शाहरुख खान और गौरी खान के रिश्ते में आज भी वही ताज़गी है

शाहरुख खान और गौरी खान के रिश्ते में आज भी वही ताज़गी है

08-Apr-2022

बॉलीवुड की पसंदीदा जोड़ी शाहरुख खान और गौरी खान का रिश्ता अलग-अलग धर्म से होने के बावजूद दिन-ब-दिन मजबूत होता जा रहा है। वे उन दिनों से साथ हैं जब उनके पास कोई स्टारडम नहीं था। 1991 में शादी के बंधन में बंधने वाला यह जोड़ा वाकई काबिले तारीफ है।

शाहरुख खान ने नहीं देखी वह फिल्म जिसकी वजह से गौरी के परिवार रिश्ते के लिए  वाले मान गए थे, जानिये वजह -

शाहरुख खान और गौरी खान का साथ और वैवाहिक जीवन  को  सालो पुराना है फिर भी रिश्ते में आज भी वही ताज़गी है  उनके बीच इंटरफेथ मैरिज अभी भी सबसे चर्चित विषयों में से एक है। शाहरुख और गौरी पहले भी कई इंटरव्यू में इस बारे में खुलकर बात कर चुके हैं। हमें गौरी का एक ऐसा इंटरव्यू मिला जिसमें उन्होंने एक मुस्लिम परिवार में शादी करने के बारे में चर्चा की।

गौरी खान ने पहले सीज़न में कॉफ़ी विद करण में सुज़ैन खान के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनसे उनके और शाहरुख के धर्म में अंतर के बारे में पूछा गया था, जिस पर गौरी ने कहा था, “शाहरुख, दुर्भाग्य से उनके कोई माता-पिता नहीं हैं। अगर वे होते तो घर के बुजुर्ग लोग उनका ख्याल रखते। लेकिन, हमारे घर में ऐसा कुछ नहीं है।”

एमएस शिक्षा अकादमी
उन्होंने आगे कहा, “यह मैं ही हूं जो दीवाली या होली या कोई भी त्योहार संभालती है। इसलिए मेरे बच्चों का प्रभाव हिंदू हिस्से पर बहुत होगा … लेकिन बात यह है कि, आर्यन शाहरुख में इतना है कि वह अपने धर्म का पालन करेगा, मुझे लगता है। वह हमेशा कहते थे कि ‘मैं एक मुसलमान हूं’। जब वह मेरी मां को यह बताता है, तो वह कहती है, ‘तुम्हारा क्या मतलब है?’।

धर्म परिवर्तन पर अपने विचारों के बारे में बात करते हुए, गौरी खान ने कहा, “एक संतुलन है, मैं शाहरुख के धर्म का सम्मान करती हूं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं धर्मांतरण कर मुस्लिम बन जाऊंगी। मैं उस पर विश्वास नहीं करता। मुझे लगता है कि हर कोई एक व्यक्ति है और अपने धर्म का पालन करता है। लेकिन, जाहिर तौर पर कोई अनादर नहीं होना चाहिए। जैसे शाहरुख मेरे धर्म का भी अनादर नहीं करते।”

यह भी याद किया जा सकता है जब शाहरुख ने मजाक में गौरी को बुर्का पहनने और अपना नाम बदलकर ‘आयशा’ करने के लिए कहा था। फरीदा जलाल के साथ अपने एक पुराने साक्षात्कार में, शाहरुख ने अपनी और गौरी की शादी के दिन का एक किस्सा साझा किया। उन्होंने कहा, “मुझे याद है, जब उनका पूरा परिवार, पुराने जमाने के लोग, मैं उन सभी का सम्मान करता था और उनकी मान्यताओं का सम्मान करता था, लेकिन उस समय पुराने जमाने के रिसेप्शन में, जब मैं 1 बजे आया तो वे सभी वहां बैठे थे। 15, फुसफुसाते हुए “हम्म .. वह एक मुस्लिम लड़का है। हम्म.. क्या वह लड़की का नाम बदलेगा? क्या वह (गौरी) मुसलमान बनेगी?”

शाहरुख ने कहा, ‘वे सभी पंजाबी में बात कर रहे थे। तो, मैंने समय देखा और कहा, “ठीक है गौरी, अपना बुर्का पहन लो और अब नमाज़ पढ़ो। पूरा परिवार हमें घूर रहा था और सोच रहा था कि क्या मैंने पहले ही उसका धर्म बदल दिया है। तो मैंने उनसे कहा, “अब से वह हर समय बुर्का पहनेगी, वह कभी घर नहीं छोड़ेगी और उसका नाम बदलकर आयशा कर दिया जाएगा और वह ऐसी ही होगी।”

पेशेवर मोर्चे पर, शाहरुख खान अगली बार पठान में दिखाई देंगे। फिल्म में दीपिका पादुकोण और जॉन अब्राहम भी हैं। इसके अलावा उनका एटली के साथ एक नया प्रोजेक्ट भी है।

 

दस्तूर-ए-हिन्द के मुअल्लिफ व भारत के पहले वजीर क़ानून...

दस्तूर-ए-हिन्द के मुअल्लिफ व भारत के पहले वजीर क़ानून...

07-Apr-2022

दस्तूर-ए-हिन्द के मुअल्लिफ व भारत के पहले

वजीर क़ानून, भारत रत्न डॉ. भीम राव अम्बेडकर
और
बाबा-ए-कौम और अज़ीम मुजाहिद आजादी
मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी (रह) 

भारत के दो अज़ीम रहनुमा मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी (रह) और डॉक्टर भीमराव
अंबेडकर की योम-ए-पैदाइश भारत में त्यौहार की शक्ल में मनाया जाता है। मौलाना अली हुसैन आसिम
बिहारी (रह) की योम-ए-पैदाइश 15 अप्रैल 1889 और बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की
योम-ए-पैदाइश 14 अप्रैल 1891 में र्हुइ । यह दोनों रहनुमा तकरीबन हम अस्र हैं और उनकी हयात व
खिदमात की बात करें तो दोनों रहनुमाओं में बड़ी हद तक यक्सानियत पाई जाती है। दोनों की जिंदगी 

पैदाइश से लेकर वफात तक यक्सां रही। ये और बात है कि आज बाबा साहेब के फॉलोअर्स  पैरोकार काफी
हैं और उनके बताए हुए रास्ते पर चल रहे हैं, जबकि बाबा-ए-कौम अली हुसैन साहब के फॉलोअर्स  तो हैं
लेकिन उनके बताए हुए रास्ते से भटक गए हैं। जो आज उनका नाम तक नहीं लेते। जबकि आज ढेर सारी
तनजीमें जैसे मोमिन कॉन्फ्रेंस, अंसार सभा, अंसारी पंचायत वगैरा-वगैरा हजारों की तादाद में मौजूद है, जो
सिर्फ अपनी सियासी रोटी सेकने में लगी हैं, आज तक किसी ने अली हुसैन साहब की कब्र/मकबरा की
खबर नहीं ली, जो गुमनामी की हालत में इलाहाबाद में मौजूद है।
 इन रहनुमाओं ने अपनी सारी जिन्दगी गरीबों, मेहनत कशों, तालीमी, मआशी, समाजी ताैर पर
नजर अंदाज और कमजोर दलित बिरादरियों की हमा जहत फलाह व बहबूद की कोशिशों में गुजारी।
 डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के हालात का जायजा लें तो वह एक मुम्ताज मुफक्किर, मुसल्लेह,
कानून दां, दस्तूरे हिंद के मोअल्लिफ, भारत के पहले वजीर कानून और इल्म के हामिल थे। बाबा साहब
अम्बेडकर ऐसे दौर में पैदा हुए जब जुल्म व ज्यादती और इस्तेहसाल का दाैर राइज था और भारत का
मुआशरा जात पात की तफरीक और छुआछूत पर मबनी था। डॉक्टर अंबेडकर का ताल्लुक भी उसी अछूत
बिरादरी से था जो इंसानी हुकूक से महरूम थी। उन्हें बचपन में इस छुआछूत का शिकार होना पड़ा।
डॉक्टर अंबेडकर जब स्कूल में दाखिला लिया तो दीगर जात के बच्चों के साथ उन्हें बैठने की इजाजत न
थी। वह सबसे अलग जमीन पर डांट बिछा कर बैठते थे लेकिन कभी मायूस नहीं हुए और न हिम्मत हारी।
 वही मुजाहिद आजादी माैलाना आसिम बिहारी (रह) का ताल्लुक मुस्लिम बिरादरी से था। वह
एक मुसल्लेह व मुफक्किर कौम, दानेश्वर, समाजी व सियासी और इंसान दाेस्त शख्सियत थे। इन्होंने आवाम
के लिए जो खिदमात अंजाम दीं उसकी मुस्लिम मुआशरे में कोई मिसाल नहीं मिलती। उनकी कोशिशों की
बदौलत अवाम में बेदारी पैदा र्हुइ  और समाजी व सियासी शऊर पैदा ह ुआ। माैलाना आसिम बिहारी ऐसे दौर
में पैदा हुए जब गरीब, मेहनतकश तबकात समाजी, तालीमी और मआशी बदहाली के शिकार थे। गैरों की
तर्ज पर मुस्लिम मुआशरे में भी जात-पात और ऊंच-नीच का दौर दौरा था। मुसलमानों के दरमियान
नाइंसाफी व इस्तेहसाल की बुरी रिवायत आम थी।
 डॉक्टर अंबेडकर और मौलाना आसिम बिहारी दोनों की पैदाइश गरीब घराने में र्हुइ , लेकिन
दोनों रहनुमाओं ने आला तालीम हासिल की। क्योंकि वह जानते थे कि समाज के अंदर फैली जात पात,
छुआछूत और नाइंसाफी व इस्तेहसाल की इस गंदी रिवायत को अगर खत्म करना है तो आला तालीम
हासिल करना होगा। समाज के अंदर फैली तमाम तरह की बुराइयों को अगर खत्म करना है तो हमें तालीम
याफ्ता बनना होगा। इसलिए दोनों ने अपनी सारी उम्र दबे कुचले लोगों को इंसाफ दिलाने और गुरबती के
शिकार लोगों की मदद करने में गुजार दी।
 दोनों रहनुमाओं ने हमेशा लोगों से तालीम याफ्ता बनने, मुत्तहिद होने, मेहनत करने, अपने
हुकूक के लिए आवाज उठाने, समाज के अंदर फैली बुराइयों से लड़ने और उसको खत्म करने, ना इन्साफी
व इस्तेहसाल के खिलाफ आवाज बुलंद करने, भेदभाव, जात पात की रिवायत के खिलाफ लड़ने, हक़ तल्फी
करने वालों और हक तल्फी करने वाली पॉलिसियों के खिलाफ लड़ने की बात कही।


क्या छत्तीसगढ़ में दंगा भड़काने की तैयारी में जुटी हैं आरएसएस ?

क्या छत्तीसगढ़ में दंगा भड़काने की तैयारी में जुटी हैं आरएसएस ?

06-Apr-2022

( यह पोस्ट सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की फेसबुक वॉल से साभार ली गई हैं. इसे यहां शेयर करने का मकसद इतना ही है कि छत्तीसगढ़ को नफरत और दंगे की आग में झुलसने नहीं देना है. )

राजस्थान से फोन आया है.
मुझे बताया गया है कि करौली दंगे की तैयारी हिंदुत्ववादी संगठन लंबे समय से कर रहे थे.इन संगठनों के पीछे आरएसएस और बीजेपी का हाथ है

इन लोगों का मकसद राजस्थान में सांप्रदायिकता को भड़का कर हिंदुओं के वोटों को एक साथ लाना है.

इनका लक्ष्य आने वाले विधानसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार हटाकर भाजपा की सरकार बनाना है.दंगा उसी मकसद से किया गया है.

छत्तीसगढ़ में भी आरएसएस के बड़े पदाधिकारी बस्तर और अन्य इलाकों में लगातार दौरे कर रहे हैं और सांप्रदायिकता भड़का रहे हैं.
वहां भी कांग्रेस की सरकार को हटाकर भाजपा अपनी सरकार बनाने की फिराक में है.

भाजपा को दंगे करा कर सत्ता में पहुंचने का रास्ता ही मालूम है इनसे और किसी अच्छे तरीके की उम्मीद नहीं की जा सकती.

 


15 दिनों में 13 गुना बढ़ी ईंधन की कीमतें!

15 दिनों में 13 गुना बढ़ी ईंधन की कीमतें!

05-Apr-2022

15 दिनों में 13 गुना बढ़ी ईंधन की कीमतें!

पंद्रह दिनों में ईंधन की कीमतों में तेरहवें संशोधन के साथ, मंगलवार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 80-80 पैसे की बढ़ोतरी हुई है।

इसके साथ ही ईंधन दरों में कुल वृद्धि अब 9.20 रुपये प्रति लीटर हो गई है

दिल्ली  : दिल्ली में पेट्रोल और डीजल की कीमत अब क्रमश: 104.61 रुपये और 95.87 रुपये प्रति लीटर है। जबकि मुंबई में पेट्रोल की कीमत 84 पैसे की वृद्धि के बाद 119.67 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 103.92 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई।

गौरतलब है कि कल सीएनजी के दाम में 2.5 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की गई थी। नई कीमत के साथ, राष्ट्रीय राजधानी में सीएनजी की कीमत 64.11 रुपये प्रति किलोग्राम है।

कीमतों में वृद्धि ने राजनीतिक हंगामा भी पैदा कर दिया है क्योंकि विपक्ष विरोध प्रदर्शन कर रहा है और ईंधन की कीमतों में कमी की मांग कर रहा है।

पेट्रोलियम उत्पादों और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर बार-बार व्यवधान के बाद राज्यसभा को सोमवार को दिन भर के लिए स्थगित कर दिया गया और विपक्ष ने इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किया क्योंकि इस मामले पर चर्चा करने की उनकी मांग को खारिज कर दिया गया था।

डीएमके सदस्य तिरुचि शिवा ने आदेश का मुद्दा उठाया था, जिसमें पूछा गया था कि “हमारे द्वारा नियम 267 के तहत महासचिव को सदन के सभी कामकाज को निलंबित करने और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी पर चर्चा करने के लिए दिए गए नोटिस और कई अन्य नोटिस क्यों खारिज कर दिए गए थे”।

पिछले साल 4 नवंबर से ईंधन की कीमतों में संशोधन पर विराम लगा था, जो 22 मार्च को समाप्त हो गया था, क्योंकि यूक्रेन में रूसी सैन्य अभियानों के मद्देनजर कच्चे तेल की कीमतें ऊपर की ओर बढ़ रही थीं।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल को देखते हुए कीमतों में और इजाफा होना तय है।

इसका अन्य वस्तुओं की कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा और मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ावा देगा और अन्य वस्तुओं की कीमतों को भी प्रभावित करते हुए विकास को नुकसान पहुंचाएगा।

इस बीच, कांग्रेस मूल्य वृद्धि के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी विरोध अभियान ‘मेहंगई मुक्त भारत अभियान’ चला रही है, जिसके तहत वह 31 मार्च से 7 अप्रैल तक देश भर में रैलियों और मार्च का आयोजन कर रही है।

विशेष रूप से, पिछले साल 3 नवंबर को, केंद्र ने देश भर में खुदरा कीमतों को कम करने के लिए पेट्रोल पर 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क में कटौती की थी।

इसके बाद, कई राज्य सरकारों ने लोगों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर मूल्य वर्धित कर (वैट) कम किया था।

input- siasat.com

 


