपूर्ण एवं आश्चर्य में डाल देने वाला बिल वसूला गया, और दूसरी तरफ, उपचार मानकों का पालन भी नहीं किया गया। गुरुग्राम की यह घटना कोई पहली या अकेली घटना नहीं है, इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं रोज-ब-रोज निजी अस्पतालों में दोहराई जाती हैं।

यह वाकया निजी अस्पतालों की बदनियति की मिसाल है। लेकिन सरकार, प्रशासन, प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की वजह से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। यहां तक कि अपने को स्वतंत्र कहने वाला मीडिया भी निजी अस्पतालों की अनियमितताओं और कमियों को दिखाने-बताने से परहेज ही करता है। निजी अस्पतालों में मरीजों के इलाज में लापरवाही व मनमानी ही नहीं की जाती, बल्कि मरीजों से अधिक बिल वसूलने के लिये हिंसक एवं अराजकता अपनाई जाती है। यहां तक कि पैसे नहीं दिये जाने पर अस्पताल प्रबंधन परिजनों को शव तक ले जाने नहीं देता है, अधिकांश मामलों में मरीज किसी दूसरे या सरकारी अस्तपाल में जाना चाहे तो भी अनेक बाधाएं खड़ी कर दी जाती है। मरीज के परिजनों के सामने इधर कुआं उधर खायी की स्थिति बन जाती है।

आम आदमी की दो मूलभूत जरूरतें हैं शिक्षा एवं स्वास्थ्य। दोनों की उपलब्धता कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आजादी के सात दशक में पहुंचते-पहुंचते सरकार अपनी इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने लगी है और इसका फायदा निजी अस्पतालों एवं निजी स्कूलों के द्वारा उठाया जा रहा है। अधिकांश निजी अस्पतालों एवं निजी स्कूलों  का स्वामित्व राजनीतिकों, पूंजीपतियों और अन्य ताकतवर लोगों के पास होने से उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत किसी सामान्य व्यक्ति की कैसे हो सकती है?  फोर्टिस अस्पताल के ताजा मामले में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जरूर संज्ञान लिया है और उसने सभी प्रदेशों और केंद्रशासित राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र भेज कर अस्पतालों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि चिकित्सीय संस्थाओं द्वारा की जाने वाली गड़बड़ियों से न केवल मरीज की स्थिति बल्कि स्वास्थ्य देखभाल और उपचार लागत में जवाबदेही को लेकर भी चिंताएं पैदा होती हैं।

पत्र में क्लीनिकल इस्टेब्लिस्मेंट रजिस्ट्रेशन एवं रेग्यूलेशन एक्ट, 2010 के क्रियान्वयन सुनिश्चित करने को कहा गया है। सवाल है कि यह पत्र कोरा दिखावा बन कर रह जायेगा या समस्या के समाधान की दिशा में कारगर साबित होगा? स्वास्थ्य मंत्रालय को ऐसी चिंता तभी क्यों सताती है, जब इस तरह की शर्मनाक एवं गैरकानूनी घटनाएं सुर्खियों में आ जाती है? जबकि बढ़ा-चढ़ा कर बिल बनाना निजी अस्पतालों का रोज का धंधा है। क्या मंत्रालय इससे अनजान रहा है?  गुरुग्राम की घटना को एक सबक के तौर पर लेने की आवश्यकता है और ताकि निजी अस्पतालों समेत सभी महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थानों में गलत कार्य करने पर कड़ी कार्रवाई तय की जाने की स्थितियां बन सके। लेकिन विडम्बनापूर्ण है कि देश में छोटे-छोटे अपराध एवं गैरकानूनी काम करने वाले के लिये तो सख्त कानून हैं और सरकार भी जागरूक है, लेकिन इन बड़े एवं सभ्य कहे जाने वाले लूटेरों के लिये सन्नाटा है। 

