भारतीय नारी कब तक रहेगी बेचारी?

भारतीय नारी कब तक रहेगी बेचारी?

06-Mar-2021

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस-8 मार्च, 2021 पर विशेष

-ललित गर्ग-

नारी का नारी के लिये सकारात्मक दृष्टिकोण न होने का ही परिणाम है कि पुरुष उसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण करता आ रहा हैं। इसी कारण नारी में हीनता एवं पराधीनता के संस्कार संक्रान्त होते रहे हैं। जिन नारियों में नारी समाज की दयनीय दशा के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति नहीं है, उन नारियों का मन स्त्री का नहीं, पुरुष का मन है, ऐसा प्रतीत होता है। अन्यथा अपने पांवों पर अपने हाथों से कुल्हाड़ी कैसे चलाई जा सकती है? अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए नारी के मन में एक नयी, उन्नायक एवं परिष्कृत सोच पनपे, वे नारियों के बारे में सोचें, अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की नारी की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझें और उसके समाधान एवं प्रतिकार के लिये कोई ठोस कदम उठायें तो नारी शोषण, उपेक्षा, उत्पीड़न एवं अन्याय का युग समाप्त हो सकता है। इसी उद्देश्य से नारी के प्रति सम्मान एवं प्रशंसा प्रकट करते हुए 8 मार्च का दिन महिला दिवस के रूप में उनके लिये निश्चित किया गया है, यह दिवस उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में, उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस से पहले और बाद में हफ्ते भर तक विचार विमर्श और गोष्ठियां होंगी जिनमें महिलाओं से जुड़े मामलों जैसे महिलाओं की स्थिति, कन्या भू्रण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गांवों में महिला की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराध को एक बार फिर चर्चा में लाकर सार्थक वातावरण का निर्माण किया जायेगा। लेकिन इन सबके बावजूद एक टीस से मन में उठती है कि आखिर नारी कब तक भोग की वस्तु बनी रहेगी? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? कब तक उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नौचा जाता रहेगा? विडम्बनापूर्ण तो यह है कि महिला दिवस जैसे आयोजन भी नारी को उचित सम्मान एवं गौरव दिलाने की बजाय उनका दुरुपयोग करने के माध्यम बनते जा रहे हैं।
महिलाओं के प्रति एक अलग तरह का नजरिया इन सालों में बनने लगा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी के संपूर्ण विकास की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अनेक योजनाएं लागू की है, जिनमें अब नारी सशक्तीकरण और सुरक्षा के अलावा और भी कई आयाम जोडे़ गए हैं। सबसे अच्छी बात इस बार यह है कि समाज की तरक्की में महिलाओं की भूमिका को आत्मसात किया जाने लगा है। आज भी आधी से अधिक महिला समाज को पुरुषवादी सोच के तहत बहुत से हकों से वंचित किया जा रहा है। वक्त बीतने के साथ सरकार को भी यह बात महसूस होने लगी है। शायद इसीलिए सरकारी योजनाओं में महिलाओं की भूमिका को अलग से चिह्नित किया जाने लगा है।
एक कहावत है कि औरत जन्मती नहीं, बना दी जाती है और कई कट्ट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं। कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई हारती रही है। इसीलिये आज की औरत को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए। पूरे पृष्ठ, जितने पुरुषों को प्राप्त हैं। पर विडम्बना है कि उसके हिस्से के पृष्ठों को धार्मिकता के नाम पर ‘धर्मग्रंथ’ एवं सामाजिकता के नाम पर ‘खाप पंचायते’ घेरे बैठे हैं। पुरुष-समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक अनियंत्रण हैं जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने एवं बेचारगी को जीने को विवश होना पड़ता है। पुरुषवर्ग नारी को देह रूप में स्वीकार करता है, लेकिन नारी को उनके सामने मस्तिष्क बनकर अपनी क्षमताओं का परिचय देना होगा, उसे अबला नहीं, सबला बनना होगा, बोझ नहीं शक्ति बनना होगा।
‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझकर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं शक्ल बदल-बदल कर काले अध्याय रच रही है। देश में गैंग रेप की वारदातों में कमी भले ही आयी हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है। आवश्यकता लोगों को इस सोच तक ले जाने की है कि जो होता आया है वह भी गलत है। महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कानूनों की कठोरता से अनुपालना एवं सरकारों में इच्छाशक्ति जरूरी है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरोध में लाए गए कानूनों से नारी उत्पीड़न में कितनी कमी आयी है, इसके कोई प्रभावी परिणाम देखने में नहीं आये हैं, लेकिन सामाजिक सोच में एक स्वतः परिवर्तन का वातावरण बन रहा है, यहां शुभ संकेत है। महिलाओं के पक्ष में जाने वाले इन शुभ संकेतों के बावजूद कई भयावह सामाजिक सच्चाइयां बदलने का नाम नहीं ले रही हैं।
देश के कई राज्यों में लिंगानुपात खतरे के निशान के करीब है। देश की राजधानी में महिलाओं के हक के लिए चाहे जितने भी नारे लगाए जाएं, लेकिन खुद दिल्ली शहर से भी बुरी खबरें आनी कम नहीं हुई हैं। तमाम राज्य सरकारों को अपनी कागजी योजनाओं से खुश होने के बजाय अपनी कमियों पर ध्यान देना होगा। योजना अपने आप में कोई गलत नहीं होती, कमी उसके क्रियान्वयन में होती है। कुछ राज्यों में बेटी की शादी पर सरकार की तरफ से एक निश्चित रकम देने की स्कीम है। इससे बेटियों की शादी का बोझ भले ही कम हो, लेकिन इससे बेटियों में हीनता की भावना भी पनपती है। ऐसी योजनाओं से शिक्षा पर अभिभावकों का ध्यान कम जाएगा। जरूरत नारी का आत्म-सम्मान एवं आत्मविश्वास कायम करने की है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की है। नारी सोच बदलने की है। उन पर जो सामाजिक दबाव बनाया जाता है उससे निकलने के लिए उनको प्रोत्साहन देना होगा। ससुराल से निकाल दिए जाने की धमकी, पति द्वारा छोड़ दिए जाने का डर, कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थलों पर भेदभाव, दोहरा नजरियां, छोटी-छोटी गलतियों पर सेवामुक्त करने की धमकी, बड़े अधिकारियों द्वारा सैक्सअल दबाब बनाने, यहां तक कि जान से मार देने की धमकी के जरिये उन पर ऐसा दबाव बनाया जाता है। इन स्थितियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है नारी को खुद हिम्मत जुटानी होगी, साहस का परिचय देना होगा लेकिन साथ ही समाज को भी अपने पूर्वाग्रह छोड़ने के लिए तैयार करना होगा। इन मुद्दों पर सरकारी और गैरसरकारी, विभिन्न स्तरों पर सकारात्मक नजरिया अपनाया जाये तो इससे न केवल महिलाओं का, बल्कि पूरे देश का संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।
रामायण रचयिता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की यह पंक्ति-‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ जन-जन के मुख से उच्चारित है। प्रारंभ से ही यहाँ ‘नारीशक्ति’ की पूजा होती आई है फिर क्यों नारी अत्याचार बढ़ रहे हैं? क्यों महिला दिवस मनाते हुए नारी अस्तित्व एवं अस्मिता को सुरक्षा देने की बात की जाती है?  क्यों उसे दिन-प्रतिदिन उपेक्षा एवं तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। इसके साथ-साथ भारतीय समाज में आई सामाजिक कुरीतियाँ जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, बहू पति विवाह और हमारी परंपरागत रूढ़िवादिता ने भी भारतीय नारी को दीन-हीन कमजोर बनाने में अहम भूमिका अदा की। बदलते परिवेश में आधुनिक महिलाओं के लिए यह आवश्यक है कि मैथिलीशरण गुप्त के इस वाक्य-“आँचल में है दूध” को सदा याद रखें। उसकी लाज को बचाएँ रखें। बल्कि एक ऐसा सेतु बने जो टूटते हुए को जोड़ सके, रुकते हुए को मोड़ सके और गिरते हुए को उठा सके। प्रेषकः-

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई0पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनरू 22727486

 


जहेज़ की कुरीतियों को दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को आगे आना होगा। सैय्यद तक़वी

