चरित्रहीनता की पराकाष्ठा है हनी ट्रैप मामले

चरित्रहीनता की पराकाष्ठा है हनी ट्रैप मामले

23-Sep-2019

ललित गर्ग - 

जनमत का फलसफा यही है और जनमत का आदेश भी यही है कि राजनेताओं, प्रशासन एवं कानून व्यवस्था से जुड़े शीर्ष व्यक्तित्वों की पहचान पद से नहीं, चरित्र से हो। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक सही अर्थों में लोकतंत्र का स्वरूप नहीं बनेगा तथा चरित्रहीनता किसी-न-किसी स्तर पर व्याप्त रहेगी। मध्य प्रदेश में हनी ट्रैप के जरिए ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का पर्दाफाश होने और इस मामले में पांच युवतियों व एक कांग्रेस नेता सहित सात लोगों की गिरफ्तारी कई मायनों में चिंताजनक है, राजनीति में चरित्र की गिरावट की परिचायक है।

गिरोह से बरामद अश्लील वीडियो क्लिपिंग के आधार पर इस हनी ट्रैप में कथित रूप से एक पूर्व मुख्यमंत्री और कुछ पूर्व मंत्रियों समेत कई बड़े राजनेताओं के फंसे होने की बात कही जा रही है। कहा यह भी जा रहा है कि भाजपा सरकार में मंत्री रहे दो नेताओं से ये गिरोह लाखों रुपए वसूल कर चुका है और वर्तमान कमलनाथ सरकार के एक मंत्री के ओएसडी से भी दो करोड़ रूपए मांग रहा था।

”खेत कभी झूठ नहीं बोलता“- जो देंगे, वही वापस मिलेगा। कोई भी हो, सभी भारतीय समाज के हैं, अपने में से ही हैं, समाज के प्रतिबिम्ब हैं। समाज से भिन्न कल्पना भी मात्र कल्पना होगी। लेकिन हम कैसा समाज बना रहे हैं, यह चिन्तन का विषय है। चरित्र एवं नैतिकता को भूला देने का ही परिणाम है कि नित-नयी सनसनीखेज चरित्रहीनता, भ्रष्टता, असदाचार की घटनाएं सामने आती हैं और राजनीति से जुडे़ चेहरों पर कालिख पुतते हुए दिखती है, जो न केवल शर्मसार करती है बल्कि राष्ट्रीय चरित्र को धुंधलाती है, इतना ही नहीं इस तरह के चरित्रहीन राजनेताओं के काले कारनामों की जासूसी और ब्लैकमेलिंग के लिए हनी ट्रैप का इस्तेमाल करने के लिये अनेक गिरोह सक्रिय है।

देश में गिरते चरित्र के कारण इन हनी ट्रैप के इस्तेमाल की घटनाएं बढ़ती जा रही है। हनी टैªप की घटनाओं का होना ही चिन्ताजनक नहीं हे बल्कि शीर्ष व्यक्तित्वों के चरित्र का दागी होना भी संकट का कारण है। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि अब तक नेतृत्व चाहे किसी क्षेत्र में हो- राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, वह सुविधानुसार अपनी ही परिभाषा गढ़ता रहा है। न नेता का चरित्र बन सका, न जनता का और न ही राष्ट्र का चरित्र बन सका। सभी भीड़ बनकर रह गए और हनी ट्रैप के शिकार होते रहे। प्रश्न है कि कब तक लोकतंत्र को चरित्र से दूबला बनने दिया जाता रहेगा? कब तक हनी ट्रैप में नेतृत्व दागी होता रहेगा?

इंदौर के पलासिया पुलिस थाने में ब्लैकमेलिंग का यह मामला दर्ज किया गया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि एक महिला आरोपी से दोस्ती करने के बाद उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रही थी। महिला ने कुछ रिकर्डिग भी कर ली थीं और तीन करोड़ रुपये की मांग की जा रही थी, मांगी गई रकम न देने पर वीडियो वायरल करने की धमकी दे रही थी। पीड़ित की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच की। उसके बाद तीन करोड़ की रकम में से पहली किस्त के तौर पर 50 लाख रुपये लेने इंदौर आई एक युवती के साथ दो अन्य को एक महिला व एक पुरुष को हिरासत में लिया गया। हनी ट्रैप की आशंका के बाद एटीएस ने जांच शुरू की। उसके बाद भोपाल से तीन महिलाओं को हिरासत में लिया गया। यह महिलाएं मीनाल रेसीडेंसी, कोटरा सुल्तानाबाद और रवेरा टाउन से पकड़ी गई हैं। तीनों हाई प्रोफाइल महिलाओं के राजनीतिक संबंध है। एक महिला तो पन्ना जिले से विधायक के आवास में किराए पर रहती है। ये महिलाएं कथित तौर पर राजनेताओं और उच्च रैंकिंग वाले सरकारी अधिकारियों का विडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करती थीं।

जासूसी और ब्लैकमेलिंग के लिए हनी टैªप का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। यह कोई नई बात नहीं है। हनी ट्रैप का मतलब है जैसे कोई मक्खी शहद के लालच में उस पर बैठ जाए और जब शहद पीकर उड़ना चाहे तो उड़ न पाए। राजनीतिक लाभ, आर्थिक लाभ, अनुचित कार्यों को अंजाम देने के अलावा दुश्मन देश से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज या खुफिया जानकारी जुटाने के लिए इसका इस्तेमाल प्रायः किया जाता है। कुछ माह पहले हनी ट्रैप के मामले में यह बात सामने आई थी कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़ी महिलाएं भारतीय सेना के जवानों से दोस्ती का स्वांग रचकर अहम जानकारियां जुटाने की फिराक में थी। दरअसल समाज में इन दिनों जिस तरह से चारित्रिक गिरावट बढ़ रही है, यह उसी का नतीजा है।

राष्ट्रीय जीवन की सोच का यही महत्वपूर्ण पक्ष है कि चरित्र जितना ऊंचा और सुदृढ़ होगा, उस राष्ट्र एवं समाज मेें सफलताएं उतनी तेजी से कदमों में झुकेंगी। बिना चरित्र न राष्ट्रीय जीवन है और न समाज के बीच गौरव से सिर उठाकर सबके साथ चलने का साहस। सही और गलत की समझ ही चरित्र को ऊंचा उठाती है। बुराइयों के बीच रहने वालों का सबकुछ लुट जाता है जबकि अच्छाइयों में सिर्फ उपलब्धियों के आंकडे होते हैं। चरित्र की उज्ज्वलता में मनुष्य का अंतःकरण आर-पार साफ दीखता है।

चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के प्रति उपेक्षा एवं उदासीनता बिखराव देती है और बिखरी जीवन-चर्या में विश्वसनीयता, जिम्मेदारी, कार्यक्षमता ढीली पड़ जाता है। ऐसे लोगों को अपनी सुरक्षा में झूठे रास्ते एवं असत्य का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे लोग कभी-कभी छोटे सुख एवं लाभ के लिये बड़ा नुकसान कर देते हैं। महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग चरित्रवान न होने के कारण समाज के लिए बहुत घातक साबित होते रहे हैं। जरा सोचिए, मंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को अगर कोई देश का दुश्मन हनी ट्रैप में फंसा ले और देश की सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील खुफिया जानकारियां हासिल कर ले तो देश को तबाह होते कितनी देर लगेगी? हकीकत तो यह है कि हनी ट्रैप या नेताओं की चारित्रिक गिरावट के बहुत ही कम मामले सामने आ पाते हैं जबकि समाज के भीतर ही भीतर यह सड़न, दुर्बलता बहुत ज्यादा बढ़ रही है।

इस तरह की बुराइयां दूब की तरह फैलती है और उनकी जड़े गहरी होती है। समय आ गया है कि जिम्मेदार पदों के लिए एक शर्त अनिवार्य हो कि उस पर बैठने वाला व्यक्ति चरित्रवान हो और चारित्रिक पतन का कोई भी मामला सामने आने पर उसे तत्काल पद से हटा दिया जाए। पुराने जमाने में धनवान से ज्यादा महत्व चरित्रवान को दिया जाता था। समय आ गया है कि चरित्र को एक बार फिर समाज में उसकी पुरानी प्रतिष्ठा लौटाई जाए। देश के एकमात्र नैतिक आन्दोलन अणुव्रत के गीत की एक पंक्ति ”सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, जिसका असर राष्ट्र पर हो।’’ आज राष्ट्र को सुधारने की शुरुआत व्यक्ति से करनी होगी, व्यक्ति भी वह जो राजनीति, कानून एवं प्रशासन से जुड़ा हो।

आज चरित्र की स्थापना ज्यादा जरूरी है क्योंकि बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में चरित्र को हर कीमत पर भुना लेते हैं। वे जानते ही नहीं कि यदि चरित्र गिर गया तो फिर आदमी के सारे आदर्श, मूल्य एवं परम्पराएं किस बुनियाद पर टिकी रहेंगी। गिरा हुआ आदमी हो या राष्ट्र रंेगता हुआ चल तो सकता है मगर दौड़ प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकता। हमारा राष्ट्र दुनिया में अव्वल आने की दौड़ में प्रतियोगी है, एक नया और सशक्त भारत को बनाने की बात हो रही है, लेकिन चरित्र बिन सब सून है।


चलो चलें बाढ़ का मजा ले

चलो चलें बाढ़ का मजा ले

16-Sep-2019

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक)

    देश में इन दिनों चहुंओर मानसूनी बारिश खूब बरस रही है। सालों बाद जरूरत के मुताबिक ऐसी बारिश देखने को मिली। हां बरखा से जन व जमीन को सुविधा और दुविधा साथ-साथ हो रही है। आलम कहीं सूखे से राहत तो कहीं बाढ़ की आफत तो कहीं फसल की खुशामत तीनोें हद की हिमाकत पर है। येही तो असली कुदरत का करिश्मा है। जिसे हम मानव अपनी होशियारी व हरकत से हुकूमत समझते आए हैं। नतीजतन पानी-पानी के लिए त्राहिमाम-त्राहिमाम होना हमारी फितरत बन गई है। बकौल गंदगियों से जिंदगियां तबाह, पावन सलिला आचमन होकर सूखे कंठ और जमीं को तृप्त नहीं कर पा रही है। बावजूद सबक लेना तो दूर उसके कारक भी मानव रूपी दानव बे-रोक टोक बनते जा रहे हैं। 

     ये भूलते हुए कि प्रकृति हमारी आने वाली पीढ़ी की अनमोल धरोहर है। उसे संजोए रखने के बजाए नेस्तनाबूत करने में प्राणपण से जुटे हुए हैं। इसीलिए प्रकृति भी अपना हिसाब समय-समय पर पूरा कर देती है। ऐसे में भी जल प्लावन, अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी त्रासदी में हमारी मजे की चाहत हिलौरें मारती नहीं थकती। ऐसा ही मंजर हालिया घरों, सड़कों, नदी, नालों और तालाबों में आई विनाशकारी बाढ में दिखाई पढ़ा। जहां उमड़े जनसैलाब ने चलो, चलें बाढ़ का मजा ले कहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जैसे समुद्र का तट, झील की ठंड़क और वादियों का मनोहारी आबोहवा हो वैसे ही ललक से त्रासदी का मनचाहा लुत्फ उठाने में सिरमौर रहे। 

    वीभत्स! विनाश पर तमाशबीनों ने गजब का तमाशा बनाया। बे-खबर राहगिरों, बीमार और जरूरतमंदों की आवाजाही में अड़ंगा लगाए रखा चाहे रास्ता जलमग्न ही क्यो ना हो? तथा मौके पर राहत में जुटा अमला और सुरक्षा कर्मी मुसीबत में फंसे त्रस्त को छोड़कर मजाकियां ग्रस्त को समझाते, झड़काते तथा हटाते रहने में मजबूर रहा। बावजूद नुक्ता-चिनी और नुराकुश्ति में मशगूल बेदरंगी अपना रौब झाड़ते हुए अपने यारों को दूरभाष यंत्र पर आंखों देखा हाल चित्र और चलचित्र दिखाकर बर्बादी का कहर देखने न्यौता देते रहे। बिना देर गंवाए यारी भी ऐसी निभी की पलक झपकते ही शागिर्दों का रैन बसैरा वाहनों का काफिला लेकर सड़कों पर धमाचौकड़ी मचाते रहा। और तबाही का हर सुख लेते तक टस से मस नहीं हुआ, जब तक पानी खतरे से नीचे नहीं आया।  बद्स्तुर यहां वक्त की दुहाई देते थकने नहीं वाले सरकारी नुमाइंदे, राजनैतिक आकाओं, डाक्टरों और व्यापार जगत के साहूकारों का जमघट बेखौफ, नफे नुकसान बैगर नाश को शान से देखता रहा। बरबस, तसल्ली से प्रफुल्लित मुद्रा में नाते-रिश्तेदारों को महाप्रलय की अजर-अमर खुशखबरी सुनाई। खातिरदारी में फुटकर चना, फल्ली, मक्का, चाय, पान और मंगोड़े इत्यादि बेचने वालों ने मौके का फायदा उठाकर मेहनत की कमाई कर ली।

    काश! इतनी ही शिद्दत, दौलत और मेहनत आपदा व बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए कर दी जाती तो डूबते को तिनके का सहारा हो जाता। कई उजड़े घरों को परछाई, बीमार को दवाई, बच्चों को पढ़ाई, बेरोजगारों को कमाई, किसान को उपज की भरपाई और गरीबों की भलाई हो जाती। लेकिन चंद मुठ्ठी भर सेवादानों और सरकारी मोहकमों के अलावा किसी ने इनकी परवाह तक नहीं की। उलट छोड़ दिया हालातों पर अपने नयन सुख के निहारने के वास्ते मौजदारों ने। गफलतबाजी में कि इस विपदा के वाकई कोई गुनाहगार है तो हम है और हम ही है, जिसका परिणाम आज दूजे तो कल हमें भोगना है। 

      अलबत्ता, बचाव ही उपाय है यह मूल मंत्र हमें  प्रलयकारी मुसीबतों से बचा सकता है। इसके लिए हमें समय रहते कारगर कदम उठाने की जरूरत है। जो हम बेरुखी में सालों से दरकिनार करते आए हैं। प्रतिफलन सूखा, बाढ़ और भूस्खलन आदि दिक्कतें जन-जीवन तथा परि आवरण को आगोश में ले रही हैं। लिहाजा, अब बिना देर गंवाए अवैध उत्खनन-प्रदूषण रोकने, जल-जंगल-जमीन-पशुधन बचाने, वृक्ष बनाने, जैविक खेती को बढ़ावा, कांक्रिट के संजाल से मुक्ति और स्वच्छता के ईमानदारी से ठोस प्रयास करने पड़ेंगे। समेत हर घर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, जल सोख पीड़, पेड़ का मनोपयोग और कमशकम जिला स्तर पर नदी-नाला-तालाबों को जोड़ने की परिकल्पना जल संरक्षण के निहितार्थ साकार करना होगा। तब ही सही मायनों में प्रकृति का विदोहन सजा की जगह मजा की सुखद अनुभूति देंगा। 


 हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक

 


चालान से बचने के लिए शख्स ने इजाद किया नया तरीका, हेलमेट पर चिपका लिए सारे दस्तावेज

चालान से बचने के लिए शख्स ने इजाद किया नया तरीका, हेलमेट पर चिपका लिए सारे दस्तावेज

