राजनीति का अवसरवादी चेहरा

राजनीति का अवसरवादी चेहरा

23-Nov-2019

सैय्यद एम अली तक़वी, निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, syedtaqvi12@gmail.com

महाराष्ट्र राजनीति में आज का दिन हमेशा याद किया जायेगा। इसलिए नहीं कि एक महीने से चला आ रहा गतिरोध अप्रत्याशित रूप से समाप्त हो गया। बल्कि इसलिए कि आश्चर्यजनक तरीके से देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजीत पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। इन सबके बीच भाजपा नेता नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र सरकार के गठन पर कहा, 'मैंने पहले ही कहा था कि क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी हो सकता है। आज के दौर में राजनेता पूरी तरह से राजनीति को गन्दा एवं भ्रष्टाचार से युक्त करना चाहते हैं।

 एनसीपी चीफ शरद पवार और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा को लेकर जमकर भड़ास निकाली। शरद पवार ने कहा कि उन्हें इस फैसले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसके साथ ही उन्होंने  शिवसेना के साथ रहने का ऐलान किया । यह वक्तव्य भी भूल-भुलैया की तरह है । शरद पवार के अनुसार अजीत पवार ने राज्यपाल को एनसीपी विधायकों के समर्थन की जो सूची सौंपी है वह सही नहीं है। इस बात को लेकर क्या कहा जाए- सेटिंग या बेटिंग ?
बहरहाल आज राजनीति का एक अद्भुत चेहरा सामने आया है। शरद पवार राजनीति के पितामह समान हैं। शायद इसीलिए आज का घटनाक्रम सामने आया।

इस घटनाक्रम से यह बात भी साफ हो गई कि राजनीति का मकसद सिर्फ़ सत्ता है। बीते कुछ वर्षों से राजनीति में सत्ता के लोभियों की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है। रही सही कसर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। जब अवसरवादी सत्ता की कुर्सी पर आसीन होंगे तो जनता को न्याय नहीं मिल सकता है। बहरहाल पवार ग्रुप ने पावर में आने के लिए जो पुअर परफॉर्मेंस दी है वह राजनीति के पावर को घटाने के लिए काफी है।

 


कल्याण दौड में भी आदिवासी बेचैन क्यों?

कल्याण दौड में भी आदिवासी बेचैन क्यों?

22-Nov-2019

 -ः ललित गर्ग :-

राजधानी दिल्ली में आदिवासी जनजीवन से जुड़ी संस्कृति का आदि महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 27 राज्यों के आदिवासियों की संस्कृति, जीवनशैली और भोजन की विविधता का प्रदर्शन करने वाले इस महोत्सव का उद्घाटन किया। एक तरफ सरकार आदिवासी जनजीवन के लिये बेहतर जीवन देने, उनके अधिकारों की रक्षा और उनके विकास के लिए कृतसंकल्प होने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री के गृहराज्य गुजरात में आदिवासी अपने अधिकारों को लेकर आन्दोलनरत है। न केवल गुजरात बल्कि पडौसी राज्य मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आदिवासी हुंकार यात्रा एवं भोपाल में महारैली होना और झारखंड जैसे आदिवासी समझे जाने वाले राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियां के दौरान भी आदिवासी जनजीवन के विरोध के स्वर दिखाई दे रहे हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों है? क्या सरकार की कथनी और करनी में व्यापक खाइयां है? क्या आज भी आदिवासी कोरे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होने को विवश है? कब आदिवासी समस्या मुक्त जीवन जी पाएंगे?

एक तरफ आदिवासी इन ज्वलंत प्रश्नों के समाधान की आस लगाए है तो दूसरी ओर सरकारें आदिवासी कल्याण के लिये अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा रही है। अगर गृहमंत्री अमित शाह के दावों पर यकीन किया जाए तो देश में भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासियों की विधिवत परवाह की है और उन्हें अपने भविष्य को लेकर किसी प्रकार की चिंता से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनेक अवसरों पर आदिवासी कल्याण एवं उन्नत जीवन के संकल्प को दोहराया है और अनेक बहुआयामी योजनाएं शुरु की है। फिर प्रश्न है कि क्या कांग्रेस पार्टी ने आदिवासियों को वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया? इस बात पर कांग्रेस पार्टी का दावा है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आदिवासियों के लिए पंचशील सिद्धांत लागू किया और पांचवीं अनसूची के तहत आदिवासियों की संस्कृति और संसाधन की सुरक्षा की व्यवस्था की।

इंदिरा गांधी ने बंधुआ मजदूरी समाप्त की और बाद में कांग्रेसी सरकारों ने संविधान में 73वें संशोधन के तहत पंचायती राज की व्यवस्था लागू की, ऐसा कानून बनाया और 2006 में वन अधिकार कानून बनाया। दूसरी ओर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पहली बार 1999 में देश में आदिवासी मामलों का मंत्रालय बनाया और मौजूदा मोदी सरकार उनके लिए उजाला, शिक्षा और घर की योजना के तहत ऐसा काम कर रही है जो उन्हें बेहतर जीवन देने और उनके विकास के लिए कृतसंकल्प है। फिर प्रश्न है कि दोनों ही मुख्य पार्टियों ने जब आदिवासी जनजीवन के उन्नयन एवं उत्थान के लिये व्यापक प्रयत्न किये हैं तो फिर आदिवासी असंतुष्ट एवं बेचैन क्यों है?

आदिवासियों के असंतोष के कारण का खुलासा अमित शाह ने ही कर दिया कि आदिवासियों की आबादी सिर्फ 8 फीसदी है और फैलाव देश के 40 फीसदी भूभाग पर। भारत में लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र है, इसके अधिकांश हिस्से में आदिवासी समुदाय रहता है। लगभग नब्बे प्रतिशत खनिज सम्पदा, प्रमुख औषधियां एवं मूल्यवान खाद्य पदार्थ इन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में हैं। यह वह इलाका है जहां पर 71 प्रतिशत जंगल है, 92 प्रतिशत कोयला है, 92 प्रतिशत बाॅक्साइट है, 98 प्रतिशत लोहा है, 100 प्रतिशत यूरेनियम है, 85 प्रतिशत तांबा और 70 प्रतिशत जलस्रोत भी उन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में है। भारत के उद्योगों के लिए 80 प्रतिशत कच्चा माल भी उन्हीं इलाकों से आता है। विडंबना यह है कि इसमें से सिर्फ 10 प्रतिशत जमीन पर आदिवासियों का मालिकाना हक है। असली संघर्ष औद्योगिक और पूंजीवादी विकास और आदिवासी अस्तित्व के बीच है। आदिवासी अपना अस्तित्व चाहते हैं और आधुनिक विकास अपने लिए उनके संसाधन। आदिवासियों के असंतोष एवं आक्रोश के अन्य कारण भी है। 

जैसे कि सन् 1956 से लेकर 2017 तक के समय में गुजरात के सौराष्ट्र के गिर, वरडा एवं आलेच के जंगलों में रहने वाले भरवाड, चारण, रबारी एवं सिद्धि मुस्लिमों को इनके संगठनों के दवाब में आकर गलत तरीकों से आदिवासी बनाकर उन्हें आदिवासी जाति के प्रमाण-पत्र दिये गये हैं और उन्हें आदिवासी सूची में शामिल कर दिया गया है। यह पूरी प्रक्रिया बिल्कुल गलत, असंवैधानिक एवं गैर आदिवासी जातियों को लाभ पहुंचाने की कुचेष्टा है, जिससे मूल आदिवासियों के अधिकारों का हनन हुआ है, उन्हें नौकरियों एवं अन्य सुविधाओं से वंचित होना पर रहा है। गुजरात में ही असंतोष का कारण एक और भी है कि छोटा उदयपुर संसदीय क्षेत्र के आदिवासी राठवा जाति को सरकारी आंकड़ों में कोली शब्द लिखे जाने से उनके आदिवासी अस्तित्व को नुकसान हो रहा है।

