ऐसे ही नही आया छत्तीसगढ़ राज्य मे बदलाव

ऐसे ही नही आया छत्तीसगढ़ राज्य मे बदलाव

14-Dec-2020

ऐसे ही नही आया छत्तीसगढ़ राज्य मे बदलाव

एम. एच. जकारिया 

ऐसे ही नही आया छत्तीसगढ़ राज्य मे बदलाव, छत्तीसगढ़ के किसान मजदूरों और जनता के भरोसा जितने और लंबे संघर्ष के बाद बनी है सरकार!

आज भूपेश बघेल सरकार को दो साल पूरे होंने जा रहे है, इन 2 सालों में छत्तीसगढ़ में कई घोषणा हुई अभी सरकार बनी भी नही थी और कोरोना जैसे भयानक महामारी का सामना छत्तीसगढ़ की जनता को देखना पडा जिसे सरकार ने हर तरीके से इलाज की बेहतर व्यवस्था की जो की देश के अन्य राज्यो की तुलना में एक नज़ीर बना जिसकी प्रशंसा पूरे देश मे हो रही हैं, प्रवासी मजदूरों के रहने खाने और ठहरने की व्यवस्था मे कोई कमी सरकार के द्वारा नही की गई।

आज भी देश के अन्य राज्यों में किसान मजबूर है बेबस है लेकिन मुखमंत्री भूपेश बघेल की किसानों के प्रति बेहतर सोच ने किसानों को मजबूत कर दिया है, पहले किसान मजबूर था आज मजबूत है, नरवा, गरवा बारी और गोबर खरीदी योजना राज्य सरकार की ऐसी योजनाओ में शामिल हुआ है जिसमे अति गरीब ग्रामीणों के हाथो में पैसा दिखाई देने लगा है, जो देश के किसी भी राज्य में नही है।

भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद-

तीन बड़े फैसले लिए गए थे. इसमें से दो धान खरीद और कर्ज माफी सीधे किसानों से जुड़े थे. जो कि वादे के अनुसार पूरे किये गए इन फैसलों ने इस बात का स्पष्ट संकेत दे दिया था कि सरकार का फोकस गांव, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ज्यादा रहने वाला है. दो साल के भीतर ही सरकार ने एक-एक कर जन घोषणा पत्र  के कई वादे पूरे कर दिए. जिसमें किसानों की ऋण माफी,की गई समर्थन मूल्य, मे धान खरीदा गया जबकि आज देश के किसान सड़को पर है

कोरोना संकट काल में छत्तीसगढ़ मंदी से अछूता रहा- 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा किए गए सकारात्मक प्रयासों से राज्य में जीएसटी, आटोमोबाईल, कृषि सहित अन्य क्षेत्रों में तेजी देखी जा सकती है। राज्य सरकार द्वारा किसानों को धान की बोनस, मनरेगा के तहत गांव-गांव में रोजगार जैसे मंहती कार्यों से आज आम जन की क्रय शक्ति बढ़ी है जिसके कारण छत्तीसगढ़ में किसानों के साथ-साथ राज्य की व्यापारियों ने भी अन्य राज्यों की आपेक्षा बेहतर कारोबार किया है|  

रोजगार देने में देश में शीर्ष स्थान- 

छत्तीसगढ़ राज्य महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में जॉब कॉर्डधारी परिवारों को 100 दिनों का रोजगार देने में देश में शीर्ष स्थान पर है। इसी प्रकार लक्ष्य के विरूद्ध रोजगार सृजन में देश में दूसरे स्थान पर है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक राज्य में अब तक 55,981 परिवारों ने 100 दिनों का रोजगार प्राप्त कर लिया है। देश में 100 दिनों का रोजगार हासिल करने वाले कुल परिवारों में अकेले छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ ने रोजगार सृजन के मामले में सालभर के लक्ष्य का 66 प्रतिशत पूरा कर लिया है। इसमें लक्ष्य का 70 प्रतिशत से अधिक काम का लक्ष्य हासिल करने में नक्सल प्रभावित जिले आगे हैं।

खेलबो-जीतबो-गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की परिकल्पना- 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खेलबो-जीतबो-गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ का नारा अब धरातल पर तेजी से मूर्त रूप ले रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य मंे खिलाड़ियों और खेलप्रेमियों के लिए सर्वसुविधा युक्त अत्याधुनिक खेल सुविधाएं तेजी से विकसित हो रही है। इससे खेल के नक्शे पर छत्तीसगढ़ राज्य की एक अलग पहचान होगी साथ ही यहां के खिलाड़ियों को राज्य में ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेल प्रशिक्षण की सुविधा मिलेगी। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य सरकार ने विगत दो वर्षों में खेल अधोसंरचनाओं के विकास में बड़ी उपलब्धि भी हासिल की है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व और खेल मंत्री श्री उमेश पटेल के मार्गनिर्देशन में प्रदेश में आधुनिक खेलों के साथ ही साथ प्रदेश के ग्रामीण और पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देने और खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारने के लिए अनेक अहम कदम उठाएं है

गांवों में गौठान बन रहे रोजगार के महत्वपूर्ण केन्द्र- 

राज्य में अब तक एक लाख 36 हजार गोबर विक्रेताओं को 59 करोड़ 8 लाख रूपए की राशि का भुगतान हो चुका है। प्रदेश में गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में गोधन न्याय योजना एक महत्वपूर्ण योजना है। इसके तहत बनाए गए गौठान गांवों में रोजगार के लिए महत्वपूर्ण केन्द्र साबित हो रहे है। यही वजह है कि सभी वर्ग के लोग इस योजना के प्रति विशेष रूचि दिखा रहे हैं और वे इससे जुड़कर तेजी से आय अर्जित करने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में 20 जुलाई से प्रारंभ गोधन न्याय योजना के तहत विगत 30 नवम्बर तक 6 हजार 430 गौठान स्थापित हो गए है, इनमें सक्रिय गौठानों की संख्या 3 हजार 785 है। इस दौरान गौठानों में 29 लाख 53 हजार क्विंटल गोबर की खरीदी में हितग्राहियों को 59 करोड़ 8 लाख रूपए की राशि का भुगतान हो चुका है।

छत्तीसगढ़ में अब 52 लघु वनोपजों की खरीदी समर्थन मूल्य पर- 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेश के वनवासियों के हित को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ में 31 से बढ़ाकर 38 लघु वनोपजों की खरीदी समर्थन मूल्य पर करने के साथ-साथ संघ द्वारा निर्धारित समर्थन मूल्य के अंतर्गत 14 लघु वनोपजों की खरीदी का अहम निर्णय लिया गया है। गौरतलब है कि राज्य सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ में निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत 31 से बढ़ाए गए 38 लघु वनोपजों में से 7 नवीन लघु वनोपज कुसुमी बीज, रीठा फल(सूखा), शिकाकाई फल्ली(सूखा), सतावर जड(सूखा)़, काजू गुठली, मालकांगनी बीज तथा माहुल पत्ता को शामिल किया गया है। निर्धारित समर्थन मूल्य के अनुसार इनमें कुसुमी बीज 23 रूपए, रीठा फल(सूखा) 14 रूपए, शिकाकाई फल्ली(सूखा) 50 रूपए, सतावर जड(सूखा) 107 रूपए़, काजू गुठली 90 रूपए, मालकांगनी बीज 100 रूपए तथा माहुल पत्ता 15 रूपए प्रति किलोग्राम की दर पर खरीदी की जाएगी। इसी तरह संघ द्वारा समर्थन मूल्य पर 14 लघु वनोपजों पलास (फूल), सफेद मूसली (सूखा), इंद्रजौ, पताल कुम्हड़ा, कुटज, अश्वगंधा, आंवला (कच्चा), सवई घास, कांटा झाडू, तिखुर, बीहन लाख-कुसुमी, बीहन लाख-रंगीनी, बेल (कच्चा) तथा जामुन (कच्चा) की खरीदी की जाएगी।

छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास के नए आयाम- 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में प्रदेश में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए पिछले दो वर्ष के दौरान अनेक दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय लिए गए हैं। औद्योगिक विकास को गति देने के लिए राज्य में नवीन औद्योगिक नीति 01 नवम्बर 2019 से 2024 लागू की गई। छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्योगों को बिजली दर में रियायत, अनुदान, सहायता, विभिन्न स्वीकृतियां प्रदान करने की सुविधाजनक व्यवस्था के लिए एकल विण्डो प्रणाली साथ ही स्थानीय उद्योगों के उत्पादों की प्राथमिकता देने सहित अनेक फैसलों से उद्योग जगत को काफी राहत मिली है।
वित्तीय वर्ष 2019-20 में विभिन्न बैंकों के द्वारा 494 हितग्राहियों को कुल 10.14 करोड़ रूपए का ऋण वितरण किया गया है जिसमें विभाग द्वारा मार्जिन मनी के रुप में  1.73 करोड़ रूपए का भुगतान किया गया है। विभिन्न अनुदानों के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2019-20 में 848 इकाईयों को रुपये 22.83 करोड़ की राशि ब्याज अनुदान के अंतर्गत तथा 80.13 करोड़ रूपए स्थायी पूंजी निवेश अनुदान के अंतर्गत वितरित की गई है।  जनवरी 2019 से जून 2020 की अवधि में राज्य में 847 इकाईयों द्वारा रु. 14,983 करोड़ का पूंजी निवेश कर 15,400 व्यक्तियों को रोजगार प्रदान किया गया है।


यूहीं नफरत नही करते हैं,डलहौजी

यूहीं नफरत नही करते हैं,डलहौजी

09-Dec-2020

यूहीं नफरत नही करते हैं,डलहौजी

यूहीं नफरत नही करते हैं,डलहौजीवादी, दक्षिणपंथी,छोटी सोच वाले, इस महिला से,14 मार्च 1998 कैसे भूलेंगे यह लोग ।  जब दीमक लगी कुर्सी पर उसने बैठने का फैसला किया, कांटो के मुकुट को सर पर रखा और पीठ पर वार सहने को चेहरे पर मुस्कान धरी । उस कुर्सी पर जिस कुर्सी की ताकत लोगों को लगता था कि खत्म हो गई है,काँग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी । उस कुर्सी पर जिस कुर्सी से दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत निपट गई थी मगर वह कमज़ोर होने लगी,लोगों को लगता था,बेचारी कमज़ोर औरत क्या ही करेगी । साल दो साल में थककर हारकर निपट जाएगी ।

यह महिला इन्हें ख्वाबों में डराती है, क्योंकि इन्हें पता है कि इस देश में अगर खुलकर मनमानी का राज करना है, तो इस परिवार की उस आख़री महिला को बच्चों समेत राजनैतिक रूप से मिटा दो,जो लौह महिला के स्पर्श और सानिध्य में ढली है ।

आज वह बूढ़ी लगती हैं मगर सोचो उस दौर के सबसे उच्चकोटि के वक़्ता,कवि,ब्राह्मण कुल के युग पुरुष और मातृभाषा हिन्दी के महारथी को अपनी टूटी फूटी हिन्दी से इस महिला ने  मात दी । 98 में जब कुर्सी पर बैठीं, तो किसने सोचा था कि हम सत्ता में लौटेंगे मगर वह औरत कुछ सालों में ही नागफनी के जंगल से सत्ता खींचकर उस आंगन तक ले आई,जिसमे लेटे लोग अपनी विरासत के जा चुकने का ग़म मना रहे थे ।

पूरा देश एक सुर में उस महिला को देश के शीर्ष पद पर देखना चाह रहा था,मगर उसने नकार दिया । "कुर्सी" जिसके लिए कौन से प्रपंच हमारी भूमि पर नही किये गए,उसे नकार दिया । जिन्हें लगता है यह चाल थी,वह मूर्ख लोग हैं । जाएँ और किसी से भी पूछें कि तुम प्रधानमंत्री बनना पसन्द करोगे या बैकडोर से राज करोगे । उत्तर पा जाओगे,मूर्ख भी नही मिलेगा जो नकार दे,प्रधान,सरपंच तक तो यह फार्मूला काम करता है मगर प्रधानमंत्री जैसा पद अच्छे अच्छे फिसल कर गिरेंगे । हमने तो इस पद की लालच में बूढ़ों को दुत्कार कर किनारे होते देखा है, हाथ जोड़े बेबस खड़े देखा है, इसलिए जानते हैं कुर्सी से मुँह मोड़ना दुनिया का सबसे बड़े त्याग में से एक है ।

कट्टरपंथी यूहीं इस महिला से नही चिढ़ते हैं, उनके चिढ़ने के कारण हैं । इस महिला ने प्रधानमंत्री भी उसे बनाया जिसके धर्म के लोगों को दो दशक पहले कठघरे में रखकर उत्पात मचाया गया था । सोचिए बीस साल में,सिर्फ बीस साल में देश का वह प्रधानमंत्री बन गया,जिसे बीस साल पहले उसके धर्म की वजह से मार डाला जाता । एक धर्म जो दहशत में था,उसका प्रधानमंत्री, यह सोच पाना ही कुछ लोगों की छोटी सोच से मुमकिन नही ।

यह महिला काल बनकर आई दक्षिणपंथियों कट्टरपंथियों के लिए और उनके सबसे बड़े संगठनकर्ता कथित लौह पुरुष में ज़ंग लगाकर निकल गई । दस साल उस काँग्रेस को प्रधानमंत्री दे गई,जो 98 में मरने के कगार पर थी ।

हाँ वह बीमार पड़ी,खूब बीमार पड़ी और पकड़ ढीली हुई । जैसे ही पकड़ ढीली हुई,विरोधियों को सांस मिल गई । उसने घर से बाहर निकले पाँव समेटे और इधर एक चेहरा उभरा । वह महिला दर्द में उलझी की उसपर बेतरतीब वार हुए । सब एक साथ मिलकर उसपर टूट पड़े,उसके वंश पर टूट पड़े । अच्छे बुरे सब एक साथ मिलकर उसे घेरने लगे, तरह तरह वेषधर उसको मिटाने निकले,वह डंटकर मुकाबला करती,मगर हार गई,अपनो से ही हार गई ।

जब उसपर हमले शुरू हुए,तो अपने उसके ही पीछे दुबक गए । कोई नही आया सीना खोलकर की मुझ पर वार करो,मैं मरने को तैयार हूँ । उसने खुद को समेटा, नए खून को आगे किया । वह जान गई कि उसका वक़्त पूरा हुआ,अब वह लड़ें जिन्हें इस विचार को आगे बढ़ाना है । जइन्हें जैसी भी हो,बची खुची गाँधी की विरासत को ताक़त देना है, वह सम्भालें ।

हट गई,जैसे तमाम बार हट जाती थीं । बिना कोई ज़ोर लगाए हट गईं और उसकी पार्टी फिर वहीं पहुँच गई,जहाँ से चली थी,निराशा के अथाह समन्दर में डूब गई ।

जब सब बिखरने लगा,तो फिर उसने ज़िद छोड़ी । उसको याद आया कि उसकी आखरी सांस तक लौह महिला से किया वायदा निभाना है । महात्मा के विचारों के दल को दलदल से निकालना है । जो औरत प्रधानमंत्री का पद त्याग चुकी थी,वह सबसे कमज़ोर वक़्त में अपनी जिद छोड़ वापिस कमान संभालने निकल पड़ी,साथ मे ही निकल पड़ी ऊर्जा और एक के बाद एक कदम सूरज के नज़दीक़ बढ़ने लगा ।

पूरा गिरोह इस औरत से डरता है, क्योंकि उन्हें उसमें, अपने पूर्वजों के, दुश्मन पूर्वजों की पूरी खेप दिखाई पड़ती है । वह उसमें गाँधी से राजीव तक की छाप देख,दहलते हैं । वह उसको नीचा दिखाना चाहते हैं, उसे बर्बाद कर डालना चाहते हैं मगर यह सच है, भारत की त्यागी बहू से भला कौन जीता है ।

एक बहु ने अपने बाल खोले थे,दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध हुआ और पूरा पथभृष्ट राजतंत्र नष्ट हो गया,जो सुई की नोक के बराबर भूमि नही देना चाहते थे,तहस नहस हो गए । बहु जब अन्याय के विरुद्ध कदम उठाती है, तो बड़े से बड़े महल दरक जाते हैं । आज ताक़त में खड़ी बाँटने वाली ताकते इस बहु से ही डरते हैं, जिसे वह बहु स्वीकार नही कर पाते ।

