चिराग राजनीति में नई संभावनाओं की खनक

चिराग राजनीति में नई संभावनाओं की खनक

21-Nov-2019

-ललित गर्ग-

देश की राजनीति में युवाओं का समुचित प्रतिनिधित्व न होना दर्शाता है कि क्रांति और बदलाव का जज्बा रखने वाला युवा इसे लेकर उदासीन है या उसकी संभावनाओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। यह वक्त की मांग हो चली है कि युवाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले। इस दृष्टि से केंद्रीय मंत्री, दलितों के बड़े नेता एवं लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने पिछले दिनों लोजपा की केंद्रीय कमान अपने 36 वर्षीय पुत्र चिराग पासवान को सौंपने का निर्णय लेकर न केवल बिहार की राजनीति में बल्कि समूची देश की राजनीति में युवा संभावनाओं को उजागर करने की खनक पैदा की है। यह वह आहट है जो भारत की राजनीति को एक नयी दिशा एवं दृष्टि प्रदत्त करेंगी। क्योंकि चिराग वोट की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक उत्थान की नीति के चाणक्य है।

भारतीय राजनीति में युवाओं की भागीदारी को लेकर अक्सर बड़ी-बड़ी बातें हर किसी मंच से होती रहती हैं लेकिन कोई दल उन्हें प्रतिनिधित्व का मौका नहीं देता क्योंकि उनकी नजर में युवा वोट भर हैं। राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल भीड़ और ट्रौलिंग के लिए करते रहते हैं। हालांकि इस मिथक को चिराग ने तोड़ा, 2014 के लोकसभा चुनाव में जमुई सीट पर 80 हजार से ज्यादा मतों से विजयी हुए थे तो एक ही संसदीय दौर में उन्होंने जनता का विश्वास इस कद्र जीता कि 2019 के चुनाव में चिराग ने 5 लाख से ज्यादा वोट हासिल करते हुए लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। बिहार के युवा सांसद चिराग पासवान सक्षम जनप्रतिनिधि के साथ-साथ मौलिक सोच एवं संवेदनाओं के प्रतीक हंै। उन्हें सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी होकर प्रासंगिक एवं अप्रासंगिक के बीच भेदरेखा बनाने एवं अपनी उपस्थिति का अहसास कराने का छोटी उम्र में बड़ा अनुभव है जो भारतीय राजनीति के लिये शुभता का सूचक है। लोकतंत्र का सच्चा जन-प्रतिनिधि वही है जो अपनी जाति, वर्ग और समाज को मजबूत न करके देश को मजबूत करें।

चिराग पासवाल भारत की राजनीति में एक मौलिक सोच के प्रतीक नेता के रूप में उभर रहे हैं और मौलिकता अपने आप में एक शक्ति होती है जो व्यक्ति की अपनी रचना होती है एवं उसी का सम्मान होता है। संसार उसी को प्रणाम करता है जो भीड़ में से अपना सिर ऊंचा उठाने की हिम्मत करता है, जो अपने अस्तित्व का भान कराता है। मौलिकता की आज जितनी कीमत है, उतनी ही सदैव रही है। जिस व्यक्ति के पास अपना कोई मौलिक विचार या कार्यक्रम है तो संसार उसके लिए रास्ता छोड़कर एक तरफ हट जाता है और उसे आगे बढ़ने देता है। मौलिक विचार तथा काम के नये तरीके खोज निकालने वाला व्यक्ति ही समाज एवं राष्ट्र की बड़ी रचनात्मक शक्ति होता है अन्यथा ऐसे लोगों से दुनिया भरी पड़ी है जो पीछे-पीछे चलना चाहते हैं और चाहते हैं कि सोचने का काम कोई और ही करे। चिराग ने भारत की राजनीति में युवा पीढ़ी के लिए कुछ नया सोचा है, कुछ मौलिक सोचा है, तो सफलता निश्चित है। वे इसी सोच से प्रदेश की राजनीति से केन्द्र की राजनीति की ओर अग्रसर होकर सफल नेतृत्व देने में सक्षम साबित होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

लोजपा अब पूरी तरह युवाओं के हाथ में है। चिराग युवा हैं, सक्षम है, प्रखर वक्ता है, कुशल संगठनकार एवं प्रबन्धक हैं और विगत में उन्होंने अनेक अवसरों पर अपनी इन क्षमताओं के साथ-साथ निर्णायकता साबित की है। कई मौकों पर यह बात सामने आई है कि बिहार के साथ-साथ केंद्रीय राजनीति के दांव-पेच और समीकरणों को भी वह अच्छी तरह जानने-समझने लगे हैं। हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित राजनीति के अगले ध्वजवाहक बनने और अपने लक्षित मतदाता समूह में पिता जैसी स्वीकार्यता पाने की होगी। चिराग नई लकीर खींचने में पारंगत है, वे अपने पिता की प्रतिच्छाया ही न बनकर कुछ नये प्रतिमान स्थापित करेंगे, राजनीति की नई परिभाषाएं गढ़ंगे। क्योंकि वे विपरीत स्थितियों में सामंजस्य स्थापित करके भरोसा और विश्वास का वातावरण निर्मित करने में दक्ष है।

युवापीढ़ी और उनके सपनों का मूच्र्छित होना और उनमें निराशा का वातावरण निर्मित होना- एक सबल एवं सशक्त राष्ट्र के लिये एक बड़ी चुनौती है। चिराग ने यह अनुभव किया, यह उनकी सकारात्मक राजनीति एवं मानवतावादी सोच का ही परिणाम है। चिराग इस मामले में अन्य क्षत्रप या नेता पुत्रों से थोड़ा अलग इसलिए भी हैं कि उनका नजरिया और अंदाज भविष्योन्मुखी और विकासवादी प्रतीत होता है। इधर हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चिराग की तारीफ की थी। इन सबके बावजूद यक्ष प्रश्न यह है कि क्या चिराग अपने पिता की दलित राजनीति की विरासत को कोई नया आयाम दे पाएंगे। या फिर वह इस विरासत से इतर मुख्यधारा की राजनीति में अपनी काबिलियत दिखाएंगे।

चिराग राजनीति की बारीकियों को समझने में माहिर है। राजनीति का मौसम विज्ञानी माने जाने वाले रामविलास शायद मोदी लहर का पूर्वानुमान लगाने में चूके हो लेकिन चिराग ने शायद मोदी की आंधी को भलीभांति भांप लिया था और वह किसी संशय में नहीं थे। ऐसे में अपने पिता की दुविधा दूर करते हुए उन्होंने एनडीए के पाले में जाने का दोटूक फैसला किया। चिराग का यह कदम ना सिर्फ सटीक साबित हुआ, बल्कि उसकी राजनीतिक क्षेत्र में व्यापक चर्चाएं भी होने लगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि रामविलास दलितों के एक बड़े नेता हैं और अपने मतदाता समूह में उनकी मजबूत स्वीकार्यता भी है। उनकी लोकप्रियता बिहार के बाहर अन्य प्रदेशों में भी है। इसलिए जहां तक विरासत की राजनीति का प्रश्न है तो चिराग के लिए पहली चुनौती तो अपने पिता जैसी स्वीकार्यता हासिल करने की रहेगी। 

उनके पास दलित सेना जैसा ताकतवर संगठन भी है। चिराग को पार्टी के सांगठनिक और प्रभाव विस्तार के काम में दलित सेना की मदद बेहद करीने से लेनी होगी। पार्टी की बागडोर थामने के बाद चिराग पर न केवल पार्टी की बल्कि विभिन्न राजनीतिक दलों की नजरें टिकी है कि वे अब कौन से सियासी रास्ते पर चलते हैं, कौनसे नये राजनीतिक प्रयोग करते हैं। सवाल यह है कि क्या वह अपने पिता की राजनीतिक छाया से इतर कोई अन्य रास्ता अपनाते हैं या फिर दलित राजनीति को एक युवा नेतृत्व देने के रास्ते पर ही आगे बढ़ेंगे। चिराग के पास फिलहाल विकल्प खुले हैं। हाल के समय में भारतीय राजनीति में नई पीढ़ी के कई नेता पुत्रों ने अभी तक कोई बहुत बड़ी उम्मीद नहीं जगाई है। चाहे राहुल गांधी हों या तेजस्वी यादव, फिलहाल इनके सियासी सितारे डूब-उतर रहे हैं। साथ ही अपने प्रभाव में निरंतरता बरकरार रखने में कहीं न कहीं चूक भी रहे हैं। हालांकि इन नामों की तुलना में चिराग के पास कोई बहुत बड़ी राजनीतिक विरासत तो नहीं है, लेकिन वे अपने होने का अहसास, कुछ अनूठा करने का एवं जनता के दिलों को जीतने का हूनर साबित किया है। बावजूद इसके उन्हें अब एक राष्ट्रीय नेता के रूप में खुद को साबित करना अभी बाकी है। फिलहाल उनके सामने झारखण्ड के चुनाव का मौका एकदम सामने है, जहां उन्हें खुद का साबित करना होगा।


खुशहाल बचपन हमारी सोच का संकल्प बने

खुशहाल बचपन हमारी सोच का संकल्प बने

13-Nov-2019

 ललित गर्ग

आजाद भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिवस 14 नवम्बर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, हममें से कई लोग सोचते हैं कि बाल दिवस को इतने उत्साह या बड़े स्तर पर मनाने की क्या जरूरत है। परन्तु आज देश का बचपन जिस बड़े पैमाने पर दबाव, हिंसा, शोषण का शिकार है, बाल दिवस मनाते हुए हमें बचपन की विडम्बनाओं एवं विसंगतियों से जुड़ी त्रासदियों को समाप्त करना चाहिए। ऐसा इसलिये भी जरूरी है कि बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है। यदि सात दशक तक बाल दिवस मनाते एवं बच्चों के उन्नत भविष्य बनाने का संकल्प दोहराते हुए बीत गया फिर भी बच्चों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों और शोषण के विरुद्ध हमने कोई सार्थक वातावरण निर्मित नहीं किया है तो यह विचारणीय स्थिति है।

ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं-ना-कहीं हमारे राष्ट्र के पहरूओं ने देश के बाल-निर्माण का सुनहरा भविष्य बुनते हुए कोई-ना-कोई त्रुटि की है। सोचने वाली बात है कि हमने बाल-दिवस को कोरा आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, प्रयोजनात्मक नहीं। यही कारण है कि इतने लम्बे सफर के बाद भी कहां फलित हो पाया है हमारी जागती आंखों से देखा बचपन को सुनहरा बनाने का स्वप्न? कहां सुरक्षित एवं संरक्षित हो पाया है हमारा बचपन? कहां अहसास हो सका बाल-चेतना की अस्मिता का? आज भी बाल जीवन न सुखी बना, न सुरक्षित बना और न ही शोषणमुक्त।

बच्चों के प्रति पंडित नेहरू के प्रेम को देखते हुए उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाने का मुख्य उद्देश्य यही था कि सभी भारतीय नागरिकांे को बच्चों के प्रति जागरूक करना ताकि सभी नागरिक अपने बच्चों को सही दिशा में सही शिक्षा एवं संस्कार दे, उनको शोषण एवं अपराधमुक्त परिवेश दे, उनकी प्रतिभा को उभारने का अवसर दे ताकि एक सुव्यवस्थित और सम्पन्न राष्ट्र का निर्माण हो सके जो की बच्चों के अच्छे भविष्य पर ही निर्भर करता है। लेकिन आज का बचपन केवल अपने घर में ही नहीं, बल्कि स्कूली परिवेश एवं समाज में दबाव एवं हिंसा का शिकार है। यह सच है कि इसकी टूटन का परिणाम सिर्फ आज ही नहीं होता, बल्कि युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यह एक महाबीमारी एवं त्रासदी का रूप ले लेता है। यह केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है।

बचपन से जुड़ी समस्याओं एवं त्रासद स्थितियों पर समय-समय पर अनेक शोध हुए है, इन शोधकर्ताओं का मानना है कि स्कूल और घर दोनों ही जगह ताकत का खेल चल रहा है। स्कूल का प्रबंधन तो अपना सारा रोबदाब बच्चों को ही दिखाता है। लेकिन घर में बालक माता-पिता के कुल दीपक और बुढ़ापे के सहारे हैं, अतः वे उन्हें सक्षम बनाने एवं दुनिया का अनोखा बालक का दर्जा दिलाने के लिये अपने व्यवहार को ही कटू एवं हिंसक बना देते हैं। यदि माता-पिता किसी ऊंच्चे पद पर हैं तो बच्चों का चरित्र उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। दोनों स्थानों में परिवार और स्कूल में लीक से हटने पर बच्चों के लिये दण्ड की व्यवस्था है। लड़कियों को धमकी दी जाती है कि यदि उन्होंने कोई गलती की तो उसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा।

विडम्बना यह है कि भारतीय बालक अपने अधिकारों से अनभिज्ञ हैं। यह काम शिक्षकों और पालकों को करना चाहिए किन्तु वे दोनों ही इनके प्रति उदासीन हैं। वे बाल अधिकार को अपनी सत्ता के लिए धमकी मानते हैं। संविधान में बच्चों के जीवन, विकास और सुरक्षा की व्यवस्था है। दण्ड को बालकों के अधिकारों का अतिक्रमण माना जाता है। लेकिन इन कानूनांे के होते हुए भी अज्ञानता के कारण बच्चे उनका लाभ नहीं ले पाते।

इस गंभीर होती समस्या से निजात पाने के लिये एक विस्तृत बाल संहिता तैयार की जाए और उसमें बालक के अधिकारों को शामिल किया जाए। हमें इसकी बड़ी जरूरत है। क्योंकि हमारे देश के लोगों के मन में बच्चों को लेकर महत्वाकांक्षाएं बड़ी गहराई से जमी हुई हैं। यही कारण है कि हमारे देश का बचपन संकट एवं अंधेरों से घिरा हैं। बचपन को इस संकट एवं उन पर हो रही हिंसा एवं दबा की त्रासदी से मुक्ति के लिये समय समय पर प्रयत्न होते रहे हैं। बी. आर. कृष्णन के सभापतित्व में विशेषज्ञों की एक समिति ने ‘चिल्ड्रन कोड बिल-2000’ तैयार किया था। इसमें सुझाया गया है कि एक राष्ट्रीय तथा सभी राज्यों के अपने-अपने कमीशन बनाए जाएं। ये कमीशन महिला कमीशन जैसे हों। कोड बिल के पालकों के इस दायित्व पर जोर दिया गया है कि वे बच्चों के साथ प्यार और दयालुता का व्यवहार करंे। परिवारों और स्कूलों में संवाद का माहौल बनना चाहिए ताकि बच्चों का स्वाभाविक विकास हो सके। ताकि बचपन के सामने आज जो भयावह एवं विकट संकट और दुविधा है उससे उन्हें छुटकारा मिल सके।

लंदन के लैंकस्टर यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट स्कूल के अर्थशास्त्र विभाग में असोसिएट रह चुकीं एम्मा गॉरमैन ने इस पर लम्बा शोध किया है। उन्होंने अपने इस शोध के लिए यूके के 7000 छात्र-छात्राओं को चुना। उन्होंने पहले उनसे तब बात की जब वे 14-16 की उम्र के थे। उसके बाद तकरीबन दस वर्षों तक उनसे समय-समय पर बातचीत की गई। गॉरमैन ने पाया कि बाल एवं किशोरावस्था के हिंसक एवं दबावपूर्ण वातावरण यानी बच्चों को अभित्रस्त करना, उन पर अनुचित दबाव डालना या धौंस दिखाना, चिढ़ाना-मजाक उड़ाना या पीटना की घटनाओं ने बच्चों के भीतर के आत्मविश्वास, स्वतंत्र व्यक्तित्व, मौलिकता, निर्णायक क्षमता का दीया बुझा दिया, समस्याओं से लड़ने की ताकत को कमजोर कर दिया, पुरुषार्थ के प्रयत्नों को पंगु बना दिया।

बच्चा अपनी मर्जी से कुछ भी करता है या अपनी आंखों से दुनिया देखने की कोशिश करने लगता है तो उसे मौखिक उपदेश से लेकर पिटाई तक झेलनी पड़ती है। उसे वह बनने की कवायद करनी पड़ती है जो घर के लोग चाहते हैं। इस तरह उसकी इच्छा, कल्पनाशीलता और सर्जनात्मकता की बलि चढ़ जाती है। घर में आमतौर पर संवादहीनता का माहौल रहता। मां-बाप बच्चों से बात नहीं करते। उसकी शिकायतों, उसकी परेशानियों को जानने की कोशिश नहीं करते। ऐसे में बच्चे के भीतर बहुत सी बातें दबी रह जाती हैं जो धीरे-धीरे कुंठा का रूप ले लेती हैं, जो आगे जाकर बच्चों को मनोरोगी बना देती है।

स्कूली परिवेश एवं घर के माहौल में बच्चों के साथ होने वाले नकारात्मक प्रभाव वयस्क होने के बाद जब सामने आता है तो वहां एक ऐसी ढलान होती है जहां संभावनाभरे इंसान का जन्म असंभव हो जाता है। हमें उन धारणाओं एवं मान्यताओं को बदलना होगा जो बच्चों पर दबाव एवं हिंसा की त्रासदी का आधार है, जिनको सन्दर्भ बनाकर हमने गलतफहमियों, सन्देहों और अपनी महत्वाकांक्षाओं की दीवारें इतनी ऊंची खड़ी कर दी कि बचपन ही संकट में आ गया है। आधुनिकता के इस युग में सभी अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा खूब पढ़े और इंजीनियर, डॉक्टर या कोई आईपीएस अधिकारी बने इसके लिये माता-पिता शुरू से ही बच्चे से अतिश्योक्तिपूर्ण अपेक्षाएं रखते हैं और इसके लिये उसे अभित्रस्त करते हैं, उस पर अनुचित दबाव डालते हैं और हिंसक हो जाते हैं।

इस बीच अभिभावक या शिक्षक बच्चे की क्षमता को परखना भूल जाते हैं, उस पर दबाव एवं धौंस जमाने, उसको डराने, चिढ़ाने, मजाक उड़ाने या पीटने के कारण बच्चा बेहतर रिजल्ट देने के बजाय कमजोर हो जाता है, उसकी नैसर्गिक क्षमताएं अवरुद्ध हो जाती है। इसके कारण बाल एवं किशोरावस्था में दबाव, शोषण एवं हिंसा का शिकार होने वालें बच्चों में से 40 प्रतिशत के मनोरोगी होने की आशंका रहती है। मनोरोग के लक्षण प्रायः तब उभरते हैं जब बच्चे 20-25 की उम्र में पहुंचते हैं। मनोरोगों में डिप्रेशन प्रमुख होता जिसके चलते उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कत होती है।

बाल दिवस केवल एक दिन स्कूलों में मना लेने से इस दिवस का उद्देश्य खत्म नहीं हो जाता है क्योंकि आज भी हमारे देश में बालमजदूरी, यौन शोषण, दबाव एवं हिंसा जैसे जघन्य अपराध होते रहते है। जिस उम्र में बच्चो के हाथ में किताबे होनी चाहिए उस उम्र में इन बच्चों को आर्थिक कमजोरी के चलते इन्हें काम करने पर मजबूर कर दिया जाता है, जिसके चलते इनके जीवन में पढाई का कोई महत्व नहीं रह जाता है ऐसे में अगर बच्चे पढ़-लिख न सके तो एक विकसित राष्ट्र का सपना कैसे आकार लेगा? ऐसे में बस यही प्रश्न उठता है हमारे देश की सरकारों को बच्चों  को बालमजदूरी, यौन-शोषण, पारिवारिक हिंसा से बचाने के लिए कानून का निर्माण किया जाय और पूरी सख्ती से इसे लागू भी किया जाय। साथ में इन बच्चों  के पढाई के खर्चों को भारतीय सरकारों को एक सीमा तक खुद उठाना चाहिए तभी हम एक विकसित राष्ट्र का सपना देख सकते है और तभी बाल दिवस मनाने का उद्देश्य भी पूरा होगा।


लोकतंत्र लोक-सुख का है या लोक-दुःख का?

लोकतंत्र लोक-सुख का है या लोक-दुःख का?