ये परिस्थितियां गुनाह करने वाले अस्पतालों के पक्ष में जाती हैं, जिसका फायदा वे उठाते रहते हैं। ऐसे में कानूनों और नियमों का पालन कौन कराएगा? सैकड़ों-हजारों मामलों में इक्का-दुक्का लोग ही न्यायालय का दरवाजा खटखटा पाते हैं। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, जिस तरह वे चिकित्सा-व्यवस्था को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ रही हैं और स्वास्थ्य बजट में कटौती कर रही हैं, उसी का नतीजा है कि निजी अस्पताल अनियंत्रित होते जा रहे हैं।  वे सोचते हैं कि सरकारें कुछ भी करें, मरीजों के पास उनकी पास आने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। सरकार अगर सचमुच गंभीर है और चाहती है कि फोर्टिस जैसी घटना फिर न दोहराई जाए तो उसे चाहिए कि ऐसी व्यवस्था और वातावरण तैयार करे, जिसमें कोई अस्पताल किसी भी मरीज को गैरकानूनी तरीकें से लूटने का साहस न कर सके।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत निर्मित कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी बातें हो रही है,  लेकिन भारत अपने हाथों से स्वास्थ्य के नाम पर आम आदमी की भाग्यलिपि में कौन-सा रंग भर रहा है, यह हमें आज पढ़ना है। भारत का सपना है आजाद देश में उन्नत एवं सर्वसुलभ चिकित्सा। लेकिन निजी अस्पतालों की बीतते कालखण्ड की कुछ वीभत्स एवं डरावनी घटनाओं ने विनाश के चित्र उकेरे हंै, जो ज्यादा भयावह एवं चिन्ता का कारण है।  तमाम निजी अस्पतालों के इन तथ्यों की सच्चाई स्वास्थ्य की दिनोंदिन बिगड़ती दशा और दिशा को प्रस्तुत करती है। इन निजी अस्पतालों के खिलाफ शिकायतों के अंबार है, लेकिन इनके निस्तारण की कोई पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था नहीं है। सवाल है कि मरीज अपना इलाज कराये या अपनी शिकायत लेकर दर-दर भटके? सवाल यह भी है अगर सरकार कुछ कारगर प्रयास कर पाती तो हालात इतने बदतर तो न होते। 

क्यों नहीं निजी अस्पतालों की इन ज्यादतियों की चर्चा प्रमुखता से की जाती? कब तक स्वास्थ्य को चैपट होते हुए एवं एक गौरखधंधा बनते हुए हम देखते रहेंगे? आखिर ये बुनियादी सवाल क्यों नहीं सरकार की नींद को उडा रहे हैं? यह केवल किसी एक प्रान्त के मरीजों की समस्या नहीं, पूरे देश का यह दर्द है।  लेकिन परिदृश्य ऐसा भी नहीं है जिसमें उम्मीद की कोई किरण नजर न आती हो। मोदी सरकार की कोशिशों और आम मरीजों की जागरूकता के कारण धीरे धीरे ही सही, मगर इन स्थितियों के खिलाफ एक वातावरण बना है। यह बदलाव शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के आंकड़ों में यदि दिखाई नहीं देगा तो नया भारत एक नारा भर बन कर रह जायेगा।

( प्रस्तुत लेख श्री ललित गर्ग जी के हैं ललित गर्ग जी अक्सर सामाजिक,राजनैतिक, व ज्वलंत मुद्दों पर अपने कलम चलाते रहते हैं ) 


 'चोर का माल चंडाल खाए' पत्रकार और वसूली

'चोर का माल चंडाल खाए' पत्रकार और वसूली

13-Nov-2017

KHULASAPOST MAGAZINE ARTICLE

आजकल गलत काम करने वालों से कुछ लोग पत्रकार बनकर जमकर वसूली करते हैं और गलत काम करने वाला मजबूरी में कुछ बोल भी नहीं पाता है. आगरा में एक ऐसे ही मामले का भंडा़फोड़ हुआ है जिसमें करीब दस लोग पत्रकार बनकर हर महीने नकली खाद्य तेल बेचने वाले एक कारोबारी से लाखों रुपये वसूलते थे. न देने पर कैमरा लेकर आते और रिकार्डिंग करने लग जाते. फिर धमकी देते कि वह शासन प्रशासन को दिखाकर नकली तेल के कारबोरा की पोल खोल देंगे. इससे डरा कारोबारी उन्हें मुंहमांगी रकम दे देता. 