जहेज़ की कुरीतियों को दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को आगे आना होगा। सैय्यद तक़वी

06-Mar-2021

जहेज़ की कुरीतियों को दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को आगे आना होगा। सैय्यद तक़वी

अभी कुछ दिन पहले साबरमती नदी में एक हादसे की खबर आई। कई दिनों से इस घटना के बारे में सुन रहा था और पढ़ रहा था और सोच रहा था कि ऐसा क्यों हुआ? इस देश में क्या हो रहा है इंसान की सोच कहां तक पहुंच गई है? किसी की बेटी ने जिंदगी से तंग आकर अपनी जान दे दी और यह परेशानी और तंगी इस बात की थी कि उससे जहेज़ का बार-बार मुतालबा किया जा रहा था आज के जमाने में जहेज़ सिर्फ वह नहीं है जो शादी के वक्त मां बाप अपनी बेटी को देते हैं आज कुछ लालची लोग शादी के बाद भी समय-समय पर लड़की के बाप से चीजों के लिए डिमांड करते हैं उसके लिए वह अपनी बीवी का इस्तेमाल करते हैं जो बहुत ही ज्यादा चिंताजनक है।
यहां मैं किसी धर्म या मजहब की बात नहीं कर रहा हूं मैं इंसानियत की बात कर रहा हूं कम से कम जो हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति है उसमें चाहे हिंदू हो मुसलमान हो सिख हो या ईसाई हम सब को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि सिर्फ कोई लड़की किसी की बीवी ही नहीं होती बल्कि वह मां भी होती है बहन भी होती है और सबसे बड़ी बात कि किसी की बेटी भी होती है जिस के इतने रूप हों उसके साथ  इस तरह का बर्ताव कैसे किया जा सकता है।
आज हमारे देश का युवा और उसी युवक के अभिभावक या माता-पिता लड़की वालों से जहेज़ के नाम पर दौलत पैसा गाड़ी बंगले की डिमांड करते हैं वह अपने आप में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला है। जो इंसान अपनी पत्नी से प्यार नहीं कर सकता वह दुनिया में किस से प्यार कर सकता है उसको इंसान कहलाने का हक नहीं है। वह इंसानियत के नाम पर धब्बा है। उसको सिर्फ दौलत से प्यार होता है । 
इसके लिए हम को आगे आना होगा और यह फैसला लेना होगा कि हम जहेज़ जैसी कुरीतियों को बढ़ावा नहीं देंगे इसके लिए हर धर्म के जो गुरु हैं चाहे वह मौलाना हो पंडित हो पादरी हों या फादर हों कोई भी हो उनको भी इसमें खुलकर सामने आना होगा कि जहां इस तरह की चीजें होंगी वहां पर शादी की रस्में पूरी नहीं कराएंगे।
इसके अलावा सरकार को भी इस मामले में सजगता बरतनी होगी जिससे सरकार और सरकार के अंडर में काम करने वाले संस्थाएं समय-समय पर लोगों के यहां छापा मारती हैं चाहे फिल्म स्टार हों चाहे वह बिजनेसमैन हों आय को लेकर के छापा मारा जाता है। आप मकान बनवा रहे हैं तो सरकार उसको चेक करती है आपने अपने पैसों से गाड़ी खरीदी सड़क पर चल रहे हैं तो सरकार उसको चेक करती है आप कोई बिजनेस या व्यवसाय कर रहे हैं तो सरकार उसको भी चेक करती है हर चीज पर सरकार की नजर होती है तो आखिर इन शादियों में दिए जाने वाले दहेज पर सरकार की नजर क्यों नहीं होती। अगर आप मकान बनवा रहे हैं तो उसके लिए भी नियम कानून है। अगर आप गाड़ी खरीद रहे हैं अपना व्यवसाय खोल रहे हैं तो सब चीज में सरकार के कानून और नियम है ऐसे में शादी के लिए नियम और कानून क्यों नहीं है? हर चीज के लिए संसद में प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सरकार तत्पर रहती है ऐसे में जहेज़ के खिलाफ प्रस्ताव क्यों नहीं पारित करवाती है। इस पर विचार करना चाहिए।
एक बाप मेहनत मजदूरी करके खुद तकलीफ उठा करके अपने बेटी को पालता पोसता है बड़ा करता है और उसकी ख्वाहिश होती है कि अपनी बेटी की जिंदगी के लिए किसी अच्छे के साथ की शादी की जाए लेकिन नतीजा क्या निकलता है नतीजा वही है जो अभी साबरमती नदी के किनारे दिखाई दिया।
एक बेटी की जान चली गई लेकिन मुजरिम के साथ क्या हुआ उसे सिर्फ गिरफ्तार किया गया और शायद आने वाले वक्त में उसे जमानत भी मिल जाए क्या यह सही है? बिल्कुल सही नहीं है। ऐसे लोगों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए।
जनता यानी आवाम को भी यह फैसला करना होगा कि जहां जहेज़ और इस तरह के लोक लुभावनी शादी हो वहां के दावत नामें को कुबूल ना करें और साथ ही साथ मौलाना पंडित वगैरह को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि ऐसी जगह पर शादी की रस्म पूरा कराने से इंकार कर दे। 
बेटी घर की रहमत होती है घर की लक्ष्मी होती है जिसे रहमत या लक्ष्मी की कद्र नहीं उसे पूरी तरह समाज द्वारा बहिष्कृत करना चाहिए।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com
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अब इंसानों के दो ही ग्रुप BH+ और BH–. सैय्यद तक़वी

अब इंसानों के दो ही ग्रुप BH+ और BH–. सैय्यद तक़वी

05-Mar-2021

अब इंसानों के दो ही ग्रुप BH+ और BH–. सैय्यद तक़वी

जी हां यह बात सही है लेकिन बिल्कुल परेशान होने की जरूरत नहीं है यह दो ब्लड ग्रुप बहुत तेजी के साथ हिंदुस्तान में फैल रहे हैं।
ब्लड ग्रुप को मुख्यतः 4 वर्गों में बांटा गया है जिनके नाम हैं;A, B, AB और O है। रक्त यह का एक वर्गीकरण, एंटीबॉडी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पर निर्भर करता है।
लेकिन आज के हालात ने लोगों के ब्लड को दो ग्रुप में बांटा हुआ है बी एच पॉजिटिव और बी एच नेगेटिव । यह वर्गीकरण इंसान की सोच, जरूरत, परिवारिक बैकग्राउंड और बेईमानी/ईमानदारी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पर निर्भर करता है। इसमें सबसे खास बात यह है की अधिकतम लोगों का ब्लड ग्रुप बी एच पॉजिटिव है यानी भ्रष्टाचार पॉजिटिव । ऐसे लोग सिर्फ भ्रष्टाचार करने कराने की तलाश में रहते हैं और भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके खोजा करते हैं। भ्रष्टाचार निगेटिव लोग कम हैं और बीएच पाज़िटिव का शिकार हैं।
आज जो देश की स्थिति है उसका कारण बीएच पाज़िटिव लोग हैं। पेट्रोल का शतक तक पहुंचना, गैस का हज़ारी गैस होना, सब्सिडी का लुप्त होना, विद्युत चार्ज का आसमान छूना, सड़कों पर गड्ढे होना यह सब बीएच पाज़िटिव लोगों की देन है।
आज जिस युग में हमारा देश जी रहा है वहां बीएच पाज़िटिव लोगों का सम्मान है। वही अतिथि भी हैं और मुख्य अतिथि भी। बीएस नेगेटिव लोगों को इस वक्त नौकर का कार्य दिया गया है। अर्थात जो बीएच पॉजिटिव लोग कहें वह चुपचाप करते रहो उनकी बात मानते रहो आवाज ना उठाओ अगर आवाज उठाओगे तो देशद्रोही कहलाओगे। आवाज उठाने की मिसाल सामने है सीए एनआरसी के खिलाफ आवाज उठाई गई और अब किसान आंदोलन में किसान जो आवाज उठा रहे हैं। क्या हल निकला दोनों का कुछ नहीं क्योंकि इस वक्त हर जगह हर पद पर हर विभाग में बी एच पॉजिटिव लोग अधिक संख्या में मौजूद हैं। जो लोग बी एच नेगेटिव है उनकी आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है क्योंकि बी एच पॉजिटिव की विशेषता यह होती है कि वह इंसान से सुनने, देखने और समझने की क्षमता को छीन लेता है। इसके बाद में वह यह समझता है कि हम जो कर रहे हैं वह सही है हिटलर को भी बीएच पॉजिटिव की बीमारी हो गई थी जिसका परिणाम बहुत भयानक निकला।
बी एच पॉजिटिव की विशेषता यह है कि वह इंसान गलत कार्य तो करता ही है साथ ही साथ हिंसक प्रवृत्ति का भी हो जाता है। अर्थात लड़ना लड़ाना जान ले लेना मरवा देना यह सब उसके लिए आम बात हो जाती है। एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी होती है कि बी एच पॉजिटिव लोग अपने अंदर डर भी रखते हैं जब उनसे बड़ा कोई ताकतवर सामने आ जाता है तो वह भले ही उनके घर में घुस आए लेकिन वह यही कहते हैं कि नहीं हमारे घर में कोई नहीं घुसा।
कोविड 19 भी बीएच पाज़िटिव लोगों को नहीं रोक पाया। बल्कि इन लोगों के लिए एक नया रास्ता खुल गया। व्यक्तिगत तौर पर एक इंसान ने दूसरे इंसान की मदद की। लेकिन जो बड़ी-बड़ी संस्थाएं बड़े-बड़े ऑर्गेनाइजेशन हैं उन्होंने इस मौके को भी पूरी तरीके से भुना लिया। जरूरत बी एच नेगेटिव तक नहीं पहुंची बल्कि इन लोगों ने इस माध्यम से भी काफी लंबी लंबी डकारे ली। इसमें धार्मिक और सामाजिक सभी संस्थाएं शामिल है।
हां दूसरी तरफ ऐसे धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं एवं आर्गेनाइजेशंस भी हैं जो बीएच नेगेटिव है उन्होंने खुलकर समाज की सेवा की और इंसानियत की मदद की। लेकिन उन्होंने प्रचार नहीं किया।
बहरहाल यह खेल तो चलता रहेगा। बीएच पाज़िटिव हंसता रहेगा और बीएच निगेटिव रोता रहेगा क्योंकि मदारी भी यही और बंदर भी यही। साथी साथ जो डमरु बज रहा है वह भी भी एच पाज़िटिव। अभी एच नेगेटिव वालों का एक ही काम है बस यह सुनते रहे और देखते रहे।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com
 


