कोरोना से है बचना तो धूम्रपान सेदूर रहो !

कोरोना से है बचना तो धूम्रपान सेदूर रहो !

22-Apr-2020

- हाथ और होठों के संपर्क से संक्रमण फैलने का खतरा 

- रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी करता है कमजोर 

- धूम्रपान का सीधा असर श्‍वसन प्रणाली व फेफड़ों पर 

 

रायपुर, 21अप्रैल 2020 । कोरोना वायरस (कोविड-19) के संक्रमण की चपेट में आने से बचने के लिए बचना है तो धूम्रपान से तौबा करने में ही भलाई है । बीड़ी-सिगरेट संक्रमित हो सकते हैं और उँगलियों व होंठों के संपर्क में आकर वह आसानी से संक्रमण फैला सकते हैं । हालाँकि सरकार ने सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा रखी है, फिर भी लोग चोरी-चुपके इसका इस्तेमाल कर अपनी जान को जोखिम में डालने से बाज नहीं आ रहे हैं । इन उत्पादों का सेवन कर इधर-उधर थूकने से भी संक्रमण का खतरा था, इसलिए सरकार ने खुले में थूकने पर भी रोक लगा रखी है, इसका उल्लंघन करने पर दण्ड का प्रावधान भी किया गया है।

 

होम क्‍वारेंटाइन कोरोना सर्विलेंस टीम के प्रभारी सदस्य व उपसंचालक स्‍वास्‍थ्‍य विभाग डॉ. अखिलेश त्रिपाठी का कहना है  धूम्रपान से व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जिसके चलते कोरोना जैसे वायरस सबसे पहले ऐसे लोगों को ही अपनी चपेट में लेते हैं। इसके अलावा बीमारी की चपेट में आने पर ऐसे लोगों के इलाज पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि धूम्रपान न करने वालों की तुलना में धूम्रपान करने वालों को कोरोना का खतरा कई गुना अधिक रहता है।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी बाकायदा दिशा-निर्देश जारी कर धूम्रपान से कोरोना की जद में आने के खतरे के बारे में सचेत कर चुका है।  

 

नेशनल टोबैको कण्ट्रोल प्रोग्राम (एनटीसीपी)के नोडल अधिकारी डॉ. कमलेश जैन ने बताया बीड़ी-सिगरेट ही नहीं बल्कि अन्य तम्बाकू उत्पादों के साथ ही हुक्का, सिगार, ई-सिगरेट भी कोरोना वायरस के संक्रमण को फैला सकते हैं, इसलिए अपने साथ ही अपनों की सुरक्षा के लिए इनसे छुटकारा पाने में ही भलाई है । कोरोना का वायरस छींकने, खांसने और थूकने से निकलने वाली बूंदों के जरिये एक दूसरे को संक्रमित करता है । लोगों को छूने से परहेज यानी सोशल डिसटेंसिंग के पालन करने के दौरान पान व पान मसाला खाकर थूकने से वायरस बाहर आने से संक्रमण का खतरा समुदाय को हो सकता है।

 

डॉ जैन ने बताया, गुटखा पान मसाला के बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के बाद लगातार विभाग इसके बिक्री की शिकायत मिलने पर कार्रवाई भी कर रहा है। प्रतिबंध के बावजूद लोग 4 से 5 गुना महंगे दाम पर गुटका पान मसाला खरीद कर सेवन कर अपने परिवार व समाज को खतरे में डाल रहे हैं। महामारी एक्‍ट-1897 के तहत सर्वाजनिक रुप से कहीं भी इसके सेवन व उल्‍लंघन करते पाए जाने पर धारा-188 के तहत जुर्माना व दंड का प्रावधान हैं। लोगों की जागरुकता ही कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए कारगर साबित हो सकता है। कांकेर कलेक्‍टर ने आगामी 3 मई तक लॉकडाडन के पालन करते हुए संपूर्ण जिले में गुटखा, तंबाकू एवं गुड़ाकू के क्रय-विक्रय को तत्‍काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया है। वहीं रायपुर कलेक्‍टर डॉ.एस भारतीय दासन ने सडक पर थूकने वालों क खिलाफ केस दर्ज करने का फैसला लिया है।

 

इसीलिए प्रदेश में खुले में थूकने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में शामिल कर दिया गया है । इसके अलावा धूम्रपान से श्वसन प्रणाली, सांस की नली और फेफड़ों को भारी नुकसान पहुँचता है। धूम्रपान व प्रभाव हमारे शरीर के गले के लंग्‍स और फेफड़े को प्रभावित करता है। ये हमारे शरीर के रोगप्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करता है। यही कारण है कि फेफड़ों की कोशिकाएं कमजोर होने से संक्रमण से लड़ने की क्षमता अपने आप कम हो जाती है । वर्तमान में कोविद -19 का वायरस गले के लंग्‍स को प्रभावित कर गले में खराब पैदा करता है। वहीं आगे वायरस श्‍वसन नली को संक्रमित कर सांस लेने में परेशानी खड़ा करता है।


लॉक डाउन के पीछे सरकार का प्लान क्या था?....

लॉक डाउन के पीछे सरकार का प्लान क्या था?....

21-Apr-2020

लॉक डाउन के पीछे सरकार का प्लान क्या था?......लॉक डाउन के पीछे सरकार का प्लान यह था कि सब व्यक्ति अपने अपने घरों में रहेंगे जिसे कोरोना का लक्षण दिखेगा वह व्यक्ति हस्पताल आ जाएगा या हम उसे ढूंढ लेंगे और उसका इलाज हो जाएगा उसके साथ के लोगो को क्वारंटाइन में रखेंगे और दूसरों में यह बीमारी नही फैलेगी इस तरह से बीमारी खत्म हो जाएगी?.....मैं गलत तो नही कह रहा हूँ न?......लगभग सभी पढ़ने वाले उपरोक्त तर्क से सहमत होंगे........

अब कल जो ICMR ने कहा है वो समझ लीजिए ......कल दोपहर में NDTV पर एक इंटरव्यू दिखाया गया उसमे ICMR के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ रमन गंगाखेड़कर ने NDTV संवाददाता से बात करते हुए कहा कि 'भारत में कोरोना वायरस के 80 प्रतिशत मरीज बिना लक्षणों वाले हैं।'

यह इतनी बड़ी बात थी कि मुझे अपने कानो पर  विश्वास नहीं हुआ शाम को जब बीबीसी पर देखा तो उसमे यह हेडलाइन थी तब मुझे लगा कि मैंने ठीक ही सुना था रात एक वेबसाइट पर इस बातचीत की डिटेल मिली .......... रमन गंगाखेड़कर ने बताया है कि देश के हर राज्य में लगभग यही स्थिति है NDTV से बात करते हुए उन्होंने कहा, "80 प्रतिशत मामले बिना लक्षणों वाले हैं। हमारी सबसे बड़ी चिंता उनका पता लगाना है। संक्रमित मरीजों के संपर्क में आने वाले लोगों के अलावा ऐसे मरीजों की पहचान करने का कोई और तरीका नहीं है।"उन्होने कहा कि 'ऐसे मरीजों की पहचान बेहद मुश्किल हैं।'

अब आखिरी वाक्य पर गौर कीजिए 'ऐसे मरीजों की पहचान बेहद मुश्किल हैं।'..... बात तो ठीक ही है जिसमें कोई सिम्टम्स ही नही उसको कैसे रेक्टिफाई किया जाए?
यानी लॉक डाउन की पूरी थ्योरी अब सिर के बल खड़ी हो जाती है.......

दो दिन पहले एक प्रमुख न्यूज़ चैनल ने भी दस राज्यों में बिना लक्षण वाले कोरोना मरीजों की खबर दी है  एक वेबसाइट के अनुसार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी कह रहे हैं कि , राज्य में कोरोना के 70 प्रतिशत मरीज बिना लक्षणों वाले हैं। अन्य राज्यों की बात करें तो कर्नाटक में 60 प्रतिशत, पंजाब में 75 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 75 प्रतिशत और असम में 82 प्रतिशत मरीज बिना लक्षणों वाले हैं।

बिना लक्षणों वाले ज्यादातर मरीज 20-45 आयु वर्ग के हैं। एक डॉक्टर कह रहे है कि ज्यादातर मिलेनियल्स यानी युवा साइलेंट कैरियर्स होते हैं, क्योंकि छोटे बच्चों और बूढ़ों की अपेक्षा इनका इम्यून सिस्टम स्ट्रॉन्ग होता है.

कल एक मित्र की वाल पर खबर थी कि मुम्बई में सिर्फ एक दिन की रिपोर्ट में 53 मीडियाकर्मी कोरोना पॉज़िटिव मिले है कोरोना संक्रमित मीडियाकर्मियों में टीवी रिपोर्टर, कैमरामैन और प्रिंट फोटोग्राफर शामिल हैं. चौकाने वाली बात यह है कि '99% लोगों में कोई लक्षण ही नहीं दिखा' इस बात को मै कन्फर्म नही कर पाया कि क्या वास्तव में 99 प्रतिशत को कोई लक्षण नही दिख रहे है लेकिन जैसा कि एक वेबसाइट पर उध्दव ठाकरे का बयान है उसके हिसाब से यह लगभग ठीक ही होगा

दो दिन पहले की खबरे तलाशेंगे तो दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन का बयान भी मिल जाएगा कि कई लोगों की हिस्ट्री नही मिल रही है। कई लोगों को खांसी, बुखार या सांस की समस्या नहीं थी, मगर जांच में कोरोना पॉजिटिव पाए गए, अरविंद केजरीवाल ने भी इस रविवार को कहा है 18 अप्रैल को हमारे पास 736 केसों के टेस्ट की रिपोर्ट आई, उनमें 186 कोरोना के मरीज निकले। ये मरीज एसिम्प्टमैटिक (जिसमें किसी प्रकार का लक्षण न हो) हैं। इनमें खांसी, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ जैसे कोई लक्षण भी नहीं थे, लेकिन जांच में ये पॉजिटिव मिले हैं। दिल्ली में ऐसे बहुत लोग कोरोना लेकर घूम रहे हैं। यह स्थिति बहुत ही खतरनाक है।

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने तो यहाँ तक कह दिया था कि जिस तरह से दिल्ली में बिना लक्षण वाले मरीज बढ़े हैं, उसे देखते हुए कोरोना के कम्युनिटी स्प्रेडिंग (समुदाय में फैलने) की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है

क्या हमारे यहाँ कोई यह अनोखी घटना घट रही है? नही!... बिल्कुल भी नही........

जब अमेरिका वुहान से अपने नागरिकों को वापस लाया तो ये जानने के लिए कि कहीं वो कोरोना वायरस की चपेट में तो नहीं हैं. उनका मेडिकल टेस्ट करवाया गया एक यूएस सिटिजन का कैलिफोर्निया के सैन डियागो के एक अस्पताल में टेस्ट हुआ. नतीजा निगेटिव आया. कुछ दिन बाद दोबारा उस व्यक्ति का टेस्ट हुआ. इस बार पता चला कि उसके शरीर में कोरोना वायरस है. उसी दौरान जापान से भी इस तरह के दो मामले सामने आए. शुरुआती टेस्ट में कोरोना वायरस निगेटिव नतीजा आया, बाद के टेस्ट में पॉजिटिव........ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि ये तीनों कोरोना वायरस के ‘साइलेंट कैरियर’ थे. इनके शरीर में मौजूद कोरोना वायरस का पता उन टेस्टिंग मेथड से नहीं हो सका, जो एक महीने पहले तक आमतौर पर यूएस में कोरोना का पता लगाने के लिए इस्तेमाल की जा रही थीं............

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीजेज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन डायरेक्टर रार्बट रेडफील्ड के अनुसार कोरोना से संक्रमित 25 प्रतिशत लोग न लक्षण लिए होते हैं और न बीमार होते हैं फिर भी दूसरों को संक्रमित कर सकते हैं। मतलब वायरस शरीर में बैठा-पहुंचा हुआ है और वह एसिम्प्टमैटिक याकि लक्षणरहित है .........अभी भी अमेरिका के मैसाचुसेट्स में 82 ऐसे मामले आए हैं जहां लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण ना दिखने के बावजूद उन्हें इस महामारी से पीड़ित पाया गया. वहीं कई स्टडीज से ये भी पता चला है कि बिना लक्षण वाले लोग ज्यादा संक्रमण फैला रहे हैं........

ऐसे मरीजों के बारे में सबसे पहली विस्तृत जांच रिपोर्ट चीन में प्रकाशित हुई है. कुछ दिन पहले चीन के नेशनल हेल्थ कमीशन की रिपोर्ट आई थी जिसमे 6764 एसिम्प्टोमैटिक मरीजों की जांच पर आधारित रिपोर्ट तैयार की गई थी. इनमें सिर्फ 1297 मरीजों में ही बाद में बीमारी के लक्षण दिखे.
यानी कोरोना पॉजिटिव मरीजों में सिर्फ 20 फीसदी मरीजों में ही बाद में बीमारी का लक्षण दिखा, बाकी मरीजों में ऐसा कोई लक्षण नजर नहीं आया

ठीक यही पैटर्न ICMR के रिसर्च में सामने आया है यहाँ भी 80 प्रतिशत मामले बिना लक्षणों वाले हैं।

इस खबर को आप सकारात्मक तरीके से भी ले सकते हैं और नकारात्मक तरीके से भी, यह आपके विवेक के ऊपर है........ मुझे ऐसा लगता है कि हमे 'लड़ना' 'हराना' जैसे वाक्यों का प्रयोग छोड़ देना चाहिए ..... यह वायरस कही जा नही रहा है.... यह खत्म हो जाएगा ऐसा दावा किसी वैज्ञानिक ने नहीं किया हो सकता है कि धीरे धीरे यह वायरस हमारे शरीर के साथ अनुकूलित हो जाए.........कोई भी परजीवी उसको खत्म नही करता जिसके शरीर मे वह रहता हो वह दोनों परस्पर एक बॉडी में साथ रहने का अनुकूलन प्राप्त कर लेते हैं यह कॉमन सेंस की बात है .........बहुत संभव है कि यह हो भी गया हो बहुत संभव है कि भारत की बड़ी आबादी हर्ड इम्युनिटी को प्राप्त कर गयी हो जिस हिसाब से दूसरे देशों की तुलना में भारत मे कम मौतें हुई है उससे यह उम्मीद बंधती है, .............लेकिन एक बात तो तय मानिए कि इन नए तथ्यों के संदर्भ में  कोविड -19 के बारे में हमे एक बार हमे नए सिरे से पुनर्विचार करना होगा....
गरीश मालवीय 
द्वारा सै क़ासिम 


महाराष्ट्र में साधुओं की भीड़ द्वारा पुलिस के सामने मोब्लिंचिंग

महाराष्ट्र में साधुओं की भीड़ द्वारा पुलिस के सामने मोब्लिंचिंग

20-Apr-2020

महाराष्ट्र के पालघर में उन्मादी भीड ...