अंतिम सत्य जानलो,दुनिया मे बड़े से बड़े निज़ाम में चाभी बहु के हाथ सौंपी जाती है, बहु ने अगर उस चाभी की लाज समझ ली तो दुनिया की कोई ताक़त उससे ज़बरन ताला खुलवा नही सकती,क्योंकि नई नस्ल को सँस्कृति परम्पराओं के साथ आगे के लिए तैयार करना बहु की ज़िम्मेदारी होती है,उस बहु से ही तो यह सब डरते हैं ।

जब से वह उस कुर्सी पर लौटी है, तमाम कुर्सियाँ डगमगाने लगी है । विद्रोह के स्वर उठने लगे हैं । डरे हुए विपक्षी भयभीत होकर उसके सिपाहियों को छीन रहें हैं क्योंकि उन्हें वह दिख रहा है, जो उनके पूर्वजों को दिखा करता था । वह जानते हैं, जब तक यह महिला है, तब तक उनको रोज़ नई तरकीब आज़मानी होगी । वह एक त्यागी बहु है, जिसकी काट पीले पन्नो में नही है । यह यक़ीन करो,वह फिर नागफनी के जंगल में नँगे पांव निकल पड़ी है । लौटेगी तो फिर दरककर गिरेंगे कथित शूरवीर । असली चाणक्य ने भी बहु की महिमा,साहस और आवश्यकता समझी थी,नकली चाणक्य तो बहु के पाँव में काटें बो रहें,कीचड़ उछाल रहें,सब लौटेगा,सूद समेत लौटेगा  । डरो,डरकर उसपर वार करो,जितना तेज़ उछलोगे उतना नीचे जाओगे । हर एक जिसने उसके साय से परहेज़ किया,सबको उसकी चौखट छूनी पड़ी है ।

1998 से 2019 तक देख डालो,उस महिला का लोहा मान लोगे । देखो उसकी हर चाल हैरत है, जिनके पुरखे उसपर हमले करते थे,उनके बच्चे उससे ढाल माँग रहे हैं ।

सर पर आँचल धरे पूरी उम्र काट दी हमारे देश की चौखट पर । अब फिर सक्रिय हुईं की सत्ता में खलबली मच गई । जब जब देश के संविधान की मूल आत्मा की बात होगी,तब यह महिला उसके सबसे नज़दीक़,सबसे अधिक मजबूती से खड़ी दिखाई देंगी क्योंकि वह हमारा भरोसा हैं ।

सोनिया गाँधी पर जितने चाहे सवाल दाग दो मगर उनकी मेहनत,रणनीति और सौम्यता से विपक्ष को घुटने के बल बैठाना लम्बे वक़्त तक याद किया जाएगा । सबसे लंबे वक्त तक काँग्रेस अध्यक्ष पद पर बैठकर,सबसे कमजोर वक़्त में भी दसयों साल सत्ता दिलवा पाना आसान नही है । सोनिया गाँधी के बेहतर चीज़ है, सही वक्त पर सही निर्णय । देश के इतिहास में सोनिया गांधी की राजनीति बहुत ऊंचा स्थान रखेगी,क्योंकि बिना नीचे गिरे, बिना बदला लिए,बिना गन्दी बात बोले भी राजनीति में शिखर छुआ जा सकता है ।

एक आखरी बात की जिन माँ बेटे से इतनी तक़लीफ़ है, जिनको यह बाँटने वाले डलहौजीवादी कमज़ोर और बेकार समझते हैं, वह जानते हैं कि उनके लिए काल है यह माँ,क्योंकि उनको पता है नफरत,हिंसा,झूठ,अत्याचार,लालच का विकल्प प्रेम,अहिंसा,संवेदना और त्याग,जो इस वक़्त सोनिया के दामन में टँके हैं । सोनिया गांधी को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं, उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की वह यह आखरी विनाशकारी हाथों को भी उनके स्थान पर भेज दें । सोनिया बहुत कर चुकी हैं, फिर भी अभी उन्हें सड़क पर खड़े,लोकतंत्र के लिए लड़ते देख ऊर्जा आती है कि जब तक ऐसे लीडर हैं, हमे निराश नही होना चाहिए । सोनिया हमारा भरोसा हैं, रहेंगी,आपको बहुत बहुत मुबारकबाद । 

द्वारा  सै क़ासिम  लखनऊ 

कार्यकारी संपादक 


भ्रष्टाचार की आंधी में ईमानदारी के दीपक जलाने होंगे

भ्रष्टाचार की आंधी में ईमानदारी के दीपक जलाने होंगे

08-Dec-2020

अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोध दिवस- 9 दिसम्बर 2020
-ः ललित गर्ग:-
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अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोध दिवस प्रतिवर्ष 9 दिसम्बर को पूरे विश्व में मनाया जाता है। 31 अक्टूबर 2003 को संयुक्त राष्ट्र ने एक भ्रष्टाचार-निरोधी समझौता पारित किया था और तभी से यह दिवस मनाया जाता है। पूरे विश्व में एक समृद्ध, मूल्याधारित समाज को बनाए रखने के लिए भ्रष्टाचार को खत्म करना इस दिन का मुख्य उद्देश्य है। इस दिन सम्मेलन, भाषण, रैलियां, प्रदर्शनियां, नाटक आदि कई गतिविधियां संयुक्त राष्ट्र और संबंधित सदस्य राज्यों के द्वारा भ्रष्टाचार से लड़ने की भावना के साथ आयोजित की जाती हैं।

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तेजी से पांव पसार रहा भ्रष्टाचार किसी एक समाज, प्रांत या देश की समस्या नहीं है। इसने हर व्यक्ति एवं व्यवस्था को दूषित किया है, इसे रोकने के लिये प्रतीक्षा नहीं प्रक्रिया आवश्यक है। सत्ता एवं स्वार्थ ने भ्रष्टाचारमुक्ति को पूर्णता देने में नैतिक कायरता दिखाई है। इसकी वजह से लोगों में विश्वास इस कदर उठ गया कि चैराहे पर खड़े आदमी को सही रास्ता दिखाने वाला भी झूठा-सा, भ्रष्ट एवं अनैतिक लगता है। आंखें उस चेहरे पर सचाई की साक्षी ढूंढती हैं। भ्रष्टाचार एक गंभीर अपराध है जो सभी समाजों में नैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास को कमजोर करता है। आज के समय में भ्रष्टाचार से कोई देश, क्षेत्र या समुदाय बचा नहीं है। यह दुनिया के सभी हिस्सों में फैल गया है चाहे वो राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक हो और साथ ही लोकतांत्रिक संस्थानों को भी कमजोर करता है, सरकारी अस्थिरता में योगदान देता है और आर्थिक विकास को भी धीमा करता है, तभी इस विकराल होती समस्या पर नियंत्रण पाने के लिये संयुक्त राष्ट्र ने भ्रष्टाचार निरोध दिवस को आयोजित करने का निश्चय किया।
प्रश्न है कि आखिर भ्रष्टाचार है क्या? आसान शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार उन लोगों के द्वारा जिनमें पॉवर होती है एक प्रकार का बेईमान या धोखेबाज आचरण को दर्शाता है। यह समाज की बनावट को भी खराब करता है। यह लोगों से उनकी आजादी, स्वास्थ्य, धन और कभी-कभी उनके जीवन को ही खत्म कर देता है। किसी ने सही कहा है कि भ्रष्टाचार एक मीठा जहर है।’ विश्व भर में हर साल खरबों डॉलर की रकम या तो रिश्वतखोरी या फिर भ्रष्ट तरीकों की भेंट चढ़ जाती है जिससे कानून के शासन की अहमियत तो कम होती ही है, साथ ही मादक पदार्थों, हथियारों और लोगों की अवैध तस्करी, हिंसा एवं आतंकवाद को भी बढ़ावा मिलता है। हर साल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने वाली खरबों डॉलर की ये रकम वैश्विक घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 5 फीसदी के बराबर है। इसके कारण राष्ट्रों की समृद्धि से ज्यादा साख खतरे में पड़ी है। आज हमारे कंधे भी इसीलिये झुक गये कि भ्रष्टाचार का बोझ सहना हमारी आदत हो गयी है। भ्रष्टाचार के नशीले अहसास में रास्ते गलत पकड़ लिये और इसीलिये भ्रष्टाचार की भीड़ में हमारे साथ गलत साथी, संस्कार, सलाह, सहयोग जुड़ते गये। जब सभी कुछ गलत हो तो भला उसका जोड़, बाकी, गुणा या भाग का फल सही कैसे आएगा? तभी  भ्रष्टाचार से एक बेहतर दुनिया बनाने के प्रयासों के रास्ते में भारी रुकावट पैदा हो रही है।
भ्रष्टाचार निरोध दिवस मनाते हुए दुनिया के कतिपय राष्ट्रों ने ईमानदार शासन व्यवस्था देने का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिनमें भारत में नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश में एक नयी चुस्त-दुरूस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त कार्यसंस्कृति को जन्म दिया है, इस तथ्य से चाहकर भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। न खाऊंगा का प्रधानमंत्री का दावा अपनी जगह कायम है लेकिन न खाने दूंगा वाली हुंकार अभी अपना असर नहीं दिखा पा रही है। सरकार को भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये सख्ती के साथ-साथ व्यावहारिक कदम उठाने की अपेक्षा है। पिछले सत्तर वर्षों की भ्रष्ट कार्यसंस्कृति ने देश के विकास को अवरूद्ध किया। आजादी के बाद से अब तक देश में हुये भ्रष्टाचार और घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो देश में विकास की गंगा बहायी जा सकती थी। दूषित राजनीतिक व्यवस्था, कमजोर विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत ने पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार के अंधेरे कुएं में धकेलने का काम किया। देखना यह है कि क्या वास्तव में हमारा देश भ्रष्टाचारमुक्त होगा? यह प्रश्न आज देश के हर नागरिक के दिमाग में बार-बार उठ रहा है कि किस प्रकार देश की रगों में बह रहे भ्रष्टाचार के दूषित रक्त से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान सरकार की नीति और नियत दोनों देश को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने की है, लेकिन उसका असर दिखना चाहिए।
विभिन्न राजनीतिक दल जनता के सेवक बनने की बजाय स्वामी बन बैठे। मोदी ने इस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने का बीड़ा उठाया और उसके परिणाम भी देखने को मिले। प्रधानमंत्री का स्वयं को प्रधानसेवक कहना विपक्ष के लिये जुमलेबाजी का विषय हो सकता है। लोकतंत्र में लोक विश्वास, लोक सम्मान जब ऊर्जा से भर जाए तो लोकतंत्र की सच्ची संकल्पना आकार लेने लगती है। मोदी ने लोकतंत्र में लोक को स्वामी होने का एहसास बखूबी कराया है। लेकिन प्रश्न यह है कि यही लोक अब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जागृत क्यों नहीं हो रहा है? जन-जागृति के बिना भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
यह एक बड़ा यथार्थ है कि सरकार की काम करने की नीयत में कोई खोट नहीं है। देखा जाए तो नीति, नीयत और निर्णय यह तीन गुण किसी भी सफल लोकतंत्र व राष्ट्र के उत्तरोत्तर विकास एवं प्रगति के लिये आवश्यक होते हैं। मोदी सरकार की नीतियों में जन कल्याण, जन सम्मान, राष्ट्र गौरव की नीयत और निर्णय स्पष्ट दिखाई देते हैं। देश के सम्मान, समृद्धि और सुरक्षा के संकल्प को हकीकत में बदलने का काम मोदी सरकार कर रही है। लेकिन एक प्रश्न यहां यह भी खड़ा है कि भाजपा की प्रांत सरकारें एवं भाजपा के नेता भ्रष्टाचारमुक्ति के लिये उदाहरण क्यों नहीं बन पा रहे हैं? देखा जाए तो भ्रष्टाचार किसी भी राज्य को कई स्तर पर कमजोर करता है। इसके कारण कामकाज में देर होती है। इसका असर उत्पादन से लेकर अन्य परिणामों पर पड़ता है। योग्य लोग नजरअंदाज कर दिये जाते हैं और अयोग्य लोगों के हाथों में कमान आ जाती है। भ्रष्टाचार के कारण ही देश में प्राकृतिक संपदा एवं जनधन की लूट होने के आरोप भी लगते रहते हैं। इन त्रासद स्थितियों से सरकार के प्रति नकारात्मक सोच तो बनती ही है, साथ ही आम लोग मानसिक तौर पर कुंठित एवं निराश भी होने लगते हैं।
भ्रष्टाचार और काले घन के खिलाफ जो माहौल बना निश्चित ही एक शुभ संकेत है देश को शुद्ध सांसें देेने का। क्योंकि हम गिरते गिरते इतने गिर गये कि भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन गया। राष्ट्रीय चरित्र निर्माण, नैतिकता, पारदर्शिता की कहीं कोई आवाज उठती भी थी तो ऐसा लगने लगता है कि यह विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुस रहा है। लेकिन देर आये दुरस्त आये कि भांति अब कुछ संभावनाएं मोदी ने जगाई है, इस जागृति से कुछ सबक भी मिले हैं और कुछ सबब भी है। इसका पहला सबब तो यही है कि भ्रष्टाचार की लडाई चोले से नहीं, आत्मा से ही लड़ी जा सकती है। दूसरा सबब है कि कोई गांधी या कोई गांधी बन कर ही इस लड़ाई को वास्तविक मंजिल दे सकता है। एक सबब यह भी है कि कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों से भ्रष्टाचारमुक्ति की आशा करना, अंधेरे में सूई तलाशना है।
भ्रष्टाचार की चरम पराकाष्ठा के बीच मोदी रूपी एक छोटी-सी किरण जगी है, जो सूर्य का प्रकाश भी देती है और चन्द्रमा की ठण्डक भी। और सबसे बड़ी बात, वह यह कहती है कि ‘अभी सभी कुछ समाप्त नहीं हुआ। अभी भी सब कुछ ठीक हो सकता है।’ भ्रष्टाचार के खिलाफ खडे़ लोग एक दूसरे के कान में कह रहे हैं, इस देश ने भ्रष्टाचार की अनेक आंधियाँ अपने सीने पर झेली हैं, तू तूफान झेल लेना, पर भारत की ईमानदारी, नैतिकता एवं सदाचार के दीपक को बुझने मत देना। प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 


यूट्यूब ने जारी किया नया फीचर्स, जानिए क्या है खास!

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08-Dec-2020

अपने मंच पर बदमाशी और घृणा को रोकने के लिए एक कदम में, YouTube ने एक नई सुविधा शुरू की है जो उपयोगकर्ताओं को आक्रामक टिप्पणियों को पोस्ट करने पर चेतावनी देगा। अधिक सम्मानजनक टिप्पणी करने से पहले YouTube उन्हें संकेत देगा।

Mashable के अनुसार, YouTube पर उत्पाद प्रबंधन के उपाध्यक्ष जोहाना राइट ने एक ब्लॉग में कहा, “हम जानते हैं कि टिप्पणियां रचनाकारों को उनके समुदाय से जुड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन टिप्पणियों की गुणवत्ता के साथ मुद्दे भी सबसे सुसंगत में से एक हैं प्रतिक्रिया के टुकड़े हम रचनाकारों से प्राप्त करते हैं। ”

Google कर्मचारी सारा ने Google समर्थन पर पोस्ट किया, “आज हम सम्मानजनक बातचीत को प्रोत्साहित करने में मदद करने के लिए टिप्पणियों में एक नया अनुस्मारक पेश कर रहे हैं। अब एंड्रॉइड पर, रिमाइंडर एक टिप्पणी पोस्ट करने से पहले पॉप अप हो सकता है जो दूसरों के लिए अपमानजनक हो सकता है, जिससे टिप्पणीकार को पोस्टिंग के बाद प्रतिबिंबित करने का विकल्प मिल सके ”।

हालाँकि, उपयोगकर्ता चाहें तो टिप्पणी जारी रख सकते हैं। नए अनुस्मारक सुविधा के अलावा, YouTube ने YouTube को अधिक समावेशी मंच बनाने के लिए कुछ और अपडेट भी किए हैं।

Mashable के अनुसार, ब्लॉग ने कहा कि YouTube अनुचित और आहत करने वाली टिप्पणियों के लिए YouTube स्टूडियो में एक नए फ़िल्टर का परीक्षण करेगा। इन टिप्पणियों को स्वचालित रूप से समीक्षा के लिए रखा जाएगा ताकि मंच पर मौजूद सामग्री रचनाकारों को कभी भी इन टिप्पणियों को पढ़ने की ज़रूरत न पड़े। YouTube ने कहा कि यह रचनाकारों के लिए समग्र प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए टिप्पणी मॉडरेशन टूल को भी व्यवस्थित करेगा।

साथ ही, YouTube को प्रौद्योगिकी में भी निवेश किया जाएगा जो घृणित टिप्पणियों का पता लगाने और हटाने के लिए प्रणाली को बढ़ाने में मदद कर सकता है। यह वीडियो के विषय और टिप्पणी के संदर्भ के संदर्भ जैसे कारकों पर विचार करेगा।


किसान आन्दोलन को लेकर अखिलेश यादव ने दिया बड़ा बयान!

