चमगादड़ों को पकड़ कर अगली महामारी रोकने चले 'वायरस हंटर'

चमगादड़ों को पकड़ कर अगली महामारी रोकने चले 'वायरस हंटर'

24-Mar-2021

फिलिपींस में जारी एक खास रिसर्च में चमगादड़ों और उनमें पाए जाने वाले वायरसों की विस्तृत जानकारी इकट्ठा की जा रही है. इसका मकसद है एक ऐसा सिमुलेशन मॉडल बनाना जिससे भविष्य में कोविड 19 जैसी महामारी को फैलने से रोका जा सके.

सिर पर लाइट वाला हेलमेट लगाए और शरीर पर प्रोटेक्टिव सूट पहने रिसर्चर फिलिपींस के लागूना प्रांत में एक अहम अभियान में जुटे हैं. वे रात के अंधेरे में उनके बिछाए बड़े से जाल में फंसे चमगादड़ों के पंजे और पंख छुड़ा कर उन्हें कपड़ों की थैली में डाल कर ले जाएंगे.

रिसर्चर इनको माप तौल करेंगे और मल एवं लार का सैंपल भी लेंगे. इनकी सारी जानकारी विस्तार से दर्ज की जाएगी और फिर सब कुछ सुरक्षित पाए जाने के बाद ही चमगादड़ों को वापस जंगलों में छोड़ा जाएगा. यह रिसर्चर खुद को "वायरस हंटर” कहते हैं. इनके ऊपर हजारों चमगादड़ों को पकड़ने, उनकी जानकारी इकट्ठा करने और उसके आधार पर एक ऐसा सिमुलेशन मॉडल बनाने की जिम्मेदारी है, जिससे कोविड 19 जैसी किसी महामारी को फिर से फैलने से रोका जा सके.

इस मॉडल को विकसित करने के लिए जापान ने धन मुहैया कराया है. इस पर काम कर रही यूनिवर्सिटी ऑफ द फिलिपींस लोस बानोस को मॉडल तैयार करने के लिए तीन साल का समय मिला है. रिसर्चरों के समूह के प्रमुख आशा जताते हैं कि चमगादड़ों की मदद से वे जलवायु, तापमान, संक्रमण की आसानी और इंसानों में कोरोना वायरस के पहुंचने के तरीकों के बारे में अधिक से अधिक समझ कर वे अगली किसी महामारी की समय रहते भविष्यवाणी कर सकेंगे.

ईकोलॉजिस्ट फिलिप आलविओला कहते हैं, "हम कोरोना वायरस की कुछ ऐसी किस्मों का पता लगा रहे हैं जिनमें इंसान में पहुंचने की क्षमता है.” वह एक दशक से भी लंबे समय से चमगादड़ों पर शोध करते आए हैं. चमगादड़ों से फैलने वाली बीमारी पर उनका कहना है कि "अगर हमें वायरस के बारे में पता हो और यह पता चल जाए कि वे कहां से आए हैं, तो हमें पता होगा कि भौगोलिक रूप से उन्हें बाकी आबादी से कैसे अलग करना है.”

लैब में काम करने के अलावा, रिसर्चरों का काफी समय जंगलों में बीतता है. उन्हें ऐसी सभी जगहों पर जाना होता है जहां चमगादड़ों के आने की संभावना हो. अंधेरे इलाके, चट्टानें, गुफाएं और घने जंगलों में जाकर उनके लिए जाल बिछाए जाते हैं. हर चमगादड़ को सिर से सीधा पकड़ा जाता है और उनके मुंह में से लार का सैंपल निकाला जाता है. प्लास्टिक की स्केल से उनके पंखों का विस्तार मापा जाता है और ये पता लगाया जाता है कि चमगादड़ों की 1,300 से भी ज्यादा स्पीशीज और 20 फैमिली में से किनमें संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा है.

हालांकि खतरा तो रिसर्चरों पर भी है. इस रिसर्च में आलविओला की मदद कर रहे एडीसन कोसिको कहते हैं, "आजकल इससे बहुत डर लगता है. पता नहीं होता कि चमगादड़ पहले से ही कौन से वायरस लेकर घूम रहा होगा.” चमगादड़ जैसी होस्ट स्पीशीज वाले जानवरों में खुद वायरस के कारण बीमारी के लक्षण नहीं दिखते. लेकिन यही वायरस जब इंसानों या दूसरे जानवरों में फैल जाते हैं तो उन्हें बहुत बीमार बना देते हैं.

कोरोना के पहले भी चमगादड़ों से कई खतरनाक बीमारियां फैल चुकी हैं जैसे इबोला, सार्स और मिडिल ईस्ट रेसपिरेट्री सिंड्रोम.

जंगली जानवरों के साथ इंसान का संपर्क जितना बढ़ेगा, उनमें ऐसे वायरसों के पहुंचने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी. बैट ईकोलॉजिस्ट किर्क तराए उम्मीद जताते हैं कि "चमगादड़े में पाए जाने वाले संभावित जूनॉटिक वायरसों के बारे में पहले से आंकड़े और जानकारी होने से हम कुछ हद तक अगले किसी बड़े संक्रमण की भविष्यवाणी करने की हालत में होंगे.”

आरपी/सीके (रॉयटर्स)

 

कोरोना का खतरा-नये उपाय एवं सजगता जरूरी

कोरोना का खतरा-नये उपाय एवं सजगता जरूरी

19-Mar-2021

कोरोना का खतरा-नये उपाय एवं सजगता जरूरी
-ः ललित गर्ग:-

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कोरोना का खतरा फिर डरा रहा है, कोरोना पीड़ितों की संख्या फिर बढ़ने लगी है, इन बढ़ती कोरोना पीड़ितों की संख्या से केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चिन्तित होने से काम नहीं चलेगा, आम जनता को जागरूक एवं जिम्मेदार होना होगा। हमने पूर्व में देखा कि प्रधानमंत्री के स्तर पर व्यक्त की गई चिंताओं का सकारात्मक परिणाम सामने आया, जैसे ही कोरोना ने फिर से डराना शुरु किया है, प्रधानमंत्री की चिन्ताएं स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी है। उनकी इन चिन्ताओं को कम करने का अर्थ है स्वयं को सुरक्षित करना, इसलिये कोरोना के लिये जारी किये गये निर्देशों एवं बंदिशों का सख्ती से पालन होना जरूरी हैं। स्थिति की भावी भयावहता एवं गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री ने तुरन्त मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की, कोरोना के प्रारंभिक दौर में भी ऐसी बैठकें हुई थी, जिनसे कोरोना महामारी पर काबू पाने में हमने सफलताएं पायी थी। इस तरह की बैठकों एवं प्रधानमंत्री के मनोवैज्ञानिक उपायों चाहे मोमबत्ती जलाना हो, ताली बजाना हो से देश के कोरोना योद्धाओं का मनोबल मजबूती पाता रहा है, कोरोना का अंधेरा छंटता रहा है। एक बार फिर हम दिल से कोरोना को परास्त करने, उसको फैलने से रोकने के लिये अपने-अपने स्तर के दायित्वों एवं जिम्मेदारियों को केवल ओढ़े ही नहीं, बल्कि ईमानदारी से जीयें।

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बढ़ते कोरोना महामारी के आंकडों के बीच प्रधानमंत्री ने जनता का मनोबल सुदृढ़ करते हुए कोरोना रूपी अंधेरे को कोसने की बजाय हमें अपने दायित्व की मोमबत्ती जलाने की प्रेरणा दी है। उन्होंने सही कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है, बस हमें ‘कड़ाई भी और दवाई भी’ की नीति पर काम करना है। उनका यह कहना भी बहुत मायने रखता है कि कोरोना से लड़ाई में हमें कुछ आत्मविश्वास मिला है, लेकिन यह अति आत्मविश्वास में नहीं बदलना चाहिए। दरअसल, यही हुआ है, जिसकी ओर प्रधानमंत्री और अनेक विशेषज्ञ इशारा कर रहे हैं। लोगों की थोड़ी सी लापरवाही खतरे को बढ़ाती चली जा रही है। पिछले महीने ही 9-10 फरवरी को ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या 35,000 के करीब है। यह सही है, 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे। इसमें दुखद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं। आखिर महाराष्ट्र की जनता एवं वहां की सरकार इस बड़े संकट के प्रति क्यों लापरवाह एवं गैर-जिम्मेदार है?
 हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिये जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। गांधी के तीन बंदरों की तरह-वक्त देखता नहीं, अनुमान लगाता है। वक्त बोलता नहीं, संदेश देता है। वक्त सुनता नहीं, महसूस करता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है। कोरोना महाव्याधि से जुड़ी कटु सच्चाइयां एवं तथ्य भी छुपाये नहीं जा सकते। लॉकडाउन एवं अन्य बंदिशें तो तात्कालिक आपात उपाय है, महाराष्ट्र के लोगों को लंबे समय तक के लिए अपनी आदतों में परिवर्तन लाना पड़ेगा, जिम्मेदारी एवं दायित्वों का अहसास जगाना होगा। देश के लिए यह सोचने और स्थाई सुधार का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर आंकड़ों को देखना होगा। काल सिर्फ युग के साथ नहीं बदलता। दिनों के साथ बदलता है और कभी-कभी घंटों में भी। पिछले सप्ताह से तुलना करें, तो इस सप्ताह कोरोना मामलों में 40 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि हुई है, जबकि मरने वालों की संख्या में 35 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा। संक्रमण भी बढ़ा है और मौत का खतरा भी, तो फिर हम क्यों कोरोना दिशा-निर्देशों की पालना में लापरवाही बरत रहे हैं?
बड़ा प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं। इसका एक कारण है कि कोई भी वायरस नैसर्गिक रूप से अपना चरित्र बदलता (म्यूटेट) है। वह जितना अधिक फैलता है, उतना अधिक म्यूटेट करता है। जो बड़ा खतरा बनता है। इससे संक्रमण का नया दौर शुरु होता है। पिछली सदी के स्पेनिश फ्लू में देखा गया था कि संक्रमण का दूसरा दौर जान-माल का भारी नुकसान दे गया। इसलिये हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिये अधिक सर्तक, सावधान एवं दायित्वशील होना होगा। हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी इसके पुनः उभरने का एक कारण है। हमारी तकरीबन 55-60 फीसदी आबादी इस वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित कर चुकी थी। चूंकि महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली जैसे राज्यों में शुरुआत में ही वायरस का प्रसार हो गया था, इसलिए बहुत मुमकिन है कि वहां की जनता में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने की स्थिति खत्म हो गई हो। नतीजतन, लोग फिर से संक्रमित होने लगे हैं। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें एक बार कोरोना से ठीक हुआ मरीज दोबारा इसकी गिरफ्त में आ गया है।
मानवीय गतिविधियों के बढ़ने के कारण भी कोरोना पनपने की स्थितियां बनी हैं। भले ही अनलॉक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की गई, लेकिन अब सारा आर्थिक गतिविधियां एवं जनजीवन पटरी पर लौट आया है। इस कारण बाजार में चहल-पहल बढ़ गई है। नये रूप में कोरोना का फैलना अधिक खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिकों की मानें, तो अब लॉकडाउन से संक्रमण को थामना मुश्किल है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गये, कमियां एवं त्रुटियां सुधार ली। अस्पतालों की सेहत सुधार ली। लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। टीकाकरण भी फायदेमंद उपाय है और इस पर खास तौर से ध्यान दिया जा रहा है। मगर हाल के महीनों में पूरी आबादी को टीका लग पाना संभव नहीं है। इसलिए बचाव के बुनियादी उपायों को अपने जीवन में ढालना ही होगा। तभी इस वायरस का हम सफल मुकाबला कर सकेंगे।
विडम्बना एवं त्रासद स्थिति है कि तेलंगाना, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी तादाद में वैक्सीन बर्बाद हो रही है। कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, यह तय करते हुए कमियों को दूर करना होगा। यह भी विडम्बना ही है कि मुख्यमंत्रियों को रोज शाम कोरोना वैक्सीन की निगरानी के लिए कहना पड़ रहा है। एक बड़ी चिंता गांवों में कोरोना संक्रमण रोकने की है। तुलनात्मक रूप से गांव अभी सुरक्षित हैं, तो यह किसी राहत से कम नहीं। गांवों में यह स्थिति बनी रहे, वे ज्यादा सुरक्षित हों, चिकित्सा सेवा के मामले में संपन्न हों, तो देश को ही लाभ होगा। कोरोना की नई लहर के एक-एक वायरस को उसके वर्तमान ठिकानों पर ही खत्म करना होगा, ताकि व्यापक लॉकडाउन की जरूरत न पड़े। अन्यथा वक्त आने पर, वक्त सबको सीख दे देगा, जो कितनी भयावह हो सकती है, कहा नहीं जा सकता।
इसीलिये प्रधानमंत्री ने टीकाकरण की धीमी गति एवं उपेक्षा पर चिन्ता जताई है, उन्होंने मुख्यमंत्रियों के सामने सही सवाल रखा है, ‘यह चिंता की बात है कि आखिर कुछ इलाकों में जांच कम क्यों हो रही है? कुछ इलाकों में टीकाकरण कम क्यों हो गया है? मेरे ख्याल से यह समय गुड गवर्नेंस को परखने का है।’ अब अपने-अपने स्तर पर मुख्यमंत्रियों को ज्यादा सचेत होकर लोगों को सुरक्षित करना होगा। कोरोना से लड़ाई में किसी कमी के लिए केवल केंद्र सरकार के फैसलों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जिन राज्यों ने अच्छा काम किया है, उन्हें अपने काम को अभी विराम नहीं देना चाहिए और जिन राज्यों में प्रशासन ने कोताही बरती है, उनकी नींद टूटनी चाहिए। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई.पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