मुम्बई  पालघर , महाराष्ट्र में साधुओं की भीड़ द्वारा पुलिस के सामने मोब्लिंचिंग कर दी गयी । बूढ़े घायल साधु की जिस तरह से लोग लाठियों से पीट -- पीट कर हत्या कर रहे थे वह इंसानों के वहशी बना दिये जाने की कहानी है । भीड़ को न पुलिस का डर था न ही मारने वाले लोगों में इंसानों के प्रति कोई दया भावना । लोगों में इतनी हिंसा और नफरत फैलाने के सबसे बड़े जिम्मेदार वही लोग हैं जो इस हत्या से तिलमिला रहे हैं । मोदी सरकार, मीडिया, बीजेपी आईटी सेल और भगुआ गैंग इसके लिए जिम्मेदार हैं जिन्होंने देश में इस तरह की वहशी भीड़ का निर्माण किया है । 

     मोब्लिंचिंग करने वाले हत्यारों को बीजेपी द्वारा महिमामण्डित किया जाता रहा । हत्यारों को सम्मानित कर उनके सम्मान में रैली निकाले जाने लगी और हत्यारोपी अपराधी ( आतंकी ) के शव को तिरेंगे में लपेटकर सम्मानित किया गया क्योंकि इन लोगों ने मुस्लिम व्यक्तियों की लिंचिंग ( हत्या ) की थी । इखलाख की हत्या से शुरू हुई यह परंपरा पालघर तक पहुँची है जिसमें इन छः सालों में 100 से अधिक लोगों की हत्या हो चुकी है । मोदी सरकार इसके ख़िलाफ़ कोई कठोर कानून बनाने के स्थान पर कुछ राज्य सरकारों द्वारा बनाये गए कानून को भी मंजूरी नहीं दे रही है । 

     भीड़तंत्र के निर्माण और भीड़ द्वारा किये जाने वाले ( अ) न्याय को समर्थन देने से देश की न्यायव्यवस्था खत्म हो गयी है । मारो -- मारो का शोर कभी भी न्यायसंगत नहीं हो सकता । मुस्लिमों और दलितों की हत्या हो या डॉक्टरों की पिटाई , चारों ओर हिंसा करने वाली भीड़ बनाई गई है जिससे राजनीतिक लाभ तो कुछ समय तक मोदी जी को मिल सकता है लेकिन जिस तरह का भारत वे बना रहे हैं वह रोज अव्यवस्था की गहरी खाई में गिरता जा रहा है ।

    मुसलमानों के खिलाफ चलाये जाने वाले प्रोपेगैंडा और हिंसा से न केवल सभी लोग प्रभावित होंगे बल्कि इसका असर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पड़ना तय है जिसे हम निरन्तर इन वर्षों में लिखते आये हैं । खाड़ी देशों से इसकी प्रतिक्रिया शुरू हो चुकी है । कुवैत सरकार ने भारत में मुसलमानों के साथ हो रहे अन्याय का विरोध किया है । खबरों के अनुसार इस मुद्दे को UNHRC में ले जाये जाने की तैयारी की जा रही है । इसके बहुत गहरे प्रभाव भारत पर पड़ने तय हैं । खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय भारत भेजे जा सकते हैं और भारत पर मुस्लिम देश व्यापार प्रतिबन्ध भी लगा सकते हैं । ध्यान रहे , पेट्रोलियम के लिए भारत खाड़ी देशों पर ही निर्भर है ।

      मोदी सरकार इजराइल और अमेरिका के अनुसार चल रही है जिसके गंभीर नतीजे देश को झेलने पड़ेंगे । इजराइल छोटा सा देश है जिसकी स्थिति भारत की तुलना में बहुत अधिक अलग है । उसका विवाद मुस्लिम देशों से ही नहीं चल रहा है बल्कि उसके अंदर बड़ी आबादी मुसलमानों की भी नहीं रहती जबकि भारत बहुधर्मी और बहुजातीय देश है जिसके पाकिस्तान को छोड़कर मुस्लिम देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबन्ध रहे हैं। एक पाकिस्तान को काउंटर करने के लिए 50 से अधिक मुस्लिम देशों से संबन्ध खराब करना मूर्खता नहीं तो और क्या है ?

       दूसरा देश है अमेरिका जिसकी चमचागिरी मोदी सरकार लगातार कर रही है , जो अपने हितों के लिए किसी भी हद तक चला जाता है । वह देशों को बर्बाद करने का सुपर एक्सपर्ट देश है । भारत में वह तब तक हिन्तुत्ववादी चरमपंथ को बढ़ाएगा जब तक देश गृहयुद्ध की चपेट में न आ जाये उसके बाद अपना सैन्य ठिकाना भारत के अंदर बना सकता है जैसे उसने अफगानिस्तान या अन्य देशों में किया है । 

      मोदीजी ने देर से ही सही कोरोना को किसी जाति, समुदाय, धर्म या सीमा से जोड़ने के खिलाफ ट्वीट किया है जो पर्याप्त नहीं है । अभी भी समय है मोदीजी देश के प्रधानमंत्री होने के नाते, देश के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों को समझते हुए साम्प्रदायिक नफरत के खिलाफ कठोर कार्यवाही कीजिये और भीड़तंत्र को खत्म करने के उपाय कीजिये । 

    मोब्लिंचिंग किसी भी व्यक्ति की हो वह अस्वीकार्य है इसके खिलाफ केंद्र सरकार तुरन्त कठोर कानून बनाये और ऐसी भीड़ के खिलाफ कठोर कार्यवाह सुनिश्चित करे ।
...
: कमल कुमार जी  का लेख :
 syed Quasim

 

 


रायपुर : छत्तीसगढ़ कोरोना वायरस महामारी के नियंत्रण में पूरे देश के समक्ष बना उदाहरण: श्री बघेल

रायपुर : छत्तीसगढ़ कोरोना वायरस महामारी के नियंत्रण में पूरे देश के समक्ष बना उदाहरण: श्री बघेल

19-Apr-2020

मुख्यमंत्री ने पिछले एक माह से प्रदेशवासियों के अनुशासन, त्याग और समर्पण को सराहा

मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को किया सम्बोधित: पिछले एक माह से दिए जा रहे सहयोग के लिए व्यक्त किया आभार

मुख्यमंत्री ने कहा रोजमर्रा के कामों में बरते पूरी सावधानी: प्रदेश में कोरोना संक्रमण नियंत्रित लेकिन खतरा अभी टला नहीं

 

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज प्रदेश की जनता को सम्बोधित करते हुए कहा है कि प्रदेशवासियों ने कोरोना वायरस संक्रमण से बचाव और रोकथाम के लिए पिछले एक माह से जिस अनुशासन, संबल और संकट से निपटने की जिजीविषा दिखाई हैं, वह विलक्षण हैं।
      मुख्यमंत्री बघेल ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज से ठीक एक माह पहले मैंने कोरोना वायरस संकट से निपटने के लिए इसी तरह आपको संबोधित करते हुए आप सबका सहयोग मांगा था। आपको सच कहूंगा। जब पहली बार कोरोना वायरस से बचाव के बारे में आपसे सहयोग की अपील कर रहा था तो मेरे मन में कई आशंकाएं थी। इतने बड़े प्रदेश के करोड़ो लोगों से अपना व्यवसाय, जीवन पद्धति, आचरण आदि बदलने को कहना और उसका पालन कराना कोई आसान काम नहीं था लेकिन आप सबने जो अनुशासन, संबल और संकट से निपटने की जिजीविषा दिखाई हैं, वो विलक्षण हैं।
 ऽ  श्री बघेल ने कहा कि आज छत्तीसगढ़ कोरोना वायरस महामारी के नियंत्रण में पूरे देश के समक्ष उदाहरण बना है तो इसके मूल में आप लोगों का अपने परिवार, अपने राज्य के लोगों के प्रति त्याग और समर्पण का भाव हैं। मैं इन सबके लिए आपका दिल से धन्यवाद करता हूँ। मैं हमेशा इस सहयोग के लिये आपका ऋणी रहूँगा। मैं धन्यवाद करना चाहूंगा सभी चिकित्सकों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, जिला  और पुलिस प्रशासन, खाद्य, महिला बाल विकास, नगर निगमों, नगर पालिकाओं, जनसंपर्क विभाग के समस्त कर्मचारियों का भी जिन्होंने 24 घण्टे इस संकट से निपटने के लिए कार्य किया। मैं मीडिया के बंधुओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों का भी आभारी रहूँगा जिन्होंने हर पल हमारा सहयोग किया।
 ऽ मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे राज्य में अगर हम कोरोना संक्रमण को नियंत्रण में रख पाये हैं, तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका हमारे गांवों की रही हैं। छत्तीसगढ़, गांवों का प्रदेश हैं और हमारे ग्रामीणों ने स्वेच्छा से अपने गांवों में जिस तरह फिजिकल डिस्टेंसिंग और साफ-सफाई का पालन किया वह अदभुद है। मैं हाथ जोड़ कर उनका आभार व्यक्त करता हूँ। आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि आज छत्तीसगढ़ की प्रशंसा पूरे देश में हो रही हैं। रिजर्व बैंक ने हमारी तारीफ की हैं । कोरोना वायरस नियंत्रण में हम सभी राज्यों में सबसे आगे हैं। यह सब आपके कारण ही हैं। 20 अप्रैल से राज्य में बहुत सारी आर्थिक गतिविधियां प्रारंभ करने पर हम विचार कर रहे हैं। गांवो में मनरेगा के काम शुरू हो गए हैं। आप अपने जिले में क्या क्या कर सकते हैं। इसकी पूरी जानकारी और दिशा-निर्देश आपको बताये जा रहे हैं। इन दिशा निर्देशों का पालन करना सबके लिये जरूरी है।
        मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से विनम्र आग्रह करते हुए कहा कि आप रोजमर्रा के कामों में पूरी सावधानी बरतें। अफवाहों से सावधान रहें। कोरोना को हमने प्रदेश में नियंत्रित जरूर कर लिया है लेकिन खतरा अभी टला नहीं हैं। हमें अपने राज्य में फैलने का दूसरा अवसर नहीं देना है। अगर आपने फिजिकल डिस्टेंसिन्ग का पालन किया, लगातार हाथ धोते रहे और भीड़भाड़ से बचे तो कोरोना को राज्य फिर से फैलने का मौका नहीं मिलेगा । एक बार फिर मैं आपके सहयोग के लिए आपका आभार व्यक्त करता हूँ । हमारी यह एकजुटता ही हमें हमारे प्रयासों में पूर्ण रूप से सफल करेगी ।

TNIS


मोदी सरकार ने कोरोना संकट की गंभीरता को समझने में बहुत देर की !

मोदी सरकार ने कोरोना संकट की गंभीरता को समझने में बहुत देर की !

17-Apr-2020

मोदी सरकार ने कोरोना संकट की गंभीरता को समझने में बहुत देर की है अब सरकार चाहे कुछ भी बोले लेकिन यह सच बदलने वाला नही है!.... भारत को नोवेल कोरोना वायरस के संबंध में चीन से पहली सूचना 31 दिसंबर को मिली थी। यह जानकारी स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने 10 फरवरी में दी थी ........जी हाँ 10 फरवरी 2020 को पहली बार सदन में कोरोना पर चर्चा हुई थी

कोरोना के विश्व भर में प्रसार को समझने में 23 जनवरी 2020 बहुत महत्वपूर्ण तारीख है 23 जनवरी को  चीन के वुहान में जो 1 करोड़ की संख्या वाला शहर है वहाँ पहली बार लॉक डाउन इंप्लिमेंट किया गया था 

लेकिन 23 जनवरी से पहले ही यह वायरस दुनिया भर में फैल चुका था इस मे WHO की बहुत बड़ी गलती थी उस पर कभी ओर चर्चा करेंगे लेकिन आप यह जान लीजिए कि 29 जनवरी 2020 तक 18 देशों में कुल 83 मामले सामने आ चुके थे इसके बाद ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नावेल कोरोनवायरस के प्रकोप को  पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया 30 जनवरी को ही पहला मामला भारत मे सामने आया था

लेकिन उससे पहले ही  विश्व के अन्य देशों में जैसे थाईलैंड (13 जनवरी); जापान (15 जनवरी); दक्षिण कोरिया (20 जनवरी); ताइवान और संयुक्त राज्य अमेरिका (21 जनवरी); हांगकांग और मकाऊ (22 जनवरी); सिंगापुर (23 जनवरी); फ्रांस, नेपाल और वियतनाम (24 जनवरी); ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया (25 जनवरी); कनाडा (26 जनवरी); कंबोडिया (27 जनवरी); जर्मनी (28 जनवरी); फिनलैंड, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात (29 जनवरी); कोरोना के मामले सामने आ चुके थे

1 फरवरी को फिलीपींस में होने वाली चीन के बाहर पहली हुई कोरोना से मौत दर्ज की गई लेकिन कहा जाता है कि 30 जनवरी को कलकत्ता में एक थाई महिला की भी मौत हुईं थी

बहरहाल अगर आप जनवरी 2020 के मध्य भाग  में देखे तो मोदीं सरकार जरूर कुछ प्रो एक्टिव कदम उठा चुकी थी जैसे 18 जनवरी से सरकार ने दिल्ली समेत देश के सात हवाई अड्डों पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था कर दी थी ताकि अगर चीन या हांगकांग से लौटे किसी शख़्स में संक्रमण के असर दिखते हैं तो उसकी तुरंत जांच कराई जा सके.

आप यदि स्वास्थ्य मंत्रालय की बात करे तो एक सूचना हमे मिलती है 22 जनवरी तक 60 विमानों के कुल 12,828 यात्रियों की जांच कर ली गयी थी हालांकि किसी भी यात्री में इस विषाणु की पुष्टि नहीं हुई थी 

24 जनवरी को संभवतः पहली बार मीडिया इस विषय मे सचेत हुआ था और उसने खबर दी थी कि मुंबई में कोरोना वायरस के दो संदिग्ध मामले सामने आए हैं. दोनों संदिग्धों को कस्तूरबा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है. फिलहाल, उनका परीक्षण कराया जा रहा है. ( लिंक कमेन्ट बॉक्स में )

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन आधिकारिक बयान दिया था कि उन्होंने राज्यों एवं केंद्र शासित क्षेत्रों को बेहद गंभीर रूप से बीमार मरीजों को अलग-थलग रखने एवं उनका वेंटिलेटर प्रबंधन करने, कमियों की पहचान करने और निगरानी एवं प्रयोगशाला सहयोग के क्षेत्र में मूलभूत क्षमता को मजबूत करने के संदर्भ में अस्पतालों की तैयारियों की समीक्षा करने का निर्देश दिया है यानी उसे स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा कुछ हद तक लग गया था.......लेकिन इन आदेशों को राज्यो ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया और मोदी सरकार ने भी बाद में इस पर कोई ध्यान नही दिया

लेकिन असली गलतियों की शुरुआत हो गयी थी कोरोना के संदिग्ध भारत आ चुके थे 28 जनवरी तक भारत में लगभग 450 लोगों को निगरानी में रखने की बात आ गयी थी. उस वक्त सरकार ने भी दावा किया था कि सबसे ज्यादा लोग केरल में हैं. 450 में से 436 लोग सिर्फ केरल के थे शायद केरल सरकार स्थिति की गंभीरता समझ चुकी थी ये अधिकतर वो लोग थे जो मेडिकल स्टूडेंट्स थे .......भारत के पहले तीन दर्ज किये गए मामले केरल के मेडिकल स्टूडेंट्स के ही थे जो बड़ी संख्या में वुहान में पढ़ते थे और वापस लौट रहे थे.....

आपको बेहद आश्चर्य होगा कि मीडिया इसके संकेत दे रहा था  30 जनवरी को बीबीसी में प्रकाशित भारत में नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के डायरेक्टर डॉ. सुजीत कुमार सिंह ने बीबीसी को एक इंटरव्यू में बताया था, "यह वायरस अमरीका तक पहुंच चुका है तो हमारे देश के लोग भी चीन की यात्रा करते हैं. क़रीब 1200 मेडिकल स्टूडेंट चीन में पढ़ाई कर रहे हैं, जिसमें से ज़्यादातर वुहान प्रांत में ही हैं. ऐसे में अगर वो वहां से लौटते हैं तो इस वायरस के भारत में आ जाने की आशंका बहुत बढ़ जाती है."

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन हालाँकि कह रही थी कि चीन में नववर्ष की छुट्टियों के मद्देनजर वहां अध्ययनरत या काम करने वालों से भारत आने पर विधिवत चिकित्सा जांच का अनुरोध किया जा रहा है.

मंत्रालय ने भारत आने वाले विमानों के लिए विमान के अंदर घोषणा करने का निर्देश भी दिया. इस संबंध में 17 जनवरी को ट्रेवल एडवाजरी जारी की थी लेकिन चीन से लौट रहे लोगों के लिए 14 दिन तक क्वारंटाइन रहने की  एडवाइजरी 30 जनवरी को जारी की गई..........

इसके बाद फरवरी में सरकार पूरे महीने सोती ही रही कोई इन यात्रियों के क्वारंटाइन को मॉनिटर करने के लिए कोई कदम नही उठाए गए शायद सरकार नमस्ते ट्रम्प प्रोग्राम में बिजी थी 8 जनवरी से 23 मार्च तक 15 लाख विदेशी यात्री भारत मे आए यह जानकारी खुद केबिनेट सेकेट्री ने दी थी और जैसा ऊपर बताया ही गया है कि यह संक्रमण पूरे विश्व मे बहुत तेजी के साथ फैल चुका था.......लेकिन मोदी सरकार स्थिति की गंभीरता को समझने में नाकाम रही...गिरीश मालवीय
द्वारा सै क़ासिम 

 

 


बहुत से लोग ये जानना चाहते हैं कि भारत मे कोरोना वायरस आया कहा से?

बहुत से लोग ये जानना चाहते हैं कि भारत मे कोरोना वायरस आया कहा से?

16-Apr-2020

बहुत से लोग ये जानना चाहते हैं कि भारत मे कोरोना वायरस आया कहा से? अगर आप भी उनमें से एक है तो जरा दिल थाम के बैठिए ओर बहुत ध्यान से यह पोस्ट पढ़िए...... क्योंकि इस पोस्ट में वो रिसर्च है जो बताती है कि दरअसल भारत मे जिन पर इसे फैलाना का इल्जाम लग रहा है वो गलत है.....ओर संभवतः भारत मे कोरोना, मार्च से पहले फरवरी में ही फैलना शुरू हो गया था........

