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कोरोना महामारी से मीडिया जगत भी अछूता नही है

कोरोना महामारी से मीडिया जगत भी अछूता नही है

14-Jul-2021

ठाकुर राम बंजारे 
कोरोना महामारी से मीडिया जगत भी अछूता नही है छोटे छोटे  पत्र -पत्रिका न्यूज़ पोर्टल और उसमें काम करने वालों की हालत  इस कोरोना संकट से  खराब स्थिति में  है और दिन ब दिन और खराब होने की संभावना दिखाई दे रही है क्योकि यही एक बिरादरी ऐसी है जो अपने हालात कहीं बयाँ नहीं कर सकती और सभी के निशाने पर रहती हैं ?  बड़े न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पेपर अपने बहुत से कर्मचारियों की छटनी कर दे रहे है और कई पत्रकार घर बैठ गए है।  क्योकि कोरोना के खतरे को देखते हुए ग्राउंड रिपोर्टिंग नही हो रही हैं खास कर के बंगाल चुनाव के बाद!
वैसे  कहने को लोकतंत्र का चौथा स्तंभों में से एक कहा जाता हैं  ,लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षित भी इसी से जुड़े  वर्ग के लोग रहते है  क्योकि इस बिरादरी पर भरोसा बहुत कम किया जाता है अब वो समय नही रह गया जब मीडिया और पत्रकार सम्मान के बा इस माने जाते थे यहाँ 
मेन स्ट्रीम कहा जाने वाला गोदी मीडिया तो मजे कर रहा है बाकी सब का हाल बे हाल है क्योकि तख्त पर बैठे सत्ताधिशो और अधिकारियों
को तो जैसे मौका मिल गया है इस कोरोना काल में कोई किसी से मिलना नही चाहता है क्योकि शोसल डिस्टनसिंग की दूरी का नियम  मारे दे रही हैं और सरकार कोरोना का हवाला देकर विज्ञापन नही देना चाहती है  और अगर देती भी है तो खैरात समझ कर देती है आखिर मुसीबत तो छोटे स्तर के पत्रकार और मीडिया झेल रहे है कोई इनका सुनने वाला नही है।
इस तराह से अगर हालात रहे तो छोटे पत्रकार और मीडिया पर इसका बुरा असर पड़   सकता  है और लोकतंत्र की आवाज उठाने वाले दब  कर रह जाएंगे  ?  

 


बिलासपुर की बेटी सीमा ‘एक रुपया मुहिम’ से गरीब और जरूरतमंदों के जीवन में ला रही हैं बदलाव

बिलासपुर की बेटी सीमा ‘एक रुपया मुहिम’ से गरीब और जरूरतमंदों के जीवन में ला रही हैं बदलाव

23-Jun-2021


*सिर्फ एक रुपया काफी हैं ज़िंदगी बदलने के लिए… लाखों के तो सिर्फ बहाने मिलते हैं*  सीमा वर्मा 

*जानिये कैसे बिलासपुर की बेटी सीमा ‘एक रुपया मुहिम’ से गरीब और जरूरतमंदों के जीवन में ला रही हैं बदलाव*

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   छत्तीसगढ़   सीमा वर्मा बिलासपुर शहर के कौश्लेंद्र राव कॉलेज में एलएलबी अंतिम वर्ष की छात्रा है। सीमा पिछले 5 सालों में 13 हज़ार से अधिक स्कूली बच्चों के लिए स्टेशनरी सामग्री उपलब्ध करवा चुकी हैं और 34 स्कूली बच्चों की पढ़ाई का लगातार खर्च उठा रही है जब तक बच्चे 12वी तक कि शिक्षा नहीं पुरी कर लेते, इस समय सीमा 50 बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रही हैं।

मूलतः छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की रहने वाली सीमा अपनी पढ़ाई के साथ एक रूपिया मुहिम भी चलाती है। इस मुहिम के ज़रिए सीमा जरूरतमंद और गरीब बच्चों की मदद करती है।

