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सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?

सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?

06-Apr-2021

सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?
- ललित गर्ग-

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भारतीय राजनीति में चुनाव का मौसम सबसे ज्यादा ठगाई, गुमराह एवं सपने दिखाने का मौसम होता है, भले ही उस समय असल में कोई भी मौसम क्यों न चल रहा हो। बिन मौसम  राजनेता अपनी निष्ठा बदलने की वर्षा करते हैं तो राजनीतिक दल चुनावी वायदों के जरिये स्वर्ग को ही धरती पर उतार लाने के ओले बरसाते हैं। यह खेल हर चुनाव से पहले खेला जाता है, फिर भी मतदाता खुद को भरमाने से नहीं बचा पाते। हर बार ठगा जाता है। कहने को चुनाव लोकतंत्र का महाकुंभ होता है, लेकिन इसी महाकुंभ में सर्वाधिक लोकतंत्र के हनन की घटनाएं होती है, जो चिन्ता का कारण बननी चाहिए।
चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी में वर्तमान चुनाव में आज जो राजनीतिक माहौल बन रहा है, जिस तरह रोज नए समीकरण बन या बिगड़ रहे हैं और जिस तरह सत्ता के खेल में आदर्शों पर आधारित सारे नियम ताक पर रखे जा रहे हैं, उसको देखते हुए किसी भी दल के किसी भी राजनेता की कथनी पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है। वैसे अपने आप में यह बहुत अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रहित की अपनी परिभाषाओं पर टिके रहने का साहस दिखाया है। इस साहस की प्रशंसा होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनावी महासंग्राम में जो कुछ हो रहा है, जिस तरह सत्ता को केंद्र बनाकर समीकरण बनाए जा रहे हैं एवं येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने के षडयंत्र रचे जा रहे हैं, उससे देश के समझदार तबके को चिंतित होना ही चाहिए। यह सही है कि मूल्य आधारित राजनीति की बात करना आज थोथा आदर्शवाद माना जाता है, लेकिन कहीं-न-कहीं तो हमें यह स्वीकारना ही होगा कि जिस तरह की अवसरवादी राजनीति हमारे लोकतंत्र पर हावी होती जा रही है, उससे देश के वास्तविक और व्यापक हितों पर विपरीत असर ही पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में हो रहे राजनीतिक तमाशे और राजनेताओं के बदलते चेहरे में हमें इस अवसर के बारे में भी जागरूक रहना होगा।
 पश्चिम बंगाल के चुनाव ने जिस तरह के भयावह परिवेश को निर्मित किया है, उसमें आम मतदाता उलझन में है, एक बड़ा सवाल है कि न केवल मतदाता बल्कि राजनेता को भी अचानक ही किसी दल में घुटन क्यों महसूस होने लगी? या फलां दल अचानक ही क्यों भाने लगा? आज जो शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में जंगल राज का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम में चुनौती दे रहे हैं, वह कल तक उन्हीं के विश्वासपात्र हुआ करते थे। पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार जिस युद्धस्तर पर लड़ा जा रहा है, उसमें युद्ध से ऐन पहले पाला बदलने वाले शुभेंदु पहले राजनेता नहीं हैं। ऐसे दलबदलु अवसरवादियों की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, जो कल तक किसी और दल व नेता के प्रति निष्ठा की कसमें खाते थे, पर अब किसी दूसरे दल-नेता के विश्वासी बनने का दम भर रहे हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल अनुत्तरित ही है कि जो उनके विश्वासी नहीं हुए, वे इनके विश्वासी कैसे होंगे? महाराष्ट्र में सुदृढ़ निष्ठाएं भी धराशायी होती हुई हमने देखी है। राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार के अपने भतीजे अजित पवार ने रात के अंधेरे में भाजपा से सत्ता की सौदेबाजी कर राकांपा तोड़ने की साजिश रची थी। यह अलग बात है कि उस सरकार की वैसी ही बेआबरू विदाई हुई, जैसी होनी चाहिए थी। आश्चर्यजनक यह भी रहा कि अजित पवार फिर अपनी निष्ठा बदल कर राकांपा में लौट आये और शिवसेना-कांग्रेस के साथ मिल कर बनी नयी सरकार में भी बिना शर्मिंदगी के उपमुख्यमंत्री बन गये। वैसे भारतीय राजनीति का अब शर्म से कोई रिश्ता रह नहीं गया है। कोई भी राजनीतिक दुर्भावना एवं विकृति शर्मसार क्यों नहीं करती?
लोकतंत्र की बुनियाद इसलिये भी खोखली होती जा रही है कि राजनीतिक दल अपनी कथनी-करनी का औचित्य साबित करने की चिंता ही नहीं करते। उन्हें इस बात की चिंता होती ही नहीं कि आज जो वे कह या कर रहे हैं, उसे यदि उनके बीते हुए कल की कथनी-करनी से तौला जाएगा तो उनकी क्या स्थिति होगी? वे यह भी नहीं सोचना चाहते कि आम लोग उनकी बात पर विश्वास क्यों करें? क्यों वे आम जनता को बेवकूफ समझते है? जनता के विश्वास से खेलना कब तक जारी रहेगी? लम्बे इंतजार करने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमल थाम लिया, जिसकी परिणति मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के पतन और शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन के रूप में हुई। जमीनी एवं जीवनदानी भाजपा कार्यकर्ताओं की कीमत पर सिंधिया समर्थकों को शिवराज सरकार में हिस्सेदारी मिल चुकी है। खुद ज्योतिरादित्य कोे नरेंद्र मोदी सरकार में प्रवेश का इंतजार है। पिछले साल ही राजस्थान में भी मध्य प्रदेश प्रकरण की पुनरावृत्ति के आसार नजर आये थे, पर अंतिम क्षणों में कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को मनाने में सफल हो गया और अशोक गहलोत सरकार बच गयी। अभी भी राजस्थान में सत्ता परिवर्तन का खेल कभी भी हो सकता है। ऐसी मिसालें कम नहीं हैं, जब हमारे राजनेताओं के रातोंरात हुए हृदय परिवर्तन ने सरकार गिरायी और बनायी हैं। विडम्बना तो यह है कि हृदय परिवर्तन अक्सर सत्ता परिवर्तन के लिए ही होता है, लोकतंत्र के लिये कोई आदर्श उदाहरण बनने के लिये नहीं।
इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण राजनीतिक स्थितियों को लेकर ढेरों मुहावरे एवं कहावतें बन चुकी हैं- राजनीति बदमाशों की अंतिम शरणस्थली है, प्यार, युद्ध और राजनीति में सब कुछ जायज है, राजनीति में कोई स्थायी मित्र या कोई स्थायी शत्रु नहीं होता, राजनीति अवसर भुनाने की कला है, राजनीति असंभव साधने की कला है आदि-आदि। और यह एक रोचक स्थिति है कि पिछले कुछ ही दिनों में देश ने इन और ऐसे सारे मुहावरों की हकीकत की बानगी किसी न किसी रूप में देख ली है। पश्चिम बंगाल चुनावों में जिस तरह के राजनीतिक समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं, जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उस सबसे हमारी राजनीति का अवसरवादी एवं विद्रूप चेहरा जरूर अलग-अलग रूपों में सामने आ रहा है। ऐसा नहीं कि पहले हमारी राजनीति के विरोधाभासी समीकरण कभी सामने नहीं आए, लेकिन जिस रूप में अब सामने आ रहे हैं, वह अपने आप में हमारी राजनीति को परिभाषित कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के तेवर पर देश में काफी चर्चा हो चुकी है, हो रही है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह समीकरण बनाए-बिगाड़े जा रहे हैं, उसे देखकर यह चिंता उभरनी ही चाहिए कि सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति हमें कहां पहुंचाएगी।
राजनीति और चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से 2020 के बीच हुए चुनावों में लड़ने वाले 405 में से 182 विधायक दल बदल कर भाजपा में शामिल हुए जबकि 38 विधायक कांग्रेस में और 25 विधायक टीआरएस में शामिल हुए। जिन नेताओं और दलों की निष्ठा और वफादारी का यह आलम है, उनके चुनावी वायदों के वफा होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? राजनीति की दूषित हवाओं ने लोकतंत्र की चेतना को प्रदूषित कर दिया है। जबकि लोकतंत्र की बुनियाद है राजनीति, जिसकी जनता की आंखों में पारदर्शिता होनी चाहिए। मगर आज राजनीति ने इतने मुखौटे पहन लिये हैं, छलनाओं के मकड़ जाल बुन लिये हैं कि उसका सही चेहरा एवं चरित्र पहचानना आम मतदाता के लिये बहुत कठिन हो गया है। कैसे राजनीति के प्रति मन श्रद्धा से झुके? क्योंकि वहां किसी मौलिक मुद्दे पर स्थिरता नहीं और जहां स्थिरता नहीं वहां विश्वास और आस्था कैसे संभव होगी?
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 