किसान आन्दोलन को लेकर अखिलेश यादव ने दिया बड़ा बयान!

04-Dec-2020

सपा अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों व संविधान में शामिल लोकतंत्र, समता एवं पंथनिरपेक्षता की रक्षा में अधिवक्ताओं को अहम भूमिका निभानी होगी।

अमर उजाला पर छपी खबर के अनुसार, सच को सच और झूठ को झूठ बताने तथा अन्याय के विरोध की क्षमता अधिवक्ताओं में ही होती है।

सत्ताधारी भाजपा ने झूठ, नफरत और भय-भ्रम के जरिए जो राजनीतिक प्रदूषण फैला रखा है, उसे अधिवक्ता समाज ही समाप्त कर सकता है।

अखिलेश पार्टी मुख्यालय में बृहस्पतिवार को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिन को अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाने के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे।

अखिलेश ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सादगी, त्याग व समर्पण भरे जीवन के कई प्रसंगों की चर्चा की। साथ ही अधिवक्ताओं का आह्वान किया कि वे भाजपा की कलाकारी को पराजित करने के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर एकजुट हों।

जीवन मूल्यों व आदर्शों को तिलांजलि देकर सत्ता धारी दल का नेतृत्व इवेंट मैनेजमेंट जैसी चीजों में अपने दिन बिता रहा हैं। जनता का ध्यान भटकाने के लिए आए दिन समारोह, लोकार्पण और उत्सव किए जाते हैं।

इस मौके पर राजेंद्र चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल, पूर्व मंत्री इकबाल महमूद तथा एमएलसी उदयवीर सिंह, अरविंद कुमार सिंह व संजय लाठर के अलावा सपा अधिवक्ता सभा के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप कुमार, सिकंदर विजय कुमार, शुभांगी द्विवेदी, अब्दुल रब और धीरेंद्र सिंह मौजूद रहे।

अखिलेश ने कहा, मुख्यमंत्री लगातार राष्ट्रीय पर्यटन पर रहते हैं। विकास के काम ठप हैं, पर वे फिल्म सिटी जल्द बना लेना चाहते हैं। भाजपा नेता कलाकार न बनें, अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह करें।

अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार की कृषि नीतियों के विरोध और किसान आंदोलन के समर्थन में 7 दिसंबर को प्रदेश के सभी जिलों में किसान यात्रा निकालने का आह्वान किया है।

उन्होंने कहा कि ‘किसानों की आय बढ़ाओ, खेती किसानी बचाओ’ की मांग को लेकर किसान यात्राओं में कार्यकर्ता, पैदल या साइकिल, मोटरसाइकिल जैसे वाहनों से शामिल होंगे।

इन यात्राओं के दौरान किसानों के मुद्दों पर जनता को जागरूक किया जाएगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं व आम लोगों से अपील की है कि वे अन्नदाताओं के लिए आटा, दाल, चावल और दूध की कमी न होने दें।

 

समता एवं संतुलन की साधना है सामायिक

समता एवं संतुलन की साधना है सामायिक

02-Dec-2020

समता एवं संतुलन की साधना है सामायिक
-मंजुला जैन-

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सुविधा और सुख का संबंध नहीं है। पदार्थ की प्रचुरता है, किन्तु सुख नहीं है। पदार्थ की अल्पता है, किन्तु दुख नहीं है। सुखी वह है, जो संतुलित है। दुखी वह है, जो असंतुलित है। संतुलन और असंतुलन से जुड़ा है सुख-दुख का प्रश्न, अभाव और अतिभाव का संवेदन। संतुलित वह है जो आत्म-रमण करता है, स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करता है। इसके लिये सभी धर्मों में प्रार्थना एक सशक्त माध्यम हैं। हिन्दू गीता पढ़ता है, मुसलमान कुरान। बौद्ध धम्मपद पढ़ता है, सिक्ख गुरुग्रंथ साहित्य पढ़ता है, क्रिश्चियन बाइबिल। नाम, रूप, शब्द, सिद्धांत, शास्त्र, संस्कृति, संस्कार की भिन्नताओं के बावजूद साध्य सबका एक है- भीतर का बदलाव, स्व की पहचान, शाश्वत मूल्यों का स्वीकरण एवं पवित्रता की साधना। जैन धर्म में इस तरह की प्रार्थना का एक सशक्त माध्यम है सामायिक।

सामायिक जैन साधना पद्धति की एक प्रक्रिया है जिसमें साधक अड़तालिस मिनट एकाग्रता की साधना में स्वयं को लीन रखता है। यह साधना पद्धति जहां जीवन में शांति, समता, एकाग्रता, सौहार्द को स्थापित करती है वहीं समाज और राष्ट्र में अहिंसा, प्रेम, करुणा को स्थापित करती है। मानव मानव के बीच मैत्री के बीच वपन करती है, विषमता एवं कटुता को दूर करती है। सामायिक आध्यात्मिक चेतना के जागरण का प्रयोग है। अध्यात्म सार्वभौम तत्व है। इसका किसी भी देश, जाति, वर्ण और संप्रदाय से संबंध नहीं होता। वह किसी पक्ष से आबद्ध नहीं होता।
सामायिक स्वयं ध्यान हैं फिर भी उसमें ध्यान के विशेष प्रयोग किये जाते हैं। पूज्य आचार्य श्री तुलसी ने अभिनव सामायिक का प्रयोग प्रस्तुत कर सामायिक के आध्यात्मिक स्वरूप को उजागर किया है। जिस व्यक्ति ने उसका प्रयोग किया है, उसमें अभिनव आकर्षण उत्पन्न हुआ है। कुछ लोग अपने को व्यस्त मानकर सामायिक की साधना से वंचित रह जाते हैं। उनका दृष्टिकोण सम्यक् नहीं है। हम तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं। सफल होने के लिए शॉर्टकट अपनाते हैं। कारण, हमें यही लगता रहता है कि हम पीछे रह गए हैं और दूसरे आगे निकल गए हैं। असली खुशी मंजिल पर पहुंचकर ही मिलेगी। पर लेखक डब्ल्यू पी किंसेला कहते हैं, ‘जो चाहते हैं, उसे पाना सफलता है। जो मिला है, उसे चाहना खुशी है।’
 आज संभ्रांत इंसान अनगिनत द्वंद्वों से और अपने ही अंतद्र्वंद्वों से आक्रांत और दिग्भ्रांत होकर दुख भोग रहा है। वह तनाव से संत्रस्त, अशांति से ग्रस्त है। वह मानसिक संतुलन, शांति और प्रसन्नता का जीवन चाहता है, उसके लिए सामायिक एक अमोघ प्रयोग है। इससे आनंद, आत्मिक निद्र्वंद्व और निर्विकल्प बन प्रसन्नता का रहस्य पाया जा सकता है। सामायिक का उद्देश्य है स्वाभिमान रहना किन्तु अभिमान नहीं करना। चेतना में शक्ति छिपी है, उसे पहचानें और उसे सकारात्मक मोड़ दे। जीवन में समता एवं सहिष्णुता के लिए सदा जिज्ञासु बने रहे। पहले स्वयं जागे फिर दूसरे को जगाएं। मंगल भावना करें- अज्ञान तमस अब दूर हो, फैले अमर उजास। अपने भीतर समता का, ऐसा दिवला चास।।
अपने जीवन में समता की स्थापना ही सामायिक का सार है। लाभ-अलाभ, सुख-दुख, जीवन-मरण, निंदा-प्रशंसा- इन सब घटनाचक्रांे में सम रहना, अप्रकम्प रहना साधना का सर्वोच्च शिखर है। इस शिखर पर आरोहण करने का साधन है सामायिक। हिंसा, असत्य, संग्रह- ये विषमता की ओर ले जाते हैं। इनसे मुक्त होने का अभ्यास है सामायिक। कलह, दोषारोपण, चुगली, निंदा, मिथ्या दृष्टिकोण- ये सब मानसिक शांति और सामुदायिक शांति के विघ्न हैं। इन विघ्नों का निवारण सामायिक की साधना से संभव है।
भगवान महावीर अन्दर और बाहर का युद्ध समाप्त कर जिस ऊंचाई तक पहुंचे वहां तक जाने में हमें भी कुछ पड़ाव अवश्य निश्चित करने होंगे और उसमें सामायिक की साधना हमारे लिए सहायक होगी-उन सभी कर्मों को अशुभ मानें जो निजी गुणों का अन्त कर दें। जिनका परिणाम औरों के लिए भी घातक बने। उन विचारों को त्याज्य जाने जिनसे औरों के अधिकार, भावना और सुख को गहरा आघात पहंुचे। कुछ तो करना ही पड़ता है। बिना काम किए कुछ हासिल नहीं होता। आज किए गए हमारे काम ही कल फल बनकर सामने आते हैं। लगातार खर्च करना है तो साथ-साथ जमा भी करना पड़ता है। लेखक रॉबर्ट लुइस स्टीवेंसन कहते हैं, ‘हर दिन क्या पाया, इससे मापा नहीं जाता। यह तो इससे तय होगा कि आप कैसे और कितने बीज बोते रहे हैं।’
आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा है कि सामायिक सचमुच अध्यात्म का प्रवेशद्वार है, शांतिमय जीवन का उपहार है जिससे विषमता मिटेगी एवं समता पनपेगी। विषमता का निदर्शन है जातिवाद, भाषा, वर्ण और संप्रदायवाद इनसे जुड़ी है मनुज की प्रतिबद्धता, जो  सहिष्णुता और समता छीन लेती है। मजहबी कट्टरता बनती है दुःस्वप्न, ज्वलंत बन जाता है मानवाधिकार का प्रश्न। एक ओर अहं का उत्कर्ष दूसरी ओर हीनता का प्रकर्ष इसमें यदि हो जाए सामायिक का अवतरण हो जाये तो मानव-मानव के बीच मैत्री का बीज के बीज प्रस्फुटित हो सकते है,, भेदजनित घृणा को समाप्त कर जीवन में प्रेम, सौहार्द, संतुलन एवं सद्भावना की जा सकती है।
सामायिक जीवन का शुद्ध ध्येय बने। वीतरागता तक पहुंचना हमारा संकल्प बने। जब भी सामायिक में हम संलग्न हो, हम आरोग्य, बोधि, समाधि का संकल्प करें। आंखें जब भी बंद कर प्रभु का ध्यान करें, प्रभु दर्शन के सिवाय कोई दृश्य न देखें। जब भी संस्कारांे की भीड़ में त्रासदी से उबा, थका मांदा मन दिशा बदले, कदम प्रभु तक पहुंचने वाली सीढ़ियों पर जाकर टिकें। ऐसी तड़प जागे कि मैं और तुम के बीच कोई भेद रेखा शेष न बचे। इस निःशेष की यात्रा में ही एक अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर मिलेगा- जो तू है वही मैं हूं, जो मैं हूं, वही तू है। तू और मैं के भेद को मिटाने की प्रक्रिया है सामायिक।
सामायिक आत्मदर्शन की साधना है। मगर एक बार जो सामायिक की साधना में उतर जाता है तो उसे अपने भीतर की प्रभु-सत्ता का अहसास हो जाता है। साहस, धैर्य, अभय, पुरुषार्थ, विश्वास और दिशा निर्णय की प्रज्ञा जाग जाती है। तब संसार समंदर को तैरने के लिए नौका के रूप में भी शरीर उसे पर्याप्त लगता है। मैं यहां यह दावा नहीं करती कि सामायिक करने वाला हर व्यक्ति वीतराग बन जायेगा, समस्याओं से मुक्त हो जायेगा, सिद्धि पा लेगा। किन्तु इतना जरूर होगा कि वह ऐसी जीवनशैली अपना लेगा, ऐसे मार्ग पर चरण बढ़ा लेगा कि समता की सिद्धि प्राप्त होगी। जिसने समता साध ली, जिसके जीवन में असंतुलन नहीं रहा ऐसा व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक कर लेता है, व्यावहारिक जीवन में उससे ज्यादा सुखी व्यक्ति दूसरा नहीं हो सकता।

 

प्रेषक  
(मंजुला जैन)
अध्यक्ष - सामायिक क्लब
34-बी, आरती बिल्डिंग, 85 तारदेव रोड़
 एसी मार्केट के पास, मुम्बई - 400034
मो. 9968126797


भारत मना रहा है  बाबा गुरु नानक जी  का 551 वां जन्मदिवस!

भारत मना रहा है बाबा गुरु नानक जी का 551 वां जन्मदिवस!

30-Nov-2020

गुरु नानक देव की जयंती इस वर्ष 30 नवंबर यानी आज है। आज का पावन दिन सिखों के पहले गुरु गुरु नानक की जयंती का प्रतीक है। यह सिख धर्म के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक है।

द  न्यूज़ इंडिया समाचार सेवा की  खबर के अनुसार, गुरुनानक सिख धर्म के संस्थापक थे। बिक्रमी कैलेंडर के अनुसार, उनका जन्म 1469 में कटक के पूर्णिमा पर हुआ था।

भाई बाला जन्मसखी के अनुसार, गुरुनानक का जन्म भारतीय चंद्र मास कार्तिक की पूर्णिमा पर हुआ था। सिख इसी वजह से नवंबर के आसपास गुरु नानक के गुरुपुरब को मनाते हैं।

आज का दिन हर सिख के लिए बेहद अहम है। आज हर कोई एक-दूसरे को गुरुपुरब यानी गुरु नानक जयंती की शुभकामनाएं देता है।

अगर आप भी अपने दोस्तों या परिजनों को शुभकामना संदेश भेजना चाहते हैं तो यहां हम आपको गुरु नानक जयंती के शुभकामना संदेशों की जानकारी दे रहे हैं।

 