11-Sep-2019

संशोधित मोटर वाहन कानून के तहत सख्त किए गए यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माने से बचने के लिए गुजरात के एक शख्स ने अनोखा तरीका अपनाया है। गुजरात में वडोदरा के रहने वाले आर शाह ने अपने हेलमेट पर ड्राइविंग लाइसेंस, आरसी, बीमा और अन्य दस्तावेज चिपका लिए हैं।

वडोदरा के रहने वाले आर शाह नाम के इस शख्स का कहना है कि ‘बाइक चलाने से पहले मैं जो सबसे पहला काम करता हूं वो है हेलमेट पहनना, इसलिए मैंने सभी कागजात इस पर चिपका दिए ताकि नए ट्रैफिक नियमों के अनुसार मुझे कोई जुर्माना न भरना पड़े।’ सोशल मीडिया पर भी उनकी चर्चा हो रही है। मोटर व्हीकल एक्ट में हुए बदलाव सुर्खियां बटोर रहे हैं।

भारी जुर्माने की खबरें
पिछले दिनों कई ऐसे मामले आए जिनमें लोगों को भारी जुर्माने का सामना करना पड़ा। यह कानून पूरे देश में एक सितंबर से लागू हो गया है हालांकि कुछ राज्यों ने इन्हें लागू नहीं करने का फैसला किया है। खबरें आ रही हैं कि किस तरह से यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को हजारों का जुर्माना देना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा खबरें हरियाणा और ओडिशा से आई हैं। ऐसे कई राज्य हैं जहां की सरकारों ने कहा है कि वे इस कानून का अध्ययन करने के बाद ही इसे लागू करेंगी। ये राज्य हैं पंजाब, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जबकि गुजरात ने कहा है कि वह आरटीओ से रिपोर्ट मिलने के बाद प्रावधान लागू करेगा हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सभी राज्यों को नए कानून का पालन करना ही होगा।
जुर्माने की रकम कई गुना बढ़ी

ऐसे कई अपराध हैं जिनके लिए जुर्माने की रकम बढ़ा दी गई है। बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने पर पहले पांच सौ रुपये तक जुर्माना था। यह अब 5000 रुपये होगा। ओवरस्पीडिंग के लिए पहले चार सौ रुपये तक जुर्माना था, अब यह हल्के वाहनों के लिए एक से दो हजार रुपये होगा जबकि मध्यम और भारी वाहनों के लिए दो हजार से चार हजार रुपये। खतरनाक ड्राइविंग में पहली बार पकड़े जाने पर छह महीने तक की सजा और एक हजार तक का जुर्माना होता था। इसे अब बढ़ाकर छह महीने से एक साल तक की सजा और एक हजार से पांच हजार रुपये तक का जुर्माना कर दिया गया है।

शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पहली बार पकड़े जाने पर दो हजार तक का जुर्माना या छह महीने तक सजा का प्रावधान था। इसे अब दस हजार रुपये तक का जुर्माना और छह महीने तक की सजा कर दिया गया है। प्रदूषण मुक्त न होने पर पहले एक हजार रुपये तक का जुर्माना था जिसमें अब तीन महीने तक की सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना और तीन महीने के लिए लाइसेंस रद्द करना तक शामिल हो गया है। बिना परमिट के गाड़ी चलाने पर पहले पहली बार पकड़े जाने पर दो से पांच हजार रुपये तक का जुर्माना था। अब छह महीने तक की सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।


हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह

हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह

03-Sep-2019

लेख : ललित गर्ग 

पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, मिशन समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार, हिंदी ब्लिट्ज व नूतन सवेरा के सम्पादक नंदकिशोर नौटियाल अब हमारे बीच नहीं है, सुनकर विश्वास नहीं होता, एक गहरी रिक्तता का अहसास हो रहा है। उनके निधन से राष्ट्र की हिंदी पत्रकारिता के तेजतर्रार, निष्पक्ष एवं राष्ट्रीयता को समर्पित एक युग का अवसान हो गया। वे हिंदी भाषा आंदोलन के एक सक्रिय सेवक एवं आन्दोलनकारी जुझारू व्यक्तित्व थे। लगभग  80 वर्षों के सक्रिय जीवन में उन्होंने न केवल पत्रकारिता के उच्च आदर्शों और मूल्यों के लिए बल्कि अनेक राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में अपने आपको नियोजित किये रखा। उन्होंने संस्कृति एवं संस्कारों को अक्षुण्ण बनाये रखने की चेतना को झंकृत कर उन्हें युग-निर्माण की दिशा में आधार बनाया। उनकी कलम में तोप, टंैंक एवं एटम से भी कई गुणा अधिक ताकत थी और इस ताकत का उपयोग उन्होंने समाज एवं राष्ट्र-निर्माण के निर्माणात्मक कार्यों में किया। 

नंदकिशोर नौटियाल के निधन को पत्रकारिता के एक युग की समाप्ति कहा जा रहा है। क्या यह पत्रकारिता कोे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की श्रृंखला के प्रतीक के रूप में कहा जा रहा है कि इस समाप्ति को पत्रकारिता में शुद्धता की, मूल्यों की, निष्पक्षता की, आदर्श के सामने कद को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा रहा है। नंदकिशोर नौटियाल ने जहां मानव-मूल्यों में आस्था पैदा करके स्वस्थ समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वहीं राजनीति एवं प्रशासन के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अनीति के खिलाफ पत्रकारिता को सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। वह पत्रकारों की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसके लिए पत्रकारिता एक मिशन रही है। इसलिए पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक दायित्व और स्वस्थ राजनीतिक वैचारिकता को उन्होंने पूरे प्राणपण के साथ निभाया। वक्त के चाहे कितने ही तेज झोंके आये हों, कितने ही तूफान उठे हों, लेकिन वह अपने कर्तव्य पथ पर सदा अडिग बने रहे और आगे बढ़ते रहे। वे समाज एवं राष्ट्र में समन्वय, सौहार्द, समरसता एवं एकता के लिये निरन्तर जूझते रहे। सस्ती लोकप्रियता एवं अर्थलोलुपता से हटकर उन्होंने पत्रकारिता के आदर्श मूल्यों को स्थापित किया, जो कभी धूमिल नहीं हो सकते। 

नंदकिशोर नौटियाल भारतीय पत्रकारिता जगत के भीष्म पितामह थे। उन्होंने मुंबई में रहते हुए व ब्लिट्ज का संपादन करते हुए स्वर्गीय आर. के. कंरजिया के साथ पत्रकारिता के नए मानदंड स्थापित किए थे। उन्होंने सारा जीवन सादगीपूर्वक बिताया और उत्तराखंड के गठन के बाद बद्रीनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष के रूप में बद्रीनाथ मंदिर के उद्धार में भी चार चांद लगाए। उन्होंने देश को कई यशस्वी पत्रकारों की एक लंबी कड़ी उपलब्ध कराई। ब्लिटज और नूतन सवेरा के संपादक के रूप में उन्होंने देश को कई ऐसे समाचार दिए जो वर्षों तक खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए चर्चित रहे। 

पं. नंदकिशोर नौटियाल का जन्म 15 जून 1931 को आज के उत्तराखंड राज्य में पौड़ी गढ़वाल जिले के एक छोटे से पहाड़ी गांव में पं॰ ठाकुर प्रसाद नौटियाल के घर हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा गांव में और दिल्ली में हुई। देश-दुनिया के प्रति जागरूक नौटियालजी छात्र जीवन के दिनों में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। दिल्ली की छात्र कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य के तौर पर उन्होंने 1946 में बंगलोर में हुए छात्र कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन में भाग लिया था। 1946 में ही नौसेना विद्रोह के समर्थन में जेल भरो आंदोलन में शिरकत किये थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी जीवनयात्रा 1948 से शुरू हुई। नवभारत साप्ताहिक (मुंबई), दैनिक लोकमान्य (मुंबई) और लोकमत (नागपुर) में कार्य किया। 1951 में दिल्ली प्रेस समूह की सरिता पत्रिका से जुड़े। दिल्ली में मजदूर जनता, हिमालय टाइम्स, नयी कहानियां और हिंदी टाइम्स के लिए कई साल कार्य किया। सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी नौटियालजी ने पत्रकारिता और लेखन को अपना व्यवसाय बनाया। अनेक साप्ताहिक पत्रों और पत्रिकाओं के लिए काम करते हुए 1962 में उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब मुंबई से साप्ताहिक हिंदी ब्लिट्ज निकालने के लिए उसके प्रथम संपादक मुनीश सक्सेना और प्रधान संपादक आर के करंजिया ने उन्हें चुना।

मेरा नौटियालजी से निकट सम्पर्क रहा। ‘अणुव्रत’ के सम्पादक के तौर पर कार्य करते हुए निरन्तर उनसे प्रेरणा एवं प्रोत्साहन मिलता रहा। मेरे आग्रह पर वे अणुव्रत लेखक सम्मेलन में भाग लेने एवं आचार्य तुलसी के दर्शनार्थ मुम्बई से लाडनूं आए। उन्हें पान के साथ जर्दा खाने का नशा था। जैन विश्वभारती के परिसर में मैंने आचार्य तुलसी से मुलाकात से पहले कहा-‘‘अब पान थूक दो।’’ नौटियालजी ने अल्हड़ता से कहा-‘‘क्यों थूक दूं?’’ मुझे पान खाना अच्छा लगता है इसलिए खाता हूं। आचार्यजी पान नहीं खाते तो मैं क्या करूं? जब उन्होंने आचार्य श्री तुलसी के दर्शन किए, उस समय उनके दोनों गाल पान से भरे हुए थे। आचार्यश्री ने अर्थभरी दृष्टि से उनको देखा और पूछा-‘‘इनके लिए पान की व्यवस्था कहां हुई?’’ आचार्यश्री के इस एक प्रश्न से नौटियालजी को भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें आत्मग्लानि हुई और उसी समय सदा के लिए पान खाना छोड़ दिया। उन्होंने बड़े विश्वास से कहा कि यह आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व और उनकी वाणी का जादू था कि मेरा रूपांतरण हो गया। मैं नास्तिक से आस्तिक और व्यसनी से व्यसनमुक्त बन गया। पंजाब समस्या के समाधान का वातावरण निर्मित करने में आचार्य तुलसी की भूमिका ने भी उन्हें बहुत प्रभावित किया और वे राजस्थान के छोटे से ग्राम आमेट में उनका आभार व्यक्त करने आये। 

एक प्रसंग और उद्धरणीय है। एक बार किसी व्यक्ति ने उनसे पूछा-‘‘आप आचार्य तुलसी के बारे में इतना लिखते हैं, अन्य संप्रदाय के आचार्यों के बारे में क्यों नहीं लिखते?’’ नौटियालजी ने कहा-‘‘मैं आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हूं। मैं उनके बारे में अधिक इसलिए लिखता हूं कि वे आदमी को आदमी बनाते हैं और दूसरा कोई आदमी को आदमी बनाने वाला हो तो बताओ, मैं उनके बारे में लिखूंगा।’’ उस सज्जन ने पूछा-‘‘आचार्यश्री ने किसको आदमी बनाया, उनका नाम बताओ, मैं उसे देखना चाहता हूं।’’ नौटियालजी ने उत्साह के साथ कहा-‘‘इसका जीता-जागता उदाहरण मैं हूं। एक समय था, जब मैं शराब पीता था। जर्दा, तंबाकू भी खाता था लेकिन उनकी प्रेरणा से आज मैं इन सब बुराइयों से मुक्त हूं। आचार्य तुलसी ने सचमुच मुझे आदमी बना दिया।’’ इस तरह उनके जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता की गहराई से जुड़े थे और वे उस पर अटल भी रहते किन्तु किसी भी प्रकार की रूढि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वे हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के थे और यह मुक्त स्वरूप् उनके भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप था।

‘ब्लिट्ज’ साप्ताहिक के बन्द हो जाने के बाद 1993 में नौटियालजी ने पूरे जोश-खरोश के साथ ‘नूतन सवेरा’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। ‘नूतन सवेरा’ ने नौटियालजी के कुशल संपादन में शीघ्र ही देश-भर में अपनी पहचान बनायी। ‘नूतन सवेरा’ ने मानवीय मूल्यों, भारतीय संस्कृति तथा जनपक्षीय पत्रकारिता की हिंदी ‘ब्लिट्ज’ की पंरपरा को आगे बढ़ाने में भारी योगदान किया है। राष्ट्रहित के मुद्दों पर नौटियालजी की दो टूक टिप्पणियों के बारे में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। ‘नूतन सवेरा’ के माध्यम से वह राष्ट्रभाषा हिंदी की अस्मिता के लिए तन-मन-धन से संघर्षरत थे। राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई के उपाध्यक्ष की हैसियत से भारत में पहली बार महासंघ के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बंबई हाई कोर्ट में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किये जाने की याचिका दायर की है जो लंबित है। पत्रकारिता के अलावा नौटियालजी प्रगतिशील राजनीति और समाजसेवा के क्षेत्र में भी बदस्तूर सक्रिय थे। वह महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के स्थापनाकाल से ही सदस्य रहे और इस समय इसके कार्याध्यक्ष हैं। 

उनके कार्यकाल में पहली बार 2002 में पुणे में अकादमी ने भव्य अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगम आयोजित किया तथा पहली बार 2008 में मुंबई, 2009 में नागपुर तथा नांदेड़ में सर्वभारतीय भाषा सम्मेलन संपन्न किया जिसमें 22 भाषाओं के विद्वानों ने भाग लिया। साहित्यिक और पत्रकारिता प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य के तौर पर नौटियालजी ने अमरीका, कनाडा, उत्तर कोरिया, लीबिया, इटली, रूस, फिनलैंड, नेपाल, सूरीनाम आदि देशों की यात्रा कर हिन्दी को दुनिया में प्रतिष्ठापित करने की दिशा में अनूठा उपक्रम किया। उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। नौटियालजी को हिंदी साहित्य सम्मेलन का साहित्य वाचस्पति सम्मान, आचार्य तुलसी सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पत्रकार भूषण सम्मान, शास्त्री नेशनल अवार्ड, लोहिया मधुलिमये सम्मान समेत रोटरी, लायंस आदि अनेक राष्ट्रीय स्तर के सम्मान प्राप्त हुए। उनके निधन पर हम भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। प्रेषकः


क्यों असुरक्षित है भारत के बच्चें?

क्यों असुरक्षित है भारत के बच्चें?

