हर छह घंटे में फेस मास्क बदलें: चिकित्सा विशेषज्ञ

हर छह घंटे में फेस मास्क बदलें: चिकित्सा विशेषज्ञ

11-May-2021

देश में COVID-19 मामलों में तेजी से वृद्धि के बीच, चिकित्सा विशेषज्ञों ने COVID-19 दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करने की सलाह दी है।

बैंगलोर स्थित चिकित्सा विशेषज्ञों ने दोहरे मुखौटे के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किए क्योंकि यह जोखिम को बहुत कम कर देगा।

चिकित्सा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि हर छह घंटे के बाद मास्क को पूरी तरह से साफ या बदल दिया जाना चाहिए। एक मास्क को 24 घंटे से अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका सुरक्षा प्रभाव कम हो जाता है और यह स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा नहीं है।

भारत में COVID-19 महामारी की दूसरी लहर को देखते हुए, कई स्वास्थ्य संगठनों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने दोहरे मुखौटे पहनने का सुझाव दिया है।

COVID-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए पूर्ण तालाबंदी के पक्ष में चिकित्सा विशेषज्ञों ने भी अपने विचार व्यक्त किए हैं।

 

एक मुकम्मल कोरोना मुक्ति का ख्वाब

एक मुकम्मल कोरोना मुक्ति का ख्वाब

10-May-2021

एक मुकम्मल कोरोना मुक्ति का ख्वाब
-ललित गर्ग-

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कोरोना महामारी ने भारत को अपने सबसे खराब और चुनौतीपूर्ण दौर में पहुंचा दिया है। अभी हम दूसरी लहर से निपटने में भी सक्षम नहीं हो पाये हंै कि तीसरी लहर की चुनौती की आशंका अधिक परेशान करने लगी है। केंद्र सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने तीसरी लहर की पुष्टि कर दी है, इसलिए अब न तो इसमें किसी किंतु-परंतु की गुंजाइश रह गयी है और न ही इसे लेकर हैरानी-परेशानी जताने का कोई मतलब बनता है। देखना यह है कि दूसरी लहर में बरती गयी लापरवाही से सबक लेते हुए हम तीसरी लहर के आने से पहले खुद को और पूरे तंत्र को किस तरह तैयार कर पाते हैं। आजाद भारत में ऐसा संकट इसके पहले कभी नहीं आया। घोर अंधेरों एवं निराशाओं के बावजूद देश कोरोना महामारी को परास्त करने में सक्षम बन रहा है। हौले-हौले नहीं, तेज रफ्तार के साथ सभी स्तरों पर कोरोना को परास्त करने के प्रयत्न हो रहे हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं, व्यापारिक घराने अपनी-अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए रोशनी बन रहे हैं। इन सबके सामुहिक प्रयत्नों से बेहतरी की उम्मीद जागी है।
बात कोरोना की पहली, दूसरी या तीसरी लहर की नहीं है, बात कोरोना महामारी से ध्वस्त हुई व्यवस्थाओं, मनोबल, आर्थिक संरचनाओं एवं पांव फैला रही स्वार्थ एवं लोभ की अमानवीय स्थितियों की है। न सिर्फ लोग बीमार हो रहे हैं और मारे जा रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं भी चरमराती नजर आती हैं। एक तरफ, यह विकरालता है, तो दूसरी तरफ लोगों की दुश्वारियां बढ़ाता रोजगार, उद्योग एवं व्यापार पर आया संकट है। हर नागरिक के जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी शासन पर है, लिहाजा जब उपचार न मिलने से लोगों की जान जा रही थी तो यह शासन की नाकामी ही थी। अब संक्रमण की तीसरी लहर आने की भी आशंका है, इसलिए दूसरी लहर से जूझ रही सरकारों को भी और सक्रियता दिखानी होगी। कायदे से उन्हें दूसरी लहर का सामना करने की भी तैयारी करनी चाहिए थी, लेकिन वे इसमें असफल रहीं। यह असफलता केंद्र और राज्यों, दोनों की है, क्योंकि समय रहते न तो आक्सीजन प्लांट लग सके, न अस्पतालों में बेड बढ़ सके और न ही दवाओं का भंडारण हो सका। ढिलाई सभी सरकारों ने बरतीं, लेकिन अब वे एक-दूसरे पर दोषारोपण में लगी हुई हैं। इस महासंकट से मुक्ति के संघर्षपूर्ण दौर में दोषारोपण की विकृत मानसिकता एक विडम्बना है, एक त्रासदी है एवं दूषित राजनीति का पर्याय है। खेद की बात यह है कि राजनीतिक वर्ग संकट का सामना मिलकर करने के बजाय तू तू- मैं मैं कर रहा है। इससे खराब बात और कोई नहीं कि विभिन्न दल और खासकर कांग्रेस संकट समाधान में सहयोगी बनने के बजाय राजनीतिक बढ़त हासिल करने के फेर में दिख रही है। प्रश्न है कि कब तक देश शासन-व्यवस्थाओं की लापरवाही एवं राजनीतिक दलों के संकीर्ण सोच एवं स्वार्थ की कीमत चुकाता रहेगा?  
बेरोजगारी एक बड़ा संकट है। ‘सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कोरोना के कहर के बीच बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी है। सरकारों के पास राहत की कोई तात्कालिक नीति नहीं दिख रही। तो क्या भारत एक नए संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसमें जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, रोजगार, पर्यावरण, जीवन निर्वाह एवं सांसें सब कुछ दांव पर लगी है। प्रश्न है कि यह जटिल एवं चुनौतीपूर्ण समय शासन की नीतियों की दूरदर्शिता और आपात एक्शन प्लान के दम पर बदला जा सकता है? पिछले चार महीनों में बेरोजगारी की दर आठ फीसदी हो चुकी है। इसमें शहरी इलाकों में साढे़ नौ फीसदी से ज्यादा की दर देखी गई है, तो ग्रामीण इलाकों में सात प्रतिशत की दर। बेरोजगारी के इस संकट से निपटने के लिए अंततः केंद्र को ही एक संबल एवं आश्वासन बनते हुए प्रो-एक्टिव कदम उठाने होंगे, दूरगामी नीति बनानी होगी और इसमें सभी राज्यों एवं आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य व विधि विशेषज्ञों को साथ लेना होगा। यह केंद्र-सरकार ही नहीं, राज्यों की सरकारों की कार्यक्षमता, विवेक एवं सुशासन जिजीविषा के लिए भी कडे़ इम्तिहान का वक्त है।
सरकारों पर निर्भरता ही पर्याप्त नहीं है, आम-जनता को भी जागरूक होना होगा। महामारी की दूसरी लहर के समक्ष सरकारें जिस तरह नाकाम हुईं, उसके लिए उन्हें लोगों के आक्रोश का सामना करना ही होगा, लेकिन यह भी ध्यान रहे कि लापरवाही का परिचय देश की जनता की ओर से भी दिया गया, कोरोना महामारी के फैलने में आम जनता की लापरवाही बड़ा कारण बनी है। विडम्बनापूर्ण तथ्य है कि आम और खास, सभी लोगों ने उन आदेशों-निर्देशों की परवाह नहीं की, जो कोरोना से बचने के लिए लगातार दिए जा रहे थे। दूसरी लहर ही विकरालता के बीच लोगों ने अमानवीयता का परिचय दिया। जमकर स्वार्थी लोगों ने दवाओं एवं आॅक्सिजन की जमाखोरी एवं कालाबाजारी की। जिससे भय एवं डर का माहौल ज्यादा बना। बिना जरूरत के भी प्रभावी एवं साधन-सम्पन्न लोगों ने चिकित्सा-सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल किया, जिससे जरूरतमंद लोग वंचित रहे और मौत के मुंह में गये।
कोरोना वायरस के कितने और किस-किस तरह के वैरिएंट और आने वाले है, उन सब पर वैज्ञानिक गहन काम कर रही है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वायरस के रूप जो भी हों, संक्रमण के उसके तरीकों में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि बचाव के तरीके लगभग वही रहेंगे। यानी दूरी बरतना, लोगों के निकट संपर्क में नहीं आना, मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोते रहना, मनोबल बनाये रखना और हां बारी आने पर वैक्सीन जरूर ले लेना। बाजार, शापिंग मॉल, पर्यटन स्थल आदि से बचना होगा, शादी-ब्याह और अन्य सांस्कृतिक, धार्मिक आयोजन को कुछ समय के लिये भूलना होगा। जनता के साथ राजनीतिक वर्ग कोे भी सतर्कता बरतनी होगी। अन्यथा दूसरी लहर की तरह तीसरी लहर की देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पहली एवं दूसरी लहर में जो भूलें हुईं उनसे सबक सीखते हुए यह सुनिश्चित करना ही होगा कि जल्द से जल्द इतनी संख्या में लोगों को टीके लग जाएं, जो हर्ड इम्युनिटी पैदा करने में सहायक हों। इसी के साथ जनता तब तक सचेत रहे, जब तक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की ओर से यह न कह दिया जाए कि कोरोना फिर सिर नहीं उठाएगा। ये ऐसे उपाय हैं एवं मानसिकता है जिन पर सतर्क अमल सुनिश्चित कर हरेक व्यक्ति इस महासंकट से निजात पाने में अहम योगदान कर सकता है। मगर पर्याप्त वैक्सीन का उत्पादन और उसकी सप्लाई सुनिश्चित करने, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने और मरीजों के लिए ऑक्सिजन, हॉस्पिटल्स में बेड, डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी वगैरह का इंतजाम करने की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की ही बनती है। उम्मीद की जाए कि दोनों अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी का उपयुक्त ढंग से निर्वाह करते हुए तीसरी लहर को शुरू में ही नियंत्रित कर लेंगे। यह सही है कि स्वास्थ्य ढांचे की दुर्दशा के लिए सरकारें ही जिम्मेदार हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जो अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है, वह रातों-रात दूर नहीं हो सकता। एक मुकम्मल कोरोना मुक्ति का ख्वाब तभी आकार लेगा जब हर व्यक्ति इसके लिये जागरूक होगा।
प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92

 

 


सुप्रीम कोर्ट में बोले केंद्र सरकार- दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की अब कोई कमी नहीं

सुप्रीम कोर्ट में बोले केंद्र सरकार- दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की अब कोई कमी नहीं

06-May-2021

एजेंसी 

नई दिल्ली :  केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि राजधानी दिल्ली के अस्पतालों में फिलहाल ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है। दिल्ली के अस्पतालों को केंद्र की ओर से ऑक्सीजन सप्लाई से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को केंद्र की ओर से सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दिल्ली को 730 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की सप्लाई की जा रही है और वर्तमान में दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन का पर्याप्त भंडार है। केंद्र ने राज्यों को ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर अपना विस्तृत प्लान भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दिया है।

कोरोना संकट के बीच देश में इलाज ना मिलने और ऑक्सीजन की कमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सरकार के तौर तरीकों से नाराजगी जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्च ने राजधानी दिल्ली में ऑक्सीजन की सप्लाई पर केंद्र से जवाब मांगा था और कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि दिल्ली को सोमवार तक 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की सप्लाई की जाए। साथ ही केंद्र से राज्यों को ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर प्लान मांगा था। जिसके बाद आज केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इन मुद्दों पर जवाब दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि दिल्ली को बीते दिन 700 एमटी ऑक्सीजन दी गई है, उससे पहले भी दिल्ली को 585 एमटी ऑक्सीजन दी गई थी। उन्होंने कहा कि इससे पहले दिल्ली को ऑक्सीजन देने में टैंकर्स की वजह से देरी हुई थी। तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दिल्ली के अलावा कई अन्य राज्य भी हैं, जहां पर ऑक्सीजन की मांग बढ़ रही है। राजस्थान, जम्मू कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य भी अपने अस्पताल की मांगों को पूरा करने के लिए अधिक ऑक्सीजन की मांग कर रहे हैं।

सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने केंद्र को कहा कि पूरे भारत में कैसे सभी अस्पतालों तक ऑक्सीजन आपूर्ति ठीक से हो, ये आपको देखना होगा। साथ ही ऑक्सीजन ऑडिट पर भी गौर करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आपको आपूर्ति में लगातार वृद्धि करनी चाहिए, ये सुनिश्चित करें कि दिल्ली को 700 एमटी ऑक्सीजन मिले। जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि आज स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा रही है। वर्तमान में स्वास्थ्य पेशेवर पूरी तरह से थकान में हैं, इस सबके बीच आप बेहतर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं कैसे सुनिश्चित करेंगे, ये भी सवाल है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से ये भी कहा कि अगर आप (केंद्र) पॉलिसी बनाने में कोई गलती करते हैं, तो आपको इसके लिए जिम्मेदार और जवाबदेह ठहराया जाएगा।


मध्य प्रदेश के विदिशा में कोरोना विस्फोट: कुंभ से लौटे 61 में से 60 कोरोना पॉजिटिव!

मध्य प्रदेश के विदिशा में कोरोना विस्फोट: कुंभ से लौटे 61 में से 60 कोरोना पॉजिटिव!

30-Apr-2021

एजेंसी 

भोपाल: मध्य प्रदेश के विदिशा में कुंभ से लौटे 83 श्रद्धालुओं में से 60 की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है. इनमें से  22 के बारे में प्रशासन को कोई जानकारी नहीं है. एक साथ 60 लोगों के कोरोना संक्रमित होने की खबर ने स्थानीय सरकार के साथ-साथ उन सभी राज्यों को भी चिंता में डाल दिया है, जहां के श्रद्धालुओं ने कुंभ में हिस्सा लिया है. गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में पहले से ही कोरोना ने कहर बरपाया हुआ है.

वापसी पर हुआ- 
प्रशासन के अनुसार, यह मामला विदिशा जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर स्थित ग्यारसपुर का है. 83 तीर्थयात्री तीन अलग-अलग बसों में 11 से 15 अप्रैल के बीच हरिद्वार के लिए रवाना हुए थे. वापसी पर जब इनका टेस्ट कराया गया, तो 60 की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई. 83 में से 22 के बारे में प्रशासन को कोई जानकारी नहीं है. अधिकारी उनका पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. 

बस से गए थे हरिद्वार- 
एक अधिकारी ने बताया कि सभी तीर्थयात्री पहले ग्यारसपुर से जिला मुख्यालय कार से पहुंचे, फिर बस से हरिद्वार के लिए रवाना हुए. तीर्थयात्री जब 25 अप्रैल को ग्यारसपुर लौटे तो उनके बारे में जानकारी जुटाकर उनका टेस्ट कराया गया. स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, हरिद्वार 83 श्रद्धालु गए थे, जिसमें से केवल 61 की ही जानकारी मिल पाई है, 22 का अब तक पता नहीं चला है और हम उनका पता लगाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं. जिन 61 का पता चला, उसमें से 60 कोरोना संक्रमित पाए गए हैं.

5 की स्थिति गंभीर- 
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पॉजिटिव मिले 60 में से 5 की हालत गंभीर है, उन्हें COVID सेंटर में शिफ्ट किया गया है. इसके अलावा बाकी 55 संक्रमितों को होम क्वारनटीन किया गया है. एक अधिकारी ने कहा, ‘कुंभ से आने वालों पर नजर रखी जा रही है. क्योंकि आशंका है कि यदि उन्हें समय पर अलग-थलग नहीं किया गया, तो वे सुपर स्प्रेडर बन जाएंगे और कई लोगों को संक्रमित कर देंगे. 

अलर्ट पर राज्य सरकारें 
हरिद्वार कुंभ के दौरान ही कई लोग कोरोना संक्रमित हो गए थे. इस दौरान कई साधु-संतों की मौत भी हुई थी. जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे श्रद्धालु कुंभ से लौटकर अपने-अपने घर पहुंचेंगे, वैसे-वैसे कोरोना संक्रमण का खतरा और बढ़ता जाएगा. इसलिए हर राज्य सरकार अलर्ट हो गई है और हरिद्वार से आने वालों का टेस्ट किया जा रहा है.


फेसबूक ने घंटो तक बंद रखा पीएम मोदी के इस्तीफे संबंधी हैशटैग!

फेसबूक ने घंटो तक बंद रखा पीएम मोदी के इस्तीफे संबंधी हैशटैग!