 

 


अंतिम सांसे लेता वामपंथ

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

24-Mar-2021

प्रीतीश नंदी

Pritish Nandy Blog - Times of India Blog

मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं लेकिन, मैं ऐसे राज्य में बड़ा हुआ, जहां कम्युनिस्टों ने 34 साल राज किया और भारत को कुछ बेहतरीन और ईमानदार नेता दिए. हालांकि, कार्यकर्ताओं के बारे में मैं उतनी निश्चतता से नहीं कह सकता. लेकिन, राजनीति में नेता और कार्यकर्ता हमेशा एक जैसा व्यवहार नहीं करते.

वामपंथ

कॉलेज में मैंने कुछ बहुत ही प्रखर और बुद्धिमान मित्रों को पढ़ाई छोड़कर एक उद्‌देश्य के लिए नक्सलबाड़ी में लड़ने जाते देखा. उद्‌देश्य था ऐसे राष्ट्र में किसानों को हक दिलाना, जिसे उनकी रत्तीभर परवाह नहीं थी- और आज भी नहीं है.

कल की ही बात है मैंने अपनी खिड़की के बाहर हंसिया व हथौड़े वाले लाल झंडों का सागर लहराते देखा, जब हजारों किसान मुंबई चले आए. मीलों पैदल चलने के कारण उनके पैरे जख्मी हो गए, उनमें छाले पड़ गए थे, तो मुझे उन दिनों के लाल झंडे की ताकत याद आई. इतने दशकों में इन किसानों के लिए कुछ भी नहीं बदला. परिवार बढ़ने से उनकी जमीनें सिकुड़ती गई है.

आज भी बारिश देर से या अपर्याप्त हो तो उनकी फसलें बर्बाद हो जाती हैं. सिंचाई पर खर्च की गई अपार राशि हवा में गायब हो गई. कम से कम महाराष्ट्र में तो यही हालत है. सरकारों से मिले वादे, वादे ही रहे. कर्ज, दरिद्रता और घोर निराशा के कारण किसानों की आत्महत्या की दर खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है.

मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं फिर चाहे मैंने एक युवक के रूप में प्रशंसा की नज़रों से कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं को साहसपूर्वक कोलकाता के सांप्रदायिक दंगों के बीच जाकर तत्काल शांति स्थापित करते देखा है.

वे बहादुर लोग थे और उनका बड़ा सम्मान था. धर्म-जाति उनकी राजनीति के हिस्से नहीं थे. वे महान विज़नरी नहीं थे. उन्होंने कभी अच्छे दिनों का वादा नहीं किया. किंतु वे लोगों की सुनते थे और सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करते थे जो (ईमानदारी से कहें तो) प्राय: पर्याप्त अच्छा नहीं होता था.

उनके हीरो सारी जगहों से थे. लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग, फिदेल कास्त्रों, हो चि मिन्ह. न तो कास्त्रो और न हो चि मिन्ह कम्युनिस्ट थे. वे तो सिर्फ देशभक्त थे, जो अपने देश के लिए लड़ रहे थे. लेकिन अमेरिकी दुष्प्रचार ने दिन-रात एक करके उन पर कम्युनिस्ट का लेबल लगा दिया.

मैं युवा था और मेरे हीरो अलग थे. चे, 1968 के वसंत में पेरिस में छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले डेनी द रेड और कोलंबियाई पादरी व मार्क्सवाद और कैथोलिक आस्था को मिलाने वाले मुक्ति शास्त्र के अग्रदूत कैमिलो टॉरेस.

उनमें से कोई भी सोवियत शैली की तानाशाही सत्ता में भरोसा नहीं करता था. वे अपने देश के लिए, एक सपने के लिए लड़ रहे थे. उन दिनों कम्युनिज्म कोई सुगठित विचारधारा नहीं थी, यह तो कुछ करने का आह्वान भर था. इसलिए जब पूर्वी और मध्य यूरोप ने सोवियतों को बाहर निकालने का फैसला किया तो मुझे खुशी हुई.

9 नवंबर 1989 की रात को पूर्व व पश्चिम जर्मनी को विभाजित करने वाली 96 मील लंबी बर्लिन की दीवार- जो कम्युनिस्ट व स्वतंत्र यूरोप के बीच दिल तोड़ देने वाले विभाजन की प्रतीक थी- भरभरागर गिर गई.

पेरिस्त्राइका और ग्लासनोस्त जैसे शब्द राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बन गए. और जॉन एफ केनेडी की प्रसिद्ध घोषणा ‘इश बिन आइन बर्लिनेर’ (मैं बर्लिनवासी हूं) 26 साल बाद नए यूरोप में फिर गूंजने लगी, जहां स्वतंत्रता ही सब कुछ थी. दो साल बाद 25 दिसंबर को क्रेमलिन से सोवियत ध्वज आखिरी बार नीचे लाया गया.

इसके पहले उसी दिन गोर्बाचेव राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे चुके थे. नया रूस जन्म ले चुका था और कई राष्ट्र अस्तित्व में आए थे. तब पहली बार लेनिन का आसन डावांडोल हुआ. कीव के अच्छे लोगों ने उन्हें काफी बाद में धरती पर गिराया. सोवियत संघ के पतन के साथ लाल झंडे का रोमांस यहां भी काफी कम हो गया. पश्चिम बंगाल का गढ़ सबसे पहले ध्वस्त हुआ.

हालांकि, ममता बनर्जी ने वामपंथ की इमारत ढहाई थी पर वामपंथी कार्यकर्ता अब तृणमूल के थे. सिर्फ नाम बदला था. केरल अब कम्युनिस्टों का गढ़ था. फिर त्रिपुरा था, जहां माणिक सरकार 20 साल से मुख्यमंत्री थे. वे हाल ही में चुनाव हार गए और चूंकि उनका कोई घर नहीं है (और बैंक में 9,720 रुपए होने के कारण घर खरीद नहीं सकते थे) तो वे अब पत्नी के साथ पार्टी दफ्तर में रहते हैं. उन्हें निर्धनतम मुख्यमंत्री माना गया है.

चित्र:H1N1 India map per confirmed cases.svg - विकिपीडिया

ज्योति बसु के बाद आए बुद्धदेब भट्‌टाचारजी 2011 में ममता बनर्जी से चुनाव हारने के पहले 11 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे. वे छोटे-छोटे दो कमरों के सरकारी प्लैट में पत्नी और बेटी के साथ रहते हैं. उन्होंने बैंक खाते में पड़े 5000 रुपए के साथ चुनाव लड़ा था. कई लोग कम्युनिस्टों के जाने से खुश हैं पर मुझे बुद्धदेब और माणिक सरकार जैसे लोगों की कमी खलेगी. केवल वामपंथ ही ऐसे लोग दे सकता था : ईमानदार, किफायती और किसी कांड से अछूते.

एक और कम्युनिस्ट थे, जिनका मैं प्रशंसक था: ज्योति बसु, जो 23 साल मुख्यमंत्री रहे. विद्वता के कारण उनका बहुत सम्मान था .1996 में वे प्रधानमंत्री होते. राजीव ने उनका सुझाया था और उन पर आम सहमति थी लेकिन, प्रकाश करात के नेतृत्व वाले पार्टी सहयोगियों ने उनका समर्थन नहीं किया. भारत ने पहला कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री होने का मौका गंवा दिया, जो सत्यजीत राय और रविशंकर के साथ उतने ही सहज थे, जितने कार्ल मार्क्स के साथ.

