लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर कर रहा मोर मितान मोर संगवारी

लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर कर रहा मोर मितान मोर संगवारी

26-Nov-2020

"पुरुषों की अब है बारी, परिवार नियोजन में हो भागीदारी"

No description available.

 

रायपुर पुरुष नसबंदी पखवाड़ा के प्रथम चरण में "मोर मितान मोर संगवारी" कार्यक्रम लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर करने महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । इस कार्यक्रम के माध्यम से चौपाल लगाकर इच्छुक लक्ष्य दम्पत्तियों को पुरुष नसबंदी के विषय पर विस्तृत जानकारी देकर  समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है । इस समय प्रदेश में पुरूष नसबंदी के लियें मोबिलाइजेशन सप्ताह चल रहा है जोकि 27 नवंबर तक चलेगा । इस दौरान पुरूष नसबंदी हेतु संभावित लाभार्थियोंको पंजीकृत किया जा रहा है । इसके बाद 28 नवंबर से 4 दिसंबर तक नसबंदी की प्रक्रिया की जाएगी । पखवाड़े के अंतर्गत समस्त गतिविधियों को कोविड-19 से संबंधित समस्त सावधानियां को सुनिश्चित करते हुए मनाया जा रहा है ।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ मीरा बघेल बताया, प्रथम चरण के पुरुष नसबंदी पखवाड़े में "मोर मितान मोर संगवारी" कार्यक्रम के तहत योग्य और लक्ष्य दंपत्तियों की भ्रांतियों को दूर करने के लिये विषय विशेषज्ञों द्वारा पुरुष और महिला नसबंदी पर फैली भ्रांतियॉ को दूर किया जा रहा है ।इस दौरान लोगों को बताया जा रहा है कि पुरुष नसबंदी बहुत ही सरल है और कम समय में होने वाली प्रक्रिया है। साथ ही इसमें कोई तकलीफ भी नही होती है। जबकि महिला नसबंदी कराना एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना पड़ता है और घरेलू कार्य भी प्रभावित होता है।

उन्होंने बताया, शत-प्रतिशत उपलब्धि प्राप्त करने के लियें प्रथम चरण की अवधि में जो लोग पूर्व में नसबंदी की सेवाएं प्राप्त कर चुके हैं, उन दम्पत्तियों को भी चौपाल में बुलाकर उनके माध्यम सेलोगों को प्रोत्साहित करने की अपील करने को कहा गया है। पुरुष नसबंदी से लाभ के बारे में इच्छुक दम्पत्तियों को जानकारी दी जा रही है  ताकि दम्पत्ति बिना कोई भय अथवा दबाव के निर्भीक होकर नसबंदी की सेवाएं प्राप्त कर सकेंगे। प्रथम चरण की अवधि पर चौपाल कार्यक्रम के दौरान पुरुष नसबंदी को बढ़ावा देने हेतु शासन द्वारा विशेष पखवाड़ा का आयोजन किया जा रहा है। चौपाल में पुरुष नसबंदी हेतु प्रोत्साहित करने आये दम्पत्ति संजय (बदला हुआ नाम) ने बताया,“हमारी शादी वर्ष 2011 में हुई थी हमारे दो बच्चे है और मैं और मेरी पत्नी और बच्चे नही चाहते थे इसलिए मैंने पुरुष नसबंदी कराई है ।संजय कहते हैं कि नसबंदी करा लेने के उपरांत मैं पहले की तुलना में अपने आपको अधिक ऊर्जावान महसूस करताहूं । और अब पत्नी के गर्भधारण करने की चिंता भी नहीं रहती है । स्थाई साधन के रूप में पुरुष नसबंदी एक पक्का और अच्छा साधन है । पुरुष नसबंदी महिलाओं की तुलना में बहुत ही सरल प्रक्रिया है । साथ ही  संजय कहते हैं कि जैसा कि समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां फैली है की पुरुष नसबंदी कराने से क्षमता कम हो जाती है यह पूरी तरह से गलत है मैं और मेरी पत्नी पूरी तरह से एक दूसरे से संतुष्ट हैं।“

---------------------------------


हाफिज सईद की सजा कोरा दिखावा है या सच?

हाफिज सईद की सजा कोरा दिखावा है या सच?

23-Nov-2020

हाफिज सईद की सजा कोरा दिखावा है या सच?
 -ः ललित गर्ग:-

No description available.

लगता है पाकिस्तान ने ठान ली है कि वो नहीं सुधरेगा। अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेगा। भारत ने दो-दो बार पाकिस्तान को घर में घुसकर सबक सिखाया लेकिन पाकिस्तान सीधी राह पर आने को तैयार नहीं। पाकिस्तान की अर्थ-व्यवस्था चैपट है, जनजीवन त्राहि-त्राहि कर रहा है, अस्त-व्यस्त है, फिर भी वह अपनी आन्तरिक स्थितियों को सुधारने की बजाय वह आतंकवाद को बल देता है, दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए आतंकवाद के विरोधी होने ढोंग करता है। आखिर कब उसे सद्बुद्धि मिलेगी? लश्करे तैयबा के संस्थापक और वैश्विक आतंकी हाफिज सईद को पाकिस्तान की एक अदालत ने जो दस साल की कैद की सजा सुनाई है, वह उसके ढ़ोग एवं पाखण्डी होने को ही दर्शा रहा है। भले ही दुनिया को पाकिस्तानी न्यायपालिका के इस फैसले से पहली नजर में यही संदेश गया है कि आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान सरकार के रूख में सख्ती आयी है और वह आतंकी सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या पाकिस्तान की आतंकवाद को पोषण देने एवं पल्लवित करने की मानसिकता में बदलाव आया है? आतंकियों, उनके संगठनों और साम्राज्य को लेकर पाकिस्तान सरकार ने क्या सही में कड़ा रूख अपना लिया है? ऐसा लगता नहीं है, यह सब कोरा दिखावा है, अन्तर्राष्ट्रीय दबावों का परिणाम है।
दुनिया के खूंखार आतंकवादियों में शुमार हाफिज सईद को आतंकी वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) के दो मामलों में पाकिस्तान की एक अदालत ने भले ही सजा सुनाई हो, उसकी संपत्ति जब्त करने का निर्देश भी दिया हो और 1.1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया हो, यदि यह सच है तो दुनिया का बड़ा आश्चर्य है। क्योंकि हाफिज सईद को सजा, उसे जेल में बंद रखने और उसके संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें हैरानी इसलिए पैदा करती हैं क्योंकि यह पाकिस्तान का झूठ और पाखंड है। सईद को सजा पहले भी होती रही है और ऐसी कार्रवाइयां कर पाकिस्तान दुनिया की आंखों में धूल झोंकता रहा है, गुमराह करता रहा है। सवाल यह है कि अगर सईद और उसके संगठन के खिलाफ पाकिस्तान सरकार इतनी सख्त है तो फिर कैसे सईद जेल से आतंकी अभियानों को अंजाम देने में लगा है? तीन-चार दिन पहले जम्मू कश्मीर में नगरोटा में बड़ा हमला करने वाले आतंकी लश्कर के ही थे।
हाफिज सईद के आतंकवाद एवं आतंकवादी घटनाओं का लम्बा, घिनौना एवं अमानवीय चेहरा रहा है। वह भारत सहित दुनिया में आतंकवाद को पनपाने वाला मुखर आतंकवादी है। उल्लेखनीय है कि भारत को पिछले काफी सालों से हाफिज सईद की तलाश है। सईद साल 2008 में मुंबई में हुए सीरियल बम धमाकों का मास्टरमाइंड है। इस हमले में छह अमेरिकियों सहित 164 लोगों की मौत हो गई थी। अमेरिका ने सईद के सिर पर एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। वह आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक है। पाकिस्तान में वो जमात-उद-दावा नामक संगठन चलाता है। अमेरिकी सरकार की वेबसाइट रिवार्ड्स फॉर द जस्टिस में भी हाफिज सईद को जमात-उद-दावा, अहले हदीद और लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक बताया गया है। अहले हदीद एक ऐसा इस्लामिक संगठन है जिसकी स्थापना भारत में इस्लामिक शासन लागू करने के लिए की गई है, जो लगातार भारत में आतंकवादी हमले करता रहा है।
वर्ष 2006 में मुंबई ट्रेन धमाकों में भी हाफिज सईद का हाथ रहा। 2001 में भारतीय संसद तक को सईद ने निशाना बनाया। वो एनआइए की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल है। मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से उसे सौंपने को कहा था। सभी हमलों में उसके आतंकी संगठनों की भूमिका के अकाट्य प्रमाण भी पाकिस्तान को दिये जा चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान तो इस बात से ही इंकार करता रहा है कि हमलों के असली साजिशकर्ता उसके यहां मौजूद हैं। बल्कि पाकिस्तान तो लगातार सईद को आतंकी मानने से भी इनकार करता रहा है। भारत समेत अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, रूस और ऑस्ट्रेलिया ने इसके दोनों संगठनों को प्रतिबंधित कर रखा है।
हाफिज सईद एवं उसे संरक्षण देने वाला पाकिस्तान दुनिया में किसी अच्छे या नेक काम के लिए नहीं, बल्कि आतंकवाद फैलानेवाले देश के रूप में जाना जाता है। उसे यह तमगा दशकों तक उसके करीबी मददगार रहे अमेरिका ने ही दिया है। आतंकवाद के खात्मे के लिए अमेरिका से पािकस्तान को जो पैसा मिलता रहा है, वह उसे आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल करता रहा। खुद अमेरिका की एजेंसियां इस बात का खुलासा कर चुकी है। अमेरिका पर सबसे बड़े आतंकी हमले के असली सूत्रधार अलकायदा सरगना उसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने अपने यहां छिपाए रखा था। दरअसल आतंकवाद पाकिस्तान की सरकारी नीति का हिस्सा है। यह बात भी दुनिया से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ ही आतंकी सगंठनों के पैसे, हथियार और प्रशिक्षण मुहैया कराती है। इन कटू सच्चाइयों एवं खौफनाक स्थितियों के चलते ही अमेरिका के वित्त विभाग ने सईद को विशेष रूप से चिह्नित वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है।
दिसंबर 2008 में उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत आतंकवादी घोषित किया गया था। एफएटीएफ की ‘ग्रे’ सूची में बने रहने से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और यूरोपीय संघ से वित्तीय मदद मिलना मुश्किल हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से आर्थिक मदद मिलने में उसे जिस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है उससे छुटकारा पाने के लिए एवं लगातार नकदी संकट से जूझ रहे देश के लिए और दिक्कतें बढ़ेंगी, इन्हीं स्थितियों को देखते हुए पाकिस्तान अब मजबूरन हाफिद सईद जैसों के खिलाफ दिखावे के तौर पर कुछ कदम उठा रहा है। पुलवामा हमले की बात तो खुद पाकिस्तान सरकार के मंत्री ने हाल में संसद में स्वीकार की। इस बात के भी प्रमाण सामने आ चुके हैं कि मुंबई बम कांड का सरगना दाउद इब्राहिम पाकिस्तान में सेना और आइएसआइ की पनाह में रह रहा है, लेकिन पाकिस्तान इस हकीकत को भी झुठलाता रहा है और दाऊद को अब तक भारत को नहीं सौंपा है। वास्तव में पाकिस्तान यदि आतंकवाद के खिलाफ हुआ है तो हाफिद सईद जैसे आतंकी को वह भारत को सौंपे। उस जैसे आतंकियों की असली सजा तो यही भारत उन्हें सजा दे। इसके लिये पाकिस्तान पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनना चाहिए।
भारत ही नहीं, विश्व के जन-जीवन आतंकमुक्त बनाने के लिये पाकिस्तान की आतंकवादी स्थितियों पर कड़ा कदम उठाना एवं दबाव बनाना जरूरी है, इसी से अनेक बड़ी समस्याओं का समाधान संभव है, इसी से पाकिस्तान की बदतर होती स्थितियों में भी सुधार होगा। इसी से दुनिया से आतंकवाद एवं युद्ध जैसी ज्वलंत समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। विश्व की सभ्यता और संस्कृति को अहिंसा एवं आतंकमुक्ति की ओर अग्रसर करने के लिये पाकिस्तान को सुधरना ही होगा, इसी से उनके भी बिगड़ते हालातों पर अंकुश लग सकेगा। प्रेषक

 

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


राजनीतिक दलों को मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं?

राजनीतिक दलों को मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं?

21-Nov-2020

मुसलमानों का मसीहा कौन ?
एम.एच. जकारिया  
हमारे देश की विडम्बना ही कही जाएगी  हर जाती धर्म को अपनी बात करने का पूरा अधिकार है लेकिन जब मुसलमान अपने हक़ और अधिकार की बात करता है तो उसे गद्दार और देश द्रोही कहा जाता है.
बिहार चुनाव के बाद स्थिति स्पष्ट होती जा रही है, जहां महाराष्ट्र में कट्टर हिन्दू विचारधारा रखने वाले संगठन शिव सेना को कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस समर्थन दे सकती है लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM से ना समर्थ  लेना चाहती है और ना देना इसी लिए बिहार मे NDA महागठबंधन सरकार बनाने से चूक गई? इसे कौन सी  (धर्म निरपेक्षता )सेक्यूरिलजम कहेंगे आज़ादी के बटवारे के बाद से ही देश का मुस्लिम समुदाय अपना नेतृत्व तलाश करने में लगा हुआ  है, 2014 के बाद मुसलमान अपने आप को  सेक्यौरिलज्म के नाम आशहाय और बहुत हद तक ठगा हुआ महसूस करने लगा है ,क्योकि जिन पर विश्वास कर वोट दिया उन्हीं लोगो ने उनका शोसन किया वोट लेते रहे वोट बैंक समझते रहे, इसके लिए बहुत हद तक अशिक्षा  और गरीबी इसका बड़ा मूल  कारण रही है, क्योकि आज तक मुसलमानों को  मज़हबो मस्लाको और शिया सुन्नी वहाबी में बाँट कर मुस्लिम धर्म गुरु अपना भला करते रहे और अपना घर भरते रहे क्योकि इन्हे भी अपने नेतृत्व को खोने का सबसे ज्यादा भय और डर था, इस लिए इनके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को ये अपने अनुयाई से पिटवाते  और  प्रताड़ित करते रहे क्योकि राजनैतिक दल इन धर्म गुरुवो को मैनेज करते रहे है , इसी लिए अब तक भारतीय मुसलमानों का राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता है ना किसी भी धर्म  निर्पक्ष राजनैतिक दल मे जो खुल कर मुसलमानों की आवाज़ को उठाने का काम किया हो सिवाय असदुद्दीन ओवैसी और बद्रुद्दीन अजमल के लेकिन इन्हे कथित धर्म  निरपेक्ष दल हमेशा से दबाते या दूरी बनाते रहे हैं "क्यो" ?

जब भी मुसलमानों के अधिकारों की बात होती संवैधानिक संस्थाओं में संसद में तो धर्म  निरपेक्ष दलों से जीते हुए मुस्लिम सांसदों के मुह में ताला क्यो  लगवा दिया जाता हैं, क्योकि कही ना कही तथा कथित ये धर्म  निरपेक्ष राजनैतिक दल भी उन्ही विचार धारा को को फालो करते हैं जो की दक्षिण पंथी विचारों को समर्थन देती रही है।  वैसे मुसलमान नेता तो बी जे पी में भी है !

  लेकिन अब इन छद्म सेक्युलरवादियो  को बहुत हद तक मुसलमान समझने लगा है क्योकि जातीवाद की राजनीति तो हर राज्य में मे हो रही हैं दलित, ओ बी सी, कुर्मी, तो फिर  मुसलमान क्यो नहीं , अब इन मस्लाको से हट कर अपने अधिकारो लिए मुसलमानों को अपने अधिकारों को समझना होगा ! आप किसी भी मस्लक के  मानने  वाले हो आपको  बेशक मानिये  लेकिन अपने अधिकारों के लिए इन्हे बीच मत लाइए अपने अधिकारों को जानिए अपनी इबादत को राजनीती से जोड़ने वालो को मुँह तोड़ जवाब दीजिये  अपने अधिकारों के   लिए लड़िये  
भारतीय संविधान को समझ  कर  अपने हक़ की लडाई लड़ने वालों को पहचाना  कर  अपना वोट दीजिये कौन आपके अधिकारो  के लिए आवाज़ उठा रहा है। और कौन आपको अपना वोट बैंक बना कर उपयोग करता जा  रहा है, तथा कथित सेक्युलर दलों ने मुसलमानों की मानसिकता को दल विशेष का डर और भय दिखा कर जकड़ रखा था जिससे मुसलमानों को बाहर निकलना होगा

बिहार चुनाव के बाद हर तरफ से लोग असदुद्दीन ओवैसी के ऊपर प्रहार कर रहे हैं कोई उन्हें वोट कटवा बता रहा है कोई उन्हें भाजपा की बी टीम बता रहा है तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी लगातार असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी पर वोट कटवा होने और बीजेपी की बी टीम होने जैसा इल्जाम लगा रही है यह इल्जाम सिर्फ असदुद्दीन ओवैसी या उनकी पार्टी पर नहीं बल्कि उनको वोट देने वाले हजारों लाखों वोटर्स के ऊपर भी इल्जाम है। क्या कांग्रेस ने तेजस्वी यादव की सीटों को कम करने का काम नहीं किया! क्या मुसलमान हमेशा दूसरी सियासी पार्टियों का वोटर्स बन कर रहे क्या वह अपनी पार्टी अपना नेता नहीं बना सकती है। यही तो हमारा लोकतंत्र है।

और सबसे अहम बिंदु यह है कि असदुद्दीन ओवैसी ने जिन 5 सीटों पर विजय हासिल की है वहां से मुसलमानों नहीं बल्कि हिंदू और, दलित भाइयों तथा अन्य इन सब का वोट मिला है किसी एक तबके का वोट पाकर कोई सीट नहीं जीतता है इस बात को हमें समझना होगा झूठी और जबरदस्ती निराधार बातें करने से कोई फायदा नहीं है

2 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत वाले समुदायों ने भी अलग-अलग राज्यों में अपने जातिय आधार पर एक क्षेत्रीय दल बना रखें हैं लेकिन 10 फीसदी से लेकर 30 फीसदी वाले मुस्लिम समुदाय ने एक भी क्षेत्रीय दल नहीं बनाया । यानी मुस्लिम समुदाय ने बीजेपी को रोकने के नाम स्वंय को सत्ता से दूर रखकर कांग्रेस,  सपा, बसपा , राजद , तृणमूल कांग्रेस पर विश्वास करते हुए को सत्ता सौपते रहे । जबकि इन सभी दलों ने कभी भी बीजेपी को रोकने के लिए प्रयास नहीं किया । यदि प्रयास करते तो सभी दल गठबंधन करके चुनाव लङते । और सबसे अहम बात यह है कि यह सभी दल कभी न कभी बीजेपी के साथ सत्ता का मज़ा ले चुके हैं। बस एक मुस्लिम समुदाय हैं जो सबसे अधिक संख्या में होने के बावजूद भी न तो क्षेत्रीय दल बनाया और न ही राजनीति करना सीखा। सभी जातियों की तरह यदि मुसलमान  भी क्षेत्रीय दल बनाते तो आज मुसलमानो की दशा और दिशा कुछ और ही होता जिसका ताज़ा तरीन उदाहरण बिहार, मे देखा जा सकता हैं। जहां मुसलमानो ने एक जुट होकर सेकुलर पार्टियों को नकार दिया जिन्होंने मुसलमानो को बस कोई  एकाध एम ए ले या सांसद का टिकट दे कर  खुश  कर दिया जाता है ! बाद में यही जनप्रतिनिधि कठपुतली की तरह नाचते है !
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में चार करोड़ से ज्यादा वोटिंग हुई थी और इनमें से 1.24 फीसद वोट एआईएमआईएम को मिले हैं। और कांग्रेस को सबसे ज्यादा प्रॉब्लम इन 1.24% वोटों से है। 2015 में ओवैसी की पार्टी को 0.5% वोट मिले थे। मतलब यह हुआ कि ओवैसी की पार्टी ने तरक्की की। अगर आप इतने ज्यादा धर्मनिरपेक्ष अर्थात सेकुलर हैं और मुसलमानों के वोट पर अपने अधिकार को जताते हैं तो क्यों नहीं ओवैसी की पार्टी को अपने गठबंधन में मिला लिया अगर शायद मिला लिया होता तो आपकी 10 से 12 सीटों में बढ़ोत्री हो सकता था। शायद आपको मुस्लिम वोटर्स चाहिए मुस्लिम नेता नहीं वह भी पढ़ा लिखा।

सबसे पहली बात तो यह है कि जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं सब को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह चुनाव लड़ें और अगर कांग्रेस को या किसी पार्टी को यह लगता है कि ओवैसी की पार्टी के लोगों से उनका वोट कट जाता है तो जितनी पार्टियां हैं सबके ऊपर इलेक्शन लड़ने पर रोक लगा दें और अकेले चुनाव लड़ें । यह कैसी मूर्खता पूर्ण बातें हैं।

दर असल में राहुल गांधी और सोनिया जी को दिग्भ्रमित किया जा रहा है क्योकि कुछ लोग इन्हे भटका रहे हैं जो कांग्रेस को धीरे धीरे सत्ता से हटाना चाहते हैं, कांग्रेस मे यही विचार धारा के लोग दीमक की तरह चाटने मे लगे हुए जिसका उदाहरण है, ज्योतिर् आदित्य सिंधिया,रीता बहुगुणा जैसे लोग
जिन्हे समझना होगा?

 

 


सोनिया गांधी को डॉक्टर्स ने दिल्ली से बाहर रहने की दी सलाह

सोनिया गांधी को डॉक्टर्स ने दिल्ली से बाहर रहने की दी सलाह

20-Nov-2020

मीडिया रिपोर्ट 

नई दिल्ली : दिल्ली में वायु प्रदूषण के हालात गंभीर होने की पृष्ठभूमि में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सीने में संक्रमण की स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने कुछ दिनों के लिए राष्ट्रीय राजधानी से दूर रहने की सलाह दी है. पार्टी सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी.

सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी कुछ दिनों के लिए गोवा या चेन्नई में रह सकती हैं. उन्होंने कहा कि शुक्रवार दोपहर सोनिया के दिल्ली से रवाना होने की संभावना है. उनके साथ राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाद्रा भी जा सकते हैं. 
सूत्रों का कहना है कि गत अगस्त महीने में अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद से सोनिया गांधी चिकित्सा निगरानी में हैं और चिकित्सक उनके सीने में सक्रमण के लगातार बने रहने से चिंतित हैं. खासकर उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि दिल्ली में वायु प्रदषण की मौजूदा स्थिति उनकी सेहत के प्रतिकूल है.

कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि वायु प्रदूषण के कारण सोनिया के सीने में संक्रमण और अस्थमा बढ़ गया है और चिकित्सकों ने उन्हें कुछ दिनों के लिए दिल्ली से बाहर जाने की सलाह दी है. सोनिया गांधी ऐसे समय दिल्ली से बाहर जा रही है जब बिहार चुनाव में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर पार्टी के भीतर से ही आत्मचिंतन की मांग उठ रही है.कांग्रेस अध्यक्ष 30 जुलाई को सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती हुईं थीं जहां से कुछ दिनों बाद उन्हें छुट्टी मिली थी. फिर 12 सितंबर को वह अपनी नियमित चिकित्सा जांच के लिए विदेश गईं थीं और उनके साथ पुत्र राहुल गांधी भी गए थे. इस कारण दोनों संसद के मानसून सत्र में शामिल नहीं हो सके थे.


बचपन की उपेक्षा आखिर कब तक?

बचपन की उपेक्षा आखिर कब तक?

19-Nov-2020

‘सार्वभौमिक बाल दिवस’ 20 नवंबर, 2020 पर विशेष
-No description available.

ललित गर्ग-

No description available.
संपूर्ण विश्व में ‘सार्वभौमिक बाल दिवस’ 20 नवंबर, को मनाया जाता है। इस दिवस की स्थापना वर्ष 1954 में हुई थी। इस दिवस को “अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस” भी कहा जाता है। बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूकता, अंतर्राष्ट्रीय बाल संवेदना तथा बच्चों के कल्याण, शिक्षा एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। बच्चों का मौलिक अधिकार उन्हें प्रदान करना इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें शिक्षा, सुरक्षा, चिकित्सा मुख्य रूप से हैं। विश्वस्तर पर बालकों के उन्नत जीवन के ऐसे आयोजनों के बावजूद आज भी बचपन उपेक्षित, प्रताड़ित एवं नारकीय बना हुआ है, आज बच्चों की इन बदहाल स्थिति की जो प्रमुख वजहें देखने में आ रही है वे हैं-सरकारी योजनाओं का कागज तक ही सीमित रहना, बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, माता-पिता की आर्थिक विवशताएं, समाज का संवेदनहीन होना एवं गरीबी, शिक्षा व जागरुकता का अभाव है।
सार्वभौमिक बाल दिवस पर बच्चों के अधिकार, कल्याण, सम्पूर्ण सुधार, देखभाल और शिक्षा के बारे में लोगों को जागरूक किया जाता है। दुनिया में सभी जगहों पर बच्चों को देश के भविष्य की तरह देखते थे। लेकिन उनका यह बचपन रूपी भविष्य आज अभाव एवं उपेक्षा, नशे एवं अपराध की दुनिया में धंसता चला जा रहा है। बचपन इतना डरावना एवं भयावह हो जायेगा, किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। आखिर क्या कारण है कि बचपन बदहाल होता जा रहा है? बचपन इतना उपेक्षित क्यों हो रहा है? बचपन के प्रति न केवल अभिभावक, बल्कि समाज और सरकार इतनी बेपरवाह कैसे हो गयी है? यह प्रश्न सार्वभौमिक बाल दिवस मनाते हुए हमें झकझोर रहे हैं।
सरकारों को कानूनों और नीतियों को बदलने और बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए व्यापक प्रयत्नों की अपेक्षा है। बच्चों को जीवित रहने और विकसित करने के लिए आवश्यक पोषण भी जरूरी है। साथ ही, बच्चों को हिंसा और शोषण से बचाना आवश्यक है। इसने बच्चों को अपनी आवाजें सुनने और अपने समाजों में भाग लेने में सक्षम बनाया जाना आदि जरूरतों को देखते हुए इस दिवस की प्रासंगिकता है। जब हम किसी गली, चैराहे, बाजार, सड़क और हाईवे से गुजरते हैं और किसी दुकान, कारखाने, रैस्टोरैंट या ढाबे पर 4-5 से लेकर 12-14 साल के बच्चे को टायर में हवा भरते, पंक्चर लगाते, चिमनी में मुंह से या नली में हवा फूंकते, जूठे बर्तन साफ करते या खाना परोसते देखते हैं और हम निष्ठुर बन रहते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों व गरीबी के मार से बेहाल होकर इस नारकीय कार्य करने को विवश है। कूड़ों के ढेर से शीशी, लोहा, प्लास्टिक, कागज आदि इकट्ठा करके कबाड़ की दुकानों पर बेचते हैं। इससे प्राप्त पैसों से वह अपने व परिवार का जीविकोपार्जन करते हैं। लेकिन सार्वभौमिक बाल दिवस जैसे आयोजनों के बावजूद कब तक हम बचपन को इस तरह बदहाल, प्रताड़ित एवं उपेक्षा का शिकार होने देंगे।
आज का बालक ही कल के समाज का सृजनहार बनेगा। लेकिन कमजोर नींवों पर हम कैसे एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं? हमारे देश में भी कैसा विरोधाभास है कि हमारा समाज, सरकार और राजनीतिज्ञ बच्चों को देश का भविष्य मानते नहीं थकते लेकिन क्या इस उम्र के लगभग 25 से 30 करोड़ बच्चों से बाल मजदूरी के जरिए उनका बचपन और उनसे पढने का अधिकार छीनने का यह सुनियोजित षड्यंत्र नहीं लगता? यह कैसी विडम्बना है कि जब इस उम्र के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, खानदानी व्यवसाय के नाम पर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षा, खेलकूद और सामान्य बाल सुलभ व्यवहार से वंचित किया जा रहा है और हम अपनी पीठ थपथपाए जा रहे हैं। बच्चों को बचपन से ही आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर हकीकत में हम उन्हें पैसा कमाकर लाने की मशीन बनाकर अंधकार में धकेल रहे हैं।
पारिवारिक काम एवं आर्थिक बदहाली के नाम पर अब बचपन की जरूरतों को दरकिनार कर खुलेआम बच्चों से काम कराया जा सकता है, नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने इन स्थितियों पर कड़ा विरोध व्यक्त किया है। कुछ बच्चें अपनी मजबूरी से काम करते हैं तो कुछ बच्चों से जबरन काम कराया जाता है। यदि गौर करें तो हम पाएंगे कि किसी भी माता-पिता का सपना अपने बच्चों से काम कराना नहीं होता। हालात और परिस्थितियां उन्हें अपने बच्चों से काम कराने को मजबूर कर देती हैं। पर क्या इसी आधार पर उनसे उनका बचपन छीनना और पढने-लिखने की उम्र को काम की भट्टी में झोंक देना उचित है? ऐसे बच्चे अपनी उम्र और समझ से कहीं अधिक जोखिम भरे काम करने लगते हैं। वहीं कुछ बच्चे ऐसी जगह काम करते हैं जो उनके लिए असुरक्षित और खतरनाक होती है जैसे कि माचिस और पटाखे की फैक्टरियां जहां इन बच्चों से जबरन काम कराया जाता है। इतना ही नहीं, लगभग 1.2 लाख बच्चों की तस्करी कर उन्हें काम करने के लिए दूसरे शहरों में भेजा जाता है। इतना ही नहीं, हम अपने स्वार्थ एवं आर्थिक प्रलोभन में इन बच्चों से या तो भीख मंगवाते हैं या वेश्यावृत्ति में लगा देते हैं।
देश में सबसे ज्यादा खराब स्थिति है बंधुआ मजदूरों की जो आज भी परिवार की समस्याओं की भेंट चढ़ रहे हैं। चंद रुपयों की उधारी और जीवनभर की गुलामी बच्चों के नसीब में आ जाती है। महज लिंग भेद के कारण कम पढ़े-लिखे और यहां तक कि शहरों में भी लड़कियों से कम उम्र में ही काम कराना शुरू कर दिया जाता है या घरों में काम करने वाली महिलाएं अपनी बेटियों को अपनी मदद के लिए साथ ले जाना शुरू कर देती हैं।  कम उम्र में काम करने वाले बच्चे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। साथ ही उनकी सेहत पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी उनका शारीरिक विकास समय से पहले होने लगता है जिससे उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इन बच्चों को न पारिवारिक सुरक्षा दी जाती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। बाल मजदूरी से बच्चों का भविष्य अंधकार में जाता ही है, देश भी इससे अछूता नहीं रहता क्योंकि जो बच्चे काम करते हैं वे पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर हो जाते हैं और जब ये बच्चे शिक्षा ही नहीं लेंगे तो देश की बागडोर क्या खाक संभालेंगे? इस तरह एक स्वस्थ बाल मस्तिष्क विकृति की अंधेरी और संकरी गली में पहुँच जाता है और अपराधी की श्रेणी में उसकी गिनती शुरू हो जाती हैं। वर्तमान संदर्भ में आधुनिक पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन शैली पर यह एक ऐसी टिप्पणी है जिसमें बचपन की उपेक्षा को एक अभिशाप के रूप में चित्रित किया गया है। सच्चाई यह है कि देश में बाल अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बच्चे अपराधी न बने इसके लिए आवश्यक है कि अभिभावकों और बच्चों के बीच बर्फ-सी जमी संवादहीनता एवं संवेदनशीलता को फिर से पिघलाया जाये। फिर से उनके बीच स्नेह, आत्मीयता और विश्वास का भरा-पूरा वातावरण पैदा किया जाए। श्रेष्ठ संस्कार बच्चों के व्यक्तित्व को नई पहचान देने में सक्षम होते हैं। अतः शिक्षा पद्धति भी ऐसी ही होनी चाहिए। सरकार को बच्चों से जुड़े कानूनों पर पुनर्विचार करना चाहिए एवं बच्चों के समुचित विकास के लिये योजनाएं बनानी चाहिए। ताकि इस बिगड़ते बचपन और भटकते राष्ट्र के नव पीढ़ी के कर्णधारों का भाग्य और भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। ऐसा करके ही हम सार्वभौम बाल दिवस को मनाने की सार्थकता हासिल कर सकेंगे।
प्रे्षकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 


कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी

कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी

18-Nov-2020

कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी
-ललित गर्ग-

No description available.

दीपावली पर कोरोना महामारी की अनेक बंदिशों एवं हिदायतों के बावजूद जिन्दगी की चकाचैंध ने हमारे लगातार असभ्य होने को ही उजागर किया। यह असभ्यता ही है कि अदालती फैसलों एवं सरकारी अपीलों के बावजूद पटाखों पर नियंत्रण की बात खोखली साबित हुई। पराली एवं वायु प्रदूषण से दमघोटू माहौल एवं कोरोना के लगातार फैलते जाने के संकट को ताक पर रखते हुए लोगों ने घोर लापरवाही बरतते हुए न केवल स्वयं बल्कि दूसरों के जीवन को संकट में डाला। जनता ने आतिशबाजी पर नियंत्रण के कानूनी फरमानों का मखौल उड़ाते हुए रात भर पटाखे छुड़ाए। यह कैसी शासन-व्यवस्था है? यह कैसा अदालतों की अवमानना का मामला है? यह सभ्यता की निचली सीढ़ी है, जहां तनाव-ठहराव की स्थितियों के बीच हर व्यक्ति अपने आमोद-प्रमोद के लिये अपनी जड़ों एवं दायित्वों से दूर होता जा रहा है। यह कैसा समाज है जहां व्यक्ति के लिए पर्यावरण, अपना स्वास्थ्य या दूसरों की सुविधा-असुविधा का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है, तो सिर्फ अपने मनोरंजन का। जीवन-शैली ऐसी बन गयी है कि आदमी जीने के लिये सब कुछ करने लगा पर खुद जीने का अर्थ ही भूल गया, यही कारण है जिन्दगी विषमताओं और विसंगतियों से घिरी होकर कहीं से रोशनी की उम्मीद दिखाई नहीं देती। क्यों आदमी मृत्यु से नहीं डर रहा है? क्यों भयभीत नहीं है? लोगों में पटाखे फोड़ने के लिए एक खास तरह का हिंस्र उत्साह, अराजकता एवं अनुशासनहीनता देखी गयी।
आज कोरोना महामारी के संकटकालीन समय में देश दुख, दर्द और संवेदनहीनता के जटिल दौर से रूबरू है, समस्याएं नये-नये मुखौटे ओढ़कर डराती है, भयभीत करती है। कोरोना ने समाज में बहुत कुछ बदला है, मूल्य, विचार, जीवन-शैली, वास्तुशिल्प सब में परिवर्तन है। आदमी ने जमीं को इतनी ऊंची दीवारों से घेर कर तंगदील बना दिया कि धूप और प्रकाश तो क्या, जीवन-हवा को भी भीतर आने के लिये रास्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं। सुविधावाद हावी है तो कृत्रिम साधन नियति बन गये हैं। चारों तरफ भय एवं डर का माहौल है। यह भय केवल कोरोना से ही नहीं, भ्रष्टाचारियों से, अपराध को मंडित करने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से एवं अपने दायित्व एवं जिम्मेदारी से मुंह फैरने वाले अधिकारियों से भी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अब भी ऐसे मुकाम पर हैं, जहां सड़क पर बाएं चलने या सार्वजनिक जगहों पर न थूकने जैसे कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए भी पुलिस की जरूरत पड़ती है। जो पुलिस अपने चरित्र पर अनेक दाग ओढ़े हंै, भला कैसे अपने दायित्वों का ईमानदारी एवं जिम्मेदारी से निर्वाह करेंगी। पुलिस का डंडा या सख्त कानून कभी भी इंसान को सभ्य नहीं बना सकते। अंदर से इच्छाशक्ति न हो तो कानूनों के पालन में इस दिवाली जैसी स्थिति होती है। सारे कानून-कायदों, अदालती या सरकारी आदेशों और पुलिस की कवायद के बावजूद पटाखे छूटते रहे। वैसे भी, भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में है, जहां शायद सबसे अधिक कानून होंगे, लेकिन हम कितना कानून-पालन करने वाले समाज हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
नरसी मेहता रचित भजन ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे’’ गांधीजी के जीवन का सूत्र बन गया था, लेकिन यह आज के आम लोगों का जीवनसूत्र क्यों नहीं बनता? क्यों नहीं आमजन पराये दर्द को, पराये दुःख को  एवं पराये जीवन को अपना मानते? क्यों नहीं जन-जन की वेदना और संवेदनाओं से अपने तार जोड़ते? बर्फ की शिला खुद तो पिघल जाती है पर नदी के प्रवाह को रोक देती है, बाढ़ और विनाश का कारण बन जाती है। देश की स्वास्थ्य-रक्षा में आज ऐसे ही बाधक तत्व उपस्थित हैं, जो जनजीवन में आतंक एवं संशय पैदा कर उसे मौत की अंधेरी राहों मेें, निराशा और भय की लम्बी काली रात के साये में धकेल रहे हैं। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होते हैं। पर यहां तो चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा व्याप्त है। हमारा राष्ट्र नैतिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक एवं व्यक्तिगत सभी क्षेत्रों में मनोबल के दिवालिएपन के कगार पर खड़ा है। और हमारा नेतृत्व गौरवशाली परम्परा, विकास और हर कोरोना खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार है, का नारा देकर अपनी नेकनीयत का बखान करते रहते हैं। पर उनकी नेकनीयती की वास्तविकता किसी से भी छिपी नहीं है, देश की राजधानी और उसके आसपास जिस तरह पटाखों पर लगे नियंत्रण की छीछालेदर हुई, उससे यह सहज ही जाहिर हो गया है। बात पुलिस की अक्षमता की नहीं है। उन कारणों की शिनाख्त करने की है, जिनके चलते एक आम नागरिक पर्यावरण या उसके अपने स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर मंडरा रहे खतरों के बावजूद लगातार उदासीन एवं लापरवाह क्यों होता जा रहा है।
कैसी विडम्बना है हमारे समाज की। किसी अनियमितता का पर्दाफाश करना पूर्वाग्रह माना जाता है। सत्य बोलना अहम् पालने की श्रेणी में आता है। साफगोही अव्यावहारिक है। भ्रष्टाचार को प्रश्रय नहीं देना समय को नहीं पहचानना है। आखिर नयी गढ़ी जा रही ये परिभाषाएं समाज और राष्ट्र को किन वीभत्स दिशाओं में धकेल रही है? विकासवाद की तेज आंधी के बावजूद हमारा देश, हमारा समाज तरह-तरह के बंधनों में आज भी जकड़ा हुआ है। उसमें न आत्मबल है, न नैतिक बल। सुधार की, नैतिकता की बात कोई सुनता नहीं है। दूर-दूर तक कहीं रोशनी नहीं दिख रही है। इन घनी अंधेरी रातों में हम कैसे विश्व गुरु बन पायेंगे?
नदी में गिरी बर्फ की शिला को गलना है, ठीक उसी प्रकार उन बाधक एवं असंवेदनहीन तत्वों को भी एक न एक दिन हटना है। यह स्वीकृत सत्य है कि जब कल नहीं रहा तो आज भी नहीं रहेगा। उजाला नहीं रहा तो अंधेरा भी नहीं रहेगा। जे पीर पराई जाने रे- भजन के बोल आज भी अनेक लोगों के हृदय को छूते है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हृदय को भी छू गया है तभी उन्होंने सबका साथ-सबका विकास एक विशिष्ट राष्ट्र कल्याणकारी उपक्रम जन-जन की पीड़ा को हरने के लिए प्रारंभ किया। राष्ट्र आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, वहां खड़े होकर यह स्पष्ट महसूस किया जा सकता है कि मोदी नीतियों का हार्द ही है परायी पीर को जानना। पराया दुख, पराया दर्द समझना। परायी पीर को समझने का ही अर्थ है उस पीड़ा को, उस तकलीफ को मिटाने का जी-जान से प्रयत्न करना। इसी से एक सभ्य व्यवस्था इंसानों के बीच बनेगी जिसमें पुलिस सड़कों से पूरी तरह से अनुपस्थित हो जाएंगी और सारी नागरिक गतिविधियां बिना उसके हस्तक्षेप के चलती रहेंगी। दरअसल, एक आदर्श राज्य की अवधारणा में पुलिस, अदालतें और जेल जैसी संस्थाओं एवं स्थितियों की जरूरत न होना ही हमारे सभ्य होने का प्रमाण है। इन दुर्लभ श्रेष्ठताओं को पाने के लिये कुछेक घंटों का अभ्यास पर्याप्त नहीं होता। उसके लिये सतत पुरुषार्थ एवं संकल्प की जरूरत है।  
प्रे्षकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 

 

 

 


महावीर हैं अंधकारों को हरने वाले दीपक

महावीर हैं अंधकारों को हरने वाले दीपक

14-Nov-2020

भगवान महावीर परिनिर्वाण दिवस, 14 नवम्बर, 2020
-ललित गर्ग-

No description available.

दीपावली को ही भगवान महावीर का परिनिर्वाण दिवस है। परिनिर्वाण से पूर्व महावीर ने जो शिक्षाएं दी, वे जन-जन के लिये अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य एवं निराशा से आशा की ओर जाने का माध्यम बनी। इसलिये भी जैन धर्म के अनुयायियों के लिये दीपावली का महत्व है। महावीर लोकोत्तम पुरुष हंै, उनकी शिक्षाओं की उपादेयता सार्वकालिक, सार्वभौमिक एवं सार्वदेशिक है, दुनिया के तमाम लोगों ने इनके जीवन एवं विचारों से प्रेरणा ली है। सत्य, अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह ऐसे सिद्धान्त हैं, जो हमेशा स्वीकार्य रहेंगे और विश्व मानवता को प्रेरणा देते रहेंगे। महावीर का संपूर्ण जीवन मानवता के अभ्युदय की जीवंत प्रेरणा है। लाखों-लाखों लोगों को उन्होंने अपने आलोक से आलोकित किया है। महावीर ने दीपावली की रात जो उपदेश दिया उसे हम प्रकाश पर्व का श्रेष्ठ संदेश मान सकते हैं। क्योंकि यह सन्देश मानव मात्र के आंतरिक जगत को आलोकित करने वाला है।

भगवान महावीर का मुक्ति दिवस हम जैसों के लिये जागने की दस्तक है। उन्होंने बाहरी लड़ाई को मूल्य नहीं दिया, बल्कि स्व कर सुरक्षा में आत्म-युद्ध को जरूरी बतलाया। उन्होंने जो कहा, सत्य को उपलब्ध कर कहा। उन्होंने सबके अस्तित्व को स्वीकृति दी। ‘णो हीणे णो अइरित्ते’-उनकी नजर में न कोई ऊंचा था, न कोई नीचा। उनका अहिंसक मन कभी किसी के सुख में व्यवधान नहीं बना। उन्होंने अपने होने का अहसास जगाकर अहं को खड़ा नहीं होने दिया। इसीलिये उनकी शिक्षाओं एवं उपदेशों का हमारे जीवन और विशेषकर व्यावहारिक जीवन में विशेष महत्व है। हम अपने जीवन को उनकी शिक्षाओं के अनुरूप ढाल सकें, यह अधिक आवश्यक है लेकिन इस विषय पर प्रायः सन्नाटा देखने को मिलता है। विशेषतः जैन समाज के लोग एवं अनुयायी ही महावीर को भूलते जा रहे हैं, उनकी शिष्याओं को ताक पर रख रहे हैं। दुःख तो इस बात का है कि जैन समाज के सर्वे-सर्वा लोग ही सबसे ज्यादा महावीर को अप्रासंगिक बना रहे हैं, महावीर ने जिन-जिन बुराइयां पर प्रहार किया, वे उन्हें ही अधिक अपना रहे हैं। हम महावीर को केवल पूजते हैं, जीवन में धारण नहीं करते हैं। हम केवल कर्मकाण्ड और पूजा विधि में ही लगे रहते हैं। महावीर का यह संदेश जन-जन के लिये सीख बने- ‘पुरुष! तू स्वयं अपना भाग्यविधाता है।’ औरों के सहारे मुकाम तक पहुंच भी गए तो क्या? इस तरह की मंजिलें स्थायी नहीं होती और न इस तरह का समाधान कारगर होता है।
भगवान महावीर कितना सरल किन्तु सटीक कहा हैं- सुख सबको प्रिय है, दुःख अप्रिय। सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। हम जैसा व्यवहार स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। यही मानवता है और मानवता का आधार भी। मानवता बचाने में है, मारने में नहीं। किसी भी मानव, पशु-पक्षी या प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना स्पष्टतः अमानवीय है, क्रूरतापूर्ण है। हिंसा-हत्या और खून-खच्चर का मानवीय मूल्यों से कभी कोई सरोकार नहीं हो सकता। मूल्यों का सम्बन्ध तो ‘जियो और जीने दो’ जैसे सरल श्रेष्ठ उद्घोष से है।
समय के आकाश पर आज कोरोना महामारी, युद्ध, शोषण, हिंसा जैसे अनगिनत प्रश्नों का कोलाहल है। जीवन क्यों जटिल से जटिलतर होता जा रहा है? इसका मूल कारण है कि महावीर ने जो उपदेश दिया हम उसे आचरण में नहीं उतार पाएं। इसी कारण मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था और विश्वास कमजोर पड़ा, धर्म की व्याख्या में हमने अपना मत, अपना स्वार्थ, अपनी सुविधा, अपना सिद्धान्त को जोड़ दिया। मनुष्य जिन समस्याओं से और जिन जटिल परिस्थितियों से घिरा हुआ है उन सबका समाधान महावीर के दर्शन और सिद्धांतों में समाहित है। हर व्यक्ति महावीर बनने की तैयारी करे, तभी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। महावीर वही व्यक्ति बन सकता है जो लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो, जिसमें कष्टों को सहने की क्षमता हो। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता एवं संतुलन स्थापित रख सके, जो मौन की साधना और शरीर को तपाने के लिए तत्पर हो। जिसके मन में संपूर्ण प्राणिमात्र के प्रति सहअस्तित्व की भावना हो। जो पुरुषार्थ के द्वारा न केवल अपना भाग्य बदलना जानता हो, बल्कि संपूर्ण मानवता के उज्ज्वल भविष्य की मनोकामना रखता हो।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्या सुख को स्थायी बनाया जा सकता है? क्या दुःख को समाप्त किया जा सकता है? इसका सीधा उत्तर होगा कि भौतिक जगत में ऐसा होना कभी संभव नहीं है। जब तक भौतिक जगत में जीएंगे तब तक यह स्वप्न लेना दिवास्वप्न है, कल्पना करना आकाश कुसुम जैसा है। आकाश में कभी फूल नहीं लगता। कमल के फूल लग सकता है, चंपक के फूल लग सकता है पर आकाश में कभी फूल नहीं लगता। यह असंभव बात है कि इंद्रिय जगत में आदमी जीए और वह सुख या दुःख एक का ही अनुभव करे, यह द्वंद्व बराबर चलता रहेगा। तब व्यक्ति के मन में एक जिज्ञासा पैदा होती है कि ऐसा कोई उपाय है जिससे सुख को स्थायी बनाया जा सके? इसका समाधान है स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार। इसके लिये जरूरी है हर क्षण को जागरूकता से जीना। उसको जीने के लिये भगवान महावीर ने कहा था-‘खणं जाणाहि पंडिए’, जो क्षण को जानता है, वह सुख और दुःख के निमित्त को जानता है।
महावीर ने जीवनभर अनगिनत संघर्षों को झेला, कष्टों को सहा, दुख में से सुख खोजा और गहन तप एवं साधना के बल पर सत्य तक पहुंचे, इसलिये वे हमारे लिए आदर्शों की ऊंची मीनार बन गये। उन्होंने समझ दी कि महानता कभी भौतिक पदार्थों, सुख-सुविधाओं, संकीर्ण सोच एवं स्वार्थी मनोवृत्ति से नहीं प्राप्त की जा सकती उसके लिए सच्चाई को बटोरना होता है, नैतिकता के पथ पर चलना होता है और अहिंसा की जीवनशैली अपनानी होती है। व्यावहारिक जीवन में यह आवश्यक है कि हम अहंकार को मिटाकर शुद्ध हृदय से अहिंसा, क्षमा, प्रेम, सत्य, अनेकांत को अपनाकर अपना जीवन पवित्र करें।
महावीर का संपूर्ण जीवन तप और ध्यान की पराकाष्ठा है इसलिए वह स्वतः प्रेरणादायी है। भगवान के उपदेश जीवनस्पर्शी हैं जिनमें जीवन की समस्याओं का समाधान निहित है। भगवान महावीर चिन्मय दीपक हैं। दीपक अंधकार का हरण करता है किंतु अज्ञान रूपी अंधकार को हरने के लिए चिन्मय दीपक की उपादेयता निर्विवाद है। वस्तुतः भगवान के प्रवचन और उपदेश आलोक पंुज हैं। ज्ञान रश्मियों से आप्लावित होने के लिए उनमें निमज्जन होना जरूरी है। महावीर आदमी को उपदेश दृष्टि देते हैं कि धर्म का सही अर्थ समझो। धर्म तुम्हें सुख, शांति, समृद्धि, समाधि, आज, अभी दे या कालक्रम से दे, इसका मूल्य नहीं है। मूल्य है धर्म तुम्हें समता, पवित्रता, नैतिकता, अहिंसा की अनुभूति कराता है। इसलिये महावीर बनने की कसौटी है-देश और काल से निरपेक्ष तथा जाति और संप्रदाय की कारा से मुक्त चेतना का आविर्भाव। महावीर एक कालजयी और असांप्रदायिक महापुरुष थे, जिन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को तीव्रता से जीया। वे इस महान त्रिपदी के न केवल प्रयोक्ता और प्रणेता बने बल्कि पर्याय बन गए।
भगवान महावीर की अनुभूतियों से जनमा सच है-धम्मो शुद्धस्स चिट्टई। धर्म शुद्धात्मा में ठहरता है और शुद्धात्मा का दूसरा नाम है अपने स्वभाव में रमण। यह नितान्त वैयक्तिक विकास की क्रांति है। जीवन की सफलता-असफलता, सुख-दुख, हर्ष-विषाद का जिम्मेदार सिवाय खुद के और कोई नहीं है। धर्म का महत्वपूर्ण पड़ाव यह भी है कि हम सही को सही समझे और गलत को गलत। सम्यक्त्व दृष्टि का यह विकास मुक्ति का ही नहीं, सफल एवं सार्थक जीवन का हस्ताक्षर है। इस मायने में धर्म पवित्रता का नया आकाश, नया मार्ग, नया विचार, नए शिखर छूने की कामना, कल्पना और सपने हैं।
भगवान महावीर का एक संुदर सूक्त है-एगे सु संपन्ने एगे शीलंपन्ने। एक व्यक्ति श्रुतसंपन्न है, किन्तु शीलसंपन्न नहीं है, दूसरा शीलसंपन्न तो है, किन्तु श्रुतसंपन्न नहीं है। यह दोनों ही अपूर्णता की स्थिति है, अधूरेपन की स्थिति है। चरित्र है, किन्तु पढ़ा-लिखा नहीं है तो भी अधूरापन है। समग्रता की स्थिति तब होगी जब श्रुतसंपन्न और शीलसंपन्न दोनो बनेंगे। शिक्षा में दोनों का समावेश होना चाहिए, जो आज नहीं है। आज विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान-विज्ञान की इतनी शाखाएं हो गई हैं, जितनी अतीत में कभी नहीं थीं। लेकिन नैतिकता का जितना ह्रास आज हुआ है और हो रहा है, उतना अतीत में कभी नहीं था।
आज के युग की जो भी समस्याएं हैं, चाहे कोरोना महामारी या पर्यावरण की समस्या हो, हिंसा एवं युद्ध की समस्या हो, चाहे राजनीतिक अपराधीकरण एवं अनैतिकता की समस्या, चाहे तनाव एवं मानसिक विकृतियां हो, चाहे आर्थिक एवं विकृत होती जीवनशैली की समस्या हो- इन सब समस्याओं का समाधान महावीर के सिद्धान्तों एवं उपदेशों में निहित है। इसलिये आज महावीर के पुनर्जन्म की नहीं बल्कि उनके द्वारा जीये गये आदर्श जीवन के अवतरण की अपेक्षा है। जरूरत है हम बदलें, हमारा स्वभाव बदले और हम हर क्षण महावीर बनने की तैयारी में जुटें तभी महावीर निर्वाण दिवस पर महावीर की स्मृति एवं स्तुति करना सार्थक होगा।
प्रे्षकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


NEP 2020 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचारों को दर्शाता है’

NEP 2020 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचारों को दर्शाता है’

12-Nov-2020

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय (MANUU) के प्रभारी कुलपति, प्रो एस.एम. रहमतुल्ला ने बुधवार को कहा।

 

“नई नीति ने प्रौद्योगिकी पर जोर दिया और मौलाना ने देश की स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दिनों में आईआईटी की स्थापना करके इसकी शुरुआत की।

उन्होंने कहा, “मौलाना आज़ाद के विचारों और देश के विकास में योगदान के लिए इस नीति के साथ आगे बढ़ना हमारी ज़िम्मेदारी है।”

जयंती समारोह
रहमतुल्लाह महान स्वतंत्रता सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के MANUU में जयंती समारोह को संबोधित कर रहे थे।

इस दिन को सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता था।

प्रो अब्दुल हमीद खान, निदेशक, मौलाना आज़ाद अध्यक्ष, मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, ने अपने ऑनलाइन व्याख्यान “असर-ए-हाज़िर मैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की मनवीत” (समकालीन समय में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की प्रासंगिकता) के माध्यम से, मौलाना पर अपनी छाप छोड़ी। आजाद के बहुआयामी, बहुआयामी व्यक्तित्व ने एक विद्वान, धर्मशास्त्री, पत्रकार, भाषाविद्, साहित्यकार, समाज सुधारक, और राजनेता को घेर लिया।

कट्टीमनी ने अपने संबोधन में कहा कि मौलाना के विचारों, उनके भाषणों और लेखन को सभी भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि मौलाना आज़ाद कौन हैं और उनका क्या योगदान है,” उन्होंने कहा कि यह मौलाना आज़ाद का बहुत अपमान है, अगर हम उन्हें विशेष समुदाय का व्यक्ति कहते हैं, तो वह एक भारतीय हैं और आजादी की लड़ाई लड़ी गई है भारत और विज्ञान, संस्कृति और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए मजबूत नींव रखी ”।

उन्होंने यूजीसी, आईआईटी और आईआईएससी आदि जैसे प्रमुख शिक्षा संस्थानों की स्थापना की। मौलाना ने हमेशा प्रौद्योगिकी, आधुनिक विज्ञान, मातृभाषा, भारतीय भाषाओं के बारे में बात की, उन्होंने टिप्पणी की।

कट्टीमनी ने यह भी बताया कि उन्होंने मौलाना आज़ाद की एक किताब का हिंदी में अनुवाद किया, जो प्रो। बी। शेख अली द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई थी।

 
 

बिहार की शानदार जीत के बाद AIMIM  के मुखिया ओवैसी ने पश्चिम बंगाल और यूपी में चुनाव लड़ने का ऐलान किया!

बिहार की शानदार जीत के बाद AIMIM के मुखिया ओवैसी ने पश्चिम बंगाल और यूपी में चुनाव लड़ने का ऐलान किया!

11-Nov-2020

बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की है। सीमांचल में मिली इस जीत से ओवैसी के हौसले काफी बुलंद नजर आ रहे हैं।

 सियासत डॉट कॉम की खबर के अनुसार, ओवैसी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दंगल में भी कूदने का एलान कर दिया है। इसके साथ ही उन्‍होंने दिग्विजय सिंह और कांग्रेस पर हमला बोला है, जो उन्‍हें बिहार चुनाव से पहले भाजपा की ‘बी’ टीम कह रही थी।
बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी 75 सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन गई है, वहीं भाजपा के खाते में 74 सीटें आई हैं।

ओवैसी ने बताया, ‘अब हमारी पार्टी पश्चिम बंगाल और उत्‍तर प्रदेश में भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। एक राजनीतिक पार्टी होने के नाते ये हमारा अधिकार है कि हम देश के किसी भी राज्‍य में चुनाव लड़ सकते हैं।

हमारी पार्टी को इस अधिकार से कोई वंचित नहीं कर सकता है।’ साथ ही उन्‍होंने कहा कि कांग्रेस और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को यह न सोचने की सलाह दी कि धर्मनिरपेक्षता उनके कारण जीवित है।

ओवैसी ने अपनी पार्टी की जीत का श्रेय सीमांचल की जनता को दिया। ओवैसी ने कहा कि हमारी राज्‍य की इकाई को इस जीत का पूरा श्रेय जाता है।

महागठबंधन के आरोपों का जवाब देते हुए ओवैसी ने कहा कि अगर बिहार में उनकी वजह से महागठबंधन को नुकसान हुआ है, तो फिर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में क्यों हार हुई? वहां तो हमारी पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही थी।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव के 243 सीटों के नतीजे सामने आ गए हैं।

एनडीए को 125, महागठबंधन को 110 और एआइएमआइएम, बसपा व दूसरे दलों को 8 सीटें मिली हैं। इस तरह एनडीए ने बहुमत हासिल कर लिया है। हालांकि, भी कुछ सीटों पर आधिकारिक तौर पर नतीजे घोषित नहीं किए गए हैं।

 

मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल ने बूढ़ा तालाब के आकर्षक तट पर ‘छत्तीसगढ़ लोककला शिल्प संसार‘ का किया अवलोकन

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बूढ़ा तालाब के आकर्षक तट पर ‘छत्तीसगढ़ लोककला शिल्प संसार‘ का किया अवलोकन

10-Nov-2020

मुख्यमंत्री ने स्वयं चॉक चलाकर बनाया मिट्टी का दीया
निःशक्तजन, अनाथ बालिकाओं और परित्यक्त महिलाओं को दिया दीपावली उपहार
जगमगाते परिसर में आसमान में उड़ाया आकाशदीप स्टॉलों से की दीपावली की खरीदी

No description available.

 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने बूढ़ा तालाब विवेकानंद सरोवर के हाल ही में हुए उन्नयन कार्य के उपरांत आज शाम इसके बेहद आकर्षक और रोशनी से जगमगाते तट पर ‘छत्तीसगढ़ लोककला शिल्प संसार‘ विक्रय-सह-प्रदर्शनी का अवलोकन किया। 
    
    मुख्यमंत्री यहां रायपुर प्रशासन की मदद से संचालित महिला स्व-सहायता समूहों ‘बिहान’, नगर-निगम के महिला स्व-सहायता समूहों, छत्तीसगढ़ माटीकला बोर्ड, बिलासा हेन्डलूम एम्पोरियम, छत्तीसगढ खाद्य एवं ग्रामोद्योग बोर्ड, छत्तीसगढ़ हस्त शिल्प बोर्ड के द्वारा बनाए गए मिट्टी और गोबर के आकर्षक दिये, पूजन-सामग्री, लोक शिल्प सामग्रियों सहित अन्य पारंपरिक कलाओं के माध्यम से निर्मित सामग्रियों का अवलोकन किया। 

    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर महिला स्व-सहायता समूहों की महिलाओं, दिव्यांगों और कुम्हारों से बातचीत की। उल्लेखनीय है कि रायपुर जिले की बिहान समूहों की महिलाएं न केवल मिट्टी और गोबर से बने आकर्षक दीये, मूर्तियां और पूजन-सामग्री बना रही है, बल्कि वे विभिन्न प्रकार के साबुन, बेकरी, कुकीज, आचार जैसी दर्जनों अन्य सामग्री भी बना रही हैं। इन सामग्रियों को बनाने में गोधन न्याय योजना भी बेहद सार्थक साबित हो रही हैं। इन सामग्रियों को आम नागरिकों के विक्रय के लिए रखा गया है। स्टॉल में नारायणपुर के स्व-सहायता समूह द्वारा बांस और बल्ब से बनायी गई रंग-बिरंगी आकर्षक झालर, कोण्डागांव स्व-सहायता समूह द्वारा टेराकोटा से बनाये गए कलात्मक दीये, महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा गोबर से निर्मित पुट्ठें से तैयार फाईल, वेस्ट पेपर से बनायी गई स्टेशनरी सामग्री, हैण्डलूम वस्त्र विक्रय के लिए रखे गए हैं। इस परिसर में बिलासा हैण्डलूम, शबरी एम्पोरियम के भी स्टॉल लगाये गए हैं। मुख्यमंत्री ने स्टॉलों से दीपावली की खरीदी भी की। उन्होंने दीया और पूजन-सामग्री भी खरीदी।

 

No description available.

कुम्हारों से मिट्टी में लगने वाले रॉयल्टी टैक्स को नहीं लेने के निर्देश 

   मुख्यमंत्री ने स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने स्टॉल में रखे चॉक देखकर अपने आपको नहीं रोक पाए और स्वयं भी कुम्हार की तरह मिट्टी के कलात्मक सामग्री बनाने वाले कलाकार की तरह बनकर अपने हाथों से दीया बनाया। उन्होंने इस अवसर पर अधिकारियों को कुम्हारों को उनके व्यवसाय को बढ़ावा देने वाले सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें मिट्टी में लगने वाले रॉयल्टी टैक्स को नहीं लेने के निर्देश दिए। 

    मुख्यमंत्री जब पैदल भ्रमण करते समय बेलमेटल विक्रय केन्द्र के समीप पहुंचे, तो वहां की कलाकारांे ने बस्तर का पारंपरिक वाद्य यंत्र तोंगा ‘तुरही‘ बजाने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने उनके अनुरोध को सहज होकर स्वीकारा और सुरीले स्वर से अनेक बार तोंगा बजाया। 

     बिहान स्टॉल में मुख्यमंत्री ने बालिका गृह की अनाथ बालिकाओं को उनके द्वारा राखी पर्व के अवसर पर बनाए गए राखियों के विक्रय से प्राप्त राशि से स्मार्ट फोन और हाथ घड़ियां प्रदान की। श्री बघेल ने इस अवसर पर आकांक्षा संस्था के 7 बच्चों, कोपलवाणी से 27 बच्चों, नवयुग दिव्यांग संस्था के 6 महिलाओं और बच्चों और बालिका गृह के बालिकाओं, नारी निकेतन की 6 परित्यक्त महिलाओं सहित 50 से अधिक बच्चों एवं महिलाओं को दीपावली उपहार के रूप में दीया, पूजन-सामग्री, चॉकलेट और सजावट की अन्य सामग्रियां प्रदान की।      

    बेहद आकर्षित और रोशनी से जगमगाते परिसर का पैदल भ्रमण करने के उपरांत मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने नागरिकों से अपील की कि हमारे यहां दीपावली के अवसर पर पारंपरिक रूप से मिट्टी की दीये बनाने की गौरवमयी परंपरा रही है। मेहनतकश लोग पारंपरिक के साथ आधुनिक तरीके से भी अब मिट्टी और गोबर के दीये और पूजन सामग्री बना रहे हैं। नागरिक ऐसी गौरवमयी परंपराओं को निरंतर बढ़ावा दे, जिससे हमारे परंपरागत व्यवसाय से जुड़े लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर मिलते रहे और उनकी आमदनी अच्छी हो। उन्होंने कहा कि महिला समूहों द्वारा भी गोबर के दीये बनाए जा रहे है, जिनकी पूरे देश में काफी मांग है, जिसकी आपूर्ति नहीं हो पा रही है। 

श्री बघेल ने आसमान में उड़ाया आकाशदीप को और 
प्रदेशवासियों को दी दीपावली की शुभकामनाएं

No description available.

    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों के साथ इस आकर्षक परिसर में आकाशदीप को आसमान में उड़ाया और दीपावली के लिए पूरे प्रदेश की जनता को अपनी शुभकामनाएं दी।

    इस अवसर पर विधायकगण सर्वश्री सत्यनारायण शर्मा, कुलदीप जुनेजा, विकास उपाध्याय, महापौर श्री एजाज ढेबर, सभापति श्री प्रमोद दुबे, छत्तीसगढ खाद्य एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र तिवारी, गौसेवा आयोग के अध्यक्ष महंत श्री रामसुन्दर दास, कलेक्टर डॉ. एस. भारतीदासन, नगर निगम के आयुक्त श्री सौरभ कुमार, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. गौरव सिंह, रायपुर स्मार्ट सिटी के एम.डी. श्री प्रभात मलिक सहित अधिकारी और नागरिकजन उपस्थित थे।

 


बिहार चुनाव: 78 सीटों पर तीसरे चरण का मतदान जारी!

बिहार चुनाव: 78 सीटों पर तीसरे चरण का मतदान जारी!

07-Nov-2020

बिहार विधानसभा चुनाव का तीसरे चरण का मतदान शनिवार को शुरु हो गया है। इस दौरन सुबह 7 बजे से 78 सीटों पर वोटिंग हो रही है। 

 

एजेंसी की  खबर के अनुसार, आखिरी चरण के इस लड़ाई में कुल 1204 कैंडिडेट अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, आखिरी दौर के इस युद्ध में कुल 2 करोड़ 35 लाख 54 हजार 71 वोटर इन उम्मीदवारों का भाग्य का फैसला करेंगे।

तीसरे चरण के मतदान में नीतीश कैबिनेट के मंत्रियों के अलावा वीआईपी पार्टी चीफ मुकेश सहनी, आरजेडी के दिग्गज नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी, अब्दुल जलील मस्तान, शरद यादव की बेटी सुभाषिनी यादव, पूर्व मंत्री चंद्रेशेखर, पूर्व सांसद लवली आनंद, शिवचंद्र राम और पूर्व मंत्री रमई राम की भी तीसरे चरण में परीक्षा होगी।

आखिरी चरण में नीतीश कुमार के 12 मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। साथ ही कई और दिग्गज मैदान में हैं। इनमें से चार बीजेपी और आठ जेडीयू खेमे से हैं।

इनमें बिजेंद्र प्रसाद यादव, नरेंद्र नारायण यादव, रमेश ऋषिदेव, खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद, लक्ष्मेश्वर राय, बीमा भारती, मदन सहनी, महेश्वर हजारी, प्रमोद कुमार, सुरेश कुमार भी मैदान में हैं।


 

 
 

अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के संकेत

अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के संकेत

04-Nov-2020

अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के संकेत

-ललित गर्ग-

No description available.

कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ी खबरों ने फिलहाल थोड़ी राहत भले ही दी है, लेकिन खतरा टला नहीं है, इसके संकेत भी साफ है। जहां तक समाज एवं अर्थव्यवस्था पर पड़े इसके असर का मामला है, अभी इन सबसे उबरने में काफी समय लग सकता है। विशेषतः भारत की अर्थ-व्यवस्था तो पहले से अपनी स्थिति को मजबूत करने की स्थिति से जूझ रही थी, कोरोना महामारी ने उसे और गहरे घाव दिये हंै। भारत की स्थिति ज्यादा खराब होने का कारण यहां खूब संक्रमण हुआ और बहुत कड़े लाॅकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था अपंग हो गई है। सरकार एवं नीति-नियंता शायद सार्वजनिक रूप से इसी स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन यही कठोर वास्तविकता है।  

लॉकडाउन के दौरान बंद बहुत सी छोटी इकाइयां अभी भी नहीं खुल सकी हैं। इस क्षेत्र में बेरोजगार हो गए सभी लोगों को रोजगार मिल गया हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन फिलहाल का सच यही है कि स्थितियां अब उतनी भी खराब नहीं हैं, जितनी पांच-छह महीने पहले लग रही थीं। कोरोना संक्रमण के सच को स्वीकार करते हुए देश ने आगे बढ़ना शुरू कर दिया है, लेकिन लंबा रास्ता अभी बाकी है। अक्तूबर का जीएसटी संग्रह एक लाख करोड़ रुपये तक पहंुच गया है, जो कि अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने का सबसे बड़ा संकेत माना जा सकता है। इससे भी ज्यादा राहत देने वाली खबर फैक्टरी उत्पादन का सूचकांक पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय का सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचना है। निक्कई परचेजिंग मैनेजर इंडेक्स के अनुसार अक्तूबर महीने में यह 58.9 पर पहुंच गया है। अगर इस सूचकांक के हिसाब से देखें, तो यह ठीक है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई है, अक्तूबर में तमाम तरह के आंकड़े बाजार से हताशा के बादल छंटने के संकेत दे रहे हैं। विशेषतः ऑटोमोबाइल क्षेत्र के आंकड़े इतने बेहतर और हैरान करने वाले रहे है। दुपहिया वाहनों और कारों की बिक्री खासी उम्मीद बंधा रही है। लेकिन अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी है, उसका इन पटरियों पर रफ्तार पकड़कर मंजिल की ओर बढ़ना। हमारी सरकारों और वित्तीय संस्थाओं को अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए और सशक्त आर्थिक नीतियों के द्वारा देश को समग्र विकास की ओर अग्रसर करना चाहिए।
दुनियाभर में यह कटु सच्चाई है कि नीति नियंताओं को वास्तव में नहीं पता कि उन्हें क्या करना है। भारत में अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये भी ऐसी ही स्थिति है। फिर भी भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिये अन्यान्य प्रयत्नों के साथ चार मुख्य बिन्दु हैं-गरीबी को मिटाना, जनसंख्या की वृद्धि को रोकना, पर्यावरण में सुधार करना एवं बेरोजगारी का उन्मूलन करना। ऐसा लगता है-गरीबी और जनसंख्या में भी कोई निकट का संबंध है। गरीब के संतान ज्यादा होती है क्योंकि कुपोषण में आबादी ज्यादा बढ़ती है। विकसित राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात कम है, अविकसित और निर्धन राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात ज्यादा है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में एक प्रसंग आता है-दरिद्रता दुखतर है और उसके साथ जुड़ा दुख है संतान का आधिक्य। दारिद्रता की पीड़ा और संतति के आधिक्य की पीड़ा-दोनों ओर से आदमी पीड़ित होता है। जनसंख्या-वृद्धि के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु कालखण्ड का प्रभाव और कुपोषण-ये दोनों जनसंख्या वृद्धि के सबसे प्रमुख कारण बनते हैं।
विश्व की सारी संपदा, सारे संसाधन गरीबी को मिटाने में लगते तो आज स्थिति बहुत भिन्न होती, किन्तु बीच में व्यवधान आ गए। कोरोना का व्यवधान भी गरीबी मिटाने की दिशा में गति का एक बड़ा अवरोध है। अब तक सम्पदा का उपयोग मानव को सुखी या सामान्य बनाने की दिशा में नहीं हुआ, बल्कि संहारक अस्त्रों के निर्माण में हुआ। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से भयभीत हो गया। शस्त्रों की होड़ सी लग गई। यू.एन.ओ. की एक रिपोर्ट के आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि अर्थशक्ति और संसाधन किस दिशा में लग रहे हैं। दुनिया का अधिकांश अर्थ प्रतिवर्ष सुरक्षा पर व्यय हो रहा है। मानव की सुरक्षा के लिए नहीं, अपनी भौगोलिक सुरक्षा के लिए यह व्यय किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य में यह बताया गया है कि किसी एक विशेष कारण के चलते नहीं बल्कि विभिन्न कारणों की वजह से लोगों को गरीबी में जीवन व्यापन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि केवल आय का स्रोत एवं आमदनी ही गरीबी का कारण नहीं है बल्कि भोजन, घर, भूमि, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि भी गरीबी के निर्धारण में भूमिका निभाते हैं।
भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, कमजोर कृषि, भ्रष्टाचार, रूढ़िवादी सोच, जातिवाद, अमीर गरीब में ऊंच-नीच, नौकरी की कमी, अशिक्षा, बीमारी आदि है। भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसकी एक बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, आज देश के यही किसान गरीबी की मार झेल रही है। खराब कृषि और बेरोजगारी की वजह से लोगों को भोजन की कमी से जूझना पड़ता है। यही कारण है कि महंगाई ने भी पंख फैला रखे हैं। बढ़ती जनसंख्या भी गरीबी का एक प्रमुख कारण है।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में बताया कि भारत में 21.9 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। विश्व बैंक की वर्ष 2011 रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की 23.6 प्रतिशत जनसंख्या (लगभग 276 मिलियन) की प्रतिदिन क्रय शक्ति 1.25 डॉलर प्रतिदिन है। इसके अतिरिक्त 2016 में जारी अंतरराष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक में भारत को 97वां स्थान मिला है। इसमें विकासशील देशों के लिए औसत दर 21.3 रखी गयी थी जबकि भारत की यह दर 28.5 प्रतिशत थी। गरीबी उन्मूलन की दिशा में योगदान देने के लिए भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी का नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित होना सुखद है। लेकिन दुखद पहलू यह है कि उनके ही देश के अधिकत्तर लोग गरीबी भरा जीवन जीने को विवश है।
भारत लंबे समय से गरीबी का दंश झेल रहा है। स्वतंत्रता पूर्व से लेकर स्वतंत्रता पश्चात भी देश में गरीबी का आलम पसरा हुआ है। गरीबी उन्मूलन के लिए अब तक कई योजनाएं बनीं, कई प्रयास हुए, गरीबी हटाओ चुनावी नारा बना और चुनाव में जीत हासिल की गई। लेकिन इन सब के बाद भी न तो गरीब की स्थिति में सुधार हुआ और न गरीबी का खात्मा हो पाया। सच्चाई यह है कि गरीबी मिटने के बजाय देश में दिनोंदिन गरीबों की संख्या में बढ़ावा हो रहा है। सत्ता हथियाने के लिए गरीब को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया तो सत्ता मिलने के बाद उसे हमेशा के लिए अपने हाल पर छोड़ दिया गया। इसलिए गरीब आज भी वहीं खड़ा है जहां आजादी से पहले था। आज भी सवेरे की पहली किरण के साथ ही गरीब के सामने रोटी, कपड़ा और मकान का संकट खड़ा हो जाता है। दरअसल, यह कम विडंबना नहीं है कि सोने की चिड़िया के नाम से पहचाने जाने वाले देश का भविष्य आज गरीबी के कारण भूखा और नंगा दो जून की रोटी के जुगाड़ में दरबदर की ठोकरें खा रहा है। नरेन्द्र मोदी सरकार की गरीबी उन्मूलन एवं जनसंख्या नियंत्रण की योजनाओं से कुछ उजाला होता हुआ दिख रहा है। प्रेषकः

 

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


छत्तीसगढ़ राज्य में कोरोना टीकाकरण के लिए की जा रही तैयारी !

छत्तीसगढ़ राज्य में कोरोना टीकाकरण के लिए की जा रही तैयारी !

03-Nov-2020

कोरोना टीकाकरण के लिए की जा रही तैयारी
प्राथमिकता के आधार पर विभाग के लोगों का तैयार किया जा रहा डेटा

रायपुर, 
कोरोना वायरस वैक्सीन के जल्द आने की उम्मीद पर केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से निगरानी के लिए समितियां बनाने को कहा है। वैक्सीन के लिए कोल्ड चैन से लेकर उसे सुदूर और जटिल इलाकों तक पहुंचाने के लिए जिला स्तर पर समन्वय समितियां बनाने की भी सलाह दी गई है।

राज्य टीकाकरण अधिकारी डॉ अमर सिंह ने बताया,कोरोना टीकाकरण के लिए अभी जानकारी एकत्र करने का कार्य चल रहा है इस संदर्भ में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सभी सीएमएचओ के साथ एक समीक्षा बैठक भी की गयी है जिसमें उन्हें संभावित वैक्सीन लगाए जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी एकत्र करने कोकहा गया है।

उन्होंने बताया, जिन लोगों का डेटाबेस तैयार किया जा रहा है उनमें स्वास्थ्य विभाग सबसे पहले है। स्वास्थ्य विभाग में सभी सीएचसी, पीएचसी, निजी चिकित्सक और उनके स्टाफ,सीएमएचओ और उनके मातहत सभी रेगुलर व कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी, मेडिकल कॉलेज के डीन और  स्टाफ, शासकीय अस्पताल के स्टाफ, मेडिकल कॉलेज सुपरीटेंडेंट के स्टाफ इत्यादि शामिल है। इसी तरह महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी-कर्मचारी समेत आंगनबाड़ी कार्यकर्ता,आंगनबाड़ी सुपरवाइजर और आंगनबाड़ी सहायिका के डेटा को तैयार किया जा रहा है इसके अलावा मितानिन का भी डेटा सहेजा जा रहा है। 28 अक्टूबर से यह डेटा तैयार किया जा रहा है जिसे फिलहाल एक्सेल शीट में भरा जा रहा है और बाद में इसे ऑनलाइन अपलोड किया जाएगा।

कब वैक्सीन आएगी जानकारी नहीं पर तैयारी जोरों पर : डॉ अमर सिंह

डॉ अमर सिंह बताते हैं:  ``कोरोना टीकाकरण के संदर्भ में अभी प्राथमिकता के आधार पर विभाग से जानकारीका संग्रह किया जा रहा है | इसमें सरकारी और निजी चिकित्सकों और उनके स्टाफ की जानकारी भी एकत्र की जा रही है । वैक्सीन कौन लगा सकता है और कौन नहीं इसकी भी जानकारी एकत्र की जा रही है। इसके अलावा कोरोना की वैक्सीन कब आएगी के संदर्भ में अभी स्पष्ट जानकारी नहीं है लेकिन इसके लिए सभी जरूरी कार्य तेजी से पूर्ण किये जाने के निर्देश दिए गए हैं । ‘’

तीन समिति बनाने का निर्देश

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने इस संबंध में 26 अक्टूबर को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखा  जिसमें  उन्होंने मुख्य सचिव के नेतृत्व में राज्य संचालन समिति (एसएससी), अतिरिक्त मुख्य सचिव का प्रधान सचिव (स्वास्थ्य) के नेतृत्व में राज्य कार्य बल (एसटीएफ) और जिलाधिकारियों के नेतृत्व में जिला कार्य बल गठित (डीटीएफ़) करने का सुझाव दिया है।

इसमें यह भी कहा गया कि एसएससी महीने में कम-से-कम एक बैठक करेगी। इसी तरह एसटीएफ की हर 15 दिन में बैठक होगी और डीटीएफ की बैठक हर हफ्ते होगी।

 


मरवाही उप चुनाव हुआ रोमांचक जोगी कांग्रेस का भाजपा प्रत्याशी को समर्थन

मरवाही उप चुनाव हुआ रोमांचक जोगी कांग्रेस का भाजपा प्रत्याशी को समर्थन

31-Oct-2020

मरवाही पेंड्रा से खुलासपोस्ट न्यूज़ 

मरवाही उप चुनाव हुआ रोमांचक जोगी कांग्रेस का भाजपा प्रत्याशी को समर्थन

हाल ही में खुलास पोस्ट न्यूज़  नेटवर्क की टीम ने अमित जोगी और ऋचा जोगी के नामांकन रद्द होने के बाद आशंका व्यक्त किया था की जोगी परिवार भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करेगी और वही हुआ जोगी परिवार ने अपना दांव खेलते हुए जोगी कांग्रेस के विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह से भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने अमित जोगी ने  शोसल  मीडिया में जो पत्र जारी किया है  वह  भावनात्मक प्रचार का हिस्सा है जो इस तरह से है !

देर रात मुझे मेरे विधायक दल के नेता श्री धरमजीत सिंह जी और विधायक दल के सचिव श्री राजेंद्र राय जी ने जानकारी दी कि उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी श्री गम्भीर सिंह का समर्थन करने का निर्णय ले लिया है। श्री प्रमोद शर्मा और अधिकांश पार्टी कार्यकर्ता भी इस बात पर अपनी सहमति दे चुके हैं। मेरी भाजपा के किसी नेता से आज तक इस सम्बंध में सीधा संवाद नहीं हुआ है पर मैं अपनी पार्टी के नेताओं की इस राय से पूर्ण रूप से सहमत हूँ। इस तरह का बयान शोसल मीडिया प्लेटफार्म से जारी किया गया है

अब । मरवाही विधानसभा सीट  उप चुनाव और भी रोचक होने वाला है ? उपचुनाव में मतदान की तारीख पास आ रही है. 3 नवंबर को वहां वोट डाले जाएंगे. यहां का सियासी पारा अब चरम पर पहुंच गया है. मुख्यमंत्री समेत सरकार के बड़े मंत्री-नेता मरवाही में डेरा डाल डटे हुए हैं, वहीं बीजेपी भी इस सीट को जीतने में कोई कोर- कसर बाकी नहीं रखना चाहती. पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने मरवाही उप चुनाव की कमान संभल रखी है ऐसे में जोगी कांग्रेस और जोगी परिवार भावनात्मक प्रचार में जुट गया है

मतदान के  2  ठीक दिन पहले इस तरह जनता कांग्रेस का बीजेपी प्रत्याशी को समर्थन देना कहीं न कहीं बीजेपी का पलड़ा भारी कर सकता है. हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी अपने चुनावी सभाओं में रिकॉर्ड मतों से जीत का दावा कर रहे हैं. अब देखना ये होगा कि जेसीसीजे का समर्थन बीजेपी के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है. शुक्रवार को छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जेसीसीजे) के कद्दावर नेता और लोरमी विधायक धरमजीत सिंह का पूर्व सीएम रमन सिंह से मिलना काफी सुर्खियों में रहा. धरमजीत सिंह ने इसे सामान्य सौजन्य मुलाकात बताया था, लेकिन मरवाही के वर्तमान सियासी परिस्थितियों के बीच इस मुलाकात को काफी अहम माना जा रहा था और जल्द ही किसी बड़े एलान का कयास लगाया जा रहा था.
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। मरवाही विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में मतदान की तारीख पास आ रही है. 3 नवंबर को वहां वोट डाले जाएंगे. यहां का सियासी पारा अब चरम पर पहुंच गया है. मुख्यमंत्री समेत सरकार के बड़े मंत्री-नेता यहां डेरा जमाए हुए हैं, वहीं बीजेपी भी इस सीट को जीतने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहती.

इधर जेसीसीजे ने कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए बीजेपी प्रत्याशी को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है. जाति को लेकर चुनावी रण से बाहर हुए जेसीसीजे प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने सोशल मीडिया पर इसका ऐलान कर दिया है. जेसीसीजे विधायक धरमजीत सिंह, प्रमोद शर्मा और राजेंद्र राय ने भी बीजेपी प्रत्याशी गंभीर सिंह को अपना समर्थन देने का फैसला किया है.

अमित जोगी ने अपने पोस्ट में लिखा है कि विधायक दल के नेता धरमजीत सिंह और सचिव राजेंद्र राय ने सूचना दी है कि उन्होंने बीजेपी दल के प्रत्याशी गंभीर सिंह का समर्थन करने का निर्णय लिया है. प्रमोद शर्मा और पार्टी के अन्य सदस्य भी इसमें अपनी सहमति दे चुके हैं. अमित जोगी ने कहा कि इस मामले में उनका बीजेपी के किसी भी नेता से सीधा संवाद नहीं हुआ है. अमित जोगी ने आगे कहा कि ‘मैं मरवाही के मेरे परिवार से आग्रह करता हूं कि मेरे पिता अजीत जोगी को अपमानित करने वाली कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध वोट देकर हमें न्याय दिलाएं.’

 

 


वैश्विक रवैये में बदलाव के बिना महामारियों के युग से बचना मुश्किल: विशेषज्ञ

वैश्विक रवैये में बदलाव के बिना महामारियों के युग से बचना मुश्किल: विशेषज्ञ

30-Oct-2020

संक्रामक बीमारियों से लड़ने के लिये वैश्विक रवैये में अगर आमूल-चूल बदलाव नहीं किये गये तो भविष्‍य में महामारियां जल्‍दी-जल्‍दी उभरेंगी। साथ ही वे ज्‍यादा तेजी से फैलेंगी, दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था को और ज्‍यादा नुकसान पहुंचाएंगी और कोविड-19 के मुकाबले ज्‍यादा तादाद में लोगों को मारेंगी। ऐसा दावा है दुनिया के 22 शीर्ष विशेषज्ञों का जिन्होंने आज जैव-विविधता और महामारियों को लेकर एक रिपोर्ट जारी कर यह चेतावनी दी है।
इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्‍लेटफार्म और बायोडायवर्सिटी एण्‍ड इकोसिस्‍टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) द्वारा कुदरत में आ रही खराबियों और महामारियों के बढ़ते खतरों के बीच सम्‍बन्‍धों पर चर्चा के लिये आयोजित एक आपात वर्चुअल वर्कशॉप में विशेषज्ञ इस बात पर सहमत दिखे कि महामारियों के युग से बचा जा सकता है, बशर्ते महामारियों के प्रति अपने रवैये में बुनियादी बदलाव लाकर प्रतिक्रिया के बजाय रोकथाम पर ध्‍यान दिया जाए।
बृहस्‍पतिवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 वर्ष 1918 में फैली ग्रेट इंफ्लूएंजा महामारी के बाद से अब तक आयी कम से कम छठी वैश्विक महामारी है। हालांकि इसकी शुरुआत जानवरों द्वारा लाये गये माइक्रोब्‍स से हुई, मगर अन्‍य सभी महामारियों की तरह यह भी पूरे तरीके से इंसान की नुकसानदेह गतिविधियों की वजह से फैली। ऐसा अनुमान है कि स्‍तनधारियों और पक्षियों की विभिन्‍न प्रजातियों में इस वक्‍त 17 लाख ‘अनखोजे’ वायरस मौजूद हैं। उनमें से लगभग 85 हजार ऐसे हैं जो इंसान को संक्रमित करने की क्षमता रखते हैं।
इकोहेल्थ अलायंस के अध्यक्ष और आईपीडीएस वर्कशॉप के चेयरमैन डॉक्टर पीटर डेजाक ने कहा ‘‘कोविड-19 या किसी भी आधुनिक महामारी के कारण को लेकर कोई बड़ा रहस्य नहीं है। जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता को हो रहे नुकसान को बढ़ावा देने वाली इंसानी गतिविधियां ही हमारे पर्यावरण पर उनके पड़ने वाले प्रभावों के कारण उत्‍पन्‍न महामारियों के खतरे को पैदा करती हैं। जमीन के उपयोग में बदलाव, खेती का विस्‍तार और सघनीकरण, गैरसतत कारोबार, कुदरत को तबाह करने वाला उत्‍पादन और उपभोग तथा वन्‍यजीवों, मवेशियों, रोगाणुओं और लोगों के बीच बढ़ते सम्‍पर्क वगैरह ऐसी चीजें हैं जो महामारियों को बुलावा देती हैं।”
रिपोर्ट के मुताबिक जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने वाली इंसानी गतिविधियों को कम करके महामारी का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए संरक्षित क्षेत्रों को और बेहतर तरीके से महफूज करना होगा। साथ ही जैव विविधता के लिहाज से बेहद समृद्ध क्षेत्रों के अंधाधुंध दोहन को भी कम करना होगा। इससे वन्य जीवों, मवेशियों और इंसान के बीच संपर्क कम होगा और नई बीमारियों को रोकने में मदद मिलेगी।
डॉक्‍टर देजाक ने कहा "यह मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण बेहद सकारात्मक निष्कर्ष की तरफ इशारा करते हैं। हमारे पास महामारियों को रोकने की अच्छी क्षमता है लेकिन इस वक्त हम जिस तरह से उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं, उनमें हमारी क्षमता को काफी हद तक नजरअंदाज किया जा रहा है। हमारी कोशिशें ठहरी हुई है। हम अब भी बीमारियों को उभरने के बाद वैक्सीन और चिकित्सीय इलाज के जरिए उनकी रोकथाम की कोशिशों पर ही निर्भर रहते हैं, मगर इसके लिए प्रतिक्रिया के साथ-साथ रोकथाम पर और ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है।"
इसके साथ ही, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के कार्यक्रम निदेशक डॉ. सेजल वोरह ने कहा, "मानव कल्याण प्रकृति के स्वास्थ्य के साथ जुड़ा हुआ है। हम वर्तमान दर पर जैव विविधता खोना जारी नहीं रख सकते हैं। भविष्य के महामारी के जोखिम को कम करने के लिए वैश्विक, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर नीतियों और प्रथाओं को बदलने में अभी भी देर नहीं हुई है।”
वहीँ मेटास्ट्रिंग फाउंडेशन के सीईओ और निदेशक, मिशन सचिवालय, जैव विविधता और मानव कल्याण पर राष्ट्रीय मिशन परियोजना, रवि चेलम ने कहा, "रिपोर्ट स्पष्ट रूप से पर्यावरण पर मानव प्रभावों को मूल कारण के रूप में स्थापित करती है। यह भी स्पष्ट है कि हम महामारी के युग में हैं और कोई भी वास्तव में सुरक्षित नहीं है। महामारी की आर्थिक लागत उन्हें रोकने के लिए होने वाले खर्च से कहीं अधिक है। अब आर्थिक सुधारों को पूरी तरह से एक नयी नज़र से  देखना होगा। " 
रिपोर्ट में कहा गया है कि बीमारियां पैदा होने के बाद सिर्फ उनके इलाज के कदम उठाने या प्रौद्योगिकीय समाधान पर ही निर्भर रहना, खासतौर से नई वैक्सीन और चिकित्सीय इलाज तैयार करना और उनका वितरण करना, दरअसल एक 'धीमी और अनिश्चिततापूर्ण' कवायद है। इसमें इंसान द्वारा बड़े पैमाने पर सहन की जाने वाली तकलीफें और इन बीमारियों के इलाज पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को होने वाले सैकड़ों अरब डॉलर के सालाना आर्थिक नुकसान को कमतर बना दिया जाता है।
 रिपोर्ट में लगाए गए एक अनुमान के मुताबिक पूरी दुनिया में जुलाई 2020 तक कोविड-19 महामारी के कारण 8 से 16 ट्रिलियन डॉलर तक का नुकसान हुआ है। ऐसा भी अनुमान है कि वर्ष 2021 की चौथी तिमाही तक अकेले अमेरिका में ही कोविड-19 महामारी की वजह से 16 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि महामारियों का खतरा कम करने पर होने वाला खर्च, ऐसी महामारियों के इलाज पर खर्च होने वाली धनराशि के मुकाबले 100 गुना कम हो सकती है। इससे रूपांतरणकारी बदलाव के मजबूत आर्थिक प्रोत्साहन हासिल होते हैं।
इस रिपोर्ट में अनेक नीति संबंधी विकल्प दिए गए हैं, जिनसे महामारी के खतरे को कम करने और उससे निपटने में मदद मिलेगी। इनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं :
·         महामारी की रोकथाम के लिए एक उच्च स्तरीय अंतर सरकारी परिषद गठित की जाए, जो नीतियां बनाने वालों को उभरती हुई बीमारियों के बारे में सर्वश्रेष्ठ विज्ञान और प्रमाण उपलब्ध कराए, अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों के बारे में पूर्वानुमान लगाए, संभावित बीमारियों के आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन करे और शोध में व्याप्त खामियों को रेखांकित करे। ऐसी काउंसिल एक वैश्विक मॉनिटरिंग कार्य योजना का डिजाइन तैयार करने में भी मदद कर सकती हैं।
·         विभिन्न देश एक अंतरराष्ट्रीय समझौते या सहमति के दायरे में रहते हुए परस्पर रजामंदी से लक्ष्य तय करें, जिनमें लोगों, जानवरों और पर्यावरण के स्पष्ट फायदे हों।
·         महामारी को लेकर तैयारी करने, महामारी की रोकथाम के लिए बेहतर कार्यक्रम बनाने और विभिन्न क्षेत्रों में महामारी विस्फोट को नियंत्रित करने तथा उसकी पड़ताल करने के लिए सरकारों में ‘वन हेल्थ’ को संस्थागत रूप दिया जाए।
·         विकास तथा भू-उपयोग संबंधी बड़ी परियोजनाओं में महामारी और उभरती हुई बीमारियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के आकलन को विकसित करके उसे जोड़ा जाए। वहीं भू-उपयोग के लिए वित्तीय सहायता में सुधार किया जाए ताकि  जैव विविधता से जुड़े फायदों और जोखिमों की पहचान हो और उन्हें स्पष्ट रूप से लक्ष्य बनाया जाए।
·         महामारियों के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान को उपभोग, उत्पादन, सरकारी नीतियों और बजट में एक कारक के तौर पर शामिल करना सुनिश्चित किया जाए।
·         महामारियों को बढ़ावा देने वाली उपभोग की किस्मों, वैश्वीकृत कृषि विस्तार और कारोबार को कम करने वाले बदलाव को जमीन पर उतारा जाए। इन बदलावों में मांस के उपभोग, पशुधन उत्पादन तथा महामारी के खतरे को बहुत बढ़ाने वाली तमाम गतिविधियों पर कर या लेवी लगाना शामिल है।
·         नई अंतर सरकारी स्वास्थ्य एवं व्यापार साझीदारी के जरिए अंतर्राष्ट्रीय वन्यजीव कारोबार में प्राणिजन्‍य रोगों के खतरे को कम किया जाए। वन्यजीवों के कारोबार में बीमारी के ज्यादा खतरे वाले जीवों की हिस्सेदारी को कम या बिल्कुल समाप्त कर दिया जाए। साथ ही वन्यजीवों के अवैध कारोबार के तमाम पहलुओं पर कानून का शिकंजा और कसा जाए तथा वन्यजीवों के कारोबार में सेहत से जुड़े खतरों के बारे में बीमारी के हॉटस्पॉट वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जानकारी और बढ़ायी जाए।
·         महामारी नियंत्रण कार्यक्रम, बेहतर खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करने और वन्यजीवों का उपयोग कम करने में स्थानीय लोगों तथा समुदाय की सहभागिता और जानकारी का मोल समझा जाए।
·         जोखिम वाले प्रमुख बर्ताव तथा अन्य मुद्दों पर महत्वपूर्ण जानकारी में व्याप्त खामियों को दूर किया जाए। बीमारियों के जोखिम में अवैध और गैरनियमित तथा वैध और नियमित वन्यजीव कारोबार के तुलनात्मक महत्व को जाहिर किया जाए और पारिस्थितिकीय अपघटन और उसकी बहाली, लैंडस्केप के ढांचे और बीमारी पैदा होने के खतरे के बीच संबंधों को लेकर बनी समझ में सुधार किया जाए।
आईपीबीईएस की एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी डॉक्टर एनी लारीगुडरी ने वर्कशॉप की रिपोर्ट के बारे में कहा ‘‘कोविड-19 ने नीति और निर्णय लेने के मामले में विज्ञान और विशेषज्ञता के महत्व को जाहिर किया है। हालांकि यह आईपीबीईएस की परंपरागत अंतरसरकारी आकलन रिपोर्ट नहीं है। यह एक असाधारण प्रकाशन है जिसमें समय संबंधी महत्वपूर्ण बाधाओं के बीच नये-नवेले प्रमाणों के साथ दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों का नजरिया पेश किया गया है। हम महामारियों के उभार और भविष्य में उनके प्रकोप को रोकने तथा नियंत्रित करने के विकल्पों के बारे में हमारी समझ को और बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए डॉक्टर देजाक और इस वर्कशॉप रिपोर्ट के तमाम लेखकों को शुभकामनाएं देते हैं। इससे आईपीबीईएस में हो रहे तमाम आकलनों को दिशा मिलेगी। साथ ही नीति निर्धारकों को महामारी का खतरा कम करने और उसकी रोकथाम के विकल्पों के बारे में नई चेतना मिलेगी।

 


जामिया के 101 छात्रों ने पास की UPSC की प्रारंभिक परीक्षा !

जामिया के 101 छात्रों ने पास की UPSC की प्रारंभिक परीक्षा !

27-Oct-2020

यूपीएससी सिविल सर्विस प्रारंभिक परीक्षा 2020 (UPSC Prelim Exam)  का रिज़ल्ट जारी हो चुका है. यह परीक्षा 4 अक्टूबर को आयोजित की गई थी. खास बात यह है कि इस प्री परीक्षा में जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी (Jamia millia university) के 101 छात्र भी सफल हुए हैं. इसमे से 10 लड़कियां भी हैं. अब यह सभी छात्र जनवरी में होने वाली मेंस परीक्षा में शामिल होंगे. जामिया की रेजिडेंशियल कोचिंग एकेडमी (RCA) से इस परीक्षा में 283 छात्र शामिल हुए थे.

यूपीएससी 2019 में 30 छात्र हुए थे सेलेक्ट

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की आवासीय कोचिंग अकादमी (आरसीए) में कोचिंग देने और प्रशिक्षण पाने वालों में से 30 उम्मीदवार सिविल सेवा परीक्षा 2019 में सेलेक्ट हुए थे. जामिया प्रशासन का दावा है कि देश के किसी भी सार्वजनिक कोचिंग सेंटर से यह सबसे बड़ा चयनित समूह है.

0 कामयाब छात्रों में थीं 06 लड़कियां

चयनित 30 उम्मीदवारों में से 06 के आईएएस, 08 के आईपीएस बनने की उम्मीद है. बाकी उम्मीदवारों को उनकी रैंकिंग और विकल्पों के अनुसार आईआरएस, ऑडिट एंड अकाउंट सेवा, आईआरटीएस तथा ग्रुप-ए की अन्य सेवाएं मिलेंगी. इस साल आरसीए से कोचिंग पाने वालों में से रूचि बिंदल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा, जिन्होंने 39 वां रैंक हासिल किया. आरसीए के कामयाब 30 उम्मीदवारों में से 06 लड़कियां हैं.

साल दर साल लगातार अच्छा प्रदर्शन

आरसीए के अच्छे प्रदर्शन के लिए, प्रो अख्तर व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन कर रही हैं और आरसीए को उत्कृष्टता की ओर ले जाने के लिए उसे हर मुमकिन सहायता प्रदान करा रही हैं. उन्होंने सभी कामयाब छात्रों और उनके परिवार को बधाई दी. पिछले साल यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में तीसरा रैंक पाने वाले जुनैद अहमद आरसीए, जेएमआई से स्टार परफार्मर थे.

2019 तक आरसीए ने 230 सिविल सेवक दिए

साल, 2010-2011 में अपनी स्थापना से वर्ष 2019 तक आरसीए ने 230 सिविल सेवक बनाए हैं, जिनमें कई आईएएस, आईएफएस और आईपीएस शामिल हैं. इसके अलावा, 285 से अधिक छात्रों को विभिन्न अन्य केंद्रीय और राज्य सेवाओं यानी सीएपीएफ, आईबी, आरबीआई (ग्रेडबी), एपीएफ, बैंक पीओ और पीसीएस आदि में भी चुना गया है. इस साल आरसीए के 14 छात्र जम्मू-कश्मीर की सीविल सेवाओं में शामिल हुए. 24 छात्र यूपीपीएससी साक्षात्कार के क्वालिफाई हुए और 15 छात्र बीपीएससी साक्षात्कार के लिए.


पश्चिम बंगाल का एक ऐसा इलाका जहाँ माँ दुर्गा विसर्जन के दौरान गोलियों की तड़तड़ाहट के साथ की जाती है माँ की विदाई

पश्चिम बंगाल का एक ऐसा इलाका जहाँ माँ दुर्गा विसर्जन के दौरान गोलियों की तड़तड़ाहट के साथ की जाती है माँ की विदाई

26-Oct-2020

परंपरा के नाम पर तृणमूल नेता बच्चू रॉय और शिवा रॉय ने अपने अपने परिवार के साथ खुलेआम उड़ा रहे हैं कानून की धज्जियाँ

राजा महाराजाओं की परंपराओं को जिंदा रखने के नाम पर अपनी जमींदारी जिंदा रखने की कर रहे हैं कोसिस

Report:Abdul Kalam

Place:Bengal

आज विजया दशमी है आज के ही दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कर उन्हें अगले वर्ष फिर से आने का आह्वान किया जाता है बहोत ही धूम-धाम से जिस तरह माँ की प्रतिमा पूजन के लिए लाई जाती है ठीक उसी तरह धूम-धाम से ही माँ दुर्गा की प्रतिमा की विदाई भी की जाती है ये परंपरा सदियों से चली आ रही है माँ की विदाई के दौरान बंगाल में सिंदूर खेला भी बहोत प्रचलित है माँ की मूर्ति विसर्जन के दौरान बंगाली महिलाएँ माँ की विदाई देते समय माँ को सिंदूर लगती हैं साथ ही माँ को पेड़ा खिलाकर मुह मीठा भी करती है और अपने सांस्कृतिक नृत्य व गान के जरिए माँ को अगले वर्ष दोबारा आने का आह्वान भी करती है पर पश्चिम बंगाल के आसनसोल के रहने वाले राय परिवार की 300 वर्ष पुरानी एक अनोखी परंपरा है जो परंपरा आज भी जारी है इस परंपरा में राय परिवार माँ की मूर्ति विसर्जन के दौरान उनकी विदाई में अपने पुरखों से चले आ रहे रीति रिवाज को मानते हुवे हवाई फायरिंग करते हैं इस फायरिंग में पुरुष तो पुरुष  महिलाएँ भी शामिल होती हैं उनका मानना है के काशीपुर के राजा का राज पाट राय परिवार ही देखता हैं और उनके द्वारा जारी रीति रिवाजों को राय परिवार आज भी कायम रखा है इस लिए वो हर वर्ष के तरह इस वर्ष भी सदियों से चली आ रही परंपरा को दोहराने का काम किए हैं हालांकि की तस्वीरों में दिख रहे लोग कोई राजा महाराजा के खानदान या फिर कोई राजवंश से नही हैं बल्कि वो जमींदार हैं राजा महाराजाओं के समय इनके पूर्वज उनकी जमनो का लेखा जोखा रखा करते थे जब राजपाठ खत्म हुई तो ये लोग जमींदार बन गए और राजा महाराजाओं की परंपरा को कुछ इस तरह से जारी रखे हैं हालांकि उनको उनके परंपरा में किसी भी तरह की दिक्कत या परेशानी ना हो इसके लिए इन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की पार्टी तृणमूल का दामन थाम लिया इससे पहले वो सीपीएम का झंडा भी ढो चुके हैं बच्चू रॉय और शिवा रॉय


नेपाल से रिक्शे से यूपी पहुंचा दूल्हा, निकाह कर ले गया दुल्हन

नेपाल से रिक्शे से यूपी पहुंचा दूल्हा, निकाह कर ले गया दुल्हन

25-Oct-2020

Report:Pooja Singh

Place:Bahraich

भारत -नेपाल के बीच विवाद के बावजूद दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंध कितने मजबूत हैं इसका उदाहरण बीते शनिवार को देखने को मिला। एक दूल्हा अपनी दुल्हन को लेने के लिए रिक्शे से भारत पहुंचा। दरअसल कोरोना के बाद से ही भारत-नेपाल सीमा सील है। इसलिए कोई साधन नहीं चल रहा है। रिक्शे पर पहुंचे दूल्हे की चर्चा बहराइच में हर ओर हो रही है। सोशल मीडिया में भी फोटो वायरल हो रही है।

शनिवार को नेपाल के रफीक का निकाह उत्तर प्रदेश के बहराइच के रुपईडीहा में रहने वाली एक लड़की से होना था। रफीक ने बताया कि कई दिनों से साधन की तलाश कर रहा था पर कोई जुगाड़ नहीं चला। निकाह टालना उचित नहीं था इसलिए मैंने सोचा कि जाना है तो जाना है। मैं रिक्शा लेकर चल दिया। खुशी हूं कि निकाह हो गया। रिक्शे से ही अपनी दुल्हन को लेकर जा रहा हूं। 

आपको दें कि नेपाल देश का भारत से रोटी-बेटी का संबंध है और दोनों देश में रहने वाले लोगों की रिश्तेदारियां हैं। लेकिन लॉकडाउन होने के बाद दोनों देशों की सीमाएं भी सील हैं, जिससे आवागमन बंद है। बताया जा रहा है कि दुल्हा-दुल्हन को बीएसएफ ने बॉर्डर पार कराया। बॉर्डर बंद होने की वजह से दोनों देश में रहने वाले स्थानीय लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है। इस बीच नेपाल के स्थानीय लोग भी नेपाल सरकार से लगातार भारत से लगी सीमा को खोलने की मांग कर रहे हैं।

 


*राष्ट्रपति और राज्यपाल को छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ ने लिखा पत्र*

*राष्ट्रपति और राज्यपाल को छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ ने लिखा पत्र*

25-Oct-2020

 *शिक्षा को महंगा करने वालो पर धारा 124 ए० के तहत अपराध दर्ज करने की रखी मांग* 

 *राजनांदगाँव* ज्ञात हो कि भारत देश के हर नागरिक को मौलिक अधिकार प्राप्त है  संविधान में शिक्षा का अधिकार ( 21क.राज्य.छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बालको के लिए निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है ) लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण पूरे देश में लॉकडाउन की स्थिति निर्मित थी और इसी बीच पूरे देश में सभी शिक्षण संस्थाओं को भी बंद रखने का आदेश भारत सरकार का था ,विश्वव्यापी महावारी कोविड-19 कोरोना संक्रमण ने हमारे भारत देश को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है पूरे देश मे हाहाकार मचा हुआ है लोग दो वक़्त की रोटी के लिये तरस रहे है ,वही बात करे छत्तीसगढ़ प्रदेश की तो यहां पर भी यही स्थिति निर्मित है जिसके चलते पालक अभी फीस पटाने में सक्षम नहीं है परंतु प्रदेश के  निजी स्कूल संचालकों के द्वारा  एक  याचिका  दायर करवाई गई थी  शिक्षकों की सैलरी देने को आधार बनाया गया था जिस आधार पर  माननीय  उच्च न्यायालय बिलासपुर  के द्वारा  सभी निजी  स्कूलों को  सिर्फ  ट्यूशन फीस पालको से लेने के लिए  कहां गया था माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर के आदेशानुसार जो ट्यूशन फीस लेने के लिए निजी स्कूल संचालकों को छूट प्रदान की गई थी परंतु इन निजी स्कूल संचालकों के द्वारा मनमाने रूप से पूरे वर्ष की फीस पालको को जमा करने का दबाव बनाया जा रहा था जिससे चलते बहुत से पालक परेशान होकर पालक छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ के नेतृत्व में जिला शिक्षा अधिकारी राजनांदगाँव से मिले थे और वर्तमान की समस्याओ अवगत भी कराया था , वही जिला शिक्षा अधिकारी ने निजी स्कूलों के द्वारा पिछले वर्ष की अधिसूचित फीस जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय राजनांदगाँव में प्रस्तुत नही करते और ट्यूसन फीस को परिभाषित नही करते तब तक किसी भी पालक को फीस पटाने की आवश्यकता नही है यह मौखिक रूप से कहा था जिसका प्रमाणिक विडियो पालको के पास है ,वही शिक्षा अधिकारी द्वारा औपचारिक तरीके से निजी स्कूलों के विरुद्ध  अनुशासनात्मक  कार्यवाही किए जाने हेतु आदेश निकाला था लेकिन किसी भी निजी स्कूल इनके आदेश का पालन नहीं किया , निजी स्कूल और लगतार मनमानी करते रहे तो जिले के समस्त पालक एकजुट होकर छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ के बैनर तले एक दिवसीय सांकेतिक भूख हड़ताल भी की थी वहाँ समर्थन देने वर्त्तमान महापौर भी पहुची थी वही निजी स्कूलों की बिंदुओं पर विभागीय जाँच की मांग की गयी थी जिस पर जिला शिक्षा ने  7 दिवस के अंदर कार्यवाही का आश्वासन दिया था परंतु जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा आज पर्यन्त विभागीय जाँच प्रारंभ भी नही करवाई गई नही आज तक पूरे जिले में किसी निजी स्कूलों की जिला शिक्षा अधिकारी के द्वारा अब तक किसी भी निजी स्कूल की मान्यता समाप्ति की कार्यवाही भी अभी तक नही की , इससे यह प्रतीत होता है कि जिला शिक्षा अधिकारी निजी स्कूलों के संचालकों के साथ सांठगांठ कर हमारे भारत देश के संविधान का अक्षरस ह पालन नहीं कर रहे हैं और देश के आने वाले भविष्य उन छात्र छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं  सूत्रों से यह जानकारी भी प्राप्त हुई है जिला शिक्षा अधिकारी राजनांदगाँव निजी स्कूल संचालकों के साथ षड्यंत्र कर शिक्षा व्यवस्था को महंगा करने में लगे हुवे है ताकि देश का बच्चा शिक्षा प्राप्त न कर सके और अनपढ़ रह जावे इसलिये आज छत्तीसगढ़ छात्र पालक संघ ने देश के राष्ट्रपति और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल से शिक्षा को महंगा करने और देश को अशिक्षित रखने के षड़यंत्र में शामिल संबंधित विभाग के अधिकारी और निजी स्कूलों के संचालको के ऊपर आई०पी०सी० की धारा 124 ए० के तहत अपराध दर्ज करवाने शिकायत की  जिससे कि आने वाले समय में इस तरह का कृत्य कोई न दोहरा सके ।


कोरोनासुर’ का वध करती मां दुर्गा की इस प्रतिमा ने लोगों को दी उम्मीद!

कोरोनासुर’ का वध करती मां दुर्गा की इस प्रतिमा ने लोगों को दी उम्मीद!

24-Oct-2020

Report:Abdul Kalam

Place:Bengal

कोरोना वायरस महामारी के बीच देश दुर्गा पूजा सेलिब्रेट कर रहा है। भले ही, पंडालों में भीड़ कम हो। लेकिन त्योहार को लेकर लोगों में उत्साह कम नहीं है। सोशल मीडिया पर दुर्गा प्रतिमाओं की बहुत सी तस्वीरें वायरल हो रही हैं, जिनमें कोरोना काल की छाप है। फेसबुक यूजर Nittya Paul ने पश्चिम बंगाल के एक पंडाल से ऐसी ही शानदार प्रतिमाओं की तस्वीरें शेयर की हैं। इन फोटोज में मां दुर्गा को डॉक्टर और महिषासुर को ‘कोरोनासुर’ के रूप में दिखाया गया है

यह तस्वीरें यूजर ने 18 अक्टूबर को शेयर कीं। उन्होंने कैप्शन में बताया, ‘कोरोना से मां दुर्गा बचाएं। यह प्रतिमाएं सिलीगुड़ी में जितेन पॉल नाम के शिल्पी ने बनाई है।’ उनकी इस पोस्ट को आर्टिकल लिखे जाने तक 9 हजार से ज्यादा लाइक्स और 73 हजार शेयर मिल चुके हैं।

शशि थरूर ने भी मां दुर्गा की इस फोटो को शेयर किया और लिखा, ‘कोविड-19 थीम पर कोलकाता में मां दुर्गा की बेहतरीन प्रतिमा बनाई गई है। इस रचने वाले अज्ञात कलाकारों को प्रणाम!’ उनके इस ट्वीट को खबर लिखे जाने तक 15 हजार से अधिक लाइक्स मिल चुके हैं। फोटो में देखा जा सकता है कि मां दुर्गा की प्रतिमा को डॉक्टर का सफेद कोर्ट पहनाया गया है। उनके गले में स्टेथोस्कोप (आला) लटका है। साथ ही, उन्हें त्रिशूल की जगह विशाल इंजेक्शन से ‘कोरोनासुर’का वध करता दिखाया गया है।