सड़क पर  अन्नदाता बे दर्द सरकार

सड़क पर अन्नदाता बे दर्द सरकार

29-Nov-2020

सड़क पर  अन्नदाता बे दर्द सरकार
जब किसान अपने घर से निकलता है तो वो ना बारिश की परवाह करता है ना आँधी और तूफान की क्योकि किसान का जूनून एक सैलाब की तरह होता है, जो किसी की भी परवाह नही करता सब को बहा ले जाता है चाहे फिर सरकार ही क्यों ना हो!
दिल्ली में पंजाब हरियाणा के किसान सरकार के किसान विरोधी कानून का विरोध करते हुए पहुँच रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार और हरियाणा की खट्टर सरकार इन मासूम किसानों को आतंकवादी बता कर इन पर बल प्रयोग कर रहे हैं, किसानों के इस काफ़िले में लाखों की तादाद में बुजुर्ग् और महिलाए भी चल रही हैं, सरकार के इस जोर जुल्म में गोदी मीडिया भी इन्ही किसानों को खलनायक बनाने में लगी हुई है ?
किसानों के प्रदर्शन ‘दिल्ली चलो’ मार्च के तहत पंजाब से चले किसानों के दिल्ली के करीब पहुंचने के कारण दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय राजधानी की सभी सीमाओं पर सुरक्षा बहुत ज्यादा बढ़ा दी है. पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारी किसान अगर दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच भी जाते हैं तो भी उन्हें राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी. प्रदर्शन में शामिल पंजाब और हरियाणा के किसानों में से काफी लोग गुरुवार की देर शाम तक राष्ट्रीय राजधानी के पास पहुंच भी गए थे. किसानों के ‘दिल्ली चलो’ मार्च को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने सिंघू बॉर्डर पर यातायात बंद कर दिया है.
प्रशासन के द्वारा किसानों पर पथराव करने का आरोप लगा कर  बैरीकेड तोड़ने का झूठा आरोप लगाया जा रहा है।  जिससे किसान उग्र हो गए उन्हें रोकने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले और पानी की बौछार किये लाठी बरसाई फिर भी,किसानों के कदम नहीं रुके। किसान दिल्ली की तरफ बढ़ते चले।
ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही है और उसने घोषणा की है कि इन आंदोलनकारी किसानों को जहां भी दिल्ली में जाने से रोका जाएगा, वे वहीं पर बैठकर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर देंगे. योगेंद्र यादव की पार्टी 'स्वराज इंडिया' के किसान संगठन 'जय किसान आंदोलन' और भारतीय किसान यूनियन (लखोवाल ग्रुप) के किसान इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं. स्वराज इण्डिया का कहना है कि कि हरियाणा पुलिस ने एक एडवाइज़री जारी करके हरियाणा से आगे किसानों को रोकने की तैयारी कर ली है, किन्तु फिर भी किसान आंदोलन को रोकना किसी तरह सम्भव नहीं होगा.
पुलिस ने सड़कें खोदी फिर भी आगे बढ़े :
किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने कई जगह सड़कें खोद दी थी, लेकिन फिर भी किसान आगे बढ़ते गए। किसान खेतों के सहारे अपना रास्ता बनाते गए। पुलिस और किसानों के बीच लगातार दूसरे दिन बड़ा टकराव पानीपत में भी हुआ। बड़ी तादाद में किसान बैरिकेडिंग तोड़ते हुए दिल्ली की तरफ आगे बढ़ गए। पीछे-पीछे पंजाब के किसान भी थे। इनकी हरियाणा पुलिस से झड़प होती रही। पानीपत के सेक्टर-29 के थाने के पास पुलिस ने जेसीबी मशीन बुला ली और सड़कों को खोद दिया। कई किसान शिवा गांव के पास मेन हाईवे पर खेतों से होते हुए कई किलोमीटर लंबे बैरिकेड को पार कर दिल्ली की तरफ आगे बढ़ गए।

हरियाणा के किसानों का साथ मिला :
किसानों का हुजूम जब दिल्ली बॉर्डर के पास पहुंचा तो कमान हरियाणा के किसानों ने संभाली। पीछे-पीछे पंजाब के किसानों का जत्था आ रहा था। हरियाणा के किसानों का कहना था कि दिल्ली से सटे सिंघु बॉर्डर पर जो पुलिस तैनात है, वह हरियाणा के किसान नेताओं को जानती है। पंजाब से किसान भाई आए हैं, वो हमारे मेहमान हैं। इसलिए हम उन्हें आगे नहीं करेंगे, बल्कि पुलिस की पहली लाठी हम खाएंगे।

वेस्ट यूपी के किसान भी सड़क पर उतरे, हाईवे जाम
भाकियू के आह्वान पर शुक्रवार को मेरठ समेत वेस्ट यूपी के सभी हाईवे को किसानों ने जाम कर दिया। किसान जगह-जगह धरने पर बैठ गए। किसानों के आंदोलन के कारण मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, बागपत समेत सभी जिलों में ट्रैफिक व्यवस्था धड़ाम हो गई। शाम में किसान सिवाया टोल पर पहुंच गए। आगे की रणनीति सिवाया टोल पर पहुंच रहे भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के निर्देश के तहत होगी। फिलहाल सिवाया टोल पर किसानों ने कब्जा कर टोल को फ्री कर दिया है। शनिवार की सुबह दिल्ली कूच का कार्यक्रम है।
भाकियू ने शुक्रवार को प्रदेशव्यापी हाइवे जाम करने का ऐलान किया था। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता के आह्वान के तहत मेरठ में दिल्ली-देहरादून हाइवे पर कंकरखेड़ा बाईपास में जिटौली के पास जिलाध्यक्ष मनोज त्यागी के नेतृत्व में सैकड़ो किसान पहुंच गए। ट्रैक्टर-ट्राली के साथ किसान हाइवे पर धरना देकर बैठ गए। इस दौरान वाहनों का आवागमन ठप कर दिया गया। पुलिस, प्रशासन के साथ हल्की नोंक-झोंक भी हुई। दोपहर बाद किसानों को सूचना मिली कि राकेश टिकैत मुजफ्फरनगर से कूच कर गए हैं। उसके बाद जिटौली में धरना समाप्त कर किसान सिवाया टोल पर पहुंच गए। उधर, हाइवे जाम के कारण मोहिउद्दीनपुर में भी जाम लग गया। वाहनों को मोहिउद्दीनपुर-खरखौदा मार्ग से निकाला गया। अब किसान सिवाया टोल पर बैठ गए हैं। शनिवार की सुबह दिल्ली कूच का कार्यक्रम है।

बिजनौर में किसानों ने 11 स्थानों पर लगाया जाम :
भाकियू ने किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के विरोध में व कृषि बिलों को वापस लिए जाने को लेकर किसानों ने बिजनोर जिले में दिल्ली पौड़ी हाइवे पर करीब 11 बजे जाम लगा दिया। भाकियू ने जिले में 11 स्थानों पर जाम लगाया। जाम में लोगों को फंसकर परेशानी से दो चार होना पड़ा। वहीं राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के पदाधिकारियों ने भी कृषि बिलों को वापस लिए जाने को लेकर जिले की पांचों तहसीलों में धरना दिया। आजाद किसान यूनियन ने भी कृषि बिलों को वापस लेने और किसानों को दिल्ली जाने से रोके जाने को लेकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन एडीएम प्रशासन को सौंपा। किसानों का जाम अभी भी जारी है।

मुजफ्फरनगर में जाम के बाद दिल्ली कूच :
मुजफ्फरनगर में राकेश टिकैत के नेतृव में किसानों ने खतौली और मंसूरपुर के बीच नावला कोठी के पास करीब तीन घंटे जाम लगाया। इसके बाद वह दिल्ली के लिए कूच कर गए। वहीं, किसानों के साथ झिंझाना थाने के गाड़ी वाला चौराहे पर मेरठ करनाल हाईवे को जाम कर दिया। सुबह 11 बजे ही भाकियू जिलाध्यक्ष के नेतृत्व में अनेक किसान गाड़ी वाला चौराहे पर पहुंच गए थे और उन्होंने हाईवे पर दरी बिछाकर वही बैठते हुए हाईवे को चक्का जाम कर दिया। इसके चलते हाईवे पर दोनों और कई कई किलोमीटर लंबे वाहनों की लाइन लग गई। पुलिस ने गांव के रास्तों से वाहनों को निकालने की भी व्यवस्था की गई है।

 

 

 

 


लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर कर रहा मोर मितान मोर संगवारी

लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर कर रहा मोर मितान मोर संगवारी

26-Nov-2020

"पुरुषों की अब है बारी, परिवार नियोजन में हो भागीदारी"

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रायपुर पुरुष नसबंदी पखवाड़ा के प्रथम चरण में "मोर मितान मोर संगवारी" कार्यक्रम लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर करने महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । इस कार्यक्रम के माध्यम से चौपाल लगाकर इच्छुक लक्ष्य दम्पत्तियों को पुरुष नसबंदी के विषय पर विस्तृत जानकारी देकर  समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है । इस समय प्रदेश में पुरूष नसबंदी के लियें मोबिलाइजेशन सप्ताह चल रहा है जोकि 27 नवंबर तक चलेगा । इस दौरान पुरूष नसबंदी हेतु संभावित लाभार्थियोंको पंजीकृत किया जा रहा है । इसके बाद 28 नवंबर से 4 दिसंबर तक नसबंदी की प्रक्रिया की जाएगी । पखवाड़े के अंतर्गत समस्त गतिविधियों को कोविड-19 से संबंधित समस्त सावधानियां को सुनिश्चित करते हुए मनाया जा रहा है ।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ मीरा बघेल बताया, प्रथम चरण के पुरुष नसबंदी पखवाड़े में "मोर मितान मोर संगवारी" कार्यक्रम के तहत योग्य और लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर करने के लिये विषय विशेषज्ञों द्वारा पुरुष और महिला नसबंदी पर फैली भ्रांतियॉ को दूर किया जा रहा है ।इस दौरान लोगों को बताया जा रहा है कि पुरुष नसबंदी बहुत ही सरल है और कम समय में होने वाली प्रक्रिया है। साथ ही इसमें कोई तकलीफ भी नही होती है। जबकि महिला नसबंदी कराना एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना पड़ता है और घरेलू कार्य भी प्रभावित होता है।

उन्होंने बताया, शत-प्रतिशत उपलब्धि प्राप्त करने के लियें प्रथम चरण की अवधि में जो लोग पूर्व में नसबंदी की सेवाएं प्राप्त कर चुके हैं, उन दम्पत्तियों को भी चौपाल में बुलाकर उनके माध्यम सेलोगों को प्रोत्साहित करने की अपील करने को कहा गया है। पुरुष नसबंदी से लाभ के बारे में इच्छुक दम्पत्तियों को जानकारी दी जा रही है  ताकि दम्पत्ति बिना कोई भय अथवा दबाव के निर्भीक होकर नसबंदी की सेवाएं प्राप्त कर सकेंगे। प्रथम चरण की अवधि पर चौपाल कार्यक्रम के दौरान पुरुष नसबंदी को बढ़ावा देने हेतु शासन द्वारा विशेष पखवाड़ा का आयोजन किया जा रहा है। चौपाल में पुरुष नसबंदी हेतु प्रोत्साहित करने आये दम्पत्ति संजय (बदला हुआ नाम) ने बताया,“हमारी शादी वर्ष 2011 में हुई थी हमारे दो बच्चे है और मैं और मेरी पत्नी और बच्चे नही चाहते थे इसलिए मैंने पुरुष नसबंदी कराई है ।संजय कहते हैं कि नसबंदी करा लेने के उपरांत मैं पहले की तुलना में अपने आपको अधिक ऊर्जावान महसूस करताहूं । और अब पत्नी के गर्भधारण करने की चिंता भी नहीं रहती है । स्थाई साधन के रूप में पुरुष नसबंदी एक पक्का और अच्छा साधन है । पुरुष नसबंदी महिलाओं की तुलना में बहुत ही सरल प्रक्रिया है । साथ ही  संजय कहते हैं कि जैसा कि समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां फैली है की पुरुष नसबंदी कराने से क्षमता कम हो जाती है यह पूरी तरह से गलत है मैं और मेरी पत्नी पूरी तरह से एक दूसरे से संतुष्ट हैं।“

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हाफिज सईद की सजा कोरा दिखावा है या सच?

हाफिज सईद की सजा कोरा दिखावा है या सच?

23-Nov-2020

हाफिज सईद की सजा कोरा दिखावा है या सच?
 -ः ललित गर्ग:-

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लगता है पाकिस्तान ने ठान ली है कि वो नहीं सुधरेगा। अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेगा। भारत ने दो-दो बार पाकिस्तान को घर में घुसकर सबक सिखाया लेकिन पाकिस्तान सीधी राह पर आने को तैयार नहीं। पाकिस्तान की अर्थ-व्यवस्था चैपट है, जनजीवन त्राहि-त्राहि कर रहा है, अस्त-व्यस्त है, फिर भी वह अपनी आन्तरिक स्थितियों को सुधारने की बजाय वह आतंकवाद को बल देता है, दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए आतंकवाद के विरोधी होने ढोंग करता है। आखिर कब उसे सद्बुद्धि मिलेगी? लश्करे तैयबा के संस्थापक और वैश्विक आतंकी हाफिज सईद को पाकिस्तान की एक अदालत ने जो दस साल की कैद की सजा सुनाई है, वह उसके ढ़ोग एवं पाखण्डी होने को ही दर्शा रहा है। भले ही दुनिया को पाकिस्तानी न्यायपालिका के इस फैसले से पहली नजर में यही संदेश गया है कि आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान सरकार के रूख में सख्ती आयी है और वह आतंकी सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या पाकिस्तान की आतंकवाद को पोषण देने एवं पल्लवित करने की मानसिकता में बदलाव आया है? आतंकियों, उनके संगठनों और साम्राज्य को लेकर पाकिस्तान सरकार ने क्या सही में कड़ा रूख अपना लिया है? ऐसा लगता नहीं है, यह सब कोरा दिखावा है, अन्तर्राष्ट्रीय दबावों का परिणाम है।
दुनिया के खूंखार आतंकवादियों में शुमार हाफिज सईद को आतंकी वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) के दो मामलों में पाकिस्तान की एक अदालत ने भले ही सजा सुनाई हो, उसकी संपत्ति जब्त करने का निर्देश भी दिया हो और 1.1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया हो, यदि यह सच है तो दुनिया का बड़ा आश्चर्य है। क्योंकि हाफिज सईद को सजा, उसे जेल में बंद रखने और उसके संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें हैरानी इसलिए पैदा करती हैं क्योंकि यह पाकिस्तान का झूठ और पाखंड है। सईद को सजा पहले भी होती रही है और ऐसी कार्रवाइयां कर पाकिस्तान दुनिया की आंखों में धूल झोंकता रहा है, गुमराह करता रहा है। सवाल यह है कि अगर सईद और उसके संगठन के खिलाफ पाकिस्तान सरकार इतनी सख्त है तो फिर कैसे सईद जेल से आतंकी अभियानों को अंजाम देने में लगा है? तीन-चार दिन पहले जम्मू कश्मीर में नगरोटा में बड़ा हमला करने वाले आतंकी लश्कर के ही थे।
हाफिज सईद के आतंकवाद एवं आतंकवादी घटनाओं का लम्बा, घिनौना एवं अमानवीय चेहरा रहा है। वह भारत सहित दुनिया में आतंकवाद को पनपाने वाला मुखर आतंकवादी है। उल्लेखनीय है कि भारत को पिछले काफी सालों से हाफिज सईद की तलाश है। सईद साल 2008 में मुंबई में हुए सीरियल बम धमाकों का मास्टरमाइंड है। इस हमले में छह अमेरिकियों सहित 164 लोगों की मौत हो गई थी। अमेरिका ने सईद के सिर पर एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। वह आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक है। पाकिस्तान में वो जमात-उद-दावा नामक संगठन चलाता है। अमेरिकी सरकार की वेबसाइट रिवार्ड्स फॉर द जस्टिस में भी हाफिज सईद को जमात-उद-दावा, अहले हदीद और लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक बताया गया है। अहले हदीद एक ऐसा इस्लामिक संगठन है जिसकी स्थापना भारत में इस्लामिक शासन लागू करने के लिए की गई है, जो लगातार भारत में आतंकवादी हमले करता रहा है।
वर्ष 2006 में मुंबई ट्रेन धमाकों में भी हाफिज सईद का हाथ रहा। 2001 में भारतीय संसद तक को सईद ने निशाना बनाया। वो एनआइए की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल है। मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से उसे सौंपने को कहा था। सभी हमलों में उसके आतंकी संगठनों की भूमिका के अकाट्य प्रमाण भी पाकिस्तान को दिये जा चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान तो इस बात से ही इंकार करता रहा है कि हमलों के असली साजिशकर्ता उसके यहां मौजूद हैं। बल्कि पाकिस्तान तो लगातार सईद को आतंकी मानने से भी इनकार करता रहा है। भारत समेत अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, रूस और ऑस्ट्रेलिया ने इसके दोनों संगठनों को प्रतिबंधित कर रखा है।
हाफिज सईद एवं उसे संरक्षण देने वाला पाकिस्तान दुनिया में किसी अच्छे या नेक काम के लिए नहीं, बल्कि आतंकवाद फैलानेवाले देश के रूप में जाना जाता है। उसे यह तमगा दशकों तक उसके करीबी मददगार रहे अमेरिका ने ही दिया है। आतंकवाद के खात्मे के लिए अमेरिका से पािकस्तान को जो पैसा मिलता रहा है, वह उसे आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल करता रहा। खुद अमेरिका की एजेंसियां इस बात का खुलासा कर चुकी है। अमेरिका पर सबसे बड़े आतंकी हमले के असली सूत्रधार अलकायदा सरगना उसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने अपने यहां छिपाए रखा था। दरअसल आतंकवाद पाकिस्तान की सरकारी नीति का हिस्सा है। यह बात भी दुनिया से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ ही आतंकी सगंठनों के पैसे, हथियार और प्रशिक्षण मुहैया कराती है। इन कटू सच्चाइयों एवं खौफनाक स्थितियों के चलते ही अमेरिका के वित्त विभाग ने सईद को विशेष रूप से चिह्नित वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है।
दिसंबर 2008 में उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत आतंकवादी घोषित किया गया था। एफएटीएफ की ‘ग्रे’ सूची में बने रहने से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और यूरोपीय संघ से वित्तीय मदद मिलना मुश्किल हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से आर्थिक मदद मिलने में उसे जिस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है उससे छुटकारा पाने के लिए एवं लगातार नकदी संकट से जूझ रहे देश के लिए और दिक्कतें बढ़ेंगी, इन्हीं स्थितियों को देखते हुए पाकिस्तान अब मजबूरन हाफिद सईद जैसों के खिलाफ दिखावे के तौर पर कुछ कदम उठा रहा है। पुलवामा हमले की बात तो खुद पाकिस्तान सरकार के मंत्री ने हाल में संसद में स्वीकार की। इस बात के भी प्रमाण सामने आ चुके हैं कि मुंबई बम कांड का सरगना दाउद इब्राहिम पाकिस्तान में सेना और आइएसआइ की पनाह में रह रहा है, लेकिन पाकिस्तान इस हकीकत को भी झुठलाता रहा है और दाऊद को अब तक भारत को नहीं सौंपा है। वास्तव में पाकिस्तान यदि आतंकवाद के खिलाफ हुआ है तो हाफिद सईद जैसे आतंकी को वह भारत को सौंपे। उस जैसे आतंकियों की असली सजा तो यही भारत उन्हें सजा दे। इसके लिये पाकिस्तान पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनना चाहिए।
भारत ही नहीं, विश्व के जन-जीवन आतंकमुक्त बनाने के लिये पाकिस्तान की आतंकवादी स्थितियों पर कड़ा कदम उठाना एवं दबाव बनाना जरूरी है, इसी से अनेक बड़ी समस्याओं का समाधान संभव है, इसी से पाकिस्तान की बदतर होती स्थितियों में भी सुधार होगा। इसी से दुनिया से आतंकवाद एवं युद्ध जैसी ज्वलंत समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। विश्व की सभ्यता और संस्कृति को अहिंसा एवं आतंकमुक्ति की ओर अग्रसर करने के लिये पाकिस्तान को सुधरना ही होगा, इसी से उनके भी बिगड़ते हालातों पर अंकुश लग सकेगा। प्रेषक

 

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


राजनीतिक दलों को मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं?