शुरू से शुरू करते हैं ताकि शक ओ शुबहा की कोई गुंजाइश ही न रहे भारत मे पहला कोरोना केस 30 जनवरी को केरल में रिपोर्ट किया गया सबसे पहले  जिस स्टूडेंट में कोरोना की पुष्टि हुई वह 24 जनवरी को केरल लौटा था। उसके बाद 30 जनवरी और 2 फरवरी को वुहान से लौटे केरल के दो छात्रों को संक्रमित पाया गया था।

अब सबसे खास बात समझिए ये तीनो छात्र MBBS के स्टूडेंट्स थे दरअसल चाइना का वुहान राज्य में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र MBBS की पढ़ाई करने जाते है दरअसल चाइना जाकर पढ़ाई करना भारत की तुलना में सस्ता पड़ता है अगर यहाँ MBBS की पढ़ाई के 1 करोड़ लगते हैं तो चीन में 60 लाख में ही काम हो जाता है चीन में लगभग कुल 23 हजार भारतीय छात्र पढ़ते है इसमे में से 21 हजार ने केवल एमबीबीएस में ही दाखिला लिया हुआ है। यह संख्या ब्रिटेन और अमेरिका में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स से कही अधिक है।......

चीन में नववर्ष मनाने की परंपरा है उनके यहाँ स्कूल यूनिवर्सिटी में नववर्ष पर सालाना अवकाश दिया जाता है जो एक महीने का रहता है. साल 2020 में यह अवकाश लगभग 15 जनवरी से 15 फरवरी तक था MBBS का कोर्स वुहान में स्थित 2 यूनिवर्सिटी में चलता है... बड़ी संख्या में भारतीय छात्र इस दौरान भारत मे आए यह वही समय था जब वुहान में कोरोना का प्रसार आरम्भ हुआ था वुहान सिटी में 18 जनवरी 2020 से को एक साथ 4,000 मामलों में कोरोना के लक्षणों की शुरुआत हो गई थी 20 जनवरी को, चीन ने लगभग 140 नए रोगियों की पहचान की थी, 23 जनवरी को वुहान में लॉक डाउन किया गया लेकिन उससे पहले ही भारतीय छात्रों का वहाँ से भारत लौटने की शुरुआत हो गयी थी

उस वक्त हम नही जानते थे लेकिन अब हम जानते है कि इस वायरस के लक्षण शरीर मे 7 से 8 दिनों के बाद ही प्रकट होते हैं...... भारत मे आ चुके इन स्टूडेंट्स में भी ये लक्षण प्रकट होना शुरु हुए...... देश के अलग अलग राज्यों मे पुहंचे इन मेडिकल स्टूडेंट्स में भी ये लक्षण प्रकट हुए थे यह लेख विभिन्न मीडिया पोर्टल की पड़ताल करके यह बताता है कि 20 जनवरी से 6 फरवरी के बीच आए कितने MBBS स्टूडेंट्स को ये लक्षण प्रकट हुए थे ........

(1) Jan 26, 2020 
राजस्थान के जयपुर में चीन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर लौटे एक डॉक्टर के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की आशंका व्यक्त की गई राज्य के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा तुरंत उसे  हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया
(लाइव हिंदुस्तान का लिंक देखिए)

(2) January 28, 2020
पंजाब के मोहाली में राज्य का पहले कोरोना वायरस संदिग्ध की पहचान की गई चीन से करीब एक हफ्ता पहले लौटे 28 वर्षीय व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी और सिर दर्द की शिकायत थी, उसी के बाद व्यक्ति को पीजीआई में दाखिल करवाया गया
( इंडिया टीवी का लिंक देखिए)

(3) Jan 28, 2020
मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक मेडिकल छात्र को कोरोना वायरस का संदिग्ध मरीज माना गया है. छात्र कुछ दिन पहले ही चीन के वुहान शहर से लौटकर उज्जैन आया था. चीन से वापस उज्जैन आने के बाद छात्र में कोरोना वायरस जैसे लक्षण देखते हुएछात्र को लगातार सर्दी, खांसी और बुखार होने के बाद उज्जैन के माधव नगर अस्पताल में भर्ती कराया गया है
( आज तक का लिंक सलग्न है )

(4) 30 Jan 2020
चीन के वुहान प्रांत के कनमिंग शहर में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही देहरादून की एक युवती में कोरोना वायरस के लक्षण मिले हैं। छाती के एक्सरे में फेफड़े में एक स्पॉट पाया गया। इस पर उसे फौरन ऋषिकेश एम्स के लिए रेफर किया गया।
(अमर उजाला का लिंक कमेन्ट बॉक्स में)

(5) 31 Jan 2020
इंदौर की खबर है कि मध्यप्रदेश के इंदौर और खरगोन में दो दो संदिग्ध मरीज मिले हैं। बताया जा रहा है कि दोनों चीन एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं। फिलहाल दोनों को जांच के लिए एमवाय हॉस्पिटल के स्पेशल वार्ड में भर्ती कराया गया है।
( ibc24 in का लिंक दिया है )

(6) 31 jan 2020
भाषा न्यूज़ एजेंसी की खबर है चीन से लौटे ओडिशा के कंधमाल जिले से ताल्लुक रखने वाले मेडिकल के एक छात्र को खांसी और जुकाम के चलते शुक्रवार को कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल भेजा गया है।
(बिजनेस स्टेंडर्ड का लिंक संलग्न है )

(7) 04 Feb 2020
चीन से लौटे हिसार जिले के एक गांव के व्यक्ति में कोरोना के लक्षण पाए गए है यह छात्र चीन के वेफांग मेडिकल विश्वविद्यालय से एमबीबीएस कर चुका है और इंटर्नशिप कर रहा है। सिविल अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में दाखिल छात्र ने बताया कि उसे बुखार महसूस हो रहा है, कभी-कभी गला भी दर्द करता है। कभी बुखार ठीक हो जाता है।
( अमर उजाला का लिंक नीचे देखिए )

(8) 02 Feb 2020
खबर है कि मध्यप्रदेश के खरगोन में चीन से लौटे एक छात्र में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए हैं. जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है. खरगोन का यह युवक चीन में MBBS पढ़ाई कर रहा है. कुछ दिन पहले ही ये छुट्टी पर चीन से खरगोन लौटा था.
(सच एक्सप्रेस का लिंक नीचे दिया है)

(9) 03 feb 2020
छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर की खबर है कि सरगुजा जिले के एक व्यक्ति में में करोना वायरस का लक्षण पाया गया है। बताया जा रहा है कि वह व्यक्ति साउथ वेस्ट मेडिकल यूनिवर्सिटी चाइना लोजो में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा था। और परीक्षा खत्म होने के बाद 9 जनवरी को अम्बिकापुर पहुंचा है। पिछले 25 दिनों से खांसी खरास आने के बाद आज वो मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए पहुंचा है
(पोर्टल सुयश ग्राम की खबर है लिंक नीचे)

(10) 6 Feb 2020
रोहतक पीजीआई  में एक संदिग्ध मरीज दाखिल हुआ है, जो चीन में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है. उसमें कुछ ऐसे लक्षण मिले हैं, जो कोरोना वायरस जैसे हैं.
(न्यूज़ 18 हरियाणा की खबर है यू ट्यूब लिंक उपलब्ध है)

(11) Feb 21, 2020
राजस्थान के कोटा में कोरोना वायरस का एक संदिग्ध मरीज सामने आया है. चाइना के सुजो शहर से एमबीबीएस के फाइनल ईयर में 25 वर्षीय छात्र पढ़ाई कर रहा था. छात्र 2 फरवरी को कोटा आया है उसे खांसी जुकाम की शिकायत पर कोटा के एमबीएस अस्पताल ले जाया गया.

(12) 13 mar 2020
40 दिन पहले चीन से लौटी युवती अपने साधारण सर्दी और खांसी का इलाज कराने जिले के सरकारी अस्पताल में पहुंची. घटना संतकबीरनगर की है जहां कोरोना वायरस से पीड़ित वह छात्रा तीन फरवरी को एक छात्रा चीन से लौटी थी
( आज तक का लिंक दिया है )

यह वो केस है जो मीडिया की नजर में आए हैं और ऐसे सैकड़ों केस हों सकते है क्योंकि उस दौरान हजारों छात्र वहाँ से भारत लौटे है..... इतने चीन से लौटे इतने अधिक मेडिकल छात्रों का सर्दी खाँसी बुखार से पीड़ित पाया जाना साधारण घटना नही थी .....बहुत से छात्रों को कोरोना वायरस से संक्रमित नही पाया गया..... लेकिन अब हमें पता चला है कि बहुत सी रिपोर्ट फाल्स निगेटिव निकल रही है अब हमें यह भी पता चला है कि बहुत से मरीजो में कोई लक्षण नही होते लेकिन वो इस वायरस के साइलेंट कैरियर होते है...... ये सारे लड़के 22 से 32 सालो के है,  हो सकता है कि इनके इम्युनिटी पावर ने कोरोना को हरा दिया हो लेकिन इस आशंका से इनकार नही किया जा उन्होंने यह वायरस स्प्रेड किया हो ...........आप यह नही कह सकते कि ये काम इन्होंने जानबूझकर किया एक बात और खास है अभी देश मे जितने हॉट स्पॉट बने हुए उन शहरों के हस्पतालों में इनके इलाज के लिए इन्हें भर्ती किया गया था 24 जनवरी को मुंबई के अस्पताल में भी 3 कोरोना संदिग्धों को भर्ती किया गया था हालांकि उनके मेडिकल स्टूडेंट्स होने की पुष्टि नही हो पाई यहाँ तक कि बिहार के सीवान जिले के मेडिकल स्टूडेंट्स भी चीन में पढ़ रहे थे.........

साफ है कि सरकार से कोरोना संक्रमण से उपजी परिस्थितियों की गंभीरता समझने में बहुत बड़ी चूक हुई है, अगर सरकारी अमला वक्त पर हरकत में आ जाता तो इस देशव्यापी लॉक डाउन से बचा जा सकता था.........

(इस पोस्ट का मतलब यह न निकाला जाए कि यह किसी पर दोषारोपण का प्रयास है इसे सिर्फ एक अलग संभाव्यता ओर इन्फॉर्मेशन की दृष्टि से ही लिया जाए)
Girish Malviya 
द्वारा सै क़ासिम 


कोरोना संक्रमण की खबरों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का हो पालन

कोरोना संक्रमण की खबरों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का हो पालन

15-Apr-2020

फेक न्यूज़ चलाने वाले चेनलों तथा न्यूज़ एजेंसी के खिलाफ हो कड़ी कार्यवाही- दारापुरी 
“कोरोना संक्रमण के सम्बंध में छापी या न्यूज चैनलों पर दिखाई जा रही खबरों में पुलिस व प्रशासन के पक्ष को भी देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का शत प्रतिशत अनुपालन कराया जाए और इसका उल्लंघन कर फेक न्यूज चलाने  वाले चेनलों तथा समाचार पत्रों व न्यूज़ एजेंसी के खिलाफ केस दर्ज कर कडी कार्यवाही की जाए ताकि समाज में वैमनस्यता व साम्प्रदायिकता को रोका जा सके और पूरा देश एकजुट होकर इस संकट का सामना कर सके। यह बात आज एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश को प्रेषित पत्र में कही है. उन्होंने कहा है की पिछले दिनों कुछ टीवी चेनलों तथा एक न्यूज़ एजंसी द्वारा सहारनपुर, फिरोजाबाद तथा इलाहबाद में कोरोना के मरीजों के लेकर फेक न्यूज़ चलाई गयी थी जिसे पुलिस ने जांच से झूठा पाया था तथा इन चेंनलों को अपने टवीट हटाने के लिए आदेश दिया था. यह सर्वविदित है कि इन चेनलों/एजंसी द्वारा चलाई गयी फेक न्यूज़ का सामाजिक सौहार्द पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इतना ही नहीं इन फेक न्यूज़ से एक तबके के खिलाफ दूसरे तबकों में तीव्र घृणा एवं विद्वेष भी पैदा हुया है. 
यह विचारणीय है कि इस समय जब देश कोरोना की महामारी से लड़ रहा है जिसमें समाज के सभी तबकों के सहयोग तथा सामजिक सौहार्द की आवश्यकता है तो ऐसे समय में फेक न्यूज़ चला कर सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ना बहुत घातक हो सकता है जोकि क्षम्य नहीं है. यह भी देखने की बात है कि क्या ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय में ऐसा राष्ट्रविरोधी कार्य करने वालों को केवल अपना ट्वीट डिलीट करने के लिए कह कर छोड़ देना पर्याप्त है? महाराष्ट्र सरकार ने ऐसे न्यूज चैनलों के विरूध्द मुकदमा दर्ज किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार ने भी कल कोरोना के नाम पर सामाजिक वैमनस्य न फैलाने की अपील की है।
अतः आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट जनहित एवं राष्ट्रहित में मांग करता है फेक न्यूज़ चलाने वाले चैनलों तथा न्यूज़ एजंसी के विरुद्ध केस दर्ज करके कडी कार्यवाही की जानी चाहिए.  
एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.)
राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट  
द्वारा सै क़ासिम 

 