22-Aug-2019

लेख : ललित गर्ग (lalitgarg11@gmail.com)

चंडीगढ़ में एक पीजी में रहने वाली दो बहनों की हत्या ने न केवल शहर को बल्कि समूचे राष्ट्र को दहला दिया है। इस खौफनाक एवं त्रासद घटना ने रेखांकित किया है कि अपराधी किसी कानूनी कार्रवाई और पुलिस के भय के बिना अपनी मनमानी एवं अपराधी मानसिकता को अंजाम दे रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि आज हमारे समाज में बात सिर्फ बच्चियों अथवा महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की नहीं है, बात इस बदलते परिवेश में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों की भी है। हमारे बच्चें आज सुरक्षित नहीं है। 

बच्चे देश का भविष्य होते हैं लेकिन जब बच्चे ही खतरे में हो तो आप खुद सोच सकते है कि उस देश का आने वाला भविष्य कैसा होगा? उस देश का भविष्य अंधकार में ही होगा जहां बच्चों पर भी रहम नहीं किया जाता, उन पर अपराध किये जाते हैं । एक सर्वे के अनुसार भारत जैसे विकासशील देश में हर 15 मिनट में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। बात केवल यौन शोषण की ही नहीं बल्कि हिंसा, उत्पीड़न एवं बाल-श्रम की भी है। ये बेहद ही शर्मसार करने वाली बात है कि हम अपने बच्चों तक को सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं, उनके बचपन को डरावना एवं त्रासद बना रहे हैं। 

भारतीय समाज में बच्चों के खिलाफ अपराध की दर दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि 2016 में पोक्सो ऐक्ट के तहत छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार के 64138 मामले दर्ज हुए थे। देशभर में बच्चों के खिलाफ कुल अपराध के मामलों में 13.5 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई है। इसका कारण है कि वर्तमान समय में नगरीकरण तथा औद्योगिकरण की प्रक्रिया ने एक ऐसे वातावरण का सृजन किया है जिसमें अधिकांश परिवार बच्चों को सुरक्षित परिवेश देने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। चंडीगढ़ की घटना के संबंध में जो ब्योरे सामने आए हैं, उनसे साफ है कि हत्यारे के भीतर शायद किसी का भय नहीं था। खबरों के मुताबिक अपराधी युवक पांच बजे के आसपास उस मकान में घुसा और चाकू या धारदार हथियार से दोनों बहनों की हत्या करके आराम से निकल गया। घटनास्थल की जांच से पता चला है कि युवक के हमले का दोनों बहनों ने अंतिम दम तक सामना किया, लेकिन जान बचाने में नाकाम रही। 

पुलिस हर वक्त सभी जगहों पर मौजूद नहीं रह सकती है। लेकिन अगर पुलिस महकमे के कामकाज की शैली ऐसी हो, जिसमें हर मामले में तुरंत कार्रवाई और सख्ती साफ दिखे तो अपराधियों के भीतर एक खौफ काम करेगा और किसी अपराध को अंजाम देने से पहले वे उसके नतीजों पर सोचेंगे। लेकिन विडम्बना है कि हमारे देश में पुलिस एवं अपराधियों की मिलीभगत से कारण पुलिस के लिये जैसा खौफ एवं डर होना चाहिए, वह नहीं है। ऐसी स्थिति में समाज को जागरूक होने की ज्यादा जरूरत है, हमें क्या की मानसिकता एवं संस्कृति के कारण भी ऐसे अपराध बढ़ रहे हैं। क्या अपने स्तर पर भी बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराधों को लेकर जागरूकता, सावधानी और आस-पड़ोस को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत नहीं है?

चंडीगढ़ की घटना ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं। जिस कमरे में दो बहनों की हत्या हुई, क्या उस दौरान आसपास कोई और नहीं था? अगर उस इमारत का इस्तेमाल पीजी यानी पेइंग गेस्ट को रखने के तौर पर भी किया जाता था उसमें रहने वालों और खासतौर पर अकेले रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए थे? सुबह पंाच बजे दोनों बहनों के कमरों में दाखिल होने और हत्या करके आराम से भाग जाने के स्थितियों के लिए क्या वहां सुरक्षा गार्ड का नहीं होना जिम्मेदार नहीं है? हालांकि इस सबसे पुलिस की जवाबदेही कम नहीं हो जाती।

जैसाकि राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरों के आंकड़े बता चुके हैं कि दिल्ली और अंडमान के बाद बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध चंडीगढ़ में होते हैं। इसके अलावा, महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी और इस मामले में चंडीगढ़ ग्यारहवें स्थान पर था। अपहरण, लूट और झपटमारी की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। सवाल है कि अगर वहां कानून-व्यवस्था और पुलिस का तंत्र अपना काम ठीक से कर रहा है तो अपराधों के मामले में यह चिंताजनक तस्वीर क्यों है? ऐसे में अपराधी प्रवृत्ति के किसी व्यक्ति ने दोनों बहनों की हत्या कर दी और फरार हो गया तो यह समूचे पुलिस तंत्र की नाकामी है।

बच्चों के साथ हो रहे अपराधों के खिलाफ लगातार केंद्र सरकार सख्त कदम उठा रही है, नये-नये कानून भी बन रहे हैं, लेेकिन प्रश्न है कि कानून बनाने से ही क्या समस्या का समाधान संभव है? अगर ऐसा है तो कानून तो बहुत बन गये और सख्त भी बन गये, फिर क्यों अपराध बढ़ रहे हैं? हमें इस समस्या की जड़ तक जाना होगा, अपराध की मानसिकता क्यों पनप रही है, इसके कारणों का पता लगाना होगा। यह जरूरी हो जाता है कि किसी व्यक्ति के अपराधी व्यवहार के पीछे कारणों पर गहनता से विचार किया जाए। 

हमें स्वयं भी जागरूक होना होगा, पुलिस की निर्भरता से बच्चों के प्रति हो रहे अपराधों पर काबू नहीं पाया जा सकता। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘वल्र्ड विजन इंडिया’ ने भारत में 45,844 के बीच एक सर्वेक्षण किया जिसमें खुलासा हुआ कि हर दूसरा बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार हुआ है। हर पांच में से एक बच्चा यौन उत्पीड़न के खौफ से खुद को असुरक्षित महसूस करता है। हर चार में से एक परिवार ने बच्चे के साथ हुए यौन शोषण की शिकायत तक नहीं की। पीड़ितों में लड़के-लड़कियों की संख्या करीब-करीब बराबर बताई गई है। बच्चो के साथ दुव्र्यवहार और हिंसा अब इस देश में बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा है। औद्योगिकीकरण, उदारीकरण, अंतरराज्यीय और ग्रामीण और शहर से पलायन, आर्थिक गरीबी, परिवार का टूटना इत्यादि की वजह से भी बच्चे अपराध का शिकार बन रहे हैं। इन स्थितियों एवं घटनाओं से बच्चों में भय एवं असुरक्षा का भाव घर कर रही है। भय से अधिक खतरनाक कुछ भी नहीं। सोचिए आज हमारे बच्चे उसी खौफ के साथ जी रहे हैं और कहीं ना कहीं ये खौफ उन्हें खोखला कर रहा है। केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय की राष्ट्रीय उत्पीडन रिपोर्ट 2007 के अनुसार भारत में हर तीन में से एक बच्चा शारीरिक हिंसा का शिकार होता है जिसमे 73 फीसदी लड़के और 65 फीसदी लड़कियां है।

भारत में बच्चों की संख्या 47 करोड़ से अधिक है, जो दुनिया के अन्य किसी भी देश में बच्चों की तुलना में सबसे ज्यादा है। यह दुःख की बात है की इनमें से अनेक बच्चे सामाजिक-आर्थिक तथा ऐतिहासिक कारणों से अनेक प्रकार के अभावों से ग्रस्त है और ये भेदभाव, उपेक्षा, और शोषण के सहज शिकार हो जाते है। इनमंे से बहुत से बच्चांे के मातापिता के पास आजीविका के बहुत कम साधन है और जिसके चलते इन बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में कई बार माता-पिता को बच्चों को छोड़कर काम पर जाना पड़ता है ऐसे में बच्चे देखभाल के अभाव में हिंसा, उपेक्षा और शोषण के शिकार हो जाते है। सभी बच्चों को सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने के लिए सुरक्षित माहौल मिले एवं यह सुनिश्चित हो कि सभी बच्चे स्कूल जायें, बच्चों के लिए बनाये गए कानूनों पर अमल ठीक तरह से हो, नीति निर्धारक बच्चों के मुद्दों को प्राथमिकता दें। परन्तु दुखद यह है कि ऐसा न होने की वजह से बच्चों के ऊपर होने वाले अपराध के आंकड़ों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।


युवा पुरुषार्थ के नये छंद रचें

युवा पुरुषार्थ के नये छंद रचें

10-Aug-2019

- ललित गर्ग -

युवा क्रांति का प्रतीक है, ऊर्जा का स्रोत है, इस क्रांति एवं ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक एवं सृजनात्मक हो, इसी ध्येय से सारी दुनिया प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाती है। सन् 2000 में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरम्भ किया गया था। यह दिवस मनाने का मतलब है कि युवाशक्ति का उपयोग विध्वंस में न होकर निर्माण में हो। पूरी दुनिया की सरकारें युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। न केवल सरकारें बल्कि आम-जनजीवन में भी युवकोें की स्थिति, उनके सपने, उनका जीवन लक्ष्य आदि पर चर्चाएं हो। युवाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इन्हीं मूलभूत बातों को लेकर यह दिवस मनाया जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के नवनिर्माण के लिये मात्र सौ युवकों की अपेक्षा की थी। क्योंकि वे जानते थे कि युवा ‘विजनरी’ होते हैं और उनका विजन दूरगामी एवं बुनियादी होता है। उनमें नव निर्माण करने की क्षमता होती है। नया भारत निर्मित करते हुए नरेन्द्र मोदी को भी युवाशक्ति को आगे लाना होगा। 
युवा किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य हैं। वो देश की नींव हैं, जिस पर देश की प्रगति और विकास निर्भर करता है। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहाँ नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए जरूरी आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रछन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं। इन स्थितियों के बावजूद युवाओें को एक उन्नत एवं आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। युवा सपनों को आकार देने का अर्थ है सम्पूर्ण मानव जाति के उन्नत भविष्य का निर्माण। यह सच है कि हर दिन के साथ जीवन का एक नया लिफाफा खुलता है, नए अस्तित्व के साथ, नए अर्थ की शुरूआत के साथ, नयी जीवन दिशाओं के साथ। हर नई आंख देखती है इस संसार को अपनी ताजगी भरी नजरों से। इनमें जो सपने उगते हैं इन्हीं में नये समाज की, नयी आदमी की नींव रखी जाती है।


यौवन को प्राप्त करना जीवन का सौभाग्य है। जीने की तीन अवस्थाएं बचपन, यौवन एवं बुढ़ापा हैं, सभी युवावस्था के दौर से गुजरते हैं, लेकिन जिनमें युवकत्व नहीं होता, उनका यौवन व्यर्थ है। उनके निस्तेज चेहरे, चेतना-शून्य उच्छ्वास एवं निराश सोच मात्र ही उस यौवन की साक्षी बनते हैं, जिसके कारण न तो वे अपने लिये कुछ कर पाते हैं और न समाज एवं राष्ट्र को ही कुछ दे पाते हैं। वे इतना सतही जीवन जीते हैं कि व्यक्तिगत स्पद्र्धाओं एवं महत्वाकांक्षाओं में उलझकर अपने ध्येय को विस्मृत कर देते हैं। उनका यौवन कार्यकारी तो होता ही नहीं, खतरनाक प्रमाणित हो जाता है। युवाशक्ति जितनी विराट् और उपयोगी है, उतनी ही खतरनाक भी है। इस परिप्रेक्ष्य में युवाशक्ति का रचनात्मक एवं सृजनात्मक उपयोग करने की जरूरत है।
गांधीजी से एक बार पूछा गया कि उनके मन की आश्वस्ति और निराशा का आधार क्या है? गांधीजी बोले- ’इस देश की मिट्टी में अध्यात्म के कण हैं, यह मेरे लिये सबसे बड़ा आश्वासन है। पर इस देश की युवापीढ़ी के मन में करुणा का स्रोत सूख रहा है, यह सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है।’ गांधीजी की यह चिन्ता सार्थक थी। क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उसकी युवापीढ़ी होती है। यह जितनी जागरूक, तेजस्वी, प्रकाशवान, चरित्रनिष्ठ और सक्षम होगी, भविष्य उतना ही समुज्ज्वल और गतिशील होगा। युवापीढ़ी के सामने दो रास्ते हैं- एक रास्ता है निर्माण का दूसरा रास्ता है ध्वंस का। जहां तक ध्वंस का प्रश्न है, उसे सिखाने की जरूरत नहीं है। अनपढ़, अशिक्षित और अक्षम युवा भी ध्वंस कर सकता है। वास्तव में देखा जाए तो ध्वंस क्रिया नहीं, प्रतिक्रिया है। उपेक्षित, आहत, प्रताड़ित और महत्वाकांक्षी व्यक्ति खुले रूप में ध्वंस के मैदान में उतर जाता है। उसके लिए न योजना बनाने की जरूरत है और न सामग्री जुटाने की। योजनाबद्ध रूप में भी ध्वंस किया जाता है, पर वह ध्वंस के लिए अपरिहार्यता नहीं है। युवापीढ़ी से समाज और देश को बहुत अपेक्षाएं हैं। शरीर पर जितने रोम होते हैं, उनसे भी अधिक उम्मीदें इस पीढ़ी से की जा सकती हैं। उन्हें पूरा करने के लिए युवकों की इच्छाशक्ति संकल्पशक्ति का जागरण करना होगा। घनीभूत इच्छाशक्ति एवं मजबूत संकल्पशक्ति से रास्ते के सारे अवरोध दूर हो जाते हैं और व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंच जाता है।
मूल प्रश्न है कि क्या हमारे आज के नौजवान भारत को एक सक्षम देश बनाने का स्वप्न देखते हैं? या कि हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से जन्मी आत्मकेन्द्रित पीढ़ी है? दोनों में से सच क्या है? दरअसल हमारी युवा पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं है, वह रोज यथार्थ से जूझती है, उसके सामने भ्रष्टाचार, आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप, महंगी होती जाती शिक्षा, कैरियर की चुनौती और उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को कुचलने की राजनीति विसंगतियां जैसी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी हैं। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी है। इन जटिल स्थितियों से लौहा लेने की ताकत युवक में ही हैं। क्योंकि युवक शब्द क्रांति का प्रतीक है। 
विचारों के नभ पर कल्पना के इन्द्रधनुष टांगने मात्र से कुछ होने वाला नहीं है, बेहतर जिंदगी जीने के लिए मनुष्य को संघर्ष आमंत्रित करना होगा। वह संघर्ष होगा विश्व के सार्वभौम मूल्यों और मानदंडों को बदलने के लिए। सत्ता, संपदा, धर्म और जाति के आधार पर मनुष्य का जो मूल्यांकन हो रहा है मानव जाति के हित में नहीं है। दूसरा भी तो कोई पैमाना होगा, मनुष्य के अंकन का, पर उसे काम में नहीं लिया जा रहा है। क्योंकि उसमें अहं को पोषण देने की सुविधा नहीं है। क्योंकि वह रास्ता जोखिम भरा है। क्योंकि उस रास्तें में व्यक्तिगत स्वार्थ और व्यामोह की सुरक्षा नहीं है। युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि संघर्ष को आमंत्रित करे, मूल्यांकन का पैमाना बदले, अहं को तोड़े, जोखिम का स्वागत करे, स्वार्थ और व्यामोह से ऊपर उठे। 
युवा दिवस मनाने का मतलब है-एक दिन युवकों के नाम। इस दिन पूरे विश्व में युवापीढ़ी के संदर्भ में चर्चा होगी, उसके हृास और विकास पर चिंतन होगा, उसकी समस्याओं पर विचार होगा और ऐसे रास्ते खोजे जायेंगे, जो इस पीढ़ी को एक सुंदर भविष्य दे सकें। इसका सबसे पहला लाभ तो यही है कि संसार भर में एक वातावरण बन रहा है युवापीढ़ी को अधिक सक्षम और तेजस्वी बनाने के लिए। युवकों से संबंधित संस्थाओं को सचेत और सावधान करना होगा और कोई ऐसा सकारात्मक कार्यक्रम हाथ में लेना होगा, जिसमें निर्माण की प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहे। विशेषतः राजनीति में युवकों की सकारात्मक एवं सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा। 
अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइविंग द फ्यूचर’ में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है ‘मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।’ उनको यह इसलिये कहना पड़ा क्योंकि जो जोश उनमें भरा जाता है, यौवन के परिपक्व होते ही उन चीजों को भावुकता या जवानी का जोश कहकर भूलने लगते हैं। वे नीति विरोधी काम करने लगते है, गलत और विध्वंसकारी दिशाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिये युवकों के लिये जरूरी है कि वे जोश के साथ होश कायम रखे। वे अगर ऐसा कर सके तो भविष्य उनके हाथों संवर सकता है। इसीलिये सुकरात को भी नवयुवकों पर पूरा भरोसा था। वे जानते थे कि नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है। एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता रखता था। आज की युवापीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे स्वामी विवेकानन्द और सुकरात जैसे लोग दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है।’’ महादेवी वर्मा ने भी कहा है ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’ इसीलिये युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि वह युवा दिवस पर कोई ऐसी क्रांति घटित करे, जिससे युवकों की जीवनशैली में रचनात्मक परिवर्तन आ सके, हिंसा-आतंक-विध्वंस की राह को छोड़कर वे निर्माण की नयी पगडंडियों पर अग्रसर हो सके।  

प्रेषकः
 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


भोजपुरी भाषा के उपासक डॉ शयाम दत्त पाण्डे जिन्हें दिलदार नगर के लोगों ने भुला दिया !

