कोरोना रूपी अंधेरों के बीच रोशनी की तलाश

कोरोना रूपी अंधेरों के बीच रोशनी की तलाश

04-Aug-2020

-ः ललित गर्ग:-

 

कोरोना महासंकट में जिंदगी हमसे यही चाहती है कि हम नकारात्मकता, अवसाद और तनाव के अंधेरों को हटाकर जीवन को खुशियों के संकल्पों से भरें। ऐसा करना कोई बहुत कठिन काम नहीं, बशर्ते कि हम जिंदगी की ओर एक विश्वास भरा कदम उठाने के लिए तैयार हों। डेन हेरिस एक सवाल पूछते हैं कि जब ‘खुशी हम सबकी जरूरत है और जिम्मेदारी भी तो क्यों हमारी यह जरूरत पूरी नहीं हो पा रही और क्या वजह है कि हम दुनिया को खुशियों से भर देने की जिम्मेदारी ठीक तरह से नहीं निभा पा रहे हैं?’ इस सवाल के बहुत से उत्तर हो सकते हैं, लेकिन हेरिस के मुताबिक ‘इसका मूल कारण है हमारे भीतर छिपा डर। यह डर ही हमारे आस-पास अवसाद व अविश्वास रचता है और हमें दुख की सीलन से गंधाते अंधेरों में खींच ले जाता है।’ डरा हुआ इंसान हर वक्त अपने आपको असुरक्षित-सा महसूस करता है। डर उनको अंधेरे में जीना सिखा देता है। शेक्सपीयर कहते थे, हमारा शरीर एक बगीचे की तरह है और दृढ़ इच्छाशक्ति इसके लिए माली का काम करती है, जो इस बगिया को बहुत सुंदर और महकती हुई बना सकती है।

जीवन की विडम्बना यह है कि हम अपनी हर अनगढ़ता, हर अपूर्णता के लिए दुनिया को जिम्मेवार ठहराते हैं। जबकि हमें इसके कारणों को स्वयं में खोजना चाहिए। जेफ ओल्सन की किताब ‘द स्लाइट एज’ में खुशी की तलाश का एक पूरा दर्शन छिपा है। ओल्सन का कहना है कि हर दिन तुम जो भी करते हो, उसमें बहुत कुछ निरर्थक लगता है, लेकिन जीवन में हर छोटी से छोटी बात का अर्थ होता है। हर बीतता हुआ क्षण तुम्हें, बेहतर बनने का अवसर दे रहा है, बशर्ते तुम होना चाहो। रूमीं ने कहा कि ‘जान लेने का मतलब किसी किताब को लफ्ज-दर-लफ्ज रट लेना नहीं, जान लेने का मतलब ये समझ जाना कि तुम क्या नहीं जानते।’ लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश लोग जिंदगी को ऐसे जीते हैं, जैसे कोई किराने की दुकान का हिसाब पूरा करता हो। क्योंकि उनको नहीं मालूम कि उन्हें जिंदगी से शांति चाहिए या विश्राम। ईमानदारी चाहिए या पैसा। परोपकार चाहिए या स्वार्थपूर्ति? स्वास्थ्य एवं सौहार्द चाहिए या स्वार्थ? विचारक रूपलीन ने कहा है कि किसी भी तरह की मानसिक बाधा की स्थिति खतरनाक होती है। खुद को स्वतंत्र करिए। बाधाओं के पत्थरों को अपनी सफलता के किले की दीवारों में लगाने का काम करिए। कुछ लोग इन्हीं स्थितियों में मजबूत होते हैं और खराब समय को ही अपने जीवन को स्वर्णिम ढंग से रूपांतरित करने वाला समय बना देते हैं। कोरोना महाव्याधि ने इंसान को अनेक कडुवे अनुभवों से साक्षात्कार कराया है और जीवन के अनेक सत्यों से परिचित कराया है।
सफलता और संघर्ष, आशा और निराशा, हर्ष और विषाद साथ-साथ चलते हैं। चुनौतियां केवल बुलंदियों को छूने की नहीं होती, खुद को वहां बनाए रखने की भी होती है। ठीक है कि एक काम करते-करते हम उसमें कुशल हो जाते हैं। उसे करना आसान हो जाता है। पर वही करते रह जाना, हमें अपने ही बनाए सुविधा के घेरे में कैद कर लेता है। रोम के महान दार्शनिक सेनेका कहते हैं, ‘कठिन रास्ते ही हमें ऊंचाइयों तक ले जाते हंै।’ प्रश्न है कि इन कठिन रास्तों पर डग भरने एवं कुछ अनूठा करने का साहसिक प्रयत्न कोई तो शुरु करे। मगर प्रश्न तो यह भी है कि अंधेरों से संघर्ष करने के लिए आगे आए कौन? कौन उस साहसिक प्रयत्नों की संस्कृति को सुरक्षा दे? कौन आदर्शों के अभ्युदय की अगवानी करे? कौन जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठापना में अपना पहला नाम लिखवाये? सचाई है कि जिन्होंने साहस एवं संयम का परिचय दिया है, वे कोरोना को परास्त भी कर पाये है, केवल कोरोना ही नहीं, जीवन की ऐसे अनेक दुर्गम मार्गों को उन्होंने पार किया है।
बहुत कठिन है यह रोशनी का सफर तय करना। बहुत कठिन है तेजस्विता और तपस्विता की यह साधना। सबके अंधेरों को समेटने के लिए कहां कौन आगे आते हैं जबकि यहां तो हर कोई खुद को उजालने की स्वार्थी आकांक्षा में न जाने कितनों के जीवन की रोशनी छीन लेते हैं। अपनी गलतियों के बारे में बात करते हुए हमारे कई किन्तु-परंतु होते हैं। हम समय और स्थितियों की बात भी करते हैं और अपने लिए छूट और माफी भी चाहते हैं। लेकिन क्या तब भी ऐसा करते हैं, जब गलतियां दूसरों की होती है? ‘लाइफ, द ट्रुथ, एंड बीइंग फ्री’ के लेखक स्टीव मेराबली कहते हैं, ‘जब हम दूसरों को उनके दृष्टिकोण और परिस्थितियों में पहुंचकर देखते हैं, तब उनकी गलतियां उतनी बड़ी नहीं दिखायी देतीं।’ ऐसे में ईमानदार प्रयत्नों का सफर कैसे बढ़े आगे? जब शुरुआत में ही लगने लगे कि जो काम मैं अब तक नहीं कर सका, भला दूसरा कैसे कर सकें? कितना बौना चिंतन है आदमी के मन का कि मैं तो बुरा हूं ही पर दूसरा भी कोई अच्छा न बने।
अपने हालात के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने का कोई मतलब नहीं होता। हर कोई अपने सुख-दुख का जिम्मेदार होता है, हर कोई अपना जीवन अपने ढंग से जी रहा होता है। ओशो के अनुसार, ‘यहां कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है। हर कोई अपनी तकदीर बनाने में लगा है।’ जीवन की प्रयोगशाला में भले हम बड़े कामों के लिए ऊंचे मनसूबे न बनायें और न ही आकांक्षी सपने देखें पर जरूरत है अंधेरी गलियां बुहारने की ताकि बाद में आने वाली पीढ़ी कभी अपने लक्ष्य से भटक न पाये।
जब हम कुछ करने की ठानते हैं तो सफलता ही मिले यह जरूरी नहीं। कई बार सब करने पर भी निराशा मिलती है। तब हम अपनी ही सोच और क्षमताओं पर संदेह करने लगते हैं। लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता। लेखिका एलेक्जेंड्रा फ्रेन्जन कहती हैं, ‘अगर दिल धड़क रहा है, फेफड़े सांस ले रहे हैं और आप जिंदा हैं..तो कोई भी भला, रचनात्मक और खुशी देने वाला काम करने में देरी नहीं हुई है।’ भगवान महावीर का संदेश था कि हमारे स्वीकृत उद्देश्यों के प्रति आस्था, समर्पण और दृढ़ निश्चय जुड़ा रहे। पुरुषार्थ के हाथों भाग्य बदलने का गहरा आत्मविश्वास सुरक्षा पाये। एक के लिए सब, सबके लिए एक की चेतना जागे। साहस, संयम एवं आत्म विश्वास की एक किरण कभी पूरा सूरज नहीं बनती। जिसे एक किरण मिल जाती है वह संपूर्ण सूरज बनने की दिशा में प्रस्थान कर देता है। रिचर्ड सील ने कहा भी है आत्मशक्ति इतनी दृढ़ और गतिशील है कि इससे दुनिया को टुकड़ों में तोड़कर सिंहासन गढ़े जा सकते हैं।
कुछ लोग विशिष्ट अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं। वे लोग भाग्यवादी एवं सुविधावादी होते हैं, ऐसे लोग कुंठित तो होते ही है, जड़ भी होते हैं। कल्पना और प्रतीक्षा में वे अपना समय व्यर्थ गंवा देते हैं। किसी शायर ने कहा भी है तू इंकलाब की आमद का इंतजार न कर, जो हो सके तो अभी इंकलाब पैदा कर।
प्रेषकः


           (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92


डॉक्टर वेदप्रताप वैदिक का लेख: ऊबाऊ भाषणों का दौर

डॉक्टर वेदप्रताप वैदिक का लेख: ऊबाऊ भाषणों का दौर

31-Jul-2020

कल प्रधानमंत्री और आज वित्तमंत्री का भाषण सुना। दोनों भाषणों से आम जनता को जो उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हुई।

प्रधानमंत्री का भाषण सभी टीवी चैनलों पर रात को आठ बजे प्रसारित होगा, यह सूचना चैनलों पर इतनी बार दोहराई गई कि करोड़ों लोग बड़ी श्रद्धा और उत्सुकता से उसे सुनने बैठ गए लेकिन मुझे दर्जनों नेताओं ने फोन किए, उनमें भाजपाई भी शामिल हैं कि प्रधानमंत्री का भाषण इतना उबाऊ और अप्रासंगिक था कि 20-25 मिनिट बाद उन्होंने उसे बंद करके अपना भोजन करना ज्यादा ठीक समझा लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि आखिरी आठ-दस मिनिटों में उन्होंने काफी काम की बात कही।

जैसे सरकार 20 लाख करोड़ रु. लगाकर लोगों को राहत पहुंचाएगी। यह सब कैसे होगा, यह खुद बताने की बजाय, इसका बोझ उन्होंने वित्तमंत्री निर्मला सीतारामण पर डाल दिया।
लोग प्रधानमंत्री से आशा कर रहे थे कि वे करोड़ों प्रवासी मजदूरों की घर-वापसी की लोमहर्षक करुण-कथा पर कुछ बोलेंगे और कुछ ऐसी प्रेरणादायक बातें कहेंगे, जिससे हमारे ठप्प कारखाने और उद्योगों में कुछ प्राण लौटेंगे लेकिन आज वित्तमंत्री ने लंबे-चौड़े आंकड़े पेश करके जो आर्थिक राहतों और सरल कर्जों की घोषणा की है, उनसे छोटे और मझोले उद्योगों को प्रोत्साहन जरुर मिलेगा लेकिन उन्होंने मूल समस्या के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा।
उन्होंने यह नहीं बताया कि तालाबंदी से उत्पन्न बेरोजगारी, भुखमरी, मंदी, घनघोर सामाजिक और मानसिक थकान का इलाज क्या है ? दुनिया के अन्य देशों की सरकारें अपनी जनता को राहत कैसे पहुंचा रही हैं, यदि इसका अध्ययन हमारे प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री सरसरी तौर पर भी कर लेते तो उन्हें कई महत्वपूर्ण गुर मिल जाते।

हमें विश्व-गुरु बनने का तो बड़ा शौक है लेकिन हम अपने नौकरशाही दड़बे में ही कैद रहना चाहते हैं।

यह स्वाभाविक है कि नेताओं की सबसे पहली चिंता उद्योगपतियों और व्यवसायियों से ही जुड़ी होती है, क्योंकि उनका सहयोग ही उनकी राजनीति की प्राणवायु होता है लेकिन वे लोग यह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि शहरों में चल रहे उद्योग-धंधों की रीढ़ वे करोड़ों मजदूर हैं, जो हर कीमत पर अपने घरों पर लौट रहे हैं और जिनके वापस आए बिना उद्योग-धंधों के लिए दी गई ये आसान कर्जों की रियायतें निरर्थक सिद्ध हो जाएंगीं


विशेष लेख - पर्यावरण संरक्षण: गोधन न्याय योजना

विशेष लेख - पर्यावरण संरक्षण: गोधन न्याय योजना

29-Jun-2020

विशेष लेख: तेजबहादुर सिंह भुवाल 

छत्तीसगढ़ की चार चिन्हारी- नरवा, गरूवा, घुरूवा, बाड़ी से आत्मनिर्भर बनते किसान

जैसा कि हम सभी जानते हैं गौमाता का हमारे जीवन में कितना महत्व है। कई युगों से गौवंशीय पशुओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उनके प्रति संवेदना एवं पर्याप्त सुविधा एवं सुरक्षा की व्यवस्था के लिए आमजन प्रगतिशील रहा। सदियों से गौमाता मनुष्यों की सेवा से उनके जीवन को सुखी, समृद्ध, निरोग एवं सौभाग्यशाली बनाती चली आ रही है। गौ माता की सेवा से हजारों पुण्य प्राप्त होते हैं। इसकी सत्यता का उल्लेख अनेक ग्रंथों, वेद, पुराणों में किया गया हैं। एक समय था जब मनुष्य अपने घरों में गाय पालते थे, उनकी सच्चे मन से सेवा करते थे। पर समय के परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्यों ने गौ माता को घर के बाहर छोड़ कर विदेशी कुत्ते, बिल्ली पालना शुरू कर दिया है, जिस पर लाखों रूपए खर्च करते है। लोग अपने स्वार्थ के कारण गांव हो या शहर सड़कों पर गायों को बेसहारा छोड़ देते है। मोटर गाडी की चपेट में आने के कारण बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं हो जाती है, जिससे पशुओं और मनुष्यों की जान चली जाती है।

प्रायः देखने में आता था कि प्रदेश की विभिन्न गौ शालाओं में पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से उन्हें चारा, पानी की कमी, देखभाल के अभाव में सैकड़ों गाये दम तोड़ देती है। इसकी जिम्मेदारी लेना वाला कोई नहीं। राज्य में वर्षों से खुले में चराई की परंपरा रही है। इससे पशुओं के साथ-साथ किसानों की फसलों का भी नुकसान होता रहता है। गाय पालक दूध निकालने के बाद उन्हें खुले में छोड़ देते हैं। लेकिन अब राज्य में ऐसा नहीं होगा।

प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पशुपालकों को लाभ पहुंचाने के लिए ‘‘गोधन न्याय योजना‘ के माध्यम से गोबर खरीदने की नई योजना बनाई है। यह देश का पहला राज्य होगा जहां गौपालन को लाभप्रद बनाने, गोबर प्रबंधन और पर्यावरण सुरक्षा के लिए योजना शुरू होगी। छत्तीसगढ़ राज्य में गौ-पालन को आर्थिक रूप से लाभदायी बनाने तथा खुले में चराई की रोकथाम तथा सड़कों एवं शहरों में जगह-जगह आवारा घुमते पशुओं के प्रबंधन एवं पर्यावरण की रक्षा के लिए गोधन न्याय योजना शुरू करने का ऐलान किया गया है। इस योजना की शुरूआत राज्य में 20 जुलाई को हरेली पर्व के दिन से की जाएगी।

‘‘गोधन न्याय योजना‘ से पशु पालक अपने पशुओं के चारे-पानी का प्रबंध करने के साथ-साथ उन्हें बांधकर रखेंगे, ताकि उन्हें, दूध एवं गोबर मिल सके, जिसे वह बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सके। शहरों में आवारा घूमते पशुओं की रोकथाम, गोबर क्रय से लेकर इसके जरिए वर्मी खाद के उत्पादन तक की पूरी व्यवस्था प्रशासन करेगा। वर्मी कम्पोस्ट के जरिए किसान जैविक खेती की ओर बढेंगे। गोधन न्याय योजना के माध्यम से तैयार होने वाले वर्मी कम्पोस्ट की बिक्री सहकारी समितियों के माध्यम से होगी। इस योजना का उद्देश्य प्रदेश में गौपालन को बढ़ावा देने के साथ ही उनकी सुरक्षा और उसके माध्यम से पशुपालकों को आर्थिक रूप से लाभ पहुंचाना है। इससे बड़ी संख्या में ग्रामीण जनों को रोजगार प्राप्त होंगे। छत्तीसगढ़ में किसानों को उपज की सही कीमत दिलाने के लिए ‘‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना’’ की भी शुरुआत की जा चुकी है। 

इसके तहत किसानों को 5750 करोड़ रुपए की आदान सहायता सीधे उनके खातों में अंतरित की जा रही है। इसकी पहली किस्त के 1500 करोड़ रुपए योजना के पहले ही दिन, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर जारी की जा चुकी है। दूसरी किस्त 20 अगस्त राजीव जयंती पर जारी की जाएगी। यह पूरी राशि चार किश्तों में जारी की जा रही है। पहली किस्त बारिश की शुरुआत के ऐन पहले मिल जाने पर किसान पूरे उत्साह के साथ खेती-किसानी में जुटे हुए हैं।

प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल जी ने सरकार में आने के बाद छत्तीसगढ़ की चार चिन्हारी नरवा, गरूवा, घुरूवा, बाड़ी के माध्यम से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने का प्रयास किया है। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘‘सुराजी गांव योजना’’ अंतर्गत गांव का विकास एवं पुरानी कृषि परंपराओं को पुर्नजीवित किया जा रहा है। ‘‘नरवा, गरवा, घुरवा अउ बाड़ी’’ योजना इसी का एक हिस्सा है। गांवों में पशुधन के संरक्षण और संवर्धन के लिए गौठानों का निर्माण किया जा रहा है। राज्य के 2200 गांवों में गौठानों का निर्माण पूर्ण हो चुका है और 2800 गांवों में गौठानों का निर्माण किया जा रहा है। आने वाले दो-तीन महीनों में 5000 गोठानों का निर्माण करने का लक्ष्य है। शासन द्वारा सभी ग्राम पंचायतों में गौठानों के सुचारु संचालन के लिए 10 हजार रूपए प्रति माह प्रत्येक गोठान को दिए जाने की व्यवस्था की गई है।

शासन के कार्य योजना अनुसार गौठानों को बहुउद्देशीय केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसमें जरूरी उपकरण और मशीनरी उपलब्ध कराने के साथ पशुओं के लिए शेड निर्माण और स्वसहायता समूहों के लिए वर्क शेड के निर्माण, चारागाह और सामूहिक बाड़ियों में फेंसिंग, भण्डारण कक्ष, पशु चिकित्सा कक्ष, बायो गैस संयंत्र की स्थापना, पानी की व्यवस्था जैसे कार्य कराए जा रहे हैं। गौठानों में विभिन्न गतिविधियों के लिए महिला स्व-सहायता समूहों को दायित्व सौंपे गयें हैं। गौठानों में महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा जैविक खाद का निर्माण, फेंसिंग पोल का निर्माण, सब्जी उत्पादन इत्यादि गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।

पर्यावरण के संरक्षण के लिए प्रदेश में वृहद वृक्षारोपण अभियान चलाया जा रहा है, जिसके लिए बड़ी संख्या में फल और छायादार पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इस अभियान के तहत मनरेगा के तहत विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण सार्वजनिक स्थानों, सरकारी स्कूल, कॉलेज, भवनों, सड़क किनारे, गौठान, चारागाह सहित उन स्थानों पर भी किए जाएंगे जहां पर सरकारी जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया है। आगामी वर्षों में इन फलदार वृक्षों से महिला स्व सहायता समूहों, ग्रामीणों की आजीविका भी निर्मित होगी। पौधों में नीम, शीशम, मुनगा, सीताफल, इमली, आम, नीबू, जामुन, अमलवास, कटहल, करंज, गुलमोहर, अमरूद, आंवला, कोसम, महुआ आदि छायादार एवं फलदार पौधे गौठान एवं चारागाह में रोपे जाएंगे। इससे पूरे प्रदेश में हरियाली आएगी वहीं मनरेगा के पंजीकृत मजदूरों को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिलेगा।

नरवा योजना अंतर्गत जमीन में जल का स्तर बनाए रखने के उद्देश्य से सभी मौसम में नदी, तालाब, डबरी में पर्याप्त मात्रा में पानी भरा रहे इसके लिए बंद पड़े नहर, नाले एवं छोटी नदियों को एक-दूसरे से जोड़कर पानी का भराव बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे किसान भाईयों को खेती, किसानी एवं अन्य उपयोग के लिए बारहमासी पानी मिल सकेगा। प्रदेश के सभी नदी, नलों एवं तालाबों के किनारे वृहद स्तर पर वृक्षारोपण भी किया जा रहा है। इसी प्रकार घुरवा और बाड़ी योजना अंतर्गत गौवंशी पशुओं के गोबर को एकत्रित कर जैविक खाद निर्माण कराया जा रहा है और गांव-गांव में बाड़ी बनवाकर सब्जियों की पैदावारी करने जागरूक किया जा रहा है, जिससे सभी किसान भाई अपने घरों, बाडियों से पर्याप्त मात्रा में सब्जी की खेती कर अतिरिक्त आमदानी प्राप्त कर सके। इसी प्रकार 19 जून से ग्रामीण अंचलों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों मे ’रोका-छेका’ अभियान भी चलाया जा रहा है। रोका-छेका अभियान से जहां फसलों और मवेशियों की सुरक्षा होगी, वहीं शहरी क्षेत्रों में खुले में घूमने वाले मवेशियों के कारण होने वाली दुर्घटना से भी निजात मिलेगी।

इन सभी योजनाओं से आने वाले समय में छत्तीसगढ़ राज्य को पर्यावरण संरक्षण का बढ़ावा मिलेगा। चारों तरफ हरियाली का वातावरण निर्मित होगा और प्रदेश पूर्ण रूप से प्रदूषण मुक्त होगा। पर्यावरण को शुद्ध रखने एवं संतुलन बनाए रखने के लिए आमजनों को भी वृक्ष लगाने जागरूक किया जाएगा। प्रदेश में इन सभी प्रयासों से गौवंश पशुओं का संवर्धन एवं संरक्षण होगा, वही उनसे दूध, दही, घी, गोबर, गौमूत्र प्राप्त होगा और इन पदार्थों से बहुत सी उपयोगी सामग्रियों का निर्माण भी किया जा सकेगा। इस प्रयास से लोगों को शुद्ध और जैविक सामग्री प्राप्त होगी। इन प्रयासों से लोगों का स्वस्थ्य ठीक रहेगा और वे निरोगी रहेंगे।


दूसरों पर उंगली उठाने से पहले यह देखना चाहिए कि आप स्वयं क्या कर रहे हैं मंत्री जी? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

दूसरों पर उंगली उठाने से पहले यह देखना चाहिए कि आप स्वयं क्या कर रहे हैं मंत्री जी? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

09-Jun-2020

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ( राजनीतिक विश्लेषक और समाजसेवी

आखिर इंसान इतना निष्ठुर कैसे हो सकता ...