महिला-रोजगार में गिरावट से बढ़ती चिन्ताएं

महिला-रोजगार में गिरावट से बढ़ती चिन्ताएं

16-Mar-2021

महिला-रोजगार में गिरावट से बढ़ती चिन्ताएं
ललित गर्ग 

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कोरोना महामारी का सबसे बड़ा खमियाजा महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ा है। लाॅकडाउन और दूसरे सख्त नियम-कायदों की वजह से दुनिया भर में बहुत सारे क्षेत्र ठप पड़ गए या अस्त-व्यस्त हो गए, सर्वाधिक प्रभावित अर्थव्यवस्था हुई एवं रोजगार में भारी गिरावट आई। अब जब महामारी का असर कम होता दिख रहा है, तो ऐसे में विश्व के तमाम देशों सहित भारत भी इससे उबरने की कोशिश में है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है, जिसके लिये केन्द्र सरकार ने अनेक तरह के राहत पैकेज जारी किये हैं, धीरे-धीरे बाजार और आम गतिविधियां सामान्य होने की ओर अग्रसर है। लेकिन इस बीच की ंमहिला रोजगार को लेकर एक चिंताजनक खबर आई है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) नाम के थिंक टैंक ने बताया है कि भारत में केवल 7 प्रतिशत शहरी महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पास रोजगार है या वे उसकी तलाश कर रही हैं। सीएमआईई के मुताबिक, महिलाओं को रोजगार देने के मामले में हमारा देश इंडोनेशिया और सऊदी अरब से भी पीछे है। कोरोना महामारी ने इस समस्या को और गहरा बनाया है।
केन्द्र सरकार की नीति एवं योजनाओं के कारण पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर नये कीर्तिमान स्थापित हुए है, महिलाओं ने सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से लेकर अर्थव्यवस्था के मोर्चे तक पर जो अनूठी सफलताएं एवं आत्मनिर्भर होने के मुकाम हासिल किये थे, उसमें कोरोना काल में तेज गिरावट आई है, जो परेशान कर रही है। सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इतनी कम संख्या में शहरी औरतों का रोजगार में होना चिंता का विषय है। कोरोना महाव्याधि के कारणों से उन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा, जिन पर महिलाएं सीधे तौर पर रोजगार के लिए निर्भर हैं। चाहें डोमेस्टिक हेल्प हो, स्कूलिंग सेक्टर हो, टूरिज्म या कैटरिंग से जुड़े सेक्टर हो। कोविड-19 संकट के चलते भारी संख्या में महिलाओं को इन सेक्टर से निकाला गया। वहीं, बच्चों के स्कूल बंद हो जाने से महिलाओं पर उनकी देखरेख का अतिरिक्त बोझ आने से कइयों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। इन कारणों से रोजगार या नौकरी का जो क्षेत्र स्त्रियों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा जरिया रहा है, उसमें इनकी भागीदारी का अनुपात बेहद चिंताजनक हालात में पहुंच चुका है। गौरतलब है कि बबल एआई की ओर से इस साल जनवरी से पिछले दो महीने के दौरान कराए गए सर्वेक्षण में ये तथ्य उजागर हुए हैं कि महिलाओं को कई क्षेत्रों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारतीय संदर्भों के मुताबिक कोविड-19 के चलते बहुत सारी महिलाओं को अपना रोजगार बीच में ही छोड़ देना पड़ा। इसने श्रम क्षेत्र में महिलाओं की पहले से ही कम भागीदारी को और कम कर दिया है।
सीएमआईई के अलावा इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के एक सर्वे में भी डराने वाले तथ्य सामने आया है कि कोविड-19 से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार पर ज्यादा बुरा असर पड़ा है। संस्था ने मुंबई में एक सर्वे किया और पाया कि जहां तीन-चैथाई पुरुषों के रोजगार पर महामारी ने असर डाला, वहीं महिलाओं का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत रहा। इसी सर्वे में पाया गया कि पुरुषों के लिए नया रोजगार पाना महिलाओं के मुकाबले आठ गुना आसान रहा। उदाहरण के लिए पुरुषों ने चीजों को डिलीवर करने की जॉब कर ली, जो भारत जैसे समाज में महिलाएं आसानी ने नहीं कर सकतीं। सीएमआईई के अनुसार, साल 2019 में 9.7 फीसदी शहरी महिलाएं लेबर फोर्स का हिस्सा थीं। लेकिन महामारी के दौरान ये हिस्सा घटकर 6.9 फीसदी हो गया। संस्था ने पूरे भारत में एक लाख 70 हजार परिवारों से बात करने के बाद ये तथ्य पेश किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यस्थलों पर इकहत्तर फीसद कामकाजी पुरुषों के मुकाबले महज ग्यारह फीसद रह गई हैं। जाहिर है, बेरोजगारी के आंकड़े भी इन्हीं आधारों पर तय होते हैं। इसमें शक नहीं कि सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं को रोजाना जिन संघर्षों का सामना करना पड़ता है, उसमें अब भी उनके हौसले बुलंद है। मगर सच यह भी है कि बहुत मुश्किल से सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाने के बाद अचानक नौकरी और रोजगार गंवा देने का सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है और वे उससे भी जूझ रही हैं। यांे जब भी किसी देश या समाज में अचानक या सुनियोेजित उथल-पुथल होती है, कोई आपदा, युद्ध एवं राजनीतिक या मनुष्यजनित समस्या खड़ी होती है तो उसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर स्त्रियों पर पड़ता है और उन्हें ही इसका खामियाजा उठाना पड़ता है। महामारी के संकट में भी स्त्रियां ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। ताजा सर्वे में नौकरियों और रोजगार के क्षेत्र में उन पर आए संकट पर चिंता जताई गई है। इससे पहले ऐसी रिपोर्ट आ चुकी है कि कोरोना की वजह से लगाई गई पूर्णबंदी के चलते महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई। सवाल है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है, जिनमें हर संकट की मार महिलाओं को ही झेलनी पड़ती है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये जरूरी है कि अधिक महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए भारत सरकार को जरूरी कदम उठाने होंगे। भारत सरकार को केवल आईटी सेक्टर पर ही फोकस करने की मानसिकता बदलनी होगी। उसे दूसरे सेक्टर में निवेश करने वाली कंपनियों को बुलाना होगा। जैसे टेक्सटाइल इंडस्ट्री, जो अब बांग्लादेश में शिफ्ट हो गई है, इस इंडस्ट्री में महिलाओं को अच्छा रोजगार मिलता है। सरकार इसके ऊपर फोकस करना होगा। सरकार को अपनी लैंगिकवादी सोच को छोड़ना पड़ेगा। भारत सरकार के खुद के कर्मचारियों में केवल 11 प्रतिशत महिलाएं हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिये अधिक एवं नये अवसर सामने आने जरूरी है।
दावोस में हुए वल्र्ड इकनॉमिक फोरम में ऑक्सफैम ने अपनी एक रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ में घरेलू औरतों की आर्थिक स्थितियों का खुलासा करते हुए दुनिया को चैका दिया था। वे महिलाएं जो अपने घर को संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं, वह सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक अनगिनत सबसे मुश्किल कामों को करती है। अगर हम यह कहें कि घर संभालना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है तो शायद गलत नहीं होगा। दुनिया में सिर्फ यही एक ऐसा पेशा है, जिसमें 24 घंटे, सातों दिन आप काम पर रहते हैं, हर रोज क्राइसिस झेलते हैं, हर डेडलाइन को पूरा करते हैं और वह भी बिना छुट्टी के। सोचिए, इतने सारे कार्य-संपादन के बदले में वह कोई वेतन नहीं लेती। उसके परिश्रम को सामान्यतः घर का नियमित काम-काज कहकर विशेष महत्व नहीं दिया जाता। साथ ही उसके इस काम को राष्ट्र की उन्नति में योगभूत होने की संज्ञा भी नहीं मिलती। जबकि उतना काम नौकर-चाकर के द्वारा कराया जाता तो अवश्य ही एक बड़ी राशि वेतन के रूप में चुकानी पड़ती। दूसरी ओर एक महिला जो किसी कंपनी में काम करती है, निश्चित अवधि एवं निर्धारित दिनों तक काम करने के बाद उसे एक निर्धारित राशि वेतन के रूप में मिलती है। उसके इस कार्य को और उसके इस क्रम को राष्ट्रीय उन्नति ( जीडीपी ) में योगदान के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि देश के आर्थिक विकास में अमुक महिला का योगदान है। प्रश्न है कि घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाता? घरेलू महिलाओं के  साथ यह दोगला व्यवहार क्यों?
दरअसल, इस तरह के हालात की वजह सामाजिक एवं संकीर्ण सोच रही है। पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था में आमतौर पर सत्ता के केंद्र पुरुष रहे और श्रम और संसाधनों के बंटवारे में स्त्रियों को हाशिये पर रखा गया है। सदियों पहले इस तरह की परंपरा विकसित हुई, लेकिन अफसोस इस बात पर है कि आज जब दुनिया अपने आधुनिक और सभ्य होने का दावा कर रही है, भारत में नरेन्द्र मोदी सरकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने एवं उसके आत्म-सम्मान के लिये तत्पर है, उसमें भी ज्यादातर हिस्से में स्त्रियों को संसाधनों में वाजिब भागीदारी का हक नहीं मिल सका है। एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर कब तक सभी वंचनाओं, महामारियों एवं राष्ट्र-संकटों  की गाज स्त्रियों पर गिरती रहेगी।


प्रेषकः
  (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


मन्दिर में पानी पीना  मुस्लिम बच्चे को को पड़ा भारी युवक ने बेरहमी से बच्चे की पिटाई !

मन्दिर में पानी पीना मुस्लिम बच्चे को को पड़ा भारी युवक ने बेरहमी से बच्चे की पिटाई !

15-Mar-2021

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक युवक द्वारा बच्चे की पिटाई का मामला सामने आया है। आरोप है कि मंदिर में पानी पीने के कारण एक युवक ने संप्रदाय विशेष के बच्चे की बेरहमी से पिटाई कर दी।

 

अमर उजाला पर छपी खबर के अनुसार, इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद मसूरी पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।

वीडियो में आरोपी युवक पहले लड़के का नाम पूछते हुए नजर आता है। फिर युवक कहता है कि वह धार्मिक स्थल क्यों गया था। लड़का बताता है कि वह पानी पीने के लिए गया था। इसके बाद आरोपी लड़का उसके साथ गाली-गलौज कर मारपीट शुरू कर देता है।

गाजियाबाद पुलिस ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर बताया है कि वीडियो संज्ञान में आने के बाद तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है।

आरोपी का नाम श्रृंगीनंदन यादव है जो कि बिहार के भागलपुर का रहने वाला है। यह युवक कथित तौर पर हिंदू एकता संघ नाम के एक संगठन से भी जुड़ा हुआ है।

पुलिस ने बताया कि आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है और जिस बच्चे की पिटाई की गई है उसकी भी तलाश की जा रही है।

 
 

कुरआन के खिलाफ बोलने वाले और उसका साथ देने वालों का बायकॉट करें। सैय्यद तक़वी

कुरआन के खिलाफ बोलने वाले और उसका साथ देने वालों का बायकॉट करें। सैय्यद तक़वी

13-Mar-2021

कुरआन के खिलाफ बोलने वाले और उसका साथ देने वालों का बायकॉट करें। सैय्यद तक़वी

धर्म आस्था का प्रतीक है और सभी धर्म सम्मानित और सम्माननीय और सब धर्म की इज्जत करनी चाहिए। किसके धर्म की किताब में क्या लिखा है यह बहस का विषय नहीं है चाहे वह गीता हो चाहे क़ुरआन हो चाहे वह गुरु ग्रंथ साहिब हो सब एक विशेष धर्म की किताबें हैं जिसको उनके अनुयाई मानते हैं। सभी धर्म में एक ही बात कही गई है सिर्फ भाषा का अंतर है। 
इतनी बात समझने के बाद अगर कोई व्यक्ति धार्मिक ग्रंथों के बारे में गलत बात करता है तो शायद उसके अंदर की इंसानियत मर चुकी है। राजनीति और धर्म दो अलग-अलग चीजें हैं। राजनीति में धर्म को नहीं शामिल करना चाहिए और धर्म में राजनीति को नहीं शामिल करना चाहिए लेकिन जो व्यक्ति सिर्फ कुर्सी के लालच में सरकार को खुश करने के लिए चापलूसी करने के चक्कर में अपने जमीर अपनी आत्मा को बेच करके ऐसी बातें कर रहा है जिससे समाज में सुख और शांति भंग होने का ख़तरा हो ऐसे व्यक्ति का पूरी तरीके से सामाजिक और धार्मिक बायकॉट करना बहुत जरूरी है
आइये बात करते हैं कुरआन की।
कुरआन अल्लाह की किताब है। इसमें फेर-बदल नामुमकिन है। प्रत्येक धर्म में “वही” एक आधारिक तत्व है। और वह धर्म जिसके नबी पर की गयी “वही” बाद की उलट फेर से सुरक्षित रही वह धर्म “इस्लाम” है। तथा अल्लाह ने (इस सम्बन्ध में प्रत्य़क्ष रूप से) वादा किया है कि वह क़ुरआन के संदेश को सुरक्षित रखेगा। जैसे कि क़ुराने करीम के सूरए हिज्र की आयत न. 9 में लिखा (वर्णन) हुआ है कि-