इस्लामी शिक्षाओं के समूह ने युद्ध को शांति क्षेत्र में बदल दिया!

इस्लामी शिक्षाओं के समूह ने युद्ध को शांति क्षेत्र में बदल दिया!

05-Mar-2021

मैनबर्ग एक शहर है जो अपने लगातार गैंग युद्धों, ड्रग डीलिंग और अन्य अपराधों के लिए जाना जाता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों से हर गुरुवार को एक इस्लामिक विद्वान शेख मकदाम इशाक सालेक अपने “महफिल-ए-ज़िकर” के दौरान इस जगह को एक शांति क्षेत्र में बदल रहा है।

इस महफ़िल-ए-ज़िकर में हर सप्ताह लगभग 100 से 400 लोग शामिल होते हैं। लेकिन शैक साल्क के अनुसार, महत्वपूर्ण बात यह है कि जैसे ही मण्डली शुरू होती है गैंगस्टर्स की लगातार गोलीबारी रुक जाती है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, मैनबर्ग की आबादी मिश्रित या “रंगीन” लोग हैं। रंगीन दक्षिण अफ्रीका में गोरों की पिछली रंगभेदी सरकार द्वारा भारतीयों, पाकिस्तानियों, मलेशियाई और अन्य एशियाई लोगों की गैर-गोरों और गैर-अश्वेतों आबादी का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।

मैनबर्ग अतिपिछड़ा है
मैनबर्ग एक मोटी आबादी वाला क्षेत्र है जिसमें कई नागरिक मुद्दों का निवारण किया जाना आवश्यक है। इसके ओवरपोलेशन को बेहतर आवास और नागरिक सुविधाओं की आवश्यकता है।

मेनबर्ग की रंगीन आबादी ईसाइयों के बहुमत से 52 हजार है। गरीबी और बेरोजगारी यहां के अपराध और गिरोह युद्धों के मुख्य कारण हैं।

महफ़िल-ए-ज़िकर रखने वालों में से अधिकांश मलेशियाई या मलेशियाई मुसलमान हैं जो पीढ़ियों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं। ज़िकर में, यह समुदाय अल्लाह के नामों को एक अलग रूप में दोहराता है। ज़िकर के बाद, मण्डली को गर्म भोजन के साथ परोसा जाता है।

महफ़िल-ए-ज़िकर के कारण अपराध की दर कम हुई
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में मैनबर्ग को “रेड जोन” घोषित किया गया था। हालाँकि, महफ़िल-ए-ज़िकर के शुरू होने के बाद से शहर के कई इलाकों में अपराध की दर कम हो गई।

कई गैंगस्टर महफ़िल-ए-ज़िकर का सम्मान करते हैं और पूरे मण्डली में शांति सुनिश्चित करते हैं।

पिछले तीन वर्षों के दौरान शांति को ध्यान में रखते हुए, स्थानीय पुलिस ने मण्डली के आयोजकों को “शांति पुरस्कार” से सम्मानित किया है।

ईसाई भी इस मण्डली में शामिल होते हैं और इस मण्डली को संबोधित करने के लिए ईसाई धर्मगुरुओं को आमंत्रित किया जाता है।

मुस्लिम विद्वानों द्वारा प्रवचन का विषय ज्यादातर सामाजिक विषयों जैसे शांति, प्रेम और पारिवारिक संबंधों का सम्मान है।

शेख सालेक ने कहा कि अल्लाह के ज़िकर के कारण मेनबर्ग में शांति लौट रही है। “हम हर दिन इस मण्डली का संचालन करना चाहते हैं, लेकिन वित्तीय बाधाओं के कारण हम ऐसा नहीं कर सकते। हालांकि, हम शहर के विभिन्न समुदायों के बीच शांति और सद्भाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। हम स्थानीय सरकारी एजेंसियों के सहयोग से ड्रग्स और अपराध के खतरे को खत्म करने की कोशिश करेंगे।

 

किसान आंदोलन से मोदी की भाजपा बैक फुट पर!

किसान आंदोलन से मोदी की भाजपा बैक फुट पर!

19-Feb-2021

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

चुनावी मुहाने पर होने की वजह से पशोपेश में मोदी-योगी

राज्य मुख्यालय लखनऊ।देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश जैसे-जैसे चुनाव की ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही प्रदेश की सियासत गरम होती जा रही है।देखा जाए तो फ़िलहाल पश्चिम बंगाल व आसाम चुनावी मुहाने पर खड़े हैं लेकिन साथ ही देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी सियासी संग्राम हो रहा उससे अहसास हो रहा है कि उत्तर प्रदेश में भी सियासी दल चुनावी दंगल में उतरने का मन बना चुके हैं जिसके चलते मोदी-योगी सरकारें पशोपेश में हैं न उगलते बन रहा है न निगलते बन रहा है।