नहीं, मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं लेकिन, मैं जिन कुछ बेहतरीन कलाकार, कवि, संगीतकार और विचारकों को जानता था वे किसी न किसी तरह वामपंथ से प्रेरित थे. मुझे बरसों पहले समर सेन और सुभाष मुखोपाध्याय का अनुवाद करना याद है.  वे अद्‌भुत कवि थे. मैंने साहिर व कैफी आज़मी तथा फैज़ और सरदार जाफरी का भी अनुवाद किया था. ये सब बहुत अच्छे संवेदनशील कवि थे, जो अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के विचार से प्रेरित थे.

मुझे श्री श्री और गद्‌दार याद आते हैं जिनके गीत लोगों को प्रेरित करते थे. बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी याद है? मुझे अमृता प्रीतम याद आती हैं, जिनकी कविताओं का भी मैंने अनुवाद किया है. और सलील चौधरी, जिनके अमर गीत हेमंत मुखर्जी ने गाए? कम्युनिज्म अपने अंतिम चरण में है. हर कोई यह जानता है. यह साबित करने के लिए आपको लेनिन की प्रतिमा गिराने की जरूरत नहीं है. दुनिया आगे बढ़ गई है.

 

रविवार से साभार 


जीवन को अपसेट नहीं, परफेट बनाये

जीवन को अपसेट नहीं, परफेट बनाये

15-Mar-2021

जीवन को अपसेट नहीं, परफेट बनाये
ललित गर्ग 

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आज सुविधाओं का बहुत विस्तार हुआ है, जो साधन किसी समय में विरले व्यक्तियों के लिए सुलभ थे, वे आज सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं, आज साधारण परिवारों में भी टी.वी. है, लेपटाप है, मोबाइल है, कार है, सोफा-सेट है, गोल्डन-सेट है, डायमण्ड-सेट है, पर इन सारे कीमती सेटों के बावजूद मन ‘अपसेट’ है? व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तनाव, टकराव और बिखराव बढ़ रहे हैं। हमारे जीवन में मन की शांति साधन-सुविधाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण है, लेकिन हमारा ध्यान उस ओर नहीं जा रहा है। नतीजा इंसान का मिजाज बिगड़ रहा है, जिससे वह स्वयं भी अशांत रहता है, पारिवारिक जीवन भी अशांत और अव्यवस्थित रहता है और इसका प्रभाव समाज एवं देश में भी देखने को मिलता है।
‘मूड-आॅफ’ की बात मम्मी-पापा ही नहीं, छोटे-छोटे बच्चों में देखने को मिलती है। जब तक मन को प्रशिक्षित, संतुलित और अनुशासित बनाने की दिशा में मानव समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक बौद्धिक और आर्थिक समृद्धि भी तलवार की धार बन सकती है, विकास और उल्लास का साधन नहीं होकर विषाद और विनाश का कारण हो सकती है। जीवन अवसर नहीं, अनुभव का नाम है। हर समय की तेरी-मेरी, हार-जीत और हरेक चीज को अपने काबू में करने की उठापटक बेचैनी के सिवा कुछ नहीं देती। हर पल आशंकाओं से घिरा मन जिंदगी के मायने ही नहीं समझ पा रहा है। ओशो तो कहते हैं कि जीवन तथ्य नहीं, केवल एक संभावना है-जैसे बीज, बीज में छिपे हैं हजारों फूल, पर प्रकट नहीं, अप्रकट हैं। बहुत गहरी खोज करोगे तो ही पा सकोगे।
किसी न किसी रूप में दुख हरेक की जिंदगी में होता है। कई बार कचोट इतनी गहरी होती है कि जैसे-जैसे समय बीतता है, उसकी कड़वाहट हर चीज को अपनी गिरफ्त में लेने लगती है। पर दार्शनिक रूमी कहते हैं, ‘ देखना, तुम्हारे दुख और दर्द जहरीले न हो जाएं। अपने दर्द को प्रेम और धैर्य के धागे के साथ गूंथना।’ ऐसा करने का एक ही माध्यम है मन को समझाना, उसे तैयार करना। मन के संतुलन एवं सशक्त स्थिति से, मन की भावना और कल्पना से ही मनुष्य सम्राट और भिखारी होता है। जिसका मन प्रसन्न और स्वस्थ है, वह अकिंचन होकर भी सम्राट है। जो अशांति और व्याकुलता के दावानल में जलता रहता है, वह संपन्न और समृद्ध होकर भी भिखारी के समान है। मानसिक स्वास्थ्य एवं संतुलन के अभाव में थोड़ी-सी प्रतिकूलता भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती है। उस स्थिति में जीना भी भार प्रतीत होने लगता है। ऐसे लोगों के सिर संसार की कोई भी शक्ति आलंबन नहीं हो सकती। ‘मन के जीते जीत है, मन के हारे हार’-यह कहावत बिल्कुल सही है। अनुकूलता और प्रतिकूलता, सरलता और कठिनता तथा सुख व दुःख की अनुभूति के साथ मन की कल्पना का संबंध निश्चित होता है।
जिस प्रकार दिन और रात का अभिन्न संबंध है उसी प्रकार सुख-दुःख, हर्ष-शोक, लाभ-अलाभ व संयोग-वियोग का संबंध भी अटल है। हमें सच्चाई को गहराई से आत्मसात् करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति और परिस्थिति के प्रति शिकायत, ईष्र्या, धृणा, द्वेष और गिला-शिकवा की भाषा में नहीं सोचना चाहिए। जब मन में शांति के फूल खिलते हैं, तो कांटों में भी फूलों का दर्शन होता है। जब मन में अशांति के कांटे होते हैं तो फूलों से भी चुभन और पीड़ा का अनुभव होता है।
कहा जाता रहा है- ईष्र्या मत करो, धृणा और द्वेष मत करो। क्योंकि ये समस्या के कारण हैं। यह उपदेश धर्म की दृष्टि से ही नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है। विज्ञान ने यह प्रमाणित कर दिया है- जो व्यक्ति स्वस्थ रहना चाहता है, उसे निषेधत्मक भावों से बचना चाहिए। बार-बार क्रोध करना, चिड़चिड़ापन आना, मूड का बिगड़ते रहना- ये सारे भाव हमारी समस्याओं से लडने की शक्ति को प्रतिहत करते हैं। इनसे ग्रस्त व्यक्ति खुशियों से वंचित होकर बहुत जल्दी बीमार पड़ जाता है। खुशियों की एक कीमत होती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि सर्वश्रेष्ठ खुशियों का कोई दाम नहीं होता। जितना हो सके झप्पियां, मुस्कराहटें, दोस्त, परिवार, नींद, प्यार, हंसी और अच्छी यादों के खजाने बढ़ाते रहें।
 धूप और छांव की तरह जीवन में कभी दुःख ज्यादा तो कभी सुख ज्यादा होते हैं। जिन्दगी की सोच का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि जिन्दगी में जितनी अधिक समस्याएं होती हैं, सफलताएं भी उतनी ही तेजी से कदमों को चुमती हैं। बिना समस्याओं के जीवन के कोई मायने नहीं हैं। समस्याएं क्यों होती हैं, यह एक चिन्तनीय प्रश्न है। यह भी एक प्रश्न है कि हम समस्याओं को कैसे कम कर सकते हैं। इस प्रश्न का समाधान आध्यात्मिक परिवेश में ही खोजा जा सकता है।
अति चिन्तन, अति स्मृति और अति कल्पना- ये तीनों समस्या पैदा करते हैं। शरीर, मन और वाणी- इन सबका उचित उपयोग होना चाहिए। यदि इनका उपयोग न हो, इन्हें बिल्कुल काम में न लें तो ये निकम्मे बन जायेंगे। यदि इन्हें बहुत ज्यादा काम में लें, अतियोग हो जाए तो ये समस्या पैदा करेंगे। इस समस्या का कारण व्यक्ति स्वयं है और वह समाधान खोजता है दवा में, डाॅक्टर में या बाहर आॅफिस में। यही समस्या व्यक्ति को अशांत बनाती है। जरूरत है संतुलित जीवनशैली की। जीवनशैली के शुभ मुहूर्त पर हमारा मन उगती धूप  की तरह ताजगी-भरा होना चाहिए, क्योंकि अनुत्साह भयाक्रांत, शंकालु, अधमरा मन समस्याओं का जनक होता है। यदि हमारे पास विश्वास, साहस, उमंग और संकल्पित मन है तो दुनिया की कोई ताकत हमें अपने पथ से विचलित नहीं कर सकती और सफलता का राजमार्ग भी यही है। व्यक्ति के उन्नत प्रयास ही सौभाग्य बनते हंै।
छोटे-छोटे सुख हासिल करने की इच्छा के चलते हम कई बार पूरे माहौल एवं जीवन को प्रभावित करते हैं, दूषित बना देते हंै। किसी के घर के आगे गाड़ी पार्क करने से लेकर पीने के पानी से वाहन की धुलाई करने तक, ऐसी ही नकारात्मकताएं पसरी है। ये उन्नत जीवन की राह में रोड़े हैं। हमें और भी कई तरह के गिले-शिकवे, निंदा, चुगली और उठा-पटक से गुजरना पड़ता है। गुस्सा आता है और कई तरह की कुंठाएं सिर उठाने लगती हैं। लेखक टी. एफ. होग कहते हैं, ‘ कुंठाओं से पार पाने का एक ही तरीका है कि हम बाधाओं की बजाय नतीजों पर नजर रखें।’ हम सबसे पहले यह खोजें- जो समस्या है, उसका समाधान मेरे भीतर है या नहीं? बीमारी पैदा हुई, डाॅक्टर को बुलाया और दवा ले ली। यह एक समाधान है पर ठीक समाधान नहीं है। पहला समाधान अपने भीतर खोजना चाहिए। एक व्यक्ति स्वस्थ रहता है। क्या वह दवा या डाक्टर के बल पर स्वस्थ रहता है? या अपने मानसिक बल यानी सकारात्मक सोच पर स्वस्थ रहता है? हमारी सकारात्मकता अनेक बीमारियों एवं समस्याओं का समाधान है। जितने नकारात्मक भाव (नेगेटिव एटीट्यूट) हैं, वे हमारी बीमारियांे एवं समस्याओं से लडने की प्रणाली को कमजोर बनाते हैं।


