सूचना का अधिकार कानून में संशोधन की अनुमति न देने के लिए राष्ट्रमति को ज्ञापन देने पहुंचे कार्यकर्ताओं पुलिस ने हिरासत में लिया

सूचना का अधिकार कानून में संशोधन की अनुमति न देने के लिए राष्ट्रमति को ज्ञापन देने पहुंचे कार्यकर्ताओं पुलिस ने हिरासत में लिया

01-Aug-2019

नई दिल्ली: सूचना का अधिकार कानून में संशोधन की अनुमति न देने के लिए राष्ट्रमति रामनाथ कोविंद को ज्ञापन देने पहुंचे कार्यकर्ताओं को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कार्यकर्ताओं को मंदिर मार्ग थाने ले जाया गया है. मालूम हो कि सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा और राज्यसभा से पारित कर दिया गया है. लेकिन अभी इस संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति नहीं मिली है.

इसी मांग को लेकर कार्यकर्ता राष्ट्रपति भवन पहुंच थे कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस विधेयक पर अपनी सहमति न दें. हालांकि जैसे ही लोग वहां पहुंचे, पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. आरटीआई को सशक्त करने की दिशा में काम करने वाले कार्यकर्ता 7,000 से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर और उनकी मांगों के साथ राष्ट्रपति भवन पहुंच थे.

ज्ञापन देने पहुंची सूचना के जन अधिकार आंदोलन (एनसीपीआरआई) की सदस्य और आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने पुलिस की कार्रवाई पर बेहद हैरानी जताते हुए कहा, ‘क्या ये लोकतंत्र है? अगर लोकतंत्र खत्म हो चुका है तो हमें बता दिया जाए. लोगों को शांतपूर्ण ढंग से अपना ज्ञापन तक नहीं सौंपने दिया जा रहा है.’

वहीं, एक अन्य आरटीआई कार्यकर्ता अमृता जौहरी ने बताया कि जैसे ही लोग राष्ट्रपति भवन के गेट नंबर 38 पर पहुंचे, वैसे ही पुलिस ने उन्हें अपनी गाड़ी में भर लिया. लोगों को गेट के सामने खड़े तक नहीं होने दिया गया. उन्होंने कहा, ‘हमें जानवरों की तरह गाड़ियों में भरकर थाने ले जाया जा रहा है. हमें अपना राष्टपति को अपना ज्ञापन तक नहीं सौंपने दिया गया. ये लोकतंत्र की पूरी तरह से हत्या है.’ आरटीआई संशोधन विधेयक में प्रावधान किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों तथा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और कार्यकाल केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे.

सामजिक कार्यकर्ता और विशेषज्ञ इसे आरटीआई कानून की मूल भावना के लिए खतरा बता रहे हैं.

साभार : द वायर

 


CAG ने जीएसटी को लेकर सरकार पर उठाए सवाल

CAG ने जीएसटी को लेकर सरकार पर उठाए सवाल

31-Jul-2019

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. कर की इस नई व्यवस्था पर इस संस्था की पहली ऑडिट रिपोर्ट कल संसद में रखी गई. इसमें सीएजी ने कहा है कि सरकार ने जीएसटी को लाने से पहले इसका परीक्षण नहीं किया. संस्था का मानना है कि इसके चलते इसमें कई दिक्कतें हो रही हैं और सरकार को कम राजस्व मिल रहा है.

सीएजी ने कहा है कि जीएसटी लागू हुए दो साल होने को आए हैं, लेकिन कर की इस नई व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से इनवॉयस मैचिंग सिस्टम का अभी तक अमल में आना बाकी है. उसके मुताबिक रिटर्न के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें इतनी जटिलता और तकनीकी झोल हैं कि इनपुट टैक्स क्रेडिट के मामले में घपले यानी फ्रॉड की पूरी गुंजाइश है.

सीएजी का यह भी कहना है कि खुद केंद्र सरकार ही उन नियमों का पालन नहीं कर रही है जो उसने जीएसटी के लिए बनाए हैं. उसके मुताबिक इस नई व्यवस्था को लेकर राजस्व, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर बोर्ड और जीएसटी नेटवर्क जैसे विभागों के बीच पर्याप्त तालमेल भी नहीं है. एक देश, एक टैक्स के नारे के साथ जीएसटी को जुलाई 2017 में लागू किया गया था.


जनाजे की नमाज पढ़ रहे थे इमाम अंतिम संस्कार से पहले जिंदा हुआ मुर्दा, इमाम का दिल का दौरा पड़ने से मौत

जनाजे की नमाज पढ़ रहे थे इमाम अंतिम संस्कार से पहले जिंदा हुआ मुर्दा, इमाम का दिल का दौरा पड़ने से मौत

30-Jul-2019

नई दिल्ली। आपने अक्सर इस तरह की खबरें सुनी होंगी जब मुर्दे अंतिम संस्कार के वक्त जिंदा हो जाते हैं। लेकिन सऊदी अरब में ऐसा मामला सामने आया है जहां अंतिम संस्कार के दौरान जब मुर्दा जिंदा हो गया तो जनाजे की नमाज पढ़ने आए इमाम को दिल का दौरा पड़ गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटनास्थल पर मौजूद लोगों को इसका जरा सा भी अंदाजा नहीं था का मुर्दा अंतिम समय पर जिंदा हो जाएगा और इमाम की हार्ट अटैक से मौत हो जाएगी। घटना के बाद लोगों में हड़कंप मच गया। 

जानकारी के अनुसार यह मामला सऊदी अऱब के माराकेज की मस्जिद का है। जहां एक व्यक्ति की मौत के बाद उसके अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी। जनाजे के अंतिम संस्कार के लिए जब मौके पर इमाम पहुंचे तो मुर्दा जिंदा हो गया और उठकर बैठक गया, जिसे देखकर इमाम को हार्ट अटैक आ गया और वह मौके पर ही जमीन पर गिर गए। लाइफ इन सऊदी अरबिया नाम के एक न्यूज पोर्टल के अनुसार एक व्यक्ति की इलाज के दौरान अस्पताल में मौत हो गई थी। 

इस घटना पर यकीन करना स्थानीय लोगों के लिए इसलिए भी मुश्किल हो रहा था क्योंकि डॉक्टरों ने मरीज की मौत के बाद उसका डेथ सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया था। लेकिन व्यक्ति की मौत नहीं हुई थी और वह अंतिम संस्कार के पहले जिंदा हो गया। जानकारी के अनुसार मरीज की सांस धीमी हो गई थी और वह मरा नहीं था, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था। मरीज को जब डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया तो उसके अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी और इमाम को जनाजे की नमाज पढ़ने के लिए बुलाया गया था। 

 


डिस्कवरी चैनल के एडवेंचर शो Man Vs Wild में नजर आएंगे पीएम मोदी, टीजर जारी

डिस्कवरी चैनल के एडवेंचर शो Man Vs Wild में नजर आएंगे पीएम मोदी, टीजर जारी

29-Jul-2019

डिस्कवरी चैनल के एडवेंचर शो Man Vs Wild में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया है. इस शो को 12 अगस्त 2019 को रात 9 बजे चैनल पर प्रसारित किया जाएगा. लेकिन इस शो का टीजर सामने आया है जिसमें होस्ट बेयर ग्रिल्स के साथ मोदी एडवेंचर करते दिख रहे हैं. बेयर ग्रिल्स ने ट्वीट करके शो के बारे में जानकारी दी है. उन्होंने बताया है कि शो को 180 देशों के लोग देखेंगे. इसमें मोदी का वह रूप दिखेगा जिससे लोग अब तक अनजान रहे हैं. 

PM मोदी का Man Vs Wild अवतार, देखें जंगल में एडवेंचर की तस्वीरें

PM मोदी का Man Vs Wild अवतार, देखें जंगल में एडवेंचर की तस्वीरें

ग्रिल्स ने लिखा कि जानवरों के संरक्षण और पर्यावरण बदलाव को लेकर लोगों को जागरुक करने के मकसद से मोदी भारतीय जंगल में पहुंचे. Man Vs Wild शो काफी चर्चित है और इसमें कई जानी-मानी हस्तियां शिरकत करती रही हैं. Man Vs Wild शो पहली बार 13 साल पहले प्रसारित किया गया था. इस शो में खासतौर पर सर्वाइवल स्किल पर फोकस किया जाता है. ट्विटर पर शो का टीजर जारी होने के बाद 2 घंटे में ही इसे 2 लाख से अधिक लोगों ने देख लिया. 