पत्रकार के लिए चित्र परिणाम

चलिए हम आपको खबर को विस्तार से बताते हैं दरअसल मामला 14 अक्टूबर का आगरा शहर का है जहाँ नकली खाद्य तेल और घी के काले कारोबार के पकड़े जाने के बाद बड़े खेल का खुलासा हुआ नकली तेल-घी बनाने वाले एक कारोबारी ने खुलासा किया की नकली खाद्य बनाने का खुलासा नहीं करने के एवज में कथित पत्रकार उनसे हर महीने दो लाख रुपए वसूलते थे वे कथित पत्रकार कारोबारी को धमकी देते की अगर पैसे नहीं दिए तो हम तुम्हे फंसवा देंगे हमारी सेटिंग छापा मारने वाले टीम से है.   

नकली खाद्य के कारोबारी भी अपना भांडा न फूटे के डर से कथित पत्रकारों को रकम देता था और अपन काले कारोबार को आराम से अंजाम दे रहा था वह एक प्रकार से बेफिक्र हो गया था क्योंकि कथित पत्रकारों ने खाद्य विभाग के कुछ अधिकारियो से सेटिंग होने की बात कही थी 

लेकिन एफएसडीए की टीम ने नुनिहाई स्थित मार्को इंटरनेशनल नामक कंपनी पर छापा डालकर नकली घी का कारोबार पकड़ा और कारोबारी के खुलासे से अधिकारी भी दंग रह गए कारोबारी ने एफएसडीए के अधिकारीयों को एक सूची सौंपी जिसमें दस कथित पत्रकारों के नाम हैं ये कथित पत्रकार कारोबारी से हर महीने लाखों रूपये की वसूली करते थे और पैसा न देने पर कैमरा लेकर आते थे,वीडियो बनाते थे और प्रशासन को दिखाने की धमकी देते थे खैर "चोर का माल चंडाल खाए" यह कहावत कारोबारी और कथित पत्रकार पर बिलकुल फिट बैठता है क्योंकि कारोबारी चोरी यानि नकली घी बनाकर मार्केट में सप्लाई करता था तो उसे उस बेईमानी की कमाई में कथित पत्रकार भी चंडाल बनकर अपना हिस्सा लेने आ जाते थे और कारोबारी अपने कारनामो को छिपाने के लिए कथित पत्रकारों के मुंह में लाखों रुपए रकम ढूंस देता था कारोबारी ने रकम देने की बात को साबित करने के लिए अपने गोदाम और घर में लगे सीसीटीवी फुटेज दिखाने की भी बात कही खैर यह खबर तो यूपी की है

लेकिन ऐसा कदापि नहीं है की ये कथित पत्रकार केवल एक राज्य या शहर में पाएं जाते हो यह हर राज्य में है और किसी चोर यानि काले कारनामो को अंजाम देने वाले व्यापारी के साथ एक प्रकार से पार्टनर बनकर बैठे हुए हैं ।  

 ( आकाश भट्ट की कलम से )

 


पीत पत्रकारिता या गन्दी राजनीति

पीत पत्रकारिता या गन्दी राजनीति

10-Nov-2017

मैगजीन के लेख 

पत्रकारिता जगत में रोज़ एक नयी बातें पत्रकारों के संबंध में सुनाई दे जाती है, अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के एक मंत्री के सेक्स सी.डी. पर बवाल खड़े हुआ है और उस पत्रकार की गिरफ्तारी पर कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए है जिससे छत्तीसगढ़ की राजनीति और मीडिया में बवाल मचा हुआ है | 

