सर सैयद के अफकार का नतीजा है जो भारत पूरी दुनिया में साइंस एंड टेक्नोलॉजी के मैदान में अपना परचम बुलंद कर रहा है...

सर सैयद के अफकार का नतीजा है जो भारत पूरी दुनिया में साइंस एंड टेक्नोलॉजी के मैदान में अपना परचम बुलंद कर रहा है...

21-Oct-2022

एम. डब्लू. अंसारी 

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         हर साल की तरह इस साल भी पूरे भारत में 15 अक्टूबर को मिसाइल मैन ए.पी.जे अब्दुल कलाम की 91 वीं यौमे पैदाइश और 17 अक्टूबर को 205 वां सर सैयद डे जोश खरोश से मनाया गया। इस मौके पर इन अजीम हस्तियों को खेराज-ए-अकी़दत पेश किया गया। वहीं सर सैयद अहमद और अलीगढ़ तहरीक पर रोशनी डालते हुए कई अहम पहलुओं पर अपने ख्यालात का इजहार किया। और कई जगहों पर हुकूमत हिन्द से मुतालबा किया गया कि सर सैयद अहमद खान को भारत रत्न से नवाजा जाए।

         सर सैयद के अफकार को दक्षिण भारत में लोगों ने अपनाया लेकिन उत्तरी भारत के लोगों ने कहीं ना कहीं इसमें कोताही की। यही वजह है कि आज दक्षिण भारत के मुकाबले उत्तरी भारत साइंस और टेक्नोलॉजी के मैदान में पीछे रह गए हैं। सर सैयद के जो तालीमी नजरिया और असरी तालीम को लेकर उनके जो अफकार थे कि मुसलमान तालिमी मैदान में दिगर तबके के लोगों की तरह कामयाबी की बुलंदियों को पहुंचे। ष्मिसाइल मैनष् ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने साइंस और टेक्नोलॉजी के मैदान में जो आला मुकाम हासिल किया यह सर सैयद की उसी नजरिए को अपनाने के मुतरादिफ है।

         वाजेह रहे कि गुरबत के बावजूद अपने ख्वाबों की बुलंद मंजिल को हासिल करने वाले, अपनी काबिलियत-व-सलाहियत, तहकीकात-व-तख्लीकात के जोहरों से भारत को एटमी पावर देने वाले और भारत के सबसे आला-व-बरतर ओहदे तक रसाई करने वाले आलमी शोहरत याफ्ता एक मिसाली शख्सियत के मालिक थे डॉक्टर ए.पी.जे अब्दुल कलाम।

         भारत रत्न डॉ ए.पी.जे अब्दुल कलाम की पैदाइश 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वर में हुई थी डॉक्टर कलाम ने ग्रेजुएशन के बाद दफाई तहकीकाती इदारे में शमुलियत अख्तियार की। जहां भारत के पहले सेटेलाइट तैयारे पर काम हो रहा था। इस सैयारचे की लॉन्चिंग में डॉक्टर कलाम की खिदमात को सुनहरी रूप में लिख दिए गए हैं। इसके अलावा प्रोजेक्ट डायरेक्टर के तौर पर उन्होंने पहले सेटेलाइट जहाज ष्ऐसेल्यवाष् की लॉन्चिंग में भी अहम किरदार अदा किया। उन्होंने 1974 में भारत का पहला मिसाइल तखलीक़ करके पूरी दुनिया में भारत को बुलंद मुकाम दिया। इसी खिदमत के बाइस उन्हें ष्मिसाइल मैनष् के नाम से याद किया जाता रहेगा। उनकी खिदमत सिर्फ साइंस और टेक्नोलॉजी के शोबे तक ही महदूद नहीं रही, बल्कि उन्होंने तालीमी मैदान में और सियासत में भी अपना लोहा मनवाया। उन्होंने नौजवानों को बुलंद ख्वाब देखने की तरगीब दी और उन्हें पूरा करने की तदाबीर भी पेश की। उन्होंने अपनी मुकम्मल जिंदगी के तजबार्त, मुशाहिदात, ख्यालात और तखलीकात व तहकीकीत को क़लम बंद किया। ताकि रहती दुनिया तक सभी उनकी तालीमात से मुस्तफिज हो सके।

         17 अक्टूबर गरीबी के खात्मे का आलमी दिनः- 17 अक्टूबर को गरीबी के खातमे का अंतर्राष्ट्रीय दिवसं भी है। यह दिन गुर्बत में रहने वाले अफराद की कोशिशों और जद्दोजहद को तस्लीम करने का एक मौका फराहम करता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक बहुत से लोग मुसलसल गुर्बत के शिकार हैं और अब तक एक अरब 30 करोड़ के लगभग अफराद खत-गुरबत से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। जिनमें ज्यादा तादाद बच्चों और जवानों की है और इसमें अकसरियत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और एशिया के मुल्कां में है।

         संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पिछले 1 साल में (जब लाखों अफराद मेहनत कशो के हुकुक़ और मुलाजिमत के मेयार के खात्मे के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं) कारपोरेट पावर और अरबपति तबके की दौलत में गैर मामूली इजाफा रिकॉर्ड किया गया है। गुर्बत और अदम मसावात ना- गुरेज नहीं है। यह जान-बूझकर किए गए फैसलों या इल्म की कमी का नतीजा है जो हमारे मुआशरों गरीब और पसमांदा लोगों को बेअख्तियार करते और उनके बुनियादी हुकूक की खिलाफ वर्जी करते हैं। इन तमाम मसाइल का हल यह है कि तालीमी, साइंसी, टेक्नोलॉजी, मआशी और सियासी मैदान में खुद को मजबूत किया जाए।
आज हमें एहतसाब करना चाहिए कि गुर्बत को खत्म करने के असबाब क्या हैं? हम समाज से गुर्बत को कैसे खत्म कर सकते हैं? बेशक, तमाम लोगों को आज सर सैयद की उसी तालीमी और साइंसी अफकार के साथ सियासी अफकार को भी अपनाने की जरूरत है।

         जब हर तरफ कौम-व-मिल्लत परेशानी में घिर जाए और कई मसलों से जूझ रही हो तो अपनी हिफाजत के साथ-साथ रोजी-रोटी और दीगर मसलों को अपनी इत्तिहाद और भाईचारे को बरकरार रखते हुए जद्दोजहद करनी चाहिए। यानी तालीम ही एक वाहिद रास्ता है जो समाज से गरीबी को खत्म कर सकता है। इसीलिए हमें बच्चों की तालीम के लिए स्ट्रेटजी और प्लान तैयार करने की जरूरत है। गरीब बस्तियों में नर्सरी से लेकर 12वीं तक के स्कूल कायम करना चाहिए।

         सर सैयद डे के मौके पर अलीगढ़ के फारिगी़न महज़ डिनर और दावत तक महदूद ना रहें, बल्कि कौम-व-मिल्लत के लिए काम करें। सर सैयद की तालीमी मिशन और अलीगढ़ तहरीक को आगे बढ़ाने की जरूरत है। भारत के मुस्लिम समाज में ही नहीं बल्कि दीगर समाज में भी क्लासलैस और कास्टलेस सोसाइटी के लिए काम करें। गोदी मीडिया जो आज मुल्क का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहा है उसके खिलाफ ए.एम.यू के फारिगीन को काम करने की जरूरत है। मुल्क आज इकदसादी, तालीमी, सेहत और महंगाई समेत और भी कई तरह के मसलो मसाइल से जूझ रहा है, जो बाइसे फिक्र और बाइसे तशवीश है। इस के लिए भी ए.एम.यू के फारिग़ीन समेत दीगर समाजी दानेश्वरों को काम करने की जरूरत है।
                                                     मुनव्वर अहमद
                                                     कार्यालय सचिव
बे-नज़ीर अंसार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी
उसिया रिसॉर्ट (क्वीन्स होम) कोह-ए-फ़िज़ा, अहमदाबाद पैलेस रोड, भोपाल 462001 (म.प्र.)



मल्लिकार्जुन खड़गे बने कांग्रेस के नए अध्यक्ष...

मल्लिकार्जुन खड़गे बने कांग्रेस के नए अध्यक्ष...

19-Oct-2022

एजेंसी 

नई दिल्ली :  मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के नये अध्यक्ष चुने गए हैं, उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी शशि थरूर को पराजित कर जीत हासिल कर ली है. सुबह 10 बजे के बाद से चली वोटों की गिनती दोपहर  1.30 तक चलती रही. जिसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव के नतीजे आज घोषित कर दिए गए हैं. वोटों की गिनती एआईसीसी मुख्यालय में हुई. कांग्रेस के 137 साल के इतिहास में अध्यक्ष पद के लिए इस बार छठी बार चुनाव हुआ है और 24 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब कांग्रेस को गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष मिला है.

नए अध्यक्ष के सामने होंगी बड़ी चुनौतियां 
नए अध्यक्ष के सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है. नि:संदेह इसमें कांग्रेस नेताओं के पार्टी छोड़ने के सिलसिले पर ब्रेक लगाना सबसे मुश्किल चुनौती है. बुधवार को मतगणना के बाद नए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित होना तय माने जा रहे मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए अपने नेतृत्व के प्रति विश्वास का भाव पैदा किए बिना पार्टी संगठन की राजनीतिक क्षमता में उम्मीदों का पंख लगाना आसान नहीं होगा. 


ए.ए.मयू ओल्ड बॉयज एसोसिएशन भोपाल ने जोशो-खरोश के साथ मनाया सर सैयद डे

ए.ए.मयू ओल्ड बॉयज एसोसिएशन भोपाल ने जोशो-खरोश के साथ मनाया सर सैयद डे

18-Oct-2022

 एम.डब्ल्यू.अंसारी

आज जो भारत पूरी दनियां में टेक्नोलॉजी के मैदान में अपना परचम बुलंद कर रहा है यह सर सैयद के उसी अफक़ार की देन हैः एम.डब्ल्यू.अंसारी

         हर साल की तरह इस साल भी ए.एम.यू ओल्ड बॉयज एसोसिएशन भोपाल में 205 वां सर सैयद डे जोश खरोश से मनाया। इस मौके पर तमाम मेहमानान और शिरकत करने वालों ने सर सैयद अहमद खान को खेराज-ए-अकीदत पेश की। इसके साथ ही स्टेज पर जलवा अफरोज मेहमानान ने सर सैयद डे के मौके पर सर सैयद और अलीगढ़ तहरीक पर रोशनी डालते हुए कई अहम पहलुओं पर अपने ख्यालात का इजहार किया। वहीं, जनाब महेंद्र बौद्ध, बेगम रफीक़ा मुमताज, मोहतरमा अनुराधा शंकर, जनाब फैज अहमद किदुवाई, जनाब नवाब रजा, मोहतरमा सूफिया फारूकी वाली, जनाब एम. डब्ल्यू. अंसारी और जनाब क़ाजी मोहम्मद इकबाल समेत तमाम मेहमानान और शुरका ने एक आवाज होकर हुकूमत हिंद से मुतालबा किया कि सर सैयद अहमद खान को भारत रत्न से नवाजा जाए।

        सर सैयद डे के मौके पर ए.एम.यू.ओ.बी.ए मंज से शुरका ने अपने ख्यालात का इजहार करते हुए कहा कि सर सैयद ने भारत वासियों में साईंसी मिजाज पैदा करने का जो पैगाम दिया था उस की मानवियत रोज-बरोज बढ़ती जा रही है।