कोरोना संकट के दौर में दलित परिदृश्य

कोरोना संकट के दौर में दलित परिदृश्य

14-Apr-2020

 {आज आंबेडकर जयंती पर विशेष} 
-एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.), राष्ट्रीय  प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट  
2011 की आर्थिक एवं जाति जनगणना के अनुसार भारत के कुल परिवारों में से 4.42 करोड़ परिवार अनुसूचित जाति (दलित) से सम्बन्ध रखते हैं. इन परिवारों में से केवल 23% अच्छे मकानों में, 2% रहने योग्य मकानों में और 12% जीर्ण शीर्ण मकानों में रहते हैं. इन परिवारों में से 24% परिवार घास फूस, पालीथीन और मिटटी के मकानों में रहते हैं. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अधिकतर दलितों के पास रहने योग्य घर भी नहीं है. काफी दलितों के घरों की ज़मीन भी उनकी अपनी नहीं है. यह भी सर्विदित है कि शहरों की मलिन बस्तियों तथा झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले अधिकतर दलित एवं आदिवासी ही हैं. यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इतने छोटे मकानों और झोंपड़ियों में कई कई लोगों के एक साथ रहने से कोरोना की रोकथाम के लिए फिज़िकल डिस्टेंसिंग कैसे संभव है. महाराष्ट्र का धार्वी स्लम इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है जहाँ बड़ी तेजी से संक्रमण के मामले आ रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में यदि ऐसी ही परिस्थिति रही तो इससे मरने वालों की संख्या का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. 
उपरोक्त जनगणना के अनुसार केवल 3.95% दलित परिवारों के पास सरकारी नौकरी है. केवल 0.93% के पास राजकीय क्षेत्र तथा केवल 2.47% के पास निजी क्षेत्र का रोज़गार है. इससे स्पष्ट है कि दलित परिवार बेरोज़गारी का सबसे बड़ा शिकार हैं. वास्तव में आरक्षण के 70 साल लागू रहने पर भी सरकारी नौकरियों में दलित परिवारों का प्रतिनिधित्व केवल 3.95% ही क्यों है? क्या आरक्षण को लागू करने में हद दर्जे की बेईमानी नहीं बरती गयी है? क्या मेरिट के नाम पर दलित वर्गों के साथ खुला धोखा नहीं किया गया है और दलितों को उनके संवैधानिक अधिकार (हिस्सेदारी) से वंचित नहीं किया गया है? यदि  दलितों में मेरिट की कमी वाले वाले झूठे तर्क को मान भी लिया जाए तो फिर दलितों  में इतने वर्षों में मेरिट पैदा न होने देने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? 
इसी जनगणना में यह उभर कर आया है कि देश में दलित परिवारों में से केवल 83.55% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है.  केवल 11.74% परिवारों  की मासिक आय 5,000 से 10,000 के बीच है और केवल 4.67% परिवारों की आय 10,000 से अधिक है. सरकारी नौकरी से केवल 3.56% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गरीबी की रेखा के नीचे दलितों  का प्रतिश्त बहुत अधिक है जिस कारण दलित ही कुपोषण का सबसे अधिक शिकार हैं. 
इसी प्रकार उपरोक्त जनगणना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 56% परिवार भूमिहीन हैं. इन में से भूमिहीन दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से भी अधिक हो सकता है. दलितों की भूमिहीनता की दशा उन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है जिस कारण वे भूमिधारी जातियों पर पूरी तरह से आश्रित रहते हैं. इसी प्रकार देहात क्षेत्र में 51% परिवार हाथ का श्रम करने वाले हैं जिन में से दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से अधिक हो सकता है. जनगणना के अनुसार  दलित परिवारों में से केवल 18.45% के पास असिंचित, 17.41% के पास सिंचित तथा 6.98% के पास अन्य भूमि है. इससे स्पष्ट है की दलितों की भूमिहीनता लगभग 91% है. दलित मजदूरों की कृषि मजदूरी पर सब से अधिक निर्भरता है. जनगणना के अनुसार देहात क्षेत्र में केवल 30% परिवारों को ही कृषि में रोज़गार मिल पाता है जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन में कितने दलितों को कृषि से रोज़गार मिल पाता  होगा. यही कारण है कि गाँव से शहरों को ओर पलायन करने वालों में सबसे अधिक दलित ही हैं. हाल में कोरोना संकट के समय शहरों से गाँव की ओर उल्टा पलायन करने वालों में भी बहुसंख्यक दलित ही हैं.
दलितों की भूमिहीनता और हाथ की मजदूरी की विवशता उनकी सब से बड़ी कमज़ोरी है. इसी कारण वे न तो कृषि मजदूरी की ऊँची दर की मांग कर सकते हैं और न ही अपने ऊपर प्रतिदिन होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न का मजबूती से विरोध ही कर पाते हैं. अतः दलितों के लिए ज़मीन और रोज़गार उन की सब से बड़ी ज़रुरत है परन्तु इस के लिए मोदी सरकार का कोई भी एजेंडा नहीं है. इस के विपरीत मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण करके दलितों को भूमिहीन बना रही है और कृषि क्षेत्र में कोई भी निवेश न करके इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों को कम कर रही है. अन्य क्षेत्रों में भी सरकार रोज़गार पैदा करने में बुरी तरह से विफल रही है.
सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण दलितों को आरक्षण के माध्यम से मिलने वाले रोज़गार के अवसर भी लगातार कम हो रहे हैं. इसके विपरीत ठेकेदारी प्रथा से दलितों एवं अन्य मज़दूरों का खुला शोषण हो रहा है. मोदी सरकार ने श्रम कानूनों का शिथिलीकरण करके मजदूरों को श्रम कनूनों से मिलने वाली सुरक्षा को ख़त्म कर दिया है. इससे मजदूरों का खुला शोषण हो रहा है जिसका सबसे बड़ा शिकार दलित परिवार हैं. 
अमेरिका में वर्तमान कोरोना महामारी के अध्ययन से पाया गया है कि वहां पर संक्रमित/मृतक व्यक्तियों में गोरे लोगों की अपेक्षा काले लोगों की संख्या अधिक है. इसके चार मुख्य कारण बताये गए हैं: अधिक खराब सेहत और कम स्वास्थ्य सुविधाओं की उप्लब्धता एवं भेदभाव, अधिकतर काले अमरीकन लोगों का आवश्यक सेवाओं में लगे होना, अपर्याप्त जानकारी एवं छोटे घर. भारत में दलितों के मामले में तो इन सभी कारकों के इलावा सबसे बड़ा कारक सामाजिक भेदभाव है. इसी लिए यह स्वाभाविक है कि हमारे देश में भी काले अमरीकनों की तरह समाज के सबसे निचले पायदान पर दलित एवं आदिवासी ही कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित होने की सम्भावना है. .  
वर्तमान कोरोना संकट से जो रोज़गार बंद हो गए हैं उसकी सबसे अधिक मार दलितों/ आदिवासियों पर ही पड़ने वाली है. हाल के अनुमान के अनुसार कोरोना की मार के फलस्वरूप भारत में लगभग 40 करोड़ लोगों के बेरोज़गारी का शिकार होने की सम्भावना है जिनमें अधिकतर दलित ही होंगे. इसके साथ ही आगे आने वाली जो मंदी है उसका भी सबसे बुरा प्रभाव दलितों एवं अन्य गरीब तबकों पर ही पड़ने वाला है. यह भी देखा गया है कि वर्तमान संकट के दौरान सरकार द्वारा राहत सम्बन्धी जो घोषणाएं की भी गयी हैं वे बिलकुल अपर्याप्त हैं और ऊंट के मुंह में जीरा के सामान ही हैं. इन योजनाओं में पात्रता को लेकर इतनी शर्तें लगा दी जाती हैं कि उनका लाभ आम आदमी को मिलना असंभव हो जा रहा है. 
उत्तर कोरोना काल में दलितों की दुर्दशा और भी बिगड़ने वाली है क्योंकि उसमें भयानक आर्थिक मंदी के कारण रोज़गार बिलकुल घट जाने वाले हैं. चूँकि दलितों के पास उत्पादन का अपना कोई साधन जैसे ज़मीन तथा व्यापर कारोबार आदि नहीं है, अतः मंदी के दुष्परिणामों का सबसे अधिक प्रभाव दलितों पर ही पड़ने वाला है. इसके लिए ज़रूरी है कि भोजन तथा शिक्षा के अधिकार की तरह रोज़गार को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये और बेरोज़गारी भत्ते की व्यवस्था लागू की जाये. इसके साथ ही स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये ताकि गरीब लोगों को भी स्वास्थ्य सुरक्षा मिल सके. इसके लिए ज़रूरी है कि हमारे विकास के वर्तमान पूंजीवादी माडल के स्थान पर जनवादी समाजवादी कल्याणकारी राज्य के माडल को अपनाया जाये. 
यह उल्लेखनीय है कि डा. आंबेडकर राजकीय समाजवाद (जनवादी समाजवाद) के प्रबल समर्थक और पूंजीवाद के कट्टर विरोधी थे. उन्होंने तो दलित रेलवे मजदूरों के सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा था कि “दलितों के दो बड़े दुश्मन हैं, एक ब्राह्मणवाद और दूसरा पूँजीवाद.” वे मजदूर वर्ग की राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के बहुत बड़े पक्षधर थे. डॉ आंबेडकर के मस्तिष्क में समाजवाद की रूप-रेखा बहुत स्पष्ट थी। भारत के सामाजिक रूपान्तरण और आर्थिक विकास के लिए वे इसे अपरिहार्य मानते थे। उन्होंने भारत के भावी संविधान के अपने प्रारूप में इस रूप-रेखा को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत भी किया था जो कि "स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज अर्थात राज्य एवं अल्पसंख्यक" नामक पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। वे सभी प्रमुख एवं आधारभूत उद्योगों, बीमा, कृषि भूमि का राष्ट्रीयकरण एवं सामूहिक खेती के पक्षधर थे. वे कृषि को राजकीय उद्योग का दर्जा दिए जाने के पक्ष में थे. डा. आंबेडकर तो संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाना चाहते थे परन्तु यह उनके वश में नहीं था. 
वर्तमान कोरोना संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब तक भारत सहित अधिकतर देशों में विकास का जो पूँजीवाद माडल रहा है उसने शोषण एवं असमानता को ही बढ़ावा दिया है. यह आम जन की बुनियादी समस्यायों को हल करने में बुरी तरह से विफल रहा है. जबसे राजनीति का कारपोरेटीकरण एवं फाइनेंस कैपिटल का महत्त्व बढ़ा है, तब से लोकतंत्र की जगह अधिनायिकवाद और दक्षिणपंथ का पलड़ा भारी हुआ है. इस संकट से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि इस संकट का सामना  केवल समाजवादी देश जैसे क्यूबा, चीन एवं वियतनाम आदि ही कर सके हैं. उनकी ही व्यवस्था मानव जाति के जीवन की रक्षा करने में सक्षम है। वरना आपने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को तो सुना ही होगा जिसमें वह कहते हैं कि लगभग ढाई लाख अमरीकनों को तो कोरोना से मरना ही होगा और इसमें वह कुछ नहीं कर सकते। पूंजीवाद के सर्वोच्च माडल की यह त्रासद पुकार है जो दिखा रही है कि मुनाफे पर पलने वाली पूंजीवादी व्यवस्था पूर्णतया खोखली है। इसलिए दलितों के हितों की रक्षा भी जनवादी समाजवादी राज्य व्यवस्था में ही सम्भव है। बाबा साहब की परिकल्पना तभी साकार होगी जब दलित, पूंजीपतियों की सेवा में लगे बसपा, अठवाले, रामविलास जैसे लोगों से अलग होकर, रेडिकल एजेंडा (भूमि आवंटन, रोज़गार, स्वास्थ्य सुरक्षा, शिक्षा, एवं सामाजिक सम्मान आदि) पर आधारित जन राजनीति के साथ जुड़ेंगे। यही राजनीति एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगी जिसमें उत्तर कोरोना काल की चुनौतियों का जवाब होगा। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इसी दिशा में जनवादी समाजवादी राजनीति का एक प्रयास है।
नोट: यह विशेष लेख 14 अप्रैल आंबेडकर जयंती के अवसर पर छापने के लिए है.

 


मुम्बई से 1600 किमी पैदल चलकर घर पहुंचा बेटा , मां ने नहीं खोला दरवाजा

मुम्बई से 1600 किमी पैदल चलकर घर पहुंचा बेटा , मां ने नहीं खोला दरवाजा

13-Apr-2020

सै क़ासिम लखनऊ 

वाराणसी ।

एक महामारी ने कितनो की आनझे खोल दी । अब रिश्तों की परतें भी खुल रही है। 

वाराणसी के कोतवाली थाना क्षेत्र की दवा मंडी सप्तसागर के पास का निवासी अशोक केसरी सेंट्रल मुंबई के नागपाड़ा इलाके में एक होटल में काम करता था। लॉकडाउन की घोषणा और संक्रमण के तेजी से प्रसार के बीच 14 दिन पहले ही छह दोस्तों के साथ वो वाराणसी के लिए पॉडल निकल गया। जेब में कुछ रुपये लेकर वह सड़क और रेल पटरियों के जरिये 1600 किमी की दूरी पैदल ही तय कर वाराणसी पहुंचा और घर फोन किया। यहां घर पहुंचने पर ना मां ने दरवाजा खोला, ना भाई और भाभी ही ने। जबकि वह जांच के बाद घर पहुंचा था, उसे 14 दिन तक क्वारंटीन का निर्देश मिला था। देर शाम उसने पुलिस से मदद मांगी तो पुलिस ने बेहाल अशोक को मैदागिन स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया। उसकी हालत अब ठीक है, मगर वो थकान से बेहाल है।
अशोक 14 दिन पहले ही दोस्तों के साथ निकला था, रविवार सुबह रेल पटरियों के सहारे वह कैंट स्टेशन पर पहुंचा। यहीं से पहले उसने फोन कर घरवालों को जानकारी दी। उसने अपने छह दोस्तों के बारे में भी बताया। वे पं. दीनदयालनगर व रामनगर क्षेत्र के रहने वाले हैं। सात लोगों के मुंबई से यहां आने की सूचना के बाद घर वालों ने मोहल्ले में जानकारी दी। फिर हड़कंप मच गया। उधर, अशोक घर न पहुंचकर मंडलीय अस्पताल पहुंचा। वहां जांच के लिए काफी देर तक भटकता रहा। फिर उसे जानकारी दी गई कि पं. दीनदयाल उपाध्याय जिला अस्पताल में जांच हो रही है। वहां पहुंच उसने जानकारी दी।
अशोक ने बताया कि जांच के बाद उसे 14 दिन तक घर में अलग रहने का निर्देश मिला। इसके बाद वह घर पहुंचा तो मां व भाभी ने दरवाजा नहीं खोला। उन्हें आशंका है कि वह मुंबई में कोरोना से संक्रमित हो गया होगा। कोतवाली इंस्पेक्टर महेश पांडेय ने बताया कि जिला अस्पताल में जांच के बाद वह घर पहुंचा था तो घरवालों ने रखने से इनकार कर दिया। पुलिस को जानकारी हुई तो उसका पता लगाया गया। थकान के कारण बेहाल है, उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया । उस मे कोरोना के अभी कोई लक्षण नहीं हैं।  

अशोक काम से मिलने वाले पारिश्रमिक में से घर के लिए भी रुपये भेजता था। मां व भाभी के लिए उसने कई बार रुपये भेजे। वहां से पैदल वह घर के लिए निकला कि वहां पहुंचकर सुरक्षित रहेगा। कहीं साधन नहीं मिला तो पैदल ही चल पड़ा। बताया कि रास्ते में भूखे-प्यासे कई किलोमीटर चलते रहे। रास्ते में कहीं कुछ मांगने पर मिल जाता तो वही खाकर पेट भरते।

पुलिस ने अशोक से उसके दोस्तों की जानकारी भी ली है। उसके छह अन्य दोस्तों से संपर्क कर उन्हें भी जांच के लिए पं. दीनदयालनगर और रामनगर पुलिस को सूचना दे दी गई है।

 


घरों से काम करने के दौरान इन बातों का रखें ख्याल, बैक पेन से बचे!

घरों से काम करने के दौरान इन बातों का रखें ख्याल, बैक पेन से बचे!

12-Apr-2020

COVID-19 लॉकडाउन के दौरान एक उचित डेस्क के बिना कई लोग घर से काम कर रहे हैं, वे घंटों तक गलत मुद्रा में बैठे रह सकते हैं जिससे गर्दन और पीठ के निचले हिस्से में दर्द हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि सरल युक्तियां जैसे अपने लैपटॉप को बिस्तर पर नहीं ले जाना, पर्याप्त ब्रेक लेना और स्वस्थ आहार लेने से आप इन समस्याओं से बच सकते हैं।
शेषज्ञों ने कहा कि लोगों को इस दौरान बीमार नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि होम मोड से काम करना और जिम बंद करने से कई लोगों की शारीरिक गतिविधियां बाधित होती हैं।
आर्थोपेडिक्स में सीनियर कंसल्टेंट मोनू सिंह कहते हैं, “हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह लॉकडाउन की अवधि किसी बीमारी से हमारी सुरक्षा के लिए है, और हमें लापरवाह नहीं होने देती है और सर्वाइकल दर्द, पीठ दर्द, गठिया आदि जैसी बीमारियों को न्योता देती है।” नारायण सुपरस्पेशलिटी अस्पताल, गुरुग्राम, ने आईएएनएस को बताया।
शारीरिक गतिविधि अनुसूची में गड़बड़ी“लोग अब कार्यालय के लिए दैनिक रूप से बाहर नहीं जा रहे हैं, इसने निश्चित रूप से चलना, व्यायाम करना और उस अनुसूची को संतुलित करने के लिए अपनी शारीरिक गतिविधि अनुसूची को तोड़ दिया है, जो उन्हें नियमित व्यायाम और अन्य शारीरिक गतिविधियों के लिए हर रोज कम से कम एक घंटा निकालना चाहिए योग और अन्य फ्री हैंड व्यायाम जैसे घर, ”उन्होंने कहा।
डॉक्टर ने सुझाव दिया कि घर से काम करते समय लोगों को एक मेज और कुर्सी का उपयोग करना चाहिए, अपनी पीठ को सीधा रखना चाहिए और सही करना चाहिए।

 उन्हें लैपटॉप या किसी भी स्क्रीन के सामने लंबे समय तक बैठने से बचने के लिए पर्याप्त ब्रेक लेना चाहिए, उन्होंने कहा कि प्रतिबंधित गतिविधि के इन समयों में आहार बेहद महत्वपूर्ण है।

 सिंह ने कहा, “स्नैकिंग से बचें, अस्वास्थ्यकर भोजन का सेवन न करें, अधिक तरल पदार्थों के साथ अपने दैनिक भोजन में अधिक फल और फाइबर जोड़ें और अपने कैल्शियम का सेवन सही रखें।”
सु भाष जांगिड, निदेशक और यूनिट हेड, हड्डी और संयुक्त संस्थान, गुरुग्राम में फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने लोगों को सलाह दी है कि वे लॉकिंग की इस अवधि में गर्दन और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत रखें।
“सर्वाइकल मुद्दों वाले लोगों को किसी भी भारी वजन से बचना चाहिए,” जांगिड़ ने कहा।

 “पीठ की समस्याओं वाले लोगों के लिए, आप अपने घर में चल सकते हैं। शेड्यूल बनाएं, सक्रिय रहने के लिए आधे घंटे की लंबाई पर एक समय तय करें और चलें। यदि आपके पास टहलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, तो अपनी योग चटाई या बेडशीट निकाल लें, आप अपनी मुख्य शक्ति और स्थिरता को बेहतर बनाने के लिए पाइलेट्स या सॉफ्ट योगा कर सकते हैं, ”उन्होंने कहा।
इस तरह के कुछ व्यायाम हैं – कुर्सी स्टैंड, सिंगल लेग उठाना, हील उठाना, टेबल पर सामने तख्ती।

लोग पीठ के लिए ताकत हासिल करने के लिए एक तख्ती और एक बच्चे की मुद्रा भी कर सकते हैं।
डॉक्टर ने कहा कि नृत्य सक्रिय रहने और परिवार के बंधन को मजबूत रखने का एक शानदार तरीका है।
वैकल्पिक रूप से, कोई स्किपिंग, ज़ुम्बा, योग या पाइलेट्स या फ़्लोर एक्सरसाइज़ कर सकता है।

डॉक्टर ने कहा, “खड़े होने के बजाय फोन पर बात करते हुए खड़े रहें या टहलें।”

नई दिल्ली में श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के फिजियोथेरेपी और पुनर्वास विभाग के प्रमुख विजू थॉमस (पीटी) के अनुसार, जो लोग घर से काम कर रहे हैं उन्हें और अधिक सावधान रहने की जरूरत है।
“हर सुबह सूर्य नमस्कार करें” और अपने कमरे में चलें। यदि कोई पहले से ही चिकित्सा पर है तो अपने फिजियोथेरेपिस्ट के संपर्क में रहें और पालन करने की सलाह लेते रहें, ”थॉमस ने कहा।siyasat.com

 


ज्योतिबा फुले  जीवन दर्शन !