मुस्कुराहट वाला नफ़रती बोल, नफ़रती नहीं होता

मुस्कुराहट वाला नफ़रती बोल, नफ़रती नहीं होता

01-Apr-2022

मुस्कुराहट वाला नफ़रती बोल, नफ़रती नहीं होता

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

मोदी जी के विरोधी बार-बार उनके सामने हार जाते हैं -- पता है क्यों? उनके विरोध में सकारात्मकता नहीं है। उनके पास तेल के दाम से लेकर ईवीएम के खेल तक, शिकायतें तो खूब हैं, पर किसी नये इंडिया का विजन ही नहीं है। विजन होता तो मोदी जी के विरोधी कम से कम एक आला अदालत के इस निहायत शालीन फैसले पर इतना शोर नहीं मचा रहे होते कि अगर मुस्कुराते हुए बोला जाए, तो किसी को नफरती बोल लगे भी, तो उसे नफरती नहीं कहते! बेशक, हाई कोर्ट ने यह नहीं कहा कि मुस्कुराते हुए जो भी बोला जाए, उसे मोहब्बती बोल मानना कम्पल्सरी है।

आखिर, देश में डैमोक्रेसी है और सब को जैसे अपने मन के बोल बोलने का हक है, वैसे ही हरेक को यह मानने का हक है कि किसी बोल को मोहब्बती बोल माने या नहीं माने। बस, मुस्कुराहट वाले बोल को नफरती बोल मानने, कहने, बताने का किसी को हक नहीं है। और ऐसे बोल को नफरती बनाकर किसी पर एफआईआर वगैरह कराने का तो किसी को दूर-दूर तक कोई हक नहीं है।

मुस्कुराते हुए जो भी बोला जाए, उसे सिर्फ बोल कहेंगे और सिर्फ बोलना तो कोई जुर्म नहीं हो सकता, बल्कि वह तो भारत के हरेक नागरिक का मौलिक अधिकार है।

अगर विपक्ष वालों के पास विजन होता, तब ना वे यह समझ पाते कि दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला कितना दूरंदेशी भरा है। यह सिर्फ किसी कपिल मिश्रा या अनुराग ठाकुर के छोड़ दिए जाने भर का फैसला नहीं है। ऐसे तो हर रोज सैकड़ों लोग आरोपों से छूट जाते हैं और अगर भगवा गमछे वाले हों और आरोप नफरती बोली से लेकर मर्डर से छोटी किसी करनी तक का हो, तब तो वे तो ज्यादातर छूट ही जाते हैं। पर यह तो कुछ और ही रास्ता दिखाने वाला फैसला है।

काश मोदी जी के विरोधी भी इस फैसले का वह पक्ष देख पाते, जो नागपुर की पढ़ाई का क-ख भी पढ़ा हुआ झट से देख लेगा। यह फैसला नफरत के साथ चाहे कुछ भी करे, पर देश में खुशी को जबर्दस्त बढ़ावा देने वाला फैसला है।

जरा सोचिए, नये इंडिया को ऐेसे किसी भी कदम की कितनी जरूरत थी, जो देश में खुशी बढ़ाए, देश के खुशी सूचकांक को ऊपर उठाए। जब से विश्व खुशी सूचकांक में भारत खिसक कर 136वें नंबर पर पहुंचा है और उससे भी बुरा यह कि पाकिस्तान तक हमसे आगे निकल गया है, तभी से मोदी जी रातों को जाग-जागकर इसके उपाय खोजने में जुटे हुए थे कि भारत का खुशी सूचकांक कैसे बढ़ाया जाए। सुना है कि इसी चक्कर में मोदी ने देश के लिए काम करने के अपने घंटे बाईस से भी बढ़ा दिए थे और बिना सोए लगातार काम करते रहने के अपने एक्सपेरीमेंट को और तेज कर दिया था। आखिर, मोदी जी की मेहनत रंग लायी और जज साहब को देश में खुशी बढ़ाने का रास्ता सूझा।

जरा सोचिए, नये इंडिया में नफरती बोल की शिकायतों का कितनी तेज रफ्तार से विकास हो रहा है। और अभी तो पार्टी शुरू हुई है। आगे-आगे देखिए, कितने फर्राटे से विकास होता है। और यह तो मोदी जी के विरोधी तक मानेंगे कि अदालत ने, नफरती बोल की शिकायतों के और भी फर्राटा भरने का रास्ता खोल दिया है। पर अदालत ने इस फर्राटे के साथ देश के खुशी सूचकांक की साइड कार को भी जोड़ दिया है। अब जो भी नफरती बोल बोलेगा, मुस्कुराते हुए बोलेगा। जितनी नफरती बोल की शिकायतें बढ़ेंगी, उतनी ही देश में मुस्कुराहटें बिखरेंगी। सोचने की बात है कि जब चारों ओर मुस्कुराहटें बिखरेंगी, तो क्या हमारे देश का खुशी सूचकांक नहीं बढ़ेगा? जरूर बढ़ेगा। वह दिन ज्यादा दूर नहीं, जब खुशी सूचकांक पर कम से कम पाकिस्तान को तो हम पछाड़ ही देंगे। हो सकता है कि इसके साथ ही हम नफरती बोल की शिकायतों में भी पाकिस्तान को पछाड़ दें। यानी एक के साथ एक और मैदान में पाकिस्तान को पछाडऩा फ्री! हां! नफरती बोल के मैदान में पाकिस्तान को पछाडऩे में किसी को अगर ज्यादा ही शर्म आए, तो तकनीकी आधार पर हम इस मैदान में पाकिस्तान के लिए वाकओवर भी डिक्लेअर कर सकते हैं।

आखिरकार, हमारी आला अदालत का फैसला है कि मुस्कराहट वाला नफरती बोल, नफरती नहीं होता है! जब हमारे नफरती बोल नफरती ही नहीं रहे, तो नफरती बोल के कम्पटीशन में हम पाकिस्तान को या किसी को भी कैसे हरा सकते हैं! मोदी जी के नेतृत्व में और हाई कोर्ट के कृतित्व से, ईज ऑफ बीइंग खुश में भारत को लंबी छलांगें लगाकर ऊपर चढ़ने से अब कोई नहीं रोक सकता है। देसी विपक्ष भी नहीं।

और हां! अदालत के फैसले में एक और बात बहुत ही मार्के की है। अदालत ने कहा है कि जिन भगवाइयों पर नफरती बोल बोलने का इल्जाम था, उन्होंने जो भी बोला था, मुस्कुराहट के साथ तो बोला ही था, जो भी बोला था, चुनाव के सिलसिले में बोला था। एक तो मुस्कुराहट और ऊपर से चुनाव, यह तो खैर सोने में सुहागा ही हो गया!

यह ध्यान रखना जरूरी है कि जो भी बोला गया, चुनाव जीतने की मंशा से बोला गया। नफरती बोल बोलने की मंशा से नहीं। बोला कुछ भी गया हो, असली चीज तो मंशा है। चुनाव के लिए लोग क्या-क्या बोलते हैं? क्या-क्या वादे करते हैं? कोई रोक-टोक नहीं है, सब को बोलने का पूरा अधिकार है। उस सब को सीरियसली नहीं लिया जा सकता है। नहीं लिया जाना चाहिए। चुनाव के बाद सब भूल जाते हैं। यही जनतंत्र है।

चुनाव के समय मुस्कुराते हुए कोई कुछ कहे, तब तो उसे कन्फर्म्ड मोहब्बत के बोल ही मानना चाहिए। कम से कम चुनाव के टैम के बोलों में नफरत खोजना डैमोक्रेसी की भावना के खिलाफ है। 2022 में यूपी में संदेश मिल गया है, 2024 में भारत की जनता ऐसे नफरत खोजकर दुनिया में देश की छवि खराब करने वालों को हर्गिज माफ नहीं करेगी!

और ये ‘‘गोली मारो सालों को’’ का इतना शोर मचाने का क्या मतलब है? जब किसी ने किसी को गोली मारी ही नहीं है, तो फिर कही-सुनी बातों का इतना बतंगड़ बनाने की क्या जरूरत है? वैसे भी सालों को गोली मारो के तो कितने ही अर्थ हो सकते हैं। जैसे मुहावरा, जिसका अर्थ होता है--भाड़ में जाने दो। या अपने सालों से नाराजगी का इजहार। ये सब तो प्यार में ही ज्यादा होता है, इसे नफरत से किस आधार पर जोड़ा जा रहा है। वैसे भी नफरत से ही सही, पर है तो यह भगवाइयों के प्यार का ही मामला।


मन की बात में तेल की बात...

मन की बात में तेल की बात...

29-Mar-2022

मन की बात में तेल की बात...

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व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा 

मोदी जी के विरोधी बिल्कुल ही पगला गए हैं क्या? बताइए, अब कह रहे हैं कि मोदी जी मन की बात में तेल, रसोई गैस वगैरह के दाम की बात क्यों नहीं करते? पैट्रोल-डीजल के दाम छ: दिन में पांच-पांच बार बढ़े हैं, मोदी जी को वह क्यों नहीं दिखाई दिया। कम से कम रसोई गैस सिलेंडर के दाम की तो सुध लेते, जो हजार का आंकड़ा पार करने के लिए कसमसा रहा है? वह भी नहीं तो कम से कम 800 जरूरी दवाओं की कीमतों का ही जिक्र कर देते, वगैरह, वगैरह। अब इन्हें कोई क्या समझाए कि इतनी बेतुकी बातें कर के तो ये अपना ही मजाक उड़वा रहे हैं। वर्ना मोदीजी ने तो ठोक-ठोक के बताया है और करीब आठ साल में हर महीने बताया है कि इसकी न उसकी, ये उनके मन की बात है! बेशक, मोदीजी पब्लिक से सुझाव भी मांगते हैं और उम्मीद है कि मांगते हैं, तो सुझाव लेते भी होंगे। लेकिन, सुझाव पब्लिक के हो सकते हैं, पर बात मोदीजी अपने मन की ही करते हैं। और ठस्से से करते हैं। किसी का डर है क्या? अव्वल तो छाती ही छप्पन इंच की और उस पर चुनाव में जोरदार जीत! मोदी जी किसी कल्लू्, किसी रामू, किसी रग्घू के मन की बात करेंगे क्या?

 नहीं, हम यह नहीं कह रहे हैं कि बात चूंकि मोदी जी के मन की है, इसलिए उसमें तेल का जिक्र समा ही नहीं सकता है। मोदी जी का मन बहुत बड़ा है। उसका विस्तार अपार है। उसमें पूरा ब्रह्मांड समा सकता है। बस बात मोदी जी के मन की होनी चाहिए। कोई गलत न समझे। पांच में से चार राज्यों में दोबारा भगवा सरकार बन गयी, यह मोदी जी के मन की बात है जरूर, लेकिन यही मोदी जी के मन की बात नहीं है। विदेश व्यापार का आंकड़ा 400 अरब डालर पार कर गया, यह भी मोदी जी के मन की बात है। योगा भी मोदी जी के मन की बात है और आयुष सैक्टर भी। और गुजरात का मेला भी, तो अंबेडकर से जुड़े पंच तीर्थ भी। और तो और लड़कियों की शिक्षा भी, बस हिजाब पहनने वाली लड़कियों को छोडक़र।

यानी मोदीजी के मन की बात में सब समा सकता है,करीब-करीब सब कुछ। फिर मोदीजी की मन की बात में तेल का दाम क्यों नहीं? सिंपल है--तेल का दाम बढ़े, यह तो मोदीजी के मन की बात है ही नहीं। यह तो तेल कंपनियों के मन की बात है। और सच पूछिए तो तेल कंपनियों के भी मन की बात कहां, उनकी भी मजबूरी है। सात-समंदर पार यूक्रेन और रूस लड़ रहे हैं। मजबूरी में सही, दाम तेल कंपनियां बढ़ा रही हैं और उलाहना मोदी जी को दिया जा रहा है कि उनकी मन की बात में तेल का दाम क्यों नहीं है? वैसे है मन की बात में तेल का दाम भी, तभी तो चार दिन अस्सी-अस्सी पैसे बढऩे के बाद, इतवार को तेल के दाम सिर्फ पचपन पैसे बढ़े हैं। यानी हर लीटर तेल पर पब्लिक की चवन्नी की शुद्घ बचत -- यह है मोदी जी के मन की बात! मोदी जी इसके बाद भी अपनी मन की बात में तेल की कीमतों का जिक्र कर के पब्लिक पर चवन्नी का एहसान नहीं लादना चाहते हैं, तो इस पर मोदी-मोदी की जगह, हाय-हाय क्यों? वैसे भी सब का साथ और तेल की कीमत समेत सब का विकास भी तो मोदी जी के मन की बात है।


कौन हैं वे लोग जो कश्मीर फाइल्स की टिकट थमा रहे हैं ?  राजकुमार सोनी

कौन हैं वे लोग जो कश्मीर फाइल्स की टिकट थमा रहे हैं ? राजकुमार सोनी

25-Mar-2022

कौन हैं वे लोग जो कश्मीर फाइल्स की टिकट थमा रहे हैं ?  राजकुमार सोनी

कल मुझे एक फोन आया. फोन करने वाले ने जयश्री राम कहते हुए सूचना दी कि वह कश्मीर फाइल्स देखने लिए टिकट का प्रबंध कर सकता है.

जब मैंने उसे बताया कि फिल्म को लेकर कायम किए गए शोर-शराबे के बीच मन को मारकर फिल्म देख चुका हूं तो उसने कहा- कोई बात नहीं आप अपने बच्चों को टिकट दे सकते हैं. मैंने कहा- मेरे बच्चे नफरत से वाकिफ नहीं होना चाहते तो सामने वाले ने थोड़ा नाराजगी प्रकट करते हुए कहा- ऐसा मत बोलिए भाई साहब...बच्चों को तो यह जानना बेहद जरुरी है कि दाढ़ीवालों ने हम पर कैसे- कैसे अत्याचार किए हैं ? कैसे हमारी मां-बहनों की इज्जत को लूटा हैं ? अगर हम यह सब अपने बच्चों को नहीं बता पाएंगे कि तो फिर हमारे होने और नहीं होने का कोई मतलब नहीं है. हमें यह तो बताना ही होगा कि हमारा असली दुश्मन कौन हैं ? अगर हमें अपनी पीढ़ी को बचाना है तो हमें हर घर से कम से कम दो-तीन बच्चे को राष्ट्रवादी बनाना ही होगा. हर घर से दो-तीन बच्चा राष्ट्रवादी रहेगा तो फिर 2030 तक मोदी जी को कोई नहीं हिला पाएगा.

जब मैंने प्रतिवाद किया कि मेरे बच्चे राष्ट्रवाद का चूरन चाटने को तैयार नहीं हैं तो बहस लंबी चलने लगी...और अंत में इस बात पर जाकर खत्म हुई कि मैं देशद्रोही हूं.जेहादियों का समर्थक हूं.जब हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा तब मैं कलपता फिरूंगा कि मैंने ये क्या कर डाला ?मैंने हिन्दू राष्ट्र बनने में अपना सहयोग क्यों नहीं दिया ? वगैरह- वगैरह...

हो सकता है जो मेरे साथ घटित हुआ है वह आपके साथ भी हुआ हो. आपको भी किसी ने फोन करके कहा हो कि अगर आप देशभक्त हैं तो पहली फुरसत में जाकर कश्मीर फाइल्स देख आओ.

देश में इन दिनों बड़े जोर-शोर से यहीं  तमाशा चल रहा है. कुछ लोग थोक भाव में फिल्म की टिकट खरीद रहे हैं और उसे फ्री में बांट रहे हैं. हॉल पर हॉल बुक कर रहे हैं और फिल्म दिखवा रहे हैं. अगर आप मना करते हैं तो आपसे कहा जा रहा है कि आप टिकट रिश्तेदार या पड़ोसी को दे दीजिए.