05-Nov-2019

-ः ललित गर्ग:-

देश के सामने हर दिन नयी-नयी समस्याएं खड़ी हो रही हैं, जो समस्याएं पहले से हैं उनके समाधान की तरफ एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि दूर होते जा रहे हैं। रोज नई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, कर रहे हैं। तब ऐसा लगता है कि पुरानी समस्याएं पृष्ठभूमि में चली गईं पर हकीकत में वे बढ़ रही हैं। हम जिस लोकतंत्र में जी रहे हैं वह लोक-सुख का लोकतंत्र है या लोक-दुःख का? हम जो स्वतंत्रता भोग रहे हैं वह नैतिक स्वतंत्रता है या अराजक? हमने आचरण की पवित्रता एवं पारदर्शिता की बजाय कदाचरण एवं अनैतिकता की कालिमा का लोकतंत्र बना रखा है। ऐसा लगता है कि धनतंत्र एवं सत्तातंत्र ने जनतंत्र को बंदी बना रखा है।

हमारी न्याय-व्यवस्था कितनी भी निष्पक्ष, भव्य और प्रभावी हो, फ्रांसिस बेकन ने ठीक कहा था कि ‘यह ऐसी न्याय-व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति की यंत्रणा के लिये दस अपराधी दोषमुक्त और रिहा हो सकते हैं।’ रोमन दार्शनिक सिसरो ने कहा था कि ‘मनुष्य का कल्याण ही सबसे बड़ा कानून है।’ लेकिन हमारे देश के कानून एवं शासन व्यवस्था को देखते हुए ऐसा प्रतीत नहीं होता, आम आदमी सजा का जीवन जीने को विवश है। सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक एकता भंग नहीं की जा सकती। नहीं तो फिर रह क्या जाएगा हमारे पास। टमाटर, प्याज के आसमान छूते भाव- प्रतिदिन कोई न कोई कारण महंगाई को बढ़ाकर हम सबको और धक्का लगा जाता है और कोई न कोई टैक्स, अधिभार हमारी आय को और संकुचित कर जाता है। जानलेवा प्रदूषण ने लोगों की सांसों को बाधित कर दिया, लेकिन हम किसी सम्यक् समाधान की बजाय नये नियम एवं कानून थोप कर जीवन को अधिक जटिल बना रहे हैं।

आम चुनाव से ठीक पहले बेरोजगारी से जुड़े आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट लीक हो गई थी और नरेन्द्र मोदी सरकार की दूसरी पारी की शुरूआत में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में इसकी पुष्टि भी कर दी गई है। लेकिन प्रश्न है कि रोजगार को लेकर सरकार ने क्या सार्थक कदम उठाये हैं? कोरे सर्वे करवाने या समितियां बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अक्सर बेरोजगारी, महंगाई, प्रदूषण, भ्रष्टाचार जैसी बड़ी समस्याओं की भयावह तस्वीर सामने आती है तो इस तरह की समितियां बन जाती हैं। जो केवल तथ्यों का अध्ययन करती हैं कि कितने युवाओं को रोजगार मिला व कितने बेरोजगार रह गए।

लेकिन प्रश्न है कि क्या ये समितियां या सर्वे रोजगार के नये अवसरों को उपलब्ध कराने की दिशा में बिखरते युवा सपनों पर विराम लगाने का कोई माध्यम बनते है? लोकतंत्र का लोक चाहे वह युवा हो या वृद्ध, उस पर व्यवस्था की कोई दया नहीं, संवेदना नहीं। सरकार किसी भी पार्टी की हो, सत्ता पर काबिज दल सर्वप्रथम अपना ही सुख, अपनी सुरक्षा एवं अपना ही स्थायित्व सुरक्षित करता है। सत्तासीन लोगों को न गैस का संकट, न उसकी कीमत बढ़ने-बढ़ाने का संकट, उनके लिये न आधार कार्ड के लिये कतार में खड़े होकर कार्ड बनावाने का संकट, न राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट, पैन कार्ड, आईडी कार्ड बनवाने का संकट  न चालान कटने का भय, न चालान जमा करवाने का संकट। यह कैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसमें जन-धन पर कुछ लोग सुख- सुविधाओं को भोगते है जबकि आम आदमी परेशानियों एवं समस्याओं को जीने को विवश है।

मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों का चाहे जितना बखान करें, सच यह है कि आम आदमी की मुसीबतें एवं तकलीफें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इसके बजाय रोज नई-नई समस्याएं उसके सामने खड़ी होती जा रही हैं, जीवन एक जटिल पहेली बनता जा रहा है। अगर हमारे सात दशक से अधिक बड़े लोकतंत्र में आज भी आम आदमी मजबूर है, परेशान है, समस्याग्रस्त है तो ये मजबूरियां, परेशानियां, समस्याएं  किसने पैदा की है? अमीरों के लिये तो सरकारी खजाने एवं सुविधाएं ही नहीं, बैंकों के कर्ज-कपाट खुले हैं, लेकिन आम आदमी, देश के युवाओं को कितना कर्ज और कितना धन सुलभता से मिल रहा है, यह प्रश्न मंथन का है।

कर्ज का धन जन के कल्याण एवं आर्थिक सुदृढ़ता के लिये कितना लगाया जाता है? सरकारों के पास शक्ति के कई स्रोत है, लेकिन इस शक्ति से कितनों का कल्याण हो रहा है? कैसा विचित्र लोकतंत्र है जिसमें नेता एवं नौकरशाहों का एक संयुक्त संस्करण केवल इस बात के लिये बना है कि न्याय की मांग का जबाव कितने अन्यायपूर्ण तरीके से दिया जा सके। महंगाई के विरोध का जबाव महंगाई बढ़ा कर दो, रोजगार की मांग का जबाव नयी नौकरियों की बजाय नौकरियों में छंटनी करके दो, कानून व्यवस्था की मांग का जबाव विरोध को कुचल कर आंसू गैस, जल-तोप और लाटी-गोली से दो। नेता एवं नौकरशाह केवल खुद की ही न सोचें, अपने परिवार की ही न सोचें, जाति की ही न सोचें, पार्टी की ही न सोचें, राष्ट्र की भी सोचें। क्या हम लोकतंत्र को अराजकता की ओर धकेलना चाह रहे हैं?  नेतृत्व आज चुनौतीभरा अवश्य है, विकास का मंत्र भी आकर्षक है, लेकिन सबसे बड़ा विकास तभी संभव है जब जनता खुश रहे, निर्भार रहे, सुखी रहे और लगे कि यह जनता के सुख का लोकतंत्र है।

 विकास की लम्बी-चोड़ी बातें हो रही हैं, विकास हो भी रहा है, देश अनेक समस्याओं के अंधेरों से बाहर भी आ रहा है। आम जनता के चेहरों पर मुस्कान भी देखने को मिल रही है, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, प्रदूषण, नारी सुरक्षा क्यों नहीं सुनिश्चित हो पा रही है? भारत में भी विकास की बातें बहुत हो रही हैं, सरकार रोजगार की दिशा में भी आशा एवं संभावनाभरी स्वयं को जाहिर कर रही है। यह अच्छी बात है।

लेकिन जब युवाओं से पूछा जाता है तो उनमें निराशा ही व्याप्त है। उनका कहना है कि बात केवल किसी भी तरह के रोजगार हासिल करने की नहीं है बल्कि अपनी मेहनत, शिक्षा, योग्यता और आकांक्षा के अनुरूप रोजगार प्राप्त करने की है। ऐसा रोजगार मिलना कठिन होता जा रहा है। उच्च शिक्षा एवं तकनीकी क्षेत्र में दक्षता प्राप्त युवाओं को सुदीर्घ काल की कड़ी मेहनत के बाद भी यदि उस अनुरूप रोजगार नहीं मिलता है तो यह शासन की असफलता का द्योतक हैं। डॉक्टर, सीए, वकील, एमबीए, ऐसी न जाने कितनी उच्च डिग्रीधारी युवा पेट भरने के लिये मजदूरी या ऐसे ही छोटे-मोटे कामों के लिये विवश हो रहे हैं, यह शासन व्यवस्था की नीतियों पर एक बड़ा प्रश्न है। हमें राष्ट्रीय स्तर से सोचना चाहिए वरना इन त्रासदियों से देश आक्रांत होता रहेगा।


आधुनिक भारत के शिल्पी थे सरदार पटेल

आधुनिक भारत के शिल्पी थे सरदार पटेल

31-Oct-2019

लेख : ललित गर्ग 

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन एवं आजादी के बाद आधुनिक भारत को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार वल्लभभाई पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण, ऐतिहासिक एवं स्वर्णिम स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। भारत की मादी को प्रणम्य बनाने एवं कालखंड को अमरता प्रदान करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी अखण्ड भारत को लेकर जितनी बड़ी कल्पनाएं थी, जितने बड़े सपने थे, उसी के अनुरूप लक्ष्य बनाये और उतने ही महत्वपूर्ण कार्य किये। उनके कठोर व्यक्तित्व में बिस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी।

जिस अदम्य उत्साह, असीम शक्ति एवं कर्मठता से उन्होंने नवजात भारत गणराज्य की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र पर वे एक अमिट आलेख बन गये। राजनीतिक कारणों से इस लोकपुरुष को उतना गौरवपूर्ण स्थान नहीं मिला, जितना अपेक्षित था। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने इस कमी को पूरा किया। इस वर्ष उनका 144वां जन्म दिवस देशभर के विश्वविद्यालयों और स्कूलों में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है और एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय एकता दौड़ का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर असंख्य देशवासी देश की एकता, अखंडता व सुरक्षा को बनाये रखने और आंतरिक सुरक्षा में अपना योगदान देने की शपथ लेंगे। पिछले वर्ष जयंती के मौके पर गुजरात के केवड़िया में उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का अनावरण भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। उनके व्यक्तित्व के अनुरूप प्रतिमा का निर्मित होना एवं राष्ट्रीय एकता दिवस का आयोजन, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

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सरदार पटेल भारत के देशभक्तों में एक अमूल्य रत्न थे। वे आधुनिक भारत के शक्ति स्तम्भ थे। आत्म-त्याग, अनवरत सेवा तथा दूसरों को दिव्य-शक्ति की चेतना देने वाला उनका जीवन सदैव प्रकाश-स्तम्भ की अमर ज्योति रहेगा। वे मन, वचन तथा कर्म से एक सच्चे भारतीय एवं भारतीयता के प्र्रतीक पुरुष थे। वे वर्ण-भेद तथा वर्ग-भेद के कट्टर विरोघी थे। वे अन्तःकरण से निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासन प्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता एवं अनूठी प्रशासनिक क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय अलंकरण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था। संघर्ष को वे जीवन की व्यस्तता समझते थे। गांधीजी के कुशल नेतृत्व में सरदार पटेल का स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण रहा है। स्वतन्त्रता उपरान्त अदम्य साहस से उन्होंने देश की विभिन्न 562 रियासतों का विलीनीकरण किया तथा भारतीय प्रशासन को निपुणता तथा स्थायित्वता प्रदान किया।

सरदार पटेल का जन्म गुजरात के नडियाद (ननिहाल) में 31 अक्टूबर 1875 को हुआ। उनका पैतृक निवास स्थान गुजरात के खेड़ा के आनंद तालुका में करमसद गांव था। वे अपने पिता झवेरभाई पटेल तथा माता लाडबा देवी की चैथी संतान थे। उनका विवाह 16 साल की उम्र में झावेरबा पटेल से हुआ। उन्होंने नडियाद, बड़ौदा व अहमदाबाद से प्रारंभिक शिक्षा लेने के उपरांत इंग्लैंड मिडल टैंपल से लॉ की पढ़ाई पूरी की एवं 22 साल की उम्र में जिला अधिवक्ता की परीक्षा उत्तीर्ण कर बैरिस्टर बनेें। वे कितने मेधावी थे इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1910 में वे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और लॉ का कोर्स उन्होंने आधे वक्त में ही पूरा कर लिया। इसके लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला। इसके बाद वेे भारत लौट आए और स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने लगे। सरदार पटेल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान 1917 में खेड़ा किसान सत्याग्रह, 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1924 में बोरसद सत्याग्रह के उपरांत 1928 में बारडोली सत्याग्रह में देकर अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम की।

सरदार पटेल का व्यक्तित्व विवादास्पद रहा है। प्रायः उन्हें ‘असमझौतावादी’’, ‘पूँजी समर्थक’, ‘मुस्लिम विरोधी’, तथा ‘वामपक्ष विरोधी’ कहा जाता है। पटेल की राजनीतिक भूमिका, योगदान तथा चिंतन का सही विश्लेषण किया जाना एवं उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लेकर पैदा की गयी भ्रान्तियाँ दूर कर पक्षपातों तथा पूर्वाग्रहों से रहित वास्तविक तथ्यों को उजागर किये जाने के प्रयास किये जाने अपेक्षित है। उनके राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित उपेक्षित या छिपे हुए महत्त्वपूर्ण तथ्यों को सामने लाकर उसका आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाये, ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम एवं आधुनिक भारत के निर्माण के प्रारंभिक इतिहास का वास्तविक स्वरूप सामने आये।

1947 में भारत को आजादी तो मिली लेकिन बिखरी हुई। देश में कुल 562 रियासतें थीं। कुछ बेहद छोटी तो कुछ बड़ी। ज्यादातर राजा भारत में विलय के लिए तैयार थे। लेकिन, कुछ ऐसे भी थे जो स्वतंत्र रहना चाहते थे। यानी ये देश की एकता के लिए खतरा थे। सरदार पटेल ने इन्हें बुलाया और समझाया। वे मानने के लिए तैयार नहीं हुए तो पटेल ने सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया। आज एकता के सूत्र में बंधे भारत के लिए देश सरदार पटेल का ही ऋणी है। कहा जाता है कि एक बार उनसे किसी अंग्रेज ने इस बारे में पूछा तो सरदार पटेल ने कहा- मेरा भारत बिखरने के लिए नहीं बना। फ्रैंक मोराएस ने लिखा भी है- ‘‘एक विचारक आपका ध्यान आकर्षित करता है, एक आदर्शवादी आदर का आह्वान करता है, पर कर्मठ व्यक्ति, जिसको बातें कम और काम अधिक करने का श्रेय प्राप्त होता है, लोगों पर छा जाने का आदी होता है, और पटेल एक कर्मठ व्यक्ति थे।’’

निःसंदेह स्वतंत्र भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार पटेल भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी योद्धा व भारत सरकार के आधार स्तंभ थे। आजादी से पहले भारत की राजनीति में इनकी दृढ़ता और कार्यकुशलता ने इन्हें स्थापित किया और आजादी के बाद भारतीय राजनीति में उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों को देश के अनुकूल बनाने की क्षमताओं ने सरदार पटेल का कद काफी बड़ा कर दिया। भारत तो आजाद हो गया, लेकिन असली चुनौती थी 562 रियासतों को अखण्ड भारत में शामिल करने की। निःसंदेह सरदार पटेल द्वारा रियासतों का एकीकरण विश्व इतिहास का एक आश्चर्य था। भारत की यह रक्तहीन क्रांति थी।

सरदार पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर अपनी लाल पैंसिल घुमाते हुए केवल इतना पूछा कि ‘क्या मर्जी है?’ राजा कांप उठा। आखिर 15 अगस्त 1947 तक केवल तीन रियासतें-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद छोड़कर उस लौह पुरुष ने सभी रियासतों को भारत में मिला दिया। इन तीन रियासतों में भी जूनागढ़ को 9 नवम्बर 1947 को मिला लिया गया तथा जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। 1948 में हैदराबाद भी केवल 4 दिन की पुलिस कार्रवाई द्वारा मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था। पटेल ने इन्हें एक सूत्र में पिरोया और वह काम कर दिखाया जिसकी उस वक्त कल्पना भी कठिन थी। अटल इरादों और लौह इच्छाशक्ति के कारण ही उन्हें लौह पुुरुष कहा जाता है। महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को इन रियासतों के बारे में लिखा था, ‘रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।’

सरदार पटेल गृहमंत्री के रहते जहां पाकिस्तान की छद्म व चालाकीपूर्ण चालों से सतर्क थे वहीं देश के विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। विशेषकर वे भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी भक्ति से सजग थे। अनेक विद्वानों का कथन है कि सरदार पटेल बिस्मार्क की तरह थे। लेकिन लंदन के टाइम्स ने लिखा था ‘बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के सामने महत्वहीन रह जाती हैं।’ यदि पटेल के कहने पर चलते तो कश्मीर, चीन, तिब्बत व नेपाल के हालात आज जैसे न होते। पटेल सही मायनों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा महाराज शिवाजी की दूरदर्शिता थी। वे केवल सरदार ही नहीं बल्कि भारतीयों के हृदय के सरदार थे।

जहां तक कश्मीर रियासत का प्रश्न है इसे पंडित नेहरू ने स्वयं अपने अधिकार में लिया हुआ था, परंतु यह सत्य है कि सरदार पटेल कश्मीर में जनमत संग्रह तथा कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने पर बेहद क्षुब्ध थे। यद्यपि विदेश विभाग पं॰ नेहरू का कार्यक्षेत्र था, परंतु कई बार उप-प्रधानमंत्री होने के नाते कैबिनेट की विदेश विभाग समिति में उनका जाना होता था। उनकी दूरदर्शिता का लाभ यदि उस समय लिया जाता तो अनेक वर्तमान समस्याओं का जन्म न होता। 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और चीन का रवैया कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बतलाया था।

अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था। उन्होंने यह भी लिखा था कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। 1950 में नेपाल के संदर्भ में लिखे पत्रों से भी पं॰ नेहरू सहमत न थे। 1950 में ही गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में चली दो घंटे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्ता सुनने के पश्चात सरदार पटेल ने केवल इतना कहा ‘क्या हम गोवा जाएंगे, केवल दो घंटे की बात है।’ नेहरू इससे बड़े नाराज हुए थे। यदि पटेल की बात मानी गई होती तो 1961 तक गोवा की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा न करनी पड़ती।

गृहमंत्री के रूप में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) बनाया। अंग्रेजों की सेवा करने वालों में विश्वास भरकर उन्हें राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ा। यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष जीवित रहते तो संभवतः नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता। पडौसी देशों एवं कश्मीर की समस्या भी इतनी लम्बी नहीं होती। क्योंकि सरदार पटेल  शास्त्रों के नहीं, शस्त्रों के पुजारी थे। पटेल अखण्ड एवं सुदृढ़ भारत का सपना देखते थे।


झारखंड में लिंचिंग से सात लोगों की मौत, लेकिन NCRB की रिपोर्ट में ऐसा कोई मामला नहीं है

झारखंड में लिंचिंग से सात लोगों की मौत, लेकिन NCRB की रिपोर्ट में ऐसा कोई मामला नहीं है

28-Oct-2019

रांची : झारखंड में 2017 में भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाओं में अफवाहों के कारण सात लोगों की मौत के बावजूद, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2017 की रिपोर्ट, जो हाल ही में जारी की गई थी, में कहा गया है कि राज्य में “फेक न्यूस और अफवाहों” के प्रचलन की वजह से शून्य घटनाएं देखी गईं। यह पहली बार IPC धारा 505 के तहत दर्ज की गई एफआईआर के आधार पर “झूठी / फर्जी समाचार और अफवाहों” के तहत डेटा एकत्र किया गया था या सम्मान के साथ IPC 505 आईटी अधिनियम के लिए।

18 मई,2017 में, सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाली बाल-अफवाहों पर झारखंड के सरायकेला-खरसावां और पूर्वी सिंहभूम जिलों में भीड़ की हिंसा में सात लोगों की मौत हो गई। एक स्थानीय समाचार चैनल के पत्रकार सहित दो लोगों को सोशल मीडिया पर लोगों को बाल-चोरों से सावधान करने वाले संदेशों को पोस्ट करने के लिए गिरफ्तार किया गया था, जो पुलिस के अनुसार, आतंक फैल गया और सरायकेला-खरसावां के बागबेड़ा और पूर्वी सिंहभूम के राजनगर में भीड़ के हमलों का कारण बना।
इसके अलावा, पिछले तीन वर्षों में राज्य में 21 मौतों की पृष्ठभूमि के खिलाफ देखा जा सकता है, क्योंकि पशु वध, चोरी, बच्चों को उठाने वाली अफवाहों के संदेह में भीड़ हिंसा के कारण दिखाई देती है। इसके अलावा, जनवरी 2017 से राज्य में जादू टोना के संदेह पर भीड़ की हिंसा में 90 से अधिक लोग मारे गए हैं। 2017 की घटनाओं के बाद, संदेश फैलाने वाले लोगों के खिलाफ अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसमें पुलिस ने कहा कि जादुगोड़ा, हल्दीपोखर, बागबेड़ा और घाटशिला क्षेत्रों के कई गांवों में दहशत पैदा की।

आईपीसी की धारा 505, 153 ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना, और सद्भाव के रखरखाव के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण कार्य करना), और 34 (आम इरादा) के तहत पहला मामला दो व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज किया गया था। दूसरी प्राथमिकी IPC 153 (एक पोस्ट को अग्रेषित करने वाले स्थानीय पत्रकार के खिलाफ दंगा भड़काने के इरादे से भड़काऊ बयान देने) के तहत दर्ज की गई थी।