*“एक रुपिया मुहीम” के पीछे की कहानी*

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सीमा “एक रुपिया मुहीम” की शुरुआत को लेकर बताती हैं कि उसके साथ पढ़ने वाली सुनीता यादव एक दिव्यांग छात्रा है। वह ट्राईसिकल की मदद से कॉलेज आती थी। सीमा की इच्छा थी कि वह उसे इलेक्ट्रॉनिक ट्राईसिकल दिलवाए। उसने इस विषय पर अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से बात की। उनका जवाब आया- एक हफ्ते बाद आना। इसके बाद सीमा ने सोचा इसके बारे में बाजार में भी पता कर लिया जाए। सीमा बताती हैं कि उसके दिमाग में पहले से ही यह बात चल रही थी कि अपनी सहेली उसे कैसे भी इलेक्ट्रॉनिक ट्राईसिकल लाना है, फिर चाहे इसके लिए उसे कॉलेज के छात्रों के बीच क्यों न चंदा करना पड़े।

*बाजार ने किया निराश*

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सीमा अपने कॉलेज से ट्राईसिकल के बार में पता करने के लिए निकली। वह शहर के साईकिल दूकान गई तो मालूम पड़ा कि यह ट्राईसिकल मेडिकल काम्प्लेक्स में मिलेगी। जब सीमा मेडिकल काम्प्लेक्स पहुंची तो पता चला कि ट्राईसिकल यहाँ भी नहीं, फिर सीमा ने मेडिकल शॉप वाले से ही पूछा कि ये कहाँ मिलेगा।

इसके बाद सीमा मेडिकल शॉप संचालक के बताये हुए पते पर पहुंची और जब ट्राईसिकल का दाम पूछा तो पता चला कि उसकी कीमत 35 हज़ार रूपये है और इसे दिल्ली से आर्डर पर मंगवाना पड़ता है। सीमा इस वक्त को याद करते हुए बताती है कि यह क्षण उनके लिए काफी कठिन था, लेकिन किसी भी हाल में वह अपनी सहेली सुनीता के लिए ट्राईसिकल लेने ही वाली थी।

*पंचर वाले ने दिखाया रास्ता*

सीमा इसके बाद वहां से निकलकर एक पंचर वाले की दुकान पर जा पहुंची और पंचर बनाने वाले से इस विषय में जानकारी मांगी तो उसने पूछा कितना पढ़ी लिखी हो ? सीमा ने जवाब दिया – बीएससी फाइनल ईयर में !

पंचर वाले ने कहा मैडम ! ये सरकार फ्री ऑफ़ कॉस्ट देती है। सीमा ने इसके प्रोसेस के बारे में पूछा ! फिर उसने बताया कि उसे जिला पुर्नवास केंद्र जाना चाहिए, जहाँ आपको डाक्यूमेंट्स समिट करने होंगे, जिसमे 6 महिना या साल भर तक का वक़्त लग सकता है।

तब सीमा ने उससे पूछा कि इसे जल्दी पाने का कोई और रास्ता है क्या ? उसने सीमा कलेक्टर या कमिश्नर के पास जाने का सुझाव दिया। उसने यह भी बताया कि कमिश्नर साहब काफी नर्म दिल के और भावुक है। वह आपकी जल्दी मदद करेंगे।

*प्रशासन से मिली मदद*

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सीमा ने बताया इसके बाद वह अपने एक दोस्त के साथ कमिश्नर ऑफिस गई। जहाँ उसने कमिश्नर समेत अन्य अधिकारियों को सुनीता के बारे में बताया। उसने कमिश्नर ने कहा कि सुनीता उसकी क्लासमेट थी और उसके दिव्यांग होना उसके लिए अभिशाप बना हुआ है। जिसके चलते उसे एक साल ब्रेक भी लगा है।

सीमा ने बताया कि कमिश्नर ऑफिस में सीमा कि बात सुनने के बाद वहां के अधिकारियों ने डॉक्यूमेंट जमा करने के लिए कहा। इसके बाद उसने सभी डॉक्यूमेंट जमकर दिए। दस्तावेज जमा करने के बाद दूसरे दिन एडिशनल कमिश्नर ने सीमा को कॉल कर कहा अपनी फ्रेंड को डाक्यूमेंट्स में साइन करने के लिए ऑफिस ले आओ। दस्तावेजों में हस्ताक्षर कराने के बाद तत्कालीन कमिश्नर सोनमणि बोरा के हाथों से इलेक्ट्रॉनिक ट्राईसिकल मिल गई।

