आदर्श नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुए विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव

आदर्श नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुए विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव

10-Jul-2018

खुलासा पोस्ट मैगजीन 

वर्तमान छत्तीसगढ़ विधानसभा का समापन हुआ | कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव, इन 5 वर्षो  में  नेता प्रतिपक्ष के कार्यकाल के दौरान एक आदर्श नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुए, जिन्होंने छत्तीसगढ़ विधानसभा में कांग्रेस के लिए एक आदर्श स्थापित किया  है |

श्री टी.एस.सिंहदेव (बाबा) ने जिस शालीनता के साथ नेता प्रतिपक्ष के रूप में छत्तीसगढ़ विधानसभा में जनहित के मुद्दो को उठाया और शालीनता का परिचय दिया और लोकतंत्र के मन्दिर की गरिमा को बनाये रखा उससे कांग्रेस का गौरव बढ़ा है जबकि ऐसा बहुत कम राजनीति में देखने और सुनने को मिलता है, नेता प्रतिपक्ष जिनके कार्यो की प्राशंसा खुद मुख्यमंत्री डॉ रमनसिंह ने विधानसभा के अंतिम सत्र में किया है | बीते दिन छत्तीसगढ़ की मौजूदा विधानसभा का 15वां सत्र समाप्त हुआ  वर्तमान सरकार का यह अंतिम बजट सत्र भी था। एक दिन पहले ही सत्र की समाप्ति की घोषणा करते हुए स्पीकर गौरीशंकर अग्रवाल ने कहा कि चौथी विधानसभा संसदीय मूल्यों के संरक्षण और परंपराओं के परिपालन में एक आदर्श प्रस्तुत करने में सफल रही उन्होंने कहा कि इस सदन के प्रत्येक सदस्य ने उन्हें प्रदत्त भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। 

स्पीकर ने सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आपकी इस बचनबद्धता का मैं सम्मान करता हूं। यह सदन पक्ष-प्रतिपक्ष के भावों से ऊपर रहा है, न केवल प्रतिपक्ष के अपितु पक्ष के कई सदस्यों ने कई अवसरों पर जिस संजीदगी से सरकार के कार्यों की समीक्षा की और  आलोचना की और सुझाव दिए वे सभी बिंदु भविष्य में नजीर होंगे। 
कांग्रेस के लिए ये गौरव की बात है की नेता प्रतीपक्ष टी एस सिंह देव जैसे शालीन और सौम्य व्यक्तित्व और मृदु भाषी नेता मिले है जिनकी सभी प्रशंसा करते है, जो की दिखावा और आडम्बर से दूर रहने वाले नेताओ में गिने जाते है. जबकि वर्तमान कांग्रेस संगठन लोगो के चरित्र हनन, स्केंडल और दुनिया भर के कांडों को उजागर करने में लगा हुआ है, ऐसे कठिन घड़ी में कांग्रेस को टी.एस. बाबा जैसे नेता ही उबार सकते है |

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टी.एस. सिंहदेव विगत 5 वर्षो से नेता प्रतिपक्ष का दायित्व निभाते रहे और कांग्रेस की गौरवशाली परम्परा को बचाये रखा अन्यथा जिस तरह से कांग्रेस का प्रदेश नेतृव हथकंडे अपनाते आ रहा है उससे कांग्रेस की छवि को नुकसान उठाना पड़ रहा है ! इस बात में कोई दो राय नहीं है की टी.एस. बाबा छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के लिये वर्तमान में एक सर्वमान्य चेहरा और व्यक्तित्व हो सकते  है, जिन्होंने निर्विवाद रूप से नेता प्रतिपक्ष के दायित्व को निभाया जिस तरह की स्थिति से अभी कांग्रेस दो – चार हो रही है ऐसे समय में सभी कांग्रेसजनों और कार्यकर्ताओ को टी.एस. सिंहदेव जैसे निर्विवाद नेता ही मंज़ूर होगा क्योकि वे हमेशा गुटबाजी से दूर रहते हुए इन 5 वर्षो में अपनी अलग पहचान बनाई है |

टी एस बाबा ने कांग्रेस के लिए ईमानदारी और पूरी निष्ठा और समर्पण से अपने दायित्वों का निर्वहन किया है अब आगामी छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में टी.एस. सिंहदेव को यदि कांग्रेस आलाकमान पूरी जिम्मेदारी के साथ फ्री हैण्ड देकर उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ाया जाता है तो निश्चित ही कांग्रेस के लिए लाभदायक होगा और सभी कांग्रेस के कार्यकर्ता एक मत से इसे मानने को तैयार होंगे और निश्चित ही कांग्रेस के लिए आशाजनक परिणाम देखने को मिलेगा |


नशे का नशा, सबसे बडी बीमारी है

नशे का नशा, सबसे बडी बीमारी है

28-Jun-2018

दिल पे नशा ये भारी है, सबसे बडी बीमारी है। कुछ पल का नशा सारी उम्र की सजा। फिक्रमंदी बैगर अच्छे-अच्छों को नशे का नशा हो जाता है। नशा चीज ही ऐसी है भाई! फिर क्यों नशे का नशा ना हो। गुमानी में जिधर देखो ऊधर नशा ही है। रसास्वादन के चस्के से  चिपके रहना हर कोई चाहता है। आगोश में दिल का दस्तुर, दौलत का गुरूर, शिरत का शुरूर, ताकत का मगरूर और सुरत  का फित्तुर सिर चढकर बोलता है।

बरबस नशाखोरी की मदहोशी में अंगूर की बेटी हल्क में उतर जाए तो समझो सारी दुुनिया टल्लियों की मुठ्ठी में। मिला मौका हाथ से क्यों जाने दे, क्योंकि ये कोई दबाने की नहीं बल्कि रौब-रूदबे दिखाने की धधक का प्रदर्शन जो है। साथ बहाना भी बखुब है जनाब! मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूँ गम भुलाने को या मजे लेने को जो कुछ भी कहलिजिए मर्जी अपनी-अपनी। किन्तु खुदगर्जी में यह याद अवश्य रखे कि नशा, शान नहीं वरन् नाश का सबब है।

     बदसतुर, देश में नाबालिगों का नशे के प्रति बढता आकर्षण अंत्यत दुखदायी, चिंताजनक व विनाशकारी है। जिसकी कल्पना मात्र से ही रूहूं काप जाती है। मामला बहुत पेचीदा है। समस्या देखने में छोटी व सोचने में बडी और निपटारे में तगडी है। वजह साफ है लाखों जिंदगियों के साथ  घरों के घर बर्बाद होते जा रहे है। इसके कार्य-कारक और जिम्मेदार हम अपने आपको मानते है या नहीं यह यक्ष प्रश्न आज भी निरूत्तर बना हुआ है। आह्लादित फैशन व व्यसन से तरबतर आधुनिक युग में शादी-बरात का शराबी फुहड नाच हमारी सामाजिक मान-मर्यादा को जार-जार कर रहा है। बावजूद हम शान से नशे के नशा का बेशर्मी से लुत्फ उठा रहे है। जानते हुए कि नशा स्वंय के साथ परिवार, समाज और पूरे देश को निगल कर तबाह करते जा रहा है बाबजूद नशाखोरी की रनबेरी जोरों पर जारी है।

       गौरतलब हो कि नशे का आगाज आमतौर पर दोस्ती-यारी के कस्में वादों की मजबूरियोंं की बैशाखी पर कमसिन उम्र अच्छे-बुरे की सोच से बेखबर महफिल  की  खुशी और मर्दानगी के वास्ते होता है। जो आगे चलकर नासुर  लत बनकर आदतन अपराधी बनाने की कब्रगाह बन जाती है। निकला नशीला बारूद नशे की गुलामी में जकडकर सामाजिक-आर्थिक-मानसिक और शारीरिक तौर पर नशेडी को अपना निवाला बना लेता है। जो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फसकर आजादी की तमना लिए जमींजोद होकर रह जाता है। बजाए नशा का चलन घटने के अफरातीन शानो-शौकत से बढते ही जा रहा है। अफरातफरी में  कारगुजारी वाले नशे के कारोबार ने दिनदुनी रात चौगनी तरक्की कर सारी दुनिया में अपना डंका बजा दिया । तभी तो जिसे देखो वह एम्पोर्ट  और एक्सपोर्ट की दुहाई देते नहीं थकता। तरफदारी में एक का दो करने की जुगत में नशीले घातक पदार्थो के अंदर बाहर का खेल चरम पर है।

        जहां तक बात है, नशे के रूप की तो सौदागरों ने यहां भी बाजी मारी है। इनके तरकश के तीरों में पुरातन शराब, तम्बाखू, बीडी, सिगरेट, हुक्का, गांजा, अफीम, चरस के साथ ताजातरीन कोकिन, ब्राउन शुगर, हेरोइन, गुटका पाऊच, फेवीक्विक, सेलुसन, पेट्रोल, नींद-खांसी की दवायें और सर्प विष इत्यादि बेशुमार मादक असला है। उन्माद में नशे की लत जो जारी है ये बहुत ही अत्याचारी है, मेलें लगते है शमशानों में आज इसकी तो कल उसकी बारी है। ऐसे में चारों तरफ है, हाहाकार बंद नशे का हो बाजार। उम्मीदें हो रही तार-तार और नशा बनते जा रहा है विकराल व्याभिचार, चंगुल में फस गए बेगुनाह बीमार हजार। अलबत्ता परहेज करने के सरकारों ने तिजोरी भरने खुलेयाम बनाऐ रखे है ठेकेदार।

     सरोकार, अब अभिशाप बन चुके नशे को नाश करने जिदंगी को हां और नशे का ना हर हाल में कहना ही पडेगा। वरना घर बिखरते, बच्चे बिछडते, मांग उजडते, जहर फैलते, रोगी बनते, सम्मान घटते और भविष्य पिछडते देर नहीं लगेगी। बेहतर नशे को छोडो, रिश्ते जोडो और बीमारी को लताडो। तभी हर दिल की अब ये चाहत नशा मुक्त हो मेरा भारत सार्थक होगी।

( प्रस्तुत लेख श्री हेमेन्द्र क्षीरसागर जी के हैं वे लेखक व विचारक हैं )


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का खेवनहार कौन ?

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का खेवनहार कौन ?

26-Jun-2018

एम.एच.जकरीया  

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का खेवनहार कौन ? आने वाले विधानसभा चुनावों में ये यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा हुआ है, क्योंकि वर्तमान प्रदेश नेतृत्व जिस तरह से एकला चलो की रणनीति पर चल रही है उससे वरिष्ठ कांग्रेसजन और कार्यकर्ता संतुष्ट नहीं दिख रहे है ! छत्तीसगढ़ में CD काण्ड के बाद प्रदेश नेतृत्व का छिछा लेदर तो हुआ ही है जनता के बीच भी गलत सन्देश गया है, कांग्रेस जैसा महान संगठन और किसी दूसरे के बेडरूम का अन्तरंग CD बनाकर प्रचारित करना ये किस तरह का राजनैतिक सन्देश दिया गया है कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को क्या इन सब बातों से शर्मिंदगी महसूस नहीं होती होगी,  कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को क्या इन सब बातों से शर्मिंदगी महसूस नहीं होती होगी  ,क्या टेलीफोन टेप कांड और CD काण्ड जैसे मुद्दों से वर्तमान प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व चुनाव लड़ना  चाहती है ? 

विगत 15 वर्षो से कांग्रेस के कार्यकर्ता चुनाव जितने का सपना संजोये हुए है लेकिन जिस तरह से इन हारे हुए नेताओ को बार बार टिकट दिया जाता है ऐसे जान पड़ता है कांग्रेस की राजनीति में कोई और योग्य नेता है ही नहीं ! कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी से कुछ बदलाव की उम्मीद तो है लेकिन प्रदेश प्रभारी जी की ख़ामोशी और प्रदेश नेतृत्व का अड़ियल रवैय्या कार्यकर्ताओ को कही फिर निराश ना कर दे !

यकीनन आज कांग्रेस दोहरे संकट से गुजर रही है, यह संकट अंदरूनी और बाहरी दोनों है लेकिन अंदरूनी संकट ज्यादा गहरा है, संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि इसके घेरे में प्रदेश कांग्रेस के सभी नेता कही ना कही जिम्मेदार है। झीरम कांड के बाद पार्टी की विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की इच्छा शक्ति ही खत्म हो गई लगती है और सब-कुछ व्यक्ति विशेष लोगो के भरोसे छोड़ दिया गया है, बाकी सभी को इन नेताओ से वफ़ादारी दिखाने का ही विकल्प दिया गया है, लेकिन वर्तमान नेतृत्व  खुद अपना भरोसा खोता जा रहा है यहाँ जवाबदेही का घोर अभाव दिख रहा है | 

संगठन में बोलने की किसी को भी आज़ादी नहीं है क्योकि बोलने वाले प्रभावशाली लोगो को दरकिनार कर दिया गया है वर्तमान प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ एक तरफ़ा चल रहा है ! आज वास्तविकता में प्रदेश कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर काम नहीं कर पा रही है,  सब कुछ किसी चमत्कार के उम्मीद के भरोसे छोड़ दिया गया है। कांग्रेस को पुन: ताकतवर बनाना अकेले नेता के बस की बात नहीं होती इसमे पुरे संगठन को विश्वास में लेना होता है और छत्तीसगढ़ में संगठन में एक जुटता हर किसी के बस की बात नहीं है ।

प्रदेश में लोकतंत्र की मजबूती के लिए राज्य में कांग्रेस की मौजूदा हालत बेहद चिंतनीय है। सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की पहली शर्त है, लेकिन वास्तव में क्या ऐसा वर्तमान में हो रहा है ? इन बीते 5 वर्षों में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की जनता के लिए ऐसे कितने मुद्दे उठाये ये समझने वाली बात है लेकिन एक कमज़ोर विपक्ष के रूप में ज़रूर जाना जाएगा जिसने नीतिगत मुद्दे को छोड़ धरना - प्रदर्शन और हल्ला बाज़ारी के अलावा कुछ भी नहीं किया इससे जनता को क्या लाभ हुआ ये ज़रूर सोचने वाली बात है ? हाल ही में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी के छत्तीसगढ़ में आने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओ में उम्मीद की किरण जागी थी वो भी अब कही दिखाई नहीं दे रहा है, कांग्रेस को ज़रूर उम्मीद है कि घर वापसी अभियान उनके लिए कुछ कारगर साबित होगा.

लेकिन रूठो को मनाने की फ़ितरत पार्टी प्रमुख में नहीं है क्योकि उनका अहंकार इसकी इजाजत नहीं देता शायद ये उनके शान के खिलाफ है खैर कहा तो यही जा रहा है की कांग्रेस पार्टी ने अपने पुराने नेताओं को वापस कांग्रेस प्रवेश कराने के लिए प्लान तैयार किया है. लेकिन धरातल में यहाँ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है ? ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस चुनाव में कैसे उतरेगी ये तो आने वाला समय ही बता सकता है |

 


शि‍क्षा और स्वास्थ से कब तक दूरियां

शि‍क्षा और स्वास्थ से कब तक दूरियां

21-Jun-2018

(हेमेन्द्र क्षीरसागर)

 रोटी-कपडा-मकान जीवन के अनिवार्य तत्व थे,  दौर में दवाई-पढाई-कमाई-आवाजाई और वाई-फाई जुड गए हैं । क्या इनके बिना अब जीवन की कल्पना की जा सकती हैं, कदाचित नहीं ! हम बात करें शि‍क्षा और स्वास्थ्य की तो वह दयानतहारी बनी हुई हैं, उसमें सुधार की और अधि‍क गुजांईश है। गौरतलब संविधान में शि‍क्षा और स्वास्थ्य मौलिक अधिकारों में शामिल हैं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ये दोनों ही मौलिक आवश्यकताऐं अभी भी आम आदमी से दूर ही हुए है। यह दूरियां कब तक बनी रहेंगी यह यक्ष प्रश्न झंझकोरता है। हालातों में एक गरीब बेहतर इलाज और अच्छी तालीम के लिए तरसता है। आखिर! यह व्यथा इन्हें कब तक झेलनी पडेगी नामूलम है।

खोजबीन में मुख्य वजह शि‍क्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार की बार-बार बदलती नीतियां, भ्रष्टाचार और जिम्मेवारों की गैरजवाबदेही सामने आती हैं। कारणवश शि‍क्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी संस्थानों न तमाम लूट खसोट के बावजूद अपनी जडें जमा ली हैं। अब तो सरकार, सरकारी स्कूलों को भी निजी हाथों में सौपने की तैयारी में हैं। अमलीजामा में जरूरतमदों के लिए स्वास्थ्य के साथ-साथ शि‍क्षा भी दूभर हो जाएगी।

अलबत्ता, सरकारों ने भले ही शि‍क्षा का अधिकार अधिनियम, शि‍क्षा गारंटी, सर्वशि‍क्षा और स्कूल चलो अभियान जैसी महत्वकांक्षी योजनाएं तो बनाई पर वास्तविकता यह है कि सरकारी स्कूलों में न बैठने की जगह हैं, न शि‍क्षक, न आधुनिक शि‍क्षा के संसाधन। अब सरकारी स्कूलो के हालात यह हो गये हैं कि आम इंसान तो क्या एक राह चलता भिखारी भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतरा रहा हैं।

फिलहाल, निजी शालाओं में जब लोग बच्चों को दाखिला दिलाने के लिये जाते हैं तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती हैं। सर्वाधिक लूटखसोट बडे समूह द्वारा संचालित ऑलीशान भवनों से सुस्सजित महिमा मंडितों से विभूषित राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय और बोर्डिंग नाम से युक्त सीबीसीई मान्यता प्राप्त व जैसी अग्रेंजी स्कूलों में होता हैं। जहॉ अनाप-शनाप शुल्क और विविध पोशाके, पुस्तकें, प्रतियोगिता, प्रवेश परीक्षा आदि गतिविधियुक्त स्कूलों में प्रवेश के लिए भारी जतन-यतन किये जाते हैं। विपरित स्थानीय आवश्कताएं आधारित ताम-झाम विहिन हिन्दी व अग्रेंजी माध्यम धारित स्कूलों में शि‍क्षा अध्ययन की लालसा कम होती जा रही हैं। मूलतः शि‍क्षा की चिंता किए बिना, अच्छा स्कूल चाहता है देश, स्कूल की चिंता किए बिना, अच्छा देश चाहते है लोग।।

      भांति ही सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नहीं अनेक योजनाएं तो बनाई हैं, लेकिन उन योजनाओं में कभी बजट नहीं रहता और रहता भी हैं तो अमल में नहीं लाया जाता, तो कभी उनका लाभ पात्रों को नहीं मिल पाता। इसी बीच चिकित्सकों, नर्सिग व पॅरामेडिकल कर्मीयों और पैथोलॉजी, रक्त व नेत्र बैंक, रेडियोलॉजी उपकरण की कमी सहित मूलभूत भवन, वाहन अनुलब्धता में आमजन सुलभ स्वास्थ्य उपचार से वंचित रह जाते हैं। तथापि पहुंच विहिन, असहाय अस्वस्थ्य का इलाज कैसे होगा यह गंभीर सवाल आह्रलादित करता हैं। वीभत्स, सरकारी अस्पतालों में बेबश, लाचार लोग ही इलाज कराने पहुंचते हैं वरना निजी चिकित्सालयों में मरीजों की लंबी कतार लगी रहती है।

मद्देनजर, हालिया देश में औसतन 20 हजार की जनसंख्या में एक चिकित्सक उपलब्ध है। पूर्व में उल्लेखित वीओएचआर  (वोर) कमेटी की अनुशंसानुसार पांच हजार की आबादी पर एक चिकित्सक होना चाहिए, जो प्रभावी नही हुआ हैं। हिसाब से आज हजारों की संख्या में चिकित्सकों की आवश्कता है। इसकी पूर्ति चिकित्सकों की संख्या में भारी वृद्धि करके की जा सकती है। तब ही मांग के अनुसार पूर्ति होगी, इस अनापूर्ति से कैसे समग्र उपचार का लक्ष्य अर्जित होगा। यह एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है? यह तो ‘एक अनार सौ बीमार ‘ कथन का चरितार्थ है। इस पर शासन-प्रशासन को गंभरीता से विचार कर सर्वोचित हल निकालना ही होंगा। अन्यथा अस्पतालो, चिकित्सकों के अभाव में झोला छाप डॅाक्टर, झांड-फूंक या तंत्र-मंत्र पद्धति से आम जन अपना उपचार ग्रहण कर जान बचायेगें या देगें....!

वस्तुतः शासकीय स्कूलों और चिकित्सालयों की स्थिती में अमूल-चूल नव-परिवर्तन लाकर शासकीय योजनाओं को कागजों पर चिपकाये ना रखकर धरातल पर लाना ही एकमेव हल हैं। दायित्व मात्र सरकारी तंत्रों व पहरेदारों का ही नहीं वरन् हम सब का नैतिक कर्तव्य हैं, इसे हरहाल में निर्वहन करना पडेगा तभी दूरियां नही अपितु नजदीकियां बढेंगी।

 हेमेन्द्र क्षीरसागरलेखक व‍ विचारक


देश बदलना है तो देना होगा युवओ को सम्मान

देश बदलना है तो देना होगा युवओ को सम्मान

26-May-2018

नीलम महेंद्र जी का लेख  

 

भारत एक युवा देश है। इतना ही नहीं , बल्कि युवाओं के मामले में हम विश्व में सबसे समृद्ध देश हैं। यानि दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा युवा हमारे देश में हैं। भारत सरकार की यूथ इन इंडिया,2017 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 1971 से 2011 के बीच युवाओं की आबादी में 34.8% की वृद्धि हुई है। बता दिया जाए कि इस रिपोर्ट में 15 से 33 वर्ष तक के लोगों को युवा माना गया है।


इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन में युवाओं की संख्या जहां कुल आबादी की 22.31% होगी, और जापान में यह 20.10% होगी, भारत में यह आंकड़ा सबसे अधिक 32.26% होगा। यानी भारत अपने भविष्य के उस सुनहरे दौर के करीब है जहाँ उसकी अर्थव्यवस्था नई ऊँचाईयों को छू सकती है।
लेकिन जब हम युवाओं के सहारे देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की बात करते  हैं तो इस बात को समझना आवश्यक है कि, युवा होना केवल जिंदगी में जवानी का एक दौर नहीं होता जिसे आंकड़ों में शामिल करके गर्व किया जाए। यह महज उम्र की बात नहीं होती। यह विषय उस से कहीं अधिक होता है।
यह विषय होता है असीमित सम्भावनाओं का।
यह विषय होता है सृजनात्मकता का।
यह विषय होता है  कल्पनाओं की उड़ान का।
यह विषय होता है  उत्सुकता का।
यह विषय होता है  उतावलेपन के दौर का।
यह समय होता है ऊर्जा से भरपूर होने का।
यह समय  होता है सपनों को देखने और उन्हें पूरा करने का।
यह दौर होता है हिम्मत।
कहा जा सकता है कि युवा या यूथ चिड़िया के उस नन्हे से बच्चे के समान है जो अभी अभी अपने अण्डे को तोड़कर बाहर निकला है और अपने छोटे छोटे पंखों को फैलाकर उम्मीद और आजादी के खुले आकाश में उड़ने को बेकरार है।
यह बात सही है कि किसी भी देश के युवाओं की तरह हमारे देश के युवाओं में भी वो शक्ति है कि वो भारत को एक विकासशील देश से बदलकर एक विकसित देश की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दें।
इस देश से आतंकवाद और दहेज जैसी  समस्याओं को जड़ से मिटा दे।
लेकिन जब हम बात करते हैं कि हमारे युवा देश को बदल सकते हैं तो क्या हम यह भी सोचते हैं कि वो कौन सा युवा है जो देश बदलेगा?
वो युवा जो रोजगार के लिए दर दर भटक रहा है?
वो युवा जिसकी प्रतिभा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है?
वो युवा जो वंशवाद का मुखौटा ओढ़कर स्वयं को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है?
वो युवा जो देश में अपनी प्रतिभा को उचित सम्मान न मिलने पर विदेशी कंपनियों में नौकरी कर देश छोड़कर चले जाने के लिए विवश हैं?
वो युवा जिसके हाथों में डि्ग्रियाँ तो हैं लेकिन विषय से संबंधित व्यवहारिक ज्ञान का सर्वथा अभाव है?
वे साक्षर तो हैं शिक्षित नहीं?
शिक्षित तो छोड़िए संस्कारित भी नहीं?
या वो युवा जो कभी तीन माह की तो कभी तीन साल की बच्ची तो कभी निर्भया के बलात्कार में लिप्त है?
वो युवा जो आज इंटरनेट और सोशल मीडिया साइट्स की गिरफ्त में है?
या फिर वो युवा जो कालेज कैम्पस में किसी राजनैतिक दल के हाथों का मोहरा भर है?
तो फिर कौन सा युवा देश बदलेगा?
इसका जवाब यह है कि परिस्थितियां बदलने का इंतजार करने के बजाए हम स्वयं पहल करें।
अगर हम चाहते हैं कि युवा इस देश को बदले तो पहले हमें खुद को बदलना होगा।
हम  युवाओं का भविष्य तो नहीं बना सकते लेकिन भविष्य के लिए युवाओं को तैयार तो कर ही सकते हैं।
हमें उन्हें सही मायनों में शिक्षित करना होगा।
उनका ज्ञान जो किताबों के अक्षरों तक सीमित है उसे व्यवहारिक ज्ञान की सीमाओं तक लाना होगा।
उसे वो शिक्षित युवा बनाना होगा जो नौकरी देने वाला उद्यमी बने, एक एन्टरप्रेन्योर बने न कि नौकरी ढूंढने वाला एक बेरोजगार।
उन्हें शिक्षित ही नहीं संस्कारित भी करना होगा।
उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ना होगा।
पैसों से ज्यादा उन पर समय खर्च करना होगा।
उन्हें प्रेम तो हम देते हैं सम्मान भी देना होगा।
हमें उन युवाओं का निर्माण करना होगा जो देश के सहारे खुद आगे जाने के बजाय अपने सहारे देश को आगे ले जाने में यकीन करते हों।
हमें सम्मान करना होगा उस युवा का जो सड़क किनारे किसी बहते हुए नल को देखकर चुपचाप निकल जाने के बजाय उसे बन्द करने की पहल करता है।
हमें आदर करना होगा उस युवा का जो कचरा फेंकने के लिए कूड़ादान ढूँढता है लेकिन सड़क पर कहीं पर भी नहीं फेंक देता।
हमें अभिवादन करना होगा उस युवा का जो भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेकने के बजाय लड़ना पसंद करता है।
हमें समादर करना होगा उस  युवा का जो दहेज लेने से इंकार कर देता है।
हमें इज्ज़त देनी होगी उस युवा को जो महिलाओं का सम्मान करना जानता हो उनका बलात्कार नहीं।
हमें सत्कार करना होगा उस युवा का जो फूलों का बगीचा लगाने में विश्वास करता है फूल तोड़ने में नहीं।
और यह हर्ष का विषय है कि ऐसे युवा हमारे देश में, हमारे समाज में,हमारे आसपास हमारे बीच आज भी हैं, बहुत हैं। आज जब हमारा सामना ऐसे किसी युवा से होता है तो हम मन ही मन में उसकी प्रशंसा करते हैं और निकल जाते हैं। अब जरूरत है उन्हें ढूंढने की और सम्मानित करने की। आवश्यकता है ऐसे युवाओं को प्रोत्साहित करने की।एक समाज के रूप में, एक संस्था के रूप में
ऐसे युवाओं को जब देश में सम्मान मिलेगा, पहचान मिलेगी, इन्हें शेष युवाओं के सामने यूथ आइकान और रोल मोडल बनाकर प्रस्तुत किया जाएगा, तो न सिर्फ यह इसी राह पर डटे रहने के लिए उत्साहित होंगे बल्कि देश के शेष युवाओं को उन की सोच को एक लक्षय मिलेगा एक दिशा मिलेगी।  जब हमारे देश के युवा सही दिशा सही और लक्षय पर चल निकलेंगे तो सही मायनों में यह कहा जा सकता है कि आने वाला कल भारत का ही होगा।
डॉ नीलम महेंद्र

 


असमंजस में छत्तीसगढ़ कांग्रेस, तय नहीं प्रतिद्वंदी कौन !

असमंजस में छत्तीसगढ़ कांग्रेस, तय नहीं प्रतिद्वंदी कौन !

21-May-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

छत्तीसगढ़ में राहुल गाँधी का दौरा बहुत से मायनों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिये कई सारे सवाल छोड़ गया है ?  की छत्तीसगढ़ में काँग्रेस का मुख्य प्रतिद्वंदी कौन है ? भा.ज.पा या अजित जोगी की जोगी कांग्रेस, क्योंकि जिस तरह से काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भाजपा को दर किनार कर के प्रदेश कांग्रेस के जिम्मेदार लोगो के द्वारा अजित जोगी के क्षेत्र में राहुल गांधी जी की सभा का आयोजन किया जाना क्या राष्ट्रीय अध्यक्ष को सीधे जोगी परिवार से भिड़ाने की जुगत तो नहीं थी खैर जो भी हो लेकिन मरवाही की उस सभा से राहुल गांघी जी की शख्सियत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, क्योंकि मरवाही विधानसभा क्षेत्र की दोनों सभाओं में आने वाले तो कांग्रेसी विचारधारा के लोग ही थे या राहुल गांघी जी को देखने औऱ सुनने आई भीड़ थी ?

 जिस तरह से कांग्रेस के लोकप्रियता का ग्राफ इन प्रदेश के नेताओं के कारण गिरता जा रहा है उसका ताजातरीन उदाहरण कर्नाटक से बेहतर समझा जा सकता है, छत्तीसगढ़ में होने वाले आगामी  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कितनी मज़बूती के साथ चुनावी समर में कूदती है  ये तो आने वाला समय ही बताएगा.  लेकिन, यह छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय ज़रूर बना हुआ है की काँग्रेस का असली प्रतिद्वंदी कौन है भा.ज.पा या जोगी जनता कांग्रेस ?

जनता जानती भी है और अच्छे से समझती भी हैं और प्रदेश के कई बड़े दिग्गज नेता भी दबी जुबान से कह रहे है की राहुल गाँधी जी की सभा मरवाही में नहीं होना था अब ये काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांघी जी को तय करना है कि छत्तीसगढ़ के इस दौरे में जो हुआ वो कितना उचित - था और कितना अनुचित इसका नतीजा तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन उसी दिन अजित जोगी की सभा का होना और जन सैलाब का उमड़ना राहुल गांधी जी को सीधे जोगी जी से भिड़ाने वाली गुस्ताखी ही कही जा सकती है, क्योकि काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को क्या इतने से छोटे क्षेत्र  में सभा करना कितना ज़रूरी था उनकी सभा छत्तीसगढ़ में अन्यत्र कही भी हो सकता था, क्योंकि सरगुजा में हाल ही में आदिवासी समाज के पत्थलगड़ी का ताजातरीन मामला एक मुद्दा बना हुआ था ये सभा वहाँ भी किया जा सकता था जो की आदिवासियों का राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन सकता था.

क्या ये बात काँग्रेस के प्रभारी पी.एल. पुनिया नहीं जानते थे कि अभी छत्तीसगढ़ में क्या राजनीतिक मुद्दा बेहतर होगा या जान बूझकर अजित जोगी परिवार से सीधे भिड़ाने की क्यों कोशिश की गई ? 

 अभी हाल ही में कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को जिस तरह से JDS से समझौता करना पड़ा और जिस तरह से सत्ता गंवानी पड़ी है उससे तो सबक ले सकते थे " राजनीति में विरोधी पार्टी से दुश्मनी करो लेकिन इतनी ही करो की दोस्ती की इतनी गुंजाइश रहे  की आगे जब मिले तो शर्मिंदा ना हों" "  अब ये अलग बात है कि प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष की निजी दुश्मनी काँग्रेस के लिये इस चुनाव में कहीं काल ना बन जाये ।

ये जग जाहिर है, की छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के समय से प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष महोदय का जोगी जी से नहीं बनता है,  और मध्यप्रदेश के कथित उनके राजनीतिक आका की भी जोगी जी से खुन्नस रही हैं, और उन्ही के इशारों पर ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का नेतृत्व तय होता रहा है, अब ये अलग बात है कि गोवा में काँग्रेस के मात खाने के बाद उनके आका नेपथ्य में चले गए हैं। 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को इसका नतीजा आज तक भुगतना पड़ रहा है । क्योंकि झीरम घाटी में कांग्रेस के सभी नेता शहीद हो गए और काँग्रेस का नेतृत्व लगभग शून्य हो गया था, अब बचे हुए अन्य नेताओं को काँग्रेस का नेतृत्व मिला जो संगठन और कार्यकर्ताओ को सम्भाल नहीं पा रहे है, इससे बेहतर अध्यक्ष तो चरणदास महन्त ही है जो छत्तीसगढ़ की राजनीति में पकड़ रखते हैं और कार्यकर्ताओ की नब्ज को ठीक से पहचानते तो है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें सही ढंग से सम्हलने का समय नहीं मिला जिसके चलते काँग्रेस सत्ता से दूर हो गई लेकिन वोटों का आंकलन किया जाए तो काँग्रेस का प्रदर्शन 2013 में बेहतर था ।

 


राहुल के मुकाबले में जोगी का जादू चला

राहुल के मुकाबले में जोगी का जादू चला

18-May-2018

पेंड्रा (मरवाही ) में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने 17 मई को पेंड्रा के फिजिकल कालेज मैदान में आयोजित आदिवासी और किसान सम्मेलन को संबोधित किया। जबकी ठीक उसी दिन उसी विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस कोंग्रेस के राष्ट्रिय अध्यक्ष राहुल गाँधी की सभा का आयोजन किया गया ! भीड़ और जन सैलाब बताते है की राहुल गांधी के मुकाबले जोगी जी की सभा में भीड़ ने अजित जोगी की ताक़त का अंदाज़ा लगवा ही दिया छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस संगठन को जोगी जी की इस सभा में रायपुर साइंस कॉलेज मैदान से दोगुनी भिड़ और कोटमी कांग्रेस की सभा से 10 गुना ज्यादा जनसैलाब उमड़ा।जोगी जी ने   कार्यकर्ताओं को सरकार बदलने का संकल्प दिलाया और वादा किया कि सत्ता में आने पर वे 20 लाख युवाओं को रोजगार देंगे।

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कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की कोटमी में आयोजित सभा पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि वे भाजपा से टक्कर लेने के लिए नहीं, हमसे लड़ने आए हैं। राहुल गांधी की कोटमी की सभा से ज्यादा यहां जुटी भीड़ ने साबित कर दिया है कि अबकी बार जोगी सरकार बनकर रहेगी।
जोगी ने कहा कि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की कार्ययोजना का संकलप पत्र वे हाईकोर्ट को दे चुके हैं। सत्ता में आते ही इन घोषणाओं पर अमल किया जाएगा। किसानों का कर्ज माफ करेंगे और धान का समर्थन मूल्य 2500रुपए प्रति क्विंटल किया जाएगा। 300 रुपए बोनस भी देंगे। उन्होंने पेंड्रा, गौरेला, मरवाही सहित प्रदेश के अन्य जगहों को जिला बनाए जाने का ऐलान किया।
ने कहा कि उनकी हमारी सरकार बनते ही आदिवासी वनवासी हितों में सबसे पहले काम शुरू किए जाएंगे। तबियत खराब होने की वजह से जोगी ने मंच पर आते ही संबोधन शुरू कर दिया और उद्बोधन खत्म कर चले गए।

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सभा में मरवाही विधायक अमित जोगी ने कहा कि उनकी पार्टी गरीब है इसलिए भीषण गर्मी के बावजूद टेंट तक नहीं लगवा पाए। राहुल की धनवान पार्टी ने डोम लगाकर सभा की। उन्होंने कहा कि यहां भीड़ नहीं जनसैलाब आता है। उनकी पार्टी के लोग छत्तीसगढ़ के रक्षक है।

अमित ने कहा कि अब हमारी ताकत देखकर भाजपा को सत्ता जाने का और कांग्रेस को हमारी पार्टी के सत्ता में आने का डर सताने लगा है। अमित ने मरवाही में चार साल से लगातार पड़ रहे सूखे के बाद भी एक भी पलायन नहीं होने का दावा किया और जोगी के कार्यकाल में कराए गए विकास कार्यों की उपलब्धियां गिनाईं। सभा को बिल्हा विधायक सियाराम कौशिक ने भी संबोधित किया।

अजीत जोगी ने गौरेला में मीडिया से कहा कि पूरा माहौल जोगीमय हो चुका है। राहुल गांधी के प्रदेश के दौरे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। यहां कोई चुनौती नहीं, माहौल एकतरफा हमारे पक्ष में है।

जोगी ने दावा किया कि राहुल की सभा से उनकी सभा कई गुना ज्यादा अच्छी रही। गोंड़वाना गणतंत्र पार्टी के सुप्रीमो हीरासिंह मरकाम को अपना छोटा भाई बताते हुए जोगी ने कहा कि आगामी चुनाव में किसी भी पार्टी से गठबंधन पर आने वाले दिनों में विचार करेंगे। जोगी ने कहा कि वे और हीरासिंह भाई तो हैं इसमें कोई संदेह नहीं है, वे उनके बड़े भाई हैं।

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के सुप्रीमो अजीत जोगी की आज पेंड्रा में आयोजित सभा में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता, आदिवासी और ग्रामीण जुटे। इससे कार्यकर्ता उत्साहित नजर आए। जनता कांग्रेस के हरिसिंह पोर्ते ने कहा कि भीषण गर्मी के बावजूद लोग दूर-दूर से पहुंचे। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है।


मॉं का बंटवारा

मॉं का बंटवारा

17-May-2018

   ( हेमेन्द्र क्षीरसागर, लेखक व विचारक )
     माँ है तो हम है, हम है तो जहान हैं। मॉं की छाव से बडी कोई दुनिया नहीं। मॉं के चरणों में जन्नत हैं, और उस जन्नत की मन्नत सदा-सर्वदा हम पर आसिन हैं। मॉं की बरकत कभी भेदभाव नहीं करती वह समान रूप से सभी बच्चों पर बरसती हैं। मॉं के लिए कोई औलाद तेरी-मेरी नहीं बल्कि मेरी ही होती हैं। एक माँ के आंचल में सब बच्चे समा जाते हैं पर सब बच्चों के हाथों में एक मॉं नहीं समा सकती, इसीलिए मेरी मॉं, तेरी मॉं की किरकिरी में मॉं परायी हो जाती हैं। क्यां मॉं का भी बंटवारा हो सकता हैं आज मेरी तो कल तेरी और परसों किसी की नहीं। हालात तो बंटवारे की हामी भरते है बानगी में वक्त के साथ-साथ खून का अटूट बंधन ममता के लिए मोहताज हो जाता हैं। मॉं बेटा-बेटा कहती हैं और बेटा टाटा-टाटा कहता हैं।
   वाह! रे जमाना तेरी हद हो गई जिसने दुनिया दिखाई वह सरदर्द होकर तोल मोल के चक्कर में बेघर हो गई। यह एक चिंता की बात नहीं वरन् चिंतन की बात हैं कि आखिर ऐसा क्यों और किस लिए हो रहा है? इसका निदान ढूंढे नहीं मिल रहा है या ढूंढना नहीं चाहते हैं। चाहे जो भी इस वितृष्णा में दूध का कर्ज मर्ज बनते जा रहा है जो एक दिन नासुर बनकर मानवता को तार-तार कर देगा, तब हमें अहसास होगा कि माता,  कुमाता नहीं हो सकती अपितु सपूत कपूत हो सकते हैं।
  बहरहाल, पूत के पांव जब पालने में होते है तब से वो मॉं, मॉं की मधुर गुजांर से सारे जग को अलौकिक कर देता हैं। अपनी मॉं के लिए रोता हैं, बिलकता हैं और तडपता हैं मॉं की गोद में बैठकर निवाला निगलता हैं। उसे तो चहुंओर मात्र दिखाई पडती है तो अपनी मॉं  और मॉं, मॉं कहकर अपनी मॉं पर अपना हक जताता हैं। यही ममतामयी माया मॉं-बेटे के अनमोल रिश्ते का बेजोड मिलन हैं। लगता है यह कभी टूटेगा नहीं पर काल की काली छाया इस पवित्र बंधन को जार-जार करने में कोई कोर कसर नहीं छोडती। देखते ही देखते मेरी मॉं, तेरी मॉं और दर-दर की मॉं बन जाती हैं।
  दरअसल, जवान जब आधुनिक व भौतिकी उलझन में नफा-नुकसान का ख्याल करते है। तब बूढे मॉं-बाप बेकाम की चीज बनकर बोझ लगने लगते हैं। जब इनसे कोई फायदा नही तो इन्हें पालने का क्यां मतलब? जिसने कोख में पाला उसकी छाया बुरी है।  इसी मानस्किता को अख्तियार किये तथाकथित बेपरवाह खूदगर्ज अपनी जननी को तेरी मॉं-तेरी मॉं बोलकर अपनी जिम्मेदारियों से छूटकारा चाहते है। वीभत्स चौथे पहर में पनाह देने के बजाय वृद्धाश्रम में ढकेल कर या कूड-कूडकर जीने के लिए हाथों में भीख का कटोरा थमा देते है। जहां वह बूढी मॉं मेरे बेटे-मेरे बेटे की करहाट में दम तोडने लगती हैं कि कब मेरा बेटा आएगा और प्यार से दो बूंद पानी पिलाएंगा।
   हां! ऐसे कम्बखतों को फिक्र होगी भी कैसे! कि मॉं के बिना जीना कैसा। जा के पूछे उनसे जिनकी मॉं नहीं है! वे तुम्हें बताएगें कि मॉं होती क्या है! और नसीब वाले भाई-भाई लडते हो कि मॉं तेरी हैं, मॉं तेरी हैं। यह कौन सा इंसाफ है कि बचपन में मॉं मेरी और जवानी मॉं तेरी! तेरी नही तो फिर बूढी मॉं किसकी! अच्छा नहीं होगा कि मॉं को हम अपनी ही रखे क्योंकि मॉं तो मॉं होती है तेरी ना मेरी चाहे वह जन्म देने वाली हो या पालने वाली किवां धरती मॉं हो। वह तो हमेशा बच्चों का दुःख हर लेती है और सुख देती हैं। तो क्या हम उस मॉं को जिदंगी के अंतिम पडाव में बांट दे या सुख के दो निवाले और मीठे बोल अर्पित कर दे। ये जिम्मेदारी अब हमारी है पेट मे सुलाने वाली मॉ को पैरों में सुलाये या उसके पैरों को दबाये। समर्पित, स्मरणित अभिज्ञान माँ के हिस्से नहीं होते अपितु माँ के  हिस्से में हम रहते है ।
हेमेन्द्र क्षीरसागर, लेखक व विचारक

 
 

विकास यात्रा 2018 पर विशेष : विकास यात्रा: छत्तीसगढ़ के स्वर्णिम भविष्य निर्माण की यात्रा

विकास यात्रा 2018 पर विशेष : विकास यात्रा: छत्तीसगढ़ के स्वर्णिम भविष्य निर्माण की यात्रा

14-May-2018

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आलेख: स्वराज कुमार
  लोकतंत्र में जनता का विश्वास ही किसी भी निर्वाचित सरकार की सबसे बड़ी ताकत होती है। जनता का विश्वास कायम रखने के लिए लोगों से निरंतर संवाद बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। परस्पर संवाद से ही कोई भी शासन ‘सुशासन’ में तब्दील होता है। प्रजातंत्र में जनता के लिए, जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार खामोश होकर नहीं बैठ सकती। वह अपनी जनता की बेहतरी के लिए और अपने राज्य और देश के स्वर्णिम भविष्य के लिए जनता के सहयोग से विकास के सभी कार्य करती है। जनता के खजाने से राज्य की तरक्की और नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जो भी कार्य सरकार की ओर से हो रहे हैं, अपनी जनता के पास जाकर उनका हिसाब देना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी होती है। यह बहुत चुनौती भरा और साहस का काम होता है।
    छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जनता के पास जाकर अपनी सरकार के कार्यों का हिसाब देने की चुनौती को हिम्मत के साथ स्वीकारा है। उन्होंने अपने सरकारी तंत्र को मंत्रालय और दफ्तरों से निकालकर विभिन्न अभियानों के जरिए चौक-चौराहों और चौपालों तक प्रदेशवासियों के बीच पहुंचाया है, ताकि लोगों के साथ संवाद की निरंतरता बनी रहे। प्रदेश का हर गांव, हर शहर, हर गरीब और हर किसान  सरकार और जनता के बीच संवाद के इस केन्द्र में है। मुख्यमंत्री हर महीने प्रदेश के लगभग हर जिले का दौरा करते हैं। वर्ष 2005 से उन्होंने ग्राम सुराज अभियान की शुरूआत की। उनके नेतृत्व में वर्ष 2012 में ग्राम सुराज के साथ नगर सुराज अभियान चलाया गया और वर्ष 2015 से उन्होंने ग्राम सुराज और नगर सुराज दोनों को मिलाकर लोक सुराज अभियान का आगाज किया। गर्मियों के आग उगलते मौसम में ये तीनों ही अभियान मुख्यमंत्री के एक नये प्रयोग के रूप में राज्य और देश में काफी लोकप्रिय हुए हैं। वर्तमान में लोक सुराज अभियान 2015 से लगातार चल रहा है। इसके साथ ही लगभग हर पांच साल में उनके नेतृत्व में विकास यात्राएं भी हो रही हैं। वर्ष 2008 और 2013 के बाद वर्ष 2018 में विकास यात्रा दो चरणों में 12 मई से 11 जून तक और 16 अगस्त से 30 सितम्बर तक चलेगी।
     ग्राम सुराज की तर्ज पर लोक सुराज अभियान में भी मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक और मुख्य सचिव और कलेक्टर से लेकर पटवारी तथा ग्राम और शहर स्तर के सभी मैदानी अधिकारी और कर्मचारी एक समयबद्ध अभियान के तहत जनता के बीच जाते हैं। शिविर लगाकर और चौपालों में बैठकर उनकी समस्याएं सुनते हैं और यथासंभव उनका त्वरित निराकरण भी किया जाता है। लोगों को विभिन्न योजनाओं की जानकारी देकर उन्हें पात्रता के अनुसार उन योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए भी ठोस पहल की जाती है। इस बीच डॉ. सिंह ने सितम्बर 2015 से हर महीने के दूसरे रविवार को आकाशवाणी के रायपुर केन्द्र से ‘रमन के गोठ’ कार्यक्रम के जरिए भी जनता को सरकार की योजनाओं के बारे में बताते हैं। रेडियो वार्ता का उनका यह मासिक कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुआ है।
    जनता की जरूरतों को समझकर जनकल्याण की योजनाएं बनाने में मुख्यमंत्री के लिए ग्राम सुराज, नगर सुराज और लोक सुराज अभियान और विकास यात्राओं का योगदान काफी महत्वपूर्ण रहा। इन अभियानों के दौरान चौपालों में और जनसभाओं में आम जनता से बातचीत में ही मुख्यमंत्री को कई नवीन योजनाओं का विचार आया। डॉ. रमन सिंह के अनुसार वर्ष 2012 में छत्तीसगढ़ सरकार ने विधानसभा में विधेयक लाकर राज्य के गरीबों को भोजन का अधिकार दिलाने के लिए देश का पहला खाद्य-सुरक्षा और पोषण सुरक्षा कानून बनाया। इस कानून के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन दुकानों से गरीबों को सिर्फ एक रूपए किलो में राशन कार्ड पर हर महीने प्रति यूनिट सात किलो चावल दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री बाल हृदय सुरक्षा योजना हृदय रोग से पीड़ित हजारों बच्चों के लिए वरदान साबित हो रही है। गरीब परिवारों की विवाह योग्य बेटियों की शादी में मदद के लिए मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत 70 हजार से ज्यादा बेटियों ने सामूहिक विवाह समारोहों में गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया है। किसानों को सिंचाई के लिए प्रतिवर्ष अधिकतम 7500 यूनिट बिजली निःशुल्क देने के लिए कृषक जीवन ज्योति योजना सफलतापूर्वक चल रही है और चार लाख से ज्यादा किसान इसका लाभ ले रहे हैं। सरस्वती साइकिल योजना के तहत हाईस्कूलों में अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग की बालिकाओं सहित सामान्य और पिछड़े वर्गों के गरीब परिवार की बालिकाओं को निःशुल्क साइकिल दी जा रही है। सरगुजा और बस्तर के लिए आदिवासी विकास प्राधिकरण बनाया गया है।
    राज्य में अनुसूचित जाति बहुल जिलों और क्षेत्रों के लिए अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण की स्थापना की गई है। ग्रामीण एवं अन्य पिछड़ा वर्ग क्षेत्र विकास प्राधिकरण भी बनाया गया है। नक्सल हिंसा पीड़ित इलाकों के बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए मुख्यमंत्री बाल भविष्य सुरक्षा योजना की शुरूआत करते हुए राजधानी रायपुर सहित जगदलपुर, अम्बिकापुर, बिलासपुर और दुर्ग में प्रयास आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई, जहां 11वीं और 12वीं कक्षा के बच्चों को नियमित पढ़ाई के साथ-साथ मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की निःशुल्क कोचिंग दी जा रही है। अब तक कई बच्चों ने इस सुविधा का लाभ लेकर आईआईटी, एनआईटी जैसी उच्च तकनीकी शिक्षा संस्थाओं में और मेडिकल तथा इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश लिया है और अपने सुनहरे भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। मुख्यमंत्री को इस योजना का विचार भी ग्राम सुराज अभियान के दौरान आया था। तेंदूपत्ता श्रमिकों को निःशुल्क चरण पादुका वितरण की योजना, उनके पारिश्रमिक को 450 रूपए प्रति मानक बोरा से क्रमशः बढ़ाकर वर्ष 2018 में ढ़ाई हजार रूपए प्रति मानक बोरा किया जाना भी इन अभियानों की देन है।    

हमारे सभी कार्य खुली किताब की तरह: डॉ. रमन सिंह

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    विकास यात्राओं में गांव-गांव और शहर-शहर लोगों से सीधे सम्पर्क और संवाद के जरिए भी मुख्यमंत्री ने कई योजनाओं की परिकल्पना करते हुए उन्हें धरातल पर साकार किया है। वे कहते हैं- छत्तीसगढ़ सरकार के सभी कार्य खुली किताब की तरह जनता के सामने हैं। उनकी सरकार प्रदेश के विकास और जनता की बेहतरी के लिए अपने हर वायदे को पूरा किया है। जिस भरोसे के साथ राज्य की जनता ने हमें छत्तीसगढ़ की सेवा का अवसर दिया, जनता के उस विश्वास को हम टूटने नहीं देेंगे। आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस अंचल को क्षेत्रीय असंतुलन और पिछड़ेपन की पीड़ा से मुक्ति दिलाने के जिस संकल्प के साथ वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया, उनके उस संकल्प को साकार करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयास निरंतर जारी हैं। मुख्यमंत्री के अनुसार यह छत्तीसगढ़ के स्वर्णिम भविष्य निर्माण की यात्रा है।

सरकार और जनता के परस्पर संवाद से बनती हैं योजनाएं

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    डॉ. रमन सिंह का यह भी कहना है कि मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर जनता की जरूरतों का सही-सही आंकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए जनता के बीच जाना जरूरी होता है और यह किसी भी लोकतंत्र में सरकारी तंत्र की पहली जिम्मेदारी होती है। ग्राम सुराज, नगर सुराज और अब लोक सुराज अभियान का भी यही उद्देश्य है। इसी भावना के साथ-साथ जनता से जुड़कर सीधे संवाद के इन अभियानों के बीच मुख्यमंत्री के नेतृत्व में वर्ष 2008 और वर्ष 2013 में प्रदेशव्यापी विकास यात्रा का भी आयोजन किया गया। विकास यात्रा के जरिए भी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा जा सकता है। हर इलाके में यात्रा के हर पड़ाव में काफी संख्या में किसानों, मजदूरों, छात्र-छात्राओं और समाज के सभी वर्गों के लोगों से मुलाकात हो जाती है। उनकी समस्याओं और जरूरतों के बारे में जनप्रतिनिधियों, आम नागरिकों से मौके पर ही चर्चा हो जाती है और जरूरतमंद लोगों और क्षेत्रों के विकास के लिए नई कार्य योजनाओं का ढांचा भी तैयार किया जा सकता है। काफी संख्या में नये निर्माण कार्यों का भूमिपूजन और शिलान्यास तथा पूर्ण हो चुके निर्माण कार्यों का लोकार्पण भी होता है।
     मुख्यमंत्री के नेतृत्व में पहली विकास यात्रा की शुरूआत 23 मई 2008 को और दूसरी विकास यात्रा की शुरूआत 6 मई 2013 को राज्य के राज्य के बस्तर संभाग के जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से की गई। वहां छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध तीर्थ दंतेश्वरी माता के ऐतिहासिक मंदिर में पूजा-अर्चना और प्रदेश वासियों की सुख-समृद्धि की कामना के साथ इन यात्राओं का शुभारंभ हुआ। इस बार भी मुख्यमंत्री दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी माता का आशीर्वाद लेकर विकास यात्रा की शुरूआत करने जा रहे हैं। वर्ष 2008 और 2013 में मई-जून के दहकते मौसम में विभिन्न चरणों में आयोजित दोनों ही विकास यात्राओं में मुख्यमंत्री ने प्रदेश भर का लम्बा दौरा किया। जंगलों, पहाड़ों, नदियों, घाटियों, गांवों, कस्बों और शहरों से गुजरती हुई दोनों यात्राएं आम जनता के दिलों तक पहुंचने में कामयाब हुई।

छत्तीसगढ़ के विकास पर मुझे गर्व होता है: श्री नरेन्द्र मोदी

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    विकास यात्रा 2013 के दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 18 मई को राजनांदगांव और यात्रा के समापन अवसर पर 07 सितम्बर को अम्बिकापुर (सरगुजा) आए थे। उन्होंने राजनांदगांव में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा था- छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री है, जो अपने पांच साल के कामकाज का हिसाब कड़ी धूप और तेज गर्मी में भी गांव-गांव जाकर जनता को दे रहे हैं। श्री मोदी ने डॉ. रमन सिंह को जनता के दिलों पर राज करने वाला लोकप्रिय, तेजस्वी और ऊर्जावान नेता बताते हुए कहा था- 21वीं सदी के भारत की तमाम समस्याओं के इलाज के लिए दो ही प्रमुख जड़ी-बूटियां हैं और वे हैं विकास और भरोसा। उन्होंने कहा था-छत्तीसगढ़ के विकास को देखकर मुझे गर्व होता है। यहां के मुख्यमंत्री बड़ी कुशलता और विनम्रता के साथ जनता की सेवा कर रहे हैं। उनकी वाणी में मुझे कभी कटुता नहीं दिखी। उनके विगत पांच साल की तुलना में वर्तमान पांच साल के कार्यकाल में विकास के सैकड़ों गुना ज्यादा काम हुए हैं और हो रहे हैं। यह देखकर मुझे गर्व होता है। मुझे गर्व है कि डॉ. रमन सिंह मेरे मित्र हैं। श्री मोदी ने सात सितम्बर को अम्बिकापुर में विकास यात्रा के समापन अवसर पर जनता को संबोधित करते हुए कहा था -  यह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है कि उसे विकास को प्राथमिकता देने वाले मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमन सिंह का नेतृत्व मिला है, जो बिना किसी भेद-भाव के सर्वसमाज को साथ लेकर अपने राज्य की तरक्की और खुशहाली के लिए काम कर रहे हैं।
    श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2014 में केन्द्र में नई सरकार के गठन के बाद पूरे देश में समाज की अंतिम पंक्ति के लोगों और अंतिम छोर के गांवों तक विकास की रौशनी पहुंचाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरूआत हुई। इनमें प्रधानमंत्री जनधन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, जीवन-ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) और गरीब परिवारों की महिलाओं को रसोई गैस कनेक्शन के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। छत्तीसगढ़ में भी इन योजनाओं का क्रियान्वयन तेजी से हो रहा है और बड़ी संख्या में लोगों को इनका फायदा मिल रहा है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में इस बार की विकास यात्रा में अधिक से अधिक संख्या में लोगों को इन योजनाओं का भी लाभ दिलाया जाएगा।

छत्तीसगढ़ में चौतरफा विकास-विश्वास का वातावरण: श्री लालकृष्ण आडवाणी

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    डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में वर्ष 2008 और वर्ष 2013 की विकास यात्राओं का शुभारंभ देश के उप-प्रधानमंत्री और तत्कालीन लोकसभा के नेता-प्रतिपक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने दंतेवाड़ा स्थित ऐतिहासिक दंतेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ किया था। श्री आडवाणी ने 23 मई 2008 को दंतेवाड़ा में जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा था-छत्तीसगढ़ में पिछले साढ़े चार साल में गांव, गरीब और किसानों की बेहतरी के लिए अनेक कार्य हुए हैं। राज्य में चौतरफा विकास और विश्वास का वातावरण बना है। देश का यह नया राज्य बहुत जल्द भारत के मानचित्र पर सर्वाधिक खुशहाल और विकसित राज्य के रूप में अपनी नई पहचान बनाएगा। डॉ. रमन सिंह भारत माता और छत्तीसगढ़ महतारी के उन सपूतों के सपनों को भी साकार कर रहे हैं, जिन्होंने देश की आजादी और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। श्री आडवाणी ने 9 मई 2013 को भी दंतेवाड़ा में राज्य सरकार की दूसरी विकास यात्रा का शुभारंभ किया था। उस समय उन्होंने विशाल जनसभा में कहा था-मुझे यह देखकर बहुत खुशी होती है कि डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रदेश में विगत एक दशक में आम जनता, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, जनजातियों और समाज के कमजोर वर्गों की बेहतरी के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं। विकास यात्राओं में जनता को इन योजनाओं के बारे में बताना और ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोगों को उनका लाभ दिलाना निश्चित रूप से एक सराहनीय पहल है।

हर मोर्च पर जनकल्याण की दिशा में कई बड़ी उपलब्धियां

    तीसरी विकास यात्रा के शुरू होने तक छत्तीसगढ़ ने विकास के हर मोर्चे पर जन-कल्याण की दिशा में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं, जिनकी एक लम्बी सूची है। बस्तर और सरगुजा में विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की गई रायगढ़ और राजनांदगांव में मेडिकल कॉलेज, बिलासपुर में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना, दुर्ग में नये विश्वविद्यालय की स्थापना, अंजोरा में पशु चिकित्सा के क्षेत्र में कामधेनू विश्वविद्यालय की स्थापना, रायपुर में आयुष विश्वविद्यालय, नया रायपुर में अन्तर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपल आईटी) और भारतीय प्रबंध संस्थान की स्थापना इसका एक बड़ा उदाहरण है। प्रदेश की राजधानी रायपुर के विस्तार के रूप में नया रायपुर तेजी से आकार ले रहा है।

बेमिसाल तरक्की के चौदह साल

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    किसी भी राज्य अथवा देश के विकास का मूल्यांकन आंकड़ों से ही किया जा सकता है। आंकड़े बताते हैं कि डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने विगत चौदह वर्षों में वास्तव में जो तरक्की की है, वह बेमिसाल है। उनके ही नेतृत्व में छत्तीसगढ़ वर्ष 2008 में देश का पहला और इकलौता विद्युत कटौती मुक्त राज्य बना। विगत 14 वर्ष में बिजली का उत्पादन चार हजार 732 मेगावाट से बढ़कर लगभग 22 हजार 764 मेगावाट तक पहुंच गया। जिलों की संख्या 16 से बढ़कर 27, तहसीलों की संख्या 198 से बढ़कर 150, नगर निगमों की संख्या 10 से बढ़कर 12, नगरपालिकाओं की संख्या 28 से बढ़कर 44, नगर पंचायतों की संख्या 49 से बढ़कर 113 हो गई है। प्राथमिक स्कूलों की संख्या 14 हजार से बढ़कर लगभग 38 हजार, मिडिल स्कूलों की संख्या पांच हजार 642 से बढ़कर 16 हजार 674, हाईस्कूलों की संख्या 908 से बढ़कर दो हजार 643 और हायर सेकेण्डरी स्कूलों की संख्या 680 से बढ़कर तीन हजार 898 हो चुकी है। इस बीच शासकीय विश्वविद्यालयों की संख्या 3 से बढ़कर, सरकारी कॉलेजों की संख्या 116 से बढ़कर 221, कृषि महाविद्यालयों की संख्या 4 से बढ़कर 31, इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या 12 से बढ़कर 47, पॉलीटेक्निक संस्थाओं की संख्या 10 से बढ़कर 60 और आईटीआई की संख्या 61 से बढ़कर 178 तक और मेडिकल कॉलेजों की संख्या 2 से बढ़कर 9 तक पहुंच गई है। अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों के लिए आश्रम शालाओं और छात्रावासों की संख्या एक हजार 737 से बढ़कर 3 तीन हजार 252 हो गई है। स्वास्थ्य सुविधाओं में भी उत्साहजनक वृद्धि देखी जा रही है। उप-स्वास्थ्य केन्द्र तीन हजार 818 से बढ़कर पांच हजार 180 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र 512 से बढ़कर 792 और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र 114 से बढ़कर 156 हो गए हैं। प्रदेश की सिंचाई क्षमता 26.78 प्रतिशत से बढ़कर 34.20 प्रतिशत, ग्रामीण विद्युतीकरण 91 प्रतिशत से बढ़कर 99 प्रतिशत और बिजली उपभोक्ताओं की संख्या 18 लाख से बढ़कर 42 लाख और प्रति व्यक्ति बिजली की औसत वार्षिक खपत 525 यूनिट से बढ़कर एक हजार 724 यूनिट तक पहुंच गई है। उचित मूल्य दुकानों की लम्बाई 8 हजार 637 से बढ़कर 12 हजार 298 हो गई है। वर्ष 2003 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत राज्य में केवल एक हजार 072 किलोमीटर सड़कें थी। आज यह बढ़कर 22 हजार 750 किलोमीटर तक पहुंच गई है।
     इस दौरान राज्य में पक्की सड़कों की लम्बाई 27 हजार किलोमीटर से बढ़कर 36 हजार किलोमीटर तक पहुंच चुकी है। खरीफ फसलों का रकबा 45.90 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 47.70 लाख हेक्टेयर और उद्यानिकी फसलों का रकबा 1.17 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 7.25 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। वर्ष 2003 की स्थिति में राज्य के किसानों को सहकारी बैंकों से खेती के लिए 13 से 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर अल्पकालीन ऋण मिलता था। आज की स्थिति में उन्हें ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है। विकास यात्रा सिर्फ महीने दो महीने नहीं बल्कि  प्रदेश के उज्जल और सुनहरे भविष्य के लिए निरंतर चलने वाली एक ऐसी यात्रा है, जो देश के नक्शे में छत्तीसगढ़ को सर्वाधिक विकसित राज्य और खुशहाल राज्य के रूप में पहचान दिलाने में निश्चित रूप से कामयाब होगी। (आलेख: स्वराज कुमार)


दरिंदगी की शिकार होती मासूमियत

दरिंदगी की शिकार होती मासूमियत

01-May-2018

खुलासा पोस्ट पत्रिका का लेख 

हवस की शिकार होती मासूमियत जो की जानती भी नहीं हैं कि उसके साथ क्या हुआ है? हमारे देश में नारी को शक्ति के अनेक रूपों में पूजा जाता है, उसी भारत देश मे स्त्रियों और अबोध बचपन पर इतना वीभत्सता और घिनौना कृत क्यों हो रहा है ? अब तो महिलाओं के साथ साथ अब मासूम अबोध बालिकाओं पर भी यौन शोषण देश में लगातार बढ़ता ही चला जा रहा है जो निश्चित रूप से गम्भीर चिंता का विषय है,  आखिर वासना की हवस इतना अधिक क्यों बढ़ गया हैं ? समाज में बढ़ती अश्लीलता और आसानी से अश्लील क्लिप उपलब्ध होना इन घटनाओ के जिम्मेदार हैं, हाल ही में घटित अनेकों घटनाएं इनके उदाहरण के रूप में देखें जा सकते हैं। ऐसी घटनाओं के कारणों पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत हैं,  और इस बात पर भी सोचना होगा कि फाँसी की सजा का ऐलान कर देंने से क्या ये घटनाएं रुक जाएँगी ?

जबकि मासूम बच्चियां जिस यौन शोषण की शिकार हो रही हैं उसका कर्ता-धर्ता तो पुरुष ही है . ‘बाल यौन शोषण’  का एक प्रकार है जिसमें एक वयस्क या बड़ा किशोर अपने अपने यौन सुख के लिये एक बच्चें का यौन शोषण करता है, जितना घृणित ये परिभाषा से लग रहा है, वास्तविकता में भी इतना ही शर्मनाक है |  भारत भी उन कुख्यात देशों में आता है जहाँ मासूम बच्चों के साथ दुराचार बड़े पैमाने पर होता है। यौन शोषण के सबसे ज़्यादा मामले जो नज़र में आये हैं उसमें ज़्यादातर में घर के पुरुष/रिश्तेदार, टीचर्स यहाँ तक की कई बार पिता भी ज़िम्मेदार पाये गए है।

अकेला बुजुर्ग बच्चों पर यौन अत्याचार करने वाला सबसे बड़ा शिकारी होता है। बच्चों को लात मारना, बहिष्कार करना, खरोंच करना, किसी कमरे में बन्द करना, उनके स्किन को काटना,कान खींचना, बच्चों को असुविधाजनक स्थिति में रहने के खातिर दबाव डालना, जलाना, बच्चों के मुंह को साबुन से धोना या उन्हें गर्म मसालों को निगलने के लिए मजबूर करना आदि शारीरिक शोषण के अंतर्गत आते हैं

बाल यौन शोषण हमारे समाज द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक बुराईयों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित बुराई है. इसकी उपेक्षा के कारण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही है. इस पर ध्यान देने की जरुरत है कि इस बुराई के बहुत से आयाम है जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है. बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है. भारत में बाल यौन शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता क्योंकि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने पर परिवार खुद को असहज महसूस करता है,  इसके बारे में एक सामान्य धारणा है कि, “ऐसी बातें घर की चार-दिवारी के अन्दर ही रहनी चाहिये.” बाल यौन शोषण की बात के सार्वजनिक हो जाने पर परिवार की गरिमा के खराब होने के बारे में लगातार भय बना रहता है.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2007 में नेशनल स्टडी ऑन चाइल्ड एब्यूज-इंडिया 2007 के आँकड़े आँखें खोलने के लिए काफी हैं। इसके मुताबिक देश भर में 53.22 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी रूप में यौन अत्याचार के शिकार हो जाते हैं। जागरूकता इस समस्या का सबसे बड़ा इलाज है। विडंबना यह है कि हर साल विश्व बाल यौन अत्याचार दिवस आता है और चले जाता है लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं होती।

एमवाय अस्पताल में मनोरोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वीएस पाल ने बताया कि बचपन में हुए यौन अत्याचार के जख्म जिंदगी भर नहीं भरते। ये दोनों केसेस उदाहरण भर हैं लेकिन इलाज के लिए आने वाले अधिकांश मनोरोगी ऐसी ही किसी न किसी समस्या से ग्रस्त पाए जाते हैं। हम यह स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि भारत में ऐसा भी होता है लेकिन सच्चाई महिला एवं बाल मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन से उजागर हो रही है। पालकों को अपने बच्चों के प्रति इस दृष्टिकोण से भी जागरूक होना चाहिए।

बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध लंबे समय से सामाजिक चिंता का विषय रहे हैं। लेकिन तमाम अध्ययनों में इन अपराधों का ग्राफ बढ़ने के बावजूद इस दिशा में शायद कुछ ऐसा नहीं किया जा सका है, जिससे हालात में सुधार हो। इन जटिल एवं संकटग्रस्त होती स्थितियों का समाधान न होना, सरकार की असफलता को भी उजागर करता है। भले ही सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अनेक बार चिंता जताई गई, समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने के दावे किए गए। मगर इस दौरान आपराधिक घटनाओं के शिकार होने वाले मासूमों की संख्या में कमी आने के बजाय और बढ़ोतरी ही होती गई।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के मुकाबले 2016 में बच्चों के प्रति अपराध के मामलों में ग्यारह फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें भी कुल अपराधों के आधे से ज्यादा सिर्फ पांच बड़े राज्यों- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में हुए। सबसे ज्यादा मामले अपहरण और उसके बाद बलात्कार के पाए गए। बच्चों के खिलाफ अपराधों में यौन शोषण एक ऐसा जटिल पहलू है, जिसमें ज्यादातर अपराधी पीड़ित बच्चे के संबंधी या परिचित ही होते हैं।

यद्यपि, भारतीय दंड संहिता, 1860, महिलाओं के खिलाफ होने वाले बहुत प्रकार के यौन अपराधों से निपटने के लिये प्रावधान (जैसे: धारा 376, 354 आदि) प्रदान करती है और महिला या पुरुष दोनों के खिलाफ किसी भी प्रकार के अप्राकृतिक यौन संबंध के लिये धारा 377 प्रदान करती है, लेकिन दोनों ही लिंगों के बच्चों (लड़का/लड़की) के साथ होने वाले किसी प्रकार के यौन शोषण या उत्पीड़न के लिये कोई विशेष वैधानिक प्रावधान नहीं था जिसे वर्तमान सरकार ने मौत की सजा में बदलने का प्रस्ताव ला रही है । वैसे वर्ष 2012 में संसद ने यौन (लैंगिक) अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 के जरिये इस सामाजिक बुराई से दोनों लिंगों के बच्चों की रक्षा करने और अपराधियों को दंडित करने के लिए एक विशेष अधिनियम बनाया। इस अधिनियम से पहले, गोवा बाल अधिनियम, 2003 के अन्तर्गत व्यवहारिकता में कार्य लिया जाता था। इस नए अधिनियम में बच्चों के खिलाफ बेशर्मी या छेड़छाड़ के कृत्यों का अपराधीकरण किया गया है।


छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगला विकल्प कौन ?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगला विकल्प कौन ?

27-Apr-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

छत्तीसगढ़ की राजनीती में 2 ही विकल्प नज़र आ रहे हैं बीजेपी से मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह या अजित जोगी की जोगी कांग्रेस, क्योंकि भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस के प्रदर्शन का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है? समय रहते कांग्रेस आलाकमान अगर ध्यान नहीं देता है तो परिणाम निश्चित रूप से कांग्रेस का प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में तीसरे स्थान में होने की संभावनाओ से इंकार नहीं किया जा सकता है! हमारे "खुलासा पोस्ट" और ''गरजा छत्तीसगढ़ न्यूज़'' की संयुक्त पड़ताल में जिस तरह से आम जनता की राय सामने आ रही है वह कांग्रेस के लिए चौंकाने वाले हो सकते है, इस सर्वे में कांग्रेस के कई दिग्गज कार्यकर्ताओ का भी अभि-मत शामिल किया गया है |

अभी छत्तीसगढ़ राज्य चुनावी रंग में नहीं रंगा है, लेकिन चुनावी धमक ज़रूर दिखाई देने लगा है, सत्ताधारी पार्टी के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के द्वारा लोक सुराज अभियान के माध्यम से जनता से सीधा संवाद और उनके समाधान का निराकरण करने का प्रयास किया गया है वहीँ दूसरी ओर अजित जोगी और उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ में लगातार सभाओं और जनसंपर्क के माध्यम से जनता से रुबरू हो रहे है, ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजनीति में 2 ही सितारे चमकते दिखाई दे रहे है, वर्तमान में ऐसा अभी दिखाई दे रहा है ? और वहीं मुख्य विपक्ष कही जाने वाले कांग्रेस के सभी नेता मुगालते में अभी कुछ दिखाई दे रहे हैं ! कांग्रेस के बड़े नेता भले ही कितने भी एक जुटता या यूँ कहें आपस में सगे भाईचारा दिखाने की कोशिश कर रहे हो लेकिन अन्दर खाने में आक्रोश है, यही कारण है की डॉ चरणदास महंत और सत्यनारायण शर्मा जैसे दिग्गज नेताओ को भी बैकफूट में डालने से गुरेज नहीं किया जा रहा है | 

कुल मिलाकर वर्तमान में कांग्रेस संगठन में बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष दिख रहा है और इसकी सबसे बड़ी वज़ह है कांग्रेस के मुखिया का अड़ियल रवैय्या ? वहीं कांग्रेस के एक दिग्गज प्रभारी कहते नज़र आ रहे है की जोगी जी के पास फंड ही नहीं है तो चुनाव क्या खाक लड़ायेंगे ? आइये हम आपको बताने जा रहे है, छत्तीसगढ़ में क्या चुनावी सम्भावना हो सकती है | 

कांग्रेस पार्टी ने जोगी जी पर हमेशा कांग्रेस में रहकर कांग्रेस को हराने का आरोप लगाती रही है ! और उसी कारण से कांग्रेस सत्ता से 15 साल से दूर रही है | वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी स्वच्छ छवि और अपने कार्यशैली और अच्छे प्रशासनिक क्षमता के लिए जाने जाते रहे है और एक बेहतरीन राजनीतिक सूझबुझ से अपना तीसरा निर्विवादित कार्यकाल पूरा करने जा रहे है | जिसमे उनके विरोधियो के द्वारा कई आरोप ज़रूर लगाये गए, लेकिन अभी तक साबित कुछ भी नहीं कर सके | वहीं दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी जी ने अब खुद अपनी पार्टी जोगी कांग्रेस बना ली है और प्रमुख प्रतिद्वंदी बनकर बराबरी का टक्कर देने की तैय्यारी में है ! जिसमे नुकसान कांग्रेस को ही होने वाला है |

ऐसे में “क्या“ ?  छत्तीसगढ़ में टक्कर भाजपा और जोगी कांग्रेस के बीच ही होने वाला है ? अभी तक छत्तीसगढ़ में जितने भी सर्वे हुए है उसमे स्पष्ट संकेत मिल रहे है, की कांग्रेस के प्रदर्शन का ग्राफ छत्तीसगढ़ में लगातार गिरता ही चला जा रहा है और कांग्रेस के प्रदर्शन का ग्राफ 3 रे, स्थान पर होने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता? इसका सबसे बड़ा कारण है वर्तमान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल की तोड़ने की नीति चाहे कार्यकर्ता हो या विधायक उन्होंने सिर्फ कांग्रेस में तोड़ फोड़ ज्यादा किया है, कांग्रेस की टिकट से जितने वाले जन प्रतिनिधियों को कांग्रेस से बाहर करने का कार्य इनके द्वारा किया गया है, वह चाहे देवरात सिंह हो, रेणु जोगी हो या आर.के. राय हो फेरहिस्त लम्बी है, कांग्रेस अध्यक्ष के निजी दुश्मनी भंजाने के चलते कांग्रेस पार्टी का सर्वनाश हो रहा है, जिसे कांग्रेस आलाकमान को समय रहते समझना होगा नहीं तो छत्तीसगढ़ में 2018 में वापसी की उम्मीद कांग्रेस को छोड़ देना चाहिए ?

वहीँ डॉ. रमन सिंह के लगभग 15 साल के कार्यकाल में सत्ता में रहने के बाद भी ना कोई गुरुर ना कोई घमण्ड आज भी वही चिर परिचित मुस्कुराता चेहरा नजर आता है, ठीक इसके उलट भूपेश बघेल हमेशा तनावग्रस्त और गुस्से में दिखाई देते है कार्यकर्ताओ से सीधे मुंह बात नहीं करते ऐसा कार्यकर्ताओं का कहना है वहीं अजित जोगी की जोगी कांग्रेस, कांग्रेस के उपेक्षा के शिकार कार्यकर्ताओ को गले लगा रहे है और अपनी पार्टी में सम्मान दे रहे है | कांग्रेस संगठन सभी वर्गों को सम्मान के साथ जोड़ने की बात ज़रूर करता है लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस में ठीक इसका उलटा हो रहा  है ! 

सब को मालूम है सच हमेशा कड़वा होता है और यही बातें कांग्रेस के साथियों को शायद बुरी लगती है जब की उन्हें इसमें सुधार की सम्भावना को तलाश करना चाहिए ! वही वर्तमान में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा कड़वा सच यही है की कई कांग्रेस के दिग्गज नेता और कार्यकर्ता घर बैठे हुए हैं क्योंकि उन्हें ना जिम्मेदारी दी जाती है ना उन्हें पूछा जाता है अगर वर्तमान में चुनाव हो जाये तो जोगी कांग्रेस, कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचा सकती है और कांग्रेस के कई बड़े नेता जिनकी टिकट हमेशा से तय रहती है वो निश्चित रूप से हार सकते है क्योंकि इस त्रिकोणीय मुकाबले में लाभ भाजपा और जोगी कांग्रेस का होने वाला है जिसे अध्यक्ष की मंडली को छोड़ कांग्रेस के सभी दिग्गज नेता बड़े अच्छे से समझ रहे है, लेकिन इनके जिद्द के सामने विवश हो कर खामोश बैठे है !

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है कांग्रेस हाई कमान चाहे तो प्रदेश में कोई नया नेतृत्व दे कर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार कर सकता है बशर्ते नया नेतृत्व सभी को जोड़कर नई सम्भावना के साथ विधानसभा का चुनाव लड़े ? क्योंकि वर्तमान अध्यक्ष महोदय जी जाति की राजनीति में कांग्रेस पार्टी को दाँव पर लगा रहे हैं और कांग्रेस आला कमान चुप्पी साधे हुए है और खामोश है, जिसका भयानक परिणाम कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता जिन्होंने कई उम्मीदे लगा रखीं है और सब की उम्मीद एक आदमी के झूठे अहंकार की वज़ह से फिर से मिट्टी में मिल जाने वाला है !

छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा क्षेत्र है, जिसमें अधिकतर विधानसभाओ में विधायकों के प्रदर्शन पर ही आने वाले विधानसभा चुनाव का परिणाम आएगा, भारतीय जनता पार्टी के लिए भी सीधे संकेत मिल रहे है की कई विधानसभा क्षेत्र में वर्तमान विधायको का प्रदर्शन संतोषप्रद नहीं है, भारतीय जनता पार्टी के 60 % विधायकों को बदले जाने पर ही चुनावी समर में कुछ अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है वहीं जोगी कांग्रेस अभी नये दल के रुप मे इस विधानसभा में चुनाव लड़ने जा रही है और उनकी सभाओं में अच्छी ख़ासी भीड़ जुट रही है, लेकिन भीड़ को देखकर परिणाम का आंकलन अभी करना बेमानी होगा लेकिन जोगी कांग्रेस के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी राजनीती के मंजे हुए खिलाडी है शह और मात का खेल बेहतर जानते है. अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनके राजनितिक भविष्य की अग्नि परीक्षा है जिसमे सभी की नज़रे टिकी हुई है अब आगे क्या होने वाला है ये तो आने वाले चुनाव के परिणाम ही बताएगा ?

कांग्रेस का हाथ छोड़ते जा रहे है दलित और मुस्लिम ? 

भारत का दलित और मुस्लिम वोट बैंक अब कांग्रेस का हाथ और साथ क्यों छोड़ता जा रहा है ? एक समय था जब इन्हे कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक समझा जाता था, समय समय पर दलित समाज के वोट तो अन्य दूसरे दलों के साथ जुड़ते रहे है जिस तरह की लीडरशीप उन्हें मिली, लेकिन मुस्लिम समाज नेतृत्व के आभाव में इधर-उधर भटकते रहे है ?  क्योंकि मुस्लिम लीडर शिप कांग्रेस परस्त रही है, मुस्लिम लीडर छोटे छोटे पदों में ही सिमट कर रह गए उन्होंने मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए सार्थक कोशिशे नहीं की जिसका नतीजा सच्चर कमेटी जैसी रिपोर्ट के रूप में सामने आया,  और इन समस्त दुर्दशा का कारण बनी कांग्रेस जिसने संघ और भा.ज.पा. के दंगो का भय और आतंक दिखा कर मुसलमानो से वोट तो लेते रही लेकिन उसने मुसलमानो का कभी भला नहीं सोंचा आज तक भा.ज.पा को मुस्लिम विरोधी बताया जाता है हम पूरे देश की बात तो नहीं करते लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में भाजपा का चेहरा कुछ और ही है देश में बीजेपी को खलनायक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ में यही बीजेपी एक नायक की तरह है ।

यह वर्ष चुनावी वर्ष है सभी पार्टियाँ अपने अपने जीत के दावे कर रही हो लेकिन जनता जनार्दन का समर्थन किसे जाता है यह भविष्य तय करेगा, हमने यह रिपोर्ट अपने निजी स्त्रोतों के द्वारा किए गए सर्वे और कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी के द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर कांग्रेस की दशा को प्रदर्शित किया है ।

अभी जंग का आगाज़ भी नही और तख़्त में बैठने का ख्वाब !

जी हाँ छत्तीसगढ़ काँग्रेस की राजनीतिक उथल पुथल में कुछ ऐसी ही बातें सामने निकल कर आ रही है , नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंह देव (बाबा) के बयान के बाद काँग्रेस में बवाल मचा है  । पूर्व प्रदेशकांग्रेस अध्यक्ष डॉ चरण दास महन्त ने भी मीडिया में बयान देते हुए यह कहा है की मैं क्यों मुख्यमंत्री नहीं बन सकता? बात में दम तो है लेकिन इसके लिए विधानसभा के चुनाव को जितना भी आवश्यक हैं ,अभी तो वर्तमान अध्यक्ष महोदय काँग्रेस को तोड़ने का काम कर रहे हैं , और चुनाव में जीत के लिए कार्यकर्ताओ का दिल  जितना पड़ता हैं जो वर्तमान में दूर - दूर तक कही दिखाई नहीं दे रहा है और  चाटुकारों के दम पर चुनाव नहीं जीता जाता , पिछले चुनाव में ऐसा ही कुछ देखा गया था उस चुनाव में नेतृत्व महन्त जी के हाथ में था और जितने की संभावना भी बनी लेकिन उनके इर्दगिर्द जो चाटुकारों का घेरा है उन्होंने उस जीत में पानी फेर दिया ,इसमें कोई संदेह नही है कि चरण दास महन्त वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं साफ सुथरी छवि भी है उनकी  लेकिन उनके मैनेजर उनके करीब  कार्यकर्ताओ को पहुँचने नहीं देते हैं ।

और पिछले विधानसभा चुनाव में यही देखा गया था , क्योंकि कांग्रेस में हार जीत के मंथन की परंपरा नही है और छोटे कद के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुनी नहीं जाती वैसे महन्त जी के  प्रदेशकांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल निर्विवादित रहा हैं । लेकिन उनके इर्दगिर्द के साथी जो कूट राजनीति में माहीर माने जाते हैं वो इनके तरक्की के लिये सबसे बड़े बाधक बने हुए है । वैसे कांग्रेस में दिग्गज नेताओं की कमी नहीं है लेकिन बिचौलियों के चलते कांग्रेस हमेशा  नुकसान में रहती हैं ,अब देखना ये हैं कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व समय रहते सही कदम उठता है या आँख मूंदकर संगठन का भट्टा बैठाने वालों पर ही भरोसा करता है ये तो आने वाला समय ही बता पायेगा ?


आईना हमने दिखाया तो बुरा मान गए

आईना हमने दिखाया तो बुरा मान गए

23-Apr-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

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सामन्तवादी सोंच और तानाशाही रवैये का ताज़ातरीन उदाहरण है कांग्रेस का मीडिया विभाग-काँग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष द्वय शिव डहरिया और रामदयाल उइके के साथ हुई अपमान जनक घटना से इसे देखा जा सकता हैं, नेता द्वय को दलित और आदिवासी के मामले में बोलने नही दिया गया और वे दोनों प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर चले गए क्या ? ये अपमान जनक घटना नही है ! जिन  दलित और आदिवासियों के वोटों से ये सत्ता में बैठने का सपना देख रहे है उन्ही के साथ भेदभाव  का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा, यहाँ लगता तो ऐसे ही हैं | की छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का संचार और  मीडिया विभाग जाती और धर्म के हिसाब से बोलने का अधिकार देता है ? 
और इनसे उम्मीद भी क्या की जा सकती हैं !

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छत्तीसगढ़ में दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज अपना वोट क्यों दे कांग्रेस को ?  वोट हमारा और राज तुम्हारा अब ये नहीं चलने वाला है | जब संगठन में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इन्हें नहीं दिया गया तो इनसे सत्ता में भागीदारी की क्या उम्मीद की जा सकती है? आज का ये सबसे बड़ा सवाल है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है छत्तीसगढ़ की प्रदेश की वर्तमान कार्यकारिणी का प्रतिनिधित्व, जिसमे अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपनों को दे वाली कहावत चरितार्थ हो रही है, जिसमे 1 ही परिवार के 6 सदस्य बड़े ही आश्चर्य की बात है.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस संगठन इन सभी वर्गों के पीठ में छुरा घोंपने का काम कर रही है और इन समाजों की अंधभक्ति और अशिक्षा का नाजायज फायदा उठा रही है, क्योकि कांग्रेस की परंपरा ही चरण छूने वालो की रही है, अगर किसी ने इनके खिलाफ बोलने या लिखने की कोशिश भी की तो इनके चंदा खोर चमचो की टीम लिखने वाले को गरियाने लग जाते है, शायद इसलिए की चंदा वसूली से इनका घर चलता है ?

संगठन की भलाई के लिए कहने वालो को कांग्रेस का दुश्मन समझते है ? अभी हाल ही में मेरे द्वारा एक समाचार प्रकाशित किया गया जिससे कुछ लोगों को काफी बुरा लग गया और वे सोशल मीडिया में मुझे ट्रोल करने लगे और जिस प्रकार के शब्द की उम्मीद नहीं की थी वे भी कमेन्ट बॉक्स में डाले गए. 

मै आपको बता दूँ कि मै किसी भी पार्टी या संगठन की तरफदारी नहीं कर रहा हूँ बल्कि वास्तविकता से वाकिफ करा रहा हूँ? अभिव्यक्ति की आजादी सभी को है कांग्रेस किसी के बाप की जागीर नहीं है कुछ ऐसे ही दो कौड़ी के चमचो के कारण कांग्रेस का ये हाल हुआ है !इन फूल छाप कांग्रेसी नेताओ की वज़ह से दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के लोगो को संगठन की मुख्यधारा में कभी भी आगे आने नहीं दिया, बल्कि मोर्चा–प्रकोष्ठ जैसे पद या यूँ कहे तो टुकड़े फेक कर इनके जुबान को बंद करने की कोशिश हमेशा से करते आये हैं, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में ये नहीं चलने वाला है, अब छत्तीसगढ़ की जनता समझ गई है की हमारा कौन भला चाहने वाला है ! अब दाऊ गिरी का जमाना लद गया समाज जागृत हो गया है पहले की तरह छत्तीसगढ़ की जनता दाऊ जी के दरबार में हाथ जोड़े अब नहीं खड़ी होने वाली है !

आज उत्तरप्रदेश,बिहार,आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, दिल्ली में अब ये समाज जागरूक हुआ तो पिछले 25 -30 सालों से कांग्रेस को सत्ता के लाले पड़ गए है और तब भी ये समझना नहीं चाहते, तो क्या कर सकते है ?  छत्तीसगढ़ की राजनीति में तीसरी ताकत बनकर उभर रहे अजित जोगी की पार्टी इन  समाज के लोगो का हाथ बड़े सम्मान के साथ थाम रही है और इन्हें जिम्मेदारी भी दे रही है और इनके अधिकारों को उन्हें बताने का काम भी कर रहे है ! 

कभी कांग्रेस के लिए समर्पित अजित जोगी और उनका परिवार इनके ही राजनीतिक साजिशों का शिकार हुए है, क्योंकि जोगी जी ने दलितों, पिछड़ो, अल्पसंख्यक और आदिवासियों के हितो की बात की, जिसे कांग्रेस के सामंतवादी विचारधारा रखने वाले नेता हज़म नहीं कर पाए और साजिशे कर के उनको और उनके परिवार को कांग्रेस छोड़ने के लिए मज़बूर किया, झूठा टेलीफोन टेप काण्ड का आरोप लगाया, जो की ये कांग्रेस के नेता साबित भी नहीं कर पाए और राहुल गाँधी जी को अँधेरे में रख कर इन्हें कांग्रेस छोड़ने विवश करते रहे और प्रदेश के एक कद्दावर मन्त्री की फ़र्ज़ी सेक्स सी.डी. को लेकर हो हल्ला मचाते रहे यह कांग्रेस की परम्परा को लज्जित करने जैसा है जिस सेक्स सीडी की बात कहकर नेता जी हो हल्ला मचा रहे थे वह अभी साबित भी नहीं हुआ और इस मामले में एक पत्रकार को जेल भी भुगतना पड़ा

इस सीडी को लेकर कांग्रेस जिस तरह हल्ला मचा रही थी यह सीडी फर्जी साबित होने के बाद कांग्रेस की छवि पर जो बुरा प्रभाव पड़ा है उसका जवाबदार कौन होगा ? छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के मान सम्मान को कौन धूमिल कर रहा है? कौन जातपात के भेदभाव की राजनीति कर रहा है जनता और सच्चे कांग्रेस के कार्यकर्ता जानते समझते है, अगर कोई सच लिखता है और इन्हें आईना दिखाता है तो इन चंदाखोर चमचा बाबू लोगो को बुरा लगता है क्योकि इनकी निष्ठा संगठन के प्रति ना होकर अपना भला करने में अधिक है |


राजनीति पर जातिगत राजनीति बड़ा धब्बा

राजनीति पर जातिगत राजनीति बड़ा धब्बा

08-Mar-2018

By : khulasapost magazine story

देश की राजनीति पर जातिगत राजनीति सबसे बड़ा धब्बा है. चुनाव सुधार और सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों के अलावा आम राजनीतिक बहसों पर भी गौर करें तो जातिगत राजनीति को देश के लिए सबसे मुश्किल कड़ी बताया जाता है. विडंबना देखिए कि पिछले तकरीबन 60-70 वर्षों से हमारे देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही लगभग इसी आधार पर खड़ी हुई है. उत्तर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में जातिगत राजनीती की विचार धारा आम बात है,  लेकिन आपको जानकर आश्चीर्य होगा कि दक्षिण भारतीय राज्यों में भी पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर लड़ी जाती है. हालांकि, भारत की जनता जातियों के आधार पर संगठित है । अत: न चाहते भी राजनीति को जातिगत व्यवस्था के साथ जोड़ा जाना सामाजिक विवशता है अतः राजनीतिक दलों को इस व्यवस्था का उपयोग करना ही पड़ता है अत: राजनीति मे जातिवाद का अर्थ जाति का राजनीतिकरण है ।

जाति को अपने दायरे में खींचकर राजनीति उसे अपने काम में लाने का प्रयत्न करती है । दूसरी ओर राजनीति द्वारा जाति या बिरादरी को देश की व्यवस्था में भाग लेने का मौका मिलता है । नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय संगठन का उपयोग करते हैं और जातियों के रूप में उनको बना-बनाया संगठन मिल जाता है जिससे राजनीतिक संगठन मे आसानी होती है भारत में जाति और राजनीति में आपसी सम्बध को समझने हेतु इन चार तथ्यों पर विचार आवश्यक है ।

धर्म के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण किए जाने की कोशिश होती रही है और अब देश में धर्म के नाम पर युवाओं का ध्रुवीकरण जोरों से किया जा रहा है. राजनीति के गलियारों में चलने वाली साम्प्रदायिकता की ज़हरीली हवा समाज में इस कदर घुल रही है कि इसका प्रभाव युवाओं पर हो रहा है. सभी समुदायों के धार्मिक और राजनीतिक नेता इस बात को अच्छे से जानते हैं कि नौजवान पीढ़ी के बीच ध्रुवीकरण का बीज बोने से आने वाले वक्त में उनकी सियासी फसल बेहतर हो सकती है. 

अब हालात ये हो गए हैं कि युवाओं के बीच साजिश रचने वाले धार्मिक चेहरों की सक्रियता तेजी से बढ़ी है. कर्नाटक हो, महाराष्ट्र हो या फिर हरियाणा व उत्तर प्रदेश. सभी राज्यों में अचानक युवाओं को धर्म का पाठ पढ़ाने की घटनाएं बढ़ गई हैं, जाहिर है जिनके पीछे कुछ विघटनकारी साम्प्रदायिक ताकतों का हाथ होता है शिक्षण संस्थाओं के बाहर और सार्वजिनक कार्यक्रमों में धर्म के ये राजनीतिक ठेकेदार अपना काम कर रहे हैं. युवाओं में एक-दूसरे के प्रति धर्म के नाम पर नफरत बढ़ाने का काम किया जा रहा है. छोटी-छोटी बातों पर दंगे-फसाद हो रहे हैं. मामला कोई भी हो, उसे धर्म से जोड़कर देखा जाता है.

एक तरफ दक्षिण भारत में कई सांप्रदायिक संगठन न केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपनी आक्रमक कार्रवाई को तेज करते नजर आते हैं बल्कि वैज्ञानिक सोच रखने वाले विद्वानों को भी ठिकाने लगाने पर आमादा हैं, तो दूसरी तरफ हैदराबाद के एक विवादित नेता भड़काऊ बयान देकर उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमानों के बीच जगह बनाने के लिए नई सियासी जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. 

हम किस समाज में रह रहे हैं?  एक ऐसा समाज जहाँ केवल एक शक की वजह से बिना बात के एक आदमी की जान ले ली जाती है. जहां गाय को माता बुलाने वाली हिन्दुत्व की फ़ौज 80 वर्ष की बुजुर्ग महिला की छाती पर अपने पैरों से हमला करती है. उन्हें अपने जूतों के नीचे रौंदती है. उन्ही की आँखों के सामने उनकी जवान लड़कियों के साथ अश्लील हरकतें की जाती हैं. और गौ रक्षा के नाम पर पूरे परिवार और गाँव की हज़ारों की भीड़ के सामने एक व्यक्ति को दिन-दहाड़े मौत के घाट उतार दिया जाता है. क्या हमारे देश में कानून नाम की कोई चीज़ है या नहीं? क्या हम एक सभ्य समाज में रह रहे हैं?  

इस विराट लोकतंत्र के लिए यह बेहद शर्मनाक है कि चुनाव का मुद्दा जनता की बुनियादी आवश्यकताएं न होकर अब गौ मांस बन गया है. यह नागरिक पतन की चरम परिणति है. सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाज में जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है. आए दिन कोई न कोई विवादित पोस्ट समाज में साम्प्रदायिक तनाव की वजह बन जाती है. फेक आईडी बनाकर फेसबुक और ट्वीटर पर धार्मिक उन्माद भड़काने की कोशिशें की जा रही है. देश का युवा वर्ग सोशल मीडिया पर खासा सक्रिय है. वो इससे कहीं न कहीं प्रभावित होता है. सरकार हर घटना के पीछे सियासी फायदा तो तलाशती है. लेकिन कार्रवाई करने में अक्सर देरी करती नजर आती है. 

दरअसल,  मजहबी और सियासी ठेकेदारों की ये कोशिश समाज में एक बड़ा ध्रुवीकरण करने के लिए हो सकती है. अगर भाजपा यह बात प्रचारित करती है कि उसे गत लोकसभा चुनाव में सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए डाले गये वोटों में से जो मत मिले हैं वे राजनीतिक रूप से चेतन मतदाताओं द्वारा बिना किसी लोभ लालच से दिये गये हैं, तो उसे यह भी मान लेना चाहिए कि जागरूक मतदाता बँधुआ नहीं होता है. दलों के कारनामों के प्रभाव में उसकी दिशा बदल भी सकती है. उल्लेखनीय है कि उक्त चुनाव में भाजपा की जीत काँग्रेस की अलोकप्रियता, व्यापक पैमाने पर दल बदलुओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय लोगों को चुनाव में उतारकर संसाधनों के तीव्र प्रवाह के कारण भी थी और लोगों के भावनात्मक-सांप्रदायिक उत्प्रेरण के कारण भी. 

देश की जनसंख्या का एक भाग आज भी साम्प्रदायिकता की राजनीति से प्रभावित है लेकिन वहीँ एक बड़ा हिस्सा इसमें विश्वास नहीं रखता. इस जनसमूह को वास्तविकता से परिचित कराने की जिम्मेदारी सचेत नागरिकों का है. सरकार आज दूसरे छोर पर है. जनतंत्र में सरकारें जनता की मर्जी से चुनी जाती हैं. वे तभी बेहतर होंगीं जब हम उनपर काबू रख सकेंगे. आज सरकारें बेकाबू हैं क्योंकि हम उनके जाल में स्वेच्छा से फंसे हुए हैं. अब समय है कि बहेलियों के जाल ध्वस्त किये जाएं और यह तभी संभव है जब जनता खासकर युवा असल में जाग जाएं.


हम इतना डरे हुए क्यों हैं ?

हम इतना डरे हुए क्यों हैं ?

23-Feb-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

हम इतना डरे हुए क्यों हैं ? जी हाँ, यह सवाल आप पर, हम पर, हम सब पर लागू होता है,  आज एक आम इंसान जब भी घर से निकलता है तो उसे सही सलामत अपनी घर वापसी का भरोसा नहीं रह गया है चंद लोग सत्ता के मद में इतना चूर हो गए है कि इन्हें जानवर से ज़्यादा सस्ती इंसान की जिंदगी नज़र आने लगी है, किसी जमाने में हम तालिबानों को उनकी इन्ही हरकतों पर हँसते थे आज हमारे देश में धर्म के नाम पर उन मज़लूमों पर ज़ुल्म हुए है वो क्या तालिबानियों से बत्तर नही है ?

ये हो क्या रहा है ? इस देश मे.  कहाँ है कानून का राज ? क्या तालिबानी फरमानो से देश चलेगा ? शर्म करो सत्ताधीशो, तुम्हारे वोट बैंक की राजनीति ने इस देश को गृह युद्ध की कगार पर पहुंचा दिया है । जितने मरेंगे, कटेंगे उतना राजनीतिक फायदा की उम्मीद मत करो अब जनता समझने लगी है तुम्हें ?  इलाहाबाद का दलित युवक सड़को पर बेदर्दी से मार दिया जाता है, लेकिन हत्या के जिम्मेदारों के लिए सिंहासन पर बैठे लोगो ने कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी क्योकि वो एक गरीब दलित परिवार से था वोट लेने के समय तो इन्हे सर पर बिठाते है और सत्ता मिल जाने पर ‘डेटॉल’ और साबुन से हाथ धोकर छूने को कहते है ये इंसान ना हुए भगवान हो गए । धर्म के आडम्बर में इंसानियत का खून सफ़ेद हो गया 

दलित युवक की मौत दु:खद है, शर्मनाक है । लेकिन समाज के कुछ लोग खुलेआम हत्यारो को मारने की सुपारी दे रहे है ? अभी कुछ दिनो से तमाम जाति व समाज के लोग किसी को मारने उसका सिर काटने पर ईनाम की घोषणा कर रहे है । और वहां की राज्य सरकारे मूकदर्शक बनकर हाथो पर हाथ धरे बैठी है जो की शर्मनाक है !

आखिर कब तक डर और दहशत दिखा कर राज करोगे,  कहीं ऐसा ना हो जाए की जिनकी अटूट आस्था तुम पर थी वह भी तुम्हारे वहशियाना फैसलों से तुम से दूर भागने लगे,  जब भी कोई किसी पर अत्याचार करे हिंसा को जन्म दे तो वो ही आतंकवाद होता है आप माने या न माने मुझको इससे कोई फर्क नही पड़ता है, पर सच्चाई तो यही है। आपको जनता ने एक बार मौका दिया है क्या यही आप के लिए अंतिम अवसर मान कर चल रहे है, दोबारा क्या मुंह लेकर जाओगे जनता के पास क्योकि ये प्रजातंत्र है | धर्म के नाम पर ISIS, अल कायदा, LTT आदि आतंकवादी संगठनों का इतिहास को पढ़े तो आपको मालूम होगा के वे भी धर्म के नाम पर धर्म की रक्षा के लिए या अपनी रक्षा के लिए खड़े हुवे और फिर दिन प्रति दिन क्रूर होते चले गए यही हाल अब हमारे देश का है भारत देश में कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है यदि कोई देश भक्ति के नाम पर हिंसा, और आतंक फैला कर दहशत फैलाता है तो ऐसे लोग रक्षक नही राक्षस कहलाने के हकदार होंगे ।

यह कहना कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, अब हास्यास्पद ही लगता है। विभिन्नता में भी एकता है यह नारा भी अब चुभने लगा है। भारत में कोई भी सरकार रही हो, उसने भारत की समस्याओं के हल पर गंभीरता से विचार और कार्यवाही कभी नहीं की। गैर-जिम्मेदार राजनीति के फैसलों के चलते हर वर्ष ये सम्याएँ बढ़ती चली जा रही है । दादरी में अखलाक की हत्या, फिर 2016 में ऊना (गुजरात) में गाय का चमड़ा उतार रहे चार दलित युवकों की पिटाई, इसी वर्ष राजस्थान के अलवर में पहलू खान की हत्या हो या इलाहाबाद के युवक दिलीप सरोज़ की पीट पीटकर हत्या हो इसे कोई भी कानून जायज नहीं ठहरा सकता। भीड़ की मानसिकता वाले लोगों के हौसले क्यों बुलन्द हैं क्योंकि उनमें यह विश्वास है कि हम सड़क पर उतरकर जो चाहें कर सकते हैं। पुलिस हमारे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी, फिर अफवाहें, तथ्यों की अनदेखी, एक खास समुदाय के पहनावे पर धार्मिक विश्वासों के प्रति पूर्वाग्रह या घृणा जैसी कई चीजें सड़क पर तुरन्त मरने-मारने का फैसला करने को प्रेरित करती हैं।


दलित समुदाय पर ख़तम होती मायावती की ‘माया’

दलित समुदाय पर ख़तम होती मायावती की ‘माया’

16-Feb-2018

khulasapost magazine

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ! यह नाम नहीं एक विचार है. वह सोच है जिसने भारत में सबसे पिछड़े समाज को भारत के मुख्य धारा में लाने का काम किया. आजादी के दशकों बाद भी दलित, समाज की मुख्यधारा से वंचित रखा गया , लेकिन बदलाव धीरे-धीरे आता है और आज भारत उस बदलाव के मोड़ पर खड़ा है, जब दलित खुद को दलित कहलाने से परहेज नहीं करता बल्कि उस पर फक्र करता है.

गुजरात के चुनावो में दलित एक ताक़त बनकर उभरे है जहां, इनकी एकता और ताक़त को दलितों की मसीहा कहलाने वाली मायावती ने रोकना चाहा उन्हें गुजरात के दलितों का साथ देना छोड़ खुद प्रत्याशी खड़े कर के दलितों और पिछडो को हराने का काम किया है | आपको याद दिला दे उत्तरप्रदेश सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलितों पर घटित ठाकुरों के दबंगई का ज़वाब भीम आर्मी ने दलितों की रोबिनहुड बन गयी. पिछले साल एक गांव में दलितों ने बोर्ड लगा दिया जिस पर लिख दिया- था (द ग्रेट चमार )

अपने आप को दलितों का मसीहा कहने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी की सुप्रीमो मायावती ही दलितों पिछडो और आदिवासियों की सब से बड़ी दुश्मन है, मायावती अपने झूठे अहंकार और वजूद को जिन्दा रखने के लिए अपनी ही जड़ो में मठा डालने का काम कर रही है, जिसे अब दलित और पिछड़ा समाज समझने लगा है जिसे अभी हाल ही के गुजरात विधानसभा सभा के हुए चुनावों से बेहतर समझा जा सकता 

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गुजरात चुनाव में दलित-पिछड़े और पाटीदार आन्दोलन को लेकर हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी – अल्पेश ठाकोर उभरे और उन लोगो ने जिस तरह से गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को टक्कर दी है यदि उसमे मायावती अपनी जिद में अड़ कर अपने प्रत्याशी ना खड़े किये होते और इनका समर्थन कर सहयोग करती तो चुनाव और भी दमदारी के साथ लड़ा जा सकता था ! लेकिन मायावती ने जानबूझ कर गुजरात चुनाव में वोट काटने के लिए अपने प्रत्याशी उतारे–जिससे दलित पिछड़े और आदिवासी क्षेत्र में कुछ वोट बंट गये शायद मायावती जी को ये गुमान हो चला है की पूरे देश के सर्वहारा बहुजन वर्ग इनकी निजी जागीर है – ये तब कहाँ चली गयी थी जब गुजरात में दलितों पर जुल्म ढहाया जा रहा था जिग्नेश और अल्पेश पर फर्जी केस दर्ज किये जा रहे थे.  मायावती जी की सोंच में दलितों के नाम पर अकेला खाउंगी  और किसी को खाने नहीं दूंगी वाली स्थिति है ? उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में ठाकुरों के द्वारा दलितों पर हमला किया गया और दलित समाज  की दलित आर्मी के युवा नेता रावण पर झूठे मुक़दमे बना कर जेल भेज दिया गया लेकिन उस पर कोई टिप्पणी नहीं और ना आन्दोलन और ना उसे छुड़ाने कोई प्रयास किया गया इसका सीधा सा मतलब है की दलितों में कोई नया नेतृत्व नहीं उभरने देना चाहती है मायावती ! दलितों को अपनी मुट्ठी में समझने वाली मायावती की झोली खाली हो गई 

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तीन दशक पहले बहुजन समाज पार्टी जिन मुद्दों, नारों, रणनीति, सामाजिक समीकरण और नेता के सहारे संसदीय राजनीति में उतरी थी, तीन दशक बाद भी उसी के सहारे खड़ी हैं। जबकि सच्चाई यह है कि तीन दशक में देश और प्रदेश की राजनीति और समाज में ढेर सारे परिवर्तन हो चुके हैं।

दलित और अति पिछड़े समाज में भी आर्थिक और शैक्षणिक उन्नति हुई है। लेकिन मायावती ने अपनी रणनीति में कोई ठोस बदलाव नहीं किया है। जो बदलाव किए, उसे महज सत्ता पाने तक सीमित रखा गया। पार्टी और संगठन के आंतरिक ढांचे में उन परिवर्तनों का कोई असर नहीं पड़ा।

चलिए चलते हैं 1996 में हुए वोटिंग पर जहाँ मायावती ने सहारनपुर के हरौड़ा और बदायूं की बिल्सी सीट से विधानसभा चुनाव जीता, मगर हरौड़ा से विधायकी कायम रखी। पहली बार 2007 में जब दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ के सहारे बसपा अपने बूते 206 सीटें जीती तो सहारनपुर की सात में पांच सीटें बसपा के खाते में गईं। लेकिन वर्तमान की राजनीति में इस बार हुए यूपी चुनाव में करीब 42 फीसदी मुस्लिम और 22 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी वाले सहारनपुर की सभी सीटों पर हार के साथ बसपा के भाईचारे का तिलिस्म टूट गया।

मायावती से यही मोहभंग ‘भीम आर्मी’ जैसे नए संगठनों की जमीन तैयार कर रहा है। लगातार तीन चुनाव में मायावती की नाकामी के बाद दलित भी सोचने पर मजबूर हुआ है। दलितों में अब जोश और जागृति आ चुकी है। इसी का नतीजा है कि सहारनपुर हिंसा के खिलाफ केवल सोशल मीडिया के जरिए 21 तारीख को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों की भीड़ उमड़ी। गुजरात में दलित नेता जिग्नेश मेवानी की जीत के बाद दलित राजनीति में एक नए दौर के आगाज के रूप में देखा जा रहा है। वक्त के साथ-साथ अब मायावती की ‘माया’ दलितों पर से खतम होती नजर आ रही है अब दलित समुदाय नए नेतृत्व को पसंद कर रहा है और अब वे युवा नेतृत्व पर भरोसा जता रहे हैं, हो सकता है समय बीतने के साथ-साथ मायावती भी बीते हुए समय की बात हो जाए ।


तो क्या बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होगा त्रिकोणीय मुकाबला ?

तो क्या बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होगा त्रिकोणीय मुकाबला ?

15-Feb-2018

लेख : एम.एच.जकरीया 

वर्ष 2018 के लगते ही छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है इस बार का चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने वाला है जहाँ कांग्रेस कह रही है की यह सीधे बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला है तो वहीँ जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस भी दावा कर रहा है की यह मुकाबला जोगी कांग्रेस और बीजेपी के बीच है. भले ही जनता कांग्रेस और कांग्रेस अपना पक्ष मजबूत बताए और जीत हासिल करने के दावे ठोके लेकिन सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भी इनसे टकराने के लिए एक तरह से चट्टान की तरह खड़ा हुआ है, बीजेपी पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनाव के परिणाम के आधार पर हर बूथ के लिए मंत्री, सांसद से लेकर वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर चुकी है.

हालाँकि इस बार बीजेपी के लिए यह चुनाव आसान नहीं होगा क्योंकि कुछ मंत्रियो का विवादों में फंसा रहना भी एक कारण है, लेकिन बीजेपी के लिए राहत की बात यह है की अभी विपक्ष और विपक्ष की ‘तुकड़ी’ (अलग हुई पार्टी) दोनों आपस में एक दूसरे पर हमला बोलने में जुटे हुए हैं वहीँ सत्ताधीश बीजेपी धीरे-धीरे अपने काम में लगा है और  चौथी पारी के लिए कमर कस ली है। बीजेपी अपनी तमाम खामियों को दुरुस्त करने में जुट गया है।

खासतौर पर उन सीटों पर जोर आजमाइश ज्यादा है, जहां बीजेपी कमजोर हो रही है। बीजेपी ने इस बार 66 सीटो पर जीत दर्ज करने का लक्ष्य रखा है चूंकि लक्ष्य बड़ा है और उस लक्ष्य को साधने संगठन के सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है, लिहाजा कवायद तेज हो गई है।  


कांग्रेस पार्टी में जहाँ गुटबाजी की खबरे आती रहती है वहीँ बीजेपी भी इसका कुछ-कुछ शिकार होते नजर आ रही है, ऐसा हम दावा नहीं करते परन्तु करीब 3-4 महीने पहले बीजेपी की राष्ट्रीय महासचिव सरोज पांडे ने यह कहकर माहौल गरमा दिया है कि अगले मुख्यमंत्री का चयन पार्टी आलाकमान तय करेगी. सरोज पांडे का यह बयान मुख्यमंत्री रमन सिंह को सीधे चुनौती देने वाला माना जा रहा है. सरोज पांडे ने बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में मुख्यमंत्री का राग छेड़कर बीजेपी नेताओं के बीच अच्छी-खासी बहस छेड़ दी.

इस बयान के पहले भी कोरबा में उन्होंने राज्य में बीजेपी नेतृत्व को लेकर ऐसा ही बयान दिया था. और वही बयान उन्होंने फिर दोहराया कि छत्तीसगढ़ में अगली सरकार बनने पर सीएम कौन बनेगा इसका फैसला चुनाव के बाद होगा. तो पार्टी महासचिव के सुर में सुर मिलाते हुए राज्य के गृह मंत्री राम सेवक पैकरा ने भी कहा कि चौथी बार मुख्यमंत्री कौन बनेगा इस पर फैसला राष्ट्रीय कार्यसमिति ही लेगी. 

दरअसल बीजेपी के भीतर नेताओं का एक दबाव समूह बन गया है. जो एन केन प्रकारेण मौजूदा मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने के लिए जोर आजमाइश में जुटा है. इसके लिए आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग पार्टी फोरम में उठाई जा रही है. इसके पीछे दलील दी जा रही है कि छत्तीसगढ़ का निर्माण ही आदिवासी राज्य के रूप में किया गया था. तत्कालीन समय इस वर्ग की भावनाओं का आदर करते हुए कांग्रेस आलाकमान ने बतौर आदिवासी मुख्यमंत्री अजित जोगी की ताजपोशी की थी. राज्य के आदिवासी नेता इसकी मिसाल देते हुए बीजेपी आलाकमान से भी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने लगातार तीसरी बार कांग्रेस को धूल चटाई है. हालांकि 2003, 2008 और 2013 में वोटों का अंतर लगातार घटता गया है. 2013 के विधानसभा चुनाव में यह अंतर घटकर एक फीसदी से भी कम हो गया. जहां बीजेपी को 42.34 फीसदी वोट मिले, वहीं कांग्रेस को 41.57 फीसदी. इस तरह से वोटों का अंतर सिमटकर 0.7 फीसदी तक आकर रह गया है.
अंतु-परंतु के बीच कुछ राजनीतिक परिस्थितियां भाजपा के भी अनुकूल है. इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की मौजूदगी. यह कांग्रेस की ही बी पार्टी है जिसे मुख्यमंत्री रमन सिंह तीसरी शक्ति मानते हैं तथा चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बताते हैं। यह स्थिति उनके लिए मुफीद है. चुनाव में इस पार्टी की उपस्थिति से भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन होगा जिससे पार्टी की राह आसान हो जाएगी।

बिलकुल वैसे ही जैसे वर्ष 2003 में हुआ था एक प्रकार से 2003 फिर अपने आप को दुहराएगा. उस चुनावी वर्ष में जो नए राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ का पहला विधानसभा चुनाव था, विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस के प्रतिबद्ध वोटों का ऐसा विभाजन किया कि भाजपा सत्ता में आ गई. एनसीपी प्रदेश में कांग्रेस की बी पार्टी थी जो भाजपा की जीत का कारण बनी. इस समय भी वही परिस्तिथियाँ है इस बार बी पार्टी का नेतृत्व अजीत जोगी कर रहे हैं. हो सकता है इसका लाभ फिर बीजेपी को मिले ऐसे में बीजेपी चाहेगी अगला चुनाव त्रिकोणीय हो ताकि उसकी संभावनाएं जीवंत रहे


नया रायपुर में कर्मचारियों के लिए प्रतिमाह रुपए 1817 में सिटी बसें अनुबंधित

नया रायपुर में कर्मचारियों के लिए प्रतिमाह रुपए 1817 में सिटी बसें अनुबंधित

15-Feb-2018

नया रायपुर में कर्मचारियों के लिए प्रतिमाह रुपए 1817 में सिटी बसें अनुबंधित । इस कार्य के लिए नया रायपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी और नगर निगम सिटी  बस लिमिटेड के मध्य अनुबंध संपन्न। उपरोक्त दरें राज्य शासन द्वारा अनुमोदित है जिसके लिए NRDA और नगर निगम के मध्य  एमओयू किया गया. यह अनुबंध 2 वर्ष के लिए किया गया है। वर्तमान में लगभग 5000 कर्मचारियों के लिए यह बसें चलेंगी। 75 बस इस अनुबंध के तहत चल रहे हैं ।बीआरटीएस की बसे इसके अतिरिक्त हैं। बीआरटीएस की बसों से लगभग 450 कर्मचारी आना जाना करते हैं। आम आदमी यदि रेलवे स्टेशन से नया रायपुर के जंगल सफारी तक सफ़र करता है तो उसे ₹35 किराया लगता है किराए की दर प्रति 5 किलोमीटर परिवर्तित होती हैं। तत्पर बीआरटीएस बसों में लगभग 3000 यात्री प्रतिदिन आवागमन कर रहे हैं


रमन सिंह के विरुद्ध जंग को तैयार जोगी

रमन सिंह के विरुद्ध जंग को तैयार जोगी

14-Feb-2018

लेख : एम.एच. जकरीया 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री और भाजपा का चेहरा डॉ रमन सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ने का फैसला किया है। जो की चौकाने वाला है, आज तक कांग्रेस के नेता अजित जोगी को डॉ रमन सिंह का साथ देने वाला सहयोगी बता कर आरोप लगाते रहे हैं,  अगर हकीकत में ऐसा होने वाला है तो राजनाँदगाँव का चुनाव पुरे भारत देश में कौतुहल का केन्द्र होगा !

वैसे भी कांग्रेस हमेशा से जोगी जी पर भाजपा को सहयोग देने का आरोप लगाते रहे हैं शायद उनका ये निर्णय अपने आप को राजनैतिक रूप से परखने का हो सकता है वैसे कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने इसे मिली जुली गीदड़ भबकी बता कर कटाक्ष किया है  | वैसे इस निर्णय पर जनता की मुहर लगाने और चुनावी शंखानंद करने, जोगी जी 11 फरवरी को रायपुर से राजनांदगांव जाने वाले है, ऐसा उनके द्वारा कहा जा रहा है की राजनांदगांव की जनता के बीच इस निर्णय की अधिकृत घोषणा करेंगे।

अजित जोगी ने फेसबुक लाइव में जनता को सम्बोधित करते हुए अपने बयान में उन्होंने कहा है की डॉ. रमन सिंह से छत्तीसगढ़ के दुखी किसानों का बदला, हताश, बेरोजगार युवाओं का बदला, पीड़ित महिलाओं का बदला और परेशान व्यापारियों का बदला लेने और इन वर्गों का भाग्य बदलने, अजीत जोगी ने, मुख्यमंत्री रमन सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार-मुक्त अत्याचार-मुक्त, बेरोजगारी-मुक्त और शराब-मुक्त बनाने के लिए, रमन-मुक्त करना आवश्यक है इसलिए अजीत जोगी  मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे और उन्हें पराजित कर छत्तीसगढ़ के नवनिर्माण की नींव रखेंगे ।

 वैसे चुनाव में हार जीत का फैसला तो जनता करती है लेकिन अचानक से इस तरह का ऐलान कई तरह से चौकाने वाला है | वैसे राजनैतिक हलको में ये भी चर्चा का विषय है की जोगी दबाव बनाने के लिए इस तरह की चौकाने वाली घोषणा करते रहते है, अब ये तो आने वाला समय ही बतायेगा की वहां किस तरह की राजनैतिक स्थिति बनती है, वैसे किसी भी तरह से डॉ. रमन सिंह को कमजोर समझना भी उनकी नादानी होगी क्योकि शुरुवात से ही राजनांदगांव उनका कर्म क्षेत्र रहा है छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने अपने विकास कार्यो के चलते राजनांदगांव का काया पलट कर दिया है अब वो 15 साल पहले वाला राजनांदगांव नहीं रहा और ना ही पहले वाली सोच वाली जनता, की इतनी आसानी से मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह को टक्कर दे सके और उन्हें हरा सके ये निश्चित तौर पर जोगी के लिए आत्मघाती कदम माना जायेगा, क्योकि उनकी नव निर्मित राजनैतिक पार्टी जोगी कांग्रेस छत्तीसगढ़ में पहली बार चुनावी मैदान में उतरने वाली है ऐसे में जोगी जी एक ही विधानसभा चुनाव क्षेत्र में घिरना नहीं चाहेंगे, वो अपनी पूरी ताक़त से छत्तीसगढ़ में अपनी राजनैतिक स्थिति को मज़बूत करने एड़ी–चोटी का जोर लगा देंगे, ऐसे में राजनांदगांव विधान सभा से मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के विरुद्ध उनका चुनाव लड़ना उनकी अपनी ही पार्टी के लिए घातक साबित हो सकता है !

अभी विधानसभा चुनाव में समय है अभी कई तरह के फैसले और समीकरण बदलेंगे क्योंकि  राजनीति में कुछ भी स्थिर नहीं होता, राजनेता अपने राजनैतिक फायदे के लिये इस तरह की घोषणाएं करते रहते है, वैसे जिस तरह से वर्तमान में राजनैतिक माहौल दिखाई दे रहा है कुछ भी कहना मुनासिब नहीं होगा !

छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस से अलग हुए अजित जोगी राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते रहे है पिछले 15 वर्षो से छत्तीसगढ़ की राजनीति में जितनी कठिनाई और विरोध तरह-तरह के आरोपों को झेलने के बाद भी उन्होंने सभी प्रतिकूल परिस्थियों  का डटकर मुकाबला किया है इसमें कोई दो राय नहीं है | आने वाले  वर्ष 2018 का विधानसभा चुनाव अजित जोगी का राजनैतिक भविष्य तय करेगा क्योकि ये उनके लिए अब आर-पार की लड़ाई है |

सोशल इंजिनियरिंग में माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले अजित जोगी को हल्का समझना कांग्रेस– भा जपा को फिर से भारी पड़ने वाला है, क्योकि पदयात्रा और रैली की भीड़ देख कर अति उत्साहित हो रहे कांग्रेस के बड़े नेता ये बेहतर समझते है की विधानसभा चुनाव आने पर टिकट बाँटने के बाद कई टिकट के दावेदार इधर से उधर होने वाले है क्योंकि उस समय संगठन की वफादारी नहीं वो अपना अस्तित्व बचाने में सारी निष्ठा भूल जायेंगे | वैसे भी कांग्रेस ने अपनी पुराने नेतृत्व पर भरोसा किया है, कई जिलाध्यक्ष और पदाधिकारियों के बदले जाने की सम्भावना है ऐसे में अभी बहुत कुछ अभी होना बाकि है, क्योकि राजनीती में कुछ भी नहीं कहा जा सकता |

वैसे देखा जाये तो कांग्रेसियों की नजर में यह बदलाव संभावनाओं से भरा नज़र आ रहा है और इसके कई सकारात्मक पक्ष भी हैं। वर्तमान में मैडम जोगी के कांग्रेस से जाने के बाद और जो बची खुची संभावनाएँ थी वो भी अब खतम हो गई है | पिछले 16 साल से चल रही कांग्रेस में नेतृत्व की लड़ाई का एक अध्याय तो निश्चित ही अब समाप्त हो गया है। वहीं अब दूसरी ओर जोगी के सामने खुद को  स्वतंत्र रूप से प्रदेश की राजनीति में अपनी ताक़त दिखाने का पूरा मौका मिला है ? अब देखना है की अजित जोगी अपनी पार्टी को स्थापित करने से लेकर एक-एक समर्थक जुटाने और उन्हें अपने मतदाता के रूप में तैयार करने और राजनैतिक चुनौती को सार्थक करने में कितना कामियाब हो पाते है ये तो आने वाला समय ही तय करेगा लेकिन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के लिए 2 की लड़ाई में फायेदा ज़रूर होने वाला है गुजरात की तरह छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है जिस पर जनता भरोसा कर सके ।

लेकिन भाजपा के लिए जोगी जी की नई पार्टी से  सतनामी समाज के प्रभाव वाले सीटों को बचाने की चिंता है। वहीं, कुछ आदिवासी सीटों पर भी जोगी के प्रभाव से कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में कही ऐसा ना हो की जोगी जी की राजनीती का उदय हो और वो किंग मेकर की भूमिका में आ जाये और कांग्रेस और भाजपा को उनसे ही आस लगानी पड़ जाये क्योकि जनता का मूड कब किस करवट पलट जाये ये तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन कांग्रेस और भाजपा की अब पहले जैसी स्थिति नहीं रह गई है और ना ही वो परम्परा गत वोट बैंक बचे है जो आँखे मूंदकर इन्हें वोट दे दिया करते थे ! इसका बहतर उदाहरण उत्तरप्रदेश -बिहार -गुजरात -मध्यप्रदेश – से समझ सकते है जहाँ इनकी गुटबाजी और  हठधर्मिता के कारण इनसे सत्ता इनके हाथ से चली गई ? राजनीतिक के प्रेक्षक अभी से इस आंकलन में जुट गए हैं कि जोगी छत्तीसगढ़ के चुनाव में कितने प्रभावी हो सकते हैं या रहेंगे । आंकलन की परीक्षा के लिए 2018 तक तो इंतजार करना ही होगा ?


पत्रकारिता बन गई अब केवल कॉर्पोरेट मीडिया !

पत्रकारिता बन गई अब केवल कॉर्पोरेट मीडिया !

08-Feb-2018

लेख : एम.एच. जकरीया 

वर्तमान समय में पत्रकारिता ने कॉर्पोरेट मीडिया का रूप ले लिया है और क्यों न हो ज़रूरते तो सभी की है,  चाहे पत्रकार हो या सम्पादक या मीडिया का मालिक सभी की अपनी तरह से अपनी ज़रूरते है जिसे पूरी करने के लिए वह काम करता है कोई कह दे की मै भूखे पेट रहकर काम कर लू तो ये बाते हजम नहीं होती,  हां ये ज़रूर है की पत्रकारिता में जो इमानदारी होनी चाहिये वह अब समाप्त  होती चली जा रही है । एक दौर था जब भारत के मीडिया हाउसो को संपादक चलाया करते थे जो आज कही न कही कॉर्पोरेट हाउस के मालिकों के हाथो में चला गया है जो अब मीडिया को अपने मन मुताबिक इस्तेमाल कर रहे हैं। और यही वजह है कि संपादक और पत्रकारों में एक किसम का डर सा समा गया है। जिसके चलते वो समाज से सरोकार रखने वाली ख़बरों को छोड़ कर अपने मालिक की कही गई बेमतलब की अफवाहों को ख़बरों में तब्दील कर रहे 

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 मीडिया हाउस के कॉर्पोरेट हाउस में बदलते ही उनमें राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप भी बढ़ने लगते हैं जिसका उदहारण आपको आपके टीवी में रोज दखने को मिल ही जाता है। कुछ मीडिया चैनलों ने तो मानो किसी न किसी राजनीतिक पार्टी और उसकी विचारधारा के प्रचार का पूरा ठेका ही उठा रखा है। देखा जा रहा है की पत्रकारिता ने आज के इस आधुनिक परिवेश में तुच्छ पत्रकारिता का रूप ले लिया है, वर्तमान न्यूज़ चैनलो में अब देश हित के मुद्दे और घटनाओ के स्थान पर बे मतलब की प्रायोजित बहसों ने ले लिया है जिससे समाज में एक नई मानसिकता को जन्म देने का काम कर रही है और यही मानसिकता लोगों को धर्म के आधार पर एक दुसरे से बाँटने का काम कर रही है, और यह मानसिकता अब क्रूरता का भयानक रूप लेते जा रही है,  हाल की दिल दहला देने वाली घटनाओ को देखे तो इंसानियत पर से भरोसा ही उठता चला जा रहा है और यह सवाल जहन में आता है की क्या यही लोकतंत्र है ?

वर्तमान में पत्रकारिता को पूंजीवाद ने ज़कड़ रखा है जिसका ताज़ातरीन उदाहरण है गुजरात का चुनाव जहां कॉर्पोरेट प्रायोजित मीडिया ने जिस तरह से भ्रम फ़ैलाने का काम किया उसे सभी ने महसूस किया है ? क्या यही पत्रकारिता है ? क्या पत्रकारिता का स्तर इतना नीचे गिरता जा रहा है, इन प्रयोजित मीडिया ने समाज में अपनी जड़ता बिखेरे दी है,  पैसे लेकर किसी एक पक्ष/राजनितिक पार्टी विशेष के हित में खबरों का प्रचार एवं प्रसार किया जा रहा है,  

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मीडिया चैनल भी दलगत विशेष हो चुके है, जिसका जीता जागता उदाहरण हमने हालिया चुनावो में देखा है जहाँ जनता और सच्चाई की आवाज़ को दबा दिया गया और कुछ राजनितिक दल इन चैनलो के मालिकों को पैसे, पद, प्रतिष्ठा का  लालच देकर अपना एवं अपनी राजनितिक दलों का काम आसानी से करवा रहीं है. और मन चाहा झूठ जनता के सामने खबरों के रूप में परोसने का काम कर रहे है ? अब पत्रकारों की विश्वसनीयता और पत्रकारिता के मूल्यों पर सवाल खड़े होने लगा है. अब लोग पत्रकारों को बड़े ही हेय दृष्टि से देखने लगे है | आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद अहम करार देने से हम नहीं हिचकिचाते. और कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के साथ हम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हवाला देकर  हम वे पत्रकार हैं जो उनसे सवाल पूछते हैं जो हम पर और देश पर राज करते हैं, उन्हें हर मौके पर चुनौती देते हैं. हम दिन भर के अहम मुद्दों पर सार्वजिनक बहस करते हैं, जब वही निर्णय करने वाले गलती करते हैं तो हम उनकी आलोचना करते नहीं थकते हैं और उन लोगों पर फैसला सुनाते हैं

लेकिन अब अपने आप को "निष्पक्ष" घोषित करने वाली मीडिया जगत से जुड़े हुए मठाधीशों को अब आंच महसूस होने लगी है, लगता है, जिनकी भाषा में अब बदलाव आने लगा है । कभी "असहिष्णुता" पर तीख़ी बहस और मन्दिर मस्जिद और 3 तलाक के नाम पर डिबेट करने वाले न्यूज़ चैनलो को भी अपनी खोती लोकप्रियता का अहसास होने लगा है ? आप हर रोज़ जनता को नाराज़ करने लायक हरकतें करते रहेंगे तो जनता आपको कब तक बर्दास्त करेगी । एक ना एक दिन तो जनता के सब्र का बाँध टूटने ही वाला है ! कब तक आप के अनर्गल प्रलाप को जनता देखेगी  ।   लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला भारतीय पत्रकारिता बस राजनेताओ की एक ताकत बन कर रह गया है। वर्तमान समाचार जगत- मीडिया, के हाव-भाव देखकर लगता नहीं कि अब इन्हें देश की कोई चिंता है। चिंता बची है तो केवल टीआरपी की।


कांग्रेस के ‘रण छोड़’ प्रत्याशियों को राहुल गाँधी की खरी-खरी

कांग्रेस के ‘रण छोड़’ प्रत्याशियों को राहुल गाँधी की खरी-खरी

03-Feb-2018

एम.एच. जकरीया  की कलम से 

कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी बुरी परम्परा चली आ रही है, कुछ धनाड्य और कथित ऊँची पहुँच वाले जुगाडू सेटिंग बाज़ नेता अपनी सुविधाओ के हिसाब से चुनाव लड़ने के लिए अपनी सीट बदलते रहते है ! वर्ष 2018  में छत्तीसगढ़ राज्य में आगामी विधान सभा के चुनाव होने जा रहे है ऐसे में कांग्रेस पार्टी में उम्मीदवारों में चुनाव में अपनी टिकट को लेकर उथल - पुथल मची हुई है | कुछ ही कांग्रेस के नेताओ को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर दिग्गज नेताओं की हालत इस चुनाव में पतली नज़र आ रही है ! और उनके जीत पाने की सम्भावना भी लगभग गौण है, ऐसे में कुछ कांग्रेस के हारे हुए पूर्व विधायक किसी और विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की जुगाड़ में लगे हुए है ! लेकिन कांग्रेस आला कमान के सूत्रों से सुनाई में आ रहा है की AICC के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गाँधी का स्पष्ट आदेश है की जो जहाँ से चुनाव लड़ा है उसे दूसरे विधानसभा से टिकट नहीं दिया जायेगा, तब से दूसरे के विधानसभा क्षेत्र में नज़र गड़ाए नेताओ के पसीने छूटने लगे है |

छत्तीसगढ़ में भी जैसे जैसे विधानसभा चुनाव 2018 निकट आते जा रहे हैं वैसे-वैसे राजनीतिक दलों की चुनावी तैयारियां तेज होते जा रही हैं. हालाँकि चुनाव वर्ष के अंतिम अक्टूबर-नवम्बर माह में होने को है लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ने चौतरफा मोर्चा बंदी करना शुरू कर दिया  है । इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के प्रभारी कांग्रेस पार्टी के महासचिव पी.एल. पुनिया ने अपनी रणनीति पर राहुल गाँधी से मुहर लगवाकर चुनावी जंग के लिए कमर कसने की घोषणा कर दी है । 

लेकिन कांग्रेस का मुख्यमंत्री का चेहरा स्पष्ट नहीं हो रहा है। क्यों की कांग्रेस में टिकट बॅटवारे के बाद ही स्थिति साफ होगी की कांग्रेस कितनी मज़बूती के साथ चुनावी समर में कामियाबी का डंका बजाने वाली है, क्योकि चुनाव लड़ने की  मह्त्वकांक्षा पाले हुए कई नेताओ की कांग्रेस के प्रति वफादारी तब स्पष्ट हो जाएगी और इनमे से कई जोगी कांग्रेस और भाजपा में पलटी मार सकते है क्योकि आज भी कांग्रेस के बड़े पदों पर वही फूल छाप कांग्रेसी है जिन्हे संगठन की वफादारी से कोई लेना देना नहीं है उन्हें केवल सत्ता सुख चाहिए वैसे इस टाइप के एक दो नेताओ ने तो अभी से अपने हारे हुए क्षेत्र को छोड़ कर दूसरे विधानसभा क्षेत्र में दौरा करना शुरू भी कर दिया है ऐसे में उन विधानसभा क्षेत्र के ज़मींन से जुड़े कार्यकर्ताओ का मनोबल टूटना स्वाभाविक है और पार्टी से पलायन और बगावत होने की पूरी सम्भावना है और कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण यह भी है कि, कांग्रेस में फूल छाप कांग्रेसी ही सत्ता सुख का आनंद लेते है बाकि निष्ठावान कार्यकर्ता मनमसोस कर रह जाते है, क्योकि कथित पूंजीपति रण-छोड़ दास फूल छाप कांग्रेसी अपने पैसो से टिकट खरीदते है और उस क्षेत्र के कार्यकर्ताओ को चंद पैसो में खरीदकर अपना गुलाम समझने लगते है ,जिससे वफादार कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता घर बैठना पसंद करते है और यही कांग्रेस पार्टी के पतन का कारण बनता जा रहा है |

छत्तीसगढ़ राज्य में पिछले करीब 15 वर्षो से कांग्रेस सत्ता से बाहर है, और बहुत हद तक कांग्रेस का सत्ता से बाहर रहने की वजह है की कांग्रेस अपनी परम्परागत वोट खोती चली जा रही है, एक समय इन्ही पूंजीपतियों और सामंतवादी नेताओ को दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यक और आदिवासी वोट आँख मूंदकर मिल जाते थे लेकिन अब ये समाज जागृत हो चूका है और अपने अधिकार अच्छे से समझता है और यही कांग्रेस की हार की वज़ह है अब वो समय लद गए की चंद पैसो से वोट खरीद लिये जाये ? 

आज का जागरूक मतदाता अब समझदार हो गया है वो अब किसी भावना में बहने वाला नहीं है ,इसलिए पूरी समझदारी से प्रत्याशियों का चयन ही जीता सकता है कांग्रेस को आने वाले चुनाव में, नहीं तो चंद पैसो के लिए जैसे पद बेचा जा रहा है वैसे विधानसभा चुनाव के टिकटो की बोली लगी तो सत्ता में वापसी की उम्मीद छोड़ दो