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शुभ के सृजन का दुर्लभ अवसर है महाशिवरात्रि

शुभ के सृजन का दुर्लभ अवसर है महाशिवरात्रि

13-Mar-2021

महाशिवरात्रि-11 मार्च, 2021 पर विशेष
-ः ललित गर्ग:-

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फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है, यह हिंदुओं का एक धार्मिक त्योहार है, जिसे हिंदू धर्म के प्रमुख देवता महादेव अर्थात शिवजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह शिव से मिलन की रात्रि का सुअवसर है। इसी दिन निशीथ अर्धरात्रि में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये यह पुनीत पर्व सम्पूर्ण देश एवं दुनिया में उल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सांस्कृतिक एवं धार्मिक चेतना की ज्योति किरण है। इससे हमारी चेतना जाग्रत होती है, जीवन एवं जगत में प्रसन्नता, गति, संगति, सौहार्द, ऊर्जा, आत्मशुद्धि एवं नवप्रेरणा का प्रकाश परिव्याप्त होता है। यह पर्व जीवन के श्रेष्ठ एवं मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
आध्यात्मिक पथ पर चलने वालों के लिए महाशिवरात्रि का पर्व बहुत महत्वपूर्ण है। पारिवारिक परिस्थितियों में जी रहे लोगों तथा महत्वाकांक्षियों के लिए भी यह उत्सव बहुत महत्व रखता है। जो लोग परिवार के बीच गृहस्थ हैं, वे महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव के रूप में मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं से घिरे लोगों को यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि शिव ने अपने सभी शत्रुओं पर विजय पा ली थी। महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है। ये आपको, हर मनुष्य के भीतर छिपे उस अथाह शून्य के अनुभव के पास ले जाती है, जो सारे सृजन का स्त्रोत है।
भगवान शिव आदिदेव है, देवों के देव है, महादेव हैं। सभी देवताओं में वे सर्वोच्च हंै, महानतम हंै, दुःखों को हरने वाले हंै। वे कल्याणकारी हंै तो संहारकर्ता भी हैं। शिव भोले भण्डारी है और जग का कल्याण करने वाले हैं। सृष्टि के कल्याण हेतु जीर्ण-शीर्ण वस्तुओं का विनाश आवश्यक है। इस विनाश में ही निर्माण के बीज छुपे हुए हैं। इसलिये शिव संहारकर्ता के रूप में निर्माण एवं नव-जीवन के प्रेरक भी है। सृष्टि पर जब कभी कोई संकट पड़ा तो उसके समाधान के लिये वे सबसे आगे रहे। जब भी कोई संकट देवताओं एवं असुरों पर पड़ा तो उन्होंने शिव को ही याद किया और शिव ने उनकी रक्षा की। समुद्र-मंथन में देवता और राक्षस दोनों ही लगे हुए थे। सभी अमृत चाहते थे, अमृत मिला भी लेकिन उससे पहले हलाहल विष निकला जिसकी गर्मी, ताप एवं संकट ने सभी को व्याकुल कर दिया एवं संकट में डाल दिया, विष ऐसा की पूरी सृष्टि का नाश कर दें, प्रश्न था कौन ग्रहण करें इस विष को। भोलेनाथ को याद किया गया गया। वे उपस्थित हुए और इस विष को ग्रहण कर सृष्टि के सम्मुख उपस्थित संकट से रक्षा की। उन्होंने इस विष को कंठ तक ही रखा और वे नीलकंठ कहलाये। इसी प्रकार गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये भोले बाबा ने ही सहयोग किया। क्योंकि गंगा के प्रचंड दबाव और प्रवाह को पृथ्वी कैसे सहन करें, इस समस्या के समाधान के लिये शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को समाहित किया और फिर अनुकूल गति के साथ गंगा का प्रवाह उनकी जटाओं से हुआ।
सृष्टि से जुड़े अनेक संकट और उनसे मुक्ति के शिव-प्रयत्नों केे घटना-क्रम हैं जिनके लिये शिव ने अपनी शक्तियों, तप और साधना का प्रयोग करके दुनिया को नव-जीवन प्रदान किया। शिव का अर्थ ही कल्याण है, वही शंकर है, और वही रुद्र भी है। शंकर में शं का अर्थ कल्याण है और कर का अर्थ करने वाला। रुद्र में रु का अर्थ दुःख और द्र का अर्थ हरना- हटाना। इस प्रकार रुद्र का अर्थ हुआ, दुःख को दूर करने वाले अथवा कल्याण करने वाले। शिव की प्रतिमाओं में तीसरा नेत्र अवश्य बनाया जाता है, शिवालयों की रचना बिना नन्दी की मूर्ति के पूर्ण नहीं होती, प्रश्न है कि ये केवल आस्था एवं पूजा-विधान की बात है या इसके गूढ़ एवं सृजनकारी अर्थ भी है? शिव का तीसरा नेत्र भौतिक नेत्र नहीं हैख् वहीं नंदी भी केवल एक बेल मात्र नहीं है, ये दोनों जीवन एवं सृष्टि से जुड़ी अर्थपूर्ण संरचनाएं है, इसके मर्म को समझकर ही हम शिव की साधना के सक्षम पात्र हो सकते हैं। असल में ये अद्भुत प्रेरणा एवं शक्ति है जो हमें शिव की तरह जीवन को देखने के लिये प्रेरित करती है।
 भौतिक एवं भोगवादी भागदौड़ की दुनिया में शिवरात्रि का पर्व भी दुःखों को दूर करने एवं सुखों का सृजन करने का प्रेरक है। भोलेनाथ भाव के भूखे हैं, कोई भी उन्हें सच्ची श्रद्धा, आस्था और प्रेम के पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना कर सकता है। दिखावे, ढोंग एवं आडम्बर से मुक्त विद्वान-अनपढ़, धनी-निर्धन कोई भी अपनी सुविधा तथा सामथ्र्य से उनकी पूजा और अर्चना कर सकता है। शिव न काठ में रहता है, न पत्थर में, न मिट्टी की मूर्ति में, न मन्दिर की भव्यता में, वे तो भावों में निवास करते हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूजा एवं अभिषेक करने पर उपासक को समस्त तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं। शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प तथा प्रसाद में भांग अति प्रिय हैं। लौकिक दृष्टि से दूध, दही, घी, शकर, शहद- इन पाँच अमृतों (पंचामृत) का पूजन में उपयोग करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। शिवरात्रि वह समय है जो पारलौकिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों प्रकार की व्यथाओं, संतापों, पाशों से मुक्त कर देता है। शिव की रात शरीर, मन और वाणी को विश्राम प्रदान करती है। शरीर, मन और आत्मा को ऐसी शान्ति प्रदान करती है जिससे शिव तत्व की प्राप्ति सम्भव हो पाती है। शिव और शक्ति का मिलन गतिशील ऊर्जा का अन्तर्जगत से एकात्म होना है। लौकिक जगत में लिंग का सामान्य अर्थ चिह्न होता है जिससे पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग की पहचान होती है। शिव लिंग लौकिक के परे है। इस कारण एक लिंगी है। आत्मा है। शिव संहारक हैं। वे पापों के संहारक हैं। शिव की गोद में पहुंचकर हर व्यक्ति भय-ताप से मुक्त हो जाता है।
शिव पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने इसी दिन रुद्र रूपी शिव को उत्पन्न किया था। शिव एवं हिमालय पुत्री पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। अतः यह शिव एवं शक्ति के पूर्ण समरस होने की रात्रि भी है। वे सृष्टि के सर्जक हैंै। वे मनुष्य जीवन के ही नहीं, सृष्टि के निर्माता, पालनहार एवं पोषक हैं। उन्होंने मनुष्य जाति को नया जीवन दर्शन दिया। जीने की शैली सिखलाई। शिवरात्रि भोगवादी मनोवृत्ति के विरुद्ध एक प्रेरणा है, संयम की, त्याग की, भक्ति की, संतुलन की। सुविधाओं के बीच रहने वालों के लिये सोचने का अवसर है कि वे आवश्यक जरूरतों के साथ जीते हैं या जरूरतों से ज्यादा आवश्यकताओं की मांग करते हैं। इस शिवभक्ति एवं उपवास की यात्रा में हर व्यक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि शिशुभाव जागता है। क्रोध नहीं, क्षमा शोभती है। कष्टों में मन का विचलन नहीं, सहने का धैर्य रहता है। यह तपस्या स्वयं के बदलाव की एक प्रक्रिया है। यह प्रदर्शन नहीं, आत्मा के अभ्युदय की प्रेरणा है। इसमें भौतिक परिणाम पाने की महत्वाकांक्षा नहीं, सभी चाहों का संन्यास है।
शिव ने संसार और संन्यास दोनों को जीया है। उन्होंने जीवन को नई और परिपूर्ण शैली दी। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति की जीवन में आवश्यकता और उपयोगिता का प्रशिक्षण दिया। कला, साहित्य, शिल्प, मनोविज्ञान, विज्ञान, पराविज्ञान और शिक्षा के साथ साधना के मानक निश्चित किए। सबको काम, अर्थ, धर्म, मोक्ष की पुरुषार्थ चतुष्टयी की सार्थकता सिखलाई। वे भारतीय जीवन-दर्शन के पुरोधा हैं। आज उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व सृष्टि के इतिहास का एक अमिट आलेख बन चुका है। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रेरणास्रोत है। लेकिन हम इतने भोले हैं कि अपने शंकर को नहीं समझ पाए, उनको समझना, जानना एवं आत्मसात करना हमारे लिये स्वाभिमान और आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला अनुभव सिद्ध हो सकता है। मानवीय जीवन के सभी आयाम शिव से ही पूर्णत्व को पाते हैं।  
आज चारों ओर अनैतिकता, आतंक, अराजकता और अनुशासनहीनता का बोलबाला है। व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र- हर कहीं दरारे ही दरारे हैं, हर कहीं टूटन एवं बिखराव है। मानवीय दृष्टि एवं जीवन मूल्य खोजने पर भी नहीं मिल रहे हैं। मनुष्य आकृति से मनुष्य रह गया है, उसकी प्रकृति तो राक्षसी हो चली है। मानवता क्षत-विक्षत होकर कराह रही है। इन सबका कारण है कि हमने आत्म पक्ष को भुला दिया है। इन विकट स्थितियों में महादेव ही हमें बचा सकते हैं, क्योंकि शिव ने जगत की रक्षा हेतु बार-बार और अनेक बार उपक्रम किये।
वस्तुतः अपने विरोधियों एवं शत्रुओं को मित्रवत बना लेना ही सच्ची शिव भक्ति है। जिन्हें समाज तिरस्कृत करता है उन्हें शिव गले लगाते हैं। तभी तो अछूत सर्प उनके गले का हार है, अधम रूपी भूत-पिशाच शिव के साथी एवं गण हैं। समाज जिनकी उपेक्षा करता है, शंकर उन्हें आमंत्रित करते हैं। शिव की बरात में आए नंग-धडं़ग, अंग-भंग, भूत-पिशाच इसी तथ्य को दृढ़ करते हैं। इस लिहाज से शिव सच्चे पतित पावन हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण देवताआंे के अलावा दानव भी शिव का आदर करते हैं। सचमुच! धन्य है उनकी तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता, दृढ़-संकल्पशक्ति, धैर्यशीलता, आत्मनिष्ठा और अखण्ड साधनाशीलता।
प्रे्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