कृषि क़ानूनों को लेकर किसानों द्वारा पिछले 83 दिनों से किए जा रहे आंदोलन का असर शहर से लेकर गाँव तक देखने को मिल रहा है लेकिन मोदी की भाजपा व सरकार देशभर के किसानों में पनप रहे विरोध को भाँपने में नाकाम रही हैं उसी का नतीजा है कि आज मजबूर होकर मोदी की भाजपा में किसानों के बीच जाने की रणनीति बनाई जा रही हैं।किसानों के मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री स्वं चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौधरी अजित सिंह को मुज़फ़्फ़रनगर लोकसभा सीट से गठबंधन के प्रत्याशी तौर पर हरानेवाले मोदी की भाजपा के प्रत्याशी डाक्टर संजीव बालियान को लगाया जा रहा है कि वह किसानों के बीच जाकर सरकार की कृषि क़ानूनों को लाने की अपनी मनसा को समझाएँगे मोदी की भाजपा के रणनीतिकारों के पास कृषि क़ानूनों के पक्ष में ठोस जवाब नहीं है जिन क़ानूनों में बनते ही बदलाव करने पर विवश होना पड़ रहा है जब किसानों की हालत सुधारने की कोशिश के चलते तीनों कृषि क़ानून लाए गए हैं लेकिन न किसानों से बातचीत की और न विपक्ष के नेताओं से मशविरा किया जब इतना बड़ा बदलाव करने की तैयारी थी इन तीनों कृषि क़ानूनों को इतनी आनन फ़ानन में लाने की क्या ज़रूरत थी अध्यादेश के द्वारा क्यों लाए गए ? राज्यसभा में किस तरह पास किया गया यह भी देशभर ने देखा ? पूरी दुनिया कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों को लेकर परेशान थी लॉकडाउन लगा था उसकी तैयारी के बजाय मोदी सरकार गुप-चुप तरीक़े से अपने पूँजीपति मित्रों को कृषि पर एकाधिकार देने की रणनीति पर काम कर रही थी और उन्हीं मित्रों के क़र्ज़ माफ़ कर रही थी विपक्ष चिल्ला रहा था कि पैदल चल रहे मज़दूरों को उनके घरों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जाए लेकिन मोदी सरकार उनके प्रति गंभीर नहीं थी यह भी मोदी सरकार की नियत पर सवालिया निशान लगा रही है।

 इतना ही नहीं पूँजीपतियों की सरकार एक तरफ़ कृषि क़ानूनों के ज़रिए किसानों को बँधवा मज़दूर बनाने की तैयारी कर रही थी वहीं उसके उद्योगपति मित्र इन क़ानूनों के ज़रिए खेती किसानी पर कैसे क़ब्ज़ा करना है देश के कई हिस्सों में बड़े-बड़े गोदामों को बनाया जा रहा था।किसानों द्वारा क़ानूनों के विरोध में की जा रही पंचायतों में उमड़ रही भीड़ को देखने से लगता है कि अब बहुत देर हो चुकी हैं ख़ैर यह तो अब आगे चलकर पता चलेगा कि मोदी की भाजपा व सरकार की रणनीति कामयाब होंगी या आंदोलनकारियों की रणनीति।धार्मिक धुर्वीकरण कर सरकार बनाने वाली मोदी की भाजपा इस पूरे आंदोलन को लेकर इस ग़लतफ़हमी में रही कि जिस तरह CAA,NPR व संभावित NRC के विरोध को ठंडा करने में कामयाबी हासिल की थी उसी तरह कृषि क़ानूनों के विरोध को निपटा लेंगे लेकिन मोदी सरकार की यह भूल ही उसको भारी पड़ती दिख रही है क्योंकि उस आंदोलन को मोदी सरकार ने हिन्दू मुसलमान कर दिया था जबकि वह भी ग़लत तरीक़े से बनाए गए क़ानून का विरोध था लेकिन इस काम में मोदी सरकार माहिर हैं वह किसी भी अपने ग़लत क़दम का हिन्दू मुसलमान कर राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर  अपनी ग़लती को सही करार देने में कामयाब हो जाती हैं।

ख़ैर प्रदेश अब चुनावी मोड़ में आ गया है प्रदेश में विपक्षी पार्टियाँ अब सक्रिय नज़र आ रही हैं हालाँकि कुछ पार्टियाँ अभी सोशल मीडिया पर ही सक्रिय देखी जा सकती हैं लेकिन उनका रूख कड़ा हैं कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल पंचायत दर पंचायत कर किसानों व जनता के बीच जा रही हैं इन दोनों ही पार्टियों की पंचायतों में भारी भीड़ जमा हो रही हैं।इनकी सभाओं में आ रही भीड़ को तीनों कृषि क़ानूनों की ख़ामियों के साथ ही बढ़ती महंगाई को लेकर भी मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं जिसको पंचायतों में आ रही भीड़ हाथों हाथ ले रहीं हैं पैट्रोल डीज़ल व रसोई गैस की बढ़ती क़ीमतें महंगाई में आग लगा रही हैं इन सबसे बेफ़िक्र मोदी सरकार महंगाई को रोकने में नाकाम हो रही हैं यह मोदी की भाजपा के लिए ख़तरे की घंटी माना जा रहा है जिसको अब सत्तारूढ़ दल महसूस भीकरने लगीं है लेकिन मोदी की भाजपा के लिए यहाँ यह मजबूरी है कि वह इसे हिन्दू मुसलमान नहीं कर पा रही हैं यही वजह है इस पूरे आंदोलन में मोदी की भाजपा बैक फुट पर है और किसान फ़्रंट फुट पर नज़र आ रहा है। 


किसान आन्दोलन पर देशद्रोह एवं अशांति के धब्बे?

किसान आन्दोलन पर देशद्रोह एवं अशांति के धब्बे?

18-Feb-2021

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-ः ललित गर्ग:-

सर्वोच्च न्यायालय ने जन-प्रदर्शनों, आन्दोलनों, बन्द, रास्ता जाम, रेल रोकों जैसी स्थितियों के बारे में जो ताजा फैसला किया है, उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से गंभीर चिन्तन होना चाहिए, नयी व्यवस्थाएं बननी चाहिए। भले ही उससे उन याचिकाकर्ताओं को निराशा हुई होगी, जो विरोध-प्रदर्शन के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। कोई भी आन्दोलन जो देश के टुकड़े-टुकड़े कर देने की बात करता हो, लाल किले का अपमान करता हो, 500 पुलिसवालों पर हिंसक एवं अराजक प्रहार करके उन्हें घायल कर देता हो या राष्ट्रीय ध्वज का निरादर करता हो, उसे किस तरह और कैसे लोकतांत्रिक कहा जा सकता है? वहीं लोकतंत्र अधिक सफल एवं राष्ट्रीयता का माध्यम है, जिसमें आत्मतंत्र का विकास हो, स्वस्थ राजनीति की सोच हो एवं राष्ट्र को सशक्त करने का दर्शन हो, अन्यथा लोकतंत्र में भी एकाधिपत्य, अव्यवस्था, अराजकता एवं राष्ट्र-विरोधी स्थितियां उभर सकती है।

सत्ता, राजनीति एवं जन-आन्दोलनों के शीर्ष पर बैठे लोग यदि जनतंत्र के आदर्श को भूला दें तो वहां लोकतंत्र के आदर्शों की रक्षा नहीं हो सकती। आज लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह के विरोध प्रदर्शन की संस्कृति पनपी है, उससे राष्ट्र की एकता के सामने गंभीर खतरे खडे़ हो गये हंै। यह बड़ा सच है कि यदि किसी राज्य में जनता को विरोध-प्रदर्शन का अधिकार न हो तो वह लोकतंत्र हो ही नहीं सकता। विपक्ष या विरोध तो लोकतंत्र का आधार होता है क्योंकि जिस देश की जनता एवं राजनीतिक दल पंगु, निष्क्रिय और अशक्त हो तो वह लोकतांत्रिक राष्ट्र हो ही नहीं सकता। विरोध तो लोकतंत्र का हृदय है और देश की अदालत ने भी विरोध-प्रदर्शन, धरने, अनशन, जुलूस आदि को भारतीय नागरिकों का मूलभूत अधिकार माना है लेकिन उसने यह भी साफ-साफ कहा है कि उक्त सभी कार्यों से जनता को लंबे समय तक असुविधा होती है तो उन्हें रोकना सरकार का अधिकार एवं दायित्व है। विरोध भी शालीन, मर्यादित होने के साथ आम जनजीवन को बाधित करने वाला नहीं होना चाहिए। अदालत की यह बात एकदम सही है, क्योंकि आम जनता की जीवन निर्वाह की स्थितियों को बाधित करना तो उसके मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है। यह सरकार का नहीं, जनता का विरोध है।

चंद प्रदर्शनकारी के धरनों से असंख्य लोगों की स्वतंत्रता बाधित हो जाती है। लाखों लोगों को लंबे-लंबे रास्तों से गुजरना पड़ता है, धरना-स्थलों के आस-पास के कल-कारखाने बंद हो जाते हैं और सैकड़ों छोटे-व्यापारियों की दुकानें चैपट हो जाती हैं। गंभीर मरीज अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देते हैं। शाहीन बाग और किसानों जैसे धरने यदि हफ्तों तक चलते रहते हैं तो देश को अरबों रु. का नुकसान हो जाता है। रेल रोको अभियान सड़कबंद धरनों से भी ज्यादा दुखदायी सिद्ध होते हैं। ऐसे प्रदर्शनकारी जनता की भी सहानुभूति खो देते हैं। उनसे कोई पूछे कि आप किसका विरोध कर रहे हैं, सरकार का या जनता का? प्रश्न यह भी है कि इस तरह के प्रदर्शन से किसका हित सध रहा है, किसानों का या राजनीतिक दलों का?

