बीएचयू मामला : फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति का समर्थन करने वाले दलित प्रोफेसर से मारपीट की कोशिश

बीएचयू मामला : फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति का समर्थन करने वाले दलित प्रोफेसर से मारपीट की कोशिश

10-Dec-2019

लखनऊः बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्रों के एक समूह ने डॉ. फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति का समर्थन करने वाले संस्कृत धर्म विज्ञान (एसवीडीवी) संकाय के एक दलित प्रोफेसर का पीछा किया और उनके साथ मारपीट करने की कोशिश की.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी के एसवीडीवी फैकल्टी के छात्र मुस्लिम होने की वजह से फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं.

प्रोफेसर शांति लाल साल्वी ने बताया कि वह अपने फैकल्टी ऑफिस से बाहर आ रहे थे कि तभी छात्रों के एक समूह ने उन्हें जातिसूचक शब्द कहने शुरू किए और हमला करने के इरादे से उनके पीछे भागे.

साल्वी ने चीफ प्रॉक्टर ओपी राय को लिखे पत्र में छात्रों को उकसाने के लिए फैकल्टी के ही एक वरिष्ठ प्रोफेसर पर आरोप लगाया है.

साल्वी ने प्रॉक्टर को लिखे पत्र में कहा, ‘मैं एसवीडीवी फैकल्टी में अपने ऑफिस में बैठा था कि कुछ छात्र मेरे पास आए और मुझे जाने को कहा क्योंकि वे फैकल्टी बंद कर रहे थे. जैसे ही मैं एक सहकर्मी के साथ बाहर आया, मुनीश मिश्रा नाम के एक बाहरी शख्स ने शुभम तिवारी नाम के एक छात्र और अन्य के साथ मिलकर मेरे खिलाफ नारेबाजी करनी शुरू कर दी.’

प्रोफेसर ने आगे लिखा, ‘उन्होंने मुझे और विभाग के एचओडी को चोर कहा. जल्द ही और भी छात्र आ गए और मुझ पर जातिसूचक टिप्पणी करने लगे. वे सब मुझे पीटने के इरादे से मेरे पीछे भागे. यह जानकर कि मुझे खतरा है, मैंने भागना शुरू किया और लगभग आधा किलोमीटर भागा. सेंट्रल ऑफिस पहुंचने के लिए मैंने एक बाइक सवार से लिफ्ट ली. एक छात्र ने मुझ पर ईंट फेंकी लेकिन वह मुझे लग नहीं पाई.’

इस घटना का कारण पूछने पर साल्वी ने कहा कि यह पूरा मामला फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी का ही एक प्रोफेसर छात्रों को उनके खिलाफ भड़का रहा है.

साल्वी ने कहा, ‘मेरे विभाग में एक प्रोफेसर हैं, जो पहले एचओडी हुआ करते थे. बीते कई वर्षों से वह मेरा उत्पीड़न कर रहे हैं. उन्होंने अफवाह भी फैलाई है कि बीएचयू से ही पीएचडी करने वाली मेरी पत्नी मुस्लिम है और फ़िरोज़ ख़ान की बहन है. उन्होंने छात्रों को बताया कि मैं ही फ़िरोज़ ख़ान को लेकर आया और इसलिए आज छात्रों ने मुझ पर हमला किया. मैंने प्रॉक्टर को पत्र सौंप दिया है और मैं उन लोगों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कराऊंगा, जिन्होंने मेरा उत्पीड़न किया.’

यूनिवर्सिटी के लगभग 20 प्रोफेसर ने साल्वी के साथ मिलकर बीते सोमवार शाम को वाइस चांसलर राकेश भटनागर और चीफ प्रॉक्टर राय से चर्चा की. प्रशासन ने मामले की जांच के लिए जांच समिति के गठन का वादा किया है.

यूनिवर्सिटी के एक अधिकारी ने कहा, ‘समिति के निष्कर्षों के आधार पर इस घटना के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ यूनिवर्सिटी के नियमों के अनुरूप ही कार्रवाई की जाएगी. इस संबंध में वाराणसी के लंका पुलिस थाने में एक एफआईआर दर्ज की गई है.’


एक और भीषण अग्निकांड से जुड़े सवाल

एक और भीषण अग्निकांड से जुड़े सवाल

09-Dec-2019

- ललित गर्ग- 

देश में एक के बाद एक डरावने, भयानक, त्रासद एवं वीभत्स अग्निकांड हो रहे हैं, जो असावधानी एवं लापरवाही की निष्पत्ति होते हैं। प्रशासनिक एवं जिम्मेदार लोगों की आपराधिक लापरवाही से दिल्ली के रानी झांसी रोड पर फिल्मिस्तान इलाके के अनाजमंडी की फैक्ट्री में लगी भीषण आग की घटना में अब तक जहां 43 लोग मौत के ग्रास बन गये है, वहीं कई लोग गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। यह अग्निकांड रविवार की भोर में करीब पांच बजे संकरी गलियों में स्थित पैकेजिंग और बैग बनाने वाली फैक्ट्री में शार्ट सर्किट होने से हुआ, अधिकतर लोगों की मौत दम घुटने से हुई है। मरने वाले अधिकतर लोग यूपी और बिहार के बताए जा रहे हैं। एक सवाल सभी के मन में है कि आखिर लापरवाही किसकी थी? जिस इमारत में आग लगी, वहां यह फैक्ट्री कानून एवं आवश्यक नियमों की घोर उपेक्षा करते हुए काफी दिन से चल रही थी। यह फैक्ट्री पूरी तरह से अवैध थी। इसमें किसी तरह का कोई संसाधन नहीं था, जिससे आग पर काबू पाया जा सके। आग से बचाव के भी कोई उपकरण नहीं लगे थे। ऐसे में सवाल प्रशासन के ऊपर उठ रहे हैं कि कैसे इतनी बड़ी गलती नजरअंदाज की जा सकती है?

जिस बिल्डिंग में आग लगी है वहां बेकरी का गोदाम चल रहा था, जहां पैकेजिंग का काम भी होता था और लोग सोते भी थे। ये भी बताया जा रहा है कि जिस इलाके में ये फैक्ट्रियां चल रही थी वो बेहद संकरी गली वाला इलाका है। इसके अलावा सभी फैक्ट्रियां आपस में जुड़ी हुई थी, जिस वजह से आग तेजी से फैल गई। संकरी गलियों के कारण राहत का काम तेजी से नहीं हो पाया और धुंआ बढ़ते ही लोग बेहोश होने लगे। ये भी कहा जा रहा है कि इन गलियों में एक ही गाड़ी अंदर जा सकती है। प्रश्न है कि इन मौत की संकरी गलियों में ये अवैध धंधे एवं फैक्ट्रियां क्यों एवं कैसे प्रशासन चलने दे रहा है? दिल्ली में ऐसे अनेक इलाके हंै जहां ऐसे ही धंधे एवं फैक्ट्रियां मौत का अंधा कुआं बनी हुई है, जहां हर पल मौत पसरी हुई दिखाई देती है। चुनाव के समय इन मौत के अंधियारी गलियों को चुनावी मुद्दा बनाने के लिये सभी राजनीतिक दल लपकते हैं, लेकिन चुनाव होने के बाद कोई इनकी सुध नहीं लेता। कब तक राजनीतिक दल ऐसे ज्वलंत एवं जीवन से जुड़े मुद्दों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकते रहेंगे?

इस अग्निकांड की काली आग एवं दमघोंटू धुएं ने कितने ही परिवारों के घर के चिराग बुझा दिए। इस अग्निकांड ने एक बार फिर एक कालिख पोत दी कानून, व्यवस्था एवं राजनीति के कर्णधारों के मुँह पर। ये मौतें इसलिए हुईं, क्योंकि जिन पर भी इन अति-संकीर्ण, असुरक्षित एवं जानलेवा जगहों पर नियम-कायदे के हिसाब से सुरक्षा देने की जिम्मेदारी थी उन सबने हद दर्जे की लापरवाही, असावधानी एवं गैर जिम्मेदारी का परिचय दिया। इसीलिए इस अग्निकांड को हादसा कहना उसकी गंभीरता को कम करना है। यह हादसा नहीं, जिम्मेदार लोगों की आपराधिक लापरवाही का क्रूरतम एवं हत्यारेपन की त्रासद निष्पत्ति है। भ्रष्ट, लापरवाह एवं लालची प्रशासनिक चरित्रों के स्वार्थ की पराकाष्ठा है। अव्यवस्था की अनदेखी कैसे घातक एवं त्रासद परिणाम सामने लाती है, इसका एक डरावना एवं खौफनाक उदाहरण है फिल्मिस्तान का श्मशान बनना।

हर घटना में कोई न कोई ऐसा संदेश छिपा होता है, जिस पर विचार करके हम भविष्य के लिए चेत सकते हैं। अनाजमंडी की फैक्ट्री की इस कलंकित करने वाली दुखद दुर्घटना में भी कई सबक छिपे हैं। सवाल यह है कि क्या हम उन पर गौर करेंगे? क्या भविष्य के लिये सचेत एवं सावधान होंगे? अभी कुछ समय पहले ही हमने करोल बाग की अर्पित होटल के अग्निकांड में दो दर्जन के लगभग लोगों को ऐसे ही मौत का ग्रास बनते देखा है, लेकिन हम इन दुर्घटनाओं से न कुछ सीख लेते हैं और न ही सावधान होते हैं। लेकिन कब तक?