 

 


आयुष्मान भारत योजना में घोटाला, 993 केंद्रों के खिलाफ प्राथमिकी

आयुष्मान भारत योजना में घोटाला, 993 केंद्रों के खिलाफ प्राथमिकी

25-Jul-2019

दिल्ली : केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना धोखाधड़ी और घोटाले की चपेट में आती हुई दिख रही है. नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक इस योजना के तहत फर्जी कार्ड बनाने वाले 993 केंद्रों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है. इनमें उत्तर प्रदेश के आगरा के 900 और पीलीभीत के तीन केंद्र हैं. वहीं, 250 से अधिक अस्पतालों को योजना के पैनल से बाहर कर दिया गया है.

अखबार ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि नेशनल हेल्थ अथॉरिटी की एंटी फ्रॉड यूनिट ने इन मामलों का पता लगाया है. बताया जाता है कि इस यूनिट के सामने ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें पुरुषों के गर्भाशय निकालने के ऑपरेशन किए गए हैं. वहीं, कई महंगी सर्जरियां केवल कागजों पर किए गए हैं. आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को हर साल पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा दिया जाता है.


मौलाना कल्बे जव्वाद के मसले को तूल ना दें। देश में और भी समस्याएं हैं। तक़वी

मौलाना कल्बे जव्वाद के मसले को तूल ना दें। देश में और भी समस्याएं हैं। तक़वी

24-Jul-2019

सैय्यद एम अली तक़वी ब्यूरो चीफ (The Revolution News) 

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक, प्रिन्ट मीडिया पर बस एक ही बात चल रही और वह है मौलाना कल्बे जव्वाद और वरिष्ठ वकील महमूद प्राचा की कांफ्रेंस। कोई किसी के खिलाफ एफआईआर लिखा रहा कोई किसी के खिलाफ। लाइसेंस दिए जाने और हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिए जाने संबंधी बातें चल रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ ज़मीर फ़रोश ऐसे हैं जो नमक मिर्च लगाकर जनता के सामने पेश करते हैं और बचा हुआ काम कुछ लोग धार्मिक चोला पहन कर धर्म और शोहरत के नाम पर पैसा कमाने के लिए चैनल्स पर आकर अपनी जिहालत का सबूत देते हैं।

 हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा ने लखनऊ में वरिष्ठ शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद से मुलाकात की। इसके बाद दोनों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एससी/एसटी और अल्पसंख्यकों को हथियार खरीदने के लिए लाइसेंस देने की वकालत की। इसके लिए बाकायदा लखनऊ में 26 जुलाई को एक कैंप भी लगाया जाएगा, जिसमें लोगों को हथियार खरीदने के तरीके के बारे में जानकारी दी जाएगी। हालांकि मौलाना कल्बे जव्वाद ने सफाई दी है कि 26 तारीख को जो कैंप लगेगा उसमें लोगों के हथियार चलाने की कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी। बाद में कैंप स्थगित कर दिया गया।

जब देश में हथियारों की दुकानें सजी हैं तो हथियार खरीदने के तरीके के बारे में जानकारी देना कहां ग़लत है? पूरी दुनिया में हथियारों के खरीद की होड़ मची है। मिज़ाइल पर मिज़ाइल बन रहे खरीदे बेचे जा रहे हैं। क्यों?


अल्पसंख्यकों और दलितों को शस्त्र लाइसेंस दिए जाने के बयान का अयोध्या के संत समाज ने कड़ा विरोध किया है। संत समाज ने इसे देश-विरोध मानसिकता करार दिया है और कहा है कि किसी एक व्यक्ति की गलती से पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा करना देश विरोधी है। न्यूज 18 की एक खबर के अनुसार, तपस्वी छावनी के महंत परमहंस दास का इस मुद्दे पर कहना है कि “मॉब लिंचिंग की घटना पर दोषी को फांसी की सजा होनी चाहिए, ताकि एक कड़ा संदेश समाज में जाए। उन्होंने कहा कि गोधरा के बाद किसी भी हिंदू संगठन ने नहीं कहा कि सभी हिंदू हथियार रखें, क्योंकि देश में अखंडता और एकता की जरुरत है, कुछ लोग हिंदुस्तान का माहौल खराब करना चाहते हैं।

महंत परमहंस दास ने कहा कि ‘इस तरह का बयान देने वाले देश को संघर्ष की आग में जलाना चाहते हैं। कुछ लोगों की गलती की वजह से सभी को दोषी नहीं कहा जा सकता। देश को फिर बांटने की तैयारी की जा रही है। इसे कामयाब नहीं होने देंगे।’ महंत का बयान बिल्कुल सही है जो माबलिंचिंग का दोषी हो उसे फांसी की सज़ा सुनाई जाये। यह भी सही है कि किसी विशेष समाज को हथियार रखने की जरूरत नहीं है। गोधरा के बाद किसी संगठन ने हथियार रखने की बात नहीं कही यह भी सही है। मगर कुछ सवाल हैं जिसका जवाब कौन देगा? 

1992 में अयोध्या में कारसेवकों के पास हथियार या औजार कहां से आया जो इतनी बड़ी मस्जिद जमींदोज कर दी गई? गुजरात में 2002 में लगभग 790 मुसलमानों एवं 254 हिन्दुओं की बेरहमी से हत्या की गई या ज़िन्दा जला दिया गया। हथियार कहां से आया?  आर एस एस के ट्रेनिंग कैंप में जो फूलों की बारिश करना सिखाया जाता है उसके लिए इतने फूल कहां से आते हैं? अगर बजरंग दल यह कहता है कि राजस्थान में हम मुसलमानो को रहने नहीं देंगे। तो यह किस दम पर कह रहे? सवाल बहुत हैं लेकिन यह सवाल जवाब का सिलसिला देश के लिए लाभदायक नहीं है। हमें आगे देखने की जरूरत है। हमारे देश की राजनीति बहुत गंदी और निचले स्तर की हो गई है आज हमें अपने देश को मोहब्बत और इंसानियत के चश्मे से देखने की जरूरत है।

हम हर चीज़ को हिंदू मुस्लिम के हिसाब से देखते हैं। माबलिंचिंग करने वाला, मुस्लिमों को भारत से बाहर निकालने का बयान देने वाला, हिंदू मुस्लिम करने वाला, या किसी भी तरह से सौहार्द खराब करने की कोशिश करने वाला हिंदू या मुस्लिम है ही नहीं। यह सब शैतान और रावण के पुजारी हैं। हमको चाहिए कि हम सब हिंदू मुस्लिम मिलकर ऐसे लोगों के खिलाफ खड़े हो जाएं तो किसी की मजाल नहीं जो देश का माहौल खराब कर सकें।
जय हिन्द।

( प्रस्तुत लेख लेखक के निजी विचार हैं ) 


RTI संशोधन बिल लोकसभा में पास, विपक्ष क्यों है खिलाफ, जाने क्या बदला

RTI संशोधन बिल लोकसभा में पास, विपक्ष क्यों है खिलाफ, जाने क्या बदला

23-Jul-2019

नई दिल्ली: मोदी सरकार सूचना के अधिकार कानून में संशोधन के लिए बिल संसद में लेकर आई, जिसे लोकसभा से पास भी करा लिया गया. सरकार का कहना है कि बिल में जो संशोधन प्रस्तावित है, उससे आरटीआई कानून और सशक्त होगा और लोगों के लिए और ज्यादा मददगार साबित होगा. लेकिन बिल को लेकर मोदी सरकार को विपक्ष और आरटीआई कार्यकर्ताओं का विरोध झेलना पड़ रहा है. केंद्र सरकार का कहना है कि पहले मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की सेवा की शर्तें चुनाव आयुक्तों के समान ही होती थी, लेकिन इस संशोधन के बाद यह शर्तें बदल जाएंगी. सरकार की दलील है कि क्योंकि चुनाव आयोग एक वैधानिक संस्था है जबकि सूचना आयोग एक कानूनी संस्था. लिहाजा दोनों के काम करने के तरीके में अंतर है.

वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस बिल के जरिए सूचना के अधिकार कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रही है. इसके साथ ही राज्य के अधिकार भी छीनने की कोशिश कर रही है. ऐसे में मोदी सरकार के लिए राज्यसभा से इस बिल को पास करवाना एक बड़ी चुनौती होगा. क्योंकि आज की तारीख में मोदी सरकार के पास राज्यसभा में वह संख्या बल मौजूद नहीं है, जिसके भरोसे लोकसभा से ये बिल विपक्ष की आपत्ति के बावजूद पास हो गया.

दोनों धाराओं में संशोधन का प्रस्ताव यह है कि अब सबकुछ केंद्र सरकार के हाथों में होगा. ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि आखिर संशोधन के बाद इसमें क्या बदलाव हुए हैं.

सेवा की शर्त

2005 एक्ट के मुताबिक केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 साल (या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो) के लिए निर्धारित किया गया था. संशोधन के बाद अब यह फैसला केंद्र सरकार के हाथों में होगा.

सेवा के दौरान सैलरी

2005 एक्ट के मुताबिक सूचना आयुक्तों और मुख्य सूचना आयुक्तों की सैलरी चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्तों के लगभग बराबर था. नए संशोधन के बाद अब सैलरी, भत्ता और अन्य सभी शर्तों को लेकर केंद्र सरकार फैसला लेगी.

सेवा के दौरान कटौती

2005 एक्ट के मुताबिक अगर किसी की नियुक्ति सूचना आयुक्त या मुख्य सूचना आयुक्त के तौर पर होती है और वह व्यक्ति सरकारी नौकरी के तहत पेंशन या भत्ता पा रहा है तो उसकी सैलरी से उतने पैसे की कटौती कर ली जाती है. नए नियम के मुताबिक अब इस बात का फैसला केंद्र सरकार के हाथों में आ गया है.

अगर हम उदाहरण के तौर पर समझें तो सूचना आयुक्त की सैलरी अगर 1 लाख रुपये होता है और वह पहले से 25 हजार रूपये पेंशन और भत्ता पा रहा है. उस हालत में सरकार सूचना आयुक्त के खाते में 1 लाख 25 हजार रूपये नहीं देगी. पेशन और भत्ता पाने की स्थिति में भी सरकार पेंशन और भत्ते के पैसे को काट कर देती है. यानि आपको हर हाल में 1 लाख रूपये से ज्यादा नहीं मिलेंगे.

करीब 14 साल पहले यानी अक्तूबर 2005 में देश को एक नया कानून मिला था. इस कानून को "सूचना का अधिकार" यानी आरटीआई कानून के नाम से जाना जाता है. इसके तहत किसी भी नागरिक को सरकार के किसी भी काम या फैसले के बारे में सूचना लेने का अधिकार मिला हुआ है. एक अनुमान के मुताबिक, देशभर में हर साल करीब 60 लाख आरटीआई दायर होते हैं. जिसके जरिए लोगों को वह जानकारियां हासिल हो पाती है, जो अमूमन इस कानून के बनने से पहले तक नहीं मिल पाती थी. इसी वजह से आरटीआई को आम जनता के हाथ में एक अचूक हथियार के तौर पर देखा जाता है.

 


भारत के लिए जॉब या मॉब?

भारत के लिए जॉब या मॉब?

21-Jul-2019

नई दिल्ली: सामाजिक स्थलों को फिर से विकसित करने का प्रयास चल रहा है। नागरिकता के नियमों को फिर से लिखा जा रहा है, जबकि नागरिक-राज्य संबंधों की धारणा प्रमुख फरमानों के अनुसार बदल रही है। पसंद का हथियार: एक मॉब। यह एक चतुर उपकरण के रूप में योग्य है। यह नतीजों के किसी भी डर के बिना प्रमुख उद्देश्य को पूरा करता है क्योंकि यह न केवल कई लोगों के बीच अपराध को वितरित करके अपराध का अनावरण करता है, यह एक सामूहिक कार्रवाई है जिसमें हमलावर, दर्शक और पुलिस शामिल हैं।

इस प्रकार, यह भीड़तंत्र प्रमुख प्रवृत्ति रहा है। सजा के डर से उन्मादी भीड़ ने हिंसा के कई साधनों का इस्तेमाल किया है, अल्पसंख्यकों और हाशिए पर पड़े समुदायों को डराने-धमकाने और उत्पीड़ित करने के लिए – दादरी में मोहम्मद अख़लाक़, पिहलू खान, ऊना में चार दलित युवक, झारखंड में तबरेज़ अंसारी और त्रिपुरा में बुधि कुमार। पैटर्न स्पष्ट है – हर एक व्यापक दिन के उजाले में घात लगाकर हमला करता है, यहां तक ​​कि पुलिस या तो मूकदर्शक के रूप में खड़ी रहती है और इसके बाद सोशल मीडिया पर भव्यता और छाती पीटती है।

यह स्पष्ट है कि भीड़ का इरादा केवल अपने पीड़ितों को जय श्री राम और जय हनुमान को “भीड़-बिंदु” पर जप करने के लिए मजबूर करना नहीं है। यह वास्तव में एक चेतावनी के रूप में सेवा करने के लिए है – पहले जो अलग-थलग घटनाओं के रूप में हुआ था, अब खुले तौर पर बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। किसी ने एक तस्कर, राष्ट्र-विरोधी, चोर, बाहरी व्यक्ति समझा; बस एक “अड़चन” अब भीड़ की दया पर है, जो न तो प्रतिशोध और न ही दोषसिद्धि के डर के साथ पूरी तरह से न्याय के साथ न्याय करता है। एक विशिष्ट पैटर्न लगभग हर ऐसे मामले में देखा जा सकता है जहां अपराध को वास्तविक अपराधी की तुलना में पीड़ित के लिए अधिक तत्परता से जिम्मेदार ठहराया जाता है।
अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनादेश पिछली बार के मुकाबले बड़ा है, उनके कई समर्थक यह देखते हैं कि उनकी हिंसक और गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम देना उतना ही मंजूर है। बड़े और छोटे अपराध करने वालों के बीच एक व्यापक विश्वास है, अनुचित नहीं है, जो उन्हें अपने अपराधों के लिए भुगतान नहीं करना होगा। वास्तव में, वे अब संसद में अधिक से अधिक सुरक्षा जाल का आनंद ले रहे हैं।

यदि आप बीजेपी के कारण, जो भी नैतिक लागत है, एक आसानी से कानून से बच सकते हैं। दादरी लिंचिंग मामले के आरोपियों ने यूपी के सीएम की रैली में फ्रंट रो सीट का आनंद लिया; बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय, जिन्होंने एक नागरिक अधिकारी की पिटाई की थी, जेल से रिहा होने पर एक नायक की तरह स्वागत किया गया था। कुछ दोषियों को (मंत्रियों द्वारा) माला पहनाई गई, कुछ को शहीद का दर्जा दिया गया, कुछ को चुनाव के लिए टिकट दिया गया। बीजेपी ने लगातार अपने पीड़ितों के बजाय अपराधियों के साथ चुना है।

निस्संदेह, कांग्रेस के अंत के साथ-साथ, महाराष्ट्र में विधायक नितेश राणे और कंपनी द्वारा प्रदर्शित अक्षम्य व्यवहार के जवाब में, प्रचलित प्रवृत्ति की एक और अभिव्यक्ति के कारण कार्रवाई की जा रही है। केंद्र और राज्य सरकारें कानून के शासन को बनाए रखने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी में लगातार विफल रही हैं। पिछले साल, यूपी के बुलंदशहर में, पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह 20 साल के एक व्यक्ति के साथ मारे गए थे जब एक हिंसक भीड़ पुलिस के साथ भिड़ गई थी। जब गोहत्या के बारे में अफवाहें उठती हैं, तो कानून का एक अधिकारी भी सुरक्षित नहीं होता है।