भोजपुरी भाषा के उपासक डॉ शयाम दत्त पाण्डे जिन्हें दिलदार नगर के लोगों ने भुला दिया !

08-Aug-2019

डॉ श्याम दत्त पाण्डेय
जस नाम तस गुण।डॉ श्याम दत्त पाण्डे जी का आकर्षक बलिष्ट खूबसूरत व लम्बे कद काठी के व्यक्ति थे। इनकी छवि इनके नाम को सुशोभित करती थीं ये अच्छे पहलवान(कुश्ती लड़ने) तथा क्रिकेट व वालीबाल खिलाड़ी होने के साथ साथ एक मधुर गायक और अच्छे बाँसुरी वादक भी थे ।एक तरह से लोक कलाओं के प्रेमी और संरक्षक थे ।

आपकी प्रारम्भिक शिक्षा इनके जन्म स्थान गाज़ीपुर जनपद के ब्रम्हनौलिया ग्राम में हुई जो कि दिलदार नगर थाने के अन्तर्गत है छठवी से दसवीं तक कि शिक्षा भभुआ हाई स्कूल(बिहार)में हुई तथा बारहवीं की शिक्षा वारणसी के BHU में जीव विज्ञान संकाय में प्राप्त की ।इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पटना मेडिकल कॉलेज में MBBS के लिए आवेदन किया लेकिन40 सीट होने की वजह से दाखिला नहीं हो सका इसके बाद इन्होंने इसके बाद उन्होंने दरभंगा मेडिकल कॉलेज में एल एम पी की डिग्री हासिल की और सरकारी नौकरी के पलामू जिला झारखंड के रांका स्टेट में बतौर तैनात हुए।

सन 1948 से 1951 तक पालमु मे बतौर डॉ सेवारत रहे ।उस समय पालमु गढ़वा जिला अति पिछड़ा ,और वहाँ की जनता आर्थिक दृष्टि से कमजोर थीं ,वहां के लोगों की आपने खूब सेवा की ,उनकी सेवा भावना से वहाँ की जनता उन्हें मसीहा मानती थी, समूचे पालमु छेत्र उनकी बड़ी ख्याति फ़ैली हुई थी, ईसी बीच आपका तबादला नेतरहाट हो गया, वहाँ पर भी अपने सेवा भाव से खूब ख्यातिप्राप्त की ।
नेतरहाट में रहते हुए इनके बाबा श्री मनवहाल पाण्डेय रिटायर्ड हेड मास्टर उम्र 86 वर्ष का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था जिनकी सेवा करने आपने नेतरहाट को और नौकरी को अलविदा कर दिया और अपने बाबा की सेवा के साथ साथ वहाँ की जनता की भी सेवा करने लग गए जिसे वहाँ की जनता आज भी याद करती हैं।
दिलदारनगर में उन्होंने अपनी स्वयं की क्लीनिक खोलकर वहां के लोगों की सेवा भवना से चिकित्सा करने लगे ,बहु आयामी प्रतिभा के धनी डॉ साहब दिलदारनगर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में धोबिनाच कव्वाली कवि सम्मेलन आयोजित कर सहयोग करते थे ।
सन1957 टाऊन क्लब दिलदारनगर बनने के बाद उसके आजीवन अध्यक्ष रहे, और स्वयं के व्यय पर भोजपुरी गीत संगीत साहित्यिक कृतियों के आयोजन में सहयोग करते रहे।गंगा जमुना तहज़ीब को बनाये

रखने डॉ साहब जाति प्रथा छुवा - छुत  भेदभाव की सख़्त ख़िलाफ़त करते रहे। 
दिलदारनगर गर्ल्स इंटर कॉलेज इनकी सोच का ही परिणाम था, जो उस छेत्र के लिये उस समय बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
उनका आकर्षण ऐसा था अध्यापक गण चाहे वो राजपूत मुस्लिम इण्टर कॉलेज के हो या आदर्श विद्यालय के खिंचे चले आते थे ।
आपके अच्छे मित्रों में स्व. सरयू पाण्डे ,के एल रॉय पूर्व स्वास्थ्य मंत्री स्व हैदर अलीखो , प्रधान अध्यापक मुस्लिम राजपूत इण्टर कॉलेज वाईस प्रिंसीपल श्री शर्मा, श्री उपाध्याय प्रिंसीपल आदर्श विद्यालय ,केसरी मास्टर ,स्व नाज़िर हुसैन भोजपुरी फ़िल्मों के भीष्मपितामह ,स्व. हाज़ी अहमद अली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उसिया छेत्र के सभी ग्राम प्रधान दिलदारनगर के सभी प्रमुख जन उन्हें बड़े आदर के साथ याद करते रहे है।

उनके व्यक्तित्व की खासियत ये थी कि मरीज़ों की सेवा में हमेशा अपने किटबैग के साथ तैयार रहते और पैदल ही पहुँच जाते और घूंघट में रहती महिलाओं का सीमित साधनों के साथ बड़े आदर से चिकित्सा करते थे।
1 रुपिया फीस लेने वाले डॉ पाण्डे का कहना था की मैंने गरीब परिवार में जन्म लिया है ,ग़रीबो के लिए मेरा जीवन समर्पित हैं।और उन्होंने जीवनपर्यन्त गरीबों की सेवा की है,
उनके परिवार जनों से और दिलदारनगर के निवासियों से उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तब मानी जायेगी जब उनके जन्म दिवस के अवसर पर 
1. स्वास्थ शिविर लगा कर गरीबों का मुफ़्त इलाज हो 
2.पाण्डे जी की स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो 
3.उनके नाम पर उनके गृह ग्राम में स्मारक /स्कूल/ चिकित्सालय /बनाया जाय
एम. डब्ल्यू. अन्सारी, आई.पी.एस. से.नि. डी.जी. 


तेजाब से सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि आत्मा भी जलने लगती है

तेजाब से सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि आत्मा भी जलने लगती है

26-Jul-2019

सैय्यद एम अली तक़वी, निदेशक, यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ

किसी इंसान को मौत के घाट उतार देने से उसकी पूरी जिंदगी खत्म की जा सकती है, उसका हाथ पांव काट देने से उसको अपंग किया जा सकता है किसी भी तरह की जिस्मानी तकलीफ़ देकर परेशान किया जा सकता है लेकिन अगर किसी पर तेजाब डाल दिया जाए तो वह इंसान ना मर पाता है ना ही जी पाता है। ऐसी हो जाती है जिंदगी। तेजाब से बदसूरत हुई जिंदगी को हमारा समाज सर उठाकर जीने की इजाजत भी नहीं देता है। यह हमारे समाज की कड़वी और सच्ची तस्वीर है। तेजाब से सिर्फ चेहरा नहीं बल्कि इंसान की आत्मा भी जलने लगती है ।

पूरी दुनिया में लड़कियों और औरतों पर एसिड अटैक जैसी घिनौनी और भयानक वारदातों के साथ एक बहुत बड़ा सवाल कानून व्यवस्था के साथ साथ बाजार का भी जुड़ा हुआ है। किसी भी पीड़ित के मन में ये सवाल पैदा होना लाज़िमी है कि क्या तेज़ाब जैसी संवेदनशील वस्तु की बिक्री और उपलब्धता बाजार में अन्य सामानों की तरह होनी चाहिए? इसका जवाब और व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों की अनदेखी और बाजार में आसानी से तेज़ाब की उपलब्धता भी ऐसी घटनाओं के रोकथाम में सबसे पहले आड़े आ रही है। बल्कि शायद यही सबसे बड़ा कारण है।

आइए पहले, रूह कंपा देनी वाले ऐसे जघन्य अपराध पर कवयित्री इंदु रिंकी वर्मा की कुछ पंक्तियों पर नजर डालते हैं।

वह लिखती हैं- 

'शरीर ही तो झुलसा है, रूह में जान अब भी बाकी है,  हिम्मत से लड़ूंगी ज़िन्दगी की लड़ाई, आत्मसम्मान मेरा अब भी बाकी है, 
मिटाई है लाली होठों की मेरी, पर होठों की मुस्कान अब भी बाकी है, 
काली हूं मैं, मैं दुर्गा भी हूं, हौसलों में उड़ान अब भी बाकी है, बदसूरत बनाया मुझको तो तूने, बदसीरत है तू ये बात भी सांची है, जलेगा सवालों से पल पल तू मेरे, हर सवाल में तेज़ाब अब भी बाकी है।' 

यह चंद लाइनें तेज़ाब पीड़ित लड़कियों का दुख-दर्द शिद्दत से महसूस करा जाती है।  महिलाओं पर अत्याचार, शोषण, क़त्ले आम ये सब बहुत छोटे से शब्द नज़र आते हैं, एक तेज़ाब की शिकार महिला के दर्द के आगे। महिलाओं को जिस्मानी और दीमागी तकलीफें देना आज के बेबस और कुंठित आदमी के लिए कोई नयी बात नहीं है।
पुरुषवादी मानसिकता ने हज़ारों सालों तक महिलाओं का मन मुताबिक इस्तेमाल किया और जब मन भर गया तो किसी बेकार  वस्तु समझकर फेंक दिया।

इतिहास गवाह है कि एक लंबे शोषण काल के बाद 18वीं सदी के आते-आते दूसरे देशों में महिलाओं की आज़ादी की आवाजें बुलंद होना शुरू हुईं। 19वीं और 20वीं शताब्दी ने महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को और तेजी दी और 21वीं सदी के आते-आते महिलाओं के लिए बहुत कुछ बदला पर नहीं बदली तो कुंठित सभ्यता की विचारधारा।

सैकड़ों सालों से जहां महिलाएं अपने अधिकारों के लिए और अपने वजूद के लिए लड़ाई लड़ रही थीं और सफलता अर्जित कर रहीं थी तो वहीं ये पुरुषवादी सभ्यता, महिलाओं को तकलीफ देने का नये नये तरीके खोजती रहती है। ये गंदी सोच ऐसे तरीकों की तलाश में थी जो बहुत आसानी से  मिल जाए और तरीका इतना घातक हो की महिला की आत्मा तक कांप जाए। शायद इसी गंदी सोच और मानसिकता वाले लोगों ने तेज़ाब को माध्यम बनाया।

कानून की कमियों के कारण आज महिलाएं बग़ैर किसी दोष के भी भुगत रहीं हैं और हमारी सभ्यता इस जर्जर एवं निरर्थक व्यवस्था का मज़ाक उड़ा रही है।  एसिड अटैक की खबरें हर अखबार,चैनल, न्यूज़ पोर्टल, सोशल मीडिया आदि पर देखने को मिल जाएंगी।  चर्चा और सेमिनार भी देखने सुनने को मिल जाएंगे पर ये चर्चा किसी नतीजे पर पहुंचे बिना ही समाप्त हो जाती हैं। इसका परिणाम कुछ नहीं निकलता है। एसिड अटैक पर लिखकर, टीवी प्रोग्राम करके सिर्फ टीआरपी और स्पोंसरशिप बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा है, क्योंकि अगले दिन फिर एसिड अटैक से पीड़ित महिला अपना इलाज कराने के लिए जूझ रही होती हैं, कहीं कोई महिला शिकार बन रही होती है तो कहीं दुनिया को अलविदा कह रही होती है।

हम महिलाओं के साथ किस तरह बर्ताव करें इसमें बहुत सी समस्याएं हैं। लोगों की संवेदनाएं जगाने की जरूरत है वो इस अपराध और इससे होने वाली तकलीफ को लेकर उदासीन हैं, यह किसी इंसान(पीड़ित महिला) की पूरी जिंदगी तबाह कर देता है।  सरकार जांच कमेटी बनाकर, बयान देकर अपने आप को बरी कर लेती है और फिर एक बार समाज अपने ढर्रे पर लौट आता हैं। सामाजिक कार्यकर्ता धरने प्रदर्शन और टीवी की चर्चा में शामिल होकर चादर तान कर चैन से सो जाते हैं और देश में एसिड अटैक होते रहते हैं। यही रेप केस में भी हो रहा है।एसिड अटैक की वजह से ना जाने कितनी लड़कियों और महिलाओं की जान जा चुकी है, ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी है और आज बद से बदतर हालात में अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं।

 भारत में हर साल करीब 500 लोगों पर एसिड अटैक होता है, वहीं दुनियाभर में यह आंकड़ा 1500 के आसपास है। इसमें महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। प्यार में असफलता, छेड़खानी, दहेज और जमीन विवाद में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की माने तो यूपी, एमपी और दिल्ली में ऐसी घटनाओं का ग्राफ सबसे उपर है जो चिंताजनक है। साल 2014 में केवल यूपी में ही एसिड अटैक के 185 केस दर्ज किए गए थे।

देश में बढ़ती इन घटनाओं को देखते हुए सन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्‍य सरकारों को जमकर फटकार लगाई थी। इसके साथ ही यह निर्देशित किया था कि एसिड अटैक से पीडि़तों के इलाज और पुनर्वास की पूरी जिम्‍मेदारी राज्‍य सरकार की होगी। लेकिन परिणाम क्या हुआ? वही ढाक के तीन पात। यह एक ऐसा प्रकरण है जिस पर न्यायपालिका और सरकार को सख्त क़ानून बनाने चाहिए जो इस देश के साथ साथ दुनिया के लिए एक मिसाल के रूप में सामने आए साथ ही शिकार महिला को सुरक्षा और सुविधाएं मुहैय्या कराई जाएं । 