भारतीय नारी कब तक रहेगी बेचारी?

भारतीय नारी कब तक रहेगी बेचारी?

06-Mar-2021

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस-8 मार्च, 2021 पर विशेष

-ललित गर्ग-

नारी का नारी के लिये सकारात्मक दृष्टिकोण न होने का ही परिणाम है कि पुरुष उसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण करता आ रहा हैं। इसी कारण नारी में हीनता एवं पराधीनता के संस्कार संक्रान्त होते रहे हैं। जिन नारियों में नारी समाज की दयनीय दशा के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति नहीं है, उन नारियों का मन स्त्री का नहीं, पुरुष का मन है, ऐसा प्रतीत होता है। अन्यथा अपने पांवों पर अपने हाथों से कुल्हाड़ी कैसे चलाई जा सकती है? अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए नारी के मन में एक नयी, उन्नायक एवं परिष्कृत सोच पनपे, वे नारियों के बारे में सोचें, अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की नारी की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझें और उसके समाधान एवं प्रतिकार के लिये कोई ठोस कदम उठायें तो नारी शोषण, उपेक्षा, उत्पीड़न एवं अन्याय का युग समाप्त हो सकता है। इसी उद्देश्य से नारी के प्रति सम्मान एवं प्रशंसा प्रकट करते हुए 8 मार्च का दिन महिला दिवस के रूप में उनके लिये निश्चित किया गया है, यह दिवस उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में, उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस से पहले और बाद में हफ्ते भर तक विचार विमर्श और गोष्ठियां होंगी जिनमें महिलाओं से जुड़े मामलों जैसे महिलाओं की स्थिति, कन्या भू्रण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गांवों में महिला की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराध को एक बार फिर चर्चा में लाकर सार्थक वातावरण का निर्माण किया जायेगा। लेकिन इन सबके बावजूद एक टीस से मन में उठती है कि आखिर नारी कब तक भोग की वस्तु बनी रहेगी? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? कब तक उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नौचा जाता रहेगा? विडम्बनापूर्ण तो यह है कि महिला दिवस जैसे आयोजन भी नारी को उचित सम्मान एवं गौरव दिलाने की बजाय उनका दुरुपयोग करने के माध्यम बनते जा रहे हैं।
महिलाओं के प्रति एक अलग तरह का नजरिया इन सालों में बनने लगा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी के संपूर्ण विकास की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अनेक योजनाएं लागू की है, जिनमें अब नारी सशक्तीकरण और सुरक्षा के अलावा और भी कई आयाम जोडे़ गए हैं। सबसे अच्छी बात इस बार यह है कि समाज की तरक्की में महिलाओं की भूमिका को आत्मसात किया जाने लगा है। आज भी आधी से अधिक महिला समाज को पुरुषवादी सोच के तहत बहुत से हकों से वंचित किया जा रहा है। वक्त बीतने के साथ सरकार को भी यह बात महसूस होने लगी है। शायद इसीलिए सरकारी योजनाओं में महिलाओं की भूमिका को अलग से चिह्नित किया जाने लगा है।
एक कहावत है कि औरत जन्मती नहीं, बना दी जाती है और कई कट्ट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं। कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई हारती रही है। इसीलिये आज की औरत को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए। पूरे पृष्ठ, जितने पुरुषों को प्राप्त हैं। पर विडम्बना है कि उसके हिस्से के पृष्ठों को धार्मिकता के नाम पर ‘धर्मग्रंथ’ एवं सामाजिकता के नाम पर ‘खाप पंचायते’ घेरे बैठे हैं। पुरुष-समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक अनियंत्रण हैं जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने एवं बेचारगी को जीने को विवश होना पड़ता है। पुरुषवर्ग नारी को देह रूप में स्वीकार करता है, लेकिन नारी को उनके सामने मस्तिष्क बनकर अपनी क्षमताओं का परिचय देना होगा, उसे अबला नहीं, सबला बनना होगा, बोझ नहीं शक्ति बनना होगा।
‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझकर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं शक्ल बदल-बदल कर काले अध्याय रच रही है। देश में गैंग रेप की वारदातों में कमी भले ही आयी हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है। आवश्यकता लोगों को इस सोच तक ले जाने की है कि जो होता आया है वह भी गलत है। महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कानूनों की कठोरता से अनुपालना एवं सरकारों में इच्छाशक्ति जरूरी है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरोध में लाए गए कानूनों से नारी उत्पीड़न में कितनी कमी आयी है, इसके कोई प्रभावी परिणाम देखने में नहीं आये हैं, लेकिन सामाजिक सोच में एक स्वतः परिवर्तन का वातावरण बन रहा है, यहां शुभ संकेत है। महिलाओं के पक्ष में जाने वाले इन शुभ संकेतों के बावजूद कई भयावह सामाजिक सच्चाइयां बदलने का नाम नहीं ले रही हैं।
देश के कई राज्यों में लिंगानुपात खतरे के निशान के करीब है। देश की राजधानी में महिलाओं के हक के लिए चाहे जितने भी नारे लगाए जाएं, लेकिन खुद दिल्ली शहर से भी बुरी खबरें आनी कम नहीं हुई हैं। तमाम राज्य सरकारों को अपनी कागजी योजनाओं से खुश होने के बजाय अपनी कमियों पर ध्यान देना होगा। योजना अपने आप में कोई गलत नहीं होती, कमी उसके क्रियान्वयन में होती है। कुछ राज्यों में बेटी की शादी पर सरकार की तरफ से एक निश्चित रकम देने की स्कीम है। इससे बेटियों की शादी का बोझ भले ही कम हो, लेकिन इससे बेटियों में हीनता की भावना भी पनपती है। ऐसी योजनाओं से शिक्षा पर अभिभावकों का ध्यान कम जाएगा। जरूरत नारी का आत्म-सम्मान एवं आत्मविश्वास कायम करने की है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की है। नारी सोच बदलने की है। उन पर जो सामाजिक दबाव बनाया जाता है उससे निकलने के लिए उनको प्रोत्साहन देना होगा। ससुराल से निकाल दिए जाने की धमकी, पति द्वारा छोड़ दिए जाने का डर, कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थलों पर भेदभाव, दोहरा नजरियां, छोटी-छोटी गलतियों पर सेवामुक्त करने की धमकी, बड़े अधिकारियों द्वारा सैक्सअल दबाब बनाने, यहां तक कि जान से मार देने की धमकी के जरिये उन पर ऐसा दबाव बनाया जाता है। इन स्थितियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है नारी को खुद हिम्मत जुटानी होगी, साहस का परिचय देना होगा लेकिन साथ ही समाज को भी अपने पूर्वाग्रह छोड़ने के लिए तैयार करना होगा। इन मुद्दों पर सरकारी और गैरसरकारी, विभिन्न स्तरों पर सकारात्मक नजरिया अपनाया जाये तो इससे न केवल महिलाओं का, बल्कि पूरे देश का संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।
