मानव इतिहास की त्रासदी

मानव इतिहास की त्रासदी

31-Jan-2020

बहुत सारे मानव मानवीय मूल्यों को लेकर कोई सामाजिक लड़ाई लड़ते हैं फिर वह लड़ाई जीत लेते हैं और फिर उसके बाद शुरू होता है मानव कुंठाओ का एक नया खेल। 

मिसाल के तौर पर अन्ना हजारे के नेतृत्व में बहुत सारे लोग अच्छी भावना लेकर आंदोलन में शामिल हुए सारा देश आंदोलन के साथ जुड़ गया आंदोलन कुछ सफलताओं को चार सफलताओं के साथ देश की हर गली कूचे तक पहुंचा इसमें कुछ मुख्य नाम याद कीजिए अन्ना हजारे केजरीवाल कुमार विश्वास योगेंद्र यादव शांति प्रशांत कपिल मिश्रा शाजिया इलमी किरण बेदी और भी कई नाम

इनमें से कुछ ने अन्ना हजारे के साथ संगठन चलाने और आंदोलन चलाने की अपनी सहमति जारी रखें कुछ नहीं पॉलीटिकल पार्टी बना ली कुछ दूसरी पॉलिटिकल पार्टियों में शामिल हो गए हैं

गौर करने की बात यह है यह सभी लोग एक मंच से एक आवाज लगा रहे थे एक ही विचारधारा पर काम कर रहे थे एक ही कदमताल करते नजर आ रहे थे मगर जैसे-जैसे कामयाबी मिलती गई उस कामयाबी की सीट पर छीना झपटी इन्हें आपस में बांट दी गई और इनमें से बहुत अच्छे दिखने वाले लोग अपने निजी फायदे के लिए कुछ उस वक्त की भ्रष्टाचारी पार्टी में जाने वाली में शामिल हो गए तो कुछ एक धर्म को सीधे गोली मारो गाली देने लगे और कुछ नहीं नई पार्टी बना कर वोट मांगने की प्रक्रिया शुरू कर दी

असल में मानव की कोई विचारधारा है ही नहीं मानव सिर्फ अपनी कुंठाओं से भरा होता है और जैसे ही उसे वक्त मिलता है मौका मिलता है वह अपनी शराफत का लबादा उतार कर फेंक देता है विचारधारा को रोटी के साथ निगल जाता है और जिसे ईमान कहता है उसे दो टके में बेच डालता है

यह बात सिर्फ राजनेताओं या आंदोलनकारियों पर ही लाजिम नहीं होती यह बात नबियों के साथियों पर भी लागू होती है देवताओं के अनुयायियों पर भी लागू होती है और सभी प्रकार के धर्म गुरुओं पर सबसे पहले लागू होती है

यह बात पत्रकारों पर भी लागू होती है और यही सोच अमीर गरीब सभी इंसानों पर लागू होती है
सभी अपनी अपनी पसंद के मिनिमम कॉमन प्रोग्राम देखते हैं और ऐसे संगठनों में शामिल हो जाते हैं जहां उनके मिनिमम कॉमन प्रोग्राम को सफलता मिलने की संभावना हो

इसलिए मेरा मानना यह है कि दुनिया में बुद्धि जीविता और मानवता दोनों ही एक वहम है भरम हैं दरअसल ऐसी कोई चीज दुनिया में है ही नहीं

कोई धर्म की दुकान लगाता है तो कोई कर्म की दुकान लगाता है कोई बहन की दुकान लगाता है तो कोई छल की दुकान लगाता है और अगर कोई सचमुच मानव हो तो आपने ही जैसे दिखने वाली प्रजातियों से हार जाता है और खामोश एकांत की तरफ चला जाता है

अर्थात हमारे पास चंद सांसे हैं जो हमें लेनी है और इन सांसों को लेने के लिए न जाने कितनी सांसें छीन लेनी है यही दुनिया है यही देश है यही धर्म है

आज के दौर दुनिया भर में दानव राज का है और दानव अपनी इच्छा पूर्ति करेंगे और कर रहे हैं
मुझे दानव राज से भी कोई गिला नहीं क्योंकि यह भी एक प्रक्रिया का हिस्सा है दानव राज ना होगा तो फिर नरभक्षी कैसे लिखा जाएगा अगर नरभक्षी होगा तो तभी शाकाहार की कोई व्याख्या घड़ी जा सकती है

ऐसे ही मन हुआ कि चलो आपको चिढ़ा दूं धैर्य के साथ बकवास पढ़ने के लिए धन्यवाद { वाहिद नसीम वरिष्ठ पत्रकार हैं )

 

 


शाहीन,बाज़ (ईगल)  बुलंदी पर उड़ना बच्चों का खेल नहीं है।

शाहीन,बाज़ (ईगल) बुलंदी पर उड़ना बच्चों का खेल नहीं है।

29-Jan-2020

शाहीन,बाज़ (ईगल) माद्दा के बच्चों का जब उड़ना सीखने का वक़्त आता है तब उनकी माँ उनको उठाकर दस हज़ार फीट की बुलंदी पर ले जाती है और फिर वहां से नीचे ज़मीन की तरफ फेंक देती है बच्चा नीचे गिरना शुरू होता है। अपने नन्हे पर फड़फड़ाकर अपने आपको बचाने और उड़ने की कोशिश करता रहता है मगर दस हज़ार फीट की बुलंदी पर उड़ना बच्चों का खेल नहीं है। दुनिया में सिर्फ ये एक ही परिंदा है जो इतनी बुलंदी पर उड़ता है। किसी दुसरे परिंदे की मजाल ही नहीं जो इस बुलंदी को छू सके। वो बच्चा तेज़ी से। नज़दीक आती ज़मीन को देखकर सहम जाता है,अपने परों को और तेज़ी से मारना शुरू कर देता है। अपनी आख़री कोशिश करता है फिर फिजा में अपनी नजरें घुमाकर माँ को ढूंडने की कोशिश करता है मगर उसकी माँ कहीं नज़र नहीं आती, जो करना है ख़ुद ही करना है। बचना है तो उड़ना है। वरना मरना है। बच्चा अपनी कोशिश जारी रखता है मगर कामयाबी नहीं मिलती यहाँ तक की ज़मीन करीब पहुँच जाती है। उसके ज़मीन से टकराने और पाश पाश होने में बस कुछ ही लम्हे बाक़ी होते है। वो अपनी आँखें बंद कर लेता है। उसे इतने में अपने नज़दीक दो परों की फड फडाहट सुनाई देती है। उसे महसूस होता है किसी ने उसे अपने पंजों में दबोच लिया है। अब वो गिर नहीं रहा। उसकी माँ उसे गिरने से पहले दोबारा दबोच लेती है और वापस घोंसले में पहुंचा देती है। ये अमल उस वक़्त तक जारी रहता है जबतक बच्चा बेखौफ़ होकर उड़ना सीख नहीं लेता। माद्दा ईगल सिर्फ उड़ने तक उसका साथ नहीं देती बल्कि जीवन साथी चुनने में अपने नर साथी के साथ उसकी सलाहियतों को परखती है। किसी नर ईगल से मिलन से पहले माद्दा ईगल एक पत्थर को बुलंदी से फेंकती है। ये नर ईगल के लिए चेलेंज होता है के वो ये पत्थर पकड़ कर दिखाए जो ज़मीन पर गिरता है।जहां हर चीज़ की रफ्तार ग्रेविटी की वजह से बढती जाती है जो की 200 किलो मीटर प्रति घंटा भी हो सकती है। मगर ईगल की रफ़्तार इससे कई ज़्यादा 300 किलो मीटर प्रती घंटा तक हो सकती है। नर ईगल निहायत ही तेज़ी से ज़मीन की तरफ जाकर उस पत्थर को ले आता है। माद्दा ईगल ये आज़माईश सिर्फ एक मर्तबा नहीं बल्कि उस वक़्त तक जारी रखती है जबतक उसे ये इत्मीनान ना हो जाए के नर ईगल उसे कमाने की सलाहियत रखता है या नहीं।

शाहीन (ईगल) एकदम निडर और बहाद्दुर परिंदा है। डर क्या होता खौफ किस चिड़िया का नाम है? ये परिन्दा नहीं जानता। शिकार करते वक़्त वो ये कभी नहीं सोचता के उसका शिकार कौन है? कितना वज़नी है और किस किस हथियार से लैस है। ये मुरदार(मरा हुआ) हरगिज़ नहीं खाता बल्कि ख़ुद ताज़ा शिकार करके खाता है। इसकी निगाहें इंसान की निगाहों से पांच गुना ज़्यादा तेज़ होती है।  इसका शिकार जब इसकी नज़रों में आ जाता है तो उसका बचना तकरीबन ना मुमकिन हो जाता है। बड़े जानवरों के शिकार के लिए ये अमूमन बुलंदी से गिराने का तरीक़ा इस्तेमाल करता है।इसके इस स्ट्रेटेजी से कछवे जैसी मोटी चमड़ी रखने वाला भी सुरक्षित नहीं रहता। ये बुलंदी पर लेजाकर उन्हें चट्टानों पर पटख देता है जिनसे उनकी खाल पाश पाश हो जाती है।

तूफ़ान के आने पर तमाम परिंदे सुरक्षित जगह तलाश करते है लेकिन शाहीन तूफानों से मोहब्बत करने वाला परिंदा है। तूफानों की तुंद तेज़ हवाओं से इसे बुलंदी पर उड़ने केलिए कम मेहनत करनी पडती है। ये परिंदा बजाए घबराने के तूफानों से मोहब्बत करता है। ये परिंदा क़ुदरत का एक बेहतरीन शाहकार है। जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
इल्यास मख़दूम सर

 

 


: गणतंत्र की सफलता जनता की भागीदारी और उनके सपनों को पूरा करने में: श्री भूपेश बघेल

: गणतंत्र की सफलता जनता की भागीदारी और उनके सपनों को पूरा करने में: श्री भूपेश बघेल

26-Jan-2020

गणतंत्र दिवस पर मुख्यमंत्री की तीन बड़ी घोषणाएं: आगामी शिक्षा सत्र से प्राथमिक शालाओं में छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हल्बी, भतरी, सरगुजिया, कोरवा, पांडो, कुडुख, कमारी में भी होगी पढ़ाई की व्यवस्था
 स्कूलों में किया जाएगा संविधान की प्रस्तावना का वाचन

छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों की जीवनी पर परिचर्चा जैसे आयोजन होंगे स्कूलों में

मुख्यमंत्री ने जगदलपुर में ध्वजारोहण कर ली परेड की सलामी

 

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर के लालबाग परेड मैदान में आयोजित गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह में ध्वजारोहण कर परेड की सलामी ली। इस अवसर पर उन्होंने जनता के नाम अपने संदेश में कहा कि गणतंत्र की सफलता की कसौटी जनता से सीखकर, उनकी भागीदारी से, उनके सपनों को पूरा करने में है। श्री बघेल ने प्रदेशवासियों को देश के 71वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि छत्तीसगढ़ की माटी और छत्तीसगढ़ की जनता से बड़ी कोई पाठशाला नहीं है। मैं जितनी बार बस्तर आता हूं, सरगुजा जाता हूं या गांव-गांव का दौरा करता हूं तो हर बार मुझे कोई नई सीख जरूर मिलती है। लोहण्डीगुड़ा ने हमें आदर्श पुनर्वास कानून के पालन की सीख दी तो आदवासियों की जमीन वापसी से छत्तीसगढ़ सरकार को अपार यश मिला। कुपोषण मुक्ति के लिए नवाचार और दृढ़संकल्प की शुरूआत दंतेवाड़ा से हुई। बीजापुर ने दूरस्थ अंचलों में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने का प्रण दिया। सुकमा तथा बस्तर जिले में फूडपार्क, कोण्डागांव में मक्का प्रोसेसिंग इकाइयां लगाने का जज्बा दिया।
मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ी में सम्बोधन की शुरूआत करते हुए कहा कि जम्मो संगी-जहुंरिया, सियान-जवान, दाई-बहिनी अऊ लइका मन ला जय जोहार, 71वें गणतंत्र दिवस के पावन बेरा म आप जम्मो मन ल बधाई अउ सुभकामना देवत हंव।

मुख्यमंत्री ने की तीन बड़ी घोषणाएं

    मुख्यमंत्री ने कहा कि आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर मैं नई पीढ़ी को जागरूक और सशक्त बनाने के संबंध में तीन नई घोषणाएं करता हूं। जब केन्द्र में यूपीए सरकार थी तब ’शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009’ में प्रावधान किया गया था कि बच्चों को यथासंभव उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाये। विडंबना है कि राज्य में अभी तक इस दिशा मंे ठोस पहल नहीं की गई। आगामी शिक्षा सत्र से प्रदेश की प्राथमिक शालाओं में स्थानीय बोली-भाषाओं छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हल्बी, भतरी, सरगुजिया, कोरवा, पांडो, कुडुख, कमारी आदि में पढ़ाई की व्यवस्था की जाएगी। सभी स्कूली बच्चों को संविधान के प्रावधानों से परिचित कराने के लिए प्रार्थना के समय संविधान की प्रस्तावना का वाचन, उस पर चर्चा जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे। छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों की जीवनी पर परिचर्चा जैसे आयोजन किए जाएंगे।

छत्तीसगढ़ भी बना देश के महान क्रांतिकारियों की परंपरा का हिस्सा

    श्री बघेल ने कहा कि मुझे यह कहते हुए बहुत गर्व का अनुभव होता है कि बस्तर के हमारे अमर शहीद गैंदसिंह और उनके साथियों ने सन् 1857 की पहली क्रांति के ज्ञात-इतिहास से बहुत पहले परलकोट विद्रोह के जरिये गुलामी के खिलाफ जो अलख जगाई थी, वह भूमकाल विद्रोह के नायक वीर गुण्डाधूर और शहीद वीरनारायण सिंह के हाथों में पहुँचकर मशाल बन गई। मैं यह सोचकर भी बहुत रोमांचित हो जाता हूँ कि अमर शहीद मंगल पाण्डे, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रानी लक्ष्मी बाई जैसे क्रांतिकारियों की पावन परंपरा का हिस्सा छŸाीसगढ़ भी बना था।

मुख्यमंत्री ने महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को नमन किया

    मुख्यमंत्री ने देश के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को नमन करते हुए कहा कि हमारा छत्तीसगढ़, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जैसी विभूतियों के पद-चिन्हों पर चला। पं. रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, डॉ. खूबचंद बघेल, पं. संुदरलाल शर्मा, बैरिस्टर छेदीलाल, यतियतन लाल, डॉ. राधाबाई, पं. वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, अनंतराम बर्छिहा, मौलाना अब्दुल रऊफ खान, हनुमान सिंह, रोहिणी बाई परगनिहा, केकती बाई बघेल, बेला बाई के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा। मैं सभी को नमन करता हूं।

भारतीय संविधान की गौरवगाथा को किया याद

    श्री बघेल ने कहा कि आज का दिन भारतीय संविधान निर्माण की गौरवगाथा को याद करने का है और यह संकल्प लेने का भी, कि हम सब भारतवासी अपने संविधान की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहेंगे। संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर ने कहा था-यह तथ्य मुझे व्यथित करता है कि भारत ने पहले भी एक बार स्वतंत्रता खोई है। यदि राजनीतिक दल अपने पंथ को देश के ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ़निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए। हमें खून के आखिरी कतरे तक, अपनी आजादी की रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए। हमें अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों कोे प्राप्त करने के लिए निष्ठापूर्वक संवैधानिक उपायों का ही सहारा लेना चाहिए। आज के दिन हमें याद करना चाहिए कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना ’’हम भारत के लोग’’ के उद्घोष के साथ शुरू होती है। जिसमें न्याय, समता, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा, विचार-अभिव्यक्ति-विश्वास-धर्म और उपासना की स्वतंत्रता जैसे शब्द मील के पत्थर की तरह हमें रास्ता दिखाते हैं। आज का दिन यह रेखांकित करने का भी है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने साम्प्रदायिकता को अपने समय की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में चिन्हित किया था, इसलिए उन्हांेने धर्मनिरपेक्ष समाज और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की मजबूत नींव डालने के लिए धर्मनिरपेक्ष संविधान पर जोर दिया था। वहीं देश के नियोजित विकास का आधारभूत ढांचा खड़ा किया था, जो भारत की योजनाबद्ध तरक्की का आधार बना। सात दशकों में भारत ने विकास की जो ऊंचाइयां हासिल की हैं, उसका सबसे बड़ा कारण हमारे संविधान की वह शक्ति है, जो तमाम विविधताओं के बीच भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाती है।

