NRC का मुसलमानों के अलावा अन्य पर कोई प्रभाव नहीं, नागरिकता संशोधन विधेयक से होगा भय का माहौल

NRC का मुसलमानों के अलावा अन्य पर कोई प्रभाव नहीं, नागरिकता संशोधन विधेयक से होगा भय का माहौल

04-Oct-2019

नई दिल्ली : आज, देश में तेजी से एक खतरनाक तूफान इकट्ठा हो रहा है, जो अंततः भारत को नष्ट कर सकता है जैसा कि हम जानते हैं कि कई लोगों ने उम्मीद की थी कि नागरिकता कानूनों में संशोधन करने का विचार, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के विरोध में सिर्फ एक धार्मिक पहचान के लोगों को नागरिकता से बाहर कर देगा। यह भी उम्मीद है कि असम के बाहर के राज्यों को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) प्रदान करने के लिए 2019 के सांप्रदायिक रूप से अधिग्रहित ग्रीष्मकालीन चुनाव अभियान के दौरान बात सिर्फ चुनावी उकसावे की थी, जो ध्रुवीकृत अपने उद्देश्यों को पूरा करने के बाद भी जारी रहेगा।

CAB) और NRC को लागू करने के लिए दृढ़
लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार, सत्तारूढ़ दल और उनके वैचारिक लॉस्टार, आरएसएस, दोनों अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) और राष्ट्रीय NRC को लागू करने के लिए दृढ़ हैं। गृह मंत्री अमित शाह संसद में घोषणा करते हैं कि भारतीय मिट्टी के हर वर्ग इंच से प्रत्येक “घुसपैठिए” को हटाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं, जो राज्यों को विदेशियों के लिए निरोध केंद्र बनाने के लिए कहता है, और सीएबी को उन तरीकों से पारित करने के अपने संकल्प की पुष्टि करता है जो राज्यों के हितों की रक्षा करते हैं। कई बीजेपी मुख्यमंत्री और नेता NRC के विस्तार के लिए अपने राज्यों में आते हैं। और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदुओं को आश्वासन दिया कि एनआरसी द्वारा उन्हें किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।

परिणाम : भारत में मुस्लिम बस्तियों में दहशत और खौफ
इसका परिणाम बंगाल, बिहार, यूपी और महानगरों सहित पूरे भारत में मुस्लिम बस्तियों में दहशत और खौफ है। लोग कठोर सवाल पूछ रहे हैं कि भारतीय नागरिक होने के लिए उन्हें कौन से दस्तावेज़ों की आवश्यकता होगी, कट-ऑफ ईयर क्या होगा – 1971, 1947, 1951, 1987 – और उन दस्तावेजों के लिए क्या परिणाम होंगे जो इन दस्तावेजों को जमा नहीं कर सकते। सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान कोई भी उत्तर की आपूर्ति नहीं कर रहा है, और हर दिन की तबाही और भ्रम केवल मायने रखता है। दिल्ली में हमारे बेघर आश्रमों में भी, मुस्लिम बेघर लोग हमसे पूछ रहे हैं – “हमारा क्या बनेगा? हमारे पास कोई दस्तावेज नहीं है। ”इस बीच, अन्य सभी धार्मिक अनुशीलनों के भारतीय अप्रमाणित हैं।

1987 तक भारत में पैदा होने वाले व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाता था
स्वतंत्रता के पहले 40 वर्षों के लिए, 1987 तक, भारत में पैदा होने वाले किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाता था। 1987 में, कानून में संशोधन की आवश्यकता थी, इसके अलावा, कम से कम एक माता-पिता भारतीय थे। 2003 में, मैं केवल एक नागरिक बन सकता था यदि एक माता-पिता भारतीय थे और दूसरा अवैध प्रवासी नहीं था, जिसे कानूनी प्राधिकारी के बिना भारत में प्रवेश या रुके रहने के रूप में परिभाषित किया गया था।


 
केवल मुस्लिम को अवैध प्रवासी माना जाएगा
यदि कैब को पारित किया जाता है, तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अवैध प्रवासियों को, जो मुस्लिम को छोड़कर हर धार्मिक पहचान के हैं, भारतीय नागरिक बनने की अनुमति देगा। इसका मतलब यह होगा कि केवल मुस्लिम जो यह साबित करने में असमर्थ हैं कि वे भारत में वैध रूप से प्रवेश नहीं किए थे, उन्हें अवैध प्रवासी माना जाएगा। न केवल वे, बल्कि उनके बच्चे और बदले में उनके बच्चों को भारतीय नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा। यह इनकार सदा के लिए होगा, क्योंकि ऐसे व्यक्तियों की संतान बनने के लिए कानून का कोई निवारण नहीं है, जो कभी भारतीय नागरिक बन गए हों, भले ही वे भारत में पैदा हुए हों, और जानते हैं और किसी अन्य देश की आकांक्षा नहीं करते।

एनआरसी का मुसलमानों के अलावा अन्य लोगों पर कोई प्रभाव नहीं
इस संशोधन का यह भी अर्थ होगा कि एनआरसी का मुसलमानों के अलावा अन्य लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि अन्य सभी भारतीय नागरिकता के लिए अर्हता प्राप्त करेंगे, भले ही वे अनिर्दिष्ट हों। CAB के बाद NRC, ऑपरेशन में, केवल मुस्लिम भारतीयों को यह स्थापित करने की आवश्यकता होगी कि वे या उनके पूर्वजों ने कानूनन भारत में प्रवेश किया। अन्य भारतीयों को दस्तावेजों का उत्पादन करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, लेकिन अगर वे असफल होते हैं, तो भी वे नागरिकता के लिए अर्हता प्राप्त करेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही जन्म, भूमि के स्वामित्व या मतदान के अधिकार जैसे दस्तावेजों के आधार पर अपनी नागरिकता साबित करने के लिए व्यक्तियों को सबूत के बोझ को स्थानांतरित कर दिया है, जो कि सबसे कमजोर और खराब रूप से लिखे गए नागरिकों को मुश्किल में डालते हैं। मामलों को बदतर बनाने के लिए, शाह के अधीन गृह मंत्रालय ने पहले ही हर राज्य सरकार, और यहां तक ​​कि जिला मजिस्ट्रेटों को विदेशियों के न्यायाधिकरणों की स्थापना के लिए और इन न्यायाधिकरणों को अपनी प्रक्रियाओं और प्रमाण के मानकों को फ्रेम करने के लिए पहले ही अधिसूचित कर दिया है।


 
विभाजित और वैचारिक रूप से भ्रमित विपक्ष को देखते हुए, केंद्र सरकार राज्यसभा में सीएबी पारित करने के लिए आश्वस्त है। लेकिन कानून में इस बदलाव से पहले ही, 2015 में एक अधिसूचना द्वारा, केंद्र सरकार ने तीनों पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिम “अवैध प्रवासियों” को प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई से मुक्त कर दिया था और 2018 में, उनकी नागरिकता के लिए प्रक्रिया को तेज कर दिया था।

मुसलमानों को दूसरे वर्ग के नागरिकों के रूप में रहने के लिए मजबूर किया जाएगा
एक सौ साल पहले, हिंदू महासभा, और 1925 में, आरएसएस ने एक और भारत की कल्पना की थी, जिसमें एक हिंदू शासन करेगा और हावी होगा, और जिसमें मुसलमानों को दूसरे वर्ग के नागरिकों के रूप में रहने के लिए मजबूर किया जाएगा। वर्तमान सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान का मानना है कि 100 साल बाद, उनका समय आ गया है। नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB), उसके बाद एक राष्ट्रव्यापी NRC, जिसमें प्रभावी रूप से केवल मुसलमानों को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी, जिसका परिणाम होगा लाखों मुस्लिम नागरिक एक अनजाने भय, पीड़ा और अव्यवस्था में जी रहा होगा.

बाकी बेपरवाह
यह भयभीत तुफान है जो आने वाले महीनों में भारत को घेरने की धमकी दे रहा है, जो इस देश को उसके देश में नष्ट कर देगा क्योंकि यह कल्पना और वादा किया गया है। हमारी मुस्लिम बहनें और भाई आज इस आसन्न तबाही के खतरे को स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। हम में से बाकी बेपरवाह है. क्या हमें यह एहसास नहीं है कि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान की मृत्यु को चिह्नित करेगा?

यह लेख पहली बार 3 अक्टूबर, 2019 को ‘बढ़ते तूफान’ शीर्षक के तहत प्रिंट संस्करण में दिखाई दिया। लेखक : हर्ष मंदर, एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक MEDIA IN PUT SIASAT .COM


"ख़ुला" तलाक़, सब कुछ बदल देने की अब शुरुआत करनी चाहिए………….

02-Oct-2019

ज़ुलैख़ा जबीं, नई दिल्ली

गुज़रे हफ़्ते लखनऊ की एक ख़ातून रेशमा सिद्दीक़ी ने, प्रेस कॉन्फ्रेंस करके, अपनी शादीशुदा ज़िंदगी से ख़ुद को आज़ाद करने का एलान करते हुए, मीडिया के ज़रिए अपने शौहर को "ख़ुलानामा" भेज दिया. रेशमा सिद्दीक़ी पिछले 13 बरस 7 महीने (24 फ़रवरी 2006 से सितम्बर 2019) से घरेलू हिंसा से पीड़ित थीं, अपने शौहर को समझाने की हर कोशिश करके देख लेने और उसमें नाकाम होने के बाद रेशमा ने शौहर के ज़ुल्मो-सितम को मानने से सिर्फ़ इंकार ही नहीं किया बल्कि इस्लाम में बीवी को दिए गए हक़ों में से एक "ख़ुला" का इस्तेमाल करते हुए शौहर (शारिक सिद्दीक़ी) के साथ अपने निकाह को ख़त्म करते हुए उसे अपनी ज़िन्दगी से बाहर कर दिया।   

रेशमा ने अपनी शादीशुदा ज़िंदगी को एक ज़ालिम मर्द के साथ रिश्ते में रहते हुए घुट-घुट कर गुज़ारने से बेहतर अपनी बेटी के साथ सुकून की ज़िन्दगी बसर करने का रास्ता चुना. रियल इस्लामी तरीक़े से रेशमा ने स्थापित, मौजूदा पारम्परिक समाज में जिस तरह ये पहल की है वो अपने आप में क्रन्तिकारी होने के साथ ही चुनौती भरा क़दम है. एक ऐसे वक़त में जब एक वक़्त में ज़ुबानी तौर पर बोले गए (तीन) तलाक़ को अपराध मानते हुए बीवी की शिकायत भर से शौहर को जेल की सलाख़ों के पीछे पहुंचाया जा सकता है- उस वक़्त रेशमा सिद्दीक़ी का निकाह से आज़ाद होने के लिए अपने शरई "ख़ुला" हक़ का इस अंदाज़ में (पब्लिकली) इस्तेमाल- करना तो दूर सोचना ही बहोत बड़ी बात है. रेशमा की हिम्मत को सलाम. उनके इस इंक़लाबी क़दम की “धमक” मौजूदा वक़्त से  बहोत दूर तलक जाएगी.