“इन्ना नहनु नज़्ज़लना अज़्ज़िक्रा व इन्ना लहु लहाफ़िज़ून”

अनुवाद-- हमने ही इस क़ुरान को नाज़िल किया है (आसमान से भेजा है) और हम ही इसकी हिफाज़त (रक्षा) करने वाले हैं।

इतिहास भी इस बात का गवाह है कि क़ुरआन में कोई फेर बदल नही हुई है। ग़ौर करने वाली बात यह है कि इस्लाम भी अन्य आसमानी धर्मों की तरह(उन धर्मों को छोड़ कर जिनमें फेर बदल कर दी गयी है) नबीयों को मासूम मानता है। और “वही” को इंसानों तक पहुँचाने के सम्बंध मे किसी भी प्रकार की गलती (त्रुटी) का खण्डन करता है।

जैसे कि क़ुरआने मजीद के सूरए नज्म की आयत न. 3 और 4 में बयान (वर्णन) हुआ है कि

“व मा यनतिक़ु अनिल हवा इन हुवा इल्ला वहीयुन यूहा।”

अनुवाद--वह (नबी) अपनी मर्ज़ी से कोई बात नही कहता वह जो भी कहता है वह “वही” होती है।

यह वही अल्लाह की तरफ़ से होती है।

जरूरी बात यह है कि इंसान पहले कुरआन पढ़े फिर बात करे। कुरान इंसान की हिदायत के लिए कुरान अमन और शांति के लिए है।
तमाम ओलमा हजरात ने यह बात साफ कर दी है और कहा है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों का क़ुरान पर पूरा एतबार है और क़ुरान में सिर्फ़ अच्छाईयां बतायी गई है।
कुरआन में दिलो को जोड़ने की बात की गई है।
शजरा ए ख़बीसा के लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि क़ुरान में  26 आयतें हटाना तो दूर की बात है ज़ेर और ज़बर भी ऊपर नीचे नहीं किया जा सकता है।
कुरान पर उंगली उठाने वाले पहले भी आए लेकिन सिवाय रुसवाई के उनको कुछ नसीब ना हुआ चाहे सलमान रुश्दी हो, तस्लीमा नसरीन हो या तारिक फतेह यह सब लानती लोग हैं ।इस कैटेगरी में एक और नाम जुड़ गया है। मगर अफसोस की बात है कि यह ऐसा नाम है जो अपने नाम के आगे और पीछे सैय्यद और रिजवी लगाए हुए हैं। लेकिन इसके लगा लेने से किरदार नहीं बनता किरदार बनता है अमल से।
सरकार को चाहिए कि इस ख़बीस के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे और तमाम उम्मते मुस्लिमा को भी चाहिए कि एक प्लेटफार्म पर आकर ऐसे नाज़ेबा हरकत के लिए उसके खिलाफ आवाज उठाएं।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com


किसानों की समस्याओं को जल्दी हल करे सरकार। सैय्यद तक़वी

किसानों की समस्याओं को जल्दी हल करे सरकार। सैय्यद तक़वी

08-Mar-2021

किसानों की समस्याओं को जल्दी हल करे सरकार। सैय्यद तक़वी

भारत का अन्नदाता किसान (वास्तविकता यही है) एक बार फिर सड़क पर है। केन्द्र की सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान सड़क पर उतरने को मजबूर है। सौ दिन से ज़्यादा हो गये मगर स्थिति वैसे ही बनी है। किसानों को डर है कि नए कानूनों से मंडिया खत्म हो जाएंगी साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर होने वाली खरीदी भी रुक जाएगी। दूसरी ओर सरकार का तर्क इसके विपरीत है यानी एमएसपी पर खरीदारी बंद नहीं होगी। बग़ैर आग के धुआं नहीं निकलता। कहीं कुछ ना कुछ ऐसा तो है ही जिससे किसान संतुष्ट नहीं है सवाल यह है कि अगर किसी के लिए कुछ किया जा रहा है वह संतुष्ट नहीं है तो ऐसे करने से क्या फायदा। इस से अच्छा है कि ऐसा किया जाए जिससे वह संतुष्ट हों।
वैसे अगर देखा जाए तो अलग-अलग राज्यों में किसान सरकारों के खिलाफ लामबंद होते रहे हैं। इन आंदोलनों के असर से सत्ता हिलती भी रही है और गिरती भी रही है। 
आज मैं आपको कुछ किसान आंदोलन की बात बताता हूं इतिहास के पन्ने पलटने पर बहुत से किसान आंदोलन हमारी नजरों के सामने आते हैं।
क्या आप को याद है कि मध्यप्रदेश के मंदसौर में 2017 किसान आंदोलन में पुलिस की गोली से 7 किसानों की मौत हो गई थी।
क्या आप को यह याद है कि कर्ज माफी और फसलों के डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन मूल्य की मांग को लेकर तमिलनाडु किसानों ने 2017 एवं 2018 में राजधानी दिल्ली में अर्धनग्न होकर एवं हाथों में मानव खोपड़ियां और हड्डियां लेकर प्रदर्शन किया था।
जिस किसान आंदोलन को सरकार हल्के में ले रही है इतनी हल्की चीज नहीं है किसान आंदोलन आज कोई नया नहीं हो रहा है इसका बहुत पुराना इतिहास है लेकिन आज के आंदोलन की बात करें तो पंजाब से उठी आंदोलन की चिंगारी से अब पूरा देश धधक रहा है। हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार समेत देश के अन्य हिस्सों में भी किसान सड़कों पर उतर आए हैं। दिल्ली को तो मानो चारों ओर से आंदोलनकारी किसानों ने घेर लिया है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पूरे देश के नागरिकों को अन्न उपलब्ध कराने वाले किसानों के लिए कोई आगे बढ़ कर उनके समस्याओं को हल करने की कोशिश नहीं कर रहा है।
क्या यह चिंता की बात नहीं है कि जो किसान देश की जनता को अन्न उपलब्ध कराता है आज उसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर है उसने अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए कड़ी सर्दी के मौसम में भी सड़क पर रह कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं।
किसानों में भी कई बड़े नेता गुज़रे हैं जिसमें चौधरी चरणसिंह और चौधरी देवीलाल का नाम आता है यह बात अलग है कि उनकी अपनी राजनीतिक पार्टियां भी थीं। स्व. महेन्द्रसिंह टिकैत की तो पहचान ही किसान आंदोलन के कारण थी और वे देश के सबसे बड़े किसान नेता माने जाते थे।
याद कीजिए 1987 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के कर्नूखेड़ी गांव में बिजलीघर जलने के कारण किसान का बिजली संकट का सामना करना और महेंद्र सिंह टिकैत का सभी किसानों से बिजली घर के घेराव का आह्वान। लाखों किसान जमा हो गए।
टिकैत के रूप में बड़ा किसान नेता सामने आया। और फिर जनवरी 1988 में किसानों ने अपने नए संगठन भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले मेरठ में 25 दिनों का धरना। इसमें किसानों की मांग थी कि सरकार उनकी उपज का दाम वर्ष 1967 से तय करे। 
आज एक बार फिर वही किसान सरकार के सामने खड़ा है और सरकार उनकी बातों को नहीं सुन रही है और हल्के में ले रही है इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए बल्कि हमें समझना चाहिए कि यह वही किसान हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भी लोहा लिया। किसानों ने अंग्रेजों की चूलें भी हिलाई थीं। अंग्रेजों के राज में भी समय-समय पर किसानों आंदोलन हुए और उन्होंने न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि अंग्रेज सत्ता की चूलें भी हिलाकर रख दी थीं। 
हकीकत में देखें तो जितने भी 'किसान आंदोलन' हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ थे। देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में प्रमुख से आंदोलन हुए। इनका नेतृत्व भी महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया।
इसके अलावा भी किसान आंदोलन का एक इतिहास है इसमें बहुत से आंदोलन शामिल हैं।
दक्कन का विद्रोह, एका आंदोलन,  मोपला विद्रोह, 
कूका विद्रोह, रामोसी किसानों का विद्रोह, तेभागा आंदोलन, ताना भगत आंदोलन, तेलंगाना आंदोलन,
बिजोलिया किसान आंदोलन, अखिल भारतीय किसान सभा, नील विद्रोह (चंपारण सत्याग्रह), खेड़ा सत्याग्रह, 
बारदोली सत्याग्रह इत्यादि।
आज सरकार के पास मौका है कि किसानों की समस्या को हल करके उनका दिल जीत लें साथ में देश की जनता को भी संतुष्ट करें।
सरकार को यह याद रखना चाहिए कि सत्ता तो आती जाती रहती है क्योंकि जो चीज आती है उसे एक दिन जाना होता है जिसका वजूद होता है उसे एक दिन मिटना होता है जो चीज शुरू होती है वह समाप्त भी होती है। लेकिन सबसे बड़ी चीज होती है जनता का विश्वास जीतना ताकि सरकार ना भी रहे तो लोग सकारात्मक छवि के कारण याद करें नकारात्मक छवि के कारण नहीं।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com


महात्मा गांधी एक्सीलेंस अवार्ड लखनऊ में संपन्न, फेस ग्रुप ने किया 28 लोगों को महात्मा गांधी एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित

महात्मा गांधी एक्सीलेंस अवार्ड लखनऊ में संपन्न, फेस ग्रुप ने किया 28 लोगों को महात्मा गांधी एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित

06-Mar-2021

सैयद कासिम 

लखनऊ : फेस ग्रुप द्वारा महात्मा गांधी एक्सीलेंस अवार्ड 2021 का आयोजन विपिन खंड स्थित संगीत नाटक अकादमी में आयोजित किया गया जहाँ मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे।टीम केयर इंडिया रिसर्च फ़ाउंडेशन के महासचिव शहजादे कलीम की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम में बजरंगी भाई जान फिल्म से प्रसिद्धि पाने वाले बॉलीवुड एक्टर मनोज बख्शी व टीवी एक्टर ज्ञान भारती आकर्षण का केंद्र रहे ।

फेस ग्रुप के चेयरमैन डॉक्टर मुश्ताक़ अंसारी ने जानकारी देते हुए बताया कि मशहूर वोल्टेज स्टेबलाइजर कंपनी सर्वोकाँन के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में उन चुनिंदा 28 लोगों को अवार्ड से सम्मानित किया गया जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में कर्तव्य से आगे बढ़कर देश व समाज के बेहतर निर्माण में अपनी अहम भूमिका भूमिका निभाई है ।

फेस ग्रुप की महाप्रबंधक नेहा शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि देश के कई शहरों व राज्यों में अवार्ड वितरण के बाद अब लखनऊ में भी समाज सेवा,शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, पत्रकारिता, कला, साहित्य व फिल्म जगत के कर्मठ लोगों को सम्मानित किया गया है । 

उन्होंने बताया इस सम्मान कार्यक्रम में दिल्ली,हरियाणा ,पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान,महाराष्ट्र,गुजरात,तमिलनाडु,मणिपुर आदि राज्यों से करीब 300 आवेदन हमें प्राप्त हुए जिसमें समाजसेवी नवीन सेठ, परवेज आलम, विश्वास ज़ुल्का मेराज अंसारी एडवोकेट, फिल्म मेकर डी के वासुदेव, समाजसेवी डॉ एम आर अंसारी, आर्ट प्रमोटर निशु त्यागी, गायक शशि सीकर, स्वास्थ्य सेवा के लिए डॉक्टर पूजा दीवान, डॉक्टर दिलशाद,पत्रकारिता के फ़ील्ड से सैयद रजा हुसैन रिजवी,वामिक खान,सैयद कासिम,समाजसेवी मोहम्मद अब्दुल रहमान, फैशन फील्ड से सिंबुल आसिफ, आर्ट एंड कल्चर फ़ील्ड से जावेद अख्तर ,अंकिता बाजपेई, सिनेमा फील्ड से ज्ञान भारती,समर खान, जे के सिन्हा,अंकिता वाजपाई,शिक्षा के क्षेत्र से डॉक्टर तरन्नुम रफीक ,जी थिंलागर,समाजसेवी शकील अहमद ,हाओटिनखुप किपजन,बिपिनचंद्र ‌ रावजी भाई पटेल, डॉक्टर आई एस ज़मा, शोएब फारुकी, डॉक्टर एस थिरुवेंकटमूर्ति आदि लोगों को अवार्ड से सम्मानित किया गया।इसके अलावा पूर्व विधायक प्रमोद गुप्ता,नवाब मीर अब्दुला, दबीर सिद्धकी,हिमानी खनेजा चौहान, कल्पना गुप्ता,निहारिका सिंह,नीतू कोइराला,पूजा सिंह,सीमा राठौर, अर्चना शुक्ला,मोहम्मद शबाब, अब्दुल हलीम, डॉ अनवर, अब्दुल वाहिद, शांतनु मालवीय, डॉक्टर मोहम्मद मो मुबासशिर,शाहिद सिद्दीक़ी,आज़ाद हफ़ीज़,बलबीर सिंह,ज़ुबेर अहमद,सलाहुद्दीन शिबू एडवोकेट, इमरान अहमद, जफरुल खान, निखहत खान, राजेंद्र सिन्हा,इमरान कुरेशी,इरशाद राही आदि को गेस्ट ऑफ ऑनर के सम्मान से नवाजा गया।

इस अवसर पर दिल्ली व लखनऊ के कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुत किए गए जिसमें समर खान,अभिषेक खंडेलवाल,तान्या श्रीवास्तव,सुमिता श्रीवास्तव की गायकी को दर्शकों ने खूब सराहा तथा रितिका गुप्ता व वैशाली जैन की  डांस परफॉर्मेंस की  भी भूरी भूरी प्रशंसा हुई। मंच का संचालन जेसमीन झा व शिखा गुलाटी द्वारा किया गया।


पश्चिम बंगाल चुनाव: ममता बनर्जी ने किया उम्मीदवारों के नामों का ऐलान, 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट!