ज्योतिबा फुले जीवन दर्शन !

11-Apr-2020

ज्योतिबा फुले स्कॉटिश मिशन के अंग्रेजी स्कूल में पढ़े लिखे व्यक्ति थे । उनकी जितनी पढ़ाई थी उससे उस दौर में अंग्रेजी सरकार के अधीन नौकरी पाना आसान था । लेकिन उन्होंने कभी भी जीवन यापन के लिए सरकारी नौकरी का चुनाव नहीं किया ।

ज्योतिबा के अच्छे स्कूल में पढ़ने के कारण कई ब्राह्मण , क्षत्रिय , कायस्थ और मुसलमान उनके दोस्त थे । अपनी युवावस्था में एक बार वह अपने एक ब्राह्मण मित्र की बारात में शरीक होने गए । वहां वह पहली बार जातिगत भेदभाव के अपराध का शिकार हुए ।
शुद्र माली जाति का लड़का ब्राह्मणों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले , इसे ब्राह्मण भला कैसे बर्दास्त कर सकते थे । उस दिन ज्योतिबा का गिरेबान पकड़कर एक ब्राह्मण ने टोका ...

" शर्म नहीं आती ? शुद्र कहीं के..ब्राह्मणों के साथ चलते हो..जातिपाँति की कोई मर्यादा है या नहीं ? या सब कुछ ताक पर रख दिया है ? हटो यहां से...सबसे पीछे चलना और आगे मत आना. बहुत बेशर्म हो गए हैं ये लोग आजकल. '

ज्योतिबा पर मानों बिजलियाँ गिर पड़ी । वह हक्केबक्के रह गए । कोई उन्हें इस तरह प्रताड़ित कर सकता था , उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था । इतना अपमान , ऐसी घृणा..बिना एक क्षण रुके वह फौरन घर लौट गए ।

गुस्से में उफनते हुए उन्होंने पूरा वाकया अपने पिता को सुनाया । उन्हें लगा वो कुपित होंगे , लाठी लेकर अपमान का बदला लेने चलेंगे , लेकिन ऐसा नहीं हुआ । उनके पिता गोविंदराव भी परंपरा के गुलाम थे । धर्मभीरु और रूढ़िप्रिय थे । उन्होंने उल्टे ज्योतिबा को समझाना शुरू किया -

" गनीमत समझो कि उन्होंने तुम्हें डांट-डपट कर छोड़ दिया. हम जाति से शुद्र हैं. हम उनकी बराबरी कैसे कर सकते हैं ? गैर ब्राह्मणों का पेशवाओं के राज में भी अपमान होता था. उन्हें हाथी के पैरों तले कुचल देते थे. तमाम तरह की यातनाएं देते थे. न्याय ब्राह्मणों का पक्षधर था..

आज तुमने जो कुछ किया वह पेशवाओं के राज में करते तो तुम्हें कड़ी सज़ा होती "

ज्योतिबा लगातार उनकी बात सुनते रहे और उनके सामने दागदार सच्चाइयों के पर्दे खुलते रहे । उनका  अपने पिता की बात से होने वाला दोहरा दुख कम होने लगा । उन्हें समझ आने लगा कि राजनीतिक गुलामी भीषण जरूर थी , लेकिन उसकी कोई सीधी आंच सामान्य लोगों पर नहीं आती थी । परंतु सामाजिक विषमता की आग तो आदमी को जिंदा जलाने वाली थी । मनुष्य की आत्मा को तिल तिल कर मारने वाली थी । अगर लड़ना ही है तो इस जानलेवा बीमारी से लड़ना होगा ।

जोतिबा के सामने भविष्य का रास्ता खुलता हुआ दिखाई देने लगा । उस दिन उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि अब आगे चलकर बस एक ही काम करना है , जाति भेद के खंभों पर खड़े विषमता के महल को पूरी ताकत के साथ ढहा देना है ।
2.
विषमता के खिलाफ लड़ाई में ज्योतिबा का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा थी । उन्हें पता था कि विषमता के साथ-साथ अन्य सभी लड़ाईयां शिक्षा के दम पर ही जीती जा सकती हैं । जीवन के बाद के वर्षों में , जुलाई 1883 के आसपास वह लिख कर गए हैं  -

" विद्या बिना मति गयी । मति बिना नीति गयी ।
नीति बिना गति गयी । गति बिना वित्त गया ।
वित्त बिना शुद्र गए । इतने अनर्थ , एक अविद्या ने किए । '

ज्योतिबा ने यह लड़ाई पूना से शुरू की । पूना में उन्होंने 1848 के अगस्त महीने में अछूत बच्चों के लिए स्कूल शुरू किया जो महाराष्ट्र ही नहीं , पूरे देश में अपने ढंग का पहला स्कूल था । यह ऐसा काम था जो इस देश के 3000 सालों के इतिहास  में नहीं हुआ था । अछूत समाज के लिए पहला स्कूल ज्योतिबा के कारण खुल सका ।

यह तो स्पष्ट था कि ज्योतिबा के उस स्कूल में शुद्र या अतिशूद्र जाति के लड़के या लड़कियां ही आती थीं , लेकिन असल प्रश्न यह था कि उन्हें पढ़ायेगा कौन ? उस समय पाठशालाओं के शिक्षक बिना किसी संकोच के जाति भेद का पालन करते थे । लड़कों के बैठने की व्यवस्था उनकी जाति श्रेष्ठता के अनुसार की जाती थी । निम्न वर्ण के लड़के उच्च वर्ण के लड़कों के साथ बैठकर नहीं पढ़ सकते थे । लड़कियों की स्थिति तो और भी बदतर थी । उनके लिए विद्यालय जाना तो दूर घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था । लिहाज़ा ज्योतिबा ने सभी विद्यार्थियों को अकेले पढ़ाने का निर्णय लिया । यह उस दौर के भारत में उठाया गया बेहद क्रांतिकारी कदम था । लेकिन यह सभी को रास नहीं आया । 

पूना के सनातनी ब्राह्मणों को ज्योतिबा का इस तरह अछूतों के लिए स्कूल खोलने बिल्कुल पसंद नहीं आया । उनके मत में यह घोर अधर्म था । उन्होंने ज्योतिबा की कड़ी टिका टिप्पणी की । उन्हें भला बुरा कहा । समाज से बहिष्कृत करने की धमकी दी । लेकिन ज्योतिबा टस से मस न हुए ।

जब ज्योतिबा पर इन सब बातों का असर नहीं हुआ तो ब्राह्मणों द्वारा उनके पिता को निशाना बनाया गया । उनको ताने दिए गए , उनकी घोर निंदा की गई -

" तुम्हारा लड़का धर्म और समाज के लिए कलंक है । उसकी पत्नी भी निपट निर्लज्ज और मर्यादाहीन है । दोनों समाजद्रोही और धर्मद्रोही हैं । उनके व्यवहार के कारण तुम पर परमात्मा का कोप होगा । अच्छा होगा कि दोनों को घर से बाहर निकाल दो "

गोविंदराव रोजाना यह सब ताने सुनकर दब गए । उन्होंने ज्योतिबा के सामने प्रस्ताव रखा -

" या तो स्कूल छोड़ो या घर ! "

ज्योतिबा को अपने लक्ष्य से हटना कतई मंजूर नहीं था । वह बिना देर किए फौरन घर छोड़ने की बात पर राजी हो गए । पिता इस दृढ़ता को देखकर तिलमिला उठे ।

उन्होंने इस बार और गहरी चोट की  - ' अगर ऐसा है तो अपनी पत्नी को भी ले जाओ , मैं तुम्हारी पत्नी को अपने घर में नहीं रख सकता । '

ज्योतिबा के लिए वह दिन बहुत दुखदायी था । उन्होंने दुखी मन से पिता का घर छोड़ दिया । अब तक पिता का साया होने की वजह से उन्हें रहने और खाने की समस्या नहीं थी । लेकिन घर से बाहर कदम रखते ही ज्योतिबा को खाने के लाले पड़ने लगे । उन्होंने कई दिन तक आधे पेट तो कई दिन  बिना खाये बिताए । काम धंधे की खोज में व्यस्तता के कारण ज्योतिबा को स्कूल का काम छोड़ना पड़ा । आठ नौ महीनों तक चलने के बाद स्कूल भी बंद हो गया । यह ज्योतिबा के लिए बेहद मुश्किल समय था । संभवतः यह आगामी चुनौतियों के लिए उनकी परीक्षा थी , जिसका वह डटकर सामना कर रहे थे ।
3.
घर से निकाले जाने के बाद ज्योतिबा की आर्थिक हालत जब ठीक हुई तो उन्होंने पुनः स्कूल शुरू किया । यह स्कूल एक मुसलमान के घर में शुरू किया गया ।  उस दौर के सभी धर्मभीरु और स्वयं को हिन्दू कहने वाले लोग , जिनके लिए ज्योतिबा ज्ञान की अलख जगा रहे थे उन्होंने उनकी घोर उपेक्षा की । वह उनके  प्रयासों को तुच्छ नज़रों से देखते रहे ।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ज्योतिबा ने शिक्षा देने के लिए कभी भी उस दौर के ब्राह्मणों की तरह न भेदभाव किया न ही बदले में कुछ लिया । उन्होंने अपने जीवनकाल में रोजी रोटी के लिए कभी सब्जियां बेचीं , कभी दर्जी का काम किया , कभी खेती की तो कभी कठोर शारीरिक श्रम किया ।

ज्योतिबा के दुबारा स्कूल शुरू करने के बाद स्कूल में आने वाले छात्रों की संख्या बढ़ने लगी । इससे प्रेरित होकर अगले चरण के रूप में उन्होंने 3 जुलाई 1857 को लड़कियों के लिए भी एक स्कूल खोला । ज्योतिबा ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की दूरदर्शिता दिखाई ।

लेकिन इस कार्य में भी ज्योतिबा के सामने शिक्षक न मिलने की समस्या सामने आने लगी । जब ज्योतिबा को तमाम कोशिशों के बाद पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक न मिला , तब उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री को इस काम के लिए तैयार किया । लगभग 4 साल का कोर्स पूरा करने के बाद सावित्री प्रशिक्षित शिक्षिका बन गयी । वह भारत की पहली शिक्षिका थीं ।

सावित्री के स्कूल में पढ़ाने से परम्परावादी समाज की चूलें हिल गयीं । घर से बाहर कदम रखकर समाज में खुले तौर पर काम करने वाली वह पहली भारतीय महिला थीं । इससे बौखलाए हुए परम्परावादी और धर्मभीरु लोगों ने सावित्री की छीछालेदर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । जब वह घर से बाहर निकलती तो लोग उन पर थूकते , उन्हें गालियां देते , उनको पत्थरों से मारते और उन पर गोबर और मल फेंक दिया करते थे ।

लेकिन धन्य हैं वह महिला , नमन है उनको , कि इस जानलेवा अपमान की आग पीकर भी वह शांति से अपना काम करती थीं । वह अक्सर लोगों से हाथ जोड़कर कर विनम्रता से कहती थी -

" भाईयों , मैं तो आपको और आपकी इन छोटी बहनों को पढ़ाने का पवित्र काम कर रही हूं । मुझे बढ़ावा  देने के लिए शायद आप मुझपर गोबर- पत्थर फेंक रहे हैं । मैं यह मानती हूं कि यह गोबर या पत्थर नहीं , फूल हैं । आपका यह काम मुझे प्रेरणा देता है कि इसी तरह मुझे अपनी बहनों और भाईयों की सेवा करनी चाहिए । ईश्वर आपको सुखी रखें । "

फुले दंपत्ति की इस जिजीविषा और दृढ़ निश्चय की बदौलत कई दिक्कतों , संकटों और विरोधों के बाद भी स्कूल चलता रहा । इन कार्यों से ज्योतिबा और सावित्री ब्राह्मण और अन्य ऊंची जातियों के लिए नीच और पापी बन गए । वहीं दूसरी ओर पूरे महाराष्ट्र में वह अछूतों और महिलाओं के मसीहा बन गए । अब लोग उनके प्रयासों को जानने और समझने लगे थे ।
4.
जब ज्योतिबा को जान से मारने की कोशिश हुई ..

ज्योतिबा के विचार और आचार पचा पाना सनातनियों के लिए संभव नहीं था । वह उनके कार्यों की प्रसद्धि से घबराने लगे थे । उनके लिए अछूतों और महिलाओं का उत्थान समाज का सत्यानाश होना था । इस कुंठा की वज़ह से सनातनी ब्राह्मणों ने ज्योतिबा की हत्या करने की योजना बनाई । उन्होंने शूद्रों के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधने का सोचा और ज्योतिबा की हत्या के लिए घोंडीराम नामदेव कुम्हार और रौद्रे नामक शुद्र व्यक्तियों को पैसे देकर इस काम के लिए तैयार किया ।

उन्हें आज से लगभग 150 साल पहले ज्योतिबा की हत्या के लिए एक - एक हज़ार रुपये दिए गए थे जिनका मूल्य आज एक करोड़ से कम नहीं होगा ।

निर्धारित किये गए दिन को आधी रात में दोनों ज्योतिबा के घर पहुंचें । घर के भीतर आहट पाकर ज्योतिबा और सावित्री की नींद खुल गयी । उन्होंने सामने देखा तो हाथों में चमचमाते छुरे लिए हुए दो हट्टे कट्टे आदमी खड़े थे ।

" क्या चाहते हो ? " , ज्योतिबा ने पूछा ।

" तुम्हारी जान । "

" क्यों ? क्या मैंने आपका कुछ अहित किया है ? "

" वह बात नहीं है । हमें बस तुम्हे जान से मारने का हुक्म है "

" मुझे मारकर तुम्हें क्या मिलेगा ? "

" एक-एक हज़ार रुपये । "

" अरे ! तब तो जरूर मेरा सिर कलम कर दो । अगर इससे तुम्हारा कुछ भी भला होता है तो मैं क्यों रोड़ा अटकाउं ! जिस गरीब जनता की सेवा में मैंने अपना पूरा जीवन लगा दिया , वही जनता अगर मेरा गला काटना चाहती है तो काट ले । मेरी सारी हयात अछूतों का भला करने में गयी है । अब अगर मेरी मौत से उनका भला होता है तो मैं क्यों रोकूँ , बढ़ो आगे । "

ज्योतिबा की धीर गंभीर और आत्मविश्वासपूर्ण वाणी सुनकर दोनों ने हथियार डाल दिए । उन्होंने ज्योतिबा की अच्छाई के बारे में सुना था । उसे  साक्षात देखकर वो ज्योतिबा के चरणों में गिर पड़े और माफी मांगने लगे । ज्योतिबा ने उदारतापूर्वक उनको क्षमा कर दिया ।

उनमें से एक कुछ दिन बाद ज्योतिबा का शरीर संरक्षक बना और दूसरा घोंडी राम कुम्हार ज्योतिबा के सत्यशोधक समाज का प्रबल समर्थक बना ।

ज्योतिबा मन , वचन , कर्म सभी से उदार और न्यायप्रिय थे । इस घटना ने इस बात पर पूर्णतः मुहर लगा दी थी ।

4.
जुन्नर के किसान और ज्योतिबा ..