क आरोपी को बाद में पूर्वी सिंहभूम सत्र न्यायालय ने जमानत दे दी थी। पहली घटना 18 मई, 2017 की सुबह हुई, जब चार लोग, हलीम, नईम, सज्जाद और सिराज खान, शोभापुर और पदनामसाई में सरायकेला-खरसावा जिले में बाल-उत्पीड़न की अफवाहों के कारण लुट गए। भीड़ ने बचाव के लिए गए पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया। दो मामले दर्ज किए गए – एक हत्याओं के लिए और दूसरा लोक सेवक को ड्यूटी से रोकने के लिए। पहले मामले में सुनवाई चल रही है। दूसरे में, 2018 में एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 12 लोगों को दोषी ठहराया और उन्हें “सरकारी अधिकारियों को ड्यूटी पर बाधा डालने और हमला करने, घातक हथियारों से हमला करने, दूसरे के घर में घुसने, कानून और व्यवस्था में गड़बड़ी करने, सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए चार साल की सजा सुनाई।”
दूसरी घटना 18 मई की शाम को हुई। भाई विकास वर्मा और गौतम वर्मा, उनकी दादी राम चंद्र देवी और उनके दोस्त गंगेश गुप्ता पर बच्चे को उठाने वाली अफवाहों पर भीड़ द्वारा हमला किया गया था। हमले में भाइयों और उनकी दादी की मौत हो गई थी। लिंचिंग के मामले में कुल 26 लोगों को गिरफ्तार किया गया था और वर्तमान में उन पर मुकदमा चल रहा है। NCRB रिपोर्ट डेटा को “राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा प्रदान किए गए डेटा” का श्रेय देती है।
जबकि ADG एमएल मीणा ने कॉल और मैसेज का जवाब नहीं दिया, तत्कालीन डीएसपी लॉ एंड ऑर्डर और वर्तमान में मुख्यमंत्री की सुरक्षा में विमल कुमार ने कहा, “अफवाह फैलाने के लिए IPC 505 के तहत मामला दर्ज किया गया था और एक कारण था जिसके कारण लिंचिंग हुआ। इसे एनसीआरबी डेटा में क्यों नहीं डाला गया, इसकी जाँच करने की आवश्यकता है। ”


अपराध जगत का सरताज बना 'योगी' का उत्तर प्रदेश

अपराध जगत का सरताज बना 'योगी' का उत्तर प्रदेश

25-Oct-2019

कृष्ण देव सिंह सम्पादक : बुधवार मल्टीमीडिया नेटवर्क

मेरे मन में उत्तरप्रदेश व पश्चिम बंगाल के बारे में हमेशा अच्छी धारणा रही है। बचपन से ही दोनों प्रदेशों की धार्मिक तथा आध्यात्मिक महत्व को लेकर आदर भाव रहा है। शायद इसकी सबसे बड़ी वजह भिलाई तभा रायपुर में मेरे सम्पर्क में आने वाले वे सभी लोग हैं जो छत्तीसगढ़ तथा बिहार के बारे में बहुत ही गंदी व स्तरहीन धारणा रखते है तथा अपने-अपने राज्यों और संस्कृति को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयत्न करते रहते थे। लेकिन किसी न किसी कारण पिछले चार-पांच वर्षो से छत्तीसगढ़ के अलावा उत्तरप्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल के दुरस्त अंचलों में जाना पड़ रहा है।  इन राज्यों से जुड़ी खबरों और मेरी प्रत्येक यात्रा सिद्ध करती है कि अपने आपको श्रेष्ठता का दंभ पालने वालों का चेहरे का रंग लगातार फीका पड़ता जा रहा है और अब तो उत्तर प्रदेश पुरे देश में अपराध जगत का सरताज होने का खिताब पाकर प्रथम स्थान प्राप्त कर चुका है ।          

पिछले दिनों नेशनल क्राइम रिकार्ड की अधिकृत आंकड़े जारी किये गये । ताजा आकड़ों के अनुसार पिछले दो वर्षों में लगातार अपराध के हर क्षेत्रों में लगातार वृद्धि हो रही है और झ्स क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश सबसे आगे ह्रै | एनसीआरबी के अनुसार अकेले उ.प्र. में देश के कुल अपराध का 10.1%अपराध हुआ है। वर्ष 2016 में 2 लाख 82 हजार 171 मामले तथा वर्ष 2017 में 3 लाख 10 हजार 84 अपराध दर्ज किये गये है । इतना ही नही महिला अत्याचार में भी 14% है तथा वर्ष 2016 में 49262 तथा 2017 में 56151 मामले पंजीकृत किये गये है । दलित अत्याचार में भी वर्ष 2016 में 10426 तथा 2017 में 11444 मामलो के साथ प्रथम स्थान पर हैं । अपहरण के मामलों 20.8% अंक पाकर शिखर पर हैं | वर्ष2016 में 20649 तथा 2017 में छलांग मारकर 40971 मामले दर्ज कराने में सफल हुए । हालांकि संतोष की बात यही है कि संगठित अपराध में कमी आई है।
     

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो  यानी एनसीआरबी देश भर में अपराध के आंकड़ो का ब्योरा रखने वाली संस्था है जो हर वर्ष अपराध से संबंधित आंकड़े जारी करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1986 में की गई ताकि अपराध की अपराधियों से जोड़कर खोज की जा सके । यह संस्था देश की गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इनके आंकड़े के अनुसार देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है और यह वृद्धि लगभग सभी राज्यों में हुई है। आंकड़ो के अनुसार माहिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तरप्रदेश के बाद दूसरे पायदान पर महाराष्ट्र है जहाँ 56011के मुकाबले 31979 मामले दर्ज किए गए । 

जबकि देश भर मे वर्ष 2015 में 3,29,243, वर्ष 2016 में 3,38,954 तथा वर्ष 2017 में 3,59,849 मामले दर्ज किए गये हैं। आंकड़े के अनुसार देश भर में वर्ष 2017 में संगीन अपराध के 50 लारव केस दर्ज हुए जो कि वर्ष 2016 के मुकाबले में 3.6% ज्यादा है । लेकिन हत्या के मामले में 3.6% की कमी आई है । जबकि अपहरण के मामले में वृद्धि हुई है। आईपीसी के तहत देश भर में कुल 30,62,579 मामले दर्ज हुए हैं,जबकि 2016 में यह आंकड़ा  29,75,711 था। जहाँ तक सवाल राज्यों का है तो इस मामले में भी उप्र० प्रथम, महाराष्ट्र द्वितीय, मध्यप्रदेश तृतीय फिर केरल, दिल्ली है । अपहरण के मामले के 21% उप्र० में दर्ज हैं जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है व तीसरे स्थान पर बिहार है। महिलाओं की तरह बच्चों के खिलाफ मामलों में भी देश भर में  वृद्धि हुई है और झ्स मामलों में भी उत्तरप्रदेश सबसे आगे है।
         

भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में दर्ज है जबकिओडिशा दूसरे स्थान पर है । आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2017 में भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम व संबंघित घाराओं में कुल 4,062 मामले दर्ज की गई जिनमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर रहा । कर्नाटक में मामले तो कम दर्ज हुए लेकिन बढ़ोत्तरी सबसे ञ्यादा दर्ज की गई 1 वर्ष 2016 में 25 मामलों की तुलना में 2017 में यहाँ 289 मामले दर्ज हुए । दिलचस्प बात यह भी है कि सिक्कीम एकमात्र ऐसा राज्य है जहॉं भ्रष्टाचार के एक भी मामले दर्ज नही हुए। दूसरे स्थान पर मध्यप्रदेश,तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र,चौथे स्थान पर दिल्ली और पांचवे स्थान पर छत्तीसगढ़ है। उपरोक्त अधिकृत आंकड़े बताती है कि देश भर में उत्तर प्रदेश अपराध जगत का सरताज बन चुका है जबकि केन्द्र शासित प्रदेशों में झ्स मामले में दिल्ली सबसे अव्वल है। 


समाज महिलाओं की प्रतिभा को उचित सम्मान दे

समाज महिलाओं की प्रतिभा को उचित सम्मान दे

24-Oct-2019

डॉ नीलम महेंद्र लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं

समय निरंतर बदलता रहता है, उसके साथ समाज भी बदलता है और सभ्यता भी विकसित होती है।लेकिन समय की इस यात्रा में अगर उस समाज की सोच नहीं बदलती तो वक्त ठहर सा जाता है।  1901 में जब नोबल पुरस्कारों की शुरुआत होती है और 118 सालों बाद  2019 में जब  नोबल पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा होती है तो कहने को इस दौरान 118 सालों का लंबा समय बीत चुका होता है लेकिन महसूस कुछ ऐसा होता है कि जैसे वक्त थम सा गया हो।

क्योंकि 2019 इक्कीसवीं सदी का वो दौर है जब विश्व भर की महिलाएं डॉक्टर इंजीनियर प्रोफेसर पायलट वैज्ञानिक से लेकर हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं।  यहाँ तक कि हाल ही के भारत के महत्वकांक्षी चंद्रयान 2 मिशन का नेतृत्व करने वाली टीम में दो महिला वैज्ञानिकों के अलावा पूरी टीम में लगभग 30% महिलाएं थीं। कमोबेश यही स्थिति विश्व के हर देश के उन विभिन्न चनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी महिलाओं के होने की है जो महिलाओं के लिए वर्जित से माने जाते थे जैसे खेल जगत,सेना, पुलिस, वकालत, रिसर्च आदि।

सालों के इस सफर में यद्यपि महिलाओं ने एक लंबा सफर तय कर लिया लेकिन 2019 में भी जब नोबल जैसे अन्य प्रतिष्ठित  पुरुस्कार पाने वालों के नाम सामने आते हैं  तो उस सूची को देखकर लगता है कि सालों का यह सफर केवल वक्त ने तय किया और महिला कहीं पीछे ही छूट गई। शायद इसलिए 2018 में पिछले 55 सालों में भौतिकी के लिए नोबल पाने वाली पहली महिला वैज्ञानिक डोना स्ट्रिकलैंड ने कहा था, "मुझे हैरानी नहीं है कि अपने विषय में नोबल पाने वाली 1901 से लेकर अब तक मैं तीसरी महिला हूँ, आखिर हम जिस दुनिया में रहते हैं वहाँ पुरूष ही पुरूष तो नज़र आते हैं।"  आश्चर्य नहीं कि  97% विज्ञान के नोबल पुरस्कार विजेता पुरूष वैज्ञानिक हैं। 1901 से 2018 के बीच भौतिक शास्त्र के लिए 112 बार नोबल पुरस्कार दिया गया जिसमें से सिर्फ तीन बार किसी महिला को नोबल मिला।

इसी प्रकार रसायन शास्त्र, मेडिसीन, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी लगभग यही असंतुलन दिखाई देता है। इनमें 688 बार नोबल दिया गया जिसमें से केवल 21 बार महिलाओं को मिला। अगर अबतक के कुल नोबल पुरस्कार विजेताओं की बात की जाए तो यह पुरस्कार विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 892 लोगों को  दिया गया है जिसमें से 844 पुरूष हैं और 48 महिलाएं। विभिन्न वैश्विक मंचों पर जब लैंगिक समानता की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी पुरस्कार के ये आंकड़े निश्चित ही वर्तमान कथित आधुनिक समाज की कड़वी सच्चाई सामने ले आते हैं।

इस विषय का विश्लेषण करते हुए ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट एंजेला सैनी ने  "इन्फीरियर" अर्थात हीन नाम की एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में विभिन्न  वैज्ञानिकों के इंटरवियू हैं और कहा गया है कि वैज्ञानिक शोध खुद औरतों को कमतर मानते हैं जिनकी एक वजह यह है कि उन शोधों को करने वाले पुरूष ही होते हैं। अमेरिका की साइंस हिस्टोरियन मार्गरेट डब्लू रोसिटर ने 1993 में ऐसी सोच को माटिल्डा इफ़ेक्ट नाम दिया था जब महिला वैज्ञानिकों के प्रति एक तरह का पूर्वाग्रह होता है जिसमें उनकी उपलब्धियों को मान्यता देने के बजाए उनके काम का श्रेय उनके पुरुष सहकर्मियों को दे दिया जाता है  और आपको जानकर हैरानी होगी कि इसकी संभावना 95% होती है। क्लोडिया रैनकिन्स जो सोसाइटी ऑफ स्टेम वीमेन की  सह संस्थापक हैं, इस विषय में  उनका कहना है कि इतिहास में नेटी स्टीवेंस, मारीयन डायमंड और लिसे मीटनर जैसी कई महिला वैज्ञानिक हुई हैं जिनके काम का श्रेय उनके बजाए उनके पुरुष सहकर्मियों को दिया गया। दरअसल लिसे मीटनर ऑस्ट्रेलियाई महिला वैज्ञानिक थीं जिन्होंने न्यूक्लियर फिशन की खोज की थी लेकिन उनकी बजाए उनके पुरूष सहकर्मी ओटो हान को 1944 का नोबल मिला। 

 अगर आप  इस कथन के विरोध में नोबल पुरस्कार के शुरुआत यानी 1903 में ही मैडम क्यूरी को नोबल दिए जाने का तर्क प्रस्तुत करना चाहते हैं तो आपके लिए इस घटना के पीछे का सच जानना रोचक होगा जो अब इतिहास में दफन हो चुका है। यह तो सभी जानते हैं कि रेडिएशन की खोज मैडम क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी दोनों ने मिलकर की थी लेकिन यह एक तथ्य है कि 1902 में जब  इस कार्य के लिए नामांकन दाखिल किया गया था तो नोबल कमिटी द्वारा मैडम क्यूरी को नामित नहीं किया गया था, सूची में केवल पियरे क्यूरी का ही नाम था । पियरे क्यूरी के एतराज और विरोध के कारण मैडम क्यूरी को भी नोबल पुरस्कार दिया गया और इस प्रकार 1903 में वो इस पुरस्कार को पाने वाली पहली महिला वैज्ञानिक और फिर 1911 में रेडियम की खोज करके दूसरी बार नोबल पाने वाली पहली महिला बनीं। 

स्पष्ट है कि प्रतिभा के बावजूद महिलाओं को  लगभग हर क्षेत्र में कमतर ही आंका जाता है और उन्हें काबलियत के बावजूद जल्दी आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। 2018 की नोबल पुरस्कार विजेता डोना स्ट्रिकलैंड दुनिया के सामने इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं जो अपनी काबलियत के बावजूद सालों से कनाडा की प्रतिष्ठित वाटरलू यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर ही कार्यरत रहीं थीं। इस पुरस्कार के बाद ही उन्हें प्रोफेसर पद की पदोन्नति दी गई। 

आप कह सकते हैं कि पुरूष प्रधान समाज में यह आम बात है। आप सही भी हो सकते हैं। किंतु मुद्दा कुछ और है। दरअसल यह आम बात तो हो सकती है लेकिन यह "साधारण"  बात नहीँ हो सकती। क्योंकि यहाँ हम किसी साधारण क्षेत्र के आम पुरुषों की बात नहीं कर रहे बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के असाधारण वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, गणितज्ञ, साहित्यकार पुरुषों की बात कर रहे हैं जिनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता  और जिनका मानसिक स्तर उन्हें आम पुरुषों से अलग करता है। लेकिन खेद का विषय यह है कि महिलाओं के प्रति इनकी मानसिकता उस भेद को मिटाकर इन कथित इंटेलेकचुअल पुरुषों को आम पुरुष की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है ।

पुरूष वर्ग की मानसिकता का अंदाजा ई -लाइफ जैसे साइंटिफिक जर्नल की इस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है कि केवल 20% महिलाएं ही वैज्ञानिक जर्नल की संपादक, सीनियर स्कॉलर और लीड ऑथर जैसे पदों पर पहुंच पाती हैं। आप कह सकते हैं कि इन क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या और उपस्थिति पुरुषों की अपेक्षा कम होती है। इस विषय पर भी कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी की लिसोलेट जौफ्रेड ने एक रिसर्च की थी जिसमें उन्होंने यू एस नेशनल साइंस फाउंडेशन से इस क्षेत्र के 1901 से 2010 तक के जेंडर आधारित आंकड़े लिए और इस अनुपात की तुलना नोबल पुरस्कार पाने वालों की लिंगानुपात से की। नतीजे बेहद असमानता प्रकट कर रहे थे। क्योंकि जिस अनुपात में महिला वैज्ञानिक हैं उस अनुपात में उन्हें जो नोबल मिलने चाहिए वो नहीं मिलते।

जाहिर है इस प्रकार का भेदभाव आज के आधुनिक और तथाकथित सभ्य समाज की पोल खोल देता है।लेकिन अब महिलाएँ जागरूक हो रही हैं। वो वैज्ञानिक बनकर केवल विज्ञान को ही नहीं समझ रहीं वो इस पुरूष प्रधान समाज के मनोविज्ञान को भी समझ रही हैं। वो पायलट बनकर केवल आसमान में नहीं उड़ रहीं बल्कि अपने हिस्से के आसमाँ को मुट्ठी में कैद भी कर रही हैं। यह सच है कि अब तक स्त्री पुरूष के साथ कदम से कदम मिलाकर सदियों का  सफर तय कर यहाँ तक पहुंची है, इस सच्चाई को वो स्वीकार करती है और इस साथ के लिए पुरूष की सराहना भी करती है।  लेकिन अब पुरूष की बारी है कि वो स्त्री की काबलियत को उसकी प्रतिभा को स्वीकार करे और उसको यथोत्तचित सम्मान दे जिसकी वो हक़दार है। 
 


छठ: सूर्योपसना का महापर्व

छठ: सूर्योपसना का महापर्व

17-Oct-2019

कृष्ण देव सिंह

_समुह सम्पादक (बुधवार पत्रिका)

 हिन्दुस्तान के लोग कहीं भी रहें ,अपनी मिट्टी से जुडे रहना ही उनकी खासियत और पहचान है।उनका दिल हमेशा अपनी संस्कृति और रिवाजों के आसपास धड़कता है।देश के विभिन्न अंचलों की तरह ही छत्तीसगढ़ तभा मध्यप्रदेश में बिहार, झारखण्ड तथा पूर्वांच्चल मूल के परिवारों को अपने राज्य,शहर या गांव से दूर रहने का मलाल तो है परन्तु छठी मइया व उनके पुत्र सूर्यदेव का सम्पूर्ण परिवार की पूजन की लोक पर्व छ्ठ को वो परम्परागत रंग में रंगने में कोई कसर नहीं छोड़ते है।

 छ्ठ बिहार,झारखण्ड व पूंर्वाच्चल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है।इसकी महत्ता इतनी है कि बिहारी मूल के  लोग दुनिया के किसी भी कोने/हिस्से में रहे,वे अपने पैतृक घर / परिवार जरूर लौटते हैं या लौटने की पुरी कोशिश करते हैं और जो नही जा पाते,वो अपने आसपास ही छोटा - सा बिहार बना लेते है। आज हालात यह है भारत के सभी शहरों/ कस्बो के साथ_ साथ दुनिया के अनेक देशों में छ्ठ पर्व धूमधाम व पुरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

    अपनी ऊर्जा से समस्त जगत को चलायमान रखनेवाले सूर्यदेव और उनकी माता अदिति की प्रमुख रूप  से अराघना का ये छ्ठपर्व संभवतःसनातन हिन्दू संस्कृति के प्राचीनतम् त्यौहारों में से एक मात्र लोकपर्व है| किंवदंतियों की माने तो दीनानाथ(सूर्यदेव) और छ्ठी मैया(माता) की उपासना चार दिन होती है,लगभग वैसा ही पर्व एक बार महर्षि धौम्य की सलाह पर द्रोपदी ने किया था। सूर्यदेव की उपासना की लगभग समान विधि -विधानों का उल्लेख ॠग्वेद में भी मिलता है।

      वैसे जब त्यौहार इतना पुराना हो और उससे गहरा लगाव हो तो आस्था का सैलाब हर कहीं होना स्वाभाविक है। छ्ठपर्व के अवसर पर बिहार जाने वाली हवाईजहाज/ ट्रेन/ बस की टिकटें महीनों पहले आरक्षित हो जाती है। लेकिन अगर वे इस बार घर से दूर हैं तो आप अपने पैतृक प्रान्त का एक प्रतिरूप अपने पास ही तैयार करना चाहते है तो मेरा इस  लेरव में वार्णित विधि- विधान आपकी कुछ मदद जरूर कर सकते हैं:  हमारे देश में सुर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छ्ठ मूलतः सूर्य षट्टी व्रत होने के कारण इसे छ्ठ कहा गया है।

यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दुसरी वार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष  षष्ठी पर मनाये जाने वाले छ्ठ पर्व को चैती छ्ठ तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर बनाये जाने वाले छ्ठपर्व को कार्तिक( कतकी)छ्ठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख -समृद्धि तभा मनोंवांक्षित फलप्राप्ति के लिए छ्ठ पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरूष समान रूप से मनाते हैं। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और षष्ठी मैया का सम्बन्ध पुत्र और माता का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पुजा सूर्य ने ही की थी। छ्ठ पर्व की परम्परा में बहुत गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि (छ्ठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है । उस समय. सूर्य की परावैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथा संभव रक्षा करने का सामर्थ इस परम्परा में है।

   छठ पर्व का धार्मिक महत्व

सूर्मषष्टी अथवा छ्ठ पूजा सूर्योपासना का महोत्सव है। सनातन घर्म के पांच प्रमुख देवताओ मैं से एक सूर्यनारायण हैं। वाल्मीकि रचित रामायण में ॥आदित्य हृदय स्त्रोत ॥ के द्दारा सूर्यदेव का जो स्तवन किया गया है ,उससे उनके सर्वदेवमय सर्वशाक्तिमय स्वरूप का बोध होता है। सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च सूर्य सूक्त के इस वेद मंत्र के अनुसार भगवान सूर्य को सम्पूर्ण जगत का आत्मा कहा गया है। सूर्य का अर्थ सरति आकाशे सुवति कर्माणि लोक प्रेरयति वा वतलाया गया है ,अर्थात आकाश में चलते हुए लोक में जो कर्म की प्रेरणा दे ,उसे सूर्य कहा गया है। पुराणों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है। मोदनी में सूर्य को ग्रह विशेष बतलाया गया है। सूर्य के व्युप्पत्ति लभ्य अर्थ के अनुसार आकाश मण्डल से संचार की प्रेरणा देते हुए जो ग्रहों के राजा है,वही सूर्य है। पौरोहित्य शास्त्र के अनुसार सूर्य का जन्मस्थान कलिन्ग देश,गोत्र-कथ्यप,रक्त-वर्ण है। ग्रहराज होने के कारण ज्योतिष शास्त्र मानता है कि ग्रहों की अनुकूलता हेतु भगवान भाष्कर की पूजा करनी चाहिए ।पूजन में अर्ध्य का विघान मिलता है।कहा गया है कि सूर्य़ को अर्ध्य.देने से पाप विनिष्ट हो जाते हैं।

 

स्कन्दपुराण में तो स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य कि सूर्य को वगैर अर्ध्य दिये भोजन तक नहीं करना चाहिए|पौरोहित्य शास्त्र के अनुसार अर्ध्य में आठ बस्तुओं का समावेश अर्थात

 जल,दूघ,कुश का अगला भाग,दघि ,अक्षत,तिल,यव और सरसों को अर्ध्य का अंग बतलाया है। अर्ध्य देने के लिए तांबे एंव पीतल की घातु के लोटे (जलपात्र) का प्रयोग करना चाहिए| शास्त्रों के अनुसार उगते हुए सूर्य एंव डूबते हुए सूर्य के सामने अर्ध्य देना चाहिए । पुराणों के अनुसार सूर्यदेव षष्ठ अर्थात छठवें दिन तेजोमय प्रकाश के साथ माता अदिति के समक्ष प्रकट हुए थे,इसीलिए माता अदिति को छ्ठी -मैइया के स्प में स्तुति की जाती है। व्रती प्रसिद्ध छ्ठ पूजा के अवसर पर विशेष रन्य से सांय एव प्रातःकालीन सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्य षष्ठी (छठ) व्रत का परंम्परागत से अनुपालन कर पवित्रता एंव तपस्या को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाते है।

    लोक उत्सव का स्वरूप

 छ्ठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरूआत चैत्र/ कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी को तभा समाप्ति चैत्र' कार्तिक शुक्लपक्ष सप्तमी को होती है। झ्स दौरान व्रतघारी स्त्री/ पुरूष लगातार 36घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते!