रचनात्मक सोच से मिली छत्तीसगढ़ को देश और दुनिया में खास पहचान

    मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा कि देश के ताजा हालात किसी से छिपे नहीं हैं। तमाम प्रतिगामी ताकतों और हरकतों के बीच छत्तीसगढ़ एक बार फिर यह साबित करने में सफल हुआ है कि हमें जोड़ना आता है, हमें रचना आता है, हमें बनाना आता है। तोड़ने-फोड़ने-बिगाड़ने में प्रदेश की जनता का कभी कोई विश्वास नहीं था। रचनात्मक सोच और कार्य ही हमारा रास्ता बनाते रहे हैं। इसके लिए मैं छत्तीसगढ़ की जनता का, आप सबका, तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। आप लोगों की इसी विशेषता की वजह से छत्तीसगढ़ को देश और दुनिया में खास पहचान मिली है।

उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से छत्तीसगढ़ हुआ सम्मानित

    राष्ट्रीय कृषि कर्मण पुरस्कार, राष्ट्रीय आजीविका मिशन के अंतर्गत 5 पुरस्कार, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के अंतर्गत 9 पुरस्कार, महात्मा गांधी नरेगा योजना के अंतर्गत 7 पुरस्कार, राष्ट्रीय पंचायत अवार्ड के तहत 11 जिलों तथा एक-एक जनपद और ग्राम पंचायतों को मिले पुरस्कार यह साबित करते हैं कि हमारे किसानों और ग्रामीण भाई-बहनों की प्रतिभा राष्ट्रीय स्तर पर अपना लोहा मनवाने की काबीलियत रखती है। नीति आयोग द्वारा देश के 115 आकांक्षी जिलों की जो रैंकिंग जारी की गई है, उसमें सुकमा जिला पहले स्थान पर है। इसी प्रकार स्वच्छता सर्वेक्षण में भी छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा है, ये सारे पुरस्कार और सम्मान आप लोगों को समर्पित हैं।

प्रदेश में गठित हुई 704 नई ग्राम पंचायतें

    श्री बघेल ने कहा कि हमने जनता से मिले अधिकार, जनता को ही सौंपने की दिशा में अनेक निर्णय लिए हैं। बड़ी पंचायतों के परिसीमन से 704 नई पंचायतें गठित हुई जिनमें से 496 अनुसूचित क्षेत्रों में है। हमने पेसा क्षेत्रों को अधिकार और विकास की नई रोशनी देने के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। ग्राम पंचायतों से विकेन्द्रीकरण की शुरूआत की है, तो नए जिले ‘गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही’ के गठन का निर्णय भी लिया गया। हम पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए जनभागीदारी बढ़ाने और संस्थाओं के सशक्तिकरण का काम तेजी से कर रहे है। छत्तीसगढ़ पंचायत अधिनियम, 1993 में संशोधन करके उम्मीदवारों की न्यूनतम योग्यता में कक्षा का मापदण्ड हटाकर ‘साक्षर’ कर दिया है। इसी प्रकार चुनकर न आने की स्थिति में निःशक्तजनों को नामांकित करने का प्रावधान किया गया है।

राज्य के संसाधन जनता की बेहतरी के लिए

    मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल राज्य की जनता की बेहतरी के लिए करने का जो संकल्प लिया है, उससे हमारी प्राथमिकताएं तय हो गई हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हमने डीएमएफ के सदुपयोग के लिए नियमों में जो संशोधन किए उसके परिणाम मिलने लगे हैं। स्कूल-कॉलेजों में शिक्षक, अस्पतालों में डॉक्टर, बच्चों को फीस में छूट, कोचिंग और आवासीय प्रशिक्षण की सुविधा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी अनेक सुविधाओं से खनन प्रभावित अंचलों में नवजीवन का संचार हो रहा है। आदिवासी अंचलों में युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी तथा अन्य रोजगार के अवसर मिले हैं। दंतेवाड़ा जिले में हाट बाजार क्लीनिक, ‘मेहरार-चो-मान’, कबीरधाम जिले में ‘शाला संगवारी’ दुर्ग जिले में ‘हेल्थ कूरियर वालंटियर (रनर्स) बस्तर में सुपोषण के नए आयामों से जनहित के जमीनी कार्यों को नई सोच नई दिशा, नई गति मिली है। किसानों, ग्रामीणों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं, युवाओं सहित हर तबके को बेहतर अवसर और भागीदारी देने के लिए हमने विशिष्ट योजनाएं बनाई, जिसके कारण प्रदेश में नये उत्साह का संचार हुआ है।

दंतेवाड़ा से प्रारंभ हुआ गरीबी उन्मूलन के विशेष अभियान

    श्री बघेल ने कहा कि समयबद्ध परिणाममूलक योजनाएं और कार्यक्रम बनाए बिना, हम अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकते, इसलिए हमने एक व्यापक कार्य योजना के साथ प्रदेश के सबसे पिछड़े अंचल को सबसे पहले गरीबी और उसके प्रभावों से उबारने का संकल्प लिया है। भारतीय रिजर्व बैंक एवं वर्ल्ड बैंक के अनुमानों के अनुसार बस्तर के जिलों में बी.पी.एल. परिवारों का प्रतिशत 50 से 60 के बीच है, जबकि देश में बी.पी.एल. परिवारों का औसत लगभग 22 प्रतिशत है। विगत दशकों में देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या में कमी हुई है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों की मूलभूत समस्याओं का निदान नहीं हुआ। दंतेवाड़ा जिले में लगभग 57 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं, जो आर्थिक-सामाजिक सूचकांक में भी सबसे नीचे हैं। हमने यह लक्ष्य निर्धारित किया है कि आगामी चार सालों में दंतेवाड़ा जिले में गरीबी उन्मूलन हेतु विशेष अभियान चलाकर वहां रहने वाले बी.पी.एल. परिवारों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम अर्थात 22 प्रतिशत से कम की जाए। आगामी वर्ष इस कार्ययोजना का विस्तार दो अन्य जिलों में किया जाएगा, जहां बी.पी.एल. परिवारों का प्रतिशत सर्वाधिक है। इसके साथ ही हमने युद्ध स्तर पर अनेक राज्य स्तरीय योजनाएं, कार्यक्रम और अभियान शुरू किए हैं, जिसकी प्रगति उत्साहजनक है।

निर्दोष आदिवासी परिवारों को मिलेगी आपराधिक प्रकरणों की त्रासदी से मुक्ति

    मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर के निर्दोष आदिवासी परिवारों को आपराधिक प्रकरणों की त्रासदी से मुक्त कराने के लिए गठित जस्टिस ए.के. पटनायक  समिति की सिफारिश के आधार पर पहले चरण में 313 लोगों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ है, जो उनके लिए बहुत बड़ी आर्थिक और सामाजिक राहत भी है। आगे भी यह समिति सैकड़ों लोगों को  न्याय दिलाएगी। उन्होंने कहा कि ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006’ के तहत निरस्त दावों की समीक्षा से हजारों परिवारों में नई उम्मीद जागी है। वहीं सामुदायिक वन अधिकारों के तहत स्थानीय लोगों को न्याय दिलाने की शुरूआत भी हमने की है। कोण्डागांव और धमतरी जिले के जबर्रा में हजारों एकड़ जमीन के सामुदायिक अधिकार पत्र देने से संबंधित गांवों में विकास की नई क्रांति हो रही है। इतना ही नहीं सर्वे तक को मोहताज रखे गये, अबुझमाड़ क्षेत्र के निवासियों को वन अधिकार पत्र देने की विशेष पहल की जा रही है। हमने तेंदूपत्ता संग्रहण पारिश्रमिक दर 2500 रू. प्रति मानक बोरा से बढ़ाकर 4000 हजार रू. प्रति मानक बोरा की है, जिसके कारण विगत वर्ष 15 लाख से अधिक परिवारों को 602 करोड़ रूपए का भुगतान हुआ। अब न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी जाने वाली लघु वनोपजों की संख्या 8 से बढ़ाकर 22 कर दी है। एक हजार से अधिक हाट-बाजारों पर संग्रहण केंद्र तथा वन-धन-विकास केंद्र की स्थापना की गई है। 50 हजार आदिवासी महिलाओं को इन केन्द्रों से जोड़ा गया है। नई औद्योगिक नीति में कृषि व उद्यानिकी को भी स्थान दिया गया है। इसके अलावा स्थानीय संसाधनों से स्थानीय विकास और स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए आकर्षक प्रावधान किए गए हैं।

नई पीढ़ी को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की पहल

    मुख्यमंत्री ने कहा कि नई पीढ़ी को अच्छी शिक्षा से लेकर रोजगार दिलाने तक का का काम सामूहिक जिम्मेदारी का है। अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के प्री-मैट्रिक छात्रावास, आवासीय विद्यालयों आश्रमों में निवासरत विद्यार्थियों की शिष्यवृत्ति बढ़ाकर 1000 रूपए प्रतिमाह करना, मैट्रिकोत्तर छात्रावासों के विद्यार्थियों की भोजन सहायता की राशि बढ़ाकर 700 रूपए प्रतिमाह करना, जाति प्रमाण पत्र जारी करने  की  सरल व्यवस्था, 17 नये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय शुरू करना इसके कुछ उदाहरण है। हम दो दशकों के इतिहास में पहली बार लगभग 15 हजार स्थाई शिक्षक-शिक्षिकाआंे की भर्ती कर रहे हैं, जिससे 7 हजार से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाएं आदिवासी अंचलों की शालाओं को मिलंेगे। उच्च शिक्षा को सुविधाजनक और गुणवत्तायुक्त बनाने के लिए प्रदेश में 10 आदर्श महाविद्यालयों की स्थापना, 54 महाविद्यालयों में अधोसंरचना विकास हेतु आर्थिक सहायता दी गई है, वहीं दूसरी ओर सहायक प्राध्यापक, ग्रंथपाल, क्रीड़ा अधिकारी के लगभग 1500 पदों पर भर्ती की जा रही है। 34 सरकारी कॉलेजों में लगभग 4 हजार तथा 56 अशासकीय कॉलेजों में 6 हजार सीटें बढ़ाई गई हैं। हर जिले में कन्या छात्रावास की उपलब्धता को अनिवार्य बनाया गया है। बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभाग में स्थानीय लोगों की भर्ती में तेजी लाने के लिए कनिष्ठ सेवा चयन बोर्ड का गठन, जिला संवर्ग में भर्ती की समय-सीमा दो वर्ष बढ़ाना, सभी वर्गों के युवाओं को विभिन्न विभागों में हजारों पदों पर भर्ती, कौशल उन्नयन और रोजगारपरक प्रशिक्षण जैसे अनेक उपाय किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए खेल प्राधिकरण का गठन, राज्य स्तरीय युवा महोत्सव का आयोजन शुरू किया गया है, जिससे युवाओं को चौतरफा संभावनाएं दिखाई पड़ने लगी हैं। हम युवाओं को यह संदेश देने में सफल हुए हैं कि  पढ़ाई के अलावा उनके कैरियर निर्माण के अन्य कई रास्ते तलाशे जा रहे हैं। गांव-गांव में युवा-शक्ति को रचनात्मक दिशा देने के लिए ‘राजीव मितान क्लब’ गठित किए जाएंगे। इन क्लबों को अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए प्रतिमाह 10 हजार रूपए दिए जाएंगे।

   दो हजार आंगनबाड़ी भवन निर्माण की मंजूरी

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मातृ शक्ति को समुचित अधिकार व आदर देने के साथ माताओं तथा शिशुओं की देखरेख में सहायक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, मिनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं का मानदेय 700 रूपए से 1500 रूपए तक बढ़ाया गया है। 10 हजार आंगनबाड़ी केन्द्रों को नर्सरी स्कूल के रूप में विकसित करने 2 हजार आंगनवाड़ी केन्द्र भवनों के निर्माण की मंजूरी दी गई है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत् सहायता राशि 15 हजार से बढ़ाकर 25 हजार रूपए की गई हैै।

किसानों को चार हजार करोड़ रूपए से अधिक का ब्याज मुक्त कृषि ऋण

    श्री बघेल ने कहा कि हमने किसानों को प्रति क्विंटल धान के लिए 2500 रूपए देने, अल्पकालीन ऋण माफी का वायदा निभाया है। इसके साथ ही मक्के की खरीदी समर्थन मूल्य पर करने, उद्यानिकी फसलों का विस्तार करने जैसे अनेक कदम उठाए हैं, जिससे किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल रही है। राज्य के इतिहास में पहली बार एक साल में ब्याज मुक्त कृषि ऋण प्रदाय ने 4 हजार करोड़ रूपए का आंकड़ा पार किया है, जो हमारी सरकार के प्रति किसानों के लगातार बढ़ते विश्वास के साथ ही। हमारी नीतियों को मिल रहे सहयोग और समर्थन का प्रतीक है। हमने प्रदेश के हर परिवार को खाद्यान्न और पोषण सुरक्षा देने के लिए सार्वभौम पीडीएस का वायदा निभाया है। अत्यंत जरूरतमंद परिवारों को 1 रूपए किलो की दर से 35 किलो चावल देने के अलावा ए.पी.एल. तथा अन्य वर्गों की जरूरतों का भी ख्याल रखा है। आदिवासी अंचलों में निःशुल्क रिफाइन्ड आयोडाइज्ड नमक, चना, गुड़ देने की व्यवस्था भी कर दी है।

‘नरवा, गरवा, घुरवा, बारी’ कार्यक्रम बन रहा आंदोलन

मुख्यमंत्री ने कहा कि ग्रामीण संस्कृति और अर्थव्यवस्था को समवेत करते हुए हमने ‘नरवा, गरवा, घुरवा, बारी’ के जरिये अपनी चिन्हारी को बचाने का बीड़ा उठाया, जिसके अंर्तगत 2 हजार से अधिक जलाशयों के वैज्ञानिक ढंग से विकास के कदम उठाए जा रहे हैं। 5 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में गौठानों का विकास किया जा रहा है, जिसमें से प्रत्येक विकासखंड में एक ‘मॉडल गौठान’ बनाया जा रहा है। लगभग 3 लाख 14 हजार मीट्रिक टन जैविक खाद का निर्माण और उपयोग किया गया है। अब यह कार्यक्रम आंदोलन का रूप ले रहा है।

पांच वर्षों में वास्तविक सिंचाई का रकबा दोगुना करने का लक्ष्य

    मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार ने पीने के पानी से लेकर सिंचाई और उद्योग तक के लिए पर्याप्त जल की व्यवस्था तेजी से करने की जरूरत समझी है। इसके लिए जल संसाधन नीति तैयार की जा रही है। सिंचाई विकास प्राधिकरण का गठन किया गया है। हमारा लक्ष्य है कि 5 साल में वास्तविक सिंचाई का रकबा दोगुना हो जाए। गांवों से लेकर शहरों तक अच्छी सड़कों का जाल बिछाने के लिए एक ओर जहां ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ के अंतर्गत 3 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण कराया जा रहा है, वहीं ‘मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना’, ‘मुख्यमंत्री ग्राम गौरव पथ योजना’ सहित विभिन्न योजनाओं के तहत 10 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कें बनाने की कार्ययोजना पर अमल किया जा रहा है। हमने प्रति माह 400 यूनिट तक बिजली खपत पर बिजली बिल आधा करने का वादा भी पूरा किया गया है। इसके अलावा प्रदेश को अधिक बिजली खपत वाला राज्य बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। विद्युत अधोसंरचना के विस्तार तथा उपभोक्ता सेवा में सुधार का कार्य दु्रतगति से किया जा रहा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने दोनों सालों की शुरूआत श्रमिक भाई-बहनों के बीच जा कर की है। यह हमारा स्पष्ट संदेश है कि मेहनत करने वालों को सम्मान और अधिकार मिलना ही चाहिए, इसलिए हमने श्रमिकों के कल्याण के लिए कई नई योजनाएं शुरू की है। औद्योगिक स्थापनाओं में सेवारत कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष कर दी गई है। मासिक पेंशन योजना के तहत् 3 हजार रूपए दिए जाएंगे। असंगठित श्रमिकों के कल्याण हेतु समग्र नीति का निर्माण किया जा रहा है। संगठित श्रमिकों तथा निर्माण श्रमिकों के कल्याण हेतु नए कदम उठाए जा रहे हैं। इसके अलावा ‘दुकान एवं स्थापना अधिनियम’ के अंर्तगत पंजीकृत संस्थानों को वार्षिक नवीनीकरण तथा अन्य कई प्रावधानों से छूट दी गई है। श्रमजीवी पत्रकार साथियों की सेवानिवृत्ति की आयु भी बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई है। हमने मध्यम वर्गीय परिवारों को आर्थिक समस्याओं से निजात दिलाने के लिए भी अनेक कदम उठाए हैं, जैसे छोटे भूखण्डों की खरीदी-बिक्री पर लगी रोक हटाई, गाइड लाइन दरों में 30 प्रतिशत तथा पंजीयन शुल्क में 2 प्रतिशत की कमी, नगरीय क्षेत्रों में 7500 वर्गफीट तक की सरकारी जमीन के 30 वर्षीय पट्टे, फ्री-होल्ड अधिकार, भू-भाटक से छूट, नामांतरण-डायवर्सन में सरलता, भुइयां सॉफ्टवेयर से जन सुविधा आदि। मेरा मानना है कि इन फैसलों से जनता को संवेदनशील सरकार की उपस्थिति का का अहसास हुआ है।