छत्तीसगढ़ के साबिक डी.जी. जनाब एम. डब्ल्यू अंसारी ने कहा कि आज जो भारत पूरी दुनियां में टेक्नोलॉजी के मैदान में अपना परचम बुलंद कर रहा है यह सर सैयद के उसी अफकार की देन है, जो उन्होंने भारत-वासियों में साईंसी मेजाज़ की दाग़-बेल डाली थी।

        वजह रहे कि सर सैयद अहमद खान (रह) एक जात और शख्स का नाम नहीं है बल्कि एक फिक्रए एक राह और एक मंजिल का नाम है। वह फिक्र-ए-इंसानियत को मेराजे कमाल तक पहुंचाने की, वह राह है तालीम की और वह मंजिल है दोनों जहान में सुरखुरूई की। सर सैयद अहमद खान को सच्चा खेराजे अकीदत उनकी शान में सिर्फ क़सीदा खानी नहीं बल्कि हर अंधेरी डगर पर इल्म का चिराग रोशन करना है।

        एम यू के तलबा/फारिगीन ने सर सैयद की तालीमी मिशन और अलीगढ़ तहरीक को कितना आगे बढ़ाया? भारत का गरीब तबका एस.सी, एस.टी, ओ.बी.सी आज किस तरह के चौलेंजेज  का सामना कर रहा है? भारत के मुस्लिम समाज में ही नहीं बल्कि दीगर समाज में भी क्लास-लैस और कास्ट-लेस सोसाइटी के लिए ए.एम.यू के फारिगीन किया एकदामात कर रहे हैं। गोदी मीडिया जो आज मुल्क का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहा है उसके खिलाफ ए.एम.यू के फारिगी़न किस तरह का रवैया अख्तियार कर रहे हैं? और मुल्क किस तरह के मसलो-मसाइल से जूझ रहा है? ये बाइसे-फिक्र और बाइसे-तश्वीश है। इसके लिए काम करने की जरूरत है। एम यू के तलबा इसमें बहुत ही अहम रोल अदा कर सकते हैं।

        ष्सर सैयदष् चाहते थे कि मुसलमान दीगर तरक्की याफत एकवाम की तरह जदीद उलूम व फुनून हासिल करे और तहजीबी व सियासी सतह पर भी उनसे रब्त क़ायम करे, तभी  मुसलमान तरक्की कर सकते हैं। आम मुसलमान सोचते थे कि अंग्रेजी तालीम हासिल करने से हमारा मजहब कमज़ोर होगा, ईसाई हो जाएंगे, हमारे बच्चों में गलत अफकार राएज होंगे और और वह बे-राह रवी अख्तियार करेंगे, जिससे हमारे मुआशरे में खलफशार पैदा होगा। जबकि ष्सर सैयदष् जदीद तालीम के साथ-साथ मजहबी तालीम हासिल करने पर भी जोर देते थे, क्योंकि वह जानते थे बगैर मजहबी तालीम के भी हम तरक्की नहीं हासिल कर सकते। इस हवाले से तहजीब उल अखलाक के एक मजमून में सर सैयद लिखते हैंः-

        मुझको इस बात का रन्ज है कि मैं अपने क़ौम में हजारों नेकियां देखता हूं पर ना-शाइस्ता, उनमें निहायत दिलेरी और जुर्रत पाता हूं-पर खौफनाक, उनमें निहायत क़वी इस्तेक़लाल पाता हूं-पर बेढंगा, उनको निहायत दाना और अकलमंद पाता हूं-पर अक्सर मकरो-फरेब और जोर से मिले हुए, उनमें सब्र-व-क़नाअत भी आला दर्जे की है-मगर गैर मुफीद और बे-मौका, पस मेरा दिल जलता है और मैं ख्याल करता हूं कि अगर यही उनकी उमदा-सिफतें उमदा-तालीमो-तरबियत से आरास्ता हो जाएं तो दुनिया दोनों के लिए कैसी कैसी मुफीद हों।

     सर सैयद ने वक्त के तकाजे के मुताबिक तालीम हासिल करने की तरगीब दी और मुसलमानों की तालीमी हालत बेहतर बनाने के लिए कान्फ्रेंस, कॉलेजेस, इदारे वगैरह कायम किए ताकि मुसलमान वक्त के तकाजे को समझें और इल्म हासिल करके तरक्की की राहों पर गामज़न हों। तहजीब उल अखलाक में एक जगह लिखते हैंः-

        इस वक्त हम को जरूरत है कि जिस क़दर जल्द हो सके एक तादाद कसीर और अगर कसीर नहीं तो एक तादाद माकू़ल अपनी कौम के नौजवानों की पैदा करें जो इल्म और काबिलियत में (उन उलूम में जो जमाने की हाजतों के लिए जरूरी है) सरबर-आवरदा हां। तहजीबुल-अख्लाक़, अक्टूबर 1929 पृष्ठ-44)

        अल्लामा इकबाल ने कौमो-मिल्लत की तालीमी पिछड़ापन के हालत पर अफसोस का इजहार करते हुए कहाः-
हैरत है कि तालीम-व-तरक्की में हैं पीछे
जिस कौम का आगाज ही एकरा से हुआ था
       सर सैयद ने 19वीं सदी के आखिर में मुस्लिम कौम की तरक्की व खुशहाली का जो खाका पेश किया था वह आज के इस तरक्की याफता दौर में भी उतना ही मोअसर और मोतबर है, जो उनकी बसीरत और दूर-अंदेशी की दलील है। आज भी तालीम के माहिरीन उसी नुक्ते पर इत्तेफाक करते हैं कि जदीद उलूम से बा-खबर होना और जदीद-व-बआला तालीम हासिल करना ही मुसलमानों की तरक्की व खुशहाली का वाहिद रास्ता है। उन्होंने बहुत कब्ल ही यह अंदाजा कर लिया था कि आने वाले दौर में भारत में वही कौमें इज्जत व वक़ार और तरक्की हासिल कर सकेंगे, जो जदीद उलूम और आला तालीम से खुद को पूरी तरह आ-रास्ता करेंगीं। क्योंकि आने वाला दौर साइंस और टेक्नोलॉजी का दौर है।

      मुसलमानों की हालाते जिंदगी पर तंज कसते हुए किसी ने क्या ही खूब कहा है किः-
बे-इल्म भी हमीं लोग हैं और गफलत भी है तारी
अफसोस के अंधे भी हैं और सो भी रहे हैं

        सर सैयद डे के मौके पर तमाम मेहमानान और शुरका ने एक आवाज होकर आवाज बुलंद की के तमाम अलीग मिलकर गरीब बस्तियों में ज्यादा से ज्यादा प्राइमरी स्कूल से लेकर 12वीं क्लास तक के स्कूल खोलें/खोलने में मदद करें। गवर्नमेंट की तालीम को फरोग़ देने वाली तमाम स्कीमों, रोजगार वगैरह स्कीमों को गरीबों तक पहुंचाएं। मुल्क की खिदमात के लिए जरूरी है कि सर सैयद का तालीमी मिशन, अलीगढ़ तहरीक को घर-घर तक पहुंचाएं और उसके साथ ही तमाम मुल्की मसाइल, मिल्लत के मसाइल को हल करने के लिए आवाज बुलंद करें, तभी सर सैयद डे का मनाना कामयाब होगा। और यही सही मायनों में सर सैयद अहमद खान को खेराजे-अकीदत पेश करना होगा।

        अल्लामा इकबाल का सर सैयद अहमद खान की मिशन को आगे बढ़ाने के लिए ए.एम.यू कॉलेज के तलबा के नाम एक नज्मः-
औरों का पयाम और, मेरा पयाम और है
इश्क के दर्द-मंदों का तर्ज कलाम और है
मौत है ऐशे-जादवां, ज़ोक तलब अगर ना हो
गर्दिश ए आदमी है और, गर्दिशे जाम और है
        बार-बार दोहराना और गुनगुनाना चाहिए ताकि सर सैयद के मिशन तालीम, लोगों की जेहनों को झकझोड़ता रहे। लगातार काम होता रहे। ए.एम.यू के तलबा सर सैयद के तालीमी मिशन पर ग़ामज़न रहें और उनके बताए हुए रास्ते पर चले।

        इस मौके पर मेहमाने खुसूसी मोहतरमा बेगम रफीक़ा मुमताज (साबिक सदर ए.एम.यू ओ.बी.ए), जनाब महेंद्र बौद्ध (साबिक वज़ीर दाखला एम.पी गवर्नमेंट एंड पेट्रोन, ए.एम.यू.ओ.बी.ए, भोपाल म-प्र), मोहतरमा अनुराधा शंकर (आई.पी.एस एडिशनल डी.जी पुलिस मध्य प्रदेश सरकार), जनाब फैज अहमद किदवाई (आई.ए.एस प्रिंसिपल सेक्रेट्री मध्य प्रदेश सरकार), जनाब नवाब रजा (चेयरमैन महाकौशल ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज) मोहतरमा सूफिया फारूकी वाली (आई.ए.एस कमिश्नर एम.जी.एन.आर.ई.जी.एस, मध्य प्रदेश सरकार), जनाब एम.डब्लू.अंसारी (आई.पी.एस, साबिक डी.जी. पुलिस छत्तीसगढ़ एंड पेट्रोन ए.एम.यू ओ.बी.ए भोपाल.मध्य प्रदेश), जनाब क़ाजी मोहम्मद इकबाल (सदर ए.एम.यू.ओ.बी.ए. भोपाल, मध्य प्रदेश) आदि समेत कसीर तादाद में लोगों ने शिरकत की।
                                                     
एम.डब्ल्यू.अंसारी (आई.पी.एस)
                                                          
रिटायर्ड डी.जी.

                                              


अब नैरेटिव टेररिज्म—वाह विश्व गुरु वाह!

अब नैरेटिव टेररिज्म—वाह विश्व गुरु वाह!

17-Oct-2022

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व्यंग्य: राजेंद्र शर्मा

नैरेटिव टैररिज्म यानी हिंदी में बोलें, तो आख्यान आतंकवाद का नाम किसी ने सुना था? हमने भी पहले कभी नहीं सुना था। आज सुबह ही अखबार में सुना, बल्कि पढ़ा और अपना ज्ञानवर्द्धन किया।

जम्मू-कश्मीर में स्टेट इन्वेस्टीगेटिंग एजेंसी उर्फ सिआ ने, जाहिर है कि मोदी के आशीर्वाद से तथा शाह साहब की  प्रेरणा से इस नये जुर्म की और वह भी आमूली-मामूली नहीं, बाकायदा आतंकवाद के जुर्म की खोज की है। और यह कोई लाइब्रेरी या लेबेरेटरी वाली खोज भी नहीं, एकदम जमीनी या प्रैक्टीकल खोज है।

राज्य की इस खास तफ्तीश एजेंसी ने वेब पत्रिका, कश्मीर वाला के संपादक, फहद शाह और कश्मीर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आफ फर्मास्यूटिकल साइंसेज के शोधार्थी, आला फाजिली को ठीक इसी ‘आख्यान आतंकवाद’ का अभियुक्त बनाया है। वृहस्पतिवार को सिआ की चार्जशीट ने जम्मू-कश्मीर में एक अदालत को, आतंकवाद की इसी नयी किस्म की अपनी खोज के बारे में बताया। जैसे पहले जेहाद की तरह-तरह की किस्में भारत में ही खोजी थीं, लव जेहाद से लेकर, कोरोना जेहाद वगैरह से होते हुए आईएएस जेहाद तक, अब आतंकवाद की भी और नयी किस्में खोजे जाने का रास्ता खुल गया है।

खैर! इस शुक्रवार को पूरा जम्मू-कश्मीर आतंकवाद की इस नयी खोज के बारे में जान गया और शनिवार को पूरा देश। नया हफ्ता शुरू होने तक, पूरी दुनिया हमारी इस नयी खोज के बारे में जान ही लेगी। और खोज भी कोई छोटी-मोटी नहीं, सिर्फ टॉप लेवल के पढ़े-लिखों वाले आतंकवाद की है। न गोली, न बम, न बंदूक, सिर्फ कागज-कलम और रिसर्च वाले आतंकवाद की खोज!

वैसे अर्बन नक्सल या अर्बन माओवादी या टुकड़े-टुकड़े गैंग की खोज तो, मोदी जी के राज में आने के साथ ही कर ली गयी थी। उसके मामलों में भी खासकर पढ़े-लिखों को ही जेल वगैरह में डाला गया था। फिर भी, बाकी दुनिया मोदी जी के राज की इस नयी खोज से ठीक से कनेक्ट ही नहीं कर पा रही थी। पर अब वह बाधा भी नहीं रहेगी। नैरेटिव हो या कुछ और, आतंकवाद चाहे जैसा भी क्यों न हो, उसे दुनिया झट से पहचान जाएगी। पब्लिक को उसकी बदहाली के आख्यान सुना-सुनाकर भडक़ाने वालों को, कौन सी सरकार आतंकवादी नहीं मानना चाहेगी! यानी आख्यान आतंकवाद की हमारी खोज तो हिट होकर रहेगी।

और अब तो प्रो. साईबाबा को हाई कोर्ट के फैसले के बाद भी जेल से बाहर न निकलने देकर, सुप्रीम कोर्ट ने इस मानवता के लिए बहुत ही जरूरी खोज पर अपनी मोहर भी लगा दी है। सुप्रीम जस्टिस साहब ने तो कहा भी है कि ‘दिमाग ही सबसे खतरनाक है। आतंकवादियों या माओवादियों के लिए दिमाग ही सब कुछ है।’ यानी बम-बंदूक तो सब बहाने हैं, असली खतरा दिमाग चलाने वालों से है। और इलाज तो एकदम सिंपल है। फिल्म ‘सत्या’ ने पहले ही बता दिया था: ‘‘गोली मारो भेजे में, भेजा शोर करता है’’! भारत ने प्राचीन काल में दुनिया को शून्य दिया था और मोदी काल में सारी दुनिया की सरकारों को आख्यान आतंकवाद का हथियार।

वह दिन दूर नहीं है, जब सारी दुनिया की सरकारें इस खोज के लिए, अपनी-अपनी भाषाओं में थैंक यू मोदी जी गाएंगी। अब तो विरोधियों को भी मानना ही पड़ेगा कि अमृतकाल लगते ही मोदी जी ने भारत को विश्व गुरु बना दिया है। आखिर, अमरीका ने इतनी मुश्किल से आतंकवाद खोजा था, उसकी नयी किस्म कोई यूं ही नहीं खोज लेता!

अब प्लीज यह कोई नहीं कहे कि एक ही खोज से कोई विश्व गुरु नहीं बन जाता है। हमें कोई विश्व गुरु बनने-बनाने की जरूरत नहीं है। विश्व गुरु बनने की जरूरत तो उसे होगी, जो नया-नया विश्व गुरु बनने चला हो। हम तो बने-बनाए विश्व गुरु हैं। हम तो हमेशा के विश्व गुरु हैं। हम तो तभी से विश्व गुरु हैं जब शून्य के आगे-पीछे हमारे ऋषियों ने विमान बनाए थे, हमारे मुनियों ने इंसानी धड़ों पर जानवरों के सिर लगाए थे और हमारे तपस्वियों ने एक-एक अंडे से सौ-सौ टेस्ट-ट्यूब बच्चे पैदा कराए थे। हमारे आविष्कार भले ही पश्चिम वाले चुरा ले गए हों, भले ही इस चोरी के बल पर पश्चिम वालों ने बाद में हमें गुलाम बना लिया हो, पर विश्व गुरु का अपना वह पुराना आसन, भारत ने किसी को चुराने नहीं दिया।

सच पूछिए तो हमारे घेरे होने की वजह से ही, विश्व गुरु का आसन चूंकि कभी खाली ही नहीं हुआ था, इसीलिए तो और किसी ने कभी विश्व गुरु होने का दावा भी नहीं किया। और तो और हम भी इसे भूले बैठे थे, जब तक मोदी जी ने हनुमान जी की तरह चेताया नहीं कि हम तो विश्व गुरु हैं। ऐसा परमानेंट विश्व गुरु क्या सिर्फ एक ही आविष्कार के लप्पे से विश्व गुरु के आसन की दावेदारी की बात सोच सकता है; फिर चाहे वह एक आविष्कार, नैरेटिव टैरर जैसा फाडू ही क्यों नहीं हो!

और भी बहुत हैं हमारे विश्व गुरु होने के इशारे। विश्व भूख सूचकांक ही ले लो। जब से मोदी जी ने वही-वही करने का संकल्प लिया है, जो सत्तर साल में नहीं हुआ था, तब से भूख सूचकांक पर भारत ऊपर से ऊपर ही चढ़ता जा रहा है। पर 2014 तक क्यों जाएं, पिछले साल ही दुनिया के कुल 116 देशों में भारत 101वें नंबर पर था, इस साल ऊपर चढ़कर 107 वें नंबर पर पहुंच गया है। आस-पड़ौस के सारे देश पीछे छूट गए हैं। चीन-वीन तो खैर कोसों दूर हैं ही, पर बांग्लादेश, नेपाल, भूटान तक, सब पीछे छूट गए हैं। बस एक अफगानिस्तान ही है जो अब भी हमारी टक्कर में है यानी भूख में हमसे भी दो कदम आगे है।

वैसे अगर मोदी जी ने  कोरोना के टाइम में 80 करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो अनाज की मुफ्त की रेवड़ी नहीं दी होती, तो आराम से हमने अफगानिस्तान को भी बुरी तरह पछाड़ दिया होता। वैसे, आज भूख में दुनिया भर में एक नंबर पर न सही, पर हम एक नंबर के रास्ते पर तो हैं ही। विश्व गुरु हरेक चीज में एक नंबर हो, यह भी जरूरी तो नहीं; कई बार नंबर एक बनने के रास्ते पर भी तो हो सकता है। फिर भूख सूचकांक में न सही, भूखों की संख्या बढ़ाने में तो हम दुनिया में नंबर वन हैं ही। इसमें तो कोई अफगानिस्तान हमारे आस-पास भी नहीं फटक सकता है।

और हमारे पास दुनिया का अमीर नंबर दो है, उसको भी तो याद कर लो। और जो हरेक सार्वजनिक दर्शन से पहले पोशाक बदलने वाला और हर वक्त अकेला कैमरे के फोकस में रहने वाला, प्रधान सेवक हमें ईश्वरीय कृपा से मिला है, उसका क्या?

और जो कॉरीडोर-कॉरीडोर, मंदिर-मंदिर, धर्मनिरपेक्ष संविधान की छतरी के नीचे लगभग हिंदू राष्ट्र बनने का अद्भुत चमत्कार हो रहा है, उसका क्या? और भी बहुत कुछ है हमें विश्व गुरु बनाने के लिए। फिर भी, नैरेटिव टेररिज्म की बात ही कुछ और है। विश्व गुरु के आसन से अब हमें कोई नहीं हिला सकता।                                                                    


भुखमरी : भारत की स्थिति पाकिस्तान-बांग्लादेश और नेपाल से भी बदतर...

भुखमरी : भारत की स्थिति पाकिस्तान-बांग्लादेश और नेपाल से भी बदतर...

15-Oct-2022

एजेंसी 

खुलासा : वैश्विक भुखमरी सूचकांक यानी हंगर इंडेक्स में इस बार चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. भारत में भुखमरी पाकिस्तान, बांग्लादेश और यहां कि नेपाल से भी ज्यादा है. आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में भुखमरी ज्यादा तेजी से बढ़ी है और भारत की रैंकिंग और भी ज्यादा खराब हो गई है. भारत भुखमरी से जुड़ी इस रैंकिंग में पहले से छह स्थान और नीचे गिर गया है.

पाकिस्तान-बांग्लादेश-नेपाल से भी खराब भारत की स्थिति
वैश्विक भुखमरी यानी हंगर इंडेक्स में रैंकिंग के अनुसार, 121 देशो में भारत 107वें स्थान पर आ गया है.यानी 121 देशों में भुखमरी के आंकड़ों में भारत की स्थिति 107वें पायदान पर है. बता दें कि इससे पहले भारत 116 देशों की रैंकिंग में 101वें स्थान पर था. इसमें सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है कि भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है. इस रैंकिंग में साउथ एशिया के देशों में अफगानिस्तान के बाद सबसे ज्यादा खराब हालात भारत के ही हैं. 

ये देश हैं भारत से भी बदतर स्थिति में
जीएचआई स्कोर की गणना चार संकेतकों पर की जाती है, जिनमें अल्पपोषण, कुपोषण, बच्चों की वृद्धि दर और बाल मृत्यु दर शामिल हैं.भारत से बुरी स्थिति वाले देशों में अफगानिस्तान, जाम्बिया और अफ्रीकी देश शामिल हैं. इन देशों में तिमोर-लेस्ते, गिनी-बिसाऊ, सिएरा लियोन, लेसोथो, लाइबेरिया, नाइजर, हैती, चाड, डेम, मेडागास्कर, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, यमन आदि शामिल हैं. 

भारत में दो सालों में बढ़ी है भुखमरी
बता दें कि इससे पहले साल 2020 में भारत 94वें स्थान पर था और इस बार 107वें स्थान पर है. पाकिस्तान को 99वां, श्रीलंका को 64वां, बांग्लादेश को 84वां, नेपाल को 81वां और म्यांमार को 71वां स्थान मिला है. ये सारे देश भारत से ऊपर हैं. यह रैंकिंग जीएचआई स्कोर के आधार पर जारी की जाती है. अभी भारत का स्कोर 29.1 है. यह साल 2000 में 38.8 था, जो 2012 और 2021 के बीच 28.8 27.5 के बीच रहा.

भारत में 20 लोग हर रोज भर पेट नहीं खा पाते…

ये वाकई चौंकाने देने वाला है कि भारत में करीब 20 लोग ऐसे हैं, जो हर रोज अच्छे से खाना नहीं खा पाते हैं और हर रात को उन्हें भूखे ही सोना पड़ता है. साल 2020 में साउथ एशिया में 1331.5 मिलियन लोग ऐसे थे, जैसे हेल्दी डाइट नहीं मिल पाई और उसमें से 973.3 मिलियन तो भारत के लोग थे. अगर भूख से मरने वाले लोगों का आंकड़ा देखें तो भारत में हर साल 7 हजार से 19 हजार लोग हर भूख से मर जा रहे हैं. यानी पांच से 13 मिनट में एक आदमी बिना खाने के मर जाता है.


बायर ने अपने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन पहल के तहत किसानों के लिए शुरू किया ड्रोन का व्यावसायिक उपयोग

बायर ने अपने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन पहल के तहत किसानों के लिए शुरू किया ड्रोन का व्यावसायिक उपयोग

13-Oct-2022

अभिषेक वर्मा 

भारत के 7 से ज्‍यादा राज्‍यों में धान, सोयाबीन, मक्‍का एवं कपास समेत प्रमुख फसलों और बागवानी के लिए किया जाएगा वाणिज्‍यिक स्‍तर पर प्रयोग

बायर ने 2021 में कृषि कार्यों में ड्रोन के प्रयोग को लेकर फील्‍ड ट्रायल की शुरुआत करते हुए ड्रोन की लेबलिंग के लिए रेगुलेटरी डाटा जुटाने का कार्य किया है

खेती में ड्रोन के प्रयोग का लक्ष्‍य सतत कृषि उत्‍पादकता को बढ़ावा देना, रियल-टाइम एडवाइजरी में सक्षम बनाना और किसानों के लिए उपज एवं उनकी आय में वृद्धि करना है

कृषि कार्यों में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को गति देने और सुरक्षित एवं टिकाऊ कृषि की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को मजबूती देने के लिए 'बायर सॉल्‍यूशंस' के तहत कंपनी  विभिन्‍न सर्विसेज मुहैया करा रही है

दिल्ली : स्‍वास्‍थ्‍य एवं कृषि से संबंद्ध लाइफ साइंस के क्षेत्र की अग्रणी वैश्‍विक कंपनी बायर ने इस साल खरीफ सीजन में कृषि कार्यों के लिए ड्रोन के वाणिज्‍यिक प्रयोग की शुरुआत का एलान किया है। चरणबद्ध तरीके से धान, कपास, सोयाबीन, मक्‍का एवं बागवानी की फसलों की सुरक्षा के लिए ड्रोन की सेवाएं उपलब्‍ध कराई जाएंगी। बायर कृषि ड्रोन प्रयोग की  तकनीकी विकसित करने, इंटर्नल ट्रायल शुरू करने और व रेगुलेटरी डाटा जुटाने के लिए विश्‍वविद्यायलों एवं शोध केंद्रों से गठजोड़ करने वाली पहली कंपनी है।

ड्रोन की वाणिज्‍यिक सेवाओं से पंजाब, हरियाणा, मध्‍य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्‍ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व कई अन्‍य राज्‍यों के छोटी जोत वाले किसानों को लाभ होगा। इससे फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशंस (एफपीओ) और प्रगतिशीत किसानों को भी लाभ मिलेगा। इसके माध्‍यम से ऐसे ग्रामीण उद्यमियों को नए अवसर मिलेंगे, जो बेटर लाइफ फार्मिंग (बीएलएफ) सेंटर संचालित कर रहे हैं। छोटे किसानों को ड्रोन सेवा प्रदान करने के लिए सेटअप स्‍थापित करने में रुचि रखने वालों को भी मौका मिलेगा। बायर ऐसे उद्यमियों को मशीनरी उपलब्‍ध कराएगी और उन्‍हें फसलों व उत्‍पादों के बारे में जानकारी देगी। बिजनेस सपोर्ट और ट्रेनिंग की व्‍यवस्‍था भी की जाएगी।

इस सेवा की शुरुआत पर भारत, बांग्‍लादेश एवं श्रीलंका में बायर के क्रॉप साइंस डिवीजन के कंट्री डिवीजनल हेड सिमोन-थॉर्स्‍टन वीबुश ने कहा, 'भारतीय किसानों के लिए ड्रोन टेक्‍नोलॉजी विकसित करने की दिशा में प्रोत्‍साहित करने एवं फसलों की सुरक्षा के लिए ड्रोन के वाणिज्‍यिक प्रयोग की अनुमति देने के सरकार के कदम का हम स्‍वागत करते हैं। यह सतत कृषि एवं छोटी जोत वाले किसानों की समृद्धि की दिशा में सकारात्‍मक कदम है। हम क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा सुनिश्‍चित करने के लिए कृषि क्षेत्र के उन्‍नत डिजिटलीकरण एवं मैकेनाइजेशन के माध्‍यम से सकारात्‍मक बदलाव लाने को प्रतिबद्ध हैं।'

बायर मेक इन इंडिया के लक्ष्‍य का समर्थन करती है और कंपनी ने भारत के बेहतरीन ड्रोन स्‍टार्टअप्‍स के साथ गठजोड़ किया है, जिससे किसानों को ड्रोन आधारित सर्विसेज दी जा सकें तथा ग्रामीण उद्यमियों के लिए आजीविका के नए अवसर सृजित हों।

कृषि क्षेत्र में ड्रोन के अनगिनत प्रयोग हैं, जैसे स्‍प्रे, मैपिंग एवं सर्वे के जरिये फसलों की सुरक्षा सुनिश्‍चित करना। इनकी मदद से कई मुश्‍किल कार्यों को आसानी से किया जा सकता है। इनकी मदद से खरपतवार, कीट एवं बीमारियों की रोकथाम के लिए प्रयोग होने वाले पेस्‍टिसाइड्स को पूरे खेत में समान मात्रा में छिड़कना संभव होता है। इनसे समय बचता है और किसान अन्‍य कार्यों पर ध्‍यान देते हुए अपनी आमदनी बढ़ाने में सक्षम हो सकते हैं।

 


हिंदुत्ववादीकरण का खेड़ा मॉडल... आत्मनिर्भरता भी जरूरी है!

हिंदुत्ववादीकरण का खेड़ा मॉडल... आत्मनिर्भरता भी जरूरी है!

11-Oct-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

लीजिए, अब सवा बुद्धि वालों ने इसमें भी पंख लगा दी। कहते हैं कि गुजरात मॉडल में खेड़ा जिले में मुसलमानों को खंभे से बांध कर, लाठी-डंडों से पिटाई की जो सजा पब्लिक को जुटाकर और भारत माता के जैकारे लगाकर दी गयी है, उसे मोदी जी के राज में भारत का तालिबानीकरण चाहे कोई कह भी ले, पर हिंदुत्ववादीकरण नहीं कह सकते! पर क्यों भाई क्यों? हिंदुत्ववादीकरण कहने में प्राब्लम क्या है। माना कि गुजरात मॉडल के अंदर जो ताजा खेड़ा मॉडल बना है, वह किसी तरह तालिबान मॉडल से घटकर नहीं है। तालिबान वहां पब्लिक में ऐसी ही सजाएं देते थे, ये भारत में वैसी ही सजाएं दे रहे हैं। पब्लिक ऐसे ही वहां भी नारे लगाती थी, सीटियां बजाती थी, सजा देने वालों का हौसला बढ़ाती थी, यहां भी बढ़ाती है। वहां भी किसी न किसी तरह कमजोर ही ऐसी सजाओं का निशाना बनते थे, यहां भी बन रहे हैं। वहां भी पुलिस, वकील, जज, सब खुद तालिबानी ही होते थे, यहां भी हैं। वहां भी सजा देने वाले कायदे-कानून सब पर हंसते हैं, यहां भी हंसते हैं। वहां भी कोई राज-वाज उनके बीच में नहीं आता था, यहां भी नहीं आता है। यानी सब कुछ वैसा ही है और खेड़ा मॉडल, सचमुच तालिबानी मॉडल का ही भाई है। तब भी है तो भाई ही। बेशक, दोनों का डीएनए कमोबेश एक है। इसलिए, खेड़ा मॉडल को तालिबानीकरण का मामला कहने में भी गलती नहीं होगी? पर भाई हैं तब भी हैं तो अलग। हमशक्ल जुड़वां भाई तक अलग होते हैं -- राम और श्याम। तब खेड़ा मॉडल को तालिबानीकरण कहने की ही जिद क्यों? हम भारत वाले उसे हिंदुत्ववादीकरण का मॉडल क्यों नहीं कह सकते!

वैसे भी दोनों में इतनी समानताएं होने का मतलब यह नहीं है कि दोनों मॉडलों में कोई अंतर ही नहीं है। ज्यादा बड़े न सही, पर दोनों में अंतर भी हैं और एकाध नहीं, कई-कई अंतर हैं। एक तो यही कि तालिबान की सजा अक्सर उन्हें मिलती है, जो कहते हैं कि हम भी उसी अल्लाह पर ईमान रखते हैं, पर तालिबान कहते हैं कि उनका ईमान सच्चा नहीं है या कच्चा है या झूठा है, वगैरह। पर अपने खेड़ा मॉडल का मामला आसान है, सजा देने वालों का धर्म अलग, सजा पाने वालों का धर्म अलग। यानी किसी कन्फ्यूजन या दुविधा की गुंजाइश ही नहीं। और जब से मोदी जी ने कपड़े देखकर दूर से ही पहचानने का गुर दिया है, तब से तो कोई खास मेहनत करने की भी जरूरत नहीं रह गयी है। इसी तरह, तालिबान के मॉडल में टेक्रोलॉजी ज्यादा है। सजा में वे पत्थर-वत्थर भी मार लेते हैं और मैगजीन वाली बंदूकों का भी इस्तेमाल कर लेते हैं। पर अपने खेड़ा मॉडल में तकनीक खंभे से बांधकर, लाठी-डंडों से पीटने से आगे नहीं बढ़ी है। यानी परंपरा की पूरी तरह से रक्षा की जा रही है, बिना किसी मिलावट के। बाकी सबसे ज्यादा उन्नत टेक्नोलॉजी तो उस खंभे में है, जिससे पिटने वालों को बांधा गया था। और हां! जो राष्ट्रभक्ति हमारे यहां ऐसे मौकों पर दिए जाने वाले भारत माता के जैकारों से पैदा होती है, वो बात तालिबान के अल्लाहू... के नारों में कहाँ !

हां! इस सबसे कोई यह नहीं समझे कि हमारा मॉडल इतना ही अहिंसक है कि लाठी-डंडों से पिटाई से आगे ही नहीं गया है। अखलाक से लेकर पहलू खान तक, हमारे यहां भी मॉब लिंचिंग का चलन खूब चल पड़ा है। और इज्जत बचाने के लिए जानें लेने का भी। फिर भी मैगजीन वाली बंदूकों के बिना कानून वगैरह खतरे में पडऩे वाली हिंसा कहां? इसीलिए तो, लिंचिंग-विंचिंग से लेकर, खेड़ा या उना मॉडल तक और टैंक पर न सही बुलडोजर पर ही चढक़र सही, हमारे यहां भी तालिबाननुमा मॉडल अपने खेल करता रहता है, पर कानून-वानून कभी खतरे में नहीं पड़ता। हां! अपोजीशन वालों की सरकार हो तो बात ही दूसरी है। और इससे याद आया उनके और हमारे बीच का सबसे बड़ा अंतर। तालिबान मॉडल ने अपने असली रंग तब दिखाए थे, जब तालिबान के पास राज नहीं था। पर जब से तालिबान दोबारा राज में आए हैं, तब से उनके सुर कुछ बदले-बदले से हैं। पर हमारे यहां वाले अपना असली रंग तब दिखा रहे हैं, जब वे राज में हैं, बल्कि डबल इंजन वाले राज में हैं। और जब से हमारे यहां वाले दोबारा राज में आए हैं, तब से हमारी तो पूछो ही मत। और जो चुनाव आस-पास हो, तब तो सोने में सुहागा ही हो जाता है। तभी तो गुजरात में पिछले चुनाव से पहले उना मॉडल था, इस बार चुनाव से पहले खेड़ा मॉडल। और वक्त-जरूरत पर याद दिलाने के लिए, 2002 का मोदी जी का ‘‘राजधर्म’’ मॉडल तो खैर है ही। सुनते हैं कि पीएम वाजपेयी ने जब ज्यादा किच-किच की थी, तो सीएम मोदी ने उन्हें इसका ज्ञान देकर निरुत्तर कर दिया था कि उनके गुजरात में तो, इसी को ‘‘राजधर्म’’ कहते हैं।

फिर भी, हम सिर्फ इन भिन्नताओं की वजह से इसका आग्रह नहीं कर रहे हैं कि हमारे खेड़ा मॉडल को हिंदुत्ववादीकरण के मॉडल के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए; तालिबानीकरण के ही आम खाते में डालकर नहीं छोड़ दिया जाए। हमारे आग्रह की वजहें कहीं ज्यादा गहरी, ज्यादा बुनियादी हैं। मोदी जी भारत को विश्व गुरु बनाने के मिशन में लगे हुए हैं। ताजातरीन खेड़ा मॉडल हो या पुराना उना मॉडल या चाहे अखलाक, पहलू खान वगैरह वाला ही मॉडल हो; ये सभी विश्व गुरु भारत के  खास गुर हैं। ऐसे अनोखे गुर सीखने के लिए ही दुनिया भर  से   राज करने वाले हमारे गुरुकुल में शिक्षा लेने आएंगे। और अपने-अपने देश में लौटकर, सफलता के साथ ये गुर आजमाएंगे! लेकिन, विश्व गुरु का भारत का ब्रांड हमारे अपने, देसी ब्रांड नाम के बिना कैसे कामयाब हो सकता है? उधारी के तालिबान के ब्रांड नाम के सहारे, विश्व गुरु की दौड़ में हम कितने कदम दौड़ पाएंगे! देखा नहीं कैसे बेचारे आरएसएस वालों को आज तक हिटलर-मुसोलिनी के आइडिया उठाने और सावरकर की हिंदुत्ववाली किताब उड़ाने के लिए, न जाने किस-किस से क्या-क्या सुनना पड़ता है। पर अब और नहीं। 


सर सैयद अहमद खान उर्दू सहाफत और सैयद-उल-अखबार

सर सैयद अहमद खान उर्दू सहाफत और सैयद-उल-अखबार

06-Oct-2022

एम. डब्लू. अंसारी 

सर सैयद डे के मौके पर ए.एम.यू के फारिंगीन को स्ट्रेटजी एंव प्लान तैयार कर सर सैयद की मिशन एवं अलीगढ़ तहरीक को आगे बढ़ाने की जरूरत है

सर सैयद पाया शख्सियत किसी नहीं। मुसलमानों के और एम.ए.ओ कॉलेज के खान जैसी शख्सियत की मिलती। फी जमाना नजरियात और उनके बहुत कुछ लिखा जा चुका रहेगा। हम सब वाकिफ हैं की बेश बहा खिदमात का सियासी तालीमी मजहबी अहमद खान की बुलंद तअरूफ की मोहताज अज़ीम मुसल्लेह, रहनुमा बानी सर सैयद अहमद दूसरी कोई नज़ीर नहीं उनकी शख्सियत, अफकारो गिरां कद्र कारनामों पर है और लिखा जाता कि सर सैयद अहमद खान दायरा बहुत वसी है। फ्रंट के अलावा इल्मी, अदबी और तहकीकी मैदान में उन्होंने जो गहरे नक्श सब्त किए हैं वह बहुत मोअसर और देर पा थे। अलीगढ़ तहरीक को आमतौर पर महज तालीमी या सियासी तहरीक ख्याल किया जाता है, मगर एक लिहाज से यह एक फिकरी, तहजीबी और इल्मी तहरीक भी थी, जिसने उर्दू शरो अदब पर मुसबत असरात मुरत्तव किये। सर सैयद का शुमार उर्दू के अव्वलीन मेमारों में बजा तौर पर होता है।

उर्दू जबानो - अदब के हवाले से सर सैयद ने जो कुछ किया, उनके ख्यालात मुख्तलिफ तहरीरों में मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर एक मौके पर फरमाते हैं कि "जहां तक हमसे हो सका हमने उर्दू जुबान के इल्म-व-अदब की तरक्की में अपने इन नाचीज परचों के जरिए से कोशिश की। मजमून के अदा का एक सीधा और साफ तरीका अख्तियार किया। जहां तक हमारी कुजमुज जुबान ने यारी दी, अल्फाज की दुरुस्ती, बोलचाल की सफाई पर कोशिश की। रंगीन इबारत से जो तश्बीहात और इस्तेआराते ख्यालात से भरी होती है और जिसकी शौकत सिर्फ लफ्जों ही में रहती है और दिल पर उसका कुछ असर नहीं होता, परहेज किया। तुकबंदी से जो जमाने में मुक्जा ईबारत (पंक्चुअल टेक्स्ट) कहलाती थी, हाथ उठाया। जहां तक हो सका सादगी इबारत पर तवज्जो की । इसमें कोशिश की कि जो कुछ लुत्फ हो, वह सिर्फ मजमून की अदा में हो जो अपने दिल में हो वही दूसरे के दिल में पड़े । ताकि दिल से निकले और दिल में बैठे" ("हमारी खिदमत ")
चुनांचे हम देखते हैं कि सर सैयद अहमद खान की बदौलत एक नए दबिस्तान की इब्तिदा हुई। जिसमें सादा व सलीस नस्र निगारी की तरफ तवज्जो की गई और आम फहम अंदाज में चीजों को बयान करने का सिलसिला शुरू हुआ। उर्दू में इंशाईया निगारी के साथ-साथ तहकीक व तनकीद के मैदान में भी नुमायां तब्दीली आई और सर सैयद के रूफका ने भी इल्मी और संजीदा नसर निगारी के फरोग में गिरा कदर खिदमात अंजाम दीं।

उर्दू अदब में हकीकत और फितरत की तहरीक भी सर सैयद ने ही शुरू की। उर्दू जुबान व अदब के फरोग व इरतका में सर सैयद और उनके रूफका के नुमाया किरदार का हर कोई मोतरिफ है। उर्दू जुबान व अदब से सर सैयद की गैर मामूली वाबस्तगी के नतीजे में उर्दू नसर सहल और सलीस बनी, बकौल सैयद अब्दुल्लाह "सर सैयद ने इसे आम इजतमाई जिंदगी का तर्जुमा और इल्मी मतालिब के इजहार का वसीला बनाया " । इस सिलसिले में यह बात भी काबिले जिक्र है कि सर सैयद ने नसर में अस्लूब की जगह मजमून को अव्वलियत दी और पुरानी नसर, जिसमें तकल्लुफ और तसना पाई जाती थी उसको तर्क करने की और बेजा इबारत आराई से बचने की तरगीब दी और यूं उर्दू नसर की हुदूद को मजीद वुसअत और नई बुलंदी से हम किनार किया। सर सैयद अहमद खान ने मुख्तलिफ मौजूआत पर कलम उठाया और आला दर्जे के मुकाले तहरीर किए और उनके रूफका ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिसके नतीजे में उर्दू जुबान जो उस वक्त इल्मी तौर पर उतनी मुस्तहकम न थी, कुछ ही अरसे में आला इल्मी जवाहर पारों से इसका दामन भर गया।

जहां तक शायरी का ताल्लुक है तो सर सैयद ने उर्दू की रिवायती असनाफ और इनके मौजूआत पर तनकीद करते हुए उर्दू शायरी में वक्त के तकाजों के मुताबिक नई असनाफ को फरोग देने की वकालत की, लेकिन वह बहुत जल्द ही शायरी की दुनिया से बाहर निकल आए।

सर सैयद उर्दू शायरी के उस वक्त के रंगो आहंग को अपने इस्लाही मिशन के लिए मुफीद नहीं पाते थे। उनका ख्याल था कि इससे वक्ती तफरीह का काम तो लिया जा सकता था, लेकिन किसी कौम की तामीर इस नौअ के लिटरेचर से कदरे नामुमकिन थी। सर सैयद ने शायरी को इसलाहे कौमी का जरिया बनाया। उनके जेरे असर जो लिटरेचर वजूद में आया उसकी इब्तिदा अमसदसे हाली और इतिहा कलामे इकबाल की शक्ल में हम देख सकते हैं। उर्दू जुबान की मोहब्बत और इसकी इल्मी खिदमत का जो नक्शा सर सैयद के दिल में था उसका अंदाजा उनके चंद खुतूत और दिगर मुतफर्रिक तहरीरों से बखूबी होता है। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने सर सैयद की खिदमात का जिक्र करते हुए एक बार कहा था:

"मरहूम सर सैयद और उनके साथियों ने अलीगढ में सिर्फ एक कॉलेज ही कायम नहीं किया था बल्कि वक्त की तमाम इल्मी और अदबी सरगर्मियों के लिए एक तरक्की पसंद
हलका पैदा कर दिया था। इस हलके की मरकजी शख्सियत खुद उनका वजूद था और उसके गिर्द मुल्क के बेहतरीन दिमाग जमा हो गए थे। इस अहद का शायद ही कोई काबिले जिक्र अहले कलम ऐसा होगा जो इस मरकजी हल्का के असरात से मुतासिर न हुआ हो। उर्दू की नई शायरी की बुनियाद अगरचे लाहौर में पड़ी थी मगर उसे नशों-नुमा यहीं की आबो-हवा में मिली"। ( बहवाला रिसाला फिक्रो नजर, अलीगढ़, खुखूसी शुमारा, मार्च-2017 )

आज, ए.एम.यू के तालबा, जिनकी तादाद हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है, जो सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में तमाम शोबों में खिदमात अंजाम दे रहे हैं, सर सैयद डे के मौके पर डिनर का एहतमाम किया जाता है और सिर्फ हॉस्टल की पुरानी यादें वगैरह बातों पर चर्चा करते हुए खुशगवार माहौल से लुत्फ अंदोज होते हैं। क्या ही बेहतर होता अगर सर सैयद डे के फॉर्म से ए.एम.यू के फारिंगीन भारत की मौजूदा सूरते हाल, कौम की इक्तसादी, बे-रोजगारी, तालीमी, सेहत के मसाएल, समाजी पसमांदगी, उर्दू जुबान की बका - व - फरोग, कौमो -मिल्लत की शिनाख्त और मुल्क की डेमोक्रेसी को बचाने की कोशिश और मुल्क मुखालिफ सरगर्मियों के खिलाफ खड़े होने, स्ट्रेटजी प्लान तैयार करने और इसके लिए काम करने और इसके लिए काम करते इन तमाम मसाएल पर रोशनी डालना वक्त का तकाजा है।

सर सैयद ने उर्दू अदब को जो कुछ दिया, उसके हवाले से यह बात कही जा सकती है कि आज का मजमोई अदबी और फिक्री रूजहान भी उसी सिलसिले फिक्रो अमल की एक इरतिकाई शक्ल है। सर सैयद के बेमिसाल कारनामे की बदौलत उर्दू शेरो-अदब की दुनिया बदल गई और यह कौमी तरक्कियों का वसीला बन गया। बिला - शुबह सर सैयद ने उर्दू शेरो अदब को लंबे गोया आता किया।

मुनव्वर अहदम

ई मेल:

आफिस सिक्रेट्री mwansari1984@gmail.com taha2357ind@gmail.com

बे-नज़ीर अन्सार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी

उसिया रिसॉर्ट (क्वीन्स होम) कोह-ए-फिजा, अहमदाबाद पैलेस रोड, भोपाल-462001 (म प्र)


बापू को बाय, भागवत को हाय!

बापू को बाय, भागवत को हाय!

04-Oct-2022

व्यंग्य: राजेंद्र शर्मा

बापू ही थे। इतनी दुबली काया, फिर भी इतनी तेज चाल। उस पर आज तो जैसे भागे ही जाते थे। पीछे भागते-भागते पूछा, इतनी जल्दी मेंं कहां भागे जाते हैं। न रुके, न चाल धीमी की, उस पर आवाज भी धीमी कर के फुसफुसाते हुए निकल गए--जान बची और लाखों पाए, राजपथ छोड़, राजघाट आए! जिस तरफ से बापू भागते से चले आ रहे थे, उस तरफ पीछे जाकर देखा, तो पता चला कि संसद भवन के ऐन सामने की अपनी परमानेंट बैठकी से बापू गायब हैं। वह भी बर्थ डे पर। खबरिया चैनलों ने सुना तो छुट्टी की चादर ओढ़ के सो गए, फिर भी सोशल मीडिया ने खबर फैला दी। आइटी सैल वाले बदहवासी में ट्वीट पर ट्वीट करने लगे--यह "गोडसे जिंदाबाद" की जबर्दस्त ट्रेंडिंग से बौखलाए, सेकुलरवालों का षडयंत्र है। हम भी जान लड़ा देेंगे, पर "गोडसे जिंदाबाद" को ट्रेंडिंग से बाहर नहीं जाने देंगे।

गोदी युग के आठ साल बाद भी बचे रह गए, छोटे-बड़े दर्जनों खबरचियों ने राजपथ पहुंचकर बापू का घेराव सा कर लिया। पर बापू भी जैसे आज सब को खुश करने के मूड में थे, एक-एक सवाल का बड़े धीरज से और खुश होकर जवाब दे रहे थे। खबरचियों ने इतना खुश होने का राज पूछा तो, बापू ने वही दोहराया--जान बची और लाखों पाए! पर खबरची इस पर संतुष्ट कहां होने वाले थे। बापू भी दिल की बात सुनाने को तैयार बैठे थे। बताने लगे कि  संसद के बाहर बैठे-बैठे सब कुछ होते सिर्फ देखते रहना, बड़ी तपस्या का काम है। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनकी गति, उनके ही तीन बंदरों जैसी हो जाएगी-- न कुछ देख सकें, न कुछ सुन सकें और न कुछ बोल सकें। बस सब को धीरज बंधाते रहें ; भला कब तक। सो मैं तो राजपथ से जान छुड़ाकर भाग आया। खबरचियों ने फौरन सुधारा, अब राजपथ कहां रहा, वह तो कर्तव्य पथ हो गया है। बापू ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, मेरा भी नाम बदल देते तो? मैं तो उससे पहले ही भाग आया।

खबरची आसानी से कहां टलने वाले थे। खोद-खोद कर पूछने लगे, मोदी जी आप को छुट्टी देने के लिए क्या आसानी से राजी हो गए। आप कहीं बिना बताए तो नहीं भाग आए? बिना बताए भाग आए हैं, तब तो मोदी जी के लिए बड़ा संकट पैदा हो जाएगा। आप नहीं होंगे, तो कर्तव्य पथ पर भारी शून्य पैदा हो जाएगा। विपक्षियों को संसद के अंदर तो कोई वैसे भी अब बोलने नहीं देता है, संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करने के लिए किस के सामने जाएंगे, वगैरह। बापू बोले, मेरे सामने विरोध प्रदर्शन करने का भी कोई फायदा था क्या, जब संसद की ऊंची चाहरदीवारी के बाहर कोई देख ही नहीं सकता। रही शून्य की बात तो, मैं इसलिए भी हटा हूं कि मेरी जगह भरने का अच्छा-खासा इंतजाम हो चुका है। राष्ट्रपिता के लिए भागवत जी का नाम भी चल चुका है। गोडसे जिंदाबाद ट्रेंड कर रहा है। और क्या चाहिए। मैं कम से कम इतना डैमोक्रेट जरूर हूं कि जनता और सरकार की भावनाएं समझ कर, सही टैम पर रिटायर हो जाऊं। बस अब सचमुच रिटायर्ड जीवन जीऊंगा, जमुना के किनारे चैन से चादर तान के सोऊंगा।

खबरचियों ने रुंआसे से सुर में कहा -- पर इस तरह देश का क्या होगा? देश कहां जाएगा? बापू बोले -- अमृतकाल में, और कहां! खबरची खिसिया के बोले, मजाक मत कीजिए, आपने सब देखा ही है। बापू अब सीरियस हो गए -- मेरी मूर्तियों के ही भरोसे बैठे रहे तो वही होगा जो हो रहा है। उठते-उठते बोले -- तुम भी जोर लगा के बोलो : बापू को बाय, भागवत को हाय!        


2 / अक्टूबर गांधीजी और शास्त्रीजी की जयंती के साथ-साथ शहीद आजम शेख भिकारी की जयंती भी मनाई जाए...

2 / अक्टूबर गांधीजी और शास्त्रीजी की जयंती के साथ-साथ शहीद आजम शेख भिकारी की जयंती भी मनाई जाए...

03-Oct-2022

एम. डब्लू अंसारी 

"सानी टीपू सुल्तान शहीद आजम शेख भिकारी अंसारी " हिंदी संस्करण का विमोचन

-बजीर असार एजुकेशनल एण्ड सोशल वेलफेयर सोसाइटी

भोपाल:- 2 / अक्टूबर को गांधीजी और शास्त्रीजी की जयंती पर एक समारोह का आयोजन किया गया। समारोह की शुरुआत में जलसा के सभी अतिथियों और प्रतिभागियों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी और लाल बहादुर शास्त्रीजी (गरीबों और किसानों के मसीहा, "जय जवान, जय किसान" के जनक ) को उनक जयंति के अवसर पर याद किया गया और उनके बलिदान पर प्रकाश डाला गया।

इसके साथ ही, स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध मुजाहिद आजादी "सानी टीपू सुल्तान शहीद आजम शेख बुखारी उर्फ शेख भिकारी अंसारी" जिनके कारनामे और खिदमात से लोग नावाकिफ हैं। इनके बारे में लोगों में बेदारी पैदा करने के साथ-साथ आने वाली नस्लों को भी वाकिफ कराना है। इस संबंध में, बे-नज़ीर अंसार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी, जो गुजिश्ता कई सालों से उर्दू की और इन तमाम गुमनाम मुजाहिदीन आजादी पर काम करते हुए इन तमाम गुमनाम मुजाहिदी को मंजर आम पर लाने का काम कर रही हैं और मिल्ली खिदमात अंजाम देती आ रही है, ने शहीद आजम शेख बुखारी उर्फ शेख भिकारी अंसारी की जयंती के मौके पर समारोह शहीद आजम शेख भिकारी पर संकलित पुस्तक के हिंदी संस्करण का विमोचन भी किया गया।

विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लेने वाले कॉमरेड शैलेंद्र शैली जी ने अपने बयान में कहा कि ऐसे सभी स्वतंत्रता सेनानियों जो आज गुमनाम हो गए हैं, उन सब को इस तरह की किताब लिख कर मंजर आम पर लाना जरूरी है। इस किताब में 75 से ज्यादा गुमनाम

मुजाहिदीने आजादी के नाम हैं, जिनके नाम पर यह किताब समर्पित है। मुजाहिदीने आज़ादी

के नाम से इस किताब का इनतेसाब किया गया है। कॉमरेड शैली ने आगे कहा कि इन सभी मुजाहिदीन आज़ादी पर किताब लाई जानी चाहिए और बच्चों में निबंध लिखने के मुकाबला कराया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इन सभी के बलिदानों के बारे में जान सकें।

डॉ कमर गौस साहब ने अपने खयालात का इजहार करते हुए बे-नज़ीर सोसाइटी की उर्दू सेवाओं पर प्रकाश डाला और फिर शेख भिकारी के संघर्ष, मातृभूमि के लिए जुनून और बलिदान पर भी प्रकाश डाला।

समारो के अध्यक्ष मुहम्मद इकबाल काजी साहब, डॉ. मेहताब आलम साहब, डॉ. तस्नीम हबीब साहब ने भी इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को याद किया और साथ ही सभी ने एक मत होकर इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों पर विशेष रूप से जनरल बख्त खान, मौलवी मुहम्मद बाकिर, शहीद खुदा बख्श, शेर अली खान आफरीदी, अल्लामा हबीबुर रहमान आज़मी आदि औ भोपाल और मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों पर किताब लाने पर जोर दिया। इसी तरह ढेर सारे स्वतंत्रता सेनानी मध्य प्रदेश में भी हैं जिन्हें याद करने और उन पर किताब लिखने की ज़रूरत है।

बता दें कि "सानी टीपू सुल्तान शहीद आजम शेख बुखारी उर्फ शेख भिकारी अंसारी" जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। झारखंड के चोटूपालु घाटी पर लड़ते हुए उन्हें अंग्रेजों ने गिरफतार कर लिया था और अदालत की कार्यवाही समाप्त होने पहले ही उन्हें 8 जनवरी 1858 को मौत की सजा सुना दी गई थी, जिनको चोटूपालू घाटी में एक बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई थी और कई दिनों तक उनका शव पेड़ पर लटका हुआ था। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 2 अक्टूबर 1811 को झारखंड के रांची जिले में हुआ था।

अंत में सभी ने महात्मा गांधीजी, लाल बहादुर शास्त्रीजी और बतख मियां अंसारी जी ( जिन्होंने गांधीजी की जान बचाई थी) को याद किया गया। समारोह के अंत में, डॉ तसनीम हबीब साहब ने सभी मेहमानों और प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया ।

बे-नजीर अन्सार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी उसिया रिसॉर्ट (क्वीन्स होम) अहमदाबाद पैलेस रोड, कोह-ए-फिजा, भोपाल 462001 (म.प्र.)

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भागवत का मस्जिद/मदरसा दौरा : उम्मीद शून्य, सिर्फ अंदेशे

भागवत का मस्जिद/मदरसा दौरा : उम्मीद शून्य, सिर्फ अंदेशे

03-Oct-2022

आलेख : राजेंद्र शर्मा

आरएसएस के सर-संघचालक यानी सुप्रीमो के राजधानी दिल्ली में मस्जिद/मदरसे का पिछले ही दिनों दौरा करने और आल इंडिया इमाम आर्गनाइजेशन के प्रमुख से तथा मदरसे में पढऩे वाले बच्चों से भी ‘‘संवाद’’ करने से खबरों में सुर्खियां तो बननी ही थीं। आखिरकार यह पहली ही बार है, जब आरएसएस के किसी सर-संघचालक ने मस्जिद/मदरसे में जाने की जरूरत समझी है। आरएसएस की स्थापना के बाद, करीब सत्तानवे साल तक ही नहीं, आजादी के बाद पूरे पचहत्तर साल हो जाने तक, किसी संघ-प्रमुख को ऐसा प्रत्यक्ष ‘‘संवाद’’ कायम करने की जरूरत महसूस नहीं हुई थी। जैसे आरएसएस को मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय की ओर इस तरह ‘‘दोस्ती का हाथ’’ बढ़ाने के लिए कथित अमृतकाल के शुरू होने का ही इंतजार था!

लेकिन, भागवत के इस दौरे तथा इस दौरे के क्रम में तथा उसके गिर्द मुस्लिम बुद्घिजीवियों के साथ उनके ‘‘संवाद’’ को क्या सचमुच, मोदी के राज में एक प्रकार से चौतरफ़ा घेराव में डाल दिए गए मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय की ओर आरएसएस के ‘‘दोस्ती का हाथ’’ बढ़ाने के इशारे के तौर पर लिया जा सकता है? और वास्तव में, जैसाकि वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद असीम ने ध्यान दिलाया है, क्या इसे वाकई ‘‘संवाद’’ कहा भी जा सकता है! मुख्यधारा के मीडिया में इस पूरे प्रकरण को उछाल कर जिस तरह की छवि बनाने की कोशिश की गयी है उसके विपरीत, इस सवाल का जवाब एक दो-टूक "नहीं" ही हो सकता है।

लेकिन, इस जवाब के अपने कारणों का खुलासा करने से पहले, एक छोटा सा रीएलिटी चैक उपयोगी रहेगा। आरएसएस सुप्रीमो का यह पहला मस्जिद/मदरसा दौरा ठीक उस समय हुआ है, जब भाजपा की सरकारों की बुलडोजर कार्रवाइयों के बाद या साथ-साथ, अब मुसलमानों द्वारा संचालित मदरसे भी उनकी मुस्लिमविरोधी ‘वीरता’ के खास निशाने पर हैं। इस बार यह खेल, तमाम मदरसों के सर्वे के नाम पर हो रहा है। पहले उत्तर प्रदेश, फिर असम और अब उत्तराखंड में, मदरसों के सर्वे का दौर-दौरा जारी है। बेशक, इसके लिए मदरसों में पढऩे वाले बच्चों के हितों की दुहाई दी जा रही है। लेकिन असली मकसद क्या है, यह असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिश्व सरमा ने, जो संघ परिवार का नया-नया दीक्षित होने के कारण कुछ ज्यादा ही मुंहफट हैं, यह कहकर उजागर कर दिया है कि इन मदरसों में क्या गतिविधियां चल रही हैं, यह जानना बहुत जरूरी है! संक्षेप में यह कि भागवत जिस संगठन के सुप्रीमो हैं, उसी के राजनीतिक बाजू - भाजपा - द्वारा नियंत्रित शासन द्वारा इन मदरसों की जांच को, मुस्लिम समुदाय को कमतर होने का एहसास कराने के, एक और तथा नये औजार के रूप में आजमाया जा रहा है।

बहरहाल, भागवत की ताजा पहल या पैंतरे पर लौटें। संघ प्रमुख के इस पहले मस्जिद/मदरसा दौरे के लिए हवा बनाने के लिए, इसकी पूर्व-संध्या में अचानक पांच जाने-माने मुस्लिम बुद्घिजीवियों के साथ, उनकी मुलाकात की खबर मीडिया में प्रकट हो गयी। हालांकि, इन मुस्लिम बुद्घिजीवियों के साथ भागवत की उक्त बातचीत, करीब महीने भर पहले, अगस्त के महीने में किसी समय हुई थी, पर उस समय न संबंधित बुद्घिजीवियों द्वारा मीडिया में इस मुलाकात की खबर देने की जरूरत समझी गयी थी और न आरएसएस की ओर से इसकी खबर दी गयी थी। लेकिन, मस्जिद/मदरसा दौरे से ऐन पहले, यह खबर अचानक धमाके के साथ प्रकट हो गयी, जिससे संघ प्रमुख के इस कदम को, मुसलमानों से संवाद की एक व्यवस्थित कोशिश तथा एक रुझान की तरह पेश करने में आसानी हो। इसकी जरूरत इसलिए और भी ज्यादा थी कि संघ प्रमुख के मस्जिद/मदरसा दौरे की शुरूआत, इमामों के आल इंडिया संगठन के अध्यक्ष डा0 उमर अहमद इलियासी के साथ, मध्य दिल्ली में कस्तूरबा गांधी मार्ग पर स्थित मस्जिद में मुलाकात से होनी थी। इसी मुलाकात के दौरान इलियासी ने भागवत को ‘‘राष्ट्रपिता’’ का खिताब दिया था, हालांकि आरएसएस की ओर से दिए गए विवरण के अनुसार, भागवत ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था कि "राष्ट्रपिता" तो एक ही काफी हैं, हम राष्ट्रपुत्र हैं!

भागवत के इस बहुप्रचारित दौरे की पृष्ठभूमि बनने से पहले तक अप्रचारित ही बनी रही उक्त बातचीत में मुस्लिम बुद्घिजी,वियों का शामिल होना, शायद संघ समर्थकों व अनुयाइयों के लिए, इमामों के संगठन के प्रमुख के साथ मुलाकात को निगलना कहीं आसान बनाता था। आखिर, इससे यह छवि बनती है कि संघ प्रमुख, मुसलमानों के राय बनाने वाले, धार्मिक-गैरधार्मिक, सभी नेताओं से संवाद करना चाहते हैं। लेकिन, यह मानने के लिए किसी को भी जरूरत से ज्यादा भोला होना पड़ेगा कि संघ प्रमुख के मुसलमानों के साथ ऐसे प्रत्यक्ष संवाद की जरूरत महसूस करने का, मौजूदा हालात और खासतौर पर राजनीतिक-सामाजिक हालात के तकाजों से कोई संबंध ही नहीं है और यह आरएसएस की अपनी ही स्वतंत्र विकास प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके दावों के साथ कुछ बुद्घिजीवियों ने तो इसमें आरएसएस के सांप्रदायिक सद्भाव केे लिए ज्यादा से ज्यादा चिंतित होने भी लक्षण खोजने शुरू कर दिए हैं। वर्ना न सिर्फ एक पैकेज के हिस्से के तौर पर पेश करने के लिए, मुस्लिम बुद्घिजीवियों के साथ उक्त मुलाकात को महीने भर तक गोपनीय बनाए रखने का कोई कारण नहीं बनता था, बल्कि उन पांच बुद्घिजीवियों में शामिल, पत्रकार शाहिद सिद्दीकी द्वारा मीडिया में दी गयी जानकारी के अनुसार, उक्त बातचीत के लिए भागवत से समय मिलते-मिलते, करीब महीने भर का समय भी नहीं लगा होता।

सिद्घीकी द्वारा मीडिया में दिए गए ब्यौरे के अनुसार तो, नूपुर शर्मा प्रकरण की पृष्ठïभूमि में इन मुस्लिम बुद्घिजीवियों ने भागवत से बातचीत करनी चाही थी, ताकि समाज में अकारण बढ़ायी जा रही कटुता पर चिंता साझा कर सकें। लेकिन, समय मिलने में ही इतना वक्त लग गया कि उनकी भागवत से मुलाकात होने तक नुपुर शर्मा प्रकरण ठंडा पड़ चुका था और उन्होंने अंतत: मौजूदा सांप्रदायिक रिश्तों पर सामान्य बातचीत ही की। यह भी अलग से रेखांकित करने की जरूरत शायद नहीं होनी चाहिए कि बुद्घिजीवियों से बातचीत से लेकर, इमाम संगठन के प्रमुख से मस्जिद में मुलाकात तथा मदरसे के दौरे तक, हर चीज के लिए पहल मुस्लिम पक्ष की ओर से ही गयी थी। कथित ‘‘संवाद’’ की उदारता के सारे दिखावे के बावजूद, संघ प्रमुख ने तो बस ‘कृपापूर्वक’ पहले मुस्लिम बुद्घिजीवियों के बातचीत के अनुरोध को और आगे चलकर, इमाम संगठन के प्रमुख के मस्जिद में आकर मुलाकात करने के न्यौते को, स्वीकार भर किया था! पर ‘‘कृपा’’ की ऐसी मुद्रा के साथ क्या वास्तविक संवाद संभव है?

सच तो यह है कि यह पूरी की पूरी कोशिश, एक स्पष्ट नाबराबरी के रिश्ते पर आधारित है और इसलिए, समुदायों के बीच नाबराबरी को ही पुख्ता कर सकती है। मीडिया में आए सारे ब्यौरे, हर स्तर पर ऐसी नाबराबरी की ही कहानी कहते हैं। मुस्लिम बुद्घिजीवियों के साथ बातचीत में भागवत ने उनसे मांग की कि मुसलमानों को आपसी सद्भावना बनाने के लिए गोहत्या, हिंदुओं को काफिर कहने, जेहाद आदि के संबंध में, हिंदुओं की शिकायतों या गलतफहमियों को दूर करना चाहिए। और इन बुद्घिजीवियों ने इन शिकायतों या गलतफहमियों को दूर करने के लिए, गंभीरता से प्रयास भी किए थे। दूसरी ओर, इन्हीं विवरणों के अनुसार, इन मुस्लिम बुद्घिजीवियों ने जब बात-बात पर मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल किए जाने, आबादी आदि के मसलों पर उन्हें झूठे दोषी ठहराए जाने आदि की शिकायतें उठायीं, तो संघ प्रमुख से उन्हें इसके सिवा कोई खास आश्वासन नहीं मिल सका कि संवाद बना रहना चाहिए। बाद में संघ प्रमुख ने मुस्लिम मदरसे के बच्चों को इसका उपदेश देने के अलावा कि प्रार्थना पद्घतियां अलग सही, हम सब एक हैं, उनसे यह अपेक्षा भी जतायी कि कुरान पढ़ते हैं, तो साथ में गीता भी पढऩी चाहिए! जाहिर है कि संघ प्रमुख को इसका ख्याल भी नहीं आया कि क्या मुसलमान भी हिंदू धार्मिक शिक्षा संस्थाओं से और यहां तक कि संघ द्वारा संचालित ‘गैर-धार्मिक’ सरस्वती विद्या मंदिरों से भी, कुरान भी पढ़ाने की ऐसी ही अपेक्षा नहीं कर सकते हैं?

दरअस्ल संप्रदायों के बीच यही असमानता तो संघ परिवार के सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का असली आधार है। भारत में, जहां इस्लाम का एक हजार वर्ष से ज्यादा पुराना इतिहास है और खासी बड़ी मुस्लिम आबादी है, आरएसएस और उसके बाजुओं की राष्ट्रवाद की संकल्पना, सिद्घांत के स्तर पर मुसलमानों को भारतीय राष्ट्र से बाहर रखे जाने पर और व्यावहारिक स्तर पर राष्ट्र पर उनका दावा कमतर माने जाने पर ही टिकी रही है।

आरएसएस के बीज सिद्घांतकार माने वाले गोलवलकर ने, संघ की गीता माने जाने वाले अपने घोषणापत्र, ‘‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’’ में स्पष्ट किया है कि उनकी कल्पना के हिंदू राष्ट्र में, मुसलमानों को अपनी अलग पहचानों को छोडक़र हिंदुओं के साथ मिल जाना होगा या अधिकारहीन होकर, दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर, हर प्रकार से हिंदुओं से कमतर दर्जा स्वीकार करते हुए, रहना होगा। आरएसएस सुप्रीमो का बहुप्रचारित ‘‘संवाद’’ वास्तव में, इसी प्रकार का नाबराबरी का दर्जा, मुसलमानों के राय बनाने वाले हिस्सों के बीच और उनसे भी बढक़र खुद को पढ़ा-लिखा तथा इसलिए विवेकशील मानने वाले हिंदुओं के बढ़ते हिस्से के बीच, सामान्य और स्वीकार्य बनाने का ही प्रयास करता है। इसीलिए, इसे संवाद कहना ही, संवाद के अर्थ को ही विकृत करना है।

बेशक, मोदी राज की दूसरी पारी में जिस तरह लंबे डग भर कर राज्य व शासन को बहुसंख्यकवादी बनाया गया है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तीखा तथा उग्र बनाकर, खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को हर प्रकार से असुरक्षित बनाया गया है, उसे देखते हुए मुस्लिम बुद्घिजीवियों से लेकर, मुस्लिम धार्मिक नेताओं, इमामों आदि तक, सब का इस गिरावट को थामने के लिए, जैसे भी संभव हो तथा जैसे भी समझ में आए, हाथ-पैर मारना स्वाभाविक है। ऐसे में डूबते को तिनके का सहारा के अंदाज में, इस सांप्रदायिक गिरावट के मुख्य स्रोत, आरएसएस के प्रमुख से संवाद के जरिए ही कोई रास्ता निकालने की अगर कोई उम्मीद लगाए, तो न सिर्फ उसे दोष नहीं दिया जा सकता है, बल्कि मौजूदा निराशाजनक हालात में, कुछ लोगों को यही इकलौता रास्ता लगना ही स्वाभाविक है। याद रहे कि 1992-93 के मुंबई के भयावह खून-खराबे को रुकवाने के लिए, खुद महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने मुंबई के जाने-माने धर्मनिरपेक्ष बुद्घिजीवियों को शिव सेना सुप्रीमो, बाल ठाकरे से मिलकर अपील करने का सुझाव दिया था और उन्होंने ऐसा किया भी था। लेकिन, जैसाकि हमने पीछे कहा, यह देश में तेजी से बढ़ रही सांप्रदायिक खाई तथा ज्यादा से ज्यादा हमलावर होते सांप्रदायिक द्वेष के समाधान का नहीं, हिंदू-श्रेष्ठता के दावे को और सामान्य बनाने के जरिए मजबूत करने का और इसलिए, सांप्रदायिक विद्वेष व अशांति की ढलान पर देश को और आगे धकेलने का ही रास्ता है।

मुस्लिम बुद्घिजीवियों के साथ अपनी बातचीत में, संघ सुप्रीमो ने जिस तरह दोनों समुदायों में ‘‘गर्म दिमाग लोगों’’ के होने की बात कही, उसमें दोनों ओर के ‘‘गर्म दिमाग लोगों’’ के प्रति जैसा बराबरी का सलूक दिखाया गया है, वह भी उस सांप्रदायिक नाबराबरी का ही हिस्सा है, जिसकी हम पीछे चर्चा कर आए हैं। यह झूठी बराबरी, वास्तव में भागवत के कुनबे की मौजूदा सत्ता से संरक्षित ‘‘गर्म दिमागों’’ के लिए छूट को सामान्य बनाने का और उनके लिए हर तरह की जिम्मेदारी से हाथ झाडऩे का ही काम करती है। वास्तव में संघ प्रमुख के संवाद के स्वांग का ठीक यही मकसद है। सांप्रदायिक ढलान पर भारत को तेजी से धकेलने के लिए, मौजूदा मोदी निजाम को स्वाभाविक रूप से दुनिया भर में बढ़ती आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही, इस जनविरोधी सांप्रदायिक निजाम की रीति-नीतियों से बढ़ते चौतरफा संकट के हालात में, उसकी साख गिरती जा रही है और उसका विरोध बढ़ता तथा एकजुट होता जा रहा है।

ऐसे में संघ की सत्ता तक पहुंच का बने रहने और हिंदू राष्ट्र की ओर बढऩे, दोनों पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में ही भागवत को मुसलमानों के साथ संवाद करना याद आ रहा है, ताकि अपने बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक समर्थन को छोड़े बिना, मोदी राज के विरोधियों की कतारों में तथा खासतौर पर मुसलमानों के बीच, कुछ भ्रम भी फैलाया जा सके और अंतत: हिंदू राष्ट्र की ओर आगे बढ़ते रहने के लिए, हिंदुओं की श्रेष्ठता और मुसलमानों की हेयता के दावों को, नया नॉर्मल भी बनाया जा सके। तभी तो एक तरफ मुसलमानों से छद्म संवाद है और दूसरी ओर ‘‘अब काशी, मथुरा की बारी है’’ का नारा भी!   


किस का रास्ता बुहारेगी आप की झाडू? काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती!!

किस का रास्ता बुहारेगी आप की झाडू? काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती!!

01-Oct-2022

आलेख : राजेन्द्र शर्मा

क्या इसे विडंबनापूर्ण ही नहीं कहा जाएगा कि आम आदमी पार्टी (आप), जिसका लोकसभा में प्रतिनिधित्व गुरुदासपुर उपचुनाव के बाद शून्य हो गया है, 2024 में होने वाले अगले आम चुनाव में अकेले और सभी सीटों पर लड़ने का एलान करने वाली पहली पार्टी बन गयी है।

आप के दिल्ली में पिछले सप्ताहांत पर आयोजित पहले निर्वाचित प्रतिनिधि राष्ट्रीय सम्मेलन में इस ‘‘एकला चलो’’ पर मोहर लगायी गयी, जबकि इस सम्मेलन की पूर्व-संध्या में ही गुजरात में अपनी पार्टी के एक आयोजन में, ‘आप’ सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल इस नीतिगत दिशा का एलान भी कर चुके थे। वास्तव में उससे भी पहले से, खासतौर पर पंजाब में अपनी जबर्दस्त कामयाबी के बाद से ही, आप पार्टी ने बार-बार इसका दावा करना शुरू कर दिया था कि वह ‘कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प’ बन चुकी है।बहरहाल, अब आप ने अपने इस दावे को फैलाकर, समूचे विपक्ष को इसके दायरे में समेट लिया है और वह अकेले ही देश के पैमाने पर भाजपा का मुकाबला करने का दावा कर रही है। खबरों के अनुसार, आप सुप्रीमो ने किसी भी विपक्षी कतारबंदी का हिस्सा बनने के बजाए, सीधे ‘एक सौ तीस करोड़ भारतवासियों के साथ गठबंधन" करने की बात कही है। इस पहलू से अगर देखा जाए और थोड़ा उदार हुआ जाए, तो क्या केजरीवाल के ‘‘एकला चलो’’ के एलान को, वास्तव में अपनी पार्टी का विस्तार करने की कोशिश की आकांक्षा के रूप में भी नहीं देखा जाना चाहिए?

बेशक, केजरीवाल ने अपनी पार्टी के उसी सम्मेलन में, जिसमें 156 विधायकों समेत, 20 राज्यों के कुल 1,446 निर्वाचित प्रतिनिधि उपस्थित थे (हालांकि पार्टी के दूसरे मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर भी अटकलें लगायी जाएंगी) अन्य सभी पार्टियों को यह कहकर खारिज करना भी जरूरी समझा था कि, 70-75 साल में इन पार्टियों ने जनता के लिए कुछ नहीं किया था और इसीलिए देश भर में जनता ‘बांहें खोलकर आप को गले लगा रही है’ आदि।

लेकिन, क्या इस सब को भी एक राजनीतिक पार्टी के अपने, दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों से न सिर्फ भिन्न, बल्कि श्रेष्ठतर होने के स्वाभाविक दावे के हिस्से के तौर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए।

जाहिर है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अन्य चीजों के अलावा इसी विश्वास के आधार पर अपने समर्थकों को एकजुट रखने तथा अपने प्रभाव का विस्तार करने की उम्मीद कर सकती है कि वही सबसे श्रेष्ठ है। कोई राजनीतिक पार्टी इस श्रेष्ठता की क्या परिभाषा अपने अनुयाइयों तथा समर्थकों के सामने रखती है, यह एक अलग प्रश्न है। लेकिन इतना तय है कि अपनी श्रेष्ठता या बाकी सब से अनोखेपन के किसी न किसी प्रकार के दावे के सहारे ही कोई राजनीतिक पार्टी, अपनी शक्ति को बनाए रखने तथा बढ़ाने की उम्मीद कर सकती है। वर्ना कोई उस खास पार्टी के ही साथ क्यों खड़ा होगा?

क्यों न यह माना जाए कि अरविंद केजरीवाल स्वाभाविक रूप से आप पार्टी के सुप्रीमो के तौर पर इसी लक्ष्य को साधने की कोशिश कर रहे होंगे?

इसके अलावा, अगले लोकसभा चुनाव की कार्यनीति के संबंध में आप ने उक्त सम्मेलन से जिस कार्यनीति की घोषणा की है, उसे पत्थर पर लकीर खींचने की तरह देखने की भी क्या जरूरत है?

अगला लोकसभा चुनाव अगर कोई विशेष कारण ही सामने नहीं आ जाए तो, 2024 की दूसरी तिमाही में ही होना है। यानी तब तक पूरा डेढ़ साल बाकी है। और संसदीय जनतंत्र की राजनीति में डेढ़ साल कोई कम नहीं होते हैं। अंतत: चुनाव के समय चाहे जो कार्यनीति अपनायी जाए, इस बीच की अवधि में क्या राजनीतिक पार्टियों का अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करना ही स्वाभाविक नहीं है? आखिरकार, वास्तविक चुनावी कार्यनीति भी तो पार्टियों की तुलनात्मक ताकत के तकाजों से भी तय हो रही होगी।

इतना ही नहीं, इस बीच की अवधि में कई महत्वपूर्ण विधानसभाई चुनाव होने हैं। इनमें से, हिमाचल और गुजरात विधानसभा के चुनाव तो चंद महीने में ही यानी इसी साल के अंत तक हो जाने हैं। दोनों राज्यों में परंपरागत रूप से जरूर कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला होता आया है। खासतौर पर गुजरात में पिछले विधानसभाई चुनाव में तो करीब पंद्रह साल बाद, भाजपा के हाथों से सत्ता फिसलते-फिसलते रह गयी थी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा के चुनावी बोलबाले के लिए, गुजरात सरकार पर भाजपा का कब्जा बनाए रखने का मनोवैज्ञानिक महत्व कितना ज्यादा है, यह स्वत:स्पष्ट है। और गुजरात समेत, जहां पिछले विधानसभाई चुनाव में कांग्रेस ने मोदी के नेतृत्ववाली संघ-भाजपा जोड़ी के पसीने छुड़वा दिए थे, कांग्रेस पार्टी कमजोर ही हुई है, जबकि आप के साथ नये समर्थक जुड़ रहे हैं। ऐसे में आप को अगर यह लगता है कि वह भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस से ज्यादा सक्षम है, तो क्यों नहीं वह अपना जोर आजमा कर देखे? कम से कम आप पार्टी के कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प होने के केजरीवाल के शुरूआती दावे का क्या यही संदर्भ नहीं माना जाना चाहिए, हालांकि देश के पैमाने पर ‘एकला चलो’ के नारे में अब उसका विस्तार कर दिया गया है।

आखिर, हो सकता है कि यह विस्तार कार्यनीतिक ही हो यानी विधानसभाई चुनावों के जरिए अपनी ताकत बढ़ाने के प्रयास को ज्यादा धारदार बनाने भर के लिए!

यह सब अगर सच भी मान लिया जाए, तब भी आप पार्टी के पहले राष्ट्रीय निर्वाचित प्रतिनिधि सम्मेलन में ‘एकला चलो’ की कार्यनीति का एलान जिस राजनीतिक संदर्भ में किया गया है, वह संदर्भ इसकी ऐसी हानिरहित व्याख्याओं को बलपूर्वक नकारता है।

इस संदर्भ के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला, मोदी राज की जनविरोधी तथा जनतंत्रविरोधी नीतियों के चलते बेकारी, महंगाई, भूख तथा सांप्रदायिक अशांति के गहराते संकट की पृष्ठभूमि में, निम्र मध्य वर्ग समेत, मेहनतकश अवाम के बीच तेजी से बढ़ता असंतोष, जिसे अपनी आर्थिक व मीडियाई ताकत से लेकर राजकीय ताकत तक को पूरी तरह से झोंककर भी, मोदी राज ठंडा नहीं कर पा रहा है।

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