 ज़ाहिर सी बात है की बिना किसी ठोस तथ्यों के किसी को पुलिस के द्वारा गिरफ्तार किया जाना कितना तर्क संगत है यह तो जाँच और आने वाला समय ही बताएगा लेकिन इस घटना में पत्रकार के साथ राजनीति का भी जुड़ना कथित सी.डी. की विश्वस्नीयता को सन्देह के कटघरे में लाकर खड़े कर देता है ? ऐसा जान पड़ता है यह कानूनी कार्रवाई कम इसमें मीडिया ट्रायल ज्यादा हुआ है !

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वैसे भी कांग्रेस की अपनी साफ सुथरी परम्परा रही है, जिसे अब कुछ लोग कलंकित करने में लगे हुए है | कांग्रेस ने इस तरह से कभी भी किसी के बैडरूम के अन्तरंग मामलो को उजागर करने में हमेशा से परहेज़ करता रहा है, ऐसे में कांग्रेस की छवि पर भी बुरा असर पड़ा है | लेकिन अब छत्तीसगढ़ में नई परंपरा कुछ अतिउत्साहित शीर्ष नेताओ ने अभी हाल के वर्षो से सत्ता पाने की लालसा में शुरू किया है जहाँ इस तरह से टेलीफोन टेप करना, किसी का चोरी छुपे वीडियो बनाने का काम किया जा रहा है ये वही लोग है जिन्होंने कुछ दिनों पहले एक टेलीफोन टेप काण्ड में हल्ला मचाया था, जिसमे मै आपको याद दिलाना चाहूंगा अंतागढ़ चुनाव से सम्बंधित एक टेलीफोन टेप पर खूब हो हल्ला मचा एक अंगेजी अख़बार पर मुकदमा भी किया गया और उसके बाद क्या हुआ ये सभी जानते है, अगर कही यही सी.डी. किसी पत्रकार के अन्तरंग दृश्यों की होती तो क्या होता लेकिन यहाँ मामला राजनीती के साथ पत्रकारिता से भी जुड़ा है, इसलिए ये बात महत्वपूर्ण हो जाती है की क्या पत्रकारिता किसी की निजी और अन्तरंग पहलू को दिखाने और बताने की इज़ाज़त देता है ?  और यदि खुदा ना खस्ता कथित सी.डी. में वो मंत्री और जो महिला ना हो तो उस व्यक्ति और महिला के भविष्य का क्या होगा और उस परिवार पर जो बीत रही होगी उसे भी मानवता के द्रष्टिकोण से देखना होगा समाज में उसके परिवार बच्चों का भविष्य समाप्त ही समझा जाये ये किस तरह की पत्रकारिता है, क्या वर्तमान राजनीति का इतना नैतिक पतन हो गया है और ये किस तरह की पत्रकारिता है क्या ऐसे ही किसी की चरित्र हत्या कर दिया जाये, क्या लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में यही सब करने की इजाज़त दी गई है ?

अब यहाँ सवाल ये उठता है की हक़ीक़त क्या है !  क्योकि वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा कांग्रेस के मुखिया के करीबी रिश्तेदार भी बताये जा रहे है, अगर ये मामला पत्रकारिता से जुड़ा होता तो पहले खबर बनती उसके बाद प्रतिक्रिया आती और ये राजनितिक उद्देश्य से किया गया स्टिंग था तो इसे बाकायदा मीडिया के सामने लाया जाना था जो की तर्क संगत नहीं लगता है, की इस तरह से किसी के भी अश्लील अंतरंग दृश्यों को दिखा कर राजनीति किया जाना कितना उचित है |  हाँ यहाँ ये ज़रूरी हो जाता है की हमारे जन प्रतिनिधियों का चरित्र साफ सुथरा हो लेकिन वीडियो में जिस तरह से क्लिपिंग में दिखाए गए है उससे स्पष्ट होता है की वीडियो के साथ छेड़ छाड़ किया गया है | अब ये तो जांच के बाद ही पता चलने वाला है. लेकिन राजनैतिक दलों और मीडिया के द्वारा इसे मंत्री का बताया जा रहा है |