ज्योतिबा के समय , जुन्नर में खेती-किसानी पूरी तरह से ब्राह्मण ज़मींदारों और साहूकारों के हाथ में थी । ये साहूकार और जमींदार गरीब किसानों , मज़दूरों और जरूरतमंदों को अलग अलग तरीके से लूटा करते थे । इससे तंग आकर जुन्नर क्षेत्र के किसानों ने सरकार के पास यह अर्जी दायर की कि उन्हें जमींदारों और साहूकारों से बचाया जाए । उनके हितों की रक्षा किया  जाय ।

सरकार ने उनकी प्रार्थना पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया । तब ज्योतिबा ने गरीब , मज़दूर और किसानों को इकठ्ठा किया । उन्हें हिम्मत दी और एकता का महत्व समझाया । परिणामस्वरूप , किसानों ने भारतीय इतिहास में एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाते हुए सालभर ज़मीन परती रखी । उन्होंने पूरे क्षेत्र में हल चलाना बंद कर दिया । जमीन जोतना बंद कर दिया ।

घबराये जमींदार और साहूकारों द्वारा ज्योतिबा पर तमाम दबाव बनाए गए , लेकिन वो झुके नहीं । ज्योतिबा किसानों के सच्चे नेता थे । उन्हें झुकने की बजाय संघर्ष करना आता था । 

कुछ समय बाद सरकार , जमींदार और साहूकार , तीनों को झुकना पड़ा । इनकी ज्योतिबा के साथ सुलह हुई और सरकार को किसानों के हित के लिए बाकायदा 'एग्रीकल्चर ऐक्ट ' पास करना पड़ा ।

आश्चर्य की बात है कि बालगंगाधर तिलक और रानाडे जैसे नेता उस समय साहूकारों के पक्ष में थे । उन्होंने ज्योतिबा की  निंदा की और साहूकारों का खुलकर साथ दिया । उस समय प्रकाशित होने वाले ' इंदुप्रकाश ' नामक अखबार ने भी ज़मींदारों का पक्ष लेते हुए ज्योतिबा की आलोचना की ।

लेकिन इसके बावजूद भी ज्योतिबा के नेतृत्व में गरीबों , किसानों और मज़दूरों की जीत हुई । यह उक्त अखबार और नेताओं की पक्षधरता से ज्यादा महत्वपूर्ण और सुकूनदायक बात थी ।
6.
ओतुर गांव के ब्राह्मण और ज्योतिबा..

इस घटना के बारे में पढ़ने के बाद संभवतः आपको एक बार उस समय के सनातनी ब्राह्मणों के बारे में सोचकर हंसी आये । लेकिन गंभीरता से सोचने पर आपको अंदाजा लग जायेगा कि उस समय का समाज ब्राह्मणीय वर्चस्व और जातिवाद से कितनी बुरी तरह ग्रस्त था ।

ओतुर गांव में श्री बालाजी कुसाजी पाटिल नामक एक किसान थे । किसी कारणवश उन्होंने अपने पुत्र के विवाह में गांव के पुरोहितों को निमंत्रण नहीं दिया । इससे गांव के पुरोहित नाराज़ हो गए । इस विवाह के खिलाफ उन्होंने कोर्ट में वाद दायर किया । उन्होंने क्या दावा किया पढ़िए -

' हम यहां के पीढ़ियों के पुश्तैनी पुरोहित हैं । विवाह कार्य करवा देना , तत्सम्बन्धी संस्कार वर-वधु को देना तथा सारे धार्मिक कृत्य करना हमारा अधिकार है । हम इसके लिए तैयार भी थे लेकिन बालाजी पाटिल ने अपनी जाति के पुरोहितों को बुलवा कर विवाह करवाया । यह हमारा अपमान है । वे हमें हमारा अधिकार और दक्षिणा दोनों प्रदान करें '

धीरे धीरे यह खबर पूरे पूना में फैल गयी । पूना के सभी ब्राह्मण , ओतुर के ब्राह्मणों के साथ और बालाजी के खिलाफ हो गए । बालाजी का जीना मुहाल हो गया ।

अंततः उन्होंने ज्योतिबा की शरण ली । ज्योतिबा ने बालाजी की पूरी मदत की । न्यायाधीश के समक्ष बेबाकी से बालाजी के पक्ष में बात रखवाई । परिणामतः पूना के न्यायाधीश ने बालाजी के पक्ष में निर्णय दिया ।

इससे ब्राह्मण वर्ग और अधिक क्रुद्ध हो गया । वह अगली  अपील के लिए बम्बई के सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया । सम्पूर्ण महाराष्ट्र में इस मुकदमें की खूब चर्चा हुई । पूना में सारे ब्राह्मण एक तरफ और गैर ब्राह्मण दूसरी तरफ हो गए । उस समय ज्योतिबा ने गैर ब्राह्मणों का नेतृत्व पूरी जिम्मेदारी और हिम्मत के साथ सम्हाला ।

बहुत बाद में जाकर ज्योतिबा के जीवन के अंतिम वर्षो में जनवरी , 1890 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय ने बालाजी पाटिल के पक्ष में निर्णय दिया और इस विवाद का अंत हुआ ।

यह विवाद सत्यशोधक समाज और ज्योतिबा समेत सभी गैर ब्राह्मणों की जीत थी । इसने महाराष्ट्र की सामाजिक आबोहवा बदल के रख दी । आज यह एक सामान्य मामला लग सकता है लेकिन उस दौर में ब्राह्मणीय वर्चस्व के खिलाफ खड़े होना बहुत बड़ा और साहसिक कदम था ।
7.
हमें आमिर खान का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उन्होंने पहली बार ज्योतिबा के जल संरक्षण संबंधी प्रयासों को फेसबुक लाइव के माध्यम से लोगों के सामने लाने का काम किया ।

ज्योतिबा की यह पहल उस समय के अछूतों की समस्या से जुड़ी हुई है । पूना में उस समय स्थान स्थान पर पीने के पानी के छोटे बड़े हौज हुआ करते थे , जिन पर पेशवाओं का अधिकार होता था । इन हौज पर महार , चमार , भंगी आदि शुद्र जाति के लोग पानी नहीं भर सकते थे । तपती दुपहरी में कई बार वे पानी के लिए प्रार्थना करते हुए , हौज से थोड़ी दूर पर दम तोड़ देते थे लेकिन उन्हें पानी की एक बूंद भी नहीं मिलती थी । अक्सर पड़ने वाले सूखे या गर्मियों में होने वाली पानी की कमी के कारण हर साल किसी न किसी घर से कोई न कोई जरूर मरता था । उस समय की नगरपालिका भी कोई स्थायी इंतज़ाम नहीं कर पा रही थी ।

पानी की कुछ बूंदों के लिए अछूतों की जो हालत थी उसे देखना और सहना ज्योतिबा के लिए संभव नहीं था । 1868 में उन्होंने अपने घर के पास हौज की स्थापना की और उसे अछूतों के लिए खुला कर दिया । वहां कोई भी किसी भी समय आकर पानी पी सकता था ।

उन्होंने अछूतों को जल संरक्षण के लिए भी प्रेरित किया । उन्हें  छोटे -बड़े जलाशयों , घर पर पानी इकठ्ठा करने की तकनीकों तथा पानी बचाने के तरीकों के बारे में सिखाया । इसके अलावा ज्योतिबा ने 'जल-नीति' का विकास भी किया और ब्रिटिश सरकार से इसे लागू करने का अनुरोध किया ।  स्थानीय स्तर पर उन्होंने 'जल-नीति' का अध्ययन किया और किसानों को मिट्टी और खनिजों के क्षरण के बारे में शिक्षित किया । उनका महत्वपूर्ण सुझाव सिंचाई के लिए 'टैप सिस्टम' को लेकर था जिसे इज़राइल ने 1948 में अपने यहाँ लागू किया ।  सिंचाई के 'टैप सिस्टम' द्वारा न केवल मिट्टी और खनिजों का क्षरण रोका जा सकता है बल्कि जल का भी अधिकतम उपयोग किया जा सकता है ।

जल संरक्षण संबंधी उनके इन प्रयासों का आज भी महाराष्ट्र में उल्लेख किया जाता है । आमिर खान की पहल भी इसी से प्रेरित लगती है जिसका उल्लेख उन्होंने अपने फेसबुक लाइव में किया था ।

हर बार की तरह इस बार भी ज्योतिबा के इन कार्य की  सनातनियों द्वारा तीखी आलोचना हुई थी । लेकिन ज्योतिबा कब मानने वाले थे । उन्हें तो ऐसा हर काम डंके की चोट पर करना था , जो पारंपरिक अन्यायपूर्ण रूढ़ियों को तोड़ सके ।
8.
' जब ज्योतिबा ने दूसरी शादी से किया इनकार...
आखिरी पोस्ट '

ज्योतिबा को लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई थी । उनके पिता गोविंदराव की उम्र ढल रही थी । वे चाहते थे कि अगर संतान न हो तो ज्योतिबा दूसरी शादी कर लें । उस समय ऐसा करना बेहद आम बात थी । उन्होंने ज्योतिबा के ससुराल वालों को भी इसके लिए मना लिया था । लेकिन ज्योतिबा ने इसके लिए स्पष्ट मना कर दिया । उस समय उन्होंने जो कहा वो आज भी प्रासंगिक है -

' संतान नहीं होती इसलिए किसी भी स्त्री को बांझ कहना बहुत बड़ी निर्दयता है । संभव है , उसके पति में दोष हो । ऐसी स्थिति में अगर वह स्त्री कहे कि मुझे दूसरा पुरुष करना है तो उस पुरुष पर क्या बीतेगी ? '

सिर्फ संतानोत्पत्ति के लिए दूसरा विवाह करने की प्रथा ज्योतिबा को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी । उन्होंने आखिर तक अपने पिता और सगे संबंधियों की बात नहीं मानी और दूसरा विवाह नहीं किया ।

फिर , सवाल उठता है कि यशवंत कौन था ?

उनके गोद लिए हुए पुत्र ' यशवंत ' की कहानी दिलचस्प है । लेकिन उनसे पहले ज्योतिबा द्वारा स्थापित ' बालहत्या प्रतिबंध गृह ' के बारे में जान लेते हैं ।

उन दिनों विधवाओं की स्थिति बहुत दयनीय थी , खासकर ब्राह्मण विधवाओं की । 25 जुलाई , 1859 को सरकार ने विधवा विवाह कानून पारित किया था लेकिन उससे विधवाओं की सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ । दूसरी ओर बालहत्या की बढ़ती दर भी चिंताजनक थी ।

ज्योतिबा ने 1863 में एक बालहत्या प्रतिबंधक गृह शुरू किया । वहां कोई भी विधवा आकर बच्चा पैदा कर सकती थी । इससे पूर्व ऐसे बच्चों की लोकलाज के डर से हत्या कर दी जाती थी या ऐसी विधवाएं आत्महत्या कर लेती थीं । ज्योतिबा ने इस गृह के बड़े बड़े पोस्टर हर जगह लगवाए । उन पर लिखा था -

" विधवाओं , यहां अनाम रहकर निर्विघ्न जचगी कीजिये । अपना बच्चा साथ ले जाएं या यही पर रख दें यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा । यहां रखे बच्चों की देखभाल अनाथाश्रम करेगा । "

यह घटना सनातनियों के घर में बम फूटने जैसी थी । वे आपे से बाहर हो गए ।

" क्या समझता है ये आदमी अपने आप को ? होता कौन है ऐसा अनाथाश्रम बनाने वाला ? वे जानते थे ज्योतिबा के अलावा ऐसा करने वाला कोई और नहीं हो सकता लेकिन वे उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते थे ।

यह बालहत्या प्रतिबंधक गृह एक गैर ब्राह्मण और शूद्र माने जाने वाले ज्योतिबा द्वारा मुख्यतः ब्राह्मणों की विधवाओं के लिए शुरू किया गया था । लेकिन विडंबना देखिए कि इसका सबसे ज्यादा विरोध ब्राह्मणों ने ही किया ।

इस घटना से इतर एक और घटना घटी ।  पूना के गंजपेठ में केशोपन्त सिन्दी के घर में रहने वाली एक ब्राह्मण विधवा युवती काशीबाई , जो वेश्यावृत्ति की राह पर भटका दी गयी थी ,  ज्योतिबा और सावित्री से मिली । काशीबाई गर्भवती थी और आत्महत्या करने जा रही थी । लेकिन ज्योतिबा और सावित्री ने उसे बचा लिया । इसी काशी से यशवंत का जन्म हुआ जिसे फुले दंपत्ति ने गोद लिया । उन्होंने उसे पुत्र मानकर उसका पालन पोषण किया । 10 जुलाई , 1887 को ज्योतिबा ने अपनी वसीयत बनाई और उसमें यशवंत को विधिवत पुत्र के सारे अधिकार दिए ।

यशवंत ज्योतिबा के मानस पुत्र थे । उनमें भी ज्योतिबा की तरह प्रगतिशीलता ,  सेवाभाव और त्याग की भावना थी । उनकी मृत्यु अपनी माता सावित्री के साथ तब हुई जब प्लेग पीड़ितों का इलाज करने के दौरान अपनी मां के साथ वह भी प्लेग का शिकार हो गए ।

ज्योतिबा ने अपनी पत्नी के साथ - साथ बेटे और बहू को भी पढ़ाया । जीवन के अंत समय में 1890 के आसपास उन्हें लकवा मार गया था । इस अवस्था में भी उनके अंदर इतना जुनून था कि उन्होंने बाएं हाथ से " सार्वजनिक सत्यधर्म " नामक पुस्तक लिखी जो उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद प्रकाशित हुई ।

28 नवम्बर , 1890 को युगपुरुष महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु हुई । उनके गुजरने के वर्षो बाद भी आज उनकी शिक्षा , उनके विचार , उनका जीवन , सब कुछ हमारे लिए अनुकरणीय और मार्गदर्शक है । हम और हमारी आने वाली पीढियां उनके जीवन और विचारों को हमेशा अपने हृदय में संजो कर रखेंगी ।

आज की सीरीज का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि महात्मा ज्योतिबा के जीवन और कार्यों की छोटी सी झलक आप लोगों तक पहुंच सके ।

नमन ..उस महान नायक को.
शेतकर्याची आसुड (किसान का चाबुक) - जोतीराव फुले
(फुले जन्मदिवस पर उनकी 'किसान का कोडा' पुस्तक पर यह पुराना लेख फिर से प्रस्तुत है)

जोतीराव (जोतीबा) फुले 19वीं सदी के भारत के अग्रणी चिंतक थे, जिन्होंने भारतीय समाज को सदियों से जकड़े जातिगत और स्त्री उत्पीड़न के ब्राह्मणवादी विचार के विरुद्ध संघर्ष को आधुनिक समता बंधुत्व स्वतंत्रता की जनवादी दृष्टि से वैचारिक-सैद्धांतिक आधार प्रदान किया; सबसे पहले सभी के लिए मुफ्त सार्वजनिक शिक्षा का सवाल उठाया, औपनिवेशिक व्यवस्था में किसान-दस्तकार समुदायों के निर्मम शोषण का प्रथम विस्तृत विवरण भी लिखा एवं श्रमिकों को संगठित करने के प्रथम प्रयास किये। पर अभी भी ज्यादा लोग फुले के लेखन से परिचित नहीं हैं। 1873 में लिखित 'गुलामगिरी' को तो कुछ हद तक जाना-पढ़ा भी गया है, पर 1883 में लिखित उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण 'किसान का चाबुक' को बहुत कम जाना जाता है। इस पुस्तक का संक्षिप्त परिचय और आलोचना यहाँ प्रस्तुत है।
परिप्रेक्ष्य के लिए यह जानना जरुरी है कि अपनी युवावस्था के आरम्भ में ही फुले यूरोप-अमेरिका के 18वीं सदी की बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रांतियों के अग्रणी मानवतावादी चिंतकों के विचारों से परिचित हो चुके थे। इनमें भी मानव समानता और मुक्ति के सबसे क्रांतिकारी चिंतक थॉमस पेन की 'राइट्स ऑफ़ मैन' फुले 1847 में पढ़ चुके थे और समता, बंधुत्व, मानव स्वतंत्रता के रेडिकल विचार उनके प्रेरणा स्रोत बन चुके थे। यूरोपीय विचारकों के इन विचारों से प्रभावित फुले भारत में यूरोपीय शासन की एक प्रगतिशील भूमिका मानते थे। पर इसके ठीक विपरीत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन तंत्र द्वारा भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को मान्यता-संरक्षण और शासन चलाने के लिए उसके साथ किये गठजोड़ का यथार्थ अनुभव उनके दिमाग में बहुत सारे प्रश्न भी खड़े कर रहा था। औपनिवेशिक शासन की शोषणकारी नीतियों द्वारा शूद्र-अतिशूद्र किसान, दस्तकार और मजदूर समुदायों के जीवन में आई भारी तबाही-विपत्ति भी उनके सामने   क्रमश आगे 


निज़ामुद्दीन में हुआ तबलीगी मरकज़ी सम्मेलन बिल्ली के भाग से छींका सरीखा

निज़ामुद्दीन में हुआ तबलीगी मरकज़ी सम्मेलन बिल्ली के भाग से छींका सरीखा

11-Apr-2020

निज़ामुद्दीन में हुआ तबलीगी मरकज़ी सम्मेलन बिल्ली के भाग से छींका सरीखा रहा। इस बात में कोई शक नहीं कि आयोजकों को इस पर ज़रूर गौर करना चाहिए था। इससे जुड़ा एक दूसरा सच भी है लेकिन मुख्यधारा के मीडिया और आईटी सेल की बमबारी ने लोगों के कान सुन्न कर उस दिशा में सोचने ही नहीं दिया। मसलन 13-15 मार्च को आयोजित इस सम्मेलन से एक दिन पहले भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक बयान आता है जिसमें वह कोरोना को लेकर किसी आपात स्थिति के न होने की घोषणा करता है। और ठीक उसी दौरान और लॉकडाउन लागू होने से पहले तक इसी तरह के देश में तमाम आयोजन और सम्मेलन होते रहे। अगर सरकार चाहती तो 25 मार्च को आयोजकों द्वारा लोगों को निकालने के आवेदन पर अमल कर सभी को जाँच के बाद क्वारंटाइन करने के ज़रिये आराम से चुपचाप बग़ैर मुद्दा बनाए उनके गंतव्यों तक पहुँचा सकती थी। जैसा कि उसने वैष्णो देवी से लेकर हरिद्वार में फँसे हज़ारों गुजराती लोगों के साथ किया।