29-Apr-2021

भाषा की रिपोर्ट 

नई दिल्ली : उल्लेखनीय है कि फेसबुक पहली सोशल मीडिया कंपनी नहीं है जिसने कोविड-19 महामारी पर सरकार की आलोचना करने वाले पोस्ट को सेंसर किया है. ट्विटर ने भी सरकार के आदेश पर और फर्जी खबर करार दिए जाने पर कई पोस्ट को हटाया है या वहां तक पहुंच बाधित की है. फेसबुक के प्रवक्ता ने बृहस्पतिवार को एक बयान में कहा, ‘‘हमने गलती से इस हैशटैग को अस्थायी रूप से बंद किया था, न कि भारत सरकार द्वारा हमें ऐसा करने के लिए कहा गया था. हमने इसे बहाल कर दिया है.

खबरों के मुताबिक बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग को लेकर चलाए जा रहे हैशटैग को फेसबुक ने घंटो बाधित रखा. उपयोगकर्ता अगर इस हैशटैग की तलाश करते तो संदेश आ रहा था कि ‘‘अस्थायी रूप से इस तक पहुंच बाधित कर दी गई है क्योंकि पोस्ट में मौजूद कुछ सामग्री हमारे समुदाय मानकों के विपरीत है.’’ फेसबुक समय-समय पर हैशटैग और पोस्ट को विभिन्न कारणों से बाधित करती रही है. कुछ को व्यक्तिगत रूप से हटाया जाता है जबकि कुछ स्वत: बाधित हो जाते हैं.

हैशटैग रिजाइन मोदी को बाधित करने का मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण से पहले आया है. उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार कोविड-19 महामारी से निपटने के तरीके को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की आलोचना का सामना कर रही है. देश में बृहस्पतिवार को कोविड-19 के अबतक आए मामलों की संख्या 1.80करोड़ तक पहुंच गई है.

स्वतंत्र शोध परियोजना ल्यूमेन डाटाबेस के हवाले से कहा गया है कि सरकार के अनुरोध पर सांसदों, विधायकों और फिल्मकारों के पोस्ट सहित 50 से अधिक पोस्ट सोशल मीडिया से हटाए गए हैं. सरकारी सूत्रों ने बताया कि सोशल मीडिया मंचों को कोरोना वायरस की महामारी से लड़ने में उत्पन्न होने वाली किसी बाधा को रोकने और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पोस्ट हटाने को कहा गया है.


सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने ‘हैशटैग रिजाइनमोदी’ को बाधित कर दिया जिसमें कोविड-19 महामारी से निपटने की सरकार के तरीके की आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की जा रही थी. घंटों बाद इस हैशटैग को बहाल करते हुए कंपनी ने कहा किया उसने गलती से यह कदम उठाया था. कंपनी ने बुधवार को हैशटैग को बाधित करने के कदम पर बृहस्पतिवार को सफाई देते हुए कहा कि यह सरकार के अदेश पर नहीं किया गया था.


दिल्ली में उपराज्यपाल को मिला प्रधानता- लागू हो गया विवादास्पद कानून

दिल्ली में उपराज्यपाल को मिला प्रधानता- लागू हो गया विवादास्पद कानून

28-Apr-2021

एजेंसी 

नई दिल्ली: दिल्ली में कोरोना की दूसरी लहर के कहर के बीच केंद्र ने एक ऐसा कानून को लागू कर दिया है जो दिल्ली में जनता की चुनी हुई सरकार के मुकाबले उपराज्यपाल को ज्यादा अधिकार देता है. नए कानून के अनुसार, दिल्ली सरकार का मतलब ‘उपराज्यपाल' होगा. दिल्ली की सरकार को अब कोई भी कार्यकारी फैसला लेने से पहले उपराज्यपाल की अनुमति लेनी होगी. एनसीटी सरकार (संशोधन) अधिनियम  2021 को लागू कर दिया गया है जिसमें शहर की चुनी हुई सरकार के ऊपर उपराज्यपाल को प्रधानता दी गई है. गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक अधिनयम के प्रावधान 27 अप्रैल से लागू हो गए हैं. 

बता दें कि पिछले महीने दोनों सदनों में भारी विरोध के बीच इस विवादास्पद कानून को मंजूरी दी गई थी. लोकसभा ने 22 मार्च को और राज्य सभा ने 24 मार्च- को इसको मंजूरी दी थी. जब इस विधेयक को संसद ने पारित किया था तब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘‘भारतीय लोकतंत्र के लिए दुखद दिन' करार दिया था. 

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने 2020 के विधानसभा चुनावों में 70 में से 62 सीटों पर कब्जा किया था. बीजेपी  खाते में 8 सीटें आईं थी, जबकि कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया था. अरविंद केजरीवाल आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार, उपराज्यपाल के माध्यम से दिल्ली पर चुनी हुई सरकार के विपरित शासन करने, और दिल्ली सरकार की योजनाओं को रोकने का प्रयास करती रही है. 

अधिकारों की इस रस्साकस्सी में सुप्रीम कोर्ट ने भी जुलाई 2018 में एक अहम फैसला सुनाया था. जहां संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि उपराज्यपाल को फैसले लेने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है और वह निर्वाचित सरकार की सलाह से काम करने के लिए बाध्य हैं. पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति के निर्णय में कहा था कि निरंकुशता और अराजकता के लिये कोई जगह नहीं है. 


विशेषज्ञों का दावा: मई में रोजाना हो सकती है कोरोना से 5 हजार लोगों की मौत!

विशेषज्ञों का दावा: मई में रोजाना हो सकती है कोरोना से 5 हजार लोगों की मौत!

24-Apr-2021

एजेंसी 

रिपोर्ट : भारत में हर दिन कोरोना वायरस की दूसरी लहर का कहर बढ़ता ही जा रहा है। देश में पिछले दो दिन से लगातार तीन लाख से ज्यादा कोरोना के नए मरीज मिल रहे हैं और ढाई हजार से ज्यादा लोगों की जान जा रही है। इस बीच, एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में आने वाले दिनों में कोरोना वायरस का कहर और बढ़ेगा। मई में हर दिन 5,000 से ज्यादा लोगों की जान जाएगी यानी कि अप्रैल से लेकर अगस्त तक 300,000 से ज्यादा लोगों की मौत होगी। 


वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) की ओर से कोविड-19 की आगामी स्थिति पर अध्ययन किया गया है। 15 अप्रैल को प्रकाशित इस अध्ययन में कोविड टीकाकरण अभियान के बावजूद दूसरी लहर के लंबे समय तक कहर बरपाने की आशंका जताई गई है। 

आईएचएमई के विशेषज्ञों ने अध्ययन में चेतावनी दी है कि भारत में आने वाले समय में कोरोना महामारी और विकराल रूप धारण कर सकती है। इस अध्ययन में विशेषज्ञों ने भारत में कोरोना मरीजों की संख्या और कोविड से होने वाली मौतों का आकलन किया है। अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में मई में कोरोना महामारी से प्रतिदिन 5,600 से ज्यादा लोगों की मौत होगी। एक अनुमान के मुताबिक, 12 अप्रैल से 1 अगस्त के बीच 3,29,000 लोगों की कोरोना से मौत हो सकती है। कोरोना से मरने वालों की यह संख्या जुलाई के अंत तक 6,65,000 तक पहुंच सकती है। 

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के अध्ययन में कहा गया कि सितंबर, 2020 से फरवरी, 2021 तक कोरोना संक्रमितों की संख्या और कोविड से होने वाली मौतों की संख्या में गिरावट देखी गई, लेकिन 15 फरवरी के बाद संक्रमण ने एक फिर अपनी  रफ्तार पकड़ ली। 

बता दें कि देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर का कहर जारी है। आज लगातार दूसरे दिन 3.45 लाख से अधिक कोरोना के नए मरीज मरीज मिले हैं और 2600 से अधिक लोगों की जान चली गई। इसी के साथ देश में सक्रिय मरीजों की संख्या 25.50 लाख से अधिक हो गई है।  

 


कोरोना महामारी में बदले जीवन के अर्थ को समझे

कोरोना महामारी में बदले जीवन के अर्थ को समझे

21-Apr-2021

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लेख- ललित गर्ग

भारतीय चिंतन में उन लोगों को ही राक्षस, असुर या दैत्य कहा गया है जो समाज में तरह-तरह से अशांति फैलाते हैं। असल में इस तरह की दानवी सोच वाले लोग सिर्फ अपना स्वार्थ देखते हैं। ऐसे लोग धन-संपत्ति आदि के जरिए सिर्फ अपना ही उत्थान करना चाहते हैं, भले ही इस कारण दूसरे लोगों और पूरे समाज का कोई अहित क्यों न हो रहा हो। धर्म कहता है कि विश्व को श्रेष्ठ बनाओ। यह श्रेष्ठता तब ही आएगी जब कुटिल चालों से मानवता की रक्षा की जाएगी। ऐसा करने की आवश्यकता कोरोना महामारी ने भलीभांति समझायी है।

आज भौतिक मूल्य अपनी जड़ें इतनी गहरी जमा चुके हैं कि उन्हें निर्मूल करना आसान नहीं है। मनुष्य का संपूर्ण कर्म प्रदूषित हो गया है। सारे छोटे-बड़े धंधों में अनीति प्रवेश कर गई है। यदि धर्म, प्रकृति एवं जीवन मूल्यों को उसके अपने स्थान पर सुरक्षित रखा गया होता तो कोरोना महाव्याधि की इतनी तबाही कदापि न मचती। संकट इतना बड़ा न होता।

समाज की बुनियादी इकाई मनुष्य है। मनुष्यों के जुड़ने से समाज और समाजों के जुड़ने एवं संगठित होने से राष्ट्र बनता है। यदि मनुष्य अपने को सुधार ले तो समाज और राष्ट्र अपने आप सुधर जायेंगे। इसलिए परोपकार, परमार्थ की महिमा बताई गई है। मनुष्यों के जीवन और कृत्य के परिष्कार के लिए उससे बढ़कर रास्ता हो नहीं सकता। अगर मनुष्य का आचरण सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग एवं संयम आदि पर आधारित होगा तो वह अपने धंधे में किसी प्रकार की बुराई नहीं करेगा और न जीवन में विसंगतियों की धुसपैठ नहीं होने देगा। जीवन की शुद्धता कर्म की शुद्धता की आधार-शिला है। धर्म मनुष्य के भीतर की गंदगी को दूर करता है और जिसके भीतर निर्मलता होगी, उसके हाथ कभी दूषित कर्म नहीं करेंगे। मन को निर्मल बनाने के लिये कृतज्ञ होना जरूरी है। लेखिका-शिक्षिका डेना आकुरी कहती हैं कि जो कुछ भी आपके पास है, आप उसके लिए अगर कृतज्ञता जाहिर कर पाते हैं तो आप वास्तव में वर्तमान में जी पाते हैं। मनोवैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि कृतज्ञ बनने से न सिर्फ शरीर, बल्कि दिल की सेहत भी अच्छी रहती है।’ कोरोना महामारी से मुक्ति के लिये कृतज्ञता का भाव जरूरी है।

कृतज्ञता तब जन्म लेती है, जब हम नकारने की बजाय स्वीकार्यता या सराहना का दृष्टिकोण अपनाकर जीवन से अपना नया रिश्ता कायम करते हैं। यहां ग्रीक दार्शनिक एपिक्यूरस की इस उक्ति को याद करने की जरूरत है- जो नहीं है, उसके बारे में सोचकर उन चीजों को न खोएं, जो आपके पास हैं। याद रखें, आज जो कुछ भी आपके पास है, कभी वह भी सिर्फ एक उम्मीद ही रहा होगा।’ कोरोना महामारी ने जीवन को नये सिरे से, नये मूल्यों के साथ जीने की सीख दी है, विवशता दी है।

मनुष्य अब ज्यादा दुःखी हो रहा है। वह समझने लगा है कि धर्म, प्रकृति एवं नैतिकता के बिना उसका विस्तार नहीं है, किन्तु भोगवादी जीवन का वह अब इतना अभ्यस्त हो गया है कि बाह्य आडम्बर की मजबूत डोर को तोड़कर सादा, संयममय और सात्विक जीवन अपनाना उसके लिए कठिन हो रहा है। इसी कठिनता से उबारने के लिए नीति एवं नैतिकता का जीवन जरूरी है। नीति बल यानी धर्म की शक्ति सर्वोपरि है। जातियां, प्रजाएं, सत्ताएं न पैसे से टिकती हैं और न सेना से। एकमात्र नीति की नींव पर ही टिक सकती है। अतः मनुष्य मात्र का कर्तव्य है कि इस विचार को सदा मन में रखकर परमार्थ और परोपकार रूपी नीति का आचरण करें।

जिन्होंने जिंदगी में दुख नहीं देखा हो, जो लोग कठिनाइयों से नहीं गुजरे हों, जिन्हें सबकुछ आसानी से मिल गया हो, वे जीवन की गहराइयों को नहीं समझ पाते। ऐसे लोगों को कोरोना ने जीवन की गहराई को समझने का अवसर दिया है, भले ही ऐसे लोग जरा सी मुश्किल आने पर दूसरों को कोसते हैं और खुद निराशा में घिर जाते हैं। कष्ट एक अभ्यास है। परेशानी अपने आप में एक पुरुषार्थ है। विपरीत परिस्थितियां विकास का मार्ग हैं। जो इनसे गुजरते हैं वे अपनी मनोभूमि और अंतरात्मा में अत्याधिक सुदृढ़ हो जाते हैं। इनके लिए हर संकट अगले नए साहस का जन्मदाता होता है। जीवन में जब ऐसी स्थितियां आएं तो हमेशा मस्त रहिये। मस्त रहना है तो व्यस्त रहना सीखें। यही कहा जाता है। बात भी गलत नहीं है। लेकिन हम व्यस्त तो बहुत दिखते हैं, मस्त नहीं। दरअसल हम अस्त-व्यस्त ज्यादा होते हैं। बिजी होना और माहिर होना एक बात नहीं है। बिजी दिखने से ज्यादा जरूरी है प्रोडक्टिव होना, सकारात्मक होना।

तुम तो बिजी ही होंगे! यह कहकर दोस्त तो सरक गया। पर सुनने वाले का सुकून भी चला गया। यूं आजकल सभी बहुत बिजी होते हैं। बिजी होना एक फैशन भी है। कुछ देर के लिए खास होने का एहसास भी दिला सकता है। लेकिन ज्यादातर अपने बिजी होने की दुहाई देने को मजबूर दिखते हैं और यह चुभता है ऐसे बिजी लोगों को कोरोना ने कटू सच्चाइयां का साक्षात्कार करा दिया है। शोध तो कहते हैं कि बिजी होना सफल होना भी है, यह कोरा भ्रम है। सफलता के लिए हर समय व्यस्त रहने या दिखने की जरूरत नहीं है।

जोड़ना और जुड़ना हमारी जरूरत है। पर हर चीज जोड़ी नहीं जाती, न ही जोड़े रखी जा सकती। भले ही आपको बहुत सारा जोड़कर ही खुशी मिलती है तो भी बुराई नहीं है। पर तब समेटने और संभाल कर रखने का हुनर होना भी जरूरी है। सामान हो या रिश्ते, अगर हर समय बिखरे रहते हैं तो यह जानना जरूरी है कि पोटली का हल्का होना ही क्यों बेहतर होता है।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां हमें ज्यादा से ज्यादा सामान खरीदने के लिए उकसाया जाता है। थोड़ा हमारे पास होता है। थोड़े की जरूरत होती है। जरूरत पूरी हो जाती है, पर और ज्यादा जमा करने की चाह पीछा नहीं छोड़ती। आगे-पीछे के नाम पर हम बस जोड़ते ही रहते हैं। कई बार झुंझलाते है। अपने ही जोड़े हुए से उकता भी जाते हैं, पर जमा करते रहने से बाज नहीं आते। चीजें बिखरी रहती हैं। कई बार समय पर नहीं मिलतीं। उन चीजों को खरीद बैठते हैं, जो पहले से ही पास होती हैं। बेवजह का बोझ उठाए रखना ही जरूरी लगने लगता है। यह बात देर में समझ आती है कि जरूरत तो थोड़ी ही थी। हमारी परिग्रह की यह सोच अनेक समस्याओं का कारण बनती है।