प्रारंभ में, कानून को कमजोर करने वाले इन कार्यों को गाय की सतर्कता की आड़ में अंजाम दिया गया, लेकिन नकाब उतारना शुरू हो रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर उग्रवादी आक्रामकता, अभद्र भाषा और हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है। वास्तव में, हमारे समाज के कुछ वर्गों को राजनीतिक और सामाजिक बहिष्कार में बदलने के लिए एक ठोस कदम है जो कि ज़बरदस्ती, अलगाव और भीड़ न्याय द्वारा होता है। हमने “लव जिहाद” और “घर वाप्सी” के आविष्कारशील आरोपों को भी देखा है जो विशेष समुदायों को लक्षित और अलग-थलग करने के लिए धूम्रपान करने वालों के रूप में है।

इस अराजकवादी आग में ईंधन जोड़ते हुए, सत्ताधारी पार्टी के सांसद स्पष्ट राजनीतिक मकसद के साथ शपथ ग्रहण समारोह के दौरान धार्मिक नारेबाजी में लगे रहे। वे न केवल अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों को एक संकेत भेजना चाहते हैं, बल्कि अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को भी टक्कर देने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही साथ साथी सांसदों की प्रतिक्रिया भी ट्रिगर कर रहे हैं जो समान रूप से निंदनीय है। और समानताएं याद करना मुश्किल है – संसद के अंदर अपने सहयोगियों को चकमा देने वाले लोग सड़कों पर अपने लेफ्टिनेंट के रूप में सटीक भाषा और मोडस ऑपरेंडी का उपयोग कर रहे हैं।

भारतीय लोकतंत्र की मौत की गुत्थी 1947 में कई बुद्धिमान लोगों ने सुनी थी; मतभेदों के साथ हमारे देश की तरह एक देश असफल होने के लिए बाध्य था। फिर भी, यह हमारे संस्थापक पिताओं की कल्पना और शिथिलता थी जिन्होंने सफलतापूर्वक भारतीय होने का एक बहुलवादी लेकिन एकजुट विचार को बढ़ावा दिया, जिसने दिन को बचा लिया। यह एक विचार है जो हमारे दृष्टिकोण और कानून की धर्मनिरपेक्ष नींव के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है जो बीजेपी और उसके नेताओं द्वारा चैंपियन बनाए गए कट्टरता के परिणामस्वरूप निरंतर कमज़ोर, समझौता और मिट गया है।

– ज्योतिरादित्य एम सिंधिया

सिआसत हिंदी से साभार 


सोनभद्र नरसंहार : मारे गए लोगों के परिवारों को 10-10 लाख देगी कांग्रेस पार्टी

सोनभद्र नरसंहार : मारे गए लोगों के परिवारों को 10-10 लाख देगी कांग्रेस पार्टी

20-Jul-2019

मिर्जापुर। सोनभद्र नरसंहार के पीड़ित परिजन शनिवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मिलने के लिए चुनार गेस्ट हाउस पहुंचे तो प्रियंका गांधी भावुक हो गईं। उन्होंने महिलाओं से बातचीत की। इस दौरान पीड़ित परिवार की महिलाएं अपना दर्द बयां करते हुए रोने लगी। प्रियंका ने पीड़ितों के आंसू पोंछते हुए उन्हें लगे से लगा लिया और उनकी हिम्मत बढ़ाई। प्रियंका गांधी ने कहा, 'कांग्रेस पार्टी सोनभद्र नरसंहार में मारे गए व्यक्तियों के परिजनों को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देगी।' 

सोनभद्र नरसंहार के पीड़ितों से मिलने को लेकर अड़ी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को प्रशासन ने सोनभद्र जाने की इजाजत नहीं दी। जिला प्रशासन और पुलिस ने प्रियंका गांधी को सोनभद्र जाते वक्त 25 किलोमीटर पहले नारायण पुलिस चौकी पर रोका लिया था और हिरासत में लेकर मिर्जापुर स्थित चुनार गेस्ट हाउस रखा था। बता दें कि शनिवार की सुबह 15 पीड़ित परिवार कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मिलने के लिए चुनार स्थित गेस्ट हाउस पहुंचे। इस दौरान पीड़ित महिलाओं से मिलकर प्रियंका गांधी काफी भावुक हो गईं। उन्होंने महिलाओं के गले मिलकर ढांढस बंधाया। 

पीड़ितों से मुलाकात के बाद प्रियंका गांधी ने कहा, 'मैं उनसे (सोनभद्र के पीड़ितों से) मिलीं और उनका हाल-चाल लिया। यहां आने का मेरा मकसद पूरा हो गया। कांग्रेस इस घटना में मारे गए लोगों के परिवार को 10-10 लाख की सहायता देगी। इसके बाद प्रियंका गांधी मिर्जापुर से लौट आईं। 


पुलिस के रजिस्टर्ड वाहन का टिक टॉक वीडियो बनाते समय किया इस्तेमाल, विवादों में घिरा तेलंगाना के गृह मंत्री का पोता

पुलिस के रजिस्टर्ड वाहन का टिक टॉक वीडियो बनाते समय किया इस्तेमाल, विवादों में घिरा तेलंगाना के गृह मंत्री का पोता

19-Jul-2019

मीडिया रिपोर्ट 

तेलंगाना के गृह मंत्री मोहम्मद महमूद अली का पोता मोबाइल ऐप ‘टिक टॉक’ पर उस वीडियो के वायरल होने के बाद विवादों में घिर गया है जिसमें स्पष्ट रूप से वह एक पुलिस वाहन पर बैठा दिख रहा है। गृह मंत्री के पोते फुरकान अहमद एक वीडियो में एक अन्य व्यक्ति के साथ पुलिस वाहन के बोनट पर बैठे दिख रहे हैं। अहमद के साथ बैठा अन्य व्यक्ति अचानक नीचे उतरता है और एक फिल्म के डॉयलाग पर होंठ हिलाता है और कथित रूप से आईजी रैंक के एक अधिकारी को ‘‘धमकाता’’ है।

इस वीडियो क्लिप को लेकर अली ने कहा कि वे यहां यकतपुर में दो दिन पहले एक समारोह में गए थे जहां एक स्थानीय व्यक्ति ने यह वीडियो बनाया। मंत्री ने समाचार एजेंसी ‘पीटीआई भाषा’ से कहा, ‘मेरा पोता केवल वाहन के ऊपर बैठा था और किसी स्थानीय व्यक्ति ने यह वीडियो बनाया… हम इसकी जांच करेंगे।’

उन्होंने कहा कि उनके पोते का इससे कोई लेना देना नहीं है। पुलिस सूत्रों ने बताया कि पुलिस के सभी वाहन डीजीपी के नाम के तहत पंजीकृत हैं और यह वाहन गृह मंत्री को आवंटित था। उन्होंने कहा, ‘यातायात का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।’  

 


सोनभद्र में जमीन विवाद में 9 लोगों की हत्या, 3 महिलाएं भी शामिल, 25 जख्मी

सोनभद्र में जमीन विवाद में 9 लोगों की हत्या, 3 महिलाएं भी शामिल, 25 जख्मी

17-Jul-2019

सोनभद्र। सोनभद्र जिले के घोरावल थाना क्षेत्र में बुधवार की शाम जमीनी विवाद में दो पक्षों में खूनी संघर्ष हो गया। ताबड़तोड़ फायरिंग में दोनों पक्ष से 9 लोगों की मौत हो गई और 25 लोग घायल हो गए। खूनी संघर्ष की सूचना मिलते ही घोरावल समेत आसपास के अन्य थानों की फोर्स मौके पर पहुंची। पुलिस ने मारपीट कर रहे लोगों को रोकने की कोशिश की। 

घोरावल थाना क्षेत्र के उभा गांव में दो पक्षों में कई सालों से जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। बुधवार की शाम को एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के लोगों की पिटाई कर दी। इतने में आक्रोशित दूसरे पक्ष के लोगों ने फायरिंग करनी शुरू कर दी। फायरिंग होता देख दूसरे पक्ष के लोगों ने भी हथियार निकाल कर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू की, जिसमें दोनों पक्षों के 9 लोगों की मौत हो गई और 25 लोग घायल हो गए। 