पश्चिम बंगाल चुनाव: ममता बनर्जी ने किया उम्मीदवारों के नामों का ऐलान, 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट!

06-Mar-2021

पश्चिम बंगाल में चुनावों की तारीखों का ऐलान होने के बाद टीएमसी यानी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है। इस लिस्ट के मुताबिक 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए गए हैं।

पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस ने अपने सारे पत्ते खोल दिए हैं। ममता बनर्जी ने महिलाओं से लेकर क्रिकेट और फिल्मी सितारों को उतारकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं या यूं कह लीजिए कि दीदी ने सियासी रण में अपने सिपहसालारों को तैनात कर दिया है।

अमर उजाला पर छपी खबर के अनुसार, दरअसल, ममता बनर्जी ने 50 महिलाओं को टिकट दिया है तो 42 मुस्लिम उम्मीदवारों पर भी दांव खेला है।

इसके अलावा अनुसूचित जाति के 79, अनुसूचित जनजाति के 17 और 9 सितारों को भी मैदान में उतारा है। इस रिपोर्ट में हम दीदी का सियासी गणित समझते हैं।

291 उम्मीदवारों की सूची जारी करते वक्त ममता बनर्जी ने साफ कहा कि 28 वर्तमान विधायकों के टिकट काटे गए हैं, जिनमें 80 साल से ज्यादा उम्र के नेता शामिल हैं।

हालांकि, सूत्रों का कहना है कि इस लिस्ट में वे नेता भी शामिल हैं, जिन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है। वहीं, पार्टी ने 100 युवाओं पर दांव खेला है।

इसका सीधा मकसद युवा मतदाताओं पर फोकस है। इसके अलावा टीएमसी ने तीन सीटें अपने सहयोगी गोरखा मुक्ति मोर्चा के लिए किसी भी तरह के विवाद से बचने की कोशिश की है।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने 291 सीटों के लिए घोषित प्रत्याशियों में 50 टिकट महिला उम्मीदवारों को दिए हैं। इसके माध्यम से दीदी ने बंगाल की आधी आबादी को सियासी संदेश देने की कोशिश की है।

सियासी जानकारों का मानना है कि टीएमसी इस कदम से महिलाओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।

बंगाल की सियासत में असदुद्दीन ओवैसी और अब्बास सिद्दीकी की एंट्री के बाद मुस्लिम मतदाताओं को लेकर सवाल उठने लगे थे।

हालांकि, ममता बनर्जी ने 42 मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव खेलकर इस धड़े को भी साधने की कोशिश की है। दरअसल, बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो करीब 100 सीटों पर हार-जीत तय करते हैं।

 

म्युनिसिपल परफॉर्मेंस इंडेक्स में छत्तीसगढ़ राज्य  के रायपुर और बिलासपुर शहर ने किया उत्कृष्ट प्रदर्शन !

म्युनिसिपल परफॉर्मेंस इंडेक्स में छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर और बिलासपुर शहर ने किया उत्कृष्ट प्रदर्शन !

05-Mar-2021

देश के टॉप 10 शहरों में बनाई जगह रायपुर शहर को 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों की श्रेणी में मिला देश में 7वां रैंक

मुख्यमंत्री श्री बघेल और नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. डहरिया ने नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और विभागीय अधिकारियो-कर्मचारियों को दी बधाई

Municipal Performance Index Hummer Bilaspur in Municipal Performance Index  among the top ten cities in the country 

रायपुर, 04 मार्च 2021

म्युनिसिपल परफॉर्मेंस इंडेक्स में छत्तीसगढ़ के 2 शहरों ने   उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए देश के टॉप 10 शहरों में जगह बनाई है। रायपुर शहर को 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों की श्रेणी में देश में 7वां एवं बिलासपुर शहर को 10 लाख से कम जनसंख्या वाले शहरों की श्रेणी में 7वां रैंक प्राप्त हुआ है। दोनों शहरों को  शहरी निकायों (सरकार) द्वारा नागरिकों को मूलभूत नागरिक सुुविधाएं उपलब्ध कराने में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के कारण देश में सातवां रैंक प्राप्त हुआ है।
    भारत सरकार आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से देश के शहरों के मध्य आयोजित म्युनिसिपल परफॉर्मेंस इंडेक्स प्रतियोगिता के परिणाम घोषित किए गए। परिणामों की घोषणा केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा नई दिल्ली में की गई।
    मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने रायपुर एवं बिलासपुर के नागरिकों, जनप्रतिनिधियों एवं नगरीय प्रशासन विभाग को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि छत्तीसगढ़ लगातार शहरी क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ट कार्य हेतु पुरस्कृत किया जा रहा है। ज्ञात हो कि गत वर्ष देश में स्वच्छतम राज्य का पुरस्कार तथा प्रधानमंत्री आवास योजना में बेहतर कार्य हेतु छत्तीसगढ़ को केंद्र सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया था।
     इस उपलब्धि पर नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने शहर वासियों एवं विभागीय अधिकारियों को बधाई देते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार का प्रदर्शन दोहराने की बात कही है।

 

 


नाबालिग लड़कियों को छेड़छाड़ करने के आरोप में मदरसा शिक्षक को पांच साल की सजा !

नाबालिग लड़कियों को छेड़छाड़ करने के आरोप में मदरसा शिक्षक को पांच साल की सजा !

04-Mar-2021

यहां की एक विशेष अदालत ने मंगलवार को एक मदरसे के 29 वर्षीय शिक्षक को 2016 में दो नाबालिग लड़कियों से छेड़छाड़ करने के लिए पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

विशेष न्यायाधीश एम ए बरालिया ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 354 (छेड़छाड़) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के प्रासंगिक प्रावधानों (POCSO) अधिनियम के तहत दोषी पाया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 11 वर्षीय पीड़िता और उसकी नौ वर्षीय बहन एक मदरसे में कक्षाओं में भाग ले रही थी, जहाँ आरोपी 10 वर्षों से पढ़ा रहे थे।

अगस्त, 2016 में, शिकार मदरसे रो से घर लौट आए और उसके माता-पिता को सूचित किया कि आरोपी उसे अनुपयुक्त छुआ था और यह भी उसे चूमा था, अभियोजन पक्ष ने कहा।

छोटे भाई-बहनों ने भी इसी तरह का आरोप लगाया और मदरसे में कक्षाओं में जाने से मना कर दिया।

जब माता-पिता ने आरोपी का सामना किया, तो उसने कुछ जवाब दिए, जिसके बाद ट्रॉम्बे पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।

आरोपी को दो महीने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया और उसे जमानत दे दी गई, क्योंकि पुलिस 60 दिनों के निर्धारित समय के भीतर आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रही थी।

मुकदमे के दौरान, अभियोजन पक्ष ने मामले को साबित करने के लिए पीड़ितों और उनके माता-पिता की जांच की।

सियासत डॉट कॉम से साभार 

 

महंगी पड़ी मोदी सरकार ?...शिखर पर पेट्रोल-डीजल, सत्ता में काबिज भाजपा ने कांग्रेस पर फोड़ा ठीकरा!

महंगी पड़ी मोदी सरकार ?...शिखर पर पेट्रोल-डीजल, सत्ता में काबिज भाजपा ने कांग्रेस पर फोड़ा ठीकरा!

27-Feb-2021

लेख- ठाकुर राम बंजारे 

आसमान छूते पेट्रोल-डीजल और गैस के दामों से आम जनता परेशान है. पेट्रोल-डीजल के दाम 100 रुपये के पार हो गए हैं. तो वहीं रसोई गैस के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं, जिस महंगाई पर छाती पीटकर भाजपा ने देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से सत्ता छिना था. आज सत्ता पर काबिज हैं और महंगाई अपने चरमं पर हैं, भाजपा को अपने सात साल की कार्यकाल पर महंगाई को लेकर आइना दिखाई पढ़ गई है. महंगाई को लेकर आज भाजपा की सरकार पर देश की जनता कई सवाल कर रहे है. लेकिन इनके बड़े नेताओं ने जवाब देना तो छोड़ अपना मुंह छिपाने में गले हुए है कहते है पानी की गहराई का तभी पता चलता है जब पानी में उतरा जाए. भाजपा जब सत्ता से दूर था तब पेट्रोल-डीजल और रसोई जैसी आवश्यक वस्तुओं की महंगाई को लेकर सड़कों पर उतर आए थे जिसे आम जनता ने हाथोंहाथ लिया, और महंगाई से त्रस्त जनता बीजेपी को आँख मूंद वोट कर सत्ता में बैठा दिया लेकिन आज भाजपा की पोल खुलते दिखाई पढ़ रहे है. भाजपा ने सत्ता के सात सालों में हीं देश की जनता को महंगाई की दल-दल में ढ़केल दिया है आज जनता समझ रहे है की पानी की गहराई का तभी पता चलता है जब पानी में उतरा जाए.

पीएम मोदी ने कांग्रेस पर फोड़ा महंगाई का ठीकरा- ये विडम्बना ही है सत्ता में काबिज देश की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बढ़ती महंगाई को कांग्रेस की पिछली सरकारों को हीं जिम्मेदार ठहरा रहा हैं. मिडिया में आयी अपने बयान में पीएम मोदी ने कहा कि पिछली सरकारों ने देश के ऊर्जा आयात पर निर्भरता में कमी पर ध्यान दिया होता तो मध्यम वर्ग पर इतना बोझ नहीं बढ़ता. पीएम मोदी की बयान से साफ जाहिर है कि सरकार अभी टैक्सेज में कटौती करने के मूड में नहीं है पेट्रोल और डीजल की आज जो रिकॉर्ड कीमतें चल रही हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि इन पर टैक्स बहुत ज्यादा है |

2014 के चुनावों में बीजेपी की तरफ से पोस्टर जारी कर कहा था, बहुत हुई जनता पर पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार. 7 नवंबर 2011 को बीजेपी नेता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था, हम चैलेंज के साथ कह सकते हैं कि पूरी तरह से रिफाइंड पेट्रोल दिल्ली में 34 रूपये और मुंबई में 36 रूपये से मिल सकता है तो उसके दोगुने दाम क्यों सरकार की तरफ से लिए जा रहे हैं?

तेल पर टैक्स से सरकार को मोटी कमाई:-

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सरकार को मौजूदा वित्त वर्ष में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी से 3.49 लाख करोड़ रुपये हासिल होंगे. यह वित्त वर्ष 2020-21 के बजट अनुमान 2.49 लाख करोड़ रुपये से 39.3 फीसदी या करीब 97,600 करोड़ रुपये ज्यादा होगा. यानी पेट्रोल और डीजल पर टैक्स से सरकार को कोरोना काल के बावजूद इस साल जबरदस्त कमाई होने वाली है.

सरकार के पास हैं पेट्रोलियम उत्पादों के दाम घटाने का अधिकार-

सरकार के पास पेट्रोलियम उत्पादों के दाम घटाने के अधिकार हैं| कीमतों को डीरेगुलेट करने और इन पर टैक्स घटाने के विकल्प भी शामिल हैं | 15 जून 2017 से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें रोजाना आधार पर बदलने की शुरुआत कर दी गयी, इससे पहले इनमें हर तिमाही में बदलाव हुआ करता था| कीमत बाजार के हाथों में चले जाने के बाद इसमें अधिक तेजी देखने को मिल रही हैं |

पड़ोसी देशों में कम है पेट्रोल की कीमत-

भारत के पड़ोसी देशों में पेट्रोल की कीमत भारत की तुलना में काफी कम है| पाकिस्तान में पेट्रोल की बात करें तो यहां कीमत करीब 51 रुपए के आसपास है | श्रीलंका में पेट्रोल 60.26 रूपये में मिल रहा है | भूटान में इसकी कीमत 49.56 रूपये हैं |


स्कूल खोलना कहां तक सही, अभिभावक का राजी होना जरूरी

स्कूल खोलना कहां तक सही, अभिभावक का राजी होना जरूरी

25-Feb-2021

क़ादिर रज़वी

वेक्सीनेसन के दौरान राज्य सरकार ने फैसला लेते हुवे स्कूल तो खोल दी है लेकिन सरकार के इस फैसले को लेकर अभिभावकों की चिंता बढ़ गयी है। सरकार के फैसले को सही नहीं बताते हुए छत्तीसगढ़ पालक संग ने कोर्ट की शरण ले ली है।

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        11 महीने बाद छत्तीसगढ़ के स्कूलों में बच्चों की हाजरी लगने लगी है सरकार के मंजूरी के बाद 9 वीं से  12 वीं के स्कूल 15 फरवरी से खोल दिये गए लेकिन स्कूल खोलने का विरोध भी शुरू हो गया है। स्कूल खोले जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में छात्र पालक संघ ने याचिका लगाई है और सरकार के फैसले को चुनौती दी है।

           याचिका में कहा- गया है कि शासन का फैसला गलत है क्योंकि अभी कोरोना खत्म नही हुवा है स्कूल खुलने से बच्चे एक दूसरे के संपर्क में आएंगे इससे शोसल डिस्टेंसिंग तो टूटेगी ही जिससे कोरोना होने का खतरा बढ़ जाएगा।