धन हर समस्या का समाधान नहीं है। इसी चिंतन में ठीक लिखा है ‘‘जिसके पास केवल धन है उससे बढ़कर गरीब कोई नहीं।’’ एक महापुरुष ने यहां तक कहा है कि मुझसे धनी कोई नहीं है क्योंकि मैं सिवाय परमात्मा के किसी का दास नहीं हूं। यदि धन संपत्ति ही सब कुछ होती तो संसार में कोरोना महामारी से अमीर नहीं मरते। कोरोना का शिकार अमीर और गरीब दोनों हो रहे हैं। क्यों उसको त्यागते और क्यों उस पारसमणि को पाने की लालसा रखते जिसके स्पर्श से लोहा भी कुंदन बन जाता है? वह पारसमणि आत्मा है। इसकी प्राप्ति के उपरांत पाने को कुछ शेष नहीं रह जाता। इसलिए जरूरी है कि हम आत्मा से आत्मा को देखे, आत्मा से आत्मा का मिलन करे। यही आत्मा से परमात्मा तक की हमारी यात्रा होगी जो हमारे जीवन को सार्थक दिशा दे सकेगी और यही कोरोना जैसे महासंकट में कैसे जीया जाये, को वास्तविक दिशा देगी। अब जीवन में सबकुछ बदल चुका है, इस बदले हुए जीवन के अर्थ को समझना ही कोरोनामय वातावरण में जीवन को सुखी, स्वस्थ एवं सार्थक करने का माध्यम है। प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92


हर घड़ी स्वास्थ्य जागृति एवं क्रांति हो

हर घड़ी स्वास्थ्य जागृति एवं क्रांति हो

08-Apr-2021

विश्व स्वास्थ्य दिवस-7 अप्रैल 2021 पर विशेष
 - ललित गर्ग -

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इक्कीसवीं सदी ने मनुष्य जाति को बहुत कुछ दिया हैµअच्छा भी, बुरा भी। इनमें से उसकी एक देन हैµकोविड-19, मानव इतिहास से इस सबसे बड़ी एवं भयावह महामारी ने मनुष्य जीवन को संकट में डाल दिया है, न केवल मनुष्य जीवन बल्कि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक सभी क्षेत्र इससे प्रभावित हुए हैं। विशेषतः मनुष्य का तन-मन-धन चैपट हुआ, बड़ा संकट से घिरा है। कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण बनी है। क्योंकि डब्ल्यूएचओ विश्व के देशों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग एवं मानक विकसित करने वाली संस्था है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 193 सदस्य देश तथा दो संबद्ध सदस्य हैं। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की एक अनुषांगिक इकाई है। इस संस्था की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को की गयी थी। इसीलिए प्रत्येक साल 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। इस वर्ष कोरोना महामारी से जुझते एवं उसके बढ़ते प्रकोप पर नियंत्रण पाने की दृष्टि से इस दिवस की विशेष उपयोगिता एवं प्रासंगिकता है।
कोरोना महामारी की त्रासदी एवं संकट से जूझ रहे विश्व-मानव का  स्वास्थ्य की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिये विश्व स्वास्थ्य दिवस का विशेष महत्व है। डबल्यूएचओ के द्वारा जेनेवा में वर्ष 1948 में पहली बार विश्व स्वास्थ्य सभा रखी गयी जहाँ 7 अप्रैल को वार्षिक तौर पर यह दिवस मनाने के लिये फैसला किया गया था। वर्ष 1950 में पूरे विश्व में इसे पहली बार मनाया गया था। कोरोना महामारी से मुक्ति की दिशा में सार्थक पहल एवं इस महामारी की गंभीरता एवं घातकता के प्रति जागरूकता का स्तर बढ़ाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू हैं। वैश्विक आधार पर स्वास्थ्य से जुड़े सभी मुद्दे को विश्व स्वास्थ्य दिवस लक्ष्य बनाता है जिसके लिये विभिन्न देशों की सरकारों के साथ मिलकर व्यापक प्रभावी उपक्रम किये जाते हैं, विभिन्न जगहों जैसे स्कूलों, कॉलेजों, सार्वजनिक संस्थानों और दूसरे भीड़ वाले जगहों पर दूसरे संबंधित स्वास्थ्य संगठनों के साथ मिलकर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। विश्व में मुख्य स्वास्थ्य मुद्दों की ओर लोगों का ध्यान दिलाने के साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना को स्मरण करने के लिये इस दिवस को मनाया जाता है। वैश्विक आधार पर स्वास्थ्य मुद्दों को बताने के लिये यूएन के तहत काम करने वाली डबल्यूएचओ एक बड़ी स्वास्थ्य संगठन है। विभिन्न विकसित देशों से अपने स्थापना के समय से इसने कुष्ठरोग, टीबी, पोलियो, चेचक और छोटी माता आदि सहित कई गंभीर स्वास्थ्य मुद्दे को उठाया है। एक स्वस्थ विश्व बनाने के लक्ष्य के लिये इसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1970 में परिवार नियोजन, बच्चों की रोगरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए, 1974 में टीकाकरण कार्यक्रम, 1987 में प्रसूता मृत्यु दर को कम करने के लिए, 1988 में पोलिया उन्मूलन और 1990 में जीवनशैली से होने वाली बीमारी को रोकने के लिए अभियान चलाये गये हैं। 1992 में डब्ल्यूएचओ ने पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए पहल की। 1993 में एचआईवी-एड्स को लेकर संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर कार्यक्रम शुरू किया। उस प्रोग्राम ने एड्स पर डब्ल्यूएचओ के चल रहे वैश्विक प्रोग्राम की जगह ले ली। वर्ष 1960 में  नीग्रो जाति में होने वाले संक्रामक रोग यॉज, स्थानीय महामारी सिफलिस, कुष्ठ और आंख से संबंधित रोग ट्रेकोमा को जड़ से खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। इसने एशिया में कॉलरा जैसी महामारी को नियंत्रित करने में मदद की। इसने अफ्रीका में पीत ज्वर जैसी स्थानीय महामारी को नियंत्रित करने में भी अहम भूमिका निभाई। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के लोगों के स्वास्थ्य के स्तर को ऊंचा उठाना है। हर इंसान का स्वास्थ्य अच्छा हो और बीमार होने पर हर व्यक्ति को अच्छे प्रकार के इलाज की अच्छी सुविधा मिल सके। दुनिया भर में पोलियो, रक्ताल्पता, नेत्रहीनता, कुष्ठ, टी.बी., मलेरिया और एड्स जैसी भयानक बीमारियों की रोकथाम हो सके और मरीजों को समुचित इलाज की सुविधा मिल सके, और इन समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक बनाया जाए और उनको स्वस्थ वातावरण बना कर स्वस्थ रहना सिखाया जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव-स्वास्थ्य की परिभाषा है।
इन उल्लेखनीय स्वास्थ्य जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के बावजूद कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी को लेकर डब्ल्यूएचओ की भूमिका भी संदेह के दायरे में आ गई है। तत्कालिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने तो उसकी खुली आलोचना कर डाली है। सवाल उठते रहे हैं कि क्या कोरोना महामारी के संदर्भ में डब्ल्यूएचओ ने गंभीरता दिखाते हुए पर्याप्त कदम उठाए? क्या उसने चीन से सही सवाल पूछे ताकि इस बीमारी के संभावित खतरे को लेकर कुछ भनक लगती? क्या इस बीमारी को लेकर विश्व को समय से सलाह न दे पाने में नाकाम रहने के लिए उसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए?
कोरोना महामारी को लेकर इसका मकसद मानवीय स्वास्थ्य के सभी पहलुओं को सुधारने और महामारी की रोकथाम में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना था। इसे एक निष्पक्ष तकनीकी संगठन के रूप में काम करना चाहिए, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों की तरह यह भी अमीर और ताकतवर देशों के दबावों से प्रभावित दिखाई दिया है, इसकी निष्पक्षता एवं पारदर्शिता संदेह के घेरे में आ गयी। किसी भी किस्म की स्वास्थ्य आपदा में डब्ल्यूएचओ से यह अपेक्षा होती है कि वह बिना किसी पक्षपात समय रहते कारगर कदम उठाए। इसमें महानिदेशक की भूमिका बेहद अहम होती है। उसे इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि उसकी निजी पसंद क्या है या उसके मूल देश का इस पर क्या रुख है? मौजूदा महानिदेशक टेड्रोस गेब्रेयसस की भूमिका विवादास्पद बनी क्योंकि जब 7 जनवरी को चीन ने कोरोना वायरस के फैलने की सूचना दी। इससे एक हफ्ते पहले चीन ने डब्ल्यूएचओ को बताया था कि वुहान शहर में हो रही मौतों की वजह उसे पता नहीं लग पा रही। गेब्रेयसस तब भी सावधान नहीं हुए। क्या वह चीन के प्रभाव में थे जिसने उनके चुने जाने का जबरदस्त समर्थन किया था? टेड्रोस का रुख भी किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के मुखिया जैसा नहीं था। उनका रवैया तब और संदिग्ध हो गया जब उन्होंने डब्ल्यूएचओ-चीन की संयुक्त टीम पर सहमति जताई, जबकि डब्ल्यूएचओ की टीम को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए था। आखिरकार 30 जनवरी को डब्ल्यूएचओ ने कोविड-19 को अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली स्वास्थ्य आपदा करार दिया। यह एलान पहले ही हो जाना चाहिए था। लापरवाही का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 4 से 8 फरवरी के बीच डब्ल्यूएचओ के कार्यकारी बोर्ड की बैठक हुई। वहां 52 सूत्रीय एजेंडे में कोविड-19 को शामिल तक नहीं किया गया। कोविड-19 का प्रकोप बढ़ाता रहा, फिर भी डब्ल्यूएचओ उसे वैश्विक महामारी घोषित करने से कतराता रहा। उसने 11 मार्च को यह एलान किया। कुल मिलाकर इस मामले में डब्ल्यूएचओ का रुख उसके उद्देश्यों के उलट रहा। डब्ल्यूएचओ को प्रहरी की भूमिका निभानी थी वह उसमें नाकाम रहा। इन स्थितियों में उसके द्वारा विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने के उद्देश्यों पर भी धुंधलाना छाया है, जरूरत है इस दिवस को मनाते हुए डब्ल्यूएचओ की प्रतिष्ठा एवं पारदर्शिता को स्ािापित करने के निष्पक्ष उपक्रम करने की, तभी इस दिवस को मनाने की सार्थकता होगी। किसी एक दिन नहीं, बल्कि हर रोज, हर घड़ी हमें स्वास्थ्य को पैदा करना पड़ता है, ऐसी जागृति एवं क्रांति ही कोरोना महामारी से हमें निजात दिला सकती है। आइए अब हम स्वास्थ्य-निर्माण के सिर्फ सपने न देखें, उन्हें सच करने का संकल्प करें। प्रस्थान का यही क्षण हमारी विश्व स्वस्थता की सफलता का विश्वास होगा।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


लोकतंत्र में हथियार उठाना कायरता की मिशाल है

लोकतंत्र में हथियार उठाना कायरता की मिशाल है

06-Apr-2021

अरे मूर्ख टट्टुओं, हथियारबंद नक्सलियों क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर, नक्सली लीडरों के चमचागिरी को त्यागकर अच्छे जीवन का विकल्प चुनो...
आत्मसमर्पण करके आम नागरिक बनो, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, मंत्री और जज बनो: श्री एच.पी. जोशी

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नक्सलियों के शीर्ष लीडर नाम बदलकर अरबपति का जीवन जीते हैं और इनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं जबकि आम जनता को गुमराह करके ये इनका शोषण करते हैं..... जिन्हें सरकार में होना चाहिए उन्हें ही सरकार के खिलाफ नक्सली बना देते हैं इतने दुष्ट हैं शीर्ष नक्सली लीडर।

वास्तव में नक्सली कायर और बुझदिल हैं जो जवानों को षड्यंत्र से शहादत को मजबूर करते हैं, है हिम्मत तो वापस आएं, आत्मसमर्पण करें फिर लोकतंत्र में भागीदार बनकर सिस्टम में सुधार के जनक बनें। नक्सलवाद के समर्थकों का सदैव आरोप रहता है कि सरकारी तंत्र उन्हें उपेक्षित रखता हैं उन्हें समुचित संवैधानिक अधिकार नहीं देता तो यह झूठ है क्योंकि संविधान में सरकार का दायित्व निर्धारित कर दिया गया है कि सभी सरकार देश के सभी नागरिकों को उनके अधिकारों को प्रदान करे; इसके लिए बाकायदा न्यायालय और मानव अधिकार आयोग भी है जो नागरिकों के सभी अधिकार को समान रूप से संरक्षित करते हैं, यदि नक्सलियों को समस्या है तो आम जनता की भांति न्यायालय की शरण में आएं, मगर उन्हें तो झूठ में जीवन जीना है लोगों को लूटना है।

खूनी आतंक के पर्याय बन चुके नक्सलियों के शीर्ष नेताओं को पता है कि इन हिंसा और उपद्रव से उन्हें आर्थिक लाभ मिलता रहेगा इसलिए नीचे के छोटे मोटे टट्टू नक्सली अर्थात हथियारबंद नक्सलियों को देश के वीर जवानों के खिलाफ छल कपट से लड़ने के लिए उकसाते हैं।

नक्सलियों के बड़े लीडर के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं; गोपनीय और अनगिनत नामों से नक्सली बनकर आम जनता को लूटने वाले ये लोग अरबपति बनकर बड़े ठाठ की जिंदगी जी रहे हैं। जबकि टट्टू नक्सलियों अर्थात छोटे मोटे नक्सलियों को ब्रेनवॉश करके इनका शोषण करते हैं और इनके ही हाथों इन्हें इनके मानव अधिकारों से वंचित रहने को मजबूर कर देते हैं।

स्थानीय नक्सलियों को समझना होगा कि किस तरह से उनके शीर्ष नक्सली लीडर उनका शोषण करने में लगे हैं और कैसे बड़े चालाकी से इन्हें इनके ही मानव अधिकारों से वंचित रहने को मजबूर करते हैं; कैसे शीर्ष नक्सली लीडर इन कम पढ़े लिखे लोगों को इनके ही अधिकारों के खिलाफ एकजुट करके इन्हें हथियारबंद नक्सली बनाकर सभी सुविधाओं से वंचित रहने को मजबूर कर देते हैं। स्थानीय नक्सलियों को समझना होगा, उन्हें जागरूक होना होगा, जितना जल्दी हो सके इन छोटे छोटे हथियारबंद नक्सलियों को अपने शीर्ष लीडर के चालाकी और मानसिकता की समीक्षा करके आत्मसमर्पण करना होगा और लोकतंत्र में भागीदार बनकर, चुनाव लड़कर, स्थानीय जनप्रतिनिधि, विधायक, सांसद और मंत्री बनकर अपने लोगों को विकास की नई दिशा दिखाना होगा उन्हें शिक्षा और उच्च शिक्षा के माध्यम से स्वयं और अपने बच्चों को आईएएस, आईपीएस जैसे शीर्ष अधिकारी बनाना होगा।

हर हथियारबंद नक्सलियों को पता होनी चाहिए कि नक्सली बनकर वे बेहतर जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते जबकि आमतौर पर हर नागरिक को बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध हैं। सरकारी तंत्र हर प्रकार के सुविधाओं जैसे निःशुल्क आवास, निःशुल्क राशन, निःशुल्क चिकित्सा, निःशुल्क शिक्षा, निःशुल्क स्कील, निःशुल्क सुरक्षा और निःशुल्क कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराता है जबकि वे नक्सली बनकर अपने इन अधिकार से वंचित दशहत, डर और भययुक्त जीवन को अपना साथी समझ बैठे हैं।