अंधाधुंध फायरिंग से 9 लोगों की मौत और घायलों की सूचना मिलते ही घोरावल थाना क्षेत्र समेत अन्य थाना क्षेत्रों की पुलिस मौके पर पहुंच गई। एसपी सलमान ताज पाटिल मौके पर पहुंचकर संघर्ष को रोकने में लगे रहे। मृतकों में रामचन्द्र पुत्र लालशाह, राजेश गौड़ पुत्र गोविंद, अशोक पुत्र ननकू रामधारी पुत्र हीरा साह, 45 वर्षीय अज्ञात महिला पत्नी नंदलाल, दुर्गावती पत्नी रंगीलाल, राम सुंदर पुत्र तेज सिंह, जवाहिर पुत्र जयकरण सुखवंत पुत्री रामनाथ हैं। 


आरटीई के तहत दाखिला पाने की मांग वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया खारिज, याचिकाकर्ता से कहा -

आरटीई के तहत दाखिला पाने की मांग वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया खारिज, याचिकाकर्ता से कहा -

16-Jul-2019

बाॅम्बे हाईकोर्ट ने पिछले दिनों फर्जी याचिकाएं/जनहित याचिकाओं के खिलाफ कठोर कदम उठाते हुए एक सपन श्रीवास्तव की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। सपन ने मांग की थी कि उसके बेटे को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत दाखिला दिया जाए। सपन,जिसने खुद माना कि वह अब तक हाईकोर्ट के समक्ष 25 याचिकाएं दायर कर चुका है,जबकि उसने खुद को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंधित बताने का दावा किया। जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस एन.एम जामदार की पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि शुरूआत से अब तक कितनी याचिकाएं दायर कर चुका है।

जिस पर याचिकाकर्ता ने बताया कि उसे एकदम सही से संख्या तो नहीं पता,परंतु ''25 से कम तो नहीं होगी''। याचिका में सपन ने दावा किया था कि वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से संबंध रखता है क्योंकि उसकी वार्षिक आय एक लाख रूपए से भी कम है।

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दलील दी गई कि सपन का बेटा निजी स्कूल में उस 25 प्रतिशत के कोटे के तहत दाखिला पाने का हकदार है,जो उन माता-पिताओं के बच्चों के लिए बनाया गया है,जिनकी वार्षिक आय एक लाख रूपए से कम है। पीठ इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई और कहा कि- '' ऐसा नहीं हो सकता है कि याचिकाकर्ता के पास सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने और 25 जनहित याचिकाओं दायर करने के लिए धन का भुगतान करने के साधन है और दूसरी तरफ समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से होने का दावा करता है। यह भी देखा गया है कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई सभी जनहित याचिकाओं के दौरान,कोर्ट के नियमों के तहत उसने शपथ लेते हुए बताया था कि सभी जनहित याचिकाओं को दायर करने और केस लड़ने का खर्च उसने खुद वहन किया है।

जो उसने अपने आय से स्रोत से दिया है। ऐसे में हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता की आय को एक लाख रूपए वार्षिक से कम नहीं माना जा सकता है,यह गलत है। इसलिए याचिकाकर्ता के बेटे को किसी निजी स्कूल में उस 25 प्रतिशत कोटे के तहत दाखिला नहीं दिया जा सकता है,जो उन माता-पिता के बच्चों के लिए बनाया गया है,जिनकी वार्षिक आय एक लाख रुपए से कम है। ऐसे में याचिका को खारिज किया जाता है।'' 

साभार : livelaw से 


शिरडी में कई भक्तों का दावा- साक्षात दिखे मुस्कुराते हुए साईं बाबा

शिरडी में कई भक्तों का दावा- साक्षात दिखे मुस्कुराते हुए साईं बाबा

13-Jul-2019

नई दिल्ली। शिरडी के साईं बाबा की प्रसिद्धि देश के कोने-कोने तक है। अलग-अलग राज्यों से हर रोज हजारों की संख्या में श्रद्धालु शिरडी के साईं बाबा के दर्शनों के लिए आते हैं। मान्यता है कि साईं बाबा के दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता और यहां सभी की मुरादें पूरी होती हैं। अब शिरडी के साईं धाम में भक्तों ने एक और चमत्कार देखा है। खबर है कि शिरडी में साईं बाबा की एक दिव्य तस्वीर द्वारकामाई मंदिर की दीवार पर दिखाई दी है। यह दीवार साईं बाबा की कब्र के बेहद नजदीक स्थित है। साईं बाबा के दर्शनों के लिए पहुंचे कई श्रद्धालुओं ने दीवार पर उनकी दिव्य तस्वीर देखे जाने का दावा किया है। 

जानकारी के मुताबिक, गुरुवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु साईं बाबा के दर्शनों के लिए शिरडी धाम पहुंचे थे। इस दौरान रात करीब 11:30 बजे जैसे ही आरती शुरू हुई, श्रद्धालुओं को द्वारकामाई मंदिर की दीवार पर साईं बाबा की दिव्य आकृति दिखाई दी। आरती में मौजूद कई श्रद्धालुओं ने साईं बाबा की तस्वीर देखे जाने का दावा किया। साईं बाबा की आकृति देखकर श्रद्धालुओं ने उनके जयकारे लगाने शुरू कर दिए। इस दौरान कुछ श्रद्धालु भावुक होकर वहीं बैठ गए। 

दीवार पर साईं बाबा की तस्वीर दिखने की खबर जैसे ही फैली, लोग द्वारकामाई मंदिर की तरफ दौड़ने लगे। भक्तों ने दावा किया कि दीवार पर साईं बाबा की मुस्कुराती हुई छवि थी, जो कुछ समय के लिए दिखाई दी। श्रद्धालुओं का दावा है कि साईं बाबा की दिव्य आकृति उस दीवार पर दिखाई दी, जहां वो बैठकर अपने अनुयायियों को प्रवचन दिया करते थे। आपको बता दें कि यह दूसरी बार है जब साईं बाबा के भक्तों ने उनकी आकृति को द्वारकामाई की दीवार पर देखने का दावा किया है। 

प्रसिद्ध द्वारकामाई मंदिर को बुधवार रात से ही दर्शनों के लिए खोला गया था, जिसके बाद हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने यहां दर्शन किए। यहां हर साल बड़ी संख्या में लोग दर्शनों के लिए आते हैं। इस घटना के बाद कई साईं भक्तों का कहना है कि बाबा खुद उन्हें दर्शन देने के लिए मंदिर में आए थे। दिल्ली से दर्शनों के लिए शिरडी पहुंचे एक भक्त ने दावा किया कि वह उस वक्त वहां मौजूद था, जब दीवार पर साईं बाबा की तस्वीर दिखाई दी। शिरडी के द्वारकामाई मंदिर की दीवार पर साईं बाबा की तस्वीर दिखाई देने की खबर सोशल मीडिया पर काफी शेयर की जा रही है। 

इससे पहले 12 जुलाई को साईं बाबा की छवि दिखने की बात सामने आई थी। दिलचस्प बात यह है कि दोनों घटनाएं यहां साईं बाबा मेमोरियल के 100 साल पूरे होने के उत्सव से कुछ दिन पहले ही घटित हुई हैं। आपको बता दें कि महाराष्ट्र में शिरडी साईं बाबा मंदिर, तिरुपति बाला जी मंदिर के बाद देश का दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से 296 किलोमीटर की दूरी पर स्थित साईं मंदिर में हर साल लाखों की संख्या में भक्त दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। साईं बाबा को लेकर आज भी कई सवाल रहस्य बने हुए हैं। 

साभार : hindi.oneindia


जातिवादियों और समाजवादियों को अपनी जड़ों की ओर लौटने की मजबूरी

जातिवादियों और समाजवादियों को अपनी जड़ों की ओर लौटने की मजबूरी

11-Jul-2019

 कृष्ण देव सिंह (कें डी सिंह, बुधवार समाचार पत्रिका )

