छत्तीसगढ़ : गोबर के दीए से रौशन होगा प्रदेश, शासन की पहल से इस बार इकोफ्रेंडली दीवाली

छत्तीसगढ़ : गोबर के दीए से रौशन होगा प्रदेश, शासन की पहल से इस बार इकोफ्रेंडली दीवाली

25-Oct-2019

लेख- तेजबहादुर सिंह भुवाल

छत्तीसगढ़ सरकार ने सुराजी योजना के माध्यम से पूरे प्रदेश में एक नई क्रांति की शुरूआत कर दी है। इस योजना अंतर्गत नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी से प्रदेश के सभी ग्राम पंचायतों में तीव्र गति से काम शुरू हो गया है। नदी-नालों को आपस में जोड़ा जा रहा है, ताकि जल का स्तर अनुपात में बना रहे। गौवंशीय पशुओं के लिए गांव-गांव गौठान बनाए जा रहे है। प्रदेश के सभी गांवों में घुरवा का भी निर्माण किया जा रहा है साथ ही गोबर और गौमूत्र से जीवन उपयोगी सामग्री बनायी जा रही है। इसके लिए पुरूष एवं महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाने का महती प्रयास किया जा रहा है एवं बाड़ी योजना से घर-घर साग-सब्जी का जैविक खेती-बाड़ी से स्वयं उत्पादन कर बिक्री की जा रही है। इस कार्य की प्रगति के रूप में गौधन संवर्धन के साथ ही गोबर से निर्मित सामग्रियों से आम लोगों के जीवन एवं स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डाल रहे है।

प्रदेश के मुखिया ने छत्तीसगढ़ की विरासत से मिली लोक कला, संस्कृति, तीज-त्यौहार को ध्यान में रखते हुए हमारी गौ माता के संरक्षण और संवर्धन का प्रयास किया। जो लोग इस खेती-बाड़ी को भूल कर शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की दौड़ में भाग रहे थे। उन्हें अब फिर से गांव से जोड़ने का अहम प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री द्वारा शुरू किए गए सुराजी योजना से पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है साथ ही लोगों को रोजगार भी प्राप्त हो रहे हैं एवं बड़े पैमाने पर गोबर से निर्मित सामग्रियों का उत्पादन भी किया जा रहा है।

शासन के प्रयासों से गोबर के दीए से इस बार घर आंगन रोशन करने की तैयारी की गयी है। पर्यावरण संरक्षण और महिला स्वसहायता समूहों को रोजगार मुहैया कराने की दिशा में गोबर से बने दीए को अहम माना जा रहा है। रंग-बिरंगे गोबर के ये दीए पहली बार बाजार में आया है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों में तेजी से इसकी बिक्री की जा रही है। इस दीए की खास बात यह है कि दीए को दीपावली में उपयोग करने के बाद जैविक खाद बनाने उपयोग में लाया जा सकता है। दीया के अवशेष को गमला या कीचन गार्डन में भी उपयोग किया जा सकता है। इस तरह मिट्टी के दीए बनाने और पकाने में पर्यावरण को होने वाले नुकसान के स्थान पर गोबर के दीए को इकोफ्रेंडली माना जा रहा है।

शासन के अभिनव पहल से गांव की महिलाएं जो केवल खेतों में काम करतीं, घर संभालतीं और गोठान में गाय का गोबर उठाती। जो अब गाय के गोबर को अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति मजबूत करने का जरिया बना लिया है। प्रदेश के अधिकतर गांवों की महिलाओं को एक स्वसहायता समूह के माध्यम से जोड़कर गाय के गोबर से आकर्षक दीए बनाने के साथ-साथ कई तरह की कलात्मक चीजें बना रही हैं। इनकी इस कलात्मक दीयों के मांग भी बहुत हैं। यह कला अब छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना रही है।

कुछ समय पहले तक गांवों की महिलाएं गरीबी से जूझते हुए अपना परिवार चला रही थीं। महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, बिहान के स्व सहायता समूहों से जोड़कर प्रशासन द्वारा महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया जा रहा है। अब महिलाएं इस अनोखी कलाकारी के जरिए आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। इन महिलाओं द्वारा गोबर से निर्मित दीए इस दिवाली में घरों को रोशन करने के लिए तैयार किए गए हैं। गोबर के दिए, स्वास्तिक चिन्ह, गणेश की मूर्ति आदि उपयोगी वस्तुएं निर्मित कर रही हैं। इस अनोखी कलात्मकता से सजी इन चीजों की कीमत भी बेहद आकर्षक है। यह पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है।

गोबर से निर्मित सामग्री बनाने के लिए गोबर को सूखाकर उसके पाउडर में एक किलो प्रीमिक्स व गोंद मिलाया जाता है फिर गीली मिट्टी की तरह गूथने के बाद इसे हाथ से खूबसूरत आकार दिया जाता है। इसके बाद इसे दो दिनों तक धूप में सुखाने के बाद अलग-अलग रंगों से सजाया जाता है। इससे ऐसे बहुत से उपयोगी सामान जैसे फ्लावर पाॅट, पेन स्टैण्ड, कापी, पुस्तक एवं अन्य सामग्री बनायी जा सकती है। इको फ्रेंडली होने के चलते राज्य के अन्य शहरों और अन्य राज्यों से भी इसकी मांग आ रही है। इसके अलावा यहां महिलाएं बचे हुए गोबर चूर्ण और पत्तियों से ऑर्गेनिक खाद भी बना रही हैं।

दिवाली के लिए विशेष तौर पर मिट्टी और गोबर के दीयों को प्रोत्साहित करने के लिए पहली बार शासन ने आदेश जारी किए हैं। सभी को दूर दराज से दिए बेचने के लिए आने वाले कुम्हारों को बाजार में किसी तरह की कोई परेशानी न होने का विशेष ध्यान रखने कहा है। शासन ने प्रदेशवासियों को इस बार ज्यादा से ज्यादा मिट्टी और गोबर के दीएं जलाने की अपील की है।

शहरो में ग्रामीण क्षेत्रों से दिवाली में दर्जनों कुम्हार दीए लेकर आते हैं। उन्हें बाजार में जगह नहीं मिलती ऐसे में कुछ फेरी लगाकर गली मोहल्लों में भी दिए बेचते हैं, पर इस बार ऐसा नहीं होगा। शासन ने सभी कुम्हारों के लिए बाजार में उचित व्यवस्था करने और स्थानीय निकाय से उनसे किसी तरह का कोई शुल्क वसूल नहीं करने कहा है। ऐसी मान्यता है कि धनतेरस पर 13 गोबर के दीप, नरक चौदस को 14 और दीपावली में 21 दीप जलाकर मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर आसानी से मिल जाते हैं, इसलिए महिलाएं घर पर ही तैयार कर पूजा करती है, लेकिन शहरों में गोबर की उपलब्धता नहीं होने से लोग मिट्टी के दिए बनाकर ही पूजा करते हैं, गोबर के दीए का बड़ा की महत्व होता है। बाजार में उपलब्ध चाईनीज और अन्य सामग्री के उपयोग नहीं करना चाहिए। दीवाली में भारी आवाज एवं अधिक धुआं वाले फटाखों का उपयोग कम करना चाहिए। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है, जो सीधे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, इससे बचना चाहिए।

आईए हम सभी मिलकर गोबर एवं मिट्टी के दिए जलाकर दीवाली को इकोफ्रेंडली बनाए और अपने परिवार एवं प्रदेश को स्वच्छ और सुन्दर बनाएं। आप सभी को दीपावली की बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

 


ढाका : छेड़छाड़ का विरोध करने पर स्कूली छात्रा को जिंदा जलाने वाले 16 लोगों को सुनाई गई मौत की सजा

ढाका : छेड़छाड़ का विरोध करने पर स्कूली छात्रा को जिंदा जलाने वाले 16 लोगों को सुनाई गई मौत की सजा

24-Oct-2019

ढाका। भारत के एक पड़ोसी देश में यौन उत्‍पीड़न से जुड़ एक मामले में दुनिया के सामने एक बड़ा उदाहरण पेश किया है। पड़ोसी बांग्‍लादेश की कोर्ट ने 19 साल की स्‍कूल जाने वाली लड़की नुसरत जहां रफी की हत्‍या के मामले में दोषी पाए गए 16 लोगों को मौत की सजा सुनाई है। नुसरत को इस वर्ष अप्रैल में छेड़छाड़ का विरोध करने पर जिंदा जला दिया गया था। उसकी मौत के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया था। नुसरत पर पहले केरोसिन डाला गया और फिर उसे आग लगा दी गई थी। उसे सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया गया था क्‍योंकि उसने उस मदरसे के खिलाफ दर्ज कराई यौन उत्‍पीड़न की अपनी शिकायत को वापस लेने से इनकार कर दिया था।

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अभियोजन पक्ष के वकील हफीज अहमद ने मीडिया को बताया था कि कोर्ट रूम में लोगों का हुजूम था जिस समय मौलवी को सजा सुनाई गई थी। वकील की मानें तो इस फैसले से साबित हो गया है कि कोई भी हो देश में हत्‍या करने के बाद कोई भी बच नहीं सकता है। साथ ही अब दुनिया को मालूम है कि देश में कानून व्‍यवस्‍था जैसी कोई चीज भी है। पुलिस का कहना था कि नुसरत की हत्‍या टीचर के आदेश पर की गई थी। प्रधानमंत्री शेख हसीना की ओर से इस घटना के दोषियों को सजा देने की बात कही गई है। नुसरत की तरफ से इस वर्ष 27 मार्च को पुलिस में यौन उत्‍पीड़न की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई गई थी।नुसरत ने अपने भाई के मोबाइल फोन पर अपना आखिर बयान दर्ज कराया। नुसरत ने इसमें अपने हमलावरों की पहचान की है।

नुसरत ने आखिरी बार कहा था, 'टीचर ने मुझे छुआ है और मैं इस अपराध के खिलाफ अपनी आंखिरी सांस तक लड़ूंगी।'घटना ढाका से करीब 150 किलोमीटर दूर छोटे से शहर फेनी की है। नुसरत ने अपनी शिकायत में बताया था कि स्‍कूल का प्रिंसिपल उसे अपने ऑफिस में बुलाता था और बार-बार उसे गलत तरीके से छूता था। जब चीजें उसके नियंत्रण के बाहर हो गईं तो वह वहां से भाग गई।

नुसरत ने लोकल पुलिस स्‍टेशन में इसकी शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ऑफिसर ने मोबाइल पर नुसरत की गवाही की रिकॉर्डिंग की थी। नुसरत अपने साथ हुए बर्ताव को बताते हुए बहुत ही असहज थी और ऑनलाइन रिलीज वीडियो में इस बात की पुष्टि भी होती है। पूरे समय उसने अपने हाथों से चेहरा ढंका हुआ था। पुलिस ऑफिसर ने उससे कहा कि उसे अपना चेहरा नहीं छिपाना चाहिए क्‍यों‍कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। छह अप्रैल को यानी घटना के 11 दिन बाद नुसरत अपनी फाइनल एग्‍जाम के लिए स्कूल गई थी। यहां पर एक लड़की यह कहकर नुसरत को छत पर ले गई कि उसकी एक दोस्‍त की पिटाई हो रही है। छत पर पहले से ही चार से पांच लोग मौजूद थे। उन्‍होंने नुसरत से केस वापस लेने का दबाव डाला। जब नुसरत ने मना कर दिया तो उस पर मिट्टी का तेल डालकर उसे जिंदा जला दिया गया। नुसरत को 80 प्रतिशत जली हुई हालत में अस्‍पताल लाया गया था। डॉक्‍टर उसका इलाज करने में असमर्थ थे। फिर उसे ढाका मेडिकल कॉलेज हास्पिटल भेजा गया। यहां पर 10 अप्रैल को नुसरत ने दम तोड़ दिया।


1989 से बंद है कश्मीर में थिएटर, अब फिर से हर जिले में दिखाई जाएगी फिल्में

1989 से बंद है कश्मीर में थिएटर, अब फिर से हर जिले में दिखाई जाएगी फिल्में

24-Oct-2019

मीडिया रिपोर्ट 

श्रीनगर: कश्मीर में धारा 370 निरस्त होने के बाद हालातों को सामान्य करने को एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए जम्मू और कश्मीर सरकार ने कश्मीर क्षेत्र के विभिन्न जिलों में लोगों को मुफ्त में फिल्मों की स्क्रीनिंग के लिए व्यवस्था करने का निर्णय लिया है. बता दें कि सन 1988 से उग्रवाद के प्रकोप के बाद से कश्मीर में सिनेमा थिएटर बंद हो गये थे और अभी कुछ अरसे श्रीनगर में केवल एक नीलम थिएटर को पुनः शुरू किया गया.

कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर आधार अहमद खान ने बताया कि सरकार बहुत जल्द जनता के लिए प्रत्येक जिलों में विभिन्न फिल्मों की स्क्रीनिंग शुरू करेगी. उन्होंने कहा कि लोग विभिन्न फिल्म स्क्रीनिंग केंद्रों पर जा सकते हैं और मुफ्त में फिल्में देख सकते हैं. खान ने कहा, “बच्चों, खेल, संस्कृति और अन्य वृत्तचित्रों पर आधारित फिल्मों का चयन कर कश्मीर के प्रत्येक जिले के चयनित सभागारों में उन्हें दिखाया जाएगा.

आम जनता अपने जिलों में मुफ्त में फिल्में देख सकती है.” श्रीनगर के एक निवासी ने कहा कि सिवाय श्रीनगर के एक नीलम थिएटर कश्मीर डिवीजन के किसी भी जिले में आज तक कोई भी थिएटर संचालित नहीं है. उन्होंने कहा कि उन्हें फिल्में देखने के लिए सेना द्वारा चलाए जा रहे सिनेमाघरों का रुुख करना पड़ता है. संभागीय आयुक्त ने सभी डिप्टी कमिश्नरों को फिल्मों के स्क्रीनिंग के लिए पर्याप्त व्यवस्था करने के निर्देश दिए है, जिसमें उनके जिलों में फिल्मों को परेशानी मुक्त स्क्रीनिंग के लिए हीटिंग, सीटिंग, दुकानों और अन्ये व्यवस्थाये शामिल है.

 


दुबई- भारतीय बिजनेसमैन ने लॉटरी में जीते 1 मिलियन डॉलर

दुबई- भारतीय बिजनेसमैन ने लॉटरी में जीते 1 मिलियन डॉलर

23-Oct-2019

दुबई में एक एक भारतीय बिजनेसमैन के लिए 20 अक्तूबर का दिन लकी रहा। मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक इस बिजनेसमैन ने एक लॉटरी में 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर जीते। वहीं एक अन्य व्यक्ति ने शानदार मोटर बाइक जीती।
कमाल्सनन नादार वासु नाम की भारतीय मूल के वयक्ति ने ला ने लॉटरी में टिकट नंबर 3318 चुना था। यह टिकट उनके लिए लकी रहा और उन्होंने 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर जीत लिए। लॉटरी में भारी भरकम रकम जीतने के बाद महिला ने कहा कि वो निशब्द हैं। वो अपनी भावनाएं बयां नहीं कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता कि मैं दुबई को इस सरप्राइज के लिए कैसे शुक्रिया अदा करूं। दुबई में पिछले 35 साल से रह रहे हैं। 2018 में अपने व्यापार में गिरावट के बाद से Dh900,000 का भारी कर्ज उठाया था दें।

वह अपने जीते हुए पैसे का उपयोग अपने ऋणों को निपटाने के लिए करेंगे। बाकी उसके व्यवसाय और भविष्य के लिए बचा कर रखेंगे।  उन्होंने गल्फ न्यूज को बताया, मेरे साथ टिकट खरीदने वाले मेरे दोस्त को भी आधे मिलियन डॉलर दूंगा । 56 साल के वासु अब 30 साल से स्टील फैब्रिकेशन का कारोबार करते हैं। ।

 


राजस्थान में कार्यकर्ताओं ने BSP के दो बड़े नेताओं को गधे पर बिठाया, कालिख पोती

राजस्थान में कार्यकर्ताओं ने BSP के दो बड़े नेताओं को गधे पर बिठाया, कालिख पोती

22-Oct-2019

जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुुुर में बहुजन समाज पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के ही कुछ कार्यकर्ताओं ने टिकट वितरण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए जूतों की माला पहना दी और उनके चेहरे पर कालिख पोत दी. यह घटना मंगलवार को यहां बनीपार्क स्थित बसपा कार्यालय में हुई. इसका वीडियो सामने आया है. बसपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक रामजी गौतम और पार्टी की राज्य इकाई के प्रभारी सीताराम के चेहरे पर काली स्याही पोत दी और उन्हें जूतों की माला पहना दी. उन्होंने गौतम को गधे पर भी बैठा दिया. घटना का वीडियो भी वायरल हुआ है.

वहीं, बसपा प्रमुख मायावती ने इस घटना को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है. खबरों के अनुसार बसपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक रामजी गौतम और पार्टी की राज्य इकाई के प्रभारी सीताराम के चेहरे पर काली स्याही पोत दी और उन्हें जूतों की माला पहना दी. उन्होंने गौतम को गधे पर भी बैठा दिया. पार्टी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इन दोनों नेताओं ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात किया है. वे कार्यकर्ताओं की दुर्दशा को पार्टी की प्रमुख मायावती तक नहीं पहुंचाते हैं और भ्रष्टाचार करते हैं.

घटना के संबंध में एक कार्यकर्ता ने कहा,‘‘हमारे कार्यकर्ता अपने नेताओं से परेशान हैं. कार्यकर्ता पांच साल मेहनत करते हैं, लेकिन नेता पैसे लेकर भाजपा और कांग्रेस के पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट देते हैं. बसपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को नजरअंदाज किया जाता है और उनका शोषण किया जाता है.’’ बसपा प्रमुख मायावती ने इस घटना की निंदा करते हुए कांग्रेस पार्टी पर राज्य में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर हमला कराने का आरोप लगाया.

मायावती ने ट्वीट किया, ”कांग्रेस पार्टी ने पहले राजस्थान में बसपा विधायकों को तोड़ा और अब मूवमेन्ट को अघात पहुंचाने के लिए वहाँ वरिष्ठ लोगों पर हमला करा रही है जो अति-निन्दनीय और शर्मनाक है.”


लब पे आती है… पर हेडमास्टर का स्थानांतरण : छात्रों ने कहा, हम  भी वहीं जहाँ वे जायेंगे !

लब पे आती है… पर हेडमास्टर का स्थानांतरण : छात्रों ने कहा, हम भी वहीं जहाँ वे जायेंगे !

21-Oct-2019

बिसालपुर : 19 अक्टूबर को पीलीभीत जिले की BSA ने अली के निलंबन को “मानवीय आधार” पर अस्थायी रूप से रद्द कर दिया और उसे दूसरे स्कूल में स्थानांतरित कर दिया। पीलीभीत जिले के बीसालपुर ब्लॉक के सरकारी प्राइमरी स्कूल II के एक छात्र ने बताया, हेडमास्टर – फुरकान अली सर को दूसरे स्कूल में ट्रांसफर कर दिया गया है” मैं भी वहीं एडमिशन लूंगा। छात्रों ने कहा “वह सबसे अच्छा शिक्षक है। सभी ने उसे स्कूल में प्यार किया क्योंकि वह दयालु है और उसने हमें कभी नहीं मारा”।

बच्चे उठते हैं और यह कहते हुए रोना शुरू कर देते हैं कि वे स्कूल नहीं जाना चाहते
कविता (35), जिनके दो बच्चे स्कूल जाते हैं – दूसरी कक्षा में एक लड़का और कक्षा 1 में एक लड़की – कहती है, “मेरे बच्चों ने मुझे बताया है कि मास्टर साहब अपने पैसे से स्कूल के लिए सब्जियाँ प्राप्त करते थे। उनके निलंबन के बाद, हर सुबह, बच्चे उठते हैं और यह कहते हुए रोना शुरू कर देते हैं कि वे स्कूल नहीं जाना चाहते हैं। मुझे नहीं पता कि वो क्या करने जा रहे हैं। ” एक अन्य माता-पिता, पूनम (33), जिनका बेटा द्वितीय श्रेणी में है, का कहना है कि वे ब्लॉक शिक्षा अधिकारी को एक लिखित आवेदन प्रस्तुत करने की योजना बना रहे हैं। “हम साक्षर नहीं हैं, लेकिन हम उसे स्कूल में वापस लाने के लिए अधिकारों को पत्र लिखेंगे।

14 अक्टूबर को हुई थी निलंबन
बता दें कि 14 अक्टूबर को पीलीभीत प्रशासन ने स्थानीय वीएचपी सदस्यों की शिकायत के बाद अली को निलंबित कर दिया था कि उन्होंने छात्रों को सुबह की सभा के दौरान एक धार्मिक प्रार्थना सुनाई। उन्होंने आरोप लगाया था कि मदरसों में विशेष प्रार्थना का पाठ किया जाता है। 19 अक्टूबर को पीलीभीत जिले की BSA ने अली के निलंबन को “मानवीय आधार” पर अस्थायी रूप से रद्द कर दिया और उसे दूसरे स्कूल में स्थानांतरित कर दिया।
शनिवार को द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए, पीलीभीत के डीएम वैभव श्रीवास्तव ने कहा था, “हेडमास्टर फुरकान अली को निलंबित कर दिया गया था क्योंकि एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था जिसमें वह यह कहते और सुनते हुए दिखाई दे रहे हैं कि क्योंकि प्राथमिक स्कूल के अधिकांश छात्र एक हैं। विशेष समुदाय और उनके अनुरोध के बाद, वह इकबाल की कविता को सुबह की सभा के दौरान सुनाया करते थे। ”

प्रधानाध्यापक हमेशा बच्चों के शौकीन थे
घीसपुर के हबीबुल्ला खान जानौबी क्षेत्र के निवासी अली 2011 में प्राथमिक विद्यालय में तैनात थे। उनके पिता इरफान कहते हैं कि अली परिवार का पहला व्यक्ति था जिसने सरकारी नौकरी हासिल की। उनका दाहिना पैर बचपन से पोलियो से पीड़ित था, अली हमेशा एक “शांत बच्चा था जो अपनी किताबों को रखता था”, इरफान कहते हैं “अब, अली वह व्यक्ति है जो मेरी दवाओं का भुगतान करता है। उन्होंने शादी नहीं की क्योंकि वह कहते हैं कि वह अपनी सभी बहनों की शादी होने के बाद करेंगे। सात भाई-बहनों में अली सबसे बड़े हैं। अली की बहन ग़ज़ाला (28), जो दिसंबर में शादी करने वाली है, और उसने बरेली के एक कॉलेज से बीए पूरा किया है, कहती है कि प्रधानाध्यापक हमेशा बच्चों के शौकीन थे। “क्योंकि वह सबसे बड़ा था, वह हमेशा हमारी देखभाल करता है। उन्हें हमेशा बच्चे पसंद थे। वे तुरंत उससे दोस्ती कर लेते हैं और उसके साथ खेलना शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि वह स्कूल में बच्चों के साथ बहुत अच्छा है”।

प्रेम नारायण कहते हैं कि फुरकान का छात्रों के साथ अच्छा तालमेल है
प्राथमिक विद्यालय परिसर में बीईओ कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी प्रेम नारायण कहते हैं कि फुरकान का छात्रों के साथ अच्छा तालमेल है। “अगर वह छात्रों को एक बार लाइन में खड़े होने के लिए कहेंगे, तो वे करेंगे। यह डर के कारण नहीं बल्कि सम्मान के कारण हुआ। मुझे आश्चर्य नहीं है कि उपस्थिति को हटा दिया गया है क्योंकि वह हटा दिया गया था। 150-200 छात्रों को नियंत्रित करने वाला एक शिक्षक एक बड़ी बात है”।

अली के निलंबन के बाद, स्कूल में उपस्थिति काफी हद तक कम हो गई है
अली के निलंबन के बाद, स्कूल में उपस्थिति काफी हद तक कम हो गई है। निलंबित किए जाने के एक दिन बाद, केवल पांच छात्रों ने उपस्थिति रजिस्टर के अनुसार स्कूल में दिखाया। कविता, जिनके बच्चे निलंबन के बाद से स्कूल जाने से इनकार कर रहे हैं, ने कहा, “प्रशासन हमारे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। वे हमारे बच्चों की परवाह नहीं करते क्योंकि हम गरीब हैं। ”


सरकार के विरोध में ऑस्ट्रेलियाई अखबारों ने खाली छोड़ा फ्रंट पेज, कहा- सरकार मीडिया की आजादी में दे रही है दखल

सरकार के विरोध में ऑस्ट्रेलियाई अखबारों ने खाली छोड़ा फ्रंट पेज, कहा- सरकार मीडिया की आजादी में दे रही है दखल

21-Oct-2019

नई दिल्ली: ऑस्ट्रेलिया के बड़े अख़बारों ने आज प्रेस प्रतिबंधों के विरोध में अपने फ्रंट पेज को ब्लैक छोड़ कर एकता का प्रदर्शन किया है. यह विरोध राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के खिलाफ है. पत्रकारों का कहना है कि इससे रिपोर्टिंग में बाधा उत्पन्न हो रही है. अखबार के पहले पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा गया है, ''जब सरकार आपसे सच दूर रखती हो, वे क्या कवर करेंगे?''

अखबारों के विरोध पर सरकार का कहना है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन करता है लेकिन "कोई भी कानून से ऊपर नहीं है." जून में, ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (एबीसी) पर पुलिस ने छापेमारी की थी. यही नहीं न्यूज कॉर्प ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार के घर में भारी तोड़-फोड़ की गई थी. मीडिया संगठनों का कहना है कि व्हिसलब्लोअर्स ने एक सूचना दी थी, इसी को छापे जाने की वजह से मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया गया. रिपोर्ट में युद्ध अपराध की बात की गई थी और यही नहीं सरकारी एजेंसी द्वारा ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की जासूसी की बात कही गई थी.

न्यूज कॉर्प ऑस्ट्रेलिया के कार्यकारी चेयरमैन माइकल मिलर ने ब्लैक आउट न्यूज़ पेपर की तस्वीर ट्वीट की. इस ट्वीट में द ऑस्ट्रेलियन और द डेली टेलीग्राफ अखबार की भी कॉपी है. उन्होंने आम लोगों से अपील की कि वह सरकार से पूछें कि "वे मुझसे क्या छिपाने की कोशिश कर रहे हैं?" एबीसी के प्रबंध निदेशक डेविड एंडरसन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया सच छिपाने वाला लोकतंत्र बनने की राह पर है. रविवार को ही ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने दोहराया कि छापे के बाद तीन पत्रकारों पर मुकदमा चल सकता है. इसी के मद्देनजर मीडिया संस्थानों ने अपना विरोध जताया है.

प्रधान मंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि प्रेस स्वतंत्रता ऑस्ट्रेलिया के लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन "कानून के शासन" को बरकरार रखने की आवश्यकता है. पत्रकारों का कहना है सख्त सुरक्षा कानूनों के माध्यम से खोजी पत्रकारिता खतरे में है, जिससे जनता का "जानने का अधिकार" खत्म हो गया है.

साभार : abp news


कमलेश तिवारी के बाद उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष अमित जानी को जान से मारने की धमकी दी गई !

कमलेश तिवारी के बाद उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष अमित जानी को जान से मारने की धमकी दी गई !

21-Oct-2019

हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या का मामला अभी थमा भी नहीं था कि एक और हिंदूवादी नेता को जान से मारने की धमकी मिली है. जानकारी के मुताबिक दिल्ली से सटे नोएडा में हिंदूवादी नेता और उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष अमित जानी को जान से मारने की धमकी दी गई है. बताया जा रहा है कि बुर्के में आई एक महिला ने अमित जानी के सेक्टर-15 स्थित कॉरपोरेट हाउस में गार्ड को धमकी भरा लिफाफा दिया था. अमित ने इसकी सूचना पुलिस को दी. इसके बाद मौके पर पुलिस अधिकारी पहुंचे और जांच की. कोतवाली सेक्टर-20 पुलिस ने इस मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया है.

एसएसपी वैभव कृष्ण ने बताया कि इस मामले में कोतवाली सेक्टर-20 में मुकदमा पंजीकृत किया गया है. सीसीटीवी कैमरे खंगाले जा रहे हैं. पुलिस की टीम जल्द ही इस मामले का खुलासा करेगी. गौरतलब है कि हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की बीते शुक्रवार को खुर्शेदबाग इलाके में उनके घर के अंदर गला रेतकर और गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड के सिलसिले में पुलिस ने बिजनौर निवासी आरोपियों मुफ्ती नईम काजमी और मौलाना अनवारुल हक के साथ गुजरात में सूरत के रहने वाले फैजान यूनुस, मोहसिन शेख और राशिद अहमद को हिरासत में लेकर पूछताछ की है. मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया है. (इनपुट-भाषा)

मीडिया इन पुट सिआसत डॉट कॉम 


हिंदू महासभा के नेता की हत्या पर बोले अखिलेश, ‘कमलेश की मां की बात जरूर सुनना’

हिंदू महासभा के नेता की हत्या पर बोले अखिलेश, ‘कमलेश की मां की बात जरूर सुनना’

20-Oct-2019

लखनऊ : कमलेश तिवारी हत्याकांड पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर जमकर हमला बोला. अखिलेश ने कहा कि लखनऊ में एक हिंदू महासभा के नेता की हत्या कर दी गई, ऐसी और कितनी घटनाएं बतानी पड़ेंगी.

उन्होंने बताया, ‘मृतक की मां कह रही है हमें समाजवादी सरकार में सुरक्षा मिली थी, आजम खान के जमाने में हमें गनर मिले थे लेकिन इस योगी सरकार ने हमें सुरक्षा नहीं दी और उसी का परिणाम है कि हमारे बेटे की हत्या हो गई.’
उन्होंने कहा कि सरकार बीजेपी की है, पुलिस बीजेपी की है फिर भी हत्याएं नहीं रुक रहीं. अखिलेश ने योगी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ‘वो कहते हैं व्यवस्था करना चाहते हो तो ठोक दो, लेकिन किसी को नहीं पता कि किसे ठोकना है.’

‘कमलेश की मां की बात जरूर सुनना’

अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी के लोग खुद दुखी हैं. उनके लोग मारे जा रहे हैं, परेशान हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि लखनऊ में मृतक की मां का स्टेटमेंट जरूर देखना, फिर आपको पता चल जाएगा कि हत्या का दोषी कौन है.

उन्होंने कहा, ‘ये लोग (योगी सरकार) हत्या की कहानी को भी दूसरी कहानी की तरफ लेकर जा रहे हैं और कह रहे हैं कि 2015 में धमकी दी गई थी. अगर 2015 में धमकी दी गई थी तो बताओ ढाई साल से सरकार क्या कर रही थी. ढाई साल से सरकार ने कार्रवाई क्यों नहीं की. यह केवल कहानी बना रहे हैं और जिन्होंने घटना की वह भी नहीं पकड़े गए हैं. पकड़े वो गए हैं जो 2015 में साजिश कर रहे थे.’

 

 


मोदी सरकार एक और बड़ी सरकारी कंपनी BHEL की हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में

मोदी सरकार एक और बड़ी सरकारी कंपनी BHEL की हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में

18-Oct-2019

नई दिल्ली : मोदी सरकार एक और बड़ी सरकारी कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है, मिली जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार दूसरी बड़ी सरकारी कंपनी BHEL यांनी की भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी बेचने का विचार कर रही है.

26 फीसदी हिस्सेदारी करना चाहती है सरकार

जानकारी के लिए बता दें कि फिलहार BHEL में सरकार कि हिस्सेदारी 63.17 फीसदी है, जिसे घटाकर 26 फीसदी करना चाहती है. बताया जा रहा है कि सिर्फ हिस्सेदारी ही नहीं घटाई जायेगी बल्कि एसेट का मॉनेटाइजेशन किया जा रहा है. कंपनी के 4 से 5 ऐसे सेगमेंट की पहचान की जा रही है जिसको सरकार निजी हाथों में सौंप सकती है.

सरकार नॉन-कोर बिजनेस को निजी हाथों में सौंपेगी और ये प्रक्रिया चालू वित्त वर्ष में पूरी कर ली जाएगी. खासकर BHEL के ट्रांसपोर्टेशन बिजनेस को निजी हाथों में सौंपने का प्लान है. इन दोनों प्रस्तावों पर काफी उच्च स्तरीय बैठक हो चुकी है और इस पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है. अब इसकी प्रक्रिया को जल्द से जल्द शुरू किया जाएगा.

अभी स्ट्रैटजिक बिक्री की प्रक्रिया में सरकार ने सबसे पहले उन कंपनियों की पहचान की है जिसमें स्ट्रैटजिक बिक्री हो सकती है. ये अब तय करने का अधिकार कंपनी की नोडल मिनिस्ट्री के पास नहीं होगा, अब ये नीति आयोग के पास है. नीति आयोग ने जिन कंपनियों की पहचान की है उनमें से एक नई कंपनी जुड़ गई है BHEL. नीति आयोग के इस प्रस्ताव के ऊपर संबंधित मंत्रालयों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक कैबिनेट सचिवालय में हुआ. उसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में हुआ. फिर ये तय हुआ कि BHEL को निजी हाथों में सौपेंगे और इसमें हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम करेंगे.


बैंकों के विश्वास पर ग्रहण लगना!

बैंकों के विश्वास पर ग्रहण लगना!