नक्सलियों को समझना होगा कि चाहे वे हजारों जवानों को शहादत के लिए मजबूर कर लें मगर इससे उन्हें अपने मानव अधिकारों के समुचित उपयोग करने का अवसर नहीं मिलेगा। नक्सलियों का जीवन अत्यंत असुविधा और असुरक्षित होता है, बड़े नक्सली लीडर के प्रसादपर्यंत ही उन्हें जीवन का अधिकार होता है। लोग नक्सलियों से भयभीत भले रहें मगर कोई उनका सम्मान कोई नहीं करता। यदि नक्सलियों को स्वाभिमान और सम्मान भरे सुविधायुक्त और सुरक्षित जीवन चाहिए, पूरे विश्व में कहीं भी निवास करने और घूमने की आजादी, अच्छे कपड़े और भोजन चाहिए तो उन्हें शीर्ष नक्सली लीडरों की चमचागिरी छोड़कर लोकतंत्र का हिस्सा बनना होगा।

लोकल नक्सलियों को विवेकशील होना पड़ेगा उनमें ये विवेक जरूर हो कि चाहे वे कितने ही जवानों को छल कपट और क्रूरता से शहीद होने पर मजबूर कर लें मगर उनकी मृत्यु तो बद्तर होने वाली है। उन्हें समझना होगा कि दूसरे पक्ष को कितना बड़ा नुकसान होता है यह मायने नहीं रखता बल्कि मायने इस बात की है कि आपने इसके बदले क्या क्या खो दिया।

इन हथियारबंद नक्सलियों को जानना होगा कि "हर मनुष्य भाई बहन के समान हैं।" मैं नक्सलियों को फिर से कहता हूं औकात है तो आओ, लोकतंत्र में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करते हुए अपने हक और अधिकार को हासिल करो, मरना या मारना इसका कोई विकल्प ही नहीं है। आप जिन सशस्त्र बल, पुलिस और सहायक सशस्त्र बल के जवानों से लड़ रहे हो, जिन्हें शहादत के लिए मजबूर कर रहे हो वे सब आपके बचपन के साथी या भाई ही हैं। आपके सामने ऐसे दर्जनों अवसर भी आये हैं जब आपके बंदूक के निशाने पर आपके ही भाई बहन होते हैं, आपके नक्सली लीडर आपके परिवार के सदस्यों के ऊपर मुखबिर होने का झूठा आरोप लगाकर आपसे ही मरवा देते हैं और आप उनके झांसे में आकर आपके अपने परिवार और रिश्तेदारों की भी कत्ल कर जाते हैं।

हथियारबंद नक्सलियों को एक बार अपने आंखों के चश्मे उतारकर अपने और आम जनता के जीवन शैली की समीक्षा करनी होगी, तब समझ में आएगा कि वे कितने पानी में हैं।

नक्सलियों थोड़ा अपने घर परिवार को झांक कर तो देखो और बताओ आपके पास कितने मोबाइल फोन है, कितने लेपटॉप है, कितने टेलीविजन है, कितने सोफा, कितना पलंग, कितने दीवान, कितने आलमारी और कितने लॉकर है?

अरे मूर्ख हथियारबंद नक्सलियों आपसे कुछ प्रश्न है :-
1- क्या कभी आपने बिना भय के जीवन जीया है?
2- क्या कभी बिना हथियार के खुद को सुरक्षित पाते हो?
3- क्या आप नक्सली बनने के बाद सुख, चैन के साथ परिवार के साथ जीवन का आनंद ले पाते हो?
4- क्या आपके नक्सली लीडर आपको वैवाहिक जीवन, परिवार और अच्छे आवास की व्यवस्था उपलब्ध करा सकते हैं?
5- क्या आपने कभी अच्छे और मनचाहे कपड़े कभी पहना है?
6- क्या कभी मनचाहे पर्यटकों में घूमने का अवसर पाया है?
7- क्या कभी शहरों में जाकर मॉल, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर, सर्कस, मेला, उद्यान और चौक चौपाटी में जीवन का आनंद लिया है?
8- क्या कभी आप अपने परिवार और समाज के साथ कहीं पिकनिक या टूर में गया है?
9- क्या नक्सली बनने के बाद आपको किसी पारिवारिक सदस्यों, समाज या सरकार ने कभी सम्मानित किया है?
10- क्या आपको नहीं लगता कि आप भी मंत्री बनें, संसद या विधायक बनें?
11- क्या कभी आपने अपने परिवार के साथ एसी, कूलर लगे घर जिसमें सोफा हो, बड़ा सा महाराजा सेट वाला पलंग और लाइव टेलीकास्ट हो रहे टेलीविजन के सामने अपने परिवार के साथ मिलकर चाय नाश्ता और भोजन किया है?
12- क्या कभी आपने परिवार के साथ कुछ फ़िल्म, कुछ सीरियल, रोमांटिक गानें और मजेदार चुटकुले सुना है?
13- क्या आपको आपके लीडर जैसे सुविधाएं मिलती है; क्या आपके बच्चे आपके लीडर के बच्चों के बराबर उनके साथ उनके स्कूल कॉलेज में पढ़ते हैं?
14- क्या आपको और आपके बच्चों को विभिन्न भाषाओं को पढ़ना लिखना आता है? पढ़ना लिखना नहीं आता इसीलिए तो आपके लीडर आपको बेवकूफ बनाकर मजा कर रहे हैं।

मुझे विश्वास है इन चंद प्रश्नों के लिए आपका हर जवाब 'नहीं' में होगा, मैं जानता हूँ आपसे सैकड़ों ही नहीं हजारों प्रश्न भी करूँगा तो भी आपके सारे जवाब 'नहीं' में ही रहेगा। इसलिए यदि आपको जीवन का असली आनंद लेना हो तो आओ हिंसा को त्याग कर हमारे साथ जीवन का आंनद लीजिए... सुखद जीवन के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ दो, प्रेम और सद्भावना को अपने जीवन में स्थान दो। आपके ईश्वर ने आपके आराध्य ने और आपके माता पिता ने आपको सुख सुविधाओं से युक्त सुखद जीवन जीने के लिए जन्म दिया है इसलिए जीने का आनंद लो। आइए क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर, नक्सली लीडरों के चमचागिरी को त्यागकर अच्छे जीवन का विकल्प चुने... आत्मसमर्पण करके आम नागरिक बनें, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, मंत्री और जज बनें।

 


रजनीकांत का प्रकाश सूर्य बनता गया

रजनीकांत का प्रकाश सूर्य बनता गया

05-Apr-2021

रजनीकांत का प्रकाश सूर्य बनता गया
- ललित गर्ग-

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करीब पांच दशकों से सिनेमा में सक्रिय एवं सुुविख्यात फिल्मी अभिनेता रजनीकांत को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किये जाने की केंद्र सरकार की घोषणा को भले ही राजनीतिक रंग देने का प्रयत्न हो रहा है, भले ही इस अवार्ड की घोषणा को तमिलनाडू के विधानसभा चुनाव से जोड़ने की कोशिश हो, लेकिन इस घोषणा से पुरस्कार स्वयं पुरुस्कृत हुआ है। इस पुरुस्कार से कला, अभिनय एवं हिन्दी सिनेमा का सम्मान हुआ है। रजनीकांत ने हिन्दी सिनेमा में अपने विलक्षण अभिनय से कामयाबी का नया आसमान रचा है, उन्होंने अपनी फिल्मों में एक अलहदा पहचान बनायी, अपनी खास संवाद अदायगी, चमत्कारी एक्टिंग स्टाइल और गजब के अभिनय ने उन्हें बुलंदी तक पहुंचाया। तमिलों ने उन्हें अपने सिर पर बैठाया। न केवल देश बल्कि दुनिया में उनके प्रशंसकों का बहुत बड़ा समूह है, जो उनके स्टाइल जैसे सिगरेट को फ्लिप करने का अंदाज, सिक्का उछालने का तरीका और चश्मा पहनने का तरीका बहुत से लोग कॉपी करने की कोशिश करते हैं। देश ही नहीं विदेशों में भी रजनीकांत के स्टाइल की कॉपी की गई। रजनीकांत ने अपनी एक्टिंग के दम पर सिनेमा जगत और लोगों के दिल में अलग ही जगह बनाई है, दादा साहब फाल्के अवॉर्ड उनके विलक्षण अभिनय कौशल, अनूठी प्रतिभा एवं हिन्दी सिनेमा को दिये गये अविस्मरणीय योगदान का सम्मान है।  
रजनीकांत का फिल्मी सफर पांच दशकों की लंबी पगडंडी पर चलता एक प्रकाश, एक प्रेरणा है। अनेक कीर्तियां, अनेक पद, अनेक सम्मान-पुरस्कार प्राप्त करके भी जो व्यक्ति दबा नहीं, बदला नहीं, गर्वित नहीं हुआ अपितु हर बार जब ऐसे पुरस्कारों से भारी किया गया तब-तब वह ”रजनीकांत“ यानी कांतिमय बनता गया। वह हर बार कहता रहा कि, ”मैं कलाकार हूँ, कलाकार ही रहना चाहता हूँ।“ और बस वो प्रकाश सूर्य बनता गया। वह इसलिए महान् नहीं कि उसके नाम के आगे अनेक अलंकरण व यशकीर्ति के प्रतीक जुड़े हैं। उसके करोड़ों प्रशंसक हैं। बड़ी-बड़ी हस्तियां उससे जुड़ी हैं। उसकी झलक पाने के लिए देश-विदेश के कोने-कोने से आकर के प्रशंसक लोग कतार बांधे रहते हैं। बल्कि वह इसलिए महान् है कि उसके पास बैठकर कोई अपने को छोटा महसूस नहीं करता। उसका सान्निध्य पाकर सब एक संतोष, एक तृप्ति, एक विश्वास महसूस करते हैं। एक बड़े विचार, आदर्श समाज-निर्माण के संकल्प से जुड़ते हैं। कहते हैं कि वटवृक्ष के नीचे कुछ भी अन्य अंकुरित नहीं होता, लेकिन इसके मार्गदर्शन में सैंकड़ों व्यक्तित्व एवं हजारों शुभ-संकल्प पल्लवित हुए हैं, हो रहे हैं, संबल पाते हैं, जीवन को उन्नत दिशाओं में अग्रसर करते हैं। वह एक कलाकार ही नहीं, जीवन-निर्माण का संकल्प भी है। घड़ी का तीन-चैथाई वक्त जन-कल्याण के लिए देने वाला व्यक्ति निजी नहीं, जनिक होता है। जब किसी का जीवन जनिक हो जाता है तब निजत्व से उभरकर बहुजन हिताय हो जाता है। निजत्व गौण हो जाता है।
दक्षिण फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत का असली नाम शिवाजी है। रजनीकांत का जन्म 12 दिसंबर 1950 को बेंगलुरू में एक मराठी परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी मेहनत और कड़े संघर्ष की बदौलत टॉलीवुड में ही नहीं बॉलीवुड में भी काफी नाम कमाया। साउथ में तो उनको थलाइवा और भगवान कहा जाता है। उन्होंने 25 साल की उम्र में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। उनकी पहली तमिल फिल्म ‘अपूर्वा रागनगाल’ थी। इस फिल्म में उनके साथ कमल हासन और श्रीविद्या भी थीं। 1975 से 1977 के बीच उन्होंने ज्यादातर फिल्मों में कमल हासन के साथ विलेन की भूमिका ही की। लीड रोल में उनकी पहली तमिल फिल्म 1978 में ‘भैरवी’ आई। ये फिल्म काफी हिट रही और रजनीकांत स्टार बन गए। रजनीकांत को 2014 में 6 तमिलनाड़ु स्टेट फिल्म अवॉर्ड्स से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें से 4 सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और 2 स्पेशल अवॉर्ड्स फॉर बेस्ट एक्टर के लिए दिए गए थे। उन्हें साल 2000 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था। 2014 में 45वें इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में रजनीकांत को सेंटेनरी अवॉर्ड फॉर इंडियन फिल्म पर्सनैलिटी ऑफ द ईयर से भी सम्मानित किया गया था। अब उन्हें दादा साहब फाल्के अवॉर्ड प्रदत्त करने का निर्णय सिलेक्शन ज्यूरी ने किया है। इस ज्यूरी में आशा भोंसले, मोहनलाल, विश्वजीत चटर्जी, शंकर महादेवन और सुभाष घई जैसे कलाकार शामिल हैं। निश्चित ही यह सही कलाकार का सही चयन है। साल 2018 में यह पुरस्कार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और साल 2017 में भूतपूर्व बीजेपी नेता और अभिनेता विनोद खन्ना को दिया गया था।
पिछले लम्बे दौर में यह चर्चा काफी तेजी थी कि रजनीकांत तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में भी कदम रखने वाले हैं, लेकिन बीते साल दिसंबर में उन्होंने ऐलान किया कि वे स्वास्थ्य कारणों से चुनावी राजनीति से बाहर ही रहेंगे। पिछले 25 वर्षों से रजनीकांत के सक्रिय राजनीति में आने कयास लगाये जाते रहे थे, लेकिन अब रजनीकांत ने - ‘अच्छा करो, अच्छा बोलो तो अच्छा ही होगा’ इस एक वाक्य से जाहिर कर दिया कि फिल्मी संवाद सिर्फ रुपहले बड़े पर्दे पर ही धमाल नहीं करते, बल्कि आम जनजीवन में भी वे नायकत्व को साकार होते हुए दिखा सकते हैं। रजनीकांत भले ही सक्रिय राजनीति में आकर एक नये अध्याय की शुरुआत नहीं कर पाये हो, लेकिन वे सार्वजनिक जीवन में सेवा एवं समाज निर्माण के कार्यों में सक्रिय बने रहेंगे। तमिलनाडु भारत का ऐसा राज्य है, जहां की राजनीति में फिल्मी सितारों का हमेशा दबदबा रहता है।
रजनीकांत के राजनीति में आने की महत्वाकांक्षाओं का बड़ा कारण रहा कि सरकार में बहुत भ्रष्टाचार है और इस तरह की भ्रष्ट सरकारों को सत्ता में नहीं होना चाहिए। राजनीति में भ्रष्टाचार एवं आर्थिक अपराधों का वे समय-समय पर विरोध करते रहे हैं। रजनीकांत ने सिनेमा जगत में ही अद्भुत नहीं रचा बल्कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश में जो नैतिकता एवं संवेदनाओं की लकीरें खींची हैं, वह कोई देख नहीं रहा है, किसी के पास कुछ सुझाने के लिए भी नहीं है। इसलिए तो रजनीकांत भिन्न है। इसलिए तो उनसे मार्गदर्शन मिलता है। इसलिए वे राष्ट्र एवं समाज की आशा और अपेक्षा के केन्द्र हैं। ऐसे रोशनी देने वाले चरित्रों को राजनीति रंग देना दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसे पुरस्कार की पात्रता पर भी सवाल उठाना विडम्बनापूर्ण है।
रजनीकांत ने हिन्दी एवं तमिल सिनेमा में एक लम्बी यात्रा तय की है। इस यात्रा के अनेक पड़ाव रहे हैं। सिनेमा के दुनिया के सबसे बड़े अवार्ड से नवाजे जाने के अवसर पर इन पड़ावों को मुड़कर देखना एक रोचक एवं प्रेरक अनुभव है। कहा जा सकता है कि उनका सिनेमाई जीवन के समानान्तर एक और जीवन समाज-निर्माता का जीवन है। वह मूल्यों का एवं संवेदनाओं का जीवन है। स्वयं का भी विकास और समाज का भी विकास, यही समष्टिवाद है और यही धर्म है और यही रजनीकांत के जीवन का सार है। केवल अपना उपकार ही नहीं परोपकार भी करना है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारा दायित्व भी है और ऋण भी, जो हमें अपने समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना है और यही रजनीकांत  की प्राथमिकता में शुमार है। उन्होंने समय की आवाज को सुना, देश के लिये कुछ करने का भाव उनमें जगा, उन्होंने सच को पाने की ठानी है, यह नये भारत को निर्मित करने की दिशा में एक शुभ संकल्प हैं। उनको दादा साहब फाल्के अवॉर्ड देने की घोषणा से उनके संकल्पों को बल मिलेगा, वे राजनीति को भले ही सक्रिय रूप में जीवन-लक्ष्य न बनाये पर राजनीतिक परिवेश में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका से भी भ्रष्टाचार एवं अपराधमुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक पहल बनेगी, ऐसा होने से ही राजनीति में सिद्धान्तों एवं मूल्यों की स्थापना को बल मिल सकेगा।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
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प्रसन्न जीवन की बुनियाद पर सरकारी नीतियां बने -ललित गर्ग