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            शिक्षा के द्वारा आनन फानन में स्कूल खोले जाने का फैसला बेहद आपत्ति जनक अभिभावकों ने माना है।
             स्कूल में न तो सेनेटाइजर की व्यवस्था है न स्कूल जाते बच्चे शोसल डिस्टेंस का पालन कर पा रहे है न ही मास्क का उपयोग हो रहा है न ही वेक्सीनेसन हुवा है। स्कूल में शिक्षक तक मास्क नही लगा रहे तो बच्चों को क्या बोल पाएंगे।

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                  हमारे स्वास्थ्य मंत्री ने ये भी कह दिया है कि हमारे यहाँ बच्चो को किसी को टिका लगने नही देंगे फिर इतनी हड़बड़ी क्या थी स्कूल खोलने की जब 11 महीने की ऑनलाइन क्लासेस ले ली है, 1 महीने की क्लासेस बची हुई है तो उसके लिए बच्चों को स्कूल क्यों बुलाया जा रहा है।
       मार्च से ही बंद प्रदेश के स्कूल खोलने को लेकर सरकार ने हरी झंडी तो दिखा दी लेकिन महामारी को देखते हुवे कुछ गाइड लाइन भी तय की।

क्या है गाइड लाइन-

1-गाइड लाइन के मुताबिक स्कूल प्रबंध को अपने अपने परिसर में सेनेटाइजर कराना जरूरी है।
2-हर छात्रों का टेम्प्रेचर देखना होगा।
3-स्कूल परिसर में शिक्षकों और बच्चों को मास्क पहनना और सेनेटाइजर लगाना जरूरी है।
4-छात्रों को कक्षाओ में शोसल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुवे बैठना होगा।
5-कैम्पस में भी बच्चे एक दूसरे के करीब न रहे।
6-एक कमरे में 20 से 22 बच्चे को बैठने की अनुमति दी गयी है।
           ये खयाल स्कूल प्रबंधक को रखना अनिवार्य है।

     सभी जिला शिक्षा अधिकारी खुद स्कुलो का भ्रमण करें तो पता चल जाएगा कि कितने गाइड लाइन का पालन हो रहा है।

                           फिलहाल प्रदेश में  पहली से 8 वीं तक के स्कूल नही खोले गए है सिर्फ 9 वी से 12वी तक स्कूल खोले गए सायद सरकार ये समझती है वो इतने तो समझदार है कि वो नियमो का पालन करते हुवे खुद को संक्रमण से बच सकते है लेकिन ऐसा लगता है पालक संघ सरकार के इस फैसले से सहमत नही बरहाल पालक संघ का डर अपने जगह लाज़मी है।

              लेकिन सवाल ये है कि इस महामारी के आड़ में हम बच्चों को शिक्षा से दूर क्या रखेंगे ।
भले ही वेक्सीनेसन शुरू हो गया हो पर सभी को वेक्सीन लगने में काफी वक्त लगेगा ऐसे में कोरोना अभि जाने वाला नही है और ईसके साथ ही जीना सीखना पड़ेगा।

           लेकिन स्कूल के लिए जो गाइड लाइंस बनाई गई है दरअसल ये गाइड लाइंस आम जिंदगी में अपने घर के बाहर के लिए भी बनी हुई है।

      लेकिन जरा गौर कीजिए इन गाइड लाइन का पालन करते सड़को पर कितने लोग नज़र आते है अब सड़को पर जरा निकल कर देखिये  कितने लोग पर मास्क दिखता है कहाँ- कहाँ सेनेटाइजर का इस्तेमाल होते दिखता है और कहां पर शोसल डिस्टेंसिंग नज़र आती है दरअसल इन तमाम गाइड लाइन की धज्जियां सड़को से लेकर दुकानों पर उड़ रही है।

           ऐसे में सवाल ये उठता है स्कूल भी इसी श्रेणी में लाकर खड़े कर दिए जाएंगे और नियमित कक्षाएं लगेगी तो इन गाइड लाइंस का ऐसा ही हाल नही होगा........???
         जो बाहर सड़को पर नज़र आता है जहां बड़े व्यक्ति गाइड लाइंस का पालन करते नज़र नही आ रहे है वहाँ बच्चो से सरकार कैसे उम्मीद लगाए बैठी है।
          अभी कुछ दिनों पहले कोंडागांव में मोहल्ला क्लास शुरू कराई थी राज्य शासन ने वह 22 बच्चे और 3 शिक्षक कोरोना संक्रमित हुवे थे
   अभी रोज ही समाचार कोरोना पाज़ीटिव होने का आ रहा है मनेन्द्रगढ़ तो सूरजपुर, सैनिक स्कूल अम्बिकापुर और रोज कही न कही से उसके बाद भी सरकार की अनदेखी करना क्या दर्शाता है और क्या समझ जाएं..??

         इसका मतलब शिक्षा माफिया और राज्य शासन की आपसी मिली भगत है आप ये सोचिये 11 महीने ऑनलाइन करवाई जा चुकी है उसके बाद ये अचानक से 1 महीने के लिए स्कूल खोलना पूरी तरह से आपत्ति जनक है हर अभिभावक इसे शर्मनाक कह रहे है।

             पहले exam से 15 दिन पहले कक्षाओ को बंद कर दिया जाता था ताकि बच्चे घर मे exam की तैयारी कर सके यहाँ पर उल्टा ही हो रहा है 1 महीने बचे हुवे है तो सरकार स्कूल खोल दी गयी है।

          जो सीधे तौर पे अभिभावक फीस नही दे पा रहे है क्योंकि कोरोना काल मे सभी प्रतिष्ठानों को बंद करवाया गया तो सरकार से कोई मुवावजा तो नही मांगा न कोई आंदोलन किया गया तो सरकार को समझनी चाहिए कि स्कुलो में मांगी जा रही फिसों को कैसे पालक दे पाएंगे इस महामारी के दौरान पालको ने अपने सेविंग से बच्चों का पालन पोषण किया अब स्कुलो का फीस का बोझ कैसे उठा पाएंगे।

                ये शिक्षा माफियाओ और राज्य शासन की मिली भगत है ताकि इसकी आड़ में पालको अभिभावकों को लूटा जा सके।
ये स्कुलो को खोलना ही पूरा मामला प्राइवेट स्कूलों को फीस दिलवाने के पूरा खेल है। क्या ऑनलाइन क्लास के लिए स्कूल वाले मोबाइल, लेपटॉप दिए बच्चो को जो पैसा वसूला करना चाहते है एक थर्ड क्लास ऑनलाइन क्लास बच्चो को दी गयी है वाट्सऐप में बच्चों को फोटो भेज-भेज के वीडियो भेज-भेज कर पढ़ाई क्या इस तरह ऑनलाइन पढ़ाई होती है इसके एवज में जो फीस मांगी जा रही है स्कूल संचालक द्वारा पालक से क्या उचित है इसलिए अब कुछ जगहों से अभिभावक न्यायलय की शरण मे जाना मजबूरी बनी।

           जबकि प्राइवेट स्कूलो द्वारा शिक्षकों को ऑनलाइन क्लास के लिए  एंगेज रखा औऱ शिक्षकों से 1 से 2 घंटे क्लास दिलवाई गई और उसके एवज में प्राइवेट स्कूल वाले शिक्षकों को वेतन के आधे से कम सेलरी देकर छल किया है लेकिन अब स्कूल संचालक पालक से पूरा-पूरा फीस वसूल करना कहाँ तक सही है।

            जबकि बच्चे स्कूल से प्रांगण में कदम तक नहीं रखे है न स्कूल का बिजली उपयोग हुवा न स्कूल के बच्चों ने स्कूल प्ले ग्राउंड  का उपयोग किया न कमरे का उपयोग किया न स्कूल की लाइब्रेरी उपयोग किया किसी तरह से बच्चों ने स्कूल का उपयोग हि नही किया लेकिन टिविसन फीस की आड़ में समस्त फीस को समायोजित करके स्कूल द्वारा वसूला जा रहा है।

                 ये राज्य शासन भी अच्छी तरह से जानती है लेकिन राज्य शासन पता नही क्यों मुखदर्शक बनी हुई है और शिक्षकों के वेतन की बात है तो पालक संघ ने राज्य शासन को पत्र लिख कर कहा है कि अगर पालक संघो से 30% वसूल की जाए तो शिक्षकों को 100% में 100% शिक्षकों को सेलरी दी जा सकती है.

और वैसे भी "शिक्षा नो प्रोफिट नो लॉस " पर मान्यता दी जाती है न कि शिक्षा का धंधा करने के लिए।

             माननीय न्ययालय के समक्ष जो स्कूल संचालकों ने अपना पक्ष रखा औऱ ये कहा हम शिक्षकों को वेतन नही दे पा रहे है माननीय न्यायालय ने उन्हें टिविसन फीस वसूलने के लिए कहा लेकिन सरकार की जिम्मेदारी थी कि न्ययालय के समक्ष ये बात रखनी चाहिए थी कि स्कूल संचालको टिविसन फीस के आड़ में समस्त शुल्क को वसूल रहे है तो सायद माननीय न्ययालय जो है राज्य शासन को आदेशित करता कि सबसे पहले टिविसन फीस को डिफाइन करवाये उसके बाद टिविसन फीस वसुलिये तो कही न कही माननीय न्यायालय के सामने तथ्य राज्य शासन के द्वारा रखें जाने थे। क्योंकि राज्य शासन एक पक्ष था तो उन्हें अपना पक्ष  पालको का पक्ष बहुत ही कमजोर तरीके से रखा तो निश्चित तौर पे राज्य शासन में बैठे हुवे लोग और शिक्षा माफियाओ की मिली भगत को उजागर करती है। क्योंकि राज्य शासन ने किसी तरह की टिविसन फीस को डिफाइन नही किया।
           लेकिन मुद्दा अभी भी यही है कि अगर स्कूल खोले गए है सरकार आदेश दे दी है फैसला अभी भी पालको के हाथ हो सकता है क्योंकि बच्चा हमारा है और हमे इसबात का डर है कि बच्चा कोरोना संक्रमित हो सकता है।

              दरअसल ये चिन्ता स्वभाविक है बच्चे को पालक किसी ऐसे ख़तरे में नही डालना चाहेगा जो खतरा अदृश्य हो कहाँ से आएगा किस रूप में आएगा इसका भी पता नही है।

             सरकारी स्कूलों की स्थति आपको बतादू सरकार की नज़र में बच्चे भेड़ बकरी है वो जी जाए मर जाए इससे सरकार को कोई लेना देना नही।
            लेकिन प्राइवेट स्कूलों के पेरेंट्स है वो अपने बच्चों के लिए बहुत सतर्क नज़र आ रहे है।

              आपको किसी भी स्कूल के कंसेंट लेटर में (साइन) हस्ताक्षर न करें सरकार की इतना घटिया सोच कैसे हो सकती है हमारे बच्चों को स्कूल भेजना है और सरकार कहती है कि आप लिख के दीजिये की आपका बच्चा स्कूल में कोरोना पाजेटिव हो कर मर जाता है तो उसके लिए पालक जिम्मेदार होंगे मतलब पालक का अपने बच्चे के डेथ सर्टिफिकेट में साइन करने जैसा है क्या ये एक प्रकार कि मूर्खता पूर्वक आदेश नही है .....??

            न स्कूल न सरकार किसी भी प्रकार कि जिम्मेदारी लेने को तैयार नही, तो पालक को ही समझना होगा।              
            अगर आपका बच्चा कोरोना संक्रमित होकर मर जाता है तो समझ लीजिए आपका बच्चा वापस नही आएगा।

           सरकार जो 11 महीने की ऑनलाइन पढ़ाई कराई है और 1 महीना जो बचा हुवा है इसमें सरकार चाहती तो ऑनलाइन Exam करा सकती थी सारे बच्चे घर मे बैठकर शांतिपूर्वक Exam दे सकते थे और आगे की तैयारी कर सकते थे और सरकार नए सत्र स्कूल को जून-जुलाई में खोल सकती थी लेकिन सीधे तौर पर सरकार और शिक्षा माफियाओ की मिली भगत बच्चो की जान लेने पर अड़ी है।

           अंत मे एक बात बताता चलु माननीय न्यायलय सुप्रीम कोर्ट का ये भी आडर है स्कूल फीस ले सकता है लेकिन कोर्ट ने ये भी खास तौर पर कहा है की जो बच्चे स्कुल फीस नही देने की वजह से परीक्षा में स्कूल संचालक न रोक सकता है न ही स्कूल से निकाल सकता है यानी कि स्कूल ऐसा करता है तो संबंधित थाने में जाकर पालक पंजीबद्ध करा सकता है। 


संत रैदास की अनूठी भक्ति एवं सिद्धि

संत रैदास की अनूठी भक्ति एवं सिद्धि

24-Feb-2021

संत रैदास जयन्ती- 27 फरवरी, 2021 के उपलक्ष्य में

-ललित गर्ग -

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महामना संत रैदास भारतीय संत परम्परा और संत-साहित्य के महान् हस्ताक्षर है, दुनियाभर के संत-महात्माओं में उनका विशिष्ट स्थान है। क्योंकि उन्होंने कभी धन के बदले आत्मा की आवाज को नहीं बदला तथा शक्ति और पुरुषार्थ के स्थान पर कभी संकीर्णता और अकर्मण्यता को नहीं अपनाया। ऐसा इसलिये संभव हुआ क्योंकि रैदास अध्यात्म की सुदृढ़ परम्परा के संवाहक भी थे। वे निर्गुण रंगी चादरिया रे, कोई ओढ़े संत सुजान को चरितार्थ करते हुए सद्भावना और प्रेम की गंगा को प्रवाहित किया। मन चंगा तो कठौती में गंगा, यह संत शिरोमणि रैदासजी के द्वारा कहा गया अमर सूक्ति भक्ति दोहा है। जिसमें उनकी गंगा भक्ति को सरलता से समझा जा सकता है। हिंदू धर्म के अनुसार कोई भी इंसान जात-पांत से बड़ा या छोटा नहीं होता। अपितु मन, वचन और कर्म से बड़ा या छोटा होता हैं। संत शिरोमणि रैदासजी जात से तो मोची थे, लेकिन मन, कर्म और वचन से संत थे। उनके भक्त रैदासी कहलाते हैं।
सद्गुरु स्वामी रामानन्दजी के बारह शिष्यों में से एक रैदासजी के जीवन में गंगा भक्ति से जुड़े अनेक घटना एवं प्रसंग है। जिनसे स्पष्ट होता है कि उनके जीवन निर्माण, उनकी भक्ति, उनकी धर्म-साधना, उनकी कर्म-साधना एवं साहित्य साधना में गंगा का अलौकिक एवं अनूठा महत्व एवं प्रभाव रहा है। संत कवि रैदास कबीरदास के गुरु भाई थे। गुरु भाई अर्थात् दोनों के गुरु स्वामी रामानंदजी थे। संत रैदास का जन्म लगभग 600 वर्ष पूर्व माघ पूर्णिमा के दिन काशी में हुआ था। मोची कुल में जन्म लेने के कारण जूते बनाना उनका पैतृक व्यवसाय था और इस व्यवसाय को ही उन्होंने भक्ति-साधना एवं ध्यान विधि बना डाला। कार्य कैसा भी हो, यदि आप उसे ही परमात्मा का ध्यान बना लें तो मोक्ष सरल हो जाता है। रैदासजी अपना काम पूरी निष्ठा और ध्यान से करते थे। इस कार्य में उन्हें इतना आनंद आता था कि वे मूल्य लिए बिना ही जूते लोगों को भेंट कर देते थे। रैदासजी के उच्च आदर्श और उनकी वाणी, भक्ति एवं अलौकिक शक्तियों से प्रभावित होकर अनेक राजा-रानियों, साधुओं-महात्मा तथा विद्वज्जनों ने उनको सम्मान दिया है। वे मीरा बाई के गुरु भी थे। रैदासजी श्रीराम और श्रीकृष्ण भक्त परंपरा के कवि और संत माने जाते हैं। उनके प्रसिद्ध दोहे आज भी समाज में प्रचलित हैं जिन पर कई धुनों में भजन भी बनाए गए हैं। जैसे, प्रभुजी तुम चंदन हम पानी- इस प्रसिद्ध भजन को सभी जानते हैं।
महान संत, समाज सुधारक, साधक और कवि रैदास ने जीवनपर्यन्त छुआछूत, ऊंच-नीच, जातिवाद जैसी कुरीतियों का विरोध करते हुए समाज में फैली तमाम बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई और उन कुरीतियों के खिलाफ निरन्तर कार्य करते रहे। समस्त भारतीय समाज को भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता और भाईचारे की सीख देने वाले 15वीं सदी के महान समाज सुधारक संत रैदासजी को जो चेतना प्राप्त हुई, वह तन-मन के भेद से प्रतिबद्ध नहीं है, मुक्त है। उन्हें जो साधना मिली, वह सत्य की पूजा नहीं करती, शल्य-चिकित्सा करती है। सत्य की निरंकुश जिज्ञासा ही उनका जीवन-धर्म रहा है। वही उनका संतत्व रहा। वे उसे चादर की भाँति ओढ़े हुए नहीं हैं बल्कि वह बीज की भाँति उनके अंतस्तल से अंकुरित होता रहा है। उनका जन्म ऐसे विकट समय में हुआ था, जब समाज में घोर अंधविश्वास, कुप्रथाओं, अन्याय और अत्याचार का बोलबाला था, धार्मिक कट्टरपंथता चरम पर थी, मानवता कराह रही थी। उस जमाने में मध्यमवर्गीय समाज के लोग कथित निम्न जातियों के लोगों का शोषण किया करते थे। ऐसे विकट समय में समाज सुधार की बात करना तो दूर की बात, उसके बारे में सोचना भी मुश्किल था लेकिन जूते बनाने का कार्य करने वाले संत रैदास ने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने के लिए समाधि, ध्यान और योग के मार्ग को अपनाते हुए असीम ज्ञान प्राप्त किया और अपने इसी ज्ञान के जरिये पीड़ित मानवता, समाज एवं दीन-दुखियों की सेवा कार्य में जुट गए। उन्होंने अपनी सिद्धियों के जरिये समाज में व्याप्त आडम्बरों, अज्ञानता, झूठ, मक्कारी और अधार्मिकता का भंडाफोड़ करते हुए समाज को जागृत करने और नई दिशा देने का प्रयास किया।
‘रैदास’ के नाम से चर्चित इस अलौकिक संत चेतना का मूल नाम रविदास है। जूते बनाने के कार्य से उन्हें जो भी कमाई होती, उससे वे संतों की सेवा किया करते और उसके बाद जो कुछ बचता, उसी से परिवार का निर्वाह करते थे। एक दिन रैदास जूते बनाने में व्यस्त थे कि तभी उनके पास एक ब्राह्मण आया और उनसे कहा कि मेरे जूते टूट गए हैं, इन्हें ठीक कर दो। रैदास उनके जूते ठीक करने लगे और उसी दौरान उन्होंने ब्राह्मण से पूछ लिया कि वे कहां जा रहे हैं? ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘‘मैं गंगा स्नान करने जा रहा हूं पर चमड़े का काम करने वाले तुम क्या जानो कि इससे कितना पुण्य मिलता है?’’ इस पर रैदास ने कहा कि आप सही कह रहे हैं ब्राह्मण देवता! हम नीच और मलिन लोगों के गंगा स्नान करने से गंगा अपवित्र हो जाएगी। जूते ठीक होने के बाद ब्राह्मण ने उसके बदले उन्हें एक कौड़ी मूल्य देने का प्रयास किया तो संत रैदास ने कहा कि इस कौड़ी को आप मेरी ओर से गंगा मैया को ‘रविदास की भेंट’ कहकर अर्पित कर देना।
ब्राह्मण गंगाजी पहुंचा और स्नान करने के पश्चात् जैसे ही उसने रैदास द्वारा दी गई मुद्रा यह कहते हुए गंगा में अर्पित करने का प्रयास किया कि गंगा मैया रैदास की यह भेंट स्वीकार करो, तभी जल में से स्वयं गंगा मैया ने अपना हाथ निकालकर ब्राह्मण से वह मुद्रा ले ली और मुद्रा के बदले ब्राह्मण को एक सोने का कंगन देते हुए वह कंगन रैदास को देने का कहा। सोने का रत्नजड़ित अत्यंत सुंदर कंगन देखकर ब्राह्मण के मन में लालच आ गया और उसने विचार किया कि घर पहुंचकर वह यह कंगन अपनी पत्नी को देगा, जिसे पाकर वह बेहद खुश हो जाएगी। पत्नी ने जब वह कंगन देखा तो उसने सुझाव दिया कि क्यों न रत्नजड़ित यह कंगन राजा को भेंट कर दिया जाये, जिसके बदले वे प्रसन्न होकर हमें मालामाल कर देंगे। पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण राजदरबार पहुंचा और कंगन राजा को भेंट किया तो राजा ने ढ़ेर सारी मुद्राएं देकर उसकी झोली भर दी। राजा ने प्रेमपूर्वक वह कंगन अपनी महारानी के हाथ में पहनाया तो महारानी इतना सुंदर कंगन पाकर इतनी खुश हुई कि उसने राजा से दूसरे हाथ के लिए भी वैसे ही कंगन की मांग की।
राजा ने ब्राह्मण से वैसा ही एक और कंगन लाने का आदेश देते हुए कहा कि अगर उसने तीन दिन में कंगन लाकर नहीं दिया तो वह दंड का पात्र बनेगा। राजाज्ञा सुनकर बेचारे ब्राह्मण के होश उड़ गए। ब्राह्मण रैदास के पास पहुंचा और उन्हें सारे वृत्तांत की विस्तृत जानकारी दी। रैदासजी ने उनसे नाराज हुए बगैर कहा कि तुमने मन के लालच के कारण कंगन अपने पास रख लिया, इसका पछतावा मत करो। रही बात राजा को देने के लिए दूसरे कंगन की तो तुम उसकी चिंता भी मत करो, गंगा मैया तुम्हारे मान-सम्मान की रक्षा करेंगी। यह कहते हुए उन्होंने अपनी वह कठौती (चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरा पात्र) उठाई, जिसमें पानी भरा हुआ था और जैसे ही गंगा मैया का आव्हान करते हुए अपनी कठौती से जल छिड़का, गंगा मैया वहां प्रकट हुई और रैदासजी के आग्रह पर उन्होंने रत्नजड़ित एक और कंगन उस ब्राह्मण को दे दिया। इस प्रकार खुश होकर ब्राह्मण राजा को कंगन भेंट करने चला गया और रैदासजी ने उसे अपने बड़प्पन का जरा भी अहसास नहीं होने दिया।
मीराबाई के आमंत्रण पर संत रैदासजी चित्तौड़गढ़ आ गये लेकिन यहां भी उनकी गंगा भक्ति तनिक भी कम नहीं हुई। वहीं पर उनका 120 वर्ष की आयु में निर्वाह हुआ। भारतीय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परिवेश में संत रैदासजी गंगा भक्ति इतिहास में एक अमिट आलेख है।
प्रेषकः


ललित गर्ग
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 09811051133

 


"रामदेव बाबा के दावे की हक़ीक़त" पतंजलि के कोरोनिल डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुमोदित नहीं है?

23-Feb-2021

हाल ही में, मीडिया के एक वर्ग ने दावा किया कि पतंजलि के कोरोनिल को भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से मंजूरी मिली है।

बाद में, डब्ल्यूएचओ और पतंजलि दोनों ने अफवाहों को खारिज करने के लिए स्पष्टीकरण जारी किया।

WHO ने ट्वीट किया, “WHO ने # COVID19 के इलाज के लिए किसी भी पारंपरिक दवा की प्रभावशीलता की समीक्षा या प्रमाणित नहीं किया है।”

पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के एमडी आचार्य बालकृष्ण ने भी स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा, “हम भ्रम से बचने के लिए स्पष्ट करना चाहते हैं कि कोरोनिल को हमारे डब्ल्यूएचओ जीएमपी आज्ञाकारी सीओपीपी प्रमाण पत्र डीसीजीआई, भारत सरकार द्वारा जारी किया गया है। यह स्पष्ट है कि डब्लूएचओ किसी भी ड्रग्स को स्वीकार या अस्वीकृत नहीं करता है। WHO पूरी दुनिया के लोगों के लिए एक बेहतर, स्वस्थ भविष्य बनाने के लिए काम करता है।

इससे पहले, बाबा रामदेव ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा के आधार पर सस्ती चिकित्सा प्रदान करते हुए दवा मानवता की मदद करेगी।

“प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर, आयुष मंत्रालय ने कोविद -19 में उपायों के समर्थन के लिए कोरोनिल टैबलेट को एक दवा के रूप में मान्यता दी है,” उन्होंने बताया।

 

देश का पैगाम किसानों के नाम......

देश का पैगाम किसानों के नाम......

20-Feb-2021

देश का पैगाम किसानों के नाम......

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किसान जागो, संगठित हो और हमारे जीवन को संरक्षित करो, क्योंकि फैक्टरियां और व्यापारिक प्रतिष्ठान हमें लाखों बीमारियों की सौगात देने को उतारू हैं।

किसान 6 से 8 महीने तक कड़ी मेहनत करके, 150 रुपये किलो में बीज लेकर राहर बोता है। खराब मौसम से बचकर कुछ उत्पादन कर भी लेता है तो उस राहर को ₹40-60/KG में बेचने को मजबूर रहता है जबकि व्यापारी वर्ग उसे एक दिन के मशीनी मेहनत के बाद ₹125/KG में बेचता है। किसानों थोड़ा समीक्षक बनो, पिछले साल राहर दाल का जो अधिकतम मूल्य था उसके 75% से कम मूल्य में राहर मत बेचो..... जागो और संगठित हो जाओ, आप मंडी या दुकान में जितना अधिक भीड़ लगाकर बेचोगे, आपके राहर उतने ही सस्ते दामों में बिकेंगे..... आराम से बेचना, बचाकर रखो.... दुकान या मंडी में बेचने के बजाय मील से या जतवा से दाल बनाकर, दाल को केमिकल से केंसर और शुगर कारक बनाये बिना स्वयं सड़क किनारे दुकान लगाकर ग्राहकों को बेचना, ताकि आम आदमी रोगमुक्त जीवन को प्राप्त करें और आपको अच्छे दाम मिले। आम जनता को लुटेरे दलालों से बचाएं।

मैंने ऊपर जो राहर के बारे में कही वह केवल राहर के लिए नहीं बल्कि लगभग सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों के लिए बता रही हूँ। आप चावल, गेंहू और अन्य सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों के रखरखाव की समीक्षा करेंगे तो समझ मे आएगा कि आप जिसे पौष्टिकता और जीवन की रक्षा के लिए खा रहे हैं वह आपको ढेरों बीमारियों की सौगात देने वाली है। हम किसान अपने घरों में धान, गेंहू, राहर, चना इत्यादि को लंबे दिनों तक रखने के लिए खासकर बीज के रूप में रखते है  तो उसमें नीम पत्ते, प्याज इत्यादि डालकर उसे घुन इत्यादि से बचाते हैं, अब कैमिकल प्रोसेस के माध्यम से उसी खाद्य पदार्थों में जहरीले केमिकल मिलाया जा रहा है, ताकि अनाज के एक दाने भी खराब या बर्बाद न हो चाहे आप खाने वाले उसे खाकर जल्दी मरने योग्य होते जाएं।

हम ग्रामीणों और किसानों को बड़ी समस्या होती है अपने खाद्य पदार्थों की सुरक्षा में। आप जिस चावल, राहर और अन्य खाद्य पदार्थ को बाजार या दुकान से खरीदते हैं उसमें कैमिकल डालकर सुंदर बनाया गया है, चिकना बनाया गया है ताकि आप देखकर आकर्षित हो सकें। यदि आपने धान या दाल की मिलिंग नहीं देखी होगी तो जरूर देखिए जिस अनाज को आप दोगुने दाम देकर खरीद रहे हैं वह जहरीले पदार्थों की लेप से लिपटी हुई है जो आपको भयावह बीमारियों से ग्रसित करने वाली है।

बचपन में हमारा परिवार लगभग 3 हेक्टेयर जमीन में गन्ना किसानी करके उसका गुड़ बनाने का काम करता था, गुड़ को थोड़ा साफ और चमकदार बनाने के लिए पुटू, एक प्रकार का भिंडी के तने के छिलके डालकर गन्ना रस से उसका कालापन निकालते थे, मगर अब ऐसा नहीं है टोटल कैमिकल प्रोसेस होने लगा है। मेरे दिमाक में एक निर्देश हमेशा से, बचपन से सुरक्षित है... शक्कर बीमारियों का कारक है जबकि अब जिस पद्धति से सुंदर दिखने वाले गुड़ बनाकर आपको खिलाया जा रहा है वह भी आपके साथ धोखा है, इसके माध्यम से आपको सैकड़ों बीमारियों की सौगात दी जा रही है। इसका बड़ा कारण है ईंधन बचाने और कम गन्ने में अधिक गुड़ बनाने की होड़। अब जो ग्रामीण क्षेत्रों में गुड़ की फैक्टरी लग रही है वह भी केमिकल और बीमारियों से युक्त है, भोज्य पदार्थों में जितना अधिक व्यापारिक इन्वॉल्वमेंट होगा ग्राहकों को उतने अधिक दाम में उपलब्ध होते हैं, भोज्य पदार्थ और राशन जितना अधिक दिनों तक व्यापारिक प्रतिष्ठान में रहेंगे उतने अधिक रोगकारक और केमिकल युक्त होंगे। इसलिए हे भगवान, हे किसान आपसे प्रार्थना है अनाज का थोक विक्रय मत करो क्योंकि ये लोग हमें बीमारियों से मारने और लूटने को उतारू हैं आपके मेहनत में केवल दलाली करने वाले हैं। आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है, थोक के बजाय फुटकर बेचो, अपने घर मे फिर से कोठी बनाओ, खेत से सीधे बोरी भरकर मत बेच दो... हमारी रक्षा करो...हमारी प्राण बचाओ।

पुनः आपसे निवेदन है कि परंपरागत कृषि पद्धति को छोड़कर थोड़ा व्यापारिक बनिए.. स्थानीय मार्केट में मांग के अनुरूप ही अनाज का उत्पादन करिए; हमारे जीवन और पेट भरने के साथ साथ थोड़ा अपने आर्थिक स्थिति में सुधार भी करिए। थोड़ा संगठित हो जाओगे, जागरूक हो जाओगे तो आत्महत्या के लिए मजबूर नही होओगे, ख्याल रखना मनुष्य के जीवन ले लिए हवा और पानी के बाद जो सबसे आवश्यक है वह है आप किसानों के द्वारा उत्पादित अनाज। जो लोग आपके अपमान करने, आपको देशद्रोही बताने में लगे हैं उन्हें बताना भी जरूरी है कि जिसे वह खाकर जिंदा है वह फैक्टरी में नहीं बनते। फैक्ट्री में बनने वाले कोई भी अतिआवश्यक चीजें राशन से अधिक आवश्यक नहीं है। उपभोक्ताओं को भी बताना जरूरी है उन्हें भी ज्ञात होनी चाहिए कि किसानों और उनके बीच के जो लोग हैं दलाली कर रहे हैं, केवल दलाली ही नहीं बल्कि बीमारियों की सौगात दे रहे हैं। आम लोगों को भी जानकारी होनी चाहिए कि उनके जीवन के लिए जाति, धर्म और सीमा की नहीं बल्कि शुद्ध हवा, पानी और केमिकल रहित अनाज की जरूरत है, जाति नहीं होगी, धर्म नही होगी और सीमा नही रहेगी तब भी वे जिंदा रह सकते हैं।

श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी
नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ 


पूर्व CJI के खिलाफ यौन उत्पीड़न का केस हुआ बंद!

पूर्व CJI के खिलाफ यौन उत्पीड़न का केस हुआ बंद!

18-Feb-2021

एजेंसी 

नई दिल्ली : देश की सर्वोच्चतम न्यायालय ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले को बंद कर दिया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने रंजन गोगोई के खिलाफ कथित यौन उत्पीड़न मामला में स्वत: संज्ञान के अधार पर शुरू हुई जांच प्रक्रिया को बंद कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले को न्यायपालिका के खिलाफ साजिश बताया है। आपको बता दें कि पूर्व सीजेआई के खिलाफ साल 2019 में एक महिला ने कथित रूप से यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने केस के बंद करते हुए कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ इस तरह के आरोप साजिश की संभावना को उजागर करते हैं। ऐसे मामलों को पूर्व सीजेआई के फैसलों से जोड़ा जा सकता है। जिसमें नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) पर उनके विचार भी शामिल हो सकते हैं। बता दें कि रंजन गोगोई के खिलाफ जांच की जिम्मेदारी पूर्व न्यायमूर्ति एके पटनायक को दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं की रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पूर्व न्यायाधीश एके पटनायक की रिपोर्ट में पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के खिलाफ साजिश को स्वीकार किया गया है। जिसे कोर्ट नजरअंदाज नहीं कर सकती। इस मामले को दो साल बीत चुक हैं, और गोगोई को फंसाने के षड्यंत्र की जांच में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड हासिल करने की संभावना बहुत ही कम रह गई है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के वकील उत्सव बैंस ने भी पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों के पीछे षड्यंत्र का दावा किया था।


स्वामी दयानन्द सरस्वतीः राष्ट्रक्रांति के उन्नायक

स्वामी दयानन्द सरस्वतीः राष्ट्रक्रांति के उन्नायक

11-Feb-2021

स्वामी दयानन्द सरस्वती जन्म जयन्ती-12 फरवरी 2021 पर विशेष
-ः ललित गर्ग:-

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महापुरुषों की कीर्ति किसी एक युग तक सीमित नहीं रहती। उनका लोकहितकारी चिन्तन त्रैकालिक, सार्वभैमिक एवं सार्वदेशिक होता है और युग-युगों तक समाज का पथदर्शन करता है। स्वामी दयानंद सरस्वती हमारे समाज एवं राष्ट्र के ऐसे ही एक प्रकाश स्तंभ हैं, जिन्होंने न केवल धर्मक्रांति की बल्कि राष्ट्रक्रांति के भी वे प्रेरक बने। जिस युग में उन्होंने जन्म लिया उस समय देशी-विदेशी प्रभाव से भारतीय संस्कृति संक्रमण के दौर से गुजर रही थी और उसका पतन आरंभ हो गया था। उन्होंने भयाक्रांत, आडम्बरों में जकड़ी और धर्म से विमुख जनता को अपनी आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक एकता से संबल प्रदान किया। वे उन महान संतों-महापुरुषों में अग्रणी हैं जिन्होंने देश में प्रचलित अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, विभिन्न प्रकार के आडंबरों व सभी अमानवीय आचरणों का विरोध किया। वे आधुनिक भारत के महान् चिन्तक, समाज सुधारक, क्रांतिकारी धर्मगुरु व देशभक्त थे। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने तथा हिंदू धर्म के उत्थान व इसके स्वाभिमान को जगाने हेतु स्वामीजी के महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारतीय जनमानस सदैव उनका ऋणी रहेगा।
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी सन् 1824 में काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में टंकरा नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम कृष्णजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित-मनीषी बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए।
महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा भारतीय जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा की परवाह किये बिना हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है, संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। स्वामीजी ने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। सत्यार्थ प्रकाश के लेखन में उन्होंने भक्ति-ज्ञान के अतिरिक्त समाज के नैतिक उत्थान एवं समाज-सुधार पर भी जोर दिया उन्होंने समाज की कपट वृत्ति, दंभ, क्रूरता, अनाचार, आडम्बर, एवं महिला अत्याचार की भत्र्सना करने में संकोच नहीं किया। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों एवं ढकोसलों का विरोध किया और धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्थापित किया। उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर से जुड़ी भ्रान्त धारणाओं को बदलने के लिये विवश किया।
एक बार शिवरात्रि को स्वामी दयानन्द सरस्वती ने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए। अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और वे 1846 में सत्य की खोज मे निकल पड़े। गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजलि-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा- विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत-मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।
महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। केशवचन्द्र सेन ने स्वामीजी को यह सलाह दे डाली कि यदि आप संस्कृत छोड़ कर हिन्दी में बोलना आरम्भ करें, तो देश का असीम उपकार हो सकता है। तभी से स्वामीजी ने हिन्दी में उपदेश देना प्रारंभ किया, इससे विभिन्न प्रान्तों में उन्हंे असंख्य अनुयायी मिलने लगे।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। उन्होंने ईसाइयत और इस्लाम के विरूद्ध मोर्चा खोला, सनातनधर्मी हिंदुओं के खिलाफ संघर्ष किया। इस कारण स्वामीजी को तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी, अपमान, कलंक और कष्ट झेलने पड़े। संघर्ष उनके लिये अभिशाप नहीं, वरदान साबित हुआ। आंतरिक आवाज वही प्रकट कर सकता है जो दृढ़ मनोबली और आत्म-विजेता हो। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलायी थी, उसका कोई जवाब नहीं था। वे जो कुछ कह रहे थे, उसका उत्तर न तो मुसलमान दे सकते थे, न ईसाई, न पुराणों पर पलने वाले हिन्दू पण्डित और विद्वान। हिन्दू नवोत्थान अब पूरे प्रकाश में आ गया था और अनेक समझदार लोग मन ही मन अनुभव करने लगे थे कि वास्तव में पौराणिक धर्म की पोंगापंथी में कोई सार नहीं है। इस तरह धर्म के वास्तविक स्वरूप से जन-जन को प्रेरित करके उन्होंने एक महान् क्रांति घटित की। उनकी इस धर्मक्रांति का सार था कि न तो धर्मग्रंथों में उलझे और न ही धर्म स्थानों में। उनके धर्म में न स्वर्ग का प्रलोभन था और न नरक का भय, बल्कि जीवन की सहजता और मानवीय आचार संहिता का ध्रूवीकरण था।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने न केवल धर्मक्रांति की बल्कि परतंत्रता में जकड़े देश को आजादी दिलाने के लिये राष्ट्रक्रांति का बिगुल भी बजा दिया। इसके लिये उन्होंने हरिद्वार पहुँच कर वहां एक पहाड़ी के एकान्त स्थान पर अपना डेरा जमाया। वहीं पर उन्होंने पाँच ऐसे व्यक्तियों से मुलाकात की, जो आगे चलकर सन् 1857 की क्रान्ति के कर्णधार बने। ये पांच व्यक्ति थे नाना साहेब, अजीमुल्ला खां, बाला साहब, तात्या टोपे तथा बाबू कुंवर सिंह। बातचीत काफी लम्बी चली और यहीं पर यह तय किया गया कि फिरंगी सरकार के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में सशस्त्र क्रान्ति के लिए आधारभूमि तैयार की जाए और उसके बाद एक निश्चित दिन सम्पूर्ण देश में एक साथ क्रान्ति का बिगुल बजा दिया जाए। सन् 1857 की क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना भी स्वामीजी के नेतृत्व में ही तैयार की गई थी और वही उसके प्रमुख सूत्रधार भी थे। वे अपने प्रवचनों में श्रोताओं को प्रायः राष्ट्रवाद का उपदेश देते और देश के लिए मर मिटने की भावना भरते थे। उन्होंने यह अनुभव किया कि लोग अब अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके हैं और देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने को आतुर हो उठे हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से समाज-सुधार के अनेक कार्य किए। छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि, धार्मिक संकीर्णता तथा अन्धविश्वासों के विरुद्ध उन्होंने जमकर प्रचार किया और विधवा विवाह, धार्मिक उदारता तथा आपसी भाईचारे का उन्होंने समर्थन किया। इन सबके साथ स्वामीजी लोगों में देशभक्ति की भावना भरने से भी कभी नहीं चूकते थे। प्रारम्भ में अनेक व्यक्तियों ने स्वामीजी के समाज सुधार के कार्यों में विभिन्न प्रकार के विघ्न डाले और उनका विरोध किया। धीरे-धीरे उनके तर्क लोगों की समझ में आने लगे और विरोध कम हुआ। उनकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ने लगी। उनके विराट व्यक्तित्व को किसी उपमा से उपमित करना उनके व्यक्तित्व को ससीम बनाना होगा। उनकी जन्म जयन्ती मनाने की सार्थकता तभी है जब हम उनके बताये मार्ग पर चलते हुए गुणवत्ता एवं जीवनमूल्यों को जीवनशैली बनाये।
प्रेषक

 

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


नई दिल्ली के राजपथ पर छाया रहा छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य यंत्रों का जादू

नई दिल्ली के राजपथ पर छाया रहा छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य यंत्रों का जादू

10-Feb-2021

नई दिल्ली के राजपथ पर छाया रहा छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य यंत्रों का जादू

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देश के लोगों ने 26 जनवरी 2021 नई दिल्ली के राजपथ पर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों पर आधारित निकली झांकी को न केवल बड़ी उत्सुकता के साथ देखा बल्कि इसकी उन्मुक्त कंठो से सराहना भी की। यह झांकी नेशनल मीडिया के साथ ही लोगों के दिलो-दिमाग में छा गई। गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर आधारित राज्य की झांकी देश भर के लोगों का आकर्षण का केन्द्र बनी वहीं यह सोशल मीडिया पर भी छायी रही। देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार इसको सराहना मिल रही है।

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नेशनल मीडिया टाइम्स नाउ ने अपने ट्विटर हेण्डल में इसकी सराहना करते हुए लिखा है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता आज पूरे वैभव के साथ राजपथ पर दिखी। हिन्दुस्तान टाईम्स ने लिखा कि झांकी में छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी नृत्य और संगीत परम्परा को प्रदर्शित किया गया। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने अपने ट्विटर हेण्डल में लिखा कि छत्तीसगढ़ राज्य की झांकी में संगीत के विविध वाद्य यंत्रों को बहुत खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया है।

गौरतलब है कि यह झांकी छत्तीसगढ़ जनसम्पर्क विभाग के द्वारा तैयार की गई है। इस झांकी के निर्माण के लिए पिछले तीन माह से तैयारी की जा रही थी। कई प्रस्तावों पर विचार करने के बार इस झांकी का निर्णय लिया गया है। छत्तीसगढ़ की झांकी में छत्तीसगढ़ के लोक संगीत का वाद्य वैभव को प्रदर्शित किया गया है। छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले लोक वाद्यों को उनके सांस्कृतिक परिवेश के साथ बडे़ ही खूबसूरत ढंग से इसे दिखाया गया है। प्रस्तुत झांकी में छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित बस्तर से लेकर उत्तर में स्थित सरगुजा तक विभिन्न अवसरों पर प्रयुक्त होने वाले लोक वाद्य शामिल किए गए हैं। इनके माध्यम से छत्तीसगढ़ के स्थानीय तीज त्योहारों तथा रीति रिवाजों में निहित सांस्कृतिक मूल्यों को भी रेखांकित किया गया है।

झांकी के ठीक सामने वाले हिस्से में एक जनजाति महिला बैठी है जो बस्तर का प्रसिद्ध लोक वाद्य धनकुल बजा रही है। धनकुल वाद्य यंत्र, धनुष, सूप और मटके से बना होता है। जगार गीतों में इसे बजाया जाता है। झांकी के मध्य भाग में तुरही है। ये फूँक कर बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है, इसे मांगलिक कार्यों के दौरान बजाया जाता है। तुरही के ऊपर गौर नृत्य प्रस्तुत करते जनजाति हैं। झांकी के अंत में माँदर बजाता हुआ युवक है। झांकी में इनके अलावा अलगोजा, खंजेरी, नगाड़ा, टासक, बांस बाजा, नकदेवन, बाना, चिकारा, टुड़बुड़ी, डांहक, मिरदिन, मांडिया ढोल, गुजरी, सिंह बाजा या लोहाटी, टमरिया, घसिया ढोल, तम्बुरा को शामिल किया गया है।

छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति प्रस्तुत करने में संस्था लोक रागनी में दुर्ग एवं बालोद जिले के कलाकारों का अहम भूमिका रही

संस्था लोक रागिनी व कुहुकी के संचालक रिखी क्षत्रीय की टीम में बालोद व दुर्ग जिले के विभिन्न कलाकारों ने सम्मालित होकर अपना बहुमूल्य योगदान दिया, जिसमें गुंडरदेही विकासखंड के रंगकटेरा से कुलदीप सार्वा, सरेखा से उग्रसेन देवदास, रनचिरई से रामकुमार पाटिल, तमोरा से डोरे लाल साहू, बालोद विकासखंड से प्रदीप ठाकुर, जयालक्ष्मी ठाकुर, गुरूर विकासखंड के ग्राम दरर्रा निवासी कु. केवरा सिन्हा, दुर्ग से संजीव राजपूत, पारस रजक, नेहा विश्वकर्मा, कुम्हारी से साधना शामिल हुए। छत्तीसगढ़ शासन, जनसंपर्क विभाग की ओर से नोडल अधिकारी, अपर संचालक श्री उमेश मिश्रा के मार्गदर्शन एवम छत्तीसगढ़ के लीडर के रूप में श्री तेजबहादुर सिंह भुवाल द्वारा दिल्ली में झांकी का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया गया।

छत्तीसगढ़ की कलाकार टीम द्वारा राष्ट्रीय रंगशाला कैम्प में आयोजित ‘‘झंकार’’ में छत्तीसगढ़ की लोक कला, संस्कृति को नृत्य के माध्यम से प्रदर्शित किया, जिसे विशेषज्ञ समिति ने बहुत सराहना भी। इसी प्रकार केन्द्रीय जनजाति कार्य मंत्री श्री अर्जुन मुण्डा के यहां आयोजित सम्मान समारोह में छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने आदिवासी नृत्य का जबरदस्त प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में उपस्थित देश के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे सांसदगण एवं विधायक सहित बड़ी संख्या में आगंतुकों ने ताली बजाकर सम्मान किया। इस अवसर पर केन्द्रीय राज्य मंत्री श्रीमती रेणुका सिंह ने भी छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति एवं गुरतुर बोली की सराहना की। छत्तीसगढ़ से टीम लीडर के रूप में तेजबहादुर सिंह भुवाल को राष्ट्रीय रंगशाला कैम्प, रक्षा मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ लीडर का सम्मान दिया गया। 

प्रेषित- तेज सिंह भुवाल 


राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग तेज

राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग तेज

09-Feb-2021

नई दिल्ली, कांग्रेस शासित राज्यों में एक बार फिर से राहुल गांधी को दोबारा पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने की मांग जोर पकड़ रही है। पार्टी की प्रदेश इकाइयां इस संबंध में प्रस्ताव भी पास करने लगी हैं। अब सबकी निगाहें मई में होने वाले संगठन के चुनाव पर टिकी हैं।

दिल्ली और छत्तीसगढ़ के बाद अब तेलंगाना भी इस मांग के समर्थन में आवाज बुलंद करने वाला तीसरा राज्य बन गया है।

एक बैठक में सर्वसम्मति से इस बाबत एक प्रस्ताव पारित किया गया। बैठक में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के तेलंगाना प्रभारी व सांसद मणिकम टैगोर और 33 जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष एन. उत्तम कुमार रेड्डी और सीएलपी लीडर भट्टी विक्ररमार्का ने भी हिस्सा लिया।

इससे पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य इकाई ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा प्रस्तावित और राज्य इकाई के अध्यक्ष मोहन मरकाम व प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया द्वारा अनुमोदित एक प्रस्ताव पारित किया था।

दिल्ली कांग्रेस ने भी राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था।

दिल्ली कांग्रेस के प्रमुख चौधरी अनिल कुमार ने राहुल गांधी से अनुरोध किया कि वे जल्द से जल्द कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करें।

उन्होंने कहा, देश में खतरनाक राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस को सांप्रदायिक, सत्तावादी और अलोकतांत्रिक ताकतों का मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी जैसे ऊर्जावान और शक्तिशाली नेता की आवश्यकता है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि राहुल गांधी मोदी सरकार के गलत कामों का पदार्फाश करने के लिए दृढ़ निश्चय कर रहे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनका आत्मविश्वास कार्यकर्ताओं के आत्मविश्वास और मनोबल को बढ़ाने के लिए जरूरी है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने संसद के अंदर और बाहर किसान विरोधी कानूनों का जबरदस्त विरोध किया था और देश में कृषि क्षेत्र को बर्बाद करने वाले कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर किसान आंदोलन का समर्थन किया था, क्योंकि इन कानूनों का उद्देश्य मोदी सरकार के कुछ अमीर कॉर्पोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाना है।

गौरतलब है कि आम चुनावों में पराजय के बाद राहुल गांधी ने मई 2019 में पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और सोनिया गांधी को अगस्त में अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

यह मुद्दा कांग्रेस नेताओं द्वारा उठाया गया था जिन्होंने अगस्त 2020 में पार्टी और ब्लॉक से सीडब्ल्यूसी स्तर तक चुनावों में व्यापक सुधार की मांग की थी। लेकिन, पार्टी ने पांच राज्यों के चुनावों के बाद मई में संगठन का चुनाव कराने का फैसला किया है।

द न्यूज़ इंडिया से 


गिधवा-परसदा पक्षी विहार’ बनेगा विश्व स्तरीय  पर्यटन स्थल : श्री भूपेश बघेल

गिधवा-परसदा पक्षी विहार’ बनेगा विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल : श्री भूपेश बघेल

03-Feb-2021

 मुख्यमंत्री ने की अनेक महत्वपूर्ण घोषणाएं: गिधवा-परसदा क्षेत्र में पक्षी जागरूकता एवं प्रशिक्षण केन्द्र की होगी स्थापना

राज्य के समस्त वेटलैंड का होगा संरक्षण एवं प्रबंधन 

छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड बनाएगा 
प्रवासी पक्षियों के संरक्षण की योजना

मुख्यंत्री पहुंचे गिधवा-परसदा जलाशय: पक्षियों को कैमरे में किया कैद

मुख्यमंत्री ‘गिधवा-परसदा पक्षी विहार महोत्सव’ में हुए शामिल: छत्तीसगढ़ में पहली बार पक्षी महोत्सव का आयोजन

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 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने कहा है कि ‘गिधवा-परसदा पक्षी विहार’ को विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। छत्तीसगढ़ के इस पक्षी विहार को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र में स्थापित करने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे। पक्षी विज्ञानियों, प्रकृति प्रेमियों और यहां आने वाले सैलानियों के लिए विभिन्न सुविधाएं विकसित की जाएंगी। यहां विश्व के विभिन्न प्रवासी पक्षियों का आवागमन होता हैं। विशेषकर साल के माह नवम्बर से मार्च (05 माह) में यहां ये पक्षी रहवास करते हैं। मुख्यमंत्री श्री बघेल बेमेतरा जिले के नवागढ़ विकासखण्ड के नगधा गांव में आयोजित ‘गिधवा-परसदा पक्षी विहार महोत्सव’ को सम्बोधित कर रहे थे। इसके पहले श्री बघेल ने गिधवा-परसदा जलाशय का भ्रमण किया और वहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों और जलाशय के मनोरम और विहंगम दृश्यों को कैमरे में कैद किया। इस अवसर पर वन एवं परिवहन मंत्री श्री मोहम्मद अकबर, संसदीय सचिव श्री गुरुदयाल बंजारे, विधायक श्री आशीष छाबड़ा, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री राकेश चतुर्वेदी, आईजी श्री विवेकानंद सिन्हा, कलेक्टर श्री शिवअनंत तायल सहित अनेक जनप्रतिनिधि और अधिकारी उपस्थित थे।

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    मुख्यमंत्री ने पक्षी महोत्सव में जैव विविधता के संरक्षण के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण घोषणाएं करते हुए कहा कि गिधवा एवं परसदा ग्रामों के आस-पास जिन क्षेत्रों में प्रवासी पक्षी आते हैं, उसके संरक्षण की योजना बनाकर छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा कार्य किया जाएगा। साथ ही क्षेत्र में एक पक्षी जागरूकता एवं प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया जाएगा। यहां राज्य के प्रवासी एवं स्थानीय पक्षियों की जैव विविधता संबंधी जानकारी एवं प्रशिक्षण जन सामान्य को दी जाएगी। राज्य के समस्त ऐसे वेटलैंड जिसमें प्रवासी पक्षी आते हैं एवं जैव विविधता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, उनके संरक्षण एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड को दी जाएगी। 
    उल्लेखनीय है कि गिधवा-परसदा के जलाशयों को विश्व स्तरीय पक्षी पर्यटन स्थलों में स्थान दिलाने के लिए यहॉं 31 जनवरी से 02 फरवरी 2021 तक पक्षी विहार महोत्सव का आयोजन किया गया। पक्षियों के संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण तथा स्थानीय लोगों को ईको-पर्यटन के माध्यम से होम, विलेज स्टे से रोजगार उपलब्ध होगा।
    बेमेतरा जिले के गिधवा-परसदा, नगधा, एरमशाही क्षेत्र जलीय एवं स्थल जैव विविधता से भरपूर है। यह क्षेत्र पारिस्थितिकीय व स्वस्थ्य पर्यावरण के लिये उपयुक्त है। गिधवा-परसदा स्थल मुख्यतः जलीय नमी युक्त क्षेत्र है। इसका भौगोलिक विस्तार लगभग 06 कि.मी. क्षेत्र में है। गिधवा परसदा में मुख्य 02 बड़े तथा 02 मध्यम आकार के जलाशय हैं, नजदीकी ग्राम एरमशाही में 05 जलाशय भी स्थित हैं। गिधवा-परसदा जलीय तंत्र में भरपूर जलीय खाद्य वनस्पति व जीव होने के कारण यहां पक्षियों के लिए अच्छा रहवास है। यहां किए गए अध्ययनों में पक्षियों की कुल 143 प्रजातियां जिसमें कुल 26 स्थानीय प्रवासी प्रजातियां, 11 विदेशी प्रवासी प्रजातियां तथा 106 स्थानीय आवासीय प्रजातियां पक्षी पायी गयी है।