राजनीतिक दलों को मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं?

21-Nov-2020

मुसलमानों का मसीहा कौन ?
एम.एच. जकारिया  
हमारे देश की विडम्बना ही कही जाएगी  हर जाती धर्म को अपनी बात करने का पूरा अधिकार है लेकिन जब मुसलमान अपने हक़ और अधिकार की बात करता है तो उसे गद्दार और देश द्रोही कहा जाता है.
बिहार चुनाव के बाद स्थिति स्पष्ट होती जा रही है, जहां महाराष्ट्र में कट्टर हिन्दू विचारधारा रखने वाले संगठन शिव सेना को कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस समर्थन दे सकती है लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM से ना समर्थ  लेना चाहती है और ना देना इसी लिए बिहार मे NDA महागठबंधन सरकार बनाने से चूक गई? इसे कौन सी  (धर्म निरपेक्षता )सेक्यूरिलजम कहेंगे आज़ादी के बटवारे के बाद से ही देश का मुस्लिम समुदाय अपना नेतृत्व तलाश करने में लगा हुआ  है, 2014 के बाद मुसलमान अपने आप को  सेक्यौरिलज्म के नाम आशहाय और बहुत हद तक ठगा हुआ महसूस करने लगा है ,क्योकि जिन पर विश्वास कर वोट दिया उन्हीं लोगो ने उनका शोसन किया वोट लेते रहे वोट बैंक समझते रहे, इसके लिए बहुत हद तक अशिक्षा  और गरीबी इसका बड़ा मूल  कारण रही है, क्योकि आज तक मुसलमानों को  मज़हबो मस्लाको और शिया सुन्नी वहाबी में बाँट कर मुस्लिम धर्म गुरु अपना भला करते रहे और अपना घर भरते रहे क्योकि इन्हे भी अपने नेतृत्व को खोने का सबसे ज्यादा भय और डर था, इस लिए इनके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को ये अपने अनुयाई से पिटवाते  और  प्रताड़ित करते रहे क्योकि राजनैतिक दल इन धर्म गुरुवो को मैनेज करते रहे है , इसी लिए अब तक भारतीय मुसलमानों का राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता है ना किसी भी धर्म  निर्पक्ष राजनैतिक दल मे जो खुल कर मुसलमानों की आवाज़ को उठाने का काम किया हो सिवाय असदुद्दीन ओवैसी और बद्रुद्दीन अजमल के लेकिन इन्हे कथित धर्म  निरपेक्ष दल हमेशा से दबाते या दूरी बनाते रहे हैं "क्यो" ?

जब भी मुसलमानों के अधिकारों की बात होती संवैधानिक संस्थाओं में संसद में तो धर्म  निरपेक्ष दलों से जीते हुए मुस्लिम सांसदों के मुह में ताला क्यो  लगवा दिया जाता हैं, क्योकि कही ना कही तथा कथित ये धर्म  निरपेक्ष राजनैतिक दल भी उन्ही विचार धारा को को फालो करते हैं जो की दक्षिण पंथी विचारों को समर्थन देती रही है।  वैसे मुसलमान नेता तो बी जे पी में भी है !

  लेकिन अब इन छद्म सेक्युलरवादियो  को बहुत हद तक मुसलमान समझने लगा है क्योकि जातीवाद की राजनीति तो हर राज्य में मे हो रही हैं दलित, ओ बी सी, कुर्मी, तो फिर  मुसलमान क्यो नहीं , अब इन मस्लाको से हट कर अपने अधिकारो लिए मुसलमानों को अपने अधिकारों को समझना होगा ! आप किसी भी मस्लक के  मानने  वाले हो आपको  बेशक मानिये  लेकिन अपने अधिकारों के लिए इन्हे बीच मत लाइए अपने अधिकारों को जानिए अपनी इबादत को राजनीती से जोड़ने वालो को मुँह तोड़ जवाब दीजिये  अपने अधिकारों के   लिए लड़िये  
भारतीय संविधान को समझ  कर  अपने हक़ की लडाई लड़ने वालों को पहचाना  कर  अपना वोट दीजिये कौन आपके अधिकारो  के लिए आवाज़ उठा रहा है। और कौन आपको अपना वोट बैंक बना कर उपयोग करता जा  रहा है, तथा कथित सेक्युलर दलों ने मुसलमानों की मानसिकता को दल विशेष का डर और भय दिखा कर जकड़ रखा था जिससे मुसलमानों को बाहर निकलना होगा

बिहार चुनाव के बाद हर तरफ से लोग असदुद्दीन ओवैसी के ऊपर प्रहार कर रहे हैं कोई उन्हें वोट कटवा बता रहा है कोई उन्हें भाजपा की बी टीम बता रहा है तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी लगातार असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी पर वोट कटवा होने और बीजेपी की बी टीम होने जैसा इल्जाम लगा रही है यह इल्जाम सिर्फ असदुद्दीन ओवैसी या उनकी पार्टी पर नहीं बल्कि उनको वोट देने वाले हजारों लाखों वोटर्स के ऊपर भी इल्जाम है। क्या कांग्रेस ने तेजस्वी यादव की सीटों को कम करने का काम नहीं किया! क्या मुसलमान हमेशा दूसरी सियासी पार्टियों का वोटर्स बन कर रहे क्या वह अपनी पार्टी अपना नेता नहीं बना सकती है। यही तो हमारा लोकतंत्र है।

और सबसे अहम बिंदु यह है कि असदुद्दीन ओवैसी ने जिन 5 सीटों पर विजय हासिल की है वहां से मुसलमानों नहीं बल्कि हिंदू और, दलित भाइयों तथा अन्य इन सब का वोट मिला है किसी एक तबके का वोट पाकर कोई सीट नहीं जीतता है इस बात को हमें समझना होगा झूठी और जबरदस्ती निराधार बातें करने से कोई फायदा नहीं है

2 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत वाले समुदायों ने भी अलग-अलग राज्यों में अपने जातिय आधार पर एक क्षेत्रीय दल बना रखें हैं लेकिन 10 फीसदी से लेकर 30 फीसदी वाले मुस्लिम समुदाय ने एक भी क्षेत्रीय दल नहीं बनाया । यानी मुस्लिम समुदाय ने बीजेपी को रोकने के नाम स्वंय को सत्ता से दूर रखकर कांग्रेस,  सपा, बसपा , राजद , तृणमूल कांग्रेस पर विश्वास करते हुए को सत्ता सौपते रहे । जबकि इन सभी दलों ने कभी भी बीजेपी को रोकने के लिए प्रयास नहीं किया । यदि प्रयास करते तो सभी दल गठबंधन करके चुनाव लङते । और सबसे अहम बात यह है कि यह सभी दल कभी न कभी बीजेपी के साथ सत्ता का मज़ा ले चुके हैं। बस एक मुस्लिम समुदाय हैं जो सबसे अधिक संख्या में होने के बावजूद भी न तो क्षेत्रीय दल बनाया और न ही राजनीति करना सीखा। सभी जातियों की तरह यदि मुसलमान  भी क्षेत्रीय दल बनाते तो आज मुसलमानो की दशा और दिशा कुछ और ही होता जिसका ताज़ा तरीन उदाहरण बिहार, मे देखा जा सकता हैं। जहां मुसलमानो ने एक जुट होकर सेकुलर पार्टियों को नकार दिया जिन्होंने मुसलमानो को बस कोई  एकाध एम ए ले या सांसद का टिकट दे कर  खुश  कर दिया जाता है ! बाद में यही जनप्रतिनिधि कठपुतली की तरह नाचते है !
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में चार करोड़ से ज्यादा वोटिंग हुई थी और इनमें से 1.24 फीसद वोट एआईएमआईएम को मिले हैं। और कांग्रेस को सबसे ज्यादा प्रॉब्लम इन 1.24% वोटों से है। 2015 में ओवैसी की पार्टी को 0.5% वोट मिले थे। मतलब यह हुआ कि ओवैसी की पार्टी ने तरक्की की। अगर आप इतने ज्यादा धर्मनिरपेक्ष अर्थात सेकुलर हैं और मुसलमानों के वोट पर अपने अधिकार को जताते हैं तो क्यों नहीं ओवैसी की पार्टी को अपने गठबंधन में मिला लिया अगर शायद मिला लिया होता तो आपकी 10 से 12 सीटों में बढ़ोत्री हो सकता था। शायद आपको मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं वह भी पढ़ा लिखा।

सबसे पहली बात तो यह है कि जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं सब को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह चुनाव लड़ें और अगर कांग्रेस को या किसी पार्टी को यह लगता है कि ओवैसी की पार्टी के लोगों से उनका वोट कट जाता है तो जितनी पार्टियां हैं सबके ऊपर इलेक्शन लड़ने पर रोक लगा दें और अकेले चुनाव लड़ें । यह कैसी मूर्खता पूर्ण बातें हैं।

दर असल में राहुल गांधी और सोनिया जी को दिग्भ्रमित किया जा रहा है क्योकि कुछ लोग इन्हे भटका रहे हैं जो कांग्रेस को धीरे धीरे सत्ता से हटाना चाहते हैं, कांग्रेस मे यही विचार धारा के लोग दीमक की तरह चाटने मे लगे हुए जिसका उदाहरण है, ज्योतिर् आदित्य सिंधिया,रीता बहुगुणा जैसे लोग
जिन्हे समझना होगा?

 

 


सोनिया गांधी को डॉक्टर्स ने दिल्ली से बाहर रहने की दी सलाह

सोनिया गांधी को डॉक्टर्स ने दिल्ली से बाहर रहने की दी सलाह

20-Nov-2020

मीडिया रिपोर्ट 

नई दिल्ली : दिल्ली में वायु प्रदूषण के हालात गंभीर होने की पृष्ठभूमि में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सीने में संक्रमण की स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने कुछ दिनों के लिए राष्ट्रीय राजधानी से दूर रहने की सलाह दी है. पार्टी सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी.

सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी कुछ दिनों के लिए गोवा या चेन्नई में रह सकती हैं. उन्होंने कहा कि शुक्रवार दोपहर सोनिया के दिल्ली से रवाना होने की संभावना है. उनके साथ राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाद्रा भी जा सकते हैं. 
सूत्रों का कहना है कि गत अगस्त महीने में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद से सोनिया गांधी चिकित्सा निगरानी में हैं और चिकित्सक उनके सीने में सक्रमण के लगातार बने रहने से चिंतित हैं. खासकर उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि दिल्ली में वायु प्रदषण की मौजूदा स्थिति उनकी सेहत के प्रतिकूल है.

कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि वायु प्रदूषण के कारण सोनिया के सीने में संक्रमण और अस्थमा बढ़ गया है और चिकित्सकों ने उन्हें कुछ दिनों के लिए दिल्ली से बाहर जाने की सलाह दी है. सोनिया गांधी ऐसे समय दिल्ली से बाहर जा रही है जब बिहार चुनाव में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर पार्टी के भीतर से ही आत्मचिंतन की मांग उठ रही है.कांग्रेस अध्यक्ष 30 जुलाई को सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती हुईं थीं जहां से कुछ दिनों बाद उन्हें छुट्टी मिली थी. फिर 12 सितंबर को वह अपनी नियमित चिकित्सा जांच के लिए विदेश गईं थीं और उनके साथ पुत्र राहुल गांधी भी गए थे. इस कारण दोनों संसद के मानसून सत्र में शामिल नहीं हो सके थे.


बचपन की उपेक्षा आखिर कब तक?

बचपन की उपेक्षा आखिर कब तक?

19-Nov-2020

‘सार्वभौमिक बाल दिवस’ 20 नवंबर, 2020 पर विशेष
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ललित गर्ग-