प्रसन्न जीवन की बुनियाद पर सरकारी नीतियां बने -ललित गर्ग

31-Mar-2021

प्रसन्न जीवन की बुनियाद पर सरकारी नीतियां बने
-ललित गर्ग-

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हाल ही में पंजाब विश्वविद्यालय की ओर से देश के 34 शहरों में खुशी का स्तर नापने  के लिये एक महत्वपूर्ण सर्वे कराया गया, अब तक इस तरह के सर्वे एवं शोध विदेशों में ही होते रहे हैं, भारत में इस ओर कदम बढ़ाना जागरूक समाज का द्योतक हैं। इस किय गए सर्वे की रिपोर्ट में लुधियाना, अहमदाबाद और चंडीगढ़ को भारत के सबसे खुश शहरों का तमगा हासिल हुआ है। लोगों की खुशी का स्तर नापने के लिए इस अध्ययन में पांच प्रमुख कारक रखे गए थे- कामकाज, रिश्ते, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, लोकोपकार और धर्म-अध्यात्म। दुनिया के स्तर पर भी हैपिनेस इंडेक्स जारी किए जाने की खबरें हर साल आती रहती हैं। संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट जारी की जाती है, वर्ष 2019 में भारत का स्थान 133 से नीचे सरककर 140वें पायदान पर आ गया था। इस तरह यह गंभीर चिंता की बात है कि हम प्रसन्न समाजों की सूची में पहले की तुलना और नीचे आ गये हैं।
प्रसन्नता से जुड़ी सूचनाओं से हमें अलग-जगहों पर लोगों की मनोदशा को लेकर कुछ जानकारी मिलती है, लेकिन ज्यादा बड़ी बात यह है कि कोरेे धन से खुशी तलाशने वालों को ये तथ्य सावधान करते हैं, क्योंकि धन के अलावा खुशहाली के कुछ दूसरे कारक भी हैं, जिनको पंजाब विश्वविद्यालय ने अपनी नयी सर्वे में चुना है। सरकार के नीति निर्माताओं के अजेंडे पर ये कारण आने चाहिए। इस तरह के सर्वे का उद्देश्य ही प्रसन्न समाज की बाधाओं को सामने लाना एवं प्रसन्न-खुशी समाज निर्मित करना है। इस तरह के सर्वे रिपोर्ट का आना जहां सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन करने का अवसर देता है, वहीं नीति-निर्माताओं को भी सोचना होगा कि कहां समाज निर्माण में त्रुटि हो रही है कि हम लगातार खुशहाल देशों की सूची में नीचे खिसक रहे हैं।
दुनिया में विकास के जो पैमाने स्थापित हैं क्या वे आम-जन की खुशी एवं प्रसन्नता की बुनियादी जरूरतों पर तय होते हैं? सरकारें खुद को कामयाब दिखाने के लिए जीडीपी के आंकड़े लगातार बढ़ाने की कोशिश करती हैं, उनकी आम लोगों के जीवन को खुशहाल बनाने में कितनी भूमिका है, इस पर अब दुनिया में गंभीर बहस की एवं अनुसंधान की जरूरत है। क्या दुनिया की सरकारें खुशी और प्रसन्नता को आधार बनाकर अपनी नीतियां बनाती है? दुनिया में भूटान वह अकेला देश है जहां सरकार बाकायदा जीएनएच (ग्रॉस नेशनल हैपिनेस) इंडेक्स को आधार बनाकर अपनी नीतियां तय करती है और लोगों के जीवन में खुशी लाना अपना लक्ष्य मानती है।
ऐसे सर्वे का मकसद विभिन्न देशों के शासकों को आईना दिखाना है कि उनकी नीतियां लोगों की जिंदगी खुशहाल बनाने में कोई भूमिका निभा रही हैं या नहीं? आजादी के बाद के भारत के शीर्ष नेतृत्व ने निरन्तर आदर्शवाद और अच्छाई का झूठ रचते हुए सच्चे आदर्शवाद के प्रकट होने की असंभव कोशिश की है, इसी से जीवन की समस्याएं सघन होती गयी है, नकारात्मकता का व्यूह मजबूत होता गया है, खुशी एवं प्रसन्न जीवन का लक्ष्य अधूरा ही रहा है,  इनसे बाहर निकलना असंभव-सा होता जा रहा है। दूषित और दमघोंटू वातावरण में आदमी अपने आपको टूटा-टूटा सा अनुभव कर रहा है। आर्थिक असंतुलन, बढ़ती महंगाई, बिगड़ी कानून व्यवस्था, चरमर्राते रिश्ते, जटिल होंती जीवनशैली, बिगड़ता स्वास्थ्य, महामारियां एवं भ्रष्टाचार उसकी धमनियों में कुत्सित विचारों का रक्त संचरित कर रहा है। ऐसे जटिल हालातों में इंसान कैसे खुशहाल जीवन जी सकता है?
आधुनिक समाज व्यवस्था का यह कटु यथार्थ है कि भौतिक सुविधाओं तक पहुंच एक ठोस हकीकत है जिसे देखा, समझा और नापा जा सकता है। उन सुविधाओं की बदौलत किसको कितनी खुशी मिलती है या नहीं मिलती, यह व्यक्ति की अपनी बनावट, मनःस्थिति एवं सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। इसे कैसे नापा जाए और सरकारें इसे नीति निर्धारण का आधार बनाएं तो उन नीतियों की सफलता-असफलता का आकलन कैसे हो? हालांकि यह व्यक्ति के मनोजगत की बात है, फिर भी इसके कुछ सूत्र पंजाब यूनिवर्सिटी की स्टडी में मिलते हैं। जैसे, आधुनिक पारिवारिक संरचना को लें तो रिपोर्ट में पाया गया कि शादीशुदा लोगों के मुकाबले अविवाहित लोग खुद को ज्यादा खुश बताते हैं। इसका मतलब यह लगाया गया कि स्थिरता के बजाय जिम्मेदारियों के झंझट से बचे रहना खुशी का एक जरिया हो सकता है। विकास की सार्थकता इस बात में है कि देश का आम नागरिक खुद को संतुष्ट और आशावान महसूस करे। स्वयं आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ बने, कम-से-कम कानूनी एवं प्रशासनिक औपचारिकताओं का सामना करना पड़े, सरकारी, पारिवारिक झंझट कम से कम हो, तभी वह खुशहाल हो सकेगा।
सवाल यह भी है कि आखिर वे कौन सी जरूरतें या जिम्मेदारियां हैं जिनसे किसी को अपने जीवन की खुशी छिनती हुई जान पड़ती है। बच्चों की पढ़ाई की चिंता से मुक्ति एवं बीमार पड़ने पर किसी आर्थिक संकट में फंसे बगैर इलाज हो जाने का भरोसा ऐसे कारण हैं, जो आमजन की छिनती खुशी पर अंकुश लगा सकते हैं, बहरहाल, इस अध्ययन से इतना तो पता चलता ही है कि सरकारी नीतियों की दिशा ऐसी होनी चाहिए जो आम व्यक्ति को खुशी जीवन दे सके। जिसके लिये सरकार की सोच को एवं नीतियांे में व्यापक बदलाव की जरूरत है, सरकार की नीतियों का लक्ष्य समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, सुरक्षा का भरोसा, सामाजिक सहयोग, कम-से-कम सरकारी औपचारिकताएं एवं झंझट, स्वतंत्रता और उदारता आदि होना चाहिए। लेकिन विडम्बनापूर्ण स्थिति तो यह है कि हमारा भारतीय समाज एवं यहां के लोग पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित अपने ज्यादातर पड़ोसी समाजों से कम खुश है।
यहां प्रश्न यह भी है कि आखिर हम खुशी और प्रसन्नता के मामलें क्यों पीछेे हैं, जबकि पिछले कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था की तेजी को पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है। अनेक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठनों ने इस मामले में हमारी पीठ ठोकी है। यही नहीं, खुद संयुक्त राष्ट्र ने मानव विकास के क्षेत्र में भारतीय उपलब्धियों को रेखांकित किया है। बावजूद इसके, खुशहाली में हमारा मुकाम नीचे होना आश्चर्यकारी है। दरअसल पिछले तीन-चार दशकों में भारत में विकास प्रक्रिया अपने साथ हर मामले में बहुत ज्यादा विषमता लेकर आई है। जो पहले से समर्थ थे, वे इस प्रक्रिया में और ताकतवर हो गए हैं। यानी लखपति करोड़पति हो गए और करोड़पति अरबपति बन गए। एकदम साधारण आदमी का जीवन भी बदला है लेकिन कई तरह की नई समस्याएं उसके सामने आ खड़ी हुई हैं। नौकरी-रोजगार, अर्थव्यवस्था, महंगाई, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम, रुपया का अवमूल्यन, किसानों की दुर्दशा, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, महिलाओं पर बढ़ते अपराध, शिक्षा, चिकित्सा, महामारियां ऐसे अनेक ज्वलंत मुद्दे हंै जिनका सामना करते हुए व्यक्ति निश्चित ही तनाव में आया है, उसकी खुशियां कम हुई है, जीवन में एक अंधेरा व्याप्त हुआ है। क्यों होता है ऐसा? कभी महसूस किया आपने? यह स्थितियां एक असंतुलित एवं अराजक समाज व्यवस्था की निष्पत्ति है। ऐसे माहौल में व्यक्ति खुशहाल नहीं हो सकता। एक महान विद्वान ने कहा था कि जब हम स्वार्थ से उठकर अपने समय को देखते हुए दूसरों के लिए कुछ करने को तैयार होते हैं तो हम सकारात्मक हो जाते हैं। सरकार एवं सत्ताशीर्ष पर बैठे लोगों को निस्वार्थ होना जरूरी है। उनके निस्वार्थ होने पर ही आम आदमी के खुशहाली के रास्ते उद्घाटित हो सकते हैं।
खुशहाल भारत को निर्मित करने के लिये आइये! अतीत को हम सीख बनायें। उन भूलों को न दोहरायें जिनसे हमारी रचनाधर्मिता एवं खुशहाल जीवन जख्मी हुआ है। जो सबूत बनी हैं हमारे असफल प्रयत्नों की, अधकचरी योजनाओं की, जल्दबाजी में लिये गये निर्णयों की, सही सोच और सही कर्म के अभाव में मिलने वाले अर्थहीन परिणामों की। एक सार्थक एवं सफल कोशिश करें खुशहाली को पहचानने की, पकड़ने की और पूर्णता से जी लेने की।  
प्रेषकः

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कौमी एकता का मिशाल है शहंशाहे छत्तीसगढ़ का दरबार

कौमी एकता का मिशाल है शहंशाहे छत्तीसगढ़ का दरबार

30-Mar-2021

कौमी एकता की  मिशाल है शहंशाहे छत्तीसगढ़ का दरबार
(हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह लुतरा शरीफ  पर विशेष)
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क़ादिररिज़वी 

छत्तीसगढ़ की धरती पर लुतरा शरीफ एक ऐसा मशहूर देहात है जिसको पूरे हिंदुस्तान में एक ख्याति प्राप्त है जंगल के करीब बसे इस छोटे से गांव की फ़िजाओं में एक अलग ही खुश्बू है चारो ओर खुशहाली और शादमानी की महक है और यह सब इसलिए है क्योंकि यहां शहंशाहे छत्तीसगढ़,ताजदारे विलायत हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह का मुकद्दस दरगाह है जिनके फैजान के नूरी किरणों से 60 वर्षो सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नही हिंदुस्तान का चप्पा-चप्पा महक रहा है।
यहां हर जाति धर्म के लोग हिंदुस्तान के कोने-कोने से  अपनी फरियाद लेकर आते है और खाली झोली भरकर जाते है छत्तीसगढ़ के शहंशाह का फैजान हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई के अलावा अन्य मजहब व मिल्लत के मानने वालों पर जारी है।
              
बाबा इंसान अली की पैदाइस,जिन्दगी और अंतिम सफर
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सूफी-संत हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह की पैदाईस 175 वर्ष पहले सन 1845 में ग्राम बछौद के सैय्यद मरदान अली के घर मे दादी अम्मा बेगम बी साहिबा के गोद मे हुई। बाबा इंसान अली शाह तीन बहन भाई में सबसे छोटे थे उनसे दो बड़ी बहन थी जिनका नाम इज्जत बी व उम्मीद बी था। बाबा सरकार   बचपन से ही करामाती थे अपने आप में ही लीन रहते थे आपका बचपन,जवानी के साथ पूरी जिंदगी बहुत ही सादगी और सराफत से गुजरी है जबकि आप एक रईस खानदान से ताल्लुक रखते थे आप जब बड़े हुए तो आपकी शादी खम्हरिया के मालगुजार जनाब मोहियुद्दीन खान की बेटी उमेद बी से हुई शादी के बाद बाबा इंसान अली की एक बेटी हुई जिनका मात्र 6 माह में इन्तेकाल हो गया था उसके बाद कोई औलाद नही हुआ आपने अपनी पूरी जिंदगी लोगो के भलाई करते हुए कौम खिदमत में गुजर दिए आपके पास कोई भी किसी भी हाल में आया सभी का आपने मदद किया ।  28 सितंबर सन 1960 रविवार का दिन हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह के लबो पर अजीब सी मुस्कुराहट थी नूरानी चेहरे से नूर की रहमत टपक रही थी बाबा सरकार कभी हँसते तो कभी मुस्कुराते तो कभी अपने आप मे मगन हो जाते दिन भर लोगो की आंखे बाबा के चेहरे पर टकटकी लगाए देखती रही दिन ढलता गया शाम का सूरज धरती के आगोश में छुप गया और अंधेरों में अपनी बांहे फैलाना शुरू कर दिया उपस्थित लोगों ने खामोश जुबान से रोते हुए आफ़ताबे छत्तीसगढ़ को आखरी सलाम किया बाबा इंसान अली  रात 9:35 बजे हमेशा के लिए हमारी जाहिरी आंखों से ओझल हो गए और अब अपने आस्ताने में आराम करते हुए दूर दराज से पहुँचे हुए मुसीबतजदो की परेशानी दूर कर रहे है।
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रतनपुर के राजा भोषले के लश्कर में सिपहसालार से बाबा इंसान अली के परदादा सैय्यद हैदर अली
(ट्रांसफर होकार बछौद पहुचे थे )