आखिर कौन हैं वे लोग जो हमें जबरिया फिल्म दिखाने पर आमादा हैं? आप थोड़ी सी छानबीन करेंगे या इनकी फेसबुक प्रोफाइल खंगालेंगे तो इनके चेहरे सामने आ जाएंगे.

आप पाएंगे कि कोई बजरंग दल से जुड़ा है तो कोई विद्यार्थी परिषद से.कोई भाजपा का नेता हैं तो कोई संघ परिवार का सदस्य है. कोई संघ परिवार से संबद्ध नहीं भी हैं तो वह ऊंची जाति का जीव यानी प्राणी हैं.

ये लोग झुंड बना कर उत्तेजक और भड़काऊ नारे लगाते हुए सनीमा देखने जा रहे हैं. फिल्म के पोस्टर और टॉकीज के सामने भगवा गमछा ओढ़कर सेल्फी ले रहे हैं. हॉल के अंदर संघ की प्रार्थना-नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे गा रहे हैं और उसका वीडियो बनाकर यू् ट्यूब- फेसबुक पर शेयर करते हुए लिख रहे हैं- जान लो जेहादियों... फलांने-ढिकांने भैय्या की वजह से पूरी टॉकीज बुक हुई हैं.दाढ़ी वालों अब तुम्हारी खैर...नहीं...। ये फिल्म नहीं ताबूत हैं... आदि-आदि.

मैंने पहले भी लिखा था. फिर से वहीं बात दोहारा रहा हूं कि कश्मीर फाइल्स निहायत ही गंदे मकसद से बनाई गई दो कौड़ी की फिल्म हैं.

यह फिल्म युद्ध के उदघोष की तरह जय-जय श्रीराम का नारा लगाकर रोजी-रोटी चलाने वाले लंपट समुदाय की भावनाओं को आसन्न चुनाव में भुनाने और उनकी दोयम दर्जे की ऊर्जा का उपयोग करने के मकसद से ही बनाई गई हैं. फिल्म का खुला और भीतरी स्वर यहीं हैं कि मुसलमान कौम हत्यारी हैं और हर मुसलमान गद्दार हैं. यह फिल्म मुसलमानों के प्रति नफरत का भाव पैदा करती हैं तो सवर्णों के प्रति सहानुभूति.

लेकिन फिल्मकार ने सवर्ण समुदाय को सहानुभूति दिलाने के चक्कर में उन्हें भी दया और घृणा का पात्र बना दिया है. लोग-बाग सोशल मीडिया में सवर्ण समुदाय को जमकर गरिया रहे हैं. यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या देश में सिर्फ़ पंड़ित ही रहते हैं ? क्या देश में शोषित-पीड़ित दलित आदिवासियों का कोई वजूद नहीं हैं ? जो पंड़ित नहीं है क्या वह इंसान नहीं है?

वैसे इस बीच एक अच्छी बात यह हुई कि देश के पढ़े- लिखे और समझदार लोगों ने समीक्षा लिख- लिखकर फिल्म की बैंड बजा दी हैं. हालांकि अभी भी देश के नामचीन बुद्धिजीवियों और लेखकों की टिप्पणियां आनी बाकी हैं.तथापि जितने लोगों ने भी फिल्म के कंटेंट को लेकर धुलाई अभियान जारी रखा है वह काबिले तारीफ हैं.देश की अमनपसंद जनता के अलावा कश्मीर के बाशिंदों ने भी अपने प्रतिवाद से यह जाहिर कर दिया है कि कश्मीर फाइल्स आधे- अधूरे सच के साथ बनाई गई एक कचरा फिल्म के अलावा और कुछ नहीं है.

फिल्म को देखकर या समीक्षाओं को पढ़कर लोग पूरी शिद्दत से यह सवाल भी उठा रहे हैं कि भक्तों... अब तो आठ साल से केंद्र में मोदी की सरकार है. कम से कम अब तो कश्मीरियों का पुर्नवास कर दो ? इस बीच फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का दो- एक मजेदार इंटरव्यू भी वायरल हुआ है. एक पत्रकार ने यह पूछा कि आपकी फिल्म ने करोड़ों कमा लिए... क्या आप कश्मीरी पंड़ितों के पुर्नवास के लिए कुछ करेंगे ? विवेक अग्निहोत्री ने आंखें चुराते हुए उत्तर दिया हैं-आपको गलतफहमी हैं कि फिल्म कमा रही हैं.जब कमाएगी तब देखेंगे. एक राज्य में कोई भक्त फ्री में फिल्म दिखवा रहा था तो अग्निहोत्री को कहना पड़ा- खुले में फिल्म दिखवाना अपराध है. लोग पैसे देकर फिल्म को देखें.

देश के भाजपा शासित राज्यों ने फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया है. टैक्स फ्री-टैक्स फ्री की चिल्लो-पौ पर किसी ने सोशल मीडिया में यह सुझाव भी दिया है कि अगर विवेक अग्निहोत्री सही मायनों में देशभक्त हैं तो उन्हें अपनी फिल्म को यू ट्यूब में डाल देना चाहिए.

फिल्म को देखने के बाद लोग प्रधानमंत्री की क्षमता को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं.

सवाल यहीं है कि क्या देश का प्रधानमंत्री इतना कमजोर हैं कि उसे चुनाव जीतने के लिए एक अविवेकी फिल्मकार के चरणों में शरण लेनी पड़ रही हैं ?

राजकुमार सोनी
9826895207 


क्या हम एक-दूसरे को चाकू घोंपने के लिए तैयार बैठे हैं ?

क्या हम एक-दूसरे को चाकू घोंपने के लिए तैयार बैठे हैं ?

24-Mar-2022

क्या हम एक-दूसरे को चाकू घोंपने के लिए तैयार बैठे हैं ?

एक के हाथ में त्रिशूल हैं.दूसरे ने भाला थाम रखा है. किसी तीसरे के पास जंग लगी कटार हैं.चौथा शख्स बटन चाकू लेकर घूम रहा है.एक ने तो जाफरानी के खाली डिब्बे में बारूद को ठूंस-ठूंसकर भर लिया है. जाने कब कहीं पटकना पड़ जाय ? एक ने लाठी को तेल पीला दिया है तो किसी ने हॉकी स्टिक उठा रखी हैं. एक शख्स जेब में मिर्ची पावडर की पुड़िया लेकर घूम रहा है ? कोई हमला करेगा तो आंखों में मिर्ची झोंक दूंगा.  एक के पास तो देसी तमंचा हैं तो एक ने रिवाल्वर के लिए कलेक्टर कार्यालय में आवेदन लगा रखा है.

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा हमारे मुल्क के किस हिस्से में हो रहा है ?कहां हो रहा है ? कहीं ये सब दृश्य फिल्म मेरे अपने या अंकुश के तो नहीं है ? क्या यह सब दृश्य कल्पना की उपज हैं ?

लेकिन पता नहीं क्यों जितने लोगों से बात करता हूं तो लगता कि ऐसा देश के हर हिस्से में हो रहा है ? हर घर में हो रहा है ? क्या सचमुच इस देश की एक बड़ी आबादी ऐसे संभावित दृश्यों के बारे में सोच रही हैं ?

देश के वर्तमान निजाम की बांटों- छांटो और काटो वाली राजनीतिक सोच ने हम सबके हाथों में जाने-अनजाने में ही सही हथियारों का जखीरा थमा दिया है.जो मूढ़ बुद्धि के हैं वे कह सकते हैं कि कहां हैं हथियार... किधर हैं हथियार? 

क्या मैं बकवास कर रहा हूं ?

मैं जरा भी बकवास नहीं कर रहा हूं. जरा अपने आसपास देखिए... आप हर रोज़ कितने लोगों से लड़ रहे हैं ? आप लड़ना नहीं चाहते तो वे लोग  आपसे लड़ने आ जाते हैं. अगर आपने कश्मीर फाइल्स नहीं देखी तो आपको देशद्रोही कहा जा रहा है. अब कोई लंपट और गदहे का बच्चा आपको देशद्रोही कहेगा तो क्या आपको गुस्सा नहीं आएगा ? आपको गुस्सा आता है और आप अलबर्ट पिंटो की तरह सामने वाले पर पिल पड़ते हैं.

लंपट समुदाय के लोग सुबह होते ही इस बात की चर्चा ( लड़ने ) करने लगते हैं कि देश का हर मुसलमान गद्दार है. इस कौम से नफरत करनी चाहिए. इस कौम को नेस्तनाबूद कर देना है. आप संवेदनशील हैं.अच्छे मनुष्य की श्रेणी में आते हैं तो आप कूद पड़ते हैं.आप कहते हैं-नहीं ऐसा नहीं हैं. देश की आज़ादी में मुसलमानों का बड़ा योगदान है.गद्दार तो वे लोग हैं जो अंग्रेजों से माफी मांग रहे थे. तर्क चलता है. कुतर्क चलता है. बात इतनी ज्यादा आगे बढ़ जाती हैं कि आपको कहना पड़ता है- जब यह देश पूरी तरह से बरबाद हो जाएगा तब तुमको समझ में आएगा. उधर से आवाज़ आती हैं- आप जैसे विभीषण और जयचंदों की वजह से हम हिन्दू राष्ट्र नहीं बना पा रहे हैं ?

गाली-गलौच होने लगती हैं. मां की गाली.बहन की गाली. अबे जा साले....अबे तू जा...

जानता हूं तेरी औकात क्या है ? 
दो कौड़ी के आदमी तू...मुझे औकात मत बता. हम सेक्यूलरों के पिछवाड़े में भाला डाल देंगे. अबे...तू क्या भाला डालेगा साले...मेरा भाई डिफेंस में हैं. मेरा भाई कर्नल है. तेरे पिछवाड़े में तो एक ही गोली काफी है.

आप कहते हैं-बेटा जल्द ही समझ जाओगे. वे कहते हैं- हम तुमको समझा देंगे.इस देश में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा. 

चल वंदे मातरम बोलकर बता ? 
तू जय-जय श्रीराम बोल के दिखा.

मैं क्यों बोलूं ?
मैं भी क्यों बोलूं ?

साले...रहोगे गोबरभक्त ही.
और तुम पप्पू के चमचे रहोगे

जा गौमूत्र पी
जा पप्पू मूत्र पी

फिर गाली और गलौच
बम-बारूद
चाकू और भाला
दिखा देंगे... सीखा देंगे...बता देंगे.

यहूदी... नाजी...जेनोसाइड..नरसंहार... फासिस्ट.. गद्दार... विभीषण... जयचंद... 

ना जाने कितने शब्द हवा में तैर रहे हैं ?

दोस्तों...एक युद्ध छिड़ चुका हैं.

सवाल यह है कि यह युद्ध कब तक चलेगा ? 

जवाब यह हैं कि जब तक देश का एक-एक नागरिक नहीं समझेगा कि  निज़ाम ने हमारे हाथों में हथियार थमाकर हमें आपस में ही युद्ध करने के लिए झोंक दिया गया हैं तब तक तो युद्ध चलता रहेगा.

क्या हमें लड़ना बंद कर देना चाहिए ? 

विचारधारा के सही होने ? अच्छे और बुरे होने की लड़ाई सदियों से जारी है.

पहले इस लड़ाई में एक खराब काम का जवाब अच्छे काम से दिया जाता था.. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

दोस्तों...लड़ाई तो जारी रहने वाली हैं.

क्या यह नहीं हो सकता कि हम निज़ाम की कठपुतली बनकर लड़ना बंद कर दें ? ऐसा हो तो सकता है... लेकिन वे ऐसा होने नहीं देंगे. कभी कश्मीर फाइल ले आएंगे तो कभी कोई दूसरी फाइल ? 

अगर युद्ध चल भी रहा है तो भी मैं होली पर गुलाल का टीका लगाना. गुजिया खाना...दीवाली पर फटाखे फोड़ना. ईद पर गले मिलना...क्रिसमस पर केक खाना और प्रकाश पर्व पर सड़क किनारे खड़े होकर गुलाबी रंग का मीठा शरबत पीना नहीं भूल सकता ?

आप भूल सकते हैं क्या ?

राजकुमार सोनी
9826895207


मोदी जी कश्मीरी पंडितों के आंसू हर्गिज़ सूखने नहीं देंगे!

मोदी जी कश्मीरी पंडितों के आंसू हर्गिज़ सूखने नहीं देंगे!

24-Mar-2022

मोदी जी कश्मीरी पंडितों के आंसू हर्गिज़ सूखने नहीं देंगे!

*(व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)*

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ये जो मोदी जी के विरोधी हर चीज में गांधी जी को घुसा देते हैं, ये बात बिल्कुल भी ठीक नहीं है। अब बताइए, कहां कश्मीर फाइल्स को देखकर और उससे भी ज्यादा बिना देखे बह रहे आंसू और कहां गांधी जी- क्या कोई कनेक्शन है! पर मोदी जी ने अग्निहोत्री जी की फिल्म के प्रमोशन पर जरा सा यह क्या कह दिया कि फिल्मों के लाने से ही सच सामने आता है, भाई लोगों ने उसमें भी गांधी जी की लाठी अड़ा दी। पीएम जी ने इतना भर कहा था कि जब एटनबरो ने फिल्म बनायी, तब दुनिया गांधी को जान पायी, वैसे ही कश्मीर फाइल्स ने दिखाई, तब कश्मीरी पंडितों के दु:ख-दर्द को दुनिया जान पायी, पर पटठों  ने सरासर फेक न्यूज चला दी कि मोदी जी ने कहा है कि एटनबरो की फिल्म से पहले दुनिया गांधी जी को जानती ही नहीं थी!

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बस फिर क्या था, मोदी-शत्रु इसी को ले उड़े। कोई 1930 से टाइम्स के कवर पर गांधी जी की तस्वीर दिखा रहा है, तो कोई 1980 के दशक में रिचर्ड एटनबरो की फिल्म से पहले दुनिया भर में लगी गांधी की मूर्तियां गिना रहा है, और कोई दुनिया भर में गांधी के नाम पर जारी डाक टिकट दिखा रहा है। कोई आइन्स्टीन से लेकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर तथा मंडेला तक के मुंह से गांधी को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा कहलवा रहा है। और तो और, जैसाकि टूलकिट में लिखा है, इसमें भी भाई लोगों ने गोडसे जी को बदनाम करने का मौका निकाल ही लिया और इसका शोर मचा दिया कि पीएम जी गांधी हत्या के अगले दिन के दुनिया भर के अखबारों के मुखपृष्ठ पर ही नजर डाल लेेते, तब उन्हें पता चल जाता कि एटनबरो की फिल्म से तीन दशक पहले, दुनिया गांधी को कितना जानती थी या नहीं जानती थी! पर कश्मीर फाइल्स के आंसू तो कश्मीरी पंडितों के लिए हैं, मोदी जी के गांधी इतिहास पर बहस खड़ी कर के, उन आंसुओं की तरफ से ध्यान हटाने की कोशिश क्यों की जा रही है? ध्यान बंटाने के संघ परिवार के पेटेंट अधिकार में ऐसी खुली चोरी!