ग़ौर करने लायक़ बात है के जहाँ एक तरफ़ सामंती भारतीय मुसलमान और उनकी क़ायम की गई "मर्दाना अदालत" (क़ज़ियात) पर रेशमा का ये क़दम  ज़बरदस्त चोट कर गया है वहीं दूसरी तरफ़ आम भारतीय मुसलमान औरतों के पैरों से समाज और झिझक, ख़ुद को असहाय समझने के एहसास की बेड़ियाँ काट कर, उसकी ख़ुद्दारी, ख़ुशियों और सुकून की आज़ादी का पैग़ाम भी देता है.  यही नहीं, रेशमा के क़दमों की “धमक”   तमाम सोशल एक्टिविस्टों, महिला आंदोलनों के लिए एक हेल्दी, ईमानदार और सार्थक बहस के दरवाज़े भी खोलता है.  आंखों में नास्तिकता का चश्मा चढ़ाए, सिर्फ़ ख़ुद के प्रोग्रेसिव, समझदार होने का झूठा दम्भ पाले वे तमाम श्रेष्ठी वर्ग, जिनकी ज़हनियत(मानसिकता) में मुसलमान औरत बेचारी, प्रताड़ित, मज़हबी तौरपर लाचार, दबाई गई, कुचली गई रही है- रेशमा के फ़ैसले की गूँज उनके लिए भी ख़बरदार हो जाने की वजह बनेगी.

मर्दवादी भारतीय क़ज़ियात (शरई अदालत) और उसमें बिराजे मज़हबी "ठेकेदारों" को भी एक ख़ामोश मगर दहाड़ती चुनौति देता हैं रेशमा का ये क़दम. ये कहने में कुछ ग़लत नहीं के आज भी ज़्यादातर भारतीय शरई अदालतें, दारुल क़ज़ा क़ुरआन के क़ायदे-क़ानून पर नहीं बल्कि मनुस्मृति आधारित पति-परमेशवर, बीवी-अर्धांगिनी और  मालिक-दास के अमानवीय, ग़ैर इंसानी, अलिखित कान्सेप्ट को प्रैक्टिस करने के लिए मुस्लिम औरतों, उनके बेबस, ग़रीब रिश्तेदारों को मजबूर करती आ रही है.

हमारे मुल्क में जब जब दीने इस्लाम की सही (क़ुरआनिक) समझ रखने वाले (मर्द/औरतें) लोगों ने, औरतों के बराबर से इंसानी हुक़ूक़ (अधिकारों), उनकी वसीयतों और उनके रिश्ते के मर्दों की ज़िम्मेदारी के क़ुरआनी हुक्म पर समाज में चेतना जगाने या समझाईश देने की कोशिश की, विक्टिम औरतों के साथ, उनकी आवाज़ में ईमानदार, प्रोग्रेसिव  आवाज़ें  मिलाने की थोड़ी भी कोशिश की गयी, तब तब उन्हें ख़ामोश करने के लिए  (ग़ैर क़ुरआनी) शरई अदालतों की तरफ़ से फ़तवों की दबंगई के हमले किये जाने लगते. शाहबानो से लेकर आज तक ये मर्दवादी अदालतें और स्वयंभू पर्सनल लॉ बोर्ड और सिर्फ़ परम्पराओं को इस्लाम मानने वाली इनकी जाहिल भीड़ ने ततैयों की तरह क़ुरआन के तौर तरीक़ों से हक़ का पैग़ाम देने वालों को दुश्मने इस्लाम की तरह ट्रीट किया है.  वे तमाम लोग जो हिन्दू औरतों को धार्मिक तौर पर मुसलमान औरतों से ज़्यादा अधिकार संपन्न मानते हैं उन सभी के लिए रेशमा का ये क़दम आश्चर्य में डालने वाला है।

1500 बरस पुरानी किताब (क़ुरआन)/ बातों को न मानने की सलाह देने वाले और उसे छोड़कर आगे बढ़ने की (दबी ज़ुबान में धमकी देने वाले) बात कहने वाले हमारे कुछ अज्ञानी मित्रों को यहाँ ये बताना ज़रूरी हो जाता है के आज़ादी के 2 बरस पहले तक भी (1945 - 46) हमारे मुल्क में  मुसलमान औरत  क़ुरआन में दिए गए अपनी आज़ादी के हक़ "ख़ुला" हक़ का इस्तेमाल करती रही है. आज भी हमारे मुल्क के कुछ अमीर अशराफ (उच्च वर्णों) तबक़ों के मर्द अपनी बहन और बेटियों से "ख़ुला" का इस्तेमाल अपनी मर्ज़ी (ज़बरदस्ती) से शौहर या उसके ख़ानदान को सबक़ सिखाने के लिए करवाते हैं-जो निहायत शर्मनाक हरकत है. 

रेशमा का ये इंक़लाबी क़दम मर्दों की बनाई/ चुनी गई शरई अदालतों में बैठे मर्दों और मर्दानगी का दस्तख़त बनीं  उन तमाम औरतों के लिए भी ये एलान करता है के क़ुरआन में मौजूद ग़ौरो-फ़िक्र की हिदायत को अपनाते हुए औरतों और उनके बच्चों के हक़ में सच्चाई और इंसाफ़ के लिए मुंह खोलो वर्ना सात जन्मों वाली (ग़ैर इस्लामी) परम्पराओं से जूझ रही मुसलमान औरतें अपने इस्लामी हक़ों का इस्तेमाल करने लगेगी, फ़िर चाहे वो शौहर से अलग होने का मसला हो या बाप, भाई, शौहर या बेटों की बनायीं जायदाद में अपने अल्लाह द्वारा तय किये गए हिस्से का हक़ लेने का मसला हों आज की मुसलमान ख़ातून अपना हक़ छीन लेने में अब नहीं चूकेगी.  

कितनीअच्छी, मानवीय, क़ाबिले फ़ख्र और हम सभी के लिए ग़ौर करने वाली बात है के इस्लाम में क़ुरआन के ज़रिए अपनी औरतों को उसकी ज़िन्दगी में आने वाले हर रिश्ते( मां, बेटी, बहन, बीवी)में सम्मान, बराबरी(आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तौर पर) से फ़ैसले लेने का सिर्फ़ हक़ ही नहीं दिया गया है बल्कि उसके रिश्ते के हर मर्दों पर औरतों के लिए गए फ़ैसलों (सामाजिक, सांस्कृतिक चलन/परंपरा के मुताबिक़) का सम्मान करते हुए उस पर अमल  (यथासंभव) करने/ करवाने की ज़िम्मेदारी भी डालता है. यही नहीं लड़की की मर्ज़ी के बग़ैर ज़बरदस्ती कर दिए गए निकाह को अपनी तरफ़ से ख़ारिज करवाने का सीधा एकतरफ़ा हक़ भी उस औरत के पास है.

क़बीलाई समाजों में अक्सर कम उमरी में, ख़ानदानों की दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने के लिए निकाह कर दिए जाते हैं लेकिन होश की उम्र आने के बाद लड़की उस रिश्ते से इंकार करते हुए वो रिश्ता ख़तम कर सकती है, दूसरा निकाह कर सकती है.  (मौजूदा वक़्त में ऐसी कई घटनाओं को गूगल की  मदद से आसानी से देखा जा सकता हैं)   

ये कहने में कोई झिझक नहीं के दुनिया का इकलौता मज़हब इस्लाम ही है जहां क़ुरआन के ज़रिये विधवा या तलाक़शुदा औरतों से निकाह करने वाले मर्दों को सम्मान दिया गया है. ऐसी औरतों के लिए बस यही शर्त है के वे अपने इद्दत (रोके जाने वाले दिन) पूरी करके दूसरा निकाह कर सकती हैं. (विधवा के लिए 4 माह 10 दिन, तलाक़शुदा के लिए 3 माह 10 दिन- वो भी इसलिए के अगर औरत प्रेगनेंट है तो फिर आने वाले बच्चे की विरासत, आर्थिक प्रोटेक्शन और उसके चाइल्ड राईट का निर्धारण तय किया जा सके.    

अब ये रौशन हक़ीक़त (सच) है के क़ुरआन में इंसानियत, जेंडर बराबरी के साथ ही बहोत सारे टॉपिक और मसलों पर बात की गयी है. फ़िलहाल हम यहां क़ुरआन में औरतों के हक़, औरतों तक पहुँचाने के लिए उनके रिश्तेदार मर्द को ज़िम्मेदार बनाए जाने को लेकर बात कर रहे हैं, जो दूसरी मज़हबी कहाँ जाने वाली किताबों में देखने को नहीं मिलता. लेकिन ज़मीनी कड़वी सचाई ये है के हमार सामाजिक प्रैक्टिस में ऐसा कुछ भी होता हुआ दिखलाई नहीं पड़ता. आमजन की नकारात्मक धारणा "जो दिखता है" उसी से क़ायम होती है. तो फ़िर भारतीय मुस्लिम औरतें मनुस्मृति आधारित चतुर्वर्णीय, सामाजिक, सांस्कृतिक मकड़जाल से कैसे आज़ादी हासिल करेंगी?  इसका जवाब सीधी रेखा में नहीं बल्कि सिलसिलेवार पायदान (सीढ़ियों) की शक्ल में दिया जा सकता है. मुस्लिम ख़वातीन को सबसे पहले अपने घर में ढंक कर रखे गए  क़ुरआन को समझकर पढ़ना, सीखना होगा.  इसके साथ ही दुनिया के दूसरे इस्लामिक मुल्कों के पर्सनल लॉ में किये गए संशोधनों, बदलावों को जानना, समझना होगा, उसपर ग़ौरो फ़िक्र करते हुए अपने इल्म को समाज के अंतिम छोर में प्रताड़ित होती ख़ातूनों तक भी पहुँचाना होगा.  

यक़ीनन ये काम दो चार हफ़्तों,   कुछ महीने, साल का नहीं है बल्कि बरसों बरस, पीढ़ियां सुधारने का ये काम बतौर एक तहरीक, मुहीम के तौर पर चलाई जानी होगी जिससे हमारी अगली पीढ़ी, पिछली ज़िन्दगी और उसके मायने बदले जा सकें. अपनी आने वाली पीढ़ियों को अमनों इन्साफ़ की रौशनी देने के लिए हम सभी बाशऊर मुसलमानों को कम से कम आज से ही "जलना" पड़ेगा.   बक़ौल शायर –

 "ख़ुद बदल जायेगा सब ये सोचना बेकार है

सबकुछ बदल देने की अब शुरुआत करनी चाहिए…."

( प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं )


पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण-मुक्ति का शंखनाद

पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण-मुक्ति का शंखनाद

01-Oct-2019

ललित गर्ग-

दिल्ली के मावलंकर ओडिटोरियम में जिस तरह का प्रकृति-पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण-मुक्ति का शंखनाद हुआ, वह विश्व की ज्वलंत समस्या के समाधान की दिशा में एक सार्थक कदम कहा जायेगा। अवसर था भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा 26वें भाऊराव देवरस स्मृति व्याख्यान का। विषय था पर्यावरणीय संकट और जनजीवन के लिये चुनौतियां। इस अवसर पर जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कुशल राजनीतिक एवं पर्यावरणविद की भांति धरती पर मंडरा रहे खतरों के लिये जागरूकता एवं स्वच्छ जल जन-जन तक पहुंचाने का जो संकल्प व्यक्त किया वह एक शुभ संकेत है, नये भारत के अभ्युदय का प्रतीक है। उम्मीद बंधी कि सरकार की नीतियों में जल, जंगल, जमीन एवं जीवन की उन्नत संभावनाएं और भी प्रखर रूप में झलकेगी।

नवरात्रा के शुभारंभ पर भव्य उपस्थिति के बीच श्रोताओं ने महसूस किया कि पर्यावरण के सम्मुख उपस्थित खतरे कितने भयावह एवं जानलेवा है एवं उनके समाधान की दृष्टि से सरकार के साथ-साथ भाऊराव देवरस सेवा न्यास जैसे जनसेवा संगठनों ने कुछ ठानी है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए। क्या कुछ छोटे, खुद कर सकने योग्य कदम नहीं उठाये जा सकते? पर्यावरण संरक्षण में हम हर तरह से सहयोग करने की कोशिश कर सकते। जलवायु परिवर्तन भी विभिन्न प्रकार के भूमि क्षरण का कारण बन रहा है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, अनियमित वर्षा, असंतुलित मौसम चक्र और तूफान के कारण ऐसा हो रहा है।

इस व्याख्यान में दुनिया में बढ़ते मरुस्थलीकरण से बचाने की चर्चा भी हुई। भगवतीप्रकाश शर्मा, कुलपति - गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने अपने विस्तृत व्याख्यान में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, मरुस्थलीकरण, वायु, जल, जंगल, जमीन, ध्वनि, कृषि प्रदूषण जैसी समस्याओं की चर्चा करते हुए कहा कि यदि शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी तो इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा। आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया जाए, जिसमें मुख्यतः धूप, खनिज, वनस्पति, हवा, पानी, वातावरण, भूमि तथा जानवर आदि शामिल हैं।

इन संसाधनों का अंधाधुंध दुरुपयोग किया जा रहा है, जिसके कारण ये संसाधन धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर हैं। इस जटिल होती समस्या की ओर चिन्तीत होना एवं कुछ सार्थक कदम उठाने के लिये पहल करना जीवन की नयी संभावनाओं को उजागर करता है। इंसान की आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती भविष्य में भी सुरक्षित बनी रहे इसके लिये भारत इसमें अग्रणी भूमिका निभा सकता है। क्योंकि भारत के पास समृद्ध विरासत एवं आध्यात्मिक ग्रंथ ऋग्वेद आदि है जो पर्यावरण का आधार रहे हैं।

भगवतीप्रकाश शर्मा ने जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता में कमी और भूमि के बंजर होने के कारणों में इंसानी दखल को प्रमुख बताया, तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। अब सकारात्मक दखल के जरिए इसे सुधारने और भावी पीढ़ी को बेहतर भविष्य देने का समय आ गया है। पिछले 200 साल में हमने पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचाया है, उसे ठीक करना है। उन्होंने पौधों एवं कीट-पतंगों के लगातार कम होती किस्मों को भी पर्यावरण के सम्मुख गंभीर संकट बताया। समूचे विश्व में 2 लाख 40 हजार किस्म के पौधे और 10 लाख 50 हजार प्रजातियों के प्राणी हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजनर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) एक की रिपोर्ट में कहा कि विश्व में जीव-जंतुओं की 47677 विशेष प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियां यानी 15890 प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है।

आईयूसीएन की रेड लिस्ट के अनुसार स्तनधारियों की 21 फीसदी, उभयचरों की 30 फीसदी और पक्षियों की 12 फीसदी प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं। वनस्पतियों की 70 फीसदी प्रजातियों के साथ ताजा पानी में रहने वाले सरिसृपों की 37 फीसदी प्रजातियों और 1147 प्रकार की मछलियों पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। ये सब इंसान के लालच और जगलों के कटाव के कारण हुआ है। गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों ही नहीं, जंगलों से खत्म हो गए। 99 प्रतिशत लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया? लोग कहते है कि उल्लू से क्या फायदा, मगर किसान जानते हैं कि वह खेती का मित्र है, जिसका मुख्य भोजन चूहा है। भारतीय संस्कृति में पशु पक्षियों के संरक्षण और संवर्धन की बात है। इसीलिए अधिकांश हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के वाहन पशु -पक्षियों को बनाया गया है। एक और बात बड़े खतरे का अहसास कराती है कि एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है।

गजेन्द्र सिंह शेखावत ने लगातार दूषित होते जल, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और भूमि क्षरण जैसे मुद्दों पर सरकार की जागरूकता एवं सहयोग का भरोसा दिलाया। उन्होंने प्लास्टिक प्रदूषण के खतरों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार ने ठान लिया है कि भारत में सिंगल यूज प्लास्टिक के लिए कोई जगह नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूर्व में ही देश को स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने की अपील करते हुए एक महाभियान का शुभारंभ गांधी जयंती के अवसर पर करने का संकल्प व्यक्त कर चुके हैं। प्रकृति को पस्त करने, मानव जीवन एवं जीव-जन्तुओं के लिये जानलेवा साबित होने के कारण समूची दुनिया बढ़ते प्लास्टिक के उपयोग एवं उसके कचरे से चिन्तित है।

जैसा कि सर्वविदित है कि 2015 और 2017 के बीच भारत में पेड़ों और जंगल के दायरे में आठ लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) ने पिछले महीने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विश्व में 23 फीसदी कृषियोग्य भूमि का क्षरण हो चुका है, जबकि भारत में यह हाल 30 फीसदी भूमि का हुआ है। इस आपदा से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन को रोकना ही काफी नहीं है। इसके लिए खेती में बदलाव करने होंगे, शाकाहार को बढ़ावा देना होगा और जमीन का इस्तेमाल सोच-समझकर करना होगा।

जल, जंगल और जमीन इन तीन तत्वों से प्रकृति का निर्माण होता है। यदि यह तत्व न हों तो प्रकृति इन तीन तत्वों के बिना अधूरी है। विश्व में ज्यादातर समृद्ध देश वही माने जाते हैं जहां इन तीनों तत्वों का बाहुल्य है। बात अगर इन मूलभूत तत्व या संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। आधुनिकीकरण के इस दौर में जब इन संसाधनों का अंधाधुन्ध दोहन हो रहा है तो ये तत्व भी खतरे में पड़ गए हैं एवं भूमि की उत्पादकता कम होती जा रही है, पानी की कमी हो रही है। ऊपजाऊ भूमि भी रेगिस्तान में तब्दील हो रही है। तकनीकी तौर पर मरुस्थल उस इलाके को कहते हैं, जहां पेड़ नहीं सिर्फ झाड़ियां उगती हैं। जिन इलाकों में यह भू-जल के खात्मे के चलते हो रहा है, वहां इसे मरुस्थलीकरण का नाम दिया गया है। लेकिन शहरों का दायरा बढ़ने के साथ सड़क, पुल, कारखानों और रेलवे लाइनों के निर्माण से खेतिहर जमीन का खात्मा और बची जमीन की उर्वरा शक्ति कम होना भू-क्षरण का दूसरा रूप है, जिस पर कोई बात ही नहीं होती। लेकिन मोदी सरकार की जागरूकता से इस पर बात ही नहीं हो रही, बल्कि इस समस्या से निजात पाने की दिशा में सार्थक कदम भी उठाये जा रहे हैं।

चिन्तन एवं चिन्ता का एक ही मामला है लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही बंजर भूमि, सिकुड़ रहे जलस्रोत, विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन- ये सब देश के लिए सबसे बडे़ खतरे हैं और इन खतरों का अहसास करना एवं कराना ही इस व्याख्यान का ध्येय था। प्रतिवर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। हर चीज की उपलब्धता कम हो रही है। आक्सीजन की कमी हो रही है। साथ ही साथ हमारा सुविधावादी नजरिया एवं जीवनशैली पर्यावरण एवं प्रकृति के लिये एक गंभीर खतरा बन कर प्रस्तुत हो रहा हैं। इस दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ाने के लिए हमें विकास प्रक्रिया पर ठहरकर सोचने के लिए तैयार होना होगा। बात तभी बनेगी जब सरकार के साथ-साथ समाज भी अपना नजरिया बदले। इन स्थितियों मे भाऊराव देवरस जैसे समाजसेवी एवं करूणाशील व्यक्तित्व का शाश्वत आह्वान घोर अंधेरों के बीच उजालों के अवतरण का द्योतक है।

भाऊराव देवरस सेवा न्यास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को पोषित एवं पल्लवित करने वाला संगठन है, सेवा, शिक्षा एवं संस्कार निर्माण के अनूठे प्रकल्प को आकार देते हुए वह प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति भी जागरूक है। सीमित साधनों में यह न्यास समाज निर्माण का विलक्षण कार्य कर रहा है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक-राष्ट्रीय संगठन के रूप में न्यास देश और शायद दुनिया का एक अनुकरणीय सेवा प्रकल्प है।

जिसने हमेशा नई लकीरें खींची हैं, एक नई सुबह का अहसास कराया हैं। वह शोषण और स्वार्थ रहित समाज चाहता है, जिसमें सभी लोग समान हों। समाज में कोई भेदभाव न हो। दूसरों के अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता आदर्श जीवनशैली का आधार तत्व है और न्यास इसे प्रश्रय देता है। इसके बिना अखण्ड राष्ट्रीयता एवं समतामूलक समाज की स्थापना संभव ही नहीं है। जब तक व्यक्ति अपने अस्तित्व की तरह दूसरे के अस्तित्व को अपनी सहमति नहीं देगा, तब तक वह उसके प्रति संवेदनशील नहीं बन पाएगा। प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति भी संवदेनशीलता जागना जरूरी है।


एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर नहीं रखने चाहिए :कंगना रनौत

एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर नहीं रखने चाहिए :कंगना रनौत

30-Sep-2019

कंगना रनौत बोली- एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर नहीं रखने चाहिए और टीनेजर्स को सेफ सेक्स पर फोकस करना चाहिए
बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने हाल ही में एक मीडिया समिट में काफी मुद्दों पर खुलकर बात की। कंगना रनौत ने रिलेशनशिप से जुड़े एक सवाल पर अपने बारे में बात करते हुए कहा कि जब उनके माता-पिता को मालूम हुआ कि कंगना सेक्सुअली एक्टिव हैं। उस वक्त उनके माता-पिता चौक गए थे।
संजीवनी टुडे पर छपी खबर के अनुसार, कंगना ने आगे कहा कि माता-पिता को इस बात के साथ कंफर्टेबल होना चाहिए कि उनके बच्चों के सेक्शुअल पार्टनर हैं। उन्हें इस बात की जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि बच्चे संतुलित सेक्स करें और प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करें।

 

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पिंकविला की रिपोर्ट के मुताबिक, कंगना ने कहा कि पार्टनर्स बदलना ठीक नहीं है, ये आपके सिस्टम को बिगाड़ देगा। पार्टनर नहीं बदलने को लेकर एक बहुत गहरा विज्ञान है जो ये बताता है कि इसके कितने घातक परिणाम होते हैं। कहा कि लोगों को एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर नहीं रखने चाहिए और टीनेजर्स को सेफ सेक्स पर फोकस करना चाहिए।
पिंकविला के अनुसार, कंगना रनौत ने कहा, “सेक्स हर किसी की जिंदगी का अहम हिस्सा है, लेकिन जब भी आपको सेक्स की जरूरत महसूस हो तो आपको करना चाहिए। इससे ऑब्सेस्ड होने की जरूरत नहीं है।”

 

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डॉ. कफील को क्लीन चिट मामले में सीएम के सलाहकार बोले- रिपोर्ट का गलत…!

डॉ. कफील को क्लीन चिट मामले में सीएम के सलाहकार बोले- रिपोर्ट का गलत…!

29-Sep-2019

डॉ. कफील को क्लीन चिट मिलने के मामले में नया मोड़ आ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने कहा है कि डॉ. कफील ने रिपोर्ट का गलत निष्कर्ष निकाला है।
वहीं, कफील खान ने शनिवार को मांग की कि उन्हें सम्मान के साथ बहाल किया जाना चाहिए। बता दें कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अगस्त 2017 में ऑक्सीजन की कमी से हुई 70 बच्चों की मौत के मामले में आरोपी डॉ. कफील को चार मामलों में से सिर्फ एक में ही क्लीन चिट मिली है। आरोप है कि घटना के वक्त 100 बेड के एईएस वार्ड के नोडल प्रभारी डॉ. कफील ही थे, जबकि जांच में यह आरोप निराधार पाया गया है।
शुक्रवार को डॉ. कफील खान को पूरे मामले में क्लीन चिट मिलने की खबरें आती रहीं, जबकि शासन के अनुसार उनके खिलाफ अभी विभागीय जांच चल रही है और अंतिम कार्रवाई बाकी है। वहीं, शनिवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने एक बयान में कहा है कि यह कहना सही नहीं कि डॉ. कफील को विभागीय जांच में क्लीन चिट मिल गई है। उन्होंने रिपोर्ट का गलत निष्कर्ष निकाला है।

डॉ. कफील को सिर्फ एक मामले में मिली क्लीन चिट
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के ऑक्सीजन कांड में आरोपी बनाए गए बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कफील खान को सिर्फ एक मामले में ही क्लीनचिट मिली है। तत्कालीन प्रमुख सचिव स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन हिमांशु कुमार ने लगभग छह महीने पहले शासन को सौंपी अपनी जांच रिपोर्ट में उन्हें 100 बेड के एईएस वार्ड के नोडल ऑफिसर मामले में क्लीनचिट दी थी। हालांकि इस रिपोर्ट के आने के बाद भी डॉ. कफील को बहाल नहीं किया गया है।
शासन ने हिमांशु कुमार से पूरे मामले की जांच कराई थी। प्रमुख सचिव की जांच में डॉ. कफील के खिलाफ लापरवाही के साक्ष्य नहीं मिले। इसी आधार पर प्रमुख सचिव ने 18 अप्रैल 2019 को शासन को रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें कहा गया था कि डॉ. कफील के पास 100 बेड वार्ड के नोडल अधिकारी का चार्ज नहीं था और न ही वह ऑक्सीजन की आपूर्ति के मामले में किसी कमेटी में थे।

छह महीने बाद सामने आई इस रिपोर्ट को डॉ. कफील की ओर से मेडिकल कॉलेज प्रशासन से लेकर अन्य जिम्मेदारों के पास भेजा गया। डॉ. कफील ने निलंबन वापसी की गुहार भी लगाई लेकिन कुछ हुआ नहीं। इस संबंध में जांच अधिकारी हिमांशु कुमार से पक्ष जानने की कोशिश की गई, मगर उन्होंने फोन नहीं उठाया।

डॉ. कफील अहमद खान के खिलाफ विभागीय जांच अभी जारी है। उन्हें 100 बेड के एईएस वार्ड के नोडल ऑफिसर मामले में क्लीनचिट मिली है, उनके खिलाफ अन्य कई गंभीर मामले हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कार्रवाई की जाएगी।

 


जज़्बात और इज्ज़त से खेलने का अधिकार किसने दिया?

जज़्बात और इज्ज़त से खेलने का अधिकार किसने दिया?

28-Sep-2019

डाक्टर कफील खान को जांच रिपोर्ट में पूरी तरह निर्दोष बताया गया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।  सिर्फ यही नहीं न जाने कितने उदाहरण हमारे आपके सामने हैं।
सवाल वही है कि जो इतने दिनों तक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना बर्दाश्त किया उसकी भरपाई कौन करेगा? क्यूं पावर का दुरुपयोग किया जा रहा है? क्यूं सत्ता को बदनाम किया जा रहा है? क्यूं इंसान की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है? इन सबका जवाब कौन देगा?
 यह बिकी हुई मीडिया जिसका न कोई जमीर है न चरित्र, इसको कौन रोकेगा। एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर रही है । मीडिया को यह अधिकार आखिर किसने दिया है कि बिना इल्ज़ाम साबित हुए किसी भी इंसान की इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ करे नमक मिर्च लगाकर उसको चोर, उचक्का , बदमाश बनाकर अपने अखबार और चैनल की टीआरपी बढ़ाये। क्या इनके ज़मीर इतना मुर्दा  हो गया है कि वह यह नहीं सोचते कि वह भी इंसान है उसका भी परिवार है । सबकी जिंदगी नरक हो जाती है।
 आखिर इन सब सवालों का जवाब कौन देगा?
आज कल सामान बेचने से आसान है अपना ज़मीर बेचना। रोजगार तलाशने से अच्छा है ज़मीर बेचना जिससे आपको सब कुछ हासिल हो जायेगा।
सवाल यह है कि किस्से फरियाद की जाये? फरियाद सुनने वाले ही अगर गलत हैं तो फिर कुछ नहीं हो सकता।
राजनीति का शुद्धिकरण कौन करेगा। दिल्ली में केजरीवाल सरकार काम कर रही है उसके पीछे भी जाहिल अनपढ़ हाथ धो के पीछे पड़े हैं। क्या यही देश प्रेम है? सिर्फ कागज़ी कार्यवाही से कुछ नहीं होगा। 
जनता को आगे आना होगा। आवाज उठानी होगी। ख़ामोश रहना भी जालिम का साथ देने के बराबर है।
राजनीति का मतलब लोग नहीं जानते हैं। कैल थॉमस ने कहा है कि राजनीति से घृणा करने वाले कारणों में एक कारण यह है कि सत्यता शायद ही कभी एक राजनीतिज्ञ का उद्देश्य रही हो। अधिकतर राजनीतिज्ञों का मुख्य उद्देशय चुनाव जीतकर शक्ति प्राप्त करना होता है”। जिस शक्ति का आज दुरुपयोग हो रहा है।
अगर भारतीय लोकतंत्र की राजनीति को ईमानदारी से बगैर किसी भेदभाव के समृद्ध बनाना है तो राष्ट्र के लिए एक साथ आगे बढने की कोशिश करनी चाहिए और समझना चाहिए कि इसे हर हाल में करना है?

यह समय, हम लोगों के पास जागरूक होने और उन नेताओं और राजनीतिक दलों पर सवाल उठाने, और उन्हें सही प्रकार से बदलने के लिए मजबूर करने का है, जिनके लिए हमारे पास वोट के रूप में एक महत्वपूर्ण  हथियार (ईवीएम प्रतिबंधित होने के बाद) मौजूद है ।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट
syedtaqvi12@gmail.com


PMC बैंक पर RBI ने की 6 महीने के लिए नोटबंदी ! ग्राहक नहीं निकाल सकते 1000 रुपए से अधिक

PMC बैंक पर RBI ने की 6 महीने के लिए नोटबंदी ! ग्राहक नहीं निकाल सकते 1000 रुपए से अधिक

26-Sep-2019

आरबीआई ने पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) पर 6 महीने के लिए प्रतिबंध लगा दिए. इसके मुताबिक पीएमसी बैंक नए लोन नहीं दे सकेगा, ना ही पुराने लोन रिन्यू कर सकेगा. कोई निवेश नहीं कर सकेगा ना ही कर्ज या जमा ले सकेगा. खाताधारक 1000 रुपए से ज्यादा नहीं निकाल सकेंगे. आरबीआई ने मंगलवार को ये निर्देश जारी किए. बैंक के पास ग्राहकों के 11,000 करोड़ रुपए जमा हैं. आरबीआइ के इस आदेश के बाद बैंक की तमाम शाखाओं में ग्राहकों की भीड़ पहुंच गई, जिन्हें शांत करने के लिए पुलिस बल का भी प्रयोग करना पड़ा है.

आरबीआइ की तरफ से जारी सूचना में बताया गया है कि पंजाब व महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में किसी भी तरह का खाता रखने वाले (बचत, चालू या कोई अन्य खाता) ग्राहकों को महज 1000 रुपये निकालने की छूट होगी. बैंक को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह आरबीआइ के आदेश के बिना कोई भी नया कर्ज आवंटित नहीं करे, ना ही कोई निवेश करे और ना ही कोई जमा स्वीकार करे. साथ ही बैंक प्रबंधन पर किसी भी तरह के दायित्वों या संपत्तियों को बेचने पर भी रोक लगा दी गई है. आरबीआई ने यह कार्रवाई बैंकिग रेलुगेशन एक्ट, 1949 के सेक्‍शन 35ए के तहत की है.

बैंक की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 2018-19 में मुनाफा 1.20% घटकर 99.69 करोड़ रुपए रह गया. नेट एनपीए 1.05% से बढ़कर 2.19% पहुंच गया. पीएमसी बैंक पर एनपीए कम बताने समेत प्रबंधन में कई तरह की खामियों के आरोप हैं. आरबीआइ के इस निर्देश पर पीएमसी बैंक के एमडी जॉय थॉमस ने कहा कि उन्हें आरबीआइ की तरफ से रोक लगाए जाने का दुख है.

 

 


भगवान के नाम चिट्ठी लिखकर चोर ने मंदिर से चुरा ली दान पेटी

भगवान के नाम चिट्ठी लिखकर चोर ने मंदिर से चुरा ली दान पेटी

25-Sep-2019

एजेंसी 


मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के सारनी में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। यहां एक चोर ने चोरी करने से पहले भगवान के नाम एक चिट्ठी लिखी और फिर मंदिर की दान पेटी को तोड़कर उसने रखा कैश उड़ा ले गया। चिट्ठी में चोर ने अपने पापों की माफी मांगी थी।

दरअसल, सारनी शहर के राधाकृष्णन वार्ड के हनुमान मंदिर से एक चोर ने दान पेटी तोड़कर हजारों रुपयों की चोरी कर ली। मंगलवार को जब श्रद्धालु पूजा के लिए मंदिर आए तो उन्होंने मंदिर की दान पेटी टूटी हुई देखी। दान पेटी के पास चिट्ठी मिली, जिसमे चोर ने सारे गुनाहों को माफ करने की बात लिखी है। चोर ने चिट्ठी में कहा कि वह परेशान होने के कारण ऐसा काम कर रहा है। मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक, मंदिर सार्वजनिक है। यहां कोई पुजारी नहीं रहता है। दान पेटी पिछले तीन सालों से नहीं खोली गई थी। पेटी में लगभग 40 से 50 हजार रुपये नकद राशि हो सकती है।

चोर ने चिट्ठी में लिखा था, ''हे भगवान, मैंने जो भी गलती अभी तक की है, उसके लिए आपने क्षमा किया है। आज से मैं अपने इन कार्यों को पूरी तरह छोड़ दूंगा। भगवान धर्म खातिर और आई, पापाजी के लिए आपको आना ही होगा। अगर सब कुछ ठीक हो जाता है तो मैं समझूंगा, आपने मुझे आखिरी मौका दिया है। भगवान अब अगर सब कुछ ठीक हो गया तो मैं आपके किसी भी मंदिर में 500 रुपए दान करुंगा।''


मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम और अन्य को नोटिस जारी किया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम और अन्य को नोटिस जारी किया

25-Sep-2019

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने सोमवार को कथित स्ट्रीमिंग अश्लील और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री के खिलाफ नियमन के लिए नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, आदि जैसे ओवर द टॉप (ओटीटी) मीडिया प्लेटफार्मों के खिलाफ दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया। न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति शैलेन्द्र शुक्ला की खंडपीठ ने केंद्र सरकार और दस प्रतिवादी कंपनियों को जवाब देने को कहा है। AltBalaji, Netflix, Amazon Prime, Ullu, Voot, Vuclip, Hoichoi, Yashraj Films, Arre और Zee5 ने छह हफ्तों के भीतर इस पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।

वकील अमय बजाज, आशी वैद्य, पारितोष श्रीवास्तव और अनमोल कुशवाहा के माध्यम से एक एनजीओ मातर फाउंडेशन द्वारा याचिका दायर की गई थी, जिसमें केंद्र सरकार से इस मामले में नियम बनाने और सामग्री को विनियमित करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी। इस याचिका में इन प्लेटफार्मों को दिशा-निर्देशों के लिए अपनी वेबसाइटों के साथ-साथ इंटरनेट से सभी कथित अवैध सामग्री को तत्काल प्रभाव से हटाने के लिए भी प्रार्थना की गई। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सरकार ने 2015 में अश्लील वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा दिया था और अभी तक, उत्तरदाताओं ने "नग्न, अश्लील, यौन रूप से स्पष्ट, गैरकानूनी और अश्लील सामग्री" की स्ट्रीमिंग जारी रखी। इसमें तर्क दिया गया कि उत्तरदाताओं को उनकी सामग्री के माध्यम से "महिलाओं को वस्तुबद्ध" किया गया था, जो बड़े पैमाने पर जनता के लिए आसानी से सुलभ था।

ऐसी सामग्री कम उम्र के बच्चों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। अधिवक्ता अमय बजाज ने कहा कि उत्तरदाताओं ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीवन के अधिकार को प्रभावित किया है और कहा है कि, "स्ट्रीम की गई सामग्री महिलाओं को गलत अर्थों में दिखा रही हैं और बच्चों के साथ-साथ युवाओं के दिमाग को भी दूषित कर रही हैं। ये कंपनियां भारतीय दंड संहिता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, महिलाओं का प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम और भारतीय संविधान के कई प्रावधानों का भी उल्लंघन कर रही हैं।" उन्होंने कहा, "हमने केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों में आरटीआई दायर की लेकिन विषय वस्तु पर अधिकार क्षेत्र के आधार पर वहां इनकार कर गया।"

साभार : LIVELAW से 


चरित्र शंका में पत्नी का पीछा कर रहा था पति, बिजली के खंभे से बांधकर पत्नी ने की जमकर पिटाई

चरित्र शंका में पत्नी का पीछा कर रहा था पति, बिजली के खंभे से बांधकर पत्नी ने की जमकर पिटाई

25-Sep-2019

मीडिया रिपोर्ट 

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में एक पति को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करना और उसकी पीछा करना भारी पड़ गया। पत्नी ने अपने पति को खंभे से बांधकर उसकी घूंसों और थप्पड़ों से जमकर पिटाई कर दी। इस दौरान राहगीरों ने भी उसे शोहदा समझकर पीट दिया। बाद में मामला पुल‍िस तक पहुंचा, लेक‍िन वहां दोनों का समझौता कराकर पुल‍िस ने उन्हें घर भेज दिया। अब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला कानपुर जिले के बाबूपुरवा थाना इलाके का है। बता दें कि महिला किदवई नगर इलाके में एक शॉपिंग दुकान में काम करती है। उसका पति उसके चरित्र पर शक करता था। पत्नी के मोबाइल पर बातचीत करने पर भी उसे ऐतराज था। इसलिए आए दिन दोनों के बीच विवाद होता था। सोमवार को उसकी पत्नी किदवई नगर हनुमान मंदिर की तरफ जा रही थी। इस बात की भनक लगने पर पति उसका पीछा करने लगा। लेकिन रास्ते में पत्नी ने पति को देख लिया। इस बात को लेकर दोनों के बीच विवाद होने लगा। विवाद इतना बढा कि दोनों के बीच मारपीट शुरू हो गई।

पहले पति ने पत्नी को लगातार कई तमाचे मारे। लेकिन स्थानीय लोगों ने शोहदा समझकर पति को पीटना शुरू कर दिया। इसके बाद खुद उसकी पत्नी ने खंभे से बंधे अपने पत‍ि पर थप्पड़ों और घूंसों की बार‍िश कर दी। पत‍ि हाथ जोड़ता रहा लेक‍िन पत्नी को उस पर कोई तरस नहीं आया। इस दौरान पति सबसे बचाने की गुहार लगाता रहा। इसके बाद क‍िसी ने पुल‍िस को फोन क‍िया। क‍िदवई नगर पुलिस, पति-पत्नी दोनों को थाने ले गई थी जहां आपसी समझौते के बाद दोनों घर चले गए। अब पति की पिटाई का ये वीड‍ियो इलाके में जमकर वायरल हो रहा है।


कोर्ट परिसर से लापता हुआ जज साहब, पत्नी ने दर्ज कराई FIR

कोर्ट परिसर से लापता हुआ जज साहब, पत्नी ने दर्ज कराई FIR

24-Sep-2019

नई दिल्ली : मध्य प्रदेश के सतना से एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है। उत्तम हिन्दू में प्रकाशित खबर के अनुसार, सतना में अदालत परिसर से सोमवार को 35 वर्षीय एक न्यायाधीश एकाएक लापता हो गये। बाद में जज की पत्नी कृष्णा सिंह ने इस घटना की जानकारी पुलिस को दी और उनकी गुमशुदगी की एफआईआर भी दर्ज कराई। सिविल लाइन थाने की इंस्पेक्टर अर्चना द्विवेदी ने बताया कि कृष्णा सिंह (34) ने सतना न्यायालय में पदस्थ अपने न्यायाधीश पति आर.पी. सिंह (35) के सोमवार को सतना के न्यायालय परिसर से लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई है। 

उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत पर पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया है और उनकी तलाश में जुट गई है। अर्चना ने बताया कि वह सतना न्यायालय में अष्टम व्यवहार न्यायाधीश के पद पर पदस्थ हैं और सतना के सिविल लाइन थाना इलाके में शासकीय आवास में रहते हैं। शिकायत के अनुसार लापता न्यायाधीश आर.पी. सिंह की करीब दो माह से तबीयत ठीक नहीं है। 23 सितंबर की सुबह करीब 11 बजे न्यायालय परिसर सतना से उनका कोई पता नहीं चल रहा है। अर्चना ने बताया कि पुलिस उनकी तलाश में जुटी है।


संवेदना से उभरा लेख : क्या हमारे जीवन से दूर हो रहा है रामायण !

संवेदना से उभरा लेख : क्या हमारे जीवन से दूर हो रहा है रामायण !

24-Sep-2019

तहसीन मुनव्वर

हमारे बचपन में हर गली हर मुहल्ले में रामलीला होती थीं। इनका हिस्सा हिंदू मुसलमान सभी होते थे। शाम को घर का काम ख़त्म कर सभी की कोशिश होती कि घर  के समीप की किसी बड़ी रामलीला को देखने जाएं। फिर रामलीलाओं में प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगीं और उस में नर्तक आदि बुलाए जाने लगे। इससे संस्कृति से जुड़े लोग धीरे धीरे दूर होने लगे लेकिन वह अधिक जुड़ने लगे जिनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक संतुष्टि नहीं अपितु मनोरंजन पाना था। शायद उसी समय में हम लोगों को वहां जाने से घर वालों ने मना किया। रही सही कसर रामानंद सागर जी ने पूरी कर दी और घर घर रामायण दूरदर्शन के माध्यम से पहुंचा दी गई। 

एक एसा समय भी आया कि रामलीला के मंचन की जगह बड़े पर्दे पर दिखाई जाने वाली रामायण ने ले ली। आरंभ में इसका सभी ने आनंद लिया क्योंकि पर्दे के दोनों ओर दर्शक बैठ जाते थे और रामायण का आनंद लेते थे।  भू माफिया के चलते और पार्क समाप्त हो जाने के कारण रामलीला मंचन के स्थान भी समाप्त होते चले गए। अब इक्का दुक्का स्थान पर ही रामलीला मंचन होता है। जहां बड़े स्तर पर होता है वहां आप हर दिन नहीं जा सकते। पश्चिमी बंगाल ने अपने यहां दुर्गा पूजा को संस्कृति से इस प्रकार जोड़ा हुआ है कि दुर्गा पूजा पंडालों का व्यापक प्रोत्साहन होता है। हमें रामलीलाओं को भी उसी प्रकार आगे बढ़ाना था लेकिन हम राम के नाम से की जाने वाली राजनीति में इस प्रकार उलझ गए कि राम राम से जय श्री राम तक तो पहुंच गए किन्तु मर्यादा पुरषोत्तम राम जिन को अल्लामा इक़बाल ने क्या सुंदर अभिव्यक्ति से सजाया है और इमामे हिंद कहा है, आज हमारी संस्कृति से दूर हो गए हैं। 

यह हमारे समय की त्रास्दी ही कही जायेगी कि सोनाक्षी सिन्हा को यह तक नहीं मालूम था कि हनुमान जी किन के लिए संजीवनी बूटी लेने गए थे जबकि हमारे घर में सब एक दूसरे को देख रहे थे कि इतना भी नहीं मालूम। सोनाक्षी सिन्हा के बारे में यह कहते हुए इस कारण भी दुख होता है कि वह एक एसे परिवार में जन्मी पली बढ़ी हैं जिस में सभी का नाम रामायण से ही जुड़ा है। उनका घर रामायण, उनके पिता शत्रुघन, चाचा राम, लखन और भरत यहां तक कि उनके भाइयों तक का नाम लव और कुश है और सब से बड़ी बात यह कि उनके पिता उस समय भाजपा का हिस्सा रहे थे जब राम मंदिर आंदोलन अपने ज़ोर पर था। 

यह केवल एक फ़िल्मी परिवार का मामला नहीं है बल्कि हमें सोचना होगा कि जो नई नस्ल सोनाक्षी जैसों को अपना आइडल या आराध्य मान लेती है उनके जीवन से भी कहीं रामायण दूर न हो गई हो। मुझे राम इस लिए पसंद हैं कि वह त्याग की मूरत हैं, वह अपने पिता के कहने पर राज सिंहासन त्याग कर जंगलों का कठिन जीवन जीने निकल पड़ते हैं। वह भी एक दो वर्ष के लिए नहीं बल्कि चौदह वर्षों के लिए। रावण से भी उनका युद्ध अंतिम समय तक टालने की कोशिश होती है किन्तु जब रावण अपनी हद में नहीं रहता तब राम युद्ध करते हैं। रावण के अंतिम क्षणों में भी वह उसके ज्ञान का सम्मान करने से नहीं चूकते और लक्ष्मण से उसे पानी पिलाने को और ज्ञान पाने को कहते हैं। लक्ष्मण चरणों के स्थान पर सर के पास बैठते हैं और ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। 

ऐसे मर्यादा पुरषोत्तम राम किसे पसंद नहीं आएंगे और कौन उनके बताए रास्ते पर चल कर रोशनी नहीं पाना चाहेगा। अफ़सोस हमारे जीवन से ऐसे राम की लीला दूर हो गई हैं। आवश्यकता है देश को फिर मर्यादा पुरषोत्तम राम जी से जोड़ने की जो धार्मिक मान्यता के अनुसार मेरे साथी देश वासियों के भगवान हैं ही किन्तु मेरी अपनी सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। राम जी को हमारे जीवन में सरकार या कोई राजनीतिक दल वापस नहीं ला पाएगा बल्कि इस के लिए हमारे समाज को ही हर स्तर पर कठिन आराधना करनी होगी। जहां तक सोनाक्षी सिन्हा की बात है उन्हें घर में बैठ कर कई दिन तक रामायण पढ़नी चाहिए और हो सके तो इतनी रट लेनी चाहिए कि आगे हो सके तो वह राम कथा वाचन कर सकें। भूल सुधार की उनके पास यही सूरत बची है।
 
दिलों के बीच बना दे जो प्यार का सेतु।
उस आला ज़ात को भगवान राम कहते हैं।।
*तहसीन मुनव्वर*( सीनियर एडिटर न्यूज़ 18 उर्दू )


जिसके पास लाइसेंस उसके नाम वाहन

जिसके पास लाइसेंस उसके नाम वाहन

23-Sep-2019

 हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक

केंद्र सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम लागू क्या किया देश में गजब की हलचल मच गई। इसमें यातायात सुरक्षा के साथ-साथ यातायात स्वच्छता और स्वस्थता दिखाई पड़ी। कानून के मुताबिक नियम, कायदों को तोड़ने पर सक्त कार्रवाई और भारी जुर्माने का कड़ा प्रावधान है।  यह पहले भी कम सीमा में थे, किंतु ना जाने क्यों अमलीजामा पहनाने में ना-नूकर की जा रही थी। इसके लिए सरकारों को दोष दे या हुक्मरानों को या अफसरों को किवां अपने आप को?

खैर! दोषारोपण के चक्कर में अब अपना आज ना गंवाए। जो बीत गया सो बीत गया अब आगे की सुध ले। लापरवाही से नियमों को तोड़कर हमने आज तक जितनी जाने गवाई है वह वापस तो नहीं आ सकती लेकिन सीख में आगे सुरक्षा, सतर्कता, सजगता, नियमब्धता, कर्तव्यता और दृढ़ता से नियमों का पालन करते हुए बे मौतों से बचा जा सकता है।  दुर्भाग्य जनक स्थिति ये है कि जितने लोग बीमारियों से जान नहीं गवाते उससे कहीं अधिक वाहनों की दुर्घटना से असमयक काल के गाल में समा जाते हैं। हादसों में सड़कों का भी बड़ा योगदान है, जिसके के लिए व्यवस्थाएं दोषी नहीं अपितु जुर्मी है। बावजूद सबक लेने के बेखौफ आज भी बैगर या फर्जी लाइसेंस, पंजीयन, परमिट, इंश्योरेंस और नाबालिक वाहनों की सवारी केरोसिन से गढ्डों की सड़कों पर बेधड़क कर रहे हैं। इनमें बाईकर्स की तेजी तो ऐसी है जैसे लाखों रूपए घंटे कमाते हो वैसे जान हथेली पर रखकर और लेकर कर्कश ध्वनि से कोहराम मचाते रहते हैं। 

ऊपर से नौसिखिया, नियमों से बेखबर ऑटो, टैक्सी और ट्रैक्टर चालक राह चलतों की इस कदर आफत खड़ी कर देते हैं कि वाहनों से चलना तो छोड़िए कदमताल भी अवरूद्ध कर देते हैं। बरबस फिलवक्त सड़को पर सरपट दौड़ रहे वाहनों के मुकाबले लाइसेंस, बीमा, परमिट और पंजीयन कमतर ही है। यहां यह भी समझ से परे है कि लाइसेंस ना हो तब भी बड़ी आसानी से वाहन खरीदा जा सकता है। इस पर रोक हर हाल में लगना चाहिए। जिसके पास लाइसेंस उसके नाम वाहन का प्रचलन हो। उसके लिए जिले में मौजूद एकमात्र परिवहन कार्यालय के भरोसे सबकी लाइसेंस बनने और वाहनों के पंजीयन में काफी समय बीत जाएगा। लिहाजा कमशकम ब्लाक स्तर पर शिविर आदि लगाकर इसकी पुक्ता व्यवस्था बनाई जाए। 

दरअसल, इस नये मोटर वाहन अधिनियम को  अपने राज्यों में वोट बैंकों के खातिर जमीन पर लाने सरकारें कतरा रही है, इनमें भाजपानित प्रांत भी शामिल हैं। हां! यह कानून कड़ा जरूर है। इसे भारत जैसे देश में मनवाना दांतों तले चने चबाने के समान है, पर जीवन बचाने के वास्ते इसे चबाना भी पड़ेगा और हजम भी करना होगा। तभी हमारी सेहत सलामत रहेगी। अगर हम कानून के फंडे और पुलिस के डंडे के बिना नियमों का पालन कर लिए होते तो आज इस कानून की जरूरत ही ना पड़ती। कुछ सोच भी ऐसी अख्तियार हो चुकी है कि पुलिस को दिखाने मात्र के लिए वाहनों के कागजात और सुरक्षा पात्र होते हैं। यहां यह ना भूले की पुलिस तो जैसे तैसे छोड़ देगी अलबत्ता यमराज कैसे छोड़ेंगे? क्योंकि नजर हटी, दुर्घटना घटी जगजाहिर है। इसलिए चाकचौबंद रहने में सब की भलाई है।

अंतोगत्वा, मोटर वाहन अधिनियम का प्रभाव यह पड़ा  कि देश में लाइसेंस, बीमा, प्रदूषण प्रमाण पत्र, परमिट, पंजीयन और हेलमेट की बिक्री में  वृद्धि तथा दुर्घटनाएं भी कम हुई। असरकारक डिजिटल दस्तावेजों को मान्य करते हुए आवश्यक कागजात, सुरक्षात्मक सामग्री समेत जो भी कमी हो उसे मौके पर ही पूरी करवाने की पहल हो। पुनश्चय, प्रावधानों के नाम पर माकुल सुविधाएं, मजबूत सड़क देकर जितने की गाड़ी नहीं उससे अधिक का जुर्माना वसूला मुनासिब नहीं। हालातों के हिसाब से कार्यवाही हो तो बने बात। यथा देश में जबरदस्ती के जगह जबरदस्त तरीके से नियमों का पालन होने में अभी और समय लगेगा।

 

 


आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- एक भी हिंदू को देश नहीं छोड़ना पड़ेगा

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- एक भी हिंदू को देश नहीं छोड़ना पड़ेगा

23-Sep-2019

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि एक भी हिंदू को देश छोड़कर नहीं जाना पड़ेगा. पीटीआई के मुताबिक उन्होंने यह बात असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी से जुड़ी चिंताओं को दूर करने का प्रयास करते हुए कही. रविवार को आरएसएस और भाजपा समेत उससे जुड़े संगठनों की कोलकाता में एक समन्वय बैठक हुई थी. इसके बाद संघ के एक पदाधिकारी ने कहा, ‘मोहन भागवतजी ने स्पष्ट कहा कि एक भी हिंदू को देश नहीं छोड़ना होगा. उन्होंने कहा कि दूसरे राष्ट्रों में प्रताड़ना और कष्ट सहने के बाद भारत आए हिंदू यहीं रहेंगे.’

असम में बहुप्रतीक्षित एनआरसी की 31 अगस्त को जारी हुई अंतिम सूची में 19 लाख से ज्यादा आवेदकों के नाम नहीं हैं. यानी उन्हें भारतीय नहीं माना गया है. आरएसएस के सूत्रों के मुताबिक बैठक में मौजूद कुछ नेताओं ने पश्चिम बंगाल में एनआरसी की कवायद शुरू करने से पहले राज्य में नागरिकता (संशोधन) विधेयक को लागू करने की जरूरत पर जोर दिया. बैठक में शामिल एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘बंगाल में पहले नागरिकता संशोधन विधेयक लागू होगा और इसके बाद एनआरसी लाया जाएगा. राज्य के हिंदुओं को इस बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है.’

राजस्थान में इस महीने के शुरू में आरएसएस की तीन दिवसीय वार्षिक समन्वय बैठक हुई थी. इस दौरान यह चिंता जताई गई थी कि असम में एनआरसी की अंतिम सूची में कई वास्तविक भारतीय छूट गए हैं जिनमें से अधिकतर हिंदू हैं. मोहन भागवत का यह बयान इसी चिंता की पृष्ठभूमि में आया है.


मूंगफली बेचने वाले शख्स को बिजली विभाग ने थमा दिया 62 लाख का ​बिल

मूंगफली बेचने वाले शख्स को बिजली विभाग ने थमा दिया 62 लाख का ​बिल

23-Sep-2019

सीतापुर। यूपी के सीतापुर में बिजली विभाग का अजब गजब कारनामा सामने आया है। यहां मूंगफली का ठेला लगाने वाले गरीब को विद्युत विभाग ने 62 लाख 39 हजार रुपए बिजली का बिल भेज दिया। बिजली का बिल देखते ही राम अवतार का पूरा परिवार सदमे में चला गया। राम अवतार और उसका बेटा मूंगफली का ठेला लगाकर अपने परिवार की जीविका चलाते हैं।

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विद्युत उपखंड लहरपुर के अधिकारियों और कर्मचारियों की बड़ी लापरवाही सामने आई है। 19 महीने का 62 लाख 39 हजार 16 रुपए का बिजली बिल भेजने से मूंगफली का ठेला लगाने वाले राम अवतार का पूरा परिवार सदमे में चला गया और अधिकारियों से न्याय की गुहार लगा रहा है।

बता दें कि अकबरपुर गांव के रहने वाले राम अवतार ने 19 महीने से बिल नहीं जमा किया था और जब बिजली का बिल आया तब 62 लाख रुपए से अधिक बिल देखकर राम अवतार का पूरा परिवार हैरान रह गया। पीड़ित राम अवतार के बेटे का कहना है पिछली बार उनका बिजली का बिल 287 रुपए का आया था, जिसे उन्होंने जमा कर दिया था। 19 महीने का बिल 62 लाख रुपए से अधिक का देखकर पूरे परिवार का रो-रो कर बुरा हाल है। वहीं, इस बारे में जब बिजली विभाग के अधिकारियों से बात करनी चाहिए तो बिजली विभाग के अधिकारी कैमरे के सामने आने से बचते नजर आए।


YouTube में वीडियो देखकर नकल कर रही थी लड़कियां, एक की मौत और दूसरी ......

YouTube में वीडियो देखकर नकल कर रही थी लड़कियां, एक की मौत और दूसरी ......

21-Sep-2019

IANS

बीजिंग: चाइना की यूट्यूबर (YouTuber) झोउ जिओ हुई (Zhou Xiao Hui) दो लड़कियों के परिजनों को मुआवजा देने के लिए तैयार हो गई है. लड़कियों ने उनके वायरल वीडियो की नकल की और ऐसा करने के चलते दोनों में से एक की मौत हो गई. 25 वर्षीय येह (झोउ जिओ हुई) के यूट्यूब में 70 लाख सब्सक्राइबर हैं. यूट्यूबर को अनकन्वेंशनल ऑफिस कुकिंग वीडियो (Unconventional Office Cooking Video) बनाने के लिए जाना जाता है.

बीबीसी ने बताया, यूट्यूबर पर कथित तौर पर आरोप है कि 14 और 12 साल की लड़कियों ने उनके वीडियो का अनुसरण करते हुए टिन के कैन पर पॉपकॉन बनाने की कोशिश की.

लड़कियां जब 22 अगस्त को टिन के कैन पर अल्कोहल गर्म करने की कोशिश कर रही थीं, उसी दौरान उसमें विस्फोट हो गया, जिसके चलते 14 वर्षीय झेजे की 5 सितंबर को मौत हो गई. 12 साल की लड़की जिआयु के परिजनों के अनुसार उसे कॉस्मेटिक सर्जरी (Cosmetic Surgery) की जरुरत है. मुआवजा देने के बजाए यूट्यूबर झोउ जिओ हुई ने इस बात से इनकार किया कि वह लड़किया उनके वीडियो की नकल कर रही थी. उन्होंने कहा कि लड़कियों ने वीडियो में बताए गए तरीके के बजाय इसे गलत तरीके से किया.


भगवान राम के वनवास पर एंकर चित्रा त्रिपाठी ने किया ट्विट, लोग बोले 'चापलूसी से नौकरी मिलने वालों का यही हाल है'

भगवान राम के वनवास पर एंकर चित्रा त्रिपाठी ने किया ट्विट, लोग बोले 'चापलूसी से नौकरी मिलने वालों का यही हाल है'

19-Sep-2019

दिल्ली 

आज तक की एंकर चित्रा त्रिपाठी अपने एक ट्वीट को लेकर ट्रोल हो रही हैं। एंकर चित्रा त्रिपाठी ने अपने अधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया, ''सतयुग में जैसे 14 सालों का वनवास खत्म हुआ था, वैसे ही लग रहा है कि सदियों का वनवास अब कलयुग में खत्म होने वाला है।'' चित्रा त्रिपाठी के इस ट्वीट के बाद ही लोगों ने उनको ट्रोल करना शुरू कर दिया। लोगों ने कहा, चित्रा त्रिपाठी जी, थोड़ा सा तो ज्ञान रखती कि सतयुग नही त्रेता युग में श्री राम का जन्म और वनवास हुआ था।' चित्रा त्रिपाठी न्यूज चैनल आज तक से पहले एबीपी न्यूज चैनल में थी। 

एक यूजर ने लिखा, ''सतयुग नही त्रेता युग था वो। बिना पढ़ाई चाटूकारिता से नौकरी मिलने वालों की जानकारी ऐसी ही होती है।'' एक यूजर ने लिखा, आपको ये भी नहीं पता कि राम का जन्म सतयुग नहीं त्रेता में हुआ था।

आपकी दिमाग काम करता है की नही सतयुग द्वापर त्रेता कलियुग कुछ इसमे जनकारी है चित्रा हालांकि ट्रोल होने के बाद चित्रा त्रिपाठी ने एक यूजर के कमेंट पर रिप्लाई कर कहा- अच्छा...।

 

 


ढाई महीनों में LIC को हुआ 57 हजार करोड़ का नुकसान

ढाई महीनों में LIC को हुआ 57 हजार करोड़ का नुकसान

18-Sep-2019

दिल्ली 

ढ़ाई महीने के अंदर भारतीय जीवन बीमा निगम को शेयर बाजार में निवेश से 57,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। एलआईसी जिन कंपनियों में निवेश किया है उनमें से 81 फीसदी के बाजार मूल्‍य में गिरावट आयी है। शेयर बाजार में एलआईसी को हुए निवेश से इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई से सितंबर में अब तक) में केवल 57,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। एलआईसी ने सबसे ज्यादा आईटीसी में निवेश कर रखा है, उसके बाद एसबीआई, ओएनजीसी, एलएंडटी, कोल इंडिया, एनटीपीसी, इंडियन ऑयल और रिलायंस इंडस्ट्रीज में निवेश है।

बिजनेस स्‍टैंडर्ड की रिर्पोट के अनुसार जून तिमाही के अंत तक शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों में एलआईसी का निवेश मूल्य 5.43 लाख करोड़ रुपये का था, लेकिन अब यह घटकर महज 4.86 लाख करोड़ रुपये रह गया है। इस तरह महज ढाई महीने में एलआईसी के शेयर बाजार में निवेश को 57,000 करोड़ रुपये की चपत लग गई है।

आपको बता दें कि एलआईसी को सरकार के विनिवेश एजेंडा को पूरा करने के लिए सरकारी कंपनियों के मुक्तिदाता की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। तो वहीं पिछले एक दशक में सार्वजनिक कंपनियों में एलआईसी का निवेश चार गुना हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2019 तक एलआईसी ने कुल 26.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है जिसमें से अकेले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में 22.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, सिर्फ 4 लाख करोड़ रुपये निजी क्षेत्र में लगाए गए हैं।


कश्मीर के पूर्व विधायक यूसुफ ने कहा- मैं विदेशी नहीं और न ही फारूक अब्दुल्ला आतंकवादी

कश्मीर के पूर्व विधायक यूसुफ ने कहा- मैं विदेशी नहीं और न ही फारूक अब्दुल्ला आतंकवादी

18-Sep-2019

कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद भले ही केंद्र सरकार कह रही है कि घाटी में स्थिति सामान्य हैं, लेकिन सरकार के दावे में विरोधाभास दिखाई देता है। पिछले दिनों सीपीआई (एम) नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व विधायक मोहम्‍मद यूसुफ तरीगामी को कश्मीर से दिल्ली एम्स अपना इलाज कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद लेनी पड़ी। इसी पर तरीगामी ने कहा मैं कोई विदेशी नहीं हूं और न ही फारूक अब्दुल्ला और अन्य नेता आतंकवादी हैं। कश्मीर की स्थिति कश्मीर के लोगों की वजह से नहीं, बल्कि हम सभी राजनेताओं और राजनीति के कारण खराब है। तरीगामी कश्मीर में नजरबंदी का सामना करने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले पहले नेता हैं।

‘कश्मीरी धीरे-धीरे मौत के करीब जा रहे हैं’

तरीगामी और राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी ने आज दिल्‍ली में प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि सुप्रीम कोर्ट के जज तरूण गोगोई और एस ए बोबड़े ने उनके वापस कश्मीर जाने पर कोई रोक नहीं है, वह जब चाहें जा सकते हैं बशर्ते उनकी तबीयत यह यात्रा करने योग्य हो। यूसुफ तरीगामी ने कहा कि भाजपा का दावा है कि एक भी गोली नहीं चलाई गई है और कोई भी मारा नहीं गया है, लेकिन कश्मीरी धीरे-धीरे मौत के करीब जा रहे हैं। हम भी जीना चाहते हैं, हमें भी मौका दिया जाना चाहिए। यह एक कश्मी‍री, एक हिंदुस्तानी बोल रहा है। ये मेरी अपील है, हमारी भी सुनें, ये बोलते हुए तरीगामी भावूक हो गए और उनकी आंखों से आंसू आ गए।
‘संचार टूटने से दिक्कतें’

उन्होने कहा कि मैं परेशान हूं, इस शासन से हमें बहुत उम्मींदें नहीं थीं, लेकिन मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वे एक संवैधानिक प्रावधान को अलविदा कहने के लिए इतने उतावले होंगे। कश्मीर के लोग मजबूर नहीं थे, लेकिन मैं इस स्थिति को देखकर चिंतित हूं। दुकानें नहीं खुली हैं, स्कूल नहीं खुले हैं। कोई सार्वजनिक परिवहन नहीं है। 40 दिनों से अधिक समय से लोग कुछ भी कमाने के लिए कोई भी काम करने में असमर्थ हैं। वहां लोगों का बड़ा वर्ग रोजाना काम करता है और कमाता है और उस आधार पर रहते हैं। संचार टूटना लोगों को सबसे अलग कर रहा है।

कश्मीर की जमीनी हकीकत सरकारी दावे के उलट: येचुरी

वहीं मोदी सरकार पर जमकर हमला बोलते हुए येचुरी ने कहा कि कश्मीर के हालात सामान्य नहीं है। कश्मीर का मुद्दा अब कोर्ट के पास है। कोर्ट को ही इस पर फैसला सुनाने का हक है। येचुरी ने कहा कि हमारे कोर्ट में दायर किए हलफनामे में कहा गया था कि कश्मीर की जमीनी हकीकत कुछ और है जो कि सरकारी दावे के एकदम विपरीत है। एक राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में बंट गया है और इसके क्या परिणाम होंगे। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में एक अलग याचिका दायर की जा रही है।

सीताराम येचुरी ने कहा कि वहां पर लोगों को आजीविका में दिक्कत हो रही है। 40 दिनों से अधिक समय हो गया है, संचार पूरी तरह से बंद है। हम पार्टी के उन लोगों तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिनके पास लैंडलाइन है। वहां पर कोई सार्वजनिक परिवहन नहीं है। अस्पतालों में दवाओं की कमी की भी खबरें आ रही हैं।

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32 साल के शख्स को 81 साल का बुजुर्ग बनाने वाला मेकअप आर्टिस्ट बिल्लू बार्बर गिरफ्तार

32 साल के शख्स को 81 साल का बुजुर्ग बनाने वाला मेकअप आर्टिस्ट बिल्लू बार्बर गिरफ्तार

16-Sep-2019

नई दिल्ली: अभी कुछ दिन पहले ही खबर आई थी जब एक 32 साल का शख्स जयेश 81 साल के बुजुर्ग का भेष बनाकर देश से भागने की फिराक में था. अब इस मामले में दिल्ली पुलिस ने उस मेकअप आर्टिस्ट को भी गिरफ्तार कर लिया है, जिसने जयेश को ये हुलिया दिया था. बिल्लू बार्बर के नाम से मशहूर इस मेकअप आर्टिस्ट का नाम  शमशेर सिंह है, जो दिल्ली के रोहिणी इलाके का रहने वाला है. 

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डीसीपी एयरपोर्ट संजय भाटिया के मुताबिक आरोपी मेकअप आर्टिस्ट बिल्लू बार्बर ने एजेंट सिद्धू और उसके एक साथी  के कहने पर उसने जयेश पटेल का हुलिया बदला. उसने जयेश के दाढ़ी और सिर के बाल बढ़वाए,फिर उनमें सफेद रंग किया, पगड़ी पहनाई. ज़ीरो पावर का मोटे फ्रेम का चश्मा पहनाया ,सफेद कपड़े पहनाए और फिर एयरपोर्ट पर व्हीलचेयर में बैठकर जाने के लिए कहा था.

पुलिस के मुताबिक शमशेर एजेंट्स के कहने पर 10 और लोगों का गेटअप ऐसे ही बदल चुका है, जिनमें 2 महिलाएं भी शामिल हैं. पुलिस ने उसके पास से मेकअप का पूरा सामान भी बरामद कर लिया है. आरोपी ने बताया कि वह एक शख्स से मेकअप के लिए 20 हज़ार रुपये लेता था.  मालूम हो जयेश पटेल ने बुज़ुर्ग के गेटअप में अपना पासपोर्ट बनवाया था और उसी पासपोर्ट से अमेरिका जाने की फिराक में था लेकिन 10 सितंबर को दिल्ली एयरपोर्ट पर पकड़ा गया. सुरक्षा में लगे सीआईएसएफ के अधिकारियों को उसके बोलने के लहजे, आवाज और त्वचा देखकर शक हुआ था. इसके बाद उसकी करामात का भंडाफोड़ हो गया. 

साभार : NDTV