रामायण रचयिता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की यह पंक्ति-‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ जन-जन के मुख से उच्चारित है। प्रारंभ से ही यहाँ ‘नारीशक्ति’ की पूजा होती आई है फिर क्यों नारी अत्याचार बढ़ रहे हैं? क्यों महिला दिवस मनाते हुए नारी अस्तित्व एवं अस्मिता को सुरक्षा देने की बात की जाती है?  क्यों उसे दिन-प्रतिदिन उपेक्षा एवं तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। इसके साथ-साथ भारतीय समाज में आई सामाजिक कुरीतियाँ जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, बहू पति विवाह और हमारी परंपरागत रूढ़िवादिता ने भी भारतीय नारी को दीन-हीन कमजोर बनाने में अहम भूमिका अदा की। बदलते परिवेश में आधुनिक महिलाओं के लिए यह आवश्यक है कि मैथिलीशरण गुप्त के इस वाक्य-“आँचल में है दूध” को सदा याद रखें। उसकी लाज को बचाएँ रखें। बल्कि एक ऐसा सेतु बने जो टूटते हुए को जोड़ सके, रुकते हुए को मोड़ सके और गिरते हुए को उठा सके। प्रेषकः-

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई0पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनरू 22727486

 


जहेज़ की कुरीतियों को दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को आगे आना होगा। सैय्यद तक़वी

जहेज़ की कुरीतियों को दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को आगे आना होगा। सैय्यद तक़वी

06-Mar-2021

जहेज़ की कुरीतियों को दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को आगे आना होगा। सैय्यद तक़वी

अभी कुछ दिन पहले साबरमती नदी में एक हादसे की खबर आई। कई दिनों से इस घटना के बारे में सुन रहा था और पढ़ रहा था और सोच रहा था कि ऐसा क्यों हुआ? इस देश में क्या हो रहा है इंसान की सोच कहां तक पहुंच गई है? किसी की बेटी ने जिंदगी से तंग आकर अपनी जान दे दी और यह परेशानी और तंगी इस बात की थी कि उससे जहेज़ का बार-बार मुतालबा किया जा रहा था आज के जमाने में जहेज़ सिर्फ वह नहीं है जो शादी के वक्त मां बाप अपनी बेटी को देते हैं आज कुछ लालची लोग शादी के बाद भी समय-समय पर लड़की के बाप से चीजों के लिए डिमांड करते हैं उसके लिए वह अपनी बीवी का इस्तेमाल करते हैं जो बहुत ही ज्यादा चिंताजनक है।
यहां मैं किसी धर्म या मजहब की बात नहीं कर रहा हूं मैं इंसानियत की बात कर रहा हूं कम से कम जो हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति है उसमें चाहे हिंदू हो मुसलमान हो सिख हो या ईसाई हम सब को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि सिर्फ कोई लड़की किसी की बीवी ही नहीं होती बल्कि वह मां भी होती है बहन भी होती है और सबसे बड़ी बात कि किसी की बेटी भी होती है जिस के इतने रूप हों उसके साथ  इस तरह का बर्ताव कैसे किया जा सकता है।
आज हमारे देश का युवा और उसी युवक के अभिभावक या माता-पिता लड़की वालों से जहेज़ के नाम पर दौलत पैसा गाड़ी बंगले की डिमांड करते हैं वह अपने आप में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला है। जो इंसान अपनी पत्नी से प्यार नहीं कर सकता वह दुनिया में किस से प्यार कर सकता है उसको इंसान कहलाने का हक नहीं है। वह इंसानियत के नाम पर धब्बा है। उसको सिर्फ दौलत से प्यार होता है । 
इसके लिए हम को आगे आना होगा और यह फैसला लेना होगा कि हम जहेज़ जैसी कुरीतियों को बढ़ावा नहीं देंगे इसके लिए हर धर्म के जो गुरु हैं चाहे वह मौलाना हो पंडित हो पादरी हों या फादर हों कोई भी हो उनको भी इसमें खुलकर सामने आना होगा कि जहां इस तरह की चीजें होंगी वहां पर शादी की रस्में पूरी नहीं कराएंगे।
इसके अलावा सरकार को भी इस मामले में सजगता बरतनी होगी जिससे सरकार और सरकार के अंडर में काम करने वाले संस्थाएं समय-समय पर लोगों के यहां छापा मारती हैं चाहे फिल्म स्टार हों चाहे वह बिजनेसमैन हों आय को लेकर के छापा मारा जाता है। आप मकान बनवा रहे हैं तो सरकार उसको चेक करती है आपने अपने पैसों से गाड़ी खरीदी सड़क पर चल रहे हैं तो सरकार उसको चेक करती है आप कोई बिजनेस या व्यवसाय कर रहे हैं तो सरकार उसको भी चेक करती है हर चीज पर सरकार की नजर होती है तो आखिर इन शादियों में दिए जाने वाले दहेज पर सरकार की नजर क्यों नहीं होती। अगर आप मकान बनवा रहे हैं तो उसके लिए भी नियम कानून है। अगर आप गाड़ी खरीद रहे हैं अपना व्यवसाय खोल रहे हैं तो सब चीज में सरकार के कानून और नियम है ऐसे में शादी के लिए नियम और कानून क्यों नहीं है? हर चीज के लिए संसद में प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सरकार तत्पर रहती है ऐसे में जहेज़ के खिलाफ प्रस्ताव क्यों नहीं पारित करवाती है। इस पर विचार करना चाहिए।
एक बाप मेहनत मजदूरी करके खुद तकलीफ उठा करके अपने बेटी को पालता पोसता है बड़ा करता है और उसकी ख्वाहिश होती है कि अपनी बेटी की जिंदगी के लिए किसी अच्छे के साथ की शादी की जाए लेकिन नतीजा क्या निकलता है नतीजा वही है जो अभी साबरमती नदी के किनारे दिखाई दिया।
एक बेटी की जान चली गई लेकिन मुजरिम के साथ क्या हुआ उसे सिर्फ गिरफ्तार किया गया और शायद आने वाले वक्त में उसे जमानत भी मिल जाए क्या यह सही है? बिल्कुल सही नहीं है। ऐसे लोगों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए।
जनता यानी आवाम को भी यह फैसला करना होगा कि जहां जहेज़ और इस तरह के लोक लुभावनी शादी हो वहां के दावत नामें को कुबूल ना करें और साथ ही साथ मौलाना पंडित वगैरह को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि ऐसी जगह पर शादी की रस्म पूरा कराने से इंकार कर दे। 
बेटी घर की रहमत होती है घर की लक्ष्मी होती है जिसे रहमत या लक्ष्मी की कद्र नहीं उसे पूरी तरह समाज द्वारा बहिष्कृत करना चाहिए।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com
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अब इंसानों के दो ही ग्रुप BH+ और BH–. सैय्यद तक़वी