पर भाई लोग गांधी जी वाली फेक न्यूज पर ही कहां रुके हैं? इसके साथ ही उन्होंने यह फेक न्यूज भी चलाने की कोशिश की है कि कश्मीर फाइल्स आई, तब मोदी जी को कश्मीरी पंडितों की याद आयी। इसी फेक न्यूज के एक और रूप में तो यह तक कहा जा रहा था कि फिल्म ने दिखाई, तभी कहीं जाकर कश्मीरी पंडितों की तकलीफ मोदी जी तक पहुंच पायी! इस फेक न्यूज को लेकर उड़ने की कोशिश भले ही खास कामयाब नहीं हो रही हो, फिर भी विरोधियों ने इसका काफी शोर तो मचा ही दिया है कि 1990 मेें कश्मीरी पंडितों का जब घाटी से पलायन हुआ, तब देश में किस की सरकार थी, उस सरकार को कौन समर्थन देकर चलवा रहा था, जम्मू-कश्मीर में किस का राज था, जगमोहन ने क्या किया था, तब मोदी जी की पार्टी ने कश्मीरी पंडितों का मसला क्यों नहीं उठाया, मोदी जी ने सारथी बनकर अडवाणी जी का राम-रथ अयोध्या की तरफ ही क्यों हांका और उसके रोके जाने पर ही वी पी सिंह की सरकार को क्यों गिराया गया, कश्मीरी पंडितों के मसले पर नहीं, वगैरह-वगैरह! और तो और हिमाकत यह कि यह तक कह रहे हैं कि आठ साल में मोदी सरकार ने ही कश्मीरी पंडितों को क्या दे दिया? मान लो कि तीन साल महबूबा की सरकार चलवाने में निकल गए, तब भी पांच साल तो बचते थे, उनमें ही क्या किया? और नहीं तो तीन साल से तो डाइरेक्ट दिल्ली से राज चल रहा है, उसमें ही क्या किया, फिल्म के ज्ञान के इंतजार के सिवा। और सच पूछिए तो अब भी क्या कर रहे हैं, एक सांप्रदायिक फिल्म के प्रमोशन और कश्मीरी पंडितों के आंसुओं की अपने फायदे के लिए राजनीतिक तिजारत के सिवा, वगैरह-वगैरह!

पर ये सब गलत है। ये विरोधियों की बहानेबाजी है। ये अब भी कश्मीरी पंडितों के आंसुओं को सामने नहीं आने देना चाहते हैं। पर मोदी जी ऐसा हर्गिज नहीं होने देंगे। मोदी जी कश्मीरी पंडितों के आंसुओं को हर्गिज-हर्गिज सूखने नहीं देंगे। छुपाने नहीं देंगे। बल्कि मोदी जी कश्मीरी पंडितों के आंसुओं के कतरों को इकठ्ठा कर-कर के दरिया और समंदर न सही, कम से कम एक बड़ा सा तालाब तो बनवा ही देंगे। तालाब के किनारे आदि पंडित, मनु महाराज की विश्व की विशालतम मूर्ति भी बनवा देेंगे। मनु महाराज की मूर्ति को केंद्र में रखकर, कश्मीरी पंडितों के पलायन का एक आधुनिक स्मारक भी बनवा देंगे और उसमें पलायन का लाइट एंड शो करा देंगे, ताकि दुनिया कश्मीरी पंडितों के आंसुओं को भुला नहीं पाए और कश्मीर देखने आने वाले दुनिया का हरेक पर्यटक, कश्मीरी पंडित स्मारक देखने जरूर जाए। बल्कि कश्मीरी पंडित स्मारक ही टूरिस्टों का मुख्य आकर्षण बन जाए।

और हां, कश्मीर पंडितों के आंसुओं की याद दिलाने में विशेष योगदान के लिए मोदी जी, कश्मीरी पंडितों के आंसू दिखाने वाली हरेक फिल्म का देश भर में टैक्स माफ करा देेंगे और भगवा शासित राज्यों में सरकारी कर्मचारियों को आधे दिन की और स्कूली बच्चों को पूरे दिन की छुट्टी दिलवाकर, कम्पल्सरी कर के ऐसी हरेक फिल्म मुफ्त दिखवाएंगे। और जाहिर है कि कश्मीर फाइल्स ही अगले ऑस्कर में भारत की एंट्री होगी और इस बार सारे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उसी के हिस्से में रहेंगे, विलेन वाले पुरस्कार के सिवा। संक्षेप में यह कि मोदी जी वह सब करेंगे जो किसी उत्पीडित समुदाय के आंसुओं से द्रवित होकर, अब तक भारत ही क्या सारी दुनिया में और किसी शासक ने नहीं किया होगा, उनके उत्पीड़न के कारणों का उन्मूलन करने के सिवाए।

प्लीज! अब कोई यह कहकर कन्फ्यूजन फैलाने की कोशिश नहीं करे कि कश्मीरी पंडित इसलिए उत्पीडि़त हुए हैं और हैं, क्योंकि पूरा कश्मीर ही उत्पीडि़त है। बाहरी उत्पीड़न को शिकस्त नहीं दे पाए, तो उत्पीडि़तों के एक छोटे से हिस्से ने, एक और भी कमजोर हिस्से पर अपनी हार की खिसियाहट निकाल ली कि इन उत्पीडि़तों के आंसू तो इन उत्पीडि़तों को ही एक-दूसरे के खिलाफ भडक़ाने से नहीं, साझा उत्पीड़न के खिलाफ सब को एकजुट करने और मुक्ति दिलाने से सूखेंगे।

लेकिन, कश्मीरी पंडितों के आंसुओं को सुखाना ही कौन चाहता है। उल्टे सरकार कश्मीरी पंडितों के आंसुओं को सुरक्षित रखने, बल्कि उनका प्रवाह गंगा की तरह अविरल बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। वह न कश्मीरी पंडितों को 1990 की अपनी त्रासदी भूलने देगी और न पंजाबी-सिंधी-बंगाली हिंदुओं को 1947 की त्रासदी। वह चुनाव-दर-चुनाव ऐसी सभी त्रासदियों की याद दिलाती रहेगी और चुनाव के जरिए सरकार बनाती रहेगी। और इसी में राष्ट्रहित है, यह साबित कर के भी दिखाती रहेगी- देखा नहीं कैसे अडानी जी और अंबानी जी को एशिया का धनपति नंबर वन और धनपति नंबर टू बनवाया है। अब इंडिया का वर्ल्ड नंबर वन होना भी दूर नहीं है।                                             

*(राजेन्द्र शर्मा वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)* 
यह लेखक के अपने विचार है 


अमेरिका ने माना है की रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध हुए हैं: रिपोर्ट

अमेरिका ने माना है की रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध हुए हैं: रिपोर्ट

22-Mar-2022

संयुक्त राज्य अमेरिका ने औपचारिक रूप से निर्धारित किया है कि म्यांमार की सेना ने रखाइन राज्य में जातीय रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध किए हैं।

 म्यांमार में बर्मी सेना ने  रोहिंग्या  के साथ नरसंहार और मानवता के खिलाफ नरसंहार किए हैं,” अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने वाशिंगटन, डीसी में यूएस होलोकॉस्ट मेमोरियल संग्रहालय में एक भाषण में घोषणा की।

“प्रलय के बाद से केवल सात बार अमेरिका ने निष्कर्ष निकाला है कि नरसंहार किया गया था। आज, प्रलय संग्रहालय में, आठवां अंक है, जैसा कि मैंने निर्धारित किया है कि बर्मी सेना के सदस्यों ने रोहिंग्या के खिलाफ नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध किए हैं, ”ब्लिंकन ने कहा।

तख्तापलट के बाद से, सुरक्षा बलों ने कम से कम 1,600 लोगों को मार डाला है और 12,000 से अधिक को हिरासत में लिया है। 500,000 से अधिक लोगों को आंतरिक रूप से विस्थापित किया गया है और सामूहिक दंड के रूप में जनता जानबूझकर आबादी की सहायता को रोक रही है।

ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने कहा कि देश में शेष रोहिंग्याओं को और भी अधिक आंदोलन प्रतिबंधों और कठोर व्यवहार का सामना करना पड़ा है, जो कि उत्पीड़न, रंगभेद और स्वतंत्रता के गंभीर अभाव की मानवता के खिलाफ अपराधों की राशि है।

एचआरडब्ल्यू में एशिया एडवोकेसी डायरेक्टर जॉन सिफ्टन ने कहा कि अमेरिकी सरकार को म्यांमार की सेना की निंदा को कार्रवाई के साथ जोड़ना चाहिए। “बहुत लंबे समय से, अमेरिका और अन्य देशों ने म्यांमार के जनरलों को कुछ वास्तविक परिणामों के साथ अत्याचार करने की अनुमति दी है।”

एचआरडब्ल्यू के अनुसार, अमेरिकी सरकार को फरवरी 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद से रोहिंग्या के खिलाफ किए गए सामूहिक अपराधों और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों और लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किए गए सामूहिक अपराधों के लिए न्याय का पीछा करने के लिए अन्य देशों के साथ लंबे समय से लंबित कार्रवाई का समन्वय करना चाहिए।

रोहिंग्या के खिलाफ अपराधों के लिए जिम्मेदार उन्हीं सैन्य नेताओं ने देश की चुनी हुई नागरिक सरकार के खिलाफ 1 फरवरी, 2021 को तख्तापलट किया। अधिकार समूह के अनुसार, जुंटा ने तब व्यवस्थित रूप से उन लोगों पर हमला किया जिन्होंने तख्तापलट का विरोध किया, उन्हें सामूहिक हत्याओं, यातनाओं और मनमाने ढंग से हिरासत में लिया, जो मानवता के खिलाफ अपराधों की राशि थी।

एचआरडब्ल्यू ने कहा कि अमेरिका और अन्य सरकारों को रोहिंग्या के खिलाफ सैन्य अपराधों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों और जातीय समूहों के खिलाफ दुर्व्यवहार के लिए न्याय की मांग करनी चाहिए और सैन्य नेतृत्व के खिलाफ मजबूत आर्थिक उपाय लागू करने चाहिए।

 


सुंदरता का पता नहीं, लेकिन अच्छे दिन देखने वाले की आंखों में बसते हैं

सुंदरता का पता नहीं, लेकिन अच्छे दिन देखने वाले की आंखों में बसते हैं

19-Mar-2022

सुंदरता का पता नहीं, लेकिन अच्छे दिन देखने वाले की आंखों में बसते हैं

(व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)

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इंडिया यहीं तो मार खा जाता है। माना कि आठ साल पहले मोदी जी ने अच्छे दिन लाने का प्रॉमिस किया था, जरूर किया था। लेकिन, उसके बाद आठ साल में मोदी जी ने पब्लिक को क्या-क्या ऑफर नहीं दिया है। स्वच्छ भारत भी। मेक इन इंडिया भी। न्यू इंडिया भी। स्वस्थ भारत भी। पांच ट्रिलियन वाला इंडिया भी। आत्मनिर्भर भारत भी। दुनिया में पिटते डंके वाला इंडिया भी। और तो और, विश्व गुरु भारत भी। राम और शिव के बाद, कृष्ण की वापसी वाला इंडिया भी। यहां तक कि यूक्रेन में भारतीय छात्रों के दूसरों के झगड़े में फंसने के बाद तो, मैडीकल शिक्षा गुरु भारत भी। मोदी जी ने एक से बेहतर एक चॉइस दी है। पर पट्ठे विपक्ष वाले हैं कि इनकी सुई अच्छे दिनों पर ही अटकी हुई है। और विपक्ष वाले सिर्फ अपनी सुई अच्छे दिनों पर अटकाए रहते तब तो फिर भी गनीमत थी, ये तो पब्लिक की सुई भी वहीं की वहीं अटकाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। न मौका देखते हैं न माहौल, बस किसी भी दिन इसका शोर मचाने लग जाते हैं कि अच्छे दिन कहां हैं? अच्छे दिन कहां रह गए? अच्छे दिन कब तक आएंगे, वगैरह-वगैरह। और तो और, इस बार के चुनाव में पब्लिक ने तो भगवाइयों की होली से हफ्ते भर पहले होली करवा दी, चार के चार राज्यों में दोबारा सरकार बनवा दी, पर कमबख्त विपक्षियों ने ऐसे खुशी के मौके तक का ख्याल नहीं किया। मोदी जी के जिम्मेदारी का एहसास दिलाने तक का ख्याल नहीं किया। यहां तक कि चुनाव नतीजे आने के हफ्ते भर बाद तक जलाने वाले तेल के दाम जस के तस बने रहने का भी ख्याल नहीं किया। प्रोवीडेंट फंड पर ब्याज में जरा सी कटौती की सिफारिश होने की देर थी, लगे वही पुराना राग अलापने कि क्या यही अच्छे दिन हैं? अच्छे दिन कहां हैं? अच्छे दिन कब आएंगे! चुनाव वाले जनादेश की याद दिलाओ, तो बेशर्मी से कहते हैं कि ये तो भगवाइयों के अच्छे दिन हुए। पब्लिक के अच्छे दिन कब आएंगे? बेरोजगारों के भूखों रहने के बाद, अब तो पेंशनयाफ्ता भी एक रोटी कम खाएंगे -- क्या ऐसे ही अच्छे दिन आएंगे!

वैसे अच्छे दिनों की हम नहीं कहते, पर भूख वाली बात सही नहीं है। भूख होती तो योगी जी की लखनऊ की गद्दी पर वापसी होती? सारे देश ने वीडियो देखा था और मोदी जी ने अपनी चुनाव सभाओं में अपनी जुबानी उसका ऑडियो सुनाया था। बूढ़ी अम्मा ने एलानिया बताया था कि वोट तो मोदी को ही देंगे -- “बिन्नै हमें अन्न दओ है। हमने बिनको नमक खाओ है। वोट बिन्हें ई देंगे।” यानी प्रमाणित है कि अन्न दिया गया और वह भी मुफ्त। और सिर्फ पांच किलो अन्न ही कहां? तेल, नमक, दाल भी। सारी दुनिया को दिखाकर दिया। मोदी जी और योगी जी की फोटू वाले थैलों में सजाकर दिया गया। हजारों-लाखों को नहीं, तेईस करोड़ की आबादी में पूरे पंद्रह करोड़ को दिया गया। उनको भी दिया गया, जिन्होंने सब खाने के बाद भी एक मामूली थैंक्यू की डकार तक नहीं ली। फिर भूख कहां? 

पेंशनयाफ्ताओं की थाली में आधी रोटी कम भी हो जाएगी, तो ऐसा क्या गजब हो जाएगा? कम खाएंगे, जल्दी मुक्ति पाएंगे! और प्लीज अब कोई पलट कर यह मत कहने लगिएगा कि ये कैसे अच्छे दिन हुए? तेईस करोड़ में से पंद्रह करोड़ मुफ्त राशन की लाइन में -- क्या यही अच्छे दिन हैं? यह तो भूखे से ही पूछो कि ये अच्छे दिन हुए कि नहीं। भूखा ही जानता है कि पेट में अन्न जाने के दिन से बढ़कर, अच्छा दिन दूसरा नहीं होता है। भूखे को तो अच्छे दिन की छोड़ो, रोटी में स्वर्ग दिखाई देता है और अन्न बांटने वाले में भगवान। और हां इसमें सरकार-वरकार को बिल्कुल नहीं घसीटना चाहिए। पर एक बात समझ में नहीं आयी। एक तरफ तो मोदी जी कह रहे हैं कि यूपी ने 2022 में, उनकी देश में 2024 की जीत पक्की कर दी है और दूसरी तरफ अखबारों में खबर है कि मार्च के बाद से मोदी जी-योगी जी की फोटुओं वाले थैलों का राशन बंद। राशन के पुराने दिन आएंगे, तो मोदी जी 2024 की अपनी जीत पक्की कैसे कराएंगे! नये-नये जुम्लों से पब्लिक को कब तक बहलाएंगे?