कार्तिक छ्ठ व्रत 2019का विवरण

 31अक्टूबर2019:

नहाय खाय *1नवम्बर2019    :

खरनापूजा *2नबम्बर2019    : संध्या अर्ध्य

*3नवम्बर2019     :प्रातः अर्ध्य नहाय खाय

        पहला दिन शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथी को नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है।  आमावस्या तिथी से सबसे पहले घऱ की पुरी तरह सफाई कर उसे पावित्र बनाया जाता है। इसके वाद लाल रंग की खाद्य जैसे टमाटर यादि खाना पूर्णतः वर्जित हो जाता है।छ्ठ व्रत की तैयारी शुरू हो जाता है तभा चुल्हा यदि का निर्माण किया जाता है। शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथी को प्रातः काल व्रती स्नान ध्यान से निवृत होकर सुद्धता और  पावित्रता से निर्मित साकाहारी भोजन का सेवन करता/ करती है। इसी के साथ छठ व्रत की शुरूआत हो जाता है। परिवार के सभी सदस्य व्रती। के भोजनोपंरात ही भोजन ग़हण करते हैं।भोजन के रूप में कददु(लौकी) -दाल और चावल ओल( जीमीकंदा) ,हरा वैगन,गोभी की शब्जी तथा चना दाल सेंधा नमक में बनाया हुआ खाने की परम्परा है।

लोहंडा और खरना

दुसरे दिन अर्थात शुक्ल पक्ष पंचमी तिथी को व्रतघारी दिनभर निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ॥ खरना॥ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए सभी परिजनोंको निमंत्रित किया जाता हैा प्रसाद के रूप खीर,घी लगा रोटी,चना दाल,चावल तथा चावल का पिट्ठा विशेष रूप से बनाया जाता है| गन्ने का रस यदि उपलब्ध हो तो उसे प्रमुखता दी जाती है अन्यथा गुड का उपयोग होता है लेकिन प्रसाद में नमक या चीनी का उपयोग नही किया जाता है।खरना का विशेष प्रसाद सोहारी(घी लगा हुआ विशेष रोटी) और रसिया (गन्ना का रस अथवा गुड का खीर) होता है जिसे व्रती रात्रि में पूजा- अर्चना के वाद ही ग्रहण करता हैा इसी के बाद शुरू होता है व्रती का 36घंटे का कठोर निर्जला व्रत । विशिष्ट हालात में व्रती यदि मजबुरी हो तो रात्री में गौमुखी (गाय की तरह शरीर की अवस्था बनाकर) जल ग़हण किया जा सकता है।छठ व्रत के दौरान स्वच्छता और पावित्रता का विशेष रूपसे ध्यान ररवा जाता हैा

संध्या अर्ध्य

तीसरे दिन अर्थात शुक्ल षष्ठी को दिन में छ्ठ प्रसाद बनाया जाता हैा प्रसाद के रूप मैं ठेकुआ,जिसे टिकरी भी कहते हैं,के अलावा चावल के लडडू ( लड्डुआ) बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के स्प में लाया गया साँचा(चीनी का एक विशिष्ट साचा में  बना मिठाई) ,गन्ना और फल भी  छ्ठ प्रसाद के स्प में शामिल होता है। शाम को पुरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्ध्य का सूप सजाया जाता है ओर ब्रति के साथ परिवार और परिजन लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छ्ठव्रती एक नीयत नदी/ तालाव / पोखर के किनारे एकत्र होकर सामहिक रूपसे अर्ध्य दिया जाता है तथा छ्ठी मैया का प्रसाद भरे सूप से  पूजा की जाती है । अर्ध्य के साथ ही हुमाद से हवन किया जाता है जिसमें व्रती के वाद घाट पर उपस्थित सभी लोग भाग लेते हैं। पूजन में  सूर्य की पत्नी   ॥  प्रत्यूषा ॥   और उनसे उत्पन्न सूर्यपुत्र  ॥शनिदेव ॥की भी अर्चना की जाती हैाछ्ठी मैइया की प्रसाद भरे सूप लेकर व्रती जल में स्नान  कर खड़ी हो जाती है 1 तत्पश्चात परिजन द्वारा सूर्य को जलऔर दुघ का अर्ध्यदिया जाता हैा इस दौरान कुछ घण्टे के लिए वहाँ मेले का दृथ्य बन जाता है।

उषा अर्थात प्रातः अर्ध्य

   चौथे दिन अर्थात शुक्ल पक्ष सप्तमी की शुबह उदियमान सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैा व्रती अपने पुरे प्रियजनों के साथ उसी स्थान पर पुनः एकत्र होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्ध्य दिया था। पुनः पिछली संध्या की प्रक्रिया की पुनरावृति होती है तथा हुमाद से कण्डे ( गोबर का बना) से अग्नि प्रञ्जवलित कर ह्बन करते है । विशेष रूप से सूर्यदेव की ब्याहता पत्नी उषा और  उनसे उत्पन्न पुत्र यम तभा यमी की भी पुजा - अर्चना की जाती हैा अन्त में व्रती कच्चे दुघ का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं । तत्पश्चात घाट पर उपस्थित सभी पारिजनों को प्रसाद वितरित किया जाता है।

व्रत

छ्ठ त्यौहार मूलतः इतिहास के पन्नों में दर्ज ॥मगध॥ जनपद का महापर्व है लेकिन अब इसकी ०यापकता सम्पूर्ण भारत ही नही वल्कि विथ्वव्यापी हो गया है। छ्ठ न सिर्फ आस्था का महापर्व है बल्कि श्रद्धा की महापरीक्षा भी है।छ्ठ उत्सव के केन्द्र में एक कठिन तपस्या की तरह हैा  व्रत रखने वाले स्त्री  को परबैतिन भी कहा जाता हैा  चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है।भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता हैापर्व के लिये आरक्षित विशेष कमरे में ही व्रती फर्स/ जमीन पर एक कबंल / चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है lमहिलाएं साड़ी और पुरूष घोती पहनकर छ्ठ करते हैं।शुरू करने के बाद  छ्ठ पर्व को सालो-साल तक करना होता है जबतक कि  अगली पीढ़ी की किसी विवाहित स्त्री/ पुरूष को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए । घर / परिवार में किसी की मृत्यू हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।

छ्ठ व्रत प्रमुख रूप  से पुत्र/ पुत्री की प्राप्ति हेतु,सन्तान की लम्बी उम्र के लिए,निरोगी शरीर और परिवार की सुख समृद्धि के लिए किया जाता है।  व्रत करने वाले सभी व्रती सुवह से ही स्नान कर गेहूं सुखाते हैं। इस वात का विशेष तौर से ध्यान रखा जाता है कि कोई पशु / पक्षी इन दानों को चुगने नहीं पाये/ आमावश्या के वाद पुरे छ: दिन लहसुन/ प्याज आदि का पुरे परिवार में सेवन पूर्णतः वर्जित होता है।पकवान / प्रसाद बनाते समय शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।तीसरे दिन सूर्यास्त के समय तथा चतुर्थ दिन प्रातः काल पति/ पुत्र में से कोई सिर पर बहगी( प्रसाद से भरा टोकरी) रखकर अपने परिवार व इस्टों के साथ पास के घाट पर जाते हैं। अर्ध्य में तीन चीजें  का विशेष महत्व है,बांस से बना सूपा,टोकरी और प्रसाद । प्रसाद में सामान्यतः ठेकुआ,मौसमी फल,गन्ना,नारियल आदि रखे जाते हैं। व्रती पहले नदी / तालाव में स्नान करते हैं।  फिर गीले ही कपडे पहने ही  प्रसाद को सुपे में रखकर  दोनों हाथ से पकड़कर जल में खड़े हो जाते हैं। दीपक भी जलता रहता है। सभी परिजन दोनो समय (संध्या / प्रातः) बारी -बारी से अर्ध्य देते हैं। अर्ध्य देने के बाद  गोबर कें कंडे से जलते हुए आग में सामान्यतः शुद्ध व पवित्र घी में मिला हुआ हुमाद से हवन किया जाता है।

व्रती के वाद सभी हवन करते हैं। हवन सम्पन्न होने के वाद व्रती व्रत तोड़ता है।व्रती के प्रसाद ग़हण करने के बाद घाट पर उपस्थित सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित किया जाता है।तदुपरान्त वचे प्रसाद की टोकरी को लेकर सभी अपने -अपने घर लौट जाते ह़ै तथा प्रसाद वितरित करते हैं। कार्तिक मास की तरह ही चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथी को छ्ठ पूजा का आयोजन इसी तरह घुमघाम से मनाया जाता हैा छ्ठ पर्व के दिनों में माहौल पूर्णतः घार्मिक होता है तथा महिलायें विशेष रूप से सूर्यदेव और छठी मईया की सामूहिक गीत गाकर पुरे वातावरण को आध्यात्मिक बनाने में कोई  कसर शेष नहीं रखती है।


गुजरात का आदिवासी नाराज क्यों?

गुजरात का आदिवासी नाराज क्यों?

15-Oct-2019

ललित गर्ग:-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासी एवं जनजातीय लोगों के कल्याण एवं उन्हें राष्ट्रीय मूलधारा से जोड़ने के अपने संकल्प को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को बार-बार दोहराते रहते हैं, दूसरी ओर उन्हीं के गृहराज्य गुजरात के आदिवासी अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को लेकर बार-बार आन्दोलनरत होने को विवश हो रहे हैं। जब तक यह विरोधाभास समाप्त नहीं होगा, आदिवासी कल्याण की योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़े होते रहेंगे।

विदित हो इनदिनों गुजरात के छोटा उदयपुर में आदिवासी जनजातीय समूह बृहत  स्तर पर आन्दोलन कर रहे हैं, जिसमें आदिवासी जननायक संत गणि राजेन्द्र विजयजी एवं विभिन्न दलों के राजनेता एक मंच पर आकर आदिवासी जनजातीय अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, ऐसा इसलिये हो रहा है कि किन्हीं सरकारी प्रावधानों में राठवा जाति को आदिवासी नहीं माना जा रहा है, जबकि लाखों की संख्या वाली यह जनजाति आदिवासी है और आजादी के बाद से उसे आदिवासी ही मानते हुए सारी सुविधाएं मिलती रही है। उनके अस्तित्व को धुंधलाने की कुचेष्ठाओं को लेकर हो रहे इस आन्दोलन के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, लेकिन सरकार उनकी उचित मांगों को लेकर किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचती हुई नहीं दिख रही है। आदिवासी अधिकारों के हक में एवं उनके कल्याण के लिये तत्पर दिखाई देने वाली भाजपा सरकार आखिर मौन क्यों है? इस आन्दोलन एवं सरकार की उदासीनता के बीच की दूरी दर्शाती है कि सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर विरोधाभास है।

यह अन्तर और विरोधाभास इसलिये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन्हीं दिनों एक बार फिर झारखण्ड के रांची में आदिवासी एवं जनजातीय लोगों के कल्याण एवं उन्हें राष्ट्रीय मूलधारा से जोड़ने के अपने संकल्प को दोहराते हुए उन्होंने इसके लिये आदिवासी जनजीवन में शिक्षा के लिये एकलव्य माडल आवासीय स्कूलों की श्रृंखला को अधिक सशक्त बनाने एवं इसे पीपी माॅडल पर संचालित करने पर जोर दिया है। निश्चित ही उनके इस संकल्प से आदिवासी जनजीवन एवं वहां के बच्चों में शिक्षा की एक रोशनी का अवतरण होगा। मोदी एवं भाजपा सरकार आदिवासी समुदाय का विकास चाहती हैं, ‘आखिरी व्यक्ति’ तक लाभ पहुँचाने की मंशा रखती हैं और आदिवासी हित एवं उनकी संस्कृति को जीवंत करने के लिये तत्पर है।

केन्द्र सरकार की एकलव्य मॉडल स्कूलों की महत्वाकांक्षी योजना से आदिवासी क्षेत्रों में व्यापक बदलाव आएगा। देशभर में तीन साल में 462 एकलव्य स्कूल खोलने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य को पूरा होने का अर्थ आदिवासी जनजीवन की दशा एवं दिशा बदलना। लेकिन प्रश्न है कि गुजरात को आदिवासी क्यों नाराज है? क्यों उनके अधिकारों को कुचला जा रहा है? क्यों नहीं उनकी जायज मांगों को स्वीकार किया जाता? भाजपा की प्रान्तीय सरकार में ही उनको क्यों आन्दोलन की जरूरत पड़ रही है? ये प्रश्न समाधान चाहते हैं।

 राष्ट्र की विडम्बना रही है कि आदिवासी समुदाय को बहला-फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति आदिवासी जनजीवन की तकलीफों के बढ़ते जाने का कारण रही। इन आदिवासी-समुदायों को बार-बार ठगे जाने के ही षडयंत्र होते रहे हैं। देश में कुल आबादी का 11 प्रतिशत आदिवासी है, जिनका वोट प्रतिशत लगभग 23  हैं। क्योंकि यह समुदाय बढ़-चढ़ का वोट देता है। बावजूद देश का आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन करने को विवश हैं। यह तो नींव के बिना महल बनाने वाली बात होती रही है। 

आदिवासी समुदाय को बांटने और तोड़ने के व्यापक उपक्रम भी विभिन्न राजनीतिक दल करते रहे हैं, ये दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के घिनौने एवं देश को तोड़ने वाले प्रयास करते हुए इन आदिवासी के उज्ज्वल एवं समृद्ध चरित्र एवं संस्कृति को धुंधलाते रहे हैं, प्रधानमंत्री ने इनकी पीड़ा को गहराई से महसूस करते हुए समय-समय पर उनके कल्याण की बहुआयामी योजनाओं को आकार दिया है। आज इन आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होता हुआ दिखाई दे रहा है तो इसका श्रेय मोदी सरकार को जाता है। देश के विकास में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका को सही अर्थाें में स्वीकार करना वर्तमान की बड़ी जरूरत है और इसी जरूरत को पूरा करने के लिये मोदी सरकार प्रतिबद्ध है।

हाल ही में मुझेे गुजरात के छोटे उदयपुर के कवांट में नरेन्द्र मोदी के द्वारा शिलान्यास किये गये एकलव्य माॅडल आवासीय विद्यालय को देखने का अवसर मिला। जिसका संचालन आदिवासी संत गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में सुखी परिवार फाउण्डेशन द्वारा किया जा रहा है। इस विद्यालय की उपलब्धियों, शिक्षा का स्तर, छात्रों का अनुशासन, विविध गतिविधियों में सहभागिता, विद्यालय के उन्नत विज्ञान, गणित, आदि की प्रयोगशालाएं, छात्र-छात्राओं को राष्ट्रीय एवं प्रांत स्तर पर मिले पुरस्कार आदि देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। किसी भी माॅडर्न स्कूल की तुलना में यह विद्यालय कम नहीं था। जबकि अन्य प्रांतों के एकलव्य विद्यालयों को देखने का अवसर भी मिला। सरकारी संरक्षण में चल रहे स्कूलों की तुलना में पीपी माॅडल पर चल रहे इस विद्यालय में दिनरात का फर्क है। केन्द्र सरकार एवं प्रांत सरकारों को पीपी माॅडल पर गैर-सरकारी संगठनों को एकलव्य स्कूलों के संचालन पर प्राथमिकता देनी चाहिए।

इससे आदिवासी कल्याण के वास्तविक लक्ष्यों को हासिल करने में सफलता मिलेगी। क्योंकि आदिवासी लोग मेहनत से काम में जुटे हैं। पढ़ाई-लिखाई के प्रति जागरूकता फैल रही है। बड़े-बड़े अधिकारी गांवों से निकलकर देश चला रहे हैं। हमारा देश बहुत धनी देश है लेकिन यहां के लोग गरीब हैं। इस बात में सच्चाई है। हमारी आदिवासी धरती में सोना छिपा है। हमारे लोग मेहनती हैं। वे अपने श्रम की बूंदों से इस भूमि को सींचकर भारत के नये भविष्य की कहानी गढ सकते हैं। फिर से भारतवर्ष को सोने कि चिड़िया बनाया जा सकता है। इसके लिये हमें अपने आदिवासी गांवों की ओर प्रस्थान करना होगा। आदिवासी जनजीवन एवं उनके अधिकारों के लिये सहानुभूति से विचार करना होगा, ताकि उनको आन्दोलन के लिये विवश न होना पड़े, उनकी ऊर्जा का उपयोग  एक नई शक्ति का संचार करने में हो ताकि देश तरक्की कर सके। आदिवासी उन्नत होंगे तो राष्ट्र उन्नत होगा।

भारत के समग्र विकास में आदिवासी समुदाय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। वास्तविक विकास आदिवासी जल, जंगल, जमीन एवं गांवों के विकास पर ही निर्भर है। इसलिये आधुनिक विकास की विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये हमें आदिवासी समुदाय को विकसित करना होगा। आदिवासी समुदायों को विकसित, शिक्षित एवं समृद्ध बनाकर ही हम भारत का वास्तविक विकास कर सकते हैं। विकास की धीमी एवं असंतुलित गति के लिए सरकारों की दूषित नियोजन व्यवस्था भी उत्तरदायी रही है। आदिवासी अंचलों में में शैक्षिक सुविधाएं वांछित स्तर की नहीं हैं। अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए आदिवासी अनेक प्रकार के रोगों से त्रस्त हैं। अज्ञानता और पिछड़ेपन के कारण भी वे सफाई का महत्व नहीं समझते और बीमारियां उनको जीवनपर्यंत लगी रहती है। बहुत से गांवों में अच्छी यातायात व्यवस्था अभी भी बहुत दूर की बात है।

आदिवासी के लाभ के लिए शुरू की गई अनेक योजनाओं के अंतर्गत आवंटित धन दौलत गलत स्थान पर पहुंच जाता है। इस प्रकार आदिवासी की दशा को सुधारने के लिए अरबों रुपए व्यय किए गए हैं किंतु कोई संतोषजनक प्रगति इस दिशा में नहीं हुई। लेकिन मोदी सरकार इन विसंगतियों एवं विषमताओं से आदिवासी समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिये संकल्पित एवं प्रतिबद्ध है। वह न केवल आदिवासी संस्कृति, कला, संगीत, जीवनमूल्यों को विकसित करने को तत्पर है बल्कि उनक रोजगार, ग्रामोद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीवनस्तर को उन्नत बनाने के लिये अनेक बहुआयामी योजनाओं को आकार दे  रही है।

हमें आदिवासी जल, जंगल, जमीन एवं जीवन आधारित विकास का माॅडल विकसित करना होगा, जिसके माध्यम से भारत को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाना संभव है। इसमें एकलव्य माॅडल स्कूलों की केन्द्र सरकार की योजना मील का पत्थर साबित होगी। मोदी सरकार को ही आदिवासी असंतोष एवं उपेक्षा की बार-बार बनती स्थितियों को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिये ठोस नीति बनानी होगी ताकि गुजरात के आदिवासी समुदाय में होने वाले आन्दोलनों पर विराम लग सके।


भ्रष्ट व्यवस्था का ग्रास बनता आम आदमी

भ्रष्ट व्यवस्था का ग्रास बनता आम आदमी

10-Oct-2019

 ललित गर्ग 

असल में भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी समस्या है। लेकिन भारत में इसने कहर बरपाया है। भ्रष्टाचार की यह आग हर घर को स्वाहा कर रही है। लेकिन यह आग घरों के साथ-साथ बैंकों को स्वाहा करने की ठानी है। नित-नये बैंकिंग घोटाले एक गंभीर समस्या बन गये हैं। बैंकिंग सैक्टर में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी फैल चुकी हैं, इस बात का अंदाजा रिजर्व बैंक के आंकड़ों से चलता है। बैंकिंग तंत्र में अनेक छेद हो चुके हैं। पीएनबी में अरबपति जौहरी नीरव मोदी और मेहुल चैकसी ने 11,300 करोड़ का घोटाला बैंक के ही कुछ अफसरों और कर्मचारियों के साथ मिलकर किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि बैंकिंग सैक्टर से जुडे़ अधिकांश घोटालों में आला अफसरों से लेकर कर्मचारी तक शामिल रहेे हैं। नोटबंदी के दौरान समूचा राष्ट्र बैंक मैनेजरों और कर्मचारियों के खुले भ्रष्टाचार का चश्मदीद बना है। नोटबन्दी को अगर किसी ने पलीता लगाया तो बैंकिंग सैक्टर ने ही लगाया।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारे देश में हर शाख पर उल्लू नहीं एक घोटालेबाज, एक भ्रष्ट आदमी बैठा है! भ्रष्टाचार के लिए ऐसे-ऐसे नायाब तरीके ढूंढे जाते हैं कि किसी को भनक तक नहीं लगे। बैंकों की घोटालों की मानसिकता एवं त्रासद स्थितियों ने न केवल बैंकों के प्रति विश्वास को धुंधला दिया है बल्कि बैंकों की कार्यप्रणाली को भी जटिल एवं दूषित कर दिया है।  बैंकों के चपरासी से लेकर आला अधिकारी तक बिना रिश्वत के सीधे मुंह बात तक नहीं करते। आम बैंक उपभोक्ता की आज कोई अहमियत नहीं रही, क्योंकि हर बैंक में कोई-न-कोई बड़ा घोटाला आकार ले रहा होता है और सभी उसी में व्यस्त होते हैं। बैंक भ्रष्टाचार से देश की अर्थव्यवस्था और प्रत्येक व्यक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और आज देश की गिरती अर्थ व्यवस्थ का बड़ा कारण बैंकिंग घोटाले ही है।

पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाला के सामने आते ही कठोर कार्रवाइयों के साथ-साथ बैंक के पूर्व चेयरमैन वरियाम सिंह एवं बैंक के पूर्व प्रबन्ध निदेशक जॉय थामस को गिरफ्तार कर लिया गया है। क्योंकि बैंक ने रियल एस्टेट की कंपनी एचडीआईएल को नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों का ऋण दिया। एचडीआईएल के चेयरमैन राकेश वाधवन और उनके बेटे सारंग वाधवन परिवार ने अपनी सम्पत्ति बना ली क्योंकि बैंक के अधिकारियों और वाधवन परिवार में सांठगांठ थी। अब घोटाले की परतें प्याज के छिलकों की तरह खुल रही हैं, ईडी ने परिवार की 12 महंगी कारें और उनकी 3,500 करोड़ की सम्पत्ति जब्त कर ली है।

वरियाम सिंह ने बैंक के चेयरमैन पद पर रहते एचडीआईएल को 4335 करोड़ का ऋण दिया था। वरियाम सिंह ही कम्पनी और राजनेताओं के बीच सम्पर्क सूत्र का काम करते थे। जब कम्पनी ने बैंक ऋण नहीं लौटाया तो बैंक की हालत खस्ता हो गई। इस घोटाले को छिपाने के लिए बैंक ने फर्जीवाड़े का सहारा लिया और 21 हजार से अधिक खाते खोले गए जिनमें अधिकतम खाते मृतकों के नाम थे। 45 दिनों में खाते सृजित किए गए और डिटेल भी आरबीआई को सौंप दी गई। प्रश्न है कि आरबीआई को ऑडिट के समय क्यों नहीं घोटाला का पता चला? जब घोटाला सामने आया तो लोगों के अपने ही धन को निकालने पर पाबंदियां लगा दीं गई। जब शोर मचा तो पहले दस हजार और फिर 25 हजार रुपए निकलवाने की अनुमति दे दी गई। डूब रहे बैंक के खाताधारक अपना धन मिलेगा या नहीं, इसको लेकर आशंकित हैं। इस तरह एक बार फिर भ्रष्ट सिस्टम के आगे आम आदमी लाचार हो चुका है। क्या आरबीआई लोगों के हितों की रक्षा कर पाएगा? यह सवाल सबके सामने है। जब लोग सड़कों पर आकर छाती पीटते हैं तो राजनीतिक दबाव के चलते सरकारें जांच बैठा देती हैं। थोड़ी देर के लिए तूफान थम जाता है और समय की आंधी सब कुछ उड़ाकर ले जाती है। घोटालों का नतीजा चाहे जो भी निकला हो, किसी को सजा हुई हो या नहीं, अगर इन घोटालों का भयावह एवं डरावना सच यही है कि हमारी व्यवस्था में छिद्र-ही-छिद्र हैं।

नेहरू से मोदी तक की सत्ता-पालकी की यात्रा, लोहिया से राहुल-सोनिया तक का विपक्षी किरदार, पटेल से अमित शाह तक ही गृह स्थिति, हरिदास से हसन अली तक के घोटालों की साईज। बैलगाड़ी से मारुति, धोती से जीन्स, देसी घी से पाम-आॅयल, लस्सी से पेप्सी और वंदे मातरम् से गौधन तक होना हमारी संस्कृति का अवमूल्यन- ये सब भारत हैं। हमारी कहानी अपनी जुबानी कह रहे हैं। जिसमें भ्रष्टाचार व्याप्त है और अब जनता के धन का सबसे सुरक्षित स्थान भी असुरक्षित हो गया है। पिछले कुछ वर्षों से भारत में इस नए तरह के भ्रष्टाचार ने समूची अर्थ-व्यवस्था को अस्थिर एवं डांवाडोल बना दिया है। बड़े घपले-घोटालों के रूप में सामने आया यह भ्रष्टाचार बैंकों एवं कारपोरेट जगत-बड़े घरानों से जुड़ा हुआ है। भारत में नेताओं, कारपोरेट जगत के बडे-बड़े उद्योगपति तथा बिल्डरों ने देश की सारी सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिए आपस में गठजोड़ कर रखा है। इस गठजोड़ में नौकरशाही के शामिल होने, न्यायपालिका की लचर व्यवस्था तथा भ्रष्ट होने के कारण देश की सारी सम्पदा यह गठजोड़ सुनियोजित रूप से लूटकर अरबपति-खरबपति बन गया है। बड़ी दूरदर्शिता से 21 दिसम्बर 1963 को भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे पर संसद में हुई बहस में डॉ. राममनोहर लोहिया ने जो भाषण दिया था वह आज भी प्रासंगिक है। उस वक्त डॉ. लोहिया ने कहा था सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है।

यह सच है कि आज भी ऐसे बड़े घराने हैं जो जब चाहें किसी भी सीएम और पीएम के यहां जब चाहें दस्तक दें तो दरवाजे उनके लिए खुल जाते हैं। देश में आदर्श सोसायटी घोटाला, टू जी स्पैक्ट्रम, कामनवैल्थ घोटाला और कोयला आवंटन को लेकर हुआ घोटाला आदि कारपोरेट घोटाले के उदाहरण हैं। अब इस सूची में बैंकों के घोटालों की भी लम्बी सूची है। चाहे सहकारी बैक हो या पंजाब नेशनल बैंक, चाहे बडौदा बैंक हो या आईसीआई बैंक- जनता की मेहनत की कमाई का इन सभी ने दुरुपयोग किया।

अब तो हालत यह हो गई है कि हमारा देश भ्रष्टाचार के मामले में भी लगातार तरक्की कर रहा है। विकास के मामले में भारत दुनिया में कितना ही पीछे क्यों न हो, मगर भ्रष्टाचार के मामले में नित नये कीर्तिमान बना रहा है। इन स्थितियों में भारत कैसे महाशक्ति बन सकेगा? महाशक्ति बनने की बड़ी कसौटी भ्रष्टाचार की है। सरकार भ्रष्ट हो तो जनता की ऊर्जा भटक जाती है। देश की पूंजी का रिसाव हो जाता है। भ्रष्ट अधिकारी और नेता धन को स्विट्जरलैण्ड भेज देते हैं। इस कसौटी पर अमरीका आगे हैं। ’ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल’ द्वारा बनाई गयी रैंकिंग में अमरीका को 19वें स्थान पर रखा गया है जबकि चीन को 79वें तथा भारत का 84वां स्थान दिया गया है। इन स्थितियों में वह कैसे अमेरिका एवं चीन से आगे निकल सकेगा?

हमारे राष्ट्र के सामने अनैतिकता, महंगाई, बढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण, आर्थिक अपराध आदि बहुत सी बड़ी चुनौतियां पहले से ही हैं, उनके साथ भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। राष्ट्र के लोगों के मन में भय, आशंका एवं असुरक्षा की भावना घर कर गयी है। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होेता है। पर यहां तो निराशा, असुरक्षा और भय की लम्बी रात की काली छाया व्याप्त है। मोदी के रूप में एक भरोसा जगा क्योंकि मनमोहन सिंह की सरकार ‘जैसा चलता है, वैसे चलता रहे’ में विश्वास रखती थी, जिससे भ्रष्टाचार की समस्या को नये पंख मिले। भ्रष्ट स्थितियों पर नियंत्रण के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसी खूबसूरत मोड को तलाशने की कोशिश की।  भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ सार्थक करने का प्रयत्न किया। लेकिन प्रश्न है मोदी अपनी नेकनीयत का बखान तो कर रहे हैं, वे ईमानदार एवं नेकनीयत है भी, लेकिन शासन व्यवस्था एवं बैंकिंग प्रणाली को कब ईमानदार एवं नेकनीयत बनायेंगे? देखना यह है कि वे भ्रष्टाचार को समाप्त करने में कितने सफल होते हैं। 


चरित्रहीनता की पराकाष्ठा है हनी ट्रैप मामले

चरित्रहीनता की पराकाष्ठा है हनी ट्रैप मामले

23-Sep-2019

ललित गर्ग - 

जनमत का फलसफा यही है और जनमत का आदेश भी यही है कि राजनेताओं, प्रशासन एवं कानून व्यवस्था से जुड़े शीर्ष व्यक्तित्वों की पहचान पद से नहीं, चरित्र से हो। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक सही अर्थों में लोकतंत्र का स्वरूप नहीं बनेगा तथा चरित्रहीनता किसी-न-किसी स्तर पर व्याप्त रहेगी। मध्य प्रदेश में हनी ट्रैप के जरिए ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का पर्दाफाश होने और इस मामले में पांच युवतियों व एक कांग्रेस नेता सहित सात लोगों की गिरफ्तारी कई मायनों में चिंताजनक है, राजनीति में चरित्र की गिरावट की परिचायक है।

गिरोह से बरामद अश्लील वीडियो क्लिपिंग के आधार पर इस हनी ट्रैप में कथित रूप से एक पूर्व मुख्यमंत्री और कुछ पूर्व मंत्रियों समेत कई बड़े राजनेताओं के फंसे होने की बात कही जा रही है। कहा यह भी जा रहा है कि भाजपा सरकार में मंत्री रहे दो नेताओं से ये गिरोह लाखों रुपए वसूल कर चुका है और वर्तमान कमलनाथ सरकार के एक मंत्री के ओएसडी से भी दो करोड़ रूपए मांग रहा था।

”खेत कभी झूठ नहीं बोलता“- जो देंगे, वही वापस मिलेगा। कोई भी हो, सभी भारतीय समाज के हैं, अपने में से ही हैं, समाज के प्रतिबिम्ब हैं। समाज से भिन्न कल्पना भी मात्र कल्पना होगी। लेकिन हम कैसा समाज बना रहे हैं, यह चिन्तन का विषय है। चरित्र एवं नैतिकता को भूला देने का ही परिणाम है कि नित-नयी सनसनीखेज चरित्रहीनता, भ्रष्टता, असदाचार की घटनाएं सामने आती हैं और राजनीति से जुडे़ चेहरों पर कालिख पुतते हुए दिखती है, जो न केवल शर्मसार करती है बल्कि राष्ट्रीय चरित्र को धुंधलाती है, इतना ही नहीं इस तरह के चरित्रहीन राजनेताओं के काले कारनामों की जासूसी और ब्लैकमेलिंग के लिए हनी ट्रैप का इस्तेमाल करने के लिये अनेक गिरोह सक्रिय है।

देश में गिरते चरित्र के कारण इन हनी ट्रैप के इस्तेमाल की घटनाएं बढ़ती जा रही है। हनी टैªप की घटनाओं का होना ही चिन्ताजनक नहीं हे बल्कि शीर्ष व्यक्तित्वों के चरित्र का दागी होना भी संकट का कारण है। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि अब तक नेतृत्व चाहे किसी क्षेत्र में हो- राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, वह सुविधानुसार अपनी ही परिभाषा गढ़ता रहा है। न नेता का चरित्र बन सका, न जनता का और न ही राष्ट्र का चरित्र बन सका। सभी भीड़ बनकर रह गए और हनी ट्रैप के शिकार होते रहे। प्रश्न है कि कब तक लोकतंत्र को चरित्र से दूबला बनने दिया जाता रहेगा? कब तक हनी ट्रैप में नेतृत्व दागी होता रहेगा?

इंदौर के पलासिया पुलिस थाने में ब्लैकमेलिंग का यह मामला दर्ज किया गया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि एक महिला आरोपी से दोस्ती करने के बाद उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रही थी। महिला ने कुछ रिकर्डिग भी कर ली थीं और तीन करोड़ रुपये की मांग की जा रही थी, मांगी गई रकम न देने पर वीडियो वायरल करने की धमकी दे रही थी। पीड़ित की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच की। उसके बाद तीन करोड़ की रकम में से पहली किस्त के तौर पर 50 लाख रुपये लेने इंदौर आई एक युवती के साथ दो अन्य को एक महिला व एक पुरुष को हिरासत में लिया गया। हनी ट्रैप की आशंका के बाद एटीएस ने जांच शुरू की। उसके बाद भोपाल से तीन महिलाओं को हिरासत में लिया गया। यह महिलाएं मीनाल रेसीडेंसी, कोटरा सुल्तानाबाद और रवेरा टाउन से पकड़ी गई हैं। तीनों हाई प्रोफाइल महिलाओं के राजनीतिक संबंध है। एक महिला तो पन्ना जिले से विधायक के आवास में किराए पर रहती है। ये महिलाएं कथित तौर पर राजनेताओं और उच्च रैंकिंग वाले सरकारी अधिकारियों का विडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करती थीं।

जासूसी और ब्लैकमेलिंग के लिए हनी टैªप का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। यह कोई नई बात नहीं है। हनी ट्रैप का मतलब है जैसे कोई मक्खी शहद के लालच में उस पर बैठ जाए और जब शहद पीकर उड़ना चाहे तो उड़ न पाए। राजनीतिक लाभ, आर्थिक लाभ, अनुचित कार्यों को अंजाम देने के अलावा दुश्मन देश से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज या खुफिया जानकारी जुटाने के लिए इसका इस्तेमाल प्रायः किया जाता है। कुछ माह पहले हनी ट्रैप के मामले में यह बात सामने आई थी कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़ी महिलाएं भारतीय सेना के जवानों से दोस्ती का स्वांग रचकर अहम जानकारियां जुटाने की फिराक में थी। दरअसल समाज में इन दिनों जिस तरह से चारित्रिक गिरावट बढ़ रही है, यह उसी का नतीजा है।

राष्ट्रीय जीवन की सोच का यही महत्वपूर्ण पक्ष है कि चरित्र जितना ऊंचा और सुदृढ़ होगा, उस राष्ट्र एवं समाज मेें सफलताएं उतनी तेजी से कदमों में झुकेंगी। बिना चरित्र न राष्ट्रीय जीवन है और न समाज के बीच गौरव से सिर उठाकर सबके साथ चलने का साहस। सही और गलत की समझ ही चरित्र को ऊंचा उठाती है। बुराइयों के बीच रहने वालों का सबकुछ लुट जाता है जबकि अच्छाइयों में सिर्फ उपलब्धियों के आंकडे होते हैं। चरित्र की उज्ज्वलता में मनुष्य का अंतःकरण आर-पार साफ दीखता है।

चारित्रिक एवं नैतिक मूल्यों के प्रति उपेक्षा एवं उदासीनता बिखराव देती है और बिखरी जीवन-चर्या में विश्वसनीयता, जिम्मेदारी, कार्यक्षमता ढीली पड़ जाता है। ऐसे लोगों को अपनी सुरक्षा में झूठे रास्ते एवं असत्य का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे लोग कभी-कभी छोटे सुख एवं लाभ के लिये बड़ा नुकसान कर देते हैं। महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग चरित्रवान न होने के कारण समाज के लिए बहुत घातक साबित होते रहे हैं। जरा सोचिए, मंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को अगर कोई देश का दुश्मन हनी ट्रैप में फंसा ले और देश की सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील खुफिया जानकारियां हासिल कर ले तो देश को तबाह होते कितनी देर लगेगी? हकीकत तो यह है कि हनी ट्रैप या नेताओं की चारित्रिक गिरावट के बहुत ही कम मामले सामने आ पाते हैं जबकि समाज के भीतर ही भीतर यह सड़न, दुर्बलता बहुत ज्यादा बढ़ रही है।

इस तरह की बुराइयां दूब की तरह फैलती है और उनकी जड़े गहरी होती है। समय आ गया है कि जिम्मेदार पदों के लिए एक शर्त अनिवार्य हो कि उस पर बैठने वाला व्यक्ति चरित्रवान हो और चारित्रिक पतन का कोई भी मामला सामने आने पर उसे तत्काल पद से हटा दिया जाए। पुराने जमाने में धनवान से ज्यादा महत्व चरित्रवान को दिया जाता था। समय आ गया है कि चरित्र को एक बार फिर समाज में उसकी पुरानी प्रतिष्ठा लौटाई जाए। देश के एकमात्र नैतिक आन्दोलन अणुव्रत के गीत की एक पंक्ति ”सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, जिसका असर राष्ट्र पर हो।’’ आज राष्ट्र को सुधारने की शुरुआत व्यक्ति से करनी होगी, व्यक्ति भी वह जो राजनीति, कानून एवं प्रशासन से जुड़ा हो।

आज चरित्र की स्थापना ज्यादा जरूरी है क्योंकि बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में चरित्र को हर कीमत पर भुना लेते हैं। वे जानते ही नहीं कि यदि चरित्र गिर गया तो फिर आदमी के सारे आदर्श, मूल्य एवं परम्पराएं किस बुनियाद पर टिकी रहेंगी। गिरा हुआ आदमी हो या राष्ट्र रंेगता हुआ चल तो सकता है मगर दौड़ प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकता। हमारा राष्ट्र दुनिया में अव्वल आने की दौड़ में प्रतियोगी है, एक नया और सशक्त भारत को बनाने की बात हो रही है, लेकिन चरित्र बिन सब सून है।


चलो चलें बाढ़ का मजा ले

चलो चलें बाढ़ का मजा ले

16-Sep-2019

(हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक)

    देश में इन दिनों चहुंओर मानसूनी बारिश खूब बरस रही है। सालों बाद जरूरत के मुताबिक ऐसी बारिश देखने को मिली। हां बरखा से जन व जमीन को सुविधा और दुविधा साथ-साथ हो रही है। आलम कहीं सूखे से राहत तो कहीं बाढ़ की आफत तो कहीं फसल की खुशामत तीनोें हद की हिमाकत पर है। येही तो असली कुदरत का करिश्मा है। जिसे हम मानव अपनी होशियारी व हरकत से हुकूमत समझते आए हैं। नतीजतन पानी-पानी के लिए त्राहिमाम-त्राहिमाम होना हमारी फितरत बन गई है। बकौल गंदगियों से जिंदगियां तबाह, पावन सलिला आचमन होकर सूखे कंठ और जमीं को तृप्त नहीं कर पा रही है। बावजूद सबक लेना तो दूर उसके कारक भी मानव रूपी दानव बे-रोक टोक बनते जा रहे हैं। 

     ये भूलते हुए कि प्रकृति हमारी आने वाली पीढ़ी की अनमोल धरोहर है। उसे संजोए रखने के बजाए नेस्तनाबूत करने में प्राणपण से जुटे हुए हैं। इसीलिए प्रकृति भी अपना हिसाब समय-समय पर पूरा कर देती है। ऐसे में भी जल प्लावन, अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी त्रासदी में हमारी मजे की चाहत हिलौरें मारती नहीं थकती। ऐसा ही मंजर हालिया घरों, सड़कों, नदी, नालों और तालाबों में आई विनाशकारी बाढ में दिखाई पढ़ा। जहां उमड़े जनसैलाब ने चलो, चलें बाढ़ का मजा ले कहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जैसे समुद्र का तट, झील की ठंड़क और वादियों का मनोहारी आबोहवा हो वैसे ही ललक से त्रासदी का मनचाहा लुत्फ उठाने में सिरमौर रहे। 