भारत में सक्रिय समाजवादी और जातिवादी पृष्ठभूमि वाले राजनीतिक दल इन दिनों चौराहे पर खड़ा हैं। उन्हें समझ में नही आ रहा है कि आखिर अब वे किधर जाएं ? कुछ नेता कह रहे हैं कि हम जनता के बीच जाएंगे। पर, क्या लेकर उसके पास जाएंगे ? यह प्रश्न है  जब कुछ देने के लिए आपके पास सरकार थीं तो जिसको जो कुछ दिया या नहीं दिया,उसका परिणाम तो लोकसभा चुनाव में मिल गया। दरअसल जब वे सत्ता में होते हैं तो उनके पास देने के लिए एक सरकार होती है। उस समय जब वे अंधे की रेवड़ी की तरह अपनों को ही बांटने में लगे रहे तो अब उनके पास व्यापक जनता का विश्वास पाने के क्या उपाय हैं ? अब तो उस  स्थिति पर उनको विचार करना होगा कि वे व्यापक जनता से सिमट कर सीमित वोट बैंक तक क्यों सिमट गए।यदि ऐसा ही बना रहा तो देर -सवेर वही हाल होगा जो हाल की चुनाव कुछ राजनीतिक दलों का इस देश में हो चुका है।  इन वर्षो में कई दल समय के साथ विलुप्त हो गए।

बड़ा सवाल है कि क्या उनकी मौजूदा कार्य नीति-रणनीति के सहारे उनके पुराने दिन लौट सकते हैं ? लगता तो नहीं है। अब उनको यानी समाजवादी जिन्हे जातिवादी व पारिवारवादी धारा भी कहते  हैं, के दलों को राजग खासकर भाजपा से मुकाबला कर उससे वह वोट छीनना है, इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी शैली बदलें। समाजवादी धारा की राजनीति और उसके भटकाव  को पहले समझना होगा। स्वात्रंत्तोतर समाजवादी राजनीति को तीन कालावधियों में बांटा जा सकता है। आजादी के तत्काल बाद की समाजवादी राजनीति मुख्यतः आचार्य नरेंद्र देव ,जय प्रकाश नारायण डा.राम मनोहर लोहिया की आदर्शवादी राजनीति थीआजादी के बाद उसी अवधि में समाजवादी कार्यकर्ताओं का सबसे अधिक निर्माण हुआ।

1967 में डा.लोहिया के निधन के बाद राज नारायण,कर्पूरी ठाकुर और मधु लिमये की कालावधि की समाजवादी राजनीति रही। इस अवधि में समाजवादियों में कर्म व  नैतिकता की कसावट आचार्य नरेंद्र देव-जेपी-लोहिया युग जैसी तो नहीं रही,पर सत्ताधारी कांग्रेसियों से वे साफ-साफ अलग नजर आते थे। पर कर्पूरी ठाकुर के 1988 में निधन के बाद बिहार में समाजवादी राजनीति की शैली ही पूरी तरह बदल गई।उत्तर प्रदेश में राजनारायण के बाद मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी राजनीति की कमान संभाल ली।मुलायम-लालू की राजनीति कमोवेश एक समान रही है।

1990 का मंडल आरक्षण का जमाना था।मंदिर आंदोलन भी उसी दौरान चला।वह भावनाओं का भी दौर था। आरक्षण विरोधियों के आंदोलन का बिहार में मुख्य मंत्री के रूप में लालू प्रसाद ने बहादुरी से मुकाबला किया । वह सामाजिक न्याय का आंदोलन था जिसमें सफलता का लाभ लालू प्रसाद को सबसे अधिक मिला।इससे लालू प्रसाद गैर कुर्मी  पिछड़ों के बीच  लोकप्रिय हो गए।मुलायम सिंह यादव को भी उस दौर का लाभ मिला हलांकि मुलायम को सामाजिक न्याय के लिये कभी सघर्ष करते हुए नही देखे गये।लालू प्रसाद की सरकार ने लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को  रोका और उन्हें समस्ती पुर में गिरफ्तार करवाया । इसका लाभ भी  मिला।1991 के लोक सभा चुनाव और 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले दल को भारी सफलता मिली  पर उसी सफलता के साथ भटकाव भी शुरू हो गया।समय के साथ भटकाव बढ़ता ही चला गया।यादव और मुस्लिम मतदाता तो फिर भी लालू प्रसाद के साथ बने रहे,पर अन्य वोटर धीरे-धीरे  कटने लगे।

 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव के समय तो जदयू से चुनावी तालमेल का लाभ राजद को बिहार में मिल गया,पर इस बार उसकी अनुपस्थिति में लोक सभा चुनाव में राजद जीरो पर आउट हो गया। इन विषम राजनीतिक परिस्थितियों से समाजवादी धारा वाले इस दल को कठिन मार्ग से गुजर कर अपने लिए रास्ता बनाना है।देखना है कि वह उसे कैसे पार करती है। पर बिहार आंदोलनों की भूमि रहा है।अब तो  रास्ता जन आंदोलन का ही बचा है। आंदोलन के जरिए ही जनता से जुड़ने का विकल्प बचता  है। हलाकिं राजद के पास एक ही बड़ी पूंजी है।वह है 1990 में मंडल आरक्षण के बचाव में किया गया जोरदार आंदोलन।

बालाकोट अभियान के अलावा राजग सरकार ने अपने विकास व कल्याण के कामों के जरिए भी मतदाताओं को अपनी ओर खींचा है।अपवादों को छोड़ दें तो ऐसे सम्यक विकास कार्यों से समाजवादी धारा की राजनीति को कम ही मतलब रहा है।राजग शासन काल में बिजलीकरण का भारी विस्तार हुआ है।यह सब राजग को  अन्य दलों से अलग करता है। फिर भी राजद तथा अन्य गैर राजग दलों के लिए जनता से जुड़ने की राह बाकी  है। राजग की सरकार के कार्यकाल में  लोगों के  बैंक खातों में सीधे सरकारी मद के पैसे जा रहे हैं।पर इसमें भी कमीशनखोरी की खबरें आती रहती हैं।अन्य सरकारी योजनाओं में भी बिचैलिए हावी  हैं।उसमें संबंधित सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत है।थानों और अंचल कार्यालयों में शायद ही कोई काम पैसों के बिना हो रहा है।

साठ-सत्तर के दशक में  सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट दलों  के कार्यकर्त्तागण सरकारी लूट और अत्याचारों के खिलाफ आंदोलन करते थे।जेल जाते थे। परचे छपवा कर बांटते थे।जिला-जिला धरना देते थे।अन्य तरह से भी लोगों की मदद में शामिल रहते थे। सोशलिस्ट कार्यकर्त्ताअपने इलाकों के भूमिहीन लोगों को अंचल कार्यालय से बासगीत का परचा दिलवाता था। बिना किसी रिश्वत के। तब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी इस बात का ध्याान नहीं रखती थी कि यह तो सरकार का काम है,हम क्यों करें ? पर आज कुछ राजनीतिक कार्यकर्त्ता यह कह सकते हैं कि सरकार अपने कामों में विफल होगी तो उसका  चुनावी लाभ खुद ब खुद हमें मिल ही जाएगा। पर यह आलसी कार्यकर्त्ताओं का तर्क है।  दरअसल समाजवादी पृष्ठभूमि वाले दलों को अपने बीच से निःस्वार्थी व कर्मठ कार्यकत्र्ताओं की जमात तैयार करनी होगी। आज की पंच सितारा संस्कृति वाली राजनीति में यह काम कठिन है,पर असंभव भी नहीं।उन्हें स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाना होगा। 


अगर डाक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती तो सुप्रीम कोर्ट दिलाएगा मुआवजा

अगर डाक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती तो सुप्रीम कोर्ट दिलाएगा मुआवजा

08-Jul-2019

नई दिल्ली : अगर डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत हो जाती है या फिर उसको गंभीर समस्या पैदा हो जाती है, तो आपको डॉक्टर से लड़ने की जरूरत नहीं। ऐसे डॉक्टरों को कानून के दायरे में रहकर सबक सिखाया जा सकता है। आप डॉक्टर, हॉस्पिटल, नर्सिंग होम और हेल्थ सेंटर के खिलाफ केस कर सकते हैं।

जी हां, ऐसा ही एक मामला था बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा। सुप्रीम कोर्ट ने बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा के मामले में फैसला सुनाते हुए कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल के डॉक्टरों को इलाज में लापरवाही का दोषी ठहराया था। साथ ही पीड़ित कुणाल साहा को 6 करोड़ 8 लाख रुपये का मुआवजा 6 फीसदी सालाना की ब्याज दर से देने का आदेश दिया था।