मुफ्त इलाज के साथ सरकारी नौकरी और सामजिक सुरक्षा के लिए इंतेज़ाम करना चाहिए ताकि एसिड अटैक की पीड़ित को कहीं से कुछ तो राहत मिल सके। एसिड अटैक को लेकर कानून को सख्त बनाने के लिए आईपीसी की धारा 326 में कुछ बदलाव किया गया। बदलाव के बाद 326 Aऔर 326 B अस्तित्व में आया. आईपीसी की धारा 326 a में तेजाब फेंकने का अपराध गैर जमानती होगा। दोषी को कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है साथ ही साथ दोषी पर उचित जुर्माना भी होगा और जुर्माने की रकम पीड़िता को दिया जाएगा। धारा 326 B के मुताबिक तेजाब फेंकने का अपराध गैर जमानती है। इसके लिए दोषी को कम से कम पांच साल तक की सजा हो सकती है और दोषी को जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

अपराध पर सिर्फ नियम और कानून से रोक नहीं लगाई जा सकती है बल्कि हमें लोगों की सोच बदलने की जरूरत है। लोगों को समझना चाहिए कि आप इतनी आसानी से किसी महिला का चेहरा नहीं बिगाड़ सकते हैं। अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो आप किसी महिला के साथ ऐसा बुरा व्यवहार नहीं कर सकते। इस तरह की शिक्षा को बढ़ावा देने की जरूरत है, स्कूल, कालेज, सोशल मीडिया, रैली इन सबके जरिए लोगो को समझाना हमारा पहला लक्ष्य होना चाहिए। हम चाहते हैं कि एसिड हमले के शिकार लोग भी यह महसूस करें कि अभी जिंदगी में बहुत कुछ बचा हुआ है। जिंदगी खत्म नहीं हुई है वो बाहर आएं और खुद को उतना ही आत्मविश्वास से भरा महसूस करें जितना हमले के पहले करते थे।

 


आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए

आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए

25-Jul-2019

लेख : डॉ नीलम महेंद्र 

नारी, स्त्री, महिला वनिता,चाहे जिस नाम से पुकारो नारी तो एक ही है। ईश्वर की वो रचना जिसे उसने सृजन की शक्ति दी है, ईश्वर की वो कल्पना जिसमें प्रेम त्याग सहनशीलता सेवा और करुणा जैसे भावों  से भरा ह्रदय  है। जो  शरीर से भले ही कोमल हो लेकिन इरादों से फौलाद है। जो अपने जीवन में अनेक किरदारों को सफलतापूर्वक जीती है। वो माँ के रूप में पूजनीय  है, बहन के रूप में सबसे खूबसूरत दोस्त है बेटी के रूप में घर की रौनक है, बहु के रूप में घर की लक्ष्मी है  और पत्नी के रूप में जीवन की हमसफर।

पहले नारी का स्थान घर की चारदीवारी तक सीमित था लेकिन आज वो हर सीमा को चुनौती दे रही है। चाहे राजनीति का क्षेत्र हो चाहे सामाजिक, चाहे हमारी सेनाएँ हों चाहे कारपोरेट जगत, आज की नारी  हर क्षेत्र में सफलता पूर्वक दस्तक देते हुए देश की तरक्की में अपना योगदान दे रही है।

समय के साथ नारी ने परिवार और समाज में अपनी भूमिका के बदलाव को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है अपनी इच्छा शक्ति के बल पर सफल भी हुई लेकिन आज वो एक अनोखी दुविधा से गुजर रही है। आज उसे अपने प्रति पुरुष अथवा समाज का ही नहीं बल्कि उसका खुद का भी नजरिया बदलने का इंतजार है।

क्योंकी कल तक जो नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक थे, जो एक होकर एक दूसरे की कमियों को पूरा करते थे, जो अपनी अपनी कमजोरियों के साथ एक दूसरे की ताकत बने हुए थे, आज एक दूसरे से बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन यह समझ नहीं पा रहे कि इस लड़ाई में वे एक दूसरे को नहीं बल्कि खुद को ही कमजोर और अकेला करते जा रहे हैं।

आधुनिक समाज में नारी स्वतंत्रता महिला सशक्तिकरण महिला उदारीकरण जैसे भारी भरकम शब्दों के जाल में न केवल ये दोनों ही बल्कि एक समाज के रूप में हम भी उलझ कर रह गए हैं। इन शब्दों की भीड़ में हमारे कुछ शब्द, इन कल्पनाओं में हमारी कुछ कल्पनाएँ, इन आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए।
इस नई शब्दावली और उसके अर्थों को समझने की कोशिश मे हम अपने कुछ खूबसूरत शब्द और उनकी गहराई को भूल गए। अपनी संस्कृति में नारी और पुरूष की उत्पत्ति के मूल "अर्धनारीश्वर" को भूल गए।

भूल गए कि शिव के अर्धनारीश्वर के रूप में शिव  पुरुष का प्रतीक हैं और शक्ति नारी का।
भूल गए कि प्रकृति अपने संचालन और नव सृजन के लिए शिव और शक्ति दोनों पर ही निर्भर है।
भूल गए कि शिव और शक्ति अविभाज्य हैं।
भूल गए कि शिव जब शक्ति युक्त होता है, तो वह समर्थ होता है।
भूल गए कि शक्ति के अभाव में शिव शव समान है।
भूल गए कि शिव के बिना शक्ति और शक्ति के बिना शिव का कोई आस्तित्व ही नहीं है।
क्योंकि,
शिव अग्नि हैं तो शक्ति उसकी लौ हैं।
शिव तप हैं तो शक्ति निश्चय।
शिव संकल्प करते हैं तो शक्ति उसे सिद्ध करती हैं।
शिव कारण हैं तो शक्ति कारक हैं।
शिव मस्तिष्क हैं तो शक्ति ह्रदय हैं।
शिव शरीर हैं तो शक्ति प्राण हैं।
शिव ब्रह्म हैं तो शक्ति सरस्वती हैं।
शिव विष्णु हैं तो शक्ति लक्ष्मी हैं।
शिव महादेव हैं तो शक्ति पार्वती हैं।
शिव सागर हैं तो शक्ति उसकी लहरें।

जब प्रकृति का आस्तित्व ही अर्धनारीश्वर में है, पुरुष और नारी दोनों ही में है तो दोनों में अपने अपने आस्तित्व की लड़ाई व्यर्थ है। इसलिए नारी गरिमा के लिए लड़ने वाली नारी यह समझ ले कि उसकी गरिमा पुरुष के सामने खड़े होने मे नहीं उसके बराबर खड़े होने में है। उसकी जीत पुरुष से लड़ने में नहीं उसका साथ देने में है। इसी प्रकार नारी को कमजोर मानने वाला पुरुष यह समझे कि उसका पौरुष महिला को अपने पीछे  रखने में नहीं अपने बराबर रखने में है। उसका मान नारी को अपमान नहीं सम्मान देने में है। उसकी महानता नारी को अबला मानने में नहीं उसे सम्बल देने में है।

इसी प्रकार नारी को एक संघर्षपूर्ण जीवन देने वाले समाज के रूप में हम सभी समझें कि नारी न सिर्फ हमारे परिवार की या समाज की बल्कि वो सृष्टि की जीवन धारा को जीवित रखने वाली नींव है।
 


जातीय राजनीति और ब्राम्हणवाद

जातीय राजनीति और ब्राम्हणवाद

16-Jul-2019

कृष्ण देव सिंह (के डी सिंह बुधवार समाचार)

जो विचारों,वसूलों की अग्नि से तपकर निकलता है वो विचारधारा के लिए जीता मरता है। पहले राजनैतिक पार्टीया अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को वरिष्ठता व योग्यता के हिसाब से मौका देती थी।पर ये क्रम टूट गया। वंश ,कूल, गोत्र,रसूख,पैसा देखकर और दलालो को अवसर देने लगी। परिणाम स्वरूप कई राजनीतिक दलों की अतेष्ठी भी हो गई है और समय रहते कुछ और दल नहीं चेते तो वक्त उन्हें भी गर्त में भेजने में संकोच नहीं करेगी । सनातन हिन्दु घर्म के सामान्य वर्ग की जातियो का यह सोच कि जंन्म के आधार पर वे उचे या बडे है .ब्राह्मणवाद कहलाता है| यह विचार धारा मनुष्य को उंच-नीच और जाति वर्ग मे बांटता है | वर्तमान भारत मे तुलसी दास द्वारा रचित रामचरित मानस , मनुस्मृति और वंच आफ थाट को  ब्राम्हणवादी प्रवृति का प्रमुख पोषक मान्य रचनाओं के रूप में  प्रचारित व प्रसारित है ၊

पूजहि बिप्र शील गुण हीना ,शूद्र पूजहि न .होय प्रवीणा ||

    नव-ब्राह्मणवाद

बहुजनो ,दलितो शूद्रो मे एक ऐसा वर्ग विकसित हुआ है ,जो समृद्ध है, पढ़ा-लिखा है | इस नवधनाढ्य तबका मे ब्राह्मणवादी सोच का आकर्षण है | जिस परिवेश मे ये पले बढ़े  है, उससे अपने को अलग और उच्च समझते है|अब इनके बाल बच्चे भी जन्मजात श्रेष्ठ समझे जाते है| नये तबको का यही सोच ,नव ब्राह्मणवाद कहलाने लगा  है| इसका प्रदर्शन अन्य रुपो मे भी होने लगा  है |

अब मंदिर निर्माण , सामान्य वर्ग के  मुहल्ले मे उतना नही होता है जितना दलितो  व पिछड़े वर्ग के मुहल्ले मे धडल्ले से होते है | भजन हरिकीर्तन,शिव चर्चा ,इन बस्तियो मे कहीं न कही होते ही रहते है| 
एक बात के लिये मै हिन्दु मंदिर और मठो की प्रशंसा करूँगा कि उन्होने मंदिरो और मठो के साथ साथ कई शिक्षण संस्थान ,अस्पताल व यात्रियों तथा गरीबों के लिए मुफ्त भोजनालय भी खोले,जिसका लाभ सबो को मिलता है। कई संस्थान व संगठन धार्मिक स्थलों पर अपनी मुफ्त सेवायें भी देते है परन्तु इसके पीछे का उद्देश्य प्रमुखत: पुण्य अर्जित करना ही है।

नव ब्राह्मणवादी दो खेमो मे बँटे है | पहला खेमा अपने को पूर्णतः मनुवाद(संघ) के विलीन कर लिया है| ये नवब्राह्मणवादी अधिक खतरनाक है|ये आये दिन संघ के समर्थन मे आग उगलते रहते है| ये अधिक आक्रामक है|जैसे:विनय कटियार, साक्षी महाराज,कल्याण सिह, उमा भारती वगैरह....  दूसरा खेमा लोहिया वाद का चादर ओढे हमारे बीच है | जिसमे लालू प्रसाद, मायावती, मुलायम सिंह सरीखे लोग है | इनके पूजापाठ का पाखण्ड देखकर एक ब्राह्मण भी शरमा जाएगा| संपत्ति इतने जमा कर लिये है कि जन्म जन्मांतर तक इनके सगे संबंधि भी श्रेष्ठ बने रहेगे|

     जातिवादी राजनीति 

जाति व्यवस्था एक ब्राह्मणवादी सोच है फलतः जाति आधारित राजनीतिक विचार धारा जिसे लोहियावाद के रूप मे जाना जाता है.अंतिम रूप से ब्राह्मणवादी राजनीति मे विलीन हो गया प्रतीत होने लगा है । उसके कई उदाहरण है लेकिन राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय देश के प्रमुख घोषित ख्याति नामधारी नेता तो कांग्रेस में विलीन हो और अधिकांश देश की प्रमुख दक्षिणपंथी विचारधारा राष्ट्रीय स्वंम सेवक संघ में ।

  जैसे कुछ उदाहरण : 1-फायर ब्रांड लोहियावादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस अटल बिहारी बाजपेयी ,(भाजपा,) के समर्थक हो गये |

2-लोहियावादी , यादव हृदय सम्राट मुलायम सिंह मोदी के फैन हो गये |

3- देश के जाने माने सुशासन बाबू और नीतीश कुमार ,भाजपा के गोद मे सत्तासुख भोग रहे है | इन्होने भाजपा को बिहार मे पैर पसारने के लिए सहयोग देने में कोई कोर कसर बाकि नही रखा।

4-दक्षिण की राजनीतिक पार्टियाँ डी.एम.के. और ए.आई.डी.एम.के का संबंध भाजपा के साथ घरवाली और बाहरवाली जैसा है | एक रुठती है तो दूसरी मान जाती है

 5-अब सबसे पवित्र लोहियावादी लालू प्रसाद यादव जी की बात करे | अस्सी के दशक मे लालू के शासनकाल मे ब्राह्मवादी-सामंती गुण्डो ने अनेक नरसंहार किया जिसमे सैकडो भूमिहीन गरीब पिछड़े और दलित मारे गये. लेकिन कभी भी लोहियावादी लालू इन पिछड़े दलितो के समर्थन मे खड़ा नही हुए | बल्कि पूरे बिहार को यादव और मुसलमान राज्य बनाने  के साथ साथ अपराधियों को खुला संरंक्षण देकर जंगल राज्य की स्थापना की ।हाल के चुनाव मे भी लालू के लाल-तेजस्वी ने गिरिराज सिंह जैसे घोर प्रतिक्रियावादी को जितवाने मे भरपुर मदद किया तथा यादव परिवार भ्रष्टाचार का प्रयाय बन कर रह गया है । 

(इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं )


वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह की वीरगाथा

वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह की वीरगाथा

09-Jul-2019

लेखः- तेजबहादुर सिंह भुवाल

इतिहास गवाह है कि राजपूतों ने अपने वीरता और दृढ़ संकल्प के कारण हिन्दुस्तान की मातृभूमि के आन-बान और शान को कभी कम नहीं होने दिया। राजपूतों ने अपने बाजुओं के बल और फौलादी ताकत से दुश्मनों का सामना डट कर किया है। इसी कारण विभिन्न राजाओं ने अपने सेनापति के रूप में राजपूतों को ही नियुक्त किया करते थे।

राजपूत सूर्यवंश में ऐसे तो बहुत से वीर, बहादुर और प्रतापी राजा हुए पर वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह जैसा दूसरा कोई नहीं हुआ। महाराणा प्रताप ने मुगल सम्राट अकबर की आधीनता को स्वीकार नहीं करने के लिए राजपाठ छोड़कर जंगल में रहे और घास की रोटियां भी खाई। पर मरते दम तक वह मुगलों की आधीनता स्वीकार नहीं की। महाराणा प्रताप में इतनी शक्तियां थी कि वे एक बार में घोड़े पर सवार इंसान और घोड़े को दो हिस्सों में पूरा काट दिया करते थे। प्रताप में शेर की दहाड़, बाजुओं में फौलादी बल उनकी इच्छा शक्ति और आत्मबल के कारण हल्दीघाटी युद्ध में हजारों मुगल सैनिकों को अकेले मार गिराया।

उनका नाम कुंवर प्रताप सिंह, पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह था। उनका जन्म कुम्भलगढ़ राजस्थान में 9 मई 1540 ईस्वी में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह, दादा राणा संग्राम सिंह और परदादा महाराणा कुंभा सिंह थे। महाराणा प्रताप की माता महारानी जीवत कुंवर जी थी। उनकी पत्नि अजबदेह और पुत्र राणा अमर सिंह थे। उनकी राज्य सीमा मेवाड़ थी। उनका शासन काल 1568 से 1597 ईस्वी तक रही। उनके गुरू आचार्य राघवेन्द्र थे और उनको अस्त्र शस्त्र की शिक्षा राजा जयमल मड़ेतिया ने दी थी।

वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर मेवाड़ में सिसोदिया वंश के राजा थे। महाराणा प्रताप सिंह का नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिए अमर है। महाराणा प्रताप सिंह की जयंती विक्रय संवत कैलेन्डर के अनुसार प्रति वर्ष ज्येष्ठ शुल्क पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। महाराणा प्रताप सिंह का वजन 110 किलो और ऊॅंचाई 7 फीट 5 इंच थी। वे अपने पास हमेशा दो तलवार वाले म्यान और 80 किलो का भाला, 80 किलो का कवच रखते थे। उनकी तलवार, कवच, भाला, ढाल मिलाकर कुल 207 किलो का था।

हिन्दूस्तान की भूमि में राजपूतों को उनकी वीरता और बहादुरी के कारण राज्य की सुरक्षा का जिम्मा दिया जाता था। इसी प्रकार एक राजपूत के रूप में राजामान सिंह का अकबर की सेना में सेनापति के रूप में उदय हुआ और राजा मान सिंह सम्राट अकबर के एक विश्वसनीय पात्र बन गए थे। चूँकि राजा मान सिंह की बुआ का विवाह सम्राट अकबर से हुआ था और वास्तव में इसीलिए सम्राट अकबर के साथ उनका रिश्ता फूफा और भतीजे का था। दूसरी तरफ महाराणा प्रताप भी राजा मान सिंह के रिश्तेदार थे, लेकिन महाराणा प्रताप मुगलों से नफरत करते थे इसलिए मानसिंह को भी आक्रमणकारी मानने लगे थे। इस प्रकार जब अकबर ने एक संधि पर हस्ताक्षर कराने और मुगल संप्रभुता को स्वीकार करने के लिए मान सिंह को महाराणा प्रताप के पास भेजा, जिसमें उन्हें रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन वहाँ संधि नहीं होने पर दोनो राजपूतों में मदभेद उत्पन्न हो गया। वर्ष 1576 में मुगलों और महाराणा प्रताप के बीच हल्दी घाटी का भंयकर युद्ध हुआ।

मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था, वे प्रताप को अपना बेटा मानते थे, महाराणा प्रताप भी बिना भेदभाव के इनके साथ रहते थे, आज भी मेवाड़ के राज चिन्ह में एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील का चित्र अंकित है।

महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक वफादार घोड़ा चेतक और उनका स्वामी भक्त हाथी भी था, जिसका नाम रामप्रसाद था। उनका हाथी इतना समझदार व ताकतवर था कि उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही 13 हाथियों को मार गिराया था। उस हाथी को पकड़ने के लिए लिए अकबर ने 14 हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उस पर 14 महावतों को बिठाया गया, तब जाकर रामप्रसाद को बंदी बना पाये। मुगलों ने उस हाथी को गन्ने और पानी दिया, पर उस स्वामी भक्त ने 18 दिन तक मुगलों का खाना-पानी को छुआ तक नहीं और शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि ‘‘जिसके हाथी को मेरे सामने नहीं झुका पाया, उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाऊंगा’’।

हल्दीघाटी के युद्ध में मेवाड़ से 20 हजार सैनिक शामिल हुए थे और अकबर की ओर से 85 हजार सैनिक शामिल हुए थे। महाराणा प्रताप सिंह ने जब महल का त्याग किया तब उनके साथ लोहार जाति के लोगों ने भी अपना घर छोड़ा और दिन-रात महाराणा के फौज के लिए तलवारे बनाते थे। इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह ही विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला और राजपूतों ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।

सन् 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुगल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चैकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपुर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।

महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया, उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधारने के बाद वापस आगरा ले आया।

              एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए। उनकी यह वीरता देशवासियों के दिलों में सदा के लिए मातृभूमि के प्रति सच्ची निष्ठा, देश प्रेम और बलिदान की भावना को जागृत रखेगा। जय महाराणा-जय राजपूताना।  

 


कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने राहुल गांधी से किया अनुरोध, कहा: ‘कृपया हमारे मुखिया  के रूप में बने रहें!’

कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने राहुल गांधी से किया अनुरोध, कहा: ‘कृपया हमारे मुखिया के रूप में बने रहें!’

02-Jul-2019

लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से अपने पद से इस्तीफे की पेशकश के बाद उन्हें मनाने की कोशिश जारी हैं।

राहुल गांधी के समर्थन में पार्टी नेताओं के इस्तीफों के दौर के बीच कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की है। सभी मुख्यमंत्रियों ने राहुल गांधी से उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहने का आग्रह किया है। पर राहुल अपने फैसले पर अड़े हुए हैं।
यह समझा जा सकता है कि कांग्रेस नेता ने उन्हें कोई संकेत नहीं दिया कि क्या वह उनकी चिंताओं पर विचार कर सकते हैं।
पिछले हफ्ते महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के चुनाव-परिणाम वाले राज्यों के कांग्रेस नेताओं से मिलने के बाद, राहुल ने जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक स्थिति पर राज्य इकाई के साथ चर्चा की। बाद में उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (छत्तीसगढ़), अमरिंदर सिंह (पंजाब), कमलनाथ (मध्य प्रदेश),  अशोक गहलोत (राजस्थान) और वी नारायणसामी (पुदुचेरी) से मुलाकात की। बैठक में प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद थीं।
राहुल गांधी को सामूहिक रुप से मनाने की कोशिशों के तहत पार्टी की जल्द कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हो सकती है। इस बैठक में राहुल गांधी के समर्थन सभी पदाधिकारी अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर सकते हैं। ताकि, राहुल गांधी नए सिरे से संगठन का पुर्नगठन कर सके। इसके साथ पार्टी संगठन से जुड़ा रोजमर्रा का कामकाज निपटाने के लिए समिति का भी गठन कर सकती है।

TNIS


विश्व हिन्दू परिषद् ने मुस्लिमों से शादी को लेकर दिया चौकाने वाला बयान !

विश्व हिन्दू परिषद् ने मुस्लिमों से शादी को लेकर दिया चौकाने वाला बयान !

01-Jul-2019

विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने रविवार को कहा कि विहिप किसी दूसरे धर्म में शादी करने के खिलाफ नहीं है, बल्कि मुस्लिम युवकों के हिंदू लड़कियों से ‘लव जिहाद’ करने का विरोध करता है। बंसल ने यहां कहा कि विहिप किसी दूसरे धर्म में शादी करने के खिलाफ नहीं है।

लेकिन एक साजिश चल रही है, जिसके तहत मुस्लिम युवक हिंदू लड़की से शादी करता है और फिर उसकी नादानी का अनुचित फायदा उठा कर अपने धर्म में उसका धर्मांतरण करा देता है।

ज़ी न्यूज़ पर छपी खबर के अनुसार, यहां विहिप की दो दिवसीय केंद्रीय प्रबंधन समिति की बैठक के समापन पर बात करते हुए बंसल ने कहा कि लव जिहाद के मुद्दे पर भी बैठक में चर्चा हुई।
बैठक की अध्यक्षता विहिप के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु सदाशिव कोकजे ने की और इसमें करीब 225 वरिष्ठ पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया. बंसल ने कहा, विहिप की बैठक में गोहत्या के खिलाफ (सरकार से) सख्त कार्रवाई किए जाने की मांग की गई और हिंदुओं द्वारा पूजी जाने वाली गाय के संरक्षण के लिए एक अलग मंत्रालय बनाने की हिमायत की गई।

इसके अलावा अयोध्या में राम मंदिर का शीघ्र निर्माण करने की भी मांग की गई। उन्होंने दावा किया कि भीड़ हत्या की घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है जबकि ऐसी कुछ ही घटनाएं हुई हैं और बाद में इसका कारण कुछ और निकलता है। उन्होंने कहा कि अन्य धर्मों के लोगों को गाय से जुड़ी हिंदुओं की भावना का सम्मान करना चाहिए क्योंकि गाय सबके लिए समान रूप से लाभदायक है।

बंसल ने कहा कि (गायों की सुरक्षा के लिए) अक्सर सड़क पर उतरने वाले गोरक्षक सहित किसी के भी खिलाफ हिंसा की सभी घटनाओं की हम निंदा करते हैं. लेकिन उनके खिलाफ की जाने वाली ज्यादती के बारे में कोई नहीं बोलता है। उन्होंने दावा किया कि गोरक्षक पशुओं का संरक्षण करते हैं और उनके द्वारा किसी मुनष्य की जान लेने की कल्पना नहीं की जा सकती।

पिछले बुधवार को झारखंड में 24 वर्षीय तबरेज अंसारी की हुई हत्या की घटना का जिक्र करते हुए बंसल ने कहा कि उसकी मौत संदिग्ध नजर आती है और अपराध की किसी घटना को सिर्फ आपराधिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

विहिप प्रवक्ता ने बताया कि दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में कुछ मंदिरों की प्रबंध समितियों में ईसाई मिशनरियों को रखे जाने की कथित परंपरा पर भी बैठक में चर्चा हुई।

उन्होंने कहा, धन को सिर्फ हिंदुओं के कल्याण पर खर्च किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विहिप ने इस साल देश भर में गुरु नानक देव की 550 वीं जयंती मनाने का फैसला किया है।

मीडिया इन पुट 


क्या पार्टी पर पकड़ बनाए रखने का फार्मूला है, कार्यकारी अध्यक्ष? : प्रकाशपुंज पांडेय

क्या पार्टी पर पकड़ बनाए रखने का फार्मूला है, कार्यकारी अध्यक्ष? : प्रकाशपुंज पांडेय

19-Jun-2019

राजनीतिक विश्लेषक और समाजसेवी प्रकाशपुंज पांडेय ने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के हाल ही में हुए परिवर्तन पर अपनी राय एक डिफरेंट ऐंगल से साझा की है। उनका कहना है कि, 17 जून 2019 को भारतीय राजनीति में एक ऐसी घटना घटी जो किसी प्रहसन से कम नहीं। भारतीय जनता पार्टी में जगत प्रकाश नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। कार्यकारी अध्यक्ष ? इससे पहले तो कार्यकारी अध्यक्ष नहीं बनाए जाते रहे हैं, फिर अचानक पार्टी के संविधान और चलन के विपरीत क्यों कदम उठाया गया है ? इससे पहले भी तो कई अध्यक्ष रहे हैं जो पार्टी और सरकार के कई ओहदों पर आज भी काम कर रहे हैं, लेकिन अमित शाह में ऐसा क्या है कि पार्टी उनको अध्यक्ष बनाए रखना चाहती है अथवा वे अध्यक्ष बने रहना चाहते हैं? 

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय का कहना है कि, असल में जगत प्रकाश नड्डा की ताजपोशी ये बताती है कि भारतीय जनता पार्टी की संसदीय बोर्ड नाम की संस्था कमजोर हुई है। इस बोर्ड में कोई भी ऐसा सदस्य नहीं है जो ये कह सके कि न तो भाजपा अध्यक्ष का पद पार्ट टाइम जॉब के रूप में संभाला जा सकता है और न ही देश का गृह मंत्रालय। ये बेहद चौंकाने वाली स्थिति है, जबकि इसमें मातृ संस्था स्वयं सेवक संघ को भी दखल देना चाहिए था। दूसरा चौंकाने वाला पहलू ये है कि मीडिया की तरफ से भी इस तरह का कोई सवाल खड़ा नहीं किया गया। बड़े-बड़े राजनीतिक समीक्षक चुप्पी साधे बैठे हैं।

जब भी कोई इस तरह का गैर पारंपरिक कदम उठाया जाता है, उसके परिणाम-दुष्परिणाम दूरगामी होते हैं। अभी के राजनीतिक परिदृश्य में यदि देखा जाए तो भाजपा में बाकी पार्टियों से अधिक लोकतंत्र है। बाकी पार्टियों में उनके प्रमुख, परिवार से ही बनते आ रहे हैं, चाहे वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ही क्यों न हो। पार्टियों में लोकतंत्रात्मक दायरा बढ़ाने के लिए इस तरह के घटनाक्रम का भारत की सिविल सोसायटी, मीडिया, राजनीति के जानकारों की ओर से सवाल उठाए जाने चाहिए। जगत प्रकाश नड्डा की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी से ऐसा संदेश गया है कि अमित शाह की ओर से भाजपा के ऊपर एक तरह से एहसान किया गया है अगर वे चाहते तो गृह-मंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों बने रह सकते थे, क्योंकि उनका कद अब इतना बढ़ गया है कि उनसे कोई सवाल करने की किसी हिम्मत नहीं है, जबकि स्थिति इसके उलट भी हो सकती है। भारतीय राजनीति में इस तरह के कुछ ताज़ा घटनाक्रमों का अवलोकन किया जा सकता है कि उनका क्या असर हुआ। 

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने भारतीय राजनीति के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वर्ष 2003 में जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की हार हुई और उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद तिरंगा यात्रा निकालने की वजह से उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया। जब तिरंगा यात्रा खत्म हुई तो उमा भारती ने गौर से कुर्सी खाली करने के लिए कहा, लेकिन गौर ने गच्चा दे दिया। उसके बाद क्या-क्या हुआ किसी से छिपा नहीं। एक बार नीतिश कुमार ने जीतनराम मांझी के लिए कुर्सी खाली की, बाद में नीतिश कुमार को बिना सीएम कुर्सी के बेचैनी होने लगी तो रोज़ नई-नई नौटंकियां सामने आने लगीं। 

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि हालात अगर भाजपा में भी इस तरह के बनने लगें तो चौंकिएगा नहीं। सबसे अच्छा तरीका ये होता कि अमित शाह भी लालकृष्ण आडवाणी, वैंकेया नायडू, नितिन गड़करी, राजनाथ सिंह की तरह अध्यक्ष पद छोड़कर गृहमंत्रालय संभालते। पार्टी किसी और को पूरी तरह से अध्यक्ष बनाती और स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका देती। इसके बाद सरकार और पार्टी प्रमुखों का दायित्व होता कि वे आपस में तालमेल बनाकर रखें। 

 अमित शाह का पद छोड़ना क्यों जरूरी ? 