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हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह के परदादा सैय्यद हैदर अली शाह सरजमीने अरब से पैग़म्बरे इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब की बशारत के बाद हिंदुस्तान आये सबसे पहले ख़्वाजा गरीब नवाज के दरबार अजमेर शरीफ में कुछ ठहरे और इसके बाद दिल्ली पहुचकर ख्वाजा बख्तियार काकी व सरकार निजामुद्दीन औलिया के दरबार मे हाजरी देने के बाद कलियर शरीफ,बरेली शरीफ,देवा शरीफ होते हुए किछौछा शरीफ पहुचकर हजरत सैय्यद मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी के दरबार में कुछ दिन रुकने के बाद सीधा छत्तीसगढ़ रुख किये इलाहबाद,कटनी होते हुए बिलासपुर पहुचे और वहां से रतनपुर आये और हजरत सैय्यद मुशा शहीद के दरगाह में रुकने का फैसला कर लिए वहां राजा भोशले की सल्तनत थी एक दिन सैय्यद हैदर अली राजा भोशले से मिले राजा बहुत खुश हुए और अपने फौज का सिपहसालार बना दिये वे अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम देने लगे यहां से कुछ सालों बाद सैय्यद हैदर अली शाह का लश्कर से ट्रांसफर होकर बछौद आ गए और हमेशा के लिए परिवार के साथ यहीं बस गए।
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वली होने की पहचान नागपुर के बाबा ताजुद्दीन से मिली
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हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह एकदम फक्कड़ मिजाज के थे। उन्हें खान-पान की कोई सूद-बुद नही होती थी कपड़ो का कोई ख्याल नही रहता था अजब कैफियत,अजब रंग-ढंग कभी कभी बाते भी बेतुका करते जो आम आदमी के समझ से परे होती थी कुछ दिनों से तो गाली गलौच करना,पागलों जैसी हरकत करना,अचानक किसी को बार देना ,मुह बनाते हुए बीड़ी-सिगरेट पीना ये सब तो जैसे उनकी आदतों सुमार हो गया था। बाबा इंसान अली के इन हरकतों को देखकर लोग आपको पागल,दीवाना,मजनू कहने लगे थे फिर एक दिन रायपुर के हजरत मोहसिने मिल्लत हजरत सैय्यद हामिद अली लुतरा शरीफ पहुंचे और  बाबा इंसान अली व्यक्तित्व को पहचानते हुए कहा कि जिन्हें तुम लोग पागल समझ रहे हो ये कोई आम इंसान नही है ये तो अल्लाह के खास बंदों में से एक है ये अल्लाह के वली हैं हजरत हामिद अली ने कहा कि बाबा इंसान अली को नागपुर के बाबा ताजुद्दीन के दरबार मे ले जाओ वहां तुम्हे सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे और तुम सबको इनके हक़ीक़त के बारे में पता चल जाएगा। फिर क्या था बाबा इंसान अली शाह को जंजीर और रस्सियों में जकड़े हुए सन 1923 में आपकी मां दादी अम्मा बेगम बी साहिबा व आपकी पत्नी उम्मद बी साहिबा व कुछ लोगो के साथ नागपुर (महाराष्ट्र) बाबा ताजुद्दीन औलिया के दरबार पहुँचे जब बाबा ताजुद्दीन ने बाबा इंसान अली को देखा मचल गए और कहा " अरे ये क्या.... फौरन इनकी रस्सियां और जंजीरे खोल दो जिन्हें तुम पागल,दीवाना समझ रहे हो ये कोई आम इंसान नही है ये तो खुदा का करीबी बन्दा है ये दुनियाएं विलायत का बड़ा ताजदार है इनकी मंजिल तो कही और ही है बाबा इंसान अली को अपना बड़ा भाई कहते हुए बाबा ताज ने अपने गले का हार उनके गले मे पहना दिया यही वह मंजर है जब बाबा इंसान अली के अंदर छिपे राज को सभी ने जाना और फिर लोग बहुत ही इज्जतो एहतेराम के साथ उनके सामने अदब से रहने लगे।

*करम है मेरे बाबा इंसान अली का*
*की हम बेकसों को ठिकाना मिला है*
*उसे बागे जन्नत की परवाह क्या होगी*
*जिन्हें आपका आस्ताना मिला है*

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विलायत के ताजदार की कुछ अनोखी करामात
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हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह जन्म से ही करिश्माई व्यक्तित्व के धनी थे उनकी सैकड़ो करामात (करिश्मा) है आज भी दरबार से जारी है और कयामत तक जारी रहेगा। वैसे तो उनके सैकड़ों करामात है लेकिन कुछ मशहूर करामात (करिश्मा) आपके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। आप शुध्द छत्तीसगढ़ी बोली बोला करते थे एक बार हजरत सैय्यद हामिद अली शाह रायपुर से लुतरा शरीफ आये रात में क्या देखते है कि बाबा इंसान अली खुदा के याद में लीन हैं उनके सीने से एक नूर चमक रहा था उस नूर से मदीना शरीफ के गुम्बद खजरा नजर आ रहे थे पूरा कमरा खुशबुओं से भरा हुआ था बाबा इंसान अली ने जब सैय्यद हामिद अली शाह को देखा तो फरमाया। तैं हर मोला काय देखत हावस ये हर वो जगह ये जिंहा ले आदमी मन कयामत तक ले फ़ैज़ पावत रही। एक बार बाबा सरकार राधे श्याम नाम के ड्राइव्हर के जीप में बैठकर बिलासपुर से लुतरा शरीफ आ रहे थे कि सीपत के पास जीप का डीजल खत्म हो गया और गाड़ी रुक गई बाबा ने तेज आवाज में बोले "तै काबर जीप ला रोक देहे रे" वाहन चालक ने डरते हुए कहा कि डीजल खत्म हो गया है बाबा ने कहा "एखरे बर तैं मोला अपन गाड़ी म बैठाए हावस का रे" बाबा ने जलाल में आते हुए कहा कि टीपा म पानी ला के टँकी मा डाल दे" चालक ने डरते हुए ऐसा ही किया और गाड़ी चालू किया गाड़ी चालू हो गई बाबा ने लुतरा शरीफ में उतरकर कहा कि "तैं हर टँकी मा झांक के देखबे झन" इसके बाद कई दिनों तक उसी पानी से जीप चलती रही एक दिन चालक राधेश्याम टंकी में खोलकर देख लिया उस दिन से फिर गाड़ी बन्द हो गई फिर डीजल डलवाकर चलाना पड़ा। इसके अलावा सैकड़ो करिश्मे है बाबा इंसान अली शाह के पास शेर आकर पहरा देते और कदमो को चूमकर वापस जंगल चले जाते उनके फैजान से लाखो की जिंदगी में खत्म होने से पहले बहारे आ गई।

निगाहें वली में वो तासीर देखी,बदलते हजारों की तकदीर देखी

                 
मौसी की बनवाई हुई मस्जिद में 14 साल पढ़ाये नमाज
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(खम्हरिया में है बिलासपुर जिला की सबसे पुरानी मस्जिद है)
आसपास के गांव के मुसलमानों के नमाज पढ़ने के लिए हजरत बाबा सैय्यद इंसान अली शाह के खाला (मौसी) सिंगुल की गौटनींन ने ग्राम खम्हरिया में 170 वर्ष पूर्व मस्जिद बनवाई थी जो आज भी पूर्व की तरह ही है गुड़,चुना और बेल के गारे से निर्मित आलीशान मस्जिद बिलासपुर जिला के सबसे पुरानी मस्जिद है मस्जिद के दीवारों की मोटाई ढाई फिट है उक्त मस्जिद में बाबा इंसान अली शाह ने 14 वर्षो तक नमाज पढ़ाई है और लोगो को सही रास्ता चलने की शिक्षा देते हुए दिन का काम किया यह मस्जिद आज भी पूर्व की तरह ही खूबसूरत है ऐसा लगता है कि अभी अभी ही इसकी तामीर की गई है इस मस्जिद को देखने दूरदराज से आते है यह लोगो के आकर्षक का केंद्र है मस्जिद के आंगन में बाबा सरकार के नानी जान की दरगाह है। 


यूपी और उत्तराखंड के चुनाव में दिखाएगा किसान आंदोलन अपना रंग

यूपी और उत्तराखंड के चुनाव में दिखाएगा किसान आंदोलन अपना रंग

27-Mar-2021

यूपी और उत्तराखंड के चुनाव में दिखाएगा किसान आंदोलन अपना रंग
लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी 
राज्य मुख्यालय लखनऊ।किसान आंदोलन के सामने मजबूर नज़र आ रही हैं मोदी की भाजपा।2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे कर चुनाव में गईं भाजपा ने अनेकों अनेक सपनों का बाज़ार लगाकर चुनाव तो जीता और उसके बाद 2017 का यूपी चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीता फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भी विपक्ष को जगह नहीं मिलने दी,साथ ही किसी आंदोलन को भी उभरने नहीं दिया यह बात अलग है कि जो सपने दिखाकर सत्ता हासिल की थी वह पूरे किए या नहीं किए इस पर कोई बात नहीं की जाती कुछ सपनों को जुमले कह कर टाल जाते हैं तो कुछ पर खामोशी अख़्तियार कर ली जाती हैं। हिन्दू मुसलमान कर सत्ता का आनंद लेते रहे जहाँ घिरते नज़र आते है वहाँ कांग्रेस की नेहरू की बात कर मामले को घूमा दिया जाता है।इस दौरान दो आंदोलन बड़े पैमाने हुए CAA , NPR व संभावित NRC का देशभर में बहुत विरोध हुआ लेकिन मोदी सरकार ने इस आंदोलन को हिन्दू मुसलमान कर हल्का करने की भरपूर कोशिश की थी लेकिन वह आंदोलन कोरोना वायरस की वजह से वापिस हुआ था ख़त्म नहीं हुआ था और अब अब अपने उद्योगपति मित्रों को लाभ पहुँचाने के लिए बनाए गए तीन नए कृषि क़ानून बनाए गए हैं जिसका देशभर के किसान पिछले चार महीने से विरोध कर रहें हैं लेकिन मोदी सरकार न सीएए पर वापिस हुईं थीं और न कृषि क़ानूनों पर वापिस होने के संकेत दे रही हैं।इन दोनों बड़े आंदोलनों में सीएए , एनपीआर व संभावित एनआरसी के विरूद्ध आंदोलन को तो मोदी सरकार हिन्दू मुसलमान का इंजेक्शन देकर कंट्रोल करने में कामयाब रही थी लेकिन किसान आंदोलन को कमज़ोर करने में नाकाम रही हैं।हालाँकि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार सहित आरएसएस के समर्थित संगठनों ने इस आंदोलन को भी बदनाम करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए खालिस्तानी , नक्सली ,आतंकवादी पाकिस्तानी व चीनी परस्त तक कहा गया फिर मुट्ठी भर किसानों का आंदोलन बताया गया पंजाब व हरियाणा का आंदोलन कहा गया लेकिन किसान आंदोलन पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और यह आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता गया अब सवाल उठता है कि क्या मोदी की भाजपा के लिए यह आंदोलन गले की फाँस बन गया है और न उगलते बन रहा है और न निगलते बन रहा है।मोदी की भाजपा के नेता इससे निपटने के लिए जो भी रूख अख़्तियार कर रहे हैं वहीं उल्टा पड़ रहा है।मोदी की भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह मानी जा रही हैं कि इसी वर्ष के आख़िर तक देश का सबसे बड़ा राज्य यूपी और उत्तराखंड चुनाव की ओर जा रहा है जहाँ मोदी की भाजपा की सरकारें हैं उसमें किसान आंदोलन कितना फ़र्क़ डालता है यह राजनीतिक पंडित आकंलन कर रहे हैं उनका दावा है कि इन दोनों राज्यों में किसान आंदोलन बड़े पैमाने पर मोदी की भाजपा को नुक़सान होने का अनुमान लगाया जा रहा है लेकिन मोदी की भाजपा ऐसा प्रदर्शित कर रही हैं जैसे वह इस आंदोलन से डर नहीं रही हैं अगर वह यह सिर्फ़ दिखावा कर रही हैं कि वह डर नहीं रही हैं और वह इससे हो रहे नुक़सान की भरपाई के लिए रणनीति तैयार कर ज़मीन पर मुक़ाबला करेंगी तो ठीक है और अगर वह यह वास्तव में ही इस आंदोलन को हल्के में ले रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी।हमने कई ऐसे लोगों से बात की है जो मोदी की भाजपा को क़रीब से नज़र रखते हैं उनका कहना है कि इस आंदोलन को मज़बूत करने में और दिल्ली की सीमाओं तक पहुँचाने में हरियाणा की भाजपा सरकार ज़िम्मेदार है हरियाणा सरकार ने इस आंदोलन को हल्के में लिया है दूसरी ग़लती यूपी की योगी सरकार के पुलिस अफ़सरों व प्रशासनिक अधिकारियों की रही जब मोदी सरकार के अधिकारी किसानों को लालक़िले पर ले जाने में कामयाब हो गए थे और उनसे कुछ ग़लतियाँ करा दी थी उसके बाद लगने लगा था कि किसान आंदोलन बस कुछ ही देर में समाप्त हो जाएगा क्योंकि लालक़िले की घटना से किसान नेता बैकफुट पर थे उसी दौरान यूपी पुलिस ने आंदोलन स्थल पर इतनी फ़ोर्स लगा दी गई थी जैसे ऊपर से आदेश का इंतज़ार है जिसके बाद बलपूर्वक किसानों हटा दिया जाएगा बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि हल्का फुलका शुरू भी कर दिया था इसी दौरान मोदी की भाजपा के एक विधायक ने किसानों को पीटना भी शुरू कर दिया था जिसका पता किसान नेता राकेश टिकैत को लगा उसके बाद उनका दर्द फूट पड़ा और उनकी आँखों से बहे आँसुओं ने मोदी सरकार को बैकफ़ुट पर ला दिया और आंदोलन फ़्रंट फुट पर आ गया रात में ही किसानों की भीड़ ने यह साबित कर दिया कि कृषि क़ानूनों के विरूद्ध चल रहा आंदोलन मुट्ठी भर किसानों का आंदोलन नहीं वह जन आंदोलन हैं।उसी का नतीजा है कि यह आंदोलन मोदी की भाजपा के लिए मुसीबत बन गया है इससे निपटने के लिए मोदी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने ही पड़ेंगे नहीं तो यह आंदोलन मोदी की भाजपा के लिए उसके ताबूत में आख़िरी कील साबित होने जा रहा है।

 


चमगादड़ों को पकड़ कर अगली महामारी रोकने चले 'वायरस हंटर'

चमगादड़ों को पकड़ कर अगली महामारी रोकने चले 'वायरस हंटर'

24-Mar-2021

फिलिपींस में जारी एक खास रिसर्च में चमगादड़ों और उनमें पाए जाने वाले वायरसों की विस्तृत जानकारी इकट्ठा की जा रही है. इसका मकसद है एक ऐसा सिमुलेशन मॉडल बनाना जिससे भविष्य में कोविड 19 जैसी महामारी को फैलने से रोका जा सके.

सिर पर लाइट वाला हेलमेट लगाए और शरीर पर प्रोटेक्टिव सूट पहने रिसर्चर फिलिपींस के लागूना प्रांत में एक अहम अभियान में जुटे हैं. वे रात के अंधेरे में उनके बिछाए बड़े से जाल में फंसे चमगादड़ों के पंजे और पंख छुड़ा कर उन्हें कपड़ों की थैली में डाल कर ले जाएंगे.

रिसर्चर इनको माप तौल करेंगे और मल एवं लार का सैंपल भी लेंगे. इनकी सारी जानकारी विस्तार से दर्ज की जाएगी और फिर सब कुछ सुरक्षित पाए जाने के बाद ही चमगादड़ों को वापस जंगलों में छोड़ा जाएगा. यह रिसर्चर खुद को "वायरस हंटर” कहते हैं. इनके ऊपर हजारों चमगादड़ों को पकड़ने, उनकी जानकारी इकट्ठा करने और उसके आधार पर एक ऐसा सिमुलेशन मॉडल बनाने की जिम्मेदारी है, जिससे कोविड 19 जैसी किसी महामारी को फिर से फैलने से रोका जा सके.

इस मॉडल को विकसित करने के लिए जापान ने धन मुहैया कराया है. इस पर काम कर रही यूनिवर्सिटी ऑफ द फिलिपींस लोस बानोस को मॉडल तैयार करने के लिए तीन साल का समय मिला है. रिसर्चरों के समूह के प्रमुख आशा जताते हैं कि चमगादड़ों की मदद से वे जलवायु, तापमान, संक्रमण की आसानी और इंसानों में कोरोना वायरस के पहुंचने के तरीकों के बारे में अधिक से अधिक समझ कर वे अगली किसी महामारी की समय रहते भविष्यवाणी कर सकेंगे.

ईकोलॉजिस्ट फिलिप आलविओला कहते हैं, "हम कोरोना वायरस की कुछ ऐसी किस्मों का पता लगा रहे हैं जिनमें इंसान में पहुंचने की क्षमता है.” वह एक दशक से भी लंबे समय से चमगादड़ों पर शोध करते आए हैं. चमगादड़ों से फैलने वाली बीमारी पर उनका कहना है कि "अगर हमें वायरस के बारे में पता हो और यह पता चल जाए कि वे कहां से आए हैं, तो हमें पता होगा कि भौगोलिक रूप से उन्हें बाकी आबादी से कैसे अलग करना है.”

लैब में काम करने के अलावा, रिसर्चरों का काफी समय जंगलों में बीतता है. उन्हें ऐसी सभी जगहों पर जाना होता है जहां चमगादड़ों के आने की संभावना हो. अंधेरे इलाके, चट्टानें, गुफाएं और घने जंगलों में जाकर उनके लिए जाल बिछाए जाते हैं. हर चमगादड़ को सिर से सीधा पकड़ा जाता है और उनके मुंह में से लार का सैंपल निकाला जाता है. प्लास्टिक की स्केल से उनके पंखों का विस्तार मापा जाता है और ये पता लगाया जाता है कि चमगादड़ों की 1,300 से भी ज्यादा स्पीशीज और 20 फैमिली में से किनमें संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा है.

हालांकि खतरा तो रिसर्चरों पर भी है. इस रिसर्च में आलविओला की मदद कर रहे एडीसन कोसिको कहते हैं, "आजकल इससे बहुत डर लगता है. पता नहीं होता कि चमगादड़ पहले से ही कौन से वायरस लेकर घूम रहा होगा.” चमगादड़ जैसी होस्ट स्पीशीज वाले जानवरों में खुद वायरस के कारण बीमारी के लक्षण नहीं दिखते. लेकिन यही वायरस जब इंसानों या दूसरे जानवरों में फैल जाते हैं तो उन्हें बहुत बीमार बना देते हैं.

कोरोना के पहले भी चमगादड़ों से कई खतरनाक बीमारियां फैल चुकी हैं जैसे इबोला, सार्स और मिडिल ईस्ट रेसपिरेट्री सिंड्रोम.

जंगली जानवरों के साथ इंसान का संपर्क जितना बढ़ेगा, उनमें ऐसे वायरसों के पहुंचने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी. बैट ईकोलॉजिस्ट किर्क तराए उम्मीद जताते हैं कि "चमगादड़े में पाए जाने वाले संभावित जूनॉटिक वायरसों के बारे में पहले से आंकड़े और जानकारी होने से हम कुछ हद तक अगले किसी बड़े संक्रमण की भविष्यवाणी करने की हालत में होंगे.”

आरपी/सीके (रॉयटर्स)

 

कोरोना का खतरा-नये उपाय एवं सजगता जरूरी

कोरोना का खतरा-नये उपाय एवं सजगता जरूरी

19-Mar-2021

कोरोना का खतरा-नये उपाय एवं सजगता जरूरी
-ः ललित गर्ग:-

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कोरोना का खतरा फिर डरा रहा है, कोरोना पीड़ितों की संख्या फिर बढ़ने लगी है, इन बढ़ती कोरोना पीड़ितों की संख्या से केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चिन्तित होने से काम नहीं चलेगा, आम जनता को जागरूक एवं जिम्मेदार होना होगा। हमने पूर्व में देखा कि प्रधानमंत्री के स्तर पर व्यक्त की गई चिंताओं का सकारात्मक परिणाम सामने आया, जैसे ही कोरोना ने फिर से डराना शुरु किया है, प्रधानमंत्री की चिन्ताएं स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी है। उनकी इन चिन्ताओं को कम करने का अर्थ है स्वयं को सुरक्षित करना, इसलिये कोरोना के लिये जारी किये गये निर्देशों एवं बंदिशों का सख्ती से पालन होना जरूरी हैं। स्थिति की भावी भयावहता एवं गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री ने तुरन्त मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की, कोरोना के प्रारंभिक दौर में भी ऐसी बैठकें हुई थी, जिनसे कोरोना महामारी पर काबू पाने में हमने सफलताएं पायी थी। इस तरह की बैठकों एवं प्रधानमंत्री के मनोवैज्ञानिक उपायों चाहे मोमबत्ती जलाना हो, ताली बजाना हो से देश के कोरोना योद्धाओं का मनोबल मजबूती पाता रहा है, कोरोना का अंधेरा छंटता रहा है। एक बार फिर हम दिल से कोरोना को परास्त करने, उसको फैलने से रोकने के लिये अपने-अपने स्तर के दायित्वों एवं जिम्मेदारियों को केवल ओढ़े ही नहीं, बल्कि ईमानदारी से जीयें।

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बढ़ते कोरोना महामारी के आंकडों के बीच प्रधानमंत्री ने जनता का मनोबल सुदृढ़ करते हुए कोरोना रूपी अंधेरे को कोसने की बजाय हमें अपने दायित्व की मोमबत्ती जलाने की प्रेरणा दी है। उन्होंने सही कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है, बस हमें ‘कड़ाई भी और दवाई भी’ की नीति पर काम करना है। उनका यह कहना भी बहुत मायने रखता है कि कोरोना से लड़ाई में हमें कुछ आत्मविश्वास मिला है, लेकिन यह अति आत्मविश्वास में नहीं बदलना चाहिए। दरअसल, यही हुआ है, जिसकी ओर प्रधानमंत्री और अनेक विशेषज्ञ इशारा कर रहे हैं। लोगों की थोड़ी सी लापरवाही खतरे को बढ़ाती चली जा रही है। पिछले महीने ही 9-10 फरवरी को ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या 35,000 के करीब है। यह सही है, 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे। इसमें दुखद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं। आखिर महाराष्ट्र की जनता एवं वहां की सरकार इस बड़े संकट के प्रति क्यों लापरवाह एवं गैर-जिम्मेदार है?
 हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिये जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। गांधी के तीन बंदरों की तरह-वक्त देखता नहीं, अनुमान लगाता है। वक्त बोलता नहीं, संदेश देता है। वक्त सुनता नहीं, महसूस करता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है। कोरोना महाव्याधि से जुड़ी कटु सच्चाइयां एवं तथ्य भी छुपाये नहीं जा सकते। लॉकडाउन एवं अन्य बंदिशें तो तात्कालिक आपात उपाय है, महाराष्ट्र के लोगों को लंबे समय तक के लिए अपनी आदतों में परिवर्तन लाना पड़ेगा, जिम्मेदारी एवं दायित्वों का अहसास जगाना होगा। देश के लिए यह सोचने और स्थाई सुधार का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर आंकड़ों को देखना होगा। काल सिर्फ युग के साथ नहीं बदलता। दिनों के साथ बदलता है और कभी-कभी घंटों में भी। पिछले सप्ताह से तुलना करें, तो इस सप्ताह कोरोना मामलों में 40 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि हुई है, जबकि मरने वालों की संख्या में 35 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा। संक्रमण भी बढ़ा है और मौत का खतरा भी, तो फिर हम क्यों कोरोना दिशा-निर्देशों की पालना में लापरवाही बरत रहे हैं?
बड़ा प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं। इसका एक कारण है कि कोई भी वायरस नैसर्गिक रूप से अपना चरित्र बदलता (म्यूटेट) है। वह जितना अधिक फैलता है, उतना अधिक म्यूटेट करता है। जो बड़ा खतरा बनता है। इससे संक्रमण का नया दौर शुरु होता है। पिछली सदी के स्पेनिश फ्लू में देखा गया था कि संक्रमण का दूसरा दौर जान-माल का भारी नुकसान दे गया। इसलिये हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिये अधिक सर्तक, सावधान एवं दायित्वशील होना होगा। हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी इसके पुनः उभरने का एक कारण है। हमारी तकरीबन 55-60 फीसदी आबादी इस वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित कर चुकी थी। चूंकि महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली जैसे राज्यों में शुरुआत में ही वायरस का प्रसार हो गया था, इसलिए बहुत मुमकिन है कि वहां की जनता में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने की स्थिति खत्म हो गई हो। नतीजतन, लोग फिर से संक्रमित होने लगे हैं। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें एक बार कोरोना से ठीक हुआ मरीज दोबारा इसकी गिरफ्त में आ गया है।
मानवीय गतिविधियों के बढ़ने के कारण भी कोरोना पनपने की स्थितियां बनी हैं। भले ही अनलॉक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की गई, लेकिन अब सारा आर्थिक गतिविधियां एवं जनजीवन पटरी पर लौट आया है। इस कारण बाजार में चहल-पहल बढ़ गई है। नये रूप में कोरोना का फैलना अधिक खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिकों की मानें, तो अब लॉकडाउन से संक्रमण को थामना मुश्किल है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गये, कमियां एवं त्रुटियां सुधार ली। अस्पतालों की सेहत सुधार ली। लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। टीकाकरण भी फायदेमंद उपाय है और इस पर खास तौर से ध्यान दिया जा रहा है। मगर हाल के महीनों में पूरी आबादी को टीका लग पाना संभव नहीं है। इसलिए बचाव के बुनियादी उपायों को अपने जीवन में ढालना ही होगा। तभी इस वायरस का हम सफल मुकाबला कर सकेंगे।
विडम्बना एवं त्रासद स्थिति है कि तेलंगाना, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी तादाद में वैक्सीन बर्बाद हो रही है। कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, यह तय करते हुए कमियों को दूर करना होगा। यह भी विडम्बना ही है कि मुख्यमंत्रियों को रोज शाम कोरोना वैक्सीन की निगरानी के लिए कहना पड़ रहा है। एक बड़ी चिंता गांवों में कोरोना संक्रमण रोकने की है। तुलनात्मक रूप से गांव अभी सुरक्षित हैं, तो यह किसी राहत से कम नहीं। गांवों में यह स्थिति बनी रहे, वे ज्यादा सुरक्षित हों, चिकित्सा सेवा के मामले में संपन्न हों, तो देश को ही लाभ होगा। कोरोना की नई लहर के एक-एक वायरस को उसके वर्तमान ठिकानों पर ही खत्म करना होगा, ताकि व्यापक लॉकडाउन की जरूरत न पड़े। अन्यथा वक्त आने पर, वक्त सबको सीख दे देगा, जो कितनी भयावह हो सकती है, कहा नहीं जा सकता।
इसीलिये प्रधानमंत्री ने टीकाकरण की धीमी गति एवं उपेक्षा पर चिन्ता जताई है, उन्होंने मुख्यमंत्रियों के सामने सही सवाल रखा है, ‘यह चिंता की बात है कि आखिर कुछ इलाकों में जांच कम क्यों हो रही है? कुछ इलाकों में टीकाकरण कम क्यों हो गया है? मेरे ख्याल से यह समय गुड गवर्नेंस को परखने का है।’ अब अपने-अपने स्तर पर मुख्यमंत्रियों को ज्यादा सचेत होकर लोगों को सुरक्षित करना होगा। कोरोना से लड़ाई में किसी कमी के लिए केवल केंद्र सरकार के फैसलों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जिन राज्यों ने अच्छा काम किया है, उन्हें अपने काम को अभी विराम नहीं देना चाहिए और जिन राज्यों में प्रशासन ने कोताही बरती है, उनकी नींद टूटनी चाहिए। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई.पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


महिला-रोजगार में गिरावट से बढ़ती चिन्ताएं

महिला-रोजगार में गिरावट से बढ़ती चिन्ताएं

16-Mar-2021

महिला-रोजगार में गिरावट से बढ़ती चिन्ताएं
ललित गर्ग 

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कोरोना महामारी का सबसे बड़ा खमियाजा महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ा है। लाॅकडाउन और दूसरे सख्त नियम-कायदों की वजह से दुनिया भर में बहुत सारे क्षेत्र ठप पड़ गए या अस्त-व्यस्त हो गए, सर्वाधिक प्रभावित अर्थव्यवस्था हुई एवं रोजगार में भारी गिरावट आई। अब जब महामारी का असर कम होता दिख रहा है, तो ऐसे में विश्व के तमाम देशों सहित भारत भी इससे उबरने की कोशिश में है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है, जिसके लिये केन्द्र सरकार ने अनेक तरह के राहत पैकेज जारी किये हैं, धीरे-धीरे बाजार और आम गतिविधियां सामान्य होने की ओर अग्रसर है। लेकिन इस बीच की ंमहिला रोजगार को लेकर एक चिंताजनक खबर आई है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) नाम के थिंक टैंक ने बताया है कि भारत में केवल 7 प्रतिशत शहरी महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पास रोजगार है या वे उसकी तलाश कर रही हैं। सीएमआईई के मुताबिक, महिलाओं को रोजगार देने के मामले में हमारा देश इंडोनेशिया और सऊदी अरब से भी पीछे है। कोरोना महामारी ने इस समस्या को और गहरा बनाया है।
केन्द्र सरकार की नीति एवं योजनाओं के कारण पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर नये कीर्तिमान स्थापित हुए है, महिलाओं ने सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से लेकर अर्थव्यवस्था के मोर्चे तक पर जो अनूठी सफलताएं एवं आत्मनिर्भर होने के मुकाम हासिल किये थे, उसमें कोरोना काल में तेज गिरावट आई है, जो परेशान कर रही है। सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इतनी कम संख्या में शहरी औरतों का रोजगार में होना चिंता का विषय है। कोरोना महाव्याधि के कारणों से उन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा, जिन पर महिलाएं सीधे तौर पर रोजगार के लिए निर्भर हैं। चाहें डोमेस्टिक हेल्प हो, स्कूलिंग सेक्टर हो, टूरिज्म या कैटरिंग से जुड़े सेक्टर हो। कोविड-19 संकट के चलते भारी संख्या में महिलाओं को इन सेक्टर से निकाला गया। वहीं, बच्चों के स्कूल बंद हो जाने से महिलाओं पर उनकी देखरेख का अतिरिक्त बोझ आने से कइयों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। इन कारणों से रोजगार या नौकरी का जो क्षेत्र स्त्रियों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा जरिया रहा है, उसमें इनकी भागीदारी का अनुपात बेहद चिंताजनक हालात में पहुंच चुका है। गौरतलब है कि बबल एआई की ओर से इस साल जनवरी से पिछले दो महीने के दौरान कराए गए सर्वेक्षण में ये तथ्य उजागर हुए हैं कि महिलाओं को कई क्षेत्रों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारतीय संदर्भों के मुताबिक कोविड-19 के चलते बहुत सारी महिलाओं को अपना रोजगार बीच में ही छोड़ देना पड़ा। इसने श्रम क्षेत्र में महिलाओं की पहले से ही कम भागीदारी को और कम कर दिया है।
सीएमआईई के अलावा इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के एक सर्वे में भी डराने वाले तथ्य सामने आया है कि कोविड-19 से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार पर ज्यादा बुरा असर पड़ा है। संस्था ने मुंबई में एक सर्वे किया और पाया कि जहां तीन-चैथाई पुरुषों के रोजगार पर महामारी ने असर डाला, वहीं महिलाओं का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत रहा। इसी सर्वे में पाया गया कि पुरुषों के लिए नया रोजगार पाना महिलाओं के मुकाबले आठ गुना आसान रहा। उदाहरण के लिए पुरुषों ने चीजों को डिलीवर करने की जॉब कर ली, जो भारत जैसे समाज में महिलाएं आसानी ने नहीं कर सकतीं। सीएमआईई के अनुसार, साल 2019 में 9.7 फीसदी शहरी महिलाएं लेबर फोर्स का हिस्सा थीं। लेकिन महामारी के दौरान ये हिस्सा घटकर 6.9 फीसदी हो गया। संस्था ने पूरे भारत में एक लाख 70 हजार परिवारों से बात करने के बाद ये तथ्य पेश किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यस्थलों पर इकहत्तर फीसद कामकाजी पुरुषों के मुकाबले महज ग्यारह फीसद रह गई हैं। जाहिर है, बेरोजगारी के आंकड़े भी इन्हीं आधारों पर तय होते हैं। इसमें शक नहीं कि सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं को रोजाना जिन संघर्षों का सामना करना पड़ता है, उसमें अब भी उनके हौसले बुलंद है। मगर सच यह भी है कि बहुत मुश्किल से सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाने के बाद अचानक नौकरी और रोजगार गंवा देने का सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है और वे उससे भी जूझ रही हैं। यांे जब भी किसी देश या समाज में अचानक या सुनियोेजित उथल-पुथल होती है, कोई आपदा, युद्ध एवं राजनीतिक या मनुष्यजनित समस्या खड़ी होती है तो उसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर स्त्रियों पर पड़ता है और उन्हें ही इसका खामियाजा उठाना पड़ता है। महामारी के संकट में भी स्त्रियां ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। ताजा सर्वे में नौकरियों और रोजगार के क्षेत्र में उन पर आए संकट पर चिंता जताई गई है। इससे पहले ऐसी रिपोर्ट आ चुकी है कि कोरोना की वजह से लगाई गई पूर्णबंदी के चलते महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई। सवाल है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है, जिनमें हर संकट की मार महिलाओं को ही झेलनी पड़ती है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये जरूरी है कि अधिक महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए भारत सरकार को जरूरी कदम उठाने होंगे। भारत सरकार को केवल आईटी सेक्टर पर ही फोकस करने की मानसिकता बदलनी होगी। उसे दूसरे सेक्टर में निवेश करने वाली कंपनियों को बुलाना होगा। जैसे टेक्सटाइल इंडस्ट्री, जो अब बांग्लादेश में शिफ्ट हो गई है, इस इंडस्ट्री में महिलाओं को अच्छा रोजगार मिलता है। सरकार इसके ऊपर फोकस करना होगा। सरकार को अपनी लैंगिकवादी सोच को छोड़ना पड़ेगा। भारत सरकार के खुद के कर्मचारियों में केवल 11 प्रतिशत महिलाएं हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिये अधिक एवं नये अवसर सामने आने जरूरी है।
दावोस में हुए वल्र्ड इकनॉमिक फोरम में ऑक्सफैम ने अपनी एक रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ में घरेलू औरतों की आर्थिक स्थितियों का खुलासा करते हुए दुनिया को चैका दिया था। वे महिलाएं जो अपने घर को संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं, वह सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक अनगिनत सबसे मुश्किल कामों को करती है। अगर हम यह कहें कि घर संभालना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है तो शायद गलत नहीं होगा। दुनिया में सिर्फ यही एक ऐसा पेशा है, जिसमें 24 घंटे, सातों दिन आप काम पर रहते हैं, हर रोज क्राइसिस झेलते हैं, हर डेडलाइन को पूरा करते हैं और वह भी बिना छुट्टी के। सोचिए, इतने सारे कार्य-संपादन के बदले में वह कोई वेतन नहीं लेती। उसके परिश्रम को सामान्यतः घर का नियमित काम-काज कहकर विशेष महत्व नहीं दिया जाता। साथ ही उसके इस काम को राष्ट्र की उन्नति में योगभूत होने की संज्ञा भी नहीं मिलती। जबकि उतना काम नौकर-चाकर के द्वारा कराया जाता तो अवश्य ही एक बड़ी राशि वेतन के रूप में चुकानी पड़ती। दूसरी ओर एक महिला जो किसी कंपनी में काम करती है, निश्चित अवधि एवं निर्धारित दिनों तक काम करने के बाद उसे एक निर्धारित राशि वेतन के रूप में मिलती है। उसके इस कार्य को और उसके इस क्रम को राष्ट्रीय उन्नति ( जीडीपी ) में योगदान के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि देश के आर्थिक विकास में अमुक महिला का योगदान है। प्रश्न है कि घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाता? घरेलू महिलाओं के  साथ यह दोगला व्यवहार क्यों?
दरअसल, इस तरह के हालात की वजह सामाजिक एवं संकीर्ण सोच रही है। पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था में आमतौर पर सत्ता के केंद्र पुरुष रहे और श्रम और संसाधनों के बंटवारे में स्त्रियों को हाशिये पर रखा गया है। सदियों पहले इस तरह की परंपरा विकसित हुई, लेकिन अफसोस इस बात पर है कि आज जब दुनिया अपने आधुनिक और सभ्य होने का दावा कर रही है, भारत में नरेन्द्र मोदी सरकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने एवं उसके आत्म-सम्मान के लिये तत्पर है, उसमें भी ज्यादातर हिस्से में स्त्रियों को संसाधनों में वाजिब भागीदारी का हक नहीं मिल सका है। एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर कब तक सभी वंचनाओं, महामारियों एवं राष्ट्र-संकटों  की गाज स्त्रियों पर गिरती रहेगी।