कोरोना संकट के काल में जहां एक और देश के गृहमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह विपक्ष से यह प्रश्न पूछ रहे हैं की कोरोना संकट में विपक्ष ने क्या किया, वहीं दूसरी ओर चुनाव की सुगबुगाहट होते ही वर्चुअल रैली को संबोधित कर करोड़ों रुपए खर्च किए जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं यह कैसा दोहरा चरित्र है? जब देश इस समय एक बड़े और गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है सरकार के पास पीपीई किट खरीदने को पैसा नहीं हैं। सरकार अपनी जनता का कोविड 19 टेस्ट नहीं करवा पा रही है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों रुपए एक रैली पर खर्च करना क्या संदेश देता है? 

बिहार में विधानसभा चुनाव की आहट होते ही भाजपा तैयारियों में जुट गई है। रविवार को गृहमंत्री अमित शाह ने 'बिहार-जनसंवाद' के माध्यम से वर्चुअल रैली को संबोधित किया। भाजपा ने दावा किया कि पार्टी मुख्यालय से गृहमंत्री अमित शाह द्वारा संबोधित अपनी तरह की पहली डिजिटल राजनीतिक रैली को 14 लाख से अधिक फेसबुक यूजर ने देखा, लेकिन भाजपा सोशल मीडिया पर इस रैली को लेकर यूजर्स के निशाने पर है। ट्‍विटर पर हैशटेग #72000 LED ट्रेंड कर रहा है। कई यूजर्स कह रहे हैं कि कोरोना महामारी के दौर में भाजपा का इतना खर्च कहां तक उचित है? इस ट्‍विटर पर यूजर्स भाजपा से इन एलईडी का खर्च पूछ रहे हैं। कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि एलईडी पर खर्च हुआ पैसा अगर प्रवासी मजदूरों पर खर्च किया जाता तो अच्छा रहता।

भाजपा ने इस रैली को लेकर खास तैयारियाँ की थीं। रैली को असली लुक देने के लिए 72 हजार बूथों पर 72 हजार एलईडी स्क्रीन लगाए गए थे। ये एलईडी स्क्रीन खास उन लोगों के लिए हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं हैं। वर्चुअल रैली को आम रैली जैसा दिखाने की कोशिश की गई। अब यूजर्स इन 72 हजार एलईडी के खर्च को लेकर भाजपा पर सवाल उठा रहे हैं। रैली से पहले राजद नेता तेजस्वी यादव ने भाजपा पर आरोप लगाया था कि इस रैली के लिए राज्य में 72,000 एलईडी स्क्रीन लगाने के लिए 144 करोड़ रुपए खर्च किए गए। राज्य में लगभग 72,000 मतदान केंद्र हैं। 

मैं मीडिया के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और अमित शाह जी से यह प्रश्न करता हूं कि आपको देश की फ़िक्र है तो देश में लाखों मज़दूर जो परेशान हो रहे थे और हो रहे हैं उन्हें व्यापक तौर से घर पहुंचाने में यह पैसा क्यों नहीं खर्च किया? या आप के लिए सत्ता ही सब कुछ है? 

 


क्या मज़दूरों को जानबूझकर परेशान करने के लिए ट्रेनों को गुमराह किया जा रहा है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

क्या मज़दूरों को जानबूझकर परेशान करने के लिए ट्रेनों को गुमराह किया जा रहा है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

29-May-2020

 प्रकाशपुन्ज पाण्डेय, राजनीतिक विश्लेषक


 

समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने बड़ी ही बेबाक़ी से कहा है कि देश में लॉकडाउन के दौरान जो श्रमिक ट्रेनें अपने निर्धारित स्थान के बजाय दूसरे स्थानों पर चली जा रही हैं वो कोई मानवीय भूल नहीं हो सकती है। आखिर कैसे हजारों मील का सफ़र तय करने वाली ट्रेन मुंबई से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के लिए निकले और उड़ीसा के राउरकेला पहुंच जाएं उत्तर प्रदेश के बलिया के लिए निकले और महाराष्ट्र के नागपुर पहुंच जाए। अगर ट्रेन छपरा के आगे मोतिहारी जाने वाली है तो वह सीधे जाने के बजाय पीछे जाकर मुगलसराय होते हुए मोतिहारी क्यों जाएगी? यह अपने आप में एक बहुत बड़ा सवालिया निशान पैदा करता है। ऐसा मानवीय भूल के कारण कदापि संभव नहीं है। 

इससे यह प्रतीत होता है कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है ताकि मज़दूरों को परेशान किया जा सके। क्योंकि सरकार की मंशा थी कि मजदूर जहां है वहीं रहे। लेकिन मजदूर सरकार की बद इंतजामियों के कारण अपने घरों के लिए निकलने को मजबूर हो गए थे, तो सरकार ने यह सोचा कि अगर ऐसा होता है तो कोरोना काल के बाद विपक्ष के साथ-साथ समूचा देश सरकार की नीतियों और सरकार की व्यवस्थाओं पर सवाल जरूर करेगी जिसका जवाब सरकार को देना मुश्किल हो जाएगा। खैर जमीन पर नहीं लेकिन कागज़ों पर और ट्विटर पर तो रेल मंत्री बहुत ही एक्टिव दिखते हैं। लेकिन पुनः वही बात दोहराई जाती है कि कागज़ों पर होने वाली कार्रवाई से जनता को राहत नहीं मिलती है। जनता को तब राहत मिलेगी जब जमीन पर जाकर काम हो। शायद इसी लिए सुप्रीम कोर्ट को भी मजदूरों के मुद्दे पर स्वयं संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नसीहत देनी पड़ी। 

 


प्रवासी या प्रवासी मजदूर कौन हैं?

प्रवासी या प्रवासी मजदूर कौन हैं?

18-May-2020

ज़ालिम, ज़ुल्म और प्रवासी मजदूर।
कितना जुल्म ढायेगी “ये सरकार”!

दरअसल, मजदूर जब गाँव से शहर आए तो उसे हमने माइग्रेशन कहा और ऐसा करने वाले मज़दूरों को प्रवासी मजदूरों की संज्ञा दी गई।
भारत में लॉकडाउन मजदूरों के लिए एक मुसीबत बन कर आया। लाखों मज़दूर सड़क पर आ गए।
उत्तर प्रदेश और बिहार से प्रवासी मजदूर देश के दूसरे राज्यों में सबसे ज्यादा जाते हैं। फिर नंबर आता है मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड। जिन राज्यों में ये काम की तलाश में जाते हैं उनमें से सबसे आगे है दिल्ली-एनसीआर और महाराष्ट्र। इसके बाद नंबर आता है गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब का। लेकिन आज परिस्थितियां बदलीं हैं।
मजदूरों का कोई नहीं क्यूंकि मजदूर मजबूर हैं, लाचार हैं, बेबस हैं, भूखे हैं, ग़रीब हैं, नंगे पैर हैं, जेब में पैसा नहीं, खाने को अन्न नहीं, पीने को पानी नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं, पैरों में चप्पल नहीं, उनके पास अगर है तो सिर्फ आंसू है, भूख है, प्यास है, बेबसी है, लाचारी है और बद्दुआएं हैं।
जिन हवाई चप्पल वालों को जहाज़ में बिठाने का वादा कर सत्ता में आई थी भाजपा आज उन्हीं को ज़ुल्म का शिकार बनाया जा रहा है।
ये प्रवासी मजदूर ही प्रदेशों की आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक दशा व दिशा को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  वे विभिन्न प्रदेशों में रहते हैं, अलग भाषा बोलते हैं परन्तु वहां के विभिन्न क्रियाकलापों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जहां-जहां प्रवासी मजदूर बसे वहां उन्होंने आर्थिक तंत्र को मजबूती प्रदान की और बहुत कम समय में अपना स्थान बना लिया।
पिछले कुछ सप्ताह से जारी लॉकडाउन के चलते प्रवासी मज़दूरों ने अब अपने घरों की तरफ़ लौटना शुरू कर दिया है। हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए वे पैदल निकल पड़े हैं।  हाल ही में जब कर्नाटक सरकार ने प्रवासी मज़दूरों के लिए चलाई गई विशेष ट्रेन श्रमिक स्पेशल को रद्द कर दिया तो सैकड़ों मज़दूर इससे बेहद बेसब्र नज़र आए।
पहले तो राज्य सरकार की ओर से इन प्रवासी मज़दूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेन से जाने की अनुमति दी गई लेकिन बाद में बिल्डरों और डेवलपरों से बात करने के बाद सरकार ने अपना फ़ैसला बदल लिया। इस क़दम ने बेंगलुरु में फंसे हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को बुरी तरह हताश कर दिया है।
ऐसा पूरे देश में हो रहा है। एक तरफ जहां कोरोनावायरस पूरे देश में हाहाकार मचाये है वहीं सरकार ने मजदूरों पर ज़ुल्म करके हाहाकार मचा दिया है।
मजदूर बताते हैं कि ठेकेदारों ने साफ़ कहा है कि अगर लौटने का फ़ैसला कर चुके हो तो यह जगह छोड़नी होगी। जब मजदूर इस जगह को छोड़कर रेलवे स्टेशन जाते हैं और फिर उन्हें टिकट नहीं मिलता है। टिकट नहीं मिलने के बाद वह भटक रहे हैं। काम करने की हिम्मत नहीं बची है, वह अपने घर लौटना चाहते हैं।
मजदूरों की हालत यह है कि उनके पास एक कप चाय ख़रीदने तक के पैसे नहीं बचे हैं। मजदूर लोग अब बंधुआ मज़दूर बन कर रह गए हैैं।
"ट्रेन चलाने की बात कही गई पर मजदूरों को कोई जानकारी नहीं मिली कि उन्हें किस ट्रेन में टिकट मिली है। पूछताछ करने पर  लाठी मारकर उन्हें वहां से भगाया जा रहा है।"
बड़े बिल्डरों ने शुरुआत में मज़दूरों को फूड पैकेट ज़रूर मुहैया कराए लेकिन बाद में मज़दूरों को राशन का सामान मुहैया कराने लगे।
आज की वास्तविक सच्चाई यह है कि "यह अपने को श्रेष्ठ मानने और कामकाजी लोगों से अलग थलग दिखने का नज़रिया है। सरकार के पास कामकाजी मज़दूरों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। वे उपयोगी ज़रूर हैं लेकिन वे प्राथमिकताओं के दायरे से बाहर हैं।" उनके लिए सरकार ने "Use and throw" का नियम अपनाया हुआ है।
सच्चाई यह है कि दक्षिण और पश्चिम भारत के विकसित राज्यों के विकास में बीमारू राज्यों के मजदूरों की अहम भूमिका रही है।
कोरोनावायरस के कारण एक डर भी है रही कारण है कि मजदूर लोग घर जाना चाहते हैं। क्यूंकि इस वक़्त उन्हें अपने परिवार वालों के साथ रहना है। मजदूर लोग दस बाइ दस फीट वाली जगह में छह-सात लोग मिलकर रहते हैं। भगवान ना करे लेकिन अगर किसी एक को कोरोना हो गया तो बाकी मजदूरों का क्या होगा?"
"कोविड-19 से एक सकारात्मक परिदृश्य जो सामने आया है वह यह है कि इसने प्रवासी मज़दूरों को लाइम लाइट में ला दिया है। ये मजदूर लोग ही भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन हैं और अब तक हर किसी को उनके होने के बारे में मालूम तो था लेकिन कोई उनके अस्तित्व को स्वीकार करने तक के लिए तैयार नहीं था।" और आज पूरे देश में सिर्फ मजदूर नज़र आ रहा है। और सरकार परेशान है।
क्या प्रवासी मज़दूरों के लिए कोई सम्मान नहीं है? क्यूंकि उन्होंने खुद को बेहद मामूली समझा वे दरअसल सम्मान चाहते हैं लेकिन इस बात को हम में से कोई समझना नहीं चाहता। कुल मिलाकर हालात और भी ख़राब होने वाले हैं।
प्रोफेसर गुप्ता जापान और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि इन देशों ने साबित किया है कि अर्थव्यवस्था के लिए श्रमिक को ख़राब समझा जाना सही विचार नहीं है। लेकिन हमारी सरकार को तो सिर्फ़ ताली और थाली पर विश्वास है।
सोशल मीडिया पर मजदूरों का दर्द साफ़ दिखाई दे रहा है क्योंकि गोदी मीडिया तो सच्चाई पर पर्दा डालने का काम कर रही है। एक वीडियो में छत्तीसगढ़ के एक लड़के ने कहा- बहुत हो गया तमाशा, सरकार का। सरकार से ज़्यादा हमें अपने पांवों पर भरोसा है। सोचिए ज़रा कि लोगों का पहला भरोसा तो यही टूटा है कि सरकार उनके लिए कुछ करेगी! अब इस पर उनका यक़ीन नहीं रहा।
भरोसा टूटने की दूसरी वजह उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने दिया है जहां योगी सरकार ने श्रम क़ानून को ही निलंबित कर दिया गया है। वहां के अध्यादेश के मुताबिक तीन साल के लिए श्रम क़ानून को निलंबित कर दिया गया है। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यही है कि आप बंधुआ मज़दूरी और गुलामी को संस्थागत शक्ल दे रहे हैं। प्रवासी मज़दूरों की वास्तिवक स्थिति और उनके उत्पीड़न की सामाजिक सच्चाई का पता एक महामारी के प्रकोप में चल रहा है। यह बताता है कि सरकार अपने लोगों को कैसे और कितना समझती है। इसलिए सरकार पर लोगों का कोई भरोसा नहीं रहा है।
इस वक़्त भारत में दो महामारी फैल रही है एक कोरोनावायरस दूसरे मजदूरों के उत्पीड़न की महामारी।
आज स्थिति यह है कि अब जब उनके आय का ज़रिया ही नहीं बचा तो ये प्रवासी मज़दूर अपने गाँव वापस लौट रहे हैं और यही है नेताओं और मंत्रियों के लिए असल चिंता का सबब। जिससे बौखलाई सरकार अनाप-शनाप कार्य कर रही है।
ये प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा खेतों में या फिर निर्माण कार्यों में मजदूरी करते हैं। वहाँ काम ना मिला तो फिर घरों और सोसाइटी में मेड और सुरक्षा गार्ड को तौर पर काम करते हैं। इसके आलावा एक बड़ा वर्ग कारखानों में भी काम करता है। अभी कई राज्यों में खेतों में बुआई का काम शुरू होने वाला है। और वहाँ के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर अपने घर लौट चुके हैं। किसानी के लिए मजदूर नहीं मिल रहे। ऐसे में आने वाले दिनों में बड़ा संकट खेती पर आने वाला है जिसका सीधा असर अनाज की पैदावार पर पड़ेगा। फिर सप्लाई कम, डिमांड ज्यादा, मंहगाई इत्यादि।
देश के सामने एक बड़ा सवाल है।
क्या अर्थव्यवस्था ठप नहीं होगी?
क्या दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों में इन मजदूरों के बिना कामकाज ठप हो जाएगा?
इसका जवाब बहुत आसान है कि मुश्किलें ज्यादा बढ़ जाएंगी और जिस दिन ऐसे सब मजदूर वापस चले जाएंगे, उस दिन अर्थव्यवस्था ठप पड़ सकती है।
आपको घरों में काम करने के लिए लोग नहीं मिलेंगे, ड्राइवर रखने के लिए ज्यादा पैसे ख़र्च करने पड़ सकता है। लोगों को मजदूरी पर रखने के लिए आपको और बेहतर सुविधाएं देनी पड़ेंगी। जिस राज्य से ये मजदूर निकल कर जा रहे हैं, वहां लेबर की कमी ज्यादा होगी। फिर डिमांड सप्लाई का गैप बढ़ेगा और फिर मजदूरी ज्यादा देना पड़ेगा। यानी बहुत खराब परिस्थितियां आ जायेंगी।
फिलहाल पूरे भारत की सड़कों पर मजदूर पैदल, नंगे पैर, भूखा चलता दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया पर आने वाली तस्वीरें, वीडियोज बहुत भयावह है। जनता इन मजदूरों को अपनी जेब से पैसे बांट रही है मगर बेशर्म सरकार को शर्म नहीं आती।
प्रधानमंत्री मोदी ने एलान कर दिया है कि 'लॉकडाउन 4' नए रूप रंग का होगा। जो आज से शुरू हो गया है। इसमें पहले के तीन लॉकडाउन के मुकाबले ज्यादा छूट मिलने की बात कही गई है। ऐसे में जब फैक्ट्रियों में, खेतों में और घरों में दोबारा से काम करने की इनको इजाजत मिलेगी तो मजदूर कहां से आएंगे?
एक बड़ा सवाल?
सोचिए और जागिये।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 


"हमारे बाद अंधेरा नहीं उजाला होगा"

13-May-2020

द्वारा :  जुलैखा जबीन 


आजका दौर भारतीय नारीवाद के गुज़रे स्वर्णिम इतिहास पे चिंतन-मनन किए जाने का है... यक़ीनन ये वक़्त ठहर कर ये सवाल पूछने का भी है के भारत के नारीवादी आंदोलन का वर्ग चरित्र हक़ीक़त में क्या और कैसा रहा है....! हालांकि इन बेहद ज़रूरी सवालों को कई तरह के "प्रतिप्रश्नों" के ज़रिए "उड़ा" दिए जाने की भरसक कोशिशें की जाएंगी. लेकिन फ़िर भी असहज कर दिए जाने वाले सवाल उठाना जम्हूरियत की असली ख़ूबसूरती तो है ही, लोकतंत्र में जी रहे तमाम आम नागरिकों के नागरिक होने का इम्तिहान भी है..... पिछले कुछ दिनों से जामिया यूनिवर्सिटी की स्कालर और ग़ैर संवैधानिक #CAA, #NRC #NPR  पर एक नौजवान नागरिक #सफ़ूराजरगर की गिरफ़्तारी, उसपर राजद्रोह से लेकर हत्या करने, हथियार रखने, दंगे भड़काने जैसी गतिविधियों सहित 18 धाराएं लगाई गई हैं. इसके साथ ही जेल में की गई मेडिकल जांच में उसके प्रेग्नेंट होने की ख़बर सामने आने के बाद भारत के बहुसंख्यक समाज के लुंपन एलिमेंट्स की तरफ़ से सोशलमीडिया में जो शाब्दिक बवाल मचाया गया वो तो अपेक्षित था.