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संपूर्ण विश्व में ‘सार्वभौमिक बाल दिवस’ 20 नवंबर, को मनाया जाता है। इस दिवस की स्थापना वर्ष 1954 में हुई थी। इस दिवस को “अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस” भी कहा जाता है। बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूकता, अंतर्राष्ट्रीय बाल संवेदना तथा बच्चों के कल्याण, शिक्षा एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। बच्चों का मौलिक अधिकार उन्हें प्रदान करना इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें शिक्षा, सुरक्षा, चिकित्सा मुख्य रूप से हैं। विश्वस्तर पर बालकों के उन्नत जीवन के ऐसे आयोजनों के बावजूद आज भी बचपन उपेक्षित, प्रताड़ित एवं नारकीय बना हुआ है, आज बच्चों की इन बदहाल स्थिति की जो प्रमुख वजहें देखने में आ रही है वे हैं-सरकारी योजनाओं का कागज तक ही सीमित रहना, बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, माता-पिता की आर्थिक विवशताएं, समाज का संवेदनहीन होना एवं गरीबी, शिक्षा व जागरुकता का अभाव है।
सार्वभौमिक बाल दिवस पर बच्चों के अधिकार, कल्याण, सम्पूर्ण सुधार, देखभाल और शिक्षा के बारे में लोगों को जागरूक किया जाता है। दुनिया में सभी जगहों पर बच्चों को देश के भविष्य की तरह देखते थे। लेकिन उनका यह बचपन रूपी भविष्य आज अभाव एवं उपेक्षा, नशे एवं अपराध की दुनिया में धंसता चला जा रहा है। बचपन इतना डरावना एवं भयावह हो जायेगा, किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। आखिर क्या कारण है कि बचपन बदहाल होता जा रहा है? बचपन इतना उपेक्षित क्यों हो रहा है? बचपन के प्रति न केवल अभिभावक, बल्कि समाज और सरकार इतनी बेपरवाह कैसे हो गयी है? यह प्रश्न सार्वभौमिक बाल दिवस मनाते हुए हमें झकझोर रहे हैं।
सरकारों को कानूनों और नीतियों को बदलने और बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए व्यापक प्रयत्नों की अपेक्षा है। बच्चों को जीवित रहने और विकसित करने के लिए आवश्यक पोषण भी जरूरी है। साथ ही, बच्चों को हिंसा और शोषण से बचाना आवश्यक है। इसने बच्चों को अपनी आवाजें सुनने और अपने समाजों में भाग लेने में सक्षम बनाया जाना आदि जरूरतों को देखते हुए इस दिवस की प्रासंगिकता है। जब हम किसी गली, चैराहे, बाजार, सड़क और हाईवे से गुजरते हैं और किसी दुकान, कारखाने, रैस्टोरैंट या ढाबे पर 4-5 से लेकर 12-14 साल के बच्चे को टायर में हवा भरते, पंक्चर लगाते, चिमनी में मुंह से या नली में हवा फूंकते, जूठे बर्तन साफ करते या खाना परोसते देखते हैं और हम निष्ठुर बन रहते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों व गरीबी के मार से बेहाल होकर इस नारकीय कार्य करने को विवश है। कूड़ों के ढेर से शीशी, लोहा, प्लास्टिक, कागज आदि इकट्ठा करके कबाड़ की दुकानों पर बेचते हैं। इससे प्राप्त पैसों से वह अपने व परिवार का जीविकोपार्जन करते हैं। लेकिन सार्वभौमिक बाल दिवस जैसे आयोजनों के बावजूद कब तक हम बचपन को इस तरह बदहाल, प्रताड़ित एवं उपेक्षा का शिकार होने देंगे।
आज का बालक ही कल के समाज का सृजनहार बनेगा। लेकिन कमजोर नींवों पर हम कैसे एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं? हमारे देश में भी कैसा विरोधाभास है कि हमारा समाज, सरकार और राजनीतिज्ञ बच्चों को देश का भविष्य मानते नहीं थकते लेकिन क्या इस उम्र के लगभग 25 से 30 करोड़ बच्चों से बाल मजदूरी के जरिए उनका बचपन और उनसे पढने का अधिकार छीनने का यह सुनियोजित षड्यंत्र नहीं लगता? यह कैसी विडम्बना है कि जब इस उम्र के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, खानदानी व्यवसाय के नाम पर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षा, खेलकूद और सामान्य बाल सुलभ व्यवहार से वंचित किया जा रहा है और हम अपनी पीठ थपथपाए जा रहे हैं। बच्चों को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर हकीकत में हम उन्हें पैसा कमाकर लाने की मशीन बनाकर अंधकार में धकेल रहे हैं।
पारिवारिक काम एवं आर्थिक बदहाली के नाम पर अब बचपन की जरूरतों को दरकिनार कर खुलेआम बच्चों से काम कराया जा सकता है, नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने इन स्थितियों पर कड़ा विरोध व्यक्त किया है। कुछ बच्चें अपनी मजबूरी से काम करते हैं तो कुछ बच्चों से जबरन काम कराया जाता है। यदि गौर करें तो हम पाएंगे कि किसी भी माता-पिता का सपना अपने बच्चों से काम कराना नहीं होता। हालात और परिस्थितियां उन्हें अपने बच्चों से काम कराने को मजबूर कर देती हैं। पर क्या इसी आधार पर उनसे उनका बचपन छीनना और पढने-लिखने की उम्र को काम की भट्टी में झोंक देना उचित है? ऐसे बच्चे अपनी उम्र और समझ से कहीं अधिक जोखिम भरे काम करने लगते हैं। वहीं कुछ बच्चे ऐसी जगह काम करते हैं जो उनके लिए असुरक्षित और खतरनाक होती है जैसे कि माचिस और पटाखे की फैक्टरियां जहां इन बच्चों से जबरन काम कराया जाता है। इतना ही नहीं, लगभग 1.2 लाख बच्चों की तस्करी कर उन्हें काम करने के लिए दूसरे शहरों में भेजा जाता है। इतना ही नहीं, हम अपने स्वार्थ एवं आर्थिक प्रलोभन में इन बच्चों से या तो भीख मंगवाते हैं या वेश्यावृत्ति में लगा देते हैं।
देश में सबसे ज्यादा खराब स्थिति है बंधुआ मजदूरों की जो आज भी परिवार की समस्याओं की भेंट चढ़ रहे हैं। चंद रुपयों की उधारी और जीवनभर की गुलामी बच्चों के नसीब में आ जाती है। महज लिंग भेद के कारण कम पढ़े-लिखे और यहां तक कि शहरों में भी लड़कियों से कम उम्र में ही काम कराना शुरू कर दिया जाता है या घरों में काम करने वाली महिलाएं अपनी बेटियों को अपनी मदद के लिए साथ ले जाना शुरू कर देती हैं।  कम उम्र में काम करने वाले बच्चे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। साथ ही उनकी सेहत पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी उनका शारीरिक विकास समय से पहले होने लगता है जिससे उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इन बच्चों को न पारिवारिक सुरक्षा दी जाती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। बाल मजदूरी से बच्चों का भविष्य अंधकार में जाता ही है, देश भी इससे अछूता नहीं रहता क्योंकि जो बच्चे काम करते हैं वे पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर हो जाते हैं और जब ये बच्चे शिक्षा ही नहीं लेंगे तो देश की बागडोर क्या खाक संभालेंगे? इस तरह एक स्वस्थ बाल मस्तिष्क विकृति की अंधेरी और संकरी गली में पहुँच जाता है और अपराधी की श्रेणी में उसकी गिनती शुरू हो जाती हैं। वर्तमान संदर्भ में आधुनिक पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन शैली पर यह एक ऐसी टिप्पणी है जिसमें बचपन की उपेक्षा को एक अभिशाप के रूप में चित्रित किया गया है। सच्चाई यह है कि देश में बाल अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बच्चे अपराधी न बने इसके लिए आवश्यक है कि अभिभावकों और बच्चों के बीच बर्फ-सी जमी संवादहीनता एवं संवेदनशीलता को फिर से पिघलाया जाये। फिर से उनके बीच स्नेह, आत्मीयता और विश्वास का भरा-पूरा वातावरण पैदा किया जाए। श्रेष्ठ संस्कार बच्चों के व्यक्तित्व को नई पहचान देने में सक्षम होते हैं। अतः शिक्षा पद्धति भी ऐसी ही होनी चाहिए। सरकार को बच्चों से जुड़े कानूनों पर पुनर्विचार करना चाहिए एवं बच्चों के समुचित विकास के लिये योजनाएं बनानी चाहिए। ताकि इस बिगड़ते बचपन और भटकते राष्ट्र के नव पीढ़ी के कर्णधारों का भाग्य और भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। ऐसा करके ही हम सार्वभौम बाल दिवस को मनाने की सार्थकता हासिल कर सकेंगे।
प्रे्षकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 


कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी

कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी

18-Nov-2020

कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी
-ललित गर्ग-

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दीपावली पर कोरोना महामारी की अनेक बंदिशों एवं हिदायतों के बावजूद जिन्दगी की चकाचैंध ने हमारे लगातार असभ्य होने को ही उजागर किया। यह असभ्यता ही है कि अदालती फैसलों एवं सरकारी अपीलों के बावजूद पटाखों पर नियंत्रण की बात खोखली साबित हुई। पराली एवं वायु प्रदूषण से दमघोटू माहौल एवं कोरोना के लगातार फैलते जाने के संकट को ताक पर रखते हुए लोगों ने घोर लापरवाही बरतते हुए न केवल स्वयं बल्कि दूसरों के जीवन को संकट में डाला। जनता ने आतिशबाजी पर नियंत्रण के कानूनी फरमानों का मखौल उड़ाते हुए रात भर पटाखे छुड़ाए। यह कैसी शासन-व्यवस्था है? यह कैसा अदालतों की अवमानना का मामला है? यह सभ्यता की निचली सीढ़ी है, जहां तनाव-ठहराव की स्थितियों के बीच हर व्यक्ति अपने आमोद-प्रमोद के लिये अपनी जड़ों एवं दायित्वों से दूर होता जा रहा है। यह कैसा समाज है जहां व्यक्ति के लिए पर्यावरण, अपना स्वास्थ्य या दूसरों की सुविधा-असुविधा का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है, तो सिर्फ अपने मनोरंजन का। जीवन-शैली ऐसी बन गयी है कि आदमी जीने के लिये सब कुछ करने लगा पर खुद जीने का अर्थ ही भूल गया, यही कारण है जिन्दगी विषमताओं और विसंगतियों से घिरी होकर कहीं से रोशनी की उम्मीद दिखाई नहीं देती। क्यों आदमी मृत्यु से नहीं डर रहा है? क्यों भयभीत नहीं है? लोगों में पटाखे फोड़ने के लिए एक खास तरह का हिंस्र उत्साह, अराजकता एवं अनुशासनहीनता देखी गयी।
आज कोरोना महामारी के संकटकालीन समय में देश दुख, दर्द और संवेदनहीनता के जटिल दौर से रूबरू है, समस्याएं नये-नये मुखौटे ओढ़कर डराती है, भयभीत करती है। कोरोना ने समाज में बहुत कुछ बदला है, मूल्य, विचार, जीवन-शैली, वास्तुशिल्प सब में परिवर्तन है। आदमी ने जमीं को इतनी ऊंची दीवारों से घेर कर तंगदील बना दिया कि धूप और प्रकाश तो क्या, जीवन-हवा को भी भीतर आने के लिये रास्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं। सुविधावाद हावी है तो कृत्रिम साधन नियति बन गये हैं। चारों तरफ भय एवं डर का माहौल है। यह भय केवल कोरोना से ही नहीं, भ्रष्टाचारियों से, अपराध को मंडित करने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से एवं अपने दायित्व एवं जिम्मेदारी से मुंह फैरने वाले अधिकारियों से भी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अब भी ऐसे मुकाम पर हैं, जहां सड़क पर बाएं चलने या सार्वजनिक जगहों पर न थूकने जैसे कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए भी पुलिस की जरूरत पड़ती है। जो पुलिस अपने चरित्र पर अनेक दाग ओढ़े हंै, भला कैसे अपने दायित्वों का ईमानदारी एवं जिम्मेदारी से निर्वाह करेंगी। पुलिस का डंडा या सख्त कानून कभी भी इंसान को सभ्य नहीं बना सकते। अंदर से इच्छाशक्ति न हो तो कानूनों के पालन में इस दिवाली जैसी स्थिति होती है। सारे कानून-कायदों, अदालती या सरकारी आदेशों और पुलिस की कवायद के बावजूद पटाखे छूटते रहे। वैसे भी, भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में है, जहां शायद सबसे अधिक कानून होंगे, लेकिन हम कितना कानून-पालन करने वाले समाज हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
नरसी मेहता रचित भजन ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे’’ गांधीजी के जीवन का सूत्र बन गया था, लेकिन यह आज के आम लोगों का जीवनसूत्र क्यों नहीं बनता? क्यों नहीं आमजन पराये दर्द को, पराये दुःख को  एवं पराये जीवन को अपना मानते? क्यों नहीं जन-जन की वेदना और संवेदनाओं से अपने तार जोड़ते? बर्फ की शिला खुद तो पिघल जाती है पर नदी के प्रवाह को रोक देती है, बाढ़ और विनाश का कारण बन जाती है। देश की स्वास्थ्य-रक्षा में आज ऐसे ही बाधक तत्व उपस्थित हैं, जो जनजीवन में आतंक एवं संशय पैदा कर उसे मौत की अंधेरी राहों मेें, निराशा और भय की लम्बी काली रात के साये में धकेल रहे हैं। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होते हैं। पर यहां तो चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा व्याप्त है। हमारा राष्ट्र नैतिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक एवं व्यक्तिगत सभी क्षेत्रों में मनोबल के दिवालिएपन के कगार पर खड़ा है। और हमारा नेतृत्व गौरवशाली परम्परा, विकास और हर कोरोना खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार है, का नारा देकर अपनी नेकनीयत का बखान करते रहते हैं। पर उनकी नेकनीयती की वास्तविकता किसी से भी छिपी नहीं है, देश की राजधानी और उसके आसपास जिस तरह पटाखों पर लगे नियंत्रण की छीछालेदर हुई, उससे यह सहज ही जाहिर हो गया है। बात पुलिस की अक्षमता की नहीं है। उन कारणों की शिनाख्त करने की है, जिनके चलते एक आम नागरिक पर्यावरण या उसके अपने स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर मंडरा रहे खतरों के बावजूद लगातार उदासीन एवं लापरवाह क्यों होता जा रहा है।
कैसी विडम्बना है हमारे समाज की। किसी अनियमितता का पर्दाफाश करना पूर्वाग्रह माना जाता है। सत्य बोलना अहम् पालने की श्रेणी में आता है। साफगोही अव्यावहारिक है। भ्रष्टाचार को प्रश्रय नहीं देना समय को नहीं पहचानना है। आखिर नयी गढ़ी जा रही ये परिभाषाएं समाज और राष्ट्र को किन वीभत्स दिशाओं में धकेल रही है? विकासवाद की तेज आंधी के बावजूद हमारा देश, हमारा समाज तरह-तरह के बंधनों में आज भी जकड़ा हुआ है। उसमें न आत्मबल है, न नैतिक बल। सुधार की, नैतिकता की बात कोई सुनता नहीं है। दूर-दूर तक कहीं रोशनी नहीं दिख रही है। इन घनी अंधेरी रातों में हम कैसे विश्व गुरु बन पायेंगे?
नदी में गिरी बर्फ की शिला को गलना है, ठीक उसी प्रकार उन बाधक एवं असंवेदनहीन तत्वों को भी एक न एक दिन हटना है। यह स्वीकृत सत्य है कि जब कल नहीं रहा तो आज भी नहीं रहेगा। उजाला नहीं रहा तो अंधेरा भी नहीं रहेगा। जे पीर पराई जाने रे- भजन के बोल आज भी अनेक लोगों के हृदय को छूते है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हृदय को भी छू गया है तभी उन्होंने सबका साथ-सबका विकास एक विशिष्ट राष्ट्र कल्याणकारी उपक्रम जन-जन की पीड़ा को हरने के लिए प्रारंभ किया। राष्ट्र आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, वहां खड़े होकर यह स्पष्ट महसूस किया जा सकता है कि मोदी नीतियों का हार्द ही है परायी पीर को जानना। पराया दुख, पराया दर्द समझना। परायी पीर को समझने का ही अर्थ है उस पीड़ा को, उस तकलीफ को मिटाने का जी-जान से प्रयत्न करना। इसी से एक सभ्य व्यवस्था इंसानों के बीच बनेगी जिसमें पुलिस सड़कों से पूरी तरह से अनुपस्थित हो जाएंगी और सारी नागरिक गतिविधियां बिना उसके हस्तक्षेप के चलती रहेंगी। दरअसल, एक आदर्श राज्य की अवधारणा में पुलिस, अदालतें और जेल जैसी संस्थाओं एवं स्थितियों की जरूरत न होना ही हमारे सभ्य होने का प्रमाण है। इन दुर्लभ श्रेष्ठताओं को पाने के लिये कुछेक घंटों का अभ्यास पर्याप्त नहीं होता। उसके लिये सतत पुरुषार्थ एवं संकल्प की जरूरत है।  
प्रे्षकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 

 

 

 


महावीर हैं अंधकारों को हरने वाले दीपक

महावीर हैं अंधकारों को हरने वाले दीपक

14-Nov-2020

भगवान महावीर परिनिर्वाण दिवस, 14 नवम्बर, 2020
-ललित गर्ग-

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दीपावली को ही भगवान महावीर का परिनिर्वाण दिवस है। परिनिर्वाण से पूर्व महावीर ने जो शिक्षाएं दी, वे जन-जन के लिये अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य एवं निराशा से आशा की ओर जाने का माध्यम बनी। इसलिये भी जैन धर्म के अनुयायियों के लिये दीपावली का महत्व है। महावीर लोकोत्तम पुरुष हंै, उनकी शिक्षाओं की उपादेयता सार्वकालिक, सार्वभौमिक एवं सार्वदेशिक है, दुनिया के तमाम लोगों ने इनके जीवन एवं विचारों से प्रेरणा ली है। सत्य, अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह ऐसे सिद्धान्त हैं, जो हमेशा स्वीकार्य रहेंगे और विश्व मानवता को प्रेरणा देते रहेंगे। महावीर का संपूर्ण जीवन मानवता के अभ्युदय की जीवंत प्रेरणा है। लाखों-लाखों लोगों को उन्होंने अपने आलोक से आलोकित किया है। महावीर ने दीपावली की रात जो उपदेश दिया उसे हम प्रकाश पर्व का श्रेष्ठ संदेश मान सकते हैं। क्योंकि यह सन्देश मानव मात्र के आंतरिक जगत को आलोकित करने वाला है।

