घर में बेघर नज़र आ रही है जनता।

घर में बेघर नज़र आ रही है जनता।

19-Jan-2020

मौजूदा वक्त में जो भी हो रहा है बिल्कुल अच्छा नहीं हो रहा है। ना सबका साथ है ना सबका विकास है और ना ही सबका विश्वास है। ये क्या हो रहा है, क्यो हो रहा है। ये सबको पता है। ज़िद और जोर जबरदस्ती का परिणाम अच्छा नहीं होता है।
      समर्थन की बात तो नहीं करूंगा क्योंकि समर्थन जैसी कोई चीज़ है ही नहीं हां यह बात जरूर है कि विरोध की यलगार के बीच भारतीयता, एकता और संविधान की आवाज का गला घोंटा जा रहा है। मौलिक अधिकारों के तहत जनता को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है और इसी के तहत सरकार का बात सुनना भी जरूरी है क्योंकि यह उनका कर्तव्य है। लेकिन मौजूदा समय में जो स्थिति है वह देश को तकलीफ़ दे रही है। ऐसा लग रहा है कि अब लोग जाग रहे हैं।
हो सकता है जो लिख रहा हूं उससे कोई सहमत हो और कोई असहमत लेकिन मौजूदा समय में अपने ही देश में अपने को ही साबित करने का कोई औचित्य नहीं है। पूरे देश में आशंकाओं के बादल हैं हाहाकार मचा हुआ है। ऐसा ही रहा तो क्या होगा कोई नहीं बता सकता। 
यह देश सबका है, किसने क्या कुर्बानी दी, किसका क्या योगदान है इन सबसे बढ़कर देश की तरक्की पर ध्यान देना चाहिए, अर्थव्यवस्था, रोजगार, मंहगाई और शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। देश में सुकून की जरूरत है, एकता की जरूरत है, धर्म निरपेक्षता की जरूरत है।
           हम सब एक हैं। एक होकर रहना चाहिए। मूर्खतापूर्ण क़दम उठाने से और हठ धर्मी से देश का नुक़सान होगा, जनता का नुक़सान होगा। हम सब एक ही थाली में खाने वाले लोग हैं। जिस तरह कोई बेटा/पुत्र पिता जी कहता है, कोई पापा, कोई बाबा, कोई अब्बा कहता है लेकिन मतलब एक ही होता है उसी तरह ईश्वर की संतान कोई अल्लाह, कोई राम , कोई रहीम,  कोई भगवान, कोई वाहेगुरु पुकारता है मगर सब एक ही है।
इस बात को समझने की जरूरत है। 
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 


डॉ उदित राज का ब्लॉग: ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’

डॉ उदित राज का ब्लॉग: ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’

17-Jan-2020

बात बात पर मुसलमानों से कहा जा रहा है कि पाकिस्तान चले जाएँ . मेरठ के पुलिस अधिकारी ने कहा कि वो पाकिस्तान चले जाएँ. भले ही अपने दूषित मानसिकता को छुपाने कि कोशिश किया कि वो लोग पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे .
लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं दिख रहा है. बहस इतनी ज्यादा बढती जा रही है कि कहीं उनको लेने का देने न पड़ जाय. जो आज मुसलमानों को विदेशी बताते फिर रहे हैं. फिर यह प्रश्न पैदा होता है कि जो पहले आया वो पहले जाएगा.

यह सर्वविदित है कि कि भारत भूमि पर अफ़्रीकी, यूरोपिय और मंगोलायिड लोग समय समय पर आते रहे हैं और बस गये . हाल में एक वायरल वीडियो में दिखा कि जिसमे एक सज्जन कहते हुए नज़र आ रहे है कि हम ब्राह्मण जर्मनी से आये हैं.

वो सज्जन पढ़े लिखे नज़र आये और यह भी कह रहे हैं कि मोहन भागवत चित्पावन ब्राह्मण हैं. चित्पावन ब्राह्मण मूल रूप से इजराईल से आये थे अर्थात इनकी नसल यहूदी है.

राखीगढ़ी में हाल में उत्खनन हुआ और यह बड़े स्तर पर कि योजना थी . मिले हुए अवशेषों का पूरा वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ तो पता चला कि वो सिंधु घाटी की सभ्यता से जुडा है.
सत्ता का दवाब पुरातत्वविद पर पूरा था और उनसे कहलवाने कि कोशिश कि गयी कि इनका डी एन ए सवर्णों से मिलता है. इसके पीछे का मकसद यह है कि किसी तरह से हड़प्पा सभ्यता को सनातनी हिन्दू से जोड़ दिया जाय. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है.
दुनिया के 92 बानवे वैज्ञानिक जो हार्वर्ड , एम आई टी , रसियन अकेडमी ऑफ़ साइंसेस और भारत की तमाम संस्थाएं से जुड़े , 612 लोगों का अध्ययन किया , लोगों का अध्ययन इस्टर्न इरान , उज्बेकिस्तान , तजाकिस्तान , कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि से लिए गए और अध्ययन में पाया कि आर्य उत्तरी भारत में आये.
हिटलर के नाजियों कि सोच भी यही थी कि आर्य भारत में बाहर से आये . हड़प्पा के लोगों में स्टेपे डी एन ए नहीं है, हलाकि , हाल में राखीगढ़ी के उत्खनन और डी एन ए विश्लेषण में कोशिश कि गयी कि आर्यों को मूलनिवासी घोषित किया जाय .


ऐसा कुछ कहलवाया भी गया , लेकिन दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक जैसे डेविड रायिक आदि कि चुनौती के सामने ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत नही कर पाए. ऋग्वेद में जो परंपरा एवं प्रकार बलि और कर्मकांड का दीखता है, उसका मेल पूर्वी यूरोप से , जिसमे रशिया को भी शामिल किया जाता है, मेल खता है.
डेविड रायिक कहते हैं – “राजनीटिक कारणों से डी एन ए के अध्ययन के लिए सामग्री आराम से उपलब्ध नहीं हो पति है. यहाँ के लोग मरे हुए पूर्वजों के प्रति बहुत भावुक हैं, जबकि यूरोप और यहाँ तक कि पाकिस्तान के लोग भी इस तरह का व्यवाहर नहीं करते . इसके पीछे संघ एक कारण के रूप में दीखता है. . विनायक सावरकर और गोलवलकर भी यही कहते थे कि हम यहाँ के ही हैं, बाहर से नहीं आये हैं. डी एन ए के अलावा भाषाई एवं अन्य सांस्कृतिक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि आर्य बाहर से आये .
संघ के ऐसे प्रयास समय समय पर चलते रहते हैं .सरस्वती नदी यहाँ से कभी निकली थी जिसे हिन्दू सभ्य्यता से जोड़ने का पूरा प्रयास किया जाता रहा है. कुछ समय पूर्व बाल गंगाधर तिलक अपनी किताब “आर्कटिक होम्स इन द वेदाज” में भी सवर्णों के बाहर से आने कि पुष्टि करते हैं. तिलक लिखते हैं कि – “ उत्तरी ध्रुव आर्यन का मूल स्थान या निवास हुआ करता था , लेकिन वहां ज्यादा ठंढ होने कि वजह से 8000 बीसी के लगभग यूरोप और एशिया में बसने आये .उस समय उत्तरी ध्रुव पर बर्फ से ढंका होने कि वजह से रहने योग्य भूमि का भी अभाव था और वर्तमान भारत के उत्तरी छोर कि जमीन उस समय लगभग खाली थी , ये लोग यहाँ आकर बस गए”. तिलक वेद के मन्त्र और कैलेण्डर के गहन अध्ययन और शोध के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुचे थे.
राहुल सांकृत्यायन ने अपने प्रसिद्द उपन्यास गंगा से वोल्गा में भी विस्तार से चित्रित किया है किस तरह से आर्य विशेष रूप से गंगा के पठारी एरिया में आये. नेहरु ने अपनी प्रसिद्द किताब डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया में भी इस बात कि पुष्टि कि है कि आर्यन बाहर से आकर भारत में बसे.
जो लोग आज बात बात पर मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने कि बात करते हैं पहले अपनी अनुवांशिकी विरासत पुरखों का इतिहास जान समझ ले. किन कारणों से जो सनातनी धरम कम्बोडिया बाली सिंध , अरब और ईराक तक फैला था कैसे लुप्त हो गया .
कोई मुसलमान बन गया तो कोई बौद्ध . ऐसा क्यों हुआ ? इनकी वर्तमान सोच हमेशा से ऐसी ही रही है. जिसकी सत्ता होती है उसकी धर्म भी संस्कृति स्वाभाविक रूप से मजबूत होकर फैलती है .
जब मुस्लिम शासक यहाँ शासन कर रहे थे तो स्वाभाविक तौर पर कुछेक को जबरन मुसलमान बनाया गया होगा . ऐसा अपवाद ही होगा . जो बहुसंख्यक मुस्लिम बने उनमे से कुछ सत्ता के लोभ कि वजह से और शेष इस्लाम की खूबियों कि वजह से बने होंगे.
जब आज दलितों के साथ छूआछोत का वर्ताव है तो उस समय क्या रहा होगा .यह कल्पना करना बहुत मुश्किल नहीं है. कुछ ही साल पहले मुरैना कि घटना है कि दलित के हाथ से जब एक सवर्ण के कुत्ते ने रोटी खायी तो उस कुत्ते को सवर्ण मालिक ने घर से भगा दिया.

अगर आर्य बाहर से नहीं आये होते तो इतना निर्दयी व्यवहार बहुजनों के साथ न करते । कभी मूल निवासी अपने ही लोगों के साथ छुआछूत न करते। बेहतर होगा कि बात-बात पर मुसलमानों को पाकिस्तान जाने की बात न करें वर्ना एक दिन DNA आधारित नागरिकता की बात सच हो जाएगी।

लेखक:  डॉ उदित राज, (पूर्व लोकसभा सदस्य)


28 दिनों की कैद के बाद रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब को मिली जमानत:

28 दिनों की कैद के बाद रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब को मिली जमानत:

16-Jan-2020

सैय्यद क़ासिम

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब के अधिवक्ता जमाल सईद सिद्दीकी ने बताया की आज मुहम्मद शुऐब की जमानत स्वीकार कर ली गई। 

गैर संवैधानिक नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के चलते 18 दिसम्बर से रिहाई मंच अध्यक्ष अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब को लखनऊ पुलिस द्वारा हाऊस अरेस्ट किये जाने के बाद 19 दिसंबर की रात घर से पुलिस उठा ले गई। इस अवैध गिरफ्तारी के बाद न्यायालय में हैबियस कार्पस होने के बाद 21 दिसंबर को पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी की सूचना दी। इसके बाद देश के तमाम मानवाधिकार समूह एकजुट होकर लोकतंत्र सेनानी मुहम्मद शुऐब की गिरफ्तारी को अवैध बताया क्योंकि पुलिस ने उन्हें 18 दिसम्बर से ही हाऊस अरेस्ट किया हुआ था। विभिन्न समाचार-पत्रों ने प्रमुखता से इस ख़बर को प्रकाशित भी किया था।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि 19 दिसम्बर को नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में सामाजिक, मानवाधिकार, महिला, राजनैतिक संगठनों ने पूरे देश में शान्ति पूर्ण विरोध करने का आह्वान किया था जिसके चलते आम जनमानस गैर संवैधानिक नागरिकता संशोधन कानून का बहिष्कार कर रहा था और इसके विरोध में एकजुट हुआ था।

 


लड़की बनकर चोर ने किया था इमाम से शादी, खुला राज तो दंग रह गया इमाम

लड़की बनकर चोर ने किया था इमाम से शादी, खुला राज तो दंग रह गया इमाम

15-Jan-2020

अफ्रीकी देश युगांडा से एक बड़ी ही चौकाने वाली खबर आ रही है जहां एक इमाम ने जिसे महिला समझकर शादी किया था वह 2 हफ्ते बाद 'मर्द' निकला दरअसल अफ्रीकी देश युगांडा में एक मस्जिद में इमाम शेख मंतूबा की मुलाकात नबूकीरा नाम की एक महिला से हुई। शेख मंतूबा नबूकीरा को देखते ही फिदा हो गए और उसे प्रपोज कर दिया। नबूकीरा ने भी इमाम का प्यार कबूल कर लिया और दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद जब सुहागरात का समय आया ता उस रात नबूकीरा ने बड़ा ही अजीबोगरीब बहाना बनाया।

नबूकीरा ने इमाम से कहा कि जब तक वह अपने माता-पिता से एक बार मिल नहीं लेती उनके बीच शारीरिक संबंध नहीं बन सकता। शेख मंतूबा ने पत्नी की बात मान ली और इसी इंतजार में दो सप्ताह बीत गए। शेख मंतूबा को उम्मीद थी की वह जल्द ही पत्नी के माता-पिता से मुलाकात करेंगे। लेकिन इस बीच पड़ोसी ने कुछ ऐसा किया जिससे इमाम की पत्नी का रहस्य खुल गया। पड़ोसी ने पुलिस में शिकायत की कि उसने शेख की पत्नी को घर में टीवी और नकदी चुराते हुए देखा है, उसने यह भी दावा किया कि शेख की पत्नी मर्द है।

पुलिस ने शिकायत पर एक्शन लेते हुए इमाम की पत्नी नबूकीरा को गिरफ्तार किया और उसकी तलाशी ली। पुलिस की तलाशी में नबूकीरा का पर्दाफाश हो गया और उसका राज सबके सामने आ गया। दलअसल, महिला जैसा दिखने के लिए वह मेकअप और कपड़ों का सहारा लेता था। पुलिस ने जब इस बात की जानकारी इमाम शेख मंतूबा को दी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

पुलिस के मुताबिक इमाम शेख मंतूबा की पत्नी ने पहले माता-पिता से मिलने के बहाने उनसे दूरी बनाए रखा। उधर जब पुलिस ने दुल्हन बने युवक को गिरफ्तार कर पूछताछ की तो उसने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। पुलिस ने बताया कि इमाम की पत्नी ना सिर्फ मर्द है बल्कि वह मुसलमान भी नहीं हैं। पूछताछ में उसने बताया कि उसका धर्म ईसाई है और असली नाम रिचर्ड है। वह चोरी के इरादे से इमाम के घर उनकी पत्नी बनकर आया था।

साभार : hindi.oneindia से 


जेएनयू वीसी के विरोध में अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी ने एमेरिटस प्रोफेसर के पद से इस्तीफा दिया

जेएनयू वीसी के विरोध में अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी ने एमेरिटस प्रोफेसर के पद से इस्तीफा दिया

14-Jan-2020

नई दिल्ली: जाने-माने अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी ने वाइस चांसलर एम. जगदेश कुमार की कार्रवाइयों के खिलाफ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस के पद से इस्तीफा दे दिया है. वाइस चांसलर को लिखे पत्र में भादुड़ी ने कहा कि 1973 से ही उनका जेएनयू से काफी लंबा नाता रहा है. लेकिन अब प्रशासन विश्वविद्यालय में बोलने की आजादी और विमर्श को कुचल रहा है. उन्होंने कहा, ‘इससे मुझे काफी पीड़ा होती है. लेकिन मुझे लगता है कि बिना विरोध दर्ज कराए इस पूरे घटनाक्रम का मूक दर्शक बने रहना मेरे लिए अनैतिक होगा. विश्वविद्यालय में विरोध का गला घोटा जा रहा है.’

प्रोफेसर भादुड़ी ने अपने पत्र में लिखा कि उन्होंने 1973 में एक युवा प्रोफेसर के रूप में विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था. बीच में कुछ वर्षों के अंतराल के बाद उन्होंने इसे 2001 में छोड़ दिया. वे लिखते हैं, ‘जेएनयू में मेरे वर्षों के दौरान कई उचित या अनुचित विरोध प्रदर्शन हुए. प्रशासन ने कई बार मामले को संभाला भी और कई बार नहीं भी संभाल पाए. इसकी वजह से कई बार पढ़ने-पढ़ाने का कार्य भी बंद करना पड़ा था.’

उन्होंने कहा, ‘लेकिन आज के समय न सिर्फ प्रशासन मामले को हैंडल करने में अक्षम है, बल्कि जेएनयू के आजाद और जिंदादिली माहौल को कुचलने की कोशिश की जा रही है. यह जेएनयू की फैकल्टी के साथ-साथ उनके छात्रों के लिए गर्व का विषय था कि उन्हें दुनियाभर के विचारों से अवगत कराया जाता है, जो कि भारत में कहीं और नहीं होता है, यहां तक कि मैं अनुभव से भी कह सकता हूं कि विश्व के बहुत कम ही शैक्षणिक संस्थानों ऐसा माहौल है.’

अमित भादुड़ी ने जगदेश कुमार की आलोचना करते हुए पत्र में लिखा, ‘मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के माहौल को नष्ट करने का वर्तमान प्रयास एक बड़ी और अधिक भयावह योजना के अनुरूप है, जिसमें जेएनयू के प्रमुख के रूप में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका है.’ अर्थशास्त्री ने कहा, ‘आप अपने प्रशासन की संकीर्ण मानसिकता को लागू करने का जोर दे रहे हैं और विचारों की अन्य सभी रास्तों को छात्रों के लिए बंद करने पर तुले हुए हैं.’ अमित भादुड़ी ने प्रोफेसर एमेरिटस के पद से इस्तीफा देते हुए कहा कि मैं केवल उसी तरीके से विरोध कर रहा हूं जो मुझे लगता है कि मेरे लिए खुला है.

प्रोफेसर भादुड़ी ने जेएनयू के वाइस चांसलर को सही निर्णय लेने की ओर इशारा करते हुए पत्र के अंत में लिखा, ‘मुझे उम्मीद है कि विश्वविद्यालय द्वारा मुझे जो सम्मान दिया गया था, उसे वापस लौटाने से आपको आपके नेतृत्व में विश्वविद्यालय की स्थिति को लेकर मेरी गहरी चिंता का सही संदेश मिलेगा.’

साभार :  द वायर 


कुलगाम में हिजबुल मुजाहिदीन आतंकियों के साथ गिरफ्तार डीएसपी दविंदर सिंह कोई मुस्लिम होता तो ?

कुलगाम में हिजबुल मुजाहिदीन आतंकियों के साथ गिरफ्तार डीएसपी दविंदर सिंह कोई मुस्लिम होता तो ?

14-Jan-2020

जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में हिजबुल मुजाहिदीन आतंकियों के साथ गिरफ्तार किए गए डीएसपी दविंदर सिंह  को लेकर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सांप्रदायिक बयान दिया है. इस बयान को लेकर वह विवादों में आ गए हैं.
अधीर रंजन चौधरी ने दविंदर सिंह पर तीन हिस्सों में ट्वीट किए. उन्होंने पहला ट्वीट किया- ‘कुलगाम में हिजुबल आतंकियों के साथ गिरफ्तार हुए पुलिस अधिकारी का नाम इत्तेफाक से दविंदर सिंह है. अगर दविंदर खान होता, तो विवाद बढ़ता. इस बारे में आरएसएस के ट्रोल रेजिमेंट को साफ-साफ और स्पष्ट शब्दों में जवाब देना चाहिए. मजहब, रंग और कर्म को किनारे रखते हुए देश के ऐसे दुश्मनों की एकसुर में आलोचना की जानी चाहिए.’

चौधरी ने इसी को लेकर दूसरे ट्वीट में कहा, घाटी में जो मामला सामने आया है, वो हमारे लिए बड़ी चिंता की बात है. ऐसी चीजों को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। सवाल ये भी है कि पुलवामा जैसी आतंकी घटनाओं के पीछे असली दोषी कौन थे? इस पर भी नए सिरे से विचार करने की जरूरत है. आपको बता दें कि जम्मू कश्मीर के कुलगाम में एक गाड़ी से हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकियों के साथ डीएसपी सिंह सफर कर रहे थे. रविवार को चेकिंग के दौरान सुरक्षाबलों ने आतंकियों के साथ डीएसपी को भी गिरफ़्तार किया. जम्मू कश्मीर पुलिस के आईजी विजय कुमार ने इसके बाद कहा, देवेंदर सिंह ने आतंकवाद विरोधी अभियान में काम किया है, जिन परिस्थितियों में उन्हें गिरफ्तार किया गया है, वह एक जघन्य अपराध है. वो आतंकियों को बिठाकर गाड़ी पर ले जा रहे थे, इसलिए उनके साथ आतंकी जैसा ही सलूक किया गया है.


खत्म नही शुरू हुई है अमेरिका के खिलाफ जंग : शबीह अहमद रिज़वी

खत्म नही शुरू हुई है अमेरिका के खिलाफ जंग : शबीह अहमद रिज़वी

13-Jan-2020

 आईआरजीसी के एक सीनियर कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अमीर अली हाजीज़ादे का कहना था कि अगर अमरीका जवाबी हमला करता तो ईरान के सैकड़ों मिसाइल फ़ायर के लिए तैयार थे।


एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अमरीकी लड़ाकू विमानों ने संयुक्त अरब इमारात स्थित सैन्य अड्डों से उड़ानें भी भरी थीं, लेकिन उन्होंने ईरान में किसी ठिकाने को निशाना बनाने की कोशिश नहीं की।

बुधवार की सुबह को ही ईरान के सुप्रीम लीडर ने अमरीकी ठिकानों पर मिसाइल हमलों को केवल एक तमांचा क़रार दिया था और चेतावनी दी थी कि असली जवाबी कार्यवाही अभी बाक़ी है।

ईरान के मिसाइल हमलों के जवाब में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का शांति संदेश केवल ईरान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए अप्रत्याशित था। इसलिए कि 3 जनवरी को मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद, ट्रम्प ने धमकी दी थी कि अगर ईरान ने कोई प्रतिक्रिया दिखाई तो अमरीका धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों समेत 52 ठिकानों को नष्ट कर देगा।

ईरान के मिसाइल हमलों ने जहां ट्रम्प को शांति की बात करने पर मजबूर कर दिया, वहीं मध्यपूर्व के उन देशों को भी जिनके यहां अमरीकी सैन्य अड्डे हैं और अमरीका उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन देता रहा है, यह संदेश दिया कि ईरान के ख़िलाफ़ अगर उनकी सीमाओं का इस्तेमाल हुआ तो वह भी ईरान के मिसाइलों की मार से नहीं बच सकेंगे।

ख़ास तौर से जब अमरीका अपने सैन्य ठिकानों की रक्षा नहीं कर सका तो उनकी रक्षा क्या करेगा।

पिछले 40 वर्षों से लगातार जारी प्रतिबंध और पिछले तीन वर्षों की ट्रम्प की अधिकतम दबाव की नीति ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर करने में फ़ेल रही है। उसके मिसाइलों की तेज़ धार और सटीक निशानों ने यह साबित कर दिया कि उसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ आग से खेलने की तरह है।

ईरान का अब अगला क़दम किया होगा?

यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि जनरल सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए मिसाइल हमले ईरान की जवाबी कार्यवाही का अंत नहीं हैं।

हालांकि अमरीकी हमले में शहीद होकर जनरल सुलेमानी ने आईआरजीसी की क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर के रूप में मेजर-जनरल के रैंक के स्तर से बहुत ऊपर उठकर नई ऊंचाईयों को छू लिया और ईरान के 3,000 साल के इतिहास में रुस्तम की तरह एक योद्धा और एक नायक होने का रैंक हासिल किया।

आज ईरान के हर घर, हर गली-कूचे, सड़क, चौराहे, स्कूल, कार्यालय और होटल के प्रवेश द्वार पर सुलेमानी का मुस्कुराता हुआ चेहरा मौजूद है। सादे कपड़ों में मुस्कुराता हुआ यह चेहरा हर ईरानी को शांति और बहादुरी का आभास कराता है। शहादत को गले लगाकर सुलेमानी ईरान के इतिहास में अमर हो गए हैं।

इसलिए, ईरान उनकी मौत को कभी भुला नहीं पाएगा। इसके अलावा, ट्रम्प ने जो बर्ताव उत्तर कोरिया के साथ किया है, वह या कोई दूसरा अमरीकी राष्ट्रपति ईरान के साथ उसे दोहराने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।

जनरल सुलेमानी के ख़ून ने अमरीकी साम्राज्य के अंत की दास्तान लिख दी है और अब अमरीका के पास मध्यपूर्व से उलटे पैर वापस लौटने के अलावा कोई चारा नहीं है।

 

 


मऊ के मोहम्दाबाद में सपा नेता की गोली मारकर हत्या

मऊ के मोहम्दाबाद में सपा नेता की गोली मारकर हत्या

12-Jan-2020

उत्तरप्रदेश में अपराध रोके नही रुक रहा है।
मऊ जिले के मोहम्मदाबाद क्षेत्र में अज्ञात हमलावरों ने रविवार सुबह खेत में जा रहे सपा नेता व पूर्व ग्राम प्रधान बिजली यादव की गोली मारकर हत्या कर दी।
सखवलिया गांव के पूर्व प्रधान 40 वर्षीय बिजली यादव सुबह खेत पर जा रहे थे। गुरुकुल स्कूल के पास अज्ञात हमलावारों ने उन्हें गोली मार दी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। घटना के बाद हत्यारे फरार हो गये। पुलिस मामले की तफ्तीश में लगी हुई है ।हत्या के कारण अभी स्पष्ट नहीं हो सके हैं।

 


विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनाएं

विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनाएं

10-Jan-2020

सैय्यद एम अली तक़वी (syedtaqvi12@gmail.com)

आज 10 जनवरी का दिन सभी देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए खास है क्योंकि आज के दिन पूरे विश्व में हिन्दी दिवस मनाया जाता है। विश्व हिन्दी दिवस की शुरुआत सन 2006 में हुई थी जब उस वक्त के तात्कालीन प्रधानमंत्री कांग्रेस के डॉ मनमोहन सिंह ने विश्व हिन्दी दिवस मनाने की घोषणा की थी उसी के बाद से यह प्रथा चलन में आई और अब हर साल 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है। इससे पहले सन 1975 में पहली बार आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में वर्ल्ड हिंदी कांफ्रेस का आयोजन किया गया था। इसके बाद भारत मॉरिशियस, यूके,यूएस में इसका आयोजन होने लगा।

विश्व हिन्दी दिवस मनाने के पीछे मकसद क्या है? इसका एकमात्र उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना है। मगर विश्व स्तर पर इसे बढ़ाने के लिए पहले अपने देश में हिंदी को बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि आज अगर देखा जाए तो हमारे देश में ही हिंदी प्रतिबंधित होती जा रही है। हर प्रदेश अपनी प्रादेशिक भाषा पर जोर देता है और अगर अलग अलग राज्यों में जैसे महाराष्ट्र, बंगाल, चेन्नई इत्यादि में हिंदी बोलता हुआ कोई नज़र आ जाता है तो उसे बेवकूफ समझा जाता है। यह कटु सत्य है। यहां हिंदी दिवस भी मनाया जाता है जो विश्व हिंदी दिवस से बिल्कुल भिन्न है। हिंदी दिवस भारत में 14 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिन 1949 को संविधान सभा ने पहली बार आधिकारिक भाषा के तौर हिंदी को अपनाया था। वहीं विश्व हिंदी दिवस का मुख्य उद्देश्य इसे विश्व स्तर पर पहचान दिलाना है।

हिंदी पूरी दुनिया में अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। दुनिया के 30 से अधिक देशों में हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जाती है। लगभग 100 विश्वविद्यालयों में उसके लिए अध्यापन केंद्र खुले हुए हैं। भारत के अलावा मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद एवं टोबैगो और नेपाल में भी हिंदी बोली जाती है। अमेरिका जैसे देश में भी लगभग 150 से ज्यादा शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। 2016 में डिजिटल प्लेटफार्म पर हिंदी भाषा में समाचार पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी, जो 2021 में बढ़कर 14.4 करोड़ के आसपास पहुंच जायेगी। दक्षिण प्रशांत महासागर क्षेत्र में फिजी नाम का एक द्वीप देश है, जहां हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है।

सिर्फ़ अपने ही देश में कुछ लोग क्षेत्रीय राजनीति करने के चक्कर में हिंदी को दबाने में लगे हैं। हालांकि बड़े बड़े महापुरुषों ने हिंदी की तारीफ की और महत्व को बताया है। भारत में 66 फीसदी लोग हिंदी बोलते हैं, जबकि 77  प्रतिशत लोग इसे समझ लेते हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है'। 
लाल बहादुर शास्त्री ने भी हिंदी के महत्व को समझाते हुए कहा था कि हिन्दी पढ़ना और पढ़ाना हमारा कर्तव्य है। उसे हम सबको अपनाना है। आज हमें हिंदी के महत्व को समझना होगा और इसको बढ़ाने का प्रयास करना होगा।

 


इमरजेंसी नहीं आई है, लेकिन जो आ चुका है वह जान लीजिए.

इमरजेंसी नहीं आई है, लेकिन जो आ चुका है वह जान लीजिए.

09-Jan-2020

जि हाँ यहाँ बात हो रही है CAA और NRC की 
1.कल लाजपतनगर में दो लड़कियों ने अपने घर के आगे एक पोस्टर भर लगाया कि वह NRC का सपोर्ट नहीं करतीं, एक भीड़ आई, घर घेर लिया, भारत माता की जय के नारे के साथ मारो-मारो चिल्लाने लगी, ताजा खबर ये है कि उन लड़कियों को घर छोड़कर इलाके से बाहर जाना पड़ गया है. ऐसा आपने पहले कभी सुना था? 

2. तमिलनाडु में कुछ लोगों ने अपने घर के आगे की सड़कों पर सिर्फ रंगोलियां बनाईं, 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, नए राजा के हिसाब से रंगोली बनाना भी अब अपराध है

3. S.R. दारापुरी, 70 साल के बुजुर्ग, रिटायर्ड IPS अपनी कॉलोनी में अपने घर के बाहर खड़े थे, सिर्फ एक कागज लेकर. जिसपर सिर्फ इतना लिखा- 'NO NRC'. पुलिस की जीप आई, घर से उठा ले गई, धाराएं लगीं, दंगा भड़काने की. और जेल में ठूंस दिया गया।

4. इतिहासकार रामचन्द्र गुहा बस एक कागज लेकर सड़क पर खड़े थे, उन्हें धक्का देते हुए पुलिस जेल ले गई, अब भारत में और सऊदी अरब में अंतर ढूंढते रहिए. 

5. BHU में बेहद शांतिपूर्ण तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे 25 छात्रों, प्रोफेसरों, पत्रकारों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया. ये याद रहे कि वहां किसी भी तरह की कोई हिंसा नहीं रही थी. साफ है दूसरा मत रखने पर आपको जेल मिलना तय है.

6. चंद्रशेखर आजाद क्या कर रहा था? क्या वह संविधान की प्रति लेकर भी इस देश में घूम नहीं सकता? डॉ. अंबेडकर के नारे नहीं लगा सकता? वह आजतक जेल में ही ठूंसा हुआ है। 

7. जेएनयू विश्वविद्यालय के बाहर मेन गेट को दो दिन तक एक भीड़ घेरे रही, जैसे कि कारसेवा के लिए आई हो, उसे किसी भी तरह की आलोचना पसन्द नहीं थी, उसे किसी भी तरह के नारे से दिक्कत थी, वह बस नौच लेना चाहते थे, कुचल देना चाहते थे। 
 
लोकतंत्र था, इमरजेंसी आ सकती थी, अब भीड़तंत्र है, भीड़तंत्र में इमरजेंसी घोषित करने की जरूरत ही नहीं रही. सुबह के अखबार, नागरिकों को जेल में डालने, उनपर हुए लाठीचार्ज की खबरों से अटे पड़े हुए हैं. किसी पत्रकार की हिम्मत नहीं है कि एक सवाल उठा सके. जिन्होंने उठाई भी थी, नौकरी से निकाल दिया गया, पुण्य प्रसून, मिलिंद, शर्मा, जैसे पत्रकारों को निकाले जाने के अनगिनत उदाहरण हैं. पीएमओ से लेकर गृहमंत्रालय तक सभी न्यूजचैनलों, अखबारों पर नजर बनाए हुए हैं, बराबर निर्देश दे रहे हैं कि क्या खबर चलेगी, क्या नहीं.

लेकिन ये इमरजेंसी नहीं है,आप टेंशन मत लीजिए.
मूंगफलियां भूनिए, व्हाट्सएप चलाइए...

Shyam Meera Singh


प्रोफेसर राबिन वर्मा को मिली नागरिक धर्म निभाने की सज़ा- इंसानी बिरादरी

प्रोफेसर राबिन वर्मा को मिली नागरिक धर्म निभाने की सज़ा- इंसानी बिरादरी

08-Jan-2020

( लखनऊ ब्यूरो )

लखनऊ, 8 जनवरी। प्रोफेसर राबिन वर्मा को आख़िरकार ज़मानत मिल गई। मिलनी ही थी। पहली सुनवाई में ही उनके वकील कमलेश के तर्कों के सामने पुलिस-प्रशासन की बोलती बंद हो गई। एक बार फिर साबित हो गया कि 19 दिसंबर की हिंसा के बहाने पुलिस ने किस तरह गरीब मुसलमानों के अलावा उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर भी निशाना साधा जो नागरिकता संशोधन क़ानून को विभाजनकारी और सांप्रदायिक मानते हैं।

प्रोफेसर राबिन को 20 दिसंबर की शाम भाजपा मुख्यालय के ठीक बगल स्थित जलपान की दूकान से उठाया गया था। वह अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू के रिपोर्टर ओमार राशिद के साथ थे। ओमार राशिद कश्मीरी हैं। उनके कश्मीरी चेहरे के आधार पर पुलिस ने उन्हें संदिग्ध माना। पूछताछ के नाम पर उनके साथ बदसलूकी की। 19 दिसंबर की हिंसा की साज़िश करने की तोहमत लगाते हुए उनका मोबाइल भी छीन लिया। प्रोफेसर राबिन ने इसका तीखा विरोध किया तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया। दोनों को हज़रतगंज कोतवाली ले जाया गया। इस बीच किसी तरह इस पुलिसिया करतूत की ख़बर बाहर आ गई। दबाव बना तो दो घंटे बाद ओमार राशिद को छोड़ दिया गया लेकिन राबिन को बिठाये रखा गया। लेकिन पुलिसिया रिपोर्ट में उनकी गिरफ़्तारी अगले दिन 21 दिसंबर को दिखाई गई और उसके अगले दिन उन्हें जेल भेज दिया गया।

पुलिस की ताल में ताल मिलाते हुए मीडिया के एक हिस्से ने राबिन को खलनायक के बतौर पेश कर दिया। झूठी ख़बर परोसी गई कि उन्होंने 19 दिसंबर की हिंसा की साज़िश रची, कि इसके लिए कश्मीर से पत्थरबाज़ बुलाये और उन्हें विभिन्न होटलों में ठहराने का बंदोबस्त किया, वगैरह-वगैरह। इस तरह उम्दा शिक्षक के साथ ही इंसाफ़ और इंसानियत के पैरोकार की उनकी उजली छवि को कलंकित किया गया। उन पर 18 संगीन धाराओं के तहत झूठा मुक़दमा दर्ज़ किया गया। यह रिहाई मंच को सबक़ सिखाने की भी कवायद थी जो योगी सरकार की जनविरोधी कार्रवाइयों के ख़िलाफ़ लगातार सवाल उठाता रहा है।

उधर शिया डिग्री कालेज ने प्रोफेसर राबिन को बिना देरी किए और बगैर उनका पक्ष जाने हिंसा में शामिल होने की पुलिसिया कहानी के आधार पर उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया। लेकिन यह बड़ी बात है कि दुख और मुसीबत की इस घड़ी में परिवार ने संयम नहीं खोया। मां विद्या देवी ने कहा कि उन्होंने अपने बच्चों को सच को सच और गलत को गलत कहना सिखाया। उन्हें गर्व है कि उनका बेटा हमेशा इसी सीख पर चला और इसके लिए जेल भी चला गया। उनकी ढाई साल की पोती अपने पिता को लगातार गायब देख ज़रूर गुमसुम रही। कोई तीन महीने का पोता भी पिता के प्यार से वंचित हो गया। ज़्यादा दुख इसी बात का है।   

इंसानी बिरादरी के दल ने प्रोफेसर राबिन के परिवार की इस समझ और बहादुरी को सलाम किया। भरोसा दिलाया कि इंसाफ़ की इस लड़ाई में परिवार अकेला नहीं है, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष लोग साथ खड़े हैं। इस दल में शिक्षक प्रवीण श्रीवास्तव, प्रबंधन के शोध छात्र सय्यद ज़ुल्फिकार और सृजनयोगी आदियोग शामिल थे।

 

 


JNU हिंसा : प्रोफेसर सीपी चंद्रशेखर ने सरकार की कमेटी से दिया इस्तीफा

JNU हिंसा : प्रोफेसर सीपी चंद्रशेखर ने सरकार की कमेटी से दिया इस्तीफा

07-Jan-2020

नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को हुई हिंसा के बाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सीपी चंद्रशेखर ने सरकार की कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। कमेटी की भारत के आर्थिक डेटा पर पर पहली समीक्षा बैठक होने वाली थी, लेकिन इस बैठक से पहले ही प्रोफेसर सीपी चंद्रशेखर ने इस कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। पिछले महीने मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लिमेंटेशन ने इकोनॉमिक स्टैटिस्टिक्स पर स्टैंडिंग कमेटी का गठन किया था, जिसकी कमान चीफ स्टैटिस्टिशयन प्रनब सेन कर रहे हैं।

कमेटी से इस्तीफा देने के बाद चंद्रशेखर ने कहा कि मुझे यह लगता है कि यह सरकार भारत की सांख्यिकीय प्रणाली को मजबूत करने को लेकर चिंतित नहीं है। जेएनयू में रविवार को जो घटना हुई उसने व्यवस्था में मेरे विश्वास को कम किया है। इस घटना से साफ है कि हम दूसरी दुनिया में जी रहे हैं , ऐसे उस सरकार के साथ काम करना मुश्किल है जिसपर से आपका भरोसा उठ चुका है। बता दें कि सरकार की यह कमेटी आज अपनी पहली समीक्षा बैठक करने वाली थी, जिसमे इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन के नवंबर 2019 के डेटा को तैयार करना था, साथ ही कमेटी के आगे के एजेंडे को तय करना था।


CAA  NRC को लेकर पूर्व न्यायाधीश कोलसे पाटिल ने मोदी सरकार पर हमला बोला!

CAA NRC को लेकर पूर्व न्यायाधीश कोलसे पाटिल ने मोदी सरकार पर हमला बोला!

06-Jan-2020

पूर्व न्यायाधीश, कोलसे पाटिल ने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को लेकर मोदी सरकार की कड़ी निंदा की। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान केंद्र सरकार जनता द्वारा नहीं बल्कि ईवीएम द्वारा चुनी गई है।

एंटी-सीएए रैली
विरोध रैली के दौरान, उन्होंने प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री, अमित शाह के खिलाफ नारे लगाए।
पाटिल ने लोगों को अपने घरों से बाहर आने के लिए कहा, उन्होंने कहा कि 80 वर्ष की आयु के बावजूद वह ऐसे व्यक्तियों के साथ खड़े रहेंगे।
पाटिल ने संघ परिवार पर हमला किया

अपने संबोधन को जारी रखते हुए उन्होंने संघ परिवार पर हमला किया। कांग्रेस के शासन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग पहले शासन करते थे, वे भी ‘हरिचंद’ नहीं थे।

उन्होंने आगे कहा कि उनकी नीतियों की विफलता के कारण भाजपा सत्ता में आई।

सीएए को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी कानून की अवज्ञा करने की जरूरत है। उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों को भी याद किया।

 


नागरिकता संशोधन कानून का विरोध  अपराध है ? शबीह अहमद रिज़वी ( लखनऊ),

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध अपराध है ? शबीह अहमद रिज़वी ( लखनऊ),

06-Jan-2020

यह किस सीआरपीसी और आईपीसी की किताब में है और सरकार के किस शासनादेश ने लिखा है यह बडा सवाल कल मजदूर किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष एसआर दारापुरी व सदफ जफर, पवन अम्बेडकर समेत अन्य की जमानत पर सुनवाई करते हुए माननीय अपर न्यायधीश लखनऊ ने इंसपेक्टर हजरतगंज व अमीनाबाद से पूछे। उन्होंने सीआरपीसी व आईपीसी के अंतर को बताने के लिए कोतवाल से पूछते हुए तल्खी से कहा कि क्या यदि 6 आदमी एक चाय की दुकान पर चाय पी रहे हो तो आप आईपीसी 144 में उन्हें गिरफ्तार कर लेंगे। कोतवाल व्दारा मंशा की बात उठाने पर कोर्ट ने कहा कि मंशा तय करने का पैमाना क्या है और जब तक कि कोई सीधे हिंसा में लिप्त नहीं है आप हर नागरिक को गिरफ्तार नहीं कर सकते। उन्होंने जब सरकारी वकील और कोतवाल से लिप्त लोगों की फोटो व सीसीटीवी फूटेज दिखाने की मांग की तो कोतवाल बोले कि सीसीटीवी फूटेज में धुंआ होने के कारण किसी का चेहरा अभी तक नहीं दिखा। एकमात्र पवन अम्बेडकर की जो फोटो कोर्ट को दिखाई गयी वह तख्ती लेकर सीएए के उनके विरोध की थी जिसे कोर्ट ने अपराध नहीं माना। हजरतगंज व अमीनाबाद थानों से बंद सभी लोगों की जमानत अदालत ने मंजूर कर ली। दारापुरी जी की तरफ से अधिवक्ता नितिन मिश्रा व कमलेश कुमार सिंह ने प्रबल पैरवी करते हुए कहा कि गम्भीर बीमारी से ग्रस्त दारापुरी जी तो 19 की रात पौने एक बजे जब लखनऊ जल रहा था लखनऊ वासियों से शांति की अपील अपने फेसबुक पर कर रहे थे जिसे कोर्ट ने संग्यान में लिया और जमानत दी।
    यह आरएसएस-भाजपा के दमन के खिलाफ लोकतंत्र की जीत है।

 


"कासिम सुलेमानी" की हत्या का दंश झेलेगा संपूर्ण विश्व

04-Jan-2020

______अजय श्रीवास्तव ______________________
आधी रात को इराक के बगदाद हवाईअड्डे से बाहर आते वक्त मेजर जनरल कासिम सुलेमानी जो ईरान की कुद्स फोर्स का प्रमुख था की कार पर अमेरिकी सैनिक ड्रोन से हमला करते हैं और उसकी कार को भारी गोलाबारूद से उडा दिया जाता है।सुलेमानी के साथ आठ और लोग मारे जाते हैं जो ईरान के महत्वपूर्ण पद पर थे।
सुलेमानी के साथ अल मुहांदिस जो एक काफिले के साथ बगदाद एयरपोर्ट पर सुलेमानी को रिसीव करने पहुँचा था।सुलेमानी का विमान लेबनान या सीरिया से आया था।
ड्रोन हमले में जनरल सुलेमानी के शरीर के चिथडे उड़ गए और उनके खंडित शव की पहचान उनके अंगुली में अंगुठी के साथ की गई।
आपरेशन को अंजाम देने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक ट्वीट किया जिसमें केवल अमेरिकी झंडा था।बाद में पेंटागन के अधिकारियों ने ईरान के सबसे शक्तिशाली जनरल कासिम सुलेमानी के मारे जाने की पुष्टि की।ईरान सरकार ने भी सुलेमानी की मौत की पुष्टि करते हुए कहा कि इसका बदला लिया जाएगा।
कुद्स फोर्स के कमांडर जनरल कासीम सुलेमानी को ईरान के सुप्रीम लीड़र आयतोल्लाह अली खुमैनी ने "अमर शहीद" का खिताब दिया और कहा कि जनरल की शहादत का बदला लिया जाएगा।
अब प्रश्न उठता है कि कौन है जनरल कासिम सुलेमानी जिसके पीछे अमेरिका लगभग तीस सालों से पड़ा था और उसकी मौत से ईरान इतना गमजदा क्यों है?
कासिम सुलेमानी का जन्म ईरान के सुदूरपूर्व दक्षिणपूर्व इलाके के एक गरीब परिवार में हुआ था।बीस साल की उम्र में वे ईरान की महत्वपूर्ण इस्लामिक रिवाँल्यूशनरी गार्ड में शामिल हुऐ फिर इन्होंने पटल कर नहीं देखा।अपनी चतुराई और लगन से वे लगातार आगे बढते चले गए।ईरान सरकार ने रिवाँल्यूशनरी गार्ड का गठन देश की सुरक्षा और विचारधारा को कडाई से लागू करने के लिए किया था।पड़ोसी इराक के साथ 1980 और 1988 में हुऐ युद्ध के दौरान रिवाँल्यूशनरी गार्ड के पास राजनीतिक और आर्थिक शक्तियां भी आई।इराक में हुए खूनी संघर्ष ने सुलेमानी को आगे बढ़ने में काफी मदद पहुँचाई।वे अपने रणकौशल से लगातार दुश्मनों को कुचलते रहे और आगे बढ़ते रहे।1990 के दशक के आखिरी सालों में उन्हें कुद्स गार्ड का चीफ बना दिया गया।कासिम सुलेमानी ने लेबनान में हिजबुल्लाह को बढावा दिया और ये आरोप उनपर कई बार लगे।
इराक में जनरल सुलेमानी की अहम भूमिका थी।बगदाद को इस्लामिक स्टेट के आतंक से बचाने के लिए उनके हीं नेतृत्व में ईरान समर्थक फोर्स का गठन हुआ था,जिसका नाम पापुलर मोबिलाइजेशन फोर्स था।सुलेमानी अमेरिका के कितने पूराने दुश्मन थे इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 1980 के दशक में ईरान और इराक के बीच खूनी जंग में उनकी भूमिका अहम थी।इस युद्ध में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का खूलकर साथ दिया था क्योंकि अमेरिका की नजर में ईरान उस समय उसका सबसे बड़ा शत्रु था।ईरानी क्रांति से पहले वहाँ अमेरिका का हीं दबदबा था।
आपको बता दें जनरल सुलेमानी को मरने को लेकर कई बार अफवाहें फैली हैं।इसमें 2006 के हवाई जहाज दुर्घटना में उत्तर-पश्चिमी ईरान में अन्य सैन्य अधिकारियों की मौत और 2012 में दमिश्क में बमबारी के बाद सीरियाई राष्ट्रपति बशर असद के शीर्ष सहयोगियों की हत्या शामिल थी।
आपको बता दें कि कुछ दिनों पहले लोगों की भीड़ ने इराक स्थित अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया था।इसके लिए अमेरिका ने इराक पर निशाना साधा था।अमेरिका के पास पक्की खबर थी कि इस हमले के पीछे कासिम सुलेमानी का दिमाग है।अमरीकी रक्षा विभाग की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि "सुलेमानी बीते 27 दिसंबर समेत,कई महीनों से इराक स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों पर हमलों को अंजाम देने में शामिल रहे हैं।इसके अलावा बीते हफ्ते अमरीकी दूतावास पर हुऐ हमलों को भी उन्होंने अपनी स्वीकृति दी थी।यह एयरस्ट्राइक भविष्य में ईरानी हमले की योजनाओं को रोकने के उद्देश्य से किया गया।अमरीका, चाहे जहाँ भी हो,अपने नागरिकों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कार्यवाही को करना जारी रखेगा।"
मध्यपूर्व की घटनाओं पर कडी नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि बोखलाहट में ईरान कुछ भी कर सकता है, जिससे स्थिति और बिगड़ेगी।अब अमेरिका के अलावा इजरायल भी हमले की जद में रहेगा।विशेषज्ञों ने अंदेशा जताया है कि इजरायल पर कोई भी कार्रवाई का मतलब वो एक के बदले दस हमला करेगा और फिर अरब-इजरायल युद्ध होने में देर नहीं लगेगी।इससे तृतीय विश्वयुद्ध के छिड़ जाने की काफी संभावना है।दो विश्व युद्ध के परिणाम विश्व भुगत चुका है और अगर अब विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो इसके अंजाम की कल्पना इंसान के बस में नहीं होगी।आज अधिकांश देश न्यूक्लियर पावर से लैस हैं और युद्ध के समय जरूर इसका प्रयोग होगा।मानव क्षति के अलावा बहुत सी ऐसी चीझें होंगी जिसे कोई याद करना नहीं चाहेगा।
कासिम सुलेमानी की मौत ने असर दिखाना शुरू कर दिया है।दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आया है।ब्रेंट क्रूड़ के दाम कुछ हीं मिनटों में 3 डाँलर बढ़कर 68 डाँलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है।ऐसे में मंहगे क्रूड़ आँयल का असर घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ेगा।पिछले एक हफ्ते में पेट्रोल के दाम करीब 1% तक बढ़ गए हैं।एक्सपर्ट बताते हैं कि भारत अपनी जरूरत का 80% कच्चा तेल विदेशी बाजारों से खरीदता है।ऐसे महंगा क्रूड़ अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाएगा।अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का खामियाजा भारत को भी भुगतना होगा।क्रूड़ आँयल की कमी से दाम बढ़ेंगे।ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनी नोमुरा के अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में 10 डाँलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत के राजकोषीय घाटे और करंट अकाउंट बैलेंस पर असर होता है।
अपने वफादार जनरल की शहादत से ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी बेहद खफा हैं और उन्होंने ईरान की जनता से कहा है कि कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लिया जाएगा और जल्द लिया जाएगा।अब ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान किस हद तक आगे जाता है और अमेरिका उ

 

 

 


 CAA - NRC  के खिलाफ  पटना में प्रदर्शन में शामिल हुए आमिर हंज़ला  की हत्या के आरोप में छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया !

CAA - NRC के खिलाफ पटना में प्रदर्शन में शामिल हुए आमिर हंज़ला की हत्या के आरोप में छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया !

03-Jan-2020

नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ पटना में प्रदर्शन में शामिल हुए आमिर हंज़ला  की हत्या के आरोप में छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। गिरफ़्तार लोगों में से दो आरोपी संदिग्ध हिंदू संगठनों से जुड़े हैं। युवक का शव प्रदर्शन के 10 दिन बाद 31 दिसंबर को मिला था और युवक को आख़िरी बार नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ आरजेडी के प्रदर्शन के दौरान हाथों में तिरंगा झंडा लिए देखा गया था। प्रदर्शन को ख़त्म करने के लिए जब पुलिस ने बल का प्रयोग किया था तब वह युवक वहाँ से जाने की कोशिश में था और इसी दौरान उसकी हत्या कर दी गई थी।

पुलिस ने कहा है कि फुलवारी शरीफ में बैग सिलाई का काम करने वाले 18 वर्षीय आमिर हंज़ला की हत्या के आरोप में हिंदू पुत्र संगठन के 23 वर्षीय नागेश सम्राट, हिंदू समाज संगठन के 21 वर्षीय विकास कुमार सहित छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने इसकी पुष्टि की है कि हिंदू पुत्र संगठन उन 19 संस्थाओं में से है जिसके कार्यालयों और इससे जुड़े लोगों के बारे में बिहार पुलिस की विशेष शाखा ने पिछले साल मई में ही जानकारी जुटाने के लिए पत्र भेजा था।

पुलिस हिंसा भड़काने में सम्राट और कुमार की भूमिका की भी जाँच कर रही है। पुलिस का कहना है कि यह जाँच की जाएगी कि आरजेडी के प्रदर्शन के आह्वान के बाद और प्रदर्शन से पहले फ़ेसबुक लाइव से प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने में इन दोनों का कितना हाथ रहा है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, फुलवारी शरीफ थाना प्रमुख रफिक़ुर रहमान ने कहा, ’21 दिसंबर को प्रदर्शन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का प्रयास करने वाले प्रमुख लोगों में ये दोनों युवा भी शामिल थे।’

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, उनमें से एक वीडियो में कुमार आरोप लगा रहा है कि पुलिस ‘हिंदुओं को प्रताड़ित’ करती है और ‘सभी हिंदू बेटों’ को ‘फुलवारी शरीफ़ में आने’ को कहते हुए देखा जा सकता है। एक अन्य वीडियो में सम्राट ने ख़ुद को ‘एक हिंदू का बेटा’ घोषित किया और कहा कि वह ‘फुलवारी थाना प्रमुख रहमान ने कहा, ‘हम इन दोनों संगठनों के शीर्ष अधिकारियों से सवाल करेंगे। ऐसे समूहों का रुझान बाहर से भीड़ जुटाने का रहा है। ये दोनों लड़के पटना के नहीं हैं। तीन साल पहले सांप्रदायिक तनाव के दौरान भी ऐसी ही भीड़ जुटी थी। हम और अधिक सबूत जुटा रहे हैं। हमारे पास एक मज़बूत केस है।’

उन्होंने कहा कि इन दोनों के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश रचने का केस लगाया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, फुलवारी शरीफ थाना प्रमुख रफिक़ुर रहमान ने कहा, ‘हमारी जाँच से पता चलता है कि पुलिस द्वारा हिंसक भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल के इस्तेमाल किए जाने के बाद आमिर हंज़ला वहाँ से जाने की कोशिश में था। आमिर को तब संगत गली इलाक़े में कुछ लड़कों ने पकड़ लिया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि ईंटों और अन्य भोथरी चीजों का इस्तेमाल उसे मारने के लिए किया गया था। सिर पर चोट के निशान थे और शरीर पर दो कट के निशान थे। पेट के हिस्से में काफ़ी ज़्यादा ख़ून जमा था जिससे पता चलता है कि अंदरूनी ख़ून का बहाव हुआ था।’

हंज़ला की हत्या मामले में गिरफ़्तार अन्य आरोपियों में दीपक महतो, छोटू महतो, सनोज महतो उर्फ ​​ढेलवा और रईस पासवान हैं। इन्हें पुलिस ने ‘ज्ञात अपराधी’ के रूप में बताया है। पुलिस ने कहा कि दीपक, छोटू और सनोज से उन्हें हंज़ला के शव के स्थान के बारे में पता चला।

पुलिस ने कहा कि हंज़ला 21 दिसंबर को अपनी बाइक से काम के लिए निकला था। लेकिन प्रदर्शन को देखते हुए उसकी यूनिट बंद थी और वह आरजेडी के प्रोटेस्ट मार्च में शामिल हो गया। पुलिस के अनुसार, वीडियो फ़ुटेज में दिख रहा है कि वह प्रदर्शन में हाथों में तिरंगा झंडा लिए चल रहा था। मोबाइल स्विच ऑफ़ होने से पहले उसकी लोकेशन फुलवारी शरीफ ब्लॉक ऑफ़िस के पास मिली। बाद में इसी क्षेत्र में उसके शव को पाया गया। हंज़ला के पिता ने 21 दिसंबर की रात को ही गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, हंज़ला के पिता सोहेल अहमद ने कहा कि यह पहली बार था कि किसी प्रदर्शन में शामिल होने के लिए वह गया था। वह पूछते हैं कि ‘उसकी क्या ग़लती थी? उसने तो हाथ में तिरंगा झंडा ले रखा था।’

हज़ेला का परिवार मूल रूप से दरभंगा का है और वह क़रीब आठ साल से किराए पर फुलवारी शरीफ में रह रहा है।

पहुँच गया है’। मीडिया इन पुट 


इंडोनेशिया : जकार्ता में बाढ़ से 16 लोगों की मौत, हजारों फंसे

इंडोनेशिया : जकार्ता में बाढ़ से 16 लोगों की मौत, हजारों फंसे

02-Jan-2020

मीडिया रिपोर्ट 

जकार्ता : इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में भीषण बाढ़ के कारण नए साल का जश्न गम में तब्दील हो गया और इसके कारण कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई और हजारों अन्य लोग विस्थापित हो गए. बाढ़ के कारण एक हवाईअड्डे को बंद करना पड़ा. राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण एजेंसी के प्रवक्ता अगुस विबोवो ने बृहस्पतिवार को बताया कि मानसून की बारिश और उफनती नदियों की वजह से कम से कम 169 इलाके जलमग्न हो गए. जकार्ता के बाहरी जिलों बोगोर एवं दीपोक जिलों में भूस्खलन हुआ.

उन्होंने बताया कि बाढ़ के कारण कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई। एजेंसी की ओर से जारी वीडियो और तस्वीरों में पानी में तैरती कारें दिखाई दे रही हैं. विबोवो ने बताया कि बाढ़ के कारण हजारों घर और इमारतें डूब गईं और प्राधिकारियों को बिजली और जलापूर्ति रोकनी पड़ी. उन्होंने बताया कि कुछ स्थानों पर बाढ़ के पानी के आठ फुट ऊपर तक पहुंच जाने के कारण 31000 से अधिक लोगों को अस्थायी आश्रयगृहों में शरण लेनी पड़ी. नागर विमानन के महानिदेशक पोलाना प्रमेस्ती ने बताया कि बाढ़ से जकार्ता हलीम पेरडानाकुस्माह घरेलू हवाईअड्डे का रनवे डूब गया और अधिकारियों को इसे बंद करना पड़ा.

 


पूर्वी कांगो में आतंकवादियों ने 20 लोगों की हत्या की

पूर्वी कांगो में आतंकवादियों ने 20 लोगों की हत्या की

31-Dec-2019

भाषा की खबर 

बेनी (डीआर कांगो) : अफ्रीकी देश कांगो के पूर्वी बेनी क्षेत्र में आतंकवादियों ने 20 लोगों की हत्या कर दी. स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि मूल रूप से पड़ोसी देश यूगांडा की इस्लामिक मिलिशिया एलाइड डेमोक्रेटिक फोर्सेज के लड़ाकों ने रविवार को बेनी क्षेत्र के मुख्य प्रशासनिक शहर ओइचा के पश्चिम में स्थित अपेटिना सना पर हमला किया.

बेनी के प्रशासक डोनट किबवाना ने कहा, ‘एडीएफ ने गत रात अपेटिना-सना पर हमला किया. उन्होंने 18 नागरिकों की हत्या कर दी.’ स्थानीय अधिकारियों ने हमले के बाद तलाश अभियान के दौरान दो और शव बरामद किए जिससे मृतकों की संख्या 20 हो गई है.

सेना ने 30 अक्टूबर को मिलिशिया के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई शुरू की थी जिसके बाद से लेकर अब तक एडीएफ के लड़ाकों ने 200 से अधिक लोगों की हत्याएं की हैं.


अखिलेश के विधायक सड़क पर उतरे

अखिलेश के विधायक सड़क पर उतरे

31-Dec-2019

सैय्यद क़ासिम

समाजवादी पार्टी  के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव  ने  आज एक बार फिर बीजेपी  सरकार पर निशाना साधा. सपा विधायकों को विधानसभा के लिए साइकिल से रवाना करने के बाद अखिलेश ने कहा कि बीजेपी अपने बहुमत की ताकत से लोकतंत्र को कुचल रही है. आप नागरिकता धर्म के आधार पर देना चाहते हैं. CAA, NRC, और NPR के विरोध में ये साइकिल यात्रा है. सरकार नाकामी छिपाने के लिए नए नए शिगूफे लाती है. जब आधार में सारी जानकारी है तब NPR की ज़रूरत क्या है? ये नाश करने वाली सरकार है.

अखिलेश यादव ने कहा "आप नागरिकता धर्म के आधार पर देना चाहते हैं, आप चाहते हैं कि मुसलमानों का नागरिकता न मिले. बीजेपी तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है. क्या असम और पूर्वोत्तर के लोग इस कानून से खुश हैं? आधार में सब मौजूद है. समाजवादी पार्टी सीएए, और एनआरसी और एनपीआर का विरोध करती है. भारत की अर्थव्यवस्था का नाश हो गया है. बैंकिग सिस्टम डूबा दिया. अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए आप ऐसा कर रहे हैं ।
देश का रंग तिरंगा ही रहेगा

भगवा पर बोलते हुए अखिलेश ने कहा, "पता नहीं कहां पर खलबली मची है. किसी का अधिकार थोड़े ही है. केवल रंग बदलने के लिए ऐसा किया जा रहा है. भगवा में ऐसा क्या है? पीताम्बर रंग भी है, लेकिन देश का रंग तिरंगा ही रहेगा. जाति के आधार पर जनगणना होनी चाहिए, ताकि अबादी के आधार पर सबको अधिकार मिले." अखिलेश यादव ने आगे कहा कि विधायक खुद जाना चाहते थे साइकिल से. आगे भी साइकिल चलेगी. साल का अंत हो गया है.

नए साल में अपने पापों की माफी मांगें नहीं तो जनता सजा देगी. पूरे यूपी की जनता जानती है कि कानून व्यवस्था इनके हाथ में नहीं हैं. निवेश नहीं आ रहा है इसलिए एनपीआर आ रहा है. निवेश नहीं आया इसलिए एनआरसी आ रहा है. हमारे देश की पहचान खराब हो रही है. देश की बदनामी हो रही है. कोई ग्लोबल निवेश नहीं आएगा.


अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कहा है कि राम मंदिर का काम जल्द शुरू होना चाहिए : बाबरी मस्जिद के पक्षकार इक़बाल अंसारी

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कहा है कि राम मंदिर का काम जल्द शुरू होना चाहिए : बाबरी मस्जिद के पक्षकार इक़बाल अंसारी

30-Dec-2019

बाबरी मस्जिद के पक्षकार इक़बाल अंसारी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कहा है कि राम मंदिर का काम जल्द शुरू होना चाहिए। इक़बाल अंसारी ने आगे कहा कि कोर्ट का निर्णय आ गया है , इसलिए अब राम मंदिर का काम जल्द शुरू हाे जाना चाहिए।

खास खबर प्र छपी खबर के अनुसार, धानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मिलकर राम मंदिर निर्माण के लिए हाथ बटाना चाहिए।
इक़बाल अंसारी ने कहा कि अयोध्या से दक्षिण की तरफ सरयू नदी है जिसकी दूरी मात्र 100 से डेढ़ सौ मीटर है। मंदिर के गेट के सामने से रेलवे स्टेशन की दूरी कम से कम 200 मीटर की है।
उनका यह भी कहना है कि वे चाहते हैं कि अयोध्या में अगर लोग आएं और अयोध्या स्टेशन पर उतरें तो वहीं से उनको राम मंदिर दिखाई दे जाए। राम मंदिर पर पहुंचें तो उन्हें सरयू नदी दिखाई दें।
इक़बाल अंसारी ने कहा कि इस तरह से राम मंदिर का निर्माण हो तो लोगों की चाहत भी पूरी होगी और अयोध्या का विकास भी होगा। इसलिए शीघ्र ही राम मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो जाना चाहिए।
अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्षकार इक़बाल अंसारी ने कहा कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं, हमने पहले भी कहा था कि अदालत का फैसला मानेंगे।