आगे बढ़ने से पहले यहाँ यह बात जान लेना ज़रूरी है कि बाहर के देशों में कोरोना की स्थिति और उसकी गंभीरता का मूल्यांकन देश में किसी नागरिक से ज्यादा सरकार और उसके विदेश मंत्रालय को होना चाहिए था। और अगर उसको इसमें कोई ख़तरा दिखा था तो उसे तत्काल बाहर से आने वाले सभी लोगों का वीज़ा रद्द कर देना चाहिए था। घर में बुलाने के बाद उन्हें तरह-तरह से अपमानित और जलील करने का जो रास्ता सरकार ने चुना वह किसी भी सभ्य और आधुनिक देश के लिए शोभा नहीं देता है।  ऐसा नहीं है कि सरकार को तबलीगी के इस आयोजन के बारे में नहीं पता था। अगर उनको निकालने की कोई व्यवस्था नहीं की गयी तो यह एक सोची समझी रणनीति थी। गृहमंत्री अमित शाह ऐसे ही नहीं अंडरग्राउंड थे। उस समय गृहमंत्रालय में उन्हीं सारी चीजों पर काम हो रहा था। और फिर तबलीगी विस्फोट हुआ। पूरा लैपडाग मीडिया से लेकर आईटी सेल तक कोरोना को मुस्लिम बनाने में जुट गए। और जिस सरकार को देश के बाहर से आए 15 लाख लोगों की टेस्टिंग की कोई फिक्र नहीं थी उसने खोज-खोज कर तबलीगियों की टेस्टिंग का राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा दिया।

माहौल इस तरह से बनाया गया जैसे तबलीगी न केवल कोरोना बाहर से ले आए बल्कि देशभर में उसको फैलाने का भी उन्होंने ही काम किया। सच तो यह है कि सरकार ने टेस्टिंग ही बहुत कम की है। यह सब कुछ इसलिए किया गया जिससे आँकड़े को नियंत्रित किया जा सके। ऊपर से एक दौर में जब केवल तबलीगी लोगों की ही घेर-घेर कर टेस्टिंग की जाएगी तो स्वाभाविक तौर पर उनकी संख्या ज़्यादा निकलेगी। लेकिन लोग इस बात को नहीं समझ पाते। क्योंकि उन्हें जो दिखाया जाता है वो उतना ही देख पाते हैं।  अब जबकि देश में एक स्तर पर सरकार और उसका गोदी मीडिया इस बात को तक़रीबन स्थापित करने में सफल रहा कि तबलीगी ही कोरोना के लिए असल ज़िम्मेदार हैं तो अब सरकार ने टेस्टिंग तेज़ कर दी है। और आने वाले दिनों में अगर यह संख्या आगे बढ़ती भी है तो उसे मुसलमानों के मत्थे मढ़ने की पूरी कोशिश की जाएगी।

मुस्लिम तबके के ख़िलाफ़ नफ़रत और घृणा का यह अभियान यहीं तक सीमित नहीं रहा। बाद में उनके अस्पतालों में बंद रहने से लेकर राह चलते उनके व्यवहार संबंधी जो तमाम तरह की अश्लील और अमानवीय हरकतें प्रचारित की गयी उससे उनके ख़िलाफ़ इस घृणा को और ऊँचाई देने का मौक़ा मिला। इसमें अस्पताल में नर्सों के साथ व्यवहार लेकर सब्ज़ियों और नोटों को थूक लगाकर देने जैसी तमाम चीजें शामिल थीं। यहां तक कि इलाहाबाद में एक हिंदू शख़्स की मुसलमानों द्वारा हत्या तक की ख़बर चला दी गयी जिसका बाद में पुलिस ने खंडन किया।  दरअसल आरएसएस मुस्लिम तबके को उसके घुटनों के बल ला देना चाहता है। इस कड़ी में वह सामाजिक और राजनीतिक तौर पर उन्हें हाशिये पर फेंकने में सफल रहा है। लेकिन उसे आख़िरी तौर पर यह सफलता तभी मिलेगी जब वह उनको आर्थिक रूप से भी पंगु बना दे। उसके बाद विभिन्न कालोनियों और लोगों द्वारा मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार का जो आह्वान सामने आया वह इसी श्रृंखला का एक हिस्सा था। किसी को लग सकता है कि यह सब कुछ स्वत:स्फूर्त ढंग से होता है। लेकिन हमें इतना भोला नहीं होना चाहिए।

अगर यह सब कुछ अपने आप होता तो लिंचिंग पूरे देश में अभी जारी रहती। और गोहत्या का प्रश्न भी उसी तरीक़े से बना रहता जैसा कि आज से कुछ महीनों पहले था। यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ हो गयी है कि किस समय क्या एजेंडा और उसे कैसे चलाना है यह सब कुछ इन दक्षिणपंथी एजेंसियों द्वारा तय किया जाता है और फिर उनके हाइड्रा संगठन उस काम में जोर-शोर से जुट जाते हैं। संकट और महामारी के इस दौर में भी आरएसएस अपने एजेंडे के साथ सक्रिय है। मोदी और संघ दोनों आपसी सहमति से कार्यक्रम बना रहे हैं। संघ पर्दे के पीछे ज़मीनी स्तर पर सक्रिय है तो मोदी उसका चेहरा हैं। यह कार्य विभाजन कोई नया नहीं है पिछले छह सालों से यही सिस्टम चल रहा है। आम तौर पर विचारधाराओं का लक्ष्य मानवता का कल्याण होता है। लेकिन यह विचारधारा किस तरह से मानव विरोधी है उसका यह एक उदाहरण है। एक ऐसे समय में जबकि मानवता पर चौतरफा संकट आया हुआ है तो वह सभी को एक इंसान की जगह धर्म के सांप्रदायिक चश्मे से देख रही है।

मदद करने की जगह आर्थिक बहिष्कार करवा रही है। दरअसल इनका किसी धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। यह एक फ़ासिस्ट ताक़त है जो धर्म का अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रही है। और कम से कम हिंदू धर्म का हित चाहने वालों को ज़रूर एक बार सोचना चाहिए कि अगर उनके धर्म की उसके साथ पहचान जुड़ गयी तो फिर उसका क्या नतीजा होगा। वह न केवल मानव विरोधी घोषित हो जाएगा बल्कि संकट और विपत्ति की स्थिति में भी घृणा और नफ़रत का वाहक करार दिया जाने लगेगा। इससे संघ का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन हिंदू धर्म का बहुत बड़ा नुक़सान होगा जिसकी भरपाई कर पाना हिंदू धर्म की आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मुश्किल हो जाएगा। 
असीम मुन्ना यू पी  FACEBOOK 


कोरोना: दारुल उलूम देवबन्द और दारुल उलूम वक़्फ़ के छात्रों की हुई थर्मल स्क्रीनिंग,जानिए क्या आई रिपोर्ट।

कोरोना: दारुल उलूम देवबन्द और दारुल उलूम वक़्फ़ के छात्रों की हुई थर्मल स्क्रीनिंग,जानिए क्या आई रिपोर्ट।

11-Apr-2020

सै क़ासिम लखनऊ 
देवबन्द।इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबन्द और दारुल उलूम वक़्फ़ देवबन्द में शुक्रवार को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने 2367 छात्रों का स्वास्थ्य परीक्षण किया। यह वो छात्र हैं जो लॉकडाउन के चलते अपने घरों को नहीं जा सके। सीएमओ ने बताया कि थर्मल स्क्रीनिंग में सभी छात्र स्वस्थ मिले।प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने शुक्रवार को सीएमओ के नेतृत्व में दारुल उलूम और वक्फ दारुल उलूम देवबन्द के छात्रों की थर्मल स्कैनिंग की। जिस में तमाम छात्र स्वास्थ्य पाए गए। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग की टीम ने छात्रों को सुरक्षित रहने और सोशल डिस्टेंगि समेत अन्य टिप्स दिए।सीएमओ डा. बीएस सोढ़ी के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग के टीम ने दारुल उलूम और वक्फ दारुल उलूम देवबन्द पहुँची छात्रों की थर्मल स्कैनिंग की। थर्मल स्कैनिंग में छात्र प्रथम दृष्टया में स्वस्थ पाए गए। हालांकि टीम ने उनसे जानकारी चाही कि जनवरी माह के बाद वह कहां-कहां गए। सभी छात्रों ने बताया कि वार्षिक परीक्षा की तैयारी के चलते वह इस दौरान कहीं आ जा नहीं सके इस दौरान वह संस्था में ही रहे।दारुल उलूम और दारुल उलूम वक्फ प्रबंधतंत्र ने बृहस्पतिवार जिला प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग को पत्र भेजकर संस्था में रुके छात्रों का एहतियात के तौर पर स्वास्थ्य परीक्षण कराए जाने की मांग की थी।जिसके चलते शुक्रवार को सीएमओ डा. बीएस सोढ़ी के नेतृत्व में दोनों संस्थाओं में स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची। जहां डिप्टी सीएमओ डा. अथर जमील के नेतृत्व में अलग अलग स्थानों पर काउंटर लगाकर छात्रों की जांच की गई।साथ ही चिकित्सकों ने छात्रों को कोरोना वायरस और उससे बचाव को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी। चिकित्सकों ने सोशल डिस्टेंसिंग रखने पर अधिक जोर दिया। सीएमओ डा. बीएस सोढी ने बताया कि दोनों संस्थाओं के जिम्मेदारों की अपील पर स्वास्थ्य विभाग की टीम यहां छात्रों के स्वास्थ्य की जांच करने पहुंची। मुख्य रुप से छात्रों के शरीर का तापमान चेक किया गया। उनके मुताबिक दारुल उलूम में 1942 व दारुल उलूम वक्फ में 425 छात्रों की थर्मल स्क्रीनिंग की गई। साथ पूरी तरह स्वस्थ पाए गए।

 


कोरोना महामारी को लेकर मुख्यमंत्री ने प्रतिपक्ष के नेता, पूर्व मुख्यमंत्री सहित अनेक विधायकों से की रायशुमारी

कोरोना महामारी को लेकर मुख्यमंत्री ने प्रतिपक्ष के नेता, पूर्व मुख्यमंत्री सहित अनेक विधायकों से की रायशुमारी

10-Apr-2020

TNIS

मुख्यमंत्री ने कहा: गरीब और कमजोर तबकों की जरूरतों का
रखा जा रहा विशेष ख्याल

 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज प्रतिपक्ष के नेता श्री धमरमलाल कौशिक, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, पूर्व मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल, विधायक श्री धर्मजीत सिह, और श्री मोहन मरकाम सहित अनेक विधायकों से दूरभाष से चर्चा की और उनके क्षेत्रों का हालचाल जाना तथा लॉकडाउन के दौरान प्रदेश में की गई व्यवस्थाओं और 14 अप्रैल के बाद की स्थिति पर चर्चा कर उनके सुझाव लिये। मुख्यमंत्री ने प्रदेश में कोरोना वायरस (कोविड19) के संक्रमण और रोकथाम के लिए प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान की गई व्यवस्थाओं पर विस्तार से चर्चा की।
मुख्यमंत्री श्री बघेल ने प्रतिपक्ष के नेता श्री धरमलाल कौशिक और पूर्व मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह सहित विधायकों से दूरभाष पर चर्चा में लॉकडाउन के दौरान उनके क्षेत्रों के हालचाल सहित गरीब और कमजोर तबकों के लिए किए गए राहत उपायों पर विचार-विमर्श किया। मुख्यमंत्री ने बताया कि सभी वर्गो के हितों का ख्याल रखा जा रहा है। राशन, दवाई, सहित सभी आवश्यक व्यवस्था को लॉकडाउन से मुक्त रखा गया है। 
मुख्यमंत्री ने बताया कि गरीब परिवारों को दो माह का निःशुल्क राशन का वितरण किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंदों के लिए प्रत्येक पंचायतों में दो-दो क्विंटल अनाज रखा गया है। इसके अलावा स्वयंसेवी संगठनों और औद्योगिक समूहों के सहयोग से भोजन की व्यवस्था की जा रही है।  रायपुर शहर में डोनेशन आन व्हील्स अभियान चलाया जा रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए गांवों में भी सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। कई गांवों में बेरियर बनाकर निगरानी रखी जा रही है। रबी फसलों की कटाई के दौरान भी सोशल डिस्टेंसिग का पालन करने को कहा गया है। 
       आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए वाहनों को ऐप के माध्यम से ई-पास की व्यवस्था की गई है। अन्य राज्यों से आने वाले श्रमिकों को राज्य की सीमा के नजदीक ही उनके लिए भोजन और आवास की व्यवस्था की गई है। इसी प्रकार अन्य राज्यों में फंसे श्रमिकों को सहायता मुहैया कराई जा रही है। सभी कलेक्टरों को श्रमिकों के भोजन आवास सहित अन्य जरूरी व्यवस्था के लिए संबंधित राज्यों के कलेक्टरों से समन्वय कर आवश्यक इंतजाम करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा अन्य जरूरतों के लिए सहायता राशि उनके खातों में भेजी जा रही है।
      मुख्यमंत्री ने बताया कि कोरोना वायरस के परीक्षण के लिए एम्स रायपुर के अलावा जगदलपुर में परीक्षण की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा सभी जिलों में कोरोना संक्रमण से पीडि़त लोगों के इलाज के लिए सौ-सौ बेड की व्यवस्था की जा रही है। अंबेडकर स्मृति चिकित्सालय में 500 बेड और माना सिविल अस्पताल में 100 बेड और प्रदेश के अन्य मेडिकल कालेज में 200-200 बेड की व्यवस्था की जा रही है। 
     मुख्यमंत्री ने दुर्ग शहर के विधायक श्री अरूण वोरा, भिलाई नगर के विधायक श्री देवेन्द्र यादव, सिहावा की विधायक श्रीमती डॉ. लक्ष्मी धु्रव, खुज्जी की विधायक श्रीमती छन्नी साहू, संजारी बालोद की विधायक श्रीमती संगीता सिन्हा, गुण्डर देही के विधायक श्री कुंवर सिंह निषाद, पंडारिया की विधायक श्रीमती ममता चंद्राकर, डोंगरगढ़ के विधायक श्री भुवनेश्वर बघेल, डोंगरगांव के विधायक श्री दलेश्वर साहू, मोेहला मानपुर के विधायक श्री इंद्रशाह मंडावी, भानुप्रतापपुर के विधायक श्री मनोज सिंह मंडावी, नारायणपुर के विधायक श्री चंदन कश्यप और चित्रकोट के विधायक श्री राजमन बैंजाम से चर्चा की।

 


सलमान खान ने 16 हजार मजदूरों के खाते में जमा कराए  कुल 4 करोड़ 80 लाख रुपये  !

सलमान खान ने 16 हजार मजदूरों के खाते में जमा कराए कुल 4 करोड़ 80 लाख रुपये !

09-Apr-2020


एक बार जब मैंने कमिटमेंट कर दी, उसके बाद तो मैं खुद की भी नहीं सुनता। सलमान खान ने फिल्म वॉन्टेड में ये डायलॉग मारा था। हालांकि सलमान ने रियल लाइफ में भी इस डायलॉग को पूरा किया। दरअसल, सलमान ने कुछ दिनों पहले ये घोषणा की थी कि वह लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हो चुके इंडस्ट्री के दिहाड़ी मजदूरों की मदद करेंगे। अब मंगलवार को सलमान ने अपना ये वादा पूरा किया। उन्होंने 16 हजार मजदूरों के बैंक अकाउंट में कुल 4 करोड़ 80 लाख रुपये ट्रांसफर किए हैं।

इतना ही नहीं, सलमान ने अगले महीने मई में भी 19000 मजदूरों के अकाउंट में 5 करोड़ 70 लाख रुपये ट्रांसफर करने का वादा किया है। तो इस तरह से सलमान 2 महीने में मजदूरों की कुल 10 करोड़ 50 लाख रुपये तक की मदद करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सलमान खान फिल्म्स प्रोडक्शन ने फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलॉयीज के जनरल सेकेट्री अशोक दुबे से मजदूरों के अकाउंट नंबर मांगे थे। सोमवार 6 अप्रैल को सलमान को 19000 मजदूरों का बैंक डिटेल्स दिया गया।  इसके बाद सलमान की टीम ने तेजी से 7 अप्रैल की शाम तक 16000 मजदूरों के अकाउंट में प्रति मजदूर 3000 रुपये जमा कराए।

अशोक दुबे ने एबीपी न्यूज से बात करते हुए बताया कि सलमान ने मुझे चार दिन पहले फोन करके दिहाड़ी मजदूरों को राशन-पानी भी अलग से उपलब्ध कराने के लिए कहा था।

सियासत डॉट कॉम 


भारत में सिर्फ़ 24 घंटों में कोविड-19 के 540 नए मामले दर्ज हुए!