अनाजमंडी की फैक्ट्री जैसे हादसे तभी होते हैं जब भ्रष्टाचार होता है, जब अफसरशाह लापरवाही करते हैं, जब स्वार्थ एवं धनलोलुपता में मूल्य बौने हो जाते हैं और नियमों और कायदे-कानूनों के उल्लंघन में संवेदनाएं दब जाती है। आग क्यों और कैसे लगी, यह तो जांच का विषय है ही लेकिन फैक्ट्री को तो उसके मालिक ने मौत का कुआं बना रखा था। आखिर क्या वजह है कि जहां दुर्घटनाओं की ज्यादा संभावनाएं होती है, वहीं सारी व्यवस्थाएं फेल दिखाई देती है? सारे कानून कायदों का वहीं पर स्याह हनन होता है। यही कारण है कि जिस फैक्ट्री में यह हादसा हुआ, वहां जीवन रक्षा, अग्नि शमन एवं आग से बचाव के प्रबंध का कोई उपकरण या स्थिति नहीं था, बल्कि कहा तो यह भी जा रहा है कि फैक्ट्री के गेट पर ताला भी लगा था, एक तरह से कामगारों को मौत का बंधक बना रखा था।

इस फैक्ट्री में आग का कहर यह भी बताने वाला है कि देश की राजधानी में व्यावसायिक गतिविधियां किस तरह इंसान का जीवन लीलने वाली हैं। हर बड़ी दुर्घटना कुछ शोर-शराबें के बाद एक और नई दुर्घटना की बाट जोहने लगती है। सरकार और सरकारी विभाग जितनी तत्परता मुआवजा देने में और जांच समिति बनाने में दिखाते हैं, अगर सुरक्षा प्रबंधों में इतनी तत्परता दिखाएं या वास्तविक दुर्घटनाओं की संभावनाओं पर सख्ती बरते तो दुर्घटनाओं की संख्या घट सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, क्यों नहीं हो रहा है, यह मंथन का विषय है। अनाजमंडी की फैक्ट्री में आग लगने के कारणों की जांच के आदेश क्या प्रभावी होंगे? कब इस बुनियादी बात को समझा जाएगा कि अगर ऐसे स्थल नियम-कानूनों के साथ सुरक्षा उपायों की घोर अनदेखी करके चलेंगे तो वे तबाही का कारण ही बनेंगे? यह नकारापन ही है कि बेतरतीब शहरी ढांचे और सार्वजनिक सुरक्षा की उपेक्षा तब हो रही है जब उन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। शहरी ढांचे का नियमन करने वाले न केवल नियोजित विकास की अनदेखी कर रहे हैं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा को भी ताक पर रख रहे हैं।

इन बढ़ती दुर्घटनाओं की नृशंस चुनौतियों का क्या अंत है? बहुत कठिन है दुर्घटनाओं की उफनती नदी में जीवनरूपी नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना, यह चुनौती सरकार के सम्मुख तो है ही, आम जनता भी इससे बच नहीं सकती। मनुष्य अपने स्वार्थ और लोभ के लिए इस सीमा तक बेईमान और बदमाश हो जाता है कि हजारों के जीवन और सुरक्षा से खेलता है। दो-चार परिवारों की सुख समृद्धि के लिए अनेक घर-परिवार उजाड़ देता है।

ऐसा लगता है कि दिल्ली के शासन-प्रशासन ने पुरानी घटनाओं से कोई सबक सीखना उचित नहीं समझा। इससे भी शर्मनाक बात यह है कि अभी भी ऐसा नहीं लगता कि जरूरी सबक सीख लिए गए हैं। जिम्मेदार राजनेता, दिल्ली सरकार और आला अफसरों के बयान कर्तव्य की इतिश्री करते ही अधिक दिखते हैं। दिल्ली में केवल अनाजमंडी की फैक्ट्री ही नहीं, अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां अवैध रूप से ऐसी व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं जो मानव जीवन के लिए जानलेवा हैं। वेश्यालयों में देह व्यापार से मन्दिरों में देह का धंधा समाज के लिए इसलिए और भी घातक है कि वह पवित्रता की ओट में अपवित्र कृत्य है।

मालिकों से ज्यादा दोषी ये अधिकारी और कर्मचारी हैं। अगर ये अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाते तो उपहार सिनेमा अग्निकांड नहीं होता, नन्दनगरी के समुदाय भवन में आग नहीं लगती, पीरागढ़ी उद्योगनगर की आग भी उनकी लापरवाही का ही नतीजा थी, बवाना की फैक्टरी हो या करोलबाग अर्पित होटल या अनाजमंडी की फैक्ट्री की आग भी ऐसी ही त्रासदी थी। जीवन पर मंडरा रहे मौत के तरह-तरह की डरावने हादसों एवं दुर्घटनाओं पर काबू पाने के लिये प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है।

स्थानीय निकाय हो या सरकारें, लाइसेंसिंग विभाग हो या कानून के रखवाले- अगर मनुष्य जीवन की रक्षा नहीं की जा सकती तो फिर इन विभागों का फायदा ही क्या? कौन नहीं जानता कि ये विभाग कैसे काम करते हैं। सब जानते हैं कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर इंस्पैक्टर आते हैं और बंधी-बंधाई राशि लेकर लौट जाते हैं। लाइसेंसिंग विभाग में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार है। पर नैतिकता और मर्यादाओं के इस टूटते बांध को, लाखों लोगों के जीवन से खिलवाड़ करते इन आदमखोरों से कौन मुकाबला करेगा? कानून के हाथ लम्बे होते हैं पर उसकी प्रक्रिया भी लम्बी होती है। कानून में अनेक छिद्र हैं। सब बच जाते हैं। सजा पाते हैं गरीब आश्रित, जो मरने वालों के पीछे जीते जी मर जाते हैं। और ये होटल, ये फैक्टरियां, ये कारखाने, ये पब फिर लेबल और शक्ल बदल-बदलकर एक नये अग्निकांड को घटित करते रहते हैं। लेकिन कब तक?  

 


4 साल की उम्र से गुम होकर  परिवार से बिछड़ी लड़की को 12 साल बाद फेसबुक के माध्यम से मिली !

4 साल की उम्र से गुम होकर परिवार से बिछड़ी लड़की को 12 साल बाद फेसबुक के माध्यम से मिली !

09-Dec-2019

आंध्रप्रदेश की एक लड़की 12 साल बाद अपने परिवार से जल्द मिलने वाली है. यह लड़की 4 साल की उम्र में खो गई थी और फेसबुक  के जरिए वापस अपने परिवार को मिल पाई है. दरअसल, वामसी कृष्णा नाम का एक शख्स फेसबुक की मदद से अपने परिवारों से अलग हुए नाबालिगों को वापस उनके परिवार से मिलाने का काम करता है.

आंध्रप्रदेश की इस बच्ची का नाम भवानी है जो वामसी कृष्णा के घर पर काम करने के लिए आई थी. इसके बाद वामसी कृष्णा से बात करते हुए उसने बताया था कि वह विजयवाड़ा में 4 साल की उम्र में अपने माता-पिता से बिछड़ गई थी. इसके बाद उसे एक महिला ने गोद ले लिया और वह तबसे उस महिला के साथ विजयवाड़ा में रह रही है. भवानी ने कहा कि वह वापस अपने परिवार से मिलकर काफी खुश है. वामसी कृष्णा ने भवानी के भाई को फेसबुक पर ढूंढा था.
न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए वामसी कृष्णा ने कहा, ”मैं किसी को भी काम पर रखने से पहले उनके कागजों को देखती हूं. इसलिए मैंने इस बच्ची से भी उसके कागज मांगे थे ताकि मुझे पता चल पाए कि इसकी उम्र क्या है. इस पर बच्ची ने कहा कि उसके पास कोई कागज नहीं हैं, क्योंकि वह 4 साल की उम्र में खो गई थी और उसे एक महिला ने गोद ले लिया”. उन्होंने आगे कहा, ”फिर मैंने उससे पूछा कि क्या वह अपने असली माता-पिता से मिलना चाहती है, तो उसने हां बोला. इसके बाद मैंने उसकी जानकारी ली और फेसबुक पर उसके माता-पिता को ढूंढना शुरू कर दिया”.

वामसी ने आगे बताया, ”मैंने अपने कुछ जानने वालों को बच्ची के बारे में बताया और उनमें से एक ने मेरे द्वारा दी गई जानकारी पर मैसेज किया”. इसके बाद मैंने उसकी सभी चीजें पूछीं, जो लड़की से मिली जानकारी से मिल रही थी. इसके बाद मैंने वीडियो कॉल के लिए कहा. इसके बाद लड़की के परिवार ने कहा कि वह उनकी की बेटी है”.

मीडिया इन पुट 


नित्यानंद का VIDEO शोसल मीडिया में हो रहा है  वायरल : मुझ तक कोई कानून नहीं पहुंच सकता !

नित्यानंद का VIDEO शोसल मीडिया में हो रहा है वायरल : मुझ तक कोई कानून नहीं पहुंच सकता !

07-Dec-2019

बलात्कार और महिला उत्पीड़न के आरोपी भगोड़े ‘स्वयंभू बाबा’ नित्यानंद को लेकर विदेश मंत्रालय ने दुनिया भर में अपने दूतावासों और मिशनों को सतर्क कर दिया है। लेकिन अभी इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि नित्यानंद कब और कैसे फरार हुआ और फिलहाल कहां है। फिर भी विदेश मंत्रालय ने मीडिया में आ रही खबरों के देखते हुए यह कदम उठाया है।
गौरतलब है कि खबर आई थी कि नित्यानंद ने दक्षिण अमेरिका में कहीं अपना नया ठिकाना बना लिया है और एक वेबसाइट के जरिए यह बताया गया था कि उसने अपना एक अलग देश कैलासा के नाम से बना लिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि किसी वेबसाइट के जरिए देश नहीं बनता है।


विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उसके पास 2008 में एक पासपोर्ट था लेकिन उसके खिलाफ मिली सूचनाओं के आधार पर उसका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया है। वैसे भी नित्यानंद का पासपोर्ट सिर्फ 2018 तक ही वैध था।
इस बीच नित्यानंद का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह खुद को परम शिव बताते हुए कहता है कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, कोई अदालत उसे सजा नहीं दे सकती।
गौरतलब है कि नित्यानंद के बारे में पहली बार 2010 में एक स्कैंडल सामने आया था जिसमें उसका एक अभिनेत्री के साथ एक वीडियो वायरल हुआ था। इसके बाद नित्यानंद करीब 8 साल तक खबरों से गायब रहा था। अभी एक साल पहले ही वह फिर से सबके सामने आया था।
इस बीच अहमदाबाद स्थित ‘योगिनी सर्वज्ञपीठम’ आश्रम से दो लड़कियों के लापता होने के बाद पिछले महीने नित्यानंद के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई थी। उस पर अपहरण और चंदा वसूलने के लिए बच्चों को गलत तरीके से बंधक बनाकर रखने के आरोप लगाए गए थे। बताया जाता है कि नेपाल के रास्‍ते देश से फरार हो गया है। उसके बारे में यह जानकारी वेबसाइट से पता चली है।

 


NRC  नागरिकता संशोधन बिल भारत को इजराइल बना देगा- असदुद्दीन ओवैसी

NRC नागरिकता संशोधन बिल भारत को इजराइल बना देगा- असदुद्दीन ओवैसी

05-Dec-2019

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है. बताना चाहते है कि केंद्र सरकार ने बुधवार को नागरिकता संशोधन बिल को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद इसे संसद में पेश किया जाएगा. वही दूसरी तरफ इस बिल को लेकर विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. इसी कड़ी में अब  ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईेएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को केंद्र सरकार पर बड़ा हमला बोला है. ओवैसी ने कहा कि  यदि इस लागू किया जाता है  तो “भारत को इजरायल बन जाएगा, जिसे “भेदभाव”  करने के लिए जाना जाता है.  उन्होंने कहा यदि मीडिया रिपोर्ट सही है कि पूर्वोत्तर राज्यों को प्रस्तावित नागरिकता (संशोधन) विधेयक (सीएबी) कानून से छूट दी जाएगी तो यह अपने आप में आर्टिकल 14 का उल्लंघन है. ओवैसी ने कहा कि आपके पास देश में नागरिकता पर 2 कानून नहीं हो सकते.

असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा कि यह कानून अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है क्योंकि आप धर्म के आधार पर नागरिकता दे रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा कि अगर हम इस कानून को पारित करते हैं तो यह महात्मा गांधी और आंबेडकर का अपमान है.

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 समेत छह महत्वपूर्ण विधेयकों को आज हरी झंडी दिखाई है. देश के पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला लिया गया है.


फेसबुक पर हुए प्यार को निभाने के लिए हरियाणा की युवती पाकिस्तान युवक भारत पाक सीमा पार करते पकडे गए !

फेसबुक पर हुए प्यार को निभाने के लिए हरियाणा की युवती पाकिस्तान युवक भारत पाक सीमा पार करते पकडे गए !

04-Dec-2019

फेसबुक पर हुए प्यार को निभाने के लिए हरियाणा की युवती पाकिस्तान युवक से मिलने डेरा बाबा नाननानक (तरनतारन) के रास्ते करतारपुर पहुंच गई। इसकी भनक जब पाकिस्तान रेंजरों को लगी तो उन्होंने दोनों  को हिरासत में लिया।

अधिकारियों ने मंगलवार को बताया कि करीब 20 वर्ष की मंजीत कौर नवम्बर के अंतिम हफ्ते में करतारपुर कॉरिडोर से गुरुद्वारा दरबार साहिब पहुंची थी। कौर फेसबुक के माध्यम से उस व्यक्ति के संपर्क में थी और गुरुद्वारा में उसने उससे मुलाकात की और एक पाकिस्तानी महिला का परमिट दिखाकर उस व्यक्ति के भारतीय श्रद्धालु हाल में खुले करतारपुर कॉरिडोर के माध्यम से बिना वीजा के गुरुद्वारा दरबार साहिब जा सकते हैं लेकिन वे पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में नहीं जा सकते हैं। इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (विस्थापित न्यास संपत्ति बोर्ड) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘यह पहली घटना है जिसमें किसी भारतीय सिख महिला ने नौ नवम्बर को करतारपुर कॉडोर खुलने के बाद से इस सीमित क्षेत्र से बाहर निकलने का प्रयास किया है।’
साथ फैसलाबाद जाने का प्रयास किया।
भारतीय श्रद्धालु हाल में खुले करतारपुर कॉरिडोर के माध्यम से बिना वीजा के गुरुद्वारा दरबार साहिब जा सकते हैं लेकिन वे पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में नहीं जा सकते हैं। इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (विस्थापित न्यास संपत्ति बोर्ड) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘यह पहली घटना है जिसमें किसी भारतीय सिख महिला ने नौ नवम्बर को करतारपुर कॉडोर खुलने के बाद से इस सीमित क्षेत्र से बाहर निकलने का प्रयास किया है।’

मीडिया इन पुट 


और कितनी निर्भयाएं कब तक नोंची जाएंगी?

और कितनी निर्भयाएं कब तक नोंची जाएंगी?

02-Dec-2019

ललित गर्ग:-

समूचा राष्ट्र रांची और हैदराबाद में हुए दो जघन्य, वीभत्स एवं दरिन्दगीपूर्ण सामूहिक बलात्कार कांड से न केवल अशांत है बल्कि कलंकित भी हुआ है। एक बार फिर नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नौंचने वाली इन घटनाओं ने हमें शर्मसार किया है। ये त्रासद घटनाएं बता रही हैं कि देश में लड़कियां अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। ये क्रूर एवं अमानवीय घटनाएं महाभारतकालीन उस घटना का नया संस्करण है जिसमें राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़कर खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने का प्रयास हुआ था।

इन वीभत्स घटनाओं में मनुष्यता का ऐसा भद्दा एवं घिनौना स्वरूप सामने आया है जिसने न केवल इन दो प्रांतों बल्कि पूरे राष्ट्र को एक बार फिर झकझोर दिया है। एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए हंै कि आखिर  कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती यह कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं। इन सवालों के उत्तर हमने निर्भया के समय भी तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन इस तलाश के बावजूद इन घटनाओं का बार-बार होना दुःखद है और एक गंभीर चुनौती भी है।


ताजा दोनों घटनाएं किसी दूर-दराज के इलाके की नहीं हैं बल्कि ये दो बडे़ प्रदेशों की राजधानी की हैं। रांची में एक छात्रा का अपहरण करके उसे ले जाया गया और उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। जबकि हैदराबाद में पशु चिकित्सक की स्कूटी का टायर पंक्चर हो जाने के बाद उसे घर तक पहुंचने के लिए मदद लेनी पड़ी और मदद मिलने की बजाय वह ऐसे लोगों के चंगुल में फंस गई, जिन्होंने न सिर्फ बलात्कार किया, बल्कि उसकी निर्मम हत्या करके जला दिया। दोनों ही घटनाएं सीधे तौर पर बताती हैं कि निर्भया कांड के बाद जो भी कदम उठाए गए, वे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नाकाफी साबित हुए हैं।

हर बार की घटना सवाल तो खडे़ करती है, लेकिन बिना उत्तर के वे सवाल वहीं के वहीं खड़े रहते हैं। यह स्थिति हमारी कमजोरी के साथ-साथ राजनीतिक विसंगतियों को भी दर्शाती है। शासन-व्यवस्था जब अपना राष्ट्रीय दायित्व नैतिकतापूर्ण नहीं निभा सके, तब सृजनशील शक्तियों का योगदान अधिक मूल्यवान साबित होता है। आवश्यकता है वे अपने सम्पूर्ण दायित्व के साथ आगे आयें। अंधेरे को कोसने से बेहतर है, हम एक मोमबत्ती जलाएं। अन्यथा वक्त आने पर, वक्त सबको सीख दे देगा। वक्त सीख दे उससे पहले हमें जाग जाना होगा, हम नहीं जाग रहे हैं, हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं हो रहा है, तभी बार-बार निर्भया जैसे कांड हमें झकझोर कर रह जाते हैं।

प्रश्न है कि हम निर्भया के वक्त ही कुछ क्यों जागे थे, इसके बाद हुई ऐसी घटनाओं पर हमें क्यों मूक दर्शक बने रहे। यदि एक निर्भया के समय हमारी जागृति से कड़े कानून बनेे, निर्भया के बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई गई और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बहुत कुछ किया गया, तो क्या वैसी ही जागृति कायम रहती तो महिलाओं के प्रति दरिंदगी की घटनाएं बार-बार नहीं होती। लेकिन हमारे सुषुप्तावस्था के कारण ही बलात्कार-व्यभिचार बढ़ रहे है बल्कि कड़े कानूनों की आड में निर्दोष लोगों को फंसाने का धंधा भी पनप रहा है। जिसमें असामाजिक तत्वों के साथ-साथ पुलिस भी नोट छाप रही है।

हमें उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर हम उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज  है और विवेक का नियंत्रण खोते चले जा रहे हैं जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। हमें जीने के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है। ऐसा वातावरण निर्भया-कांड के समय बना, तब सरकार एवं समाज के एक बडे़ तबके और सभी राजनीतिक दलों ने यह संकल्प लिया था कि अब कोई और निर्भया नहीं होगी। उस आंदोलन और उन संकल्पों से एकबारगी लगने लगा था कि अब देश की सूरत बदलेगी ही, देश में महिलाएं पहले से सुरक्षित होंगी।

यह उस समय का आवेग था, जो सरकार पर कुछ करने का दबाव भी बना रहा था और हमें कई तरह के आश्वासन भी दे रहा था। निर्भया कांड के बाद जो बदलाव हुए, उसमें मुख्य था बलात्कार से जुडे़ कानूनों में बदलाव। उस समय जो आंदोलन चल रहा था, उसकी एक प्रमुख मांग थी कि बलात्कार के दोषियों को मृत्युदंड दिया जाए। हालांकि इसे लेकर कई मतभेद थे, लेकिन अंत में इसकी सिफारिश भी की गई। सोच यही थी कि अगर बलात्कारियों के बच निकलने के रास्ते बंद करने के साथ ही उनको दिया जाने वाला दंड बाकी समाज के लिए एक कठोर सबक का काम करेगा और यह अपराधी मानसिकता के लोगों को ऐसे अपराध करने से रोकेगा।

लेकिन इसके बावजूद अगर ऐसी वारदात नहीं रुक रही हैं, तो यह सोचना जरूरी है कि इस दिशा में और क्या किया जाए? इस समस्या का केवल कानून में समाधान खोजना भी एक भ्रांति है, समस्या के समाधान की दिशा में आधा-अधूरा प्रयत्न है। जरूरत है जन-जन की मानसिकता को बदलने की। समाजशास्त्र मानता है कि अपराधी के बच निकलने के रास्ते बंद करना और कड़े दंड का प्रावधान किया जाना जरूरी हैं, पर ये अपराध के खत्म होने की गारंटी नहीं हो सकते। इनके साथ सबसे जरूरी है उन स्थितियों को खत्म करना, जो ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं।

बलात्कार जैसे अपराध कुंठित मानसिकता के लोग करते हैं, लेकिन ऐसी कुंठाएं कई बार महिलाओं के प्रति हमारी सामाजिक सोच से उपजती हैं। महिलाओं को सिर्फ कानूनों में ही नहीं, सामाजिक धारणा के स्तर पर बराबरी का दर्जा देकर और उनकी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ाकर ही इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है। इससे हम ऐसा समाज भी तैयार करेंगे, जो कुंठित मानसिकता वालों को बहिष्कृत कर सकेगा। प्रश्न यह भी है कि आखिर हमारे देश में महिलाओं को लेकर पुरुषों में ही इतनी कुंठाएं क्यों है? इन कुंठाओं को समाप्त कैसे किया जाये, इस पर भी तटस्थ चिन्तन जरूरी है।

रांची एवं हैदराबाद की ताजा त्रासद एवं अमानवीय घटनाएं हो या निर्भरा कांड, नितीश कटारा हत्याकांड, प्रियदर्शनी मट्टू बलात्कार व हत्याकांड, जेसिका लाल हत्याकांड, रुचिका मेहरोत्रा आत्महत्या कांड, आरुषि मर्डर मिस्ट्री की घटनाओं में पिछले कुछ सालों में इंडिया ने कुछ और ऐसे मौके दिए जब अहसास हुआ कि भू्रण में किस तरह नारी अस्तित्व बच भी जाए तो दुनिया के पास उसके साथ और भी बहुत कुछ है बुरा करने के लिए। बहशी एवं दरिन्दे लोग ही नारी को नहीं नोचते, समाज के तथाकथित ठेकेदार कहे जाने वाले लोग और पंचायतंे भी नारी की स्वतंत्रता एवं अस्मिता को कुचलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है, स्वतंत्र भारत में यह कैसा समाज बन रहा है, जिसमें महिलाओं की आजादी छीनने की कोशिशें और उससे जुड़ी हिंसक एवं त्रासदीपूर्ण घटनाओं ने एक बार फिर हम सबको शर्मसार किया है। यह वक्त इन स्थितियों पर आत्म-मंथन करने का है, उस अहं के शोधन करने का है जिसमें श्रेष्ठताओं को गुमनामी में धकेलकर अपना अस्तित्व स्थापित करना चाहता है।

समाज के किसी भी एक हिस्से में कहीं कुछ जीवन मूल्यों, सामाजिक परिवेश जीवन आदर्शों के विरुद्ध होता है तो हमें यह सोचकर चुप नहीं रहना चाहिए कि हमें क्या? गलत देखकर चुप रह जाना भी अपराध है। इसलिये बुराइयों से पलायन नहीं, उनका परिष्कार करना सीखें। चिनगारी को छोटी समझ कर दावानल की संभावना को नकार देने वाला जीवन कभी सुरक्षा नहीं पा सकता। बुराई कहीं भी हो, स्वयं में या समाज, परिवार अथवा देश में तत्काल हमें अंगुली निर्देश कर परिष्कार करना चाहिए। क्योंकि एक स्वस्थ समाज, स्वस्थ राष्ट्र स्वस्थ जीवन की पहचान बनता है। हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए कि नारी के अपमान की एक घटना ने एक सम्पूर्ण महाभारत युद्ध की संरचना की और पूरे कौरव वंश का विनाश हुआ। रांची-हैदराबाद जैसी बालिकाओं की अस्मिता को लूटने और उन्हें मौत के हवाले कर देने की घटनाएं कहीं सम्पूर्ण मानवता के विनाश का कारण न बन जाये। 


पेड़ों की कटाई से बढ़ रहा है प्रदूषण।

पेड़ों की कटाई से बढ़ रहा है प्रदूषण।

30-Nov-2019

अभी कुछ दिन पहले लखनऊ की आबो-हवा खराब हो गई थी। बहुत हंगामा मचा था। मगर क्या हुआ? वही ढाक के तीन पात। किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। बस दिन गुजर रहे हैं। दुनिया चल रही है। कोई राजनीति में व्यस्त है तो कोई भ्रष्टाचार में। कोई सत्ता तलाश कर रहा है कोई आरोप प्रत्यारोप में मस्त हैं। पर्यावरण की फ़िक्र किसी को नहीं है। 
ऊपर से रही सही कसर सरकार पूरी कर रही है। प्रदूषण  की शिकार राजधानी लखनऊ में अगले साल फरवरी में होने वाले डिफेंस एक्सपो 2020 के लिए गोमती नदी के किनारे से 64,000 पेड़ हटाने/काटने की तैयारी की जा रही है। शासन ने ऐसा करने को कहा है। डिफेंस एक्सपो के दौरान सैन्य उपकरणों  के प्रदर्शन और अन्य सुविधाओं के लिए पेड़ हटाने की ये तैयारी की जा रही है।  समाचार पत्रों के अनुसार हनुमान सेतु से लेकर निशातगंज तक गोमती किनारे लगे पेड़ हटाने का प्रस्ताव भेजा गया है। यह भी कहा गया है कि डिफेंस एक्सपो खत्म होने के बाद गोमती किनारों पर नए पेड़ लगेंगे। 
डिफेंस एक्सपो की जगह पर्यावरण का डिफेंस ज्यादा जरूरी है। नागरिकों का डिफेंस जरूरी है।
लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी (LDA) ने दोबारा पेड़ लगाने के लिए नगर निगम से 59 लाख रुपए की मांग की है। एलडीए का कहना है कि गोमती के किनारे इन पेड़ों को लगाने के लिए 59,06,827 रुपए खर्च किए गए थे। यानी मूर्खता की हद हो गई। पहले पेड़ लगाने के लिए खर्च किया गया और अब पेड़ की कटाई के पैसे ख़र्च होंगे और फिर जब नये पेड़ लगाए जायेंगे तो फिर ख़र्च। यानी एक अच्छा मूर्खतापूर्ण कार्य किया जा रहा है।
खुशी की बात है कि यह पहला मौका होगा जब लखनऊ 'द डिफेंस एक्सपो' की मेजबानी करेगा। इसमें बड़ी संख्या में दूसरे देशों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। बड़ी बड़ी विदेशी और स्वदेशी कंपनियां इस प्रदर्शनी में अपने अत्याधुनिक हथियारों का प्रदर्शन करेंगी। इनकी नजर विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातक देश के लाभदायक सैन्य बाजार पर होगी। सब अपनी जगह ठीक है मगर जिस आक्सीजन के सहारे हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं उसी के जनक पेड़ों की बलि देना कहां तक उचित है!
आज के आधुनिक समय में जनसंख्या वृद्धि के साथ जंगलों का विनाश बढ़ गया है। लोग नहीं जानते कि पेड़ हमारी जिंदगी हैं। पेड़ों से हमें ज़िन्दगी देने वाली हवा (ऑक्सीजन) मिलती है, पेड़ों और जंगलों से हम अपनी काफी ज़रूरतों को पूरा कर पाते हैं। पेड़ों और इससे बने जंगलों के ही कारण बारिश होती है लेकिन तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के कारण इंसान अपनी जरूरतों के लिए बहुत तेजी से पेड़ों और जंगलों का विनाश कर रहा है। यही कारण है कि आज जंगलों, पेड़ों के साथ साथ पूरी दुनिया खतरे में है। नतीजतन मानव जीवन भी खतरे में है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगल कट रहे हैं। शहरीकरण का दबाव, बढ़ती आबादी और तेजी से विकास की भूख ने हमें हरी-भरी जिंदगी से वंचित कर दिया है।
जंगलों में, शहरों में पेड़ों को अवैध रूप से काटा जा रहा है। जहां एक तरफ़ सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है वहीँ दूसरी तरफ़ शहरों एवं जंगलों में दिन रात पेड़ काटे जा रहे है। इससे सिवाय बर्बादी के कुछ हासिल नहीं होगा।
प्रदेश एवं देश की सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए एवं प्रकृति से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए अन्यथा जिस दिन प्रकृति ने खेलना शुरू किया तो फिर संभलना और संभालना दोनों मुश्किल हो जाएगा।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ
उप-निदेशक, स्पेशल क्राइम ब्यूरो, लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com

 


हैदराबाद में डॉक्टर से दुष्कर्म का मामला अभी शान्त भी नहीं हुआ ,और एक महिला की जली हुई लाश मिली !

हैदराबाद में डॉक्टर से दुष्कर्म का मामला अभी शान्त भी नहीं हुआ ,और एक महिला की जली हुई लाश मिली !

30-Nov-2019

हैदराबाद में चार लोगों द्वारा एक महिला पशु चिकित्सक से दुष्कर्म  किए जाने और फिर उसे आग लगा दिए जाने के दो दिन बाद उसी क्षेत्र  में शुक्रवार को एक अन्य महिला का जला हुआ शव मिला। महिला की पहचान अभी नहीं हो पाई है।
मीडिया में  छपी खबर के अनुसार, अज्ञात महिला की संदिग्ध हत्या उसी इलाके में यानी शमशाबाद में हुई जहां महिला पशु चिकित्सक से 27 नवंबर को चार लोगों ने बलात्कार किया था और बाद में उसकी हत्या कर दी थी।
सहायक पुलिस आयुक्त अशोक कुमार गौड़ ने बताया कि पास से गुजर रहे कुछ लोगों ने जला हुआ शव देखा और पुलिस को इस बारे में सूचित किया।
इसके बाद पुलिसकर्मी घटनास्थल पर पहुंचे और शव को सरकारी अस्पताल भेजा गया। उन्होंने कहा कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि क्या महिला ने स्वयं को आग लगाकर आत्महत्या की या उसकी हत्या की गई।
इससे पहले हैदराबाद में जली हालत में महिला पशु चिकित्सक का शव मिला था, हत्या से पहले उसके साथ बलात्कार किया गया था। पुलिस ने इस केस में चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।

पुलिस के मुताबिक, महिला अस्पताल गई थी और बुधवार शाम घर लौट आई थी। वह शाम को पांच बजकर करीब 50 मिनट पर दूसरे क्लिनिक के लिए रवाना हुई और अपनी दोपहिया गाड़ी शमशाबाद टोल प्लाजा के पास खड़ी कर साझेदारी वाली कैब ली।

उसकी छोटी बहन ने पुलिस को दी शिकायत में बताया है कि महिला ने बुधवार रात नौ बजकर 22 मिनट पर उसे कॉल की थी और कहा था कि वह अब भी टोल प्लाज़ा पर है और किसी ने उससे कहा है कि उसकी स्कूटी के पहिए की हवा निकल गई है तथा मदद की पेशकश की है।

उसने अपनी बहन को यह भी बताया था कि वह डर रही है, क्योंकि पास में एक लॉरी है और जिन्होंने उसकी मदद करने की पेशकश की थी वे गाड़ी के पास हैं।

मीडिया इन पुट 


कनाडा में हवाई जहाज दुघर्टनाग्रस्त, 7 की मौत, 2 बच्चे भी शामिल

कनाडा में हवाई जहाज दुघर्टनाग्रस्त, 7 की मौत, 2 बच्चे भी शामिल

29-Nov-2019

मीडिया रिपोर्ट 

ओटावा : कनाडा के ओन्तारियो प्रांत में छोटा हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त होने से 2 बच्चे सहित 7 लोगों की मौत हो गई। अमेरिका से रजिस्ट्रेड इस विमान ने टोरंटो बटनविले मुनिस्पिल हवाई अड्डे से किंग्सटन के लिए उड़ान भरी थी लेकिन इसके थोड़ी देर बाद विमान का मलबा पुलिस ने बेरिड्ज ड्राइव से दो किलोमीटर दूर उत्तरी क्रिकफोर्ड रोड में मिला।

कनाडा परिवहन सुरक्षा एजेंसी ने बताया कि अमेरिका से पंजीकृत एक इंजन वाले ‘पाइपर पीए-32' ने टोरंटो के बटनविले हवाईअड्डे से किंग्स्टन जाने के लिए उड़ान भरी थी, जो स्थानीय समयानुसार शाम बुधवार पांच बजे लापता हो गया था। पुलिस और एक सैन्य खोज एवं बचाव हेलीकाप्टर सहित आपातकालीन सेवाओं ने उसे ढूंढने का काम शुरू किया। इसके बाद उसके अपने गंतव्य से थोड़ा पहले घने इलाके में होने की जानकारी मिली, वहां पहुंचना मुश्किल हो रहा है।
 
परिवहन सुरक्षा बोर्ड के प्रवक्ता अलेक्जेंड्रे फोरनियर ने बताया कि पायलट सहित विमान में सवार सभी सात लोगों की जान चली गई है। सरकारी एजेंसी ने घटना के कारण का पता लगाने के एक दल को भी वहां भेजा है। उन्होंने बताया कि वह विमान के रिकॉर्डर और रिव्यू रेडियो संचार का भी पता लगाने की कोशिश करेंगे। मृतकों की पहचान अभी जाहिर नहीं की गई है। 

 


पश्चिम बंगाल : कलियागंज विधानसभा सीट पर टीएमसी नेे जीत दर्ज की !

पश्चिम बंगाल : कलियागंज विधानसभा सीट पर टीएमसी नेे जीत दर्ज की !

28-Nov-2019

पश्चिम बंगाल विधानसभा के उपचुनाव में तीन सीटों पर गुरुवार को मतगणना में कलियागंज सीट पर टीएमसी ने परचम लहराया है।
अभी बाकी करीमपुर ,खड़गपुर सीट पर मतगनणा चल रही है। उपचुनाव के लिए मतदान 25 नवंबर को हुए थे।
खास खबर पर छपी खबर के अनुसार, TMC के उम्मीदवार तपन देब सिंहा ने कलियागंज सीट पर 2,304 वोटों से जीत दर्ज की है। भाजपा के उम्मीदवार कमल चंद्र सरकार को हराया।
यह सीट पर काटे का मुकाबला रहा है। आपको बताते जाए कि कांग्रेस विधायक प्रमथनाथ रॉय के निधन के कारण कालियागंज सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा था।

 


 दो मुस्लिम युवको ने  रस्ते में पीड़ा से कराहती  गर्भवती गाय  की ऐसे की मदद !

दो मुस्लिम युवको ने रस्ते में पीड़ा से कराहती गर्भवती गाय की ऐसे की मदद !

27-Nov-2019

दो मुस्लिम नौजवानों ने एक गर्भवती गाय की सहायता की, जो कर्नाटक के बागलकोट के नवानगर में एक सड़क के किनारे श्रम पीड़ा से जूझ रही थी।
दो मुस्लिम युवक अल्लाह बक्श हानी और बंदनवाज बीजापुर ने कहा कि वे गाय के मालिक के बारे में अनजान थे।
इस घटना को याद करते हुए, हानी ने कहा, “कल रात मैंने देखा कि एक गाय सड़क के किनारे दर्द से कराह रही थी। मुझे संदेह था कि कुछ गलत था और उसने मेरे एक दोस्त को बुलाया। हमने महसूस किया कि गाय पीड़ा में थी। ”
उन्होंने कहा, ‘हमने गाय की मदद की और वह जल्द ही पहुंच गई। हमें यह भी नहीं पता था कि गाय किसकी है।
कथित तौर पर, लोगों को जल्द ही साइट पर इकट्ठा किया और अपने प्रयासों के लिए युवाओं की सराहना की।

 

MEDIA IN PUT 


वाटस्अप ने लाया डिलीट मैसेज के नाम से नया फीचर!

वाटस्अप ने लाया डिलीट मैसेज के नाम से नया फीचर!

27-Nov-2019

वाट्सएप पर एक नया फीचर लाया जा रहा है। जिसमें मैसेज खुद से गायब हो जाएंगे। वाटस्अप ने एंड्रॉयड स्मार्टफोन्स के लिए एक बीटा अपडेट जारी किया है।
न्यूज़ स्टेट पर छपी खबर के अनुसार, इस वर्जन में डिलीट मैसेज के नाम से नया फीचर देखा जा सकता है। इस फीचर के तहत मैसेज सेंड करने वाले यूजर्स इसे सेट कर सकते हैं। इससे मैसेज गायब हो जाएंगे। बता दें कि इससे पहले इस फीचर को Disappearing Message के नाम से देखा गया था।

इस वर्जन में डार्क मोड का भी सपोर्ट दिया गया है। काफी लंबे समय से लोग डार्क मोड का इंतजार कर रहे हैं। एंड्रॉयड के बीटा वर्जन 2.19.348 में ये फीचर्स देखे जा सकते हैं।

इसके साथ ही वाट्सएप में कॉल वेटिंग का ऑप्शन आने वाला है। फेसबुक के मालिकाना वाली कंपनी ने एप के iOS वर्जन के लिए एक नया अपडेट जारी किया है।

इस अपडेट के तहत वॉट्सऐप में कॉल वेटिंग का विकल्प दिया गया है। इतना ही नहीं इस अपडेट के तहत चैट अपडेट को भी बेहतर बनाया गया है।

व्हाट्सएप यूजर एक ऑडियो कॉल को बीच में रोककर वेटिंग कॉल को भी उठा सकते हैं। वॉट्सऐप के इस फीचर का फायदा उन यूजर्स को अधिक होगा जो कॉलिंग के लिए ज्यादातर वॉट्सऐप कॉल्स को प्राथमिकता देते हैं।


शबाना आज़मी, नसरुद्दीन शाह सहित कई  हस्तियों ने बाबरी मस्जिद सुप्रीम के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का विरोध किया ।

शबाना आज़मी, नसरुद्दीन शाह सहित कई हस्तियों ने बाबरी मस्जिद सुप्रीम के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का विरोध किया ।

26-Nov-2019

अभिनेता नसीरूदुद्दीन शाह और शबाना आजमी समेत देशभर की 100 जानी-मानी मुस्लिम शख्सियतों ने अयोध्या पर आए सुप्रीम के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का विरोध किया है।
डेली न्यूज़ पर छपी खबर के अनुसार, इनका कहना है कि रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मामले के कुछ पक्षकारों का पुनर्विचार दायर करने के फैसला विवाद को जिंदा रखेगा और मुस्लिम कौम को नुकसान पहुंचाएगा।

इस मामले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का विरोध करने वाले बयान पर दस्तखत करने वालों में इस्लामी विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार, कारोबारी, शायर, अभिनेता, फिल्मकार, थिएटर कलाकार, संगीतकार और छात्र शामिल हैं।
बयान में बताया गया है- हम इस तथ्य पर भारतीय मुस्लिम समुदाय, संवैधानिक विशेषज्ञों और धर्मनिरपेक्ष संगठनों की नाखुशी को साझा करते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना निर्णय करने के लिए कानून के ऊपर आस्था को रखा है।

इसमें कहा गया है- हम इस बात से सहमति रखते हैं कि फैसला न्यायिक रूप से त्रुटिपूर्ण है लेकिन हमारा मजबूती से मानना है कि अयोध्या विवाद को जीवित रखना भारतीय मुसलमानों को नुकसान पहुंचाएगा और उनकी मदद नहीं करेगा।