हम तो कहेंगे कि चार राज्यों में जीत के इस जश्न में ही मोदी जी, अच्छे दिनों की इस किचकिच का कांटा हमेशा के लिए काट ही क्यों नहीं देते! सिंपल है। अच्छे दिनों का नाम बदल दो। यानी अच्छे दिन का मतलब बदल दो। फिर न पहले वाले अच्छे दिन रहेंगे और न अच्छे दिनों के नहीं आने की किचकिच रहेगी। मोदी जी को बस एक बार छाती ठोककर एलान करने की जरूरत है कि अच्छे दिन तो कब के आ चुके, बस विरोधी ही पब्लिक को देखने नहीं दे रहे हैं। इंडिया में अरबपतियों का दुनिया भर में सबसे तेजी से बढ़ना, यही तो इंडिया के अच्छे दिनों की निशानी है। इसलिए तो करोड़पति सरकार के और सरकार करोड़पतियों की दीवानी है। तेल के दाम के सैकड़ा लगाने में पब्लिक के अच्छे दिनों की कहानी होगी। चैनल-चैनल, भगवान मोदी की कहानी होगी!

उसके बाद भी अगर मोदी जी की 2024 की जीत पक्की होने में कोई कसर रह जाए, तो मिसाइलों के अच्छे दिन किस काम आएंगे? छप्पन इंच जी के प्रताप से, इतनी मिसाइलें जमा हो चुकी हैं कि दीवाली के रॉकेटों वाला हाल है। दो-चार इधर-उधर टहल भी जाएं, तो खास फर्क नहीं पड़ता है। पड़ोसी के घर में जा भी पड़ी तो क्या? वोट पड़ चुके होंगे तो सॉरी बोल देंगे, वोट पड़ने वाले होंगे तो छाती ठोक के कह देेंगे कि उखाड़ा जाए, सो उखाड़ लो! इससे ज्यादा अच्छे दिन क्या होंगे। अच्छे दिन यहां हैं भाई!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)


मुसलमानों को दरकिनार करने के बाद भी हार गए अखिलेश

मुसलमानों को दरकिनार करने के बाद भी हार गए अखिलेश

11-Mar-2022

मुसलमानों को दरकिनार करने के बाद भी हार गए अखिलेश

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

लखनऊ।मुसलमानों को सियासी अछूत बनाने के बाद भी सपा बहुत बुरी तरह हार गए हैं अब इस सवाल का जवाब सपा के सुप्रीमो अखिलेश यादव को देना होगा कि मुसलमान ने सियासी अछूत बनने के बाद भी भरपूर वोट देकर यह साबित किया कि वह कुछ भी अपने लिए नहीं करता है उसका उद्देश्य देश की एकता और अखंडता के लिए होता है अब इसको चाहें किसी भी रूप में लिया जा सकता है।देखा जाए तो हिन्दू वोट में या पिछड़ों वोट में कोई तब्दीली नहीं हुई उसने अपना वोट अधिकांश मोदी की भाजपा को दिया है इसी का परिणाम है कि योगी सरकार को फिर से यूपी की सत्ता संभालने का जनादेश दिया है साथ ही योगी ने कई और रिकॉर्ड बनाए हैं।उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए यह गुरुवार नई इबारत लिखने वाला दिन साबित हुआ।विधानसभा चुनावों की मतगणना के वक्त जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) खोली गईं तो यूपी की सियासत में नई इबारत लिखने और कई मिथक तोड़ने वाले दावे निकले। और यह भी पता चला कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 37 साल बाद भारतीय जनता पार्टी को यूपी की सत्ता पर लगातार दूसरी बार काबिज करने का इतिहास बना दिया है। 37 साल पहले कांग्रेस ने बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्धारित पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करते हुए फिर से भाजपा की सत्ता में वापसी करते हुए पार्टी को ऐतिहासिक तोहफा दिया है। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यूपी में भाजपा के ऐसे पहले नेता हो गए हैं जो लगातार दूसरी बार सीएम बनेंगे।यूपी में ऐसी उपलब्धि डॉ. संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह और मायावती भी हासिल नहीं कर सकीं। यूपी के राजनीतिक इतिहास के अनुसार, प्रदेश में 1951-52 के बाद से अब तक डॉ. संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव और मायावती मुख्यमंत्री बने, लेकिन इन्हें यह मौका दो अलग-अलग विधानसभाओं के लिए मिला। मुलायम सिंह यादव और मायावती दो बार से अधिक बार यूपी की सीएम बनी पर इन नेताओं ने भी वह उपलब्धि हासिल नहीं की जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खाते में दर्ज हो गई है। पूरे देश में इस उपलब्धि को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का डंका बज रहा है।

रिकॉर्ड बनाना योगी की फितरत
दरअसल नम्बर एक पर रहना उनकी फितरत है। करीब ढाई दशक पहले जब वह उत्तर भारत की प्रमुख पीठों में शुमार गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बने तभी वह देश के रसूखदार लोगों में शामिल हैं। इसके बाद से तो उनके नाम रिकार्ड जुड़ते गये। मसलन 1998 में जब वह पहली बार सांसद चुने गये तब वह सबसे कम उम्र के सांसद थे। 42 की उम्र में एक ही क्षेत्र से लगातार 5 बार सांसद बनने का रिकॉर्ड भी उनके ही नाम है। मुख्यमंत्री बनने के पहले सिर्फ 42 वर्ष की आयु में एक ही सीट से लगातार पांच बार चुने जाने वाले वह देश के इकलौते सांसद रहे हैं। चार महीने बाद ही दोबारा वह सिरमौर बने। यकीनन ये सिलसिला जारी रहेगा, क्योंकि इसके लिए वह अथक परिश्रम करते हैं। 

टूट गया नोएडा का मिथक
यूपी की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बने इस इतिहास के साथ ही कई मिथक धराशायी हुए है। प्रदेश की राजनीति में अब तक माना जाता रहा है कि नोएडा जाने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित नहीं रहती है। उसकी सत्ता में वापसी नहीं होती। इस कारण कुछ मुख्यमंत्री तो नोएडा जाने से बचते रहे। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव तो नोएडा जाने से परहेज करते रहे। नोएडा में उद्घाटन या शिलान्यास के कार्यक्रम को लेकर वहां जाने की जरूरत पड़ी, तो अखिलेश यादव ने नोएडा न जाकर अगल-बगल या दिल्ली के किसी स्थान से इस काम को पूरा किया। इसके विपरीत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नोएडा जाने से डरने के बजाय वहां कई बार गए।उन्होंने नोएडा जाने के बाद भी लगातार पांच साल मुख्यमंत्री रहकर और भाजपा को बहुमत से साथ फिर सत्ता में वापसी करते हुए इस मिथक को तोड़ दिया है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर में पूजा करने जाने को लेकर भी नेताओं का मिथक तोडा है। पहले अयोध्या जाकर भी तमाम नेता राम मंदिर जाने से परहेज करते थे। अब हर नेता राम मंदिर में पूजा करने का रहा है। 

यूपी के इतिहास पर नजर डाले तो पता चलता है कि नोएडा का यह मिथक वर्ष 1988 से शुरू हुआ था। वर्ष 1988 में राजनीति में सक्रिय नेता नोएडा जाने से बचने लगे, क्योंकि यह कहा जाने लगा था कि नोएडा जाने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी चली जाती है। तब वीर बहादुर सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे नोएडा गए और संयोग से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई। नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। वे 1989 में नोएडा के सेक्टर-12 में नेहरू पार्क का उद्घाटन करने गए। कुछ समय बाद चुनाव हुए, लेकिन वे कांग्रेस की सरकार में वापसी नहीं करा पाए। इसके बाद कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव के साथ भी ऐसा ही हुआ कि वे नोएडा गए और कुछ दिन बाद संयोग से मुख्यमंत्री पद छिन गया। राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे तो उन्हें नोएडा में निर्मित एक फ्लाई ओवर का उद्घाटन करना था। पर, उन्होंने नोएडा की जगह दिल्ली से उद्घाटन किया। अखिलेश यादव ने भी पांच साल मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा जाने से परहेज किया। जिसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। वह पांच वर्षों के कई बार नोएडा गए और उन्होंने ने नोएडा को कई सौगतें दी। इसके साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह साबित किया है कि जनता के दुख दर्द का निदान करने का जो सरकार कार्य करती है, वह फिर सत्ता में आती है। और यह उपलब्धि ऐसे ही नहीं हासिल हुई है, इसके लिए मुख्यमंत्री ने दो सौ से ज्यादा जनसभाएं और रोड शो किए। एक दिन में सात सात जनसभाएं की।कुल मिलाकर प्रदेश में भाजपा का विरोध दिख ज़्यादा रहा था असलियत में उतना था नहीं।लेखक वरिष्ठ पत्रकार और


आपदा में अवसर' का भौंडा तमाशा

आपदा में अवसर' का भौंडा तमाशा

09-Mar-2022

आपदा में अवसर' का भौंडा तमाशा

*(आलेख : राजेंद्र शर्मा)*

कोविड की महामारी के संकट के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने 'आपदा में अवसर' खोजने-बनाने का जो आह्वान किया था, उसके पूरे अर्थ अभी खुल ही रहे हैं। फिर भी यूक्रेन-रूस युद्घ के बीच फंस गए करीब बीस हजार भारतीयों को, जिनमें से अधिकांश खारकीव, कीव, सुमी आदि यूक्रेन के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में मेडीकल व अन्य विषयों के छात्र हैं, सुरक्षित निकालकर स्वदेश लाने के संकट को, मोदी सरकार ने जिस तरह सीधे-सीधे अपने दलगत व निजी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का औजार बनाया है, उसने ''आपदा में अवसर'' का नया ही अर्थ खोल दिया है।

बेशक, कोविड आपदा की ही तरह, यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों की इस आपदा को अवसर में बदलने का यह खेल, देश के शासन के नाते इस संकट को संभालने में मोदी निजाम से जो कुछ करने की सामान्यत: अपेक्षा की जाती थी, उसे करने में इस सरकार की घोर विफलता को ढांपने के लिए भी है। यह दूसरी बात है कि अंतत: इन छात्रों की घर वापसी को भी एक भोंडे तमाशे में तब्दील करने और इसके लिए अपने मंंत्रिमंडलीय सहयोगियों से लेकर सैन्य उच्चाधिकारियों तक को, वापस आते छात्रों का फूल देकर तथा उनसे प्रधानमंत्री के जैकारे लगवा कर स्वागत करने के लिए तैनात करने में अपना पूरा जोर लगाने के बावजूद, मोदी सरकार अपने कथित ऑपरेशन गंगा के, युद्घग्रस्त क्षेत्र से भारतीयों के ''इवैकुएशन'' यानी बचाकर निकाले जाने का ऑपरेशन होने पर ही ज्यादा से ज्यादा मुखर होते सवालों को दबा नहीं पाई है।

अचरज नहीं कि इस कथित बचाव ऑपरेशन के तहत स्वदेश पहुंचे बच्चों ने, मंत्रियों आदि के सारे कोंचने के बावजूद, मोदी का जैकारा लगाने के प्रति स्पष्ट अनिच्छा ही नहीं दिखाई है, उनमें से अनेक ने स्पष्ट रूप से यह भी पूछा है कि जब उन्हें खारकीव तथा कीव आदि से, पश्चिम की ओर पड़ते यक्रूेन के पड़ोसी देशों की सीमाओं तक अपने ही उपायों से पहुंचने के लिए छोड़ दिया गया था, तो इसे रैस्क्यू किस तर्क से कहा जा रहा है। सीमा पार कर पोलैंड, हंगरी, रूमानिया आदि की सीमाओं में पहुंच जाने के बाद, विमान से भारत तक तो वे व्यापारिक उड़ानों के जरिए भी आ सकते थे! और तो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अंतिम चरण के चुनाव के लिए वाराणसी में अपने प्रवास के दौरान, जब यूक्रेन से लौटे बनारस केे तथा उत्तर प्रदेश में अन्य स्थानों के छात्रों को मुलाकात करने के लिए बुलाया, अपने सामान्य तरीके के विपरीत उन्हें भी यह स्वीकार करना पड़ा कि यूक्रेन में फंस गए छात्रों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उनकी वजह से कुछ छात्रों ने नाराजगी जताई है और मोदी तक से नाराजगी जताई है! उनकी नाराजगी को समझा जा सकता है। हालांकि, इसके साथ ही प्रधानमंत्री यह जोड़ना नहीं भूले कि बाद में जब उनका गुस्सा ठंडा हो जाएगा और उनकी भी समझ में आ जाएगा कि सरकार ने कितना बड़ा काम किया है, तो वे भी सरकार की सराहना करेंगे।

कहने की जरूरत नहीं है कि अंतत: स्वदेश पहुंचने वाले बच्चों का विमान से उतरने से पहले मंत्रियों को भेजकर स्वागत कराने से लेकर, सरकारी खर्च पर उन्हें फौजी विमानों समेत, विभिन्न निजी विमान सेवाओं से स्वदेश वापस लाने और चार केंद्रीय मंत्रियों को इन छात्रों का निकलना सुगम करने के लिए यूक्रेन से लगती सीमाओं वाले देशों में भेजने तथा विमान सेवाओं के फेरे उल्लेखनीय ढंग से बढ़ाने की जो सक्रियता बाद में दिखाई गई है, उसमें युद्घरत देश में फंसे नागरिकों को सुरक्षित निकालने की गंभीर कोशिश कम लगती है और समय पर जरूरी सक्रियता दिखाने में भारी चूक पर, पर्दा डालने के लिए नाटकबाजी ही ज्यादा नजर आती है।

यह नरेंद्र मोदी का अपने शासन की बड़ी विफलताओं को ढांपने का सामान्य तरीका ही है। यह सरकार कमजोरी को पहचान कर तथा किसी न किसी तरह स्वीकार कर, उसे दूर करने में जुटने की जगह, हैडलाइन मैनेजमेंट के जरिए, इन कमजोरियों से हुई लोगों की वास्तविक तकलीफों को ढांपने बल्कि नकारने में ही विशेष सक्रियता दिखाती है। कोविड की पहली लहर के दौरान, अचानक पूर्ण लॉकडाउन के जरिए पूरे देश को बंद कर देने के जरिए तथा दूसरी लहर के दौरान, आक्सीजन, बैडों व दवाओं की भारी तंगी और मौतों की बहुत भारी संख्या को नकारने के जरिए ठीक यही किया गया था और अब यूक्रेन में भारतीय छात्रों के संकट के दौरान भी, यही किया जा रहा है।

याद रहे कि पहली बार, 15 फरवरी को ही यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास ने यह एडवाइजरी जारी की थी कि हालात को देखते हुए जिन छात्रों का रुका रहना आवश्यक या इसेंसियल नहीं है, वे यूक्रेन छोड़ने पर विचार कर सकते हैं। एडवाइजरी में पर्याप्त अर्जेंसी न दिखाए जाने के बाद भी, अगले ही दिन तक दूतावास के संज्ञान में आ चुका था कि जो भी फ्लाइटें हैं, पूरी बुक हो चुकी हैं और सीधी फ्लाइट सिर्फ एक है और वह भी हर रोज नहीं है और इस स्थिति में निकलना चाह रहे छात्रों के लिए भी निकलना मुश्किल है। इसके बाद,18 फरवरी को ही एअर इंडिया की तीन विशेष उड़ानों का ऐलान किया गया और वह भी क्रमश: 22, 24 तथा 26 फरवरी के लिए। जाहिर है कि कीव से लेकर दिल्ली तक, यूक्रेन से निकलने की बहुत अर्जेंसी महसूस नहीं की जा रही थी। ये उड़ानें भी फौरन ही पूरी बुक हो गईं।