जो अनापेक्षित रहा वो इनकी औरतों का इस युद्ध में न सिर्फ़ कूद पड़ना बल्कि शाब्दिक, प्रवोकिंग, ग़ैर संवैधानिक, अ'शालीन और घोर मुस्लिम विरोधी नफ़रती बाण वर्षा में अपने ख़ुद के औरत होने को भूल जाना..!..भीतर तक दहशत ज़दा करने वाले रहा.... सफ़ूरा के चरित्र का पोस्टमार्टम करनेवाली औरतें-: अच्छी खा़सी लिखि पढ़ी, पुति पुताई, कटे-लंबे और रंगे बालों वाली, सभ्य,गोरीचिट्टी अंदरूनी, बाहरी ख़ानों वाली, नौकरी पेशा, सामाजिक,राजनीतिक असर रखनेवाली, बूढ़ी, जवान और घरेलू सभी तरह की रही हैं.... भारत के गहरे तक इंजेक्टेड, हिंदुत्ववादियों के ज़रिए, अपनी औरतें और इनके भीतर तक पिरोया गया ये ज़हर डराने वाला है.


जिसके  फ़िलहाल अभी थमने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं. हालांकि चार दिन बाद ही सही दिल्ली महिला आयोग का इस तरफ़ ध्यान आ गया है.
ग़ौरतलब सवाल ये है के भारत में क्या कभी महिलाओं को इंसान समझे जाने का कोई आंदोलन खड़ा भी किया गया था? अगर जवाब "हां" में है तो क्या वे तमाम आंदोलनकारी औरतें बांझ थीं जिन्होंने नया जीवन सृजित ही नहीं किया? अगर जवाब है कि "ऐसा कैसे हो सकता है...! इतने बड़े पैमाने पर "बांझपन" हो ही नहीं सकता.....! बेशक ऐसा ही हुआ होगा, तो फ़िर ज़हन में ये सवाल भी कौंधने लगता है तो क्या भारत के गुज़रे 72 बरसों में कोई ऐसी सुनामी, कोई ऐसा ज़लज़ला आया के औरतें बच्चियाँ सबके सब ग़ारत हो गईं, मर गईं, के पिछला सब कुछ ख़त्म मटियामेट....!!!


अगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ/किया गया तो फ़िर आज सोशलमीडिया में सफ़ूरा जरगर नामक एक कश्मीरी नौजवान लड़की पर शाब्दिक निशाना साधती ये औरताना फ़ौज आई कहां से..है.?? क्या ये सभी आयातित औरतें  हैं?? नहीं... ये मुमकिन ही नहीं है के नफ़रतों की पैरोकार इतनी बड़ी औरताना सेना बाहर से मंगवाई जाए... और ये भी नामुमकिन है के इनके तनखैय्या आईटी सेल के सभी मर्द एक एक  फ़र्ज़ी औरतों के नाम की आईडी बना ऐसी घिनौनी, स्तरहीन, वल्गर, ज़बानों से आपसी बातचीत करें.....क्योंकि यहां तो, प्रोफ़ेसर, राईटर, तथाकथित सामाजिक क्षेत्र की औरतें (बाक़ायदा अपने नाम और असली फ़ोटो के साथ मोर्चा संभालती नज़र आई हैं) तो आख़िर ये औरतें हैं कौन..? क्या कहीं से टपक पड़ी अचानक से...?


नहीं साथियों, ये न आसमान से टपकी हैं और न किसी दूसरे ग्रह से आयातित हैं....! ये यहीं हमारे आप के साथ ही पैदा हुईं हैं, हमारे आपकी तरह ही इनकी परवरिश की गई हैं... हमारे आपके बीच की ही रहनेवाली हैं ये सब...पिछले डेढ़ दशकों में ये या इन जैसी, इन्हें प्रशिक्षित करने वाली मिशनरियों के तज़करे लगातार आते रहे हैं. इनके साहसिक शारीरिक, हस्तकौशल, युद्ध कौशल, हथियार प्रदर्शन की खबरें/विडियोज़ गाहे-बगाहे लीक किए जाते रहे हैं, सांस्कृतिक, पौराणिक, धार्मिक आयोजनों में इनकी कौशल, कला प्रदर्शनियों का प्रसारण हमारे सामने लाया जाता रहा हैं , हम देखते और गौरवान्वितभी रहे लेकिन ध्यान नहीं धरा. अगर कभी दिया भी तो बतौर एक्स्ट्रा करिकुलम ऐक्टिविटीज़ के नाम पर गौरवान्वित भी होते रहे हैं- के हमारी बच्चियाँ, संकट के वक़्त देश बचाने की कला में पारंगत होती जा रहीं हैं. ये या इस जैसा बहोत कुछ हर रोज़ होता रहा, हम (आम अवाम)देखते रहे.....! संवैधानिक ज़िम्मेदार एजेंसियों ने भी इस तरफ़ कान नहीं धरे, आंखें मूंद लीं,...हम भी बेचारे, अपने काम के मारे, इग्नोर मार आगे बढ़ते गए.......!


देश की राजनैतिक पार्टियों की तो क्या बात करें, चेतन शील कहे जाने वाले सामाजिक संगठन भी पिछले 20 बरसों में इस तरह के किसी भी ज़हरीली कोशिशों में बच्चों- बच्चियों के नफ़रती (ग़ैर संवैधानिक)  इस्तेमाल पर किसी विधानसभा या संसद के ज़रिए देश के सामने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव/चर्चा, किसी सड़क, किसी गोष्ठी, किसी अदालत में भी कहीं किसी तरह की संजीदगी से, बतौर कैंपेन कोई आंदोलनात्मक अभियान नहीं चलाया, जिसमें  देश की अवाम ख़ासकर नौजवान पीढ़ी को लेकर कोई पहल होती दिखाई पड़ती या सामाजिक, मज़हबी एकता पर कोई गंभीर पहल होती दिखलाई पड़ती (देश के अल्पसंख्यक, SCSt समुदायों को साथ लेकर कोई आयोजन, कोई मेला कहीं से होने/ मनाने की ख़बर/पहल दिखाई/सुनाई नहीं पड़ी). ख़ासकर महिला आंदोलनों ने देश के भीतर सांस्कृतिक एकजुटता वाले ताने बाने के बिखराव को सहेजने की मंशा से कोई गंभीर कैंपेन चलाया हो दिखाई नहीं पड़ता... छोटे मोटे NGOs ने सर्व सुविधा युक्त यात्राएं निकाल, विचार गोष्ठियों जैसी उथली गतिविधियां संचालित कीं जो बड़े 5 स्टार मीडिया इवेंट, और फ़ंडिंग एजेंसियों को सालाना रिपोर्ट पेश करने, अगले वार्षिक न्यू इवेंट्स के लिए अपने संगठन के लिए फ़ंडिंग फ़िक्स करने तक ही सीमित रहे.

महिला मुद्दों पर राजनैतिक (विचारधारात्मक) काम करने वाले संगठन/आंदोलनों की हवाई यात्राएं, कुछ गिने चुने सीमित उनके पुराने ढ़र्रो पे आधारित राज्य, राष्ट्रीय सम्मेलनों तक ही सीमित रहे. देश में लगातार बिगाड़े जा रहे सामाजिक, सांस्कृतिक ताना-बाना पर, भारतीयता, हिंदोस्तानियत का इतिहास उसकी अहमियत, आज की ज़रूरत पर किसी भी तरह की ठोस कार्ययोजना जैसा ज़मीनी स्तर पर देखने में नहीं आया. हां अपने अपने ख़ेमों के भीतर कुछ कोशिशें हुईं मगर उथली तरह से.  आम अवाम को अप्रोच करने की देश स्तरीय प्रशिक्षण का ढ़ांचा न राजनैतिक पार्टियों की प्राथमिकता में रहा और न महिला आंदोलनों/संगठनों में. पिछले 10-20 बरसों से हिंन्दोस्तान को "हिन्दूराष्ट्र" बनाने की जितनी तेज़ी से कोशिशें की गई हैं उसके  बरअक्स हिन्दोस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब के ढ़ांचे को खंडहर में तब्दील होने से बचाने के लिए राजनैतिक पार्टियों, जन संगठनों, महिला आंदोलनों ने कोई ठोस आंदोलनात्मक क़दम उठाने में कोई बड़ी अहम भूमिका अदा नहींं की है.....!


अलिखित मनुवादी विधान का संविधान के पैरेलल लगातार लागू होता जाना इसका सबसे खुला और बड़ा सुबूत है. क्या ये महज़ मज़ाक़  कहा जा सकता है के देश के SC, ST तबकों ने अपनी आबादी के मानवीय, नागरिक हक़ों के लिए कई बार एकजुट आव्हान किया और कुछ हद तक उसे हासिल करने में कामियाब भी रहे. लेकिन उच्चवर्णीय नेत्तृत्व वाले सामाजिक संगठन, महिला आंदोलन और राजनीतिक पार्टियों ने  लोकतांत्रिक हिन्दोस्तान की एकता और संप्रभुता को क़ायम रखने के लिए आम अवाम को जागरूक करने के लिए किसी भी तरह का देशव्यापि चरणबद्ध आंदोलन छेड़ने की ज़रूरत नहीं महसूस की...!

देश के अलग अलग ( जातिगत, धार्मिक) पहचान वाले नागरिक समुदायों ने अपनी समझ और बिसात मुआफ़िक़ अपने हक़, सम्मान और ज़िंदा रहने के संविधान प्रदत्त हक़ों की हिफ़ाज़त के लिए बेचैन करवटें बदलने की कोशिशें भी कीं, लेकिन बुद्धिजीवी कहाने वाली भारत की बहुसंख्यक आबादी के गिने, चुने छपास, मानसिकता वालों ने, इनके शुरू किए गए विरोध के स्वरों में "इंही के मंचों" पे जा कर भाषण देने तक ही ख़ुद को सीमित रखा. कभी समुदाय विशेष के विरोध के स्वर में अपनी बहुसंख्यक आबादी की पहचान का पंडाल लगा, उन विरोधों को सशक्त बनाने अपनी आवाज़ खड़ी करने की दिखावे को ही सही झूठी कोशिश भी नहीं की. वर्ना शाहीन बाग़ से शुरू हुआ "संविधान और लोकतंत्र बचाओ" आंदोलन फ़ासिस्ट ताक़तों के ज़रिए यूं न बिखेर दिया जाता. अगर बहुसंख्यक बुद्धिजीवी वर्ग सचमुच में हिंदोस्तानियत बचाने के लिए ईमानदार होता उसके "अपनी पहचान वाले बाग़" भी स्थापित होते और आज हिंदोस्तान का भीतरी नज़ारा कुछ और होता...!!!! अफ़सोस ऐसा कुछ सोचने की ज़रूरत भी महसूस न की सुविधा पसंद इस वर्ग ने. -नतीजतन मुल्क की बहुसंख्यक आबादी जो हिन्दु धर्मावलंबी है अतिवादी समूहों को अपनी रहनुमाई (न चाहते हुए भी) सौंप दी.  यही वजह रही की ये आबादी कभी मुल्क को अपने धर्म के ऊपर नहीं रख सकी.

पिछले 50 बरसों का चुनावी इतिहास देखा जाए तो साफ़ दिखता है के राजनैतिक पार्टी की सशक्त ट्रेड यूनियनों का हिस्सा रहकर अपने श्रमिक हक़ हासिल करने वाले उसके मेंबर्स भी चुनाव में अपने वोट ज़ात, गोत्र, धर्म के आधार पर ग़ैर राजनैतिक, अपरिपक्वता का परिचय देते हुए श्रम विरोधी पार्टियों को ही वोट देकर उन्हें जिताते रहे हैं.  यही वजह है के गुज़रे 73 बरसों में समानता की विचारधारा रखने वाली पार्टियों ने भी अपने सदस्यों/ कार्यकर्ताओं को न राजनैतिक कौशल से लैस करने में रुचि दिखाई है और न ही उन्हें ज़िम्मेदार नागरिक बनना सिखाया है. सर्व सुविधा युक्त राष्ट्रीय पार्टियों (मर्दवादी) की प्राथमिकता में ही जब देश, उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक, भौगोलिक तासीर, उसकी विविधताओं और मूल जड़ों के लिए लगाव जुड़ाव नहीं है तो उनके अधीनस्थ महिला संगठनों/आंदोलनों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली हो भी कैसे सकती है?

फ़िलहाल, भारतीय नारिवादी, महिला संगठन, उनके विचार अप्रासंगिक से कहीं कोने में दुबके पड़े हैं. क्योंकि ये सारे तरह के संगठन- भारतीय ज़मीन, उसकी संस्कृति के बहुत ऊपर आसमान में लटके हुए से थे-आज वे सभी धड़ाम से गिर पड़े हैं.... आसान ज़बान में कहें तो सब के सब फ़ेल हो गए हैं... इस हक़ीक़त को आत्मसात कर लेने में कोई बुराई नहीं है, के भारतीय नारीवादी संगठनों की सियासी और व्यक्तिगत धारणाएँ और विचारधाराएं "हिन्दोस्तान" की नहीं, बल्कि उस अलिखित मनुवादी (संविधान के रहते) क़ानून
(हिन्दु बनाम ब्राहमणी राष्ट्र के ख़ाब को) को नहला-धुलाकर, अच्छे कपड़ों, भीनी ख़ुशबू में लपेट कर ज़िन्दा रखने वाली ही साबित हुई है.

हिन्दोस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब को दोबारा ज़िन्दा करने, क़ायम रखने का आंदोलन जो 15 दिसंबर 2019 की दरमियानी रात को शाहीन बाग़ ने शुरू किया और देखते ही देखते हज़ारों की तादाद में बाग़ और करोड़ों की तादाद में मुल्क की आम ख़वातीन ने लाठी, डंडे खाकर, पुलिस के हर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मोहब्बत से जो शमअ रौशन की है इंशाअल्लाह वो रौशनी अब मद्धम नहीं पड़ने दी जाएगी.  बेफ़िक्र रहें आप तमाम सफ़ूरा जरगर, इशरत जहाँ, मीरान हैदर,  और मुल्कभर के जां नशीन सिपहसालारों आप सबके लिए ही शायर ने लिक्खा है----
हमें ख़बर है के हम हैं चराग़े आख़िरी शब,

हमारे बाद अंधेरा नहीं उजाला होगा"....!!  ज़िन्दाबाद साथियों... 

प्रस्तुत लेख लेखक के निजी विचार है 
 


एक थे मौलाना अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी : ध्रुव गुप्ता आईपीएस

एक थे मौलाना अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी : ध्रुव गुप्ता आईपीएस

11-May-2020

ध्रुव गुप्ता आईपीएस
आज 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की वर्षगांठ पर हम याद करते हैं स्वाधीनता संग्राम के असंख्य विस्मृत नायकों में एक मौलाना अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी को जिन्हें इतिहास में वह दर्ज़ा नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे। फ़ैजाबाद के ताल्लुकदार घर में पैदा हुए मौलाना साहब अपने शुरुआती दिनों में अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ़ क्रांतिकारी पर्चे लिख कर गांव-गांव बांटा करते थे। 1857 के जंग-ए-आजादी का एक बेशकीमती दस्तावेज 'फ़तहुल इस्लाम' है जिसे मौलाना साहब ने सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि कई नामो से खुद लिखा था। इस पत्रिका में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान लिखते हुए अवाम से जिहाद की गुज़ारिश की गयी है, जंग के तौर-तरीके समझाए गए हैं और देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता बनाए रखने की सिफारिश की गई है। इस पत्रिका के असर से अंग्रेजी हुकूमत इस क़दर ख़ौफ़ खाती थी कि उसने 1856 में मौलाना साहब की तमाम गतिविधियों पर रोक लगा दी। पुलिस की चौतरफा निगरानी के बावजूद उनकी सक्रियता कम नहीं हुई तो 1857 में फ़ैजाबाद से गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहापुर जजिलों में घूम-घूमकर लोगो को अंग्रेजों के खिलाफ गोलबंद करना शुरू कर दिया। जंग-ए-आज़ादी के दौरान उन्हें विद्रोही स्वतंत्रता सेनानियो की बाईसवीं इन्फेंट्री का प्रमुख बनाया गया। यह क्रांतिकारियों का वह दस्ता था जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह पराजित किया था।

चिनहट की ऐतिहासिक जंग के बाद ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस मौलाना फैज़ाबादी को उनके जीते जी नही पकड़ पाई। जनरल कैनिंग ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पचास हज़ार रुपयों का ईनाम घोषित किया था। अवाम में वे इतने लोकप्रिय थे कि लोग उन्हें गिरफ्तार कराने की सोच भी नहीं सकते थे। लोगों का मानना था कि मौलाना साहब में कोई ईश्वरीय शक्ति है जिसके रहते अंग्रेज उन्हें पकड़ ही नहीं सकते। दुर्भाग्य से इनाम के लालच में उनके मित्र और पुवायां के अंग्रेजपरस्त राजा जगन्नाथ सिंह ने 15 जून 1858 को खाने पर आमंत्रित कर उन्हें धोखे से गोली मारी और उनका सिर काटकर अंग्रेज़ जिला कलक्टर के हवाले कर दिया। जंगे आज़ादी का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन फिरंगियों के लिए जश्न का दिन था। अंग्रेज अफसरों और पुलिस ने अवाम में दहशत फैलाने की नीयत से मौलवी साहब का कटा सिर शहर में घुमाया और शाहजहांपुर की कोतवाली में नीम के एक पेड़ पर लटका दिया। 

इतिहासकार होम्स ने उत्तर भारत में अंग्रेजी शासन का सबसे ख़तरनाक दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह को बताया है। ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ विद्रोही की संज्ञा दी। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार मालीसन ने लिखा है -‘मौलवी असाधारण आदमी थे। विद्रोह के दौरान उनकी सैन्य क्षमता और रणकौशल का सबूत बार-बार मिलता है। उनके सिवाय कोई और दावा नहीं कर सकता कि उसने युद्धक्षेत्र में कैम्पबेल जैसे जंग के माहिर उस्ताद को दो-दो बार हराया था। वह देश के लिए जंग लड़ने वाला सच्चा राष्ट्रभक्त था। न तो उसने किसी की धोखे से हत्या करायी और न निर्दोषों और निहत्थों की हत्या कर अपनी तलवार को कलंकित किया। वह बहादुरी और आन-बान-शान से उन अंग्रेजों से लड़ा, जिन्होंने उसका मुल्क छीन लिया था।’

1857 के स्वतंत्रता संग्राम की सालगिरह पर आज मौलाना अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी को खिराज़-ए-अक़ीदत !
द्वारा सै क़ासिम 

 


इरफान खानः विराट संभावना की अकाल मौत

इरफान खानः विराट संभावना की अकाल मौत

29-Apr-2020

इरफान खानः विराट संभावना की अकाल मौत
-ः ललित गर्ग:-


अपनी अदाकारी से न केवल देश बल्कि दुनिया के दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले बाॅलीवुड एवं हॉलीवुड के फिल्म अभिनेता इरफान खान का 54 साल की उम्र में मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में बुधवार को निधन हो गया। इरफान काफी लंबे वक्त से कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से पीड़ित थे और इसकी जानकारी 2018 में ही उन्होंने सार्वजनिक की थी, लेकिन दो साल बाद ये जिंदगी से जारी इस जंग को हार गए। असमय में असंख्य प्रशंसकों के दिलों पर राज करने वाले इरफान की मौत एक विराट संभावना की अकाल मौत है और भारतीय सिनेमा की बड़ी क्षति है। वे भारतीय सिनेमा के एक ऐसे कलाकार थे, जिनकी तुलना अन्य किसी कलाकार से नहीं की जा सकती है। अभिनय एवं सिनेमा का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसका ज्ञान और अनुभव उन्हें नहीं रहा हो। सिनेमा उनमें बसता था और वे खुद सिनेमा को जीते थे, यही कारण है कि वे एक मिसाल बन गए। उनका स्वाभाविक एवं संजीदा अभिनय उन्हें बरसों जिंदा रखेगा।
दिग्गज अभिनेताओं में शुमार इरफान खान के कैरियर की शुरूआत टेलीविजन सीरियल्स से हुई थी। अपने शुरूआती दिनों में वे चाणक्य, भारत एक खोज, चंद्रकांता जैसे धारावाहिकों में दिखाई दिए। उनके फिल्मी कैरियर की शुरूआत फिल्म ‘सलाम बाम्बे’ से एक छोटे से रोल के साथ हुई। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में छोटे बड़े रोल किए लेकिन असली पहचान उन्हें ‘मकबूल’, ‘रोग’, ‘लाइफ इन ए मेट्रो’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘द लंच बाक्स’ जैसी फिल्मों से मिली। वे बाॅलीवुड की 30 से ज्यादा फिल्मों मे अभिनय कर चुके हैं। इरफान हॉलीवुड में भी भारतीयता का प्रतिनिधित्व करने वाला एक जाना पहचाना नाम हैं। वह ए माइटी हार्ट, स्लमडॉग मिलियनेयर और द अमेजिंग स्पाइडर मैन फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। 2011 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2012 में इरफान खान को फिल्म पान सिंह तोमर में अभिनय के लिए श्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिया गया। ‘हासिल’ फिल्म के लिये उन्हे वर्ष 2004 का फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार सहित तीन फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुए। अन्य अनेक पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित होने का अवसर प्राप्त हुआ, लेकिन वे इन पुरस्कार से बहुत उपर थे। वे हिन्दी और भारतीय सिनेमा के वैसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उसे एक विश्वमंच प्रदान किया। नायक तो सिनेमा के क्षेत्र में बहुतेरे हुए, पर इरफान जैसे नायक सदियों में कोई एक ही होता है। वास्तव में वे एक हरफनमौला सिने व्यक्तित्व थे। उनके अभिनय का हर पक्ष इतना सधा हुआ होता था कि हर दर्शक उससे मुग्ध हो जाता था।
इरफान खान का जन्म 4 नवंबर 1966 का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में हुआ था। वे स्थानीय अखबार दैनिक भास्कर और स्वदेश में सन् 1982-1989 तक कार्टून बनाते रहे। दिल्ली की श्रीधरणी आर्ट गैलरी में अपनी प्रदर्शनी के दौरान वे नवभारत टाइम्स लखनऊ के लिये चुन लिये गए। 1994 में दिल्ली आकर इकाॅनोमिक टाइम्स, फाइनेन्शिअल एक्सप्रेस, एशियन ऐज में स्टाफ कार्टूनिस्ट रहे। 2000 में जी न्यूज में वरिष्ठ कार्टूनिस्ट के पद पर काम करते हुए अपना टाॅक शो शख्शियत होस्ट किया, 2003 में एनडीटीवी के शो गुस्ताखी माफ की स्क्रिप्ट लिखी और सहारा समय पर इतनी-सी बात होस्ट किया। अब तक उनके 3 संकलन प्रकाशित हो चुके थे। एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम की पुस्तकों में इरफान सहित देश के विभिन्न अन्य कार्टूनिस्टों के संपादकीय कार्टूनों को भी शामिल किया गया था। जापान फाउन्डेशन ने ‘एशियाई कार्टून प्रदर्शनी’ के अपने वार्षिक कार्यक्रम के तहत, 2005 में नौवीं प्रदर्शनी के लिए प्रत्येक एशियाई देश से एक कार्टूनिस्ट के चयन हेतु भारत की ओर से इरफान का चयन किया।
बॉलीवुड से हॉलीवुड तक अपने अभिनय की छाप छोड़ने वाले सदाबहार अभिनेता इरफान खान को आज पूरी दुनिया जानती हैं। ऑलराउंडर अभिनेता इरफान ने अपने अभिनय के दम पर हर वर्ग के दर्शकों को प्रभावित किया है। इरफान का अपना एक अलग अंदाज है, वो एक ऐसे कलाकार हैं कि अपने जबरदस्त अभिनय से किसी भी किरदार में जान डाल देते हैं। हॉलीवुड अभिनेता टॉम हैंक्स ने कहा कि इरफान की तो आंखें भी एक्टिंग करती हैं। वे अपनी अभिनय साधना एवं कौशल के बल पर जहां एक ओर कलात्मक ऊँचाइयों के चरमोत्कर्ष तक पहुँचे वहीं दूसरी ओर लोकप्रियता के उच्चतम शिखर तक भी। वे हिन्दी सिनेमा में अपने ढंग का अलग व्यक्तित्व बन गये, जिसका कोई मुकाबला नहीं। उनकी अभिनय शैली जहां सहज प्रतीत होती है, वहीं वह विलक्षण एवं चैंकाने वाली भी थी, क्योंकि वे सब कुछ अपनी पकड़ में रखते थे-आवाज भी, भाव भी, अदाएं भी और संवाद भी। उनमें दिखावा एवं बड़बोलापन नहीं था। बल्कि उनमें एक सधे हुए एवं पूर्ण अभिनेता के सारे गुण विद्यमान थे। उनकी फिल्में देखते हुए प्रतीत होता है कि वे बिना अभिनय के सशक्त अभिनय करते हैं। मैंने देखा कि अनेक दृश्यों में, जहां उन्हें कुछ भी बोलना नहीं था, वे गजब का असर पैदा कर गये। मैंने समझ लिया कि इस कलाकार ने अभिनय की जड़ को पकड़ लिया है।
इरफान के पिता टायर का व्यापार करते थे। पठान परिवार के होने के बावजूद इरफान बचपन से ही शाकाहारी हैं, उन्हें किसी भी तरह का नशा नहीं था। उनके पिता उन्हें हमेशा यह कहकर चिढ़ाते थे कि पठान परिवार में ब्राह्मण पैदा हो गया। उन्होंने वर्ष 1984 में दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में अभिनय का प्रशिक्षण लिया। उन्हें स्कॉलरशिप भी मिली। इरफान खान का शुरुआती दौर संघर्ष से भरा था। जब उनका एनएसडी में प्रवेश हुआ, उन्हीं दिनों उनके पिता की मृत्यु हो गई। घर के आय का स्रोत ही समाप्त हो गया। उन्हें घर से पैसे मिलना बंद हो गया। उनके पास बस एनएसडी से मिलने वाली फेलोशिप का ही सहारा था। इसी समय उनकी सहपाठी लेखिका सुतपा सिकदर ने उनका भरपूर साथ दिया, उन्हीं से 23 फरवरी, 1995 को उनका विवाह हुआ। उनके दो बेटे भी हैं-नाम बाबिल और अयान। अभिनय में प्रशिक्षित होने के बाद इरफान ने मुंबई का रूख किया। मुंबई आने के बाद वे धारावाहिकों में व्यस्त हो गए। लोकप्रिय धारावाहिकों में इरफान खान के बेहतरीन अभिनय ने फिल्म निर्माता-निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। मीरा नायर की सम्मानित फिल्म सलाम बांबे में उन्हें मेहमान भूमिका निभाने का अवसर मिला। सलाम बांबे के बाद इरफान खान लगातार ऑफबीट फिल्मों में अभिनय करते रहें। एक डॉक्टर की मौत, कमला की मौत और प्रथा जैसी समांतर फिल्मों में अभिनय के बाद इरफान ने मुख्य धारा की फिल्मों की ओर रूख किया। हासिल में रणविजय सिंह की नकारात्मक भूमिका में इरफान खान ने अपनी अभिनय-क्षमता का लोहा मनवाया। देखते-ही-देखते वे मुख्य धारा के निर्माता-निर्देशकों की भी पसंद बन गए।
इरफान खान मौजूदा दौर के उन अभिनेताओं में हैं, जो स्वयं को फिल्मों में नायक की भूमिका के दायरे तक सीमित नहीं करते। वे यदि लाइफ इन ए मेट्रो, आजा नचले, क्रेजी 4 और सनडे जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण चरित्र भूमिकाएं निभाते हैं, तो मकबूल, रोग और बिल्लू में केंद्रीय भूमिका भी निभाते हैं। गंभीर अभिनेता की छवि वाले इरफान समय-समय पर हास्य-रस से भरपूर भूमिकाओं में भी दर्शकों के लिए उपस्थित होते रहे हैं। इरफान नाम ही काफी है। इनकी एक्टिंग का जादू सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों पर छाया हुआ है। उनका कहना है कि दर्शकों की सराहना किसी भी कलाकार के लिए मायने रखती है और इससे उनका उत्साहवर्धन होता है। उनकी हॉलीवुड फिल्म ‘इनफर्नो’ को भी दर्शकों ने खूब सराहा है। इरफान ने एक बयान में कहा, “यह मायने नहीं रखता कि आपने कितनी फिल्में की हैं। दर्शकों की सराहना से हर कलाकार खुश होता है। जब इरफान की फिल्म ‘इनफर्नो’ भारत और अमेरिका में रिलीज हुई तो इस फिल्म के लिए उनकी काफी प्रशंसा हुई। इरफान का कहना है यह उनके लिए पुरस्कार जैसा है। उनका सपना है कि वह ध्यान चंद जैसे विख्यात खिलाड़ी की जीवनी पर आधारित एक फिल्म करे। हालांकि यह सपना उनका अधूरा रह गया। पान सिंह तोमर फिल्म में जान फूंकने वाले इरफान को उनके फैंस शानदार अभिनय और उनके जुझारूपन के लिए प्यार करते हैं। कोरोना महामारी के कारण लाॅकडाउन की स्थिति में इरफान खान संभवतः अन्तिम फिल्म अंग्रेजी मीडियम की सिनेमाघरों में रिलीज न होकर डिज्नी हाॅटस्टार पर हुई है, लेकिन छोटे पर्दे पर इसने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। यह सफलता उस महान् कलाकार के प्रति श्रद्धांजलि है। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133 

 
 

रमजान के उपवास से इम्यूनिटी पावर को कोई फर्क पड़ता है !  जानिए तथ्यों से

रमजान के उपवास से इम्यूनिटी पावर को कोई फर्क पड़ता है ! जानिए तथ्यों से

27-Apr-2020

इस साल मुसलमान तालाबंदी और कोरोनोवायरस आशंकाओं के बीच रमजान मनाते हैं। रमजान मुसलमानों के लिए उपवास का महीना है, जो ऐसा करने के लिए पर्याप्त रूप से फिट होते हैं, उनसे पूरे चंद्र महीने के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त के घंटों के बीच उपवास (खाने और पीने से परहेज) की उम्मीद की जाती है। मुसलमान पूरे महीने अल्लाह की इबादत और इबादत के साथ बिताते हैं।

क्या उपवास प्रतिरक्षा को कमजोर करता है?

सीओवीआईडी ​​-19 की आशंकाओं के बीच लोगों को यह नहीं कहने के लिए कहा जा रहा था क्योंकि ऐसा करने से प्रतिरक्षा कमजोर हो सकती है और श्वसन रोग का कारण बन सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों और विशेषज्ञों और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधियों, जिन्होंने इस मामले को देखने के लिए एक विशेष बैठक आयोजित की थी, ने निष्कर्ष निकाला है कि कोरोनोवायरस और उपवास के बीच कोई संबंध नहीं है।

उपवास प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ा देता है

रमजान के लॉकडाउन के दौरान और एक वायरल महामारी के दौरान, एक एनएचएस डॉक्टर और यूनाइटेड किंगडम में एक वरिष्ठ विश्वविद्यालय व्याख्याता डॉ। आमिर खान के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर चर्चा करते हुए, आशंकाओं को दूर किया कि उपवास कोरोनोवायरस के अनुबंध की एक व्यक्ति की संभावना को प्रभावित कर सकता है। इसके विपरीत, उन्होंने देखा कि उपवास को कई तरीकों से शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है, इसमें हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को बढ़ावा देने वाले प्रभाव भी शामिल हैं।

पूर्वजों ने उपवास के लाभों को पहचान लिया था

यह कहते हुए कि हमारे प्राचीन पूर्वजों ने उपवास के लाभों को पहचाना होगा, डॉ खान ने बताया कि रमजान के महीने के दौरान उपवास करने वाले मुसलमानों के अलावा, ईसाइयों के लिए ईस्टर के लिए लीड-अप में लेंट के महीने में भी उपवास मनाया जाता है, और योम किपुर के दौरान यहूदी धर्म में। उन्होंने उल्लेख किया कि इस बात के भी प्रमाण हैं कि प्राचीन मिस्रवासी लंबे समय तक उपवास करते थे ताकि उनके शरीर की बीमारियों और बीमारी को दूर किया जा सके।

उपवास शरीर को “ऊर्जा संरक्षण मोड” में डालता है

डॉ। खान ने अलजजीरा में प्रकाशित अपने लेख में खुलासा किया कि हाल के अध्ययनों से पता चला है कि उपवास वास्तव में शरीर के चारों ओर कोशिकाओं में होने वाली सामान्य सूजन की मात्रा को कम करके प्रतिरक्षा प्रणाली पर लाभकारी प्रभाव डाल सकता है। पोषक तत्वों की कमी के कारण, उपवास को शरीर को “ऊर्जा संरक्षण मोड” में रखने के लिए माना जाता है, उन्होंने जोर दिया। आगे की प्रक्रिया की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि ऊर्जा बचाने के प्रयास में, शरीर अपनी कई पुरानी या क्षतिग्रस्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं को पुन: चक्रित करता है, जो बाद में उपवास की अवधि समाप्त होने पर नई, स्वस्थ प्रतिरक्षा कोशिकाओं की पीढ़ी को बढ़ावा देता है। ये नई कोशिकाएं संक्रमण से लड़ने में तेज और अधिक कुशल हैं इसलिए समग्र प्रतिरक्षा में सुधार होता है।

पीने के पानी से परहेज प्रमुख कारक है

यह बताते हुए कि रमजान का उपवास सामान्य आहारों से कैसे भिन्न होता है, डॉ। खान ने बताया कि पीने के पानी से परहेज एक महत्वपूर्ण कारक है जो रमजान के उपवास को सामान्य आहारों से अलग करता है जो आंतरायिक उपवास व्यवस्थाओं के माध्यम से वजन घटाने को बढ़ावा देते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार, हालांकि 12 से 24 घंटे से अधिक समय तक उपवास रखने वाले पानी का प्रतिरक्षा प्रणाली पर थोड़ा हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है, जो किसी व्यक्ति को किसी भी तरह के संक्रमण को पकड़ने के जोखिम में डाल सकता है, यह भी दर्शाता है कि प्रतिरक्षा बेहतर हो गई है। खाने और पीने के बाद जल्द ही फिर से।

रमजान उपवास और आहार के बीच अंतर

यह देखते हुए कि अलग-अलग अध्ययनों से पता चलता है कि रमजान के धार्मिक उपवास के अन्य प्रकार के उपवासों के लिए स्वास्थ्य लाभ की तुलना है, उन्होंने हालांकि चेतावनी दी कि उपवास तोड़ने के दौरान समोसे और पकोड़े जैसे तले हुए खाद्य पदार्थों में अतिउपयोग करना निश्चित रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली में मदद नहीं करेगा।

 

कोरोनावायरस और रमजान उपवास

डॉ। अमीर खान ने निष्कर्ष निकाला कि, “चूंकि यह कोरोनोवायरस महामारी के दौरान हमारा पहला रमजान होगा, यह जानना असंभव है कि क्या उपवास खुद को बीमारी से बचाने के लिए कुछ स्तर की सुरक्षा प्रदान कर सकता है और, हालांकि यह संभावना के दायरे से बाहर नहीं है, यह उन चीज़ों से चिपके रहना महत्वपूर्ण है जिन्हें हम जानते हैं कि काम: सामाजिक भेद, हाथ धोने, स्वच्छता और आत्म-अलगाव। ”

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*स्व*स्वर्गीय हजरते खि़रद फैजाबादी - एक बेमिसाल शख्सियत और शायर*

*स्व*स्वर्गीय हजरते खि़रद फैजाबादी - एक बेमिसाल शख्सियत और शायर*

24-Apr-2020

खि़रद फैजाबादी फैजाबाद की एक ऐसी शख्सियत कि जिसके बारे में हम जैसे के लिए कुछ लिखना सूरज को चिराग दिखााने जैसा है। लेकिन कुछ लिखना इसलिए भी जरूरी है जिससे नई नस्ल उनके बारे में कुछ जान ले, उनका तअल्लुक फैजाबाद के मौजा सीबार से था लेकिन जिन्दगी का बेशतर हिस्सा आपने लखनऊ में गुजारा। लखनऊ मैं आज भी उनके दो बेटे माशाअल्लाह मौजूद हैं। खि़रद साहब ने गजल, नज्म, कसीदा, मर्सिया, मसनवी, नौहा, सलाम, मुसद्दस हर मैदान में अपनी शायरी का लोहा मनवाया। पूरे दीवाने गािलब पर उनकी तजमीन अहले इल्मो जौक के लिए एक बेमिसाल और नायाब तोहफा है, लेकिन इसे सितमजरीफी कहा जायगा कि मौसूफ की यह बेमिसाल तख्लीक मन्जरे आम पर अभी तक न आ सकी, कोशिश भी की गयी लेकिन अभी कामयाबी न मिल सकी, मगर नाउम्मीद नहीं हूँ। दीवाने गालिब की मशहूर गजल-नक़्श फरियादी है किसकी शोखिये तहरीर का- कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का इस मतले पर इस तरह तजमीन लगाई -
नक़्श फरियादी है किसकी शोखिये तहरीर का
अस्ल में एलान है नाकामिये तदबीर का।
सिर्फ मतलब मौत है इस ख्वाब की ताबीर का
कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का।।

खि़रद फ़ैजाबादी जैसी अज़ीम शख्सियत के बारे में जानने वाले लोग आज भी फैज़ाबाद के अलावा मुख्तलिफ़ शहरों में मौजूद हैं। मैंने तो जो बचपन में देखा और बाद में जो सुना व पढ़ा वही अपने छोटे भाईयों के साथ शेयर कर रहा हूँ। उनके इल्मो सलाहियत के बारे में जानने के लिए उन्हें पढ़ना जरूरी है। ‘चिरागे़ दहर’’ जिसमें गालिब ने दिल्ली से बनारस तक के सफ़र और बनारस पहुंच कर वहां की मन्जरकशी फारसी में अस्सी अशआर में की है। यूपी के गवर्नर बी. गोपाला रेड्डी साहब ने किसी मुशायरे में खिरद साहब को वह शेरी मजमूआ दिया और उसका उर्दू में तर्जुमा करने की गुजारिश की। खिरद साहब ने गालिब के ’’चिरागे दहर’’ के हर शेर का हूबहू तर्जुमा उसी बहर में उर्दू में किया और रेड्डी साहब को पेश कर दिया। वालिद साहब बताते हैं कि रेड्डी साहब के ज़माने में गवर्नर हाउस में खि़रद साहब बगैर किसी एपाइन्टमेंट के जाते थे। ‘चिरागे दहर’ आज भी अनीसो चकबस्त लाईबे्ररी फैज़ाबाद में खि़रद साहब की खूबसूरत राइटिंग में लिखी हुई मौजूद है। खिरद फैज़ाबादी लखनऊ में रहते हुए भी फ़ैजाबाद से बेपनाह मोहब्बत करते थे। सभी से मुस्कुरा कर बात करना उनकी पहचान थी। जो भी उनसे मिलता उसे यही लगता था कि खि़रद साहब सबसे ज्यादा उसी को अज़ीज रखते है। उनको गुस्से में शायद ही किसी ने देखा होगा। ...................

खि़रद फ़ैजाबादी की शायरी में एक खास बात  नज़र आती है कि उमूमन उन्होंने अपनी शायरी में आसान उर्दू अलफ़ाज का इस्तेमाल किया। उनकी मक़बूलियत की एक वजह उनकी आसान ज़बान भी थी। उनका अन्दाजे बयान भी बड़ा दिलकश था, उसकी अक्कासी तहरीर से करना नामुमकिन है। कभी-कभी ऐसा लगता था के वह शेर नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि सामईन से बातें कर रहे हैं।
मसलन-
एक बात बताता हूँ सुन लीजिए ख़मोशी से
इस वक़्त दलीलों से मैं काम नहीं लूँगा।
किस मर्द ने पाया था खैबर में अलम दीं का,
ख़ुद आप समझ लीजे मैं नाम नहीं लूँगा।
यानी कम पढ़ा लिखा शख्स भी उनके शेर बहुत आसानी से समझ लेता था। यह भी खिरद फैजाबादी की शायरी का कमाल था। एक बार चौक की मस्जिद में होने वाली सत्तरह रबीउलअ्रव्वल की शानदार महफिल में खिरद साहब ने रसूलखुदा स.अ.व. की शान में नायाब क़सीदा पढ़ा, मोमिनीन से छलकते हुए मस्जिद के सहन में कोई भी खामोश न था। खिरद साहब के बाद अल्लामा तक़ीयुल हैदरी साहब तक़रीर करने आये, मुझे याद है जनाब ने कहा था खि़रद साहब की तारीफ कैसे करूं, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि खिरद साहब नस्र में पढ़ रहे थे कि नज़्म में। ................

खि़रद फ़ैजाबादी ने कभी शायरी को जरियए मआश नहीं बनाया। टेलीफोन मोहकमें में मुलाज़िम थे । मुलाजिमत ने उनकी शायराना जिन्दगी में कभी रूकावट नहीं डाली। खि़रद फैज़ाबादी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी महफ़िल में एक ही अन्दाज़ से शिरकत करते थे। मुबई, कलकत्ता, अहमदाबाद, अमरोहा, जौनपुर वगैरह जैसी जगहों पर खिरद साहब की दी हुई तारीखों में महफ़िल रखी जाती थी। चुंकि फैजाबाद से उन्हें खुसूसी लगाव था इस लिए बाहर के बड़े से बड़े प्रोग्राम को फ़ैजाबाद की चार महफिलों, 12 रजब  चौक  की मस्जिद, 13 रजब मोती मस्जिद (तरही महफ़िल), 14 रजब खिड़की अली बेग और 15 रजब इमामबाड़ा जवाहर अली खाँ की महफिल पर कई बार कुर्बान किया, और इसमें मुसलसल शिरकत करते रहे। इसके गवाह आज भी मौजूद हैं। यकीनन उन्हें फैज़ाबाद में शेर पढ़ने का लुत्फ़ मालूम था। उस वक्त फैजाबाद में बड़े मेयारी सामईन भी तो थे। जिनमें कुछ को मैंने भी देखा है। मसनल लईक अख्तर साहब, अख्तर अब्बास जैदी साहब, अतहर आब्दी साहब, नासिर साहब, मुजफ्फर साहब वगैरह कितनों के चेहरे याद है नाम नहीं इसके अलावा फैजाबाद के नामवर शोअरा कद्र फैजाबादी, शोर भारती, अकबर फैजाबादी, वगैरह सिर्फ शेर ही नहीं सुनाते थे बल्कि बेहतरीन सामेअ भी थे। महफिल की निज़ामत करने वाले को तब इतना जोर नहीं लगाना पड़ता था कि कलेजा मुंह को आ जाए, न शोअरा को दाद के लिए भीख मांगनी पड़ती थी। सामईन हर शेर को उसके वज़्न के एतबार से खुद दादो तहसीन से नवाज़ते थे। कोई भी खि़रद फै़जाबादी को सुने बगैर महफिल से जाता नहीं था.............

खि़रद फ़ैजाबादी सफ़े अव्वल के शायर थे। लखनऊ फैजाबाद जौनपुर इलाहाबाद वगैरह में उनके बेशुमार शागिर्द थे। कुछ शागिर्द तो उम्र में भी उनसे बड़े थे। उनके शागिर्दो में अहले सुन्नत की भी अच्छी खासी तादाद थी, खिरद फैजाबादी का शागिर्द होना उस वक़्त फख़्र की बात थी। फैजाबाद की महफ़िलों में न जाने कितने शोअरा को खि़रद फै़जाबादी ने पहचनवाया। नसीमुलक़ादरी, रम्ज़ इलाहाबादी, राही कानपूरी, इज़हार जौनपुरी सबके के नाम तो मुझे याद भी नहीं रहे। शोला जौनपुरी और कै़सर नवाब जौनपुरी को मैंने सबसे पहले खिरद फैज़ाबादी साहब के साथ महफ़िलों में आते देखा। खिरद फैजाबादी रजब की महफ़िलों में शिरकत के लिए 12 रजब को आ जाते थे। महफ़िलें तो रात में होती, लेकिन मेरे गरीबखाने (यानी नूर साहब के घर ) पर दिन भर महफ़िल सजी रहती थी। लगता था सारे काम काज बंद हैं। मेहमान शोअरा के अलावा मुक़ामी शोअरा (जिनकी तादाद आज की जैसी नहीं थी यानी बहुत कम थी लेकिन सब अपनी-अपनी जगह पर मज़बूत और कोहना मश्क़ शायर थे जैसे जनाब शोर भारती, अकबर फैजाबादी, क्रद्र फैजाबादी) इसके अलावा दीगर अहले नज़र व अहले जौ़क़ हज़रात का दिनभर जमावड़ा रहता था। खिरद फैजाबादी अपने शेर सुनाते भी थे और दीगर शोअरा से शेर सुनते भी थे। मैं शेर तो नहीं समझता था लेकिन वहाँ से हटता भी नहीं था।

खि़रद फै़जाबादी का रहन सहन बहुत ही सादा था। अल्फ़ाज़ के ज़रिए उनकी तस्वीरकशी करना मुश्किल है लेकिन आपके लिए कोशिश करता हूं, जिन्होंने उनको देखा है वह इसकी ताईद जरूर करेंगे। गन्दुमी रंग, लम्बा क़द, इकहरा बदन, सर के बाल लम्बे मगर सलीक़े से पीछे की तरफ़ सहेजे और कंघी किये हुए, चोैड़ी पेशानी, हाथों की सभी उंगलियों में अंगूठी। हर उंगली में अक़ीक, फ़ीरोजे और मुख़्तलिफ़ नगों की कई-कई अंगूठी, चैड़ी मोहरी का पायजामा, शेरवानी जिसके सारे बटन खुले रहते थे। इत्र के शौक़ीन, जिस तरफ से गुजर जाते वहाँ की फे़जा महक उठती। कहीं भी जाते तो कई लोग साथ होते, मगर सबके बीच उनकी शख्सियत नुमाया रहती। दूर से देखने वाला भी पहचान लेता कि खि़रद फै़जाबादी आ रहे हैं। रास्ता चलते भी उनके साथी उनसे अशआर सुनने से बाज़ नहीं आते थे। मैंने जब होश संभाला तो खि़रद फैजाबादी ग़ज़ल की दुनिया से मुंह मोड़ चुके थे। अपनी जिन्दगी उस शायरी के लिए वक़्फ़ कर दी थी जो आख़ेरत के लिए ज़ादे सफ़र बन सके। शायद यही वजह थी के इतने अज़ीम शायर होने के बावजूद उनमें किसी तरह का तकब्बुर या ‘‘मैं’’ ं का शायबा तक नहीं था। जूनियर शायरों का शेर सुनते और दिलखोल कर उनकी हौंसला अफ़जाई करते। हाई ब्लड प्रेशर के मरीज़ थे खाना परहेजी खाते थे। लेकिन चाय व पान के बेहद शौक़ीन थे। पान की खूबसूरत डिब्बी हमेशा साथ रहती थी।
खि़रद फै़जाबादी की शायरी की बात हो और अन्जुमनहाए मातमी का तज़किरा न किया जाय, तो बात अधूरी रह जायगी। खि़रद फ़ैजाबादी ने खुसूसन दौराने अय्यामे अज़ा अन्जुमनों की जो खि़दमत की वह नाक़ाबिले फ़रामोश है। वह मुख़्तलिफ़ शहरों में एक साथ कई-कई अन्जुमनों को सलाम और नौहे दिया करते थे। मौसूफ़ क्रिकेट के बहुत शौक़ीन थे, उस वक़्त रेडियो पर क्रिकेट मैच का आंखों देखा हाल (कमेंट्री) रिले होती थी। खि़रद साहब के लिए कहा जाता है कि घर पर बाहर से  तरही कलाम लेने आये हुए मुख़्तलिफ़ अंजुमनों के लोगों को तरही कलाम के शेर भी नोट करवाते जाते थे और कमेंट्री भी सुनते रहते थे। वैसे शोअरा हज़रात बखूबी जानते हैं कि एक वक्त में मुख़्तलिफ़ बहरों में शेर कहना किस क़दर दुश्वार है, लेकिन खि़रद साहब के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं था। लखनऊ के अलावा जौनपुर, इलाहाबाद, फैजाबाद, सुलतानपुर, जलालपुर, कानपुर व दीगर शहरों में अन्जुमनें उनके कलाम पढ़ती थीं। फैज़ाबाद की आठवीं में मैंने एक साथ कई अन्जुमनों को खि़रद फ़ैज़ाबादी का कलाम पढ़ते सुना है। फैज़ाबाद की अन्जुमनें तो खिरद साहब का कलाम पढ़ना अपना ह़क समझती थीं। ‘‘था क़ब्रे सकीना पे जै़नब का नौहा, सकीना उठो मैं वतन जा रही हूँ।’’ यह दर्दनाक नौहा आज भी  चेहल्लुम में अन्जुमनों से फरमाइश करके पढ़वाया जाता हैl
खि़रद फ़ैजाबादी ने बेशुमार क़सीदे, नज़्मे, गजलें, सलाम और नौहे कहे। उनकी शख्सियत और उनकी शायरी पर कलम उठाने के लिए इल्मी सलाहियतों के साथ गहरी निगाह भी दरकार है।
खि़रद फैज़ाबादी की ‘‘मौत और ज़िन्दगी’’ नज़्म के चन्द अशआर-
ज़िन्दगी आलामो ग़म का नाम है,
मौत बस आराम ही आराम है।
ज़िन्दगी नेमत है काफ़िर के लिए
मौत मोमिन के लिए इनआम है।
मौत क्या है एक सुकूने दायमी
ज़िन्दगी बेचैनियों का नाम है।
मौत एक तकलीफ़ है आराम देह
ज़िन्दगी तकलीफ़ देह आराम है।
कुछ न होकर जिन्दगी है नेकनाम
मौत सबकुछ है मगर बदनाम है।.............
खि़रद फ़ैजाबादी फरमाते है-
यह आदमी की ज़ात अभी है अभी नहीं,
ये मुख्तसर हयात अभी है अभी नहीं।
ये ज़िन्दगी है आरज़ी और इतनी आरज़़ी,
जैसे अख़ीर रात अभी है अभी नहीं।

और ये अख़ीर रात 4 नवम्बर 1986 माहे सफर की 26 तारीखं को सुबह 8 बजे खिरद फैज़ाबादी की जिन्दगी से भी गुजर गयी। दिमाग़ की रग फट जाने पर मेडिकल कालेज लखनऊ से शायरी का यह चमकता हुआ सूरज उजाला बांटते बांटते हमेशा-हमेशा लिए गुरूब हो गया। खुदा का शुक्र है कि उनके बेटों के पास उनकी शायरी का तमाम ज़खीरा महफूज़ है। लेकिन उसकी नशरो इशाअत की सबील होना भी जरूरी है, जो उर्दू अदब का बेशकीमती सरमाया है। मैं अपनी कमइल्मी और महदूद सलाहियतों का एतराफ़ करते हुए यह जरूर कहूंगा कि ख़िरद फै़जाबादी के बारे में मैंने जो मुख़्तसर जानकारी चन्द सतरों के ज़रिए आप तक पहुंचायी वह दरिया से कूज़ा भर पानी निकालने के बराबर भी नहीं है। आपका शुक्रगुजार हूँ जो आपने अपने कमेंट के जरिये हक़ीर की हौसला अफ़जाई की। आमदे रमज़ानुल मुबारक के पेशे नज़र अपनी बात यहीं मुकम्मल करता हूँ।

इल्तेमासे सूरए फ़ातेहा- सैयद बदरूल हसन मरहूम ‘‘खिरद फै़जाबादी’’ इब्ने सैयद इब्नुल हसन मरहूम।

*जनाब मोहसिन नक़वी*
*‘‘दानिश फै़जाबादी’’* 
र्गीय हजरते खि़रद फैजाबादी


विनाश से बचाने के लिये पृथ्वी संरक्षण जरूरी

विनाश से बचाने के लिये पृथ्वी संरक्षण जरूरी

21-Apr-2020

विश्व पृथ्वी दिवस -  22 अप्रैल 2020
- ललित गर्ग-

 

पृथ्वी दिवस पूरे विश्व में 22 अप्रैल को मनाया जाता है। पृथ्वी दिवस को पहली बार सन् 1970 में मनाया गया था। इसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील पृथ्वी के संरक्षण के लिये जागरूकता पैदा है। पिछले कुछ समय से कोरोना महामारी एवं महासंकट ने न केवल इंसानों के जीवन को खतरे में डाला है बल्कि पृथ्वी, प्रकृति एवं पर्यावरण पर भी उसके घातक असर डाला है। दुनिया में पृथ्वी के विनाश, प्रकृति प्रदूषण एवं कोरोना के जैविक संकट को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी एवं प्रकृति के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं, उनसे राजनेता, वैज्ञानिक, धर्मगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता भी चिंतित हैं। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे।
आज विश्व भर में हर जगह प्रकृति का दोहन एवं शोषण जारी है कहीं फैक्ट्रियों का गन्दा जल हमारे पीने के पानी में मिलाया जा रहा है तो कहीं गाड़ियों से निकलता धुआं हमारे जीवन में जहर घोल रहा है और घूम फिर कर यह हमारी पृथ्वी को दूषित बनाता है। जिस पृथ्वी को हम माँ का दर्जा देते हैं उसे हम खुद अपने ही हाथों दूषित करने में कैसे लगे रहते हैं। पृथ्वी पर बढ़ते प्राकृतिक स्रोत का दोहन और प्रदूषण की वजह से विश्व स्तर पर लोगों को चिंता होनी शुरू हुई है। आज जल वायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है। अगर पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाए तो मानव जीवन कैसे सुरक्षित एवं संरक्षित रहेगा? पृथ्वी है तो सारे तत्व हैं, इसलिये पृथ्वी अनमोल तत्व है। इसी पर आकाश है, जल, अग्नि, और हवा है। इन सबके मेल से प्रकृति की संरचना सुन्दर एवं जीवनमय होती है। अपने−अपने स्वार्थ के लिए पृथ्वी पर अत्याचार रोकना होगा और कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ध्यान केंद्रित करना होगा। अतिशयोक्तिपूर्ण ढं़ग से  औद्योगिक क्रांति पर नियंत्रण करना होगा, क्योंकि उन्हीं के कारण कार्बन उत्सर्जन और दूसरी तरह के प्रदूषण में बढ़ोतरी हुई है। पृथ्वी दिवस पर संकल्प लेना चाहिए कि हम पृथ्वी और उसके वातावरण को बचाने का प्रयास करेंगे। पानी को नष्ट होने से बचाना चाहिए। वृक्षारोपण को बढ़ावा देना चाहिए। अपने परिवेश को साफ−स्वच्छ रखना चाहिए। पृथ्वी के सभी तत्वों को संरक्षण देने का संकल्प लेना चाहिए।
वर्तमान परिपे्रक्ष्य में कई प्रजाति के जीव-जंतु, प्राकृतिक स्रोत एवं वनस्पति विलुप्त हो रहे हैं, जिससे पृथ्वी असंतुलित हो रही है। विलुप्त होते जीव-जंतु और वनस्पति की रक्षा के लिये विश्व-समुदाय को जागरूक करने के लिये ही इस दिवस को मनाया जाता है। आज चिन्तन का विषय न तो युद्ध है और न मानव अधिकार, न कोई विश्व की राजनैतिक घटना और न ही किसी देश की रक्षा का मामला है। चिन्तन एवं चिन्ता का एक ही मामला है लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही गर्मी, सिकुड़ रहे जलस्रोत विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन- ये सब पृथ्वी एवं पृथ्वीवासियों के लिए सबसे बडे़ खतरे हैं और इन खतरों का अहसास करना ही विश्व पृथ्वी दिवस का ध्येय है। प्रतिवर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। हर चीज की उपलब्धता कम हो रही है। आक्सीजन की कमी हो रही है। साथ ही साथ हमारा सुविधावादी नजरिया एवं जीवनशैली पृथ्वी और उसके पर्यावरण एवं प्रकृति के लिये एक गंभीर खतरा बन कर प्रस्तुत हो रहा हैं।
जल, जंगल और जमीन इन तीन तत्वों से पृथ्वी और प्रकृति का निर्माण होता है। यदि यह तत्व न हों तो पृथ्वी और प्रकृति इन तीन तत्वों के बिना अधूरी है। विश्व में ज्यादातर समृद्ध देश वही माने जाते हैं जहां इन तीनों तत्वों का बाहुल्य है। बात अगर इन मूलभूत तत्व या संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। आधुनिकीकरण के इस दौर में जब इन संसाधनों का अंधाधुन्ध दोहन हो रहा है तो ये तत्व भी खतरे में पड़ गए हैं। अनेक शहर पानी की कमी से परेशान हैं। आप ही बताइये कि कहां खो गया वह आदमी जो स्वयं को कटवाकर भी वृक्षों को कटने से रोकता था? गोचरभूमि का एक टुकड़ा भी किसी को हथियाने नहीं देता था। जिसके लिये जल की एक बूंद भी जीवन जितनी कीमती थी। कत्लखानों में कटती गायों की निरीह आहें जिसे बेचैन कर देती थी। जो वन्य पशु-पक्षियों को खदेड़कर अपनी बस्तियों बनाने का बौना स्वार्थ नहीं पालता था। अब वही मनुष्य अपने स्वार्थ एवं सुविधावाद के लिये सही तरीके से प्रकृति का संरक्षण न कर पा रहा है और उसके कारण बार-बार प्राकृतिक आपदाएं कहर बरपा रही है। रेगिस्तान में बाढ़ की बात अजीब है, लेकिन हम गतदिनों राजस्थान में अनेक शहरों में बाढ़ की विकराल स्थिति को देखा हैं। जब मनुष्य पृथ्वी का संरक्षण नहीं कर पा रहा तो पृथ्वी भी अपना गुस्सा कई प्राकृतिक आपदाओं के रूप में दिखा रही है। वह दिन दूर नहीं होगा, जब हमें शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा। आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर विशेष दिया जाए, जिसमें मुख्यतः धूप, खनिज, वनस्पति, हवा, पानी, वातावरण, भूमि तथा जानवर आदि शामिल हैं। इन संसाधनों का अंधाधुंध दुरुपयोग किया जा रहा है, जिसके कारण ये संसाधन धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर हैं।
मनुष्यों की सुविधा के लिए बनाई गयी पॉलीथीन पृथ्वी के लिये सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है। इसके नष्ट न होने के कारण भूमि की उर्वरक क्षमता खत्म हो रही है। इनको जलाने से निकलने वाला धुआँ ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचाता है जो ग्लोबल वार्मिग का बड़ा कारण है। देश में प्रतिवर्ष लाखों पशु-पक्षी पॉलीथीन के कचरे से मर रहे हैं। इससे लोगों में कई प्रकार की बीमारियाँ फैल रही हैं।
 हमें पानी का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए और पानी की अधिक से अधिक बचत करनी चाहिए। हमें वर्षा के जल को पुनः उपयोग में लाने वाली प्रणाली को विकसित करना होगा। हमें बिजली की बर्बादी को भी रोकना होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं है जब हम अंधेरे में ही अपना जीवन-यापन करने को मजबूर हो जायेेंगे। हमें कागज के उपयोग को सीमित करना होगा, क्योंकि कागज पेड़ों की लकड़ी से बनता है जिसके लिए हमें बड़ी संख्या में पेड़ काटने पड़ते हैं। आजकल भूमि भी जहरीली होती जा रही है जिससे उसमें उगने वाली वनस्पतियों में विषाक्तता बढ़ती जा रही है।
हमारी सुविधावादी जीवनशैली से निकलने वाली विषैली गैसों के एक ”अणु“ में ओजोन के लाख अणुओं को नष्ट करने की क्षमता है। कैसे रोकेंगे कार्बन डाईआक्साइड और जहरीली मिथेन गैस के उत्र्सजन को। गरमी के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में जंगल धधक उठते हैं। उत्तराखंड के जंगल जलते रहे हैं। सवाल है कि जब ऐसी घटनाओं से हम हर साल दो-चार होते हैं तो भविष्य के लिए कोई सबक क्यों नहीं लेते। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र के विदर्भ और उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में पीने के पानी की समस्या बढ़ गई है। इन इलाकों के कई जलाशयों में पानी का स्तर क्षमता का 10 फीसदी ही रह गया है, जिससे कुछ फसलें संकटग्रस्त हो गई हैं। आवश्यक है-मानव स्वभाव का प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित हो। सहज रिश्ता कायम हो। जीवन शैली में बदलाव आये। हर क्षेत्र में संयम की सीमा बने। हमारे दिमागों में भी जो स्वार्थ एवं सुविधावाद का शैतान बैठा हुआ है, उस पर अंकुश लगे। सुख एवं सुविधावाद के प्रदूषण के अणु कितने विनाशकारी होते हैं, सहज ही विनाश का रूप ले रही पृथ्वी की विनाशलीला को देखकर कहा जा सकता है। प्रदूषण के कारण सारी पृथ्वी दूषित हो रही है और निकट भविष्य में मानव सभ्यता का अंत दिखाई दे रहा है।