बयान पर दस्तखत करने वालों में फिल्म लेखक अंजुम राजबली, पत्रकार जावेद आनंद समेत जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन हिंदू पक्षकारों को देने का आदेश दिया है जबकि मुस्लिम पक्षकारों को इसके बदले 5 एकड़ जमीन देने का निर्देश दिया है।


राम पूनियानी की कलम से - ‘बीजेपी का राष्ट्रवाद और चुनावी बिसात’

राम पूनियानी की कलम से - ‘बीजेपी का राष्ट्रवाद और चुनावी बिसात’

24-Nov-2019

बीजेपी एक नहीं, बल्कि अनेक मायनों में ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ है। वह देश की एकमात्र ऐसी बड़ी राजनैतिक पार्टी है जो भारतीय संविधान में निहित प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के बावजूद यह मानती है कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है।
वह एकमात्र ऐसी पार्टी है जो किसी अन्य संगठन (आरएसएस) की राजनैतिक शाखा है और वह भी एक ऐसे संगठन की, जो हिन्दू राष्ट्रवाद का झंडाबरदार है।

बीजेपी इस मामले में भी अन्य सभी दलों से अलग है कि सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि के समान्तर उसकी ताकत भी बढ़ती रही है। वह एक ऐसा राजनैतिक दल है जिसकी राजनीति, भावनात्मक और विघटनकारी मुद्दों पर आधारित है और जिसका राष्ट्रवाद का अपना अलग ब्रांड है।

साल 2014 और फिर 2019 के आम चुनावों में पार्टी की शानदार जीत से शायद उसे यह मुगालता हो गया था कि वह अजेय है। पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी अगले 50 सालों तक देश पर राज करेगी।

उसी तरह महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों (अक्टूबर 2019) के पहले यह दावा किया जा रहा था कि इन दोनों राज्यों में पार्टी शानदार जीत अर्जित करेगी। व्यावसायिक मीडिया ने भी अपने तथाकथित सर्वेक्षणों के आधार पर घोषणा कर दी थी कि बीजेपी दोनों राज्यों में अन्य दलों को मीलों पीछे छोड़ देगी। लेकिन उसे इन दोनों ही राज्यों में मुंह की खानी पड़ी। इस परिप्रेक्ष्य में पार्टी के चुनावी भविष्य पर चर्चा की जानी चाहिए।

हरियाणा में तो बीजेपी सामान्य बहुमत भी हासिल नहीं कर सकी और उसे दुष्यंत चौटाला की जेजेपी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनानी पड़ी। महाराष्ट्र में यद्यपि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, लेकिन वह स्वयं के बल पर बहुमत से बहुत दूर रही और नतीजे में उसकी गठबंधन साथी शिवसेना उसके साथ जबरदस्त सौदेबाजी कर रही है। पिछले चुनावों में विजय के बाद पार्टी के नेता जिस तरह से अपनी पीठ थपथपाते थे, वह इस बार नहीं हो रहा है। कुछ टिप्पणीकारों ने तो इसे पार्टी की नैतिक हार बताया है। उसका अजेय होने का दावा टूट कर बिखर गया है और विपक्षी पार्टियां, जिनका मनोबल काफी गिर गया था, एक बार फिर आशा से भर गई हैं।

बीजेपी का गठन, भारतीय जनसंघ के नेताओं ने किया था। साल 1980 के दशक में बीजेपी का नारा था- ‘गांधीवादी समाजवाद’। फिर, जल्दी ही उसने अपना राग बदल लिया और वह राममंदिर की बात करने लगी। राममंदिर आन्दोलन, रथ यात्राओं आदि ने सांप्रदायिक हिंसा भड़काई और समाज को ध्रुवीकृत किया। इसी ध्रुवीकरण ने बीजेपी को ताकत दी और उसका विस्तार होता चला गया। बीजेपी ने अधिकांशतः पहचान से जुड़े मुद्दे उठाए।

साल 1996 में पार्टी को 13 दिन सत्ता का स्वाद चखने को मिला और फिर उसके बाद 13 महीने के लिए। उसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का गठन किया। सत्ता के भूखे नेता एनडीए की तरफ लपके। कहने को एनडीए का न्यूनतम साझा कार्यक्रम था, परन्तु वह कागजों तक ही सीमित था। एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद, बीजेपी ने अपने हिंदुत्व एजेंडे को नहीं त्यागा। इस एजेंडे में समान नागरिक संहिता लागू करना, अनुच्छेद 370 हटाना और राममंदिर निर्माण शामिल थे।

अब तक बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत रही है आरएसएस के स्वयंसेवकों से उसे मिलने वाला ठोस समर्थन। संघ यह मानता है कि राजनैतिक सत्ता, हिन्दू राष्ट्र के उसके एजेंडे को लागू करने का माध्यम है। गुजरात कत्लेआम के बाद, बीजेपी को कॉर्पोरेट दुनिया से भी समर्थन मिलने लगा। मोदी ने कॉर्पोरेट कंपनियों को विकास के नाम पर हर तरह की सुविधाएं दीं। कॉर्पोरेट शहंशाहों ने मीडिया पर लगभग पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया।

एक अन्य मुद्दा जिसके चलते बीजेपी का समर्थन बढ़ा वह था लोकपाल बिल। बड़ी कुटिलता से बीजेपी ने अन्ना हजारे को सामने रख, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जबरदस्त अभियान चलाया और जनता की निगाहों में कांग्रेस की साख गिराने में सफलता पाई। निर्भया मामले का इस्तेमाल भी पार्टी ने कांग्रेस को बदनाम करने के लिए किया। इस सब से, बीजेपी को चुनावों में लाभ मिला। बीजेपी ने अपने पार्टी संगठन को भी मजबूत बनाया और अब तो उसका दावा है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है।

मोदी ने हर नागरिक के बैंक खाते में 15 लाख रुपये जमा करवाने, रोजगार के करोड़ों अवसर निर्मित करने और कीमतें घटाने का वादा कर, 2014 के चुनाव में 31 प्रतिशत मत हासिल कर लिए और सत्ता में आ गए। कांग्रेस के विरुद्ध जनभावना, उस पर भ्रष्टाचार के आरोपों, आरएसएस के समर्थन और कॉर्पोरेट फंडिंग ने भी बीजेपी की मदद की। अगले पांच सालों में बीजेपी ने इनमें से एक भी वादे को पूरा नहीं किया। उसने गाय और गौमांस के मुद्दे को लेकर समाज को ध्रुवीकृत करने की भरसक कोशिश जरूर की। इसके अलावा, लव जिहाद और घरवापसी ने भी बीजेपी को मजबूती दी।

बीजेपी हिन्दुओं के मन में यह भावना घर करवाने में सफल रही कि धार्मिक अल्पसंख्यक, हिन्दुओं के लिए खतरा हैं। उसने राष्ट्रवाद के अपने ब्रांड को भी खूब उछाला। इस राष्ट्रवाद का प्रमुख हिस्सा था पाकिस्तान के खिलाफ जुनून भड़काना। उसके इस राष्ट्रवाद ने समाज के कुछ हिस्सों को प्रभावित किया। साल 2019 के चुनाव में इन सभी कारकों ने भूमिका अदा की। पुलवामा-बालाकोट और ईवीएम ने भी बीजेपी की मदद की और देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के बावजूद वह चुनाव में विजय हासिल करने में सफल रही। इससे ऐसा लगने लगा कि भावनात्मक मुद्दे उछालने और राष्ट्रवाद को भावनात्मक मुद्दा बनाने में बीजेपी इतनी प्रवीण हो गयी है कि उसे चुनाव में हराना असंभव हो गया है।

परंतु मोदी-शाह महाराष्ट्र और हरियाणा में कोई कमाल नहीं दिखला सके, क्यों? सवाल यह है कि क्या भावनात्मक मुद्दे और राष्ट्रवाद, लोगों को जिंदा रख सकते हैं? अब रोटी-रोजी से जुड़े प्रश्न उठाए जा रहे हैं और जनता राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता के जुनून में उन्हें भुलाने के लिए तैयार नहीं हैं। यह साफ है कि किसी पार्टी की चुनाव मशीनरी कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, वह जनता से जुड़े मूलभूत मुद्दों को दरकिनार नहीं कर सकती। अनुच्छेद 370 के हटने, तीन तलाक को अपराध घोषित करने या पाकिस्तान का डर दिखाने से लोगों का पेट नहीं भरता।

आज संघ ने हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों में घुसपैठ कर ली है- फिर चाहे वह शिक्षा हो, मीडिया हो या सामाजिक कार्य। परन्तु यह भी साफ है कि बीजेपी-संघ के एजेंडे से रोटी-रोजी की समस्याएं हल नहीं होंगी। इससे किसानों की आत्महत्याएं नहीं बंद होंगी। दोनों राज्यों में चुनावों के नतीजों से निश्चित तौर पर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को बल मिलेगा और भोजन, रोजगार, स्वास्थ्य और आजीविका के अधिकार जैसे मुद्दे देश में चर्चा का विषय बनेंगे।

क्या आम लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाने के प्रति प्रतिबद्ध दल, इस चुनौती को स्वीकार करेंगे और एकताबद्ध हो राष्ट्रीय एजेंडा को हमारे संविधान के अनुरूप बनाने का प्रयास करेंगें? क्या सामाजिक आन्दोलन, लोगों से जुड़े मुद्दों को जोरदार ढंग से सामने रखेंगें? सांप्रदायिक और छद्म राष्ट्रवाद के एजेंडे की सीमाएं सबके सामने हैं। अब गेंद उन शक्तियों के पाले में है, जो बहुवाद, विविधता और मानवतावाद में आस्था रखते हैं। उन्हें आगे बढ़कर, देश के वातावरण को उस नफरत और हिंसा से मुक्त करना होगा, जो उसका हिस्सा बन गई हैं।

(यह लेख राम पूनियानी की है जो नवजीवन हिन्दी वेबसाइट से ली गई है)


राजनीति का अवसरवादी चेहरा

राजनीति का अवसरवादी चेहरा

23-Nov-2019

सैय्यद एम अली तक़वी, निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, syedtaqvi12@gmail.com

महाराष्ट्र राजनीति में आज का दिन हमेशा याद किया जायेगा। इसलिए नहीं कि एक महीने से चला आ रहा गतिरोध अप्रत्याशित रूप से समाप्त हो गया। बल्कि इसलिए कि आश्चर्यजनक तरीके से देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजीत पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। इन सबके बीच भाजपा नेता नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र सरकार के गठन पर कहा, 'मैंने पहले ही कहा था कि क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी हो सकता है। आज के दौर में राजनेता पूरी तरह से राजनीति को गन्दा एवं भ्रष्टाचार से युक्त करना चाहते हैं।

 एनसीपी चीफ शरद पवार और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा को लेकर जमकर भड़ास निकाली। शरद पवार ने कहा कि उन्हें इस फैसले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसके साथ ही उन्होंने  शिवसेना के साथ रहने का ऐलान किया । यह वक्तव्य भी भूल-भुलैया की तरह है । शरद पवार के अनुसार अजीत पवार ने राज्यपाल को एनसीपी विधायकों के समर्थन की जो सूची सौंपी है वह सही नहीं है। इस बात को लेकर क्या कहा जाए- सेटिंग या बेटिंग ?
बहरहाल आज राजनीति का एक अद्भुत चेहरा सामने आया है। शरद पवार राजनीति के पितामह समान हैं। शायद इसीलिए आज का घटनाक्रम सामने आया।

इस घटनाक्रम से यह बात भी साफ हो गई कि राजनीति का मकसद सिर्फ़ सत्ता है। बीते कुछ वर्षों से राजनीति में सत्ता के लोभियों की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है। रही सही कसर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। जब अवसरवादी सत्ता की कुर्सी पर आसीन होंगे तो जनता को न्याय नहीं मिल सकता है। बहरहाल पवार ग्रुप ने पावर में आने के लिए जो पुअर परफॉर्मेंस दी है वह राजनीति के पावर को घटाने के लिए काफी है।

 


कल्याण दौड में भी आदिवासी बेचैन क्यों?

कल्याण दौड में भी आदिवासी बेचैन क्यों?

22-Nov-2019

 -ः ललित गर्ग :-

राजधानी दिल्ली में आदिवासी जनजीवन से जुड़ी संस्कृति का आदि महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 27 राज्यों के आदिवासियों की संस्कृति, जीवनशैली और भोजन की विविधता का प्रदर्शन करने वाले इस महोत्सव का उद्घाटन किया। एक तरफ सरकार आदिवासी जनजीवन के लिये बेहतर जीवन देने, उनके अधिकारों की रक्षा और उनके विकास के लिए कृतसंकल्प होने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री के गृहराज्य गुजरात में आदिवासी अपने अधिकारों को लेकर आन्दोलनरत है। न केवल गुजरात बल्कि पडौसी राज्य मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आदिवासी हुंकार यात्रा एवं भोपाल में महारैली होना और झारखंड जैसे आदिवासी समझे जाने वाले राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियां के दौरान भी आदिवासी जनजीवन के विरोध के स्वर दिखाई दे रहे हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों है? क्या सरकार की कथनी और करनी में व्यापक खाइयां है? क्या आज भी आदिवासी कोरे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होने को विवश है? कब आदिवासी समस्या मुक्त जीवन जी पाएंगे?

एक तरफ आदिवासी इन ज्वलंत प्रश्नों के समाधान की आस लगाए है तो दूसरी ओर सरकारें आदिवासी कल्याण के लिये अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा रही है। अगर गृहमंत्री अमित शाह के दावों पर यकीन किया जाए तो देश में भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासियों की विधिवत परवाह की है और उन्हें अपने भविष्य को लेकर किसी प्रकार की चिंता से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनेक अवसरों पर आदिवासी कल्याण एवं उन्नत जीवन के संकल्प को दोहराया है और अनेक बहुआयामी योजनाएं शुरु की है। फिर प्रश्न है कि क्या कांग्रेस पार्टी ने आदिवासियों को वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया? इस बात पर कांग्रेस पार्टी का दावा है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आदिवासियों के लिए पंचशील सिद्धांत लागू किया और पांचवीं अनसूची के तहत आदिवासियों की संस्कृति और संसाधन की सुरक्षा की व्यवस्था की।

इंदिरा गांधी ने बंधुआ मजदूरी समाप्त की और बाद में कांग्रेसी सरकारों ने संविधान में 73वें संशोधन के तहत पंचायती राज की व्यवस्था लागू की, ऐसा कानून बनाया और 2006 में वन अधिकार कानून बनाया। दूसरी ओर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पहली बार 1999 में देश में आदिवासी मामलों का मंत्रालय बनाया और मौजूदा मोदी सरकार उनके लिए उजाला, शिक्षा और घर की योजना के तहत ऐसा काम कर रही है जो उन्हें बेहतर जीवन देने और उनके विकास के लिए कृतसंकल्प है। फिर प्रश्न है कि दोनों ही मुख्य पार्टियों ने जब आदिवासी जनजीवन के उन्नयन एवं उत्थान के लिये व्यापक प्रयत्न किये हैं तो फिर आदिवासी असंतुष्ट एवं बेचैन क्यों है?

आदिवासियों के असंतोष के कारण का खुलासा अमित शाह ने ही कर दिया कि आदिवासियों की आबादी सिर्फ 8 फीसदी है और फैलाव देश के 40 फीसदी भूभाग पर। भारत में लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र है, इसके अधिकांश हिस्से में आदिवासी समुदाय रहता है। लगभग नब्बे प्रतिशत खनिज सम्पदा, प्रमुख औषधियां एवं मूल्यवान खाद्य पदार्थ इन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में हैं। यह वह इलाका है जहां पर 71 प्रतिशत जंगल है, 92 प्रतिशत कोयला है, 92 प्रतिशत बाॅक्साइट है, 98 प्रतिशत लोहा है, 100 प्रतिशत यूरेनियम है, 85 प्रतिशत तांबा और 70 प्रतिशत जलस्रोत भी उन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में है। भारत के उद्योगों के लिए 80 प्रतिशत कच्चा माल भी उन्हीं इलाकों से आता है। विडंबना यह है कि इसमें से सिर्फ 10 प्रतिशत जमीन पर आदिवासियों का मालिकाना हक है। असली संघर्ष औद्योगिक और पूंजीवादी विकास और आदिवासी अस्तित्व के बीच है। आदिवासी अपना अस्तित्व चाहते हैं और आधुनिक विकास अपने लिए उनके संसाधन। आदिवासियों के असंतोष एवं आक्रोश के अन्य कारण भी है। 

जैसे कि सन् 1956 से लेकर 2017 तक के समय में गुजरात के सौराष्ट्र के गिर, वरडा एवं आलेच के जंगलों में रहने वाले भरवाड, चारण, रबारी एवं सिद्धि मुस्लिमों को इनके संगठनों के दवाब में आकर गलत तरीकों से आदिवासी बनाकर उन्हें आदिवासी जाति के प्रमाण-पत्र दिये गये हैं और उन्हें आदिवासी सूची में शामिल कर दिया गया है। यह पूरी प्रक्रिया बिल्कुल गलत, असंवैधानिक एवं गैर आदिवासी जातियों को लाभ पहुंचाने की कुचेष्टा है, जिससे मूल आदिवासियों के अधिकारों का हनन हुआ है, उन्हें नौकरियों एवं अन्य सुविधाओं से वंचित होना पर रहा है। गुजरात में ही असंतोष का कारण एक और भी है कि छोटा उदयपुर संसदीय क्षेत्र के आदिवासी राठवा जाति को सरकारी आंकड़ों में कोली शब्द लिखे जाने से उनके आदिवासी अस्तित्व को नुकसान हो रहा है।

इस प्रांत में राठवा जाति के आदिवासी लोगों को कोली के रूप में मान्य किये जाने से इस प्रांत के आठ से दस लाख आदिवासी समुदाय का अस्तित्व खतरे में हैं। वर्तमान में रेवन्यू रिकार्ड में राठवा को सरकारी कर्मचारियों की भूल के कारण मात्र कोली शब्द लिख देने से उनके आदिवासी होने की पहचान को खतरा उपस्थित हो गया है। इस कारण इस क्षेत्र के आदिवासी नाराज है, उनकी सरकारी नौकरियों पर खतरा है, अन्य सुविधाओं से भी उन्हें वंचित होना पड़ रहा है। 

जबकि स्वतंत्रता आन्दोलन में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज भी जब भी जरूरत होती है, यह समाज देश के लिये हर तरह का बलिदान देने को तत्पर रहता है। फिर क्या कारण है कि इस जीवंत एवं मुख्य समाज को आदिवासी की मूल धारा से काटने के प्रयास निरन्तर किये जा रहे हैं। आजादी के बाद बनी सभी सरकारों ने इस समाज की उपेक्षा की है। आदिवासियों की ताजा बेचैनी का कारण 2006 के वन अधिकार कानून के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई भी है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से पैरवी में ढिलाई के चलते ही एक करोड़ आदिवासियों के लिए 13 फरवरी 2019 को बेदखली का आदेश पारित हो गया था। बाद में जब देश भर से गुहार लगी तो स्थगनादेश जारी हुआ।

इस तरह यह आदिवासी समाज अनेक समस्याओं से घिरा है। हजारों वर्षों से जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को हमेशा से दबाया और कुचला जाता रहा है जिससे उनकी जिन्दगी अभावग्रस्त एवं समस्याओं में ही रही है। केंद्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ों रुपए का प्रावधान बजट में करती है। इसके बाद भी उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। स्वास्थ्य सुविधाएं, पीने का साफ पानी आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं।

 जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों को अपनी भूमि से बहुत लगाव होता है, उनकी जमीन बहुत उपजाऊ होती हंै, उनकी माटी एक तरह से सोना उगलती है। जनसंख्या वृद्धि के कारण भूमि की मांग में वृद्धि हुई है। इसीलिये आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों एवं उनकी जमीन पर विकासवादी ताकते एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नजर है। कम्पनियों ने आदिवासी क्षेत्रों में घुसपैठ की है जिससे भूमि अधिग्रहण काफी हुआ है। आदिवासियों की जमीन पर अब वे खुद मकान बना कर रह रहे हैं, बड़े कारखाने एवं उद्योग स्थापित कर रहे हैं, कृषि के साथ-साथ वे यहाँ व्यवसाय भी कर रहे हैं। भूमि हस्तांतरण एक मुख्य कारण है जिससे आज आदिवासियों की आर्थिक स्थिति दयनीय हुई है। माना जाता है कि यही कंपनियां आदिवासी क्षेत्रों में युवाओं को तरह-तरह के प्रलोभन लेकर उन्हें गुमराह कर रही है, अपनी जड़ों से कटने को विवश कर रही है। उनका धर्मान्तरण किया जा रहा है। उन्हें राष्ट्र-विरोधी हरकतों के लिये उकसाया जाता है। इस तरह की स्थितियां आदिवासी समाज के अस्तित्व और उनकी पहचान के लिए खतरा बनती जा रही है। 

आज बड़े ही सूक्ष्म तरीके से इनकी पहचान मिटाने की व्यापक साजिश चल रही है। कतिपय राजनीतिक दल उन्हें वोट बैंक मानती है। वे भी उनको ठगने की कोशिश लगातार कर रही है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी विमुक्त, भटकी बंजारा जातियों की जनगणना नहीं की जाती है। तर्क यह दिया जाता है कि वे सदैव एक स्थान पर नहीं रहते। आदिवासियों की ऐसी स्थिति तब है जबकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आदिवासी को भारत का मूल निवासी माना है लेकिन आज वे अपने ही देश में परायापन, तिरस्कार, शोषण, अत्याचार, धर्मान्तरण, अशिक्षा, साम्प्रदायिकता और सामाजिक एवं प्रशासनिक दुर्दशा के शिकार हो रहे हैं। आदिवासी वर्ग की मानवीय गरिमा को प्रतिदिन तार-तार किया जा रहा है। जबकि दोनों राष्ट्रीय पार्टियों और उनकी सरकारों में आदिवासियों के कल्याण की होड़ लगी है। इस होड की दौड के बावजूद आदिवासियों के भीतर बेचैनी क्यों बढ़ती जा रही हैं?


रोज नई दिक्कतों के बाद   साथ - साथ रह सकेंगे अंजलि और इब्राहिम !

रोज नई दिक्कतों के बाद साथ - साथ रह सकेंगे अंजलि और इब्राहिम !

22-Nov-2019

प्यार के लिए संघर्ष के दौर से गुजरने वाले एक शादीशुदा जोड़े ने साथ रहने के लिए डेढ़ साल की कानूनी लड़ाई लड़ी और आज का दिन उनके लिए बेहद खास रहा।जागरण हमारे प्रतिनिधि के अनुसार अब ,पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ मिला और अब दोनों आगे की जिंदगी साथ-साथ गुजार सकेंगे।
प्रेमी युगल  धमतरी के रहने वाले अंजली जैन और इब्राहिम खान ने दूसरे  धर्म का होने के बावजूद एक दूसरे से प्रेम  किया और फिर जिंदगी भर साथ रहने की कसमें खाते हुए प्रेम विवाह  कर ली, लेकिन अपने रिश्तेदारों और दुनियावालों को यह शादी नागवार गुजरी।
इस रिश्ते को लव जेहाद की संज्ञा दी गई और फिर अंजली के घर वालों ने दोनों को अलग कर दिया। मामला अदालत में पहुंचा और फिर नौ माह तक सखी वन स्टॉप सेंटर में कैदी जैसी जिंदगी गुजारने के बाद अंजली बुधवार को यहां की चाहरदीवारी से आजाद हुई। उसे वहां लेने उसके पति आए थे।

 


बैंक ने एक एकाउंट नंबर दो खाताधारको को दे दिया, एक डालता था पैसा दूसरा निकाल लेता, पकड़े जाने पर शख्स ने कहा मुझे लगा मोदी जी पैसा डाल रहे हैं

बैंक ने एक एकाउंट नंबर दो खाताधारको को दे दिया, एक डालता था पैसा दूसरा निकाल लेता, पकड़े जाने पर शख्स ने कहा मुझे लगा मोदी जी पैसा डाल रहे हैं

21-Nov-2019

एमपी गजब है हम यह इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मध्यप्रदेश से एक और ऐसा ही गजब खबर प्रकाश में आया है आज तक में प्रकाशित खबर के अनुसार मध्यप्रदेश के भिंड में अजीबोगरीब मामला सामने आया. भिंड जिले के आलमपुर गांव में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में एक ही खाता नंबर दो लोगों को एलॉट कर दिया गया. यानी एकाउंट नंबर एक और खाता धारक दो. बैंक ने पासबुक दी. उसमें कस्टमर नंबर भी एक ही लिख दिया. 

इस एकाउंट में एक ग्राहक पैसे डालता रहा और दूसरा ग्राहक उसे सरकारी पैसा समझकर निकालता रहा. ऐसा 6 महीने तक चला. 6 महीने में 89 हजार रुपए खाते से निकाल लिए गए. आलमपुर में रुरई गांव है. यहां रहते हैं हुकुम सिंह. इन्होंने एसबीआई की आलमपुर ब्रांच में खाता खुलवाया. 12 नवंबर 2018 को पासबुक मिली. इसके बाद वे हरियाणा चले गए. वहां पैसे कमाते और इसमें डालते. 16 अक्टूबर 2019 को वापस गांव आए. खाते से पैसे निकालने गए तो पता चला कि खाते से तो 89 हजार रुपए निकाल लिए गए हैं.

खाते से निकालता रहा किसी और के पैसे, बोला- मुझे लगा मोदीजी ने डाले हैं

हुकुम सिंह तत्काल मामला लेकर एसबीआई के ब्रांच मैनेजर राजेश सोनकर के पास पहुंचे. जांच करने पर पता चला कि एक ही एकाउंट 2 लोगों को एलॉट कर दिया गया है. इस एकाउंट का दूसरा मालिक रोनी गांव का हुकुम सिंह बघेल है. इन्हें 23 मई 2016 को पासबुक जारी हुई थी. यानी हरियाणा वाले हुकुम सिंह से खाता खुलने से काफी पहले. फिर दोनों हुकुम सिंहों को बैंक ने बुलाया. हुकुम सिंह बघेल ने बताया कि पैसा निकालने के लिए बाकायदा आधार कियोस्क सेंटर पर जाकर बायोमीट्रिक मशीन में अंगूठा लगाकर पैसा निकालते थे.

खाते से निकालता रहा किसी और के पैसे, बोला- मुझे लगा मोदीजी ने डाले हैं

जब उनसे पूछा गया कि जब खाते में पैसा डाल नहीं रहे थे, तो निकाल किस हक से रहे थे. तब हुकुम सिंह बघेल ने बताया कि मुझे लगा कि मोदी जी पैसा डाल रहे हैं इसलिए मैं निकाल रहा था. फिर बैंक ने सादे कागज पर हुकुम सिंह बघेल से लिखवाया कि वो हुकुम सिंह को तीन किस्तों में 89 हजार रुपए वापस करेंगे. बघेल ने कागज पर अंगूठा लगाकर कहा कि वे सारे पैसे वापस कर देंगे, तब जाकर मामला शांत हुआ.

 


एक अरब डॉलर मूल्य के तोपों को अमेरिका से खरीदेगा भारत

एक अरब डॉलर मूल्य के तोपों को अमेरिका से खरीदेगा भारत

21-Nov-2019

भाषा की खबर 

वाशिंगटन: ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस को बताया है कि उसने भारत को एक अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य की नौसेना की तोपों को बेचने का निर्णय लिया है. इस प्रस्तावित बिक्री के साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिसे अमेरिका ने अपने नौसेना तोपों के नवीनतम (मोड 4) की बिक्री का फैसला किया है. इन तोपों का इस्तेमाल युद्धपोतों तथा युद्धक विमानों के खिलाफ और तटों पर बमबारी के लिए किया जाता है और इस फैसले से भारतीय नौसेना की घातक क्षमताओं में बढ़ोतरी होगी.

रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी ने मंगलवार को जारी अपनी अधिसूचना में कहा कि 13 एमके-45 पांच इंच/ 62 कैलिबर (एमओडी 4) नौसैनिक तोपों और उनसे संबंधित उपकरणों की प्रस्तावित विदेशी सैन्य बिक्री की अनुमानित लागत 1.0210 अरब डॉलर है.

अधिसूचना में कहा गया है कि बीएई सिस्टम्स लैंड एंड आर्मामेंट्स द्वारा बनाए जाने वाले इन हथियारों की प्रस्तावित बिक्री से भारत को दुश्मनों के हथियारों से मौजूदा और भविष्य के जोखिमों से निपटने में मदद मिलेगी. अधिसूचना में कहा गया है, ‘एमके-45 गन सिस्टम से अमेरिका और अन्य संबद्ध बलों के साथ अंतर-क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ एंटी-सर्फेस युद्ध और एंटी-एयर रक्षा मिशन का संचालन करने की क्षमता मिलेगी.’ इसमें कहा गया है कि इस बढ़ी हुई क्षमता की मदद से भारत क्षेत्रीय खतरों से निपटने और अपनी जमीन की रक्षा करने में सक्षम होगा.

अभी तक इन तोपों को ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया को ही बेचा गया है. थाईलैंड को मोड 4 का उन्नत संस्करण दिया गया है. ब्रिटेन और कनाडा जैसे अपने मित्र देशों को भी अमेरिका इन तोपों की बिक्री करने के लिए प्रतिबद्ध है.