इस प्रांत में राठवा जाति के आदिवासी लोगों को कोली के रूप में मान्य किये जाने से इस प्रांत के आठ से दस लाख आदिवासी समुदाय का अस्तित्व खतरे में हैं। वर्तमान में रेवन्यू रिकार्ड में राठवा को सरकारी कर्मचारियों की भूल के कारण मात्र कोली शब्द लिख देने से उनके आदिवासी होने की पहचान को खतरा उपस्थित हो गया है। इस कारण इस क्षेत्र के आदिवासी नाराज है, उनकी सरकारी नौकरियों पर खतरा है, अन्य सुविधाओं से भी उन्हें वंचित होना पड़ रहा है। 

जबकि स्वतंत्रता आन्दोलन में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज भी जब भी जरूरत होती है, यह समाज देश के लिये हर तरह का बलिदान देने को तत्पर रहता है। फिर क्या कारण है कि इस जीवंत एवं मुख्य समाज को आदिवासी की मूल धारा से काटने के प्रयास निरन्तर किये जा रहे हैं। आजादी के बाद बनी सभी सरकारों ने इस समाज की उपेक्षा की है। आदिवासियों की ताजा बेचैनी का कारण 2006 के वन अधिकार कानून के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई भी है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से पैरवी में ढिलाई के चलते ही एक करोड़ आदिवासियों के लिए 13 फरवरी 2019 को बेदखली का आदेश पारित हो गया था। बाद में जब देश भर से गुहार लगी तो स्थगनादेश जारी हुआ।

इस तरह यह आदिवासी समाज अनेक समस्याओं से घिरा है। हजारों वर्षों से जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को हमेशा से दबाया और कुचला जाता रहा है जिससे उनकी जिन्दगी अभावग्रस्त एवं समस्याओं में ही रही है। केंद्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ों रुपए का प्रावधान बजट में करती है। इसके बाद भी उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। स्वास्थ्य सुविधाएं, पीने का साफ पानी आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं।

 जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों को अपनी भूमि से बहुत लगाव होता है, उनकी जमीन बहुत उपजाऊ होती हंै, उनकी माटी एक तरह से सोना उगलती है। जनसंख्या वृद्धि के कारण भूमि की मांग में वृद्धि हुई है। इसीलिये आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों एवं उनकी जमीन पर विकासवादी ताकते एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नजर है। कम्पनियों ने आदिवासी क्षेत्रों में घुसपैठ की है जिससे भूमि अधिग्रहण काफी हुआ है। आदिवासियों की जमीन पर अब वे खुद मकान बना कर रह रहे हैं, बड़े कारखाने एवं उद्योग स्थापित कर रहे हैं, कृषि के साथ-साथ वे यहाँ व्यवसाय भी कर रहे हैं। भूमि हस्तांतरण एक मुख्य कारण है जिससे आज आदिवासियों की आर्थिक स्थिति दयनीय हुई है। माना जाता है कि यही कंपनियां आदिवासी क्षेत्रों में युवाओं को तरह-तरह के प्रलोभन लेकर उन्हें गुमराह कर रही है, अपनी जड़ों से कटने को विवश कर रही है। उनका धर्मान्तरण किया जा रहा है। उन्हें राष्ट्र-विरोधी हरकतों के लिये उकसाया जाता है। इस तरह की स्थितियां आदिवासी समाज के अस्तित्व और उनकी पहचान के लिए खतरा बनती जा रही है। 

आज बड़े ही सूक्ष्म तरीके से इनकी पहचान मिटाने की व्यापक साजिश चल रही है। कतिपय राजनीतिक दल उन्हें वोट बैंक मानती है। वे भी उनको ठगने की कोशिश लगातार कर रही है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी विमुक्त, भटकी बंजारा जातियों की जनगणना नहीं की जाती है। तर्क यह दिया जाता है कि वे सदैव एक स्थान पर नहीं रहते। आदिवासियों की ऐसी स्थिति तब है जबकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आदिवासी को भारत का मूल निवासी माना है लेकिन आज वे अपने ही देश में परायापन, तिरस्कार, शोषण, अत्याचार, धर्मान्तरण, अशिक्षा, साम्प्रदायिकता और सामाजिक एवं प्रशासनिक दुर्दशा के शिकार हो रहे हैं। आदिवासी वर्ग की मानवीय गरिमा को प्रतिदिन तार-तार किया जा रहा है। जबकि दोनों राष्ट्रीय पार्टियों और उनकी सरकारों में आदिवासियों के कल्याण की होड़ लगी है। इस होड की दौड के बावजूद आदिवासियों के भीतर बेचैनी क्यों बढ़ती जा रही हैं?


रोज नई दिक्कतों के बाद   साथ - साथ रह सकेंगे अंजलि और इब्राहिम !

रोज नई दिक्कतों के बाद साथ - साथ रह सकेंगे अंजलि और इब्राहिम !

22-Nov-2019

प्यार के लिए संघर्ष के दौर से गुजरने वाले एक शादीशुदा जोड़े ने साथ रहने के लिए डेढ़ साल की कानूनी लड़ाई लड़ी और आज का दिन उनके लिए बेहद खास रहा।जागरण हमारे प्रतिनिधि के अनुसार अब ,पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ मिला और अब दोनों आगे की जिंदगी साथ-साथ गुजार सकेंगे।
प्रेमी युगल  धमतरी के रहने वाले अंजली जैन और इब्राहिम खान ने दूसरे  धर्म का होने के बावजूद एक दूसरे से प्रेम  किया और फिर जिंदगी भर साथ रहने की कसमें खाते हुए प्रेम विवाह  कर ली, लेकिन अपने रिश्तेदारों और दुनियावालों को यह शादी नागवार गुजरी।
इस रिश्ते को लव जेहाद की संज्ञा दी गई और फिर अंजली के घर वालों ने दोनों को अलग कर दिया। मामला अदालत में पहुंचा और फिर नौ माह तक सखी वन स्टॉप सेंटर में कैदी जैसी जिंदगी गुजारने के बाद अंजली बुधवार को यहां की चाहरदीवारी से आजाद हुई। उसे वहां लेने उसके पति आए थे।

 


बैंक ने एक एकाउंट नंबर दो खाताधारको को दे दिया, एक डालता था पैसा दूसरा निकाल लेता, पकड़े जाने पर शख्स ने कहा मुझे लगा मोदी जी पैसा डाल रहे हैं

बैंक ने एक एकाउंट नंबर दो खाताधारको को दे दिया, एक डालता था पैसा दूसरा निकाल लेता, पकड़े जाने पर शख्स ने कहा मुझे लगा मोदी जी पैसा डाल रहे हैं

21-Nov-2019

एमपी गजब है हम यह इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मध्यप्रदेश से एक और ऐसा ही गजब खबर प्रकाश में आया है आज तक में प्रकाशित खबर के अनुसार मध्यप्रदेश के भिंड में अजीबोगरीब मामला सामने आया. भिंड जिले के आलमपुर गांव में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में एक ही खाता नंबर दो लोगों को एलॉट कर दिया गया. यानी एकाउंट नंबर एक और खाता धारक दो. बैंक ने पासबुक दी. उसमें कस्टमर नंबर भी एक ही लिख दिया. 

इस एकाउंट में एक ग्राहक पैसे डालता रहा और दूसरा ग्राहक उसे सरकारी पैसा समझकर निकालता रहा. ऐसा 6 महीने तक चला. 6 महीने में 89 हजार रुपए खाते से निकाल लिए गए. आलमपुर में रुरई गांव है. यहां रहते हैं हुकुम सिंह. इन्होंने एसबीआई की आलमपुर ब्रांच में खाता खुलवाया. 12 नवंबर 2018 को पासबुक मिली. इसके बाद वे हरियाणा चले गए. वहां पैसे कमाते और इसमें डालते. 16 अक्टूबर 2019 को वापस गांव आए. खाते से पैसे निकालने गए तो पता चला कि खाते से तो 89 हजार रुपए निकाल लिए गए हैं.

खाते से निकालता रहा किसी और के पैसे, बोला- मुझे लगा मोदीजी ने डाले हैं

हुकुम सिंह तत्काल मामला लेकर एसबीआई के ब्रांच मैनेजर राजेश सोनकर के पास पहुंचे. जांच करने पर पता चला कि एक ही एकाउंट 2 लोगों को एलॉट कर दिया गया है. इस एकाउंट का दूसरा मालिक रोनी गांव का हुकुम सिंह बघेल है. इन्हें 23 मई 2016 को पासबुक जारी हुई थी. यानी हरियाणा वाले हुकुम सिंह से खाता खुलने से काफी पहले. फिर दोनों हुकुम सिंहों को बैंक ने बुलाया. हुकुम सिंह बघेल ने बताया कि पैसा निकालने के लिए बाकायदा आधार कियोस्क सेंटर पर जाकर बायोमीट्रिक मशीन में अंगूठा लगाकर पैसा निकालते थे.

खाते से निकालता रहा किसी और के पैसे, बोला- मुझे लगा मोदीजी ने डाले हैं

जब उनसे पूछा गया कि जब खाते में पैसा डाल नहीं रहे थे, तो निकाल किस हक से रहे थे. तब हुकुम सिंह बघेल ने बताया कि मुझे लगा कि मोदी जी पैसा डाल रहे हैं इसलिए मैं निकाल रहा था. फिर बैंक ने सादे कागज पर हुकुम सिंह बघेल से लिखवाया कि वो हुकुम सिंह को तीन किस्तों में 89 हजार रुपए वापस करेंगे. बघेल ने कागज पर अंगूठा लगाकर कहा कि वे सारे पैसे वापस कर देंगे, तब जाकर मामला शांत हुआ.

 


एक अरब डॉलर मूल्य के तोपों को अमेरिका से खरीदेगा भारत

एक अरब डॉलर मूल्य के तोपों को अमेरिका से खरीदेगा भारत

21-Nov-2019

भाषा की खबर 

वाशिंगटन: ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस को बताया है कि उसने भारत को एक अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य की नौसेना की तोपों को बेचने का निर्णय लिया है. इस प्रस्तावित बिक्री के साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिसे अमेरिका ने अपने नौसेना तोपों के नवीनतम (मोड 4) की बिक्री का फैसला किया है. इन तोपों का इस्तेमाल युद्धपोतों तथा युद्धक विमानों के खिलाफ और तटों पर बमबारी के लिए किया जाता है और इस फैसले से भारतीय नौसेना की घातक क्षमताओं में बढ़ोतरी होगी.

रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी ने मंगलवार को जारी अपनी अधिसूचना में कहा कि 13 एमके-45 पांच इंच/ 62 कैलिबर (एमओडी 4) नौसैनिक तोपों और उनसे संबंधित उपकरणों की प्रस्तावित विदेशी सैन्य बिक्री की अनुमानित लागत 1.0210 अरब डॉलर है.

अधिसूचना में कहा गया है कि बीएई सिस्टम्स लैंड एंड आर्मामेंट्स द्वारा बनाए जाने वाले इन हथियारों की प्रस्तावित बिक्री से भारत को दुश्मनों के हथियारों से मौजूदा और भविष्य के जोखिमों से निपटने में मदद मिलेगी. अधिसूचना में कहा गया है, ‘एमके-45 गन सिस्टम से अमेरिका और अन्य संबद्ध बलों के साथ अंतर-क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ एंटी-सर्फेस युद्ध और एंटी-एयर रक्षा मिशन का संचालन करने की क्षमता मिलेगी.’ इसमें कहा गया है कि इस बढ़ी हुई क्षमता की मदद से भारत क्षेत्रीय खतरों से निपटने और अपनी जमीन की रक्षा करने में सक्षम होगा.

अभी तक इन तोपों को ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया को ही बेचा गया है. थाईलैंड को मोड 4 का उन्नत संस्करण दिया गया है. ब्रिटेन और कनाडा जैसे अपने मित्र देशों को भी अमेरिका इन तोपों की बिक्री करने के लिए प्रतिबद्ध है.


सरकार ने बताया 10 केंद्रीय एजेंसियों को है टेलीफोन बातचीत टैप करने का अधिकार

सरकार ने बताया 10 केंद्रीय एजेंसियों को है टेलीफोन बातचीत टैप करने का अधिकार

20-Nov-2019

मीडिया रिपोर्ट 

नई दिल्ली: सरकार ने मंगलवार को लोकसभा को सूचित किया कि सीबीआई, ईडी और आईबी समेत 10 केंद्रीय एजेंसियों को टेलीफोन बातचीत टैप करने का अधिकार है और उन्हें फोन कॉल पर किसी की निगरानी करने से पहले केंद्रीय गृह सचिव की मंजूरी लेनी होती है.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार को देश की संप्रभुता या अखंडता के हित में किसी कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से उत्पन्न, प्रेषित, प्राप्त या संग्रहित सूचना को बीच में रोकने, उस पर निगरानी रखने या उसके कोड को पढ़ने के लिहाज से बदलने का अधिकार प्रदान करती है.

उन्होंने कहा, ‘कानून, नियमों और मानक परिचालन प्रक्रियाओं के प्रावधानों के तहत ही इस पर नजर रखने के अधिकार का क्रियान्वयन किया जा सकता है. केंद्र सरकार के मामले में केंद्रीय गृह सचिव को और राज्य सरकार के मामले में संबंधित राज्य सरकार के गृह सचिव से इसकी अनुमति लेनी होगी.’

केंद्र सरकार में जो दस एजेंसियां इस लिहाज से सक्षम प्राधिकार हैं, उनमें खुफिया ब्यूरो (आईबी), केंद्रीय अन्वेषण एजेंसी (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), रॉ, सिगनल खुफिया निदेशालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त शामिल हैं. वॉट्सऐप कॉल और संदेशों की टैपिंग से संबंधित सवाल के जवाब में सरकार ने यह उत्तर दिया.


मॉब लिंचिंग मामले में कोर्ट ने 8 आरोपियों को सुनाई उम्रकैद की सजा

मॉब लिंचिंग मामले में कोर्ट ने 8 आरोपियों को सुनाई उम्रकैद की सजा

20-Nov-2019

बिहार के भागलपुर में जनवरी, 2017 में हुई मॉब लिंचिंग मामले में कोर्ट ने आठ आरोपियों को 25-25 हजार रुपए का जुर्माना के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई है।
खबर के मुताबिक भागलपुर के शाहकुंड थाना क्षेत्र के रसुल्ला गांव में छह जनवरी, 2017 की सुबह चोरी के आरोप में उमेश मंडल के पुत्र नंदकिशोर मंडल (18) को पीट-पीटकर अधमरा कर बागीचे में फेंक दिया गया था। गंभीर स्थिति में नंदकिशोर को शाहकुंड स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती कराया गया था लेकिन हालत गंभीर देख डॉक्टर ने मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया था। इलाज के दौरान दिन के करीब 11 बजे नंदकिशोर ने दम तोड़ दिया था।
पुलिस जांच में सभी आरोपियों को दोषी पाकर 22 फरवरी, 2017 को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गयी। घटना का कारण  पंचायत चुनाव को लेकर आरोपियों से विवाद बताया गया  था। इसी रंजिश के कारण युवक को घर से बुलाकर हत्या कर दी गई।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को भीड़ द्वारा हत्या करने का दोषी पाया। कोर्ट ने उम्रकैद के साथ धारा 148 में एक-एक साल की सजा सुनाई।
जिला कोर्ट से आरोपियों का जमानत खारिज होने के बाद हाईकोर्ट में अपील की गई थी। हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर निचली अदालत को जल्द से जल्द ट्रायल पूरा कराने का आदेश दिया था। कोर्ट में सुनवाई के दौरान नौ लोगों ने गवाही दी और गवाहों ने घटना का समर्थन नहीं किया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी।

 


भारत-पाकिस्तान के बीच पोस्टल सर्विस बहाल, पार्सल पर प्रतिबंध

भारत-पाकिस्तान के बीच पोस्टल सर्विस बहाल, पार्सल पर प्रतिबंध

19-Nov-2019

मीडिया रिपोर्ट 

पाकिस्तानी मीडिया के हवाले से खबर है कि भारत-पाकिस्तान के बीच पोस्टल सर्विस बहाल हो गई है लेकिन पार्सल पर अब भी प्रतिबंध जारी है।  पाकिस्तान ने 27 अगस्त से भारत से किसी तरह की डाक की खेप को स्वीकार नहीं किया है। माना जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के विरोध में पाकिस्तान की ओर से यह कदम उठाया गया है। पाकिस्तान द्वारा भारत को डाक के जरिये पत्र आदि भेजने या भारत से आए पत्रों को स्वीकार करने से मना करने के बाद भारतीय डाक अधिकारियों ने पाकिस्तान के पते वाली डाक को रोकने पर मजबूर होना पड़ा है। रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तान से भेजे गए पत्र आदि सऊदी अरब की एयरलाइंस द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवाओं के जरिये भारत पहुंच रहे हैं।

पाकिस्तान के इस कदम को अनावश्यक माना गया क्योंकि पूर्व में विभाजन, युद्ध या सीमापार तनाव होने पर भी कभी डाक मेल सेवा बंद नहीं की गई है। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव हाल के समय काफी बढ़ा है। भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने के लिए भारत ने संविधान के अनुच्छेद 370 के कुछ प्रावधानों को समाप्त किया है जिसके बाद से यह तनाव और बढ़ गया है। हालांकि, भारत का कहना है कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करना उसका आंतरिक मामला है।


सांस लेने में दिक्कत के बाद नुसरत जहां अस्पताल में भर्ती

सांस लेने में दिक्कत के बाद नुसरत जहां अस्पताल में भर्ती

18-Nov-2019

कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस की सांसद और एक्ट्रेस नुसरत जहां को कोलकाता के अपोलो अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। सांस लेने में तकलीफ के बाद नुसरत जहां को रविवार यानी 17 नवंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया। टीएमसी सांसद के प्रवक्ता अभिषेक मजूमदार ने बताया कि नुसरत को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां से उन्हें जल्द ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। वहीं एक्ट्रेस के परिवार ने उन खबरों का खंडन किया है, जिसमें दावा किया गया था कि उन्हें दवा के ओवरडोज की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पश्चिम बंगाल के बशीरहाट से टीएमसी सांसद और अभिनेत्री नुसरत जहां को रविवार रात करीब 9.30 बजे कोलकाता के अपोलो अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।


अंजलि जैन-इब्राहिम सिद्दीकी मामले में हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, साथ रहने की इज़ाज़त दी !

अंजलि जैन-इब्राहिम सिद्दीकी मामले में हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, साथ रहने की इज़ाज़त दी !

16-Nov-2019

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर के चर्चित इब्राहिम और अंजलि जैन मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने अंजलि जैन को अपनी मर्ज़ी के व्यक्ति के साथ रहने का फ़ैसला सुनाया है.  बता दें की ये मामला कथित लव जिहाद के नाम से प्रचारित किया गया था. बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक अंजलि जैन पिछले आठ महीने से रायपुर के सखी सेंटिर में कैदियों की तरह रह रही थीं. उन्होंने अदालत के फैसले के बाद कहा है कि वे अपने पति इब्राहिम सिद्दीकी ऊर्फ आर्यन आर्य के साथ  ही रहेंगी .
अंजली ने हाईकोर्ट में एक चिट्ठी लिख कर विस्तार से अपनी पीड़ा दर्ज कराई थी. इसके अलावा अदालत ने इससे संबंधित मामलों की सुनवाई भी की और आठ नंवबर को इस मामले में फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
अब शुक्रवार की देर शाम आये फ़ैसले में कहा गया कि अंजलि जैन अपनी मर्जी से, अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ कहीं भी रहने के लिये स्वतंत्र हैं. हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि अंजलि जैन की रिहाई के समय रायपुर के पुलिस अधीक्षक व्यक्तिगत रुप से वहां उपस्थित रहें.
छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के रहने वाले 33 वर्षीय मोहम्मद इब्राहिम सिद्दीक़ी और 23 वर्षीय अंजलि जैन ने दो साल की जान-पहचान के बाद 25 फ़रवरी 2018 को रायपुर के आर्य मंदिर में शादी की थी. इससे पहले इब्राहिम ने अपना धर्म भी बदल लिया था और अपना नाम आर्यन आर्य रखा था.

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लेकिन अंजलि के घर वालों को जब इसकी खबर मिली तो उन्होंने अपनी बेटी को बहुत समझाने-बुझाने की कोशिश की. घरवालों का कहना था कि इब्राहिम पहले से ही एक शादी कर चुका है. इब्राहिम का सामाजिक रुप से तलाक भी हुआ है. उन्होंने बेटी को इब्राहिम से दूर रखने की कोशिश की.

इस दौरान अंजलि को इब्राहिम से मिलने नहीं दिया गया. इसके बाद इब्राहिम ऊर्फ आर्यन आर्य ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करते हुए न्यायालय से अपनी पत्नी अंजलि जैन को वापस किए जाने की गुहार लगाई.

लेकिन अदालत ने अंजलि जैन को सोच-विचार के लिए समय देते हुये छात्रावास में या माता-पिता के साथ रहने का आदेश पारित करते हुए मामले को ख़ारिज कर दिया. अंजलि जैन ने माता-पिता के साथ रहने के बजाय छात्रावास में रहना तय किया था. इसके बाद इब्राहिम ने हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

पिछले साल अगस्त में अंजलि को सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया, जहां अंजलि ने अपने माता-पिता के साथ रहने की इच्छा जताई. इसके कुछ ही दिन बाद अंजलि ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को फोन कर के बताया कि उन्हें पिता के घर में कैद कर के रखा गया है.

जिसके बाद पुलिस ने उन्हें पिता के घर से छुड़ा कर रायपुर के सखी सेंटर में रखा था. अदालती कार्रवाइयों के बीच अंजलि पिछले आठ महीने से रायपुर के सखी सेंटर में ही रह रही थीं.

 


राजस्थान की उदयपुर में बैठकर फर्जी कॉल सेंटर से ठग रहे थे अमेरिकियों को, 23 युवक-युवती गिरफ्तार

राजस्थान की उदयपुर में बैठकर फर्जी कॉल सेंटर से ठग रहे थे अमेरिकियों को, 23 युवक-युवती गिरफ्तार

15-Nov-2019

उदयपुर। राजस्थान की उदयपुर पुलिस ने गुरुवार रात को अंबर आर्केड की बिल्डिंग में संचालित फर्जी कॉल सेंटर में छापा मारा। हिंदी वन इण्डिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक इस सेंटर से 23 युवक-युवतियों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस की शुरुआती पूछताछ में पता चला कि ये लोग कॉल सेंटर की आड़ में अमेरिका समेत कई देशों के लोगों से ऑनलाइन ठगी करते थे।

उदयपुर के गोवर्धनविलास थानाधिकारी चेनाराम ने बताया कि शिकायत मिली थी कि बहुमंजिला इमारत अंबर आर्केड में फर्जी कॉल सेंटर संचालित है, जिसकी आड़ में लोगों को ठगा जा रहा है। गोवर्धनविलास थाना पुलिस मय टीम के यहां पर छापा मारा तो 23 युवक-युवतियां मिले, जो विदेशी लोगों को झांसे में लेकर ठगी करने में लगे हुए थे। पुलिस ने सभी को गिरफ्तार करते हुए यहां दो लाख रुपए की नकदी और 37 कम्प्यूटर जब्त किए हैं।

गोवर्धनविलास थानाधिकारी चेनाराम के अनुसार युव​क युवतियों से शुरुआती पूछताछ में ठगी की बात सामने आई है। वहीं, जब्त कम्प्यूटरों की भी जांच की जाएगी और गिरफ्तार लोगों से विस्तृत पूछताछ होगी, जिसमें और भी कई खुलासे होने की उम्मीद है।


केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे को याद दिलाया वादा, तो चढ़ गया मंत्री का पारा, लोगों से बैनर छीनकर फाड़ डाला

केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे को याद दिलाया वादा, तो चढ़ गया मंत्री का पारा, लोगों से बैनर छीनकर फाड़ डाला

15-Nov-2019

 हमेशा अपने बयानों के लेकर मीडिया की सुर्खियों में रहने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री और बक्सर से भाजपा सांसद अश्विनी कुमार चौबे का एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में वह अपना आपा खोते दिख रहे हैं। वीडियो में एक सामाजिक कार्यकर्ता उनपर बदतमीजी करने का आरोप लगाता दिख रहा है। इसके अलावा वह अश्विनी चौबे पर गाली देने का भी आरोप लगाता हुआ दिख रहा है।

दरअसल, मामला बक्सर के सर्किट हाउस का है जहां सदर अस्पताल में सुविधाओं को बहाल करने का आश्वासन देने वाले केंद्रीय मंत्री को उनका वादा याद दिलाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ दिव्यांग पहुंचे थे। चौबे ने बक्सर के सदर अस्पताल में डिजिटल एक्सरे और अल्ट्रासाउंड की सुविधा को बहाल करने का वादा किया था। जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें यह वादा याद दिलाया तो अश्विनी चौबे भड़क गए और अपना आपा खो दिया। उन्होंने उनके हाथों से बैनर छीनकर फाड़ दिया और उन्हें भाग जाने को कह दिया।

प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना था कि मंत्री जी ने वादा किया था कि बक्सर जिला अस्पताल में खराब अल्ट्रासाउंड मशीन को एक महीने के भीतर ठीक करा दिया जाएगा। बावजूद इसके तीन महीने बाद भी अल्ट्रासाउंड मशीन ठीक नहीं कराया गया। नाराज लोगों को जैसे इस बात की खबर लगी की मंत्री जी गेस्ट हाउस में रुके हुए हैं वे मौके पर हुंच गए हैं और प्रदर्शन करने लगे।

इसके बाद मंत्री अपनी कार में बैठने लगते हैं और उनके समर्थक अश्‍विनी चौबे जिंदाबाद के नारे लगाते हैं तो इस पर मंत्री कहते हैं कि 100 जिंदाबाद पर एक मुर्दाबाद भारी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पिछले 10 महीनों से अल्ट्रासाउंड मशीन अस्पताल में खराब पड़ी हुई है। मंत्री जी ने इसे ठीक कराने का आश्वासन दिया था। अप्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब इसका विरोध किया गया तो मंत्री जी भड़क गए और धक्का देने लगे।

साभार : JANTA KA REPORTER

http://www.jantakareporter.com/hindi/argument-breaks-out-between-union-minister-ashwini-choubey/272617/


बिरसा मुंडा हैं आदिवासी तेजस्विता का सफरनामा

बिरसा मुंडा हैं आदिवासी तेजस्विता का सफरनामा

15-Nov-2019

- ललित गर्ग-

किसी महापुरुष के कार्यों, अवदानों एवं जीवन का मूल्यांकन इस बात से होता है कि उन्होंने राष्ट्रीय एवं सामाजिक समस्याओं का समाधान किस सीमा तक किया, कितने कठोर संघर्षों से लोहा लिया। बिरसा मुंडा भी ऐसे ही एक युगांतरकारी शख्सियत थे, जिन्होंने आदिवासी जनजीवन के मसीहा के रूप में केवल 25 सालों में बिहार, झारखंड और ओडिशा में जननायक की पहचान बनाई। आज भी आदिवासी जनता बिरसा मुंडा को भगवान की तरह याद करती है। देश 19वीं सदी के प्रमुख आदिवासी जननायक बिरसा मुंडा की 145 वीं जयंती मना रहा है। अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। उन्हांेंने आदिवासी जनजीवन अस्मिता एवं अस्तित्व को बचाने के लिये लम्बा एवं कड़ा संघर्ष किया। वे महान् धर्मनायक थे, तो प्रभावी समाज-सुधारक थे। वे राष्ट्रनायक थे तो जन-जन की आस्था के केन्द्र भी थे। सामाजिक न्याय, आदिवासी संस्कृति एवं राष्ट्रीय आन्दोलन में उनके अनूठे एवं विलक्षण योगदान के लिये न केवल आदिवासी जनजीवन बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति सदा उनकी ऋणी रहेगी।

आदिवासियों का संघर्ष अट्ठारहवीं शताब्दी से आज तक चला आ रहा है। 1766 के पहाड़िया-विद्रोह से लेकर 1857 के गदर के बाद भी आदिवासी संघर्षरत रहे। सन् 1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला। आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-जमीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे। 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी जमींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-जमीन की लड़ाई छेड़ी थी।

उन्होंने सूदखोर महाजनों के खिलाफ भी जंग का ऐलान किया। ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, कर्ज के बदले उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते थे। यह मात्र विद्रोह नहीं था, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए महासंग्राम था। हालात तो आज भी नहीं बदले हैं, आज भी आदिवासी गांवों से खदेड़े जा रहे हैं, दिकू अब भी हैं। जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और न ही अब हैं। आजादी के सात दशकों के बाद भी आदिवासियों की समस्याएं नहीं बल्कि वे ही खत्म होते जा रहे हैं। सब कुछ वही है। जो नहीं है तो आदिवासियों के ‘भगवान’ बिरसा मुंडा।

 बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था। मुंडा रीति रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था। उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया। जहां वो खेतो में काम करके अपना जीवन चलाते थे। उनके पिता, चाचा, ताऊ सभी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। बिरसा के पिता सुगना मुंडा जर्मन धर्म प्रचारकों के सहयोगी थे। बिरसा का बचपन अपने घर में, ननिहाल में और मौसी की ससुराल में बकरियों को चराते हुए बीता। बाद में उन्होंने कुछ दिन तक चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। परन्तु स्कूलों में उनकी आदिवासी संस्कृति का जो उपहास किया जाता था, वह बिरसा को सहन नहीं हुआ। इस पर उन्होंने भी पादरियों का और उनके धर्म का भी मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। फिर क्या था। ईसाई धर्म प्रचारकों ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया।

बिरसा के जीवन में एक नया मोड़ आया। उनका स्वामी आनन्द पाण्डे से सम्पर्क हो गया और उन्हें हिन्दू धर्म तथा महाभारत के पात्रों का परिचय मिला। यह कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी आलौकिक घटनाएँ घटीं, जिनके कारण लोग बिरसा को भगवान का अवतार मानने लगे। लोगों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि बिरसा के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब ‘बिरसा भगवान’ कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे।

जन-सामान्य का बिरसा में काफी दृढ़ विश्वास हो चुका था, इससे बिरसा को अपने प्रभाव में वृद्धि करने में मदद मिली। लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया। उन्होंने सबसे अधिक बल अपनी संस्कृति एवं संस्कारों पर दिया, वे समानता एवं नैतिक आचरण के हिमायती थे। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे।

बिरसा मुंडा ने किसानों का शोषण करने वाले जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी लोगों को दी। उनका संघर्ष एक ऐसी व्यवस्था से था, जो किसानी समाज के मूल्यों और नैतिकताओं का विरोधी था। जो किसानी समाज को लूट कर अपने व्यापारिक और औद्योगिक पूंजी का विस्तार करना चाहता था। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ जमा करने से रोका। बिरसा का कहना था कि मैं तो अपनी जाति को अपना धर्म सिखा रहा हूँ। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयत्न किया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें छुड़ा लिया। शीघ्र ही वे फिर गिरफ्तार करके दो वर्ष के लिए हजारीबाग जेल में डाल दिये गये। बाद में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा गया कि वे कोई प्रचार नहीं करेंगे।

परन्तु बिरसा कहाँ मानने वाले थे। छूटने के बाद उन्होंने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए। एक दल मुंडा धर्म का प्रचार करने लगा और दूसरा राजनीतिक कार्य करने लगा। नए युवक भी भर्ती किये गए। इस पर सरकार ने फिर उनकी गिरफ्तारी का वारंट निकाला, किन्तु बिरसा मुंडा पकड़ में नहीं आये। इस बार का आन्दोलन बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार के उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ा। यूरोपीय अधिकारियों और पादरियों को हटाकर उनके स्थान पर बिरसा के नेतृत्व में नये राज्य की स्थापना का निश्चय किया गया।

भारत के इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे आदिवासी नायक हैं जिन्होंने झारखंड में अपने क्रांतिकारी विचारों से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया। अंग्रेजों द्वारा थोपे गए काले कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य को सांसत में डाल दिया। बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आचरण के धरातल पर आदिवासी समाज अंधविश्वासों की आंधियों में तिनके-सा उड़ रहा है तथा आस्था के मामले में भटका हुआ है। यह भी अनुभव किया कि सामाजिक कुरीतियों के कोहरे ने आदिवासी समाज को ज्ञान के प्रकाश से वंचित कर दिया है। बिरसा जानते थे कि आदिवासी समाज में शिक्षा का अभाव है, गरीबी है, अंधविश्वास है। बलि प्रथा पर भरोसा है, हड़िया कमजोरी है, मांस-मछली पसंद करते हैं। समाज बंटा है, लोगों के झांसे में आ जाते हैं।

धर्म के बिंदु पर आदिवासी कभी मिशनरियों के प्रलोभन में आ जाते हैं, तो कभी ढकोसलों को ही ईश्वर मान लेते हैं। इन समस्याओं के समाधान के बिना आदिवासी समाज का भला नहीं हो सकता इसलिए उन्होंने एक बेहतर नायक और समाज सुधारक की भूमिका अदा की। अंग्रेजों और शोषकों के खिलाफ संघर्ष भी जारी रखा। उन्हें पता था कि बिना धर्म के सबको साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा। इसलिए बिरसा ने सभी धर्मो की अच्छाइयों से कुछ न कुछ निकाला और अपने अनुयायियों को उसका पालन करने के लिए प्रेरित किया।

जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ्तारियां भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार कर लिये गये। ब्रिटिश हुकूमत ने इसे खतरे का संकेत समझकर बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। वहां अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर दिया था। जिस कारण 9 जून 1900 को बिरसा की मृत्यु हो गई। लेकिन लोक गीतों और जातीय साहित्य में बिरसा मुंडा आज भी जीवित हैं।

आजादी के बाद हमने बिरसा मुंडा की शहादत को तो याद रखा, लेकिन हम उनके मूल्यों से दूर होते गये। हमारी सत्ताएं उसी व्यवस्था की पोषक होती गयीं, जिनके विरुद्ध उन्होंने लड़ाई लड़ी। उनकी जन्म जयन्ती मनाना तभी सार्थक होगा, जब हम उन्हें केवल पूजा का पात्र न बनाकर कर जीवन का हिस्सा बनाये एवं उनके बताये मार्ग पर चले। 


आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले प्रख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन

आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले प्रख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन

14-Nov-2019

पटना : महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का गुरुवार को बिहार की राजधानी पटना में निधन हो गया है। वे 77 साल के थे। सिंह करीब 40 साल से सिजोफ्रेनिया बीमारी से पीड़ित थे। उनके एक करीबी ने बताया कि फिलहाल पटना में रहने वाले सिंह की आज सुबह तबीयत खराब हो गई थी, जिसके बाद परिजन उन्हें लेकर तत्काल पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) गए, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। बिहार के भोजपुर के बसंतपुर के रहने वाले सिंह की तबीयत पिछले महीने भी खराब हुई थी, जिनका इलाज पीएमसीएच में ही कराया गया था, बाद में इन्हें छुट्टी दे दी गई थी। कहा जाता है कि उन्होंने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्घांत को चुनौती दी थी। गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह अपने शैक्षणिक जीवनकाल से ही कुशाग्र रहे हैं।

भोजपुर के रहने वाले थे वशिष्ठ


आरा के बसंतपुर के रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह बचपन से होनहार थे। उन्होंने मैथ (गणित) से जुड़े कई फॉर्मूलों पर रिसर्च भी किया था। उन्हें पिछले कई वर्षों से सिज़ोफ्रेनिया की बीमारी थी। वशिष्ठ के निधन की खबर मिलते ही पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है। भोजपुर के लोगों को जैसे ही अपने होनहार बेटे और अनमोल धरोहर के खोने की खबर मिली उनका दिल बैठ गया।


बीएचयू के साउथ कैंपस में आरएसएस का झंडा हटाने वाले डिप्टी चीफ प्रॉक्टर का इस्तीफा

बीएचयू के साउथ कैंपस में आरएसएस का झंडा हटाने वाले डिप्टी चीफ प्रॉक्टर का इस्तीफा

14-Nov-2019

नई दिल्ली : एजेंसी 

बरकछा स्थित बीएचयू के साउथ कैंपस में आरएसएस (संघ) का ध्वज हटाने के मामले में केस दर्ज होने से क्षुब्ध डिप्टी चीफ प्रॉक्टर प्रो. किरण दामले ने बुधवार को इस्तीफा दे दिया। इस पर उन्होंने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। इतना जरूर कहा कि मंगलवार को उनके खिलाफ धरने पर बैठे छात्रों ने इस्तीफे की मांग की थी। लिहाजा, साउथ कैंपस में पठन-पाठन का माहौल बनाए रखने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया। 

साउथ कैंपस में मंगलवार सुबह कुछ छात्र स्टेडियम में संघ का ध्वज लगा कर शाखा लगाए हुए थे। इस बीच, डिप्टी चीफ प्रॉक्टर प्रो. किरण दामले भ्रमण करते हुए वहां पहुंचीं। उन्होने शाखा लगाने वाले छात्रों को अन्यत्र जाने का निर्देश दिया। उन्होंने संघ का ध्वज हटाकर अपने कार्यालय में रखवा दिया। इससे नाराज छात्र धरने पर बैठ गए। जानकारी होते ही नगर विधायक रत्नाकर मिश्र व आरएसएस के जिला कार्यवाह चन्द्रमोहन भी मौके पर पहुंच गए। 

संघ का ध्वज हटाने पर जिला कार्यवाह चन्द्रमोहन ने देहात कोतवाली में मंगलवार देर शाम डिप्टी चीफ प्रॉक्टर के खिलाफ रपट दर्ज करा दी। बुधवार सुबह उन्हें इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने साउथ कैंपस की आचार्य प्रभारी प्रो. रमा देवी निम्नापल्ली को अपना इस्तीफा भेज दिया। उनका इस्तीफा चीफ प्रॉक्टर डा.ओपी राय के पास भेज दिया गया। इस संबंध में साउथ कैंपस की आचार्य प्रो. रमादेवी निम्नापल्ली ने कहा कि मामले को राजनीतिक तूल न दिया जाए। यह विश्वविद्यालय परिसर का मामला है। विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले से निबटने में सक्षम है।

उन्होंने कहा कि डिप्टी चीफ प्रॉक्टर को संघ का ध्वज उतारने से पहले छात्रों से बात करनी चाहिए थी। हालांकि उन्हें ध्वज के नियमों के संबंध में खास जानकारी नहीं थी। विश्वविद्यालय में हर धर्म, समुदाय एवं वर्ग के छात्र-छात्राओं को पूजा-इबादत करने की छूट है। कहा कि डिप्टी चीफ प्रॉक्टर ने उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया है और उन्होंने उसे चीफ प्रॉक्टर के पास भेज दिया है।


पाकिस्तान ने अपने वायुसेना के म्यूजियम में विंग कमांडर अभिनंदन का पुतला लगाया

पाकिस्तान ने अपने वायुसेना के म्यूजियम में विंग कमांडर अभिनंदन का पुतला लगाया

13-Nov-2019

मीडिया रिपोर्ट 

पाकिस्तानी वायुसेना ने अपने एक म्यूजियम में एक पुतला लगाया है जो भारतीय वायुसेना के पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान की तरह नजर आता है. पीटीआई के मुताबिक यह पुतला कराची स्थित म्यूजियम में लगाया गया है. इस साल फरवरी में भारत-पाकिस्तान के बीच एक हवाई टकराव हुआ था. विंग कमांडर अभिनंदन ने इस दौरान पाकिस्तानी वायुसेना के विमान को मार गिराया था. हालांकि उनका विमान पाकिस्तान में गिर गया था. इसके बाद वे लगभग तीन दिनों तक पाकिस्तानी सेना की हिरासत में भी रहे थे.

मीडिया में आयी खबरों के अनुसार एयर चीफ मार्शल मुजाहिद अनवर खान ने इस सप्ताह पाकिस्तानी वायुसेना के इस म्यूजियम के नये सेक्शन का उद्घाटन किया है. इसका नाम ‘ऑपरेशन स्विफ्ट रिटॉर्ट’ रखा गया है. इसी हिस्से में एक पुतला लगा है जो विंग कमांडर अभिनंदन की तरह दिखता है. पुतले के पास चाय का कप और उनके विमान मिग-21 का ढांचा भी रखा हुआ है.

 


अगर आपको सिर्फ मुसलमान होने के लिए याद किया जाए तो यह आपकी तौहीन है।

अगर आपको सिर्फ मुसलमान होने के लिए याद किया जाए तो यह आपकी तौहीन है।

12-Nov-2019

Hafeez Kidwai की वाल से

अगर आपको सिर्फ मुसलमान होने के लिए याद किया जाए तो यह आपकी तौहीन है। अगर आपको मुसलमान सिर्फ अपना समझकर याद करें तो यह आपपर ज़ुल्म है। आपकी सोच इतनी गहरी थी की उसमे सब समा जाएँ। आपका इल्म इतना गहरा था जिसके सामने जाहिलियत खुद बखुद दम तोड़ दे। आज जिस इल्म की इमारत पर हम इतराते नही फिरते उसकी नींव आपने रखी। आज ही 11 नवम्बर को जब ज़मीन पर आपके कदम पड़े तो किसने सोचा था की यह इंसान नही बल्कि अनमोल मोतियों को गूँथने वाला धागा है। जिसकी ज़िन्दगी लोगो को जोड़ने में खर्च होगी। किसने सोचा था जो बेटा अपनी माँ को 11 साल की उम्र में ही खो देगा,वह मदरसों के चबूतरों पर बैठ कर एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत में इल्म का झण्डा बुलन्द करेगा। किसने सोचा था मदरसों की काई से लिपटी दीवारों में वोह अरबी,फ़ारसी,इंग्लिश,हिंदी,उर्दू का नायाब शरबत बनेगा।

भला किसने ख्वाब में भी यह सोचा होगा की बहारों से महरूम कोई लड़का पत्रकारिता,लेखन,एक्टिविज्म, पालिटिक्स,समाज सेवा,लीडरशिप में सबसे ऊँचा परचम थामेगा। कौन देख रहा था की मुल्क़ में सबसे पहले काँग्रेस का, सबसे कम उम्र का प्रेसिडेंट यह ही चुना जाएगा। किसी ने सोचा भी नही था की बंटवारे में अपनी ज़मीन को रोते हुए छोड़ते लोगो को किसी के लफ़्ज़ ऐसे बाँध लेंगे, की जो जहाँ रहा वही रुक गया। वह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे ,जिनकी आज पैदाइश है। यह भारत जैसा महान देश है जिसने उन्हें अपना पहला शिक्षा मंत्री चुना। यह मौलाना आज़ाद की महानता थी की उन्होंने इस माटी में ही अपनी हर साँसों को जिया निखारा और खूबसूरती से रुखसत हो गए आज़ादी की लड़ाई का बहुत मज़बूत स्तम्भ मौलाना आज़ाद ही तो जो नेहरू के कंधे पर हाथ रखकर कह सके कि चलो अब बिना थके,बिना रुके,बिना देरी के देश की हर ज़रूरत को पूरा करते हुए निर्माण में लगा जाए ।

गाँधी के ख्वाबों के संस्थान खड़े किए जाएं,शिक्षा का सर्वोच्च छुआ जाए । आज जब लोग अपने छोटे छोटे घर बनाते हैं, उसपर फौरन अपने नाम अपने पूर्वजों के नाम के पत्थर टांक देते हैं कि दुनिया देखे उन्होंने कितना खूबसूरत घर बनाया है, वही लोग आज़ादी की लड़ाई और देश बनाने वाले नामों को सुनकर कान आंख बंद करके चुपके से सरक जाने का हुनर रखते हैं । यह सच्चाई रहती दुनिया तक नही बदलेगी की भारत की आज़ादी में किसने किसने अपना सब कुछ लुटा दिया,मिटा दिया । मौलाना आज़ाद तो वह शख्स थे,जो जेल में रहकर अपनी पत्नी की मौत की खबर सुनकर भी अंग्रेज़ों से यह गुज़ारिश भी नही करने गए कि आखरी बार उन्हें बीवी को देखना है । सब कहते रहे मगर उसूल का पाबंद यह शख्स अड़ गया कि नही,हरगिज़ नही,अपने निजी कार्यों के लिए हम अंग्रेज़ों से कोई छूट नही लेंगे और जेल की सलाखों के पीछे ही वह दर्दनाक वक़्त अकेले काटा । मौलाना आज़ाद आप हमारे मुल्क को बनाने वाले हाथों में से थे,आपके हाथ पकड़ कर अब बस रोने को दिल चाहता है, खूब रोने को,इकलौते आप हैं जिनका हाथ पकड़कर आज अपनी बेबसी और अकेलेपन को जकड़कर बहुत रोने का दिल करता है..