    वीभत्स! विनाश पर तमाशबीनों ने गजब का तमाशा बनाया। बे-खबर राहगिरों, बीमार और जरूरतमंदों की आवाजाही में अड़ंगा लगाए रखा चाहे रास्ता जलमग्न ही क्यो ना हो? तथा मौके पर राहत में जुटा अमला और सुरक्षा कर्मी मुसीबत में फंसे त्रस्त को छोड़कर मजाकियां ग्रस्त को समझाते, झड़काते तथा हटाते रहने में मजबूर रहा। बावजूद नुक्ता-चिनी और नुराकुश्ति में मशगूल बेदरंगी अपना रौब झाड़ते हुए अपने यारों को दूरभाष यंत्र पर आंखों देखा हाल चित्र और चलचित्र दिखाकर बर्बादी का कहर देखने न्यौता देते रहे। बिना देर गंवाए यारी भी ऐसी निभी की पलक झपकते ही शागिर्दों का रैन बसैरा वाहनों का काफिला लेकर सड़कों पर धमाचौकड़ी मचाते रहा। और तबाही का हर सुख लेते तक टस से मस नहीं हुआ, जब तक पानी खतरे से नीचे नहीं आया।  बद्स्तुर यहां वक्त की दुहाई देते थकने नहीं वाले सरकारी नुमाइंदे, राजनैतिक आकाओं, डाक्टरों और व्यापार जगत के साहूकारों का जमघट बेखौफ, नफे नुकसान बैगर नाश को शान से देखता रहा। बरबस, तसल्ली से प्रफुल्लित मुद्रा में नाते-रिश्तेदारों को महाप्रलय की अजर-अमर खुशखबरी सुनाई। खातिरदारी में फुटकर चना, फल्ली, मक्का, चाय, पान और मंगोड़े इत्यादि बेचने वालों ने मौके का फायदा उठाकर मेहनत की कमाई कर ली।

    काश! इतनी ही शिद्दत, दौलत और मेहनत आपदा व बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए कर दी जाती तो डूबते को तिनके का सहारा हो जाता। कई उजड़े घरों को परछाई, बीमार को दवाई, बच्चों को पढ़ाई, बेरोजगारों को कमाई, किसान को उपज की भरपाई और गरीबों की भलाई हो जाती। लेकिन चंद मुठ्ठी भर सेवादानों और सरकारी मोहकमों के अलावा किसी ने इनकी परवाह तक नहीं की। उलट छोड़ दिया हालातों पर अपने नयन सुख के निहारने के वास्ते मौजदारों ने। गफलतबाजी में कि इस विपदा के वाकई कोई गुनाहगार है तो हम है और हम ही है, जिसका परिणाम आज दूजे तो कल हमें भोगना है। 

      अलबत्ता, बचाव ही उपाय है यह मूल मंत्र हमें  प्रलयकारी मुसीबतों से बचा सकता है। इसके लिए हमें समय रहते कारगर कदम उठाने की जरूरत है। जो हम बेरुखी में सालों से दरकिनार करते आए हैं। प्रतिफलन सूखा, बाढ़ और भूस्खलन आदि दिक्कतें जन-जीवन तथा परि आवरण को आगोश में ले रही हैं। लिहाजा, अब बिना देर गंवाए अवैध उत्खनन-प्रदूषण रोकने, जल-जंगल-जमीन-पशुधन बचाने, वृक्ष बनाने, जैविक खेती को बढ़ावा, कांक्रिट के संजाल से मुक्ति और स्वच्छता के ईमानदारी से ठोस प्रयास करने पड़ेंगे। समेत हर घर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, जल सोख पीड़, पेड़ का मनोपयोग और कमशकम जिला स्तर पर नदी-नाला-तालाबों को जोड़ने की परिकल्पना जल संरक्षण के निहितार्थ साकार करना होगा। तब ही सही मायनों में प्रकृति का विदोहन सजा की जगह मजा की सुखद अनुभूति देंगा। 


 हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक

 


चालान से बचने के लिए शख्स ने इजाद किया नया तरीका, हेलमेट पर चिपका लिए सारे दस्तावेज

चालान से बचने के लिए शख्स ने इजाद किया नया तरीका, हेलमेट पर चिपका लिए सारे दस्तावेज

11-Sep-2019

संशोधित मोटर वाहन कानून के तहत सख्त किए गए यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माने से बचने के लिए गुजरात के एक शख्स ने अनोखा तरीका अपनाया है। गुजरात में वडोदरा के रहने वाले आर शाह ने अपने हेलमेट पर ड्राइविंग लाइसेंस, आरसी, बीमा और अन्य दस्तावेज चिपका लिए हैं।

वडोदरा के रहने वाले आर शाह नाम के इस शख्स का कहना है कि ‘बाइक चलाने से पहले मैं जो सबसे पहला काम करता हूं वो है हेलमेट पहनना, इसलिए मैंने सभी कागजात इस पर चिपका दिए ताकि नए ट्रैफिक नियमों के अनुसार मुझे कोई जुर्माना न भरना पड़े।’ सोशल मीडिया पर भी उनकी चर्चा हो रही है। मोटर व्हीकल एक्ट में हुए बदलाव सुर्खियां बटोर रहे हैं।

भारी जुर्माने की खबरें
पिछले दिनों कई ऐसे मामले आए जिनमें लोगों को भारी जुर्माने का सामना करना पड़ा। यह कानून पूरे देश में एक सितंबर से लागू हो गया है हालांकि कुछ राज्यों ने इन्हें लागू नहीं करने का फैसला किया है। खबरें आ रही हैं कि किस तरह से यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को हजारों का जुर्माना देना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा खबरें हरियाणा और ओडिशा से आई हैं। ऐसे कई राज्य हैं जहां की सरकारों ने कहा है कि वे इस कानून का अध्ययन करने के बाद ही इसे लागू करेंगी। ये राज्य हैं पंजाब, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जबकि गुजरात ने कहा है कि वह आरटीओ से रिपोर्ट मिलने के बाद प्रावधान लागू करेगा हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सभी राज्यों को नए कानून का पालन करना ही होगा।
जुर्माने की रकम कई गुना बढ़ी

ऐसे कई अपराध हैं जिनके लिए जुर्माने की रकम बढ़ा दी गई है। बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने पर पहले पांच सौ रुपये तक जुर्माना था। यह अब 5000 रुपये होगा। ओवरस्पीडिंग के लिए पहले चार सौ रुपये तक जुर्माना था, अब यह हल्के वाहनों के लिए एक से दो हजार रुपये होगा जबकि मध्यम और भारी वाहनों के लिए दो हजार से चार हजार रुपये। खतरनाक ड्राइविंग में पहली बार पकड़े जाने पर छह महीने तक की सजा और एक हजार तक का जुर्माना होता था। इसे अब बढ़ाकर छह महीने से एक साल तक की सजा और एक हजार से पांच हजार रुपये तक का जुर्माना कर दिया गया है।

शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पहली बार पकड़े जाने पर दो हजार तक का जुर्माना या छह महीने तक सजा का प्रावधान था। इसे अब दस हजार रुपये तक का जुर्माना और छह महीने तक की सजा कर दिया गया है। प्रदूषण मुक्त न होने पर पहले एक हजार रुपये तक का जुर्माना था जिसमें अब तीन महीने तक की सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना और तीन महीने के लिए लाइसेंस रद्द करना तक शामिल हो गया है। बिना परमिट के गाड़ी चलाने पर पहले पहली बार पकड़े जाने पर दो से पांच हजार रुपये तक का जुर्माना था। अब छह महीने तक की सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।


हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह

हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह

03-Sep-2019

लेख : ललित गर्ग 

पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, मिशन समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार, हिंदी ब्लिट्ज व नूतन सवेरा के सम्पादक नंदकिशोर नौटियाल अब हमारे बीच नहीं है, सुनकर विश्वास नहीं होता, एक गहरी रिक्तता का अहसास हो रहा है। उनके निधन से राष्ट्र की हिंदी पत्रकारिता के तेजतर्रार, निष्पक्ष एवं राष्ट्रीयता को समर्पित एक युग का अवसान हो गया। वे हिंदी भाषा आंदोलन के एक सक्रिय सेवक एवं आन्दोलनकारी जुझारू व्यक्तित्व थे। लगभग  80 वर्षों के सक्रिय जीवन में उन्होंने न केवल पत्रकारिता के उच्च आदर्शों और मूल्यों के लिए बल्कि अनेक राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में अपने आपको नियोजित किये रखा। उन्होंने संस्कृति एवं संस्कारों को अक्षुण्ण बनाये रखने की चेतना को झंकृत कर उन्हें युग-निर्माण की दिशा में आधार बनाया। उनकी कलम में तोप, टंैंक एवं एटम से भी कई गुणा अधिक ताकत थी और इस ताकत का उपयोग उन्होंने समाज एवं राष्ट्र-निर्माण के निर्माणात्मक कार्यों में किया। 

नंदकिशोर नौटियाल के निधन को पत्रकारिता के एक युग की समाप्ति कहा जा रहा है। क्या यह पत्रकारिता कोे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की श्रृंखला के प्रतीक के रूप में कहा जा रहा है कि इस समाप्ति को पत्रकारिता में शुद्धता की, मूल्यों की, निष्पक्षता की, आदर्श के सामने कद को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जा रहा है। नंदकिशोर नौटियाल ने जहां मानव-मूल्यों में आस्था पैदा करके स्वस्थ समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वहीं राजनीति एवं प्रशासन के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अनीति के खिलाफ पत्रकारिता को सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। वह पत्रकारों की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसके लिए पत्रकारिता एक मिशन रही है। इसलिए पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक दायित्व और स्वस्थ राजनीतिक वैचारिकता को उन्होंने पूरे प्राणपण के साथ निभाया। वक्त के चाहे कितने ही तेज झोंके आये हों, कितने ही तूफान उठे हों, लेकिन वह अपने कर्तव्य पथ पर सदा अडिग बने रहे और आगे बढ़ते रहे। वे समाज एवं राष्ट्र में समन्वय, सौहार्द, समरसता एवं एकता के लिये निरन्तर जूझते रहे। सस्ती लोकप्रियता एवं अर्थलोलुपता से हटकर उन्होंने पत्रकारिता के आदर्श मूल्यों को स्थापित किया, जो कभी धूमिल नहीं हो सकते। 

नंदकिशोर नौटियाल भारतीय पत्रकारिता जगत के भीष्म पितामह थे। उन्होंने मुंबई में रहते हुए व ब्लिट्ज का संपादन करते हुए स्वर्गीय आर. के. कंरजिया के साथ पत्रकारिता के नए मानदंड स्थापित किए थे। उन्होंने सारा जीवन सादगीपूर्वक बिताया और उत्तराखंड के गठन के बाद बद्रीनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष के रूप में बद्रीनाथ मंदिर के उद्धार में भी चार चांद लगाए। उन्होंने देश को कई यशस्वी पत्रकारों की एक लंबी कड़ी उपलब्ध कराई। ब्लिटज और नूतन सवेरा के संपादक के रूप में उन्होंने देश को कई ऐसे समाचार दिए जो वर्षों तक खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए चर्चित रहे। 

पं. नंदकिशोर नौटियाल का जन्म 15 जून 1931 को आज के उत्तराखंड राज्य में पौड़ी गढ़वाल जिले के एक छोटे से पहाड़ी गांव में पं॰ ठाकुर प्रसाद नौटियाल के घर हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा गांव में और दिल्ली में हुई। देश-दुनिया के प्रति जागरूक नौटियालजी छात्र जीवन के दिनों में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। दिल्ली की छात्र कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य के तौर पर उन्होंने 1946 में बंगलोर में हुए छात्र कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन में भाग लिया था। 1946 में ही नौसेना विद्रोह के समर्थन में जेल भरो आंदोलन में शिरकत किये थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी जीवनयात्रा 1948 से शुरू हुई। नवभारत साप्ताहिक (मुंबई), दैनिक लोकमान्य (मुंबई) और लोकमत (नागपुर) में कार्य किया। 1951 में दिल्ली प्रेस समूह की सरिता पत्रिका से जुड़े। दिल्ली में मजदूर जनता, हिमालय टाइम्स, नयी कहानियां और हिंदी टाइम्स के लिए कई साल कार्य किया। सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी नौटियालजी ने पत्रकारिता और लेखन को अपना व्यवसाय बनाया। अनेक साप्ताहिक पत्रों और पत्रिकाओं के लिए काम करते हुए 1962 में उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब मुंबई से साप्ताहिक हिंदी ब्लिट्ज निकालने के लिए उसके प्रथम संपादक मुनीश सक्सेना और प्रधान संपादक आर के करंजिया ने उन्हें चुना।

मेरा नौटियालजी से निकट सम्पर्क रहा। ‘अणुव्रत’ के सम्पादक के तौर पर कार्य करते हुए निरन्तर उनसे प्रेरणा एवं प्रोत्साहन मिलता रहा। मेरे आग्रह पर वे अणुव्रत लेखक सम्मेलन में भाग लेने एवं आचार्य तुलसी के दर्शनार्थ मुम्बई से लाडनूं आए। उन्हें पान के साथ जर्दा खाने का नशा था। जैन विश्वभारती के परिसर में मैंने आचार्य तुलसी से मुलाकात से पहले कहा-‘‘अब पान थूक दो।’’ नौटियालजी ने अल्हड़ता से कहा-‘‘क्यों थूक दूं?’’ मुझे पान खाना अच्छा लगता है इसलिए खाता हूं। आचार्यजी पान नहीं खाते तो मैं क्या करूं? जब उन्होंने आचार्य श्री तुलसी के दर्शन किए, उस समय उनके दोनों गाल पान से भरे हुए थे। आचार्यश्री ने अर्थभरी दृष्टि से उनको देखा और पूछा-‘‘इनके लिए पान की व्यवस्था कहां हुई?’’ आचार्यश्री के इस एक प्रश्न से नौटियालजी को भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें आत्मग्लानि हुई और उसी समय सदा के लिए पान खाना छोड़ दिया। उन्होंने बड़े विश्वास से कहा कि यह आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व और उनकी वाणी का जादू था कि मेरा रूपांतरण हो गया। मैं नास्तिक से आस्तिक और व्यसनी से व्यसनमुक्त बन गया। पंजाब समस्या के समाधान का वातावरण निर्मित करने में आचार्य तुलसी की भूमिका ने भी उन्हें बहुत प्रभावित किया और वे राजस्थान के छोटे से ग्राम आमेट में उनका आभार व्यक्त करने आये। 

एक प्रसंग और उद्धरणीय है। एक बार किसी व्यक्ति ने उनसे पूछा-‘‘आप आचार्य तुलसी के बारे में इतना लिखते हैं, अन्य संप्रदाय के आचार्यों के बारे में क्यों नहीं लिखते?’’ नौटियालजी ने कहा-‘‘मैं आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हूं। मैं उनके बारे में अधिक इसलिए लिखता हूं कि वे आदमी को आदमी बनाते हैं और दूसरा कोई आदमी को आदमी बनाने वाला हो तो बताओ, मैं उनके बारे में लिखूंगा।’’ उस सज्जन ने पूछा-‘‘आचार्यश्री ने किसको आदमी बनाया, उनका नाम बताओ, मैं उसे देखना चाहता हूं।’’ नौटियालजी ने उत्साह के साथ कहा-‘‘इसका जीता-जागता उदाहरण मैं हूं। एक समय था, जब मैं शराब पीता था। जर्दा, तंबाकू भी खाता था लेकिन उनकी प्रेरणा से आज मैं इन सब बुराइयों से मुक्त हूं। आचार्य तुलसी ने सचमुच मुझे आदमी बना दिया।’’ इस तरह उनके जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता की गहराई से जुड़े थे और वे उस पर अटल भी रहते किन्तु किसी भी प्रकार की रूढि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वे हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के थे और यह मुक्त स्वरूप् उनके भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप था।

‘ब्लिट्ज’ साप्ताहिक के बन्द हो जाने के बाद 1993 में नौटियालजी ने पूरे जोश-खरोश के साथ ‘नूतन सवेरा’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। ‘नूतन सवेरा’ ने नौटियालजी के कुशल संपादन में शीघ्र ही देश-भर में अपनी पहचान बनायी। ‘नूतन सवेरा’ ने मानवीय मूल्यों, भारतीय संस्कृति तथा जनपक्षीय पत्रकारिता की हिंदी ‘ब्लिट्ज’ की पंरपरा को आगे बढ़ाने में भारी योगदान किया है। राष्ट्रहित के मुद्दों पर नौटियालजी की दो टूक टिप्पणियों के बारे में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। ‘नूतन सवेरा’ के माध्यम से वह राष्ट्रभाषा हिंदी की अस्मिता के लिए तन-मन-धन से संघर्षरत थे। राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई के उपाध्यक्ष की हैसियत से भारत में पहली बार महासंघ के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बंबई हाई कोर्ट में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किये जाने की याचिका दायर की है जो लंबित है। पत्रकारिता के अलावा नौटियालजी प्रगतिशील राजनीति और समाजसेवा के क्षेत्र में भी बदस्तूर सक्रिय थे। वह महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के स्थापनाकाल से ही सदस्य रहे और इस समय इसके कार्याध्यक्ष हैं। 

उनके कार्यकाल में पहली बार 2002 में पुणे में अकादमी ने भव्य अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगम आयोजित किया तथा पहली बार 2008 में मुंबई, 2009 में नागपुर तथा नांदेड़ में सर्वभारतीय भाषा सम्मेलन संपन्न किया जिसमें 22 भाषाओं के विद्वानों ने भाग लिया। साहित्यिक और पत्रकारिता प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य के तौर पर नौटियालजी ने अमरीका, कनाडा, उत्तर कोरिया, लीबिया, इटली, रूस, फिनलैंड, नेपाल, सूरीनाम आदि देशों की यात्रा कर हिन्दी को दुनिया में प्रतिष्ठापित करने की दिशा में अनूठा उपक्रम किया। उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। नौटियालजी को हिंदी साहित्य सम्मेलन का साहित्य वाचस्पति सम्मान, आचार्य तुलसी सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पत्रकार भूषण सम्मान, शास्त्री नेशनल अवार्ड, लोहिया मधुलिमये सम्मान समेत रोटरी, लायंस आदि अनेक राष्ट्रीय स्तर के सम्मान प्राप्त हुए। उनके निधन पर हम भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। प्रेषकः


क्यों असुरक्षित है भारत के बच्चें?

क्यों असुरक्षित है भारत के बच्चें?

22-Aug-2019

लेख : ललित गर्ग (lalitgarg11@gmail.com)

चंडीगढ़ में एक पीजी में रहने वाली दो बहनों की हत्या ने न केवल शहर को बल्कि समूचे राष्ट्र को दहला दिया है। इस खौफनाक एवं त्रासद घटना ने रेखांकित किया है कि अपराधी किसी कानूनी कार्रवाई और पुलिस के भय के बिना अपनी मनमानी एवं अपराधी मानसिकता को अंजाम दे रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि आज हमारे समाज में बात सिर्फ बच्चियों अथवा महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की नहीं है, बात इस बदलते परिवेश में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों की भी है। हमारे बच्चें आज सुरक्षित नहीं है। 

बच्चे देश का भविष्य होते हैं लेकिन जब बच्चे ही खतरे में हो तो आप खुद सोच सकते है कि उस देश का आने वाला भविष्य कैसा होगा? उस देश का भविष्य अंधकार में ही होगा जहां बच्चों पर भी रहम नहीं किया जाता, उन पर अपराध किये जाते हैं । एक सर्वे के अनुसार भारत जैसे विकासशील देश में हर 15 मिनट में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। बात केवल यौन शोषण की ही नहीं बल्कि हिंसा, उत्पीड़न एवं बाल-श्रम की भी है। ये बेहद ही शर्मसार करने वाली बात है कि हम अपने बच्चों तक को सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं, उनके बचपन को डरावना एवं त्रासद बना रहे हैं। 

भारतीय समाज में बच्चों के खिलाफ अपराध की दर दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि 2016 में पोक्सो ऐक्ट के तहत छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार के 64138 मामले दर्ज हुए थे। देशभर में बच्चों के खिलाफ कुल अपराध के मामलों में 13.5 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई है। इसका कारण है कि वर्तमान समय में नगरीकरण तथा औद्योगिकरण की प्रक्रिया ने एक ऐसे वातावरण का सृजन किया है जिसमें अधिकांश परिवार बच्चों को सुरक्षित परिवेश देने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। चंडीगढ़ की घटना के संबंध में जो ब्योरे सामने आए हैं, उनसे साफ है कि हत्यारे के भीतर शायद किसी का भय नहीं था। खबरों के मुताबिक अपराधी युवक पांच बजे के आसपास उस मकान में घुसा और चाकू या धारदार हथियार से दोनों बहनों की हत्या करके आराम से निकल गया। घटनास्थल की जांच से पता चला है कि युवक के हमले का दोनों बहनों ने अंतिम दम तक सामना किया, लेकिन जान बचाने में नाकाम रही। 

पुलिस हर वक्त सभी जगहों पर मौजूद नहीं रह सकती है। लेकिन अगर पुलिस महकमे के कामकाज की शैली ऐसी हो, जिसमें हर मामले में तुरंत कार्रवाई और सख्ती साफ दिखे तो अपराधियों के भीतर एक खौफ काम करेगा और किसी अपराध को अंजाम देने से पहले वे उसके नतीजों पर सोचेंगे। लेकिन विडम्बना है कि हमारे देश में पुलिस एवं अपराधियों की मिलीभगत से कारण पुलिस के लिये जैसा खौफ एवं डर होना चाहिए, वह नहीं है। ऐसी स्थिति में समाज को जागरूक होने की ज्यादा जरूरत है, हमें क्या की मानसिकता एवं संस्कृति के कारण भी ऐसे अपराध बढ़ रहे हैं। क्या अपने स्तर पर भी बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराधों को लेकर जागरूकता, सावधानी और आस-पड़ोस को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत नहीं है?

चंडीगढ़ की घटना ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं। जिस कमरे में दो बहनों की हत्या हुई, क्या उस दौरान आसपास कोई और नहीं था? अगर उस इमारत का इस्तेमाल पीजी यानी पेइंग गेस्ट को रखने के तौर पर भी किया जाता था उसमें रहने वालों और खासतौर पर अकेले रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए थे? सुबह पंाच बजे दोनों बहनों के कमरों में दाखिल होने और हत्या करके आराम से भाग जाने के स्थितियों के लिए क्या वहां सुरक्षा गार्ड का नहीं होना जिम्मेदार नहीं है? हालांकि इस सबसे पुलिस की जवाबदेही कम नहीं हो जाती।

जैसाकि राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरों के आंकड़े बता चुके हैं कि दिल्ली और अंडमान के बाद बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध चंडीगढ़ में होते हैं। इसके अलावा, महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी और इस मामले में चंडीगढ़ ग्यारहवें स्थान पर था। अपहरण, लूट और झपटमारी की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। सवाल है कि अगर वहां कानून-व्यवस्था और पुलिस का तंत्र अपना काम ठीक से कर रहा है तो अपराधों के मामले में यह चिंताजनक तस्वीर क्यों है? ऐसे में अपराधी प्रवृत्ति के किसी व्यक्ति ने दोनों बहनों की हत्या कर दी और फरार हो गया तो यह समूचे पुलिस तंत्र की नाकामी है।

बच्चों के साथ हो रहे अपराधों के खिलाफ लगातार केंद्र सरकार सख्त कदम उठा रही है, नये-नये कानून भी बन रहे हैं, लेेकिन प्रश्न है कि कानून बनाने से ही क्या समस्या का समाधान संभव है? अगर ऐसा है तो कानून तो बहुत बन गये और सख्त भी बन गये, फिर क्यों अपराध बढ़ रहे हैं? हमें इस समस्या की जड़ तक जाना होगा, अपराध की मानसिकता क्यों पनप रही है, इसके कारणों का पता लगाना होगा। यह जरूरी हो जाता है कि किसी व्यक्ति के अपराधी व्यवहार के पीछे कारणों पर गहनता से विचार किया जाए। 

हमें स्वयं भी जागरूक होना होगा, पुलिस की निर्भरता से बच्चों के प्रति हो रहे अपराधों पर काबू नहीं पाया जा सकता। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘वल्र्ड विजन इंडिया’ ने भारत में 45,844 के बीच एक सर्वेक्षण किया जिसमें खुलासा हुआ कि हर दूसरा बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार हुआ है। हर पांच में से एक बच्चा यौन उत्पीड़न के खौफ से खुद को असुरक्षित महसूस करता है। हर चार में से एक परिवार ने बच्चे के साथ हुए यौन शोषण की शिकायत तक नहीं की। पीड़ितों में लड़के-लड़कियों की संख्या करीब-करीब बराबर बताई गई है। बच्चो के साथ दुव्र्यवहार और हिंसा अब इस देश में बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा है। औद्योगिकीकरण, उदारीकरण, अंतरराज्यीय और ग्रामीण और शहर से पलायन, आर्थिक गरीबी, परिवार का टूटना इत्यादि की वजह से भी बच्चे अपराध का शिकार बन रहे हैं। इन स्थितियों एवं घटनाओं से बच्चों में भय एवं असुरक्षा का भाव घर कर रही है। भय से अधिक खतरनाक कुछ भी नहीं। सोचिए आज हमारे बच्चे उसी खौफ के साथ जी रहे हैं और कहीं ना कहीं ये खौफ उन्हें खोखला कर रहा है। केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय की राष्ट्रीय उत्पीडन रिपोर्ट 2007 के अनुसार भारत में हर तीन में से एक बच्चा शारीरिक हिंसा का शिकार होता है जिसमे 73 फीसदी लड़के और 65 फीसदी लड़कियां है।

भारत में बच्चों की संख्या 47 करोड़ से अधिक है, जो दुनिया के अन्य किसी भी देश में बच्चों की तुलना में सबसे ज्यादा है। यह दुःख की बात है की इनमें से अनेक बच्चे सामाजिक-आर्थिक तथा ऐतिहासिक कारणों से अनेक प्रकार के अभावों से ग्रस्त है और ये भेदभाव, उपेक्षा, और शोषण के सहज शिकार हो जाते है। इनमंे से बहुत से बच्चांे के मातापिता के पास आजीविका के बहुत कम साधन है और जिसके चलते इन बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में कई बार माता-पिता को बच्चों को छोड़कर काम पर जाना पड़ता है ऐसे में बच्चे देखभाल के अभाव में हिंसा, उपेक्षा और शोषण के शिकार हो जाते है। सभी बच्चों को सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने के लिए सुरक्षित माहौल मिले एवं यह सुनिश्चित हो कि सभी बच्चे स्कूल जायें, बच्चों के लिए बनाये गए कानूनों पर अमल ठीक तरह से हो, नीति निर्धारक बच्चों के मुद्दों को प्राथमिकता दें। परन्तु दुखद यह है कि ऐसा न होने की वजह से बच्चों के ऊपर होने वाले अपराध के आंकड़ों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।


युवा पुरुषार्थ के नये छंद रचें

युवा पुरुषार्थ के नये छंद रचें

10-Aug-2019

- ललित गर्ग -

युवा क्रांति का प्रतीक है, ऊर्जा का स्रोत है, इस क्रांति एवं ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक एवं सृजनात्मक हो, इसी ध्येय से सारी दुनिया प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाती है। सन् 2000 में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरम्भ किया गया था। यह दिवस मनाने का मतलब है कि युवाशक्ति का उपयोग विध्वंस में न होकर निर्माण में हो। पूरी दुनिया की सरकारें युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। न केवल सरकारें बल्कि आम-जनजीवन में भी युवकोें की स्थिति, उनके सपने, उनका जीवन लक्ष्य आदि पर चर्चाएं हो। युवाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इन्हीं मूलभूत बातों को लेकर यह दिवस मनाया जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के नवनिर्माण के लिये मात्र सौ युवकों की अपेक्षा की थी। क्योंकि वे जानते थे कि युवा ‘विजनरी’ होते हैं और उनका विजन दूरगामी एवं बुनियादी होता है। उनमें नव निर्माण करने की क्षमता होती है। नया भारत निर्मित करते हुए नरेन्द्र मोदी को भी युवाशक्ति को आगे लाना होगा। 
युवा किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य हैं। वो देश की नींव हैं, जिस पर देश की प्रगति और विकास निर्भर करता है। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहाँ नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए जरूरी आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रछन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं। इन स्थितियों के बावजूद युवाओें को एक उन्नत एवं आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। युवा सपनों को आकार देने का अर्थ है सम्पूर्ण मानव जाति के उन्नत भविष्य का निर्माण। यह सच है कि हर दिन के साथ जीवन का एक नया लिफाफा खुलता है, नए अस्तित्व के साथ, नए अर्थ की शुरूआत के साथ, नयी जीवन दिशाओं के साथ। हर नई आंख देखती है इस संसार को अपनी ताजगी भरी नजरों से। इनमें जो सपने उगते हैं इन्हीं में नये समाज की, नयी आदमी की नींव रखी जाती है।


यौवन को प्राप्त करना जीवन का सौभाग्य है। जीने की तीन अवस्थाएं बचपन, यौवन एवं बुढ़ापा हैं, सभी युवावस्था के दौर से गुजरते हैं, लेकिन जिनमें युवकत्व नहीं होता, उनका यौवन व्यर्थ है। उनके निस्तेज चेहरे, चेतना-शून्य उच्छ्वास एवं निराश सोच मात्र ही उस यौवन की साक्षी बनते हैं, जिसके कारण न तो वे अपने लिये कुछ कर पाते हैं और न समाज एवं राष्ट्र को ही कुछ दे पाते हैं। वे इतना सतही जीवन जीते हैं कि व्यक्तिगत स्पद्र्धाओं एवं महत्वाकांक्षाओं में उलझकर अपने ध्येय को विस्मृत कर देते हैं। उनका यौवन कार्यकारी तो होता ही नहीं, खतरनाक प्रमाणित हो जाता है। युवाशक्ति जितनी विराट् और उपयोगी है, उतनी ही खतरनाक भी है। इस परिप्रेक्ष्य में युवाशक्ति का रचनात्मक एवं सृजनात्मक उपयोग करने की जरूरत है।
गांधीजी से एक बार पूछा गया कि उनके मन की आश्वस्ति और निराशा का आधार क्या है? गांधीजी बोले- ’इस देश की मिट्टी में अध्यात्म के कण हैं, यह मेरे लिये सबसे बड़ा आश्वासन है। पर इस देश की युवापीढ़ी के मन में करुणा का स्रोत सूख रहा है, यह सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है।’ गांधीजी की यह चिन्ता सार्थक थी। क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उसकी युवापीढ़ी होती है। यह जितनी जागरूक, तेजस्वी, प्रकाशवान, चरित्रनिष्ठ और सक्षम होगी, भविष्य उतना ही समुज्ज्वल और गतिशील होगा। युवापीढ़ी के सामने दो रास्ते हैं- एक रास्ता है निर्माण का दूसरा रास्ता है ध्वंस का। जहां तक ध्वंस का प्रश्न है, उसे सिखाने की जरूरत नहीं है। अनपढ़, अशिक्षित और अक्षम युवा भी ध्वंस कर सकता है। वास्तव में देखा जाए तो ध्वंस क्रिया नहीं, प्रतिक्रिया है। उपेक्षित, आहत, प्रताड़ित और महत्वाकांक्षी व्यक्ति खुले रूप में ध्वंस के मैदान में उतर जाता है। उसके लिए न योजना बनाने की जरूरत है और न सामग्री जुटाने की। योजनाबद्ध रूप में भी ध्वंस किया जाता है, पर वह ध्वंस के लिए अपरिहार्यता नहीं है। युवापीढ़ी से समाज और देश को बहुत अपेक्षाएं हैं। शरीर पर जितने रोम होते हैं, उनसे भी अधिक उम्मीदें इस पीढ़ी से की जा सकती हैं। उन्हें पूरा करने के लिए युवकों की इच्छाशक्ति संकल्पशक्ति का जागरण करना होगा। घनीभूत इच्छाशक्ति एवं मजबूत संकल्पशक्ति से रास्ते के सारे अवरोध दूर हो जाते हैं और व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंच जाता है।
मूल प्रश्न है कि क्या हमारे आज के नौजवान भारत को एक सक्षम देश बनाने का स्वप्न देखते हैं? या कि हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से जन्मी आत्मकेन्द्रित पीढ़ी है? दोनों में से सच क्या है? दरअसल हमारी युवा पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं है, वह रोज यथार्थ से जूझती है, उसके सामने भ्रष्टाचार, आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप, महंगी होती जाती शिक्षा, कैरियर की चुनौती और उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को कुचलने की राजनीति विसंगतियां जैसी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी हैं। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी है। इन जटिल स्थितियों से लौहा लेने की ताकत युवक में ही हैं। क्योंकि युवक शब्द क्रांति का प्रतीक है। 
विचारों के नभ पर कल्पना के इन्द्रधनुष टांगने मात्र से कुछ होने वाला नहीं है, बेहतर जिंदगी जीने के लिए मनुष्य को संघर्ष आमंत्रित करना होगा। वह संघर्ष होगा विश्व के सार्वभौम मूल्यों और मानदंडों को बदलने के लिए। सत्ता, संपदा, धर्म और जाति के आधार पर मनुष्य का जो मूल्यांकन हो रहा है मानव जाति के हित में नहीं है। दूसरा भी तो कोई पैमाना होगा, मनुष्य के अंकन का, पर उसे काम में नहीं लिया जा रहा है। क्योंकि उसमें अहं को पोषण देने की सुविधा नहीं है। क्योंकि वह रास्ता जोखिम भरा है। क्योंकि उस रास्तें में व्यक्तिगत स्वार्थ और व्यामोह की सुरक्षा नहीं है। युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि संघर्ष को आमंत्रित करे, मूल्यांकन का पैमाना बदले, अहं को तोड़े, जोखिम का स्वागत करे, स्वार्थ और व्यामोह से ऊपर उठे। 
युवा दिवस मनाने का मतलब है-एक दिन युवकों के नाम। इस दिन पूरे विश्व में युवापीढ़ी के संदर्भ में चर्चा होगी, उसके हृास और विकास पर चिंतन होगा, उसकी समस्याओं पर विचार होगा और ऐसे रास्ते खोजे जायेंगे, जो इस पीढ़ी को एक सुंदर भविष्य दे सकें। इसका सबसे पहला लाभ तो यही है कि संसार भर में एक वातावरण बन रहा है युवापीढ़ी को अधिक सक्षम और तेजस्वी बनाने के लिए। युवकों से संबंधित संस्थाओं को सचेत और सावधान करना होगा और कोई ऐसा सकारात्मक कार्यक्रम हाथ में लेना होगा, जिसमें निर्माण की प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहे। विशेषतः राजनीति में युवकों की सकारात्मक एवं सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा। 
अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइविंग द फ्यूचर’ में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है ‘मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।’ उनको यह इसलिये कहना पड़ा क्योंकि जो जोश उनमें भरा जाता है, यौवन के परिपक्व होते ही उन चीजों को भावुकता या जवानी का जोश कहकर भूलने लगते हैं। वे नीति विरोधी काम करने लगते है, गलत और विध्वंसकारी दिशाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिये युवकों के लिये जरूरी है कि वे जोश के साथ होश कायम रखे। वे अगर ऐसा कर सके तो भविष्य उनके हाथों संवर सकता है। इसीलिये सुकरात को भी नवयुवकों पर पूरा भरोसा था। वे जानते थे कि नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है। एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता रखता था। आज की युवापीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे स्वामी विवेकानन्द और सुकरात जैसे लोग दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है।’’ महादेवी वर्मा ने भी कहा है ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’ इसीलिये युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि वह युवा दिवस पर कोई ऐसी क्रांति घटित करे, जिससे युवकों की जीवनशैली में रचनात्मक परिवर्तन आ सके, हिंसा-आतंक-विध्वंस की राह को छोड़कर वे निर्माण की नयी पगडंडियों पर अग्रसर हो सके।  

प्रेषकः
 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


भोजपुरी भाषा के उपासक डॉ शयाम दत्त पाण्डे जिन्हें दिलदार नगर के लोगों ने भुला दिया !

भोजपुरी भाषा के उपासक डॉ शयाम दत्त पाण्डे जिन्हें दिलदार नगर के लोगों ने भुला दिया !

08-Aug-2019

डॉ श्याम दत्त पाण्डेय
जस नाम तस गुण।डॉ श्याम दत्त पाण्डे जी का आकर्षक बलिष्ट खूबसूरत व लम्बे कद काठी के व्यक्ति थे। इनकी छवि इनके नाम को सुशोभित करती थीं ये अच्छे पहलवान(कुश्ती लड़ने) तथा क्रिकेट व वालीबाल खिलाड़ी होने के साथ साथ एक मधुर गायक और अच्छे बाँसुरी वादक भी थे ।एक तरह से लोक कलाओं के प्रेमी और संरक्षक थे ।

आपकी प्रारम्भिक शिक्षा इनके जन्म स्थान गाज़ीपुर जनपद के ब्रम्हनौलिया ग्राम में हुई जो कि दिलदार नगर थाने के अन्तर्गत है छठवी से दसवीं तक कि शिक्षा भभुआ हाई स्कूल(बिहार)में हुई तथा बारहवीं की शिक्षा वारणसी के BHU में जीव विज्ञान संकाय में प्राप्त की ।इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पटना मेडिकल कॉलेज में MBBS के लिए आवेदन किया लेकिन40 सीट होने की वजह से दाखिला नहीं हो सका इसके बाद इन्होंने इसके बाद उन्होंने दरभंगा मेडिकल कॉलेज में एल एम पी की डिग्री हासिल की और सरकारी नौकरी के पलामू जिला झारखंड के रांका स्टेट में बतौर तैनात हुए।

सन 1948 से 1951 तक पालमु मे बतौर डॉ सेवारत रहे ।उस समय पालमु गढ़वा जिला अति पिछड़ा ,और वहाँ की जनता आर्थिक दृष्टि से कमजोर थीं ,वहां के लोगों की आपने खूब सेवा की ,उनकी सेवा भावना से वहाँ की जनता उन्हें मसीहा मानती थी, समूचे पालमु छेत्र उनकी बड़ी ख्याति फ़ैली हुई थी, ईसी बीच आपका तबादला नेतरहाट हो गया, वहाँ पर भी अपने सेवा भाव से खूब ख्यातिप्राप्त की ।
नेतरहाट में रहते हुए इनके बाबा श्री मनवहाल पाण्डेय रिटायर्ड हेड मास्टर उम्र 86 वर्ष का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था जिनकी सेवा करने आपने नेतरहाट को और नौकरी को अलविदा कर दिया और अपने बाबा की सेवा के साथ साथ वहाँ की जनता की भी सेवा करने लग गए जिसे वहाँ की जनता आज भी याद करती हैं।
दिलदारनगर में उन्होंने अपनी स्वयं की क्लीनिक खोलकर वहां के लोगों की सेवा भवना से चिकित्सा करने लगे ,बहु आयामी प्रतिभा के धनी डॉ साहब दिलदारनगर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में धोबिनाच कव्वाली कवि सम्मेलन आयोजित कर सहयोग करते थे ।
सन1957 टाऊन क्लब दिलदारनगर बनने के बाद उसके आजीवन अध्यक्ष रहे, और स्वयं के व्यय पर भोजपुरी गीत संगीत साहित्यिक कृतियों के आयोजन में सहयोग करते रहे।गंगा जमुना तहज़ीब को बनाये

रखने डॉ साहब जाति प्रथा छुवा - छुत  भेदभाव की सख़्त ख़िलाफ़त करते रहे। 
दिलदारनगर गर्ल्स इंटर कॉलेज इनकी सोच का ही परिणाम था, जो उस छेत्र के लिये उस समय बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
उनका आकर्षण ऐसा था अध्यापक गण चाहे वो राजपूत मुस्लिम इण्टर कॉलेज के हो या आदर्श विद्यालय के खिंचे चले आते थे ।
आपके अच्छे मित्रों में स्व. सरयू पाण्डे ,के एल रॉय पूर्व स्वास्थ्य मंत्री स्व हैदर अलीखो , प्रधान अध्यापक मुस्लिम राजपूत इण्टर कॉलेज वाईस प्रिंसीपल श्री शर्मा, श्री उपाध्याय प्रिंसीपल आदर्श विद्यालय ,केसरी मास्टर ,स्व नाज़िर हुसैन भोजपुरी फ़िल्मों के भीष्मपितामह ,स्व. हाज़ी अहमद अली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उसिया छेत्र के सभी ग्राम प्रधान दिलदारनगर के सभी प्रमुख जन उन्हें बड़े आदर के साथ याद करते रहे है।

उनके व्यक्तित्व की खासियत ये थी कि मरीज़ों की सेवा में हमेशा अपने किटबैग के साथ तैयार रहते और पैदल ही पहुँच जाते और घूंघट में रहती महिलाओं का सीमित साधनों के साथ बड़े आदर से चिकित्सा करते थे।
1 रुपिया फीस लेने वाले डॉ पाण्डे का कहना था की मैंने गरीब परिवार में जन्म लिया है ,ग़रीबो के लिए मेरा जीवन समर्पित हैं।और उन्होंने जीवनपर्यन्त गरीबों की सेवा की है,
उनके परिवार जनों से और दिलदारनगर के निवासियों से उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तब मानी जायेगी जब उनके जन्म दिवस के अवसर पर 
1. स्वास्थ शिविर लगा कर गरीबों का मुफ़्त इलाज हो 
2.पाण्डे जी की स्मृति में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो 
3.उनके नाम पर उनके गृह ग्राम में स्मारक /स्कूल/ चिकित्सालय /बनाया जाय
एम. डब्ल्यू. अन्सारी, आई.पी.एस. से.नि. डी.जी. 


तेजाब से सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि आत्मा भी जलने लगती है

तेजाब से सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि आत्मा भी जलने लगती है

26-Jul-2019

सैय्यद एम अली तक़वी, निदेशक, यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ

किसी इंसान को मौत के घाट उतार देने से उसकी पूरी जिंदगी खत्म की जा सकती है, उसका हाथ पांव काट देने से उसको अपंग किया जा सकता है किसी भी तरह की जिस्मानी तकलीफ़ देकर परेशान किया जा सकता है लेकिन अगर किसी पर तेजाब डाल दिया जाए तो वह इंसान ना मर पाता है ना ही जी पाता है। ऐसी हो जाती है जिंदगी। तेजाब से बदसूरत हुई जिंदगी को हमारा समाज सर उठाकर जीने की इजाजत भी नहीं देता है। यह हमारे समाज की कड़वी और सच्ची तस्वीर है। तेजाब से सिर्फ चेहरा नहीं बल्कि इंसान की आत्मा भी जलने लगती है ।

पूरी दुनिया में लड़कियों और औरतों पर एसिड अटैक जैसी घिनौनी और भयानक वारदातों के साथ एक बहुत बड़ा सवाल कानून व्यवस्था के साथ साथ बाजार का भी जुड़ा हुआ है। किसी भी पीड़ित के मन में ये सवाल पैदा होना लाज़िमी है कि क्या तेज़ाब जैसी संवेदनशील वस्तु की बिक्री और उपलब्धता बाजार में अन्य सामानों की तरह होनी चाहिए? इसका जवाब और व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों की अनदेखी और बाजार में आसानी से तेज़ाब की उपलब्धता भी ऐसी घटनाओं के रोकथाम में सबसे पहले आड़े आ रही है। बल्कि शायद यही सबसे बड़ा कारण है।

आइए पहले, रूह कंपा देनी वाले ऐसे जघन्य अपराध पर कवयित्री इंदु रिंकी वर्मा की कुछ पंक्तियों पर नजर डालते हैं।

वह लिखती हैं- 

'शरीर ही तो झुलसा है, रूह में जान अब भी बाकी है,  हिम्मत से लड़ूंगी ज़िन्दगी की लड़ाई, आत्मसम्मान मेरा अब भी बाकी है, 
मिटाई है लाली होठों की मेरी, पर होठों की मुस्कान अब भी बाकी है, 
काली हूं मैं, मैं दुर्गा भी हूं, हौसलों में उड़ान अब भी बाकी है, बदसूरत बनाया मुझको तो तूने, बदसीरत है तू ये बात भी सांची है, जलेगा सवालों से पल पल तू मेरे, हर सवाल में तेज़ाब अब भी बाकी है।' 

यह चंद लाइनें तेज़ाब पीड़ित लड़कियों का दुख-दर्द शिद्दत से महसूस करा जाती है।  महिलाओं पर अत्याचार, शोषण, क़त्ले आम ये सब बहुत छोटे से शब्द नज़र आते हैं, एक तेज़ाब की शिकार महिला के दर्द के आगे। महिलाओं को जिस्मानी और दीमागी तकलीफें देना आज के बेबस और कुंठित आदमी के लिए कोई नयी बात नहीं है।
पुरुषवादी मानसिकता ने हज़ारों सालों तक महिलाओं का मन मुताबिक इस्तेमाल किया और जब मन भर गया तो किसी बेकार  वस्तु समझकर फेंक दिया।

इतिहास गवाह है कि एक लंबे शोषण काल के बाद 18वीं सदी के आते-आते दूसरे देशों में महिलाओं की आज़ादी की आवाजें बुलंद होना शुरू हुईं। 19वीं और 20वीं शताब्दी ने महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को और तेजी दी और 21वीं सदी के आते-आते महिलाओं के लिए बहुत कुछ बदला पर नहीं बदली तो कुंठित सभ्यता की विचारधारा।

सैकड़ों सालों से जहां महिलाएं अपने अधिकारों के लिए और अपने वजूद के लिए लड़ाई लड़ रही थीं और सफलता अर्जित कर रहीं थी तो वहीं ये पुरुषवादी सभ्यता, महिलाओं को तकलीफ देने का नये नये तरीके खोजती रहती है। ये गंदी सोच ऐसे तरीकों की तलाश में थी जो बहुत आसानी से  मिल जाए और तरीका इतना घातक हो की महिला की आत्मा तक कांप जाए। शायद इसी गंदी सोच और मानसिकता वाले लोगों ने तेज़ाब को माध्यम बनाया।

कानून की कमियों के कारण आज महिलाएं बग़ैर किसी दोष के भी भुगत रहीं हैं और हमारी सभ्यता इस जर्जर एवं निरर्थक व्यवस्था का मज़ाक उड़ा रही है।  एसिड अटैक की खबरें हर अखबार,चैनल, न्यूज़ पोर्टल, सोशल मीडिया आदि पर देखने को मिल जाएंगी।  चर्चा और सेमिनार भी देखने सुनने को मिल जाएंगे पर ये चर्चा किसी नतीजे पर पहुंचे बिना ही समाप्त हो जाती हैं। इसका परिणाम कुछ नहीं निकलता है। एसिड अटैक पर लिखकर, टीवी प्रोग्राम करके सिर्फ टीआरपी और स्पोंसरशिप बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा है, क्योंकि अगले दिन फिर एसिड अटैक से पीड़ित महिला अपना इलाज कराने के लिए जूझ रही होती हैं, कहीं कोई महिला शिकार बन रही होती है तो कहीं दुनिया को अलविदा कह रही होती है।

हम महिलाओं के साथ किस तरह बर्ताव करें इसमें बहुत सी समस्याएं हैं। लोगों की संवेदनाएं जगाने की जरूरत है वो इस अपराध और इससे होने वाली तकलीफ को लेकर उदासीन हैं, यह किसी इंसान(पीड़ित महिला) की पूरी जिंदगी तबाह कर देता है।  सरकार जांच कमेटी बनाकर, बयान देकर अपने आप को बरी कर लेती है और फिर एक बार समाज अपने ढर्रे पर लौट आता हैं। सामाजिक कार्यकर्ता धरने प्रदर्शन और टीवी की चर्चा में शामिल होकर चादर तान कर चैन से सो जाते हैं और देश में एसिड अटैक होते रहते हैं। यही रेप केस में भी हो रहा है।एसिड अटैक की वजह से ना जाने कितनी लड़कियों और महिलाओं की जान जा चुकी है, ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी है और आज बद से बदतर हालात में अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं।

 भारत में हर साल करीब 500 लोगों पर एसिड अटैक होता है, वहीं दुनियाभर में यह आंकड़ा 1500 के आसपास है। इसमें महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। प्यार में असफलता, छेड़खानी, दहेज और जमीन विवाद में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की माने तो यूपी, एमपी और दिल्ली में ऐसी घटनाओं का ग्राफ सबसे उपर है जो चिंताजनक है। साल 2014 में केवल यूपी में ही एसिड अटैक के 185 केस दर्ज किए गए थे।

देश में बढ़ती इन घटनाओं को देखते हुए सन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्‍य सरकारों को जमकर फटकार लगाई थी। इसके साथ ही यह निर्देशित किया था कि एसिड अटैक से पीडि़तों के इलाज और पुनर्वास की पूरी जिम्‍मेदारी राज्‍य सरकार की होगी। लेकिन परिणाम क्या हुआ? वही ढाक के तीन पात। यह एक ऐसा प्रकरण है जिस पर न्यायपालिका और सरकार को सख्त क़ानून बनाने चाहिए जो इस देश के साथ साथ दुनिया के लिए एक मिसाल के रूप में सामने आए साथ ही शिकार महिला को सुरक्षा और सुविधाएं मुहैय्या कराई जाएं । 

मुफ्त इलाज के साथ सरकारी नौकरी और सामजिक सुरक्षा के लिए इंतेज़ाम करना चाहिए ताकि एसिड अटैक की पीड़ित को कहीं से कुछ तो राहत मिल सके। एसिड अटैक को लेकर कानून को सख्त बनाने के लिए आईपीसी की धारा 326 में कुछ बदलाव किया गया। बदलाव के बाद 326 Aऔर 326 B अस्तित्व में आया. आईपीसी की धारा 326 a में तेजाब फेंकने का अपराध गैर जमानती होगा। दोषी को कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है साथ ही साथ दोषी पर उचित जुर्माना भी होगा और जुर्माने की रकम पीड़िता को दिया जाएगा। धारा 326 B के मुताबिक तेजाब फेंकने का अपराध गैर जमानती है। इसके लिए दोषी को कम से कम पांच साल तक की सजा हो सकती है और दोषी को जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

अपराध पर सिर्फ नियम और कानून से रोक नहीं लगाई जा सकती है बल्कि हमें लोगों की सोच बदलने की जरूरत है। लोगों को समझना चाहिए कि आप इतनी आसानी से किसी महिला का चेहरा नहीं बिगाड़ सकते हैं। अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो आप किसी महिला के साथ ऐसा बुरा व्यवहार नहीं कर सकते। इस तरह की शिक्षा को बढ़ावा देने की जरूरत है, स्कूल, कालेज, सोशल मीडिया, रैली इन सबके जरिए लोगो को समझाना हमारा पहला लक्ष्य होना चाहिए। हम चाहते हैं कि एसिड हमले के शिकार लोग भी यह महसूस करें कि अभी जिंदगी में बहुत कुछ बचा हुआ है। जिंदगी खत्म नहीं हुई है वो बाहर आएं और खुद को उतना ही आत्मविश्वास से भरा महसूस करें जितना हमले के पहले करते थे।

 


आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए

आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए

25-Jul-2019

लेख : डॉ नीलम महेंद्र 

नारी, स्त्री, महिला वनिता,चाहे जिस नाम से पुकारो नारी तो एक ही है। ईश्वर की वो रचना जिसे उसने सृजन की शक्ति दी है, ईश्वर की वो कल्पना जिसमें प्रेम त्याग सहनशीलता सेवा और करुणा जैसे भावों  से भरा ह्रदय  है। जो  शरीर से भले ही कोमल हो लेकिन इरादों से फौलाद है। जो अपने जीवन में अनेक किरदारों को सफलतापूर्वक जीती है। वो माँ के रूप में पूजनीय  है, बहन के रूप में सबसे खूबसूरत दोस्त है बेटी के रूप में घर की रौनक है, बहु के रूप में घर की लक्ष्मी है  और पत्नी के रूप में जीवन की हमसफर।

पहले नारी का स्थान घर की चारदीवारी तक सीमित था लेकिन आज वो हर सीमा को चुनौती दे रही है। चाहे राजनीति का क्षेत्र हो चाहे सामाजिक, चाहे हमारी सेनाएँ हों चाहे कारपोरेट जगत, आज की नारी  हर क्षेत्र में सफलता पूर्वक दस्तक देते हुए देश की तरक्की में अपना योगदान दे रही है।

समय के साथ नारी ने परिवार और समाज में अपनी भूमिका के बदलाव को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है अपनी इच्छा शक्ति के बल पर सफल भी हुई लेकिन आज वो एक अनोखी दुविधा से गुजर रही है। आज उसे अपने प्रति पुरुष अथवा समाज का ही नहीं बल्कि उसका खुद का भी नजरिया बदलने का इंतजार है।

क्योंकी कल तक जो नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक थे, जो एक होकर एक दूसरे की कमियों को पूरा करते थे, जो अपनी अपनी कमजोरियों के साथ एक दूसरे की ताकत बने हुए थे, आज एक दूसरे से बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन यह समझ नहीं पा रहे कि इस लड़ाई में वे एक दूसरे को नहीं बल्कि खुद को ही कमजोर और अकेला करते जा रहे हैं।

आधुनिक समाज में नारी स्वतंत्रता महिला सशक्तिकरण महिला उदारीकरण जैसे भारी भरकम शब्दों के जाल में न केवल ये दोनों ही बल्कि एक समाज के रूप में हम भी उलझ कर रह गए हैं। इन शब्दों की भीड़ में हमारे कुछ शब्द, इन कल्पनाओं में हमारी कुछ कल्पनाएँ, इन आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए।
इस नई शब्दावली और उसके अर्थों को समझने की कोशिश मे हम अपने कुछ खूबसूरत शब्द और उनकी गहराई को भूल गए। अपनी संस्कृति में नारी और पुरूष की उत्पत्ति के मूल "अर्धनारीश्वर" को भूल गए।

भूल गए कि शिव के अर्धनारीश्वर के रूप में शिव  पुरुष का प्रतीक हैं और शक्ति नारी का।
भूल गए कि प्रकृति अपने संचालन और नव सृजन के लिए शिव और शक्ति दोनों पर ही निर्भर है।
भूल गए कि शिव और शक्ति अविभाज्य हैं।
भूल गए कि शिव जब शक्ति युक्त होता है, तो वह समर्थ होता है।
भूल गए कि शक्ति के अभाव में शिव शव समान है।
भूल गए कि शिव के बिना शक्ति और शक्ति के बिना शिव का कोई आस्तित्व ही नहीं है।
क्योंकि,
शिव अग्नि हैं तो शक्ति उसकी लौ हैं।
शिव तप हैं तो शक्ति निश्चय।
शिव संकल्प करते हैं तो शक्ति उसे सिद्ध करती हैं।
शिव कारण हैं तो शक्ति कारक हैं।
शिव मस्तिष्क हैं तो शक्ति ह्रदय हैं।
शिव शरीर हैं तो शक्ति प्राण हैं।
शिव ब्रह्म हैं तो शक्ति सरस्वती हैं।
शिव विष्णु हैं तो शक्ति लक्ष्मी हैं।
शिव महादेव हैं तो शक्ति पार्वती हैं।
शिव सागर हैं तो शक्ति उसकी लहरें।

जब प्रकृति का आस्तित्व ही अर्धनारीश्वर में है, पुरुष और नारी दोनों ही में है तो दोनों में अपने अपने आस्तित्व की लड़ाई व्यर्थ है। इसलिए नारी गरिमा के लिए लड़ने वाली नारी यह समझ ले कि उसकी गरिमा पुरुष के सामने खड़े होने मे नहीं उसके बराबर खड़े होने में है। उसकी जीत पुरुष से लड़ने में नहीं उसका साथ देने में है। इसी प्रकार नारी को कमजोर मानने वाला पुरुष यह समझे कि उसका पौरुष महिला को अपने पीछे  रखने में नहीं अपने बराबर रखने में है। उसका मान नारी को अपमान नहीं सम्मान देने में है। उसकी महानता नारी को अबला मानने में नहीं उसे सम्बल देने में है।

इसी प्रकार नारी को एक संघर्षपूर्ण जीवन देने वाले समाज के रूप में हम सभी समझें कि नारी न सिर्फ हमारे परिवार की या समाज की बल्कि वो सृष्टि की जीवन धारा को जीवित रखने वाली नींव है।
 


जातीय राजनीति और ब्राम्हणवाद

जातीय राजनीति और ब्राम्हणवाद

16-Jul-2019

कृष्ण देव सिंह (के डी सिंह बुधवार समाचार)

जो विचारों,वसूलों की अग्नि से तपकर निकलता है वो विचारधारा के लिए जीता मरता है। पहले राजनैतिक पार्टीया अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को वरिष्ठता व योग्यता के हिसाब से मौका देती थी।पर ये क्रम टूट गया। वंश ,कूल, गोत्र,रसूख,पैसा देखकर और दलालो को अवसर देने लगी। परिणाम स्वरूप कई राजनीतिक दलों की अतेष्ठी भी हो गई है और समय रहते कुछ और दल नहीं चेते तो वक्त उन्हें भी गर्त में भेजने में संकोच नहीं करेगी । सनातन हिन्दु घर्म के सामान्य वर्ग की जातियो का यह सोच कि जंन्म के आधार पर वे उचे या बडे है .ब्राह्मणवाद कहलाता है| यह विचार धारा मनुष्य को उंच-नीच और जाति वर्ग मे बांटता है | वर्तमान भारत मे तुलसी दास द्वारा रचित रामचरित मानस , मनुस्मृति और वंच आफ थाट को  ब्राम्हणवादी प्रवृति का प्रमुख पोषक मान्य रचनाओं के रूप में  प्रचारित व प्रसारित है ၊

पूजहि बिप्र शील गुण हीना ,शूद्र पूजहि न .होय प्रवीणा ||

    नव-ब्राह्मणवाद

बहुजनो ,दलितो शूद्रो मे एक ऐसा वर्ग विकसित हुआ है ,जो समृद्ध है, पढ़ा-लिखा है | इस नवधनाढ्य तबका मे ब्राह्मणवादी सोच का आकर्षण है | जिस परिवेश मे ये पले बढ़े  है, उससे अपने को अलग और उच्च समझते है|अब इनके बाल बच्चे भी जन्मजात श्रेष्ठ समझे जाते है| नये तबको का यही सोच ,नव ब्राह्मणवाद कहलाने लगा  है| इसका प्रदर्शन अन्य रुपो मे भी होने लगा  है |

अब मंदिर निर्माण , सामान्य वर्ग के  मुहल्ले मे उतना नही होता है जितना दलितो  व पिछड़े वर्ग के मुहल्ले मे धडल्ले से होते है | भजन हरिकीर्तन,शिव चर्चा ,इन बस्तियो मे कहीं न कही होते ही रहते है| 
एक बात के लिये मै हिन्दु मंदिर और मठो की प्रशंसा करूँगा कि उन्होने मंदिरो और मठो के साथ साथ कई शिक्षण संस्थान ,अस्पताल व यात्रियों तथा गरीबों के लिए मुफ्त भोजनालय भी खोले,जिसका लाभ सबो को मिलता है। कई संस्थान व संगठन धार्मिक स्थलों पर अपनी मुफ्त सेवायें भी देते है परन्तु इसके पीछे का उद्देश्य प्रमुखत: पुण्य अर्जित करना ही है।

नव ब्राह्मणवादी दो खेमो मे बँटे है | पहला खेमा अपने को पूर्णतः मनुवाद(संघ) के विलीन कर लिया है| ये नवब्राह्मणवादी अधिक खतरनाक है|ये आये दिन संघ के समर्थन मे आग उगलते रहते है| ये अधिक आक्रामक है|जैसे:विनय कटियार, साक्षी महाराज,कल्याण सिह, उमा भारती वगैरह....  दूसरा खेमा लोहिया वाद का चादर ओढे हमारे बीच है | जिसमे लालू प्रसाद, मायावती, मुलायम सिंह सरीखे लोग है | इनके पूजापाठ का पाखण्ड देखकर एक ब्राह्मण भी शरमा जाएगा| संपत्ति इतने जमा कर लिये है कि जन्म जन्मांतर तक इनके सगे संबंधि भी श्रेष्ठ बने रहेगे|

     जातिवादी राजनीति 

जाति व्यवस्था एक ब्राह्मणवादी सोच है फलतः जाति आधारित राजनीतिक विचार धारा जिसे लोहियावाद के रूप मे जाना जाता है.अंतिम रूप से ब्राह्मणवादी राजनीति मे विलीन हो गया प्रतीत होने लगा है । उसके कई उदाहरण है लेकिन राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय देश के प्रमुख घोषित ख्याति नामधारी नेता तो कांग्रेस में विलीन हो और अधिकांश देश की प्रमुख दक्षिणपंथी विचारधारा राष्ट्रीय स्वंम सेवक संघ में ।

  जैसे कुछ उदाहरण : 1-फायर ब्रांड लोहियावादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस अटल बिहारी बाजपेयी ,(भाजपा,) के समर्थक हो गये |

2-लोहियावादी , यादव हृदय सम्राट मुलायम सिंह मोदी के फैन हो गये |

3- देश के जाने माने सुशासन बाबू और नीतीश कुमार ,भाजपा के गोद मे सत्तासुख भोग रहे है | इन्होने भाजपा को बिहार मे पैर पसारने के लिए सहयोग देने में कोई कोर कसर बाकि नही रखा।

4-दक्षिण की राजनीतिक पार्टियाँ डी.एम.के. और ए.आई.डी.एम.के का संबंध भाजपा के साथ घरवाली और बाहरवाली जैसा है | एक रुठती है तो दूसरी मान जाती है

 5-अब सबसे पवित्र लोहियावादी लालू प्रसाद यादव जी की बात करे | अस्सी के दशक मे लालू के शासनकाल मे ब्राह्मवादी-सामंती गुण्डो ने अनेक नरसंहार किया जिसमे सैकडो भूमिहीन गरीब पिछड़े और दलित मारे गये. लेकिन कभी भी लोहियावादी लालू इन पिछड़े दलितो के समर्थन मे खड़ा नही हुए | बल्कि पूरे बिहार को यादव और मुसलमान राज्य बनाने  के साथ साथ अपराधियों को खुला संरंक्षण देकर जंगल राज्य की स्थापना की ।हाल के चुनाव मे भी लालू के लाल-तेजस्वी ने गिरिराज सिंह जैसे घोर प्रतिक्रियावादी को जितवाने मे भरपुर मदद किया तथा यादव परिवार भ्रष्टाचार का प्रयाय बन कर रह गया है । 

(इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं )