वृद्धों की उपेक्षा के गलत प्रवाह को रोके

वृद्धों की उपेक्षा के गलत प्रवाह को रोके

07-Aug-2021

विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस- 8 अगस्त 2021पर विशेष
वृद्धों की उपेक्षा के गलत प्रवाह को रोके

- ललित गर्ग -

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विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस का मनाने का मुख्य उद्देश्य संसार के बुजुर्ग लोगों को सम्मान देने के अलावा उनकी वर्तमान समस्याओं के बारे में जनमानस में जागरूकता बढ़ाना है। प्रश्न है कि दुनिया में वृद्ध दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई? क्यों वृद्धों की उपेक्षा एवं प्रताड़ना की स्थितियां बनी हुई है? चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि वृद्धों की उपेक्षा के इस गलत प्रवाह को रोके। क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल वृद्धों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है।
वृद्धावस्था जीवन की सांझ है। वस्तुतः वर्तमान के भागदौड़, आपाधापी, अर्थ प्रधानता व नवीन चिन्तन तथा मान्यताओं के युग में जिन अनेक विकृतियों, विसंगतियों व प्रतिकूलताओं ने जन्म लिया है, उन्हीं में से एक है वृद्धों की उपेक्षा। वस्तुतः वृद्धावस्था तो वैसे भी अनेक शारीरिक व्याधियों, मानसिक तनावों और अन्यान्य व्यथाओं भरा जीवन होता है और अगर उस पर परिवार के सदस्य, विशेषतः युवा परिवार के बुजुर्गों/वृद्धों को अपमानित करें, उनका ध्यान न रखें या उन्हें मानसिक संताप पहुँचाएं, तो स्वाभाविक है कि वृद्ध के लिए वृद्धावस्था अभिशाप बन जाती है। इसीलिए तो मनुस्मृति में कहा गया है कि-“जब मनुष्य यह देखे कि उसके शरीर की त्वचा शिथिल या ढीली पड़ गई है, बाल पक गए हैं, पुत्र के भी पुत्र हो गए हैं, तब उसे सांसारिक सुखों को छोड़कर वन का आश्रय ले लेना चाहिए, क्योंकि वहीं वह अपने को मोक्ष-प्राप्ति के लिए तैयार कर सकता है।”

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आधुनिक जीवन की विडम्बना है कि इसमें वृद्ध अपने ही घर की दहलीज पर सहमा-सहमा खड़ा है, उसकी आंखों में भविष्य को लेकर भय है, असुरक्षा और दहशत है, दिल में अन्तहीन दर्द है। इन त्रासद एवं डरावनी स्थितियों से वृद्धों को मुक्ति दिलानी होगी। सुधार की संभावना हर समय है। हम पारिवारिक जीवन में वृद्धों को सम्मान दें, इसके लिये सही दिशा में चले, सही सोचें, सही करें। इसके लिये आज विचारक्रांति ही नहीं, बल्कि व्यक्तिक्रांति की जरूरत है। अपेक्षा इस बात की भी है कि वृद्ध भी स्वयं को आत्म-सम्मान दें। जेम्स गारफील्ड ने वृद्धों से अपेेक्षा की है कि यदि वृद्धावस्था की झुरियां पड़ती है तो उन्हें हृदय पर मत पड़पे दो। कभी भी आत्मा को वृद्ध मत होने हो।’
विश्व में इस दिवस को मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, परन्तु सभी का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि वे अपने बुजुर्गों के योगदान को न भूलें और उनको अकेलेपन की कमी को महसूस न होने दें। हमारा भारत तो बुजुर्गों को भगवान के रूप में मानता है। इतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण है कि माता-पिता की आज्ञा से भगवान श्रीराम जैसे अवतारी पुरुषों ने राजपाट त्याग कर वनों में विचरण किया, मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार ने अपने अन्धे माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर चारधाम की यात्रा कराई। फिर क्यों आधुनिक समाज में वृद्ध माता-पिता और उनकी संतान के बीच दूरियां बढ़ती जा रही है?
हकीकत तो यह है कि वर्तमान पीढ़ी अपने आप में इतनी मस्त-व्यस्त है कि उसे वृद्धों की ओर ध्यान केन्द्रित करने की फुरसत ही नहीं है। आज परिवार के वृद्धों से कोई वार्तालाप करना, उनकी भावनाओं की कद्र करना, उनकी सुनना, कोई पसन्द ही नहीं करता है. जब वे उच्छृखल, उन्मुक्त, स्वछंद, आधुनिक व प्रगतिशील युवाओं को दिशा-निर्देशित करते हैं, टोकते हैं तो प्रत्युत्तर में उन्हें अवमानना, लताड़ और कटु शब्द भी सुनने पड़ जाते हैं। इन्हीं त्रासद स्थितियों को देखते हुए डिजरायली ने कहा था कि यौवन एक भूल है, पूर्ण मनुष्यत्व एक संघर्ष और वार्धक्य एक पश्चात्ताप।’
यथार्थ है कि पीढ़ी-अन्तराल के कारण, पश्चिमी रंग ढंग के कारण, तथाकथित आधुनिक जीवनशैली और नवीन सोच के कारण भी पुरानी और नई पीढ़ी में टकराव दृष्टिगोचर हो रहा है। आज हम बुजुर्गों एवं वृद्धों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के साथ-साथ समाज में उनको उचित स्थान देने की कोशिश करें ताकि उम्र के उस पड़ाव पर जब उन्हे प्यार और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तो वो जिंदगी का पूरा आनंद ले सके। वृद्धों को भी अपने स्वयं के प्रति जागरूक होना होगा।
वृद्ध समाज इतना कुंठित एवं उपेक्षित क्यों है, एक अहम प्रश्न है। अपने को समाज में एक तरह से  निष्प्रयोज्य समझे जाने के कारण वह सर्वाधिक दुःखी रहता है। वृद्ध समाज को इस दुःख और संत्रास से छुटकारा दिलाने के लिये ठोस प्रयास किये जाने की बहुत आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुव्र्यवहार और अन्याय को समाप्त करने के लिए और लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाने का निर्णय लिया। यह सच्चाई है कि एक पेड़ जितना ज्यादा बड़ा होता है, वह उतना ही अधिक झुका हुआ होता है यानि वह उतना ही विनम्र और दूसरों को फल देने वाला होता है, यही बात समाज के उस वर्ग के साथ भी लागू होती है, जिसे आज की तथाकथित युवा तथा उच्च शिक्षा प्राप्त पीढ़ी बूढ़ा कहकर वृद्धाश्रम में छोड़ देती है।
तथाकथित व्यक्तिवादी एवं सुविधावादी सोच ने समाज की संरचना को बदसूरत बना दिया है। सब जानते हैं कि आज हर इंसान समाज में खुद को बड़ा दिखाना चाहता है और दिखावे की आड़ में बुजुर्ग लोग उसे अपनी शान-शौकत एवं सुंदरता पर एक काला दाग दिखते हैं। आज बन रहा समाज का सच डरावना एवं संवेदनहीन है। आदमी जीवनमूल्यों को खोकर आखिर कब तक धैर्य रखेगा और क्यों रखेगा जब जीवन के आसपास सबकुछ बिखरता हो, खोता हो, मिटता हो और संवेदनाशून्य होता हो। डिजरायली का मार्मिक कथन है कि यौवन एक भूल है, पूर्ण मनुष्यत्व एक संघर्ष और वार्धक्य एक पश्चाताप।’ वृद्ध जीवन को पश्चाताप का पर्याय न बनने दे।
कटू सत्य है कि वृद्धावस्था जीवन का अनिवार्य सत्य है। जो आज युवा है, वह कल बूढ़ा भी होगा ही, लेकिन समस्या की शुरुआत तब होती है, जब युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों को उपेक्षा की निगाह से देखने लगती है और उन्हें अपने बुढ़ापे और अकेलेपन से लड़ने के लिए असहाय छोड़ देती है। आज वृद्धों को अकेलापन, परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षा, तिरस्कार, कटुक्तियां, घर से निकाले जाने का भय या एक छत की तलाश में इधर-उधर भटकने का गम हरदम सालता रहता। वृद्धों को लेकर जो गंभीर समस्याएं आज पैदा हुई हैं, वह अचानक ही नहीं हुई, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति तथा महानगरीय अधुनातन बोध के तहत बदलते सामाजिक मूल्यांे, नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन आने, महंगाई के बढ़ने और व्यक्ति के अपने बच्चों और पत्नी तक सीमित हो जाने की प्रवृत्ति के कारण बड़े-बूढ़ों के लिए अनेक समस्याएं आ खड़ी हुई हैं। इसीलिये सिसरो ने कामना करते हुए कहा था कि जैसे मैं वृद्धावस्था के कुछ गुणों को अपने अन्दर समाविष्ट रखने वाला युवक को चाहता हूं, उतनी ही प्रसन्नता मुझे युवाकाल के गुणों से युक्त वृद्ध को देखकर भी होती है, जो इस नियम का पालन करता है, शरीर से भले वृद्ध हो जाए, किन्तु दिमाग से कभी वृद्ध नहीं हो सकता।’ वृद्ध लोगों के लिये यह जरूरी है कि वे वार्धक्य को ओढ़े नहीं, बल्कि जीएं।
एक आदर्श एवं संतुलित समाज व्यवस्था के लिये अपेक्षित है कि वृद्धों के प्रति स्वस्थ व सकारात्मक भाव व दृष्टिकोण रखे और उन्हें वेदना, कष्ट व संताप से सुरक्षित रखने हेतु सार्थक पहल करे। वास्तव में भारतीय संस्कृति तो बुजुर्गों को सदैव सिर-आँखों पर बिठाने और सम्मानित करने की सीख देती आई है। अगर परिवार के वृद्ध कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं, रुग्णावस्था में बिस्तर पर पड़े कराह रहे हैं, भरण पोषण को तरस रहे हैं, तो यह हमारे लिए लज्जा का विषय है। वृद्धों को ठुकराना, तरसाना, सताना, भत्र्सनीय भी है और अक्षम्य अपराध भी। सामाजिक मर्यादा, मानवीय उद्घोष व नैतिक मूल्य हमें वृद्धों के प्रति आदर, संवेदना व सहानुभूति-प्रदाय की शिक्षा देते हैं। यथार्थ तो यह है कि वृद्ध समाज, परिवार और राष्ट्र का गौरव है।
प्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई पी एक्सटेंसन, पटपड़गंज
 दिल्ली-110092
फोन:-22727486, मोबाईल:- 9811051133

 


 
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क्राउडफंडिंग की ओर बढ़ते भारत के कदम

क्राउडफंडिंग की ओर बढ़ते भारत के कदम

05-Aug-2021

क्राउडफंडिंग की ओर बढ़ते भारत के कदम
-ललित गर्ग-
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भारत में क्राउडफंडिंग का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, विदेशों में यह स्थापित है, लेकिन भारत के लिये यह तकनीक एवं प्रक्रिया नई है, चंदे का नया स्वरूप है जिसके अन्तर्गत जरूरतमन्द अपने इलाज, शिक्षा, व्यापार, सेवा-परियोजना आदि की आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सकता है। न केवल व्यक्तिगत जरूरतों के लिये बल्कि तमाम सार्वजनिक योजनाओं, धार्मिक कार्यों और जनकल्याण उपक्रमों को पूरा करने के लिए लोग इसका सहारा ले रहे हैं। भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में इसका प्रयोग अधिक देखने में आ रहा है। अभावग्रस्त एवं गरीब लोगों के लिये यह एक रोशनी बन कर प्रस्तुत हुआ है।
 क्राउडफंडिंग की क्या ताकत होती है उसे अयांश गुप्ता की कहानी से समझ सकते हैं। अयांश की उम्र 3 साल है। वह रेयर जेनेटिक डिस्ऑर्डर स्पाइनल मस्कुलर एट्रोपी, टाइप 1 नाम की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित था। 22 करोड़ की बड़ी राशि वाले इलाज के लिए मां-पिता के पास पैसे नहीं थे। फिर क्राउंडफंडिंग से यह राशि जुटाकर एक इंजेक्शन लगाया गया। अयांश के इलाज के लिए केंद्र सरकार ने भी मदद की। उन्होंने 6 करोड़ रुपए का आयात शुल्क माफ कर दिया, अब अयांश ठीक है। अयांश के लिए कई बॉलीवुड हस्तियां और क्रिकेटर भी शामिल हुए। इम्पैक्टगुरु डॉट कॉम के सह-संस्थापक और सीईओ पीयूष जैन के अनुसार क्राउडफंडिंग की पावर देखकर खुशी होती है। अयांश को बचाने के लिए बड़ी संख्या में डोनेटर सामने आए। एक व्यक्ति ने तो सबसे ज्यादा 56 लाख रुपए का दान दिया।
क्राउडफंडिंग को भारत में स्थापित करने एवं इसके प्रचलन को प्रोत्साहन देने के लिये क्राउडफंडिंग मंच इम्पैक्ट गुरु डाॅट काॅम एवं ऐसे ही अन्य मंचों के प्रयास उल्लेखनीय है। असाध्य बीमारियों एवं कोरोना महामारी के पीडितों के महंगे इलाज के कारण गरीब, अभावग्रस्त एवं जरूरतमंद रोगियों की क्राउडफंडिंग के माध्यम से चिकित्सा में सहायता के अनूठेे कीर्तिमान स्थापित हुए हैं। बीमा एवं आयुष्मान भारत योजना के होते हुए भी आज अनेक रोगियों को अपेक्षित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही है, वे महंगे इलाज के चलते अनेक आर्थिक संकटों का सामना कर रहे हैं, उनके लिये क्राउडफंडिंग एक बड़ा सहारा बना है। क्राउडफडिंग अब लोगों के लिए गंभीर बीमारी बिलों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का एक पसंदीदा माध्यम बन गया है। अस्पतालों में बीमा के निम्न स्तर एवं जटिल प्रक्रियाओं को देखते हुए इसका प्रयोग एवं प्रचलन अधिक होने लगा है।
भारत में हर छोटी-बड़ी जरूरतों के लिये अब क्राउडफंडिंग का सहारा लिया जा रहा है। आने वाले समय में क्राउडफंडिंग न केवल जीवन का हिस्सा बनेगा बल्कि अनेक बहुआयामी योजनाओं को आकार देने का आधार भी यही होगा। आम नागरिक को चिकित्सा सेवा और जनकल्याण के कार्यों के लिये क्राउडफंडिंग को बढ़ावा देना चाहिए। भारत में सरकारी अस्पतालों को निजी अस्पतालों की तुलना में अधिक सक्षम बनाने की जरूरत है, तभी हम वास्तविक रूप में महंगे चिकित्सा की खामियों का वास्तविक समाधान पा सकेंगे लेकिन इसके साथ-साथ क्राउडफंडिंग के माध्यम से जरूरतमंद एवं गरीब रोगियों की सहायता को भी प्रोत्साहन देने की जरूरत है। अवगत हो क्राउडफंडिंग, चिकित्सा खर्च के लिए ऑनलाइन धन जुटाने का एक वैकल्पिक तरीका है। रोगी के दोस्त या परिवार के सदस्य एवं दानदाता मुख्य रूप से सोशल मीडिया नेटवर्क पर भरोसा करते हुए संबंधित चिकित्सा बिलों के धन का दान करते हैं। क्राउडफंडिंग का अतिरिक्त लाभ यह है कि मरीजों को उस धनराशि को वापस नहीं करना पड़ता है क्योंकि ऑनलाइन प्रदान किया गया धन दान है न कि ऋण।
इम्पैक्ट गुरु फाउंडेशन ने अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के साथ साझेदारी में अपनी अलग तरह की एक अनूठी सामाजिक प्रभाव परियोजना ‘एंजल रुथैंक ए नर्स’ की घोषणा करते हुए संकल्प व्यक्त किया गया कि अगले कुछ वर्षों में पूरे भारत में एक लाख से अधिक नर्सों को सशक्त बनाया जायेगा। एंजल का मतलब एडवांस नर्सेज की ग्रोथ, एक्सीलेंस एंड लर्निंग है। हमारी नर्सें कोरोना महामारी में बहुत लंबे समय तक जान को जोखिम में डालकर, भारी सुरक्षात्मक पीपीई गियर पहनकर, असुविधा में रहकर, खुद को अपने परिवार से अलग रखकर, निरन्तर अपनी सेवाएं देती रही है और यह करते हुए उन्होंने कोई शिकायत नहीं की एवं आशा नहीं खोयी-उन्होंने हर चुनौती का जोरदार मुस्कान के साथ सामना किया है, चाहे परेशानी एवं बीमारी कितनी भी गंभीर क्यों न रही हो। वास्तव में उनकी निःस्वार्थता एवं सेवाभावना ने उन्हें रोगियों के लिए स्वर्गदूत बनाया है, एक फरिश्ते के रूप में वे जीवन का आश्वासन बनकर प्रस्तुत हुई है और उनका बलिदान उन्हें देश के लिये कोविड योद्धा बनाया है।
ऐसी अग्रणी एवं प्रथम पंक्ति की कोविड़ योद्धाओं के उन्नत भविष्य एवं कौशल विकास के लिये क्राउडफंडिंग सहारा बन रहा है, यह स्वागतयोग्य है। कोरोना महामारी में उन्होंने अपना पारिवारिक सुख, करियर, जीवन, और वर्तमान सबकुछ झांेक दिया था। अब कुछ दानदाता उनकी अनूठी एवं निःस्वार्थ सेवाओं के बदले वापस कुछ लौटाने  और उनका भविष्य उन्नत करने के उद्देश्य से प्रारंभ किये जा रहे ‘एंजल रुथैंक ए नर्स’ कार्यक्रम में सहयोगी बन रहे हैं।  इस महत्वपूर्ण परियोजना का उद्देश्य नर्स समुदाय को, जिसने महामारी में अपना सब कुछ दिया है, उनके उन्नत भविष्य के लिये वापस देना है। यह एक अनूठा अवसर है जब भारत में क्राउडफंडिंग के माध्यम से नर्सों के समग्र कौशल विकास एवं उनके ज्ञान को अधिक मानवीय बनाने के लिये एक बहुआयामी योजना आकार लेने जा रही है, भारत में क्राउडफंडिंग के बढ़ते प्रचलन से इस योजना की आर्थिक जरूरतों के लिये जन-अनुदान प्राप्त होगा।
क्राउडफडिंग के माध्यम से नर्सों के उत्थान एवं उन्नयन के जो प्रयत्न हो रहे हैं, ऐसे ही प्रयत्न प्रतिभाशाली गरीब बच्चों की शिक्षा एवं पीड़ित महिलाओं के लिये भी अपेक्षित है। ‘लेडी विद द लाइट’ के रूप में जो नर्सें कोरोना पीडितों के साथ जान को जोखिम में डालकर वार्ड़ों में पूरी रात देखभाल करती रही है, घंटों उनके साथ बिताती रही हैं, उनके पास जाती रही है, उनके स्वस्थ होने के समग्र प्रयास करती रही है, ऐसी मानवीय सेवा की अद्भूत फरिश्तों के लिये क्राउडफडिंग के सहारे से दूरगामी एवं मानवीय सोच से जो योजना प्रस्तुत की है, उससे निश्चित ही नर्सों की सेवाएं अधिक सक्षम, प्रभावी एवं मानवीय होकर सामने आयेगी।
हमारे देश में क्राउडफंडिंग के माध्यम से करोड़ों रूपयों की चिकित्सा सहायता एवं अन्य जरूरतों के लिये आर्थिक संसाधन जुटाये जाने लगा हैं। केवल चिकित्सा के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी क्राउडफंडिंग का प्रचलन बढ़ रहा है। भारत के सुनहरे भविष्य के लिए क्राउडफंडिंग अहम भूमिका निभा सकती है। क्योंकि क्राउडफंडिंग से भारत में दान का मतलब सिर्फ गरीबों और लाचारों की मदद करना समझते आ रहे हैं जबकि अब कला, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा और मनोरंजन को समृद्ध करने का भी सशक्त माध्यम है। ऐसा होने से क्राउडफंडिंग की उपयोगिता एवं महत्ता सहज ही बहुगुणित होकर सामने आयेंगी।                                          
प्रेषक
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


दस वर्ष की बालिका से दुष्कर्म के बाद हत्या !

दस वर्ष की बालिका से दुष्कर्म के बाद हत्या !

04-Aug-2021

दस वर्ष की बालिका से दुष्कर्म के बाद हत्या !

विदिशा। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के शमशाबाद थाना क्षेत्र में दस वर्ष की बालिका की हत्या कर दी गयी है। आशंका है कि उसके साथ दुष्कर्म भी किया गया। पुलिस सूत्रों के अनुसार डाबरी गांव निवासी एक महिला जंगल करौंदे तोड़ने गयी थी। पीछे पीछे उसकी दस वर्षीय पुत्री भी चली गयी, लेकिन वह रास्ता भटक गयी और मां तक नहीं पहुंच पायी। इस बीच उसकी खोजबीन शुरू हुयी और शाम को उसका शव एक पेड़ पर लटका हुआ मिला। सूत्रों ने कहा कि सूचना मिलते ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की। लड़की का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। इसकी रिपोर्ट के आधार पर घटना के वास्तविक कारणों का पता लगने की संभावना है। इस बीच पुलिस को उम्मीद है कि वह शीघ्र ही आरोपी तक पहुंच जाएगी। 


मोदी मतलब मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया, शैली स्मृति व्याख्यान में बोले संजय पराते

मोदी मतलब मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया, शैली स्मृति व्याख्यान में बोले संजय पराते

03-Aug-2021

मोदी मतलब मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया, शैली स्मृति व्याख्यान में बोले संजय पराते

शैली स्मृति व्याख्यान में बोले संजय पराते : मोदी मतलब मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया, कार्पोरेटी हिंदुत्व लोकतांत्रिक भारत की हत्या कर रहा है, लोकतंत्र को लाठीतंत्र में बदल रहा है*

"कार्पोरेटी हिंदुत्व लोकतांत्रिक भारत की हत्या कर रहा है। संवैधानिक मूल्यों को ध्वस्त किया जा रहा है। असहमति रखने वाले व्यक्तियों और संगठनों को फासीवादी औजारों से खामोश किया जा रहा है, समाज के लोकतांत्रिक माहौल - डेमोक्रेटिक स्पेस - को ख़त्म किया जा रहा है।" यह बात संजय पराते ने 19वें शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यानमाला में बोलते हुए कही।  उन्होंने कहा कि जो भी जायज बात रखता है या उठाता है, उसे नक्सल या पाकिस्तानी करार देकर निशाने पर ले लिया जा रहा है और जेलों में डाला जा रहा है। बस्तर में आम तौर पर सलवा जुड़ूम अभियान के दौरान आदिवासियों पर हुए अत्याचार और विशेष रूप से सारकेगुड़ा और हाल ही में सिलगेर में हुए जन संहार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए न्याय पाना अंतहीन प्रतीक्षा का मामला बन गया है, जो किसी भी सभ्य समाज और लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी तरह सरगुजा में आदिवासियों ने संविधान की मुख्य बातों को पत्थर पर उकेर कर शिलालेख बनाये थे, जिसे भाजपा के राज में तोड़ने का अभियान चलाया गया था। अब छत्तीसगढ़ के नौजवान संविधान में लिखी बातों को पोस्टर की तरह हाथ में लेकर जलूस निकालते हैं और अपने संवैधानिक अधिकारों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।

उक्त विचार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के पाक्षिक 'लोकजतन' द्वारा फेसबुक पर आयोजित एक व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। यह व्याख्यानमाला मप्र माकपा के पूर्व सचिव शैलेन्द्र शैली की स्मृति में हर वर्ष 24 जुलाई से 7 अगस्त तक आयोजित किया जाता है। इस वैचारिक आयोजन के 7वें दिन *"बस्तर से सरगुजा तक : स्थगित संविधान, निलंबित लोकतंत्र"* विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की दो-तिहाई से आबादी गरीबी रेखा के नीचे बसर करती है। खाद्य सुरक्षा, मनरेगा और न जाने किन-किन मामलों में देश भर में अव्वल प्रदेश होने का दावा करने वाले छग में भूख से मौतों की घटनाएं इन दावों की सचाई बयान करती हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की बुरी हालत के चलते एक ओर जहां कोरोना में सरकारी दावे से कई गुनी मौतें हुयी, वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों ने जमकर लूट मचाई और एक एक मरीज से लाखों वसूले। खुद सरकार द्वारा तय की गयी दरें भी अनाप-शनाप हैं।  

मोदी शब्द की व्याख्या 'मर्डर ऑफ डेमोक्रेटिक इंडिया' के रूप में करते हुए संजय पराते ने कहा कि सरकारें चाहें भाजपा की हों या कांग्रेस की, कारपोरेट की लूट के रास्ते आसान करने और उसके लिए लोकतंत्र को लाठीतंत्र में बदलने के लिए दोनों ही तत्पर हैं। इसके खिलाफ यदि आदिवासी आवाज उठाते है, तो सिलगेर जैसे काण्ड करके उन्हें गोलियों से भून दिया जाता है। असली सवालों को हल करने के बजाय वे दोनों राम वन पथ गमन को ढूंढने के लिए करोड़ो रूपये फूंक रहे हैं और गाँव-गाँव में रामायण बंटवाकर और जबरिया उसका पाठ करवा कर, आदिवासियों की संस्कृति नष्ट कर उन्हें हिन्दू बनाने पर तुले हैं।  गाय के बहाने दलितों पर और धर्मांतरण के बहाने ईसाइयों पर हमले बढ़े हैं। बुनियादी समस्या या मांगों को उठाने पर उन्हें सुधा भारद्वाज की तरह जेल में डाले रखना या स्टेन स्वामी की तरह सांस्थानिक हत्या का शिकार बनाना आम रवैया है। बोधघाट परियोजना का उदाहरण देते हुए पराते ने कहा कि असली इरादा किसी भी तरह कारपोरेट के मुनाफे बढ़ाने का है। जंगलों के विनाश पर सहज आक्रोश व्यक्त करने पर आदिवासी दमन का शिकार बनाये जा रहे हैं। असली लड़ाई इस शुद्ध तानाशाही से है।  

संजय पराते ने कहा कि उदारीकरण के दौर में, आजादी के बाद की चिंतन प्रणाली को सबसे पहले नष्ट किया गया।  कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ने रोजी-रोटी छीनने और आदिवासी गरिमा को कुचलने का रास्ता अख्तियार किया है। सलवा जुडूम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस निर्णय में कहा गया था कि "क्या सत्ताधारी नीति निर्माता भारत के संविधान से संचालित हो रहे हैं?" इसका जवाब "नहीं"में देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि "यह विकास आतंकवाद है। यह वैश्वीकरण की लागत गरीबों पर थोपकर इसका फ़ायदा कार्पोरेट्स को पहुंचाना है। प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर, उन पर कारपोरेट का कब्जा कराकर दरबारी पूँजीवाद के लिए आदिवासियों की बलि ली जा रही है।"

माकपा नेता ने आदिवासियों को सभ्य बनाने के दावे को धूर्तता बताते हुए कहा कि सभ्यता का कोई एक पैमाना नहीं हो सकता -- संस्कृतियों को नष्ट कर एक तरह की संस्कृति थोपकर तथाकथित एकरूपी सभ्यता नहीं गढ़ी जा सकता।

अभी तक दस हजार से ज्यादा लोग उनका व्याख्यान सुन चुके हैं। उन्होंने अपने इस व्याख्यान को प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और दिवंगत स्टेन स्वामी को समर्पित किया है। यह व्याख्यान इस लिंक पर सुन देख-सुन सकते है : https://www.facebook.com/Lokjatan/

*(लोकजतन की ओर से संजय पराते 094242-31650 द्वारा जारी)*


आदिवासी  विधायक  बृहस्पति सिंह को सार्वजनिक माफ़ी माँगने पर मजबूर क्यों किया गया  ?

आदिवासी विधायक बृहस्पति सिंह को सार्वजनिक माफ़ी माँगने पर मजबूर क्यों किया गया ?

30-Jul-2021

आदिवासी विधायक बृहस्पति सिंहको सार्वजनिक माफ़ी माँगने पर मजबूर क्यों किया गया  ?

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर से कांग्रेस विधायक बृहस्पति सिंह के काफिले पर शनिवार (24 जुलाई) शाम को अंबिकापुर में हुए हमले पर अभी भी मामला थमता नज़र नहीं आ रहा है हमारे सरगुजा बयूरो की रिपोर्ट के अनुसार आदिवासी विधायक बृहस्पति सिंहपर को  आज  शोसल मीडिया में पुरे समय ट्रोल किया जाता रहा है जाहिर है दबंगई दिखाने का पूरा मामला है क्योकि पूरा सरगुजा जनता है की सरगुजा में एक तरफ़ा दबंगई किसकी चलती है ,हमला करने वाले की पहचान होने के बाद इसे राजनैतिक रंग देने की कोशिश की जाती रही है क्योकि विधायक और उनके सुरक्षा कर्मियों पर हमला 

भी हो जाती है और वह प्रदेश के एक कद्दावर मंत्री का भतीजा निकलता है ? क्या ये प्री प्लानिंग घटना नहीं  कही जाएगी जबकि वाहनों को ओवरटेक करने से नाराज एक युवक ने विधायक बृहस्पति सिंह की कार की विंडशील्ड तोड़ दी और सुरक्षा कर्मियों को गालियां दीं क्या इसे दबंगाई नहीं कहेंगे 
बलरामपुर से कांग्रेस विधायक बृहस्पति सिंह ने संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि 'वे महाराजा हैं और सीएम बनने के लिए मेरी हत्या भी करवा सकते हैं।
इसके बाद शुरू होता है एक आदिवासी विधायक पर जोर दार तरीके से दबाव बनाने का सिलसिला और पॉवर पॉलिटक्स क्योकि बाबा कई दिनों से मौके पर छक्का मरने के इंतज़ार में थे और मौका मिल ही गया चलते विधानसभा सत्र में  इस गैर मामूली घटना को बड़ा बना दिया गया कहने को तो मामले का पटाक्षेप हो गया है ऐसा कहा जा रहा है लेकिन हकीकत इससे कहीं पर है ,एक आदिवासी विधायक को अपमानित किया गया है  एक तरफ जहां सरगुजा महाराज अपने पर लगे आरोपों को लेकर अभी खींझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनके ही समर्थक सोशल मीडिया पर विधायक को धमकियां दे रहे हैं।
राजनीतिक प्रेक्षकों का यह मानना है कि पूरी घटना से कांग्रेस पार्टी को नुक़सान ही होगा। एक आदिवासी विधायक के साथ बाबा ( टी एस ) के नगर में उनके भतीजे ने हमले की नीयत से घटना घटित की। आदिवासी विधायक को न्याय मिलने के बजाय बाबा समर्थकों ने विधायक को पार्टी से निष्कासन का नोटिस दिला दिया। गरीब विधायक को उल्टे सार्वजनिक माफ़ी माँगने को मजबूर कर दिया। वैसे राजनैतिक गलियारों में तो ये भी चर्चा है की सारा खेल बाबा के किसी ख़ास ने रचा है जो सरकार में जिम्मेदार पद पर है 

 


भिक्षा मांगने की त्रासदी को जीना राष्ट्रीय शर्म है

भिक्षा मांगने की त्रासदी को जीना राष्ट्रीय शर्म है

30-Jul-2021

भिक्षा मांगने की त्रासदी को जीना राष्ट्रीय शर्म है
 - ललित गर्ग -

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एक आदर्श शासन व्यवस्था की बुनियाद होती है समानता, स्वतंत्रता, भूख एवं गरीबी मुक्त शांतिपूर्ण जीवनयापन। राष्ट्र एवं समाज में भूख एवं गरीबी की स्थितियां एक त्रासदी है, विडम्बना है एवं दोषपूर्ण शासन व्यवस्था की द्योतक है। आजादी के बहत्तर वर्षों के बाद भी यदि भीख मांगने एवं भिखारियों के परिदृश्य देखने को मिलते हैं, तो यह शर्मनाक है। इन शर्म की रेखाओं का कायम रहना हमारी शासन व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग है, शर्म की इन रेखाओं को तोड़ने के लिए जिस श्रेष्ठ संवेदना का प्रदर्शन देश की सर्वोच्च अदालत ने किया है, वह न केवल स्वागत-योग्य है, बल्कि अनुकरणीय भी है। अदालत ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह सड़कों से भिखारियों को हटाने के मुद्दे पर तथाकथित धनाढ्य एवं सम्पन्न वर्ग का नजरिया नहीं अपनाएगी, क्योंकि भीख मांगना एक सामाजिक और आर्थिक समस्या एवं विवशता है। न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम. आर. शाह की बेंच ने कहा कि वह सड़कों और सार्वजनिक स्थलों से भिखारियों को हटाने का आदेश नहीं दे सकती, यह कहकर अदालत ने शर्मी और बेशर्मी दोनों को मिटाने, भूख, गरीबी का संबोधन मिटाने की दिशा में सार्थक पहल की है।
अदालत ने भिखारियों एवं भीख मांगने की विवशता को भोग रहे लोगों के दर्द को समझा है। उसने इन शर्मनाक स्थितियों के कायम रहने के कारणों की विवेचना करते हुए कहा कि शिक्षा और रोजगार की कमी के चलते बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही लोग आमतौर पर भीख मांगने को मजबूर हो जाते हैं। अदालत का इशारा साफ था कि भीख मांगने पर प्रतिबंध लगाने की बजाय भीख मांगने के कारणों को मिटाने पर ध्यान देना होगा। विदित हो कि याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा इस उम्मीद से खटखटाया था कि सर्वोच्च अदालत सड़कों-चैराहों पर लोगों को भीख मांगने से रोकने के लिए कोई आदेश या निर्देश देगी। अदालत ने समस्या की व्याख्या जिस संवेदना एवं मानवीयता के साथ की है, वह गरीबी हटाने की दिशा में आगे के फैसलों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। अदालत ने पूछा कि आखिर लोग भीख क्यों मांगते हैं? गरीबी के कारण ही यह स्थिति बनती है।
एक आजाद मुल्क में, एक शोषणविहीन समाज में, एक समतावादी दृष्टिकोण में और एक कल्याणकारी समाजवादी व्यवस्था में यह भूख एवं भिक्षा मांगने की त्रासदी को जीना ऐसी बेशर्मी की रेखा है जिसे मिटाना हमारे शासन-व्यवस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए। यह रेखा सत्ता एवं शासन के कर्णधारों के लिए ”शर्म की रेखा“ होनी ही चाहिए, जिसको देखकर उन्हें शर्म आनी ही चाहिए। कुछ ज्वलंत प्रश्न है कि जो रोटी नहीं दे सके वह सरकार कैसी? जो अभय नहीं बना सके, वह व्यवस्था कैसी? जो इज्जत, स्नेह एवं दो वक्त की रोटी नहीं दे सके, वह समाज एवं शासन कैसा? अगर तटस्थ दृष्टि से बिना रंगीन चश्मा लगाए देखें तो हम सब गरीब एवं भिक्षुक हैं। गरीब, यानि जो होना चाहिए, वह नहीं हंै। जो प्राप्त करना चाहिए, वह प्राप्त नहीं है। एक तरफ अतिरिक्त संसाधनों का अम्बार है तो दूसरी ओर भूख एवं गरीबी है, दो वक्त की रोटी जुटाने के लिये सड़कों-चैराहों पर हाथ फैलाने की विवशता है।
अदालत ने समस्या की व्याख्या जिस संवेदना एवं मानवीयता के साथ की है, वह गरीबी हटाने की दिशा में आगे के फैसलों के लिए मील का पत्थर साबित होगी। अदालत ने पूछा कि आखिर लोग भीख क्यों मांगते हैं? गरीबी, अभाव एवं सरकार की असंतुलन नीतियों के कारण ही यह स्थिति बनती है। आज की कूटनीति की यह बड़ी हैरत और आश्चर्य की बात है कि वह भूख को नहीं भिखारी को, गरीबी को नहीं गरीब को मिटाने की योजनाएं लागू करती है। वह यह सोचने में बहुत अच्छा लगता है कि सड़कों पर कोई भिखारी न दिखे, लेकिन सड़कों से भिखारियों को हटाने से क्या गरीबी दूर हो जाएगी? क्या जो लाचार हैं, जिनके पास आय का कोई साधन नहीं, जो दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहे हैं, क्या उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा? गरीबी से भी ज्यादा भयावह है भूख एवं भीख मांगने की स्थितियां।
भले ही सरकार भी ऐसे लोगों को गरीब मानती है जिनकी वार्षिक आय सरकार के निर्धारित आंकड़ों से कम हो। लेकिन जिनकी आय का कोई जरिया ही न हो, उनके लिये सरकार ने क्या श्रेणी निर्धारित की है? बुद्धिजीवी हर आदमी को, यहां तक कि हर देश को, तुलनात्मक दृष्टि से गरीब मानते हैं। दार्शनिक गरीब उसको मानता है जो भयभीत है, जो थक गया है, जो अपनी बात नहीं कह सकता। साधारण आदमी, झोंपड़ी में रहने वाले को, अभाव एवं भूख को जीने वाले को गरीब और महल में रहने वाले को अमीर मानता है। खैर! यह सत्य है कि भिखारी की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। तब भीख एवं भिखारी की रेखा क्या? क्यों है? किसने खींची यह लक्ष्मण रेखा, जिसको कोई पार नहीं कर सकता। जिस पर सामाजिक व्यवस्था चलती है, जिस पर राजनीति चलती है, जिसको भाग्य और कर्म की रेखा मानकर उपदेश चलते हैं। वस्तुतः ये रेखाएं तथाकथित गरीबों, भूखों ने नहीं खींचीं। आप सोचिए, भला कौन दिखायेगा अपनी जांघ। यह रेखाएं उन्होंने खींची हैं जो अपनी जांघ ढकी रहने देना चाहते हैं। इस रेखा (दीवार) में खिड़कियां हैं, ईष्र्या की, दम्भ की, अहंकार की। पर दरवाजे नहीं हैं इसके पार जाने के लिए। अब अदालत इसके पार जाने का रास्ता बना रही है तो यह उसकी जागरूकता है, मानवीय सोच है।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील चिन्मय शर्मा से यह भी कहा कि कोई भीख नहीं मांगना चाहता। मतलब, सरकार को भीख मांगने की समस्या से अलग ढंग एवं ईमानदार तरीके से निपटना होगा। इसमें कोई शक नहीं कि सरकार असंख्य भारतीयों तक नहीं पहुंच पा रही है। मुख्यधारा से छिटके हुए वंचित लोग भीख मांगने को विवश हैं। ऐसे लोगों तक जल्दी से जल्दी सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचना चाहिए। जहां तक चैराहों पर भीख की समस्या है, तो स्थानीय प्रशासन इस मामले में कदम उठा सकता है। सड़क पर भीख मांगने वालों को सचेत किया जा सकता है कि वे किसी सुरक्षित जगह पर ही भीख मांगने जैसा कृत्य करें। भीख मांगना अगर सामाजिक समस्या है, तो समाज को भी अपने स्तर पर इस समस्या का समाधान करना चाहिए। समाज के आर्थिक रूप से संपन्न और सक्षम लोगों को स्थानीय स्तर पर सरकार के साथ मिलकर भीख जैसी मजबूरी एवं त्रासदी का अंत करने के लिये पहल करना चाहिए।
कोरोना महामारी के मद्देनजर भिखारियों और बेघर लोगों के पुनर्वास और टीकाकरण का आग्रह करने वाली एक याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी करके उचित ही जवाब मांगा है। इस याचिका की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उसमें महामारी के बीच भिखारियों और बेघर लोगों के पुनर्वास, उनके टीकाकरण, आश्रय व भोजन उपलब्ध कराने का प्रशंसनीय आग्रह किया गया है। भीख मांगने वाले और बेघर लोग भी कोरोना महामारी के संबंध में अन्य लोगों की तरह चिकित्सा एवं अन्य सुविधाओं के हकदार हैं। केंद्र सरकार के साथ तमाम राज्य सरकारों को स्वास्थ्य और रोजगार का दायरा बढ़ाना चाहिए, ताकि जो बेघर, निर्धन हैं, उन तक मानवीयता का एहसास पुरजोर पहुंचे एवं एक आदर्श समाज संरचना का सूर्योदय हो। प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92


कोरोना का ऐसा डर 15 महीने से खुद को घर में ही लॉक करलिया था परिवार पुलिस की मदद से बहार निकला !

कोरोना का ऐसा डर 15 महीने से खुद को घर में ही लॉक करलिया था परिवार पुलिस की मदद से बहार निकला !

29-Jul-2021

कोरोना का ऐसा डर 15 महीने से खुद को घर में ही लॉक करलिया था परिवार पुलिस की मदद से बहार निकला !

देश दुनिया से जहां हर रोज़ कोविड-19 के नियमों के पालन की धज्जियां उड़ाने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। वहीं आंध्र प्रदेश के एक गांव से नियमों के पालन का अनोखा किस्सा सामने आया है। संक्रमण की चैन तोड़ने के लिए घर पर ही रहने की सलाह को एक परिवार ने इतना सीरियसली ले लिया कि एक टेंट हाउस में खुद को लॉक कर लिया| 15 महीनों बाद बुधवार को पुलिस द्वारा परिवार के सदस्यों को रेस्क्यू किया गया। कदली गांव के सरपंच के अनुसार गांव में चुट्टुगल्ला बेनी, उनकी पत्नी और दो बच्चों का परिवार रहता है। वे कोरोना से काफी डरे हुए थे और करीब 15 महीनों से खुद को घर में अंदर से बंद कर लिया था। सरपंच गुरुनाथ के अनुसार यह मामला तब सामने आया जब गांव के वालंटियर परिवार के सदस्यों के अंगूठे का निशान लेने के लिए उनके घर गए| क्योंकि उन्हें एक आवास स्थल आवंटित किया गया था।

जब वालंटियर द्वारा परिवार के सदस्यों को आवाज़ दी गई तो उन्होंने यह कहकर बाहर आने से इनकार कर दिया कि अगर वे बाहर आए तो मर जाएंगे। इसके बाद वालंटियर ने सरपंच को मामले की जानकारी दी। इसके बाद पुलिस को बुलाया गया| पुलिस टीम की मदद से परिवार के सदस्यों को तुरंत एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया, यहां उनका इलाज चल रहा है। गुरुनाथ ने बताया कि परिवार के सदस्य अपने टेंट हाउस के अंदर ही पेशाब या शौच कर रहे थे| अगर वे दो-तीन दिन और अंदर रहते तो उनकी मृत्यु हो सकती थी। आंध्र प्रदेश में अब तक संक्रमण के 19 लाख 46 हज़ार 749 मामले दर्ज किए गए हैं, और अब तक कुल बीमारी के कारण 13,197 मौतें हुई हैं। बुधवार को राज्य में 2,527 नए मामले सामने आए, 2,412 ठीक हुए और 19 मौतें हुईं।


ममता के विपक्षी एकता के प्रयासों की जमीन

ममता के विपक्षी एकता के प्रयासों की जमीन

28-Jul-2021

ममता के विपक्षी एकता के प्रयासों की जमीन
- ललित गर्ग -

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तृणमूल कांग्रेस की सुप्रिमो ममता बनर्जी इनदिनों दिल्ली में हैं और वे अभी से साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के सन्दर्भ में विभिन्न राजनीतिक दलों को संगठित करने एवं महागठबंधन की संभावनाओं को तलाशने में जुटी हंै। माना जा रहा है कि वो ऐसे दलों को एक मंच पर साथ लाने की कोशिश में लगी हैं, जिनके समान विचार हैं, समान लक्ष्य हैं और जो नरेन्द्र मोदी सरकार को बेदखल करना चाहते हैं। विपक्षी एकता की संभावनाओं को आकार देेने एवं उससे भारत की राजनीति में बड़े बदलाव को देखने की आशा करते हुए ममता विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रमुखों से मिल रही हैं, उनके इन प्रयासों के गहरे राजनीतिक निहितार्थ है। लोकतन्त्र में राजनीतिक परिस्थितियां प्रायः बदलती रहती हैं, इन्हीं बदलाव की आहट को ममता शायद देख भी पा रही हैं और सुन भी पा रही हैं। भले विपक्षी एकता अभी दिवास्वप्न हो, असंभव प्रतीत हो, लेकिन लोकतंत्र में कुछ भी संभव है। यदि ऐसा संभव हुआ तो यह भारतीय जनता पार्टी की सशक्त जमीन में सेध लगाना होगा। लेकिन ऐसा होना संभव नहीं लग रहा है, क्योंकि भाजपा की जमीन बहुत मजबूत हो चुकी है, बिना ठोस नीति एवं नीयत के नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह से मुकाबला करना आसान नहीं है।
विपक्षी एकता को बल देने के इरादे से किये जा रहे प्रयासों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कितना सफल होंगी, यह समय ही बताएगा, लेकिन उन्हें जिस तरह विपक्षी दलों को गोलबंद करने वाली संभावित नेता के तौर पर देखा जा रहा है, वह कांग्रेस की दयनीय दशा को बयान करने के लिए पर्याप्त है। राष्ट्रीय दल होने के नाते विपक्षी एकता का जो काम कांग्रेस को करना चाहिए, वह यदि किसी क्षेत्रीय दल को करना पड़ रहा है तो इससे कांग्रेसी नेतृत्व की कमजोरी का ही पता चलता है। लोकतंत्र में राष्ट्रीय दल कांग्रेस का लगातार निस्तेज होते जाना शुभ नहीं है। क्या जो काम कांग्रेस नहीं कर सकी, उसे तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी कर सकेंगी? इस सवाल का जवाब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि वह राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिचय दे पाती हैं या नहीं?
क्षेत्रीय दलों के नेताओं और विशेषतः ममता के साथ यह एक बुनियादी समस्या है कि वे अपने राज्य के आगे और कुछ देख ही नहीं पाती है। राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर उनका रवैया संकीर्णता से भरा और राष्ट्रहित की अनदेखी करने वाला है। ममता से जुड़ी एक और विडंबना है कि वह राष्ट्रीय नेता तो बनना चाहती हैं, साथ ही साथ बंगाल में बढ़ती हिंसा, अराजकता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के अवमूल्यन की घटनाओं से स्वयं को दोषमुक्त साबित करती रहती है। ममता बनर्जी की मानें तो बंगाल में चुनाव बाद कहीं कोई राजनीतिक हिंसा नहीं हुई और इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट फर्जी है। ममता चाहे जो दावा करें, लेकिन हिंसा एवं अराजकता की राजनीति से उनकी साख गिरी है, राजनीतिज्ञों की साख गिरेगी तो राजनीति की साख बचाना भी आसान नहीं होगा। हमारे पास राजनीति ही समाज की बेहतरी का भरोसेमंद रास्ता है इसकी साख गिराने वाले कारणों में हिंसा, अपराधीकरण एवं साम्प्रदायिकता के बाद बेवजह की कीचड़ उछाल का भी है। ये चारों ही राजनीति के औजार नहीं हैं, इसलिये राजनीति को तबाही की ओर ले जाते हैं। ममता बंगाल को जिस तरह संचालित कर रही हैं, उससे यह नहीं लगता कि वह राष्ट्रीय राजनीति को कोई सही दिशा एवं दशा दे सकेंगी।
प्रांतीय राजनीति एवं केन्द्र की राजनीति का गणित भिन्न होता है। विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की शानदार जीत से उत्साहित तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में कुछ अनोखा घटित कर सकेगी, इस विश्वास के साथ उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्षी एकता का आह्वान किया है। लेकिन उनकी राजनीति सोच एवं दिशाओं में इतना दम दिखाई नहीं देता कि वे विपक्षी नेताओं से मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के वास्ते एकजुट होने और ’गठबंधन’ के गठन की दिशा में कुछ सार्थक कर सकने में सफल हो सके।
जाहिर है, आज यदि तृणमूल कांग्रेस को मोदी और अमित शाह की बीजेपी का सामना करते हुए प्रभावी राष्ट्रीय स्थान पाना है तो उसे विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व तीनों स्तरों पर परिवर्तन करना होगा। इसमें नेतृत्व की भूमिका सर्वोपरि होगी। बड़ा प्रश्न है कि विपक्षी महागठबन्धन का नेतृत्व कौन करेगा? इस नेतृत्व के रूप में ऐसा व्यक्तित्व चाहिए, जो वर्तमान भारत की बदली हुई मनोदशा और मोदी के कारण पैदा हुई राजनीतिक परिस्थिति को समझे और उसके अनुरूप सभी स्तरों पर विपक्षी एकता का निर्माण करें। महागठबंधन में इतनी समझ हो कि योग्य और सक्षम व्यक्तियों का चयन कर सामूहिक नेतृत्व विकसित करे।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विपक्षी एकता के मजबूत होने का अर्थ है लोकतंत्र का मजबूत होना। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्षी दलों का सशक्त होना जरूरी है, भारत दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय लोकतन्त्र कहलाता है, अतः इसमें जो भी बदलाव आता है वह जनता जनार्दन की इच्छा एवं अपेक्षाओं के वशीभूत ही होता है। जनता ही है जो राजनीतिक दलों की भूमिका बदलती रहती है। इसलिए ममता जो भी प्रयास कर रही हैं वह लोकतन्त्र में और अधिक जिम्मेदारी पैदा करने व जवाबदेह बनाने के लिए ही होने चाहिए। विपक्षी एकता तभी प्रभावी और सार्थक हो सकती है जब वह आम आदमी से जुड़े वास्तविक मुद्दों को उभार सके। आम जनता की समस्याओं के समाधान के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को मजबूती दे सके।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने निश्चित रूप से ममता की ताकत को दिखाया है और उसी के बल पर विपक्षी खेमे का हौसला बढ़ा है। ममता अपने बल पर 2024 लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ़ बीजेपी और एनडीए को हराने का सपना यदि पालती है तो यह अतिश्योक्ति ही कही जायेगी। लोकसभा चुनाव से पहले यूपी एवं अन्य प्रांतों के विधानसभा चुनाव में खासी जोर-आजमाइश होगी और भविष्य की विपक्षी एकता की तस्वीर भी सामने आयेगी। विपक्षी दलों की ताकतें जो बीजेपी को सत्ता से बाहर देखना चाहती हैं, अगर आपस में संवाद और समन्वय के सूत्र मजबूत करने में जुटती हैं तो वे मिलकर भविष्य की राजनीति में बड़ा बदलाव करने का माध्यम बन जाये, इसमें आश्चर्य की कोई बात भले न हो, महत्वपूर्ण जरूर है।
 अक्सर ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों का बड़ा नतीजा निकलता आया है। दिक्कत बस यह है कि विपक्ष की एकजुटता या उनमें समन्वय का लक्ष्य महज बातचीत से हासिल नहीं होने वाला, उसके लिये त्याग, दूरगामी सोच, ठोस मुद्दे एवं राजनीतिक परिवक्वता जरूरी है। इस प्रक्रिया में शामिल तमाम छोटी-छोटी पार्टियां और नेता अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन का विस्तार करने एवं अपनी जमीन को मजबूत करने में जुटे रहने से यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। उन्हें विपक्षी एकता को मजबूती देने का मकसद भी साथ में लिए चलना होगा। एक मुख्य पहलु है कि विपक्षी एकता का रथ केन्द्र में सत्ता परिवर्तन कर सकता है तो वह है कांग्रेस को इस विपक्षी एकता का आधार बनाना। अन्यथा त्रिकोणात्मक राजनीति का लाभ भाजपा को ही मिलेगा।
विपक्षी दलों के महागठबन्धन का नेतृत्व कांग्रेस यदि करती है तो वह अपनी खोयी जमीन को पुनः पा सकती है। असल में 2013 से कांग्रेस की पराजय का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो कभी थमा ही नहीं। सबसे लंबे समय तक देश का शासन चलाने वाली पार्टी को लगातार दो लोकसभा चुनावों में विपक्ष का नेता पद पाने लायक सीटें भी न मिलें तो हताशा स्वाभाविक है। इस हताशा एवं निराशा को दूर करने एवं विपक्षी एकता को सार्थक करने के लिये कांग्रेस को आगे आना चाहिए, ममता की तुलना में उसका नेतृत्व अधिक प्रभावी हो सकता है। महागठबंधन की सफलता इसी बात पर निर्भर है कि इसमें ठोस विकल्पों की जनता के सामने प्रभावी प्रस्तुति होनी चाहिए। ममता को महागठबंधन की संभावनाओं से पहले जनता से जुड़े ठोस मुद्दों की तलाश करनी चाहिए। यही वह राह है जिस पर चलकर विपक्षी एकता सफल भी हो सकती है और सार्थक भी। इसी से लोकतंत्र को मजबूती भी मिल सकती है। प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92


 


बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर महामारी का असर

बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर महामारी का असर

27-Jul-2021

बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर महामारी का असर
- ललित गर्ग-

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कोरोना महामारी के कारण बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य सर्वाधिक प्रभावित हुआ है। ज्यादातर राज्यों में जहां सवा साल से स्कूल बंद पड़े हंै, वहीं अस्पतालों में कोरोना पीड़ितों के दबाव के कारण बच्चों का इलाज प्रभावित हुआ है, उन्हें समुचित चिकित्सा सुविधाएं सुलभ नहीं हो पायी है। महामारी के दौरान दो करोड़ तीस लाख बच्चों को डीटीपी का टीका नहीं लग पाया है, जो चिंताजनक स्थिति है। छोटे बच्चों को डिप्थीरिया, टिटनेस और पर्टुसिस (काली खांसी) से बचाने के लिए ये टीके जीवन रक्षक हैं। डीटीपी टीकाकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पोलियो, चेचक जैसी बीमारियों से बचाने वाले टीके हैं। दुनिया में आबादी का बड़ा हिस्सा खासतौर से बच्चे पहले ही कुपोषण से जूझ रहे हैं। ऐसे में अगर बच्चे को जीवन रक्षक टीके नहीं लग पायेंगे तो बच्चे कैसे स्वस्थ कैसे जीयेंगे? महामारी ने बच्चों की जिन्दगी को बदलकर रख दिया है, स्वास्थ्य खतरों में धकेल दिया है।

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पिछले सवा साल के दौरान न केवल लोगों की आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक जिन्दगी गहरे रूप में प्रभावित हुई है, बल्कि बच्चों पर इसका घातक असर भी पड़ा है। घर से पढ़ाई ने बच्चों पर काफी असर डाला है। पहली कक्षा से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई आॅनलाइन चलती रही। यह मजबूरी भी थी। हालांकि आॅनलाइन कक्षाओं और परीक्षाओं का प्रयोग बहुत सीमा तक कामयाब नहीं कहा जा सकता। ज्यादातर लोगों के पास आॅनलाइन शिक्षा के बुनियादी साधन जैसे स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, लैपटाॅप और इंटरनेट आदि उपलब्ध ही नहीं थे। ऐसे में विद्यार्थियों का बड़ा वर्ग शिक्षा से वंचित भी रहा। ऐसे विद्यार्थियों की तादाद भी कम नहीं होगी जो आधे-अधूरे मन से आॅनलाइन व्यवस्था को अपनाने के लिए मजबूर हुए। जिन बच्चों ने पूरी तरह आनलाइन शिक्षा को अपनाया है, उन पर तरह-तरह के शारीरिक एवं मानसिक दबाव बने हैं। स्कूल बंद होने के कारण स्कूल जाने वाले 33 फीसदी बच्चे प्रभावित हुए हैं। यूनिसेफ के मुताबिक वैश्विक स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पोषण, स्वच्छता या पानी की पहुंच के बिना गरीबी में रहने वाले बच्चों की संख्या में 15 फीसदी की वृद्धि होने की आशंका है।
एक सर्वे में खुलासा किया गया है कि ऑनलाइन पढ़ाई के कारण बच्चों के देखने और सुनने की क्षमता प्रभावित हुई है। बच्चों को मोबाइल एडिक्शन हो रहा है। वो अब अकेले रहना अधिक पसंद कर रहे हैं, कुंठित है। बच्चों का रुझान अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स की ओर अधिक हो गया है। कोरोना काल में एक ओर जहां सभी को अपने रहने और काम करने की तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है तो वहीं बच्चों की पढ़ाई पर भी इस संकट का बहुत गहरा असर पड़ा है। बच्चों के हाथों में अब कॉपी किताब से अधिक फोन, आईपैड या कंप्यूटर होता है। बदले शिक्षा के स्वरूप ने न केवल बच्चों को बल्कि शिक्षकों को भी ऊब एवं नीरसता दी है।
अनेक राज्यों ने अब स्कूलों को खोलने का इरादा बना लिया है। कुछ राज्यों ने तो पहले ही बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को स्कूल आने की अनुमति दे दी थी। कोरोना महामारी के मामले कम पड़ जाने के साथ ही राज्यों ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। यह जरूरी भी था। राजस्थान, ओड़िशा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पंजाब आदि राज्यों में जल्दी ही स्कूली गतिविधियां प्रारंभ होने जा रही है। हरियाणा में बड़ी कक्षाएं तो पहले ही शुरू हो चुकी थीं, अब आठवीं तक की कक्षा के विद्यार्थियों के लिए भी स्कूल खोल दिए हैं। महाराष्ट्र में तो पंद्रह जुलाई से स्कूल खुल चुके हैं।
तीसरी लहर की संभावनाओं के बीच स्कूलों का खुलना पूर्णतः सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह तो तय है कि जैसे ही स्कूल खुलेंगे, विद्यार्थियों की भीड़ बढ़ेगी। और इसी के साथ तीसरी लहर का खतरा भी मंडरायेगा। पूर्णबंदी खत्म होने के बाद चरणबद्ध तरीके से काफी हद तक प्रतिबंध हटाए जा चुके हैं। दफ्तरों से लेकर बाजार तक खुल गए हैं। जिम, सिनेमाघर, होटल, रेस्टोरंेट, पर्यटन स्थल भी चालू हो चुके हैं। ऐसे में स्कूलों को भी अब और लंबे वक्त तक बंद रखना न तो संभव है, न ही व्यावहारिक। हालांकि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने प्राथमिक स्कूलों को पहले खोले जाने की सलाह दी है। इसके पीछे वैज्ञानिक दलील यह है कि कोरोना विषाणु जिस एस रिसेप्टर के जरिए कोशिकाओं से जुड़ता है, वह बच्चों में कम आता है। इससे छोटे बच्चों में कुदरती तौर पर खतरा कम रहता है। चैथे सीरो सर्वे से इसकी पुष्टि हुई है। जो हो, स्कूलों को खोलने से पहले बच्चों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि और बड़ा संकट खड़ा न हो जाए।
शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के इलाज को भी सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है। गौरतलब है कि सवा साल में महामारी ने दुनिया को हिला दिया। अभी भी इससे मुक्ति के आसार नहीं है। ऐसे में सभी देशों का जोर फिलहाल महामारी को नियंत्रित करने पर ही है। कई महीनों तक तो अस्पतालों में कोरोना पीड़ितों के कारण दूसरी गंभीर बीमारियों के इलाज भी नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में बच्चों के लिए दूसरे जरूरी टीकों का अभियान बुरी तरह से प्रभावित होना ही था। दरअसल किसी भी देश में टीकाकरण जैसे अभियान तभी सफल हो पाते हैं जब उसके पास पहले ही से स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत ढांचा हो। भारत जैसे देश में स्वास्थ्य सेवाएं कितनी बदहाल हैं, यह महामारी के दौरान उजागर हो चुका है। यह अपने आप में कम गंभीर बात नहीं है कि डीटीपी की पहली खुराक के मामले में दुनिया में भारत की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। पिछले साल भारत में तीस लाख से ज्यादा बच्चों को इस टीके की पहली खुराक नहीं मिली। 2019 में भी चैदह लाख बच्चे इस टीके से वंचित रह गए थे। इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि 2019 में जब कोरोना नहीं था तब चैदह लाख बच्चों को डीटीपी का टीका क्यों नहीं लग पाया? दरअसल यह हमारी बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था का सबूत है।
यूनिसेफ ने कहा है कि स्वास्थ्य सेवाओं के बाधित होने और महामारी के कारण गरीबी बढ़ने के साथ “एक पूरी पीढ़ी का भविष्य खतरे में है।“ एजेंसी ने सरकारों से बच्चों के लिए सेवाओं में सुधार करने के लिए और अधिक कदम उठाने का आग्रह किया है। यूनिसेफ ने कहा कि कोविड-19 महामारी दुनिया भर के बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के लिए “अपरिवर्तनीय नुकसान“ का कारण बन सकती है। 140 देशों का सर्वेक्षण करने वाली एक रिपोर्ट में पाया गया कि लगभग एक तिहाई देशों ने स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में कम से कम 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की है, जिनमें टीकाकरण और मातृ स्वास्थ्य सेवाएं शामिल हैं। यूनिसेफ ने कहा कि अगर सेवाओं में रुकावट और कुपोषण का बढ़ना जारी रहता है तो इससे अगले 12 महीनों में 20 लाख अतिरिक्त बच्चों की मौत हो सकती है और 2 लाख मृत जन्म हो सकते हैं। एजेंसी ने पाया कि महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण सेवाओं में महामारी के कारण 135 देशों में 40 फीसदी की गिरावट देखी गई। वहीं एजेंसी ने बताया कि पांच साल से कम उम्र के 60-70 लाख अतिरिक्त बच्चे तीव्र कुपोषण का शिकार हो सकते हैं।
दुनिया भर में शिक्षा पर महामारी के पड़ते प्रभाव को मापने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने एक नया ट्रैकर जारी किया है जिसे जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, वल्र्ड बैंक और यूनिसेफ के आपसी सहयोगी से बनाया गया है। यदि पिछले एक साल की बात करें तो कोरोना महामारी के कारण 160 करोड़ बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ा है। यदि शिक्षा पर संकट की बात करें तो वो इस महामारी से पहले भी काफी विकट था। इस महामारी से पहले भी दुनिया भर में शिक्षा की स्थिति बहुत ज्यादा बेहतर नहीं थी। बच्चों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा को पटरी पर लाने के लिये सरकारों को गंभीर एवं व्यापक कदम उठाने होंगे। अगर गहराई से विश्लेषण किया जाये तो बच्चों को भी सक्षम एवं स्वस्थ जीने का अधिकार है। देश में नये शब्द की रचना करो और उसी अनुरूप शासन व्यवस्थाएं स्थापित होे। वह शब्द है.... मंगल। सबका मंगल हो, बच्चों के जीवन में भी मंगल हो और उससे जुड़ी नीतियों में प्रामाणिकता का मंगलोदय हो। प्रेषकः

 

 (ललित गर्ग)
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ओलिम्पिक 2021 में भारत के चमकने की उम्मीदें

ओलिम्पिक 2021 में भारत के चमकने की उम्मीदें

26-Jul-2021

ओलिम्पिक 2021 में भारत के चमकने की उम्मीदें
- ललित गर्ग-

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खेलों में ही वह सामर्थ्य है कि वह देश एवं दुनिया के सोये स्वाभिमान को जगा देता है, क्योंकि जब भी कोई अर्जुन धनुष उठाता है, निशाना बांधता है तो करोड़ों के मन में एक संकल्प, एकाग्रता का भाव जाग उठता है और कई अर्जुन पैदा होते हैं। अनूठा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी माप बन जाते हैं और जो माप बन जाते हैं वे मनुष्य के उत्थान और प्रगति की श्रेष्ठ, सकारात्मक एवं कोरोना महामारी को परास्त करने की  स्थिति है। कोरोना महामारी के भय के माहौल के बीच टोक्यो में खेलों के महाकुम्भ ओलिम्पिक 2021 का आयोजन मनुष्य के मन और माहौल को बदलने का माध्यम बनेगा, ऐसा विश्वास है। भले ही सालभर की देरी से इसका आयोजन हो रहा है, लेकिन यह महामारी के मानवता पर असर एवं घावों को अपने तरीके से भूलाने का माध्यम बनेगा। ओलिम्पिक 2021 के उद्घाटन के वर्चुअल समारोह ने नए सवेरे का संदेश दिया है। इससे दुनिया में ऊर्जा का संचार होगा, विश्वास, उम्मीद एवं उमंग जागेगी। इस समारोह ने दिखाया कि मानव प्रजाति महामारी से जूझने का हौंसला रखने के साथ-साथ इससे उबरने में भी सक्षम है। जीवन के प्रति सकारात्मक रवैये को भी ये ओलिम्पिक खेल नया आयाम देंगे। कोरोना के खतरे के बीच इनके आयोजन ने दिखा दिया है कि मानव किसी भी मुसीबत से एकजुट होकर लड़ सकता है।
कोरोना काल के अंधकार के बीच ओलिम्पिक का आयोजन वास्तव में हमारी नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलने का सशक्त माध्यम है। इस खेलों के महाकुम्भ से निश्चित ही अस्तित्व को पहचानने, दूसरे अस्तित्वों से जुड़ने, विश्वव्यापी पहचान बनाने और अपने अस्तित्व को दुनिया के लिये उपयोगी बनाने की भूमिका बनेगी। यद्यपि कोरोना काल में ओलिम्पिक के आयोजन के औचित्य पर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। यह पहला ओलिम्पिक है, जिसे सिर्फ दस हजार लोग स्टेडियम में आकर देख सकेंगे, स्टेडियम में आम लोग नहीं बल्कि राजनयिक, आयोजन समिति से जुड़े सदस्य, अन्तर्राष्ट्रीय ओलिम्पिक समिति के सदस्य और कुछ प्रायोजक मौजूद रहेंगे।
जापान के टोक्यो शहर में यह दूसरा ओलिम्पिक है, इससे पहले 1964 में ओलिम्पिक का आयोजन कर चुका है। भले ही इस बार ओलिम्पिक में न दर्शक होंगे और न ही खिलाड़ियों में पहले जैसा उत्साह रहेगा, पर विश्वास है कि जो सपने कोरोना के कारण अधूरे थे, वे पूरे होंगे। देश एवं दुनिया की अस्मिता पर कोरोना महामारी के कारण छायी भय एवं निराशा की नित-नयी विपरीत स्थितियों की धुंध को चीरते हुए दुनिया के खिलाड़ी एवं खेल प्रतिभाओं के जज्बे से ऐसे उजालों का अवतरण होगा कि दुनिया के हर नागरिक का सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा। एक ऐसी रोशनी को अवतरित किया जायेगा जिससे दुनियावासियों को प्रसन्नता, अभय एवं आशा का प्रकाश मिलेगा जो कोरोना के दर्द को भुलाने का माध्यम बनेगा।
कोरोना के संकटकालीन दौर में इन खेलों का आयोजन साहस का काम है। ओलिम्पिक शुरू होने से पहले ओलिम्पिक से जुड़े 80 से ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। यद्यपि टोक्यो प्रशासन ने ओलिम्पिक को सुरक्षित बनाए रखने के बहुत सारे उपाय किए हैं। टोक्यो में आपातकाल लागू है। लेकिन शहर में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल है कि टोक्यो ओलिम्पिक में भारत की झोली में कितने पदक आएंगे। इस बार हमारे देश के खिलाड़िओ ने ओलिम्पिक के लिए क्वालीफाई किया है और उनकी तैयारी भी अच्छी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरन्तर खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे हैं, उन्हें एवं समूचे देश को उम्मीद है कि भारत लंदन ओलिम्पिक में लाए गए पदों की न केवल बराबरी करेगा बल्कि उससे ज्यादा भी हासिल कर लेगा। हमारे खिलाड़िओ ने कड़ी मेहनत की है लेकिन लॉकडाउन के कारण खिलाड़ियों का प्रशिक्षण काफी प्रभावित हुआ है।
राष्ट्र का एक भी व्यक्ति अगर दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ने की ठान ले तो वह शिखर पर पहुंच सकता है। विश्व को बौना बना सकता है। पूरे देश के निवासियों का सिर ऊंचा कर सकता है, भले ही रास्ता कितना ही कांटों भरा हो, अवरोधक हो। देश में प्रतिभाओं और क्षमताओं की कमी नहीं है। चैंपियंस अलग होते हैं, वे भीड़ से अलग सोचते एवं करते हैं और यह सोच एवं कृत जब रंग लाती है तो बनता है इतिहास। हमारे खिलाड़ी कुछ इसी तरह चैंपियन बनकर उभरेगे, दुनिया को चौंकाएंगे, सबके प्रेरणा बनेंगे, ऐसा विश्वास है।
जिन एथलीटों से हम पदक लाने की उम्मीद कर रहंे हैं उनमें विनेश फौगाट, नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधू, दीपिका कुमारी, मेरीकॉम, बजरंग पूनिया, अमित फंगाल, सौरभ चौधरी, मीरा बाई चानू और मनुभाकर आदि शामिल हैं। लेकिन हमें ऐसी सोच विकसित करनी होगी कि पदक जीतने के बाद नहीं बल्कि उन्हें हर तरफ से क्वालीफाई होने से चार-पांच साल पहले प्रोत्साहन और समर्थन मिलना चाहिए। वर्ष 2008 बीजिंग ओलिम्पिक में अभिनव बिन्द्रा व्यक्तिगत तौर पर गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बने थे। लंदन ओलिम्पिक में भारत की ओर से गगन नारंग और विजय कुमार ने मेडल जीता। अब तो भारत की ओर से निशानेबाजों की एक नई पौध तैयार है। सौरभ चौधरी और मनुभाकर के नेतृत्व में ये पौध झंडे गाड़ने एवं नया इतिहास बनाने के लिए तैयार हैं। तीरंदाज दीपिका कुमारी और अतानु राय जबर्दस्त फार्म में है। पीवी सिंधू और मेरीकॉम को नजरंदाज किया ही नहीं जा सकता। अगर हम लंदन ओलिम्पिक से आगे निकल गए तो यह भारत के लिए नई शुरूआत होगी। आमतौर पर ओलिम्पिक में खिलाडी सिर्फ अपने प्रदर्शन पर ध्यान केन्द्रित करते हैं लेकिन इस बार खिलाड़िओ के मन में कोरोना संक्रमण का भी भय होगा। जाहिर है कि सही वक्त पर, सही प्रतिभा को प्रोत्साहन एवं प्राथमिकता मिल जाए तो खेलों की दुनिया में देश का नाम सोने की तरह चमकते अक्षरों में दिखेगा।
हमारे देश में यह विडंबना लंबे समय से बनी है कि दूरदराज के इलाकों में गरीब परिवारों के कई बच्चे अलग-अलग खेलों में अपनी बेहतरीन क्षमताओं के साथ स्थानीय स्तर पर तो किसी तरह उभर गए, लेकिन अवसरों और सुविधाओं के अभाव में उससे आगे नहीं बढ़ सके। लेकिन इसी बीच कई उदाहरण सामने आए, जिनमें जरा मौका हाथ आने पर उनमें से किसी ने दुनिया से अपना लोहा मनवा लिया। अनेक खिलाड़ी हैं, जिन्होंने बहुत कम वक्त के दौरान अपने दम से यह साबित कर दिया कि अगर वक्त पर प्रतिभाओं की पहचान हो, उन्हें मौका दिया जाए, थोड़ी सुविधा मिल जाए तो वे दुनिया भर में देश का नाम रोशन कर सकते हैं। हमारे पास ऐसे नामों का अभाव रहा है, कुछ ही नाम है जिनको दशकों से दोहराकर हम थोड़ा-बहुत संतोष करते रहे हैं, फिर चाहे वह फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह हों या पीटी उषा।
यूं तो भारतीय ओलिंपिक संघ की स्थापना 1923 में हुई, लेकिन मानव जाति की शारीरिक सीमाओं की कसौटी समझे जानेवाले इस क्षेत्र में पहली उल्लेखनीय उपलब्धि 1960 के रोम ओलिंपिक में मिली, जब मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ में चौथे स्थान पर रहकर कीर्तिमान बनाया, जो इस स्पर्धा में 38 वर्षों तक सर्वश्रेष्ठ भारतीय समय बना रहा। चार वर्ष बाद टोक्यो में गुरबचन सिंह रंधावा 110 मीटर बाधा दौड़ में पांचवें स्थान पर रहे। 1976 में मांट्रियल में श्रीराम सिंह 800 मीटर दौड़ के अंतिम दौर में पहुंचे, जबकि शिवनाथ सिंह मैराथन में 11वें स्थान पर रहे। 1980 में मॉस्को में पीटी उषा का आगमन हुआ जो 1984 के लॉस एंजिल्स ओलिंपिक में महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ में चौथे स्थान पर रहीं। एशियाई खेलों में कुछ ऐथलीटिक स्वर्ण जरूर हमारे हाथ लगे।
किसी अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स ट्रैक पर भारतीय एथलीट के हाथों में तिरंगा और चेहरे पर विजयी मुस्कान, इस तस्वीर को हर हिंदुस्तानी बार-बार देखना चाहता है। ऐथलेटिक्स को लेकर 2021 के टोक्यो ओलिंपिक से हमें बेहद उम्मीदें हैं। क्योंकि यहां तक पहुंचते-पहुंचते कईयों के घुटने घिस जाते हैं। एक बूंद अमृत पीने के लिए समुद्र पीना पड़ता है। पदक बहुतों को मिलते हैं पर सही खिलाड़ी को सही पदक मिलना खुशी देता है। ये देखने में कोरे पदक हैं पर इसकी नींव में लम्बा संघर्ष और दृढ़ संकल्प का मजबूत आधार छिपा है। राष्ट्रीयता की भावना एवं अपने देश के लिये कुछ अनूठा और विलक्षण करने के भाव ने ही अन्तर्राष्ट्रीय ऐथलेटिक्स में भारत की साख को बढ़ाया है। ओलंपिक खेलों में विजयगाथा लिखने को बेताब देश की बेटियां, अभूतपूर्व सफलता का इतिहास रचने को तत्पर है, उनकी आंखों में तैर रहे भारत को अव्वल बनाने के सपने को जीत का हार पहनते देखने का यह समय निश्चित ही रोमांचित एवं गौरवान्वित करने वाला होगा।
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मोहम्मद आमिर (पूर्व में बलबीर सिंह) कारसेवक और बाबरी मस्जिद के विध्वंस में भाग लेने वाले संघ  के  पूर्व  नेता , उनके आवास पर संदिग्ध रूप से मृत पाए गए

मोहम्मद आमिर (पूर्व में बलबीर सिंह) कारसेवक और बाबरी मस्जिद के विध्वंस में भाग लेने वाले संघ के पूर्व नेता , उनके आवास पर संदिग्ध रूप से मृत पाए गए

23-Jul-2021

मोहम्मद आमिर (पूर्व में बलबीर सिंह), कभी कारसेवक और बाबरी मस्जिद के विध्वंस में भाग लेने वाले संघ के नेता की पुराने शहर के हाफिज बाबा नगर इलाके में उनके आवास पर संदिग्ध रूप से मृत्यु हो गई।

बाबा नगर स्थित उनके किराए के घर से दुर्गंध आने पर स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचित किया, जिस पर कंचनबाग पुलिस की एक टीम उनके आवास पर पहुंची और मौत के कारणों की जांच शुरू की।

कंचनबाग थाने के इंस्पेक्टर जे वेंकट रेड्डी ने कहा, ‘मौत का सही कारण फिलहाल पता नहीं चल सका है, अगर हमें परिवार के सदस्यों से उसकी मौत पर संदेह के बारे में कोई शिकायत मिलती है, तो पुलिस पोस्टमॉर्टम के लिए आगे बढ़ेगी और मामला दर्ज करेगी।

बाबरी मस्जिद के विनाश में भाग लेने और बाद में अपने धर्म को इस्लाम में परिवर्तित करने के बाद 100 मस्जिदों के निर्माण और जीर्णोद्धार का कार्य किया गया है। हालाँकि उन्होंने बाबरी मस्जिद के विध्वंस में सक्रिय भाग लिया लेकिन अपने धर्म परिवर्तन के बाद उन्होंने मस्जिदों की रक्षा करने का भी वचन दिया और 91 मस्जिदों का निर्माण पूरा कर लिया था।

मोहम्मद आमिर कंचनबाग थाना क्षेत्र के हाफिज बाबा नगर सी ब्लॉक में किराए के मकान में रह रहा था और हैदराबाद में अपनी 59वीं मस्जिद का निर्माण कर रहा था जिसका नाम ‘मस्जिद-ए-रहमिया’ रखा गया है।

साल 2019 में 6 दिसंबर को मोहम्मद आमिर ने हाफिज बाबा नगर में बालापुर रोड के पास मस्जिद-ए-रहमिया का शिलान्यास किया था।

तब से निर्माण कार्य चल रहा है। स्थानीय लोग इलाके में अस्थाई छाया में नमाज अदा कर रहे हैं।

आमिर बाबरी मस्जिद के विध्वंस में शामिल एक कारसेवक था, जब वह विध्वंस के बाद घर पहुंचा तो जनता ने उसका नायक का स्वागत किया।

उनके धर्मनिरपेक्ष परिवार ने उनके कार्यों की निंदा की जिसके परिणामस्वरूप वह दोषी महसूस कर रहे थे। बाद में, जब वे बीमार पड़ गए और उन्हें शारीरिक समस्याएं होने लगीं तो उन्होंने एक मौलाना से परामर्श करने का फैसला किया।

वह यूपी के मुजफ्फरनगर में मौलाना कलीम सिद्दीकी के पास गए और उन्हें बाबरी मस्जिद के विध्वंस के कार्य के बारे में समझाया और पश्चाताप की इच्छा व्यक्त की

मौलाना ने उन्हें कुरान की आयतों के माध्यम से इस्लामी मूल्यों की व्याख्या की। उस समय उसने महसूस किया कि उसने जो किया वह पापपूर्ण रूप से गलत था।

1 जून 1993 को उन्होंने मौलाना कलीम सिद्दीकी के सामने बैठकर इस्लाम कबूल कर लिया। उन्होंने 100 मस्जिद बनाने और उनकी रक्षा करने का भी फैसला किया। इस उद्देश्य के साथ उन्होंने इस 26 वर्षों में 91 मस्जिदों का निर्माण किया और 59 निर्माणाधीन थे। मोहम्मद आमिर ने हरियाणा में पहली मस्जिद का निर्माण किया और 1994 में इसका नाम मस्जिद-ए-मदीना रखा।

सियासत डॉट कॉम से साभार 


बेटे ने पत्नी को दिया तलाक, पिता ने उसी के साथ कर ली शादी !

बेटे ने पत्नी को दिया तलाक, पिता ने उसी के साथ कर ली शादी !

20-Jul-2021

बेटे ने पत्नी को दिया तलाक, पिता ने उसी के साथ कर ली शादी !
बदायूं। एक अजीबोगरीब घटना में एक युवक की पूर्व पत्नी अब उसकी सौतेली मां है और खास बात यह है कि उसका एक 'भाई' भी है, जिसका पिता उसके (युवक का) पिता हैं। यह खुलासा तब हुआ जब बेटे ने अपने पिता के बारे में जानकारी इकट्ठी करने के लिए जिला पंचायती राज कार्यालय में एक आरटीआई दायर की, जो घर छोड़कर कहीं और रह रहे थे। पिता द्वारा पैसे देना बंद करने और संभल में अलग रहने के बाद उसने आरटीआई दायर की। पिता की उम्र 40 साल है और वह एक सफाई कर्मचारी हैं। यह चौंकाने वाला मामला उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से सामने आया है। बेटे की साल 2016 में एक लड़की से शादी हुई थी और उस वक्त दोनों नाबालिग थे। छह महीने बाद वे अलग हो गए और हालांकि उसने सुलह की कोशिश की, लेकिन लड़की ने इस आधार पर तलाक पर जोर दिया कि लड़का शराबी था।
 
जब बेटे को आखिरकार पता चला कि उसके पिता ने वास्तव में उसकी पूर्व पत्नी से शादी कर ली है, तो उसने बिसौली पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई और शनिवार को दोनों पक्षों को एक बैठक के लिए बुलाया गया। इस मामले पर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि हम मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि शनिवार को बैठक के दौरान पिता और पुत्र दोनों आक्रामक थे। सर्कल अधिकारी विनय चौहान ने कहा कि शिकायत की जांच की जा रही है और पुलिस कानून के मुताबिक कार्रवाई कर रही है। लड़की जो अब अपने पूर्व पति की 'मां' है, ने उसके पास लौटने से इनकार कर दिया और कहा कि वह अपने दूसरे पति के साथ बहुत खुश है। सर्कल अधिकारी ने कहा कि हमें पहली शादी के कोई दस्तावेज नहीं दिए गए थे जब दोनों नाबालिग थे। अभी मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। दोनों पक्षों को आगे के सत्रों के लिए नोटिस मिलेगा।

 


पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर सोनिया गांधी को अमरिंदर सिंह ने भेजा पत्र !

पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर सोनिया गांधी को अमरिंदर सिंह ने भेजा पत्र !

17-Jul-2021

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी द्वारा शुक्रवार को 10 जनपथ स्थित अपने आवास पर बुलाए जाने की खबर फैलते ही पंजाब कांग्रेस में हलचल तेज हो गई थी 
इससे पहले की यह बैठक शुरू होती, मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी अपने ओएसडी नरिंदर भांब्री के हाथ सोनिया गांधी के नाम एक पत्र पहुंचा दिया।

जानकारी के अनुसार, कैप्टन का पत्र पहुंचते ही सिद्धू को लेकर बनी हवा थम गई और हाईकमान पत्र में कैप्टन द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार करने में व्यस्त हो गया। पंजाब प्रदेश कांग्रेस के प्रधान पद को लेकर पार्टी मामलों के प्रभारी हरीश रावत ने गुरुवार को जब से नवजोत सिंह सिद्धू के नाम की गैर-अधिकारिक घोषणा की, तभी से पंजाब कांग्रेस में हलचल तेज हो गई। 

सिद्धू शुक्रवार सुबह पटियाला से दिल्ली रवाना हुए तो यह माना जाने लगा कि सोनिया गांधी उनसे मुलाकात के बाद विधिवत तौर पर उन्हें प्रदेश प्रधान घोषित कर देंगी लेकिन सिद्धू के दिल्ली रवाना होते ही सांसद मनीष तिवारी ने ट्वीट कर प्रदेश प्रधान के पद पर हिंदू नेता की पैरवी कर दी। उन्होंने अपने ट्वीट में पंजाब में धार्मिक आधार पर जनसंख्या के आंकड़े भी पेश किए, जिसके अनुसार सूबे में जनसंख्या के लिहाज से हिंदू-सिख आबादी के बाद दूसरे नंबर पर हैं। तिवारी का यह ट्वीट ऐसे समय में आया, जिससे साफ हो गया कि प्रदेश के कांग्रेस नेता सिद्धू को पार्टी की कमान सौंपने को लेकर एकमत नहीं हैं।

दूसरी ओर, कैप्टन द्वारा ओएसडी के जरिए सोनिया गांधी को भेजी चिट्ठी के मजमून के बारे में सूत्रों से पता चला है कि कैप्टन ने सिद्धू को प्रदेश प्रधान न बनाने की बात कहते हुए पार्टी अध्यक्षा को अप्रत्यक्ष तौर पर चेताया है कि एक व्यक्ति को आगे लाने के लिए पार्टी का बंटवारा होने से रोका जाए। इस पत्र में कैप्टन ने सोनिया गांधी को प्रदेश में हिंदू और दलित जनसंख्या का हवाला देते हुए एक नया फॉर्मूला भी सुझाया है।

पता चला है कि सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद सिद्धू और हरीश रावत के बीच भी बैठक हुई। हालांकि इस बैठक के बाद न तो सिद्धू और न ही हरीश रावत मीडिया से मुखातिब हुए। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सिद्धू के बारे में हाईकमान द्वारा लिए जाने वाले फैसले पर कैप्टन द्वारा सोनिया को भेजे पत्र ने दबाव बना लिया है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि सिद्धू को अगर प्रदेश प्रधान बना भी दिया गया तो उनके साथ मनीष तिवारी और चौधरी संतोख सिंह को कार्यकारी प्रधान की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, ताकि कैप्टन को भी नाराज न किया जाए।


कुपोषण एवं भूख की शर्म को दुनिया कैसे धोएं

कुपोषण एवं भूख की शर्म को दुनिया कैसे धोएं

16-Jul-2021

कुपोषण एवं भूख की शर्म को दुनिया कैसे धोएं
-ः ललित गर्ग:-

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कोरोना वायरस महामारी से आर्थिक गिरावट आई है और दशकों से भुखमरी एवं कुपोषण के खिलाफ हुई प्रगति को जोर का झटका लगा है। एक नए अनुमान के मुताबिक कोरोना वायरस महामारी से भुखमरी एवं कुपोषण के कारण एक लाख अडसठ हजार बच्चों की मौत हो सकती है। 30 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के एक नए अध्ययन के मुताबिक कोरोना वायरस महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं हैं जिससे भुखमरी बढ़ी है। अध्ययन में कहा गया है कि भुखमरी एवं कुपोषण के खिलाफ दशकों से हुई प्रगति कोरोना महामारी की वजह से प्रभावित हुई है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा भारत सहित पूरे विश्व में भूख, कुपोषण एवं बाल स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की गई है। यह चिन्ताजनक स्थिति विश्व का कड़वा सच है लेकिन एक शर्मनाक सच भी है और इस शर्म से उबरना जरूरी है।
कुपोषण और भुखमरी से जुड़ी वैश्विक रिपोर्टें न केवल चैंकाने बल्कि सरकारों की नाकामी को उजागर करने वाली ही होती हैं। विश्वभर की शासन-व्यवस्थाओं का नाकामी एवं शैतानों की शरणस्थली बनना एक शर्मनाक विवशता है। लेकिन इस विवशता को कब तक ढोते रहेंगे और कब तक दुनिया भर में कुपोषितों का आंकड़ा बढ़ता रहेगा, यह गंभीर एवं चिन्ताजनक स्थिति है। लेकिन ज्यादा चिंताजनक यह है कि तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कुपोषितों और भुखमरी का सामना करने वालों का आंकड़ा पिछली बार के मुकाबले हर बार बढ़ा हुआ ही निकलता है। रिपोर्टें बताती हैं कि ऐसी गंभीर समस्याओं से लड़ते हुए हम कहां से कहां पहंुचे है। इसी में एक बड़ा सवाल यह भी निकलता है कि जिन लक्ष्यों को लेकर दुनिया के देश सामूहिक तौर पर या अपने प्रयासों के दावे करते रहे, उनकी कामयाबी कितनी नगण्य एवं निराशाजनक है। कुपोषण, गरीबी, भूख में सीधा रिश्ता है। यह दो-चार देशों ही नहीं, बल्कि दुनिया के बहुत बड़े भूभागों के लिए चुनौती बनी हुई है। दुनिया से लगभग आधी आबादी इन समस्याओं से जूझ रही है। इसलिए यह सवाल तो उठता ही रहेगा कि इन समस्याओं से जूझने वाले देश आखिर क्यों नहीं इनसे निपट पा रहे हैं? इसका एक बड़ा कारण आबादी का बढ़ना भी है। गरीब के संतान ज्यादा होती है क्योंकि कुपोषण में आबादी ज्यादा बढ़ती है। विकसित राष्ट्रों में आबादी की बढ़त का अनुपात कम है, अविकसित और निर्धन राष्ट्रों की आबादी की बढ़त का अनुपात ज्यादा है। भुखमरी पर स्टैंडिंग टुगेदर फॉर न्यूट्रीशन कंसोर्टियम ने आर्थिक और पोषण डाटा इकट्ठा किया, इस शोध का नेतृत्व करने वाले सासकिया ओसनदार्प अनुमान लगाते हैं कि जो महिलाएं अभी गर्भवती हैं वो ऐसे बच्चों को जन्म देंगी जो जन्म के पहले से ही कुपोषित हैं और ये बच्चे शुरू से ही कुपोषण के शिकार रहेंगे। एक पूरी पीढ़ी दांव पर है।’’ कोरोना वायरस के आने के पहले तक कुपोषण के खिलाफ लड़ाई एक अघोषित सफलता थी लेकिन महामारी से यह लड़ाई और लंबी हो गई है।
अध्ययन में यह भी पता चला है कि दुनिया के तीन अरब लोग पौष्टिक भोजन से वंचित हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे भी बड़ा हो तो हैरानी की बात नहीं। पर इतना जरूर है इतनी आबादी तो उस पौष्टिक खाद्य से दूर ही है जो एक मनुष्य को दुरूस्त रहने के लिए चाहिए। इनमें ज्यादातर लोग गरीब और विकासशील देशों के ही हैं। गरीब मुल्कों में भी अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और एशियाई क्षेत्र के देश ज्यादा हैं। गरीबी की मार से लोग अपने खान-पान की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाते। अगर शहरों में ही देख लें तो गरीब आबादी के लिए रोजाना दूध और आटा खरीदना भी भारी पड़ता है। राजनीतिक संघर्षों और गृहयुद्धों जैसे संकटों से जूझ रहे अफ्रीकी देशों से आने वाली तस्वीरें तो और डरावनी हैं। खाने के एक-एक पैकेट के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। ऐसे में पौष्टिक भोजन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। महंगाई के कारण मध्य और निम्न वर्ग के लोग अपने खान-पान के खर्च में भारी कटौती के लिए मजबूर होते हैं। ऐसे में एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए निर्धारित मानकों वाले खाद्य पदार्थ उनकी पहुंच से दूर हो जाते हैं। पौष्टिक भोजन के अभाव में लोग गंभीर बीमारियों की जद में आने लगते हैं।
महामारी के डेढ़ साल में कुपोषण के मोर्चे पर हालात और दयनीय हुए हैं। अब इस संकट से निपटने की चुनौती और बड़ी हो गई है। इसके लिए देशों को अपने स्तर पर तो जुटना ही होगा, वैश्विक प्रयासों की भूमिका भी अहम होगी। गरीब मुल्कों की मदद के लिए विश्व खाद्य कार्यक्रम को तेज करने की जरूरत है। विकासशील देशों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो गरीबी, कुपोषण एवं भुखमरी दूर कर सकें। सत्ताएं ठान लें तो हर नागरिक को पौष्टिक भोजन देना मुश्किल भी नहीं है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी बाधा शासन-व्यवस्थाओं में बढ़ता भ्रष्टाचार है। गलत जब गलत न लगे तो यह मानना चाहिए कि बीमारी गंभीर है। बीमार व्यवस्था से स्वस्थ शासन की  उम्मीद कैसे संभव है?
आर्थिक सुधारों के क्रियान्वयन के लगभग 30 वर्षों के बाद असमानता, भूख और कुपोषण की दर में वृद्धि देखी जा रही है। हालांकि समृद्धि के कुछ टापू भी अवश्य निर्मित हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कोविड-19 के असर से पैदा हो रहे आर्थिक एवं सामाजिक तनावों पर विस्तृत जानकारी हासिल की है। भारत को लेकर प्रकाशित आंकड़े चिंताजनक हैं। वैश्विक महामारी से उत्पन्न भुखमरी पर 107 देशों की जो सूची उपलब्ध है, उसके मुताबिक भारत 94वें पायदान पर है। एक तरफ हम खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं। वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है। भारत में महिलाओं की पचास फीसदी से अधिक आबादी एनीमिया यानी खून की कमी से पीड़ित है। इसलिए ऐसे हालात में जन्म लेने वाले बच्चों का कम वजन होना लाजिमी है। राइट टु फूड कैंपेन नामक संस्था का विश्लेषण है कि पोषण गुणवत्ता में काफी कमी आई है और लॉकडाउन से पहले की तुलना में भोजन की मात्रा भी घट गई है। ऊंचे पैमाने में पारिवारिक आय में भी काफी कमी आई है। महामारी के बाद पैदा हुई भुखमरी, बेरोजगारी और कुपोषण को विस्थापन ने और भयानक बना दिया। कोरोना संकट के दौरान भारत सरकार ने लगभग 75 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन देने की व्यवस्था संचालित की गई। बावजदू इसके एक सबक संक्रमण संकट का सरकारी वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करना भी है।
संक्रमण संकट के दौर में आगामी बजट पर भी सभी वर्गों की निगाह टिकी है। बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च को बढ़ाना जरूरी हैं। निजी क्षेत्रों की चिकित्सा व्यवस्था ने गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को लाचार और विवश बनाकर छोड़ दिया है। सरकारी स्तर पर उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं विकसित करना होगा जिससे गरीब मरीजों को भी समुचित इलाज सुलभ हो सकें। भारत सरकार एवं वैज्ञानिकों के प्रयास निःसंदेह सराहनीय हैं कि आर्थिक संकट में भी सस्ती वैक्सीन उपलब्ध कराने के सभी प्रयास जारी हैं। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार भी स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी कर अपने नागरिकों को सस्ता एवं स्वच्छ उपचार उपलब्ध करा सके तो कुपोषण, भूखमरी एवं बीमारियों से निजात मिल सकेगा। कुपोषण एवं भूखमरी से मुक्ति के लिये भी सरकारोें को जागरूक होना होगा।
प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
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एक व्यक्ति ने अपने ससुराल वालों पर एक ट्रांसजेंडर के साथ शादी के लिए प्रलोभन देने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया !

एक व्यक्ति ने अपने ससुराल वालों पर एक ट्रांसजेंडर के साथ शादी के लिए प्रलोभन देने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया !

15-Jul-2021

कानपुर। एक व्यक्ति ने अपने ससुराल वालों पर एक ट्रांसजेंडर के साथ शादी के लिए प्रलोभन देने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया है। शख्स ने अपनी शिकायत में अपने ससुराल वालों पर शादी के वक्त उसे और उसके परिवार को अंधेरे में रखकर धोखा देने का आरोप लगाया है। शिकायत के अनुसार, 28 अप्रैल को शादी करने वाले व्यक्ति को सच्चाई का पता तब चला जब उसने शादी को अंजाम देने की कोशिश की। उसने दावा किया कि उसकी पत्नी के जननांग पूरी तरह से विकसित नहीं हुए थे, जिसके कारण वह उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ थी।
 
उन्होंने कहा कि जब वह अपनी पत्नी का मेडिकल परीक्षण कराने गए तो उन्हें पता चला कि वह एक ट्रांसजेंडर हैं। पुलिस निरीक्षक कुंज बिहारी मिश्रा ने कहा कि "शास्त्री नगर निवासी ने जिले के पनकी क्षेत्र की एक महिला से शादी की। शादी के बाद, दुल्हन को दूल्हे के साथ संबंध बनाने में असहज पाया गया और उसने बताया कि उसे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, लड़के को संदेह हुआ कि कुछ गड़बड़ है। वह आखिरकार अपनी पत्नी को चेक-अप के लिए स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास ले गया, जिसने पुष्टि की कि वह एक ट्रांसजेंडर है." यह सुनते ही पति के होश उड़ गए।
 
पीड़ित का कहना है कि लड़की के घर वालों ने शादी से पहले उससे यह बात छुपाई थी। उसने कहा कि शुरुआत में तो सब सामान्य थी लेकिन धीरे-धीरे उसे पत्नी पर शक होने लगा। पत्नी उसे अपने करीब आने में कोई ना कोई बहाना बना देती थी। उस व्यक्ति ने रविवार को अपनी पत्नी की मेडिकल रिपोर्ट के साथ प्राथमिकी दर्ज कराई। दुल्हन, उसके माता-पिता और मध्यस्थ के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। इंस्पेक्टर ने आगे कहा, "ससुराल वालों सहित आठ लोगों के खिलाफ आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है और जांच जारी है। जांच के आधार पर कार्रवाई की जाएगी."

 


अलग-अलग कंपनियों की कोरोना वैक्सीन डोज लेना हो सकता है खतरनाक : सौम्या स्वामीनाथन

अलग-अलग कंपनियों की कोरोना वैक्सीन डोज लेना हो सकता है खतरनाक : सौम्या स्वामीनाथन

14-Jul-2021

अलग-अलग कंपनियों की कोरोना वैक्सीन डोज लेना हो सकता है खतरनाक : सौम्या स्वामीनाथन 

जिनेवा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि कोरोना वायरस वैक्सीन की अलग-अलग कंपनियों की डोज लिया जाना खतरनाक हो सकता है। संगठन की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने सोमवार को ऑनलाइन ब्रीफिंग में कहा कि अलग-अलग कंपनियों की कोविड वैक्सीन को मिलाने से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े और साक्ष्य हमारे पास नहीं हैं। इसके प्रभाव के बारे में बहुत कम डेटा उपलब्ध है।

डॉ स्वामीनाथन ने कहा कि कोरोना वायरस वैक्सीन मिलाने के क्या नतीजे हो सकते हैं इसके बारे में किसी तरह का डेटा उपलब्ध नहीं है। इसके मद्देनजर सावधानी बरतने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि अलग-अलग देशों के लोग खुद तय करने लगेंगे कि कब कौन सी डोज लेनी तो अराजक स्थिति पैदा हो जाने की आशंका है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग कंपनियों की डोज लेने के बारे में अध्ययन चल रहा है, नतीजों का हमें इंतजार करना चाहिए।


स्वस्थ औसत आयु में बढ़ोतरी ज्यादा जरूरी

स्वस्थ औसत आयु में बढ़ोतरी ज्यादा जरूरी

13-Jul-2021

स्वस्थ औसत आयु में बढ़ोतरी ज्यादा जरूरी
 -ः ललित गर्ग:-

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वल्र्ड हेल्थ स्टैटिस्टिक्स रिपोर्ट 2021 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में औसत आयु तो बढ़ रही है, पर स्वस्थ औसत आयु में वैसी बढ़ोतरी नहीं दिख रही। वैश्विक औसत आयु 73.3 वर्ष है तो स्वस्थ औसत आयु 63.7 वर्ष। यानी दोनों के बीच करीब नौ साल का अंतर है। इसका साफ मतलब यह हुआ कि लोगों के जीवन के आखिरी दस साल तरह-तरह की बीमारियों, तकलीफों एवं झंझावतों के बीच गुजरते हैं। बुजुर्ग आबादी के स्वास्थ्य का पहलू बहुत महत्वपूर्ण है। जीवन लम्बा होकर सुखद एवं स्वस्थ नहीं बन पा रहा है, यह चिन्ताजनक स्थिति है, यह स्थिति शासन-व्यवस्थाओं पर एक प्रश्नचिन्ह है। वार्धक्य पश्चाताप नहीं, वरदान बने, इस पर व्यापक कार्य-योजना देश एवं दुनिया के स्तर पर बननी चाहिए।
इस रिपोर्ट में महिलाओं और पुरुषों की औसत आयु और उनके स्वास्थ्य से जुड़े कुछ पहलुओं पर नए सिरे से विचार की जरूरत बताई है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में महिलाओं की औसत आयु पुरुषों के मुकाबले अधिक है। वे अपेक्षाकृत ज्यादा लंबा जीवन जीती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि स्वास्थ्य के मामले में भी वे पुरुषों से बेहतर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अगर बात औसत स्वस्थ आयु की हो तो महिलाओं और पुरुषों के बीच का यह अंतर काफी कम हो जाता है। स्वस्थ औसत आयु के लिहाज से महिलाएं और पुरुष करीब-करीब एक जैसी ही स्थिति में हैं। यानी जीवन के आखिरी हिस्से में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का स्वास्थ्य ज्यादा कमजोर एवं अनेक परेशानियां से संकुल होता है। अपने देश में भी औसत आयु के मामले में पुरुषों से तीन साल आगे दिखती महिलाएं स्वस्थ औसत आयु का सवाल उठने पर पुरुषों के समकक्ष नजर आने लगती हैं।
वल्र्ड हेल्थ स्टैटिस्टिक्स रिपोर्ट 2021 के सन्दर्भ में विचारणीय विषय है कि औसत आयु बढ़ने के साथ-साथ स्वस्थ एवं सुखी औसत आयु क्यों नहीं बढ़ रही है। इस सन्दर्भ में चिकित्सा-सोच के साथ-साथ अन्य पहलुओं पर गौर करने की अपेक्षा है। इस दृष्टि से सही ही कहा है कि इंसान के जीवन पर उसकी सोच का गहरा असर होता है और जैसी जिसकी सोच होगी वैसा ही उसका जीवन होगा। इसी वजह से “थिंक पॉजिटिव” यानी “सकारात्मक सोचिए”, यह केवल कहावत नहीं है, बल्कि स्वस्थ एवं सुखी जीवन का अमोघ साधन है। सकारात्मक सोच तब होती है जब आप सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ चुनौतियों का सामना करते हैं। यदि आप एक सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति हैं तो आप जानते हैं कि जीवन में नकारात्मक परिस्थितियों का सामना कैसे किया जाए।
जीवन बाधाओं और चुनौतियों से भरा है, लेकिन अगर आप अपनी मानसिकता को बदल सकते हैं और अधिक सकारात्मक बन सकते हैं, तो यह वास्तव में आपकी स्वास्थ्य सहित कई चीजों में मदद कर सकता है। यह जीवन की सच्चाई है और अब विशेषज्ञों ने भी अपने शोध में साबित किया है कि अगर व्यक्ति जीवन में सकारात्मक सोच रखता है तो स्वस्थ और लंबा जीवन जी सकता है। पॉजिटिव सोच रखने वाले लोग खुश रहते हैं और खुश रहना एक स्वस्थ जीवन जीने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। येल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 600 से अधिक लोगों की मृत्यु दर पर जांच की, जिन्होंने सर्वेक्षण के सवालों का जवाब कुछ 20 साल पहले दिया था, जब उनकी उम्र 50 साल की थी। शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ लोग इस तरह के बयानों से सहमत थे, जैसे ‘मेरे बूढ़े होने पर चीजें और खराब हो रही हैं’ और ‘जैसे-जैसे आप बड़े होते जाते हैं, आप कम उपयोगी होते हैं।’ वहीं कुछ इस तरह के बयानों से सहमत थे कि ‘जब मैं छोटा था तब मैं भी उतना ही खुश था।‘ पाया गया कि उम्र बढ़ने पर अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोग नकारात्मक लोगों की तुलना में औसतन 7.5 वर्ष लम्बा, स्वस्थ एवं सुखी जीवन जीया था।
ऐसे ही बोस्टन यूनिवर्सिटी द्वारा किये गये अध्ययन में कहा गया कि लंबी उम्र का राज अच्छी सेहत, संतुलित जीवनशैली और बिना किसी अक्षमता के जीना है, लेकिन सिर्फ नजरिया बदलकर भी अच्छी सेहत पाई जा सकती है और इससे उम्र बढ़ जाती है। शोध में शामिल प्रतिभागियों की औसतन उम्र 70 साल थी। शोध में करीब 70 हजार महिलाएं और 1429 पुरुषों को शामिल किया गया था। नकारात्मक सोच वालों की तुलना में सकारात्मक लोगों के उम्र की संभावना 15 प्रतिशत ज्यादा पाई गई। नयी रिपोर्ट के अनुसार अब हमारी औसत आयु बढ़ रही है तो उस जीवन में सकारात्मकता की ज्यादा अपेक्षा है। सकारात्मकता और हमारी इम्यूनिटी यानी रोगों से लड़ने की क्षमता (प्रतिरक्षा) के बीच गहरा संबंध हैं। एक शोध में 124 प्रतिभागियों ने भाग लिया और आशावादी सोच दिखाने वाले लोगों में अधिक रोगप्रतिरोधक  क्षमता दिखाई दी। जिनका नकारात्मक दृष्टिकोण था, उन्होंने अपनी रोगप्रतिरोधक प्रणाली की प्रतिक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव दिखाया। शोध यह भी दर्शाता है कि नकारात्मक दृष्टिकोण होने से आप अनेक असाध्य बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। अध्ययनों से पता चला है कि सकारात्मक सोच वास्तव में आपको आघात या संकट से जल्दी उबरने में मदद कर सकती है। सकारात्मक सोच आपको अधिक लचीला बनाने में मदद कर सकती है, जो इन कठिन परिस्थितियों का सामना करने में मददगार हो सकता है। तनाव वास्तव में स्वास्थ्य समस्याओं का कारक माना जाता है। सकारात्मक सोच हमारे तनाव के स्तर को सही तरीके से मैनेज करने और कम करने में मदद करता है। अगर किसी भी परिस्थिति में जल्द घबरा जाते हैं तो सबसे पहले नकारात्मकता हावी है जिससे तनाव होना तय है और तनाव के साथ उच्च रक्तचाप की शिकायत रहेगी। अगर किसी भी परिस्थिति में सकारात्मक रहकर डटे रहे तो तनाव नहीं होगा और ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहेगा।
वल्र्ड हेल्थ स्टैटिस्टिक्स रिपोर्ट 2021 की रिपोर्ट में वृद्ध आबादी के स्वास्थ्य से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता से उजागर किया है। महिलाओं की वृद्धावस्था में गिरती स्वास्थ्य स्थितियां विशेषज्ञों की नजरों से अछूती नहीं रही है, यह अच्छी बात है। परिवार में पितृसत्तात्मक सोच के प्रभाव में महिलाओं के स्वास्थ्य को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती। खाने-पीने के मामले में भी महिलाएं खुद को पीछे रखना उपयुक्त मानती हैं। इसके अलावा आर्थिक आत्मनिर्भरता के अभाव में स्वास्थ्य सेवाओं तक महिलाओं की सीधी पहुंच अमूमन नहीं हो पाती। जैसे-जैसे महिलाओं की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, इस मोर्चे पर सुधार की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन जहां तक वैश्विक स्तर पर औसत आयु और स्वस्थ औसत आयु में अंतर का सवाल है तो वहां मामला सरकार की नीतियों और योजनाओं की दिशा का भी है। विभिन्न सरकारों का ही नहीं वैश्विक स्तर पर मेडिकल रिसर्चों के लिए होने वाली फंडिंग में भी जोर मौत के कारणों को समझने और दूर करने पर रहता है जिसका पॉजिटिव नतीजा औसत आयु में बढ़ोतरी के रूप में नजर आता है। अब जरूरत बुजुर्ग आबादी को होने वाली बीमारियों पर ध्यान केंद्रित करने की है ताकि उसे उन बीमारियों बचाने के उपाय समय रहते किए जा सकें। तभी हम अपने बुजुर्गों के लिए लंबा और साथ ही अच्छी सेहत से युक्त सुखी एवं प्रसन्न जीवन सुनिश्चित कर पाएंगे। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
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फेरे से एक दिन पहले दुलहन फरार हो गई !

फेरे से एक दिन पहले दुलहन फरार हो गई !

12-Jul-2021

फेरे से एक दिन पहले दुलहन फरार हो गई !

जयपुर। एक दूल्हा चांद सी दुल्हन के साथ तमाम सपने संजो रहा था। रोका हो गया था। और भी दूसरे कार्यक्रम संपन्न हो चुके थे। शादी की तैयारियां हो चुकी थी और दुल्हन ने ऐसा कांड कर दिया कि दूल्हा क्या उसके दूर-दराज से आए रिश्तेदार भी हिल गए। इस शादी के लिए दलाल के जरिए 1.80 लाख रुपए में सौदा तय हो गया। इधर फेरे से एक दिन पहले दुलहन फरार हो गई। 

दूल्हे और उसके परिवार का सपना तो चकनाचूर हुआ ही पैसे भी चले गए। दूल्हे और उसके परिजन थाने पहुंचे और लुटेरी दुल्हन के खिलाफ मामला दर्ज करा दिया। बगरू में धोबियों का मोहल्ला के रहने वाले राजेश शर्मा की काफी समय से शादी नहीं हो पा रही थी। राजेश की मुलाकात दो माह पहले गणेश नारायण शर्मा से हुई। गणेश ने कहा कि उसे महाराष्ट्र में ब्राह्मणों की लड़की मिल जाएगी। इधर गणेश ने एक लड़की के बारे में बताया। शादी की बात सुनकर परिजन राजी हो गए।

लड़की दीपाली के पिता जगन्नाथ राय से उनके बीच में शादी की बात फाइनल हो गई। उसके बाद गणेश शर्मा ने शादी के लिए 1.80 लाख रुपए मांगे। तब राजेश ने अपनी मां के खाते से रुपए निकाल कर दे दिए। सांभर न्यायालय में जाकर 500 रुपए के स्टांप पेपर पर लिखा-पढ़ी की बात की गई। तीन दलाल, दूल्हा और दुल्हन स्टांप पेपर पर पूरी बातें लिखने के बाद दुल्हन को लेकर बगरू आ गए। दीपाली राजेश शर्मा के साथ उसके ही घर में रहने लगी थी।

इससे राजेश को उनके प्लान पर संदेह नहीं हुआ। 20 जून को मंदिर में शादी होनी थी। 19 जून को जब राजेश का पूरा परिवार सो रहा था तब रात में बालकनी से चुन्नी बांध कर दिपाली नीचे उतरी और रफूचक्कर हो गई। सुबह जब परिजन उठे तो उसे कमरे में न पाकर ढूंढने लगे। जब वो नहीं मिली तो राजेश ने तीनों दलालों गणेश शर्मा, विक्की शर्मा, मोहम्मद नजीर को फोन किया। पहले तो उन्होंने पैसे वापस करने की बात कही। बाद में पे टालमटोल करने लगे। इसके बाद फोन बंद लिया। फिर राजेश और उनका परिवार समझ गया कि वे शादी के नाम पर ठगी का शिकार हो गए हैं।


बच्चों को अवसाद से दूर रखने हेतु सीमा वर्मा चला रही आर्ट & क्राफ्ट प्रतियोगिता

बच्चों को अवसाद से दूर रखने हेतु सीमा वर्मा चला रही आर्ट & क्राफ्ट प्रतियोगिता

10-Jul-2021

बच्चों को अवसाद से दूर रखने हेतु सीमा वर्मा चला रही आर्ट & क्राफ्ट प्रतियोगिता 

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बिलासपुर : एक रूपया मुहिम की संचालिका सीमा वर्मा  के द्वारा राजेंद्र नगर और ताला पारा बिलासपुर के बच्चो  के बीच ड्रॉइंग &आर्ट एंड क्राफ्ट प्रतियोगिता आयोजित किया गया जिसमें बच्चों ने एक से बढ़कर एक कलाकृति बनाई आर्ट एंड क्राफ्ट  में  बच्चों ने सुंदर सुंदर क्राफ्ट बनाए किसी ने जहाज, तो किसी ने घर बनाया,किसी ने पक्षी की आकृति बनाई बच्चों को लगातार अलग अलग एक्टिविटी में सीमा के द्वारा बच्चों को व्यस्त रखा जाता है जिससे बच्चों के मानसिक विकास के साथ बच्चों में सीखने  की ललक पैदा होती है जिससे बच्चों के अंदर सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा  आज इनके द्वारा  बच्चों को कॉपी पेन प्रदान किया गया, विगत कई वर्षों से  बच्चो को फ्री टयूशन क्लास के साथ अलग - अलग एक्टिविटी भी करवाती रही है , जैसे- फ्री योग क्लास, एनुअल फंक्शन के तर्ज पर- सपोर्ट एक्टिविटी,डांस प्रतियगिता, ड्रॉइंग प्रतियोगिता के साथ अलग अलग एक्टिविटी

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करवाती रही है,बच्चे भी उत्साह पूर्वक भाग लेते रहे,इस बार पुनः लॉकडाउन की स्थिति निर्मित हुई तो  एक बार फिर बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए सीमा वर्मा ने बच्चों को लगातार  उत्साहित करने के लिए ड्रॉइंग प्रतियोगिता,आर्ट एंड क्राफ्ट प्रतियोगिता का आयोजन किया,जिसमे बच्चों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया,किसी ने संदेश देने वाले ड्रॉइंग बनाए,तो किसी ने मिट्टी से खूबसूरत घर,कुआ, शिवलिंग,कछुआ,बतख,किचन सेट,बैटरी से चलने वाली लैंप,पॉट के साथ सुंदर सुंदर क्राफ्ट बनाए, सीमा वर्मा ने बच्चों को  स्टेशनरी का समान कॉपी,पेन,पेंसिल,स्केल,रबर,कटर,के साथ चॉकलेट गिफ्ट में दिया |

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सीमा वर्मा लगातार बच्चो को कोरोनावायरस से बचने के उपाय भी लगातार बताती हैं जिसमे बच्चों को हाथ धोने के तरीके,मास्क लगाने , कोरोनागाइडलाइन का पालन करने के बारे में जागरूकता कार्यक्रम भी करती रहती है |

बच्चों  के लिए इनके द्वारा निस्वार्थ  सोच के साथ  किया गया कार्य समाज  एक बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा है
इनके कार्यों से युवा काफी प्रभावित हो रहे |

लगातार बच्चों को एक्टिव रखने के साथ इनके द्वारा चलाए जा रहे एक रुपया मुहिम से जरूरत मंद बच्चों के साल भर की फीस भी इनके द्वारा जमा की जाती है


जनसंख्या नियंत्रण के लिये आम सहमति बने

जनसंख्या नियंत्रण के लिये आम सहमति बने

10-Jul-2021

अन्तर्राष्ट्रीय जनसंख्या दिवस- 11 जुलाई 2021
जनसंख्या नियंत्रण के लिये आम सहमति बने

- ललित गर्ग-

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प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को अन्तर्राष्ट्रीय जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। बढती आबादी जिसे जनसंख्या विस्फोट का नाम दिया जाता हैं। यह भारत और सम्पूर्ण विश्व समुदाय के लिए आने वाली सबसे विकट समस्याओं में से एक हैं। अत्यधिक तेज गति से बढ़ती जनसंख्या के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के उद्देश्य से ही यह दिवस मनाया जाता है। यह जागरूकता मानव समाज की नई पीढ़ियों को बेहतर जीवन देने का संदेश देती है। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, प्रदूषण मुक्त वातावरण सहित अन्य आवश्यक सुविधाएँ भविष्य में देने के लिए छोटे परिवार की महती आवश्यकता निरन्तर बढ़ती जा रही है। प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन कर मानव समाज को सर्वश्रेष्ठ बनाए रखने और हर इंसान के भीतर इन्सानियत को बरकरार रखने के लिए यह बहुत जरूरी हो गया है कि ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ की महत्ता को समझा जाए।
भारत की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा होनेवाली है। निकट भविष्य में हम  चीन को पीछे छोड़ कर 150 करोड़ के आंकड़े को छू लेने वाले है। दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी का देश होना कोई गर्व की बात नहीं है। बढ़ती आबादी एवं सिकुड़ते संसाधन एक त्रासदी है, एक विडम्बना है, एक अभिशाप है। क्योंकि जनसंख्या के अनुपात में संसाधनों की वृद्धि सीमित है। जनसंख्या वृद्धि ने कई चुनौतियों को जन्म दिया है किंतु इसके नियंत्रण के लिये कानूनी तरीका एक उपयुक्त कदम नहीं माना जा सकता। भारत की स्थिति चीन से पृथक है तथा चीन के विपरीत भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ हर किसी को अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में निर्णय लेने का अधिकार है। भारत में कानून का सहारा लेने के बजाय जागरूकता अभियान, शिक्षा के स्तर को बढ़ाकर तथा गरीबी को समाप्त करने जैसे उपाय करके जनसंख्या नियंत्रण के लिये प्रयास होने चाहिये। परिवार नियोजन से जुड़े परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये तथा ऐसे परिवार जिन्होंने परिवार नियोजन को नहीं अपनाया है उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से परिवार नियोजन हेतु प्रेरित करना चाहिये। बेहतर तो यह होगा कि शादी की उम्र बढ़ाई जाए, स्त्री-शिक्षा को अधिक आकर्षक बनाया जाए, परिवार-नियंत्रण के साधनों को मुफ्त में वितरित किया जाए, संयम को महिमा-मंडित किया जाए और छोटे परिवारों के लाभों को प्रचारित किया जाए। शारीरिक और बौद्धिक श्रम के फासलों को कम किया जाए।
भारत में बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने में राजनीति एवं तथाकथित स्वार्थी राजनीतिक सोच है। अधिकांश कट्टरवादी मुस्लिम समाज लोकतांत्रिक चुनावी व्यवस्था का अनुचित लाभ लेने के लिए अपने संख्या बल को बढ़ाने के लिये सर्वाधिक इच्छुक रहते हैं और इसके लिये कुछ राजनीतिक दल उन्हें प्रेरित भी करते हैं। ऐसे दलों ने ही उद्घोष दिया है कि “जिसकी जितनी संख्या भारी सियासत में उसकी उतनी हिस्सेदारी।’’जनसंख्या के सरकारी आकड़ों से भी यह स्पष्ट होता रहा हैं कि हमारे देश में इस्लाम सबसे अधिक गति से बढ़ने वाला संप्रदाय-धर्म बना हुआ हैं। इसलिए यह अत्यधिक चिंता का विषय है कि ये कट्टरपंथी अपनी जनसंख्या को बढ़ा कर स्वाभाविक रूप से अपने मताधिकार कोष को बढ़ाने के लिए भी सक्रिय हैं। सीमावर्ती प्रांतों जैसे पश्चिम बंगाल, आसाम, कश्मीर आदि में वाकायदा पडौसी देशों से मुस्लिमों की घुसपैठ कराई जाती है और उन्हें देश का नागरिक बना दिया जाता है, यह एक तरह का “जनसंख्या जिहाद” है क्योंकि इसके पीछे इनका छिपा हुआ मुख्य ध्येय हैं कि हमारे धर्मनिरपेक्ष देश का इस्लामीकरण किया जाये।
इसके वितरीत विभिन्न मुस्लिम देश टर्की, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मिस्र, सीरिया, ईरान, यू.ऐ. ई., सऊदी अरब व बंाग्लादेश आदि ने भी कुरान, हदीस, शरीयत आदि के कठोर रुढ़ीवादी नियमों के उपरांत भी अपने-अपने देशों में जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रित करने के कठोर उपक्रम किये हैं। फिर भी विश्व में भूमि व प्रकृति का अनुपात प्रति व्यक्ति संतुलित न होने से पृथ्वी पर असमानता बढ़ने के कारण गंभीर मानवीय व प्राकृतिक समस्याएं उभर रही है। सभी मानवों की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए व्यावसायीकरण बढ़ रहा है। बढ़ती हुई जनसंख्या संसाधनों को खा रही है। औद्योगीकरण होने के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है व बढ़ती आवश्यक वस्तुओं की मांग पूरी करने के लिए मिलावट की जा रही है। जिससे स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त वायु प्रदूषण, कूड़े-कर्कट के जलने पर धुआं, प्रदूषित जल व खाद्य-पदार्थ, घटते वन व चारागाह, पशु-पक्षियों का संकट, गिरता जल स्तर व सूखती नदियां, कुपोषण व भयंकर बीमारियां, छोटे-छोटे झगड़ें, अतिक्रमण, लूट-मार, हिंसा, अराजकता, नक्सलवाद व आतंकवाद इत्यादि अनेक मानवीय आपदाओं ने भारत भूमि को विस्फोटक बना दिया है। फिर भी जनसंख्या में बढ़ोत्तरी की गति को सीमित करने के लिए सभी नागरिकों के लिए कोई एक समान नीति नहीं हैं । प्राप्त आंकडों के अनुसार हमारे ही देश में वर्ष 1991, 2001 और 2011 के दशक में प्रति दशक क्रमशः 16.3 ,  18.2  व  19.2  करोड़ जनसंख्या और बढ़ी है। जबकि उपरोक्त वृद्धि के अतिरिक्त  बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार आदि से निरंतर आने वाले घुसपैठिये व अवैध व्यक्तियों की संख्या भी लगभग 7 करोड़ होने से एक और गंभीर समस्या हमको चुनौती दे रही है । इन अराजक होती स्थितियों को नियंत्रित करके ही हम जनसंख्या विस्फोट की समस्या से मुक्ति पा सकते हैं।
इसके विपरीत किसी देश में युवा तथा कार्यशील जनसंख्या की अधिकता तथा उससे होने वाले आर्थिक लाभ को जनसंख्या के लाभ के रूप में देखा जाता है। भारत में मौजूदा समय में विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या युवाओं की है, यदि इस आबादी का उपयोग भारत की अर्थव्यवस्था को गति देने में किया जाए तो यह भारत को लाभ प्रदान करेगा। किंतु यदि शिक्षा गुणवत्ता परक न हो, रोजगार के अवसर सीमित हों, स्वास्थ्य एवं आर्थिक सुरक्षा के साधन उपलब्ध न हों तो बड़ी कार्यशील आबादी एक अभिशाप का रूप धारण कर सकती है। अतः विभिन्न देश अपने संसाधनों के अनुपात में ही जनसंख्या वृद्धि पर बल देते हैं। भारत में वर्तमान स्थिति में युवा एवं कार्यशील जनसंख्या अत्यधिक है किंतु उसके लिये रोजगार के सीमित अवसर ही उपलब्ध हैं। ऐसे में यदि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित न किया गया तो स्थिति भयावह हो सकती है। इसी संदर्भ में हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनसंख्या नियंत्रण की बात कही है। यह ऐसी समस्या है जिसे धर्म, जाति, सम्प्रदाय के संकीर्ण नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।
जनसंख्या वृद्धि एक नयी चुनौती बनकर हमारे सामने आई और आज भी इस पर काबू पाने में सरकार को कठिनाई हो रही है। जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम देश को भोगने पड़ रहे हैं। अधिक जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की विकराल समस्या उत्पन्न हो गयी है। लोगों के आवास के लिए कृषि योग्य भूमि और जंगलों को उजाड़ा जा रहा है। यदि जनसंख्या विस्फोट यूं ही होता रहा तो लोगों के समक्ष रोटी कपड़ा और मकान की विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इससे बचने का एक मात्र उपाय यही है की हम येन केन प्रकारेण बढ़ती आबादी को रोकें। अन्यथा विकास का स्थान विनाश को लेते अधिक देर नहीं लगेगी। सरकार को इस विशेष अवसर पर सबकी सहमति से जनसंख्या नियंत्रण पर कानून का निर्धारण करना चाहिए।
प्रेषकः

 

 (ललित गर्ग)
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मो. 9811051133