अगर आप आपराधिक (क्रिमिनल) केस करते हैं, तो डॉक्टर को जेल हो सकती है। यदि आप दीवानी (सिविल) केस करते हैं, तो कोर्ट आपको मोटा मुआवजा दिला सकता है। ऐसे मामले में कोर्ट पीड़ित पक्ष को ज्यादा से ज्यादा मुआवजा दिलाने की कोशिश करता है, ताकि डॉक्टरों के अंदर अपनी ड्यूटी के प्रति लापरवाही बरतने पर डर पैदा हो सके।

बलराम प्रसाद बनाम कुणाल साहा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ऐतिहासिक फैसला सुना चुका है। इसमें शीर्ष अदालत ने पीड़ित कुणाल साहा को 6 करोड़ रुपये 8 लाख रुपये का मुआवजा दिला चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुणाल साहा की पत्नी अनुराधा साहा के इलाज में डॉक्टरों ने लापरवाही बरती, जिसके चलते उनकी मौत हो गई। लिहाजा इलाज में लापरवाही बरतने के लिए कोलकाता स्थित एएमआरआई हॉस्पिटल 6 फीसदी ब्याज के साथ 6 करोड़ रुपये 8 लाख रुपये का मुआवजा पीड़ित कुणाल साहा को दे।

यह कहता है कानून?

अगर आप इलाज में लापरवाही बरतने के लिए डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल केस करना चाहते हैं, तो भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 304-A, 337 और 338 के तहत प्रावधान किया गया है। इन धाराओं के तहत डॉक्टर को छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं।

डॉक्टर की लापरवाही के मामले में एडवोकेट कालिका प्रसाद काला ‘मानस’ का कहना है कि डॉक्टर की यह लीगल ड्यूटी है कि वो पूरी सावधानी और सतर्कता के साथ मरीज का इलाज करे। अगर डॉक्टर इलाज में लापरवाही करता है, तो उस (डॉक्टर) पर क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह की लायबिलिटी बनती है। मतलब इलाज में लापरवाही बरतने पर डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल कार्यवाही या फिर सिविल कार्यवाही की जा सकती है। इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत भी डॉक्टर के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में मुकदमा किया जा सकता है।

इस तरह जानें डॉक्टर ने इलाज में लापरवाही बरती या नहीं

एडवोकेट कालिका प्रसाद काला का कहना है कि मरीज के केयर करने की डॉक्टर की लीगल ड्यूटी है। अगर डॉक्टर ने मरीज के केयर करने की ड्यूटी को नहीं निभाया, तो वह इलाज में लापरवाही का दोषी माना जाएगा। डॉक्टर ने अपनी ड्यूटी को निभाया या नहीं, इसको तीन प्वाइंट से समझा जा सकता है......

1. डॉक्टर ने जिस मरीज को इलाज के लिए भर्ती किया है, क्या वह उस मरीज का इलाज करने में सक्षम है या नहीं? मतलब यह कि क्या डॉक्टर के पास उस मरीज का इलाज करने की प्रोफेशनल स्किल है या नहीं? अगर उसके पास प्रोफेशनल स्किल नहीं है और उसने पैसे के लालच में या फिर किसी दूसरे इरादे से मरीज को भर्ती कर लिया है, तो डॉक्टर को इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार माना जाएगा।

2. क्या डॉक्टर ने मरीज की बीमारी के अनुसार इलाज किया है या नहीं? मतलब अगर मरीज को टीबी है, तो डॉक्टर को टीबी की ही दवा देनी चाहिए. वह टीबी के मरीज को कैंसर की नहीं दे सकता है. अगर वो ऐसे करता है, तो उसको इलाज में लापरवाही का दोषा माना जाएगा.

3. क्या डॉक्टर पूरी ईमारदारी और सावधानी के साथ मरीज का इलाज कर रहा है या नहीं? अगर डॉक्टर ने पूरी सावधानी के साथ मरीज का इलाज नहीं किया, तो वह इलाज में लापरवाही का जिम्मेदार माना जाएगा.

इलाज पाना मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि सभी को इलाज पाने का मौलिक अधिकार है। इलाज पाने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की धारा के तहत आता है। लिहाजा सरकारी अस्पतालों, नर्सिंग होम और पोली-क्लीनिक सभी को बेहतरीन इलाज उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार हैं। आपको बता दें कि मौलिक अधिकारों के हनन पर कोई भी व्यक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाई कोर्ट या फिर अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।

साभार : uttamhindu


BJP सांसद कठेरिया के गार्ड ने की फायरिंग,टोलकर्मियों को पीटा

BJP सांसद कठेरिया के गार्ड ने की फायरिंग,टोलकर्मियों को पीटा

06-Jul-2019

इटावा से बीजेपी सांसद रामशंकर कठेरिया के सुरक्षाकर्मियों की गुंडागर्दी का मामला सामने आया है. कठेरिया के सुरक्षाकर्मियों ने आगरा के एक टोल प्लाजाकर्मियों के साथ बुरे तरीके से मारपीट की. विवाद में एक सुरक्षाकर्मी ने फायरिंग भी की. पूरी घटना सांसद कठेरिया के सामने हुई. घटना का वीडियो भी सामने आया है. मामला आगरा इनर रिंग रोड रहन कला टोल प्लाजा का बताया जा रहा. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कठेरिया के काफिले को वीआईपी एंट्री न दिए जाने के चलते विवाद हुआ है.

दरअसल कठेरिया के काफिले में उनकी गाड़ी के अलावा 5 छोटी गाड़ियां और एक बस शामिल थी. टोल कर्मियों ने इन गाड़ियों को वीआईपी की जगह आम लेन से निकलने को कहा. इसी बात पर कठेरिया के सुरक्षाकर्मियों का टोल कर्मियों से विवाद हो गया. बता दें रामशंकर कठेरिया नेशनल कमीशन फॉर एससी के अध्यक्ष भी हैं.

भाजपा सांसद रामशंकर कठेरिया की मौजूदगी में उनके गुर्गों की टोल प्लाजा पर गुंडई, घटना CCTV में कैद

कुछ दिन पहले ही इंदौर से बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय ने एक निगम अधिकारी की बैट से पिटाई कर दी थी. घटना का वीडियो वायरल होने के बाद बीजेपी और विजयवर्गीय की लोगों ने खूब आलोचना भी की थी.

हाल में प्रधानमंत्री ने घटना के बहाने नेताओं को गलत व्यवहार पर लगाम लगाने का इशारा किया था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने कहा था कि इस तरह की घटनाओं से पार्टी की छवि खराब होती है. कोई किसी का भी बेटा हो, उसे पार्टी से निकाल देना चाहिए. प्रधानमंत्री के बयान के बाद विजयवर्गीय का बचाव कर रहे नेता डिफेंसिव हो गए. बीजेपी की राज्य ईकाई पर भी विधायक पर कार्रवाई करने के लिए दवाब बढ़ा है.


अब दुबई के हवाई अड्डों पर अब रुपये में किया जा सकेगा लेन-देन

अब दुबई के हवाई अड्डों पर अब रुपये में किया जा सकेगा लेन-देन

05-Jul-2019

मीडिया रिपोर्ट 

नई दिल्ली: संयुक्त अरब अमीरात  के एक नामचीन समाचार पत्र के अनुसार दुबई के सभी हवाई अड्डों पर भारतीय रुपये में लेनदेन किया जा सकेगा. सूत्रों के अनुसार भारतीय मुद्रा को लेनदेन के लिये स्वीकार किया जाना भारत से आने वाले पर्यटकों के लिये अच्छी खबर है क्योंकि उन्हें रुपये को दूसरी मुद्राओं में परिवर्तित कराने के चलते बड़ी राशि गंवानी पड़ती थी. 'गल्फ न्यूज' समाचार पत्र की एक खबर के अनुसार, भारतीय मुद्रा दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के सभी तीनों टर्मिनल और अल मख्तूम हवाई अड्डे पर स्वीकार्य है.  हवाई अड्डे पर स्थित ड्यूटी फ्री दुकान के एक कर्मचारी ने समाचार पत्र को बताया, "हां, हमने भारतीय रुपया लेना शुरू कर दिया है." 