ये बहुत पहले से तय था और लोग समझ भी रहे थे कि यदि केंद्र में मोदी सरकार की वापसी होती है तो अमित शाह ही गृह-मंत्री होंगे। गृह-मंत्री होने का मतलब है कि लगभग डेढ़ अरब आबादी की आंतरिक चुनौतियों से सुरक्षा का ज़िम्मा। ये कोई छोटी ज़िम्मेदारी नहीं है। जब देश में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक नहीं कई चुनौतियाँ मुंह बाए खड़ी हैं, ऐसी स्थिति में अमित शाह आधी अध्यक्षी कैसे संभाल सकते हैं? अमित शाह से भारत की जानता को दो बड़े मोर्चों पर निर्णायक कदम उठाने की उम्मीद है और जनता ये भी जानती है कि अमित शाह इसमें सक्षम भी हैं।

ये दो बड़ी चुनौतियाँ हैं कश्मीर में आतंकवाद और देश में कई हिस्सों में फैला नक्सलवाद। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर राजनाथ सिंह ने अपने कार्यकाल में बेहतर काम किया लेकिन जनता इस पर निर्णायक प्रहार चाह रही है। यह तभी संभव है जब अमित शाह पूरी तरह से गृहमंत्रालय संभालेंगे और संगठन के काम से मुक्त कर दिए जाएंगे। इन दो बड़े कामों के अलावा इस देश में कानून व्यवस्थाओं से जुड़े कई मामले है। इसके अलावा उम्मीद की जा रही है कि मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल में पुलिस सुधार पर कुछ कदम उठाएगी। भारतीय पुलिस के कामकाज में गुणात्मक सुधार लाने के लिए इस पर बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है। 

 अंडर परफार्मर हैं जेपी नड्डा - 

एक तो जेपी नड्डा को पूरी तरह से अध्यक्षी नहीं दी गई है, यानि वे अमित शाह के मार्गदर्शन में काम करेंगे। स्वंय से कोई निर्णय नहीं ले पाएंगे, यानि अमित शाह से उनकी मुलाकात तभी हो पाएगी जब वे गृहमंत्रालय के कामों से फ़ुरसत पाएंगे। ऐसी स्थिति में पार्टी के कामों में लेटलतीफी होगी जिससे स्वाभाविक है कि जेपी नड्डा का संगठन के मोर्चे पर प्रदर्शन प्रभावित होगा। दूसरी स्थिति ये बनेगी कि संगठन जो भी उपलब्धि हासिल करेगा वह अमित शाह के खाते में जाएगी और विफलताएं जेपी नड्डा के खाते में इसके पार्टी में खींचतान बढ़ेगी। जेपी नड्डा वैसे भी अंडर परफार्मर हैं। नड्डा पांच साल तक देश के स्वास्थ्य मंत्री रहे लेकिन उन्होंने उस मोर्चे

( प्रस्तुत लेख प्रकाशपुंज पाण्डेय जी के हैं यह लेख लेखक के निजी विचार है )


2019 का चुनाव परिणाम मेरे जैसे लोगों के खिलाफ फैसला है : करन थापर

2019 का चुनाव परिणाम मेरे जैसे लोगों के खिलाफ फैसला है : करन थापर

03-Jun-2019

ये बिल्कुल स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी के लिए लोगों का एक निजी समर्थन है। भारतीय लोगों ने जानबूझकर उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में एक और कार्यकाल देने के लिए वोट दिया है। यह अविश्वसनीय विश्वास और विश्वास का प्रतिबिंब है। कांग्रेस इससे इनकार कर सकती है, लेकिन अगर वे ऐसा करते हैं, तो वे गलत होंगे। ”
हालांकि, पर्ट्टी प्रभावित नहीं हुए। “हां, यह स्पष्ट है लेकिन यह परिणाम हमें और क्या बताता है?” वह मेरी सोच को चुनौती देता प्रतीत हो रहा था। मुझे स्कूल में एक छात्र की तरह महसूस हुआ। मुझे और गहराई से सोचने के लिए कहा जा रहा था।
परिणाम हिंदुत्व की मान्यता को दर्शाता है कि भारत मूल रूप से एक हिंदू देश है और यह नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता अवधारणा से अलग कदम है। नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता का दिल: यह कई धर्मों, जातियों, जातियों, संस्कृतियों और भाषाओं का देश है। हालांकि, विंध्य के दक्षिण में हमें एक अलग कहानी लगती है। ”
इस बार मैं बता सकता था कि मैंने पर्टी से संझौता कर ली है। वह असहमत नहीं था। इसके बजाय, उन्होंने चुनावी फैसले के एक और आयाम को प्रकट करने के लिए मेरे जवाब का इस्तेमाल किया। यह स्पष्ट रूप से कारण था कि उसने क्यों गाया था।

“क्या आपने सोचा है कि इस सब से परे – और मैं इसमें से किसी से असहमत नहीं हूँ – कुछ अधिक गहरा और व्यक्तिगत है। यह बहुत परेशान करने वाला है। यह परिणाम आपके और मेरे जैसे लोगों के खिलाफ एक फैसला है, वास्तव में हमारी पूरी कक्षा। यह उन लोगों के खिलाफ एक फैसला है, जो अपने जन्म और वंश, शिक्षा या उन्मूलन, परिवार के संपर्क और प्रभाव के कारण मानते हैं कि वे इस देश के मालिक हैं और जैसा चाहें, उसे चला सकते हैं। हममें से कुछ जानते थे कि भारत आक्रोश के साथ आगे बढ़ रहा था। मोदी ने इसे पहचाना और इसमें टैप किया। आज, उसने उसे संसद में दो-तिहाई बहुमत दिया है।

मैंने शांति से पैर्टी की बात सुनी, क्योंकि वह जो कह रहा था, उसमें सच्चाई और भयावहता दोनों थी। तब तक मैंने इन व्यक्तिगत शब्दों में चुनाव परिणाम के बारे में नहीं सोचा था। लेकिन अब उनका निष्कर्ष अप्रतिरोध्य लग रहा था।

तो, क्या यह नया भारत मोदी है जिसके बारे में बात की गई है? एक नई आवाज, एक नया दृष्टिकोण और भारतीयता की एक नई परिभाषा व्यक्त की गई है और मोदी न केवल इसकी अभिव्यक्ति है, बल्कि संभवतः, इसका व्यक्तिीकरण भी है। इस बीच, Pertie और I जैसे लोग, वास्तव में हमारी तरह एक पूरी कक्षा, खुद को भूल गए या यहां तक ​​कि बाएं-पिछड़े अल्पसंख्यक में पाते हैं। मैं इस सोच से बहुत प्रभावित हुआ, वास्तव में इससे हिल गया, कि मुझे एहसास नहीं था कि पर्टी ने बोलना शुरू कर दिया था।

“मुझे मोदी के मुंह में शब्द डालने दें, हालांकि मुझे नहीं लगता कि मैं गलत तरीके से ऐसा कर रहा हूं। वह यह कह सकता है कि करण और पर्टी जैसे लोग इतने परेशान क्यों हैं क्योंकि एक नया भारत पैदा हुआ है और वे इसका हिस्सा नहीं हैं। इसके बजाय, वे इतिहास के गलत पक्ष पर समाप्त हो गए। ”

अब मुझे नहीं पता कि क्या पर्टी सही है लेकिन यह संभव है कि वह हो सकता है। निश्चित रूप से उनका विचार दृढ़ और ठोस है। मैंने अभी तक एक काउंटर के बारे में नहीं सोचा था। मैं अब भी इस सोच से कैद हूं कि मोदी ने मेरे जैसे लोगों को अप्रासंगिक बना दिया है। और, याद रखें, जब मैं कहता हूं, तो मेरा मतलब आप में से कई से है।

करन थापर, डेविल्स एडवोकेट: द अनटोल्ड स्टोरी के लेखक हैं और व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं

 


 लोकसभा चुनाव की हार और भूपेश बघेल के नेतृव पर सवाल क्यों ?

लोकसभा चुनाव की हार और भूपेश बघेल के नेतृव पर सवाल क्यों ?

24-May-2019

एम.एच.जकरीया, TNIS

लोकसभा चुनाव 2019 में जिस तरह से बीजेपी ने बम्पर जीत हासिल की है वह विपक्षी पार्टियों के गले ही नहीं उतर रही है विपक्ष के द्वारा कई मुद्दों को जोर शोर से उठाने के बावजूद बीजेपी ने आश्चर्यजनक तरीके से जीत दर्ज कर सभी को हैरान कर दिया है अंतिम चरण के मतदान के दिन के बाद दूसरे दिन अधिकतर न्यूज चैनलों ने अपने एग्जिट पोल पर बीजेपी को पूर्ण बहुमत प्राप्त करते हुए भी दिखाया था लेकिन विपक्ष ने इसे खारिज कर दिया और मतगणना के दिन बीजेपी ने बहुमत से भी ज्यादा सीटें पाई इसी तरह बीजेपी ने छत्तीसगढ़ में भी 11 लोकसभा सीटो में से 9 सीटें हासिल की वही कांग्रेस 2 सीटो पर सिमट कर रह गई

प्रदेश में पांच महीने पहले ही विधानसभा चुनाव हुए हैं जिसमे छत्तीसगढ़ की जनता ने 15 सालो से छत्तीसगढ़ की सत्ता पर जमे रमन सरकार को बेदखल कर कांग्रेस को भरपूर प्यार दिया और इसी वजह से कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में 90 में से 68 सीटें मिली वही 15 वर्षो से प्रदेश में राज करने वाली बीजेपी 15 सीटो पर सिमट गई. पांच महीनो के बाद ही लोकसभा चुनाव परिणाम में प्रदेश में कांग्रेस को केवल 2 सीटें मिलने से कई कांग्रेसी दिग्गज आश्चर्य में है वही पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी भूपेश सरकार पर हमला बोला तो कुछ ऐसे भी लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव हुए जिन्होंने कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. हाँ भूपेश सरकार को लोकसभा चुनाव में प्रदेश में आए इस परिणाम पर आत्मचिंतन करने की जरुरत है लेकिन कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को भी यह समझना होगा कि जनता हमेशा मुद्दों पर ही किसी राजनीतिक पार्टी को वोट देती है

विधानसभा चुनाव में जनता ने पूर्व सरकार के कई वादाखिलाफी वादों की वजह से बीजेपी के खिलाफ वोट किया था वही अगर लोकसभा चुनाव में देखें तो कह सकते हैं शायद विपक्ष कई महत्वपूर्ण मुद्दों को भुना नहीं सकी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी अपने अधिकतर सभाओं में केवल राफेल डील की बात पर ज्यादा बोले जबकि उन्हें बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम, डॉलर के मुकाबले रुपया का कमजोर होना, बढ़ते रसोई गैस के दाम जैसे मुद्दों पर ज्यादा फोकस करना था.

फिलहाल चुनाव परिणाम सबके सामने है और बीजेपी दोबारा पूर्ण बहुमत से भी ज्यादा सीटें पाकर एक बार फिर सरकार बना रही है चुनाव हो या मैच सभी में हार जीत लगी रहती है ऐसे में बीजेपी की जीत की वजह से कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व पर उंगली उठाना तर्क संगत नहीं माना जा सकता है क्योंकि सभी को पता है कि प्रदेश और राष्ट्र के चुनाव में मुद्दे अलग हो जाते है. प्रदेश के विधानसभा चुनाव में आम जनता, किसान लगभग हर वर्ग रमन सरकार के दमनात्मक राज से त्रस्त हो चुका था इसलिए उन्होंने सत्ता परिवर्तन किया लेकिन  लोकसभा चुनाव को भी उसी तारतम्य में देखा जाना सही नहीं कहा जा सकता है सोशल मीडिया में कुछ हताश और घबराये हुए लोग मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर हमला बोल रहे है. हमला बोलने वालों को समझने की ज़रूरत है और यह छत्तीसगढ़ की जनता इसे बेहतर समझ भी रही है कि यह वही लोग है जो भूपेश सरकार के द्वारा पिछली सरकार की फाइलें खोल कर जाँच शुरू करवाने और पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार के दोषियो  की जांच कराने और उन्हें बेनक़ाब कर सजा दिलवाने में तत्परता दिखाने पर अपनी खीज़ इस तरह से निकाल रहे है. हालांकि केंद्र में फिर से मोदी सरकार आई है इसके बावजूद छत्तीसगढ़ सरकार के नेतृत्व को कमज़ोर समझने की गलती इन्हें नहीं करना चाहिए ।

खुलासा पोस्ट न्यूज नेटवर्क को मिली जानकारी के अनुसार लोगों के बीच ऐसी भी चर्चा है कि यह एक बड़ी साजिश के तहत छत्तीसगढ़ की सरकार और भूपेश बघेल को परेशान करने की कोशिश की जा रही हो और सम्भवता उसमे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शामिल है क्योकि लोकसभा चुनाव में कुछ बाते देखी गई थी जिसे जानबूझ कर अनदेखा किया गया फिलहाल भूपेश सरकार के पास जनता का विश्वास जीतने के लिए पांच साल है चुनाव में अपने किए गए वादों के अनुसार छत्तीसगढ़ की सत्ता संभालते ही कांग्रेस ने किसानो के कर्जमाफ किए वही बिजली के दाम भी आधे किए भूपेश सरकार अपने और भी वादों को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं छत्तीसगढ़ में अभी नई सरकार को केवल पांच महीने हुए हैं और ऐसे में लोकसभा चुनाव की हार को लेकर भूपेश बघेल के नेतृव पर सवाल नहीं उठाया जा सकता ।  

 

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की राह नहीं आसां, पांच लाख मुस्लिम वोटर्स तय करेंगे भोपाल लोकसभा का भविष्य !

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की राह नहीं आसां, पांच लाख मुस्लिम वोटर्स तय करेंगे भोपाल लोकसभा का भविष्य !

11-May-2019

भोपाल :मध्यप्रदेश के  पूर्व मुख्यमंत्री  और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कड़े इम्तिहान से गुजर रहे है । किसी समय में  हिंदू आतंकवाद का मुद्दा उठाने वाले दिग्गी राजा  भोपाल में साधुओं की मदद से बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं।
दिग्विजय सिंह जानते हैं कि करीब 19.75 लाख वोटरों वाली भोपाल लोकसभा में मुसलमान उनके साथ खड़े रहेंगे। भोपाल में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब पांच लाख है। बाकी के वोटरों को अपनी तरफ करना दिग्विजय सिंह की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।
 डब्ल्यू हिन्दी पर छपी खबर के अनुसार, भोपाल लोकसभा सीट में अंतर्गत कुल आठ विधानसभा सीटें आती हैं। 2018 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने इन आठ में से पांच सीटें जीती थीं। बाकी वोटरों को अपनी तरफ खींचने के लिए दिग्विजय सिंह अपनी छवि में बदलाव करते भी दिख रहे हैं।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, दिग्विजय सिंह को भी अपनी राजनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। 26/11 के मुंबई हमलों और दिल्ली के बटला हाउस इनकाउंटर जैसे मुद्दों पर विवादित बयान देने वाले दिग्विजय सिंह अब बहुत संभल संभल कर बोल रहे हैं।
दिग्विजय सिंह, भोपाल में अपनी हिंदू विरोधी छवि को बदलने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। भोपाल में उनके चुनाव प्रचार में साधु संत दिखाई पड़ रहे हैं।
दिग्विजय सिंह को 40-42 डिग्री की गर्मी में यज्ञ और हवन भी करने पड़ रहे हैं। दिग्विजय बीजेपी के हिंदुत्व का जवाब अपने सॉफ्ट हिंदुत्व से देने की कोशिश कर रहे हैं। संत यात्रा, हवन, नर्मदा यात्रा इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को बीजेपी का गढ़ समझा जाता है। 1989 से बीजेपी यह लोकसभा सीट लगातार जीतती आ रही है। क्या दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और दिग्गज कांग्रेसी नेता बीजेपी के इस रथ को रोक सकेंगे। 

{मीडिया इन पुट }


श्रमजीवी के नाम पर पत्रकारों के अधिकारों का हनन !

श्रमजीवी के नाम पर पत्रकारों के अधिकारों का हनन !