देश में सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना लागू

    श्री बघेल ने कहा कि सबको निःशुल्क उपचार की सुविधा देने के लिए हमने प्रदेश में दो नई योजनाएं लागू की हैं-‘डॉ. खूबचन्द बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना’ एवं ‘मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना’। इन योजनाओं से 50 हजार से लेकर 20 लाख रूपए तक निःशुल्क उपचार की सुविधा राशन कार्ड के जरिये मिलेगी। जांच व राज्य के बाहर उपचार की सुविधा प्रदान की जाएगी। इस तरह हमने देश में सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना लागू कर दी है। हमने शहरों और गांवों में रहने वाले अनुसूचित जाति, जनजाति परिवारों तथा ऐसे तबकों की सेहत संबंधी जरूरतों को काफी बारीकी से समझा है, जो अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते। इस तरह  ‘मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक योजना’ आदिवासी अंचलों में ऐसे परिवारों के लिए जीवनदायिनी बन गई है। इस योजना में अब-तक 2 हजार 309 हाट बाजारों में 13 हजार 214 शिविर आयोजित किए गए, जिसका लाभ 7 लाख 81 हजार मरीजों को मिला। ‘मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना’ के अंतर्गत 1 हजार 403 शिविर आयोजित किए गए, जिसका लाभ लगभग 1 लाख से अधिक मरीजों को मिल चुका है। हमने नई पीढ़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाने हेतु प्रदेश स्तरीय सुपोषण अभियान शुरू किया है, जिसके तहत् आंगनवाड़ी केन्द्रों में प्रोटीनयुक्त पोषण के लिए चना, फल, अण्डा व स्थानीय स्तर पर उपलब्ध उत्तम सामग्री वैकल्पिक रूप से देने की शुरूआत की गई है। इस अभियान में डीएमएफ, सीएसआर से लेकर जनभागीदारी तक सबका सहयोग लिया जा रहा है। मेरा मानना है कि कुपोषण के खिलाफ निर्णायक जंग में अब पूरा प्रदेश एकजुट है।

‘सिरपुर एकीकृत विकास’ कार्य योजना पर होगा अमल

    श्री बघेल ने कहा कि हमने अपनी संस्कृति को मां के समान सम्मान दिया है, क्योंकि संस्कृति की गोद में संस्कार पनपते हैं। राज्य के प्रमुख त्यौहारों पर सार्वजनिक अवकाश देने के साथ, इन्हें लोकप्रिय बनाने के कदम भी उठाए गए हैं। इसी प्रकार अपनी विरासत को सहेजने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। भगवान राम के वनवास काल से जुड़ी आस्थाओं का सम्मान करते हुए ‘राम वनगमन पर्यटन परिपथ’ के विकास का निर्णय लिया गया है।  बौद्धकालीन विरासतों के सम्मान में ‘सिरपुर एकीकृत विकास’ कार्य योजना बनाई गई है। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव के प्रथम आयोजन में भारत सहित 7 देशों, 24 राज्यों की भागीदारी से हम यह संदेश देने में सफल हुए हैं कि छत्तीसगढ़ सर्वधर्म-सर्वसमभाव-समरसता-सद्भाव और संस्कृतियों को बचाने वाला राज्य है। जनता की मांग पर अब यह आयोजन प्रतिवर्ष करने का निर्णय लिया गया है, ताकि हमारे प्रदेश की आदिवासी संस्कृति को दुनिया में सम्मान मिले और हम विश्व बंधुत्व के विस्तार में योगदान दे सकें। स्वामी विवेकानंद के प्रवास की यादों को चिरस्थायी और प्रेरणादायी बनाने के लिए रायपुर में वे जिस भवन में ठहरे थे, उसे स्मारक बनाने की कार्यवाही शुरू कर दी गई है। हमने पुलिस को जनसेवक के रूप में आचरण करते हुए जन-विश्वास अर्जित करने का लक्ष्य दिया है। मुझे खुशी है कि नक्सली मोर्चे से लेकर विभिन्न अपराधों की रोकथाम में सफलता मिली है। आगे भी सुरक्षा, विश्वास और विकास की त्रिवेणी पुलिस की कार्यप्रणाली का मुख्य अंग रहेगी।
    मैं आज सबसे अपील करता हूं कि हमारे पुरखों के बलिदान और योगदान का सम्मान करने की प्रतिज्ञा लें। हमारे देश की स्वतंत्रता और संविधान से ही हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। छत्तीसगढ़, संविधान की भावना के अनुरूप देश को प्रगति के शिखर पर पहुंचाने में अहम योगदान देगा। इसके लिए हम सब पूरी लगन, मेहनत और समर्पण से अपनी भूमिका निभाएंगे। TNIS

 

 

 

देश में हर जगह शाहिन बाग बन रहा है- नदिता दास

देश में हर जगह शाहिन बाग बन रहा है- नदिता दास

25-Jan-2020

देश में नागरिकता संशोधन कानून पारीत होने से पहले इस कानून का पूरे देश में विरोध हो रही है। लोग इस कानून को संविधान की हत्या बता रहे हैं। वहीं इस कानून को लेकर दिल्ली के शाहीन बाग में हजारों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

पत्रिका पर छपी खबर के अनुसार, इसे लेकर बॉलीवुड सितारे भी अलग-अलग राय रख रहे हैं। कुछ इसका विरोध कर रहे हैं तो कुछ इसके पक्ष में बयान दे रहे हैं।
हाल ही में बॉलीवुड एक्‍ट्रेस नंदिता दास ने भी इस कानून के लेकर अपनी राय रखी है।

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दरअसल, नंदिता दास हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंचीं थीं। यहां इन्होंने नागरिकता कानून और शाहीन बाग पर बयान दिया। नंदिता ने कहा कि यह ऐसा कानून है जिसके जरिये आपसे भारतीय होने का सबूत मांगा जा रहा है।
उन्‍होंने कहा कि, हर जगह अब शाहीन बाग बन रहे हैं, क्‍योंकि इतने सारे लोग अब सड़क पर आ रहे हैं। हर एक नागरिक एक इंसान के हिसाब से हम सबको इसके खिलाफ बोलना चाहिये। इस देश की जो वैल्‍यू हैं, बुनियाद है, उसे संभालकर रखना चाहिये।
नंदिता ने बताया कि जो लोग यहां 4 पीढि़यों से रहते आ रहे हैं, आप उन्‍हें कह रहे हैं कि यह देश आपका नहीं है। यह बहुत परेशान करने वाली बात है।
मैं मानती हूं कि हर किसी को इस मामले में बोलना चाहिये। असल में, लोग इस पर बोल भी रहे हैं और सहज रूप से हर जगह विरोध भी जता रहे हैं।
सीएए और एनआरसी बिखराव वाला कानून है। देश में ऐसा पहली बार हो रहा है कि लोगों को धर्म के नाम पर बांटा जा रहा है।बता दें इससे पहले भी कई बॉलीवुड हस्तियों ने इस कानून को लेकर आपत्ति जताई है।

मीडिया इन पुट 


घरेलू महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन

घरेलू महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन

24-Jan-2020

ललित गर्ग 

इनदिनों दावोस में चल रहे वल्र्ड इकनॉमिक फोरम में ऑक्सफैम ने अपनी एक रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ प्रस्तुत की है, जिसमें उसने घरेलू औरतों की आर्थिक स्थितियों का खुलासा करते हुए दुनिया को चैका दिया है। वे महिलाएं जो अपने घर को संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं, वह सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक अनगिनत सबसे मुश्किल कामों को करती है। अगर हम यह कहें कि घर संभालना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है तो शायद गलत नहीं होगा। दुनिया में सिर्फ यही एक ऐसा पेशा है, जिसमें 24 घंटे, सातों दिन आप काम पर रहते हैं, हर रोज क्राइसिस झेलते हैं, हर डेडलाइन को पूरा करते हैं और वह भी बिना छुट्टी के। सोचिए, इतने सारे कार्य-संपादन के बदलने में वह कोई वेतन नहीं लेती।

उसके परिश्रम को सामान्यतः घर का नियमित काम-काज कहकर विशेष महत्व नहीं दिया जाता। साथ ही उसके इस काम को राष्ट्र की उन्नति में योगभूत होने की संज्ञा भी नहीं मिलती। जबकि उतना काम नौकर-चाकर के द्वारा कराया जाता तो अवश्य ही एक बड़ी राशि वेतन के रूप में चुकानी पड़ती। दूसरी ओर एक महिला जो किसी कंपनी में काम करती है, निश्चित अवधि एवं निर्धारित दिनों तक काम करने के बाद उसे एक निर्धारित राशि वेतन के रूप में मिलती है। उसके इस कार्य को और उसके इस क्रम को राष्ट्रीय उन्नति ( जीडीपी ) में योगदान के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि देश के आर्थिक विकास में अमुक महिला का योगदान है। प्रश्न है कि घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाता? घरेलू महिलाओं के  साथ यह दोगला व्यवहार क्यों?

ऑक्सफैम के अनुसार भारत की महिलाएं और लड़कियां हर दिन 3.26 अरब घंटे घरेलू काम करती हैं। अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को कीमत में आंका जाए तो यह सालाना 19 लाख करोड़ के करीब होगा, जो भारत के वार्षिक शिक्षा बजट 93 हजार करोड का चार गुना है। ये रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि महिलाओं पर घरेलू काम का दबाव बेहद ज्यादा है। इस वजह से वे या तो कम घंटे का रोजगार करने को मजबूर हैं या फिर उन्हें नौकरी ही छोड़नी पड़ जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में ‘केयर टेकिंग’ के बोझ के चलते बेरोजगारी का प्रतिशत महिलाओं में 42 है, जबकि पुरुषों में यह मात्र छह प्रतिशत है। ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर कहते हैं कि घरेलू महिलाओं और लड़कियों को आज की आर्थिक व्यवस्था का लाभ बहुत कम मिलता है। वो खाना बनाने, बच्चों को पालने, सफाई करने और बुजुर्गों की देखरेख में अरबों घंटे लगाती हैं। उनकी वजह से ही हमारी अर्थव्यवस्था, बिजनेस और समाज के पहिये चलते रहते हैं। इन औरतों को पढ़ने या रोजगार हासिल करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता। इसके चलते वे अर्थव्यवस्था के निचले हिस्से में सिमट कर रह गई हैं।’ क्योंकि घर के लगभग सभी कामों का दायित्व एक महिला अपने ऊपर ओढ़ती है, फिर भी इस दृष्टि से नहीं सोचा जाता कि वह भी आर्थिक योगदान कर रही है। 

ऐसी महिलाएं घर की इनकम में सीधे कुछ नहीं जोड़ती, इसलिए उसके काम की कोई इकनाॅमिक वैल्यू नहीं समझी जाती। जीडीपी के नाम से देश की दौलत का जो सालाना हिसाब लगाया जाता है, उसमें वही इनकम शामिल होती है, जिसमें पैसे का लेनदेन हुआ हो। यह कहने की जरूरत नहीं कि परिवार में एक हाउसवाइफ की क्या अहमियत होती है और उसके बिना समाज नहीं चल सकती, लेकिन उसके काम को अनउत्पादक समझ लिया जाना उसकी हैसियत को गिराता ही नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व और अस्मिता को भी खत्म कर देता है। घरेलू कामकाजी महिलाओं का घर की देखरेख एवं परिवार के भरण-पोषण का काम भले सहज दिखता हो,लेकिन बहुत जटिल, श्रमसाध्य एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम है, लेकिन विडम्बना देखिये कि परिवार के स्तर पर या जीडीपी के स्तर पर इसका कोई मूल्यांकन नहीं है।

इनदिनों हाऊसवाइफ के अस्तित्व को लेकर ऐसी व्यापक चर्चाएं हैं। सोसियल मीडिया पर हाऊसवाइफ की सक्रियता से उन्हीं के बीच ऐसे प्रश्न उछलने लगे हैं कि क्या हाऊसवाईफ का परिवार, समाज और देश के प्रति योगदान नगण्य हैं? क्या हाऊसवाइफ का कोई आर्थिक अस्तित्व नहीं? क्या उसे आर्थिक निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं? क्या हाऊसवाइफ सिर्फ बच्चे पैदा करने और घर सँभालने के लिए होती हैं? क्यों हाऊसवाइफ का योगदान देश के विकास में एक पुरुष से कमतर आंका जाता हैं? हाउसवाइफ को उनके काम के बदले सैलरी का प्रावधान होना ही चाहिए?

ये और ऐसे अनेक प्रश्न है जिन पर न केवल देश में बल्कि दुनिया में जागरूकता का वातावरण बन रहा है। इस विषय ने नारी जागृति एवं महिला सशक्तीकरण के अभियानों को भी आंदोलित किया है। ऐसी चर्चाएं होना, एक सकारात्मक वातावरण घरेलू महिलाओं को लेकर बनना और सरकार की सोच में भी बदलाव आना निश्चित ही नारी के अस्तित्व को धुंधलकों से बाहर लाने का प्रयास कहा जायेगा। साथ ही भविष्य एक बड़ी चुनौतीपूर्ण समस्या पर समय रहते  मानसिकता को विकसित करने का वातावरण बनेगा।

हाउसवाइफ के घरेलू भूमिका और उसके आर्थिक मूल्यांकन का काम कई मोर्चों पर चल रहा है। हमारे देश में भी और बाहर भी। सन् 2004 में एक हाईकोर्ट कह चुका है कि हाउसवाइफ की कम से कम वैल्यू रुपयों में माहवार निश्चित होना चाहिए। केरल में हाउसवाइफ के लिये मासिक भत्ते की मांग भी सामने आ चुकी है। बांगलादेश के वित्तमंत्री का मानना है कि हाउसकीपिंग की वैल्यू तय की जानी चाहिए। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। हाउसवाइफ की वैल्यू तो निश्चित हो ही जायेगी लेकिन उससे बड़ा चिन्ताजनक प्रश्न हाउसवाइफ के अस्तित्व को ही समाप्त करने की मानसिकता से जुड़ा है।  

स्वीडन के जर्नलिस्ट पीटर लेटमार्क ने लेख में ‘हाउसवाइफ होने का दाग’ में अनेक चिन्ताजनक स्थितियों को प्रस्तुत किया है। इस लेख में घरेलू कामकाम की जटिल होनी स्थितियों और उनमें निष्क्रिय होती महिलाओं की भूमिका को उठाया गया है। उनका यह लेख न्यूयार्क टाइम्स में छपा है। स्वीडन और नाॅर्वे में हाउसवाइफ कहलाना बेइज्जती माना जा रहा है, महिलाएं हाउसकीपिंग से तौबा कर रही है। ऐसा अकेले स्वीडन नाॅर्वे में नहीं, भारत में भी हो रहा है। हालांकि यहां हाउसवाइफ अभी गायब नहीं हुई हैं और ऐसा होने में बरसों लग जायेंगे, लेकिन हाउसकीपिंग को अब पुराने जमाने की दकियानूसी मानकर नीची नजर से देखा जाता है। न्यू जेनरेशन की लड़कियां इसके लिए कतई तैयार नहीं है।

लिहाजा हम उन जटिल स्थितियों की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जहां हमारे लिये भी घरेलू काम-काज चुनौती बन कर प्रस्तुत होगा भले ही हम घरेलू महिलाओं के श्रम को आर्थिक मूल्य देने को तो तैयार हो जाये, लेकिन तब तक परिवार का यह महत्वपूर्ण सेक्टर खतरे में पड़ चुका होगा। हमें हाउसकीपिंग की जरूरत लगभग पहले जितनी है, बल्कि वह और बढ़ी है, उस बढ़ी जरूरत को पूरा करना हमारे लिये चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। हमें हाउसकीपिंग की वैल्यू तय करके उसकी इज्जत तो लौटानी ही होगी, साथ ही पुरुषों को इसके लिए आगे आना होगा। उन्हें घरेलू काम-काज में बराबर का हाथ बंटाना होगा। महिलाओं के इस एकाधिकार क्षेत्र को संतुलित करने के लिये पुरुषों को भी सहभागिता निभानी होगी। हमारे सामने स्वीडन का माॅडल है। वहां मर्दों को कई महीनों की पैटरनिटी लीव तो मिलती ही है, इसके लिए इंसेटिव भी दिए जाते हैं।


वह सुबह कभी तो आएगी: साहिर लुधियानवी की नज़्म घंटाघर लखनऊ पर सटीक बैठ रही है

वह सुबह कभी तो आएगी: साहिर लुधियानवी की नज़्म घंटाघर लखनऊ पर सटीक बैठ रही है

20-Jan-2020

सै क़सिम यू पी बयूरो 
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

माना कि अभी तेरे मेरे, अरमानो की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी ॥

मनहूस समाजों ढांचों में जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी ॥

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी ॥

जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी ॥
साहिर लुधियानवी

 


दिल की सुनो दुनिया वालों !

दिल की सुनो दुनिया वालों !

14-Jan-2020

                    ............ध्रुव गुप्ता
बीसवी सदी के महानतम शायरों में एक मरहूम कैफ़ी आज़मी अपने आप में एक व्यक्ति न होकर एक संस्था, एक युग थे जिनकी रचनाओं में हमारा समय और समाज अपनी तमाम खूबसूरती और कुरूपताओं के साथ बोलता नज़र आता है। एक तरफ उन्होंने आम आदमी के दुख-दर्द को शब्दों में जीवंत कर अपने हक के लिए लड़ने का हौसला दिया तो दूसरी तरफ सौंदर्य और प्रेम की नाज़ुक संवेदनाओं को इस बारीकी से बुना कि पढ़ने-सुनने वालों के मुंह से बरबस आह निकल जाय। कैफ़ी साहब साहिर लुधियानवी और शकील बदायूनी की तरह उन गिने-चुने शायरों में थे जिन्हें अदब के साथ सिनेमा में भी अपार सफलता और शोहरत मिली। 1951 में फिल्म 'बुज़दिल' के लिए उन्होंने पहला गीत लिखा- 'रोते-रोते गुज़र गई रात'। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। उनके लिखे सैकड़ों फ़िल्मी गीत आज हमारी अनमोल संगीत धरोहर का हिस्सा हैं। गीतकार के रूप में उनकी प्रमुख फ़िल्में हैं - शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, आख़िरी ख़त, हकीकत, रज़िया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की क़सम, पाक़ीज़ा, हीर रांझा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई। बेपनाह सफलता के बावज़ूद हिंदी फ़िल्मी गीतों के बारे में उनका अनुभव यह था - 'फ़िल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी। आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी, फिर उसमें शब्द पिरोए जाते थे। ठीक ऐसे कि पहले आपने क़ब्र खोदी, फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश की। कभी मुर्दे का पैर बाहर रह जाता था, कभी हाथ।मेरे बारे में सिनेमा वालों को जब यकीन हो गया कि मैं मुर्दे ठीक-ठाक गाड़ लेता हूं, तो मुझे काम मिलने लगा।' उन्होंने फिल्म हीर रांझा, गरम हवा और मंथन के लिए संवाद भी लिखे थे। देश के इस विलक्षण शायर और गीतकार के यौमे पैदाईश (14 जनवरी) पर खिराज़-ए-अक़ीदत, उनकी एक ग़ज़ल के साथ !

मैं ढूंढता हूं जिसे वह ज़हां नहीं मिलता
नई ज़मीन,  नया आसमां नहीं मिलता

वो तेग़ मिल गई जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता

वो मेरा गांव है, वो मेरे गांव के चूल्हे
कि जिनमें शोले तो शोले धुआं नहीं मिलता

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूं 
यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता

खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे-सा कुछ भी यहां नहीं मिलता

 

 


सीएए से उपजी हिंसा के मायने

सीएए से उपजी हिंसा के मायने

10-Jan-2020

शबाहत हुसैन विजेता

नागरिक संशोधन एक्ट के संसद से पास होते ही देश के विभिन्न इलाकों में गुस्से का उबाल दिखाई देने लगा। सड़कों पर जनसमुद्र उमड़ पड़ा। सरकार के खिलाफ नारेबाजी से शुरु हुआ हंगामा पथराव और तोड़फोड़ तक जा पहुंचा। नागरिक और पुलिस के बीच संघर्ष छिड़ गया। लोगों में असुरक्षा की भावना साफ दिखाई देने लगी। सड़कों पर बवाल बढ़ता रहा लेकिन स्थितियों पर जमा असमंजस के कोहरे को साफ करने वाला कोई नज़र नहीं आया।

मोदी सरकार के खिलाफ यह आक्रोश असम में एनआरसी लागू होने के फौरन बाद ही पनपना शुरु हो गया था लेकिन इस आक्रोश को दूर करने की कोई पहल किये बगैर ही सरकार सीएए लेकर आ गई। यह लोगों के भीतर पनपते आक्रोश में आग में घी की तरह से था। इसका नतीजा दिखाई देने लगा है। देश के तमाम शहर आग में झुलस रहे हैं।

असम में एनआरसी लागू होने के बाद जो हालात बने, वास्तव में वही सीएए आने के बाद भड़के बवाल की हकीकत है। असम में एनआरसी कौन सी तैयारी से लागू किया गया उसे देखा जाये तो पता चलता है कि भारत के राष्ट्रपति रहे फखरुद्दीन अली अहमद का परिवार खुद को भारत का नागरिक साबित नहीं कर पाया। कारगिल की जंग में अपनी जान कुर्बान करने वाले का परिवार भी खुद को भारत का नागरिक साबित नहीं कर पाया।

असम में एनआरसी में अपना नाम न दर्ज करवा पाने वालों के लिये सरकार ने डिटेंशन कैम्प तैयार करवा दिया। इस डिटेंशन कैम्प के बाद भी लोगों का गुस्सा नहीं फूटा था लेकिन जब सरकार सीएबी लेकर आई तो पता चला कि इस बिल के ज़रिये सरकार 31 दिसम्बर 2014 तक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आये गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देगी। बवाल की असली जड़ यही है कि एनआरसी में जो भारतीय मुसलमान खुद को भारत का नागरिक साबित नहीं कर पायेगा उसे डिटेंशन कैम्प में भेज दिया जायेगा लेकिन दूसरे देश से आने वाले गैर मुसलमान को भारत की नागरिकता दे दी जायेगी।

धर्म के आधार पर भारत में लोगों का बँटवारा किसी भी भारतीय को स्वीकार नहीं है। यही वजह है कि सीएबी जैसे ही एक्ट में बदला वैसे ही पूरा देश सड़क पर उतर आया। देश के बीस से ज़्यादा शहर हिंसा की आग में झुलस गये। तमाम नौजवानों की मौत हो गई। सीएए के खिलाफ जिस तरह से हंगामा हुआ उसने पुलिस से लेकर सरकार तक की नींद उड़ा दी।

बवाल बढ़ा तो सरकार की तरफ से शुरु में बयान आया कि किसी भी भारतीय को कहीं जाना नहीं पड़ेगा। लेकिन इसके साथ ही दिल्ली और मुम्बई की सड़कों पर सीएए के समर्थकों की भीड़ भी जुटना शुरु हो गई। यह वास्तव में बहुत खतरनाक पोज़ीशन है। अभी तक सरकार के विरोध में जो सुर उठे हैं उनका सामना सिर्फ पुलिस के साथ है। नागरिकों का आपसी तालमेल बहुत अच्छा है लेकिन अगर सीएए का विरोध करने वाले और समर्थन करने वाले आमने-सामने आ गये तो हालात कैसे होंगे। यह आपस में टकरा गये तो देश सिविल वार की तरफ बढ़ जायेगा। तब इसे कंट्रोल करना सरकार के लिये आसान नहीं होगा।

सीएए के ज़रिये पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आये चार करोड़ शरणार्थियों को भारत में शरण देने से किसी को भी दिक्क्त नहीं थी लेकिन उन्हें देश की नागरिकता देने की क्या ज़रूरत थी यह बात समझ से परे है। भारत पिछले कई साल से आतंकवाद से जूझता रहा है। जिन देशों की सीमाएँ लांघ कर भारत में आतंकी आते रहे हैं उन देशों के लोगों को भारत में बसा कर क्या भारत की सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला जा रहा है। शरणार्थी के रूप में रहने वाले के सिर्फ खाने और कपड़े भर की व्यवस्था करने की ज़िम्मेदारी होती है लेकिन नागरिक बनाने के बाद उनके लिये रोजगार कि व्यवस्था भी सरकार की ज़िम्मेदारी हो जायेगी।

गुजरे सालों में भारत में रोजगार घटे हैं। तमाम लोगों की खुद की नौकरियाँ चली गई हैं। ऐसे में दूसरे देशों से आने वालों के लिये रोजगार का इंतजाम कैसे होगा। 4 करोड़ शरणार्थी जब नागरिक बन जाने के बाद भी नौकरियाँ हासिल नहीं कर पायेंगे तब अपना पेट भरने के लिये वह गैर वाजिब रास्ते अपनाएंगे और सरकार और देश दोनों के लिये मुसीबत बन जायेंगे।

सरकार कोई भी हो उसकी ज़िम्मेदारी होती है हर नागरिक को सुरक्षा का भाव देना। अपने ही देश में नागरिकता छिन जाने का डर और अपना घर छोड़कर डिटेंशन कैम्प में रहने के लिये मजबूर किया जाना किसी भी नागरिक को अपना अधिकार पाने के लिये सड़कों पर उतार सकता है। सरकार के भीतर इतनी लचक तो होनी ही चाहिये कि वह अपने नागरिकों के मन में आ गये डर को निकाल सके। दूसरे देशों से लोगों को लाकर सरकार बसाये लेकिन अपने जिन नागरिकों को उसने सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास का नारा दिया है उसके मन से डर को निकालना भी सरकार की ज़िम्मेदारी है।

सरकार के इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग हिंसा के रास्ते पर कैसे चले गये यह भी जांच का मुद्दा है। इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद प्रदर्शन करने वालों के पास पत्थर कहाँ से आये यह भी जांच का विषय है। हिंसा और पथराव की छूट किसी को नहीं दी जा सकती। लखनऊ, कानपुर, बहराइच, रामपुर, गोरखपुर और वाराणसी के अलावा बिहार और दिल्ली में जो हालात बने हैं वह नज़रअंदाज़ करने वाले नहीं हैं। हालात बेहतर बनाने के लिये ज़रूरी है कि लोगों के भीतर जो डर का माहौल तैयार हुआ है उसे दूर किया जाना चहिये।

 

 


भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करें छात्र।

भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करें छात्र।

09-Jan-2020

सैय्यद तक़वी

आज का युग बीते समय को काफ़ी पीछे छोड़ आया है। आज के नवजवान छात्रों में काफ़ी तेज़ी आ गई है। विद्यार्थियों में उनके शिक्षकों द्वारा महत्वपूर्ण विषयों के प्रति रुचि उत्पन्न की जा रही है। इससे फायदा यह होगा कि विद्यार्थियों को भविष्य में होने वाली राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषमताओं का भली भांति ज्ञान प्राप्त होगा। देश का भविष्य नवजवानों के हाथ में होता है। स्कूल, विद्यालय और महाविद्यालय की  स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि छात्र राष्ट्र के आपसी मतभेदों को भुलाकर पूरे देश को अपनी शिक्षा के द्वारा शांति और अमन का पैग़ाम देंगे और लोकतंत्र की रक्षा करेंगे। मगर यहां तो कहानी उल्टी लिखी जा रही है। 

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लोकतंत्र के रक्षकों को मारा जा रहा है। विधा के मंदिर को तोड़ा जा रहा है। 
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार छात्रों के साथ  समस्याओं पर सर्वसम्मति बनाएं और लोकतंत्र की मजबूती में छात्रों को अपनी भूमिका निभाने का मौका दे। भारत सरकार को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। 
मेरा सभी युवाओं एवं छात्रों से निवेदन है कि भारत में मौजूदा विषयों पर अपनी राय बनाएं और अपने देश तथा विश्व में लोकतंत्र की ओर अपनी भागीदारी को मजबूत करें जिससे देश मजबूत हो।

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हम गर्व होना चाहिए कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन लोकतंत्र की पहली सीढ़ी को ही सरकार बाधित करने पर तुली हुई है। इसमें कोई शक  नहीं है कि छात्र स्कूल, कालेज के जरिए लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता है लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोस की बात है कि आज देश के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय राजनीतिक उद्दंडता का शिकार हो रहे हैं। 
ऐसा वही लोग कर सकते हैं जो कभी विश्वविद्यालय नहीं गये और ना शिक्षा हासिल की।
इतिहास गवाह है कि जब जब छात्र सड़कों पर आया है एक क्रांति आई है। शायद सरकार को इतिहास की जानकारी नहीं।
भारत में छात्र आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है। छात्रों ने हमेशा समाज-परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की एक आवाज पर लाखों छात्रों ने अपने कैरियर को दांव पर लगाते हुए स्कूल और कॉलेजों का बहिष्कार किया था। वर्ष 1973 में गुजरात विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन, 1974 में बिहार में छात्रों ने आंदोलन प्रारंभ किया। बाद में इस आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। पूर्व प्रधानमंत्री एवं आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित किए गए आपातकाल को इसी आंदोलन के बूते चुनौती दी गई और व्यवस्था परिवर्तन हुआ।  सन् 1988 में बोफोर्स कांड को लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में छात्र संगठनों द्वारा संघर्ष चलाया गया। नब्बे के दशक में शिक्षा के व्यावसायीकरण के विरोध में छात्रों ने कैम्पसों में अभियान चलाया। जे एन यू में निजीकरण के खिलाफ सशक्त आंदोलन हुआ। 
ना जाने कितने ऐसे उदाहरण हमारे सामने है जब छात्र शक्ति ने देश की दिशा बदल दी।
आज एक बार फिर छात्र शक्ति देश में मौजूद मानसिक रोगियों से लड़ने को तैयार दिखाई दे रही है। देश की जनता भी जान रही है कि छात्र संगठन को ख़त्म करने की कोशिश कौन कर रहा है? इसलिए अगर छात्रों एवं देश की जागरूक जनता द्वारा देश में एक नई क्रांति आ जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com


छात्रों पर हमला स्वतंत्र विचारधारा और भारत के भविष्य पर हमला है

छात्रों पर हमला स्वतंत्र विचारधारा और भारत के भविष्य पर हमला है

07-Jan-2020

 सैय्यद तक़वी

##विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता प्राप्त होती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।##

जे एन यू हो या ए एम यू या फिर जामिया हर जगह छात्रों को निशाना बनाया गया है। स्कूल और विश्वविद्यालय विधा का मंदिर हैं।  लेकिन भारत विरोधी विचारधारा रखने वाले जिनके पूर्वज अंग्रेजों के तलवे चाट के बड़े हुए ऐसे लोगों से विनय की उम्मीद करना बेमानी है। जनता के वोटों से चुनी गई सरकार अगर जनता को सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकती तो उसे इस्तीफा दे देना चाहिए। मगर बेहिस और बेशर्म लोगों के ऊपर असर नहीं होता।

जिस तरह से रविवार को जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) कैंपस में कुछ नकाबपोश बदमाश घुस गए और कैंपस में छात्रों और शिक्षकों पर धावा बोल दिया। इस हमले में छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी धोष बुरी तरह से घायल हो गईं। क्या यह लोकतंत्र है? यह तो सरासर लोकतंत्र की हत्या है। पहले जामिया, ए एम यू और अब जे एन यू!

जो बदमाश चेहरा छुपाये हुए बड़ी संख्या में जेएनयू कैंपस में दाखिल हुए, छात्रों पर हमला किया और कुछ ही देर के बाद कैंपस के अंदर तोड़ फोड़ शुरू कर दी। इन हमलावरों के कई वीडियो और फोटोज सामने आए हैं, जहां वो हाथों में हॉकी, डंडे लिए घूम रहे हैं और कैंपस में तोड़ फोड़ करते नजर आ रहे हैं। आखिर यह असामाजिक तत्व आये कहां से, ये कौन थे? इनको सरकार, पुलिस प्रशासन का डर क्यूं नहीं था? पुलिस प्रशासन मौन क्यूं रहा। छात्रों को क्यूं नहीं बचाया गया? योगेन्द्र यादव के पहुंचने पर उनसे मारपीट क्यूं की गई? इन सबका जवाब कौन देगा?  छात्रों ने इस हमले के लिए छात्र संगठन एबीवीपी को जिम्मेदार बताया है  तो वहीं एबीवीपी के छात्रों ने इस हमले के लिए लेफ्ट के छात्रों को जिम्मेदार बताया है। 
अफसोस की बात है कि हमारे देश के संगठन आतंकी संगठन की तरह काम कर रहे हैं। सरकार और प्रशासन क्यूं मूकदर्शक बना है? 

सरकार दावा करती है कि हमारे राज में दंगे नहीं हुए। क्या यह दंगों से कम है कि आज़ाद भारत में छात्रों को मारा पीटा जा रहा है क्योंकि वह सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। कुछ लोग पूरे देश पर क्यूं हावी हो रहे हैं? माननीय उच्च न्यायालय क्या देख रहा है? राष्ट्रपति महोदय क्या कर रहे हैं? देश जल रहा है। जनता कराह रही है। व्यापार, उधोग बर्बाद हो रहा है। भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी बढ़ती जा रही है। कब देश की सर्वोच्च संस्था और सर्वोच्च व्यक्ति बोलेंगे। इतिहास कभी माफ नहीं करेगा यदि देश की एकता अखंडता, संप्रभुता और उन्नति ख़त्म हो गई।
 

(प्रस्तुत लेख लेखक के निजी विचार है )


सावित्री बाई और फातिमा शेख !

सावित्री बाई और फातिमा शेख !

03-Jan-2020


देश में स्त्री शिक्षा की अलख जगाने वाली और स्त्रियों के अधिकारों की योद्धा सावित्री बाई फुले की जयंती पर आज देश उन्हें याद कर रहा है।हां,यह देखकर तकलीफ जरूर होती है कि स्त्री शिक्षा, विशेषकर मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के लिए जीवन भर उनके साथ कदम से कदम मिलाकर काम करने वाली फ़ातिमा शेख को लोगों ने विस्मृत कर दिया। फ़ातिमा जी के बगैर सावित्री जी अधूरी थी। सावित्री बाई और उनके पति जोतीराव द्वारा लड़कियों को घर से निकालकर स्कूल ले जाने की बात उस वक़्त के सनातनियों को पसंद नहीं आई थी। चौतरफा विरोध के बीच दोनों को अपना घर छोड़ना पडा था। पूना के गंजपेठ के उनके दोस्त उस्मान शेख ने उन्हें रहने को  अपना घर दिया। वहीं उनका पहला स्कूल शुरू हुआ। उस्मान की बहन फातिमा ने इसी स्कूल में शिक्षा हासिल की और शिक्षा पूरी करने के बाद सावित्रीबाई के साथ वहां पढ़ाना शुरू किया। वह पहली मुस्लिम महिला थीं जिन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित किया। वह घर-घर जाकर लोगों को लड़कियों के लिए शिक्षा की आवश्यकता समझाती और उन्हें स्कूल भेजने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करती। शुरू-शुरू में फातिमा को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लोग उनकी हंसी उड़ाते थे।उनकी लगातार कोशिशों से धीरे-धीरे लोगों के विचारों में परिवर्तन आया.और वे लड़कियों को स्कूल भेजने लगे। उस वक़्त के मुस्लिम समाज की दृष्टि से यह क्रांतिकारी परिवर्तन था और फ़ातिमा शेख इस परिवर्तन की सूत्रधार बनीं। 

आज सावित्री बाई फुले की जयंती पर उन्हें और फातिमा शेख दोनों को नमन, (दोनों के एक दुर्लभ चित्र के साथ ! ) ध्रुव गुप्ता

 


   जनता को राजनीति का खेल समझना होगा।

जनता को राजनीति का खेल समझना होगा।

29-Dec-2019

एक समय था जब भारत में चुनाव घर, पानी, किसान,रोजगार,शिक्षा , नाली , सड़क जैसे मुद्दों पर होते थे। अब धार्मिक मुद्दों को उछाल कर धर्म का अपमान किया जा रहा है। लोगों की आवश्यकताओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
जैसे आजकल एन आर सी, सी ए ए, एन पी आर जैसे विषयों को मुद्दा बना दिया गया है। सवाल यह है कि क्या यह चीज़ें पहले नहीं थीं? निश्चित तौर पर थीं। फिर अचानक क्या हुआ कि हिंसा और बवाल शुरू हो गया। इसका कारण है गंदी राजनीति।
जानकारी इकट्ठा करने पर यह बात सामने आई कि मशहूर संविधान विशेषज्ञ, एक्सपर्ट और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप जी ने दो साल पहले ही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को नागरिकता संशोधन बिल पर धर्मों के नाम का इस्तेमाल न करने की चेतावनी दी थी। उन्होंने सलाह दी थी कि कानून में “हिंदुओं, सिखों, पारसियों आदि जैसे धर्मों के नामों” को छोड़कर- केवल “उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों” का उपयोग करना चाहिए। CAB 2016 पर JPC के सामने सबूत पेश करते हुए कश्यप जी ने सुझाव दिया था कि “उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों” में वे सभी शामिल होंगे, जिन्हें सरकार कानून के जरिए सुरक्षा देने का लक्ष्य निर्धारित कर रही है। 
लेकिन सरकार ने इस बात को स्वीकार नहीं किया और परिणाम पूरा देश देख रहा है। जनता कराह रही है। अब जब संसद के दोनों सदनों ने इस बिल को पास कर दिया है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से यह कानून बन चुका है तो एक ही रास्ता बचा है कि इसे केवल अदालत के जरिए या फिर संसद में दोबारा संशोधन बिल के जरिए ही बदला जाये। जनता संविधान के अनुसार अपने अधिकारों के तहत शांति पूर्ण प्रदर्शन करने के लिए स्वतंत्र है। 
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन की मैं आलोचना करता हूं मगर सरकार की ज़िद की भी आलोचना करता हूं और प्रशासन के हिंसक रवैए की भी आलोचना एवं निंदा करता हूं। राजनीति की दुनिया में जनता भगवान है उसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। यह सही है कि “इस लोकतांत्रिक देश का संविधान संसद को सर्वोच्च मानता है” लेकिन यही संविधान धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता की भी बात करता है।
एक तरफ संविधान में विश्वास रखने वाली जनता को स्वीकार करना चाहिए कि इसे सही करने के तरीके हैं, न कि हिंसक विरोध प्रदर्शन करके सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाय।” वहीं दूसरी तरफ़ संविधान में विश्वास रखने वाली सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि जनता को जो अधिकार संविधान ने दिया है उसे छीना ना जाए। संविधान अधिकारों के हनन की आज्ञा नहीं देता है। प्रशासन को भी समझना चाहिए कि जनता के साथ हिंसक रवैया ना अपनाए। हम अपने ही देशवासियों को मार रहे हैं। यह निंदनीय है।
जनता एवं विपक्षी पार्टियों के पास एक रास्ता है कि (CAA) की वैधानिकता को अदालत में चुनौती दें या लोकतांत्रिक तरीके से इसे संसद में बदलने की कोशिश की जा सकती है। इसके लिए इंतेज़ार करना होगा। आने वाले चुनावों में लोकसभा में बहुमत के आंकड़े को जनादेश के जरिए बदलकर या अधिनियम में संशोधन करके परिवर्तन किया जा सकता है।
एक और बात जो चिंताजनक है वह यह है कि जो लोग संसद में बिल का विरोध कर रहे थे उनके पास बहुमत नहीं था इस लिए वह कुछ नहीं कर सके लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्होंने संसद में बिल पर सरकार का साथ दिया और अब विरोध कर रहे हैं वो वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। इसे समझने की जरूरत है।
एन आर सी, सी ए ए, एन पी आर जैसे विषयों पर ठंडे दिमाग से सोचने और एक प्लेटफार्म पर रहने की जरूरत है। हमें समझना होगा कि एकता में ही बल है। हम सब भारतवासी एक हैं। 
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ
उप-निदेशक- स्पेशल क्राइम ब्यूरो, लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com


झारखण्ड में भाजपा आदिवासी उपेक्षा के कारण हारी :ललित गर्ग

झारखण्ड में भाजपा आदिवासी उपेक्षा के कारण हारी :ललित गर्ग

26-Dec-2019

-ः ललित गर्गः-

झारखंड का जनादेश न सिर्फ स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा को लेकर जमीनी स्तर पर व्याप्त गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है बल्कि आदिवासी उपेक्षा की निर्णायक निष्पत्ति है। चुनाव में आदिवासी जनजीवन से जुड़े एवं कतिमय बड़े मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन भाजपा ने एक बड़ी भूल करते हुए आदिवासी एवं स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज किया। इस चुनाव में आदिवासी जनता की समस्याओं, मसलन, जल, जंगल, जमीन, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, बिजली आदि पर कोई बात नहीं की गई। आदिवासी समस्याएं झारखण्ड चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए, लेकिन ऐसा न होना भी इन चुनावों की सबसे बड़ी विडम्बना बनी और यही भाजपा की हार का बड़ा कारण भी बनी है।

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भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति के अनुरूप अन्य राज्यों की तरह यहां भी केंद्र सरकार के प्रमुख फैसलों पर वोट मांगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी चुनाव रैलियां में राममंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक कानून, एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पर तो व्यापक चर्चा की, लेकिन आदिवासी दिलों को छूने की कोई सार्थक एवं सफल पहल नहीं की। हिंदुत्व की लहर चलाने के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को चुनाव प्रचार में उतारा गया। एनआरसी-सीएए विरोधी आंदोलन पर मोदी ने इस टिप्पणी से सांप्रदायिक ध्रूवीकरण करने की कोशिश की कि विरोध करने वालों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है। लेकिन यह दांव भी नहीं चला, क्योंकि आदिवासी अपनी ही समस्याओं में आकंठ डूबे हैं।
झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य होने के बावजूद जिस तरह आदिवासी मुख्यमन्त्री से वंचित रहा उसका खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा है। इसके साथ ही आदिवासियों के भूमि विशेषकर जंगल-जमीन और जल के अधिकार को हल्का करने के लिए रघुवर सरकार ने जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया उसने भी आदिवासियों में रोष का संचार करने में विशेष भूमिका निभाई। भाजपा ने इन महत्वपूर्ण आदिवासी मुद्दें को तवज्जों न देकर राजनीतिक अपरिपक्वता का ही परिचय दिया है। आदिवासी जनता की समस्याओं पर कोई ठोस वादा भाजपा की तरफ से नहीं सामने आया। जबकि झारखंड के राजनीतिक मस्तक पर ये ही आदिवासी तिलक करते रहे हैं। क्या यह भाजपा की सोची-समझी रणनीति रही या आदिवासी समाज की उपेक्षा? इस बार झारखंड के इन चुनावों में आदिवासी लोगों के प्रति उदासीनता के कारण भी ये चुनाव परिणाम भाजपा के लिये लोहे के चने चबाने जैसे साबित हुए हैं।
झारखंड में आदिवासी ही राजनीतिक सत्ता के लिये निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने वोट करते समय रघुबरदास सरकार के कामकाज के अलावा केंद्र के मुद्दों को भी नकारा। झारखंड के आदिवासियों में रघुबर सरकार की नीतियों को लेकर गुस्सा था। उनकी हजारों एकड़ जमीन एक पूंजीपति घराने को पावर प्लांट लगाने के लिए दी गई और उनके विरोध को कुचल दिया गया। काश्तकारी कानून में बदलाव को भी पसंद नहीं किया गया। सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों की बहाली का मुद्दा बार-बार उठता रहा। झारखंड में 26.3 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है और 28 सीटें उनके लिए आरक्षित हैं। विपक्ष ने जेएमएम के आदिवासी नेता हेमंत सोरेन को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया, जबकि बीजेपी ने लगातार दूसरी बार गैर-आदिवासी रघुबर दास को ही इस पद के लायक समझा। चुनाव में इसका सीधा असर देखने को मिला। यही कारण है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के बाद पांचवां राज्य बीजेपी के हाथ से निकल गया। वक्त आ गया है कि पार्टी जनता की भावनाओं एवं जरूरतों को समझे और इस अति आत्मविश्वास से बाहर निकले कि उसकी हर नीति पर पूरे देश में आम सहमति है।
झारखंड  ‘धनवान’ जमीन के ‘निर्धन’ लोगों का राज्य है। इस राज्य की खनिज प्रचुरता का लाभ यदि यहीं के लोगों को नहीं मिल पा रहा है तो इसके पृथक राज्य बनने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। बिहार से अलग करके इस राज्य का निर्माण लम्बी लड़ाई के बाद हुआ था। पृथक झारखंड की लड़ाई आजादी की लड़ाई के जमाने से ही चली आ रही थी और मूलतः ‘झारखंड पार्टी’ यह झंडा उठाये हुए थी। कालान्तर में झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी के गठन से इस मांग का आन्दोलन उग्र होता रहा। वस्तुतः भाजपा ने ही अपने अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इस राज्य का निर्माण किया था परन्तु पार्टी आदिवासी जनता में अपनी वह पैठ बनाने मे सफल नहीं हो सकी जिसकी अपेक्षा की जाती थी। हालांकि भाजपा ने आदिवासी कल्याण एवं उत्थान की अनेक योजनाओं को लागू किया है। बावजूद इसके झारखण्ड में अभी भी आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवनयापन कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में करती है। इसके बाद भी 7 दशक में उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। स्वास्थ्य सुविधाएँ, पीने का साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं। आखिर चुनाव का समय इन स्थितियों में बदलाव का निर्णायक दौर होता है, लेकिन इनकी उपेक्षा चुनाव की पृष्ठभूमि को ही धुंधलाती रही है।  
 आदिवासी बनाम गैर आदिवासी का मुद्दा भी रह-रहकर इस चुनाव में सामने आ रहा था। यह भी सच है कि गठबंधन के इस दौर में भाजपा लगभग अकेले चुनाव लड़ रही थी और विरोधी लगभग एकजुट थे। भाजपा के भीतर का असंतोष और बगावत भी बहुत स्पष्ट थे। यह भी कहा गया कि भाजपा को राज्य स्तरीय राजनीति से ज्यादा अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के चमत्कारी स्वरूप पर भरोसा है। यानी राज्य स्तर पर ऐसे बहुत से कारण एवं परिस्थितियां बनी, जिससे मतदाता इधर या उधर वोट देने का मन बना पाएं, और शायद अंतिम नतीजों में राज्य के इन्हीं मुद्दों ने अपनी भूमिका निभाई।
भाजपा की हार के असल कारणों की तलाश करें तो यही सार निकलेगा कि भाजपा स्वयं से हारी है, उसकी चुनावी रणनीति असफल रही एवं उसका अहंकार भी बड़ा कारण बना है। स्थानीय मुद्दों एवं नेताओं की उपेक्षा भी बड़े कारण हैं। वह एक अलग दौर था जब प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 से राज्यों के मुख्यमंत्रियों के रूप में लीक से हटकर प्रयोग किए। इसी कड़ी में महाराष्ट्र में गैर-मराठा देवेंद्र फड़नवीस, हरियाणा में गैर-जाट मनोहरलाल और झारखंड में गैर-आदिवासी रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया। पुनः इसी प्रयोग को दोहराने के कारण पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। भाजपा को अपनी पराजय से सबसे बड़ा सबक यह सीखना होगा कि वह केवल प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के बूते पर अपनी क्षेत्रगत कमियों पर पर्दा नहीं डाल सकती है। साथ ही यह भी समझना होगा कि इस देश के किसी भी राज्य का गरीब या अनपढ़ मतदाता राजनैतिक रूप से बहुत चतुर एवं सावधान होता है। राष्ट्रीय मुद्दों और राज्यों के मुद्दों में भेद करना उसे आता है, विशेषकर आर्थिक व सामाजिक विषयों की उसे जानकारी रहती है अतः राष्ट्रहित में वह अपनी वरीयता बदलने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं करता है। लोकतन्त्र का पहला प्रहरी यही मतदाता होता है जो वक्त के अनुसार अपनी रणनीति बिना किसी राजनैतिक बहकावे में आये तय करता है। मतदाता के मन को समझना ही राजनीतिक कौशल है, इस कौशल में भाजपा चूक करती जा रही है।
न केवल झारखण्ड बल्कि उड़ीसा, गुजरात, छतीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश के आदिवासियों की चुनाव में निर्णायक एवं महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद उनकी उपेक्षा होती रही है। विडंबना यह है कि जंगलों के औद्योगिक इस्तेमाल से सरकार का खजाना तो भरता है लेकिन इस आमदनी के इस्तेमाल में स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी को लेकर कोई प्रावधान नहीं है। जंगलों के बढ़ते औद्योगिक उपयोग ने आदिवासियों को जंगलों से दूर किया है। आर्थिक जरूरतों की वजह से आदिवासी जनजातियों के एक वर्ग को शहरों का रुख करना पड़ा है। विस्थापन और पलायन ने आदिवासी संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज और संस्कार को बहुत हद तक प्रभावित किया है। गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के चलते आज का विस्थापित आदिवासी समाज, खासतौर पर उसकी नई पीढ़ी, अपनी संस्कृति से लगातार दूर होती जा रही है। आधुनिक शहरी संस्कृति के संपर्क ने आदिवासी युवाओं को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां वे न तो अपनी संस्कृति बचा पा रहे हैं और न ही पूरी तरह मुख्यधारा में ही शामिल हो पा रहे हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासी उत्थान और उन्नयन की चर्चाएं की और वे इस समुदाय के विकास के लिए तत्पर भी हैं। लेकिन इन चुनावों में उनके द्वारा आदिवासी समुदायों के समग्र विकास की चर्चा न होना, आश्चर्यकारी है। जबकि जेएमएम के आदिवासी नेता हेमंत सोरेन ने सीएम पद का उम्मीदवार बनकर इन मुद्दों को प्रमुखता से उजागर किया और यही उनकी एवं उनके गठबंधन की शानदार जीत का कारण बनी है। प्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


ये बरसों का जहर है, जो ऐसे लम्हों में छलक जाता है

ये बरसों का जहर है, जो ऐसे लम्हों में छलक जाता है

17-Dec-2019

-----------------------(-अमित संतोष मिश्रा )-----------------------------------
मैं यूपी के छोटे से शहर हरदोई में पला बढ़ा। पढ़ाई के लिए वाया इलाहाबाद दिल्ली पहुंचा। देश के हर छोटे शहर की तरह बचपन से मुसलमानों और दलितों को लेकर एक खास तरह की सीख में पला बढ़ा। ये सीखें असल में वो जहर है जिसने देश में एक जहरीली पीढ़ी तैयार की है। वह इनके खिलाफ जहर घोलने का कोई मौका नहीं छोड़ती। मैं अपने ऑफिस, घर-परिवार, रिश्तेदारों में मुसलमानों और दलितों को लेकर यह जहर रोज महसूस करता हूं। यह जहर तब और तीखा हो जाता है जब मुसलमान या दलित विरोध करते हैं। विरोध देखते ही इस हिंदूवादी (दलितों, आदिवासयों, पिछड़ों को छोड़कर) या ब्राह्मणवादी (सिर्फ जाति से ब्राह्मण नहीं) मानसिकता के जहर में दमन करने की नई तासीर उभर कर सामने आने लगती है। इनकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा करने की, साले यूनिवर्सिटी में पढ़ने जाते हैं या दंगा करने, 10-15 हजार मार डालें तो सही रहे, इन सालों को तो दबा कर ही रखना चाहिए, अगर इनकी संख्या बढ़ी तो ये हमें खत्म ही कर देंगे...ऐसी फब्तियां आजकल आम हैं। इस जहर का फायदा किसे मिलता है, यह किसी से छुपा नहीं है।
अब आते हैं उन जहरीली सीखों पर जो हमें बचपन से घुट्टी में पिलाई गई हैं-
- मुसलमानों और दलित साफ सुथरे नहीं होते। बहुत कम ही नहाते हैं।
- निरामिश या मैला कुचैला कुछ भी खाते हैं।
- एक खास बस्ती में रहते हैं और किसी से घुलते मिलते नहीं हैं। सिर्फ अपनों के ही साथ उठते बैठते हैं।
- मुसलमान हमेशा पाकिस्तान परस्ती की बात करते हैं। 
- धर्म को लेकर इतने कट्टर होते हैं कि कत्ल करने से भी गुरेज नहीं करते।

इन बातों का जहर मेरे भीतर भी गया। बचपन में मुसलमानों और दलित साथियों के लिए घर पर अलग चाय या पानी का कप रखना मेरे लिए सामान्य था। हरदोई में मेरा एक साथी आयूब जब घर आता तो उसके साथ ऐसा ही बर्ताव होता। मुझे यह सब एक व्यवस्था का हिस्सा ही लगता। जब इलाहाबाद पहुंचा तो पहला भ्रम दलितों को लेकर टूटा। कुछ अच्छे पढ़ने लिखने वाले और समृद्ध परिवार के एससी-एसटी सहपाठियों के साथ उठना बैठना हुआ। मेरे संसाधनों के हिसाब से वे मुझसे बेहतर खाते-पीते और रहते थे। मुझे लेकर उनके भीतर कभी जहर भी नजर नहीं आया। हां मैंने पूर्वांचल में ब्राह्मणों को लेकर क्षत्रिय और भूमिहारों के बीच में दया और उपेक्षा का भाव जरूर देखा। मजाक में ही सही वे हमेशा कहते- बाबा हमारी तरफ कहावत है ब्राह्मण के घर दावत में जाओ तो घर से खाकर जाओ क्योंकि वह कद्दू-पूड़ी ही खिलाएगा। बात मजाक की मजाक में ही रही और आज तक मजाक ही है। 
इसके बाद मेरा सामना मुस्लिम कम्यूनिटी के कुछ सीनियर स्टूडेंट्स से हुआ। मुझे वे बहुत नॉर्मल लगे। कई तो जूनियर होने के नाते कभी चाय-नाश्ते के पैसे भी नहीं देने देते। चूंकि इलाहाबाद में माइनॉरिटी हॉस्टल था तो उसमें भी आनाजाना होता। यह वह वक्त था जब सिमी एक्टिव था। तब सिमी आतंकी संगठन न होकर एक स्टूडेंट विंग होता था। कई बार मैं मुस्लिम हॉस्टल में होता तो सिमी वाले अपनी तकरीर देने चले आते। मेरे ज्यादातर मुस्लिम सहपाठी या तो उनका मजाक बनाते या लोड ही नहीं लेते। एक बार मुस्लिम सीनियर के साथ कमरे पर गेस्ट के रूप में रुके एक क्षत्रिय मित्र ने जब कमरे से निकल कर सुबह सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया तो कुछ स्वंयंभू मुस्लिम स्कॉलरों ने इसका विरोध किया। मेरे मुस्लिम सीनियर ने इलाहाबाद की गंदी गालियों से उनके स्कॉलर होने का भ्रम हमेशा के लिए उतार दिया। यह सब देखकर मेरा जहर हर कदम पर बुझता गया। मैं दिल्ली आया। यह शहर सही मायने में 'जात न पूछो साधो की' भावना को चरित्रार्थ करता है। कोई किसी की जात नहीं पूछता, न ही सरनेम से जाति का अंदाजा लगाता है। यहां पैसा और पोजिशन ही आपकी जात है। वैसे यहां क्या, दुनिया के हर बड़े शहर में ऐसा ही है। मैंने अपनी मर्जी से दिल्ली की रहने वाली ब्राह्मण से इतर जाति की कन्या से विवाह किया। जो थोड़ा बहुत पुराना जहर बचा था वह उसकी संगत में उतर गया। इस शहर में कई एससी-एसटी, मुस्लिम, पंजाबी, क्रिश्चियन, हिंदू, सिख सभी के अपने से बेहतर इंसानों से मिला। 
मैं खुशकिस्मत हूं कि घर से 20 साल से भी ज्यादा वक्त से बाहर निकलने और बेहतर अनुभवों की वजह से मेरा जहर खत्म हो गया। मेरे कई साथियों के बारे में मैं ऐसा नहीं कह सकता। कुछ मुझसे ओहदे, पैसे और रहन-सहन में तो बहुत आगे निकल गए लेकिन उनके जहर की तासीर वक्त के साथ घटने की बजाय और गहरी हो गई। लेकिन मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि ज्यादातर का जहर बचपन में सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई से ज्यादा नहीं है। मैं चैलेंज के साथ कह सकता हूं कि जो लोग मुस्लिम और दलितों के खिलाफ जहर उगलते हैं वह कभी भी इनके करीब नहीं रहे। उनका शायद ही कोई दोस्त इनमें से आता हो। वह यह नहीं जानते कि इनके जहर को एक खास राजनैतिक विचारधारा अपना हथियार बनाती है। 

अब बात करते हैं विरोध के विरोध की। मुस्लिम अपना हक मांगे तो कुचल दो, दलित हक मांगे तो कुचल दो, आदिवासी हक मांगे तो कुचल दो। साथ में यह ललकार भी लगाओ की एकबार हो जाए। लेकिन एक बात याद रखना देश में कुल आबादी का 80 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम-दलित-आदिवासी है। इन्होंने कभी सवर्णों और खुद पर हुए अत्याचार पर परचम उठाकर बदला नहीं मांगा। 
मेरी राय मानकर एक सोशल एक्सपेरिमेंट करके देखिएगा। किसी छोटी जगह से आए दलित या आदिवासी से ऊंची जाति के हिंदुओं को लेकर आपबीती सुनिएगा। जो किस्से उनके पास हैं उन्हें सुनकर आपका हिंदूराष्ट्र और रामराज्य डोलने लगेगा। वे हिंदूराष्ट्र की बेइमानी वैसे ही जानते हैं जैसे मुस्लिम NRC और CAB को लेकर जानते हैं।

उत्तर प्रदेश ब्यूरो सै काशिम के सौजन्य से 

 

 


भारत में महिलाओं की स्थिति- एक मूल्यांकन।

भारत में महिलाओं की स्थिति- एक मूल्यांकन।

05-Dec-2019

TNIS

भारत को आजाद हुए अरसा गुज़र गया। भारत के स्वतंत्र होने के बाद महिलाओं की दशा और दिशा में काफी बदलाव आया है। महिलाओं को अब पुरुषों के बराबर अधिकार भी मिलने लगे हैं। महिलाएं आज वह सब काम आजादी से कर सकती है जिन्हें वे पहले करने में अपने आप को असमर्थ और असहज महसूस करती थी। स्वतंत्रता के बाद बने भारत के संविधान में महिलाओं को वे सब लाभ, अधिकार और काम करने की स्वतंत्रता दी गयी जिसकी वह हकदार थीं। सदियों से अपने साथ होते बुरे सुलूक और बेहूदा हरकतों के बावजूद महिलाएं आज अपने आप को सामाजिक बेड़ियों से मुक्त पाकर, आजाद महसूस करके और भी ज्यादा आत्मविश्वास और भरोसे के साथ परिवार, समाज और देश को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कार्य कर रही है। आज राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री पद से लेकर हर जगह महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
यदि देखा जाए तो हमारे देश की आधी जनसँख्या का प्रतिनिधित्व महिलाएं करती है। महिला सशक्तिकरण के बाद स्थिति बदल गई है।  हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते उस समय का जब उन्हें अपनी जिंदगी अपनी ख़ुशी से जीने की भी आजादी नहीं थी। परन्तु बदलते वक़्त और हालात के साथ इस नए ज़माने की नारी ने समाज में वो स्थान हासिल किया जिसे देखकर कोई भी गर्व करेगा। आज महिलाएं समाज सुधार, उधमी, प्रशासनिक सेवा, राजनयिक सेवा जैसे हर क्षेत्र में दिखाई दे रही हैं।
महिलाओं की स्थिति में सुधार ने देश के आर्थिक और सामाजिक सुधार की तस्वीर बदल दी। हम यह तो नहीं कह सकते कि महिलाओं के हालात पूरी तरह बदल गए है पर पहले की तुलना मे तरक्की हुई है।  महिलाएं अब  सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों को लेकर बहुत ज्यादा जागरूक है जिससे उनको परिवार तथा रोजमर्रा की दिनचर्या से संबंधित खर्चों का निर्वाह करने का मौका आसानी से मिल जाता है। हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है।   विजयलक्ष्मी पंडित, एनी बेसंट, महादेवी वर्मा,  पी.टी उषा, अमृता प्रीतम, पदमजा नायडू, कल्पना चावला, मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, और न जाने कितने ऐसे नाम जिन्होंने महिलाओं की जिंदगी के मायने बदल दिए हैं। आज महिलाएं हर रूप में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शिक्षा, विज्ञान तथा अन्य विभागों में अपनी सेवाएं दे रही है। वे अपनी पेशेवर जिंदगी के साथ-साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बख़ूबी निभा रही है। इतना सब हो जाने के बाद भी प्रतिदिन हमें मानसिक तथा शारीरिक उत्पीड़न से जुडी ख़बरें सुनने को मिल जाती है।
भारत में महिलाएं हर तरह की हिंसा का शिकार हुई हैं। भारतीय समाज के द्वारा दी गई क्रूरता को महिला को सहन करना पड़ता है चाहे वह घरेलू हो या फिर शारीरिक, सामाजिक अथवा मानसिक हो।  समय के बदलने के साथ-साथ महिलाओं की स्थितियों में भी काफी बदलाव आता चला गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि हिंसा के कारण महिलाओं ने अपने शिक्षा के साथ सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में भागीदारी के अवसर भी खो दिए। इसके जिम्मेदार भी हम हैं। हमारी सोच जिम्मेदार है।
महिलाओं को भरपेट भोजन नहीं दिया जाता था, मनपसंद कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी, जबरदस्ती विवाह होता था,     भारतीय समाज में ऐसा माना जाता है की हर महिला का पति उसके लिए भगवान की तरह है।  हर चीज़ के लिए उन्हें अपने पति पर निर्भर रहना चाहिए। 
 नववधू की हत्या, कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ प्रथा महिलाओं पर होती बड़ी हिंसा का उदाहरण है। इसके अलावा महिलाओं को भरपेट खाना न मिलना, सही स्वास्थ्य सुविधा की कमी, शिक्षा के प्रयाप्त अवसर न होना, नाबालिग लड़कियों का यौन उत्पीड़न, दुल्हन को जिन्दा जला देना, पत्नी से मारपीट, परिवार में वृद्ध महिला की अनदेखी आदि समस्याएँ आज भी महिलाओं की कहानी बयान करती हैं। इंसान होने के कारण हमें इंसान का सम्मान करना चाहिए चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ
उप निदेशक- स्पेशल क्राइम ब्यूरो, लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com