लम्बे समय से कृषि कानूनों के विरोध में जो किसान आन्दोलन चल रहा है, वह किसानों के हितों का आन्दोलन न होकर राजनीतिक स्वार्थों को सिद्ध करने का षडयंत्र है, जिसमें अनेक विदेशी शक्तियां देश को कमजोर करने के लिये जुटी है। हम व्यवस्था से समझौता कर सकते है, लेकिन सिद्धांत के साथ कभी नहीं, किसी कीमत पर भी नहीं। समझ एवं शांति चाहने वाले लोग कहते हैं कि कोई भी आन्दोलन केवल घाव देता है, आखिर तो टेबल पर बैठना ही होता है। शांति को मौका देने की यह बात वे किससे कहते हैं? उनसे जो शांति चाहते हैं या उनसे जो शांति भंग कर रहे हैं? अब हमें देश को कमजोर करने और अलगाववाद के विरुद्ध हमें नये समीकरण खोजने होंगे। उनकी इच्छा का व्याकरण समझना होगा। वे सिर्फ शांति की अपील से आन्दोलन वापिस नहीं लेंगे। यदि यह सब इतना आसान होता तो सरकार के बार-बार झूकने एवं किसानों से लम्बे दौर की बातचीत का कोई निष्कर्ष अवश्य सामने आता।

अदालत ने इस तरह के धरने चलाने के पहले अब पुलिस की पूर्वानुमति को अनिवार्य बना दिया है, प्रश्न है कि क्या दिल्ली सीमाओं पर चल रहे लंबे धरने पर बैठे किसान अब अदालत की सुनेंगे या नहीं? इन धरनों और जुलूसों से एक-दो घंटे के लिए यदि सड़कें बंद हो जाती हैं और कुछ सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शनकारियों का कब्जा हो जाता है तो कोई बात नहीं लेकिन यदि इन कुचेष्टाओं से मानव-अधिकारों का लंबा उल्लंघन होगा तो पुलिस-कार्रवाई न्यायोचित ही कही जाएगी। क्या पुलिस ऐसी कार्रवाई के लिये सक्षम एवं तत्पर है? क्या सत्ताधारी पार्टी इस तरह का खतरा उठा पाएंगी?  
देखने में आ रहा है पुलिस देशद्रोह और अशांति भड़काने के आरोपियों पर शिकंजा कसने लगी है। बेंगलुरु की सामाजिक कार्यकत्र्री दिशा रवि को तो गिरफ्तार कर लिया गया है और निकिता जेकब और शांतनु को भी वह जल्दी ही पकड़ने की तैयारी में है। इन तीनों पर आरोप है कि इन्होंने मिलकर षड़यंत्र किया और भारत में चल रहे किसान आंदोलन को भड़काया। इतना ही नहीं, इन्होंने स्वीडी नेता ग्रेटा टुनबर्ग के भारत-विरोधी संदेश को इंटरनेट पर फैलाकर लालकिला की अस्मिता एवं अस्तित्व को धुंधलाने का सफल प्रयत्न किया। पुलिस ने काफी खोज-पड़ताल करके कहा है कि कनाडा के एक खालिस्तानी संगठन ‘पोइटिक जस्टिस फाउंडेशन’ के साथ मिलकर इन लोगों ने यह भारत-विरोधी षड़यंत्र किया है। इस आरोप को सिद्ध करने के लिए पुलिस ने इन तीनों के बीच फोन पर हुई बातचीत, पारस्परिक संदेश तथा कई अन्य दस्तावेज खोज लिये हैं। यदि पुलिस के पास ऐसे ठोस प्रमाण है तो निश्चय ही यह अत्यंत आपत्तिजनक और दंडनीय घटना है। अदालत तय करेगी कि इन अपराधियों को कितनी सजा मिलेगी।
राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण? आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सलवाद के बाद अब यह कौन-सा वाद है? जिस प्रकार उग्रवादियों एवं देशद्रोहियों को एक भाषण, एक सर्वदलीय रैली या जुलूस से मुख्यधारा में नहीं जोड़ा जा सकता, ठीक उसी प्रकार राजनीति दलों की सत्ता की राजनीति किसानों के रोग की दवा नहीं हो सकती। किसान आन्दोलन राजनीतिक दलों की एक जबरन एवं अतिश्योक्तिपूर्ण विडम्बना है। आज राष्ट्रीय जीवन में भी बहुत कुछ आवश्यक विडम्बनाएं हैं। जिनसे संघर्ष न करके हम उन्हें अपने जीवन का अंग मान कर स्वीकार कर लेते हैं। पर यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है। राष्ट्र के जीवन में विडम्बनाएं तब आती हैं, जब कुछ गलत पाने के लिए कुछ अच्छे को छोड़ने की तुलनात्मक स्थिति आती है। यही क्षण होता है जब हमारा कत्र्तव्य कुर्बानी मांगता है। ऐसी स्थिति झांसी की रानी, भगतसिंह से लेकर अनेक शहीदों के सामने थी। जिन्होंने मातृभूमि की माटी के लिए समझौता नहीं किया। कत्र्तव्य और कुर्बानी को हाशिये के इधर और उधर नहीं रखा।
आज देश के सम्मुख संकट इसलिए उत्पन्न हुआ कि हमारे देश में सब कुछ बनने लगा पर राष्ट्रीय चरित्र नहीं बना और बिन चरित्र सब सून........। राष्ट्रीयता और शांति चरित्र के बिना ठहरती नहीं, क्योंकि यह उपदेश की नहीं, जीने की चीज है। हमारे बीच गिनती के लोग हैं जिन्हें इस स्थान पर रखा जा सकता है। पर हल्दी की एक गांठ को लेकर थोक व्यापार नहीं किया जा सकता।
न राष्ट्रीयता आसमान से उतरती है, न शांति धरती से उगती है। इसके लिए पूरे राष्ट्र का एक चरित्र बनना चाहिए। वही सोने का पात्र होता है, जिसमें राष्ट्रीयता रूपी शेरनी का दूध ठहरता है। वही उर्वरा धरती होती है, जहां शांति का कल्पवृक्ष फलता है। अन्यथा हमारा प्रयास अंधेरे में काली बिल्ली खोजने जैसा होगा, जो वहां है ही नहीं।
प्रेषकः

 

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


योगी का युवाओं की ऊर्जा को खपाने का संकल्प

योगी का युवाओं की ऊर्जा को खपाने का संकल्प

08-Feb-2021

-ललित गर्ग-

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने युवाओं के बिखर गये सपनों, टूट गयी आशाओं एवं निराशा की स्थितियों पर विराम लगाते हुए युवाओं की ऊर्जा को प्रदेश-निर्माण में खपाने का नया खाका खींचना शुरू कर दिया है। यह एक सराहनीय कदम है और बेहद जरूरी भी है कि क्योंकि कोरोना के विषम काल में घर लौटे लाखों युवाओं ने नौकरियां गंवाई है। प्रदेश सरकार ने ऐसे 10 लाख युवाओं को काम पर लगाने और काम देने लायक बनाने की तैयारी का संकल्प लेकर युवाओं की मुर्झायी मुस्कान को लौटाने का अभिनव उपक्रम किया है। इन्हें एक साल के अंदर कौशल विकास केंद्रों की मदद से हुनरमंद बनाया जाएगा। युवा ना केवल लीड करेंगे, निर्माण को साकार करेंगे बल्कि विकास को नये पंख लगायेंगे। जाहिर है राष्ट्र का वर्तमान राजनीतिक शीर्ष नेतृत्व इस युवा आबादी को देखकर ना केवल इस पर रश्क करेगा बल्कि इसे अपना गर्व भी मानेगा। यकीनन इसमें कोई संशय भी नहीं होना चाहिए कि युवा हमारी शक्ति है और आने वाले समय का आधार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हालही में कहा भी है कि जब पूरे विश्व पटल की तरफ देखते हैं, भारत के युवा मन को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि आज भारत सच्चे में एक अवसरों की भूमि है। अनेक अवसर हमारा इंतजार कर रहे हैं।

भारत विश्व का सबसे जवान मुल्क है।  2011 की जनगणना के अनुसार देश में 25 वर्ष की आयु वाले लोगों की संख्या 50 प्रतिशत और 35 वर्ष वाले लोगों आबादी 65 फीसदी बताई गई। ये आंकड़े बताते हैं कि हम एक युवा मुल्क के नागरिक हैं। फिर भी सरकारें इन युवाओं की रचनात्मक एवं सृजनात्मक ऊर्जा के राष्ट्र विकास में उपयोग को लेकर गंभीर नहीं है। क्यों सरकार देश के युवाओं को रोजगार नहीं दे पा रही है? क्यों सरकार की योजनाओं में युवाओं की सहभागिता पर अंधेरे छाये है? क्यों बेरोजगारी से युवा आत्महत्या कर रहे हैं? दरअसल, भारत के युवाओं का वास्तविक धरातल अनेक तकलीफों एवं कठोर यथार्थ से जुड़ा है। उपेक्षा एवं ध्वंसात्मक गतिविधियां भारत की असली युवा आबादी का यथार्थ है। इसमें भी कई कैटगरी हैं। रोजगार मांगते युवा, मेहनत करते युवा, बेहतर शिक्षा की मांग करने पर सड़क पर आंदोलन करते युवा, सोशल मीडिया पर लगे हुए युवा, नेताओं की रैलियों में झंडा उठाकर नारे लगाते युवा ये सब हमारे देश के युवा हैं और इन्हीं से बनता है हमारा युवा भारत। किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी युवाओं को ही माना गया है। इसी भावार्थ पर कहा भी गया-‘जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।’ युवाओं के कंधों पर ही देश-प्रदेश और समाज को आगे ले जाने की, नए पड़ाव तक पहुंचाने की अघोषित जिम्मेदारी भी है। इसीलिए, योगी सरकार ने दूरगामी निर्णय लेते हुए युवाओं की ऊर्जा को प्रदेश-निर्माण में खपाने का निर्णय लेकर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। योगी सरकार इन युवाओं को रोजगार के अवसर तो मुहैया कराएगी ही, उन्हें अपना उद्यम बनाने में भी सक्षम बनाएगी। यही वक्त की जरूरत है और इसी से मुरझाये युवा-चेहरों में नई ताजगी एवं विश्वास का उदय होगा।

कोरोना महामारी के कारण चैपट हो चुकी अर्थ-व्यवस्था एवं लगातार रोजगार छीनने के बढ़ते आंकडों के बीच सभी राज्य-सरकारों एवं केन्द्र सरकार के सामने युवाओं को रोजगार देना प्राथमिकता होना ही चाहिए। प्रश्न है कि नये रोजगार देने के वायदों को पूरा करने के लिये फण्ड कहां से आएगा? समस्या बड़ी है और समाधान की राह भी बड़ी ही चुननी होगी, सफल नेतृत्व ऐसी ही बाजीगरी एवं करिश्माई तौर-तरीकों का खेल है, जो जितना साहस एवं हौसलों से जितने बड़े निर्णय करता है, वह उतना ही अपने नेतृत्व में जादू दिखाता है, इस दृष्टि से योगी आदित्यनाथ जादूई करतब दिखाते रहे हैं। उनकी मंशा भी एवं दृष्टिकोण स्पष्ट एवं पारदर्शी है कि वे प्रदेश के विकास में युवाओं की सक्रिय सहयोगिता के साथ रोजगार के नये अवसरों की प्रस्तुति चाहते हैं।
उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में रोजगार का निर्णय भले ही एक राजनीतिक निर्णय माना जाये, लेकिन यही कुशल एवं प्रभावी नेतृत्व का सशक्त आधार भी है। युवाओं के दर्द को समझने और उस पर योगी का निरंतर ध्यान देना अकारण नहीं है। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने युवाओं को तराशने को प्राथमिकता पर नहीं रखा। वर्ष 2017 से पूर्व के चार वर्षों में व्यावसायिक शिक्षा व कौशल विकास विभाग ने 3.71 लाख युवाओं को टेªनिंग दी थी। योगी राज में प्रशिक्षण पाने वालों का आंकड़ा इससे दोगुना (सात लाख) हो गया। ऐसी उपलब्धियां ही योगी सरकार के शासन को अनूठा एवं प्रभावी बनाती हैं। इसके दृष्टिगत 10 लाख युवाओं को टेªनिंग का लक्ष्य कठिन बेशक है, नामुमकिन कतई नहीं। लाॅकडाउन में घर लौटे 38 लाख प्रवासियों के कौशल को प्रमाणित करके सरकार अपनी क्षमता का सबूत पहले दे भी चुकी हैं। ताजा लक्ष्य भी मजबूत इंफ्रांस्टक्चर पर टिका है। इसकी बुनियाद राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान यानी आइटीआइ बनेंगे।

आज भारत में युवाओं की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। विश्व का हर पांचवां युवा भारत में रहता है, इस युवा शक्ति को अच्छी तरह से शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण दिया जाय तो इनको न केवल अच्छा रोजगार मिलेगा बल्कि यह देश के आर्थिक विकास में भी अच्छा योगदान दे सकते हैं, कोरोना से ध्वस्त हुई अर्थ-व्यवस्था को पटरी पा ला सकते हैं लेकिन जिस तरह से पिछले कुछ समय से देश में पर्याप्त रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है और विशेषकर युवाओं के बीच बेरोजगारी बढ़ रही है, इसके परिणास्वरूप कई नई समस्याएं उभर रही हैं। कोरोना महामारी ने इस समस्या को अधिक गहराया है। सेंटर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅमी की रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक विकास के संकुचन के दौरान वेतनभोगी नौकरियां सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। वेतनभोगी नौकरियां आर्थिक विकास या उद्यमशीलता में वृद्धि के साथ बढ़ती हुई भी दिखाई नहीं दे रही है, जो अधिक चिन्ता का विषय है। इससे स्पष्ट होता है कि आज के युवाओं में बेरोजगारी के कारण असंतोष फैल रहा है। यह स्थिति सरकारों के लिये रोजगार के मुद्दे पर अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता को उजागर कर रही है।

बेरोजगारी की समस्या विश्वव्यापी समस्या है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे कई विकसित देश भी बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं और वे संरक्षणवाद और स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए वीजा नीतियों में बदलाव कर रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने युवाओं के लिए नए रोजगार सृजन करने के लिए ‘स्टार्टअप’ और ‘स्टैंडअप’ जैसी योजनाएं भी लागू की हैं लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुकूल नहीं निकल रहा है क्योंकि फंड और अच्छे स्किल्ड लोगों की कमी के कारण ज्यादातर ‘स्टार्टअप’ आज बंद हो गए है। वर्तमान सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना ‘मेक इन इंडिया’ भी नई नौकरियों का सृजन करने में असफल रही है। ऐसे जटिल समय में देश में सर्विस सेक्टर को भी बढ़ावा देने की जरूरत है, जहां भविष्य में नई नौकरियों के सृजन की सम्भावना ज्यादा है।

कुछ दिनों पहले नीति आयोग के सदस्य विबेक देबरॉय ने यही बात कही ‘आने वाले समय में ज्यादातर रोजगार सर्विस सेक्टर में होगा न कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में’, जिसमें टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थ केयर, नवीकरणीय ऊर्जा, शिक्षा, टेलिकॉम और बैंकिंग प्रमुख क्षेत्र हो सकते हैं। अगर सरकार ने जल्द इस दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए तो देश के जिस युवा वर्ग को देश का ‘डेमोग्रफिक डिविडेंट’ कहा जाता है, वह कहीं देश के लिए ‘डेमोग्रफिक डिजास्टर’ न बन जाए। आज नरेन्द्र मोदी सरकार एवं राज्य-सरकारों का लक्ष्य सिर्फ देश-प्रदेश की आर्थिक विकास दर ही नहीं बल्कि नए रोजगार का सृजन करना भी होना चाहिए। इससे ही देश की आर्थिक विकास दर अपने आप तेज होगी। पिछले 20 वर्षो में देश की आर्थिक विकास दर काफी अधिक होने के बाद भी नए रोजगार का बहुत कम सृजन हुआ, जिसके कारण ही इस अवधि को ‘जॉबलेस ग्रोथ पीरियड’ भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इन स्थितियों को गंभीरता से लेते हुए जो कदम उठा रही है, निश्चित ही उनके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे, अन्य राज्यों एवं केन्द्र सरकार को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। इस पटरी पर लौटती अर्थ-व्यवस्था एवं सरकारों की प्रथम प्राथमिकता रोजगार ही होना चाहिए। अन्यथा भीतर-ही-भीतर युवाओं में पनप रहा असंतोष एवं आक्रोश किसी बड़ी क्रांति एवं विद्रोह का कारण न बन जाये? प्रेषकः