01-May-2019

एम.एच.जकरीया 

मई माह का पहला दिन यानि आज 1 मई को श्रमिक दिवस के नाम से जानते हैं कभी पत्रकार भी श्रमजीवी कहलाया करते थे लेकिन आज के बदलते वक्त में अब श्रमजीवी पत्रकार मीडियाकर्मी बन गए हैं. भले ही शब्द बदल गए हो लेकिन आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो खुद को श्रमजीवी पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं श्रमजीवी कहलाने का अर्थ वे लोग बखूबी जानते हैं, जो आज भी श्रमजीवी बने हुए हैं किन्तु जो लोग मीडियाकर्मी बन गये हैं उन्हें एक श्रमजीवी होने का सुख भला कैसे मिल सकता है। एक श्रमजीवी और एक कर्मचारी के काम में ही नहीं, व्यवहार में भी अंतर होता है।

एक मीडियाकर्मी या कर्मचारी का लक्ष्य और उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ एक निश्चित कार्य को पूर्ण कर अधिकाधिक पैसा कमाना होता है किन्तु एक श्रमजीवी का अर्थ बहुत विस्तार लिये हुए है । उसका उद्देश्य और लक्ष्य पैसा कमाना नहीं होता पत्रकारिता में आने का ध्येय रूपये कमाना नहीं बल्कि सुख कमाना है अपनी लिखी खबर से निकम्मों के खिलाफ, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्यवाही होते देखना है कह सकते हैं ऐसे बेबाक एवं वास्तविक श्रमजीवी पत्रकार इसीलिए गरीबी में जीते हैं और गरीबी में ही मर जाते हैं । यही पत्रकार सेवा  भाव से कार्य करते हैं न कि कर्मचारी के भाव से।

कुछ ऐसे भी श्रमजीवी पत्रकार या पत्रकार संगठन के नेता हुए हैं जो वास्तविक श्रमजीवी  पत्रकारों का शोषण करते हैं इसका बड़ा उदहारण छत्तीसगढ़ में ही देखने को मिल जाएगा. ये पिछली सरकार के द्वारा पोषित थे, ये पत्रकार नेता संगठन का दबाव दिखाकर जनसम्पर्क विभाग से लम्बी चौड़ी राशि एजेंसी के नाम पर वसूल करते रहे यहां पर सवाल यह है कि यदि ये पत्रकार नेता खुद का न्यूज एजेंसी चलाते थे तो फिर ये श्रमजीवी पत्रकार कैसे हुए ?

कह सकते हैं तत्कालीन सरकार ने आँखे बंद कर फर्जी तरीके से चलने वाले न्यूज एजेंसियों जो कभी खुलते ही नहीं थे उन्हें आँख बंद कर पैसे बाँटे थे यही श्रमजीवी पत्रकार संगठन का नेता पत्रकारों का कम अपना हित ज्यादा साधते थे वे सरकार को संगठन का धौंस दिखाकर अपना काम निकलवाते रहे हैं. जिसे सीधे साधे पत्रकार बंधू समझ नहीं पाते है साल में एक दो बार किसी मंत्री या  मुख्यमंत्री  के आतिथ्य में सम्मेलन कराने के नाम पर पिछली सरकार से मोटा पैकेज और व्यापारियों से चंदा उगाही करते थे और सम्मलेन के नाम पर पत्रकारों से भी वसूली करके ये पत्रकारों के नेता अपनी जेबे भरते रहे वैसे इनमे से अधिकतर या तो पूर्व पत्रकार है  या पत्रकार ही नहीं है

जहाँ तक मेरी जानकारी है इन तथाकथित पत्रकारों के ना एक भी लेख प्रकाशित होते है और ना ही समाचार दिखाई देते है ये केवल वास्तविक पत्रकारों का शोषण करते है जागरूक पत्रकार भाइयो को समझना होगा और ऐसे फर्जी पत्रकार नेताओ को बे-नकाब किया जाना चाहिए तभी छत्तीसगढ़ में साफ सुथरी पत्रकारिता हो सकेगी !

 

धार्मिक हिंसा या राजनीतिक बदला? विश्लेषकों ने श्रीलंका हमले के पीछे छिपे संदेश को समझाया

धार्मिक हिंसा या राजनीतिक बदला? विश्लेषकों ने श्रीलंका हमले के पीछे छिपे संदेश को समझाया

28-Apr-2019

21 अप्रैल को हुए श्रीलंका के हमले ने कई सवाल खड़े किए हैं। रूसी न्यूज एजेंसी स्पुतनिक से बात करते हुए, विश्लेषकों ने चर्चा की कि खुनखराबा दुनिया को क्या संदेश दिया और हमलों से कौन लाभान्वित हो सकता है। ईस्टर की छुट्टी के दौरान श्रीलंका में तीन ईसाई चर्चों और होटलों की बमबारी ने कई लोगों को आश्चर्य में डाल दिया। 1983-2009 के गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से, राष्ट्र को धार्मिक उत्पीड़न या उग्रवादी इस्लामी हिंसा के अधीन नहीं किया गया है।

धार्मिक हिंसा या राजनीतिक बदला?

एक पूर्व आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञ और सीआईए सैन्य खुफिया अधिकारी फिलिप गिराल्डी ने इस बात पर सहमति जताई कि छोटे द्वीप श्रीलंका के ईसाई अल्पसंख्यक के खिलाफ धार्मिक हिंसा के अचानक प्रकोप ने बहुत भ्रम पैदा कर दिया है। देश के 2011 की जनगणना के अनुसार, श्रीलंका के 70 प्रतिशत लोग बौद्ध हैं और 13 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि क्रमशः 9.7 और 7.4 प्रतिशत ही मुस्लिम और ईसाई हैं।

भूराजनीतिक विश्लेषक और यूरेशिया फ्यूचर के निदेशक एडम गैरी का मानना है कि धार्मिक हिंसा के मकसद के अलावा, कुछ ताकतें राष्ट्र को आंतरिक हिंसा में वापस लाने की कोशिश कर रही हैं। विश्लेषक ने उल्लेख किया कि “तथ्य यह है कि श्रीलंका की मुस्लिम आबादी बहुत छोटी है और लंबे समय से बौद्ध बहुमत के साथ मेल खाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह आतंकवादियों को लाभ नहीं देती है” विश्लेषक ने नोट किया कि श्रीलंका में हमलावरों के लिए यह एक विश्वसनीय मकसद नहीं है”।
भूराजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि “लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) आतंकी समूह द्वारा श्रीलंकाई अधिकारियों द्वारा पराजित किए जाने के दस साल बाद श्रीलंका को आंतरिक युद्ध पर वापस लाने के लिए हमला किया गया था।” एलटीटीई की स्थापना मई 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरन ने की थी और श्रीलंका के उत्तर और पूर्व में तमिल ईलम का एक स्वतंत्र राज्य बनाने की मांग की थी।

देश के यात्रा उद्योग के एक स्पष्ट संदर्भ में, भू राजनीतिक विश्लेषक ने सुझाव दिया, कि “यह ओवरराइडिंग संदेश लगता है कि वे आतंकवादी भेजना चाहते थे। एक दशक की शांति के बाद, श्रीलंका के दुश्मन अब शांतिप्रिय श्रीलंकाई लोगों को सुरक्षित महसूस नहीं करना चाहते हैं। आतंकवादियों का भी श्रीलंका को नुकसान पहुंचाने का एक स्व-स्पष्ट उद्देश्य था जो राष्ट्र के लिए धन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है।”

23 अप्रैल को, ISIS ने कथित रूप से घातक हमलों के लिए जिम्मेदारी का दावा किया, जबकि श्रीलंकाई रक्षा मंत्री रुवेन विजेवर्देने ने सुझाव दिया कि मार्च में न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों में ट्रांसप्लांट किए गए बड़े पैमाने पर गोलीबारी के लिए जवाबी कार्रवाई में श्रीलंका में बम विस्फोट किए गए।

बीजिंग स्थित राजनीतिक विश्लेषक और चीन के राष्ट्रीय प्रसारक सीसीटीवी के वरिष्ठ संपादक और कमेंटेटर टॉम मैकग्रेगर ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह हमला इस्लामवादियों द्वारा “सामाजिक व्यवस्था को बाधित करने और ईसाइयों को निशाना बनाने की कोशिश” द्वारा किया गया था।

मैकग्रेगर ने विरोध किया, कहा “जाहिर है, यह कट्टरपंथी इस्लामवादियों द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बाधित करने और ईसाइयों को लक्षित करने के लिए किया गया एक हमला था। मीडिया रिपोर्टों ने पहले ही खुलासा कर दिया है कि और हमें जल्द ही और अधिक विवरण सुनने की संभावना है। माना जा रहा है कि कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि यह शूटिंग क्राइस्टचर्च पर बदला है। लेकिन असली कहानी यह केवल अवसर का अपराध है”.

पत्रकार मैकग्रेगर के अनुसार, आतंकवादी “श्रीलंका को एक आसान लक्ष्य के रूप में देखते हैं”। मैकग्रेगर ने समझाया कि “यह एक गरीब देश है और यहां सार्वजनिक सुरक्षा अपेक्षाकृत कमजोर है”, उन्होंने कहा कि “मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है, कि कोलंबो में कैथोलिक चर्च सुरक्षा गार्डों को नियुक्त करने में विफल रहे थे, जबकि सरकार ने एक पूर्व आतंकी अलर्ट जारी करते हुए कहा था कि योजनाबद्ध हमलों में ईसाइयों को लक्षित किया जा सकता है।”

उन्होंने अपराध की जटिलता का उल्लेख किया और श्रीलंकाई पुलिस की व्यावसायिकता पर संदेह व्यक्त किया: “श्रीलंका की सार्वजनिक सुरक्षा में इतनी खामियां देखकर आतंकवादियों के पास बम और हथियार रखने का पर्याप्त समय और क्षमता थी, जो गहराई से परेशान करने वाला है”.

श्रीलंकाई अधिकारियों ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय तौहीद जमाल, एक छोटी ज्ञात इस्लामी आतंकवादी संगठन है, जो पहले बौद्ध प्रतिमाओं के साथ बर्बरता करने के लिए जाना जाता था, और यह हमलों में शामिल था। गैरी के अनुसार, “इस छोटे और अस्पष्ट समूह के बारे में जो कुछ भी जाना जाता है, उसके आधार पर, यह आतंक के एक बड़े एजेंट के लिए एक मोर्चे से थोड़ा अधिक प्रतीत होता है, सबसे अधिक संभावना एक विदेशी राज्य खुफिया एजेंसी है जो जमीन पर आतंकवादियों के साथ काम कर रही है “।

भू-राजनीतिक विश्लेषक ने जोर देकर कहा कि “यह मुश्किल ही नहीं बल्कि यह विश्वास करना असंभव है कि इस तरह का एक छोटा समूह इस तरह के राष्ट्रव्यापी और अत्याचार के अत्यधिक समन्वित सेट को खींच सकता है”। यह लगभग तय है कि जमीन पर आतंकवादियों को बाहरी सहायता मिली थी”। मैकग्रेगर ने चेतावनी दी कि “देश में कई आतंकवादी कोशिकाएं अभी भी बिना किसी बाधा के काम कर रही हैं, जबकि अन्य पहले से ही बहुत हस्तक्षेप के बिना देश से भाग गए हैं”। पत्रकार ने कहा, “यह निकट भविष्य में और अधिक आतंकवाद के हमलों के लिए तैयार है और इन अपराधियों को बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए वे संभवतः ईसाई और चर्च पर टार्गेट करेंगे।”

और अंत में बता दें कि 21 अप्रैल को, कोलंबो के उत्तर में एक शहर, नेगोंबो (कोलंबो के एक शहर) और पूर्वी तट पर एक शहर, बटलिकलोआ में 359 लोगों मारे गए जिसमें ईसाई चर्च और होटल प्राथमिक लक्ष्य थे। Agence France Presse के अनुसार, श्रीलंकाई पुलिस ने हमलों से 10 दिन पहले एक खुफिया अलर्ट जारी किया, जिसमें कहा गया कि आत्मघाती हमलावरों ने “प्रमुख चर्चों” को विस्फोट करने की योजना बनाई है। जैसा कि 23 अप्रैल को सीएनएन ने उल्लेख किया, कि प्रारंभिक चेतावनी एक संदिग्ध आइएस से प्राप्त जानकारी पर आधारित थी।

मीडिया इन पुट 


पल्टुओं से सावधान

पल्टुओं से सावधान

10-Apr-2019

एम.एच. जकरीया 

सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस प्रवेश करने वाले पल्टूओ की बाढ़ सी आ गई है । जनता के दिल तक पहुँचने के लिए  भूपेश बघेल ने जो कुर्बानियां दी है आज उसी का प्रतिफल है छत्तीसगढ़ मे कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन सत्ता के भूखे पद लोलुप तथाकथित नेता अब उसी कांग्रेस मे जुड़ कर सत्ता सुख भोगना चाहते हैं, क्या ये उन कांग्रेस कार्यकर्ताओ को मंजूर होगा  ?  जिस संगठन के लिये भूपेश बघेल के साथ-साथ कांग्रेस के एक एक कार्यकर्ताओं  ने अपना खून पसीना एक कर दिया, अब कामयाबी का मजा तथाकथित नेता जोगी कांग्रेस के एक नेता का पत्र  कल से सोशल मीडिया मे घूम रहा है.

उनका कहना है की जोगी कांग्रेस में जाना मेरी सबसे बड़ी भूल थी, सोशल मीडिया में  कुछ लोग  कह रहे है  घर का भुला की  घर वापसी जैसी संज्ञा दी जा रही है ? लेकिन  जिसे वो अपनी भूल बता रहे हैं ये वही अवसर वादी लोग है जिन्होंने  एक समय मे चरण छूने वाली परंपरा आगे बढ़ाया था, मुझे अच्छी तरह से याद है एक समय में चरण छूने वाले को ही तरजीह मिलती थी उस समय कांग्रेस की ऐसी ही परम्परा बना दी गई थी ।  

जिसे  भूपेश बघेल जैसे नेताओ ने तोड़ा और कार्यकर्ताओ को  बराबरी का सम्मान दिया और कंधे से कंधा मिलाकर बराबरी का अहसास दिलाया, आज मुझे उस पत्र को लेकर ही  लिखने के लिए विवश होना पड़ा है ! ये नेता किसी समय मे एक कद्दावर नेता के पिछलग्गू रहे है उनकी मेहरबानी से विधायक और फिर मंत्री बने कांग्रेस के संघर्ष काल मे जोगी जी से जुड़े और कांग्रेस को कोसने लगे जब सत्ता तक नही पहुँच पाए तो अब पछतावा और अपनी भूल बता रहे हैं । ऐसे लोगो को फिर से कांग्रेस मे लिया जाना उन कार्यकर्ताओ के आत्म सम्मान का मजाक बनाना होगा !

ये वही लोग है जो पिछली सरकार की सांठ गांठ  करके सत्ता सुख के लिए  अलग अलग तरीके से भूपेश बघेल  और  कांग्रेस संगठन को  हर तरह  से नुकसान पहुँचाते रहे जिसके लिये भूपेश बघेल और उनके परिवार ने यातनाएं सही, अब यही लोग फिर से भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके इर्द गिर्द मंडराने लगे हैं ।

ये बात सही है कि कांग्रेस संगठन एक समुद्र है, जो सभी को पनाह देता रहा है कुछ लोगो का लोकसभा चुनाव के चलते संगठन मे वापसी भी हुई है लेकिन जिन कार्यकर्ताओ ने कांग्रेस के संघर्ष काल के समय बिना किसी उम्मीद के कांग्रेस संगठन को जिताने में अपना सब कुछ लगाया है और सरकार बनने के बाद उनकी कई उम्मीदे हैं जिनका पूरा ख्याल भूपेश बघेल  और उनके मंत्रियो को रखना होगा और ऐसे अवसर वादी बहरूपिये नेताओं को जीवन भर कांग्रेस संगठन मे प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए