तिकड़ी के भरोसे छत्तीसगढ़ की भाजपा

तिकड़ी के भरोसे छत्तीसगढ़ की भाजपा

15-Jun-2020

कृष्ण देव (केडी) सिंह 

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा० रमनसिंह जी देश और प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पहुँच गये है । उनकी छटपटाहट बेवजह नहीं है। भाजपा विघानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में बहुत ही बुरी तरह हारी है जिसका ठीकरा उन्हीं के सिर पर बंधा है। लेकिन दिल्ली में भी भाजपा की करारी हार तथा इस हार से भाजपा और संघ को हुए यह अहसास कि अकेले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा एंव गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति से सभी चुनाव नहीं जीते जा सकते  क्षत्रतों को मुख्यधारा में वापसी की जरूरत है। परिणाम स्वरुप अपने प्रतिद्वंदियों को फिलहाल किनारे करने में उन्हें कामयाबी मिल गयी है और भाजपा की केन्द्रीय नेतृत्व मे डॉ. रमन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, विष्णु देव साय को प्रदेशाध्यक्ष तथा धर्म लाल कौशिक को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर छत्तीसगढ़ को इस तिकड़ी के भरोसे छोड़ दिया है । 

       दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा लग रहा है कि राज्यों में भी प्रादेशिक क्षत्रपों से मुकाबला करने के लिए  भाजपा को  लोकप्रिय और प्रभावशाली चेहरों की जरूरत है। ऐसा ही सबक भाजपा ने झारखंड मे अपनी चुनावी हार से सीखा है। इसलिए पार्टी ने वहां अपने पुराने स्वयंसेवकऔर राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मराड़ी की घर वापसी कराई है। खुद केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रांची में भव्य कार्यक्रम में मरांड़ी को भाजपा में शामिल कराया। इसी रणनीति के तहत भाजपा मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ यदि राज्यों में भी क्षेत्रिय क्षत्रपों को आगे करने की राजनीतिक पहल ने सर्वश्री शिवराज सिंह चौहान,डा० रमन सिंह,बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं को भाजपा द्वारा नई- नई जिम्मेदारी सौंपने की संभावना बन रही है | मध्यप्रदेश की राजनीतिक घटनाक्रमों ने शिवराज सिंह चौहान को पुनः मुख्यमंत्री बना दिया है । लेकिन लाख टके की बात यह है कि डा० रमन सिंह  छत्तीसगढ़ मे भाजपा में प्राणवायु फूंक सकेगें ? क्योकि उनके 15 वर्ष के मुख्य मंत्रित्व काल को लेकर दर्जनों किन्तु परन्तु लग चुका है जिसका असर उनके राजनीतिक और सामाजिक आर्कषण पर भी जबरदस्त पड़ा है।

इधर डॉ. रमन सिंह के गत दिनों दिये एक बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रदेश कांग्रेस ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में हुई जबरदस्त हार के बाद रमन सिंह की भाजपा के अंदर पूछ परख पूरी तरीके से बंद हो गई है। विधानसभा चुनाव की हार के बाद दंतेवाड़ा उपचुनाव और चित्रकूट उपचुनाव में भी भाजपा की हार हुई है। नगरी निकाय चुनाव में 10 में 10 नगर निगमों में कांग्रेस के महापौर और सभापति निर्वाचित हुए हैं। 27 में से 22 जिला पंचायतों में कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्य चुन कर आए हैं। इसे देखते हुए डॉ. रमन सिंह अब बौखलाहट में जो बयान बाजी कर रहे हैं, उसका कोई अर्थ नहीं रह गया है। अब तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी गंभीरता से उन्हें नहीं ले रहे हैं ।

भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ प्रदेश की जनता भी भली भांति जान रही है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की दुर्गति के लिये कोई जिम्मेदार है तो वह है रमन सिंह और उनके कार्यकाल के भ्रष्ट 15 साल, रमन सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल के 15 साल का हर पन्ना नये-नये भ्रष्टाचारों से भरा पड़ा है। राज्य सरकार के तरफ से विभिन्न अवसरों पर आरोप लगाये गये हैं कि पूरे 15 साल तक संस्थागत भ्रष्टचार किया गया। सरकारी दफ्तर में फर्जी एनजीओ के नाम से 1000 करोड़ के भ्रष्टाचार के पूरी सरकारी मशीनरी लिप्त थी। नान घोटाले में पूरी की पूरी सरकार शामिल थी। कुछ आरोपों की अब जांच भी शुरू हो गये है।

 पिछले दिनों बकायदा प्रदेश कांग्रेस की जारी बयान में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी के अंदर रमन सिंह की पूछ परख समाप्त हो गई है और दिल्ली विधानसभा चुनाव झारखंड विधानसभा चुनाव और उसके पहले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में रमन सिंह जी को स्टार प्रचारक बनाने लायक भी भाजपा ने नहीं समझा। रमन सिंह जी राजनीति में और भाजपा में भी हाशिए पर है। केन्द्र में जो दिल्ली में बैठक हुयी उस बैठक को लेकर डॉ. रमन सिंह को पीड़ा होना स्वभाविक है।

रमन सिंह जी को तो महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड विधानसभा चुनाव में पार्टी ने न स्टार प्रचारक बनाया और न ही प्रचार के लिये बुलाया।  छत्तीसगढ़ के कांग्रेस सरकार के कार्य की पूरे देश में प्रशंसा हो रही है और छत्तीसगढ़ मॉडल की आज देश भर में चर्चा हो रही है। बड़े-बड़े अर्थशास्त्री छत्तीसगढ़ मॉडल पर आज बात कर रहें है तो रमन सिंह को पीड़ा होना स्वाभाविक है। इसी बौखलाहट के चलते रमन सिंह ने  बयान दिया है। रमन सिंह के इस बयान में केवल और केवल छत्तीसगढ़ सरकार के कामों के तारीफ होने के कारण हो रही पीड़ा और बौखलाहट छलक रही है।

 छ्त्तीसगढ़ की सामाजिक और जातिगत समीकरण अन्य हिन्दी प्रदेशों से अलग है। यहाँ के मूल निवासी आदिवासी है लेकिन अलग अलग कालखण्ड में विभिन्न सामाजिक, व्यवसायिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं प्रशासनिक कारणों से देश के विभिन्न हिस्सों से लोग आकर यही बस गये । उनमे से एक बड़ा वर्ग अपने आपको छत्तीसगढ़िया कहता है और पिछले लगभग सौ वर्ष से कम समय से आकर बसने वालों को परदेसिया आदि अलांकारों से पुकारता है तथा वह क्षेत्रवादी घृणा फैलाने में बुरी तरह से संलग्न है । लेकिन सामाजिक दृष्टि से - पांच प्रतिशत अल्पसंख्यक, लगभग 3२%आदिवासी, ॥ % दलित,49%हिन्दु अन्य पिछड़ा वर्ग तभा शेष सामान्य वर्ग के लोग निवास करते हैं। छ्त्तीसगढ़ में जातीय दृष्ट्रि से कुर्मी, तेली (साहु) ,सतनामी तथा गोंड़  की सर्वाधिक जनसंख्या है।

अंततः वही हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी । भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की कमान पुन: विष्णुदेव साय के हाथों में सौंपने की घोषणा नई दिल्ली में की गई । इस घोषणा के बाद जहाँ एक ओर विष्णुदेव को बधाईयों का सिलसिला प्रारंभ हो गया लेकिन उसमें औपचारिकता अधिक दिखा । वही एक सवाल पार्टी के भीतर-बाहर तैर रहा है । क्या डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली विष्णुदेव साय और धर्मलाल कौशिक की एक गुटीय तिकड़ी छ्त्तीसगढ़ में भाजपा की नैया प्रदेश में पार लगा पाएंगे?  स्मरण रहें विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष धर्मलाल कौशिक को सिर्फ इसलिए डॉ. रमन सिंह बनवाने में कामयाब हुए थे क्योंकि वे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के स्वजातीय हैं  और वे उनके विश्वस्त सहयोगी होने के साथ साथ एस मैंन भी हैं।

 इसके पहले विक्रम उसेंडी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे बस्तर के आदिवासी विक्रम उसेंडी व निवृतमान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में लडे़ गए बीते विधानसभा चुनाव में पार्टी को मुंह की खानी पडी़ । भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा निर्धारित किए गए लक्ष्य 65 प्लस तो छोड़िए भाजपा राज्य में अपना बहुमत भी नहीं ला पाई । दो-चार सीट कम होती तो जोड़ जुगाड़ हो सकता था लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा को महज 15 सीट ही मिल पाईं । लेकिन उसमें भी दंतेवाडा़ विधायक रहे भीमा मंडावी के नक्सली हमले में मारे जाने के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस की देवती कर्मा ने जीत हासिल कर भाजपा की एक सीट और कम करवा दी । तब से ही इतना तो तय था कि विक्रम उसेंडी नहीं चलेंगे लेकिन डॉ. रमन सिंह की पसंद एक बार फिर लौट आएगी, इस पर भी भरोसा नहीं था । भाजपा के भीतर जैसे जैसे दावेदार बढ़ते गए वैसे वैसे रमन सिंह की पसंद पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री विष्णुदेव साय पर बात बनते गई ।

      भाजपा की बीते विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार का विश्लेषण करने पर जो तथ्य निकल कर सामने आए थे वह चौंकाने वाले रहे हैं । छत्तीसगढ़ 90 विधानसभा सीट वाला राज्य है. इन 90 में 29 सीटें अनुसूचित जनजाति ( एसटी ) वर्ग के लिए आरक्षित है. जबकि 10 सीट अनुसूचित जाति ( एससी ) के लिए तय है । आरक्षित सीटों में भाजपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था. ननकीराम कंवर, पुन्नूलाल मोहिले, कृष्णमूर्ति बांधी, भीमा मंडावी जैसों को छोड़ दिया जाए तो भाजपा इस वर्ग के बीच अपने तीन पंचवर्षीय कार्यकाल के बाद अलोकप्रिय हुई ।

    छ्त्तीसगढ़ में  15 वर्षों के डॉ.  रमण सिंह के कार्यकाल को पतापगडि़या व परदेशिया (उत्तरप्रदेश ) शासन कहने वालों की  कमी नही है । क्योंकि  सत्ता का भरपूर लाभ उन्हें मिला था । इसके अतिरिक्त डॉ. रमन का निज परिवार भी भ्रष्टाचार के विभिन्न गंभीर आरोपों से घिर गया था । यही कारण था कि प्रदेश के अन्य पिछड़ा वर्ग, एससी-एसटी तथा गैर राजपूत सामान्य वर्ग में भी भाजपा का जनाधार बड़ी तेजी से घटा है । ऐसे में पार्टी को इन वर्गों के लोगों को हर हाल में आगे बढ़ाना पड़ रहा है । क्यूंकि यह पार्टी की मजबूरी भी है. तभी तो उसने रेणुका सिंह को लोकसभा निर्वाचित होने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में लिया अनुसूइया उइके को राज्यपाल बनाकर छत्तीसगढ़ में पदस्थ किया ।

राज्य के पूर्व गृहमंत्री रामविचार नेताम पार्टी के भीतर अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए। अब जबकि पार्टी को नया प्रदेश अध्यक्ष देना था तो भाजपा को आरक्षित वर्ग को ही भी तव्वजो देनी थी । भाजपा आज की तारीख में एससी-एसटी वर्ग को छत्तीसगढ़ में और नाराज नहीं करना चाहती है । लेकिन भाजपा का प्रदेश में सबसे बड़ा आधार स्तम्भ वैश्य वर्ग की लगातार उपेक्षा  होने की अन्दरूनी चर्चा खतरनाक भी हो सकता है। अगर छ्त्तीसगढ़ के वैश्य समुदाय का लगाव भाजपा से कम हुआ तो भाजपा की तेज हीन हो चुकी इस तिकड़ी का अता - पता भी नहीं चलेगा?

   वैसे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के लिए  सांसद विजय बघेल, राज्यसभा सदस्य सरोज पांडेय, पूर्व नौकरशाह ओपी चौधरी जैसे  नाम सुनाई देते रहे लेकिन सरगुजा अंचल से आने वाले विष्णुदेव के नाम पर केन्द्रीय नेतृत्व की सहमति बनी । यह वही विष्णुदेव हैं जिन पर डॉ. रमन का भी भरोसा है तो उनके विरोधियों का भी  विष्णुदेव को संघ का भी आशीर्वाद मिलते रहा है । इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगोचर रखते हुए उनकी  प्रदेश अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हो गई. अब देखना शेष है कि छत्तीसगढ़ में तकरीबन मृतप्राय पड़ी भाजपा में तीन साल के भीतर सर्व श्री डॉ. रमन सिंह, विष्णु देव साय तथा धर्मलाल कौशिक की तिकड़ी पार्टी  में कितनी जान फूंक पाते हैं? क्योंकि भाजपा के अन्दर और बाहर ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका मानना है कि इनसे न हो पायेगा ।


लॉकडाउन कोरोना को रोकने का समाधान नहीं। - सैय्यद तक़वी

लॉकडाउन कोरोना को रोकने का समाधान नहीं। - सैय्यद तक़वी

15-Jun-2020

लॉकडाउन कोरोनावायरस को रोकने का समाधान नहीं है इस बात को हमें और सरकार को अच्छी तरीके से समझ लेना चाहिए। आज देश में तेजी से कोरोना वायरस के मामले बढ़ रहे हैं लोगों में डर भी है और लापरवाही भी।
कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश 68 दिनों तक लॉकडाउन रहा। उसके बाद भारत अब अनलॉक दौर में है नतीजा क्या हासिल हुआ हमें? क्या हमने जीती हुई बाजी हाथ से निकल जाने दी या फिर हम लापरवाही का शिकार हो गए। कुछ भी हो लेकिन कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बीच, देश में फिर से लॉकडाउन लागू करने पर चर्चा होने लगी है। यह सच है या अफवाह यह तो आने वाले समय में पता चलेगा। लेकिन क्या कोरोना के मामले पर लगाम लगाने के लिए लॉकडाउन की फिर जरूरत है?
कोरोनावायरस से मौतें हो रही हैं लेकिन हमें कोरोनावायरस के अलावा बेरोजगारी और भूख से होने वाली मौतों के बारे में भी सोचना होगा।
कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित दिल्ली, तमिलनाडु और महाराष्ट्र की सरकारों ने साफ कर दिया है कि वो लॉकडाउन नहीं लगा रहे है। और हकीकत भी यही है कि लॉकडाउन कोरोना वायरस को रोकने का समाधान नहीं है।
आज देश के सामने बहुत बड़े बड़े सवाल मुंह खोले हुए खड़े हैं क्योंकि हमारे देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत अच्छी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है और जैसे-जैसे कोरोना के मामले बढ़ेंगे उसके साथ ही चिकित्सकों एवं स्वास्थ्यकर्मियों की जररूत भी ज्यादा पढ़ेगी, जो हमारे पास पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। और जो हैं वो और ज्यादा काम करेंगे और उन पर दबाव भी बढ़ेगा। हमारे यहां पर मरीजों की संख्या ज्यादा है जबकि बेड और स्वास्थ्यकर्मी कम हैं। लोगों को बेड नहीं मिल पा रहे हैं और आने वाले दिनों में चीजें और खराब होंगी।
 हम उस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहां पर मरीज ज्यादा होंगे और स्वास्थयकर्मी कम। जिसके कारण दबाव बढ़ेगा और मृत्यु दर भी बढ़ेगी। और ऐसा अब होने लगा है। एक तरफ कोरोनावायरस का कहर, डर, खौफ दूसरी तरफ चिकित्सा के नाम पर भ्रष्टाचार भूख बेरोजगारी इन सब ने जनता का खून चूस लिया है।
हालात को देखकर लगता है कि लोगों का आपस में संपर्क बढ़ गया है, जिसके कारण देश में केस बढ़ रहे हैं। 
सरकार ने सख्त लॉकडाउन लागू किया था, जो कोरोना का समाधान नहीं है। नतीजा यह हुआ कि लॉकडाउन के कारण कई लोगों का रोजगार छीन गया, नौकरियां चली गई उद्योग बंद हो गए छोटे व्यवसाय बंद हो गए लोग भुखमरी के कगार पर आ गए इन सब वजहों से भी मौतें हुई जिसको हमने नजरअंदाज कर दिया । एक बड़ा सवाल क्या आज देश में सिर्फ कोरोनावायरस से मौतें हो रही हैं?
जवाब है नहीं।
कोरोना से अभी हर रोज लगभग 400 मौतें हो रही हैैं, लेकिन क्या कभी सोचा गया कि कुपोषण के कारण 5 साल से कम उम्र के 2 हजार बच्चों की हर रोज मौत हो रही है शायद ये अब बढ़कर 5 हजार हो गई है इसके अलावा हर रोज करीब 6 हजार हार्ट के मरीज मरते हैं। आखिर इन मौतों का क्या? सोचिए लेकिन सही सोचिए, करिए मगर दुरुस्त काम करिए सिर्फ सोचने और करने से कुछ नहीं होता है।
देश और प्रदेश की सरकारों को यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अगर लॉकडाउन फिर लगा तो देश और शहर बच नहीं पाएंगे। हमें इस वायरस के साथ रहने के लिए और जिंदगी बिताने के लिए स्थानीय स्तर पर समाधान निकालना होगा।
देश में 25 मार्च को लॉकडाउन लगा था तब 536 केस थे और 11 लोगों की मौत हुई थी। आज की संख्या हमारे सामने है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से रविवार को जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में इस वायरस से संक्रमितों की संख्या 320,922 हो गई है। रविवार की सुबह समाप्त हुए 24 घंटों में कोरोना के 11, 929 नए मामले सामने आए और 311 लोगों की मौत हुई। देश में अब तक 9195 लोगों की मौत हो चुकी है, हमें देखना होगा कि हमने लॉकडाउन से क्या हासिल किया! क्या लॉकडाउन सफल था?
एक बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि लॉकडाउन के कारण वायरस से छुटकारा नहीं मिलेगा। वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए एक रणनीति होनी चाहिए। लॉकडाउन से वायरस जरूर धीमा हुआ था मगर भारी नुकसान भी हुआ जिसकी भरपाई करना आसान नहीं है। 
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com


क्या मंदिरों को सेनेटाईज करना, हिंदू धार्मिक मान्यताओं के ख़िलाफ़ नहीं है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

क्या मंदिरों को सेनेटाईज करना, हिंदू धार्मिक मान्यताओं के ख़िलाफ़ नहीं है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

13-Jun-2020

समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने मीडिया के माध्यम से सरकार, समाज और देश की जनता के सामने एक रोचक और गंभीर स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा है कि जब केंद्र सरकारों द्वारा धार्मिक संस्थानों को खोलने की अनुमति मिल गई है तब उस परिस्थिति में तमाम धर्मों के और समुदायों के धार्मिक संस्थानों को खोलने की तैयारी की जा रही है। देखने लायक बात यह है की तमाम धार्मिक संस्थानों में सफाई व सुरक्षा के साथ ही कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण हुए लॉकडाउन के बाद मोदी सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों के पालन करने के साथ ही इन धार्मिक संस्थानों जैसे मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, बौद्ध स्तूप, जैन तीर्थ मंदिर, गुरुद्वारे आदि को सेनीटाइजर स्प्रे के माध्यम से सेनेटाईज किया जा रहा है तथा वहां आने वाले श्रद्धालुओं को भी सेनेटाईज करने की व्यवस्था की जा रही है

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि हिंदू धर्म की धार्मिक मान्यता के अनुसार शराब या शराब से बनी वस्तुएँ पूर्ण रूप से वर्जित होती हैं। तो मैं सरकार, समाज और हिंदू धर्म के अनुयायियों से प्रश्न करता हूं कि जब शराब हमारे धर्म में वर्जित है तो किस प्रकार से, कैसी स्थिति में और कौन से आधार पर सैनिटाइजर का उपयोग मंदिरों में किया जा रहा है जबकि सैनिटाइजर में अल्कोहल मतलब शराब की मात्रा सबसे अधिक होती है। इस प्रश्न का जवाब सभी को देना बहुत जरूरी है। इस प्रश्न को करने के पीछे मेरी मंशा सरकार पर उंगली उठाना नहीं है और ना ही किसी की धार्मिक आस्था या मान्यता को ठेस पहुंचाना है, बल्कि जागरूक करना है कि भगवान को सैनिटाइजर की आवश्यकता नहीं है बल्कि हमें स्वयं में अनुशासन लाने की आवश्यकता है। 

मेरे द्वारा उठाए गए इस प्रश्न के बारे में अवश्य सोचें। 

 प्रकाशपुन्ज पाण्डेय, राजनीतिक विश्लेषक व समाजसेवी, 
7987394898, 9111777044


पारदर्शी आदेश लागू करे सरकार

पारदर्शी आदेश लागू करे सरकार

12-Jun-2020

सैय्यद एम अली तक़वी (syedtaqvi12@gmail.com)

भारत में जो स्थिति चल रही है उस पर जितना भी अफसोस किया जाए वह कम है क्योंकि लगातार लॉकडाउन लगाने के बावजूद जिस तरीके से कोरोनावायरस भारत में निरंतर तेजी के साथ फैलता चला जा रहा है वह एक चिंता का विषय है सरकार द्वारा कहा गया था कि इक्कीस दिन में हम कोरोना पर विजय प्राप्त कर लेंगे लेकिन लॉकडाउन को अलग-अलग चरणों में लागू करने के बावजूद कोरोनावायरस संक्रमितों और मृतकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होती चली गई। 

आज स्थिति यह हो गई है कि एक तरफ सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क का प्रयोग ,सैनिटाइजर का प्रयोग इत्यादि बातों पर अमल करने की बात कही जा रही है वहीं दूसरी तरफ सड़कों पर हर तरफ भीड़ दिखाई दे रही है चाय के होटल, ठेले, बाजार, दुकाने सब पूरी तरह खुली है और यहां पर लोगों की भीड़ दिखाई दे रही जिसमें न तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा रहा है ना ही मास्क का लोग उपयोग कर रहे हैं ना ही सैनिटाइजर का प्रयोग किया जा रहा है। सारे नियम और कानून मंदिर, मस्जिद, स्कूल और कोचिंग तथा धार्मिक आयोजनों पर ही लागू हो रहे हैं। 

अभी मशहूर सहाफी आलिम नकवी साहब के भाई की मजलिस जो जामा मस्जिद तहसीनगंज के इमामबाड़े में होनी थी उसके लिए प्रशासन ने इजाजत नहीं दी।  सवाल यह है कि फिर बाकी कामों की इजाजत? सड़कों पर कटे हुए फलों को बेचने की इजाजत क्यों ? शराबखाने पर शराबियों की भीड़ की इजाजत क्यों? एक ऑटो में सवारियां भरकर चलने की इजाजत क्यों? होटलों में दुकानों में लोगों की भीड़ इस बात की इजाजत क्यों? चौराहों गलियों में होटलों पर लोगों की भीड़ इस बात की इजाजत क्यों? बसों में काफी संख्या में यात्री एक साथ बैठकर यात्रा कर रहे हैं इस बात की इजाजत क्यों? ट्रेनें चलाने की इजाजत क्यों?

इन बातों से तो ऐसा मालूम चल रहा है कि किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि कोरोनावायरस जैसी महामारी से निपटने के लिए क्या किया जाए केंद्र सरकार द्वारा जो नियम जारी किए गए उसके अनुसार रात 9:00 बजे से सुबह 5:00 बजे तक पूरी तरीके से बंद या कर्फ्यू की बात कही गई लेकिन दुकाने 9:00 बजे के बाद भी खुली रहती हैं लोगों की आवाजाही 9:00 बजे के बाद भी रहती है इसे क्या समझा जाए क्या इसे यह समझा जाए कि जनता के ऊपर सरकार के आदेशों का कोई असर नहीं है या फिर यह समझा जाए कि सरकार ने जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया है!

देश बहुत बुरी स्थिति से गुजर रहा है लोगों के पास खाने का सामान नहीं है रोजगार चरमरा गया आर्थिक स्थिति खराब हो गई हजारों की तादाद में शहरों में लोगों के व्यवसाय अभी भी शुरू नहीं हुए। साथ ही साथ व्यवसाय संचालकों के ऊपर बिल्डिंग के किराए का भार भी है।  सरकार इन लोगों की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही है सरकार सिर्फ उन्हीं बिंदुओं की तरफ अपना ध्यान करती है जो बिंदु चुनावी समीकरण में फिट बैठते हैं।

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वह पूरी ईमानदारी से नियम और दिशा-निर्देशों को लागू करें या तो सब चीजों को बंद कर दे या फिर अगर खोल रही है तो सब चीजों को बराबर से खोलने की इजाजत दे। कोरोनावायरस सिर्फ मंदिर मस्जिद स्कूल और कोचिंग में नहीं बल्कि हर जगह है इसलिए सिर्फ मंदिर मस्जिद स्कूल और कोचिंग पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है जबकि बाकी चीजों में पूरी तरीके से ढिलाई बरती जा रही जहां ना तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो रहा है और ना ही मास्क का प्रयोग हो रहा है इसलिए सरकार को चाहिए कि अपने सभी फैसलों पर एक बार फिर से गौर करें और पारदर्शी आदेश लागू करे।

 

 


नए अवतार में राहुल  गाँधी

नए अवतार में राहुल गाँधी

11-Jun-2020

कृष्ण देव (के. डी.) सिंह : (बुधवार पत्रिका)   

         भारतीय राजनीति एक नये दौर में प्रवेश कर रही है क्योंकि देश की वर्तमान हालातों में प्रजातांत्रिक स्तम्भ एक-एक कर सत्ता तथा सत्ताधारी दल की चिरोरी व चाकरी करने में व्यस्त हो गये है। देश के अधिसंख्य राष्ट्रीय व प्रादेशिक राजनीतिक दल व उसके नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह के आगे घुटने टेक चुके है अथवा ऐसा करने के लिए विभिन्न कारणों से विवश हो चुके हैं, तब आशा की किरण का केन्द्र एक मात्र राष्ट्रीय व्यक्तित्व राहुल गाँधी के रूप में अवतरित होता दिखने लगा है। वे देश की बिगड़ती हालातों को पुनः पटरी पर लाने के लिए गंभीर और सकारात्मक पहल कर रहें है । उनके व्यक्तित्व में जबरदस्त बदलाव आ रहा हैं।  यहीं कारण है कि अब देश की जनता राहुल गाँधी के रूप में अपना नया प्रधानमंत्री देखने लगी है।

           जबसे कोरोना महामारी के तौर पर सामने आयी है, एक जागरूक और ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर राहुल गांधी लगातार अपनी चिंताएँ भारत सरकार को संबोधित कर देश के सामने रखते आ रहे हैं । उनकी चिंता में एक  नेता की मौकापरस्ती नहीं, प्रजा और देश के भले के लिए परेशान होने का भाव दिखता है । निश्चित तौर पर नेता के तौर पर अभी उन्हें बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है, लेकिन नेता होने के लिए जो सबसे ज़रूरी तत्व है- आम आदमी की चिंता, उसके लिए मन में स्नेह, कुछ करने की पवित्र भावना, वो साफ - साफ दिख रहा है। वह कांग्रेस पार्टी के नेता के बजाय देश के नेता के तौर पर अपना व्यक्तित्व देश के नागरिकों के सामने रख रहे हैं।देश के मजदूरों से बात कर रहे हैं, वह दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्रियों से बात कर रहे हैं और समझ  व समझा रहे हैं कि आम आदमी के लिए बेहतर परिस्थिति का निर्माण कैसे हो? कोरोना महामारी की वजह से देश और नागरिकों के सामने जिस आर्थिक समस्या का निर्माण हुआ है, उससे कैसे बचा जाय?

       राहुल गांधी को पप्पू साबित करने की दुर्धर्ष कोशिश की गयी है। इसमें प्रमुख भूमिका भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रशिक्षित स्वयं सेवकों तथा दल व व्यक्ति विशेष के वेतनभोगियों की रही है। युवराज, पप्पू, लापरवाह, नामदार. भगोड़ा न जाने किन किन विशेषणों से पुकारा गया। इतना ही नही तमाम मर्यादाओं को ताक पर रखकर कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सोनियाँ गाँधी को स्तरहीन उपमा - अलंकारो से अंलकृत करने में भाजपा और भारतीय राष्ट्रीय माध्यमों विशेषकर इलेक्ट्रोनिक ने कोई कसर शेष नहीं रखा । संसद, न्यूज़ रूम्स, और वाट्सएप पर तरह तरह के किस्से बनाकर अपमानित किया गया, लेकिन राहुल टूटे नहीं , झुके नही,चुप. नही हुए। इन्हीं संबोधनों ने उन्हें अपना अलग व्यक्तित्व गढ़ने की ऊर्जा दी ।अब जो राहुल गांधी सामने है, वो न युवराज के तौर राजमुकुट पाना चाहता है, न पप्पू है और न जबरन राजनीति में चल रहा है. अब वह गंभीर है, देश और देश के नागरिकों से सरोकार जोड़ चुका है | अब वह किसी की टिप्पणी पर प्रति टिप्पणी नहीं कर रहा, बल्कि अपनी राह गढ़ रहा है । अलग राह, जिसमें सादगी है, चिंतन है और संकल्प है देश और देश के नागरिकों के लिए कुछ बेहतर कर गुजरने का ।

       सामान्य मान्यता है कि धूर्तता को सादगी से ही हराया जा सकता है, जैसे क्रूर अंग्रेजों को गांधी जी ने अहिंसा से हराया | देश पिछले कुछ दशकों से कुछ चुने हुए अमीरों को बहुत तेज गति से और अमीर बनाने की राह पर है । कॉर्पोरेट संस्कृति ने आम आदमी को चाहे जितना ऊंचा आसमान दिया हो उड़ने के लिए, वो आसमान इन्ही अमीरों और मालिकों की मुट्ठी में है। मालिक जब चाहे बड़े से बड़े मजदूर को लात मारकर सड़क पर कचरे के डिब्बे में डाल सकता है । जिसका विभत्स नजारा कोरोना -19 की महामारी से लड़ने के लिए केन्द्र द्वारा अविवेक पूर्ण एकाएक लागू की गई लॉकडाऊन के दौरान पुरा भारत और दुनिया ने देखा व सुना। देश के लाखों श्रमिकों के साथ विशेष कर मुंम्बई, दिल्ली,गुजरात के विभिन्न शहरों सहित गैर हिन्दी भाषी प्रदेशों में अमानवीय, अवांक्षित  व निर्दयता बरती गई । फलस्वस्प हजारों मजदूरों व उनके परिजनों को मौत तक हुई । करोड़ो लोग बेरोजगार हो गये और देश के लाखों पारिवार दर-दर की ठोकरें खाने के लिए विवश हुए है। निः सन्देह  यह भारतीय इतिहास का सबसे काला अध्याय है ।

देश की स्वतंत्रता की लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों को भगाने की लड़ाई नहीं थी, देश को स्वस्थ्य और समर्थ नागरिक बनाने की लड़ाई थी, जमींदारी, सामंतवाद, मनुवाद , पुंजीवाद और गैर बराबरी को ख़त्म करने की लड़ाई थी, लेकिन वैश्वीकरण ने गैर बराबरी और, मनुवादी व सामंती सोच को पुष्ट किया । मौजूदा भारत सरकार गैर बराबरी और , मनुवाद तथा सामंतवाद की पोषक सरकार है । बोल बचन में भले वह आदर्श भरी बातें करती है, लेकिन व्यवहार में मनुवादी ,सामंतवाद तथा घोर दक्षिणपंथी है । जमींदारी प्रथा, धर्म के नाम पर भेदभाव और संस्कृति के नाम पर कुप्रथाओं के खिलाफ नेहरू-गांधी - पटेल के मुखर होने की वजह से ये पार्टी कांग्रेस को समाप्त करना चाहती है । लेकिन  कांग्रेस के विधायकों, सांसदों को खरीदती है  । इसे नेहरू-गांधी से बैर है. जाती-दुश्मनी है इसीलिये पहले नेहरू, फिर सोनिया और अब राहुल गांधी को विशेष निशाना बनाया । झूठा संसार रचा, इतिहास को झूठा साबित करने की कोशिश की, नेहरू - गांधी के  चरित्र हनन की हर संभव कोशिश की ।

राहुल इस चाल को समझ गए हैं. वह जान गए हैं कि इसके झूठ का सामना सच्चाई की जमीन पर उतरकर ही किया जा सकता है । इसलिए वह निरंतर अपने सोच को, अपनी समझ को, अपनी जानकारी को निखार रहे हैं । बिना किसी की आलोचना की परवाह किये भले ही लोकसभा चुनाव में 543 में से 52 सीटों पर सिमट चुकी है, फिर भी देश में इस समय केवल काँग्रेस ही प्रमुख विपक्षी दल है। जिसकी राष्ट्रव्यापी उपस्थिति है। क्षेत्रीय दल या तो भाजपा के दामन को थाम चुके हैं या जेल जाने के डर से निष्क्रिय हो गए हैं। वामपंथी दलों के तेवर और तरीके दोनों अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। ऐसे में लोकतंत्र की उम्मीदें काँग्रेस से बढ़ गई हैं। लेकिन काँग्रेस के गांधी परिवार से ऊर्जा पाने वाले जड़ विहीन नेताओं ने  गांधी परिवार के तीन शक्ति केंद्रों के बीच वर्चस्व की लड़ाई करवा के पार्टी को राजशाही के महल षड्यंत्रों वाली सामंती स्थिति में पहुंचा दिया है।

        प्रचारित हैं कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा तीनों के करीबी सलाहकार एक दूसरे से प्रतिद्वंदिता को ही पार्टी के भविष्य का आधार मानकर चालें चल रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एक एक करके ये तीनों ही क्रमवार तरीके से पत्र लिखकर, बयान देकर और न्यूज चैनलों पर प्रकट होते हैं। न काँग्रेस का कोई अन्य नेता मौका पा रहा है न ही उसकी कोई भूमिका दिखाई दे रही है। लेकिन कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली को जानने वालों को पता है कि राहुल गांधी ने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में संगठन को कार्य करने के लिए कितना खुलापन व शक्ति सम्पन्न बनाया हैं ।

     राहुल गांधी ने बीते लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया । तब सर्वसम्मति से श्रीमती सोनिया गाँधी जी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया है। अब सवाल नहीं है कि पार्टी के देशभर के नेता , पार्टी की सक्रियता मान कर राजनीति में औपचारिक कदमताल करते रहें या क्योंकि तस्वीर साफ हो गई है? एक राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मुझे इस पार्टी का भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है। चूंकि शिखर स्तर पर कोई संशय नही है । हालांकि कुछ राज्यों में  अनुशासन और दिशा दर्शन की जबरदस्त आवश्यकता है । सबसे बड़ा उदाहरण मध्यप्रदेश है. 73 साल के दिग्विजय सिंह और 74 के कमलनाथ मुकाबला कर रहे हैं 61 साल के शिवराज सिंह और 49 साल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा से।

49 साल के ज्योतिरादित्य सिंधिया को बाहर कर दिया गया है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल जैसे नेता को षडयंत्र करके किनारे लगाने का उपक्रम पार्टी के नेताओं ने की । पन्द्रह साल बाद मिली सत्ता के पन्द्रह महीनों में मलाई सिर्फ जड़हीन , दरबारियों ने खाई। वो मुंह पोंछकर फिर अपनी खोल में घुस गए हैं। आपसी रस्साकशी के माहौल में 24 सीटों पर होने वाले उप चुनाव में जीत के फिर से सत्ता में आने के दावे किए जा रहे हैं? लेकिन पर्दा गिरने को है ,कुछ इलाकेदार नेताओं का?


जोगी जी के निधन के बाद उनकी पार्टी के भविष्य को लेकर लगाई जाने लगी अटकलें

जोगी जी के निधन के बाद उनकी पार्टी के भविष्य को लेकर लगाई जाने लगी अटकलें

09-Jun-2020

कृष्ण देव (केडी) सिंह

रायपुर 9 जून 2020 : अजीत जोगी के निधन के बाद उनकी पार्टी  जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जोगी का क्या होगा ? इस सवाल को लेकर छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में अब अटकलें लगने लगा है। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का 29 मई 2020 को निधन हो गया है । जोगी जी के बाद पार्टी में उनके उत्तराधिकारी के तौर पर प्रमुख रूप से अमीत जोगी,डा० रेणु जोगी अथवा वरिष्ठ विधायक धर्मजीत सिंह को नेतृत्व सौंपे जाने की अटकले लगने का दौर जारी है।

अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर 2016 में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जोगी ( जे.सी सी. जे. ) नाम से नई पार्टी बनाई और 2018 में बसपा से तालमेल कर विधानसभा का चुनाव लड़ा। इस चुनाव में जोगी कांग्रेस को पांच और बसपा को दो सीटें मिली। बड़ी बात यह रही कि जोगी कांग्रेस राज्य में साढ़े 12 फीसदी वोट हासिल कर तीसरी शक्ति के रूप में उभरी। बसपा को मात्र ढ़ाई फीसदी ही वोट मिले। 2003 में विद्याचरण शुक्ल एनसीपी के बैनर तले प्रत्याशी उतारकर सात फीसदी वोट हासिल कर पाए थे।  अजीत जोगी 2003,2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा थे और 2018 में उसी कांग्रेस को चुनौती देते उन्होंने अपने बलबूते पार्टी का जनाधार तैयार कर उसे मान्यता प्राप्त दल का तगमा भी दिला दिया।   

 पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी से राजनेता बने अजीत जोगी  राजनीतिक दांव-पेंच में माहिर खिलाडी के साथ छत्तीसगढ़ में जनाधार वाले नेता थे। खासतौर से सतनामी समाज के वोट बैंक पर उनकी पकड़ का कोई मुकाबला नहीं था। अब इस वोट बैंक पर अमित जोगी किस तरह कब्जा बनाये रखते हैं, यह उनके लिए चुनौती है और पार्टी की मजबूती के लिए जरुरी भी है। अब तक अमित अपने पिता अजीत जोगी की छत्रछाया में  ही काम कर रहे थे, भले वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं  और चुनावी रणनीति से लेकर दूसरे काम वही देखते हैं, लेकिन अब उन्हें अजीत जोगी के बिना अजीत जोगी जैसे फैसले लेने और काम करने होंगे। 

चार साल के भीतर जोगी कांग्रेस छोड़कर कई  नेता -कार्यकर्त्ता चले  गए।  इसके बावजूद पार्टी को साढ़े 12 फीसदी वोट मिले, तो इसके पीछे  अजीत जोगी का करामाती व्यक्तित्व ही था। पार्टी में पुराने और नए लोगों का धड़ा अलग-अलग था, लेकिन अजीत जोगी के व्यक्तित्व के नीचे सब एक थे, लेकिन अमित सबको कैसे साधेंगे , यह सवाल  पार्टी के नेता-कार्यकर्त्ता के साथ आम लोगों के दिमाग में कौंध रहा है। अमित के फैसलों से असहमत होकर पार्टी के कुछ संस्थापक सदस्य अलग हो गए तो भीतर रहने वाले कुछ पुराने लोग असहज महसूस करते रहते हैं।  ऐसे लोग अब तक अजीत जोगी के कारण चल रहे थे।  अजीत जोगी के करीबी और पत्रकार अशोक भटनागर कहते हैं- सर पर जिम्मेदारी आती है तो हर व्यक्ति में परिपक्वता आती है , ऐसे ही अमित पर पार्टी का बोझ आने से गंभीर होंगे और सबको साथ लेकर चलेंगे।  

जोगी कांग्रेस की पहली परीक्षा मरवाही विधानसभा में उपचुनाव से शुरू हो जाएगी।  अजीत जोगी के निधन के कारण मरवाही विधानसभा सीट खाली हो गई है।  अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट से अमित 2013 से 2018 तक विधायक रहे। छत्तीसगढ़ गठन के बाद से यह सीट जोगी परिवार के पास ही रही है। पारिवारिक सीट से अमित का उपचुनाव लड़ना तय है, लेकिन अमित के आदिवासी होने के  जाति प्रमाणपत्र को लेकर विवाद है।  मामला कोर्ट और थाने में है। अमित जोगी कहते हैं - इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया है। अजीत जोगी के आदिवासी प्रमाण पत्र को लेकर भी तीन दशक तक विवाद चलता रहा और अंत तक नहीं निपटा। अमित मरवाही से चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें सहानुभूति लहर का लाभ मिल जायेगा , लेकिन विरोधी दल भाजपा और कांग्रेस अमित को  रोकने की कोशिश करेगी ।

अजीत जोगी के निधन के बाद ही जोगी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय की बात चल पड़ी है।  यह बात सही है कि जोगी परिवार के कांग्रेस की नेता सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी से संबंध अच्छे है।  खासतौर से अजीत जोगी की पत्नी डॉ. रेणु जोगी की केमेस्ट्री सोनिया गाँधी से बढ़िया है, लेकिन अमित की छवि और कार्यप्रणाली न तो सोनिया गाँधी को पसंद है और न ही राहुल गाँधी को। 2018 चुनाव के पहले भी कांग्रेस में विलय की कोशिश हुई थी, लेकिन कई रोड़े आ गए। फिर प्रदेश के कांग्रेस नेता जोगी परिवार के खिलाफ हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने जोगी परिवार को बाहर कर सत्ता में धमाकेदार तरीके से कब्जा कर लिया।  पार्टी के अभी 69 विधायक है।  दो तिहाई से भी ज्यादा बहुमत। ऐसे में कांग्रेस और जोगी कांग्रेस के शेष बचे चार विधायकों को क्यों जोड़े ? सरकार अल्पमत में होती तो बात समझ में आती। जोगी कांग्रेस से खैरागढ़ के विधायक देवव्रत सिंह को छोड़कर कोई भी अभी कांग्रेस में नहीं जाना चाहता।  कहा जाता है  देवव्रत का झुकाव कांग्रेस की तरफ जरूर है। जोगी कांग्रेस विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह का कहना है - पार्टी का कांग्रेस में विलय का कोई सवाल नहीं है। पार्टी का अपना जनाधार है।  

इसी दौरान अमीत जोगी के सहारे सत्ता का भरपूर दोहन करने वाले एक भोपाली सत्ता के दलाल और इन्तजाम अलि के हवाले से जो खबरे आने लगी है, उससे प्रेक्षक अंदाजा लगाने लगे हैं कि अन्दर रवाने राजनीतिक चाले चलने के संकेत मिलने लगे हैं। प्रचारित किया जा रहा है कि जोगी कांग्रेस में अजित जोगी की पत्नी डॉ. रेणु जोगी और विधायक धर्मजीत सिंह वरिष्ठ होने के साथ परिपक्व और गंभीर  भी है। डॉ. रेणु जोगी अभी भले विधायक हैं, लेकिन राजनीतिक दांव पेंच से दूर रहती है ।वहीँ धर्मजीत को कमान सौंपने से सतनामी वोट बैंक पार्टी से छिटक सकता है।  इसके आलावा अजीत जोगी की करिश्माई छवि और छाप को फायदा जितना अमित उठा सकते हैं , उतना धर्मजीत नहीं। इस कारण अमित के व्यवहार और काम के तरीके पर जितने भी सवाल उठाये जायँ।  पार्टी के खेवनहार वही बन सकते हैं ?


हॉस्पिटल स्टाफ की व्हाट्सएप चैट वायरल, लिखा था- मुस्लिम मरीजों का नहीं करेंगे इलाज

हॉस्पिटल स्टाफ की व्हाट्सएप चैट वायरल, लिखा था- मुस्लिम मरीजों का नहीं करेंगे इलाज

09-Jun-2020

व्हाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल  के बद राजस्थान के चूरू जिले के एक निजी अस्पताल के कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू की गई है। पुलिस ने रविवार को कहा कि चैट में सीओवीआईडी ​​-19 से प्रभावित मुस्लिम मरीजों के नहीं आने की चर्चा है।

 

पूरे देश में कोरोना संक्रमण के खिलाफ लोग लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं राजस्थान के चुरू स्थित एक निजी अस्पताल के कर्मचारियों का वॉट्सऐप चैट इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। चैट में कर्मचारी अस्पताल में मुस्लिम मरीजों का इलाज न करने की बात कह रहे हैं। चैट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। यह मामला चुरू के एक प्राइवेट हॉस्पिटल श्रीचंद बारादिया रोग निदान केंद्र का है।

यह मामला सामने आने के बाद इस हॉस्पिटल को चलाने वाले डॉक्टर सुनाील चौधरी ने फेसबुक पर सफाई देते हुए आरोपों से इनकार किया है। सुनील चौधरी ने फेसबुक पर लिखा कि उनके स्टाफ का किसी खास कौम के प्रति कोई द्वेष नहीं है। अगर किसी को बुरा लगा है तो वो इसके लिए माफी मांगते हैं।

वहीं, सरदारशहर पुलिस ने कहा है कि दो दिन पहले उनको ये स्क्रीनशॉट और शिकायत मिली है। जिसके बाद मामले की जांच की जा रही है। हालांकि अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। मामले को लेकर शहर के कई संगठनों ने अस्पताल के प्रति नाराजगी जताई है और इसे दो समुदाय को बांटने वाला बताया है।

क्या लिखा था मैसेज में

पुलिस के मुताबिक, वॉट्सएप चैट में डॉक्टर चौधरी की पत्नी का भी नाम है। वो भी इसी हॉस्पिटल में डॉक्टर हैं। हालांकि उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया है। BARDIA RISE ग्रुप में किसी ने लिखा है- ‘कल से मैं मुस्लिम मरीज का एक्स रे नहीं करूंगा ये मेरा शपथ है।’ इसी शख्स ने एक और मैसेज लिखा- ‘मुस्लिम मरीजों को देखना ही बंद कर दो।’ एक अन्य ने इसी ग्रुप में लिखा- ‘अगर हिंदू पॉजिटिव होते न और मुस्लिम डॉक्टर होता तो हिंदुओं को कभी नहीं देखते। मैं मुस्लिम को ओपीडी में नहीं देखूंगी। बोल देना, मैडम नहीं है।’

डॉक्टर सुनील चौधरी की पत्नी डॉक्टर चौधरी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि किसी ने साजिश के तहत ऐसे मैसेजे को वायरल किया। डॉक्टरों का कहना है कि उनके हॉस्पिटल में बड़ी संख्या हर रोज मुस्लिम मरीजों का इलाज होता है। उन्होंने कहा कि वो फेसबुक पर भी कह चुके हैं कि उनके हॉस्पिटल ने किसी के धार्मिक भावना को ठेस नहीं पहुंचाई है।

 


आखिर इंसान इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? क्या हममें इन्सानियत नहीं बची है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

आखिर इंसान इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? क्या हममें इन्सानियत नहीं बची है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

05-Jun-2020

प्रकाशपुंज पाण्डेय 

केरल में साइलेंट वैली जंगल में हथिनी को पटाखे से भरा हुआ अन्नानास खिला दिया गया था जो उसके मुंह में फट गया और एक सप्ताह बाद 27 मई को उसकी मौत हो गई। इस दौरान वह काफी समय तक एक नज़दीकी तलाब में खड़ी रही थी। वन विभाग ने इस मामले में कहा है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए वह कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगा। विभाग ने कहा, 'हथिनी के शिकार के लिए दर्ज मामले में कई संदिग्धों से पूछताछ की गई है। इस संबंध में गठित एसआईटी को अहम सुराग मिले हैं। वन विभाग दोषियों को अधिकतम सजा दिलवाने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगा।' 

केरल में पिछले महीने के आखिर में गर्भवती हथिनी की निर्ममता पूर्वक की गई हत्या के मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री के मीडिया सलाहकार अमर प्रसाद रेड्डी ने यह जानकारी दी। अमर प्रसाद रेड्डी ने ट्वीट किया, 'केरल में हथिनी की हत्या के मामले में अमजद अली और तमीम शेख की गिरफ़्तारी हुई है। मैं राज्य के मुख्यमंत्री से इस मामले में बिना धर्म, जाति या पंथ के देखे पारदर्शी जांच की मांग करता हूं।' केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने ट्वीट कर हथिनी के हत्यारों को सजा दिलाए जाने की बात कही थी। उन्होंने गुरुवार को ट्वीट किया था कि जांच जारी है और तीन संदिग्धों पर फोकस है। पुलिस और वन विभाग संयुक्त रूप से इस घटना की जांच कर रहे हैं। जिला पुलिस प्रमुख और जिला वन विभाग के अधिकारियों ने मौके का मुआयना किया। हम वो हरसंभव करेंगे जिससे हत्यारों को सजा मिल सके।

इस खबर के ज्ञात होने के बाद मनुष्य का मनुष्यता पर से विश्वास उठ गया है। आखिर क्यों एक निर्दोष जानवर का दुश्मन बन जाता है इंसान? वो भी तब जब उसके गर्भ में एक और जान पल रहा हो! कई बार मानव जाति का निर्मम चेहरा सामने आया है। कभी किसी बंदर के साथ अत्याचार तो कभी किसी गधे के साथ। कभी किसी कुत्ते के साथ तो कभी किसी बिल्ली के साथ। आखिर इंसानों का जानवरों और पक्षियों के साथ ऐसा निर्मम व्यवहार करने का क्या औचित्य है? क्यों इंसान सिर्फ अपने मज़े लेने के लिए जानवरों और पक्षियों के साथ इतना क्रूर व्यवहार करता है। मैं इस घटना की भर्त्सना करता हूँ। 

मुख्यमंत्री ने एक अन्य ट्वीट में लिखा कि आपमें से कई लोग हमारे पास आए। हम आपको यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आपकी चिंता व्यर्थ नहीं जाएगी। इंसाफ की जीत होगी। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग इस हादसे का इस्तेमाल कर घटिया कैंपेन कर रहे हैं। मेरे विचार में ऐसे इंसानों का समाज में रहने का कोई हक नहीं है और कानून को भी ऐसे लोगों को मौत की सज़ा देनी चाहिए ताकि उन्हें भी एहसास हो कि मौत कैसी होती है। 


क्या देश में नियम - कानून का पालन करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ आम जनता की ही है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

क्या देश में नियम - कानून का पालन करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ आम जनता की ही है? - प्रकाशपुंज पाण्डेय

03-Jun-2020

हमेशा की तरह ही जन साधारण और आम जनता से जुड़े हुए मुद्दे उठाने के लिए सदैव तत्पर समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने एक अहम मुद्दे पर एक बार फिर मीडिया के माध्यम से जनता, प्रशासन, राजनीतिक दलों और सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है कि, जब कोरोनोवायरस के प्रकोप के कारण केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा एडवायजरी जारी कर जनता को इसका कड़ाई से पालन करने के लिए कहा गया है तो क्या ये नियम सिर्फ जनता के लिए हैं और क्या ये नियम, राजनेताओं, मंत्रियों और विशिष्ट लोगों के लिए नहीं है। 

प्रथम दृष्ट्या तो यही प्रतीत होता है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लॉकडाउन की घोषणा करने के अगले ही दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत से लोगों के साथ अयोध्या में राम मंदिर गए थे जहाँ सोशल और फिजिकल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा गया। कर्नाटक में देश के पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के घर एक विवाह समारोह में लॉकडाउन के दौरान भी कई लोग शामिल हुए जिसमें कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भी थे जहाँ सोशल और फिजिकल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा गया। आंध्र प्रदेश में भी एक भाजपा विधायक ने अपना जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में कई लोगों को बुलाया जहाँ सोशल और फिजिकल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा गया।

उसी प्रकार छत्तीसगढ़ की राजधानी स्थित बूढ़ा तालाब स्थल में भी निरीक्षण पर गए, भाजपा सांसद, विधायक और उनके कार्यकर्ताओं ने नीयमों की धज्जियाँ उड़ा दीं जहाँ सोशल और फिजिकल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा गया, साथ ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के शंकरनगर स्थिति काँग्रेस पार्टी के कार्यालय, राजीव भवन में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी लॉकडाउन के नियमों की अनदेखी की गई जहाँ सोशल और फिजिकल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा गया। आश्चर्य की बात तो यह है कि पत्रकारों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जहाँ नेताओं, मंत्रियों के साथ पत्रकार भी मौजूद थे, उनमें से किसी ने भी इस विषय पर कोई प्रश्न ही नहीं पूछा। साथ ही छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निधन के बाद भी उनके अंतिम दर्शनों के लिए भी जो व्यवस्था की गई थी उसमें भी सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ती दिखाई दीं जहाँ सोशल और फिजिकल डिस्टेन्सिंग का ख्याल नहीं रखा गया। 

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि 'मेरा उद्देश्य किसी की आस्था, धारणा या इज़्ज़त को ठेस पहुंचाना नहीं है बल्कि समाज को एक आईना दिखाना है कि जो नियम सरकारें बनाती हैं उन पर सबसे पहले सरकारों में बैठे नेताओं को और उनके सहयोगियों को अमल करना चाहिए ताकि जनता के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत हो सके।' 

वहीं दूसरी ओर अगर कोई आम नागरिक ऐसे नियमों का उल्लंघन कर दे तो पुलिस मार मार के उसे बेहाल कर देती है, कभी-कभी आम व्यक्ति मर भी जाता है जो कि हमने तमाम मीडिया चैनलों और अखबारों के माध्यम से देखा और पढ़ा भी है। 

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि, 'आज मैं किसी से कोई निवेदन नहीं करूंगा, केवल इतना चाहूंगा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की जरूरत है तभी बनेगा एक भारत श्रेष्ठ भारत।' 

 प्रकाशपुन्ज पाण्डेय, 
7987394898, 9111777044


"अजीत" मरते नहीं, अमर हो जाते हैं - प्रकाशपुंज पांडेय

01-Jun-2020

"अजीत प्रमोद जोगी", एक ऐसा नाम है जो कभी मर नहीं सकता, वे अमर हो गए हैं। उन्होंने तो सिर्फ़ अपनी देह त्यागी है और अनंत काल की यात्रा पर निकल चुके हैं लेकिन उनके किए हुए कार्य, उनकी कार्यकुशलता, उनकी राजनीतिक सूझबूझ, उनका दृढ़ संकल्प, उनकी वाकपटुता, लोगों से संवाद करने की उनकी कला और उनके जीवट व्यक्तित्व के लिए वह हमेशा सभी के दिलों में जिंदा रहेंगे। उन्होंने भारतीय राजनीति में जो मुकाम हासिल किया था वह सबके बस की बात नहीं है। छत्तीसगढ़ में ही नहीं, बल्कि उनके प्रशंसक समूचे भारत में और विदेशों में भी हैं। उनके साथ काम किया हुआ छोटा ही सही लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कार्यकाल को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता हूं। 

यह अजीत जोगी का आभामंडल ही था कि लोग परस्पर उनके प्रति आकर्षित होते रहते थे और खिंचे चले आते थे। मैंने यह लेख उनके जीवन का उल्लेख करने के लिए नहीं लिखा बल्कि उनके प्रति मेरे दिल में जो भावना और आदर है, उससे प्रेरित होकर लिखा है क्योंकि उनके जीवन पर तो ना जाने कितनी किताबें लिखी जा सकती हैं। यह लेख बहुत ही छोटा होगा उनके लिए। उनका व्यक्तित्व कई लोगों के लिए प्रेरणा था। उनके पास जो भी जाता था वे उनकी मदद जरूर करते थे। यह मैंने स्वयं देखा है और महसूस भी किया है। 2016 में जब उनकी नई क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी का गठन हुआ था तब मैंने उनकी पार्टी का मीडिया संभाला था साथ ही अजीत जोगी जी का ट्विटर हैंडल और फेसबुक भी मैं ही संभालता था। 

मुझे आज भी याद है जब प्रतिदिन सुबह 11:00 बजे मैं उनके लाइब्रेरी में हाज़िर हुआ करता था और वहां से उनके साथ चर्चा करते करते सागौन बंगले में जो लोन है वहां केवल मैं और वो विचरण करने के साथ ही रोज़ के नए-नए मुद्दों पर चर्चा किया करते थे। उन्होंने मुझे कहा था कि 'प्रकाश तुम्हारी लेखनी और सोच बहुत अच्छी है इसे अपने जीवन में कभी मत छोड़ना' यह बात सोच कर आज भी मेरी आंखें नम हो जाती हैं। मुझे याद है 15 अगस्त 2016 को जब मैंने एक मोबाइल के रिमोट से उनके साथ अपनी एक सेल्फी ली थी और रिमोट उनके हाथ में था तो वो बहुत खुश हुए थे। उस सेल्फी को मैं इस लेख के साथ साझा भी कर रहा हूं। वह मेरे लिए एक अविस्मरणीय समय था। मेरे जन्मदिन पर भी उन्होंने मुझे बहुत सी बधाइयाँ दी थीं तथा आशीर्वाद भी दिया था। लिखना बहुत चाहता हूं लेकिन दिल भरा हुआ है और आंखें नम है। 

बस यही कहना चाहता हूं कि 'अजीत मरा नहीं करते अजीत अमर हो जाते हैं' 

 प्रकाशपुन्ज पाण्डेय 
7987394898, 9111777044

 

 


जन्नतुल बक़ीअ के पुनर्निर्माण तक सिर्फ विरोध नहीं मुकम्मल बायकॉट ज़रूरी। सैय्यद तक़वी

जन्नतुल बक़ीअ के पुनर्निर्माण तक सिर्फ विरोध नहीं मुकम्मल बायकॉट ज़रूरी। सैय्यद तक़वी

01-Jun-2020

आज अंतरराष्ट्रीय शोक दिवस है। इस अवसर पर हर साल पूरे संसार में जगह जगह सऊदी दूतावास के सामने सैकड़ों लोगों  विरोध प्रदर्शन में भाग लेकर आले सऊद शासन की नीतियों की निंदा की जाती रही है। मैं भी मलऊन के इस बेहूदा हरकत की निंदा करता हूं।
लाकडाउन की वजह से इस साल एहतेजाज की तस्वीर बदली है। इस वर्ष सोशल मीडिया के माध्यम से और लाइव विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है।
जन्नतुल बक़ीअ कि तबाही अफ़सोसनाक है। बीती हुई सदी में 8 शव्वालुलमुकर्रम ,1345 (April 21, )1925 को आले सऊद ने बनी उमय्या व बनी अब्बास के क़दम से क़दम मिलाते हुए ख़ानदाने नबुव्वत व इसमत के लाल व गोहर की क़ब्रों को वीरान करके अपनी दुश्मनी का सबूत दिया जो सदियों से उसके सीनों में थी। आज आले मुहम्मद की क़ब्रों पर साया नहीं है जबकि उनके सदके़ में मिलने वाली नेमतों से ये यहूदी नुमा सऊदी अपने महलों में मज़े उड़ा रहे हैं। 
1925 में इस्लामी कैलेंडर के शव्वाल महीने की 8 तारीख़ को मुसलमानों के दूसरे सबसे पवित्र शहर मदीने में पैग़म्बरे इस्लाम (स अ) की बेटी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा(स अ) के पवित्र मज़ार समेत सहाबा और इस्लाम की कई विशिष्ट हस्तियों की क़ब्रों को ध्वस्त कर दिया गया था।
सऊदी शासन और कट्टरपंथी वहाबी समुदाय द्वारा अंजाम दी गई इस्लाम विरोधी इस दुःखद घटना के बाद से दुनिया भर के मुसलमान विशेष रूप से शिया मुसलमान 8 शव्वाल को शोक दिवस के रूप में मनाते हैं और विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करके आले सऊद शासन से हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स अ) के रौज़े के पुनर्निर्माण की मांग करते हैं।

इसी सिलसिले में मौलाना यासूब अब्बास साहब की ओर से सऊदी अरब हुकूमत के विरोध में जनन्तुल बकी के कब्रिस्तान मदीने में रसूल-ए-इस्लाम की इकलौती बेटी जनाबे फातिमा और इमामों के रौजों को ध्वस्त किये जाने के विरोध में आज एक विशाल विरोध-प्रदर्शन आनलाइन किया जा रहा है।
मौलाना यासूब अब्बास ने पिछले साल अपने भाषण में कहा था कि इस्लाम धर्म किसी पर जबर्दस्ती अत्याचार नहीं करता, सऊदी अरब मुसलमानों पर जबर्दस्ती कर अपना दृष्टिकोण दूसरे मुसलमानों पर लादना चाहता है। मौलाना ने सऊदी अरब हुकूमत से मांग की थी कि या तो जन्नतुल बकी का निर्माण करायें या हमकों इजाजत दें, हम वहां जाकर पुनर्निमाण करें। आज एक बार फिर वही मांग दोहराई जा रही है।
यह विरोध प्रदर्शन जरूरी भी है। इससे पता चलता है कि क़ौम ज़िंदा है। मगर शायद सिर्फ एक दिन नहीं हर शहर में कुछ मख़्सूस जगह तलाश की जाये जहां हमेशा विरोध प्रकट करता हुआ बोर्ड लगा हो। और हर महीने की आठ तारीख को इस स्याह दिन को याद करके मजलिस का आयोजन किया जाये और प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री को ज्ञापन दिया जाये।
हमारी यही मांग है कि सऊदी अरब में जारी बड़े पैमाने पर मानव एवं धार्मिक अधिकारों के हनन को तुरंत रोका जाए। संयुक्त राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय न्यायालय मूकदर्शक ना बने रहें।
मेरी मांग है कि मुसलमानों के सबसे पवित्र शहरों मक्का और मदीना समेत पूरे अरब प्रायद्वीप में इस्लामी धरोहरों को सुरक्षित रखे जाने पर बल दिया जाए और  जन्नतुल बक़ीअ क़ब्रिस्तान समेत जिन पवित्र स्थलों को आले सऊद शासन ने ध्वस्त करके आम मुसलमानो की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है, उनका तुरंत पुनर्निर्माण किया जाए।
सऊदी अरब में मानवाधिकारों की स्थिति पर पूरी दुनिया को चिंता ज़ाहिर करनी चाहिए और विशेषकर हमारी भारत सरकार को सऊदी हुकूमत की मानवता के खिलाफ जारी कार्यवाही का विरोध करना चाहिए।
आले सऊद मुर्दाबाद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 

 


मुख्यमंत्री भूपेश बघेल  की पहल पर अब तक 53 स्पेशल ट्रेन से अन्य राज्यों में फंसे 71 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिक लौटे !

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर अब तक 53 स्पेशल ट्रेन से अन्य राज्यों में फंसे 71 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिक लौटे !

31-May-2020

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 39 ट्रेनों के लिए रेल मण्डलों को 3.74 करोड़ रूपए भुगतान TNIS

नोवेल कोरोना वायरस (कोविड-19) के संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू लॉकडाउन से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण अन्य राज्यों में फंसे छत्तीसगढ़ के श्रमिकों तथा अन्य लोगों को मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की पहल पर वापस लाने का सिलसिला लगातार जारी है। अब तक 53 ट्रेनों के माध्यम से लगभग 71 हजार 712 श्रमिकों को एवं 453 अन्य यात्रियों को वापस लाया गया है। राज्य सरकार द्वारा अन्य प्रदेशों से श्रमिकों की सुरक्षित वापसी के लिए कुल 59 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की सहमति दी गई है, इनमें से 39 श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए 3 करोड़ 74 लाख 31 हजार 330 रूपए की राशि रेल मण्डलों को भुगतान की गई है।

    श्रम मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने बताया कि भवन एवं अन्य सन्ननिर्माण कर्मकार कल्याण मण्डल द्वारा प्रवासी श्रमिकों को छत्तीसगढ़ वापस लाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए विभिन्न रेल मण्डलों को श्रमिकों के यात्रा व्यय के लिए आवश्यक राशि का भुगतान किया जा रहा है। डॉ. डहरिया ने बताया कि लॉकडाउन के कारण श्रमिक जो छत्तीसगढ़ राज्य की सीमाओं पर पहुंच रहे है एवं राज्य से होकर गुजरने वाले सभी श्रमिकों के लिए भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य परीक्षण, चरण पादुका वितरण एवं परिवहन की निःशुल्क व्यवस्था से श्रमिकों कोे काफी राहत मिली है। छत्तीसगढ़ की सीमाओं पर पहुंचने वाले प्रवासी श्रमिकों को, चाहे वो किसी भी राज्य के हो, उन्हें छत्तीसगढ़ का मेहमान मान कर शासन-प्रशासन के लोग उनकी हरसंभव मदद कर रहे है।
    उन्होंने बताया कि श्रम विभाग के अधिकारियों का दल गठित कर विभिन्न औद्योगिक संस्थाओं, नियोजकों एवं प्रबंधकों से समन्वय कर श्रमिकों के लिए राशन एवं नगद आदि की व्यवस्था भी की जा रही है। प्रदेश के 26 हजार 205 श्रमिकों को 38 करोड़ 26 लाख रूपए बकाया वेतन का भुगतान भी कराया गया है। वहीं लॉकडाउन के द्वितीय चरण में 21 अप्रैल से शासन द्वारा छूट प्रदत्त गतिविधियों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग 1 लाख 4 हजार श्रमिकों को पुनः रोजगार उपलब्ध कराया गया है और छोटे-बड़े 1390 से अधिक कारखानों में पुनः कार्य प्रारंभ हो गया है।

 

 


पूर्व डीजी अंसारी ने प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को दी श्रध्दांजली, कहा-  मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं

पूर्व डीजी अंसारी ने प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को दी श्रध्दांजली, कहा- मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं

30-May-2020

पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस छत्तीसगढ़ 

आज मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं हैं................... भगवान् आपको साहस प्रदान करे जब हम अपने जीवन में इस तरह के एक विशेष व्यक्ति को खो देते हैं, समय रुकता प्रतीत होता है हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि हम आपके चेहरे पर एक मुस्कान से शुरू करें, ताकि हम उसकी आत्मा को खुश कर सकें, जैसे ही हम नहीं कर सकते हालांकि कोई शब्द वास्तव में आपको खोने में मदद नहीं कर सकता है, बस जानते हैं कि आप हर विचार और प्रार्थना में बहुत करीब हैं। मेमोरी हमें बता सकती है कि हम क्या थे, उन लोगों के साथ कंपनी में जिन्हें हम प्यार करते थे यह हमें यह जानने में मदद नहीं कर सकता कि हममें से प्रत्येक क्या है,अकेले, अब बन जाना चाहिए फिर भी, कोई भी व्यक्ति वास्तव में अकेला नहीं है;

 

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा

आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

यह संसार प्रकृति के नियमों के अधीन हैं
और परिवर्तन एक नियम है
शरीर तो मात्र एक साधन है
इस दुःख की घडी में हम सब आपके साथ हैं

 


कोई है जवाब देह, भारत में अलग कानून क्यों ?

कोई है जवाब देह, भारत में अलग कानून क्यों ?

29-May-2020

पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस छत्तीसगढ़ 

भोपाल के रेड जोन क्षेत्र में भाजपा की सदस्यता समारोह पर केंद्र और राज्य सरकार से पूर्व डीजेपी वजीर अंसारी ने सवाल खड़े किए 
(जावेद विन अली द्वारा )

उत्तर प्रदेश लखनऊ llपूरी दुनिया कोविड-19 के कोरोना वायरस की लड़ाई में जूझ रहा है lवहीं दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के पूर्व मंत्री प्रभु राम चौधरी अपने समर्थकों के साथ भोपाल के रेड जोन क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी की राज इकाई कार्यालय पर 23 मई को लगभग 200 लोगों का इकट्ठा होने के संबंध में जब मैंने भोपाल में मौजूद पूर्व डीजेपी मोहम्मद वजीर अंसारी से जानने का प्रयास किया तो उन्होंने स्पष्ट लफ्जों में कहा कि आदरणीय अटल बिहारी वाजपेई के जमाने की भाजपा की नैतिकता में आज के मौजूदा भारतीय जनता पार्टी मैं आसमान जमीन का अंतर आ गया हैl बिल्कुल सच बात हैl मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ,भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा ,पूर्व मंत्री रामपाल के साथ कई वीआईपी इस अवसर पर मौजूद थे !

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री के जाने के बाद का दृष्य देखने के लायक था !कोई कुछ भी कहे सोशल मीडिया ने पूरा पोल खोल दिया है !और इस अवसर पर डब्लू एचओ ,केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के सभी दिशानिर्देश का माखौल उड़ाया गया है !इस समय भारतीय जनता पार्टी का मीडिया मैनेजमेंट का दुनिया में चर्चा हैl उसी का नतीजा है जिस प्रमुखता से इस खबर छपनी चाहिए थी lऔर राष्ट्रीय चैनल पर चर्चा होनी चाहिए था नहीं की गईl वहीं दूसरी तरफ शादी , श्मशान घाट और कब्रिस्तान मैं 20 से 50 व्यक्ति का आदेश होने के बावजूद भी एक शादी समारोह के 30 लोगों पर एफ आई आर दर्ज किया गया है! हद तो यह है दिल्ली प्रदेश इकाई के अध्यक्ष मनोज तिवारी द्वारा हरियाणा में जाकर क्रिकेट प्रतियोगिता का उद्घाटन कर रहे हैंl भारत की गरीब जनता के लिए डब्लू एचओ से लेकर राज तक के सभी आदेशों का पालन करना अनिवार्य हैl क्या आदरणीय प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और अजीत गोयल जीके आंखों को यह सब कुछ नजर नहीं आ रहा हैl पूरी दुनिया में थू थू हो रहा हैl भारतीय मीडिया को गोदी मीडिया कहकर टीवी देखना बंद कर दिया है.  

वहीं दूसरी तरफ भारतीय मुसलमानों ने आज तक मस्जिदों में जाना बंद कर दिया है lजुमे की नमाज से लेकर ईद की नमाज तक घरों में पढ़ रहा हैl गिरजाघर ,गुरुद्वारा और मंदिर जाने पर पाबंदी रहेगी l कोविड-19 के कानून का उल्लंघन होगाl वही मात्र एक पार्टी के लिए कोई पाबंदी नहीं ।

आदरणीय डीएम महोदय और एसपी साहब से पूछने पर कहते हैं कि जांच हो रही हैl सरकार द्वारा राहत सामग्री भूखों तक नहीं पहुंचने पर कोई खाना खिला दीया और पानी पिला रहा है तो उस पर सरकार द्वारा मुकदमे कायम किए जा रहे हैं । इससे बढ़कर शर्म की बात क्या हो सकती है l मुसलमानों ने ईद की नमाज तक देश हित मे देखते हुए अपनी नमाज तक कुर्बान कर दिया और अपने खैरात, जकात और फितरा की तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए से प्रवासी मजदूरों का बिना जात धर्म देखे हुए सिख भाइयों की तरह मदद पहुंचा कर भारत में पहली बार इस तरह काम करने का जज्बा कभी देखा नहीं गया था । यह अलग बात है भारत की गोदी मीडिया इस सराहनीय कार्य की तरफ ध्यान नहीं दीया । लेकिन सोशल मीडिया ने अपना हक अदा कर दिया हैl और सोशल मीडिया पर लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा हैl कानून के भेदभाव करने से लोगों में अविश्वास पैदा होगा जो देश हित के लिए बड़ा खतरा है । संविधान पर शपथ इसी बात की ली जाती है ।


17 वर्षीय छात्रा के साथ रेप, इलाज के दौरान हुई मौत घटना शहडोल जिले से !

17 वर्षीय छात्रा के साथ रेप, इलाज के दौरान हुई मौत घटना शहडोल जिले से !

29-May-2020

छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा से लगे MP के शहडोल जिले के जैतपुर थाना अंतर्गत एक गांव में 17 वर्षीय छात्रा के साथ कथित तौर पर बलात्कार करने के बाद गला घोंटकर उसकी हत्या करने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।

शहडोल के पुलिस अधीक्षक सत्येंद्र शुक्ला ने बृहस्पतिवार को बताया कि 11वीं की छात्रा मंगलवार शाम पूजा करने के लिए घर से मंदिर की ओर निकली थी, लेकिन देर शाम तक वह घर नहीं आई। तब परिजनों ने उसकी काफी तलाश की लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला।
उन्होंने बताया कि बुधवार सुबह लगभग 6 बजे घर के पास झाड़ियों में बेहोशी की हालत में वह पड़ी हुई मिली। किशोरी को उसके परिजन तत्काल जिला अस्पताल शहडोल ले आए जहां बुधवार शाम उसकी मौत हो गई।
शुक्ला ने कहा कि प्रथम दृष्टया में यह बात सामने आई कि किशोरी के साथ बलात्कार करने के बाद गला दबाकर उसकी हत्या करने की कोशिश की गई है। इसके बाद प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की गई।
उन्होंने कहा कि इस मामले में आरोपी आरिफ खान (22) को गिरफ्तार भी कर लिया गया। शुक्ला ने बताया कि आरोपी ने अपना जुल्म कबूल भी लिया है। उन्होंने कहा कि आरोपी के खिलाफ भादंवि की धारा 376 (बलात्कार), 302 (हत्या) और पॉक्सो एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है।

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि आरोपी ने किशोरी को जबरदस्ती ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसे गला दबाकर मारने की कोशिश की। किशोरी के बेहोश हो जाने पर आरोपी ने मृत समझकर उसे झाड़ियों में फेंक दिया था। बाद में उसकी मौत हो गई।


मुज्तबा हुसैन   के  निधन  से साहित्य जगत को धक्का,  ,

मुज्तबा हुसैन के निधन से साहित्य जगत को धक्का, ,

28-May-2020

मशहूर उर्दू लेखक, हास्य और व्यंग्य रचनाकार मुज्तबा हुसैन का लंबी बीमारी के बाद बुधवार को दिल का दौरा पड़ने से 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उन्होंने हैदराबाद के रेड हिल्स इलाके में अपने निवास पर अंतिम सांस ली। बुढ़ापे से संबंधित समस्याओं के कारण वह पिछले कुछ साल से अस्वस्थ चल रहे थे।

उर्दू के ‘मार्क ट्वेन’ के रूप में विख्यात मुज्तबा हुसैन अपने समय के सबसे प्रिय उर्दू हास्यकार रहे। उन्हें 2007 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उनके निधन को भारतीय उप-महाद्वीप में उर्दू साहित्य के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है।

मुज्तबा हुसैन प्रसिद्ध लेखक इब्राहिम जलीस के भाई थे, जो पाकिस्तान चले गए थे। मुज्तबा हुसैन ने पिछले साल दिसंबर में उस समय चर्चा में आए थे, जब उन्होंने अपना पद्मश्री पुरस्कार लौटाने का ऐलान किया था। उन्होंने कथित तौर पर “मोदी सरकार द्वारा देश में डर और नफरत का माहौल पैदा किए जाने” के विरोध में यह फैसला लिया था।

उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत अपनी रचना ‘सियासत’ से की, जो हैदराबाद से प्रकाशित एक प्रमुख उर्दू दैनिक अखबार में छपती थी। पाठकों को इस अखबार में उनके संडे के कॉलम का बेसब्री से इंतजार रहता था। कहा जाता है कि मुज्तबा हुसैन की किताबें पढ़ने के लिए कई लोगों ने एक जमाने में उर्दू सीखी।

उन्होंने अपने जीवन काल में कई पुस्तकें और यात्रावृत्तांत लिखे, जिनमें ‘जापान चलो जापान’ उर्दू साहित्य में उनके सबसे बड़े योगदान में से एक माना जाता है, क्योंकि इसने जापान के बारे में एक ऐसे समय में दुर्लभ और हास्यप्रद बातें बताईं, जब उस देश की यात्रा कम ही लोग किया करते थे।उनके जीवनकाल में उन पर भारत के विभिन्न विद्वानों द्वारा कम से कम 12 शोध ग्रंथ लिखे गए। उनकी रचनाओं का उड़िया, कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी, रूसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद होता रहा है।


कार में हैंड सेनिटाइजर रखना हो सकता है खतरनाक, अमेरिका के दमकल विभाग ने दी चेतावनी

कार में हैंड सेनिटाइजर रखना हो सकता है खतरनाक, अमेरिका के दमकल विभाग ने दी चेतावनी

26-May-2020

नई दिल्ली: कोरोना से बचाने वाले हैंड सेनेटाइजर की बोतल क्या आपकी जान ले सकती है? क्या हैंडसेनेटाइजर की बोतल कार के भीतर बम बन सकती है? अमेरिका से एक हैरान करने वाली कहानी और चेतावनी आई है. दरअसल फेसबुक पर एक पोस्ट में जली हुई कार का दरवाजा दिखाया गया है और कहा गया है कि हैंड सेनेटाइजर कार में रखना खतरनाक हो सकता है. जानें पूरा मामला क्या है.

अमेरिका के वेस्टर्न लेक फायर डिस्ट्रिक्ट ने फेसबुक पर एक जली हुई कार की एक फोटो शेयर कर कहा है, ‘’ज्यादातर हैंड सेनिटाइजर अल्कोहल आधारित होते हैं जो ज्वलनशील है. गर्म मौसम में कार में रखे सेनिटाइजर पर सूर्य की रोशनी पड़ने से गर्म हो जाती है. खासकर छुट्टी मनाने के दौरान गाड़ी में धूम्रपान के वक्त ये बेहद खरनाक हो सकता है.’’

हालांकि अमेरिका के वेस्टर्न लेक फायर डिस्ट्रिक्ट ने जो तस्वीर फेसबुक पर शेयर की, बाद में उसको लेकर विवाद खड़ा हो गया. पोस्ट पर विवाद बढ़ा तो वेस्टर्न लेक फायर लेक ने सफाई दी कि पोस्ट में इस्तेमाल फोटो का इस जिले से कोई रिश्ता नहीं है. जिले में कोई हादसा भी नहीं हुआ है. ये पोस्ट लोगों को सतर्क करने के लिए किया गया था और कार में रखे हैंड सेनिटाइजर के खतरे को बताने के लिए किया गया था.

अमेरिका के नेशनल फायर प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने भी इस पर बयान देते हुए कहा कि हैंड सेनिटाइजर ज्वलनशील है और इसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए. गर्म तापमान में इससे आग लगने का खतरा रहता है.

साभार : ABP NEWS


#बौद्ध्स्थल_अयोध्या

#बौद्ध्स्थल_अयोध्या

22-May-2020

“अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा”- दारापुरी 
ह बात एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आज प्रेस को जारी बयान में कही है. उन्होंने कहा है कि जिस तरह से कल से अयोध्या में मिले अवशेषों का विडियो प्रसारित करके वहां पर हिन्दू मंदिर होने का दावा किया जा रहा है वह वास्तव में कोरोना संकट का सामने करने में मोदी सरकार की विफलताओं से लोगों का ध्यान बटाने का हथकंडा है. यह सर्वविदित है कि मोदी सरकार प्रवासी मजदूरों, कोरोना  मरीजों का टेस्ट, क्वारंनटाईन व्यवस्था, संक्रमित लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ, आर्थिक व्यवस्था एवं अन्य सभी मुद्दों पर बिलकुल असफल रही है जिससे जनता में सरकार के प्रति आक्रोश उभर रहा है. लगता है इस सब से ध्यान बटाने के लिए खुदाई/समतलीकारण से मिले अवशेषों को आधार बना कर वहां पर हिन्दू मंदिर होने का पुनः दावा किया जा रहा है जिस के बारे में सुप्रीम कोर्ट पहले ही बिना किसी सुबूत के राम मंदिर के पक्ष में फैसला दे चुकी है और इसे सभी पक्षों ने किसी तरह से स्वीकार भी कर लिया है. अब फिर इसकी बात उठाना यह दर्शाता है कि शायद राम मंदिर वाली पार्टी अभी भी अन्दर ही अन्दर अपने दावे को कमज़ोर समझ रही है और इसे अभी भी पुख्ता करने में लगी है. बिहार का चुनाव जिसे हिन्दू-मुस्लमान करने की ज़रुरत है, भी एक कारक हो सकता है क्योंकि भाजपा का मंदिर मुद्दा तो अब ख़त्म हो गया है पर उसे अभी भी चुनाव हित में जीवित रखने की ज़ुरूरत है. 
जहाँ तक अवशेषों के हिन्दू मंदिर के होने का दावा है वह भी सरासर गलत है क्योंकि अब विडियो में जो कुछ दर्शाया जा रहा है वह तो पूर्णतया बौद्ध मंदिर के अवशेषों को ही प्रमाणित करता है. उदाहरणार्थ इनमे एक धम्म चक्र है जिसके ऊपर बाहरी चक्र में 29, अन्दर के चक्र में 13 तथा सबसे छोटे चक्र में 7 कमल पत्तियां हैं. यह 29 वर्ष की आयु में बुद्ध के गृह त्याग, 10 पारमित्ताओं के साथ 3 त्रिशर्ण तथा बुद्ध के जन्म के तुरंत बाद पूर्व दिशा में चले 7 क़दमों के नीचे कमल के फूलों को इंगित करती हैं  इसी तरह जिसे शिवलिंग कहा जा रहा है वह वास्तव में छोटा बौद्ध स्तूप है क्योंकि शिवलिंग गोल होता हो चोकोर नहीं. एक द्वार पट्टिका पर कलश होने का दावा भी गलत है क्योंकि वह वास्तव में बुद्ध की तराशी हुयी मूर्ती है जिन्हें सलग्न चित्रों में देखा जा सकता है. 
अतः आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट सभी लोगों से आग्रह करता है कि वे आरएसएस/विश्व हिन्दू परिषद् के इन ध्यान बटायू हथकंडों से सावधान रहें और मोदी सरकार की कोरोना संकट को हल करने की विफलताओं को जोर शोर से उठायें और उस पर ज़रूरी कदम उठाने के लिए दबाव बनाये तथा राजनितिक परिवाद संगठित करें ताकि आने वाले समय में कोरोना की सुनामी से निबटा जा सके. 
एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.) 
राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
द्वारा सै क़ासिम 


दरिन्दगी - शर्मनाक :कब्र से निकाली बच्ची की लाश, करने लगा दरिंदगी की कोशिश, आरोपी गिरफ्तार

दरिन्दगी - शर्मनाक :कब्र से निकाली बच्ची की लाश, करने लगा दरिंदगी की कोशिश, आरोपी गिरफ्तार

22-May-2020

गुवाहाटी : 14 साल की एक लड़की की लाश को कब्र से निकाल कर उसका रेप करने की कोशिश का एक  रोंगटे खड़े कर देने वाला एक मामला सामने आया है। असम के देमाजी जिले के पुलिस अधीक्षक धनंजय गानावत के मुताबिक असम की 14 साल की लड़की की 17 मई को संदिग्ध स्थिति में मौत हुई थी और उसी रात परिजानों ने उसे गांव के किनारे साइमन नदी के तट पर दफना दिया। इस दौरान गांव के कुछ लोग भी मौजूद थे।

उसके एक दिन बाद (18 मई) को 51 वर्षीय अकान साइकिया नाम का एक व्यक्ति  कब्र से लड़की की लाश को बाहर निकाल कर उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास करने लगा। तभी वहां से गुजर रहे एक मछुआरे ने उसे देखा और तुरंत बाद इसकी सूचना पुलिस को दी। उसके कुछ ही देर बाद पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपी अकान के हाथ बांधकर उसे हिरासत में ले लिया गया। एसपी ने बताया कि लड़की की लाश के परीक्षण के लिए परिवार की अनुमति लेकर फिर से पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है और रिपोर्ट का इंतजार है। पुलिस ने आरोपी अकान साइकिया के खिलाफ पोक्सो कानून सहित भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 377 के तहत मामले दर्ज किए हैं।

उधर, इससे पहले दो शादियां कर चुके आरोपी अकान साइकिया के खिलाफ कई मामले दर्ज हैं। अकान की पहली पत्नी ने 2018 में उसके खिलाफ घरेलू हिंसा के तहत शिकायत करने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर देमोजी जेल भेज दिया था। कोरोना वायरस और लॉकडाउन के मद्देनजर जेल में कैद कैदियों में भी कोरोना फैलने की आशंका से कोरोना का कहर कम होने तक कुछ कैदियों को पैरोल पर रिहा करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया।

इसी के तहत मार्च महीने के आखिर में अकान को पैरोल मिलने पर जेल से रिहा हुआ था। परंतु जेल से बाहर आने के कुछ ही दिन बाद इस तरह की घिनौनी हरकत को अंजाम देने से डॉक्टरों ने उसकी मानसिक स्थिति की जांच की।  बताया जाता है कि अकान माहिलाओं के प्रति साइको (सनकी) की तरह बर्ताव करता था।  पुलिस अधीक्षक धनंजय गानावत ने बताया कि गांव के कई लोगों का कहना है कि अकान के लड़की का यौन शोषण करने के कारण ही उसने आत्महत्या कर ली है।


'राजीव गांधी का जाना..लेकिन क्यों' : वरिष्ठ पत्रकार राजीव मित्तल

'राजीव गांधी का जाना..लेकिन क्यों' : वरिष्ठ पत्रकार राजीव मित्तल

21-May-2020

नवभारत टाइम्स में रहते की तो याद नहीं कि राजीव गांधी को अक्षम मान लिया हो..हालांकि 1986 में वीपी सिंह ने वित्तमंत्री पद से हटा कर रक्षामंत्री बनाये जाने का बदला निकालना शुरू कर दिया था.. और राजीव गांधी के सबसे कमजोर पक्ष अमिताभ बच्चन और उनके भाई अजिताभ को निशाना बनाते हुए बोफर्स में कमीशन खाने का मुद्दा उछाल दिया था..

वीपी सिंह के राजीव के खिलाफ उछाले गए इस मुद्दे को आरएसएस और रामनाथ गोयनका ने तेजी से अपनी मुट्ठी में दबाया और अभियान छेड़ दिया..वीपी ने कॉंग्रेस छोड़ दी और मसीहाई अंदाज़ में जनमोर्चा टाइप मंच पर बैठ भजन कीर्तन करने लगे (23 साल बाद अन्ना हजारे ने बिल्कुल वीपी सिंह के नक्शे कदम पर चलते हुए मनमोहन सरकार को निशाना बनाया था..तो समझ सकते हैं कि खेल के तरीके कितने पुराने हैं और कांग्रेस ने सबक लेना नहीं सीखा)..

नवभारत टाइम्स छोड़ कर जनसत्ता चंडीगढ़ जब पहुंचा तो देखा गोयनका के दोनों पालतू अरुण शौरी और प्रभाष जोशी की तोपें राजीव गांधी पर गोले दाग रही हैं और वीपी सिंह संघियों के साथ हय्या हो हय्या हो कर रहे हैं..कुछ दिन बाद वामपंथी भी शामिल हो गए और वीपी सिंह दोनों की गोद में खेलने लगे..

अब रुकिए..यहां से एक तार 1974 के जेपी के बिहार आंदोलन से भी जुड़ा है....तब भी उस आंदोलन का संचालन इंडियन एक्सप्रेस और रामनाथ गोयनका कर रहे थे और बम्बई का एक्सप्रेस टॉवर और दिल्ली का राजघाट ये दोनों जेपी और गोयनका की रणनीतिक स्थली बने हुए थे..बाद में जब जेपी के कीन्स के पूर्ण रोजगार के सिद्धांत टाइप वाले काल्पनिक सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से जब राजनीतिक दल जुड़ने लगे तो गोयनका संघ और जनसंघ को पूरे उत्साह के साथ जेपी से जोड़ने में जुट गए..और फिर संघ जेपी के इतना नज़दीक पहुंच गया कि जेपी खुले आम अपने को संघी कहने में कतई नहीं हिचकते थे..

अब इस खेल को समझने को थोड़ा और पीछे चलिए..1971 के युद्ध में इंदिरा गांधी ने जिस तरह अमेरिकी राष्ट्र्पति निक्सन और उनके सलाहकार किसिंजर को उनकी औकात दिखाई और पाकिस्तान को तोड़ कर बांग्लादेश बनवाया, तो अमेरिका को इंदिरा गांधी को खत्म करने के लिए सीआईए को तो उतारना ही उतारना था..इधर किसिंजर चूंकि अमेरिका की हमेशा से सबसे मजबूत रही यहूदी लॉबी के नुमाइंदे थे तो उन्हें भारत में संघ का संगठन मिल गया और बरसों से दिल में नेहरू-गांधी परिवार को लेकर ज़हर का पोषण कर रहे रामनाथ गोयनका की मार्फत संत नेता जयप्रकाश नारायण को मैदान में उतारने लायक मुद्दे तलाश लिए गए..

कुल मिलाकर देवी दुर्गा की तरह पुजती आ रहीं इंदिरा गांधी 1975 के शुरुआती महीनों में भारत माता की सबसे बड़ी दुश्मन के रूप में स्थापित कर दी गयीं.. घटनाक्रम बहुत तेजी से बदला.. इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे के कहने पर कोर्ट के आदेश को किनारे कर उसी साल जून में  देश में इमरजेंसी लगा दी..अब यहां फिर देखिए कि एक महीने बाद ही बांग्लादेश के निर्माता शेख अब्दुल्ला, उनके परिवार और उनके मंत्रिमंडल के कई सारे सदस्यों का खून कर दिया और यह क़त्लेआम बांग्लादेश में कई महीनों चला..इसके पीछे सौ फीसदी सीआईए का हाथ था..शेख मुजीब की हत्या इंदिरा गांधी की बड़ी विफलताओं में गिनी जाती है..थी भी उन पर बहुत बड़ी चोट..

कुल मिलाकर गोयनका और संघ के कई खेलों में 1977 में कई  दलों की चर्बी से बनी जनता पार्टी की सरकार बनना भी एक बहुत खेल था..चूंकि संघ को अभी देश में वो मान्यता नहीं मिली थी, इसलिए गोयनका अटल को तो नहीं, लेकिन उनसे भी ज़्यादा घातक इंसान मोरार जी देसाई को संघ की मदद से जगजीवन राम को किनारे कर प्रधानमंत्री बनवाने में सफल हुए, जबकि पूरा संसदीय दल उनके विरोध में था..लेकिन धुर दक्षिणपंथी जेबी कृपलानी के जरिये जेपी को तैयार किया गया..और उस समय जेपी की बात काटने का सवाल ही नहीं उठता था..उस समय चौधरी चरण सिंह भी जगजीवन राम को न बनवाने के लिए अड़ गए..मतलब कि पूरी जनतापार्टी की मति मारी गई थी जो मोरार जो को प्रधानमंत्री बनवा दिया..

मधु दण्डवते और मधु लिमये जैसे कुछ समाजवादी नेताओं के अलावा पूरा मंत्रिमंडल सीआईए के इशारों पर काम कर रहा था..तभी विदेश मंत्रालय अटल को और सूचना मन्त्रालय आडवाणी को मिल गए..यानी संघ के हवाले हो गए दूर तक और देर तक असर डालने वाले दो विभाग. उसके बाद नौटंकियों का अंबार लग गया.. फिर तो जनतापार्टी की सरकार का चरमरा कर गिरना, इंदिरा गांधी का सत्ता में आना और फिर सीआईए का सक्रीय होना, पंजाब में आतंकवाद को बढ़ावा, और स्वर्णमंदिर में सैन्य कार्रवाई, फलस्वरूप इंदिरा गाँधी की हत्या वगैरह क्या मारियो पूजो के उपन्यास गॉड फादर की याद नहीं दिलाते!!जिसमें डॉन वीटो कारलोन के जमाई की मदद से डॉन के ही बड़े बेटे सोनी की हत्या करवाने का बृहद मंच तैयार किया जाता है मात्र एक वेश्या के फोन जरिये..

अब फिर 1987 के दिनों में लौटा जाए..अब तक सबसे बड़ा बहुमत पा कर सरकार बनाने वाले राजीव गांधी किस हश्र को प्राप्त हए और किस तरह यहां वीपी सिंह के अलावा राजीव गांधी को बरबाद किया गया खुद उनके कज़िन अरुण नेहरू के हाथों..वीपी के हटते ही राजीव गांधी का सारा विश्वास अरुण नेहरु पर था, लेकिन अरुण नेहरु खेल गए संघ के हाथों में, और उन्होंने ही राजीव गांधी से शाहबानो जैसे दो कौड़ी के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलवा दिया और तब आरिफ मोहम्मद खान जैसे छुटभैये महान क्रांतिकारी बन गए.. और दूसरे गृहमंत्री रहते अरुण नेहरु ने राजीव को फंसा कर राम मंदिर का ताला खुलवा कर कब से बंद पड़ा संघ का और संघी पत्रकारों का कारोबार खड़ा कर दिया..यानी इस बार अरुण नेहरु ने वही खेल खेला गॉड फादर के जमाई वाला..

गोयनका और देवीलाल जैसे कद्दावर नेता की मेहनत से 1989 के चुनाव में वीपी सिंह मैदान में ताल ठोंकने लायक सीटें पा गए और फिर वीपी को मिल गयीं संघ और वामपंथियों की बैसाखी.. मुराद पूरी हुई राजा साहब की, बन गए एक वर्षीय प्रधानमंत्री..लेकिन प्रधानमंत्र

द्वारा : सैय्यद क़ासिम