भगवान महावीर का मुक्ति दिवस हम जैसों के लिये जागने की दस्तक है। उन्होंने बाहरी लड़ाई को मूल्य नहीं दिया, बल्कि स्व कर सुरक्षा में आत्म-युद्ध को जरूरी बतलाया। उन्होंने जो कहा, सत्य को उपलब्ध कर कहा। उन्होंने सबके अस्तित्व को स्वीकृति दी। ‘णो हीणे णो अइरित्ते’-उनकी नजर में न कोई ऊंचा था, न कोई नीचा। उनका अहिंसक मन कभी किसी के सुख में व्यवधान नहीं बना। उन्होंने अपने होने का अहसास जगाकर अहं को खड़ा नहीं होने दिया। इसीलिये उनकी शिक्षाओं एवं उपदेशों का हमारे जीवन और विशेषकर व्यावहारिक जीवन में विशेष महत्व है। हम अपने जीवन को उनकी शिक्षाओं के अनुरूप ढाल सकें, यह अधिक आवश्यक है लेकिन इस विषय पर प्रायः सन्नाटा देखने को मिलता है। विशेषतः जैन समाज के लोग एवं अनुयायी ही महावीर को भूलते जा रहे हैं, उनकी शिष्याओं को ताक पर रख रहे हैं। दुःख तो इस बात का है कि जैन समाज के सर्वे-सर्वा लोग ही सबसे ज्यादा महावीर को अप्रासंगिक बना रहे हैं, महावीर ने जिन-जिन बुराइयां पर प्रहार किया, वे उन्हें ही अधिक अपना रहे हैं। हम महावीर को केवल पूजते हैं, जीवन में धारण नहीं करते हैं। हम केवल कर्मकाण्ड और पूजा विधि में ही लगे रहते हैं। महावीर का यह संदेश जन-जन के लिये सीख बने- ‘पुरुष! तू स्वयं अपना भाग्यविधाता है।’ औरों के सहारे मुकाम तक पहुंच भी गए तो क्या? इस तरह की मंजिलें स्थायी नहीं होती और न इस तरह का समाधान कारगर होता है।
भगवान महावीर कितना सरल किन्तु सटीक कहा हैं- सुख सबको प्रिय है, दुःख अप्रिय। सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। हम जैसा व्यवहार स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। यही मानवता है और मानवता का आधार भी। मानवता बचाने में है, मारने में नहीं। किसी भी मानव, पशु-पक्षी या प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना स्पष्टतः अमानवीय है, क्रूरतापूर्ण है। हिंसा-हत्या और खून-खच्चर का मानवीय मूल्यों से कभी कोई सरोकार नहीं हो सकता। मूल्यों का सम्बन्ध तो ‘जियो और जीने दो’ जैसे सरल श्रेष्ठ उद्घोष से है।
समय के आकाश पर आज कोरोना महामारी, युद्ध, शोषण, हिंसा जैसे अनगिनत प्रश्नों का कोलाहल है। जीवन क्यों जटिल से जटिलतर होता जा रहा है? इसका मूल कारण है कि महावीर ने जो उपदेश दिया हम उसे आचरण में नहीं उतार पाएं। इसी कारण मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था और विश्वास कमजोर पड़ा, धर्म की व्याख्या में हमने अपना मत, अपना स्वार्थ, अपनी सुविधा, अपना सिद्धान्त को जोड़ दिया। मनुष्य जिन समस्याओं से और जिन जटिल परिस्थितियों से घिरा हुआ है उन सबका समाधान महावीर के दर्शन और सिद्धांतों में समाहित है। हर व्यक्ति महावीर बनने की तैयारी करे, तभी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। महावीर वही व्यक्ति बन सकता है जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो, जिसमें कष्टों को सहने की क्षमता हो। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता एवं संतुलन स्थापित रख सके, जो मौन की साधना और शरीर को तपाने के लिए तत्पर हो। जिसके मन में संपूर्ण प्राणिमात्र के प्रति सहअस्तित्व की भावना हो। जो पुरुषार्थ के द्वारा न केवल अपना भाग्य बदलना जानता हो, बल्कि संपूर्ण मानवता के उज्ज्वल भविष्य की मनोकामना रखता हो।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्या सुख को स्थायी बनाया जा सकता है? क्या दुःख को समाप्त किया जा सकता है? इसका सीधा उत्तर होगा कि भौतिक जगत में ऐसा होना कभी संभव नहीं है। जब तक भौतिक जगत में जीएंगे तब तक यह स्वप्न लेना दिवास्वप्न है, कल्पना करना आकाश कुसुम जैसा है। आकाश में कभी फूल नहीं लगता। कमल के फूल लग सकता है, चंपक के फूल लग सकता है पर आकाश में कभी फूल नहीं लगता। यह असंभव बात है कि इंद्रिय जगत में आदमी जीए और वह सुख या दुःख एक का ही अनुभव करे, यह द्वंद्व बराबर चलता रहेगा। तब व्यक्ति के मन में एक जिज्ञासा पैदा होती है कि ऐसा कोई उपाय है जिससे सुख को स्थायी बनाया जा सके? इसका समाधान है स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार। इसके लिये जरूरी है हर क्षण को जागरूकता से जीना। उसको जीने के लिये भगवान महावीर ने कहा था-‘खणं जाणाहि पंडिए’, जो क्षण को जानता है, वह सुख और दुःख के निमित्त को जानता है।
महावीर ने जीवनभर अनगिनत संघर्षों को झेला, कष्टों को सहा, दुख में से सुख खोजा और गहन तप एवं साधना के बल पर सत्य तक पहुंचे, इसलिये वे हमारे लिए आदर्शों की ऊंची मीनार बन गये। उन्होंने समझ दी कि महानता कभी भौतिक पदार्थों, सुख-सुविधाओं, संकीर्ण सोच एवं स्वार्थी मनोवृत्ति से नहीं प्राप्त की जा सकती उसके लिए सच्चाई को बटोरना होता है, नैतिकता के पथ पर चलना होता है और अहिंसा की जीवनशैली अपनानी होती है। व्यावहारिक जीवन में यह आवश्यक है कि हम अहंकार को मिटाकर शुद्ध हृदय से अहिंसा, क्षमा, प्रेम, सत्य, अनेकांत को अपनाकर अपना जीवन पवित्र करें।
महावीर का संपूर्ण जीवन तप और ध्यान की पराकाष्ठा है इसलिए वह स्वतः प्रेरणादायी है। भगवान के उपदेश जीवनस्पर्शी हैं जिनमें जीवन की समस्याओं का समाधान निहित है। भगवान महावीर चिन्मय दीपक हैं। दीपक अंधकार का हरण करता है किंतु अज्ञान रूपी अंधकार को हरने के लिए चिन्मय दीपक की उपादेयता निर्विवाद है। वस्तुतः भगवान के प्रवचन और उपदेश आलोक पंुज हैं। ज्ञान रश्मियों से आप्लावित होने के लिए उनमें निमज्जन होना जरूरी है। महावीर आदमी को उपदेश दृष्टि देते हैं कि धर्म का सही अर्थ समझो। धर्म तुम्हें सुख, शांति, समृद्धि, समाधि, आज, अभी दे या कालक्रम से दे, इसका मूल्य नहीं है। मूल्य है धर्म तुम्हें समता, पवित्रता, नैतिकता, अहिंसा की अनुभूति कराता है। इसलिये महावीर बनने की कसौटी है-देश और काल से निरपेक्ष तथा जाति और संप्रदाय की कारा से मुक्त चेतना का आविर्भाव। महावीर एक कालजयी और असांप्रदायिक महापुरुष थे, जिन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को तीव्रता से जीया। वे इस महान त्रिपदी के न केवल प्रयोक्ता और प्रणेता बने बल्कि पर्याय बन गए।
भगवान महावीर की अनुभूतियों से जनमा सच है-धम्मो शुद्धस्स चिट्टई। धर्म शुद्धात्मा में ठहरता है और शुद्धात्मा का दूसरा नाम है अपने स्वभाव में रमण। यह नितान्त वैयक्तिक विकास की क्रांति है। जीवन की सफलता-असफलता, सुख-दुख, हर्ष-विषाद का जिम्मेदार सिवाय खुद के और कोई नहीं है। धर्म का महत्वपूर्ण पड़ाव यह भी है कि हम सही को सही समझे और गलत को गलत। सम्यक्त्व दृष्टि का यह विकास मुक्ति का ही नहीं, सफल एवं सार्थक जीवन का हस्ताक्षर है। इस मायने में धर्म पवित्रता का नया आकाश, नया मार्ग, नया विचार, नए शिखर छूने की कामना, कल्पना और सपने हैं।
भगवान महावीर का एक संुदर सूक्त है-एगे सु संपन्ने एगे शीलंपन्ने। एक व्यक्ति श्रुतसंपन्न है, किन्तु शीलसंपन्न नहीं है, दूसरा शीलसंपन्न तो है, किन्तु श्रुतसंपन्न नहीं है। यह दोनों ही अपूर्णता की स्थिति है, अधूरेपन की स्थिति है। चरित्र है, किन्तु पढ़ा-लिखा नहीं है तो भी अधूरापन है। समग्रता की स्थिति तब होगी जब श्रुतसंपन्न और शीलसंपन्न दोनो बनेंगे। शिक्षा में दोनों का समावेश होना चाहिए, जो आज नहीं है। आज विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान-विज्ञान की इतनी शाखाएं हो गई हैं, जितनी अतीत में कभी नहीं थीं। लेकिन नैतिकता का जितना ह्रास आज हुआ है और हो रहा है, उतना अतीत में कभी नहीं था।
आज के युग की जो भी समस्याएं हैं, चाहे कोरोना महामारी या पर्यावरण की समस्या हो, हिंसा एवं युद्ध की समस्या हो, चाहे राजनीतिक अपराधीकरण एवं अनैतिकता की समस्या, चाहे तनाव एवं मानसिक विकृतियां हो, चाहे आर्थिक एवं विकृत होती जीवनशैली की समस्या हो- इन सब समस्याओं का समाधान महावीर के सिद्धान्तों एवं उपदेशों में निहित है। इसलिये आज महावीर के पुनर्जन्म की नहीं बल्कि उनके द्वारा जीये गये आदर्श जीवन के अवतरण की अपेक्षा है। जरूरत है हम बदलें, हमारा स्वभाव बदले और हम हर क्षण महावीर बनने की तैयारी में जुटें तभी महावीर निर्वाण दिवस पर महावीर की स्मृति एवं स्तुति करना सार्थक होगा।
प्रे्षकः


(ललित गर्ग)
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NEP 2020 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचारों को दर्शाता है’

NEP 2020 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचारों को दर्शाता है’

12-Nov-2020

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय (MANUU) के प्रभारी कुलपति, प्रो एस.एम. रहमतुल्ला ने बुधवार को कहा।

 

“नई नीति ने प्रौद्योगिकी पर जोर दिया और मौलाना ने देश की स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दिनों में आईआईटी की स्थापना करके इसकी शुरुआत की।

उन्होंने कहा, “मौलाना आज़ाद के विचारों और देश के विकास में योगदान के लिए इस नीति के साथ आगे बढ़ना हमारी ज़िम्मेदारी है।”

जयंती समारोह
रहमतुल्लाह महान स्वतंत्रता सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के MANUU में जयंती समारोह को संबोधित कर रहे थे।

इस दिन को सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता था।

प्रो अब्दुल हमीद खान, निदेशक, मौलाना आज़ाद अध्यक्ष, मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, ने अपने ऑनलाइन व्याख्यान “असर-ए-हाज़िर मैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की मनवीत” (समकालीन समय में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की प्रासंगिकता) के माध्यम से, मौलाना पर अपनी छाप छोड़ी। आजाद के बहुआयामी, बहुआयामी व्यक्तित्व ने एक विद्वान, धर्मशास्त्री, पत्रकार, भाषाविद्, साहित्यकार, समाज सुधारक, और राजनेता को घेर लिया।

कट्टीमनी ने अपने संबोधन में कहा कि मौलाना के विचारों, उनके भाषणों और लेखन को सभी भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि मौलाना आज़ाद कौन हैं और उनका क्या योगदान है,” उन्होंने कहा कि यह मौलाना आज़ाद का बहुत अपमान है, अगर हम उन्हें विशेष समुदाय का व्यक्ति कहते हैं, तो वह एक भारतीय हैं और आजादी की लड़ाई लड़ी गई है भारत और विज्ञान, संस्कृति और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए मजबूत नींव रखी ”।

उन्होंने यूजीसी, आईआईटी और आईआईएससी आदि जैसे प्रमुख शिक्षा संस्थानों की स्थापना की। मौलाना ने हमेशा प्रौद्योगिकी, आधुनिक विज्ञान, मातृभाषा, भारतीय भाषाओं के बारे में बात की, उन्होंने टिप्पणी की।

कट्टीमनी ने यह भी बताया कि उन्होंने मौलाना आज़ाद की एक किताब का हिंदी में अनुवाद किया, जो प्रो। बी। शेख अली द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई थी।

 
 

बिहार की शानदार जीत के बाद AIMIM  के मुखिया ओवैसी ने पश्चिम बंगाल और यूपी में चुनाव लड़ने का ऐलान किया!

बिहार की शानदार जीत के बाद AIMIM के मुखिया ओवैसी ने पश्चिम बंगाल और यूपी में चुनाव लड़ने का ऐलान किया!

11-Nov-2020

बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की है। सीमांचल में मिली इस जीत से ओवैसी के हौसले काफी बुलंद नजर आ रहे हैं।

 सियासत डॉट कॉम की खबर के अनुसार, ओवैसी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दंगल में भी कूदने का एलान कर दिया है। इसके साथ ही उन्‍होंने दिग्विजय सिंह और कांग्रेस पर हमला बोला है, जो उन्‍हें बिहार चुनाव से पहले भाजपा की ‘बी’ टीम कह रही थी।
बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी 75 सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन गई है, वहीं भाजपा के खाते में 74 सीटें आई हैं।

ओवैसी ने बताया, ‘अब हमारी पार्टी पश्चिम बंगाल और उत्‍तर प्रदेश में भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। एक राजनीतिक पार्टी होने के नाते ये हमारा अधिकार है कि हम देश के किसी भी राज्‍य में चुनाव लड़ सकते हैं।

हमारी पार्टी को इस अधिकार से कोई वंचित नहीं कर सकता है।’ साथ ही उन्‍होंने कहा कि कांग्रेस और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को यह न सोचने की सलाह दी कि धर्मनिरपेक्षता उनके कारण जीवित है।

ओवैसी ने अपनी पार्टी की जीत का श्रेय सीमांचल की जनता को दिया। ओवैसी ने कहा कि हमारी राज्‍य की इकाई को इस जीत का पूरा श्रेय जाता है।

महागठबंधन के आरोपों का जवाब देते हुए ओवैसी ने कहा कि अगर बिहार में उनकी वजह से महागठबंधन को नुकसान हुआ है, तो फिर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में क्यों हार हुई? वहां तो हमारी पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही थी।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव के 243 सीटों के नतीजे सामने आ गए हैं।

एनडीए को 125, महागठबंधन को 110 और एआइएमआइएम, बसपा व दूसरे दलों को 8 सीटें मिली हैं। इस तरह एनडीए ने बहुमत हासिल कर लिया है। हालांकि, भी कुछ सीटों पर आधिकारिक तौर पर नतीजे घोषित नहीं किए गए हैं।

 

मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल ने बूढ़ा तालाब के आकर्षक तट पर ‘छत्तीसगढ़ लोककला शिल्प संसार‘ का किया अवलोकन

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बूढ़ा तालाब के आकर्षक तट पर ‘छत्तीसगढ़ लोककला शिल्प संसार‘ का किया अवलोकन

10-Nov-2020

मुख्यमंत्री ने स्वयं चॉक चलाकर बनाया मिट्टी का दीया
निःशक्तजन, अनाथ बालिकाओं और परित्यक्त महिलाओं को दिया दीपावली उपहार
जगमगाते परिसर में आसमान में उड़ाया आकाशदीप स्टॉलों से की दीपावली की खरीदी