अब इंसानों के दो ही ग्रुप BH+ और BH–. सैय्यद तक़वी

05-Mar-2021

अब इंसानों के दो ही ग्रुप BH+ और BH–. सैय्यद तक़वी

जी हां यह बात सही है लेकिन बिल्कुल परेशान होने की जरूरत नहीं है यह दो ब्लड ग्रुप बहुत तेजी के साथ हिंदुस्तान में फैल रहे हैं।
ब्लड ग्रुप को मुख्यतः 4 वर्गों में बांटा गया है जिनके नाम हैं;A, B, AB और O है। रक्त यह का एक वर्गीकरण, एंटीबॉडी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पर निर्भर करता है।
लेकिन आज के हालात ने लोगों के ब्लड को दो ग्रुप में बांटा हुआ है बी एच पॉजिटिव और बी एच नेगेटिव । यह वर्गीकरण इंसान की सोच, जरूरत, परिवारिक बैकग्राउंड और बेईमानी/ईमानदारी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पर निर्भर करता है। इसमें सबसे खास बात यह है की अधिकतम लोगों का ब्लड ग्रुप बी एच पॉजिटिव है यानी भ्रष्टाचार पॉजिटिव । ऐसे लोग सिर्फ भ्रष्टाचार करने कराने की तलाश में रहते हैं और भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके खोजा करते हैं। भ्रष्टाचार निगेटिव लोग कम हैं और बीएच पाज़िटिव का शिकार हैं।
आज जो देश की स्थिति है उसका कारण बीएच पाज़िटिव लोग हैं। पेट्रोल का शतक तक पहुंचना, गैस का हज़ारी गैस होना, सब्सिडी का लुप्त होना, विद्युत चार्ज का आसमान छूना, सड़कों पर गड्ढे होना यह सब बीएच पाज़िटिव लोगों की देन है।
आज जिस युग में हमारा देश जी रहा है वहां बीएच पाज़िटिव लोगों का सम्मान है। वही अतिथि भी हैं और मुख्य अतिथि भी। बीएस नेगेटिव लोगों को इस वक्त नौकर का कार्य दिया गया है। अर्थात जो बीएच पॉजिटिव लोग कहें वह चुपचाप करते रहो उनकी बात मानते रहो आवाज ना उठाओ अगर आवाज उठाओगे तो देशद्रोही कहलाओगे। आवाज उठाने की मिसाल सामने है सीए एनआरसी के खिलाफ आवाज उठाई गई और अब किसान आंदोलन में किसान जो आवाज उठा रहे हैं। क्या हल निकला दोनों का कुछ नहीं क्योंकि इस वक्त हर जगह हर पद पर हर विभाग में बी एच पॉजिटिव लोग अधिक संख्या में मौजूद हैं। जो लोग बी एच नेगेटिव है उनकी आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है क्योंकि बी एच पॉजिटिव की विशेषता यह होती है कि वह इंसान से सुनने, देखने और समझने की क्षमता को छीन लेता है। इसके बाद में वह यह समझता है कि हम जो कर रहे हैं वह सही है हिटलर को भी बीएच पॉजिटिव की बीमारी हो गई थी जिसका परिणाम बहुत भयानक निकला।
बी एच पॉजिटिव की विशेषता यह है कि वह इंसान गलत कार्य तो करता ही है साथ ही साथ हिंसक प्रवृत्ति का भी हो जाता है। अर्थात लड़ना लड़ाना जान ले लेना मरवा देना यह सब उसके लिए आम बात हो जाती है। एक सबसे बड़ी विशेषता यह भी होती है कि बी एच पॉजिटिव लोग अपने अंदर डर भी रखते हैं जब उनसे बड़ा कोई ताकतवर सामने आ जाता है तो वह भले ही उनके घर में घुस आए लेकिन वह यही कहते हैं कि नहीं हमारे घर में कोई नहीं घुसा।
कोविड 19 भी बीएच पाज़िटिव लोगों को नहीं रोक पाया। बल्कि इन लोगों के लिए एक नया रास्ता खुल गया। व्यक्तिगत तौर पर एक इंसान ने दूसरे इंसान की मदद की। लेकिन जो बड़ी-बड़ी संस्थाएं बड़े-बड़े ऑर्गेनाइजेशन हैं उन्होंने इस मौके को भी पूरी तरीके से भुना लिया। जरूरत बी एच नेगेटिव तक नहीं पहुंची बल्कि इन लोगों ने इस माध्यम से भी काफी लंबी लंबी डकारे ली। इसमें धार्मिक और सामाजिक सभी संस्थाएं शामिल है।
हां दूसरी तरफ ऐसे धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं एवं आर्गेनाइजेशंस भी हैं जो बीएच नेगेटिव है उन्होंने खुलकर समाज की सेवा की और इंसानियत की मदद की। लेकिन उन्होंने प्रचार नहीं किया।
बहरहाल यह खेल तो चलता रहेगा। बीएच पाज़िटिव हंसता रहेगा और बीएच निगेटिव रोता रहेगा क्योंकि मदारी भी यही और बंदर भी यही। साथी साथ जो डमरु बज रहा है वह भी भी एच पाज़िटिव। अभी एच नेगेटिव वालों का एक ही काम है बस यह सुनते रहे और देखते रहे।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com
 


इस्लामी शिक्षाओं के समूह ने युद्ध को शांति क्षेत्र में बदल दिया!

इस्लामी शिक्षाओं के समूह ने युद्ध को शांति क्षेत्र में बदल दिया!

05-Mar-2021

मैनबर्ग एक शहर है जो अपने लगातार गैंग युद्धों, ड्रग डीलिंग और अन्य अपराधों के लिए जाना जाता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों से हर गुरुवार को एक इस्लामिक विद्वान शेख मकदाम इशाक सालेक अपने “महफिल-ए-ज़िकर” के दौरान इस जगह को एक शांति क्षेत्र में बदल रहा है।

इस महफ़िल-ए-ज़िकर में हर सप्ताह लगभग 100 से 400 लोग शामिल होते हैं। लेकिन शैक साल्क के अनुसार, महत्वपूर्ण बात यह है कि जैसे ही मण्डली शुरू होती है गैंगस्टर्स की लगातार गोलीबारी रुक जाती है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, मैनबर्ग की आबादी मिश्रित या “रंगीन” लोग हैं। रंगीन दक्षिण अफ्रीका में गोरों की पिछली रंगभेदी सरकार द्वारा भारतीयों, पाकिस्तानियों, मलेशियाई और अन्य एशियाई लोगों की गैर-गोरों और गैर-अश्वेतों आबादी का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।

मैनबर्ग अतिपिछड़ा है
मैनबर्ग एक मोटी आबादी वाला क्षेत्र है जिसमें कई नागरिक मुद्दों का निवारण किया जाना आवश्यक है। इसके ओवरपोलेशन को बेहतर आवास और नागरिक सुविधाओं की आवश्यकता है।

मेनबर्ग की रंगीन आबादी ईसाइयों के बहुमत से 52 हजार है। गरीबी और बेरोजगारी यहां के अपराध और गिरोह युद्धों के मुख्य कारण हैं।

महफ़िल-ए-ज़िकर रखने वालों में से अधिकांश मलेशियाई या मलेशियाई मुसलमान हैं जो पीढ़ियों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं। ज़िकर में, यह समुदाय अल्लाह के नामों को एक अलग रूप में दोहराता है। ज़िकर के बाद, मण्डली को गर्म भोजन के साथ परोसा जाता है।

महफ़िल-ए-ज़िकर के कारण अपराध की दर कम हुई
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में मैनबर्ग को “रेड जोन” घोषित किया गया था। हालाँकि, महफ़िल-ए-ज़िकर के शुरू होने के बाद से शहर के कई इलाकों में अपराध की दर कम हो गई।

कई गैंगस्टर महफ़िल-ए-ज़िकर का सम्मान करते हैं और पूरे मण्डली में शांति सुनिश्चित करते हैं।

पिछले तीन वर्षों के दौरान शांति को ध्यान में रखते हुए, स्थानीय पुलिस ने मण्डली के आयोजकों को “शांति पुरस्कार” से सम्मानित किया है।

ईसाई भी इस मण्डली में शामिल होते हैं और इस मण्डली को संबोधित करने के लिए ईसाई धर्मगुरुओं को आमंत्रित किया जाता है।

मुस्लिम विद्वानों द्वारा प्रवचन का विषय ज्यादातर सामाजिक विषयों जैसे शांति, प्रेम और पारिवारिक संबंधों का सम्मान है।

शेख सालेक ने कहा कि अल्लाह के ज़िकर के कारण मेनबर्ग में शांति लौट रही है। “हम हर दिन इस मण्डली का संचालन करना चाहते हैं, लेकिन वित्तीय बाधाओं के कारण हम ऐसा नहीं कर सकते। हालांकि, हम शहर के विभिन्न समुदायों के बीच शांति और सद्भाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। हम स्थानीय सरकारी एजेंसियों के सहयोग से ड्रग्स और अपराध के खतरे को खत्म करने की कोशिश करेंगे।

 

किसान आंदोलन से मोदी की भाजपा बैक फुट पर!

किसान आंदोलन से मोदी की भाजपा बैक फुट पर!

19-Feb-2021

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

चुनावी मुहाने पर होने की वजह से पशोपेश में मोदी-योगी

राज्य मुख्यालय लखनऊ।देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश जैसे-जैसे चुनाव की ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही प्रदेश की सियासत गरम होती जा रही है।देखा जाए तो फ़िलहाल पश्चिम बंगाल व आसाम चुनावी मुहाने पर खड़े हैं लेकिन साथ ही देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी सियासी संग्राम हो रहा उससे अहसास हो रहा है कि उत्तर प्रदेश में भी सियासी दल चुनावी दंगल में उतरने का मन बना चुके हैं जिसके चलते मोदी-योगी सरकारें पशोपेश में हैं न उगलते बन रहा है न निगलते बन रहा है।

कृषि क़ानूनों को लेकर किसानों द्वारा पिछले 83 दिनों से किए जा रहे आंदोलन का असर शहर से लेकर गाँव तक देखने को मिल रहा है लेकिन मोदी की भाजपा व सरकार देशभर के किसानों में पनप रहे विरोध को भाँपने में नाकाम रही हैं उसी का नतीजा है कि आज मजबूर होकर मोदी की भाजपा में किसानों के बीच जाने की रणनीति बनाई जा रही हैं।किसानों के मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री स्वं चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौधरी अजित सिंह को मुज़फ़्फ़रनगर लोकसभा सीट से गठबंधन के प्रत्याशी तौर पर हरानेवाले मोदी की भाजपा के प्रत्याशी डाक्टर संजीव बालियान को लगाया जा रहा है कि वह किसानों के बीच जाकर सरकार की कृषि क़ानूनों को लाने की अपनी मनसा को समझाएँगे मोदी की भाजपा के रणनीतिकारों के पास कृषि क़ानूनों के पक्ष में ठोस जवाब नहीं है जिन क़ानूनों में बनते ही बदलाव करने पर विवश होना पड़ रहा है जब किसानों की हालत सुधारने की कोशिश के चलते तीनों कृषि क़ानून लाए गए हैं लेकिन न किसानों से बातचीत की और न विपक्ष के नेताओं से मशविरा किया जब इतना बड़ा बदलाव करने की तैयारी थी इन तीनों कृषि क़ानूनों को इतनी आनन फ़ानन में लाने की क्या ज़रूरत थी अध्यादेश के द्वारा क्यों लाए गए ? राज्यसभा में किस तरह पास किया गया यह भी देशभर ने देखा ? पूरी दुनिया कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों को लेकर परेशान थी लॉकडाउन लगा था उसकी तैयारी के बजाय मोदी सरकार गुप-चुप तरीक़े से अपने पूँजीपति मित्रों को कृषि पर एकाधिकार देने की रणनीति पर काम कर रही थी और उन्हीं मित्रों के क़र्ज़ माफ़ कर रही थी विपक्ष चिल्ला रहा था कि पैदल चल रहे मज़दूरों को उनके घरों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जाए लेकिन मोदी सरकार उनके प्रति गंभीर नहीं थी यह भी मोदी सरकार की नियत पर सवालिया निशान लगा रही है।

 इतना ही नहीं पूँजीपतियों की सरकार एक तरफ़ कृषि क़ानूनों के ज़रिए किसानों को बँधवा मज़दूर बनाने की तैयारी कर रही थी वहीं उसके उद्योगपति मित्र इन क़ानूनों के ज़रिए खेती किसानी पर कैसे क़ब्ज़ा करना है देश के कई हिस्सों में बड़े-बड़े गोदामों को बनाया जा रहा था।किसानों द्वारा क़ानूनों के विरोध में की जा रही पंचायतों में उमड़ रही भीड़ को देखने से लगता है कि अब बहुत देर हो चुकी हैं ख़ैर यह तो अब आगे चलकर पता चलेगा कि मोदी की भाजपा व सरकार की रणनीति कामयाब होंगी या आंदोलनकारियों की रणनीति।धार्मिक धुर्वीकरण कर सरकार बनाने वाली मोदी की भाजपा इस पूरे आंदोलन को लेकर इस ग़लतफ़हमी में रही कि जिस तरह CAA,NPR व संभावित NRC के विरोध को ठंडा करने में कामयाबी हासिल की थी उसी तरह कृषि क़ानूनों के विरोध को निपटा लेंगे लेकिन मोदी सरकार की यह भूल ही उसको भारी पड़ती दिख रही है क्योंकि उस आंदोलन को मोदी सरकार ने हिन्दू मुसलमान कर दिया था जबकि वह भी ग़लत तरीक़े से बनाए गए क़ानून का विरोध था लेकिन इस काम म