छात्र एक ओर और ज्यादा उड़ानों का अनुरोध कर रहे थे, तो दूसरी ओर बहुत से छात्र इस पर निराशा जता रहे थे कि इन उड़ानों में टिकट तीन गुना कर के 60 हजार रुपए कर दिया गया था, जोकि अनेक छात्रों के लिए बहुत ज्यादा था। इसके बाद 20 फरवरी को दूसरी एडवाइजरी में आमतौर पर सभी छात्रों को निकल जाने की सलाह दी गई और 22 फरवरी को तीसरी एडवाइजरी में शिक्षा संस्थाओं के अनुमोदन का इंतजार न कर के निकल जाने की। इसी रोज एअर इंडिया की पहली उड़ान 242 भारतीयों को लेकर निकली। इसी बीच 25 और 27 फरवरी के लिए एअरइंडिया की तीन और उड़ानों की घोषणा हो चुकी थी। लेकिन, 24 फरवरी को यूक्रेन की एअरस्पेस बंद कर दिए जाने से एअरइंडिया की उड़ान को दिल्ली वापस लौट आना पड़ा और यूक्रेन से उड़ानों के निकलने का सिलसिला रुक गया। और रूस का हमला शुरू होने के बाद कीव, खारकीव, सुमी आदि में भारतीय छात्रों को, अपने साधनों से विभिन्न बार्डरों तक पहुंचने की सलाह देकर छोड़ दिया गया।

इन छात्रों को निकालकर सीमाओं तक पहुंचाने का कोई व्यवस्थित प्रयास किया जाना तो दूर, किसी प्रकार सीमाओं तक पहुंचने वालों को मदद मुहैया कराने की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि पहले कई दिन, थके-हारे, भूखे-प्यासे, सीमा तक पहुंचे भारतीय छात्रों को शून्य से कम तापमान में, दो-दो रात खुले आसमान के नीचे रुकना पड़ा और भारतीय अधिकारियों की अनुपस्थिति के चलते, नस्ली भेदभाव से लेकर यूक्रेनियाइयों की खिसियाहट भरी नाराजगी तक का भी सामना करना पड़ा। हजारों छात्रों की तकलीफों के वीडियो वाइरल होने के बाद और दूसरी ओर, पहले कीव तथा फिर खारकीव में शाम तक किसी भी तरह शहर छोड़कर निकल जाने की भारतीय दूतावास की एडवाइजरी आने तथा कीव में दूतावास बंद कर दिए जाने के बाद ही, दिल्ली में बैठी सरकार की सक्रियता, प्रधानमंत्री द्वारा उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के बीच-बीच में ली जा रहीं उच्चस्तरीय बैठकों से आगे, मंंत्रियों को यूक्रेन के सीमावर्ती देशों में भेजे जाने तथा वहां से अतिरिक्त उड़ानों की व्यवस्था किए जाने की ओर, आगे बढ़ी।

लेकिन, इस सिलसिले की पहली विशेष उड़ान के भारत पहुंचने तक ही, प्रधानमंत्री मोदी उत्तर प्रदेश में अपने चुनाव प्रचार में भारतीयों को निकालकर स्वदेश वापस लाने के अपने 'कारनामे' को भुनाने की कोशिश शुरू कर चुके थे। 2 मार्च को सोनभद्र में अपनी चुनाव सभा में प्रधानमंत्री ने न सिर्फ इसका दावा किया कि भारत 'यूक्रेन से अपने नागरिकों को बचाकर निकालने में कामयाब' रहा है, जबकि वास्तव में इसकी शुरूआत भर हो पाई थी, उन्होंने इस कामयाबी के लिए यह कहकर खुद अपनी पीठ भी ठोक ली कि यह 'भारत की बढ़ती ताकत का ही नतीजा है', जो कि जाहिर है कि मोदी का ही कारनामा है!

वैसे मोदी के उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में यूक्रेन की एंट्री तो चौथे दौर के चुनाव प्रचार से ही हो गई थी, जब यूक्रेन पर युद्घ के बादल घिरने लगे थे। लेकिन, तब तक प्रधानमंत्री युद्घ की आशंकाओं का इस्तेमाल, उत्तर प्रदेश में अपने और योगी के 'मजबूत' प्रशासन के जरूरी होने की दलील के तौर पर ही करने की कोशिश कर रहे थे। अब वे 'भारत की बढ़ी हुई ताकत' के श्रेय का दावा करने तक पहुंच गए हैं और 'नागरिकों को बचाकर निकालने' की कामयाबी की नुमाइश के नीचे, हजारों भारतीय छात्रों की उन वास्तविक तकलीफों को दफ्न ही कर देना चाहते हैं, जो बेशक युद्घ के हालात के चलते पैदा हुई हैं, लेकिन जिन्हें बढ़ाने में हमारी मौजूदा सरकार की विफलताओं का भी खासा भारी योगदान रहा है। जबकि पहले भी विभिन्न सरकारों ने, इससे कई-कई गुना बड़े पैमाने पर और बिना-किसी शोर-शराबे के, अपना न्यूनतम कर्तव्य मानते हुए यही जिम्मेदारी पूरी की है।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)* 


महिलाओ के कानूनी अधिकारों की जानकारी

महिलाओ के कानूनी अधिकारों की जानकारी

07-Mar-2022

महिलाओ के कानूनी अधिकारों की जानकारी 

महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष 

निकट के किसी भी थाने में शून्य में कर सकते है FIR 

बलात्कार पीड़ित महिला किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर दर्ज करा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार कोई भी पुलिस स्टेशन महिला से यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकता है कि ये मामला हमारे इलाके में नहीं आता है। मामला किसी भी सीमा का क्यों न हो पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी ही होगी।

पुलिस थाने में महिला को हाज़िर होने की बाध्यता नहीं 

हर केस में देखा गया है कि पूछताछ के लिए व्यक्ति को पुलिस स्टेशन जाना पड़ता है। पर महिलाओं को सीआरपीसी की धारा 160 के तहत छूट मिलती है कि वे पुलिस स्टेशन नहीं जाएं तो भी पूछताछ हो सकती है। महिला पुलिस कॉस्टेबल या महिला के परिवार के सदस्य या उसकी किसी महिला मित्र की मौजूदगी में पूछताछ कर सकती हैं।

महिलाएँ समय बीत जाने के बाद भी अपनी शिकायत दर्ज सकती हैं

महिलाएं हर मामले को समय देती हैं। वे सोचती हैं कि थोड़ा और मसले को समय दिया जाएगा तो शायद हल हो जाए। पर अगर आप समय बीत जाने के बाद भी शिकायत दर्ज कराती हैं तो भी पुलिस को शिकायत दर्ज करनी होगी। वे ये कह कर मामले को नहीं टाल सकते हैं कि शिकायत देरी से हो रही है।

महिलाओ को निः शुल्क कानूनी सलाह का प्रावधान 

शिकायत दर्ज कराने गई महिली को मुफ्त में कानूनी सलाह लेने का पूरा अधिकार देश का संविधान देता है।

पहचान की गोपनीयता का अधिकार

आईपीसी की धारा 228 ए के तहत महिलाओं को यह Rights मिलता है कि किसी भी हालात में महिला की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। मीडिया में उसकी तस्वीरों और वीडियो को प्रसारित नहीं किया जा सकता है।

बलात्कार पीड़िता को पूरा अधिकार है कि वे अपनी पहचान को छुपा के शिकायत दर्ज करा सकती हैं। मीडिया में उसकी तस्वीरों को प्रसारित करने पर कानून जुर्म है। ये अधिकार सीआरपीसी की धारा 164 महिलाओं को देती है।

ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार किसी भी महिला को पुलिस सूरज ढलने के बाद और सूरज उगने के पहले गिरफ्तार नहीं कर सकती है। किसी बड़े जुर्म में मजिस्ट्रेट की अनुमति का पत्र लेना आवश्यक है।

किसी कारणवश महिला पुलिस स्टेशन में नहीं जा सकती है तो वो ऑनलाइन अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। महिला ई मेल या रजिस्टर्ड पोस्ट के जरिए भी शिकायत दर्ज करा सकती हैं। महिलाएं डीसीपी स्तर पर या किसी भी अधिकारी को शिकात भेज सकती हैं।

 


मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के प्रयास से भारतीय खेल प्राधिकरण ने छत्तीसगढ़ में दी 07 खेलो इंडिया सेंटर की मंजूरी

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के प्रयास से भारतीय खेल प्राधिकरण ने छत्तीसगढ़ में दी 07 खेलो इंडिया सेंटर की मंजूरी

05-Mar-2022

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के प्रयास से भारतीय खेल प्राधिकरण ने छत्तीसगढ़ में दी 07 खेलो इंडिया सेंटर की मंजूरी

आर्चरी और हॉकी के लिए दो-दो केन्द्रों, वॉलीबाल, मलखम्ब और फुटबाल के लिए एक-एक केन्द्र की मंजूरी

भारतीय खेल प्राधिकरण ने छत्तीसगढ़ में दी 07 खेलो इंडिया सेंटर की मंजूरी

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा छत्तीसगढ़ में खेलों को बढ़ावा देने के प्रयासों को एक बड़ी सफलता मिली है। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार छत्तीसगढ़ के खेल एवं युवा कल्याण विभाग के प्रस्ताव पर भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा छत्तीसगढ़ में खेलो इंडिया स्कीम के तहत सात खेलो इंडिया केन्द्रों की स्थापना की मंजूरी दी गई है। ये सातों केन्द्र अलग-अलग जिलों में एक-एक खेल के लिए खोले जाएंगे। भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा आर्चरी और हॉकी के लिए दो-दो केन्द्रों, वॉलीबाल, मलखम्ब और फुटबाल के लिए एक-एक केन्द्र की मंजूरी दी गई है। इन केन्द्रों में संबंधित खेलों के छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों का चयन कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कोचों के द्वारा प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन केन्द्रों की स्थापना के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण वित्तीय सहायता भी प्रदान करेगा।
मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ में सात खेलो इंडिया केन्द्र की मंजूरी मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों को अपनी खेल प्रतिभा को निखारने का अच्छा मौका मिलेगा। आने वाले समय में ये खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश और देश का नाम रौशन करेंगे। उन्होंने कहा कि यह ‘खेलबो जीतबो गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ की परिकल्पना को साकार करने में एक और सार्थक कदम सिद्ध हुआ है।
मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के निर्देश पर खेल संचालनालय ने विभिन्न खेलों की खेलो इण्डिया सेंटर प्रारंभ करने का प्रस्ताव भारतीय खेल प्राधिकरण को भेजा गया था, जिसमें से शिवतराई बिलासपुर में तीरंदाजी सेंटर, बीजापुर में तीरंदाजी सेंटर, राजनांदगांव में हॉकी सेंटर, जशपुर में हॉकी सेंटर, गरियाबंद में व्हॉलीबॉल सेंटर, नारायणपुर में मलखम्भ सेंटर और सरगुजा में फुटबॉल खेल की खेलो इण्डिया सेंटर प्रारंभ करने की स्वीकृति भारतीय खेल प्राधिकरण से प्राप्त की गई है। छत्तीसगढ़ राज्य में खेलों का प्रशिक्षण अब और मजबूत होगा। इन सभी खेलो इण्डिया सेंटर्स को प्रारंभ करते हुए खेल संचालनालय द्वारा लगातार इन सेंटर्स की मॉनिटरिंग की जाएगी।
प्रत्येक खेल के स्थानीय सीनियर खिलाड़ियों को सेंटर से जोड़ा जाएगा, उन्हें प्रशिक्षक के रूप में कार्य करने के लिए मानदेय भी दी जाएगी। सभी खेलो इण्डिया सेंटर्स में बालक एवं बालिका खिलाड़ियों का बराबर प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित की जाएगी। इन सेंटर्स को भारतीय खेल प्राधिकरण के पोर्टल में पंजीकृत किया जाएगा।
यह पहला अवसर है कि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों के लिए राज्य गठन के बाद से बड़े अवसर सृजित किया गया है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने बीजापुर अकादमी का दौरा कर वहां तीरंदाजी सेंटर प्रारंभ करने का वादा खिलाड़ियों से किया गया था, इसी प्रकार शिवतराई बिलासपुर में स्थानीय बच्चों की तीरंदाजी खेल में रूचि और प्रतिभा को देखते हुए मुख्यमंत्री जी ने इसे राज्य स्तर पर खेल अकादमी का दर्जा दिलाने की बात कही थी, जिसे साकार कर लिया गया है।
राजनांदगांव और जशपुर प्रारंभ से ही हॉकी की नर्सरी के रूप में विख्यात है, इन शहरों ने हॉकी के कई खिलाड़ी दिए हैं, अब नई पीढ़ी को बेहतर प्रशिक्षण देकर उन्हें एक नया अवसर प्रदान किया गया। बस्तर क्षेत्र अब तक खेलों में उपेक्षित रहा था, इन क्षेत्रो में मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के निर्देश पर बस्तर में भी खेलों के विकास के लिए विशेष प्रयास किये जा रहे हैं, खेलो इण्डिया सेंटर की स्वीकृति इसका उदाहरण है। नारायणपुर में मलखम्भ की विशेष प्रतिभाओं के देखकर मुख्यमंत्री जी ने इन्हें अकादमी देने की घोषणा की थी, जिसे आज पूरा किया गया है। सरगुजा में फुटबॉल के खिलाड़ियों के लिए एक नया अवसर सृजित कर खिलाड़ियों को सौंगात दी गई है। खेल एवं युवा कल्याण विभाग के द्वारा लगातार खिलाड़ियों के लिए नित्य नये अवसर गढ़े जा रहे हैं। आने वाले समय में राज्य के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का नाम रौशन करेंगे।