*पूरे वाकये से ये सीखा*

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सीमा बताती है की इस घटना से उसने अपने जीवन में तीन बाते सीखी – सीमा कहती है कि वह औरों कि तरह अपने घर में बैठी होती तो उसकी सहेली को ट्राईसिकल नहीं मिल पाती। यदि पंचर वाले ने उसे गाइड नहीं किया होता तो उसे मालूम ही नहीं चलता सरकार कि ओर से दिव्यांगजनों के लिए योजना चलती है। हमारे और सरकार के बीच कितनी ज्यादा कम्युनिकेशन गैप है।

*बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना से मिला ‘एक रुपया मुहिम’ का आईडिया*

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सीमा ने बताया कि जिस प्रकार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय लोगों से एक-एक पैसा इक्कठा कर बनवाया गया था, इसी कांसेप्ट में साथ मैं लोगों से एक-एक रूपये मांग कर इक्कठा करती थी जो जरुरतमंदों कि जरूत में काम आती है।

सीमा ने बताया कि जब उसने पैसा इक्कठा करने की शुरू कि तो उसने लगभग ₹2,34,000 तक इक्कठा किया। इन रूपये से  हम बच्चों की फीस भरते जा रहे थे , स्टार्टिंग में तो मैंने खुद लोगों से बच्चों के लिए मिले पैसों से उनकी फीस भरी और धीरे-धीरे लोग खुद मेरे बच्चों से जुड़ने लगे। जैसे बिलासपुर के तत्कालीन SP मयंक श्रीवास्तव ने 6 बच्चों को गोद ले लिया था। इसके बाद  स्पेशल डीजीपी छतीसगढ़ आर.के.  विज ने इस वर्ष 12 वी की छात्रा की साल भर की फीस सीमा के माध्यम से जमा की, आईपीएस और बिलासपुर रेंज के आईजी रत्नलाल डांगी ने भी सीमा को आर्थिक सहायता दी और उसके समाज सेवा के इस काम सराहा, सीमा आईपीएस डांगी और अपनी माँ को अपने जीवन की प्रेरणा भी मानती है।

सीमा कहती हैं – यह कार्य युवाओं को मोटिवेट करने के लिए भी करती हैं। बच्चों को गुड टच, बैड टच, पॉक्सो एक्ट,मौलिक अधिकारों, बाल विवाह,राइट टु एजूकेशन, बाल मजदूरी,आदि की जानकारी भी सीमा देती हैं। सीमा सभी लोगो से अपील करती हैं आप अपने फील्ड से रिलेटेड जानकारी अपने घर वालो को, आस पास वालों को देकर उन्हें जागरूक कर सकते है। जागरुकता से ही अपराध में कमी आएगी।