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 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने बूढ़ा तालाब विवेकानंद सरोवर के हाल ही में हुए उन्नयन कार्य के उपरांत आज शाम इसके बेहद आकर्षक और रोशनी से जगमगाते तट पर ‘छत्तीसगढ़ लोककला शिल्प संसार‘ विक्रय-सह-प्रदर्शनी का अवलोकन किया। 
    
    मुख्यमंत्री यहां रायपुर प्रशासन की मदद से संचालित महिला स्व-सहायता समूहों ‘बिहान’, नगर-निगम के महिला स्व-सहायता समूहों, छत्तीसगढ़ माटीकला बोर्ड, बिलासा हेन्डलूम एम्पोरियम, छत्तीसगढ खाद्य एवं ग्रामोद्योग बोर्ड, छत्तीसगढ़ हस्त शिल्प बोर्ड के द्वारा बनाए गए मिट्टी और गोबर के आकर्षक दिये, पूजन-सामग्री, लोक शिल्प सामग्रियों सहित अन्य पारंपरिक कलाओं के माध्यम से निर्मित सामग्रियों का अवलोकन किया। 

    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर महिला स्व-सहायता समूहों की महिलाओं, दिव्यांगों और कुम्हारों से बातचीत की। उल्लेखनीय है कि रायपुर जिले की बिहान समूहों की महिलाएं न केवल मिट्टी और गोबर से बने आकर्षक दीये, मूर्तियां और पूजन-सामग्री बना रही है, बल्कि वे विभिन्न प्रकार के साबुन, बेकरी, कुकीज, आचार जैसी दर्जनों अन्य सामग्री भी बना रही हैं। इन सामग्रियों को बनाने में गोधन न्याय योजना भी बेहद सार्थक साबित हो रही हैं। इन सामग्रियों को आम नागरिकों के विक्रय के लिए रखा गया है। स्टॉल में नारायणपुर के स्व-सहायता समूह द्वारा बांस और बल्ब से बनायी गई रंग-बिरंगी आकर्षक झालर, कोण्डागांव स्व-सहायता समूह द्वारा टेराकोटा से बनाये गए कलात्मक दीये, महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा गोबर से निर्मित पुट्ठें से तैयार फाईल, वेस्ट पेपर से बनायी गई स्टेशनरी सामग्री, हैण्डलूम वस्त्र विक्रय के लिए रखे गए हैं। इस परिसर में बिलासा हैण्डलूम, शबरी एम्पोरियम के भी स्टॉल लगाये गए हैं। मुख्यमंत्री ने स्टॉलों से दीपावली की खरीदी भी की। उन्होंने दीया और पूजन-सामग्री भी खरीदी।

 

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कुम्हारों से मिट्टी में लगने वाले रॉयल्टी टैक्स को नहीं लेने के निर्देश 

   मुख्यमंत्री ने स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने स्टॉल में रखे चॉक देखकर अपने आपको नहीं रोक पाए और स्वयं भी कुम्हार की तरह मिट्टी के कलात्मक सामग्री बनाने वाले कलाकार की तरह बनकर अपने हाथों से दीया बनाया। उन्होंने इस अवसर पर अधिकारियों को कुम्हारों को उनके व्यवसाय को बढ़ावा देने वाले सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें मिट्टी में लगने वाले रॉयल्टी टैक्स को नहीं लेने के निर्देश दिए। 

    मुख्यमंत्री जब पैदल भ्रमण करते समय बेलमेटल विक्रय केन्द्र के समीप पहुंचे, तो वहां की कलाकारांे ने बस्तर का पारंपरिक वाद्य यंत्र तोंगा ‘तुरही‘ बजाने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने उनके अनुरोध को सहज होकर स्वीकारा और सुरीले स्वर से अनेक बार तोंगा बजाया। 

     बिहान स्टॉल में मुख्यमंत्री ने बालिका गृह की अनाथ बालिकाओं को उनके द्वारा राखी पर्व के अवसर पर बनाए गए राखियों के विक्रय से प्राप्त राशि से स्मार्ट फोन और हाथ घड़ियां प्रदान की। श्री बघेल ने इस अवसर पर आकांक्षा संस्था के 7 बच्चों, कोपलवाणी से 27 बच्चों, नवयुग दिव्यांग संस्था के 6 महिलाओं और बच्चों और बालिका गृह के बालिकाओं, नारी निकेतन की 6 परित्यक्त महिलाओं सहित 50 से अधिक बच्चों एवं महिलाओं को दीपावली उपहार के रूप में दीया, पूजन-सामग्री, चॉकलेट और सजावट की अन्य सामग्रियां प्रदान की।      

    बेहद आकर्षित और रोशनी से जगमगाते परिसर का पैदल भ्रमण करने के उपरांत मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने नागरिकों से अपील की कि हमारे यहां दीपावली के अवसर पर पारंपरिक रूप से मिट्टी की दीये बनाने की गौरवमयी परंपरा रही है। मेहनतकश लोग पारंपरिक के साथ आधुनिक तरीके से भी अब मिट्टी और गोबर के दीये और पूजन सामग्री बना रहे हैं। नागरिक ऐसी गौरवमयी परंपराओं को निरंतर बढ़ावा दे, जिससे हमारे परंपरागत व्यवसाय से जुड़े लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर मिलते रहे और उनकी आमदनी अच्छी हो। उन्होंने कहा कि महिला समूहों द्वारा भी गोबर के दीये बनाए जा रहे है, जिनकी पूरे देश में काफी मांग है, जिसकी आपूर्ति नहीं हो पा रही है। 

श्री बघेल ने आसमान में उड़ाया आकाशदीप को और 
प्रदेशवासियों को दी दीपावली की शुभकामनाएं

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    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों के साथ इस आकर्षक परिसर में आकाशदीप को आसमान में उड़ाया और दीपावली के लिए पूरे प्रदेश की जनता को अपनी शुभकामनाएं दी।

    इस अवसर पर विधायकगण सर्वश्री सत्यनारायण शर्मा, कुलदीप जुनेजा, विकास उपाध्याय, महापौर श्री एजाज ढेबर, सभापति श्री प्रमोद दुबे, छत्तीसगढ खाद्य एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र तिवारी, गौसेवा आयोग के अध्यक्ष महंत श्री रामसुन्दर दास, कलेक्टर डॉ. एस. भारतीदासन, नगर निगम के आयुक्त श्री सौरभ कुमार, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. गौरव सिंह, रायपुर स्मार्ट सिटी के एम.डी. श्री प्रभात मलिक सहित अधिकारी और नागरिकजन उपस्थित थे।

 


बिहार चुनाव: 78 सीटों पर तीसरे चरण का मतदान जारी!

बिहार चुनाव: 78 सीटों पर तीसरे चरण का मतदान जारी!

07-Nov-2020

बिहार विधानसभा चुनाव का तीसरे चरण का मतदान शनिवार को शुरु हो गया है। इस दौरन सुबह 7 बजे से 78 सीटों पर वोटिंग हो रही है। 

 

एजेंसी की  खबर के अनुसार, आखिरी चरण के इस लड़ाई में कुल 1204 कैंडिडेट अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, आखिरी दौर के इस युद्ध में कुल 2 करोड़ 35 लाख 54 हजार 71 वोटर इन उम्मीदवारों का भाग्य का फैसला करेंगे।

तीसरे चरण के मतदान में नीतीश कैबिनेट के मंत्रियों के अलावा वीआईपी पार्टी चीफ मुकेश सहनी, आरजेडी के दिग्गज नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी, अब्दुल जलील मस्तान, शरद यादव की बेटी सुभाषिनी यादव, पूर्व मंत्री चंद्रेशेखर, पूर्व सांसद लवली आनंद, शिवचंद्र राम और पूर्व मंत्री रमई राम की भी तीसरे चरण में परीक्षा होगी।

आखिरी चरण में नीतीश कुमार के 12 मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। साथ ही कई और दिग्गज मैदान में हैं। इनमें से चार बीजेपी और आठ जेडीयू खेमे से हैं।

इनमें बिजेंद्र प्रसाद यादव, नरेंद्र नारायण यादव, रमेश ऋषिदेव, खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद, लक्ष्मेश्वर राय, बीमा भारती, मदन सहनी, महेश्वर हजारी, प्रमोद कुमार, सुरेश कुमार भी मैदान में हैं।


 

 
 

अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के संकेत

अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के संकेत

04-Nov-2020

अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के संकेत

-ललित गर्ग-

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कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ी खबरों ने फिलहाल थोड़ी राहत भले ही दी है, लेकिन खतरा टला नहीं है, इसके संकेत भी साफ है। जहां तक समाज एवं अर्थव्यवस्था पर पड़े इसके असर का मामला है, अभी इन सबसे उबरने में काफी समय लग सकता है। विशेषतः भारत की अर्थ-व्यवस्था तो पहले से अपनी स्थिति को मजबूत करने की स्थिति से जूझ रही थी, कोरोना महामारी ने उसे और गहरे घाव दिये हंै। भारत की स्थिति ज्यादा खराब होने का कारण यहां खूब संक्रमण हुआ और बहुत कड़े लाॅकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था अपंग हो गई है। सरकार एवं नीति-नियंता शायद सार्वजनिक रूप से इसी स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन यही कठोर वास्तविकता है।  

लॉकडाउन के दौरान बंद बहुत सी छोटी इकाइयां अभी भी नहीं खुल सकी हैं। इस क्षेत्र में बेरोजगार हो गए सभी लोगों को रोजगार मिल गया हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन फिलहाल का सच यही है कि स्थितियां अब उतनी भी खराब नहीं हैं, जितनी पांच-छह महीने पहले लग रही थीं। कोरोना संक्रमण के सच को स्वीकार करते हुए देश ने आगे बढ़ना शुरू कर दिया है, लेकिन लंबा रास्ता अभी बाकी है। अक्तूबर का जीएसटी संग्रह एक लाख करोड़ रुपये तक पहंुच गया है, जो कि अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने का सबसे बड़ा संकेत माना जा सकता है। इससे भी ज्यादा राहत देने वाली खबर फैक्टरी उत्पादन का सूचकांक पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय का सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचना है। निक्कई परचेजिंग मैनेजर इंडेक्स के अनुसार अक्तूबर महीने में यह 58.9 पर पहुंच गया है। अगर इस सूचकांक के हिसाब से देखें, तो यह ठीक है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई है, अक्तूबर में तमाम तरह के आंकड़े बाजार से हताशा के बादल छंटने के संकेत दे रहे हैं। विशेषतः ऑटोमोबाइल क्षेत्र के आंकड़े इतने बेहतर और हैरान करने वाले रहे है। दुपहिया वाहनों और कारों की बिक्री खासी उम्मीद बंधा रही है। लेकिन अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी है, उसका इन पटरियों पर रफ्तार पकड़कर मंजिल की ओर बढ़ना। हमारी सरकारों और वित्तीय संस्थाओं को अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए और सशक्त आर्थिक नीतियों के द्वारा देश को समग्र विकास की ओर अग्रसर करना चाहिए।
दुनियाभर में यह कटु सच्चाई है कि नीति नियंताओं को वास्तव में नहीं पता कि उन्हें क्या करना है। भारत में अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये भी ऐसी ही स्थिति है। फिर भी भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिये अन्यान्य प्रयत्नों के साथ चार मुख्य बिन्दु हैं-गरीबी को मिटाना, जनसंख्या की वृद्धि को रोकना, पर्यावरण में सुधार करना एवं बेरोजगारी का उन्मूलन करना। ऐसा लगता है-गरीबी और जनसंख्या में भी कोई निकट का संबंध है। गरीब के संतान ज्यादा होती है क्योंकि कुपोषण में आबादी ज्यादा बढ़ती है। विकसित राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात कम है, अविकसित और निर्धन राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात ज्यादा है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में एक प्रसंग आता है-दरिद्रता दुखतर है और उसके साथ जुड़ा दुख है संतान का आधिक्य। दारिद्रता की पीड़ा और संतति के आधिक्य की पीड़ा-दोनों ओर से आदमी पीड़ित होता है। जनसंख्या-वृद्धि के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु कालखण्ड का प्रभाव और कुपोषण-ये दोनों जनसंख्या वृद्धि के सबसे प्रमुख कारण बनते हैं।
विश्व की सारी संपदा, सारे संसाधन गरीबी को मिटाने में लगते तो आज स्थिति बहुत भिन्न होती, किन्तु बीच में व्यवधान आ गए। कोरोना का व्यवधान भी गरीबी मिटाने की दिशा में गति का एक बड़ा अवरोध है। अब तक सम्पदा का उपयोग मानव को सुखी या सामान्य बनाने की दिशा में नहीं हुआ, बल्कि संहारक अस्त्रों के निर्माण में हुआ। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से भयभीत हो गया। शस्त्रों की होड़ सी लग गई। यू.एन.ओ. की एक रिपोर्ट के आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि अर्थशक्ति और संसाधन किस दिशा में लग रहे हैं। दुनिया का अधिकांश अर्थ प्रतिवर्ष सुरक्षा पर व्यय हो रहा है। मानव की सुरक्षा के लिए नहीं, अपनी भौगोलिक सुरक्षा के लिए यह व्यय किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य में यह बताया गया है कि किसी एक विशेष कारण के चलते नहीं बल्कि विभिन्न कारणों की वजह से लोगों को गरीबी में जीवन व्यापन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि केवल आय का स्रोत एवं आमदनी ही गरीबी का कारण नहीं है बल्कि भोजन, घर, भूमि, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि भी गरीबी के निर्धारण में भूमिका निभाते हैं।
भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, कमजोर कृषि, भ्रष्टाचार, रूढ़िवादी सोच, जातिवाद, अमीर गरीब में ऊंच-नीच, नौकरी की कमी, अशिक्षा, बीमारी आदि है। भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसकी एक बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, आज देश के यही किसान गरीबी की मार झेल रही है। खराब कृषि और बेरोजगारी की वजह से लोगों को भोजन की कमी से जूझना पड़ता है। यही कारण है कि महंगाई ने भी पंख फैला रखे हैं। बढ़ती जनसंख्या भी गरीबी का एक प्रमुख कारण है।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में बताया कि भारत में 21.9 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। विश्व बैंक की वर्ष 2011 रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की 23.6 प्रतिशत जनसंख्या (लगभग 276 मिलियन) की प्रतिदिन क्रय शक्ति 1.25 डॉलर प्रतिदिन है। इसके अतिरिक्त 2016 में जारी अंतरराष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक में भारत को 97वां स्थान मिला है। इसमें विकासशील देशों के लिए औसत दर 21.3 रखी गयी थी जबकि भारत की यह दर 28.5 प्रतिशत थी। गरीबी उन्मूलन की दिशा में योगदान देने के लिए भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी का नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित होना सुखद है। लेकिन दुखद पहलू यह है कि उनके ही देश के अधिकत्तर लोग गरीबी भरा जीवन जीने को विवश है।
भारत लंबे समय से गरीबी का दंश झेल रहा है। स्वतंत्रता पूर्व से लेकर स्वतंत्रता पश्चात भी देश में गरीबी का आलम पसरा हुआ है। गरीबी उन्मूलन के लिए अब तक कई योजनाएं बनीं, कई प्रयास हुए, गरीबी हटाओ चुनावी नारा बना और चुनाव में जीत हासिल की गई। लेकिन इन सब के बाद भी न तो गरीब की स्थिति में सुधार हुआ और न गरीबी का खात्मा हो पाया। सच्चाई यह है कि गरीबी मिटने के बजाय देश में दिनोंदिन गरीबों की संख्या में बढ़ावा हो रहा है। सत्ता हथियाने के लिए गरीब को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया तो सत्ता मिलने के बाद उसे हमेशा के लिए अपने हाल पर छोड़ दिया गया। इसलिए गरीब आज भी वहीं खड़ा है जहां आजादी से पहले था। आज भी सवेरे की पहली किरण के साथ ही गरीब के सामने रोटी, कपड़ा और मकान का संकट खड़ा हो जाता है। दरअसल, यह कम विडंबना नहीं है कि सोने की चिड़िया के नाम से पहचाने जाने वाले देश का भविष्य आज गरीबी के कारण भूखा और नंगा दो जून की रोटी के जुगाड़ में दरबदर की ठोकरें खा रहा है। नरेन्द्र मोदी सरकार की गरीबी उन्मूलन एवं जनसंख्या नियंत्रण की योजनाओं से कुछ उजाला होता हुआ दिख रहा है। प्रेषकः

 

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133