प्रेषकः
  (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


मन्दिर में पानी पीना  मुस्लिम बच्चे को को पड़ा भारी युवक ने बेरहमी से बच्चे की पिटाई !

मन्दिर में पानी पीना मुस्लिम बच्चे को को पड़ा भारी युवक ने बेरहमी से बच्चे की पिटाई !

15-Mar-2021

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक युवक द्वारा बच्चे की पिटाई का मामला सामने आया है। आरोप है कि मंदिर में पानी पीने के कारण एक युवक ने संप्रदाय विशेष के बच्चे की बेरहमी से पिटाई कर दी।

 

अमर उजाला पर छपी खबर के अनुसार, इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद मसूरी पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।

वीडियो में आरोपी युवक पहले लड़के का नाम पूछते हुए नजर आता है। फिर युवक कहता है कि वह धार्मिक स्थल क्यों गया था। लड़का बताता है कि वह पानी पीने के लिए गया था। इसके बाद आरोपी लड़का उसके साथ गाली-गलौज कर मारपीट शुरू कर देता है।

गाजियाबाद पुलिस ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर बताया है कि वीडियो संज्ञान में आने के बाद तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है।

आरोपी का नाम श्रृंगीनंदन यादव है जो कि बिहार के भागलपुर का रहने वाला है। यह युवक कथित तौर पर हिंदू एकता संघ नाम के एक संगठन से भी जुड़ा हुआ है।

पुलिस ने बताया कि आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है और जिस बच्चे की पिटाई की गई है उसकी भी तलाश की जा रही है।

 
 

कुरआन के खिलाफ बोलने वाले और उसका साथ देने वालों का बायकॉट करें। सैय्यद तक़वी

कुरआन के खिलाफ बोलने वाले और उसका साथ देने वालों का बायकॉट करें। सैय्यद तक़वी

13-Mar-2021

कुरआन के खिलाफ बोलने वाले और उसका साथ देने वालों का बायकॉट करें। सैय्यद तक़वी

धर्म आस्था का प्रतीक है और सभी धर्म सम्मानित और सम्माननीय और सब धर्म की इज्जत करनी चाहिए। किसके धर्म की किताब में क्या लिखा है यह बहस का विषय नहीं है चाहे वह गीता हो चाहे क़ुरआन हो चाहे वह गुरु ग्रंथ साहिब हो सब एक विशेष धर्म की किताबें हैं जिसको उनके अनुयाई मानते हैं। सभी धर्म में एक ही बात कही गई है सिर्फ भाषा का अंतर है। 
इतनी बात समझने के बाद अगर कोई व्यक्ति धार्मिक ग्रंथों के बारे में गलत बात करता है तो शायद उसके अंदर की इंसानियत मर चुकी है। राजनीति और धर्म दो अलग-अलग चीजें हैं। राजनीति में धर्म को नहीं शामिल करना चाहिए और धर्म में राजनीति को नहीं शामिल करना चाहिए लेकिन जो व्यक्ति सिर्फ कुर्सी के लालच में सरकार को खुश करने के लिए चापलूसी करने के चक्कर में अपने जमीर अपनी आत्मा को बेच करके ऐसी बातें कर रहा है जिससे समाज में सुख और शांति भंग होने का ख़तरा हो ऐसे व्यक्ति का पूरी तरीके से सामाजिक और धार्मिक बायकॉट करना बहुत जरूरी है
आइये बात करते हैं कुरआन की।
कुरआन अल्लाह की किताब है। इसमें फेर-बदल नामुमकिन है। प्रत्येक धर्म में “वही” एक आधारिक तत्व है। और वह धर्म जिसके नबी पर की गयी “वही” बाद की उलट फेर से सुरक्षित रही वह धर्म “इस्लाम” है। तथा अल्लाह ने (इस सम्बन्ध में प्रत्य़क्ष रूप से) वादा किया है कि वह क़ुरआन के संदेश को सुरक्षित रखेगा। जैसे कि क़ुराने करीम के सूरए हिज्र की आयत न. 9 में लिखा (वर्णन) हुआ है कि-

“इन्ना नहनु नज़्ज़लना अज़्ज़िक्रा व इन्ना लहु लहाफ़िज़ून”

अनुवाद-- हमने ही इस क़ुरान को नाज़िल किया है (आसमान से भेजा है) और हम ही इसकी हिफाज़त (रक्षा) करने वाले हैं।

इतिहास भी इस बात का गवाह है कि क़ुरआन में कोई फेर बदल नही हुई है। ग़ौर करने वाली बात यह है कि इस्लाम भी अन्य आसमानी धर्मों की तरह(उन धर्मों को छोड़ कर जिनमें फेर बदल कर दी गयी है) नबीयों को मासूम मानता है। और “वही” को इंसानों तक पहुँचाने के सम्बंध मे किसी भी प्रकार की गलती (त्रुटी) का खण्डन करता है।

जैसे कि क़ुरआने मजीद के सूरए नज्म की आयत न. 3 और 4 में बयान (वर्णन) हुआ है कि

“व मा यनतिक़ु अनिल हवा इन हुवा इल्ला वहीयुन यूहा।”

अनुवाद--वह (नबी) अपनी मर्ज़ी से कोई बात नही कहता वह जो भी कहता है वह “वही” होती है।

यह वही अल्लाह की तरफ़ से होती है।

जरूरी बात यह है कि इंसान पहले कुरआन पढ़े फिर बात करे। कुरान इंसान की हिदायत के लिए कुरान अमन और शांति के लिए है।
तमाम ओलमा हजरात ने यह बात साफ कर दी है और कहा है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों का क़ुरान पर पूरा एतबार है और क़ुरान में सिर्फ़ अच्छाईयां बतायी गई है।
कुरआन में दिलो को जोड़ने की बात की गई है।
शजरा ए ख़बीसा के लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि क़ुरान में  26 आयतें हटाना तो दूर की बात है ज़ेर और ज़बर भी ऊपर नीचे नहीं किया जा सकता है।
कुरान पर उंगली उठाने वाले पहले भी आए लेकिन सिवाय रुसवाई के उनको कुछ नसीब ना हुआ चाहे सलमान रुश्दी हो, तस्लीमा नसरीन हो या तारिक फतेह यह सब लानती लोग हैं ।इस कैटेगरी में एक और नाम जुड़ गया है। मगर अफसोस की बात है कि यह ऐसा नाम है जो अपने नाम के आगे और पीछे सैय्यद और रिजवी लगाए हुए हैं। लेकिन इसके लगा लेने से किरदार नहीं बनता किरदार बनता है अमल से।
सरकार को चाहिए कि इस ख़बीस के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे और तमाम उम्मते मुस्लिमा को भी चाहिए कि एक प्लेटफार्म पर आकर ऐसे नाज़ेबा हरकत के लिए उसके खिलाफ आवाज उठाएं।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com


किसानों की समस्याओं को जल्दी हल करे सरकार। सैय्यद तक़वी

किसानों की समस्याओं को जल्दी हल करे सरकार। सैय्यद तक़वी

08-Mar-2021

किसानों की समस्याओं को जल्दी हल करे सरकार। सैय्यद तक़वी

भारत का अन्नदाता किसान (वास्तविकता यही है) एक बार फिर सड़क पर है। केन्द्र की सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान सड़क पर उतरने को मजबूर है। सौ दिन से ज़्यादा हो गये मगर स्थिति वैसे ही बनी है। किसानों को डर है कि नए कानूनों से मंडिया खत्म हो जाएंगी साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर होने वाली खरीदी भी रुक जाएगी। दूसरी ओर सरकार का तर्क इसके विपरीत है यानी एमएसपी पर खरीदारी बंद नहीं होगी। बग़ैर आग के धुआं नहीं निकलता। कहीं कुछ ना कुछ ऐसा तो है ही जिससे किसान संतुष्ट नहीं है सवाल यह है कि अगर किसी के लिए कुछ किया जा रहा है वह संतुष्ट नहीं है तो ऐसे करने से क्या फायदा। इस से अच्छा है कि ऐसा किया जाए जिससे वह संतुष्ट हों।
वैसे अगर देखा जाए तो अलग-अलग राज्यों में किसान सरकारों के खिलाफ लामबंद होते रहे हैं। इन आंदोलनों के असर से सत्ता हिलती भी रही है और गिरती भी रही है। 
आज मैं आपको कुछ किसान आंदोलन की बात बताता हूं इतिहास के पन्ने पलटने पर बहुत से किसान आंदोलन हमारी नजरों के सामने आते हैं।
क्या आप को याद है कि मध्यप्रदेश के मंदसौर में 2017 किसान आंदोलन में पुलिस की गोली से 7 किसानों की मौत हो गई थी।
क्या आप को यह याद है कि कर्ज माफी और फसलों के डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन मूल्य की मांग को लेकर तमिलनाडु किसानों ने 2017 एवं 2018 में राजधानी दिल्ली में अर्धनग्न होकर एवं हाथों में मानव खोपड़ियां और हड्डियां लेकर प्रदर्शन किया था।
जिस किसान आंदोलन को सरकार हल्के में ले रही है इतनी हल्की चीज नहीं है किसान आंदोलन आज कोई नया नहीं हो रहा है इसका बहुत पुराना इतिहास है लेकिन आज के आंदोलन की बात करें तो पंजाब से उठी आंदोलन की चिंगारी से अब पूरा देश धधक रहा है। हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार समेत देश के अन्य हिस्सों में भी किसान सड़कों पर उतर आए हैं। दिल्ली को तो मानो चारों ओर से आंदोलनकारी किसानों ने घेर लिया है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पूरे देश के नागरिकों को अन्न उपलब्ध कराने वाले किसानों के लिए कोई आगे बढ़ कर उनके समस्याओं को हल करने की कोशिश नहीं कर रहा है।
क्या यह चिंता की बात नहीं है कि जो किसान देश की जनता को अन्न उपलब्ध कराता है आज उसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर है उसने अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए कड़ी सर्दी के मौसम में भी सड़क पर रह कर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं।
किसानों में भी कई बड़े नेता गुज़रे हैं जिसमें चौधरी चरणसिंह और चौधरी देवीलाल का नाम आता है यह बात अलग है कि उनकी अपनी राजनीतिक पार्टियां भी थीं। स्व. महेन्द्रसिंह टिकैत की तो पहचान ही किसान आंदोलन के कारण थी और वे देश के सबसे बड़े किसान नेता माने जाते थे।
याद कीजिए 1987 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के कर्नूखेड़ी गांव में बिजलीघर जलने के कारण किसान का बिजली संकट का सामना करना और महेंद्र सिंह टिकैत का सभी किसानों से बिजली घर के घेराव का आह्वान। लाखों किसान जमा हो गए।
टिकैत के रूप में बड़ा किसान नेता सामने आया। और फिर जनवरी 1988 में किसानों ने अपने नए संगठन भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले मेरठ में 25 दिनों का धरना। इसमें किसानों की मांग थी कि सरकार उनकी उपज का दाम वर्ष 1967 से तय करे। 
आज एक बार फिर वही किसान सरकार के सामने खड़ा है और सरकार उनकी बातों को नहीं सुन रही है और हल्के में ले रही है इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए बल्कि हमें समझना चाहिए कि यह वही किसान हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भी लोहा लिया। किसानों ने अंग्रेजों की चूलें भी हिलाई थीं। अंग्रेजों के राज में भी समय-समय पर किसानों आंदोलन हुए और उन्होंने न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि अंग्रेज सत्ता की चूलें भी हिलाकर रख दी थीं। 
हकीकत में देखें तो जितने भी 'किसान आंदोलन' हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ थे। देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में प्रमुख से आंदोलन हुए। इनका नेतृत्व भी महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया।
इसके अलावा भी किसान आंदोलन का एक इतिहास है इसमें बहुत से आंदोलन शामिल हैं।
दक्कन का विद्रोह, एका आंदोलन,  मोपला विद्रोह, 
कूका विद्रोह, रामोसी किसानों का विद्रोह, तेभागा आंदोलन, ताना भगत आंदोलन, तेलंगाना आंदोलन,
बिजोलिया किसान आंदोलन, अखिल भारतीय किसान सभा, नील विद्रोह (चंपारण सत्याग्रह), खेड़ा सत्याग्रह, 
बारदोली सत्याग्रह इत्यादि।
आज सरकार के पास मौका है कि किसानों की समस्या को हल करके उनका दिल जीत लें साथ में देश की जनता को भी संतुष्ट करें।
सरकार को यह याद रखना चाहिए कि सत्ता तो आती जाती रहती है क्योंकि जो चीज आती है उसे एक दिन जाना होता है जिसका वजूद होता है उसे एक दिन मिटना होता है जो चीज शुरू होती है वह समाप्त भी होती है। लेकिन सबसे बड़ी चीज होती है जनता का विश्वास जीतना ताकि सरकार ना भी रहे तो लोग सकारात्मक छवि के कारण याद करें नकारात्मक छवि के कारण नहीं।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com