 

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 

 


प्रशासन को आचार संहिता से बांधना होगा

प्रशासन को आचार संहिता से बांधना होगा

06-Feb-2021

-ललित गर्ग-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले ही प्राथमिकता से सरकारी कामकाज की शैली में पारदर्शिता, तत्परता और ईमानदारी की वकालत की हो, लेकिन आज भी सरकारी कार्यशैली लापरवाह, अनुशासनहीन, भ्रष्ट एवं उदासीन बनी हुई है। आजादी के बहतर सालों के बाद भी आम आदमी शासन-तंत्र की उपेक्षा एवं बेपरवाही के कारण अनेक संकटों का सामने करने को विवश है। विवशताएं इतनी अधिक है कि आम आदमी के सामने इनके समाधान का कोई रास्ता नहीं है। एक नागरिक अपनी शिकायत पर ध्यान नहीं दिए जाने की वजह से हताशा के दौर में चला जाता है। ऐसी ही त्रासद, हताश एवं विकराल स्थितियों के बीच उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के सामने एक व्यक्ति ने इसलिए आग लगाकर जान देने की कोशिश की कि शासन-तंत्र में बैठे संबंधित अधिकारियों ने उसकी शिकायत की अनदेखी की और आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी। अफसोसजनक स्थिति है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तमाम सतर्कता, चेतावनी एवं चुस्त प्रशासन की घोषणाओं के बावजूद ऐसी स्थितियां कायम है। एक आम नागरिक प्रशासन की उपेक्षा एवं लापरवाही से इतना परेशान हो जाये कि उसे आत्महत्या के अलावा कोई और रास्ता दिखाई न दे, यह शासन एवं प्रशासन की जबावदेही पर एक बड़ा घिनौना प्रश्न है।

खबर के मुताबिक, कन्नौज जिले के रहने वाले उस व्यक्ति ने ग्राम प्रधान और लेखपाल से इस बात की शिकायत की थी कि उसकी जमीन पर दूसरे व्यक्ति ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। नियमानुसार शिकायत दर्ज होने के बाद संबंधित अधिकारियों को अपनी ड्यूटी के तहत समय पर मामले की जांच करनी चाहिए थी, ताकि न्याय का रास्ता तैयार होता। लेकिन उनके रूख में लगातार अनदेखी ने शिकायतकर्ता को इस हद तक क्षुब्ध एवं पीड़ित कर दिया कि उसे सार्वजनिक रूप से आत्मदाह की कोशिश करके अपनी परेशानी की ओर शीर्ष शासन-प्रशासन का ध्यान खींचने का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। शुक्र है कि मुख्यमंत्री कार्यालय के सामने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने तत्परता दिखाते हुए आग बुझाई और पीड़ित को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया। अगर समय पर यह सक्रियता नहीं दिखाई गई होती तो मामला इस रूप में दर्ज हो जाता कि एक व्यक्ति को शासकीय कामकाज में उपेक्षा एवं लापवाही की वजह से अपनी जान देनी पड़ी। निश्चित रूप से शिकायत पर कार्रवाई में देरी की वजह से किसी व्यक्ति के इस तरह के कदम उठाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। बात केवल उत्तर प्रदेश की नहीं है, देशभर के तमाम सरकारी कार्यालयों में आम आदमी ऐसी स्थितियों से रू-ब-रू होता है।

पीड़ित व्यक्ति की कोशिश यह होनी चाहिए थी कि अगर निचले स्तर के कर्मचारी या अधिकारी उसकी सुनवाई नहीं कर रहे थे तो वह उनके उच्चाधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने का रास्ता चुनाता। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि समूचे शासन तंत्र में निचले से लेकर ऊपरी स्तर की जटिल संरचना में एक आम नागरिक अगर कोई शिकायत लेकर पहुंचता है तो वह टालमटोल या फिर संबंधित कर्मचारी या अधिकारी की उदासीनता की वजह से अक्सर हार जाता है, टूट जाता है। कई बार भ्रष्टाचार की वजह से भी ऐसी परिस्थिति सामने आती है। यह स्थिति किसी भी सरकार और उसके तंत्र के लिए एक बडी विडम्बना है कि जो व्यवस्था आम लोगों को सुविधा मुहैया कराने और उसकी शिकायतों पर गौर करके उसका निपटारा करने के लिए बनायी गई है, उसी की वजह से किसी को हताश होकर आत्मदाह की कोशिश जैसा अतिवादी कदम उठाना पड़ रहा है। उत्तरप्रदेश ही नहीं, देश के अन्य राज्यों में इससे पहले भी शिकायत पर सुनवाई नहीं होने की वजह से कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं। सवाल है कि अगर राज्य सरकार और उसके संबंधित महकमे अपने कामकाज में सुशासन, पारदर्शिता और समय पर दायित्व पूरा करने के साथ जनता को आश्वस्त करते हैं, तो किसी नागरिक के सामने अपनी शिकायतें नहीं सुने जाने की वजह से जान देने या इसकी कोशिश करने की नौबत क्यों आती हैं?

हर स्तर पर नियंत्रण नहीं होकर सर्वोपरि नियंत्रण होना चाहिए। हर स्तर पर नियंत्रण रखने से, सारी शक्ति नियंत्रण को नियंत्रित करने में ही लग जाती है। नियंत्रण और अनुशासन में फर्क है। नीतिगत नियंत्रण या अनुशासन लाने के लिए आवश्यक है सर्वोपरि स्तर पर आदर्श स्थिति हो, तो नियंत्रण सभी स्तर पर स्वयं रहेगा और वास्तविक रूप में रहेगा मात्र ऊपरी तौर पर नहीं। अधिकार किसी के कम नहीं हांे। स्वतंत्रता किसी की प्रभावित नहीं हो। पर इनकी उपयोग में भी सीमा, समयावधि और संयम हो।

कानूनी व्यवस्था में गलती करने पर दण्ड का प्रावधान है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था मंे कोई दण्ड का प्रावधान नहीं है। यही कारण है कि किसी एक व्यक्ति को संपूर्ण अधिकार देने में हिचकिचाहट रहती है। हर स्तर पर दायित्व के साथ आचार संहिता अवश्य हो। दायित्व बंधन अवश्य लायें। निरंकुशता नहीं। आलोचना भी हो। स्वस्थ आलोचना, पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को जागरूक रखती है। पर जब आलोचक मौन हो जाते हैं और चापलूस मुखर हो जाते हैं, तब फलित समाज को भुगतना पड़ता है।

आज हम अगर दायित्व स्वीकारने वाले समूह के लिए या सामूहिक तौर पर एक संहिता का निर्माण कर सकें, तो निश्चय ही प्रजातांत्रिक ढांचे को कायम रखते हुए एक मजबूत, पारदर्शी, शुद्ध व्यवस्था संचालन की प्रक्रिया बना सकते हैं। हां, तब प्रतिक्रिया व्यक्त करने वालों को मुखर करना पड़ेगा और चापलूसों-लापरवाहों को हताश, ताकि सबसे ऊपर अनुशासन और आचार संहिता स्थापित हो सके अन्यथा अगर आदर्श ऊपर से नहीं आया तो क्रांति नीचे से होगी। जो व्यवस्था अनुशासन आधारित संहिता से नहीं बंधती, वह विघटन की सीढ़ियों से नीचे उतर जाती है। काम कम हो, माफ किया जा सकता है, पर आचारहीनता एवं गैरजिम्मेदारी तो सोची समझी गलती है- उसे माफ नहीं किया जा सकता।