खबर में कहा गया है कि पिछले साल दुबई हवाई अड्डे से लगभग 9 करोड़ यात्री गुजरे थे, इनमें 1.22 करोड़ भारतीय थे. भारतीय यात्रियों को इससे पहले तक दुबई हवाई अड्डे पर ड्यूटी फ्री दुकानों से खरीददारी के लिए सामान की कीमत डॉलर, दिरहम या यूरो में चुकानी पड़ती थी. खबर में कहा गया है कि रुपया दुबई में ड्यूटी फ्री दुकानों पर स्वीकार की जाने वाली 16वीं मुद्रा है. दिसंबर 1983 में दूसरी मुद्राओं को स्वीकार किये जाने की शुरुआत हुई थी. 


पत्रकारिता की रक्षा करना सबसे जरूरी है

पत्रकारिता की रक्षा करना सबसे जरूरी है

03-Jul-2019

भाजपा द्वारा लखनऊ के होटल क्लार्क्स अवध  में पत्रकारों के लिए आम की आम दावत का आयोजन किया गया।  ऐसी दावत ऐसा आमंत्रण कि पूछिए मत।आम और ख़ास पत्रकारों के साथ कुछ पत्रकारों के झुंड के झुंड भाजपा की आम की दावत मे ऐसे पंहुच गये जैसे   आम की फ्री सेल लगी हो। नतीजा जो वास्तव में पढे लिखे अनुभवी और सज्जन पत्रकार थे उनको शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।

वरिष्ठ पत्रकार नावेद भाई ने बहुत अच्छा  लिखा कि पत्रकार समारोह में आम के गिफ्ट बांटने वाले भाजपाइयों और पत्रकारों के मन ही नहीं शरीर भी मिल गये। पत्रकार मन मिलन कार्यक्रम में मन मिला हो या ना मिला हो पर एक दूसरे का शरीर मिल गया।  पेड़ों से आम गिरने की बात तो सबने सुनी और देखी है। लेकिन यहां तो बग़ैर पेड़ के आम टपक रहे थे। और  भीड़ की लूट ऐसी जैसे आम न होके कोई अजूबा हो। 

इज्जतदार पत्रकारों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी।  पत्रकारिता की सूरत बदल चुकी है। जो वास्तव में पत्रकार हैं उनके लिए बहुत कठिन समय है क्योंकि आज के छुट्टा पत्रकार (पत्रकार कहते हैं मगर हैं नहीं) जो ना लिख सकते हैं ना किसी विषय की व्याख्या कर सकते हैं बस कुछ पैसे देकर कार्ड बनवा कर या अखबार, मैगजीन का रजिस्ट्रेशन करवाकर पत्रकार बन गये। ना भाषा पर पकड़, ना लिखने बोलने की क्षमता और ना सामाजिक विषयों को उठाने की क्षमता। नतीजा जो पत्रकार बरसों से मेहनत करके पत्रकारिता के मूल्यों को जिंदा रखे हैं उनको कष्ट का सामना करना पड़ रहा है।

पत्रकारिता करिये मगर मूल्यों से समझौता नहीं करिये। पत्रकारिता का जो दबदबा रहता था जो इज्ज़त थी वह अब कम होती जा रही है। पत्रकारिता के नाम पर जो फील्ड में हरकतें हो रही हैं उससे वरिष्ठ पत्रकारों और पत्रकारिता का नाम खराब हो रहा है। मेरा उन सभी दोस्तों से निवेदन है जो अखबार, मैगजीन, चैनल या पोर्टल चला रहे हैं कि अपनी टीम में पढे लिखे क्षमतावान लोगों को शामिल करें जिनके अंदर आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की भावना हो। शामिल करते समय शिक्षा एवं पिछला विवरण जरूर  चेक करें। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत बनाइये मजबूर नहीं।

सैय्यद एम अली तक़वी ब्यूरो चीफ (The Revolution News)


महाराष्ट्र बीफ बैन केस : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सुनवाई से खुद को अलग किया

महाराष्ट्र बीफ बैन केस : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सुनवाई से खुद को अलग किया

02-Jul-2019

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में बीफ बैन के मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है. वे पहले इस केस में बतौर वकील पेश हुई थीं. अब इस मामले को चीफ जस्टिस के पास भेजा गया है ताकि नई बेंच का गठन किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्‍ट्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. महाराष्ट्र के कुरैशी समाज समेत कई संगठनों ने महाराष्ट्र में बीफ बैन को चुनौती दी है. वहीं कुछ गैर सरकारी संगठनों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है, जो कि बीफ पर पूरी तरह बैन चाहते हैं. याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्‍यायालय ने नोटिस जारी किया था.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि 16 साल से बड़ी उम्र के बैल किसान के किसी काम के नहीं हैं. ऐसे में किसान उन्हें बेचकर पैसा भी कमा सकते हैं. इस पाबंदी से लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं, इसलिए राज्य में 16 साल से ऊपर के बैलों की स्‍लॉटरिंग की इजाजत दी जाए. याचिका में कहा गया है कि इस मुद्दे पर राजनीति की जा रही है.


आगे की पंक्ति में बैठी थीं महिलाएं, गुस्साए स्वामी जी बिना स्पीच दिए लौट गए

आगे की पंक्ति में बैठी थीं महिलाएं, गुस्साए स्वामी जी बिना स्पीच दिए लौट गए

02-Jul-2019

नई दिल्ली। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और अखिल राजस्थान सेवारत चिकित्सक संघ (अरिसदा) की ओर से जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में राजमेडिकॉन कांफ्रेंस आयोजित की गई थी। लेकिन इस कांफ्रेंस के आखिरी दिन रविवार को कुछ ऐसा हुआ कि सभी लोग हैरान रह गए। इस कांफ्रेंस में रविवार को स्वामी ज्ञानवत्सल्य बिना मोटिवेशनल स्पीच दिए बिड़ला सभागर से कार्यक्रम छोड़कर चले गए। इसके पीछे जो कारण सामने आया, वो काफी हैरान करने वाला है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्वामी ज्ञानवत्सल्य के सभा छोड़ के जाने के पीछे कारण आगे की 3 पंक्तियों में महिलाओं का बैठना बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि जब स्वामी ज्ञानवत्सल्य मोटिवेशनल स्पीच देने के लिए स्टेज के पीछे पहुंचे तो उन्होंने अनाउंस कराया था कि पहली तीन कतारों में महिलाएं नहीं बैठेंगी। जब गुरुजी द्वारा रखी गई इस शर्त के बारे में महिला डॉक्टरों को बताया गया तो उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। 

कुछ अन्य डॉक्टर भी इसमें शामिल हुए और स्वामी ज्ञानवत्सल्य के स्पीच का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। हालांकि, विरोध कर रही महिला डॉक्टरों और आयोजकों के बीच बातचीत के बाद इसका हल निकाला गया और यह तय किया गया था कि सामने की दो पंक्तियां खाली रहेंगी। लेकिन मोटिवेशनल गुरु ज्ञानवत्सल्य अपना भाषण दिए बिना कार्यक्रम से चले गए। डॉ. रितु चौधरी ने बताया कि कुछ महिला डॉक्टर आगे की पंक्ति में बैठी थीं और पहली तीन पंक्तियों में कई महिलाएं थीं। 

रितु चौधरी ने कहा कि सभी लोग स्वामी ज्ञानवत्सल्य के आने और उनके स्पीच देने का इंतजार कर रहे थे, तभी अचानक घोषणा की गई कि कोई भी महिला पहले की सात पंक्तियों में नहीं बैठेगी। इसके बाद फिर अनाउंस किया गया कि पहले की तीन पंक्तियों में कोई महिला नहीं बैठेगी। महिला डॉक्टर यह जानकर दंग रह गईं लेकिन उन्होंने स्वामी के प्रोटोकॉल का पालन करने का फैसला किया क्योंकि उनका भाषण हमेशा अच्छा होता है। डाक्टर्स का कहना था कि थोड़ी ही देर में अनाउंस हुआ कि स्वामीजी स्पीच नहीं देंगे। उन्होंने कहा कि ये अजीब बात लगी कि स्वामी जी भेदभाव क्यों कर रहे हैं?