प्रेषकः

 

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


बंदे की क़ौम , नैशनैलिटी या धर्म से नहीं उसके काम से मतलब था

बंदे की क़ौम , नैशनैलिटी या धर्म से नहीं उसके काम से मतलब था

20-Apr-2020

.मैंने 2006-2019 के बीच लगभग 8 साल UAE में नौकरी के सिलसिले में गुज़ारे हैं । यह 8 साल मेरी ज़िंदगी के बहतरीन सालों में थे । में वहाँ Engineering Consultant था इसलिए वहाँ के नैशनल से मुलाक़ात भी काफ़ी रहती थी और बातचीत भी ख़ूब होती थी । “हिंद “ के लिए उनके दिल में मैंने बहुत इज़्ज़त देखी । मैंने वहाँ देखा कि उन्हें बंदे की क़ौम , नैशनैलिटी या धर्म से नहीं उसके काम से मतलब था । वो लोग पाकिस्तानियों और बंगलादेशीयों से काफ़ी हद तक चिढ़ते थे और हिंदियों ( भारतीयों) को ईमानदार , मेहनती और अच्छा समझते थे । भारतीयों ने वहाँ बहुत मेहनत की है तभी यह मुक़ाम हासिल हुआ है । उनके लिए हर भारतीय चाहे वो हिंदू हो , मुसलमान हो या सिख हो , हिंदी है । क्यूँकि हिंदू ज़्यादा पढ़े लिखे हैं इसलिए वहाँ पर लगभग हर बैंक , हर बड़ी कम्पनी में टॉप मैनज्मेंट में आपको भारतीय हिंदू दिख जाएँगे । बिज़्नेस में भी वहाँ पर भारतीय टॉप पर हैं । 

जो भारतीय वहाँ पर है उनमें भी हिंदू मुस्लिम वाली फ़ीलिंग नहीं थी । वहाँ पर हमारे बीच में नॉर्थ इंडियन और साउथ इंडियन वाली फ़ीलिंग ज़रूर थी । हम सभी नोर्थ इंडियन एक साथ रहते थे और साउथ इंडियन एक साथ रहते थे । किसी की कम्पनी में कोई वेकन्सी हो तो हम लोग कोशिश करते कि कोई नोर्थ इंडियन आ जाए और साउथ वाले साउथ इंडियन को रखाने की कोशिश करते । हिंदू या मुसलमान इसमें नहीं देखा जाता था । 

फिर 2014 आया , धीरे धीरे हालात बदलने लगे । हम लोगो में आपस में राजनीतिक बहस शुरू हो गयी । नोर्थ इंडिया के लगभग सभी हिंदू मोदी समर्थक हो गए और मुसलमान मोदी विरोधी । सोशल मीडिया जिसे वहाँ पर ज़्यादा तर लोग अपनी तफ़रीह के लिए इस्तेमाल करते थे उसमें राजनीतिक पोस्ट की भरमार हो गयी । अब मामला राजनीति से आगे निकलकर नफ़रत पर पहुँच गया और वहाँ पर काम करने वाले लोग भी इससे अछूते नहीं रहे । UAE का क़ानून है कि आप किसी भी धर्म या किसी भी कम्यूनिटी के ख़िलाफ़ नफ़रत नहीं फेला सकते । लेकिन उसके बाद भी कई लोग जोश में या भारतीय राजनीति से प्रभावित होकर मुस्लिम विरोधी पोस्ट लिखने लगे । कई लोगों की शिकायत हुई और उन्हें वहाँ अपनी नौकरी गँवानी पड़ी । whats group से जो नफ़रत भारत में बँट रही है उसका असर अरब मुल्कों में रह रहे भारतीयो पर भी पड़ने लगा था । 

अब तो नफ़रत अपने पीक पर है । तेजस्वी सूर्या और सुब्रमणयम स्वामी जैसे भारतीय सांसद अरब मुल्कों की महिलाओं और वहाँ के तीर्थ स्थलो तक को निशाना बना रहे हैं । वहाँ के नैशनल भी इसे बहुत सीरीयस ले रहे हैं । हाल फ़िलहाल में मुसलमानो के ख़िलाफ़ ट्वीट या फ़ेसबुक पोस्ट लिखने पर कई भारतीय हिंदू जेल जा चुके है और अपनी नौकरी से हाथ धो चुके हैं । तेजस्वी सूर्या ने दबाव में ट्वीट डिलीट कर दिया है लेकिन उसकी जहालत ने नुक़सान पूरा कर दिया है । सरकार से अरब मुल्कों के सम्बंध हमेशा से अच्छे रहे हैं । भारतीयों ने अपनी मेहनत से जो वहाँ मुक़ाम कमाया था वो चंद जाहिलो और नफ़रती चिंटूओ की वजह से ख़राब हो रहा है । प्रधानमंत्री जी ने कल कहा है कि कोरोना धर्म और जाति नहीं देखता । मीडिया और आईटी सेल पिछले एक महीने से कोरोना का धर्म बता रहा है , प्रधानमंत्री को पहले ही इसमें intervene करना चाहिए था । अब डैमिज इतना हो चुका है कि शायद कंट्रोल करना मुश्किल है । दिमाग़ में भरी नफ़रत के चलते लाखों भारतीयों की नौकरी पर तलवार टँगी हुई है । अगर अरब मुल्कों में हालात नहीं सुधरे तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा । प्रधानमंत्री को इस पर संज्ञान लेना चाहिए । मीडिया पर लगाम लगानी चाहिए। 

तेजस्वी सूर्या और सुब्रमणयम स्वामी की सदस्यता को तत्काल प्रभाव से ख़त्म करके ही अब डैमिज कंट्रोल किया जा सकता है ।. अवेस इकबाल


आखिर सोनिया को इस देश ने क्या दिया? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

आखिर सोनिया को इस देश ने क्या दिया? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

10-Apr-2020

एक स्त्री जिसे इस नारी पूजक देश में लगातार अपमानित किया जा रहा है।

 

ये पोस्ट राजनीतिक नहीं है केवल सोनिया गांधी को एक स्त्री के नज़रिए से देखने की कोशिश है। सोनिया गांधी के जीवन पर अगर हम नजर डालें तो उनका पूरा जीवन एक त्रासदी से कम नहीं है। वर्षों से वो केवल एक अदद मां बन कर रह गई हैं। शादी के कुछ साल बाद ही मां जैसी सास का गोलियों से छलनी शरीर जिसकी गोद मे आ जाए, टुकड़ों में जिसने पति की लाश देखी हो, उसकी पीड़ा को क्या कोई महसूस कर सकता है ?

आख़िर सोनिया - राजीव ने ऐसा क्या पाप किया ? एक दूसरे से प्रेम किया, विवाह किया और विवाह के इतने वर्षों बाद भी भारतीय बहू के सारे धर्म ये स्त्री निभा रही है, लेकिन हमने उसे क्या दिया? अपमान और तिरस्कार! 

विवाह के बाद एक स्त्री की पहचान उसके ससुराल से होती है, यही है न ? हमारी भारतीय संस्कृति ? फिर इस मामले में हमारी संस्कृति इतनी दोमुंही कैसे हो जाती है? किस मुंह से हम वसुधैव कुटुम्बकम का ढोंग करते हैं, जब अपने ही देश की उस बहू को हम आजतक नहीं अपना पाए, जिसने अपनी पूरी उम्र हमारे देश में गुज़ार दी हो।

स्व. सुषमा स्वराज एक स्त्री ही थीं, लेकिन एक स्त्री होकर भी सोनिया के विदेशी मूल का जो बार-बार उन्होंने ज़िक्र किया वो उनकी गरिमा के ख़िलाफ़ था। जिस स्त्री ने आपके देश को अपनाया, आपकी भाषा सीखी, पाश्चात्य परिवेश में पली स्त्री के सर से आज भी किसी रैली में पल्लू नहीं गिरता और हमने उसे क्या दिया ?

सोनिया इटली की वेश्या थी - भाजपा नेता सुब्रमनियम स्वामी
सोनिया जरसी गाय है - नरेंद्र मोदी 
सोनिया विदेशी नस्ल की है इसलिए देशभक्त पैदा नही कर सकती - कैलाश विजय वर्गीय वगैरा-वगैरा।

मोदी जी, अपने आप को हिन्दू कहते हैं। बोलते हैं कि हमारे यहां स्त्री की पूजा होती है। कितने धूर्त और मक्कार हैं आप! क्या मैं पलट के पूंछू कि सोनिया तो सालों से बहू का धर्म निभा रही हैं लेकिन तुम तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट होकर अपनी शादी के 7 वचन तक नहीं निभा सके? चुनाव नहीं होता तो देश जान ही नहीं पाता कि इनका विवाह भी हुआ है। आप अपनी घृणा से बाहर आइए तो सोनिया गांधी में आपको एक असली पारंपरिक भारतीय स्त्री की छवि दिखेगी। अपने पति के हत्यारों को माफ़ करने का कलेजा एक भारतीय स्त्री में ही हो सकता। पूर्ण बहुमत की सरकार में भी न ख़ुद पीएम बनी न राहुल को बनाया क्यों, कौन उन्हें रोक सकता था? इतना अपमान और तिरस्कार सह कर भी कभी पलट के अमर्यादित टिप्पणी नहीं की।

एक उदाहरण देता हूँ राजीव गांधी की लाश मद्रास लाई गई। जब सोनिया दिल्ली से मद्रास आईं तो उन्होंने दो ताबूत देखे एक राजीव गांधी का था जिस पर फूल चढ़े थे, दूसरा उनके अंगरक्षक का था जिस पर कुछ नहीं था। उस दुख की घड़ी में भी उन्हें इतना याद रहा कि तुरंत उन्होंने एक अधिकारी को बुलाया और कहा कि उस पर भी फूल चढ़ाओ, उन्होंने मेरे पति के लिए जान दी है। क्षमा, दया और करुणा जो भारतीय स्त्री के आभूषण हैं उसमें से क्या उनके पास नहीं है ? लेकिन फिर भी कुछ नेता और भाजपा उनका अपमान करते हैं और बीजेपी आईटी सेल व्हाट्सअप्प यूनिवर्सिटी फर्जी कहानी बनाकर बदनाम करते हैं। 

आलोचना के लिए राजनीतिक बातें हैं लेकिन राजनीति का क्या इतना पतन हो गया है कि हम एक स्त्री की गरिमा को ही भूल गए। कुछ लोग प्रज्ञा ठाकुर, साध्वी प्राची, पूजा शकुन पर गर्व कर सकते हैं लेकिन सोनिया गांधी को अपमानित करेंगे। 

दरसल सोनिया ने तो भारतीय संस्कृति निभाई लेकिन इन लोगों ने दिखाया कि ये अपने मूल में कितने कट्टर, जातिवादी, रंगभेदी, नस्लभेदी हैं, ये कितने धूर्त हैं, संस्कृति की खोल में छुपे सबसे अश्लील जमात हैं। 

 प्रकाशपुन्ज पाण्डेय। 
7987394898

 

 


महावीर जयंती 6 अप्रैल, 2020 पर विशेषः महावीर है स्वास्थ्य-उत्क्रान्ति की लहर

महावीर जयंती 6 अप्रैल, 2020 पर विशेषः महावीर है स्वास्थ्य-उत्क्रान्ति की लहर

06-Apr-2020

महावीर जयंती 6 अप्रैल, 2020 पर विशेषः
महावीर है स्वास्थ्य-उत्क्रान्ति की लहर
- ललित गर्ग -

महावीर का संपूर्ण जीवन स्व और पर के अभ्युदय की जीवंत प्रेरणा है। लाखों-लाखों लोगों को उन्होंने अपने आलोक से आलोकित किया है। इसलिए महावीर बनना जीवन की सार्थकता का प्रतीक है। महावीर बनने का अर्थ है स्वस्थ जीवन जीना, रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करना।
प्रत्येक वर्ष हम भगवान महावीर की जन्म-जयन्ती मनाते हैं, लेकिन इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण उस महान् क्रांतिकारी वीर महापुरुष की जयंती को कोरा आयोजनात्मक नहीं बल्कि प्रयोजनात्मक स्वरूप देना है। वैसे भी इस लाॅकडाउन के कारण आयोजन तो होंगे ही नहीं, इसलिये हर व्यक्ति अपने भीतर झांकने की साधना करें, महावीर को केवल पूजे ही नहीं हैं, बल्कि जीवन में धारण कर लें। आज मनुष्य जिन कोरोना महासंकट की समस्याओं से और जिन जटिल परिस्थितियों से घिरा हुआ है उन सबका समाधान महावीर के स्वास्थ्य-दर्शन और स्वस्थ जीवनशैली के सिद्धांतों में समाहित है। जरूरी है कि हम महावीर ने जो उपदेश दिये उन्हें जीवन और आचरण में उतारें। हर व्यक्ति महावीर बनने की तैयारी करे, तभी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। महावीर वही व्यक्ति बन सकता है जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो, जिसकी जीवनशैली संयम एवं अनुशासनबद्ध हो, जिसमें कष्टों को सहने की क्षमता हो। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता, संयम एवं संतुलन स्थापित रख सके, जो मौन की साधना और शरीर को तपाने के लिए तत्पर हो। जिसके मन में संपूर्ण प्राणिमात्र के प्रति सहअस्तित्व  की भावना हो। जो पुरुषार्थ के द्वारा न केवल अपना भाग्य बदलना जानता हो, बल्कि संपूर्ण मानवता के उज्ज्वल भविष्य की मनोकामना रखता हो।
सदियों पहले महावीर जनमे, लेकिन उनका जीवन एवं उपदेश आज की कोरोना संकट की आंधी में अधिक कारगर एवं प्रासंगिक है। महावीर स्वास्थ्य-उत्क्रान्ति की एक लहर है, स्वस्थ जीवन-ज्योति की एक निर्धूम शिखा है। साहस एवं संयम का अनाम दरिया है। उनके संवादों में शाश्वत की आहट थी। उनकी जीवनशैली इतनी प्रभावी थी कि उसे एक बार जीनेे वाला बंध जाता। उनकी दृष्टि में ऐसी कशिश थी कि उन्हें एक बार देखने वाला भूल ही नहीं पाता। उनके स्वस्थ जीवन के आह्नान में ऐसा आमंत्रण था कि उसे अनसुना नहीं किया जा सकता। उनका मार्गदर्शन इतना सही था कि उसे पाने वाला कभी भटक ही नहीं पाता। उनकी सन्निधि इतनी प्रेरक थी कि व्यक्ति रूपान्तरित हो जाता। उन्होंने कहा ‘अप्पणा सच्चमेसेज्जा’-स्वयं सत्य खोजें। वे किसी को पराई बैसाखियों के सहारे नहीं चलाते थे। अपने पैरों से चलने की क्षमता हो तो व्यक्ति जब चाहे चल सकता है और जहां चाहे, पहुंच जाता है। उन्होंने किसी के रास्ते रोशन नहीं किए, पर भीतर की रोशनी पैदा कर दी। ये ही सब कारण हैं कि जो हमें महावीर का स्मरण दिलाते हैं।
महावीर का विश्वास स्वस्थ जीवन में था। वे अपने आप में रहते थे। दूसरों को भी अपने आप में रहना सिखाते थे। वे स्वस्थ थे। उन्हें कोई बीमारी छू नहीं कर पाई। उन्होंने स्वास्थ्य के अनेक सूत्र दिए। उनमें एक सूत्र था-कायोत्सर्ग। कायोत्सर्ग का अर्थ है शरीर की शुद्धि, शरीर की सारसंभाल, शरीर के प्रति पवित्रता एवं संयम। कायोत्सर्ग साधना का आदि बिन्दु भी है और अन्तिम बिन्दु भी है। यह स्वास्थ्य का प्रथम बोधपाठ है और अन्तिम निष्पत्ति है। यह शरीर को घेरने वाली आपात स्थितियों का रक्षा-कवच है। तनाव-विसर्जन का प्रयोग है और सब दुःखों से मुक्त करने वाला है।
महावीर का साधनाकाल साढे़ बारह वर्ष का रहा। उसमें उन्होंने बार-बार कायोत्सर्ग का प्रयोग किया। सुरक्षा-कवच अथवा बुलेटप्रूपफ जैकेट पहनने वाले को गोली लगने का भय नहीं रहता इसी प्रकार गहरे कायोत्सर्ग में जाने के बाद कोरोना की प्रतिकूल परिस्थितियों का प्रभाव एवं कोरोना जैसे घातक एवं प्राणलेवा हमले क्षीण हो जाता है। महावीर की तरह कायोत्सर्ग की साधना करने वाला स्वस्थ हृदय वाला हो जाता है, हल्का हो जाता है और प्रशस्त ध्यान में लीन होकर सुखपूर्वक जीवन जी सकता है।
जो व्यक्ति कोरोना से मुक्ति चाहता है, स्वस्थ बनना चाहता है और स्वस्थ रहना चाहता है, उसे कायोत्सर्ग रूप औषधि का सेवन करना होगा। चिकित्साशास्त्र में जिस औषधि के घटक तत्त्वों का कोई उल्लेख नहीं है, उसका विज्ञान महावीर के पास था, उन्होंने स्वास्थ्य का ऐसा अमोघ तंत्र दिया, जो जितना सहज है, उतना ही कठिन है। कायोत्सर्ग एक प्रकार का तप है। जिसमें शारीरिक चंचलता एवं क्रोध आदि का विसर्जन करना होता है। श्वास पर ध्यान केन्द्रित करना होता है। मन चंचल होता है या चित्त की चंचलता ही मन है। इस अवधारणा के आधार पर मन की चंचलता के निरोध की बात कठिन प्रतीत होती है।
कायोत्सर्ग की साधना में शरीर के लिए शिथिलीकरण, शवासन या रिलेक्सेशन जैसे शब्द प्रयोग में आते हैं। कायोत्सर्ग एक ऐसा द्वार है, जहां से व्यक्ति को आत्मा की झलक मिल सकती है, स्थूल शरीर से भिन्न अस्तित्व की अनुभूति हो सकती है। कायोत्सर्ग में शरीर और मन को पूरा विश्राम मिल जाता है। जनता में जैन धर्म के बारे में अनेक प्रकार की भ्रान्त धारणाएं हैं। जैन धर्म तो शरीर को कष्ट देने वाला धर्म है। महावीर शरीर को आराम देने की बात करते हैं। ऐसी स्थिति में कष्ट देने का सिद्धांत मान्य कैसे किया जा सकता है। कोई भी तप या तपस्या का अर्थ शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि शरीर को साधना है। शरीर को साधे बिना मन को नहीं साधा जा सकता। इसलिए यौगिक प्रक्रियाओं के द्वारा शरीर को साधने का मार्ग बनाया गया है।
अध्यात्म के क्षेत्र में कायोत्सर्ग का विशेष महत्त्व है। मेडिकल साइंस में भी इसकी उपयोगिता निर्विवाद है। चिकित्सा विज्ञान के आधुनिक उपकरणों द्वारा की जाने वाली विभिन्न जांच में भी कायोत्सर्ग की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। हर मेडिकल जांच में शरीर को थोड़ा ढीला छोड़ने और श्वास को मंद करने की सलाह दी जाती है, दांत निकलवाते वक्त भी मुंह को ढीला छोड़ने की बात कही जाती है। रक्तचाप बढ़ने की स्थिति में कायोत्सर्ग के द्वारा उसे संतुलित किया जा सकता है। कोरोना तनाव इस समय की प्रमुख समस्या है। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सब लोग इसी तनाव से घिरे हैं। यह एक ऐसी समस्या है, जिसका डाॅक्टरों के पास उपचार भी नहीं है। कायोत्सर्ग कोरोना तनाव एवं भय की समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है। नियमित रूप से कायोत्सर्ग किया जाए तो तनाव-भय को पैदा होने का अवकाश ही नहीं मिलेगा। कायोत्सर्ग के द्वारा शरीर और मन -दोनों को स्वस्थ रखा जा सकता है। कायोत्सर्ग आत्मसाधना का मंत्र है, वैसे ही स्वास्थ्य साधना का भी मंत्र है।
 कोरोना के कहर के बीच लाॅकडाउन के समय में मौन एवं मंत्र की साधना एवं संयम का अभ्यास बहुत उपयोगी है। मौन से विश्राम मिलता है, आनन्द मिलता है। पर कायोत्सर्ग के साथ किए जाने वाले मौन की महिमा ही अलग है। मौन हो, ध्यान हो, अनशन हो या और कोई अन्य संयम अनुष्ठान हो, सभी का कोरोना की मुक्ति में उपयोगी स्थान है। जो लोग शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य चाहते हैं, कोरोना महामारी से बचना चाहते है, वे महावीर के इस महान मंत्र कायोत्सर्ग का प्रयोग करें। कायोत्सर्ग औषधि है और स्वास्थ्य का राजमार्ग है। इस पर चलने वाला कोई भी व्यक्ति स्वस्थ जीवन जी सकता है।
भगवान महावीर सचमुच प्रकाश के तेजस्वी पंुज और सार्वभौम धर्म के प्रणेता हैं। वे इस सृष्टि के मानव-मन के दुःख-विमोचक हैं। महावीर ने व्रत, संयम और चरित्र पर सर्वाधिक बल दिया था। महावीर का संपूर्ण जीवन तप और ध्यान की पराकाष्ठा है इसलिए वह स्वतः प्रेरणादायी है। भगवान के उपदेश जीवनस्पर्शी हैं जिनमें जीवन की समस्याओं का समाधान निहित है। भगवान महावीर चिन्मय दीपक हैं। दीपक अंधकार का हरण करता है किंतु अज्ञान रूपी अंधकार को हरने के लिए चिन्मय दीपक की उपादेयता निर्विवाद है। वस्तुतः भगवान के प्रवचन और उपदेश आलोक पंुज हैं। ज्ञान रश्मियों से आप्लावित होने के लिए उनमें निमज्जन जरूरी है तभी हम स्वस्थ जीवन की ओर अग्रसर हो सकेंगे।