”सिस्टम“ की रोग मुक्ति, स्वस्थ समाज एवं प्रशासन का आधार होगा। राष्ट्रीय चरित्र एवं सामाजिक चरित्र निर्माण के लिए प्रशासन से जुड़े कर्मचारियों एवं अधिकारियों को आचार संहिता से बांधना ही होगा, अन्यथा भोले-भाली जनता आत्महत्या को विवश होती रहेगी।

दो राहगीर एक बार एक दिशा की ओर जा रहे थे। एक ने पगडंडी को अपना माध्यम बनाया, दूसरे ने बीहड़, उबड़-खाबड़ रास्ता चुना। जब दोनों लक्ष्य तक पहुंचे तो पहला मुस्कुरा रहा था और दूसरा दर्द से कराह रहा था, लहूलुहान था। हमारा प्रशासनिक ढ़ांचा राजमार्ग बने, उबड़-खाबड़ बीहड़ नहीं। शासन-प्रशासन को जबावदेही तो लेनी ही होगी। किसी काम या शिकायत के निपटारे के लिए एक निर्धारित अवधि एवं न्यूनतम प्रक्रिया होनी चाहिए। सरकार अगर खुद को जनता के प्रति जिम्मेदार मानती है तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शासन-तंत्र में आम लोगों की शिकायतों का निपटारा या जरूरत के काम समय पर पूरे हों। शासकीय कामकाज में टामटोल, उदासीनता या भ्रष्टाचार सरकार में जनता का भरोसा कमजोर करते हैं। 

शासन-प्रशासन से जुड़ी शक्तियां अपने कामकाज की शैली में पारदर्शिता, त्वरता एवं ईमानदारी के कोरे दावे ही नहीं करें, बल्कि प्रक्रिया भी प्रस्तुत करें।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
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महामारी के सबक को सीख बनाना होगा

महामारी के सबक को सीख बनाना होगा

03-Feb-2021

महामारी के सबक को सीख बनाना होगा
-ललित गर्ग-

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भारत में कोरोना संक्रमण के कहर को झेल रही जिन्दगी बड़े कठोर दौर के बाद अब सामान्य होने की कगार पर दिखाई दे रही है। वैज्ञानिकों की नेशनल सुपर मॉडल समिति ने लगभग चार माह पहले ही दावा किया था कि देश में कोरोना का चरम सितम्बर में ही आ चुका था और फरवरी 2021 में कोरोना का वायरस फ्लैट हो जाएगा। ऐसा ही होते हुए दिख रहा है। इस महामारी से ध्वस्त हुई अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने एवं भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने की दृष्टि से बजट-2021 में अनेक प्रावधान किये गये हैं। कोरोना महामारी ने आर्थिक पीड़ाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण के सबक दिये हैं। उन्नत भारत का निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए हमें इन सबक को सीख बनाना होगा।
सबसे जरूरी सीख यही है कि हमें अब प्रकृति के निर्मम शोषण पर नियंत्रण करना होगा। जलवायु संकट, लगातार पिघलते ग्लेशियर, अनियमित मौसम, बढ़ता प्रदूषण, एवं वायु, भूमि व पहाड़ों पर असीमित दोहन ने देश और दुनिया को एक खतरनाक मुहाने पर ला खड़ा कर दिया है। ये सभी गंभीर संकट में हैं। कोरोना के संक्रमण दौर में यह देखना अद्भुत एवं सुखद अनुभव रहा कि लॉकडाउन ने प्रकृति को फिर से संवारने एवं स्वच्छ करने का काम किया है। इस अवधि में हमने कई दशकों के बाद फिर से नीला आसमान देखा, नदियों-तालाबों का जल स्वच्छ एवं साफ-सुथरा देखा, प्रदूषण का स्तर नीचे गिरा और जीवों, पक्षियों व कीटों की कई प्रजातियों को नवजीवन मिला। अब हमें लगातार प्रयास करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि ये सकारात्मक बदलाव निरंतर कायम रहें।
मनुष्य के लोभ एवं संवेदनहीनता त्रासदी की हद तक बढ़ते जाने के ही परिणाम हंै, जो वन्यजीवों, पक्षियों, प्रकृति एवं पर्यावरण के असंतुलन एवं विनाश के बड़े सबब बने हंै। मनुष्य के कार्य-व्यवहार से ऐसा मालूम होने लगा है, जैसे इस धरती पर जितना अधिकार उसका है, उतना किसी ओर का नहीं-न वृक्षों का, न पशुओं का, न पक्षियों का,  न नदियों-पहाड़ों-तालाबों का। दरअसल हमारे यहां बड़े जीवों के संरक्षण पर तो ध्यान दिया जाता है, पर पक्षियों के संरक्षण पर उतना नहीं। कोरोना संकटकाल में हम प्रकृति के नजदीक गये, पक्षियों के साथ कुछ पल बिताये। जीवन के अनेकानेक सुख, संतोष एवं रोमांच में से एक यह भी है कि हम कुछ समय पक्षियों के साथ बिताने में लगाए, भविष्य में भी हम ऐसा क्यों नहीं कर पाएंगे? क्यों हमारी सोच एवं जीवनशैली का प्रकृति-प्रेम कोरोना संकट के समय ही सामने आया? मनुष्य के हाथों से रचे कृत्रिम संसार की परिधि में प्रकृति, पर्यावरण, वन्यजीव-जंगल एवं पक्षियों का कलरव एवं जीवन-ऊर्जा का लगातार खत्म होते जाना जीवन से मृत्यु की ओर बढ़ने का संकेत है। यह बात कोरोना महामारी ने हमें भली-भांति समझायी है, इस समझ को सीख बनाना होगा।
वृक्षारोपण, जैविक खेती को बढ़ाकर तथा माइक्रोवेव प्रदूषण पर अंकुश लगाकर पक्षियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है। अब भी यदि हम जैव विविधता को बचाने का सामूहिक प्रयास न करें, तो बहुत देर हो जाएगी। लॉकडाउन के दौरान वन्यजीवों, पक्षियों, एवं प्रकृति के जीवन में भी अनेक प्रकार के सकारात्मक बदलाव देखने को मिले, जो मानव जीवन के लिये बहुत उपयोगी हैं। लेकिन क्या इन बदलावों को आगे भी जारी रखने के लिये हम अपनी जीवनशैली में बदलाव के लिये तैयार है?
कोरोना महामारी ने हमें पारिवारिक रिश्तों के महत्व को समझाया है। हमने इस दौरान रिश्तों की अहमियत को गहराई से समझा। लॉकडाउन ने रिश्तों को फिर से बनाने और विशेषकर बुजुर्गों के साथ स्नेह व सहयोग बढ़ाने को प्रेरित किया है। भले ही लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की बढ़ी घटनाएं परेशान कर रही हैं। महिलाओं, बच्चों या बुजुर्गों के प्रति किसी भी तरह का अनुचित व्यवहार अस्वीकार्य है। यह भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों के विपरीत भी है। कोविड-19 संकट ने हमें निजी जीवनशैली को भी इस कदर बदलने के लिए मजबूर किया है कि विलासिता की वस्तुओं पर अनावश्यक खर्च कम से कम हो। हममें से कुछ बेशक काफी ज्यादा खर्च कर सकने में सक्षम हैं, लेकिन इससे अनावश्यक खर्च का औचित्य साबित नहीं हो जाता। बाकायदा कानून द्वारा सगाई और विवाह समारोहों में पैसों का होने वाला अश्लील एवं अतिश्योक्तिपूर्ण प्रदर्शन रोका जाना चाहिए, और अनगिनत मेहमानों का आना नियंत्रित किया जाना चाहिए। ऐसे आयोजनों में अधिकतम 50 अतिथि शामिल होने की कोरोना सीख को आगे भी जारी रखा जाना चाहिए। ऐसे देश में, जहां लाखों लोगों को दिन भर में संतुलित भोजन तक न मिल पाता हो, वहां चंद लोगों पर बेहिसाब पैसे खर्च करना किसी अपराध से कम नहीं है।
हम मनुष्य जीवन की मूल्यवत्ता और उसके तात्पर्य को समझें। वह केवल पदार्थ भोग और सुविधा भोग के