लेकिन सवाल यहाँ ये उठता है की क्या किसी भी नागरिक के अन्तरंग दृश्य को यू इस तरह से सार्वजानिक रूप से दिखाया जा सकता है | क्या देश का कानून और पत्रकारिता में इसकी इज़ाज़त  है ? यहाँ मै किसी राजनैतिक दल या अपने पत्रकार बिरादरी का पक्ष नहीं ले रहा हु, बस मेरा कहना यही है की ये किस तरह की पत्रकारिता है जो किसी भी व्यक्ति के अन्तरंग दृश्यों को सार्वजानिक करे जिसे कई तरह के लोगो ने और बच्चों ने भी देखा हो सकता है क्योकि वीडियो व्हाट्सएप में सभी मोबाइलों में भेजा गया है | क्या देश का कानून इसकी इज़ाज़त देता है ? क्या कोई भी इस तरह के कृत्य की इज़ाज़त पत्रकारिता या किसी भी अन्य व्यक्ति को करने की इजाज़त देगा? तो फिर समाज में इसके  कितने भयानक परिणाम होंगे इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है | 

अश्लीलता चाहे जैसी भी हो है तो वह अपराध ही यदि किसी भी व्यक्ति या जोड़े के द्वारा सहमती से सम्बन्ध बनाये जा रहे है उस पर किसी भी तरह से कोई अपराध नहीं बनता लेकिन किसी के अन्तरंग दृश्यों पर हमारा कानून क्या कहता है |

बनाये गए सेक्स सीडी की नकल करवाने का मामला आईटी एक्ट के तहत आता है. हालांकि आईटी एक्ट के तहत अश्लील वीडियो देखना अपराध नहीं है, लेकिन उसका प्रकाशन करना या इसमें सहायता करना अपराध की श्रेणी में माना जाता है.

सेक्स वीडियो देख कर मिटा देना दंडनीय अपराध नहीं है. सीडी देख कर उसे नष्ट कर देना अपराध नहीं है.
लेकिन सेक्स वीडियो को कंप्यूटर पर सेव करके रखना अपराध है क्योंकि इसे वीडियो प्रकाशित करना माना जाता है. ऐसे में आपको प्रकाशन करने में सहायता करने के संदर्भ में दोषी माना जा सकता है.

सेक्स वीडियो की नकल बनाना धारा 67 के तहत अपराध है. ये ज़मानती अपराध है और इसमें अधिकतम तीन साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है.
अगर वीडियो में अश्लील सामग्री है तो ये धारा 67-ए के तहत आ सकता है. इसमें आईटी एक्ट के तहत अधिकतम पांच साल की सज़ा है और ये गैर ज़मानती अपराध है.
अगर सेक्स वीडियो में 18 साल से कम उम्र का किशोर-किशोरी है तो ये चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी का मामला बन जाता है और इसके तहत पांच साल की सज़ा हो सकती है.
सुचना प्रौद्योगिकी अधिनयम 2000 (आई.टी. एक्ट 2000) संशोधन 2009