17-Oct-2019

-ः ललित गर्ग :- 

पंजाब एंड महाराष्ट्र कोआपरेटिव बैंक के तीन खाताधारकों ने पिछले दो-तीन दिनों में अपनी जीवनलीला इसलिये समाप्त कर दी कि बैंक के डूबने का भय उत्पन्न हो गया। इस बैंक में जमा अपनी मेहनत की जमा पूंजी के खतरे में होने की संभावनाओं ने ही इन तीनों को आत्महत्या करने को विवश किया। ये घटनाएं न केवल भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पर बल्कि शासन व्यवस्था पर भी एक बदनुमा दाग है। आज यह स्वीकारते कठिनाई हो रही है कि देश की आर्थिक व्यवस्था को सम्भालने वाले हाथ इस कदर दागदार हो गए हैं कि नित-नया बैंक घोटाला एवं घपला सामने आ रहा है। दिन-प्रतिदिन जो सुनने और देखने में आ रहा है, वह पूर्ण असत्य भी नहीं है। पर हां, यह किसी ने भी नहीं सोचा कि जो बैंकें राष्ट्र की आर्थिक बागडोर सम्भाले हुए थे और जिन पर जनता के धन को सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी, क्या वे सब इस बागडोर को छोड़कर अपनी जेब सम्भालने में लग गये? जनता के धन के साथ खिलवाड़ करते हुए घपले करने लगे।

सर्वविदित है कि बैंक में चल रहे फ्राड को पकड़ने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक आफ इंडिया की है। लोगों का पैसा सुरक्षित रहे, इसकी जिम्मेदारी भी आरबीआई की है। आरबीआई अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता, केन्द्र सरकार भी इन स्थितियों के लिये दोषी है। घर में अपनी मेहनत की पूंजी को जमा रख नहीं सकते, बैंकों में जमा कराये तो जमा धन के सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं, कहां जाये आम आदमी? यह कैसी शासन-व्यवस्था है? बैंकिंग व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठा तो फिर कौन जाएगा बैंकों में? लोगों का बैंकिंग तंत्र में भरोसा बहाल करने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने ही होंगे अन्यथा पूरा अर्थतंत्र ही अस्थिर एवं डूबने की कगार पर पहुंच जायेगा।

कैसे त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति देखने को मिल रही है कि पीएमसी के खाताधारक अपने ही पैसे निकालने के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। जब से आरबीआई ने पीएमसी बैंक में गड़बड़ी को लेकर पाबंदियां लगाई हैं तब से खाताधारक परेशान हैं, भयभीत है, डरे हुए है। जरूरतमंद लोग बैंक से अपना ही पैसा नहीं निकाल पा रहे। जिस व्यक्ति की नौकरी छूट गई हो और उसकी बैंक में 90 लाख की रकम जमा हो, बेबसी इतनी कि वह बैंक में जमा पैसों के बावजूद अपने दिव्यांग बेटे का इलाज भी नहीं करवा पा रहा हो, उसका सदमे में दम तोड़ देना स्वाभाविक है। एक अन्य खाताधारक ने आत्महत्या कर ली जबकि एक अन्य खाताधारक की मौत हार्ट अटैक से हुई। ये खौफनाक एवं डरावनी स्थितियां सत्ता की साख पर सवालिया निशान है।

पीएमसी बैंक के खाताधारकों की पीड़ा तो नोटबंदी की पीड़ा से कहीं अधिक है। कौन सुनेगा इनकी पीड़ा, कौन बांटेगा इनका दुःख-दर्द। यह इस देश की विडम्बना ही है कि यहां आम आदमी लुट रहा है, मुट्ठीभर राजनीतिज्ञ और पूंजीपति ऐश कर रहे हैं। आजादी के सात दशक का सफर तय करने के बाद भी आम आदमी ठगा जा रहा है, उसको लूटने वाले नये-नये तरीकें लेकर प्रस्तुत हो जाते हैं। कभी इन्हें फ्लैट देने के नाम पर लूटा जाता है तो कभी कर्ज देने के नाम पर। कभी नौकरी दिलवाने के नाम पर इनसे ठगी की जाती है, तो कभी स्कूल-कालेज में दाखिले के नाम पर। कभी बैंक का दीवाला पिट गया तो इनसे धोखा हुआ।

आखिर मेहनत करने वाले लोग किसकी चैखट पर जाकर अपना दुख सुनाये, किसको अपने दर्द की दुहाई दें। आज किसको छू पाता है मन की सूखी संवेदना की जमीं पर औरों का दुःख-दर्द? बैंक घोटालों की त्रासद चुनौतियों का क्या और कब अंत होगा? बहुत कठिन है भ्रष्टाचार, अराजकता, घोटालों-घपलों की उफनती नदी में नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना।

अब सवाल यह है कि भ्रष्ट लोगों और बैंक का पैसा डकार कर भागने वाले के गुनाह का खामियाजा बैंक के ग्राहक क्यों भुगतें? घोटालेबाज क्यों नहीं सजा पाते? क्यों नहीं भविष्य में ऐसे घोटाले न होने की गारंटी सरकार देती? कैसे आरबीआई अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है? बैंक के खाताधारकों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आगे गुहार लगाई थी, तब उन्होंने भरोसा दिलाया था कि वह ग्राहकों को राहत दिलाने के लिए रिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करेंगी। राहत ही क्यों, पूरा पैसा देने की गारंटी क्यों नहीं? रोशनी बन कर गृहमंत्री अमित शाह ने पीएमसी घोटाले पर आश्वासन दिया है कि ग्राहकों का पूरा पैसा वापिस किया जाएगा। पीएमसी बैंक में 80 फीसदी तक एक लाख रुपए तक के डिपाजिटर हैं, जिनके पैसे डिपाजिट इंश्योरेंस स्कीम एक्ट के तहत वापिस किए जाएंगे। लेकिन इससे अधिक राशि के डिपोजित का क्या होगा?

सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों और निचले पायदान पर खड़े लोगों के बीच आखिर कब तक एक धोखेभरा खेल चलता रहेगा? महंगाई के दौर में पाई-पाई जोड़ने और अपनी बचत को बैंक में डालने वाले आम नागरिक मनी लांड्रिंग या हवाला जैसा कुछ नहीं कर रहे हैं। फिर उनकी जमा पूंजी को निकालने के लिये तरह-तरह की पाबंदियों क्यों? यह उनकी मेहनत की कमाई है। जो स्थिति पीएमसी में देखने को मिल रही है, उसके बाद स्पष्ट है कि यदि हर सहकारी बैंक की छानबीन की जाए तो आधे से ज्यादा बैंकों के फ्राड सामने आ जाएंगे। समय रहते उनकी जांच क्यों नहीं की जाती? सभी कोई पीएमसी काण्ड के माध्यम से भ्रष्टाचार के दानव को ललकार रहे हैं। गांव में चोर को पकड़ने के लिए विरले ही निकलते हैं, पर पकड़े गए चोर पर लाते लगाने के लिए सभी पहुंच जाते हैं।

इस पीएमसी काण्ड ने बैंकों के प्रति विश्वास की हवा निकाल दी। भ्रष्टाचार का रास्ता चिकना ही नहीं ढालू भी होता है। क्या देश मुट्ठीभर राजनीतिज्ञों और पूंजीपतियों की बपौती बनकर रह गया है? लोकतंत्र के मुखपृष्ठ पर बहुत धब्बे हैं, अंधेरे हैं, वहां मुखौटे हैं, गलत तत्त्व हैं, खुला आकाश नहीं है। मानो प्रजातंत्र न होकर सज़ातंत्र हो गया। व्यवस्था और सोच में व्यापक परिवर्तन हो ताकि अब कोई अपनी जमा पूंजी के डूबने के भय एवं डर में आत्महत्या नहीं करे। मोदी सरकार को ऐसा उपाय करना होगा कि बैंक के विफल होने पर कम से कम लोगों की मेहनत की कमाई पूरी मिल सके।

इसके लिए कानून में संशोधन भी करना पड़े तो किया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बैंकिंग व्यवस्था से विश्वास उठने के साथ-साथ वह जानलेवा भी बनती जायेगी। समानान्तर काली अर्थव्यवस्था इतनी प्रभावी है कि वह कुछ भी बदल सकती है, कुछ भी बना और मिटा सकती है। एक वक्त था जब राज्यों की सुरक्षा व विस्तार हथियारों के बल पर होते थे। शासकों को जान हथेली पर रखनी पड़ती थी। आज सत्ता मतों से प्राप्त होती है और मत काले धन से। और काला धन हथेली पर रखना होता है। बस यही घोटालों और भ्रष्टाचार की जड़ है और अब बैंकों तक उनकी पहुंच हो गयी है।

लोकतंत्र एक पवित्र प्रणाली है। पवित्रता ही इसकी ताकत है। इसे पवित्रता से चलाना पड़ता है। अपवित्रता से यह कमजोर हो जाती है। ठीक इसी प्रकार अपराध के पैर कमजोर होते हैं। पर अच्छे आदमी की चुप्पी उसके पैर बन जाती है। अपराध, भ्रष्टाचार अंधेरे में दौड़ते हैं। रोशनी में लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। हमें रोशनी बनना होगा। और रोशनी बैंक घोटालों एवं जनता की मेहनत की कमाई को हड़पने से प्राप्त नहीं होती। प्रेषक


अयोध्या जनपद के सीबार गाँव में चेहल्लुम के अवसर पर हिंदू भाइयों द्वारा सबील एवं प्रसाद वितरण।

अयोध्या जनपद के सीबार गाँव में चेहल्लुम के अवसर पर हिंदू भाइयों द्वारा सबील एवं प्रसाद वितरण।

17-Oct-2019

फैजाबाद जिले में स्थित ग्राम सीबार , थाना रौनाही जो भेलसर से 8 किमी आगे स्थित है। यहां कल 16 अक्टूबर को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का चेहल्लुम मनाया गया। जिसमें फैजाबाद के मौलाना सादिक हसन साहब ने मजलिस को खिताब किया। उसके बाद निमौली फैजाबाद की अंजुमन ने जुलूस बरामद किया। जो करबला बेगमगंज में जाकर ख़त्म हुआ। सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन मौजूद था। यहां हर साल चांद की 29 के हिसाब से 17 सफर को चेहल्लुम का आयोजन किया जाता है। यहां के भाईचारे एवं एकता की मिसाल आज के दौर में प्रेरणादायक है। यहां हर साल चेहल्लुम के अवसर पर जब जुलूस मंदिर पर पहुंचता है तो हिन्दू भाइयों द्वारा जुलूस का स्वागत किया जाता है। इस वर्ष भी जुलूस पहुंचने पर लोगों को पानी पिलाया गया और प्रसाद भी बांटा गया। इस मौके पर मंदिर के पुजारी मनीराम, जगजीवन प्रसाद, वैदेही शरण, सालिक राम यादव, सतगुर शरण उपस्थित थे। ये कार्यक्रम डॉ अशोक की देखरेख में सम्पन्न हुआ।

इस गांव की यह खासियत है कि यहां हर त्योहार सब मिलजुल कर मनाते हैं। अंजुमन अब्बासिया सैय्यदवाड़ा सीबार की तरफ से अध्यक्ष सै मो अकबर, सचिव सै मतलूब असगर और मुनतजिम  सै रज़ा इमाम मौजूद थे।


क्या राजनीति विपक्ष विहीन हो रही है?

क्या राजनीति विपक्ष विहीन हो रही है?

16-Oct-2019

लेख : ललित गर्ग 

महाराष्ट्र एवं हरियाणा के विधानसभा चुनाव के परिदृश्यों को देखते हुए एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है? क्या विपक्ष राजनीति ही नहीं, नीति विहीन भी हो गया है? यही कारण है कि आजादी के बाद के राजनीतिक सफर में विपक्ष की इतनी निस्तेज, बदतर एवं विलोपपूर्ण स्थिति कभी नहीं रही। इस तरह का माहौल लोकतंत्र के लिये एक चुनौती एवं विडम्बना है।

भले ही सात दशकों में कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी परन्तु छोटी-छोटी संख्या में आने वाले राजनीतिक दल लगातार सरकार को अपने तर्कों एवं जागरूकता से दबाव में रखते थे, अपनी जीवंत एवं प्रभावी भूमिका से सत्ता पर दबाव बनाते थे, यही लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण था। लेकिन अब ऐसी स्थिति समाप्त होती जा रही है बल्कि इस कदर बदतर हो चुकी है कि चुनावों से पहले ही स्पष्टता एवं दृढ़ता के साथ भविष्यवाणी की जा सकती है कि सत्ता में फिर से भाजपा ही आयेगी। महाराष्ट्र व हरियाणा में विधानसभा चुनाव परिणामों के बारे में यही कहा जा रहा है। यह स्थिति अचानक तो नहीं आयी है? इसकी असली वजह क्या हो सकती है? आखिर विपक्ष इतना कमजोर एवं नकारा कैसे हो गया?

आज देश में विपक्ष के पास खासकर कांग्रेस या किसी भी दल के पास कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं है, जिसकी अगुवाई में बाकी राजनेता या दल एकत्र हो सकें। भाजपा और संघ परिवार पर वार करने लिए कोई धारधार हथियार भी इनके पास नहीं है। सब ये जानते हैं कि भाजपा को अब हरा पाना इनके बूते की बात है। इस तरह की संभावनाओं को तलाशने के लिये विपक्षी दलों को एकजूट होना होगा। अन्यथा अब इन दलों के सामने अपने अस्तित्व का खतरा भी है। गौर करने की बात ये है आखिर विपक्ष में ऐसा कौन है जो इतना सक्षम, समर्थ एवं सर्वस्वीकार्य है जो बाकी नेताओं को एकजुट कर सके या मोदी से टक्कर ने सके।

भारतीय लोकतंत्र में विपक्षी दल अपनी सार्थक भूमिका निर्वाह करने में असफल रहे हैं। क्योंकि दलों के दलदल वाले देश में दर्जनभर से भी ज्यादा विपक्षी दलों के पास कोई ठोस एवं बुनियादी मुद्दा नहीं रहा है, देश को बनाने का संकल्प नहीं है, उनके बीच आपस में ही स्वीकार्य नेतृत्व का अभाव है जो विपक्षी नेतृत्व की विडम्बना एवं विसंगतियों को ही उजागर करता है। ऐसा लग रहा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अब नेतृत्व की नैतिकता एवं नीतियों को प्रमुख मुद्दा न बनाने के कारण विपक्षी दल नकारा साबित हो रहे हैं, अपनी पात्रता को खो रहे हैं, यही कारण है कि न वे मोदी को मात दे पा रहे हैं और न ही सार्थक विपक्ष का अहसास करा पा रहे हैं। भाजपा एवं मोदी का कोई ठोस विकल्प पेश करने को लेकर विपक्षी दल गंभीर नहीं हैैं, वे अवसरवादी राजनीति की आधारशिला रखने के साथ ही जनादेश की मनमानी व्याख्या करने, मतदाता को गुमराह करने की तैयारी में ही लगे हंै। इन्हीं स्थितियों से विपक्ष की भूमिका पर सन्देह एवं शंकाओं के बादल मंडराने लगे।

क्या देश के अंदर विपक्ष को खत्म करने की साजिश हो रही है? क्या इसके लिए सत्ता की ताकत का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है? ये आरोप निराधार एवं भ्रामक हैं। यह कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है कि भारत की राजनीति विपक्ष विहीन हो चुकी है, मनोबल अवश्य टूटा है, अतीत के दाग पीछा कर रहे हैं लेकिन विपक्ष विहीन भारतीय राजनीति की स्थिति जब भी बनेगी, संभवतः लोकतंत्र भी समाप्त हो जायेगा। विपक्ष की कमजोर एवं नकारा स्थिति के लिये भाजपा या मोदी को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है। विपक्ष अपनी इस दुर्दशा के लिये खुद जिम्मेदार है। विपक्ष वैचारिक, राजनीतिक और नीतिगत आधार पर सत्तारूढ़ दल का विकल्प प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है। उसने सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना की, पर कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिया।

किसी और को दोष देने के बजाय उसे अपने अंदर झांककर देखना चाहिए। मुद्दा विहीनता उसके लिए इतनी अहम रही है कि कई बार राष्ट्रीय मुद्दों पर उसने जुबान भी नहीं खोली। लोकतंत्र तभी आदर्श स्थिति में होता है जब मजबूत विपक्ष होता है। क्यों नहीं विपक्ष सीबीआई, आरबीआई जैसे मुद्दों को उठाता, आम आदमी महंगाई, व्यापार की संकटग्रस्त स्थितियां, बेरोजगारी आदि समस्याओं से परेशान हो चुका है, वह नये विकल्प को खोजने की मानसिकता बना चुका है, जो विपक्ष नेतृत्व के उद्देश्य को नया आयाम दे सकता है, क्यों नहीं विपक्ष इन स्थितियों का लाभ लेने को तत्पर होता। बात केवल विपक्ष की ही न हो, बात केवल मोदी को परास्त करने की भी न हो, बल्कि देश की भी हो तभी विपक्ष अपनी इस दुर्दशा से उपरत हो सकेगा। वह कुछ नयी संभावनाओं के द्वार खोले, देश-समाज की तमाम समस्याओं के समाधान का रास्ता दिखाए, सुरसा की तरह मुंह फैलाती गरीबी, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी और अपराधों पर अंकुश लगाने का रोडमेप प्रस्तुत करे, नोटबंदी, जीएसटी आदि मुद्दों से आम आदमी, आम कारोबारी को हुई परेशानी को उठाए तो उसकी स्वीकार्यता स्वयंमेय बढ़ जायेगी। व्यापार, अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, ग्रामीण जीवन एवं किसानों की खराब स्थिति की विपक्ष को यदि चिंता है तो इसे महाराष्ट्र एवं हरियाणा के चुनाव में दिखाना होगा। पर विपक्ष केंद्र या राज्य, दोनों ही स्तरों पर सरकार के लिये चुनौती बनने की बजाय केवल खुद को बचाने में लगा हुआ नजर रहा है। वह अपनी अस्मिता की लड़ाई तो लड़ रहा है पर सत्तारूढ़ दल को अपदस्थ करने की दृढ़ इच्छा उसने नहीं दिखाई। पूरे चुनाव परिदृश्यों में वह विभाजित और हताश दिखाई दे रहा है। इन स्थितियों के रहते आज भाजपा को सत्ता से बाहर जाने का रास्ता दिखाने की संभावनाएं कैसे रंग ला सकती है?

इन दो राज्यों के चुनावों में विपक्षी दल अनेक नाटक रच रहा है, भाजपा को हराने की तमाम जायज-नाजायज कोशिशें भी कर रहा है, लेकिन उनके कोई सार्थक परिणाम सामने आते हुए नहीं दिख रहे हैं। लग रहा है विपक्षी पार्टियों के लिये ये चुनाव सत्ता की पहुंच बनाने की बजाय राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद के रूप में होते हुए दिख रहे हैं, आखिर विपक्षी दल इस रसातल तक कैसे पहुंचे, यह गंभीर मंथन का विषय है। सवाल यह भी है कि यदि विपक्षी दल एवं नेता इन दोनों राज्यों में भाजपा सरकार की वापसी रोकने को लेकर इतने ही प्रतिबद्ध है तो चुनावों में उनकी प्रस्तुति एवं प्रशस्ति इतनी कमजोर क्यों है? अब कैसे वे सरकार बनाने की संभावनाओं को तलाश पायेंगे? भले ही वे इन संभावनाओं की तलाशने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही होता दिखाई दे रहा है।

क्योंकि हालत यह हो गई है कि कांग्रेस पार्टी में कोई ऐसा नेता नजर ही नहीं आ रहा है जो प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के बराबर आकर खड़ा हो सके? इसकी वजह भी राजनीति से विचारधारा का दरकिनार होना है। संसदीय लोकतन्त्र में मजबूत विपक्ष का होना इसलिए बहुत जरूरी होता है जिससे बहुमत में आने वाली पार्टी की सरकार पर लगातार यह दबाव बना कर रखा जा सके कि उसकी नीतियां केवल जन कल्याण की दृष्टि से ही बनाई जाएं। इस काम में बहुमत पाने वाला दल जरा सी भी कोताही नहीं बरत सकता। ऐसा स्वतन्त्र भारत के शुरू के पांच दशकों तक होता रहा है, अब इसकी ज्यादा अपेक्षा है।

 चुनावों में ही नहीं, बल्कि पिछले पांच सालों में विपक्षी दलों एवं कांगे्रस ने राष्ट्रीय मुद्दों की लगातार अनदेखी की, जनभावनाओं की उपेक्षा की। विपक्षी दलों ने यह बात कई बार कही कि वे भाजपा से विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि यह विचारधारा की लड़ाई है तो इन चुनावों दिखना चाहिए। लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। इन चुनावों में विपक्षी दलों एवं कांग्रेस को एक सूरज उगाना था ताकि सूरतें बदले, राजनीतिक परिदृश्य बदले। जाहिर है, यह सूरत तब बदलती, जब सोच बदलती। इस सोच को बदलने के संकल्प के साथ यदि विपक्षी दल आगे बढ़ते तो ही भाजपा को टक्कर देने में सक्षम होते।

यह भी हमें देखना होगा कि टक्कर कीमत के लिए है या मूल्यों के लिए? लोकतंत्र का मूल स्तम्भ भी मूल्यों की जगह कीमत की लड़ाई लड़ता रहा है, तब मूल्यों को संरक्षण कौन करेगा? एक खामोश किस्म का ”सत्ता युद्ध“ देश में जारी है। एक विशेष किस्म का मोड़ जो हमें गलत दिशा की ओर ले जा रहा है, यह मूल्यहीनता, अहंकार, कीमत की मनोवृत्ति एवं अपराध प्रवृत्ति को भी जन्म दे सकता है। हमने सभी विधाओं को बाजार समझ लिया। जहां कीमत कद्दावर होती है और मूल्य बौना। सिर्फ सत्ता को ही जब विपक्षी दल एकमात्र उद्देश्य मान लेता है तब वह राष्ट्र दूसरे कोनों से नैतिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तरों पर बिखरने लगता है। इस देश को साम्राज्यवाद से मुक्ति दिलाने वाली पार्टी कांग्रेस का क्षरण पिछले पांच वर्ष में जिस तेज गति से हुआ है उसका दूसरा उदाहरण किसी अन्य तीसरे लोकतान्त्रिक देश में नहीं मिलता। कांग्रेस ने भारतीय लोकतन्त्र में धन की महत्ता को ‘जन महत्ता’ से ऊपर प्रतिष्ठापित किये जाने के गंभीर प्रयास किये, जिसके परिणाम उसे भुगतने पड़ रहे हैं। क्या इन विषम एवं अंधकारमय स्थितियों में कांग्रेस या अन्य विपक्षी दल कोई रोशनी बन सकते हंै, अपनी सार्थक भूमिका के निर्वाह के लिये तत्पर हो सकते हैं? इन चुनावों में यदि कांग्रेस या अन्य विपक्ष दल मजबूती से अपनी सार्थक एवं प्रभावी भूमिका का निर्वाह नहीं किया तो उनके सामने आगे अंधेरा ही अंधेरा है।


महाराष्ट्र चुनाव : बीजेपी ने घोषणा पत्र में सावरकर को 'भारत रत्न' दिलाने का वादा किया

महाराष्ट्र चुनाव : बीजेपी ने घोषणा पत्र में सावरकर को 'भारत रत्न' दिलाने का वादा किया

15-Oct-2019

एजेंसी 

बीजेपी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए जारी घोषणा पत्र में अन्य बातों के अलावा विनायक दामोदर सावरकर को 'भारत रत्न' दिलाने का वादा किया है। बीजेपी लंबे समय से उन्हें 'भारत रत्न' दिलाने की माँग करती रही है, लेकिन यह पहली बार है कि इसके लिए चुनावी घोषणा पत्र में जगह दी गई है।   घोषणा पत्र में सावरकर को 'भारत रत्न' दिए जाने का ज़िक्र करने का मतलब है कि बीजेपी इसके लिए केंद्र सरकार से सिफ़ारिश करेगी। 

बीजेपी ने इस घोषणा पत्र को संकल्प पत्र का नाम दिया है। इस संकल्प पत्र में कई लोकलुभावन चुनावी वादे किए गए हैं। इसमें पार्टी ने किसानों और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। इसमें एक करोड़ नौकरियाँ देने का वादा किया गया है। महाराष्ट्र को सूखा मुक्त बनाने की भी घोषणा की गई है। हर बेघर को मकान देने की बात भी की गई है। संकल्प पत्र में बीजेपी ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी ज़ोर दिया है।

चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने दावा किया कि पिछले घोषणा पत्र के सभा वादों को पार्टी ने पूरा कर दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने इसे 16 सूत्रीय संकल्प पत्र क़रार देते हुए कहा कि राज्य को सूखा मुक्त बनाने के लिए वृहद योजना बनाई जाएगी। 

इस मौक़े पर जे. पी. नड्डा ने कहा कि इस घोषणा पत्र की तीन मुख्य बातें हैं- वह है सूखा, पानी और रोज़गार। बता दें कि 21 अक्टूबर को राज्य में चुनाव होने हैं। बीजेपी और शिवसेना गठबंधन में राज्य में चुनाव लड़ रही हैं। 


हिंसा से बढ़ता सामाजिक अलगाव एवं अकेलापन

हिंसा से बढ़ता सामाजिक अलगाव एवं अकेलापन

14-Oct-2019

लेख : ललित गर्ग 

आज देश ही नहीं, दुनिया में हिंसा, युद्ध एवं आक्रामकता का बोलबाला है। जब इस तरह की अमानवीय एवं क्रूर स्थितियां समग्रता से होती है तो उसका समाधान भी समग्रता से ही खोजना पड़ता है। हिंसक परिस्थितियां एवं मानसिकताएं जब प्रबल हैं तो अहिंसा का मूल्य स्वयं बढ़ जाता है। हिंसा किसी भी तरह की हो, अच्छी नहीं होती। मगर हैरानी की बात ये हंै कि आज हिंसा के कारण लोग सामाजिक अलगाव एवं अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। शिकागो विश्वविद्यालय के द्वारा हाल ही में किये गये अध्ययन में भी यह बात सामने आई है। यह अध्ययन शिकागो के ऐसे 500 वयस्क लोगों के सर्वे पर आधारित है जो हिंसक अपराध के उच्च स्तर वाली जगह पर रहते हैं। तथ्य सामने आया कि हिंसा का बढ़ता प्रभाव मानवीय चेतना से खिलवाड़ करता है और व्यक्ति स्वयं को निरीह अनुभव करता है। इन स्थितियों में संवेदनहीनता बढ़ जाती है और जिन्दगी सिसकती हुई प्रतीत होती है।  

शिकागो विश्वविद्यालय के मेडिसिन के सामाजिक महामारी विशेषज्ञ एलिजाबेथ एल तुंग का कहना है कि हिंसा व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालती है। शहरी वयस्कों में हिंसा की वजह से सामाजिक अलगाव और अकेलापन पाया गया। अकेलापन कुछ सीमित शारीरिक गतिविधियों से जुड़ा है, जैसे सही तरह से दवाएं न लेना, खानपान, धूम्रपान व मदिरापान आदि। व्यक्ति अपने ही समुदाय में जितनी अधिक हिंसा का शिकार होता है, अकेलापन उसे उतना ही ज्यादा घेर लेता है। सबसे ज्यादा अकेलापन उन लोगों में पाया गया जो सामुदायिक हिंसा का शिकार हुए। पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्ड में वह पॉजिटिव आए। एलिजाबेथ एल तुंग का कहना है कि अध्ययन के नतीजे उन वृद्ध लोगों के लिए विशेष रूप से परेशान करने वाले हैं, जो हिंसात्मक पड़ोस में रहते हैं। उनमें अकेलेपन की अधिक संभावना होती है और वे तनाव से जुड़ी बीमारियों से अधिक ग्रस्त हो जातेे हैं। अकेलापन एक बढ़ती गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अमेरिका में यह मृत्यु दर में इजाफे का बड़ा कारण बन सकता है। अध्ययन में हिस्सा लेने वाले 77 प्रतिशत लोग 50 से अधिक उम्र के थे।

एक शोधकर्ता ने कहा, सामाजिक अलगाव और अकेलेपन से जूझ रहे व्यक्ति को हृदयरोग का खतरा सबसे ज्यादा होता है। ठीक उस तरह जिस तरह धूम्रपान करने वाले को होता है। कहा जा सकता है कि अकेलापन धूम्रपान के बराबर घातक है। बढ़ती हिंसक मानसिकता एवं परिस्थितियों के बीच न जिन्दगी सुरक्षित रही, न इंसान का स्वास्थ्य और न जीवन-मूल्यों की विरासत।

अहिंसा की प्रासंगिकता के बीच हिंसा के तरह-तरह के पौधे उग आये हैं। हिंसक विकृतियां एक महामारी है, उसे नकारा नहीं जा सकता। अहिंसक मूल्यों के आधार पर ही मनुष्य उच्चता का अनुभव कर सकता है और मानवीय प्रकाश पा सकता है। क्योंकि अहिंसा का प्रकाश सार्वकालिक, सार्वदेशिक और सार्वजनिक है। इस प्रकाश का जितना व्यापकता से विस्तार होगा, मानव समाज का उतना ही भला होगा, वह सुरक्षित महसूस करेगा एवं जिन्दगी के प्रति धन्यता का अनुभव करेगा। इसके लिये तात्कालिक और बहुकालिक योजनाओं का निर्माण कर उसकी क्रियान्विति से प्रतिबद्ध रहना जरूरी है। क्योंकि देश एवं दुनिया में सब वर्गों के लोग हिंसा से संत्रस्त हैं। कोई भी संत्रास स्थायी नहीं होता, यदि उसे निरस्त करने का उपक्रम चालू रहता है।

हिंसक लोगों एवं परिस्थितियों के बीच रहकर जो हिंसा के प्रभाव को निस्तेज कर दें,  वही शासन व्यवस्था एवं व्यक्ति की जीवनशैली अपेक्षित है। जो हिंसक परिस्थितियां एवं विवशताएं व्यक्ति की चेतना को तोड़ती एवं बिखेरती है, उन त्रासद स्थितियों से मनुष्य को अनाहत करना एवं बचाना वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है। ‘अहिंसा सव्व भूय खेमंकरी’-अहिंसा सब प्राणियों के लिए क्षेमंकर है, आरोग्यदायिनी और संरक्षक-संपोषक है। भारत में होने वाले अहिंसक प्रयोगों से सम्पूर्ण मानवता आप्लावित होती रही है और अब उन प्रयोगों की अधिक प्रासंगिकता है। तथागत बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का सार है करुणा। गीता के अहिंसा सिद्धांत की फलश्रुति है अनासक्ति। ईसामसीह ने जिस विचार को प्रतिष्ठित किया, वह है प्रेम और मैत्री। इसी प्रकार मुहम्मद साहब के उपदेशों का सार है भाईचारा।

भगवान महावीर ने संयम प्रधान जीवनशैली के विकास हेतु व्रती-समाज का निर्माण किया। उस व्रती समाज ने अनावश्यक और आक्रामक हिंसा का बहिष्कार किया। बुद्ध की करुणा के आधार पर सामाजिक विषमता का उन्मूलन हुआ। जातिवाद की दीवारें भरभरा कर ढह पड़ी। गीता के अनासक्त योग ने निष्काम कर्म की अभिप्रेरणा दी। इसमें आचार-विचारगत पवित्रता की मूल्य-प्रतिष्ठा हुई। ईसा मसीह के प्रेम से आप्लावित सेवा भावना ने मानवीय संबंधों को प्रगाढ़ता प्रदान की। मुहम्मद साहब के भाईचारे ने संगठन को मजबूती दी। संगठित समाज शक्ति संपन्न होता है। महात्मा गांधी ने राजनीति के मंच से अहिंसा की एक ऐसी गूंज पैदा की थी कि अहिंसा की शक्तिशाली ध्वनि तरंगों ने विदेशी शासन और सत्ता के आसन को अपदस्थ कर दिया। उन्होंने सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन आदि अनेक रूपों में अहिंसा के प्रयोग किए। सशक्त प्रस्तुति एवं अभिव्यक्ति द्वारा विश्व मानव को अहिंसा की शक्ति से परिचित कराया। इंसान की मनःस्थिति को स्वस्थ बनाने के लिये आज अहिंसक जीवनशैली को प्रतिष्ठापित करना जरूरी है।

वर्तमान के संदर्भ में देखा जाए तो लगता है, महापुरुषों के स्वर कहीं शून्य में खो गए हैं। जीवन के श्रेष्ठ मूल्य व्यवहार के धरातल पर अर्थहीन से हो रहे हैं। तभी विश्व मानव में सामाजिक अलगाव एवं अकेलेपन की त्रासद स्थितियां देखने को मिल रही है। विश्व अणु-परमाणु हथियारों के ढेर पर खड़ा है। दुनिया हिंसा की लपटों से झुलस रही है। अर्थ प्रधान दृष्टिकोण, सुविधावादी मनोवृत्ति, उपभोक्ता संस्कृति, सांप्रदायिक कट्टरता, जातीय विद्वेष आदि हथियारों ने मानवता की काया में न जाने कितने गहरे घाव दिये हैं। क्रूरता के बीज, सामाजिक अलगाव एवं अकेलेपन के दंश इंसान के जीने पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।

महान् दार्शनिक आचार्य श्री महाप्रज्ञ कहते हैं-बढ़ती हुई क्रूरता, हिंसा और अपराधों का कारण है अहिंसा, मैत्री, करुणा, सौहार्द, सद्भावना आदि जीवन-मूल्यों के प्रशिक्षण का अभाव। आज हिंसा के प्रशिक्षण की व्यापक व्यवस्थाएं हैं। वे चाहें सैनिक/सामरिक प्रतिष्ठानों के रूप में हो या आतंकवाद के प्रशिक्षण के रूप में। हिंसक शक्तियां संगठित होकर नेटवर्क के लक्ष्य से सक्रिय हैं। अहिंसक शक्तियां न संगठित हैं, न सक्रिय। यह सर्वाधिक चिंतनीय पक्ष है। ताजा अध्ययन के सन्दर्भ में व्यक्ति की जीवनशैली को उन्नत बनाने, आदर्श एवं शांत जीवन पद्धति को निरूपित करने के लिये अहिंसा को व्यापक बनाने एवं संगठित करने की जरूरत है। जिस व्यक्ति के अंतःकरण में अहिंसा की प्रतिष्ठा होती है, उसकी सन्निधि में शत्रु भी शत्रुता त्याग देता है और परममित्र बन जाता है। अपेक्षा है, प्रत्येक व्यक्ति अपने चित्त को मैत्री की भावना, सह-जीवन एवं संवेदनशीलता से भावित करे। इनकी शक्तिशाली तरंगे हिंसक, अपराधी और आतंकवादी लोगों की दुर्भावनाओं को भी प्रक्षालित कर सकती है।

वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में धर्म के प्रवक्ताओं, विचारकों एवं धर्म के नेताओं का विशेष दायित्व है कि वे अपने अनुयायियों में अहिंसक मानसिकता, सहिष्णुता तथा सद्भावना के संस्कार पुष्ट करें। उनमें धार्मिक विद्वेष व घृणा के भाव न पनपने पाये। अपनी-अपनी मान्यताओं, परंपराओं तथा पूजा-उपासना की विधियों का सम्मान व पालन करते हुए भी वे आपसी सौहार्द और भाईचारे को बनाए रखें। इसी में सबका सुख, सबका हित निहित है। इसी से व्यक्ति का अकेलापन दूर हो सकता है। अहिंसा का शाश्वत मूल्य वर्तमान में टीसती हुई मानवता और कराहती मानव-जाति को त्राण दे सकता है। 


दर्दनाक दास्ताँ : परिवार ने साबित किया कि लड़का 16 साल का था न कि 22, PSA रद्द; अब FIR

दर्दनाक दास्ताँ : परिवार ने साबित किया कि लड़का 16 साल का था न कि 22, PSA रद्द; अब FIR

13-Oct-2019

कश्मीर : पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत नजरबंदी से रिहा होने के अगले दिन, उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के एक गाँव के 16 वर्षीय व्यक्ति ने चराने के लिए परिवार की भेड़ों और बकरियों को लिया। मां अपने बेटे की मासूमियत के लिए इस बारे में बात की। वह कहती हैं कि जिस दिन उसे 22 अगस्त की रात को ले जाया गया, वह पहली बार था जब पुलिस उनके घर आई थी, वह कहती है “हम मजदूरों के परिवार हैं और राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। फिर भी हमारे बेटे को जेल जाना पड़ा … उसकी किसी भी मामले में कोई भूमिका नहीं थी। 30 सितंबर को, परिवार ने साबित कर दिया कि लड़का 16 साल का था, न कि 22 जैसा कि पुलिस ने दावा किया था, जम्मू-कश्मीर अधिकारियों ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि उन्होंने उसके खिलाफ पीएसए रद्द कर दिया है। हिरासत लेने के एक महीने बाद, वह घर पहुंचा।

उनके माता-पिता, और दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के एक अन्य लड़के की, जो इसी तरह पीएसए के तहत बुक किया गया था, नाबालिग साबित हुआ और अब बाहर है. अब तक, पीएसए को कश्मीर में तीन नाबालिगों के खिलाफ निरस्त कर दिया गया है, क्योंकि उनके परिवार ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। एक चौथे मामले में अदालत ने जांच के आदेश दिए हैं। पीएसए के तहत केवल 18 और उससे अधिक लोगों को हिरासत में लिया जा सकता है। जबकि पीएसए तीनों के खिलाफ निरस्त है, फिर भी उन पर एफआईआर के तहत मामला दर्ज किया गया है, जिसके आधार पर अधिनियम लगाया गया था।

थाने जाकर अपने बेटे को सौंप दिया
अनंतनाग में अपने सेब के बगीचे में खड़े होकर दूसरे लड़के के पिता अनंतनाग में पुलिस स्टेशन और पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय के चक्कर लगाने की बात करते हैं। अगस्त की शुरुआत में, वह कहता है, पुलिस ने 16 वर्षीय – अपने चार बच्चों में से एक को – स्थानीय स्टेशन पर बुलाया और उसके मोबाइल फोन को छीन लिया, उसके बाद एक सहपाठी के बारे में पूछताछ की, जिसके बारे में माना जाता है कि वह आतंकवादी रैंकों में शामिल हो गया था। 3 अगस्त को किशोर को फिर से बुलाया गया। पिता कहते हैं, उन्होंने जाकर अपने बेटे को सौंप दिया। “वहाँ के अधिकारी ने वादा किया कि दो दिनों में मेरा बेटा वापस आ जाएगा।”

मैं डीआईईपीएस और एसएचओ के कार्यालयों के बीच चक्कर लगाता रहा
जब किशोर नहीं लौटा, तो एक चाचा कहते हैं, वे पुलिस अधिकारी से मिलने गए। “उन्होंने हमें स्टेशन हाउस अधिकारी से मिलने के लिए कहा।” पिता का कहना है कि SHO ने उन्हें DySP से मिलने के लिए कहा। “तीन दिनों के लिए, यह एक ही कहानी थी। मैं डीआईईपीएस और एसएचओ के कार्यालयों के बीच चक्कर लगाता रहा। मेरा दिन सुबह पुलिस स्टेशन के गेट पर शुरू होता था और हम लगभग 10 बजे निकलते थे। हम दिन में तीन बार गए। ” 8 अगस्त को, चाचा कहते हैं, उन्हें सूचित किया गया था कि 16 वर्षीय को अनंतनाग के संयुक्त पूछताछ केंद्र (JIC) में स्थानांतरित कर दिया गया है। जहाँ हिरासत में लिए गए आतंकवादियों से पूछताछ के लिए सुरक्षा बलों द्वारा JIC का संचालन किया जाता है। चाचा कहते हैं, “जब मैंने घर आकर ख़बर दी तो सभी रोने लगे क्योंकि उन्हें पता था कि एक युवा लड़के के लिए ऐसा क्या होता है।” अगली सुबह, सबसे खराब होने के डर से, परिवार जेआईसी में गया। “हमें बताया गया था कि वह केंद्रीय जेल, श्रीनगर में स्थानांतरित कर दिया गया है। समय बर्बाद किए बिना, हम वहां गए। वहां हमें बताया गया कि उन्हें राज्य से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया है। ”

लड़का 22 साल का है, चरमपंथी विचारधारा विकसित की
बाद में, उन्हें पता चला कि उसी दिन जैसा कि उन्हें बताया गया था कि किशोर को जेआईसी में स्थानांतरित कर दिया गया है, जिला मजिस्ट्रेट अनंतनाग ने पीएसए के तहत उसकी हिरासत को मंजूरी दे दी। अगले दिन, 9 अगस्त को, उन्हें उत्तर प्रदेश के जिला जेल, बरेली में 1,000 किमी से अधिक दूर ले जाया गया। अनंतनाग एसएसपी अल्ताफ खान द्वारा तैयार डोजियर, और जिला मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत किया गया, पीएसए के तहत नजरबंदी की मांग करते हुए कहा, “() विषय पैदा हुआ है और अपने पैतृक गांव में लाया गया है और लड़का 22 साल का है। विषय ने चरमपंथी विचारधारा विकसित की है … और उक्त आतंकवादी संगठन [जेएमएम] की गैरकानूनी गतिविधियों का समर्थन करता है। “इसने 2016 और 2018 में उसके खिलाफ दो एफआईआर भी दिखाईं।

झारखंड में स्थित एक आईएएस अधिकारी से संपर्क करने पर विचार किया
लड़के के चाचा का दावा है कि यह पहली बार था जब वे उसके खिलाफ किसी मामले की सुनवाई कर रहे थे। पिता का कहना है कि किशोर के बरेली आने के बाद, उन्होंने हर दरवाजे पर दस्तक देकर यात्राओं का एक नया दौर शुरू किया। “लेकिन उन्होंने झूठे वादे करते हुए मुझे टाल दिया। यह हर बार दिल तोड़ने वाला था। ” वह झारखंड में स्थित एक आईएएस अधिकारी से संपर्क करने पर विचार किया, जिसे वह बहुत समय पहले शॉल बेचता था। “मैंने बरेली में अपने बेटे से मिलने और फिर झारखंड जाने का फैसला किया। लेकिन जिन लोगों के रिश्तेदार राज्य के बाहर की जेलों में थे, उन्होंने मुझे बताया कि परिवार के सदस्यों को उनसे मिलने की अनुमति नहीं है। ”

अंत में परिवार ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसमें किशोर की जन्मतिथि के प्रमाण पत्र का उत्पादन किया गया था, जिसमें उसे नाबालिग दिखाया गया था। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि उन्होंने किशोर को तब पकड़ा जब वह “एक जानामाना बदमाश और ओवरग्राउंड वर्कर” था। बारामूला स्थित किशोर के पिता, जो अपने 40 के दशक में हैं और अपने परिवार के बाकी सदस्यों की तरह अशिक्षित हैं, अदालतों के बारे में बहुत कम जानते हैं। केस लड़ने के लिए इसे एक चाचा को दिया गया था। 22 अगस्त की रात को, 16-वर्षीय को बारामूला जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 28 अगस्त को पीएसए के तहत बुक किया गया था और श्रीनगर सेंट्रल जेल में ले जाने से पहले कई दिनों तक एक स्थानीय पुलिस स्टेशन में रखा गया था।


 
सोपोर पुलिस द्वारा तैयार किए गए डोजियर में लड़के की उम्र 21 बताई गई है, और कहा, “आप कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा करने के लिए सोपोर और आसपास के अन्य क्षेत्रों के भोला-भाला युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं। ”पुलिस ने उनके खिलाफ कानून और व्यवस्था से संबंधित एक प्राथमिकी का भी हवाला दिया। पुलिस के इस दावे से इनकार करते हुए कि लड़का एक समूह का हिस्सा था जिसने अगस्त में क्षेत्र में एक वाहन में आग लगा दी थी, चाचा कहते हैं, “पूरा गाँव उसकी मासूमियत की कसम खा सकता है। जब उस वाहन को जलाया गया, तो 16 वर्षीय व्यक्ति पास के गाँव में था। ”

पडोसी अधिकारी से लगाते थे गुहार, इससे “लड़के की जिंदगी बर्बाद हो जाएगा”
लड़के के हिरासत में लेने के बाद, चाचा कहते हैं, “हर दिन हम सुबह श्रीनगर के लिए रवाना होते थे। सार्वजनिक परिवहन की अनुपस्थिति में (अनुच्छेद 370 के उन्मूलन के बाद), यह एक परीक्षा थी। हम श्रीनगर तक पहुँचने में 1,000 रुपये तक खर्च करते हैं”। गांव के बुजुर्गों ने भी किशोरी की ओर से स्थानीय पुलिस अधिकारी से गुहार लगाते हुए कहा कि उसे “लड़के की जिंदगी बर्बाद कर देगा”। चाचा कहते हैं “अधिकारी ने उसे मुक्त स्थापित करने का वादा किया, लेकिन इसके बजाय उसे सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया,”। 20 सितंबर को, परिवार ने उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, और गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल द्वारा जारी किए गए एक प्रमाण पत्र का उत्पादन किया, जहां किशोरी ने पहले अध्ययन किया था, जिसमें उसकी जन्मतिथि 2 फरवरी, 2003 थी। 30 सितंबर को, अधिकारियों ने अदालत को बताया कि उन्होंने पीएसए को निरस्त कर दिया है।

कश्मीर के पूर्व विधायक यूसुफ ने कहा- मैं विदेशी नहीं और न ही फारूक अब्दुल्ला आतंकवादी

सोपोर के एसएसपी जावेद इकबाल का कहना है कि किशोर एक जाना-पहचाना स्टोन प्लेटर था और उससे जब्त एक आधार कार्ड में उसकी उम्र 20 से अधिक बताई गई थी। अनंतनाग किशोरी के पिता का कहना है कि उनकी आँखें अच्छी तरह से चमक रही हैं, वे उम्मीद कर रहे हैं कि कक्षा 12 का छात्र, जिसका जीवन “पढ़ाई के इर्द-गिर्द घूमता है”, वह घटना को अपने पीछे रख सकता है। वे बड़े नुकसान के लिए तैयार थे, क्योंकि वह अपने बागों की देखभाल नहीं करते थे क्योंकि वह फसल के मौसम के दौरान अदालत के चक्कर लगा रहे थे, वे कहते हैं, “यह एक लड़का था जो दिन में तीन बार अपने कपड़े बदलता था। जेल में उसे उसी कपड़े के कपड़े धोने और इस्तेमाल करने पड़े, जो उसने तब पहने थे जब हमने उसे सात हफ्ते के लिए पुलिस को सौंप दिया था … उसने अपना वजन कम कर लिया है और बुरे सपने आते हैं। मैं चाहता हूं कि वह एक बुरे दौर के रूप में अपनी नजरबंदी को भूल जाए। ”

 

 


दिल्ली से हटिया जा रही झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस में डकैतों ने बोला धावा, विरोध करने पर यात्रियों को डंडो से पिटा

दिल्ली से हटिया जा रही झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस में डकैतों ने बोला धावा, विरोध करने पर यात्रियों को डंडो से पिटा

11-Oct-2019

आनंद विहार से हटिया जा रही झारखंड (स्वर्ण जयंती) एक्सप्रेस के दो जनरल कोच में असलहो से लैस डकैतों ने धावा बोल दिया। गहरी नींद में सो रहे करीब तीन दर्जन से अधिक यात्रियों को बंधक बनाकर मारा पीटा। नगदी, गहने और हाजरो रुपए के कीमती सामान लूट लिए। लूटपाट के बाद झींझक स्टेशन के पास चेन पुलिंग कर उतर गए। जीआरपी और आरपीएफ सिपाहियों ने 6 बदमाशों को दबोच लिया है।  पुलिस अनुमान लगा रही है कि सभी इटावा स्टेशन से ही कोच में सवार हो गए थे।

गुरुवार रात करीब पौने एक बजे झारखंड एक्सप्रेस फफूंद स्टेशन से पास हुई थी। कानपुर की ओर ट्रेन रवाना होते ही जनरल कोच में पहले से सवार बदमाशों लूटपाट शुरू कर दी। कुछ यात्रियों ने विरोध किया को असलहों से लैस बदमाशों ने डंडो से मारना पीटना शुरू कर दिया।  ट्रेन में सवार मूसापुर कोडा कटिहार के मोहम्मद मुन्ना के सिर पर तमंचे की बट से वार कर दिया। सिर फट गया तो वह लहुलूहान हालत में कोच में गिर गए। मुन्ना की हालत देख दूसरे यात्री सहम गए। महिलाएं, बच्चे चिल्लाने लगे। किसी के कान के बाले नोच लिए तो किसी के टाप्स उतरवा लिए। दशहत में आईं कुछ महिलाओं ने असलहा देख खुद ही अपने गहने उतार दिए।

करीब आधे घंटे तक बदमाशों ने दो जनरल कोचों में लूटपाट की। तब तक ट्रेन में तैनात पुलिस की एस्कोर्ट को कोई खबर नहीं थी। कंचौसी और झींझक स्टेशन के बीच चेन पुलिंग हुई तो जीआरपी और आरपीएफ जवान हरकत में आए। आधी रात के बाद ट्रेन से उतरकर कुछ लोगों को जाते देखा तो सिपाही भी ट्रेन से कूद गए और पैदल ही दौड़ा लिया। कुछ दूरी पर कार में बैठकर भागने की कोशिश कर रहे छह बमदमाशों को दबोच लिया।

रेलवे ट्रैक के पास ही एक कार (एचआर-50 एक्स-7360)  पहले से खड़ी थी। बदमाश इसी कार में बैठने की कोशिश में दौड़ लगा रहे थे। अंधेरा होने के नाते उन्हें इस बात की भनक नहीं लगी कि पीछे से सिपाही भी आ रहे हैं। जवानों के पहुंचते ही बदमाशों के बीच भगदड़ मच गई। कार में बैठ चुके 6 को पुलिस ने दबोच लिया तथा तीन अंधेरे का फायदा उठाकर भाग निकले।

जानकारी होने पर आरपीएफ और जीआरपी के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे। कानपुर आरपीएफ के सहायक सुरक्षा आयुक्त एसनएन पांडेय नेब ताया कि पकड़े गए बमदाशों के पास से कार, यात्रियों के छीने गए मोबाइल, गहने और आठ हजार रुपए बरामद किए गए हैं। भागे तीनों बदमाशों की तलाश की जा रही है। डकैतों को पकड़ने वाले सिपाहियों को पुरस्कृत करने के लिए रिपोर्ट भेजी जाएगी।

साभार : livehindustan


कोलकाता : सांप्रदायिक सद्भाव फैलाने के लिए ‘कुमारी पूजा’ में मुस्लिम लड़की को शामिल किया गया

कोलकाता : सांप्रदायिक सद्भाव फैलाने के लिए ‘कुमारी पूजा’ में मुस्लिम लड़की को शामिल किया गया

10-Oct-2019

कोलकाता: साल्ट लेक में बिधाननगर रामकृष्ण विवेकानंद केंद्र ने साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश फैलाने के लिए इस दुर्गा पूजा में अष्टमी पर बिधाननगर रामकृष्ण विवेकानंद केंद्र में पूजा करने वाले पांच ‘कुमारियों’ में से सॉल्ट लेक में बिधाननगर रामकृष्ण विवेकानंद स्कूल की छात्रा आलिया परवीन थीं। डीडी ब्लॉक केंद्र के अध्यक्ष चंचल डे ने कहा “यह अष्टमी बहुत ही खास थी क्योंकि हम आलिया परवीन को शामिल कर सकते हैं, जो एक अलग धर्म से हैं, क्योंकि हमारी दुर्गा पूजा में पांच ‘कुमारियों’ की पूजा की जाती है। इस तरह, हमने समावेशिता और सांप्रदायिक सद्भाव के संदेश को फैलाने की कोशिश की। ”

पूर्व-युवा लड़कियों को देवी दुर्गा के रूप में पूजा करना त्योहार के मुख्य अनुष्ठानों में से एक है। परंपरा के अनुसार, केवल ब्राह्मण लड़कियों को ‘कुमारियों’ के रूप में चुना जाता है। दुर्गा पूजा में मुस्लिम ‘कुमारियों’ की पूजा करना कोई नई बात नहीं है। 18 अगस्त, 1898 को, स्वामी विवेकानंद ने श्रीनगर के खीर भवानी मंदिर में कुमारी पूजा के दौरान चार वर्षीय कश्मीरी मुस्लिम लड़की की पूजा की थी। 1901 में, उन्होंने रामकृष्ण मठ और बेलूर मठ के मिशन मुख्यालय में कुमारी पूजा की शुरुआत की थी। पूजा स्थल पर मौजूद आलिया की माँ की ज़ीनत बेगम ने कहा: “हम तब हैरान रह गए जब मेरी बेटी के शिक्षकों ने कुमारी पूजा में भाग लेने के बारे में पहली बार हमसे अनुमति मांगी। हमें नहीं पता था कि शुरू में क्या कहना था, लेकिन शिक्षकों ने हमें मना लिया और हम सहमत हो गए। ”

एफडी ब्लॉक के एक इंजीनियर एके चटर्जी को इस विचार से जोड़ा गया। “मुझे लगता है कि सामाजिक अशांति और सांप्रदायिक तनाव के इस घंटे में इस महान पहल के साथ आना बहुत अच्छा था। मैंने मुसलमानों को दुर्गा पूजा में भाग लेने के बारे में सुना है लेकिन यह पहली बार है जब मैं मुस्लिम मूल की ‘कुमारी’ की पूजा कर रहा हूं। अनुभव को मेरी स्मृति में हमेशा के लिए खो दिया जाएगा”।

एक और साल्ट लेक के निवासी बनानी सेन ने कहा, “देवता सभी देवताओं की मां हैं। वह सभी मनुष्यों की माँ है, चाहे उनका धर्म, जाति और पंथ कुछ भी हो। यह केवल स्वाभाविक है कि एक मुस्लिम लड़की या किसी अन्य ‘कुमारी’ – किसी भी अन्य धर्म से संबंधित – की पूजा की जानी चाहिए। दुर्भाग्य से लोग इन सरल रेखाओं पर सोच भी नहीं सकते हैं। ”

साभार : hindi.siasat


उन्नाव रेप केस : APPLE ने कोर्ट में कहा हमारे पास सेंगर के मोबाइल फोन ‘लोकेशन' का ब्योरा नहीं

उन्नाव रेप केस : APPLE ने कोर्ट में कहा हमारे पास सेंगर के मोबाइल फोन ‘लोकेशन' का ब्योरा नहीं

10-Oct-2019

नई दिल्ली: प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी एप्पल ने दिल्ली की एक अदालत से कहा कि भाजपा से निष्कासित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मोबाइल फोन 'लोकेशन' का उस दिन का ब्योरा उसके पास नहीं है, जिस दिन उन्नाव में 17 वर्षीय लड़की से कथित तौर पर बलात्कार हुआ था। 

बंद कमरे में हो रही सुनवाई के दौरान एप्पल के वकील ने जिला न्यायाधीश धर्मेश शर्मा के समक्ष यह जानकारी दी।उल्लेखनीय है कि 29 सितंबर को अदालत ने कंपनी से दो हफ्ते में संबद्ध जानकारियां शपथपत्र के साथ मुहैया करने का आदेश दिया था।

गौरतलब है कि सेंगर पर 2017 में एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म करने का आरोप है। एक सड़क हादसे में घायल पीड़िता का दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में इलाज चल रहा है।

 


जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए डेनमार्क जाना चाहते थे सीएम केजरीवाल, केंद्र ने नहीं दी इजाजत

जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए डेनमार्क जाना चाहते थे सीएम केजरीवाल, केंद्र ने नहीं दी इजाजत

10-Oct-2019

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को डेनमार्क जाने की इजाजत नही मिली है। मिली जानकारी के मुताबिक विदेश मंत्रालय की और से उन्हें जाने की अनुमति नही दी गयी है। इसे लेकर विदेश मंत्रालय की और से उन्हें अवगत करा दिया गया है। वहीं सीएम केजरीवाल को डेनमार्क जाने की इजाजत न देने पर राजनीति भी गरमा गई है। आम आदमी पार्टी इस मामले पर केंद्र की मोदी सरकार को घेरा है। सांसद संजय सिंह ने इसे दिल्ली वासियों के अपमान बताया है। आपको बता दें कि केजरीवाल को सी-40 जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए डेनमार्क जाना था।

अरविंद केजरीवाल को इजाजत ना मिलने पर आज केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि ‘ये मेयर लेवल का कॉन्फ्रेंस है और बंगाल के मंत्री इसमें भाग लेने जा रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 9 से 12 अक्टूबर के तक डेनमार्क के कोपेनहेगेन में सी-40 जलवायु सम्मेलन हिस्सा लेने जाना थ।

दौरे की इजाजत रद्द होने की जानकारी विदेश मंत्रालय ने केजरीवाल को दे दी है। विदेश मंत्रालय ने मुख्यमंत्री केजरीवाल को जानकारी देते हुए कहा कि आपने डेनमार्क में होने वाले C-40 कार्यक्रम के लिए पॉलिटिकल क्लियरेंस मांगा था। आपका पॉलिटिकल क्लियरेंस खारिज कर दिया गया है।