लॉकडाउन में बच्चों को अवसाद मुक्त रखने  के लिए कर रही सराहनीय कार्य-

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आज इस घातक बीमारी की  वजह से देश में पिछले लगभग दो वर्षो से स्कूल कॉलेज बंद हैं बड़े बच्चो की परीक्षाएं भी ऑनलाइन पद्धति से ली जा रही , छोटे बच्चो को प्रमोट कर दिया जा रहा, यह योजना बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार के द्वारा चलाई जा रही, पर जो बच्चे स्कूल जाते थे पढ़ाई करते ,खेल कूद,अन्य एक्टिविटी में भाग लेते थे,अपने दोस्तो के साथ स्कूल में समय व्यतीत करते थे आज कहीं ना कहीं इन दिनों बच्चों पर लॉकडाउन का बुरा असर हो रहा,बच्चें अवसाद ग्रस्त हो रहे,बच्चों के शारीरिक मानसिक विकास पर गहरा प्रभाव पड़ रहा,इस लॉकडाउन कि वजह से बच्चे शिक्षा से दूर होते जा रहे, इन सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक रूपया मुहिम की संचालिका सीमा वर्मा बच्चों के लिए लगातार कार्यरत है, बच्चो को फ्री टयूशन क्लास के साथ अलग - अलग एक्टिविटी भी करवाती रही है , जैसे- फ्री योग क्लास,एनुअल फंक्शन के तर्ज पर- सपोर्ट एक्टिविटी,डांस प्रतियगिता, ड्रॉइंग प्रतियोगिता के साथ अलग अलग एक्टिविटी करवाती रही है,बच्चे भी उत्साह पूर्वक भाग लेते रहे,इस बार पुनः लॉकडाउन की स्थिति निर्मित हुई तो  एक बार फिर बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए सीमा वर्मा ने बच्चों को लगातार  उत्साहित करने के लिए ड्रॉइंग प्रतियोगिता,आर्ट एंड क्राफ्ट प्रतियोगिता का आयोजन किया,जिसमे बच्चों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया,किसी ने संदेश देने वाले ड्रॉइंग बनाए,तो किसी ने मिट्टी से खूबसूरत घर,कुआ, शिवलिंग,कछुआ,बतख,किचन सेट,बैटरी से चलने वाली लैंप,पॉट के साथ सुंदर सुंदर क्राफ्ट बनाए, सीमा वर्मा ने बच्चों को  स्टेशनरी का समान कॉपी,पेन,पेंसिल,स्केल,रबर,कटर,के साथ चॉकलेट गिफ्ट में दिया
सीमा वर्मा लगातार बच्चो को कोरोनावायरस से बचने के उपाय भी लगातार बताती हैं जिसमे बच्चों को हाथ धोने के तरीके,मास्क लगाने , कोरोनागाइडलाइन का पालन करने के बारे में जागरूकता कार्यक्रम भी करती रहती है

सीमा के काम को काफी सराहना मिल रही है और अब तक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के दो दर्जन से ज्यादा पुरस्कार उन्होंने मिलें हैं। 


एक नई जीवनशैली को आकार दें, अटके नहीं

एक नई जीवनशैली को आकार दें, अटके नहीं

22-Jun-2021

एक नई जीवनशैली को आकार दें, अटके नहीं
- ललित गर्ग -

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कोरोना महामारी ने हमारी जीवनशैली की दिशाओं में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है। कोरोना वायरस के कारण हमारी आदतें और हमारी दिनचर्या काफी हद तक बदल गई है, जिसे हम हर दिन अनुभव भी कर रहे हैं और जी भी रहे हैं। इतिहास की कई बड़ी आपदाओं के बाद सामाजिक, आर्थिक समझ और जीवनशैली में व्यापक बदलाव देखे गए हैं लेकिन कोरोना संकट के दौर ने तो सबकुछ ही बदल दिया है, हमारे खानपान और जीवन के तौर-तरीकों से लेकर हमारी कार्यशैली एवं सोचने की दिशाएं सब कुछ बदल गयी है। आने वाले समय में इन बदलावों का बड़ा असर पड़ने वाला है। हो सकता है कि इस दौरान हमारी बदली आदतें हमारे जीवन का स्थाई हिस्सा बन जाए।
नयी बनती दुनिया में एक नया आर्थिक नजरिया पनपेगा। अब तक पूंजीवादी नजरिया उद्यमिता की वकालत करता रहा है यानी वह व्यक्ति को हीरो बनाता रहा है। कभी यह नहीं बताया गया कि हर सफलता के पीछे कई लोगों की मेहनत और सहयोग होता है, कोई अकेला कुछ नहीं करता। कोरोना वायरस अब यह समझ पैदा करेगा कि हर काम की कीमत समझी जाए। ऐसे कई कामों की जो अब तक गरीब लोग या औरतें कर रही थीं, अब उनके श्रम का मूल्यांकन करना होगा। अब पुरुषों की मानसिकता बदलने की उम्मीद भी की जा सकती है, हालांकि कितनी बदलेगी और वो महिलाओं के काम की कीमत कितनी समझ पाएंगे, यह वक्त बताएगा। कुल मिलाकर, साथ रहने और एक दूसरे के काम का सम्मान करने की भावना विकसित होने की उम्मीद जगी है। दुनिया में भले ही बाहर जाकर रेस्टॉरेंट में खाने का चलन पूरी तरह खत्म न हो लेकिन सीमित हो ही जाएगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि डिजिटल मेन्यू, रेस्तरां के किचन की लाइव स्ट्रीमिंग और वेटरों के चेहरों पर मास्क जैसे कई बदलाव दिखाई देने वाले हैं। शिक्षा में व्यापक बदलाव होंगे। दुनिया भर में लॉकडाउन के चलते स्कूलों के बंद करने पर जोर हर जगह दिखा। टीचरों और छात्रों के बीच ऑनलाइन संपर्क बढ़ा।
शासन-प्रशासन एवं उनकी नीतियों में भी व्यापक बदलाव होंगे। उम्मीद की जा रही है कि भारत रक्षा पर जितना खर्च करता है, अब स्वास्थ्य पर भी करने लगेगा। ऐसा बहुत कुछ होगा, जो आमूलचूल बदलाव लगेगा क्योंकि अब सबसे बड़ा दुश्मन महामारी को समझने की समझ बनेगी। सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को विकसित किया जाएगा क्योंकि प्राइवेट सेक्टर इस महामारी के दौर में नाकाफी साबित हुआ है। वहीं देश में, डॉक्टरों और नर्सों की संख्या बढ़ाने पर जोर रहेगा। दवाओं और जरूरी मेडिकल उपकरणों का उत्पादन देश में करने जैसे कई बदलावों की उम्मीद की जा रही है क्योंकि अब संकट के समय में दूसरे देशों पर निर्भर रहने की आदत छोड़ना होगी, क्योंकि इस आदत ने हमें गहरी चोंटें दी है।
कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन के दौरान लोगों के पहनावे में भी बड़े बदलाव देखने को मिले। लोग लग्जरी कपड़ों के बजाय पाजामा जैसे जरूरत के कुछ ही सेट कपड़ों में कई दिन गुजारने के आदी हो रहे हैं। विदेश यात्राओं, पर्यटन, पार्टी और आउटिंग जैसे बहुत से बदलाव समाज देखेगा। शादी-विवाह जैसे सामाजिक रीति-रिवाजों एवं पर्व संस्कृति में भी बदलाव आयेगा।  
सेंटर फॉर एशिया पैसिफिक एविएशन के मुताबिक मई 2020 के अंत तक दुनिया की ज्यादातर एयरलाइन्स दीवालिया हो जाएंगी। अगर आप कोविड 19 के बाद दफ्तर जाएंगे तो बहुत कुछ बदला हुआ होगा। बिल्डिंगों के डिजाइन से लेकर बैठक व्यवस्था और व्यवहार तक बहुत कुछ। इन बड़े बदलावों के बावजूद सभी चाहते हैं कि जीवन पूर्ववत संचालित हो। कोरोना की आक्रामकता से उपरत होते हुए एक ऐसी मानवीय संरचना की आवश्यकता है जहां इंसान और उसकी इंसानियत दोनों बरकरार रहे। इसके लिये मनुष्य को भाग्य के भरोसे न रहकर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। इंसान का अपना प्रिय जीवन-संगीत भले टूट रहा है। वह अपने से, अपने लोगों से और प्रकृति से अलग हो रहा है। उसका निजी एकांत खो रहा है और रात का खामोश अंधेरा भी। इलियट के शब्दों में, ‘‘कहां है वह जीवन जिसे हमने जीने में ही खो दिया।’’ फिर भी हमें उस जीवन को पाना है जहां इंसान आज भी अपनी पूरी ताकत, अभेद्य जिजीविषा और अथाह गरिमा और सतत पुरुषार्थ के साथ जिंदा रह सके। इसी जिजीविषा एवं पुरुषार्थ के बल पर वह चांद और मंगल ग्रह की यात्राएं करता रहा है। उसने महाद्वीपों के बीच की दूरी को खत्म किया है। कहीं न कहीं इंसान के पुरुषार्थ की दिशा दिग्भ्रमित न हो है कि मनुष्य के सामने हर समय अस्तित्व का संघर्ष कायम बना रहे हंै, इसके लिये प्रयास करना होगा। हालांकि इस संघर्ष से ही उसको नयी ताकत, नया विश्वास और नयी ऊर्जा मिलेगी, जो जीवन के अंधेरों को उजालों में बदलेगी।
 इंसान को स्वार्थी नहीं परोपकारी भी बनना होगा। उसे क्रूरता छोड़कर दयालु बनना होगा। लोभी व लालची बनने के नुकसान देखें हैं अब उदार व अपरिग्रह बनकर जीवन की दिशाओं को नियोजित करना होगा। कोरोना महामारी में भी उसकी चतुराई, उसकी बुद्धिमता, उसके श्रम और मनोबल ने निराशाओं को घनघोर किया है। इस सबके बावजूद जरूरत है कि इंसान का पुरुषार्थ उन दिशाओं में अग्रसर हो जहां से उत्पन्न सद्गुणों से इंसान का मानवीय चेहरा दमकने लगे। इंसान के सम्मुख खड़ी शिक्षा, चिकित्सा, जीने की मूलभूत सुविधाओं के अभाव की विभीषिका समाप्त हो। वह जीवन के उच्चतर मूल्यों की ओर अग्रसर हो।
मनुष्य को अपना प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए। किसी काम में सफलता मिलेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। भविष्य में क्या होने वाला है, सब अनिश्चित है। यदि कुछ निश्चित है तो वह है व्यक्ति का अपना पुरुषार्थ। यह आवश्यक नहीं है कि सफलता प्रथम प्रयास में ही मिल जाए। कोरोना से पीड़ित मानवता को उस शिशु की भांति अभी चलना सीखना होगा। चलने के प्रयास में वह बार-बार गिरता है किंतु उसका साहस कम नहीं होता। गिरने के बावजूद भी प्रसन्नता और उमंग उसके चेहरे की शोभा को बढ़ाती ही है। जरा विचार करें उस नन्हें से बीज के बारे में जो अपने अंदर विशाल वृक्ष उत्पन्न करने की क्षमता समेटे हुए है। आज जो विशाल वृक्ष दूर-दूर तक अपनी शाखाएं फैलाएं खड़ा है, जरा सोचो कितने संघर्षों, झंझावतों को सहन करने के बाद इस स्थिति में पहुंचा है। सर्वस्व समर्पण और अपार प्रसव पीड़ा सहन करने के बाद ही कोई नारी मातृत्व का गौरव प्राप्त करती है। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, उसको पाने की तीव्र उत्कष्ठा एवं अदम्य उत्साह हो तो अकेला व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है। विश्वकवि रविंद्रनाथ टैगोर का यह कथन कितना सटीक है कि अस्त होने के पूर्व सूर्य ने पूछा कि मेरे अस्त हो जाने के बाद दुनिया को प्रकाशित करने का काम कौन करेगा। तब एक छोटा-सा दीपक सामने आया और कहा प्रभु! जितना मुझसे हो सकेगा उतना प्रकाश करने का काम मैं करूंगा। हम देखते हैं कि आखिरी बूंद तक दीपक अपना प्रकाश फैलाता रहता है। जितना हम कर सकते हैं उतना करते चले। आगे का मार्ग प्रशस्त होता चला जाएगा। किसी ने कितना सुंदर कहा हैµजितना तुम कर सकते हो उतना करो, फिर जो तुम नहीं कर सको, उसे परमात्मा करेगा।
जीवन की नई शुरुआत हो या उसे आगे बढ़ाने का मन, या फिर नये रिश्तों एवं जीविका के साधनों की ओर कदम बढ़ाने की चेष्टा, बहुत आसान नहीं होता। पर, आसान तो कुछ भी नहीं होता। बड़ी सफलताओं के लिये बड़ी कोशिश करनी होती है। फिर दुख, पीड़ाएं कितनी भी बड़ी हो, हम उबर सकते हैं, क्योंकि हम अपनी सोच एवं संकल्प से ज्यादा मजबूत होते हैं। जो व्यक्ति आपत्ति-विपत्ति से घबराता नहीं, प्रतिकूलता के सामने झुकता नहीं और दुःख को भी प्रगति की सीढ़ी बना लेता है, उसकी सफलता निश्चित है। ऐसे धीर पुरुष के साहस को देखकर असफलता घुटने टेक देती है। इसीलिए तो इतरा पुत्र महीदास एतरेय ने कहा हैµ‘‘चरैवेति-चरैवेति’’ अर्थात् चलते रहो, चलते रहो, निरंतर श्रमशील रहो। किसी महापुरुष ने कितना सुंदर कहा हैµअंधकार की निंदा करने की अपेक्षा एक छोटी-सी मोमबत्ती, एक छोटा-सा दिया जलाना कहीं ज्यादा अच्छा होता है। प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92