प्रेषकः


(ललित गर्ग)
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आप कांशीराम जी को कितना जानते है

आप कांशीराम जी को कितना जानते है

15-Mar-2020

प्रेमकुमार मणि

15 मार्च मशहूर दिवंगत नेता कांशीराम का जन्मदिन है . 1934 में पंजाब  प्रान्त के रोपड़ या रूपनगर  जिलान्तर्गत खासपुर गांव में , आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था . अनेक कारणों से कांशीराम जी केलिए मेरे मन में अथाह सम्मान है . उनसे एक छोटी -ही सही मुलाकात भी है ,लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है . महत्वपूर्ण  है उनकी वह राजनीति ,जिसने कई बार असंभव को संभव कर दिया . भारत के सबसे बड़े प्रान्त उत्तरप्रदेश ,जो गाय  ,गंगा ,गीता के द्विजवादी विचार -चक्र में हमेशा बंधा -सिमटा रहा , में अम्बेडकरवाद की धजा उन्होंने ऐसी फहराई कि महाराष्ट्र के लोग देखते रह गए .   उनके काम करने के तरीकों को देख कर हैरत होती है . एक गरीब और जाति से  दलित माँ -बाप के घर जन्मा बालक केवल अपनी धुन के बल पर तमाम कठिनाइयों को पार करता हुआ ,देश भर में चर्चित होता है और कमसे कम उत्तर भारत के दलितों को पिछलग्गूपन की राजनीति से मुक्त कर  उसकी  स्वतंत्र राजनीति तय करता है  ,यह इतना विस्मयकारी है,  जिसकी कोई मिसाल नहीं है . कांशीराम का अध्ययन अभी हुआ नहीं है ,होना है . कांशीराम को पसंद करने वाले केवल उनके द्वारा स्थापित  पार्टी के लोग ही नहीं हैं . अनेक पार्टियों के लोग ,जो बहुत संभव है पूरी तरह उनकी वैचारिकता से सहमत न हों ,भी उनके संघर्ष करने के तरीकों से सीखते रहे हैं . उत्तरमार्क्सवादी दौर में भारतीय राजनीति के निम्नवर्गीय प्रसंग को कांशीराम के बिना पर समझना किसी केलिए भी मुश्किल होगा .

9 अक्टूबर  2006 को उनके निधन की जानकारी मुझे नीतीश जी ने दी थी . उस वक़्त भी वह बिहार के मुख्यमंत्री थे . फोन पर उनकी आवाज भर्राई हुई थी . कांशीराम जी कोई अचानक नहीं मरे थे . लम्बे समय से वह बीमार थे .उनकी  स्मृति ख़त्म हो गयी थी . हम सब उनकी मृत्यु का इंतज़ार ही कर रहे थे . लेकिन उनका नहीं होना एक युग के ख़त्म होने जैसा था . कांशीराम जी जैसे व्यक्तित्व कभी -कभी ही आते हैं . नीतीश जी चाहते थे कि आज ही पार्टी कार्यालय में एक शोकसभा हो . सभा हुई भी . फोटो -फूल जुटाने में भी वह तत्पर रहे . तब मैं जदयू की राजनीतिक सक्रियता  का हिस्सा था . कांशीराम जी से हमलोगों की पार्टी का कभी कोई मेल -जोल नहीं रहा था  . फिर भी हम सब व्यग्र थे . नीतीशजी का इस अवसर पर दिया गया  भाषण भावपूर्ण था . यह अलग बात है कि उन भावों पर उनने अपनी राजनीति को नहीं टिकने दिया . यह केवल नीतीश कुमार का हाल नहीं था . उनकी ही पार्टी बसपा के लोगों और उनके द्वारा घोषित उत्तराधिकारी मायावती ने भी यही किया . सम्मान देना एक बात है , उनके रास्ते पर चलना अलग . कांशीराम के कदमों पर चलना आसान नहीं था .

1964 में कांशीराम की उम्र तीस साल थी . वह एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब में रिसर्च असिस्टेंट की नौकरी कर रहे थे . एक रात अचानक वह गौतम सिद्धार्थ  की तरह कुछ प्रतिज्ञाएं करते हैं . 24 पृष्ठों का एक महापत्र पूरी दुनिया के नाम लिखते हैं ,जिसके सात मुख्य बिंदु थे . लोगों को इसे आज भी जानना चाहिए . खास कर नयी पीढ़ी को . -
१. कभी घर नहीं जाऊंगा .
२. अपना घर नहीं बनाऊंगा .
३. गरीब दलितों के घर ही हमेशा रहूँगा .
४ . रिश्तेदारों से मुक्त रहूँगा
५. शादी ,श्राद्ध ,बर्थडे जैसे समारोहों में शामिल नहीं होऊंगा .
६ . नौकरी नहीं करूँगा  और
७ . फुले -आंबेडकर  के सपनों को पूरा होने तक चैन से नहीं बैठूंगा .

यह कांशीराम का सन्यास था ,जिसे उन्होंने निभाया . एक बार मंच से जब वह बोल रहे थे ,भीड़ में उनके पिता श्रोताओं के बीच बैठे दिखे . पिता ने भी मिलने की इच्छा दिखलाई . लेकिन कांशीराम नहीं मिले . पिता की मृत्यु पर भी वह घर नहीं गए , जो छूट गया सो छूट गया . आजीवन माँ से भी नहीं मिले . कभी -कभी लगता है इतना कठोर होना क्या जरुरी था ? इसका जवाब तो काशीराम ही दे सकते थे .

दरअसल यह कठोरता इसलिए थी कि वह अत्यंत संवेदनशील थे . जब वह बच्चा ही थे ,एक दफा पिता से मिलने रोपड़ तहसील के डाकबंगले पर पहुंचे जहाँ उनके पिता दैनिक मज़दूर थे . कोई साहब बंगले में रुका हुआ था . पुराने ज़माने का हाथ से चलने वाला पंखा वहां लगा था जिसकी डोरियाँ खींचने केलिए उसके पिता हरी सिंह वहां तैनात थे . पंखा खींचते थके हुए पिता सो गए थे और दयनीय दिख रहे थे . बालक कांशीराम चुपचाप वहां से चला आया . बहुत वर्षों बाद कांशीराम खुद संसद सदस्य बने और इत्तफाकन संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए रोपड़  पहुंचे और उसी डाकबंगले में रुके जो रूपांतरित होकर एक आधुनिक अतिथिशाला बन चुका था  . रात को एक भयानक सपने ने उन्हें जगा दिया .पसीना -पसीना हुए  वह दौड़ कर बाहर आये . देखा कोई नहीं है . दरअसल उन्होंने स्वप्न देखा था कि उनके पिता वही पुराने ज़माने वाला डोरीदार पंखा झल रहे है ,डोरियाँ खींच रहे है और बाहर बैठे हैं . ऐसे सपने सब नहीं देखते . कांशीरामजी  कहा करते थे कि सपने वे नहीं होते जो हम सोये हुए देखते हैं ,सपने वे होते हैं ,जो हमें सोने नहीं देते .

उनकी किताब " चमचायुग " हर राजनीतिक कार्यकर्त्ता को पढ़नी चाहिए ,यह किताब भिन्न अवसरों पर मैंने बिहार के दो दिग्गज मित्र राजनेताओं  -नीतीशजी और लालूजी - को   इस विश्वास के साथ दी कि वह कुछ लाभ उठाएंगे . लेकिन पढ़ने की जहमत कोई क्यों उठाने जाय . कांशीरामजी ने चमचों के छह प्रकार बतलायें हैं . ऐसे चमचों से तमाम पार्टियां भरी हैं ; उनकी पार्टी बसपा  भी .

कांशीरामजी की कुछ सीमायें भी थीं . हर की होती है . कबीर  की तरह हद और बेहद के पार जाने वाला बिरले ही होते हैं . लेकिन इन सब के बावजूद वह ऐसे थे जिन्होंने समय पर हमारे विचारों और कार्यशैली को झकझोरा . इस बात को स्थापित  किया कि परिवर्तन की राजनीति का क्या अर्थ होता है और   इस पूंजीवादी दौर में भी खाली हाथ चलकर सफल राजनीति संभव है . उन्होंने कभी किसी चीज का रोना नहीं रोया . परिस्थितियों से जूझे ,संघर्ष किया और बिना किसी बाहरी शक्ति या सहयोग के सफलता हासिल की .  उत्तरभारत की राजनीति से गांधीवाद के  बुखार को उतार कर उनने फुले -अम्बेडकरवाद केलिए ऐसी अनुकूलता विकसित की कि आज घर -घर में इनपर चर्चा  होती है . यह अत्यंत महत्वपूर्ण काम है ,जिसकी समीक्षा भविष्य में होगी . कांशीरामजी ( या किसी की भी ) राजनीति अथवा रणनीति को ज्यों का त्यों अनुकरण करने का मैं  हिमायती नहीं हूँ ,लेकिन यह अवश्य कहूँगा कि उनसे सीखने केलिए बहुत कुछ है .

उनके जन्मदिन पर उनकी स्मृति को नमन . 

 

सौजन्य सै क़ासिम लखनऊ 


साल 2014 के जून के महीने में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी तब पेट्रोल की कीमत 82 रु चली गयी थी और देश में हाहाकार मच गया था

साल 2014 के जून के महीने में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी तब पेट्रोल की कीमत 82 रु चली गयी थी और देश में हाहाकार मच गया था

12-Mar-2020

आप जानते है आज बेंट क्रूड की कीमत क्या है?....आज अंतरराष्ट्रीय मार्केट में ब्रेंट क्रूड 14.25 डॉलर यानी 31.5 फीसदी टूटकर 31.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. यह 1991 की गल्फ वॉर शुरू होने के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है.......
यदि 2014 से तुलना की जाए तो जरा सोचकर बताए कि आज पेट्रोल डीजल की कीमत क्या होनी चाहिए 
इक़वेशन यह है .......
115 : 82 तो 31 : ?????
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आज भी पेट्रोल की कीमत 71 रु के आसपास बनी हुई है.. 
मई 2014 में सत्ता में आने से पहले भाजपा अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुपात में तेल की कीमतों में हो रही बढ़ोत्तरी को लेकर यूपीए सरकार के खिलाफ सख्त मोर्चा खोले हुए थी, मोदी अपनी चुनावी रैली में तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर यूपीए की कड़ी आलोचना कर रहे थे, बीजेपी के बड़े बड़े नेता संसद के सामने पेट्रोल डीजल की महंगी कीमतों के खिलाफ नाच नाच कर प्रदर्शन करते थे
यूपीए टू के कार्यकाल में 2009 से लेकर मई 2014 तक क्रूड की कीमत 70 से लेकर 110 डॉलर प्रति बैरल तक थी. जबकि इस बीच पेट्रोल की कीमत 55 से 80 रुपये के बीच झूलती रही.
मई 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बनाई कुछ दिनों में फिर कच्चे तेल का बाज़ार पलटने लगा
जनवरी 2016 तक कच्चे तेल के दाम 34 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क गए. मोदी सरकार ने कच्चे तेल की गिरावट की रैली का खूब फ़ायदा उठाया. इस दौरान, पेट्रोल-डीज़ल पर 9 बार उत्पाद कर (एक्साइज़ ड्यूटी) बढ़ाया गया. नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच पेट्रोल पर ये बढ़ोतरी 11 रुपये 77 पैसे और डीज़ल पर 13 रुपये 47 पैसे थे पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री की केंद्र सरकार को मिलने वाला राजस्व लगभग तीन गुना हो गया
जून 2017 में मोदी सरकार ने एक नया फार्मूला लागू किया अब कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में रोज बदलाव के तर्क के आधार पर पेट्रोल-डीजल के दाम बदले जाएंगे ......इससे पहले कच्चे तेल के 15 दिनों के औसत मूल्यों के आधार पर पेट्रोल डीजल के दाम तय किये जाते थे लेकिन इस निर्णय के बाद से यह कहा कि यदि क्रूड गिरेगा तो कीमत घटेगी ओर बढ़ेगा तो बढ़ेगी!......
इस निर्णय के समर्थन में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन आईओसी ने एक बयान दिया जिसमें कहा गया था कि 'इस कदम से यह सुनिश्चित होगा कि तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत में छोटे से छोटे बदलाव का फायदा भी डीलरों व उपभोक्ताओं को मिले'
कोई यह बताए कि जून 2017 के बाद से क्रूड की घटती हुई कीमतों का कितना फायदा मोदी सरकार ने आम आदमी को पुहंचाया है? जब भी क्रूड बढ़ा है पेट्रोल डीजल के दाम तो बढ़ाए गए हैं लेकिन जब दाम घटे है तो क्या दाम उसी अनुपात में घटाए गए हैं?
आज महंगाई फिर वही से 2014 के स्तर पर पुहंच गयी है लेकिन क्रूड के दाम 2014 की तुलना में एक तिहाई रह गए हैं .......मोदी सरकार चाहे तो एक झटके में पेट्रोल डीजल के दाम आधे से भी कम कर सकती है लेकिन करेगी नही! ........ओर आप भी कुछ नही बोलेंगे...... बल्कि आप इस पोस्ट को लिखने वाले को ही भला बुरा कहना शुरू कर देंगे.........
--- गिरीश मालवीय
साभार सै क़ासिम लखनऊ -

 


दुनिया के महान नायक, हज़रत अली का जन्म दिवस

दुनिया के महान नायक, हज़रत अली का जन्म दिवस

09-Mar-2020

आज इस्लामिक कलेंडेर के माह रजब की 13 तारीख़ है और यह दिन इस्लामिक हिस्ट्री के ही नहीं बल्कि दुनिया के महान नायक, हज़रत अली का जन्म दिवस है।
हज़रत अली (अ) (599-661) तारीख़ ए इंसानी का क़ुतुबी तारा, शमा ए हिदायत और मुर्शिद हैं। इस्लाम की समावेशी और जनपक्षधर नीतियों को ज़मीनी तौर पर लागू करने की सही मायनों में अपने ही कोशिश की थी। एक महान योद्धा, महान चिंतक, भाषाविद्व, न्यायप्रिय ख़लीफ़ा, स्कॉलर, कुशल प्रशासक होने के बावजूद आपने एक आम इंसान की तरह ज़िन्दगी गुज़ारी।आपने ख़िलाफ़त का ओहदा उस वक़्त सम्भाला जब हालात बहुत ख़राब थे, अमीरी-ग़रीबी की खाई बहुत चौड़ी हो चुकी थी। भाई-भतीजे वाद का बोल बाला था, राजकोष से कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति पैसा ले लेता था। हज़रत अली पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इस प्रक्रिया पर प्रभावशाली तरीक़े से रोक लगाई। एक गवर्नर को जो लिखा वह पढ़ने के लायक़ है,
“उस ज़ात की क़सम जिसने दाने को चीरा और जानदारों को पैदा किया है, अगर यह सही (राजकोष में भ्रष्टाचार) साबित हुआ तो तुम मेरी नज़रों में ज़लील हो जाओगे और तुम्हारा पल्ला हल्का हो जाएगा, अपने परवादिगार को हल्का ना समझो और दीन को बिगाड़ कर दुनिया को ना सँवारो वरना अमल के ऐतबार से खिसारा (हानि) उठाने वालों में से होगे।” 
जनाबे मालिक ए अश्तर को मिस्र का गवर्नर नियुक्त करते हुए जो अहकाम जारी किये हैं वह एक प्रशासक के लिये नमूना ए अमल है, कि किस प्रकार उसे कर वसूलने में नरमी और करदाता के अधिकारों का ख़याल रखना चाहिये, जनता बिना भेदभाव प्रशासक के एक भाई की हैसियत रखती है,, 
एक बार उनके घोर विरोधी अमीर माविया ने हज़रत ज़रार ए असदी से अली के विषय में कुछ बयान करने को कहा, तो ज़रार ने अमान की शर्त पर कहा,
“अल्लाह की क़सम अली ए मुर्तुजा बड़े शक्तीशाली थे, न्याय की बात कहते थे और इंसाफ़ के साथ हुक्म देते थे, इल्म और हिकमत उनके चारों तरफ़ बहते, चिंतन बहुत करते थे, लिबास उनको वही पसंद था जो कम क़ीमत हो, खाना भी अदना दर्जे का लेते, हमारे बीच बिलकुल बराबरी की ज़िंदगी बसर करते थे और हर ग़रीब को अपने पास बिठाते थे”
कहा जाता है कि यह सुनने के बाद अमीर ए शाम भी रो दिया।
हज़रत अली ने कॉरपोरेट के प्रभाव पर अंकुश लगाने के सम्बंध में बाज़ार के संचालन में काफ़ी सुधार किये, अक्सर स्वयं मुख्य मंडियों में जाते। इसके अतिरिक्त भू-सुधारों और नुज़ूल व्यवस्था के विकास में आपका योगदान भी बहुत अहम है। 
आज हमारे सामने बहुत से मसायल दरपेश हैं और सही अर्थों में क़ौम पतन की राह पर है। हम उन्नति और पतन के सिद्धांतों से अनभिज्ञ हैं लेकिन हज़रत अली ने हमें बहुत पहले ही सचेत कर दिया था। नहजुल बलाग़ा में एक ख़ुतबा है जिसमें आप फ़रमाते हैं : “मेरा ख़याल है कि यह (अहले शाम) तुम पर ग़ालिब आ जायेंगे क्योंकि बातिल पर होने के बावजूद उनमें एकता है और वह अपने शासक के आज्ञाकारी हैं और दिल से उसके आदेश का पालन करते हैं। तुम  इमाम की नफ़रमानी करते हो। वह अपने क्षेत्रों के हितों का ख़याल रखते हैं तुम अपने इलाक़े में तबाही मचाते हो। अगर मैं तुम में से किसी को लकड़ी का एक प्याला भी सुपुर्द कर दूँ तो डरता हूँ कि कहीं कोई उसका कुंडा ही ना उड़ा ले।”
अमीरूल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्लाम ने स्पष्ट रूप   से कह दिया कि तरक़्क़ी का वैज्ञानिक सिद्धांत एक डायनामिक्स है और इलाही क़ानून यह नहीं है कि जिसके साथ इमाम ए वक़्त हो वही ग़ालिब आ जाये या उन्नति करे। आप अपने असहाब को और शियों को जिसमें हर दौर के शिया शामिल हैं, को धोके में नहीं रखना चाहते थे। अलबत्ता शिया इस ग़लतफ़हमी में नं रहें कि जिन कार्यों से दूसरी क़ौम पस्त और रुसवा हुईं हैं वह काम करने से उन्हें कोई फ़ायदा होगा।
एक बहुत ही अहम बात पर चर्चा आवश्यक है, जिस तरह उनके बाद ख़लीफ़ा निरंकुश होते गए उससे ख़िलाफ़त  का सिद्धांत कमज़ोर पड़ता गया और अवाम का भरोसा राज्य पर से उठता गया, इस प्रक्रिया में जो शून्य उभरा उसमें क़बिलाई loyalities को पैर पसारने का मौक़ा मिलता गया। पलिटिकल इस्लाम के इस  नये रूप (जो आज तक क़ायम है) के उदय के पीछे क़बिलाई  व्यवस्था और सरमायेदारी के गठबंधन को समझना होगा।आज भी इस्लाम की एक विशेष धारा को पूँजीवाद ने अपने हितों को साधने में इस्तेमाल किया, इसके साथ इस्लाम की अन्य धाराओं के विरुद्ध भी इसे इस्तेमाल किया गया। आज मूल समस्या यह है कि पलिटिकल इस्लाम की विशेष धारा को मुख्य धारा समझ लिया गया है। जबकि मुख्य धारा का अपना एक इतिहास है, सभ्यता है, संस्कृति है और विश्व सभ्यता में महतवपूर्ण योगदान है। इस्लाम की समग्रता को सही परिपेक्ष्य में प्रस्तुत करने का कार्य हो रहा है, स्वयं पश्चिम के scholars इस्लाम के विरुद्ध दुष्प्रचार  के जवाब में तक़रीर और तहरीर से खंडन प्रस्तुत कर रहे हैं।

सै कासिम लखनऊ से 

 


नफ़रत का कमीना वायरस

नफ़रत का कमीना वायरस

04-Feb-2020

तहसीन मुनव्वर

आजकल एक वायरस का बहुत ज़िक्र हो रहा है। ये चीन से चला है लेकिन हम जिस वायरस की बात कर रहे हैं वो हमारा रात-दिन का चैन छीनने पर तुला है। एक वायरस ने चीन में तीन सौ के क़रीब लोगों को हलाक किया है और तक़रीबन बारह हज़ार के क़रीब लोग इस वायरस के शिकार हैं लेकिन ये जो नफ़रत का कमीना वायरस है इसने दुनिया-भर में लाखों ज़िंदगीयों को अब तक अपना शिकार बनाया है और करोड़ों लोग इस नफ़रत के वायरस की ज़द में आकर अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए हैं और दर-बदरी की ज़िंदगी जी रहे हैं। मगर अफ़सोस तो इस बात का है कि जिस वायरस से करोड़ों लोग प्रभावित हुए हैं और इतिहास गवाह है कि नफ़रत के इस वायरस ने अनगिनत जंगें तक करवाई हैं मगर दुनिया की सभी शांति संस्थाओं की कोशिशों के बावजूद न तो नफ़रत का यह वायरस दुनिया से ख़त्म ही हो पाया है और न ही उसे ख़त्म करने की कोई ऐसी कोशिश की गई है जैसी कि सब कोरोना वायरस के लिए करने की बात कर रहे हैं। एक वायरस के साथ अरबों का हथियारों का बाज़ार जुड़ा है और दूसरे के साथ भी कहीं न कहीं मैडीकल बाज़ार जुड़ ही जाएगा। अब आप फ़ैसला कीजिए कि कौन सा वायरस सबसे ज़्यादा ख़तरनक है। नफ़रत का वायरस या कोरोना वायरस?

नफ़रत के वायरस को दुनिया-भर में फैलाने में अगर ग़ौर करें तो आलमी सियासतदानों का बहुत बड़ा हिस्सा है जो देखने मैं तो अपने अपने देशों में अपनी पकड़ बनाने की ज़िद में दुनिया भर में नफ़रत को बढ़ावा देने में लगे हैं लेकिन उनका असल मक़सद हथियारों की ख़रीद-ओ-फ़रोख्त को ही मज़बूत बनाना है। वो जहां-जहां अमन की खोज में गए हैं उन्हों ने उन मुल्कों को खन्डर बना कर रख दिया है। न ही उन्हें अमन मिला और न ही वो मिला जिसने उन्हें इस मुल्क में बुलाया था। अब वो कुछ देशों से लौटना चाहते हैं तो उन्हें वापसी की राह नहीं मिल रही है और कुछ से उन्हें जाने को कहा जा रहा है तो वो रुकने के बहाने तलाश कर रहे हैं। मगर इस कश्मकश के बीच अगर देखा जाये तो अमन कहीं खो चुका है और नफ़रत का जितना बढ़ावा हो सकता था वो हो चुका है और अब भी नफ़रत के वायरस के फैलने का सिलसिला जारी है। हैरत की बात तो ये है कि नफ़रत इन्सानों को इन्सानों से करना सिखाई जाती है। कभी भी जिहालत से,बेरोज़गारी से,ग़रीबी से,मुसीबतों से, तकलीफों से और इन्सानों को तक़सीम करने वालों से नफ़रत नहीं सिखाता ये नफ़रत का वायरस।

नफ़रत का कमीना वायरस हमको एक दूसरे से नफ़रत करने को कहता है। अपने जैसे गोश्त पोश्त के इन्सान से नफ़रत करने को कहता है। ऐसे इन्सान से नफ़रत करने को कहता है कि जिसको चुटकी भी काटो तो वैसा ही दर्द होता है जैसा कि ख़ुद मुझ को होता है। तो ये नफ़रत का वायरस दुनिया-भर में मौजूद है। ये किसी भी चोले में आजाता है। किसी भी मज़हब और धर्म की आड़ ले सकता है। कभी भाषा के नाम पर, कभी छेत्र के नाम पर,कभी रंग और नसल के नाम पर और कभी मुल्कों के नाम पर ये नफ़रत को विश्व स्तर पर इस तरह बढ़ावा देता है कि आप बैठे होंगे यहां लेकिन आपसे हज़ारों लाखों मील दूर बैठा इन्सान जिसे आप जानते भी नहीं होंगे, जिससे आप ज़िंदगी में कभी मिलेंगे भी नहीं,जिसे आपसे कुछ लेना देना भी नहीं होगा मगर वो आपकी नफ़रत के वायरस के दायरे में आजाता है। नफ़रत का वायरस अपना बीमार बना कर आप को नफ़रत की आग में न सिर्फ झोंक देता है बल्कि वो आपकी बीमारी से कई और नफ़रत के बीमार पैदा कर देता है। कोरोना वायरस से बचने के बहुत से रास्ते हैं मगर नफ़रत के वायरस से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है और वो है मुहब्बत। अगर आप मुहब्बत करना जानते हैं,अपने मज़हब को वाक़ई न सिर्फ समझते हैं बल्कि इस पर चलते भी हैं तब कोई भी माई का लाल आपको नफ़रत के वायरस से बीमार नहीं कर सकता है।
उस दिन जामिया मिल्लिया इस्लामीया में जो नौजवान तमंचा लहराता हुआ घूम रहा था अगर आपको उस से हमदर्दी न हो कर नफ़रत हो रही है तब मुझे माफ़ी के साथ कहना होगा कि आप भी नफ़रत के वायरस के शिकार हो चुके हैं। अफ़सोस की बात तो ये है कि ऐसे बहुत से लोग होंगे जो इस नौजवान की बेवक़ूफ़ी पर तारीफ़ के पुल भी बांध रहे होंगे और अपनी नफ़रत की दुकान चमकाने के लिए उस का सहारा भी लेंगे। ये नौजवान भी नफ़रत का ही शिकार हुआ है। नफ़रत के वायरस ने इस को भी डसा है। ये नफ़रत का वायरस उस को सोशल मीडीया के ज़रीये परोसा गया और वो उस का बीमार होता चला गया। हम लोग जाने अंजाने इस किस्म के काम करने वालों को हीरो बनाने की कोशिश करते हैं और ये नहीं जानते हमारे आस-पास ऐसे कमज़ोर दिमाग़ के लोग मौजूद हैं जो ऐसा करने से हमारे समाज के लिए नासूर बन सकते हैं मगर हम बिना थके नफ़रत के वायरस को बढ़ाने के लिए बोलते चले जाते हैं। ये जाने समझे बग़ैर कि हम कहाँ हैं,हमारा काम किया है, हमें क्या करना था और हम क्या कर रहे हैं? ये सिर्फ एक पेशे की बात नहीं है, हर जगह जब हम अपनी ज़िम्मेदारियों से आँखें मूंदते हैं और जज़बात की रो में बहते हैं तब हम नफ़रत के कमीने वायरस को बढ़ावा देने का काम कर रहे होते हैं मगर इस पर ग़ौर नहीं करते।

कश्मीर में नब्बे की दहाई बहुत ही सख़्त तरीन इमतिहान की रही है। इस दौरान हम वहां पर अपनी सलाहीयत के मुताबिक़ जो मुम्किन था देश के लिए कर रहे थे। उस दौर में हमारे साथ एक साहब थे जो मज़ाक़ में कहते थे कि आप तो सय्यद साहब हैं मेरे हक़ में दुआ कर दीजीए।हम कहते कि हम तो नाम में भी सय्यद नहीं लगाते हैं क्योंकि हम अब वो नहीं रहे। लेकिन उनका सिलसिला नहीं रुकता था। एक दिन मिलिटेंट लीडर शब्बीर शाह की रिहाई लगभग तेरह बरस के बाद हुई और उस का जुलूस जहां हम लोग रह रहे थे उस के सामने से गुज़रा। वो साहब दहश्तगरदों के सताए थे मगर शब्बीर शाह का जुलूस देखने बाहर निकले और उनके चेहरे पर एक इत्मीनान सा नज़र आरहा था। हमने ज़िंदगी में पहली बार बारूद की बू कश्मीर में ही महसूस की थी इस लिए हर किस्म की दहश्तगर्दी से नफ़रत करते हैं। हमने देखा है कि किस तरह कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर से आने के बाद अपनी ज़िंदगी की गाड़ी खींची है। किन

 


राजनाथ सिंह की बढ़ती सक्रियता का सबब

राजनाथ सिंह की बढ़ती सक्रियता का सबब

03-Feb-2020

- ललित गर्ग-

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह इनदिनों एक अलग तरह की सक्रियता को लेकर चर्चा में है। उनका राजनीतिक प्रभुत्व एवं कद में उछाल भले ही भारतीय जनता पार्टी के एक वर्ग के लिये हैरानी का कारण बन रहा हो, लेकिन इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम पार्टी के हित में होने वाले हैं। इन्हीं राजनाथ सिंह के कारण नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने एवं भाजपा को अमाप्य ऊंचाइयों मिली हंै। संघ के विश्वासप्राप्त होने की बजह से वे अनेक अन्दरूनी बाधाओं एवं विरोध के बावजूद शीर्ष के आसपास बने रहे हैं और वे ऐसी पात्रता रखते हैं कि भविष्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी जा सके।
यह सर्वविदित है कि जब नरेन्द्र मोदी ने अपने बल पर भारी बहुमत से दोबारा सरकार बनाई थी तो राजनाथ सिंह को कमजोर करने एवं उन्हें किनारेे करने का अहसास दिलाने के लिये महत्वपूर्ण कैबिनेट समितियों में जगह नहीं दी गयी, लेकिन सुबह लिये गये इन निर्णयों को सांय होने से पहले बदलना पड़ा और लगभग सभी समितियों में उन्हें शामिल किया गया। यह एक सन्देश था कि उनकी उपेक्षा स्वीकार्य नहीं है। जब से नया मंत्रिमंडल बना है एवं भाजपा सरकार सक्रिय बनी है, राजनाथ सिंह शांत होकर अपने मंत्रालय में व्यस्त दिखाई दिये। उनके आसपास बिखरा सन्नाटा हैरान करने वाला था, लेकिन पिछले कुछ सप्ताहों में राजनाथ सिंह की सक्रियता एवं शोहरत की बुलन्दियां एक नये परिवेश के निर्मित होने का संकेत दे रही है।
हाल ही में सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने अपने मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण बैठक में बतौर मुख्यअतिथि राजनाथ सिंह को आमंत्रित करके पार्टी में एक नयी हलचल पैदा कर दी है। पार्टी के कार्यकर्ता इस बात से अंचभित है कि एक सड़क सुरक्षा पर होने वाली बैठक में रक्षामंत्री को बुलाने का क्या औचित्य है, क्या उसके पीछे कोई राजनीति पक रही है? क्या पार्टी में एक नया गुट पनप रहा है? क्या इस नये पनप रहे राजनाथ-गडकरी के गुट को संघ का वरदहस्त प्राप्त है? क्या संघ गृहमंत्री के कट्टरवादी चेहरों की जगह उदारवादी चेहरों को आगे बढ़ाना चाहता है? राजनाथ सिंह के अनूठे उदारवादी व्यक्तित्व, राजनीतिक कौशल एवं जन-स्वीकार्यता के कारण पार्टी में उनकी उपेक्षा एवं उनकी स्वयं की उदासीनता हैरानी का कारण बनी रही है, लेकिन अब वे सक्रिय हुए हंै तो यह उनके स्वयं के साथ-साथ पार्टी के हित में है। राजनाथ जैसे शीर्ष एवं अनुभवी राजनेताओं का विभिन्न मोर्चों पर सक्रिय रहना न केवल पार्टी बल्कि देशहित में हैं। आपने ‘साल’ का वृक्ष देखा होगा- काफी ऊंचा ‘शील’ का वृक्ष भी देखें- जितना ऊंचा है उससे ज्यादा गहरा है। राजनाथ सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में ऐसी ही ऊंचाई और गहराई है, जरूरत है इस गहराई एवं ऊंचाई को मापने की, उसके अंकन की एवं राष्ट्र एवं पार्टी हित में उसका उपयोग करने की।
राजनाथ सिंह चतुर एवं प्रभावी राजनेता होने के साथ-साथ उदारवादी चिन्तन के वाहक है। हाल ही में उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक सभा को संबोधित करते हुए मुसलमान मतदाताओें से जोरदार अपील की और उन्हें नागरिकता संशोधन विधेयक पर आश्वस्त करने की कोशिश की। उनकी यह व्यापक सोच एवं प्रभावी अपील असरकारक बनी और उसका लाभ इन चुनावों में पार्टी को मिलना निश्चित है। एकाएक पार्टी के पक्ष में दिल्ली में जो वातावरण बना है, उनके अनेक घटक है, लेकिन राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता का स्पष्ट राजनीति मत, साहसी एवं निष्पक्ष होना भी पार्टी के लिये लाभकारी है, यह उनका साहस ही है कि उन्होंने केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और सांसद प्रवेश वर्मा के आपत्तिजनक बयानों की आलोचना की। शायद ऐसे बयान एवं कट्टरता संघ भी पसन्द नहीं करता है। यही कारण है कि कट्टर आडवानी के मुकाबले वाजपेयी को आगे कर पार्टी में संतुलन बनाये रखने की कोशिश संघ ने की थी। आज पार्टी में कट्टरवादी शक्तियां सक्रिय है, और उसका नुकसान पार्टी को झेलना पड़ रहा है। ऐसी जटिल स्थितियों में राजनाथ जैसे उदारवादी एवं सौहार्दपूर्ण सोच वाले नेता को उन्हें पार्टी में एक नये स्वरूप में प्रतिष्ठापित करना चाहती है, संभवतः वे वाजपेयी के नये अवतार के रूप में जगह बनाये। क्योंकि पार्टी को कट्टरतादी छवि से उपरत करके ही सर्वव्यापी बनाया जा सकता है।
मैंने राजनाथ सिंह को अनेक रूपों में देखा है, उनकी कर्तव्यपरायणता और साहसिकता अनूठी है। इससे बड़ा राजनीतिक चरित्र और क्या हो सकता है? वे अपनी विलक्षण सोच एवं अद्भुत कार्यक्षमता से असंख्य लोगों के प्रेरक बने हुए हंै। उनका राजनीतिक जीवन एक यात्रा का नाम है- आशा को अर्थ देने की यात्रा, ढलान से ऊंचाई देने की यात्रा, गिरावट से उठने की यात्रा, मजबूरी से मनोबल की यात्रा, सीमा से असीम होने की यात्रा, जीवन के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की यात्रा, बिखराव से जुड़ाव की यात्रा, भारतीयता को मजबूती देने की यात्रा।
बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह की नियुक्ति एवं उनका कार्यकाल यादगार रहा, इसमें अटल बिहारी वाजपेयी के आशीर्वाद की अहम भूमिका थी। संघ ने राजनाथ में एक ऐसा शख्स देखा, जो संयमी स्वयंसेवक रहा है और जिसके बारे में संघ के शीर्ष अधिकारियों की अच्छी राय रही है। राजनाथ का कोई भी भाषण उठाकर देखिए उसमें संघ और अटल की छाया नजर आएगी, आज वे नरेन्द्र मोदी की उपलब्धियों को भी प्रभावी प्रस्तुति देते हैं। नागपुर के प्रति उनकी आस्था दरअसल संघ के शीर्ष नेतृत्व के प्रति आस्था है और यही आस्था राजनाथ के निरंतर विकास का सबब भी। भले ही राजनाथ के पास अपना कहने को गिनती के लोग हो, फिर भी राजनाथ ने संघ को भरोसे में लेकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और युक्तियों को आकार देने में सफलता पायी है, वे कभी चुप्पी तो और कभी आत्मबलिदान की मुद्रा के सहारे आगे बढ़ते रहे। उन्होंने भले ही कोई चमत्कार सरीखा इतिहास न गढ़ा हो, फिर भी उनमें संभावनाओं को तलाशा जा सकता है। खुद राजनाथ का मानना है कि उन्होंने हमेशा पाटी हितों और आदर्शों को ध्यान में रखकर काम किया। मगर फिर भी चुनावी सफलता राजनाथ से दूर ही रही। उनके खाते में महज चार चुनावी जीत दर्ज हैं। कांग्रेस विरोधी लहर में इमरजेंसी की जीत, बतौर मुख्यमंत्री उपचुनाव और फिर विधानसभा चुनाव में जीत, लोकसभा चुनाव में गाजियाबाद से जीत और फिर हालिया लखनऊ। आज भी जब राजनाथ विरोधी सक्रिय हैं, मोदी-शाह की शानदार उपलब्धियां की चुनौती है तो संघ ही एकमात्र सहारा है उनकी राजनीति का। मगर संघ भी देर-सवेर किसी दूसरे राजनाथ को अपना अर्जुन बना सकता है और उस स्थिति में राजनाथ की राजनीति चुक भी सकती है। ऐसी स्थिति में उनके सामने अपनी स्वच्छ छवि के दावे और संबंधों का दम ही उनकी राजनीति को चमका सकती है। वे भाजपा की एक बड़ी ताकत है, एक कर्मयोद्धा की तरह सक्रिय होकर भी जल्दीबाजी में नहीं रहते। वे दृढ़ होकर भी कभी कठोर नहीं हंै। वे सर्तक हैं, किन्तु सुस्त नहीं हैं। वे उत्साह एवं ऊर्जा से भरपूर हैं, अहंकारी नहीं हैं। एक सफल राजनीतिज्ञ के साथ-साथ एक मनुष्य होने के नाते उनमें मानवता है, दयालुता है, भावुकता है, पर आसानी से इन गुणों को परिलक्षित नहीं होने देते। ऐसी ही कुछ विलक्षणताएं उन्हें भारत के भावी नेता के रूप में प्रतिष्ठापित करने में सहायक हो सकती है, और उन्ही के कारण संघ भी उनका सहारा बनता है और भविष्य में बनता रहेगा। सचाई यह है कि कम-से-कम राजनाथ की राजनीति गतिशील भी है और उसमें अनंत संभावनाएं भी है।  प्रेषकः


 (ललित गर्ग)
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