भारत में बढ़ते बलात्कार चिंता का विषय।

भारत में बढ़ते बलात्कार चिंता का विषय।

02-Dec-2019

हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जहां महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है लेकिन इसके बावजूद देश की एक तस्वीर यह भी है कि यहां पर महिलाएं ही नहीं बल्कि छोटी-छोटी मासूम बच्चियां तक सुरक्षित नहीं हैं। मैं किसी पर सवाल नहीं उठा रहा हकीकत बयान कर रहा हूं। हम सब को अच्छी तरह से मालूम हैं कि हमारे देश में महिलाओं का शारीरिक शोषण किस हद तक हो रहा है और सब कुछ देखते हुए भी हमने अपनी आंखें बंद कर रखी हैं। 
इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली कठुआ और उन्नाव गैंग रेप की घटनाओं को लेकर देश में गुस्सा और आक्रोश फैला। सोशल मीडिया में कैंपेन चले, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुआ और सियासत में आरोप प्रत्यारोप।दोषियों को मौत की सजा देने की मांग उठी मगर फिर सब ठंडा हो गया।
साल 2012 में दिल्ली के चर्चित निर्भया गैंगरेप मामले के वक्त भी ऐसा ही माहौल बना था। लोग सड़कों पर प्रदर्शनकारी बन कर उतर आये थे। इस खौफनाक मामले के बाद ये जनता के आक्रोश का ही असर था कि वर्मा कमिशन की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने नया एंटी रेप लॉ बनाया और आईपीसी और सीआरपीसी में तमाम बदलाव किए गए, और इसके तहत सख्त कानून बनाए गए। लेकिन ढाक के तीन पात, कुछ नहीं हुआ। इतनी सख्ती और इतने आक्रोश के बावजूद रेप के मामले नहीं रुके।
और अब हैदराबाद में लेडी वेटनरी डॉक्टर के साथ ऐसी हैवानियत हुई, जिसने पूर देश को हिला के रख दिया,हर जिंदा ज़मीर का आदमी अंदर तक कांप गया। मदद करने के बहाने चार दरिंदों ने उसके साथ गैंगरेप किया, और फिर उसे मारकर जिंदा जला दिया।  इस भयानक वारदात को लेकर पूरे देश में आक्रोश दिखाई पड़ रहा है। सिर्फ यही नही न जाने कितने ऐसी घटनाएं होती होंगी जो खबरों में नहीं आ पाती।  
देश की राजधानी दिल्ली में 2011 में जहां इस तरह के 572 मामले दर्ज किये गए थे, वहीं साल 2016 में यह आंकड़ा 2155 रहा। निर्भया कांड के बाद दिल्ली में दुष्कर्म के दर्ज मामलों में 132 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। साल 2017 में अकेले जनवरी महीने में ही दुष्कर्म के 140 मामले दर्ज किए गए थे। मई 2017 तक दिल्ली में दुष्कर्म के कुल 836 मामले दर्ज किए गए।

देश में बढ़ते बलात्‍कार के मामले एक महामारी की तरह फैल रहे हैं। लेकिन सिवाय जबानी जंग के कुछ नहीं हुआ। जनता जो कर सकती है किया। धरना, प्रदर्शन, कैंडल मार्च, शांति यात्रा इत्यादि। मगर सरकार और प्रशासन बड़ा है फैसला उनको करना है।

भारत को भले ही एक शिक्षित देश माना जाता है मगर अभी भी यहां पर बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है। जिसकी वजह से लोग सही ग़लत नहीं सोच पाते हैं और  कुछ ऐसा कर जाते हैं जो उनके और उनके परिवार और देश के माथे पर कलंक बन जाता है। इस हरकत से घर, शहर, प्रदेश, और देश सब बदनाम होता है। भारत में शिक्षा का स्‍तर बहुत ही ज्यादा खराब है। यहां पर सरकार शिक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च तो करती है लेकिन अच्‍छी शिक्षा दे पाने में वो अब भी कामयाब नही है। आप देखेंगे तो पाएंगे कि ज्यादातर लोग बातचीत में गालियों का प्रयोग करते हैं। गालियां देना और अपशब्दों का प्रयोग एक फैशन बन गया है। ऐसे लोग सभ्य समाज का निर्माण कैसे करेंगे?
कानून व्यवस्था इतनी लचर है कि आरोपी को 10-20 साल बाद सज़ा होती है। भारत में भ्रष्‍टाचार अधिक होने की वजह से लोग रेप करके आसानी से निकल जाते हैं।
कई मशहूर और रसूखदार लोग अभी भी जेल में बंद हैं।  जिन रेपिस्‍टों को सजा होती है उनकी संख्‍या बहुत ही कम है। सरकार अगर रेप करने वाले मुजरिमों को सख्‍त सजा दे तो शायद देश में बढ़ते बलात्‍कारों को कम किया जा सकता है। जितनी चुस्ती हेलमेट चेक करने के लिए दिखाई देती है और फ़ौरन चालान काटे जाते हैं अगर वैसे ही इसमें भी कार्यवाही की जाये तो कुछ उम्मीद लगाई जा सकती है।
एक और बात पर अगर गौर किया जाए तो पता चलता है कि अधिकतर रेप नशे की हालत में ही होते हैं। आज का नवजवान नशे के फंदे में कैद है। नशे में इंसान अपने होश खोकर ग़लत हरकतें कर जाता है ऐसी चीज़ों को भी देश में बैन कर देना चाहिए। मैं प्रतिदिन देखता हूं कि शाम होते ही नशे के आदी लोग खुलेआम शराब का इस्तेमाल करते हैं। कोई रोकने वाला नहीं। स्कूल, कालेज के आसपास शराब की दुकानें खुली रहती हैं।
सिर्फ सरकार को ही नहीं बल्कि हमारे समाज को भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कुछ करना चाहिए वरना हमारी बहन बेटियां यूं ही अपराध की भेंट चढ़ती रहेंगीं।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ
उप निदेशक- स्पेशल क्राइम ब्यूरो, लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com

 


मुख्यमंत्री ने धुर नक्सल क्षेत्र नुकनपाल के गौठान का किया भ्रमण : ग्रामीणों से कहा जैविक खेती अपनाएं और गोबर से वर्मीकम्पोस्ट बनाएं

मुख्यमंत्री ने धुर नक्सल क्षेत्र नुकनपाल के गौठान का किया भ्रमण : ग्रामीणों से कहा जैविक खेती अपनाएं और गोबर से वर्मीकम्पोस्ट बनाएं

24-Nov-2019

बीजापुर के 15 गौठानों में पशुधन संवर्धन का काम प्रारंभ: 927 पशुओं का किया गया कृत्रिम गर्भाधान (TNIS)

TNIS 
 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज बीजापुर जिले की ग्राम पंचायत मूसालूर के ग्राम नकुनपाल में बनाए गए गौठान का अवलोकन किया। उन्होंने वहां ग्रामीणों और महिला स्व-सहायता समूह की महिलाओं से बड़ी आत्मीयता से बातचीत की और उन्हें जैविक खेती अपनाने और गोबर से वर्मी कम्पोस्ट बनाने की समझाईश दी। उन्होंने ग्रामीणों को रासायनिक उर्वरक की जगह गोबर खाद का खेतों में उपयोग करने की सलाह देते हुए कहा कि इससे अच्छी फसल होगी और कृषि उत्पाद का मूल्य भी अच्छा मिलेगा। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को कजरीफूल, जवांफूल चावल, तीखूर और अन्य जैविक उत्पाद भेंट किए। मुख्यमंत्री ने गौठान में नारियल और आम के पौधे भी रोपे। 
    मुख्यमंत्री ने चर्चा के दौरान कहा कि पहले पशुओं का गोबर लोग ट्रालियों में काफी कम दाम पर ले जाते थे, यदि गोबर से वर्मी कम्पोस्ट बनाई जाए तो यह खाद 8 से 10 रूपए प्रति किलो के भाव से बिकती है। गौठान में उपस्थित ग्रामीणों और महिलाओं ने  मुख्यमंत्री को बताया कि इस गौठान में लगभग 200 पशु आते हैं। यह गौठान 3 एकड़ में निर्मित किया गया है। महिला समूह ने गोबर से 5-6 क्विंटल खाद भी बनाई है। मुख्यमंत्री ने बीजापुर जिले के 15 गौठानों में पशुधन संवर्धन का काम प्रारंभ होने की जानकारी मिलने पर प्रसन्नता प्रकट की। पशुधन विकास विभाग के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि गौठानों में अब तक 927 पशुओं का कृृत्रिम गर्भाधान किया गया है। मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों को पैरा नहीं जलाने और गौठानों में पैरा दान करने की सलाह दी। इस अवसर पर राजस्व मंत्री और बीजापुर जिले के प्रभारी मंत्री श्री जयसिंह अग्रवाल, उद्योग मंत्री श्री कवासी लखमा, सांसद श्री दीपक बैज, विधायकद्वय श्री मोहन मरकाम और श्री विक्रम मंडावी भी उपस्थित थे। 

 

 


विकसित और खुशहाल बीजापुर का सपना जल्द  होगा साकार: श्री भूपेश बघेल

विकसित और खुशहाल बीजापुर का सपना जल्द होगा साकार: श्री भूपेश बघेल

24-Nov-2019

मुख्यमंत्री ने किया 291 करोड़ रुपये लागत के 142 विकास कार्यों का लोकार्पण-भूमिपूजन

 TNiS 
मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज बीजापुर के मिनी स्टेडियम में आयोजित विशाल पंच-सरपंच एवं किसान सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि विकसित और खुशहाल बीजापुर जिले का सपना जल्द साकार होगा। बस्तर के इस दूरस्थ जिले में विकास की असीम संभावनाएं हैं, इस जिले के समग्र विकास के लिये राज्य सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है। जिले के अंदरूनी इलाके में 16 नयी सड़कें बनायी गयी है। अभी 69 करोड़ 65 लाख रुपये लागत की 60 नई सड़कों का निर्माण करेंगे और 71 करोड़ 75 लाख रुपये के 6 बड़े पुल बनायेंगे। यही नहीं जिले के सभी क्षेत्रों में विकास के कार्यों को तेजी के साथ सुनिश्चित किया जाएगा और यहां के लोगों को विकास से जोड़ने के लिये विशेष पहल की जाएगी। 
    मुख्यमंत्री श्री बघेल ने इस अवसर पर 291 करोड़ रुपये लागत के 142 निर्माण और विकास कार्यों का लोकार्पण एवं भूमिपूजन किया। जिला खनिज न्यास निधि के तहत सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र उसूर तथा गंगालूर के लिए दो नयी एम्बुलेंस को हरी झण्डी दिखाकर रवाना किया गया। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों के आग्रह पर 21 करोड़ 36 लाख रुपये लागत के 19 नवीन निर्माण एवं विकास कार्यों की मंजूरी दी। उन्होंने एरमनार से तोयनार तक 10 किलोमीटर डामरीकृत सड़क निर्माण के लिए 6 करोड़ रुपये, कोंगूपल्ली से संकनपल्ली तक 15 किलोमीटर डामरीकृत सड़क निर्माण हेतु एक करोड़ रुपये,पोटामपारा से रेड्डी तक डामरीकृत सड़क निर्माण के लिए 3 करोड़ रुपये, बीजापुर महादेव तालाब गहरीकरण एवं सौंदर्यीकरण के लिए डेढ़ करोड़ रुपये, सभी 4 ब्लॉकों के प्रमुख तालाबों के गहरीकरण हेतु 5 करोड़ रुपये सहित 10 करोड़ 50 लाख रुपये लागत के 14 अन्य निर्माण एवं विकास कार्यों की मंजूरी दी।  
    राज्य सरकार ने किसानों, गरीबों सहित समाज के सभी वर्गों के हितों के लिए अनेक योजनाएं प्रारंभ की है। इन योजनाओं से प्रदेश में विकास का अच्छा वातावरण बना है। उन्होंने कहा कि किसानों की कर्जमाफी, किसानों से 2500 रुपये मूल्य पर धान खरीदी, 4 हजार रुपये प्रति मानक बोरा की दर से तेंदूपत्ता की खरीदी, सार्वभौम सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सिंचाई कर माफी इत्यादि ऐसी योजनाएं लागू किये हैं, जिससे गांव, गरीब और किसान सभी लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस वर्ष भी किसानों से 2500 रुपये प्रति क्विंटल पर धान की खरीदी करेगी। केन्द्र सरकार छत्तीसगढ़ का चावल ले या ना ले राज्य सरकार किसानों से किया अपना वायदा निभाएगी।  
इस मौके पर उद्योग मंत्री श्री कवासी लखमा, सांसद बस्तर श्री दीपक बैज, विधायक बीजापुर एवं उपाध्यक्ष बस्तर विकास प्राधिकरण श्री विक्रम मंडावी ने भी सम्मेलन को सम्बोधित किया। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में 50 हितग्राहियों को राजीव गांधी आश्रय योजना के अंतर्गत अधिकार पत्र, दो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं 5 शिक्षकों को नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया। वहीं अंदरूनी इलाके में सेवायें देने वाली 4 स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तथा एक मितानिन सहित अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में परचम लहराने वाले स्पोर्ट्स अकादमी बीजापुर के 5 खिलाड़ी छात्र-छात्राओं को प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। श्री बघेल ने 5 किसानों को नलकूप स्थापना के लिए चौरासी-चौरासी हजार रुपये सहायता राशि के चेक प्रदान किया गया। वहीं श्रम विभाग की योजना के तहत दो हितग्राहियों को 35 हजार रुपये की सहायता राशि तथा वन्य प्राणी से घायल होने वाले 3 हितग्राहियों को एक लाख 60 हजार रुपये आर्थिक सहायता राशि का चेक प्रदान किया गया। 
इस अवसर पर प्रदेश के राजस्व मंत्री एवं प्रभारी मंत्री बीजापुर श्री जयसिंह अग्रवाल, स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ प्रेमसाय सिंह टेकाम, विधायक कोंडागांव श्री मोहन मरकाम, विधायक दन्तेवाड़ा श्रीमती देवती महेन्द्र कर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष बीजापुर श्रीमती जमुना सकनी सहित क्षेत्र के अनेक जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।

 

 


चिराग राजनीति में नई संभावनाओं की खनक

चिराग राजनीति में नई संभावनाओं की खनक

21-Nov-2019

-ललित गर्ग-

देश की राजनीति में युवाओं का समुचित प्रतिनिधित्व न होना दर्शाता है कि क्रांति और बदलाव का जज्बा रखने वाला युवा इसे लेकर उदासीन है या उसकी संभावनाओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। यह वक्त की मांग हो चली है कि युवाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले। इस दृष्टि से केंद्रीय मंत्री, दलितों के बड़े नेता एवं लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने पिछले दिनों लोजपा की केंद्रीय कमान अपने 36 वर्षीय पुत्र चिराग पासवान को सौंपने का निर्णय लेकर न केवल बिहार की राजनीति में बल्कि समूची देश की राजनीति में युवा संभावनाओं को उजागर करने की खनक पैदा की है। यह वह आहट है जो भारत की राजनीति को एक नयी दिशा एवं दृष्टि प्रदत्त करेंगी। क्योंकि चिराग वोट की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक उत्थान की नीति के चाणक्य है।

भारतीय राजनीति में युवाओं की भागीदारी को लेकर अक्सर बड़ी-बड़ी बातें हर किसी मंच से होती रहती हैं लेकिन कोई दल उन्हें प्रतिनिधित्व का मौका नहीं देता क्योंकि उनकी नजर में युवा वोट भर हैं। राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल भीड़ और ट्रौलिंग के लिए करते रहते हैं। हालांकि इस मिथक को चिराग ने तोड़ा, 2014 के लोकसभा चुनाव में जमुई सीट पर 80 हजार से ज्यादा मतों से विजयी हुए थे तो एक ही संसदीय दौर में उन्होंने जनता का विश्वास इस कद्र जीता कि 2019 के चुनाव में चिराग ने 5 लाख से ज्यादा वोट हासिल करते हुए लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। बिहार के युवा सांसद चिराग पासवान सक्षम जनप्रतिनिधि के साथ-साथ मौलिक सोच एवं संवेदनाओं के प्रतीक हंै। उन्हें सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी होकर प्रासंगिक एवं अप्रासंगिक के बीच भेदरेखा बनाने एवं अपनी उपस्थिति का अहसास कराने का छोटी उम्र में बड़ा अनुभव है जो भारतीय राजनीति के लिये शुभता का सूचक है। लोकतंत्र का सच्चा जन-प्रतिनिधि वही है जो अपनी जाति, वर्ग और समाज को मजबूत न करके देश को मजबूत करें।

चिराग पासवाल भारत की राजनीति में एक मौलिक सोच के प्रतीक नेता के रूप में उभर रहे हैं और मौलिकता अपने आप में एक शक्ति होती है जो व्यक्ति की अपनी रचना होती है एवं उसी का सम्मान होता है। संसार उसी को प्रणाम करता है जो भीड़ में से अपना सिर ऊंचा उठाने की हिम्मत करता है, जो अपने अस्तित्व का भान कराता है। मौलिकता की आज जितनी कीमत है, उतनी ही सदैव रही है। जिस व्यक्ति के पास अपना कोई मौलिक विचार या कार्यक्रम है तो संसार उसके लिए रास्ता छोड़कर एक तरफ हट जाता है और उसे आगे बढ़ने देता है। मौलिक विचार तथा काम के नये तरीके खोज निकालने वाला व्यक्ति ही समाज एवं राष्ट्र की बड़ी रचनात्मक शक्ति होता है अन्यथा ऐसे लोगों से दुनिया भरी पड़ी है जो पीछे-पीछे चलना चाहते हैं और चाहते हैं कि सोचने का काम कोई और ही करे। चिराग ने भारत की राजनीति में युवा पीढ़ी के लिए कुछ नया सोचा है, कुछ मौलिक सोचा है, तो सफलता निश्चित है। वे इसी सोच से प्रदेश की राजनीति से केन्द्र की राजनीति की ओर अग्रसर होकर सफल नेतृत्व देने में सक्षम साबित होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

लोजपा अब पूरी तरह युवाओं के हाथ में है। चिराग युवा हैं, सक्षम है, प्रखर वक्ता है, कुशल संगठनकार एवं प्रबन्धक हैं और विगत में उन्होंने अनेक अवसरों पर अपनी इन क्षमताओं के साथ-साथ निर्णायकता साबित की है। कई मौकों पर यह बात सामने आई है कि बिहार के साथ-साथ केंद्रीय राजनीति के दांव-पेच और समीकरणों को भी वह अच्छी तरह जानने-समझने लगे हैं। हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित राजनीति के अगले ध्वजवाहक बनने और अपने लक्षित मतदाता समूह में पिता जैसी स्वीकार्यता पाने की होगी। चिराग नई लकीर खींचने में पारंगत है, वे अपने पिता की प्रतिच्छाया ही न बनकर कुछ नये प्रतिमान स्थापित करेंगे, राजनीति की नई परिभाषाएं गढ़ंगे। क्योंकि वे विपरीत स्थितियों में सामंजस्य स्थापित करके भरोसा और विश्वास का वातावरण निर्मित करने में दक्ष है।

युवापीढ़ी और उनके सपनों का मूच्र्छित होना और उनमें निराशा का वातावरण निर्मित होना- एक सबल एवं सशक्त राष्ट्र के लिये एक बड़ी चुनौती है। चिराग ने यह अनुभव किया, यह उनकी सकारात्मक राजनीति एवं मानवतावादी सोच का ही परिणाम है। चिराग इस मामले में अन्य क्षत्रप या नेता पुत्रों से थोड़ा अलग इसलिए भी हैं कि उनका नजरिया और अंदाज भविष्योन्मुखी और विकासवादी प्रतीत होता है। इधर हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चिराग की तारीफ की थी। इन सबके बावजूद यक्ष प्रश्न यह है कि क्या चिराग अपने पिता की दलित राजनीति की विरासत को कोई नया आयाम दे पाएंगे। या फिर वह इस विरासत से इतर मुख्यधारा की राजनीति में अपनी काबिलियत दिखाएंगे।

चिराग राजनीति की बारीकियों को समझने में माहिर है। राजनीति का मौसम विज्ञानी माने जाने वाले रामविलास शायद मोदी लहर का पूर्वानुमान लगाने में चूके हो लेकिन चिराग ने शायद मोदी की आंधी को भलीभांति भांप लिया था और वह किसी संशय में नहीं थे। ऐसे में अपने पिता की दुविधा दूर करते हुए उन्होंने एनडीए के पाले में जाने का दोटूक फैसला किया। चिराग का यह कदम ना सिर्फ सटीक साबित हुआ, बल्कि उसकी राजनीतिक क्षेत्र में व्यापक चर्चाएं भी होने लगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि रामविलास दलितों के एक बड़े नेता हैं और अपने मतदाता समूह में उनकी मजबूत स्वीकार्यता भी है। उनकी लोकप्रियता बिहार के बाहर अन्य प्रदेशों में भी है। इसलिए जहां तक विरासत की राजनीति का प्रश्न है तो चिराग के लिए पहली चुनौती तो अपने पिता जैसी स्वीकार्यता हासिल करने की रहेगी। 

उनके पास दलित सेना जैसा ताकतवर संगठन भी है। चिराग को पार्टी के सांगठनिक और प्रभाव विस्तार के काम में दलित सेना की मदद बेहद करीने से लेनी होगी। पार्टी की बागडोर थामने के बाद चिराग पर न केवल पार्टी की बल्कि विभिन्न राजनीतिक दलों की नजरें टिकी है कि वे अब कौन से सियासी रास्ते पर चलते हैं, कौनसे नये राजनीतिक प्रयोग करते हैं। सवाल यह है कि क्या वह अपने पिता की राजनीतिक छाया से इतर कोई अन्य रास्ता अपनाते हैं या फिर दलित राजनीति को एक युवा नेतृत्व देने के रास्ते पर ही आगे बढ़ेंगे। चिराग के पास फिलहाल विकल्प खुले हैं। हाल के समय में भारतीय राजनीति में नई पीढ़ी के कई नेता पुत्रों ने अभी तक कोई बहुत बड़ी उम्मीद नहीं जगाई है। चाहे राहुल गांधी हों या तेजस्वी यादव, फिलहाल इनके सियासी सितारे डूब-उतर रहे हैं। साथ ही अपने प्रभाव में निरंतरता बरकरार रखने में कहीं न कहीं चूक भी रहे हैं। हालांकि इन नामों की तुलना में चिराग के पास कोई बहुत बड़ी राजनीतिक विरासत तो नहीं है, लेकिन वे अपने होने का अहसास, कुछ अनूठा करने का एवं जनता के दिलों को जीतने का हूनर साबित किया है। बावजूद इसके उन्हें अब एक राष्ट्रीय नेता के रूप में खुद को साबित करना अभी बाकी है। फिलहाल उनके सामने झारखण्ड के चुनाव का मौका एकदम सामने है, जहां उन्हें खुद का साबित करना होगा।


खुशहाल बचपन हमारी सोच का संकल्प बने

खुशहाल बचपन हमारी सोच का संकल्प बने

13-Nov-2019

 ललित गर्ग

आजाद भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिवस 14 नवम्बर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, हममें से कई लोग सोचते हैं कि बाल दिवस को इतने उत्साह या बड़े स्तर पर मनाने की क्या जरूरत है। परन्तु आज देश का बचपन जिस बड़े पैमाने पर दबाव, हिंसा, शोषण का शिकार है, बाल दिवस मनाते हुए हमें बचपन की विडम्बनाओं एवं विसंगतियों से जुड़ी त्रासदियों को समाप्त करना चाहिए। ऐसा इसलिये भी जरूरी है कि बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है। यदि सात दशक तक बाल दिवस मनाते एवं बच्चों के उन्नत भविष्य बनाने का संकल्प दोहराते हुए बीत गया फिर भी बच्चों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों और शोषण के विरुद्ध हमने कोई सार्थक वातावरण निर्मित नहीं किया है तो यह विचारणीय स्थिति है।

ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं-ना-कहीं हमारे राष्ट्र के पहरूओं ने देश के बाल-निर्माण का सुनहरा भविष्य बुनते हुए कोई-ना-कोई त्रुटि की है। सोचने वाली बात है कि हमने बाल-दिवस को कोरा आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, प्रयोजनात्मक नहीं। यही कारण है कि इतने लम्बे सफर के बाद भी कहां फलित हो पाया है हमारी जागती आंखों से देखा बचपन को सुनहरा बनाने का स्वप्न? कहां सुरक्षित एवं संरक्षित हो पाया है हमारा बचपन? कहां अहसास हो सका बाल-चेतना की अस्मिता का? आज भी बाल जीवन न सुखी बना, न सुरक्षित बना और न ही शोषणमुक्त।

बच्चों के प्रति पंडित नेहरू के प्रेम को देखते हुए उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाने का मुख्य उद्देश्य यही था कि सभी भारतीय नागरिकांे को बच्चों के प्रति जागरूक करना ताकि सभी नागरिक अपने बच्चों को सही दिशा में सही शिक्षा एवं संस्कार दे, उनको शोषण एवं अपराधमुक्त परिवेश दे, उनकी प्रतिभा को उभारने का अवसर दे ताकि एक सुव्यवस्थित और सम्पन्न राष्ट्र का निर्माण हो सके जो की बच्चों के अच्छे भविष्य पर ही निर्भर करता है। लेकिन आज का बचपन केवल अपने घर में ही नहीं, बल्कि स्कूली परिवेश एवं समाज में दबाव एवं हिंसा का शिकार है। यह सच है कि इसकी टूटन का परिणाम सिर्फ आज ही नहीं होता, बल्कि युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यह एक महाबीमारी एवं त्रासदी का रूप ले लेता है। यह केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है।

बचपन से जुड़ी समस्याओं एवं त्रासद स्थितियों पर समय-समय पर अनेक शोध हुए है, इन शोधकर्ताओं का मानना है कि स्कूल और घर दोनों ही जगह ताकत का खेल चल रहा है। स्कूल का प्रबंधन तो अपना सारा रोबदाब बच्चों को ही दिखाता है। लेकिन घर में बालक माता-पिता के कुल दीपक और बुढ़ापे के सहारे हैं, अतः वे उन्हें सक्षम बनाने एवं दुनिया का अनोखा बालक का दर्जा दिलाने के लिये अपने व्यवहार को ही कटू एवं हिंसक बना देते हैं। यदि माता-पिता किसी ऊंच्चे पद पर हैं तो बच्चों का चरित्र उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। दोनों स्थानों में परिवार और स्कूल में लीक से हटने पर बच्चों के लिये दण्ड की व्यवस्था है। लड़कियों को धमकी दी जाती है कि यदि उन्होंने कोई गलती की तो उसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा।

विडम्बना यह है कि भारतीय बालक अपने अधिकारों से अनभिज्ञ हैं। यह काम शिक्षकों और पालकों को करना चाहिए किन्तु वे दोनों ही इनके प्रति उदासीन हैं। वे बाल अधिकार को अपनी सत्ता के लिए धमकी मानते हैं। संविधान में बच्चों के जीवन, विकास और सुरक्षा की व्यवस्था है। दण्ड को बालकों के अधिकारों का अतिक्रमण माना जाता है। लेकिन इन कानूनांे के होते हुए भी अज्ञानता के कारण बच्चे उनका लाभ नहीं ले पाते।

इस गंभीर होती समस्या से निजात पाने के लिये एक विस्तृत बाल संहिता तैयार की जाए और उसमें बालक के अधिकारों को शामिल किया जाए। हमें इसकी बड़ी जरूरत है। क्योंकि हमारे देश के लोगों के मन में बच्चों को लेकर महत्वाकांक्षाएं बड़ी गहराई से जमी हुई हैं। यही कारण है कि हमारे देश का बचपन संकट एवं अंधेरों से घिरा हैं। बचपन को इस संकट एवं उन पर हो रही हिंसा एवं दबा की त्रासदी से मुक्ति के लिये समय समय पर प्रयत्न होते रहे हैं। बी. आर. कृष्णन के सभापतित्व में विशेषज्ञों की एक समिति ने ‘चिल्ड्रन कोड बिल-2000’ तैयार किया था। इसमें सुझाया गया है कि एक राष्ट्रीय तथा सभी राज्यों के अपने-अपने कमीशन बनाए जाएं। ये कमीशन महिला कमीशन जैसे हों। कोड बिल के पालकों के इस दायित्व पर जोर दिया गया है कि वे बच्चों के साथ प्यार और दयालुता का व्यवहार करंे। परिवारों और स्कूलों में संवाद का माहौल बनना चाहिए ताकि बच्चों का स्वाभाविक विकास हो सके। ताकि बचपन के सामने आज जो भयावह एवं विकट संकट और दुविधा है उससे उन्हें छुटकारा मिल सके।

लंदन के लैंकस्टर यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट स्कूल के अर्थशास्त्र विभाग में असोसिएट रह चुकीं एम्मा गॉरमैन ने इस पर लम्बा शोध किया है। उन्होंने अपने इस शोध के लिए यूके के 7000 छात्र-छात्राओं को चुना। उन्होंने पहले उनसे तब बात की जब वे 14-16 की उम्र के थे। उसके बाद तकरीबन दस वर्षों तक उनसे समय-समय पर बातचीत की गई। गॉरमैन ने पाया कि बाल एवं किशोरावस्था के हिंसक एवं दबावपूर्ण वातावरण यानी बच्चों को अभित्रस्त करना, उन पर अनुचित दबाव डालना या धौंस दिखाना, चिढ़ाना-मजाक उड़ाना या पीटना की घटनाओं ने बच्चों के भीतर के आत्मविश्वास, स्वतंत्र व्यक्तित्व, मौलिकता, निर्णायक क्षमता का दीया बुझा दिया, समस्याओं से लड़ने की ताकत को कमजोर कर दिया, पुरुषार्थ के प्रयत्नों को पंगु बना दिया।

बच्चा अपनी मर्जी से कुछ भी करता है या अपनी आंखों से दुनिया देखने की कोशिश करने लगता है तो उसे मौखिक उपदेश से लेकर पिटाई तक झेलनी पड़ती है। उसे वह बनने की कवायद करनी पड़ती है जो घर के लोग चाहते हैं। इस तरह उसकी इच्छा, कल्पनाशीलता और सर्जनात्मकता की बलि चढ़ जाती है। घर में आमतौर पर संवादहीनता का माहौल रहता। मां-बाप बच्चों से बात नहीं करते। उसकी शिकायतों, उसकी परेशानियों को जानने की कोशिश नहीं करते। ऐसे में बच्चे के भीतर बहुत सी बातें दबी रह जाती हैं जो धीरे-धीरे कुंठा का रूप ले लेती हैं, जो आगे जाकर बच्चों को मनोरोगी बना देती है।

स्कूली परिवेश एवं घर के माहौल में बच्चों के साथ होने वाले नकारात्मक प्रभाव वयस्क होने के बाद जब सामने आता है तो वहां एक ऐसी ढलान होती है जहां संभावनाभरे इंसान का जन्म असंभव हो जाता है। हमें उन धारणाओं एवं मान्यताओं को बदलना होगा जो बच्चों पर दबाव एवं हिंसा की त्रासदी का आधार है, जिनको सन्दर्भ बनाकर हमने गलतफहमियों, सन्देहों और अपनी महत्वाकांक्षाओं की दीवारें इतनी ऊंची खड़ी कर दी कि बचपन ही संकट में आ गया है। आधुनिकता के इस युग में सभी अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा खूब पढ़े और इंजीनियर, डॉक्टर या कोई आईपीएस अधिकारी बने इसके लिये माता-पिता शुरू से ही बच्चे से अतिश्योक्तिपूर्ण अपेक्षाएं रखते हैं और इसके लिये उसे अभित्रस्त करते हैं, उस पर अनुचित दबाव डालते हैं और हिंसक हो जाते हैं।

इस बीच अभिभावक या शिक्षक बच्चे की क्षमता को परखना भूल जाते हैं, उस पर दबाव एवं धौंस जमाने, उसको डराने, चिढ़ाने, मजाक उड़ाने या पीटने के कारण बच्चा बेहतर रिजल्ट देने के बजाय कमजोर हो जाता है, उसकी नैसर्गिक क्षमताएं अवरुद्ध हो जाती है। इसके कारण बाल एवं किशोरावस्था में दबाव, शोषण एवं हिंसा का शिकार होने वालें बच्चों में से 40 प्रतिशत के मनोरोगी होने की आशंका रहती है। मनोरोग के लक्षण प्रायः तब उभरते हैं जब बच्चे 20-25 की उम्र में पहुंचते हैं। मनोरोगों में डिप्रेशन प्रमुख होता जिसके चलते उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कत होती है।

बाल दिवस केवल एक दिन स्कूलों में मना लेने से इस दिवस का उद्देश्य खत्म नहीं हो जाता है क्योंकि आज भी हमारे देश में बालमजदूरी, यौन शोषण, दबाव एवं हिंसा जैसे जघन्य अपराध होते रहते है। जिस उम्र में बच्चो के हाथ में किताबे होनी चाहिए उस उम्र में इन बच्चों को आर्थिक कमजोरी के चलते इन्हें काम करने पर मजबूर कर दिया जाता है, जिसके चलते इनके जीवन में पढाई का कोई महत्व नहीं रह जाता है ऐसे में अगर बच्चे पढ़-लिख न सके तो एक विकसित राष्ट्र का सपना कैसे आकार लेगा? ऐसे में बस यही प्रश्न उठता है हमारे देश की सरकारों को बच्चों  को बालमजदूरी, यौन-शोषण, पारिवारिक हिंसा से बचाने के लिए कानून का निर्माण किया जाय और पूरी सख्ती से इसे लागू भी किया जाय। साथ में इन बच्चों  के पढाई के खर्चों को भारतीय सरकारों को एक सीमा तक खुद उठाना चाहिए तभी हम एक विकसित राष्ट्र का सपना देख सकते है और तभी बाल दिवस मनाने का उद्देश्य भी पूरा होगा।