अब अपराधी के मानस मूल्यांकन की सार्थक पहल

अब अपराधी के मानस मूल्यांकन की सार्थक पहल

05-Mar-2022

अब अपराधी के मानस मूल्यांकन की सार्थक पहल

- ललित गर्ग-

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दुनिया के बहुत सारे देशों में फांसी की सजा का प्रावधान समाप्त किया जा चुका है और भारत में भी फांसी की सजा को समाप्त करने की मांग लगातार उठ रही है। प्रश्न है कि क्या मौत की सजा जैसे सख्त कानूनों के प्रावधान करने मात्र से अपराधों एवं अत्याचारों पर नियंत्रण पाया जा सकता है? अपराधों को कठोर कानूनों के जरिये रोकने से ज्यादा जरूरी है कि समाज मंे ऐसी जागृति लाई जाये कि लोगों का मन बदले, अपराध की मानसिकता समाप्त हो। अपराधी को समाप्त करने की बजाय अपराध के कारणों को समाप्त किया जाना चाहिए। इसी के मद्देनजर अब सर्वाेच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि मौत की सजा पाए व्यक्तियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन भी अवश्य किया जाए। इसके लिए चिकित्सा संस्थानों के सुयोग्य मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों की टीम गठित की जाए।
सर्वाेच्च न्यायालय के इस आदेश से मौत की सजा के मामलों में दंड तय करने और अपराध विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन के कुछ बेहतर नतीजों की उम्मीद है। संभवत यह अपराधमुक्त समाज की संरचना बनाने में कारगर सिद्ध होगा। बढ़ते अपराधों की वजहों में खास हैं समाज की असंतुलित एवं भेदभावपूर्ण संरचना, अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई, नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों को धुंधलाने की कुचेष्टाएं, कुंठित लोगों की आपराधिक मानसिकता, न्याय-प्रक्रिया की जटिलता और फैसलों में देरी है। यही कारण है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने एक सार्थक पहल करते हुए मौत की सजा पाए व्यक्तियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करने का आदेश उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के उच्च न्यायालयों द्वारा सुनाई गई मौत की सजा के विरुद्ध दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है। किसी को मौत की सजा देना सभ्य समाज की निशानी नहीं माना जाता। यह बर्बर समाज की कार्रवाई मानी जाती है। इसीलिए दुनिया के बहुत सारे देशों में ऐसी सजा का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है।
किसी भी समाज के निरंतर विकास करने के लिए समाज में शांति और सुरक्षा का वातावरण जरूरी है और इसके लिए उसे अपराध मुक्त होना परम आवश्यक है। प्रत्येक देश की सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि वह समाज और देश को बाह्य एवं आन्तरिक नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखने के लिए समुचित व्यवस्था करंे। समाज को अपराध मुक्त रखने के लिए अपराध और अपराधी के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है, यदि अपराधी की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति का अध्ययन कर उसको मजबूर करने वाली परिस्थितियों को बनने से ही रोक दिया जाय, तो समाज को अपराधमुक्त करना अथवा न्यूनतम अपराध वाले समाज की श्रेणी में लाने में मदद मिल सकती है।
बड़ा सच है कि कोई जन्मजात अपराधी नहीं होता। कुछ परिस्थितियों के चलते अपराधी बन जाते हैं, कुछ संगत के चलते, तो कुछ मनोविकारों के चलते। मगर जब अपराधी की सजा तय होती है, तो साक्ष्यों पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है, अपराध के कारणों पर नहीं। कानून की विडम्बना एवं विसंगति सदियों से चली आ रही है कि अपराधी को समाप्त करने के कठोर प्रावधान है, लेकिन अपराध को रोकने का कोई उपक्रम नहीं है। यही कारण है अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता के मद्देनजर सजा का निर्धारण किया जाता है। जघन्य अपराधों में कठोरतम सजा के रूप में फांसी का प्रावधान है। इसलिए हमारे यहां सजा-ए-मौत के मामले भी बहुत आते हैं। फिर निचली अदालतों के उन फैसलों को उच्च और उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जाती है। अंतिम रूप से राष्ट्रपति से जीवनदान पाने की गुहार लगाने का विकल्प भी है। हालांकि हमारे यहां फांसी की सजा समाप्त करने की मांग भी लंबे समय से उठती रही है, क्योंकि इस सजा के बाद व्यक्ति के सुधरने या अच्छा नागरिक बनने की संभावना समाप्त हो जाती है।
कानून, व्यवस्था, सुरक्षा और न्याय सभी बैशाखियों पर लटक गये हैं। यही वजह है कि आज गलत कार्यों- अपराधों के अंजाम पा लेने के बाद न्यायिक जांच का सवाल उठता है। उससे पहले अधिकारियों की आंखें खुलती नहीं। बड़ा प्रश्न है कि अपराधों की उम्र कितनी? तो शायद सार्थक उत्तर हो सकता है-‘जागने में समय लगे मात्र उतनी।’ यानी जघन्य अपराध करने वालों के मानस का अध्ययन कर समझने का प्रयास किया जाये कि आखिर उस व्यक्ति ने किन परिस्थितियों के चलते ऐसा कदम उठाया। उन परिस्थितियों को समाप्त किया जाये तो अपराध स्वतः समाप्त हो जायेगा।
देश में जितने वास्तविक बलात्कार एवं बाल-दुष्कर्म के मामले दर्ज नहीं होते, उससे अधिक फर्जी मामलें दर्ज हो रहे हैं, और इन सख्त कानूनों की आड में लोग एक-दूसरे से बदला ले रहे हैं या अनुचित धन कमा रहे हैं और सामाजिक सोच को दूषित कर रहे हैं। इन दूषित परिस्थितियों से मुक्ति के प्रयत्न हो। इन अपराध के कारणों का पता लगाकर उन्हें समाप्त किया जाये, अपराध की जड़ को ही समाप्त किया जाये तो अपराधमुक्त समाज व्यवस्था स्थापित करना आसान होगा। मगर हमारे यहां ऐसे प्रयत्नों एवं अध्ययन का अनिवार्य प्रावधान नहीं है। अब सर्वाेच्च न्यायालय ने इसे अनिवार्य किया है तो उसके परिणामस्वरूप अपराधों पर नियंत्रण स्थापित हो सकेगा। अपराध दरअसल, मानसिक विकृतियों, मानसिक उथल-पुथल का ही नतीजा होता है। अक्सर देखा जाता है कि अपराध करने के बाद अपराधी पश्चात्ताप करता है, उसे अपने किए पर पछतावा होता है। मगर कई पेशेवर कहे जाने वाले अपराधियों का मानस कुछ जटिल होता है। हालांकि अपराधशास्त्र में अपराध करने वालों के मानस का अध्ययन ही किया जाता है और हर परिस्थिति में बदलती आपराधिक प्रवृत्ति पर सूक्ष्म नजर रखी जाती है। मगर न्याय प्रक्रिया में इन बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। अब सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश पर ऐसे अपराधियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा, तो न सिर्फ उनके अपराधी बनने, उनकी आपराधिक मानसिकता के बारे में ठीक-ठीक पता लगने की संभावना बनेगी, बल्कि इस तरह के अपराधियों की चिकित्सा संबंधी नए सूत्र भी मिल सकेंगे। अपराधियों को सुधरने एवं उन्हें नेक इंसान बनाने की दिशा में भी उपयोगी पहल हो सकेगी। फिर समाज में बढ़ती आपराधिक घटनाओं को रोकने के उपायों पर भी नए ढंग से विचार करने के रास्ते खुलेंगे। अभी तक केवल दंड के भय से अपराध को रोकने का प्रयास किया जाता रहा है, शायद अब अपराधी को सुधारने के रास्ते भी खुलें।
अपराध के मनोविज्ञान के इन अध्ययनों को स्कूली पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाये, ताकि विद्यार्थी जीवन से ही आपराधिक मानस बनने को रोका जा सके। समाज को अपराध मुक्त रखने के लिए आवश्यक है, शिक्षा में चरित्र निर्माण पर विशेष जोर दिया जाय, जनता की मूल समस्याओं का समाधान शीघ्र से शीघ्र किया जाय, समाज में पनपने वाले असंतोष को समय रहते दूर किया जाय, समाज में साधनों की असमानता का अंतर समाप्त करने के प्रयास हों, मुकदमें सालों साल चलते रहते हैं और जटिल अपराधियों की प्रवृत्ति और उनके मनोबल पर कोई खास असर नहीं पड़ता है, इसलिये अपराधी को शीघ्र से शीघ्र सजा देने की व्यवस्था की जाय और किसी भी अपराधी को सजा से बच पाने के अवसर न मिल पाए। इन सभी उपायों के लिए शासन और प्रशासन की इच्छा शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है।
हमारे देश में सख्त कानूनों की कमी नहीं है। इससे अपराध रुकता तो निर्भया कांड के बाद गुस्सा देखकर कोई बलात्कार नहीं करता, लेकिन अपराध की प्रवृत्ति नहीं बदली। इसे समझने की आज कहीं कोशिश नहीं हो रही। दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को फांसी की सजा दी गई, लेकिन क्या उनका मनोविज्ञान जानना जरूरी नहीं था? उनका मनोविज्ञान पढ़कर हम पता कर सकते थे कि किन परिस्थितियों ने उन्हें इतना हिंसक एवं वीभत्स बनाया। यह एक आसान तरीका होता अपराध रोकने का बजाय इसके कि हम भय पैदा करें। अपराध नियंत्रण के और भी कई तरीके हैं। अपराधियों के हारमोन बदलकर भी उनकी प्रवृत्ति बदली जा सकती है। पश्चिमी देशों में इन तरीकों का इस्तेमाल काफी कारगर साबित हुआ है। मनोविज्ञान केवल अपराधी का ही नहीं पीड़ित का भी पढ़ा जाना चाहिए। इससे कई बार बेगुनाह बच सकता है। विडंबना यह है हमारे समाज से लेकर समूचा तंत्र अपराधमुक्त समाज के मसले पर साहसपूर्ण तरीके से सोचने की कोशिश नहीं करता है। कानून के साथ-साथ समाजशस्त्रियों, धर्मगुरुओं को सामाजिक जन-जागृति का माहौल बनाना होगा, सरकार को भी नयी सोच के साथ आगे आना होगा। अगर इस तरह अपराधों को बढ़ावा नहीं मिले और उसका प्रतिकार होता रहे तो निश्चित ही एक सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ होगी, जो अपराधमुक्त समाज का आधार बनेगी। देश में जितने अधिक एवं कठोर कानून बनते हैं, उतना ही उनका मखौल बनता है। आज यह कहना कठिन है कि दुष्कर्मी एवं अपराधी तत्वों के मन में कठोर सजा का कहीं कोई डर है। शायद इसी कारण अपराध एवं दुष्कर्म के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। निःसंदेह इस पर भी ध्यान देना होगा कि कठोर कानून एक सीमा तक ही प्रभावी सिद्ध होते हैं। प्रेषकः

 

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


राकेश टिकैत का आह्वान 9 मार्च को पहुंचो मतगणना केन्द्रों पर, मतगणना मे हो सकती है धांधली

राकेश टिकैत का आह्वान 9 मार्च को पहुंचो मतगणना केन्द्रों पर, मतगणना मे हो सकती है धांधली

03-Mar-2022

राकेश टिकैत का आह्वान 9 मार्च को पहुंचो मतगणना केन्द्रों पर, मतगणना मे हो सकती है धांधली
भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता ने आशंका जताई है मतणना में घांधली हो सकती है इसलिए बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है।

भारतीय संचार माध्यमों के अनुसार राकेश टिकैन ने कहा है कि मतगणना में गड़बड़ी की जा सकती है।  उन्होंने कहा कि इस बात को देखते हुए पूरी सतर्कता और तैयारी की आवश्यकता है।

बागपत में मतगणना से ठीक पहले भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत ने 10 मार्च के एक दिन पहले से ही मतगणना स्थलों पर डेरा डालने की बात कही है।

टिकैत ने आगामी 9 मार्च को मतगणना स्थल पर ट्रेक्टर लेकर डेरा जमाने का आह्वाहन किया है।  उन्होंने कहा है कि रात्रि का इंतज़ाम करते हुए अपने कपड़े और बिस्तर लेकर लोग पहले ही दिन मतगणना स्थल पर पहुंच जाएं, क्योंकि 10 तारीख को तो उन्हें वहां पर फटकने तक नहीं दिया जाएगा।राकेश टिकैत ने आशंका जताई है कि मतगणना में गड़बड़ी की जा सकती है इसलिए पूरी सतर्कता और तैयारी की आवश्यकता है।

टिकैत के अनुसार इस चुनाव के नतीजों में भी गड़बड़ी की आशंका है।  उन्होंने कहा कि 9 फरवरी को मतगणना स्थल के आसपास ट्रैक्टर लेकर ज़रूर पहुंच जाना। 

यूक्रेन से भारतीय नागरिकों की वापसी को लेकर राकेश टिकैत ने ऑपरेशन गंगा पर सवाल उठाए।  उन्होंने यूक्रेन-रूस युद्ध मामले पर सरकार को घेरते हुए कहा कि सरकार युद्ध में भी वोट तलाश रही है।  राकेश टिकैत के अनुसार वहां फोटो सेशन चल रह है।  जो सरकार के पक्ष में बोलता है सिर्फ उस छात्र को ही दिखाया जाता है।

टिकैत का कहना था कि देश में एक बड़े आंदोलन की जरूरत है।  उन्होंने कहा कि अब आंदोलन से ही कुछ बदलाव हो सकता है। 


राजिम अध्यात्म, धर्म और हमारी गौरवशाली संस्कृति का संगम: श्री भूपेश बघेल

राजिम अध्यात्म, धर्म और हमारी गौरवशाली संस्कृति का संगम: श्री भूपेश बघेल

02-Mar-2022

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ का सुप्रसिद्ध तीर्थ राजिम मात्र एक शहर नहीं बल्कि आध्यात्म, धर्म और हमारी गौरवशाली संस्कृति का संगम है। राजिम के महत्व को देखते हुए हमने यहां राजिम माघी पुन्नी मेला को भव्यता प्रदान करने के लिए न केवल नये मेला स्थल के लिए 54 एकड़ जमीन आवंटित की है। बल्कि मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए धर्मशाला के निर्माण सहित अन्य सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। मेले स्थल का तेजी से विकास किया जा रहा है। आज राजिम के त्रिवेणी संगम में 33.12 करोड़ रूपए की लागत से निर्मित लक्ष्मण झूले का लोकार्पण किया गया। मुख्यमंत्री श्री बघेल आज राजिम माघी पुन्नी मेले के समापन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

महानदी, पैरी और सोंढूर के पवित्र त्रिवेणी संगम के तट पर 16 फरवरी से 01 मार्च तक 15 दिनों तक चलने वाले श्रद्धा-भक्ति और आस्था के छत्तीसगढ़ के इस सबसे बड़े राजिम माघी पुन्नी मेला 2022 का भव्य समापन आज महाशिवरात्री के अवसर पर मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। मुख्यमंत्री सहित अतिथियों ने भगवान राजीव लोचन की प्रतिमा में दीप प्रज्वलित कर पूजा अर्चना की और महानदी की आरती में शामिल होकर प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश के धर्मस्व, पर्यटन, गृह, जेल, लोक निर्माण मंत्री श्री ताम्रध्वज साहू ने की। राजिम माघी पुन्नी मेला में इस वर्ष 10 लाख श्रद्धालुओं ने शामिल होकर धर्म और आस्था के संगम में डुबकी लगाई।

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आगे कहा कि विधायक अमितेष शुक्ल ने 15 दिन तक शराब पर प्रतिबंध लगाने कि बात कही थी जिसे हमने तुरंत स्वीकृति दे दी और 15 दिन राजिम सहित आस-पास के क्षेत्रों की शराब दुकानें भी बंद रही। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने वनवासकाल में सबसे ज्यादा समय छत्तीसगढ़ में बिताया। राजिम से लेकर शिवरीनारायण तक का क्षेत्र कमल क्षेत्र कहलाता है। उन्होंने रामवनगमन पथ के संबंध में कहा कि इस पथ के लिए 9 महत्वपूर्ण स्थलों को पूरी भव्यता के साथ विकसित किया जा रहा है। इसमें राजिम महत्वपूर्ण पड़ाव है। मुख्यमंत्री ने कहा की राजिम को संवारने का कार्य हमारी सरकार द्वार किया जा रहा है। उन्होंने ने कहा कि हमारी नीति और योजनाओं से छत्तीसगढ़ के किसान समृध्दि की ओर बढ़ रहे हैं। आज राज्य की संस्कृति, खानपान, रहन-सहन और व्यंजन का भी सम्मान हो रहा है। उन्होंने कहा की गोधन न्याय योजना की तारीफ प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं। श्री बघेल ने कहा की गौठानों में विकसित किए जा रहे रुरल इंडस्ट्रीज पार्क के माध्यम से हमारे किसान और ग्रामीण भाई-बहन अब उद्योगकर्मी भी कहलायेंगे। उन्होंने ने कहा की मजदूरों के लिए प्रारंभ की गई राजीव गांधी ग्रामीण भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना से गरीबों की आय भी बढ़ेगी। उन्होने शानदार आयोजन के लिए स्थानीय प्रशासन एवं आम नागरिकों को बधाई दी।

इस अवसर पर धर्मस्व मंत्री श्री ताम्रजध्वज साहू ने कहा की राज्य सरकार द्वारा हर वर्ष आयोजन को बेहतर रुप देने का प्रयास रहता है। जिसमें हम सफल हो रहे है। इस वर्ष लक्ष्मण झूला की सौगात अंचल वासियों को मिली है। इससे बारह महीने भगवान कुलेश्वरनाथ का दर्शन होगा। उन्होंने बताया की मेले मंे इस वर्ष लगभग 3 हजार हितग्राहियों को 98 करोड़ रुपये का विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाभान्वित किया गया है। राजिम विधायक श्री अमितेश शुक्ल ने कहा की लक्ष्मण झूला की सौगात से अंचल वासियों में खुशी की लहर है। उन्होंने गोधन न्याय योजना अंतर्गत गोबर खरीदी के लिए धन्यवाद दिया साथ ही शराब बंदी के लिए मुख्यमंत्री का अभार व्यक्त किया। अभनपुर विधायक श्री धनेन्द्र साहू ने कहा की मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य में हर वर्गों का विकास हो रहा है। कलेक्टर नम्रता गांधी ने मेले के आयोजन और वहां की गई व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने मेले के सफल आयोजन के लिए हर वर्ग का आभार व्यक्त किया। समारोह में छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष राजेश्री महंत श्री रामसुन्दरदास महाराज, महंत गोवर्धन शरण महाराज, संत श्री उमेशानंद महाराज, संत रविकर साहेब, ब्रम्हाकुमारी पुष्पा बहन, ब्रम्हाकुमारी हेमा बहन, संत विचार साहेब एवं विशिष्ट साधु-संतों की गरिमामयी मौजूदगी रही।
इस अवसर पर विधायक श्रीमती संगीता सिन्हा, भिलाई विधायक श्री देवेन्द्र यादव, वरिष्ठ अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि, नागरिकगण मौजूद थे।

 


राजिम अध्यात्म, धर्म और हमारी गौरवशाली संस्कृति का संगम: श्री भूपेश बघेल

राजिम अध्यात्म, धर्म और हमारी गौरवशाली संस्कृति का संगम: श्री भूपेश बघेल

02-Mar-2022

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ का सुप्रसिद्ध तीर्थ राजिम मात्र एक शहर नहीं बल्कि आध्यात्म, धर्म और हमारी गौरवशाली संस्कृति का संगम है। राजिम के महत्व को देखते हुए हमने यहां राजिम माघी पुन्नी मेला को भव्यता प्रदान करने के लिए न केवल नये मेला स्थल के लिए 54 एकड़ जमीन आवंटित की है। बल्कि मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए धर्मशाला के निर्माण सहित अन्य सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। मेले स्थल का तेजी से विकास किया जा रहा है। आज राजिम के त्रिवेणी संगम में 33.12 करोड़ रूपए की लागत से निर्मित लक्ष्मण झूले का लोकार्पण किया गया। मुख्यमंत्री श्री बघेल आज राजिम माघी पुन्नी मेले के समापन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

महानदी, पैरी और सोंढूर के पवित्र त्रिवेणी संगम के तट पर 16 फरवरी से 01 मार्च तक 15 दिनों तक चलने वाले श्रद्धा-भक्ति और आस्था के छत्तीसगढ़ के इस सबसे बड़े राजिम माघी पुन्नी मेला 2022 का भव्य समापन आज महाशिवरात्री के अवसर पर मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। मुख्यमंत्री सहित अतिथियों ने भगवान राजीव लोचन की प्रतिमा में दीप प्रज्वलित कर पूजा अर्चना की और महानदी की आरती में शामिल होकर प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश के धर्मस्व, पर्यटन, गृह, जेल, लोक निर्माण मंत्री श्री ताम्रध्वज साहू ने की। राजिम माघी पुन्नी मेला में इस वर्ष 10 लाख श्रद्धालुओं ने शामिल होकर धर्म और आस्था के संगम में डुबकी लगाई।

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में राजिम माघी पुन्नी मेला का गरिमामय समापन

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आगे कहा कि विधायक अमितेष शुक्ल ने 15 दिन तक शराब पर प्रतिबंध लगाने कि बात कही थी जिसे हमने तुरंत स्वीकृति दे दी और 15 दिन राजिम सहित आस-पास के क्षेत्रों की शराब दुकानें भी बंद रही। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने वनवासकाल में सबसे ज्यादा समय छत्तीसगढ़ में बिताया। राजिम से लेकर शिवरीनारायण तक का क्षेत्र कमल क्षेत्र कहलाता है। उन्होंने रामवनगमन पथ के संबंध में कहा कि इस पथ के लिए 9 महत्वपूर्ण स्थलों को पूरी भव्यता के साथ विकसित किया जा रहा है। इसमें राजिम महत्वपूर्ण पड़ाव है। मुख्यमंत्री ने कहा की राजिम को संवारने का कार्य हमारी सरकार द्वार किया जा रहा है। उन्होंने ने कहा कि हमारी नीति और योजनाओं से छत्तीसगढ़ के किसान समृध्दि की ओर बढ़ रहे हैं। आज राज्य की संस्कृति, खानपान, रहन-सहन और व्यंजन का भी सम्मान हो रहा है। उन्होंने कहा की गोधन न्याय योजना की तारीफ प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं। श्री बघेल ने कहा की गौठानों में विकसित किए जा रहे रुरल इंडस्ट्रीज पार्क के माध्यम से हमारे किसान और ग्रामीण भाई-बहन अब उद्योगकर्मी भी कहलायेंगे। उन्होंने ने कहा की मजदूरों के लिए प्रारंभ की गई राजीव गांधी ग्रामीण भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना से गरीबों की आय भी बढ़ेगी। उन्होने शानदार आयोजन के लिए स्थानीय प्रशासन एवं आम नागरिकों को बधाई दी।

इस अवसर पर धर्मस्व मंत्री श्री ताम्रजध्वज साहू ने कहा की राज्य सरकार द्वारा हर वर्ष आयोजन को बेहतर रुप देने का प्रयास रहता है। जिसमें हम सफल हो रहे है। इस वर्ष लक्ष्मण झूला की सौगात अंचल वासियों को मिली है। इससे बारह महीने भगवान कुलेश्वरनाथ का दर्शन होगा। उन्होंने बताया की मेले मंे इस वर्ष लगभग 3 हजार हितग्राहियों को 98 करोड़ रुपये का विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाभान्वित किया गया है। राजिम विधायक श्री अमितेश शुक्ल ने कहा की लक्ष्मण झूला की सौगात से अंचल वासियों में खुशी की लहर है। उन्होंने गोधन न्याय योजना अंतर्गत गोबर खरीदी के लिए धन्यवाद दिया साथ ही शराब बंदी के लिए मुख्यमंत्री का अभार व्यक्त किया। अभनपुर विधायक श्री धनेन्द्र साहू ने कहा की मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य में हर वर्गों का विकास हो रहा है। कलेक्टर नम्रता गांधी ने मेले के आयोजन और वहां की गई व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने मेले के सफल आयोजन के लिए हर वर्ग का आभार व्यक्त किया। समारोह में छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष राजेश्री महंत श्री रामसुन्दरदास महाराज, महंत गोवर्धन शरण महाराज, संत श्री उमेशानंद महाराज, संत रविकर साहेब, ब्रम्हाकुमारी पुष्पा बहन, ब्रम्हाकुमारी हेमा बहन, संत विचार साहेब एवं विशिष्ट साधु-संतों की गरिमामयी मौजूदगी रही।
इस अवसर पर विधायक श्रीमती संगीता सिन्हा, भिलाई विधायक श्री देवेन्द्र यादव, वरिष्ठ अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि, नागरिकगण मौजूद थे।

 


उप्र चुनाव : पब्लिक भाजपा को माफी देगी या उससे माफी मांगेगी

उप्र चुनाव : पब्लिक भाजपा को माफी देगी या उससे माफी मांगेगी

01-Mar-2022

(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

No description available.

पूर्वी उत्तर प्रदेश में सोनभद्र जिले के अंतर्गत, रॉबर्ट्सगंज विधानसभाई क्षेत्र की भाजपा की एक अनोखी जनसभा का वाइरल हुआ वीडियो, चंद सैकेंडों में जिस तरह से उत्तर प्रदेश के इस विधानसभाई चुनाव की और उसमें भी सब से बढ़कर सत्ताधारी भाजपा की दुर्दशा की कहानी कह देता है, उसे हजारों शब्दों में भी बयान नहीं किया जा सकता है। फिर भी, वीडियो में दर्ज हुआ दृश्य जिस तरह, गागर में सागर भरने के अंदाज में, एक संक्षिप्त से चल-दृश्य में इस पूरे चुनाव की कहानी सुना देता है, उसका जिक्र करने के लोभ से बचना मुश्किल है। वीडियो में, राबर्ट्सगंज विधानसभाई क्षेत्र के भाजपा विधायक और वर्तमान चुनाव में फिर से मैदान में उतारे गए भाजपा उम्मीदवार, भूपेश चौबे विधायक के रूप में अपने पांच साल के काम-काज पर लोगों की शिकायतों, नाराजागियों तथा असंतोष के जवाब में, जनसभा के मंच पर ही क्षमायाचना की मुद्रा में कान पकड़कर उठक-बैठक लगाते नजर आते हैं।
खासे लंबे भूपेश चौबे, जब मंच पर अचानक कान पकड़कर उठक-बैठक करना शुरू करते हैं, मंच पर उपस्थित दूसरे भाजपा नेता हैरान होकर, शुरू में उन्हें रोकने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन, जल्द ही यह उन्हें अपना क्षमायाचना का स्वांग कम से कम इतना लंबा करने के लिए छोड़ दिया जाता है कि पूरे क्षेत्र तक, उनके पांच साल की भूल-चूकों के लिए क्षमा मांगने का संदेश पहुंच जाए।

चुनाव के मौके पर मतदाताओं की शिकायतों के जवाब में क्षमायाचना की मुद्रा का सहारा लिए जाने का यह प्रहसन, सिर्फ भूपेेश चौबे या फिर से चुनाव मैदान में उतरे उनके जैसे पूर्व-विधायकों तक ही सीमित नहीं है। उल्टे, भूपेश चौबे प्रहसन इसीलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वह इस चुनाव में सत्ताधारी संघ-भाजपा जोड़ी की ही दशा का प्रतिनिधित्व करता है। वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी समेत ऊपर से लेकर नीचे तक समूचा भाजपा नेतृत्व कम से कम उप्र में मतदान के तीसरे चरण के बाद से, बदहवासी के उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां वह डूबते को तिनके का सहारा के अंदाज में, चुनावी इस्तेमाल के लिए सामने पड़ने वाली हर चीज को आजमा रहा है और किसी न किसी रूप में क्षमायाचना की मुद्रा का सहारा लेता नजर आ रहा है।

इन क्षमायाचना मुद्राओं में आवारा मवेशियों के मुद्दे पर, खुद प्रधानमंत्री की क्षमायाचना खासतौर पर उल्लेखनीय है। यह दूसरी बात है कि जिन प्रधानमंत्री मोदी ने, किसानों के साल भर से लंबे ऐतिहासिक आंदोलन के सामने घुटने टेकते हुए, तीन कृषि कानूनों को वापस लेते हुए भी, इन कानूनों को बनाने की गलती स्वीकार करने तथा उसके लिए किसानों से माफी मांगने के बजाए, आंदोलनकारी किसानों को इन कानूनों के फायदे समझाने में अपनी ''तपस्या की कमी'' के लिए पछतावा जताया था, उनसे आवारा पशुओं के संकट समेत और किसी भी मामले में, खुलकर गलती मानने की उम्मीद तो की ही कैसे जा सकती है? फिर भी, तीसरे चरण में चुनाव के मध्य-उत्तरप्रदेश में प्रवेश के साथ जब यह स्पष्ट हो गया कि सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा रुहेलखंड में ही नहीं, भाजपाविरोधी हवा पूरे उत्तर प्रदेश में तथा खासतौर पर देहात में चल रही है और जब संघ-भाजपा के सारे मीडिया मैनेजमेंट के बावजूद, मीडिया के खासे बड़े हिस्से में इस आशय की खबरें आने लगीं कि देहात में भाजपा के वोट का अच्छा खासा हिस्सा आवारा मवेशी चरते नजर आ रहे हैं, तो शीर्ष से खुद प्रधानमंत्री चौथे चरण के मतदान के लिए अपनी चुनाव सभाओं में, किंचित शिष्ट तरीके से भूपेश चौबे वाली कसरत करते नजर आए। बेशक, सत्ताधारी पार्टी का ध्यान इस समस्या के आकार की ओर खींचने के लिए कुछ जगहों पर, मुख्यमंत्री समेत शीर्ष भाजपा नेताओं की जनसभाओं के प्रवेश द्वारों तक सांड अपनी मौजूदगी भी दर्ज करा चुके थे।

भाजपा की डबल इंजन सरकारों की आम तौर पर और यूपी की मोदी-योगी की डबल इंजन सरकार की खासतौर पर जैसी दंभपूर्ण मुद्रा रही है, उसको देखते हुए भाजपा के प्रचार में दूसरी सभी समस्याओं की तरह, आवारा मवेशियों की समस्या का स्वीकार किया जाना कोई आसान नहीं था। सचाई यह है कि उप्र की योगी सरकार तो न सिर्फ ऐसी किसी समस्या की मौजूदगी से ही इंकार करती आ रही थी, बल्कि एक प्रकार से इस समस्या को अपनी विचारधारात्मक निष्ठा के तमगे के रूप में ही देखती और दिखाती आ रही थी। आखिरकार, आवारा मवेशियों की समस्या का तेजी से बढ़ना, उसके गोवंश ही नहीं, तमाम मवेशियों की ''रक्षा'' करने के कानूनी-गैरकानूनी, हर प्रकार के प्रयासों की ''सफलता'' का ही तो जीता-जागता सबूत था!

अचरज नहीं कि किसानों के आवारा मवेशियों की अपनी परेशानी बार-बार उठाने के बावजूद, उप्र की डबल इंजन सरकार ने इस सचाई का नोटिस तक लेने की कोई जरूरत नहीं समझी कि जहां देश भर में आवारा या छुट्टा मवेशियों की संख्या में 2012 से 2019 के बीच 3.2 फीसद की कमी हुई थी, उत्तर प्रदेश में ऐसे मवेशियों की संख्या में पूरे 17 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। खुद सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 तक ही ऐसे पशुओं की संख्या,11.8 लाख तक पहुंच चुकी थी। इसी से जुड़ी विडंबना यह कि उसी उत्तर प्रदेश में, जो खुद सरकारी सूचकांकों के अनुसार, तमाम सामाजिक मानकों के मामले में देश के सभी राज्यों में सबसे निचले पायदान पर है और जो खुद मोदी सरकार के बहुआयामी गरीबी सूचकांक पर, देश भर में सबसे खराब स्थिति को दर्शाता है, हरेक व्यक्ति पर डबल इंजन की भाजपा सरकार जितना पैसा खर्च करती है, उससे कहीं ज्यादा खर्चा वही सरकार हरेक गाय पर करती है!

हैरानी की बात नहीं है कि चालीस फीसद से ज्यादा चुनाव निकल जाने के बाद, खुद प्रधानमंत्री को ही छुट्टा पशुओं की समस्या के वास्तविक होने की बात अपनी चुनाव सभाओं में स्वीकार कर, चुनाव प्रचार के बीच 'दिशा-सुधार' की शुरूआत करनी पड़ी। यह दूसरी ब
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