धारा- 66 क. - संसूचना सेवा इत्यादि के माध्यम से आपराधिक तथ्य भेजने के लिये दंड 
दंड - जो कि तीन वर्ष तक हो सकेगा और जुर्माने से दंडनीय होगा ।
धारा-67 ड. - अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशन के लिए दंड 
दंड  - जो तीन वर्ष तक हो सकेगा, या जुर्माने से, जो दो लाख रूपये से अधिक नहीं होगा या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा
धारा-67 - अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशन के लिए दंड 
दंड  - जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो एक लाख रूपये तक का हो सकेगा और दूसरी या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि की दशा में दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक ही हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो दो लाख रूपये तक हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा ।
धारा- 72 -गोपनीयता और एकांतता भंग के लिए शास्ति  
दंड  - जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक लाख रूपये तक का हो सकेगा अथवा दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।
धारा- 74 - कपटपूर्ण प्रयोजन के लिये प्रकाशन - 
दंड  - जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक लाख रूपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।
धारा- 84 ख- अपराध के दुष्प्रेरण के लिये दण्ड -  
दंड  - ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिये नहीं बनाया गया हो, तो इस अधिनियम के अधीन अपराध के लिये उपबंधित दण्ड से दण्डित किया जायेगा ।
धारा- 84 ग- अपराध कारित करने के प्रयास के लिये दंड - 
दंड  - अपराध के लिये उपबंधित किसी प्रकार के दंड की ऐसी अवधि से, जो उस अपराध के लिये उपबंधित कारावास की लम्बी अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जिसे अपराध के लिये उपबंधित किया गया हो, के आधे से, या दोनों से दण्डनीय होगा ।
धारा- 85 - कम्पनियों द्वारा अपराध -1.  : जहाँ कोई व्यक्ति जो एक कम्पनी है, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किये गए किसी निदेश या आदेश के किन्ही उपबंधो का उल्लंघन करता है, वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के किये जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएँगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने के भागी होंगे

 


जनदर्शन : मुख्यमंत्री ने दो हजार से ज्यादा लोगों से की मुलाकात : बैगा आदिवासियों के पट्टे की समस्या पर मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को तुरंत लगाया फोन

जनदर्शन : मुख्यमंत्री ने दो हजार से ज्यादा लोगों से की मुलाकात : बैगा आदिवासियों के पट्टे की समस्या पर मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को तुरंत लगाया फोन

09-Nov-2017

रायपुर : मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आज यहां अपने निवास परिसर में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में आम जनता से मुलाकात कर लोगों की समस्याएं सुनी। डॉ. सिंह ने कबीरधाम जिले से आए बैगा आदिवासियों के प्रतिनिधि मंडल के ज्ञापन को तत्काल संज्ञान में लिया और वहां के कलेक्टर को मोबाइल फोन पर इन आदिवासियों की पट्टे से संबंधित समस्या का उचित निराकरण जल्द सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री नेे आज के जनदर्शन में राजधानी रायपुर सहित राज्य के विभिन्न जिलों के दो हजार से अधिक लोगों सेे मुलाकात की। इनमें से 928 लोग विभिन्न प्रतिनिधि मंडलों में शामिल थे, जबकि एक हजार 151 लोगों ने मुख्यमंत्री को अपनी-अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में आवेदन दिए।

मुख्यमंत्री ने पंच-सरपंचों और अन्य जनप्रतिनिधियों के आग्रह पर आज के जनदर्शन में 25 आवेदनों  में लगभग 97 लाख रूपए के निर्माण कार्यों की स्वीकृति तत्काल प्रदान कर दी, जिनमें सीसी रोड, सामुदायिक भवन तथा पुल-पुलियों के कार्य भी शामिल हैं। डॉ. सिंह ने 62 मरीजों को संजीवनी कोष से सहायता राशि की मंजूरी दी और 57 मरीजों को मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अम्बेडकर अस्पताल में नि‘शुल्क इलाज  के लिए भिजवाया।

डॉ. सिंह ने कबीरधाम जिले से आए बैगा आदिवासियों के प्रतिनिधि मंडल के ज्ञापन को तत्काल संज्ञान में लिया और वहां के कलेक्टर को मोबाइल फोन पर इन आदिवासियों की समस्याओं का उचित निराकरण जल्द सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन में बताया कि कबीरधाम जिले के पंडरिया तहसील क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम दमगढ़ में बैगा आदिवासियों के लगभग 110 परिवार विगत 80 वर्षाें से निवासरत हैं और खेती भी कर रहे हैं।

न्हें वर्ष 1975 में शासन द्वारा जमीन का पट्टा दिया गया था, लेकिन वर्ष 2014 में क्षेत्र के तत्कालीन राजस्व अधिकारियों ने जांच करने के लिए उन सबके जमीन के पट्टे जमा करवा लिए और आज तक उनकों अपनी जमीनों का पट्टा वापस नहीं मिला।

मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधि मंडल को विश्वास दिलाया कि इस प्रकरण में बैगा आदिवासियों को न्याय दिलाया जाएगा। ग्राम पंचायत अर्जुनी, कोरगापार और देवरी (क) (विकासखंड-गुण्डरदेही) जिला बालोद के सरपंचों और अन्य प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर खपरी जलाशय से 10 गांवों के लिए पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था करवाने का आग्रह किया। उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया कि इस जलाशय से नल-जल योजना के लिए सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। इसका निर्माण होने पर अर्जुनी, सकरौद, गोरकापार, खपरी, सिरसिदा, परसदा सहित दस गांवों के लोगों को पर्याप्त पानी मिल सकेगा।

मुख्यमंत्री ने उनका ज्ञापन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सचिव को आवश्यक कार्रवाई के लिए भिजवाया। ग्राम पंचायत बड़ेदेवगांव (तहसील खरसिया) जिला रायगढ़ के ग्रामीणों ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात की। उन्होंने डॉ. सिंह को ज्ञापन सौंपकर ग्राम बड़े देवगांव के शासकीय हाई स्कूल का उन्नयन हायर सेकेण्डरी स्कूल के रूप में करने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने उनका ज्ञापन स्कूल शिक्षा मंत्री श्री केदार कश्यप को भिजवाया।

 


आप पत्रकार है तो क्या आपको सात खून माफ़ है ?

आप पत्रकार है तो क्या आपको सात खून माफ़ है ?

08-Nov-2017

( आकाश भट्ट की कलम से )

पत्रकार ‌और पत्रकारिता के अब मायने बदल चुके है, आज़ादी के बाद लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को बनाये रखने के लिए पत्रकारिता को एक सम्मानजनक स्थान दिया गया था जो दिन बा दिन अपनी गरिमा को खोता जा रहा है | एक समय में, और स्वतंत्रता से पूर्व छापे खाने में छपने वाले समाचार पत्रों का चलन था उस समय के पत्रकार की एक धुंधली सी छवि खादी का कुर्ता पाजामा बाज़ू में थैली लटकाये कलम लिए समाचारों के लिए जद्दोजहद करने वाला वो पत्रकार ही तो थे जिन्होंने देश की आज़ादी और अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था, तब ना इतने साधन थे न ही ऐसी सुविधएं वो प्रेस के मालिक भी होते, संपादक भी और पत्रकार भी तब के समाचारों में एक सच्चाई और क्रांति हुआ करती थी जो बड़े-बड़ो को हिलाकर रख दिया करती थी |

उस समय साधन कम थे लेकिन पत्रकारिता को साधना की तरह पत्रकार अपने जीवन का एक हिस्सा बना कर समर्पित हो कर पत्रकारिता किया करते थे | समय बदलता गया साधन बढ़ते गए समाचारों के माध्यम समाचार जगत और कार्पोरेट में तब्दील होते चले गए, प्रिंट मडिया से टी.वी. और अब इन्टरनेट से सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के मूलभूत स्वरुप को ही बदल कर रख दिया है | एक समय में ब्लिट्ज़ के एक लेख और नागरवाला काण्ड ने उस समय ऐसा तहलका मचाया था कि सरकार की चूले हिल गई थी तब समाचारों में दूसरा माध्यम रेडियो के समाचारों का हुआ करता था विविध भारती से सरकारी समाचार और BBC रेडियो ही एक निष्पक्ष समाचार का माध्यम हुआ करते थे जिनके समाचारों की अपनी विश्वसनीयता और  ,एक सच्चाई हुआ करती थी | 

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अब  का दौर ऐसा चल रहा है, जहाँ मीडिया और पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम अपनी दादागिरी भी बखूबी से चलाई है, चाहे अधिकारी हो या पुलिस या राज नेता  मीडिया के नाम पर धौसियाना और पत्रकार संगठन और क्लब के नाम पर डराना धमकाना और वसूली करना इनका शगल बन गया है |  ज़बकि वास्तविक में जो पत्रकारिता करते है उन्हें इन सब से कोई भी लेना देना नहीं रहता है | वास्तविकता में पत्रकारिता का सही उद्देश्य खबरों और घटनाओ को लोगो तक पहुँचाने का है लेकिन अब दौर बदल चूका है, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इन सभी को अब किनारे लगाना शुरू कर दिया है अब हर एक व्यक्ति पत्रकार की भूमिका अदाकार कर रहा है |

अब  समय के साथ अभिव्यक्ति का माध्यम भी बदल चूका है,  कुछ विशेष लोगो ने पत्रकारिता को अपने बाप की जागीर समझ लिया था उन्हें अब बोरिया बिस्तर बाँध ही लेना चाहिए क्योंकि अति का अन्त कभी ना कभी जरूर होता है। अब समय ई-पेपर डिजिटल मैगज़ीन का होता जा रहा है प्रिन्ट मीडिया भी दैनिक समाचारों से पहले खबरे तत्काल फेसबुक और ट्विटर, व्हाट्स एप पर वायरल कर दिए जाते है इस लिए अब दैनिक समाचारों को लोग लेट न्यूज़ के नाम से पढ़ते है, अब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारिता के नाम पर कुछ विशेष लोगों का ही मीडिया में दख़ल रहा है, वो अब समाप्त होना जरुरी है |
 
आप पत्रकार है और मीडिया से जुड़े है तो, क्या आपको सात ख़ून माफ़ है ? नियम और क़ानून सभी के लिए बराबर है संवैधानिक नियमो का पालन सभी को करना अनिवार्य है, लेकिन हमारे देश की ये कितनी बड़ी विडंबना है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के नाम पर कुछ लोगो को दादागिरी करने की खुली छूट मिली हुई है ।

चंद लोगों ने पत्रकारिता को शर्मसार किया हुआ है आये दिन ये तथाकथित पत्रकार मंत्रियों विधायकों के बंगलो के इर्दगिर्द खैरात के लिए घूमते है और होली दीवाली का लिफ़ाफ़ा माँगने वाले ये पत्रकार जिन्हें समाचार समूहों ने भी हर तरह से नकार दिया है और काम से निकाल/हटा दिए गए है ऐसे लोग  पत्रकार का लेबल लगाकर प्रेस संगठनो और क्लबो के पदाधिकारी बनकर पत्रकारिता जैसे पवित्र काम को बदनाम करने में लगें हुए है ।

आये दिन पत्रकार सुरक्षा का रोना रोने वाले ये पत्रकार हक़ीक़त में पत्रकारों के शोषण करने वाले और अपना जेब भरने वाले है जिन्हें बेनकाब किया जाना ज़रूरी है, इनकी और ये जिन संस्थाओ से जुड़े है  इनकी जाँच होनी चाहियें हम शासन और पुलिस प्रशासन से विनती करते है की इनकी गम्भीरता से जाँच होनी चाहिये और शासन से जो भी अधिमान्यता या अन्य सुविधाएं जो इनको शासन के द्वारा प्राप्त  है उन्हें वापस लिया जाना चाहियें और इनकी संस्थाओ का पंजीयन रद्द कर गंभीरता से जाँच की जानी चाहिए