 


क्यों हटाई गई गांधी परिवार से एस पी जी सुरक्षा?

क्यों हटाई गई गांधी परिवार से एस पी जी सुरक्षा?

09-Nov-2019

केंद्र सरकार ने कल एक बड़ा मगर अटपटा फैसला लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की एसपीजी सुरक्षा हटाने का फैसला लिया है। इन तीनों की एसपीजी सुरक्षा को धीरे धीरे हटाया जाएगा। श्रीपेरंबुदूर में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद पूरे गांधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा देने का फैसला किया गया था।

मगर अब केंद्र सरकार ने फैसला पलट दिया है। गृह मंत्रालय की सुरक्षा समीक्षा कमेटी की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार अब गांधी परिवार को जेड प्लस सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इसके तहत सीआरपीएफ या एनएसजी के कमांडो तैनात होंगे। 

केंद्र सरकार के अनुसार  फिलहाल गांधी परिवार को कोई खतरा नहीं है और ऐसे में जेड प्लस की सुरक्षा पर्याप्त होगी। हैरत की बात है कि जिस गांधी परिवार में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को मार दिया जाता है उस परिवार की सुरक्षा हटा ली जाए या कम कर लिया जाए। यह चिंता का विषय है।

गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाने के बाद अब सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास ही एसपीजी सुरक्षा रहेगी। यह निर्णय राजनीतिक बदले की भावना से लिया गया है। सरकार का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। बदला लेने की राजनीति अच्छी नहीं लगती है।दिल बड़ा रखना चाहिए। 

देश के दो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या की गई। अटल बिहारी वाजपेयी ने ही कानून में बदलाव कर के गांधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा प्रदान की थी। आज शायद उनकी भी आत्मा तड़प गई होगी। यह फैसला राजनीतिक बदले की भावना से हुआ प्रतीत हो रहा है। फैसला तो इसी तरफ इशारा कर रहा है।

बहरहाल देश सब देख रहा है। 8 तारीख को फैसला लेने की आदत पड़ गई है शायद। पहले नोटबंदी अब सुरक्षा हटाना। दोनों फैसलों में इंसान की जान से खेला गया है।
मेरी अपील है सरकार से कि इस फैसले पर पुनर्विचार करे।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट
ई मेल- syedtaqvi12@gmail.com


रेलवे ने निकाली ऐसी नौकरी की मच गया बवाल, विज्ञापन में लिखा सिर्फ अग्रवाल-वैश्य करें अप्लाई

रेलवे ने निकाली ऐसी नौकरी की मच गया बवाल, विज्ञापन में लिखा सिर्फ अग्रवाल-वैश्य करें अप्लाई

08-Nov-2019

नई दिल्ली

रेलवे से जुड़ी नौकरियों में जातिगत आधार पर प्राथमिकता देने का विज्ञापन छपा तो हंगामा हो गया। सोशल मीडिया पर काफी खिंचाई हुई तो रेलवे में खानपान का इंतजाम करने वाली कंपनी आईआरसीटीसी ने विज्ञापन जारी करने वाले कॉन्ट्रैक्टर को जमकर फटकार लगाई, जिसके बाद वेंडर ने अपने एचआर मैनेजर को नौकरी से निकाल दिया और माफी भी मांगी।

Indian Railway Agarwal Vaishya community Job, ‘सिर्फ अग्रवाल-वैश्य करें अप्लाई’, रेलवे कॉन्ट्रेक्टर ने नौकरी के लिए निकाला विज्ञापन तो मच गया बवाल

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRCTC से जुड़े प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर आरके मील्स से संबंधित कंपनी वृंदावन फूड प्रॉडक्ट्स के विज्ञापन में ट्रेन कैटरिंग मैनेजर, बेस किचन मैनेजर और स्टोर मैनेजर के पदों पर 100 लोगों की नियुक्ति करने के लिए आवेदन मांगे गए थे। विज्ञापन में कहा गया था कि आवेदक अग्रवाल वैश्य समुदाय से होना चाहिए और कम से कम 12वीं तक पढ़ा लिखा होने के साथ-साथ अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से होना चाहिए।

वेंडर ने माफी मांगते हुए कहा कि दो अलग-अलग विज्ञापन दिए जाने थे- एक रेलवे में नौकरी देने के लिए था और दूसरा विज्ञापन अपने समाज की सेवा के लिए नौकरी देने का था। उस विज्ञापन में अग्रवाल समाज के लोगों को नौकरी देने की बात थी, लेकिन गलती से रेलवे की नौकरी वाला विज्ञापन अग्रवाल वैश्य समाज के लिए प्रकाशित हो गया।


बीएचयू के संस्कृत विभाग में मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति पर हंगामा, छात्र धरने पर

बीएचयू के संस्कृत विभाग में मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति पर हंगामा, छात्र धरने पर

08-Nov-2019

वाराणसी: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में कथित तौर पर एक मुस्लिम असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के विरोध में छात्र धरने पर हैं. छात्रों की मांग है कि इस नियुक्ति को निरस्त किया जाए.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए गुरुवार देर रात बीएचयू ने कहा कि उन्होंने वाइस चांसलर की अध्यक्षता में एक पारदर्शी स्क्रीनिंग प्रक्रिया के जरिए सर्वाधिक योग्य उम्मीदवार को सर्वसम्मति से नियुक्त किया है. विश्वविद्यालय ने कहा कि इस संस्थान की स्थापना धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर बिना किसी भेदभाव के राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य से सभी को समान अवसर दिए जाने से की गई थी.

विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर फिरोज खान की नियुक्ति का कुछ छात्र विरोध कर रहे हैं. इन छात्रों ने गुरुवार को वाइस चांसलर के आवास के बाहर होल्कर भवन पर धरना दिया. ये प्रदर्शनकारी छात्र प्रोफेसर खान की नियुक्ति को रद्द किए जाने की मांग कर रहे हैं. एक प्रदर्शनकारी छात्र पुनीत मिश्रा ने कहा कि बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय के मूल्यों की रक्षा करने के लिए धरना किया गया था.

उन्होंने कहा कि संस्कृत संकाय में लगे शिलापट्ट पर लिखा है कि जैन, बौद्ध और आर्य समाज से जुडे़ लोगों को छोड़कर कोई भी गैर हिंदू इस विभाग से नहीं जुड़ सकता. इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे पीएचडी स्कॉलर शुभम तिवारी ने खान की नियुक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि रिश्वत लेने के बाद संस्कृत फैकल्टी में एक अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति की गई. बीएचयू ने कहा कि छात्रों ने स्क्रीनिंग समिति की बैठक को बाधित करने की कोशिश की. प्रशासन ने स्वीकार किया कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर मुस्लिम उम्मीदवार की नियुक्ति को लेकर धरना प्रदर्शन किया गया.