भारत में सिर्फ़ 24 घंटों में कोविड-19 के 540 नए मामले दर्ज हुए!

09-Apr-2020

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में देश में कोविड-19 के 540 नए मामले दर्ज हुए हैं।

एजेंसी की  खबर के अनुसार, इस दौरान 17 लोगों की मौत हुई। भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का आंकड़ा 5734 पहुंच गया है। वहीं, इस जानलेवा वायरस से अब तक 166 लोगों की मौत हो चुकी है।

 हालांकि, 473 लोग अब तक ठीक भी हो चुके हैं। इस तरह भारत में कोरोना वायरस के मौजूदा केस 5095 हैं। देशभर में लॉकडाउन के बावजूद मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसलिए उत्‍तर प्रदेश, मध्‍यप्रदेश और दिल्ली के कुछ हॉटस्पॉट को पूरी तरह से सील कर दिया गया है।
भारत में अब कोरोना वायरस की जांच में तेजी आई है, इससे भी मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के मुताबिक, देश में अब तक 1,21,271 लोगों की जांच की गई है।

 गलवार को एक दिन में 13,345 जांच की गई, जिसमें से 2,267 जांच निजी लैबों में हुई। आइसीएमआर के तहत 139 लैब संचालित हैं, जबकि 65 निजी लैब को भी जांच करने की अनुमति दी गई है।

 आइसीएमआर ने सभी सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों से भी कोरोना जांच की सुविधा स्थापित करने के लिए लाइसेंस के लिए आवेदन करने को कहा है।

 गौरतलब है कि दुनियाभर में कोरोना वायरस(COVID-19) से संक्रमित मरीजों का आंकड़ा 15 लाख के पार पहुंच गया है। अब तक कुल 1,500,830 लोग इस जानलेवा वायरस की गिरफ्त में आ चुके हैं और ये आंकड़ा लगातार बड़ी तेजी से बढ़ रहा है।

 वहीं, कोविड-19 से संक्रमित होकर मारे जाने वाले लोगों का आंकड़ा 87,706 पहुंच गया है। सबसे ज्‍यादा मामले अमेरिका(423,135 ) में सामने आए हैं। इसके बाद स्‍पेन(146,690) और इटली(139,422) का नंबर है।

 


विश्व स्वास्थ्य दिवस पर सन्नाटा क्यूं?

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर सन्नाटा क्यूं?

08-Apr-2020


आज विश्व के सैंकड़ों  देश कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं और ऐसे समय में सात अप्रैल को मनाया जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। आज दुनियाभर के स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की सेवा में और उनकी जान बचाने में लगे हैं। भारत में भी चिकित्सक, स्वास्थ्य कर्मी, पुलिस प्रशासन जनता की सेवा में लगा है।
हर साल सात अप्रैल की तारीख को विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज ही के दिन यानी 7 अप्रैल 1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना हुई थी और इस दिवस की शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ही साल 1950 में की गई थी। हर साल 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्थापना दिवस की वर्षगांठ पर विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। 
कोरोनावायरस संक्रमण के समय में विश्व स्वास्थ्य दिवस का महत्व बहुत बढ़ जाता है। ऐसे में जनता को विश्व स्वास्थ्य दिवस पर संबोधित करना मेरे हिसाब से बहुत आवश्यक है। मगर अफसोस कि हम विश्व स्वास्थ्य दिवस पर अपने मुखिया के मन की बात नहीं जान पाये। ट्वीट से काम हो गया।
विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने की शुरुआत साल 1950 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्वास्थ्य और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार-विमर्श करना है। पूरे विश्व में  स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के बारे में जागरूकता फैलाने के साथ ही स्वास्थ्य संबंधी अफवाहों और मिथकों को दूर करना भी इसका उद्देश्य है। विश्व स्वस्थ्य संगठन की ओर से ही विभिन्न देशों की सरकारों को स्वास्थ्य नीतियां बनाने और उसके क्रियान्वयन के लिए प्रेरित किया जाता है।
क्या हमारे देश की जनता को प्रेरित करने की जरूरत नहीं है? क्या हमको ताली थाली दिया बाती यही समझ में आता है! क्या हमको चिकित्सा प्रणाली के बारे में जानने की जरूरत नहीं है! क्या हमको हाईजीन बताने का वक्त नहीं है?
आज पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है। इस मौके पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मचारियों का आभार जताया है। उन्होंने लोगों से सामाजिक दूरी का पालन करने का आग्रह किया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने एक वीडियो भी शेयर किया है। जिसमें फिल्म जगत के अभिनेता और अभिनेत्री नजर आ रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने ट्वीट करते हुए लिखा, 'आज विश्व स्वास्थ्य दिवस के मौके पर आइए हम न केवल एक दूसरे के अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण के लिए प्रार्थना करें बल्कि उन सभी डॉक्टरों, नर्सों, चिकित्सा कर्मचारियों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें, जो बहादुरी से कोविड-19 खतरे के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं।' मात्र एक ट्वीट से इतिश्री। 
सिर्फ प्रार्थना करने से अगर हल निकलता तो मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे बंद ना होते।
आभार, धन्यवाद और कृतज्ञता तो ताली, थाली और ना जाने क्या क्या पीट कर, दिया, मोमबत्ती और ना जाने क्या क्या जलाकर व्यक्त कर दिया है। चिकित्सक, पुलिस प्रशासन तो भगवान के देवदूत की तरह लोगों की रक्षा में लगा हुआ है।  आभार, धन्यवाद और कृतज्ञता के साथ साथ इन्हें सुरक्षा की जरूरत है, मास्क की जरूरत है, किट की जरूरत है। अभी हमें सचेत रहने की जरूरत है। लोगों को खाने पानी की जरूरत है, अनाज की जरूरत है। अन्न के लिए धन की जरूरत है। धन देने के लिए पवित्र मन की जरूरत है। 
जो हालात आसपास दिखाई दे रहे हैं उससे तो यही लग रहा है कि ट्रस्ट, सोसायटी, फाउंडेशन यदि ना हों तो सब भूखे मर जायें। इनके द्वारा जो कार्य किया जा रहा है उसकी प्रशंसा के लिए शब्द छोटे हैं। ऊपर से जनता को देने के बजाय दान की अपील! टैक्स, टैक्स के ऊपर टैक्स, क्या क्या लेंगे? नोटबंदी से ले लिया, जी एस टी से ले लिया, घरबंदी से ले लिया! अब जान बची है। रोती , बिलखती, सिसकती हुई जान। जो कोरोना लेने पर तुला है। 
इस मौके पर मैं मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना ज़रूर करूंगा कि जिस उन्होंने तरह सख्ती के साथ और मेहनत से प्रशासन को दिशा निर्देश दिए हैं वह काबिले तारीफ है।
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर देशवासियों से यही आग्रह है कि हर कीमत पर घर में ही रहने की कोशिश करें।
क्यूंकि जान है तो जहान है।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 

 


दुनिया के इन 18 देशों में नहीं पड़ा  कोरोना का कोई असर!

दुनिया के इन 18 देशों में नहीं पड़ा कोरोना का कोई असर!

07-Apr-2020

बीते साल दिसंबर महीने में चीन के वुहान शहर से कोरोना वायरस का शुरूआत हुई थी और देखते ही देखते यह वारयस पूरे विश्व में फैल गया।

हालांकि 12 जनवरी तक केवल चीन में ही इस वायरस से संक्रमित लोग थे लेकिन 13 जनवरी तक जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसकी चपेट में आ गए।
इस वायरस के कारण अभी तक पूरे विश्व में 59 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 11 लाख से अधिक लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके है।

इटली, स्पेन, अमेरिका जैसे देशों में इस वायरस का कहर देखने को मिल रहा है, अस्पतालों में हर दिन कोरोना वायरस से संक्रमित हजारों लोग अस्पताल पहुंच रहे हैं, ऐसे में कोई यह सोचेगा भी नहीं कि विश्व में कोई ऐसा देश होगा जहां कोरोना वायरस का एक भी मामला सामने नहीं आया होगा।

 आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन विश्व में 18 ऐसे देश ऐसे हैं जहां कोरोना वायरस का एक भी मामला सामने नहीं आया है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 सदस्य देश हैं और उसमें से 18 देश ऐसे हैं जहां अभी तक कोरोना वायरस से संक्रमित एक भी व्यक्ति सामने नहीं आया है।

कोविड-19: दुनिया के इन 18 देशों में नहीं पड़ा कोई असर! 1
रिपोर्ट की मानें तो जिन देशों में कोरोना वायरस का एक भी मामला सामने नहीं आया हैं उसमें कोमोरोस, किरिबाती, लेसोथो, मार्शल आइलैंड, माइक्रोनेशिया, नाउरू, उत्तर कोरिया, पलाऊ, समोआ, साओ टोमे और प्रिंसिपे, सोलोमन आइलैंड, दक्षिण सूडान, तजाकिस्तान, टोंगा, तुर्कमेनिस्तान, तुवालु, वानुअतु और यमन हैं।

 साभार- कैच हिन्दी


कोरोना वायरस- मुसलमानों को लेकर असदुद्दीन ओवैसी का ये ट्वीट हो रहा है काफी वायरल

कोरोना वायरस- मुसलमानों को लेकर असदुद्दीन ओवैसी का ये ट्वीट हो रहा है काफी वायरल

07-Apr-2020

कोरोना वायरस का प्रकोप देश में तेजी से फैल रहा है, अब तक 100 से ज्यादा लोगों की इसकी चपेट में आकर मौत हो गई है. वहीं दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के लोगों के काफी संख्या में कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद इस मुद्दे पर देशभर में बहस छिड़ गई है. इसे लेकर दिल्ली के शास्त्री नगर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ.

इस वीडियो में कथित तौर पर वहां के निवासी किसी भी मुसलमान को कॉलोनी में रोक लगाने की बात कर रहे हैं. यह वीडियो सामने आने के बाद AIMIM पार्टी सानिया अहमद नामक ट्विटर यूजर के पोस्ट पर रिप्लाई देते हुए ओवैसी ने लिखा, “दिल्ली के शास्त्री नगर इलाके के बी ब्लॉक के निवासी मुसलमानों को बाहर निकाल रहे हैं. वह मोहम्मडन्स से परे सोच नहीं सकते. क्या हम एक वैश्विक महामारी के बीच में हैं? यह आम दिनों की तरह है जहां बिना कारण कोई मुसलमानों को धमका सकता है और इससे दूर हो सकता है?”
कोरोना वायरस- मुसलमानों को लेकर असदुद्दीन ओवैसी का ये ट्वीट हो रहा है काफी वायरल 1


 
गौरतलब है कि कोरोना वायरस संक्रमण के बीच दिल्ली में तबलीगी जमात का एक कार्यक्रम हुआ था.  लॉकडाउन के दौरान इस कार्यक्रम के बाद निजामुद्दीन मरकज में 2300 के करीब मुसलमानों के एक साथ होने का खुलासा हुआ था. इसके बाद सभी को बाहर निकाला गया. इन सबको क्वारंटाइन किया गया. बताया जाता है कि कार्यक्रम में करीब 9 हजार लोग शामिल हुए थे.

के मुखिया और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने इस वीडियो के साथ एक ट्वीट किया है.


ताली, थाली के बाद दिया आतिशबाज़ी। अब भी जनता समझ जाये।

ताली, थाली के बाद दिया आतिशबाज़ी। अब भी जनता समझ जाये।

06-Apr-2020

कोरोनावायरस ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है। बड़े बड़े देश आसमान से जमीन पर आ गए। भारत पर भी इसका असर हुआ। आने वाले समय में जो होगा वह तो अलग बात है। वर्तमान में देश के हालात ने बता दिया कि यह सरकार पूरी तरह नाकाम हो चुकी है। बाहर से लाकर नागरिकता देने वाली सरकार अपने देश के गरीबों, मजदूरों और श्रमिकों को कुछ नहीं दे पा रही। लाकडाउन के बाद लाखों लोग पैदल अपने घरों को चल दिए। कितनों ने रास्ते में दम तोड़ दिया। गरीब ही गरीब के काम आ रहा है। लोग भूखे रह रहे हैं। सरकार के पास कोई प्लान नहीं है। बस आठ बजे टाइम सेट है। अबकी सुबह नौ बजे फरमान सुनाया गया। तैयारी हो या ना हो एलान होना है पालन भी होना चाहिए। क्योंकि हम भारतीय हैं। एकता का प्रदर्शन जरूरी है।
दुख की बात है कि महामारी में भी प्रचार का मौका ढूंढ लिया। वाह सब कुछ मुमकिन है ????,,,
प्रचार के लिए मोदी किट तैयार की गई है। मैंने पहले ही लिखा था कि राजनीति होगी और मेरी बात सही साबित हुई। सड़कों पर गरीब मजदूरों , श्रमिकों का उमड़ा जनसैलाब इनके दावों की हकीकत बयां कर रहे हैं।
भाजपा की मोदी सरकार पूरी तरह फेल हो गई है उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि अब क्या करें । कुछ है ही नहीं तो करेंगे क्या। अब तो थाली भी टूट गई और भूख और कमजोरी की वजह से ताली भी नहीं बज रही।
बड़े नेता घर में बैठे रामायण देख रहे हैं लेकिन अफसोस रामायण में भगवान राम के बताये मार्गों पर नहीं चल रहे हैं। यहां भी दिखावा। जब कोरोनावायरस से बचने की तैयारी करनी थी तब नेताओं के गले पड़ रहे थे,  विधायकों की खरीद-फरोख्त में व्यस्त थे और अब जब फैल गया तब सरकार बनाने में व्यस्त थे। कभी बाटी चोखा खाने में व्यस्त थे। सरकार क्या कर कर रही इससे देशभक्तों को कोई मतलब नहीं है और सवाल पूछने वाला देशद्रोही हो जायेगा। 
नौ बजे नौ मिनट दिया जलाने की बात कही गई मगर देशभक्ति दिखाने के चक्कर में ना जाने कितनी जगह आग लग गई, घर जल गये, मवेशी जल गये और कुछ मंदबुद्धि लोगों ने मशाल जुलूस निकाल कर कोरोना को भगा दिया। प्रधानमंत्री जी को सावधान रहना होगा क्यूंकि सावधानी हटी दुर्घटना घटी।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री जिस तरह शहरों का दौरा कर रहे हैं उससे केन्द्र की सरकार को सीखना चाहिए। मुख्यमंत्री के कार्यों की सराहना होनी चाहिए। प्रशासन अपनी पूरी ताकत के साथ लगा है । हां चिंता इस बात की जरुर है कि इंसान इस वक्त बुरी तरह पिस रहा है। अनगिनत लोग भूखे रह रहे हैं। प्रतिदिन कोरोनावायरस संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। मेडिकल स्टाफ को कोई सुविधा नहीं उपलब्ध है। क्या इस पर नहीं बोलना चाहिए। बोलने से पहले क्या सोचना नहीं चाहिए कि हम एक सौ तीस करोड़ लोग हैं। अगर किसी इंसान की तबीयत खराब हो तो उसके दोस्त, रिश्तेदार, खानदान वाले, पड़ोसी उसकी तन, मन और धन से मदद करते हैं कोई थाली, थाली नहीं बजाता, कोई दिया नहीं जलाता। यहां लोग मर रहे हैं और हम जश्न मना रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को जनता को ध्यान में रखते हुए कार्य देना चाहिए। क्योंकि यहां जनता बड़ी देशभक्त है। 
बहरहाल उम्मीद है अगली बार जब प्रधानमंत्री जनता को संबोधित करेंगे तो बतायेंगे कि कोरोनावायरस के नाम पर जो धन भारतवासियों द्वारा जमा हुआ और जो विश्व बैंक से प्राप्त हुआ उसका सदुपयोग कहां हुआ। यह भी बतायेंगे कि एन 95 मास्क और मेडिकल किट कितनी आयात और निर्यात हुई। जो लाखों लोग फंसे हैं उनके लिए क्या किया? ऐसे अनगिनत सवाल जो जनता के मन में हैं उसके बारे में माननीय प्रधानमंत्री जी चर्चा करेंगे।
प्रधानमंत्री के हाथों को मजबूत करें देश अपने आप मजबूत हो जायेगा।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com