 

 


मां पंख देती हैं तो पिता उड़ना सिखाते हैं

मां पंख देती हैं तो पिता उड़ना सिखाते हैं

19-Jun-2021

अंतर्राष्ट्रीय पिता दिवस - 20 जून 2021
- ललित गर्ग-

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अंतर्राष्ट्रीय पिता दिवस यानी फादर्स डे जून माह के तीसरे रविवार को मनाया जाता है, इस साल 20 जून 2021 को भारत समेत विश्वभर में मनाया जायेगा। पिताओं के सम्मान में व्यापक रूप से मनाया जाने वाला यह एक खास पर्व है, अवसर है क्योंकि पिता रिश्तों के शिखर होते हैं। हर पिता अपनी संतान को हार न मानने और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देते हुए हौसला बढ़ाते हैं। पिता से अच्छा मार्गदर्शक, हितैषी, गुरु कोई हो ही नहीं सकता। हर बच्चा अपने पिता से ही सारे गुण सीखता है जो उसे जीवनभर परिस्थितियों के अनुसार ढलने और लड़ने के काम आते हैं। उनके पास सदैव हमें देने के लिए ज्ञान का अमूल्य भंडार होता है, जो कभी खत्म नहीं होता। उनकी कुछ प्रमुख विशेषताएं उन्हें दुनिया में सबसे खास बनाती है जैसे -धीरज, संयम, अनुशासन, त्याग, बड़ा दिल, प्रेम, स्नेह एवं गंभीरता।
अंतर्राष्ट्रीय पिता दिवस की शुरुआत बीसवीं सदी के प्रारंभ में पिताधर्म, पिता के अवदानों तथा पुरुषों द्वारा अपनी संतान की परवरिश का सम्मान करने के लिये एक उत्सव के रूप में हुई। यह हमारे पूर्वजों की स्मृति और उनके सम्मान में भी मनाया जाता है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन और विविध परंपराओं के कारण उत्साह एवं उमंग से यह दिवस मनाया जाता है। हिन्दू परंपरा के मुताबिक पितृ दिवस भाद्रपद महीने की सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है।
मानवीय रिश्तों में दुनिया में पिता और संतान का रिश्ता अनुपम है, संवेदनाभरा है। कोई पिता कहता है, कोई पापा, अब्बा, बाबा, तो कोई बाबूजी, बाऊजी, डैडी कहता है। इस रिश्ते के कितने ही नाम हैं पर भाव सब का एक है। सबमें एक-सा प्यार, सबमें एक-सा समर्पण। ऋग्वेद की ऋचा में पिता को सभी भलाइयों और दया का प्रतीत बताया गया है। श्रीराम ने अपनी माता से पिता की महिमा बताते हुए कहा है कि पिता का स्थान देवताओं से भी श्रेष्ठ है और उनकी आज्ञा देवाज्ञा है। पिता ही पुत्रों को प्रारम्भिक शिक्षा देता है। जब वह स्वयं किसी विषय का पारंगत विद्वान होता था तो उस विषय की विशिष्ट शिक्षा भी वही देता था। अरूणेय स्वयं बड़ा विद्वान था, अतएव उसने अपने पुत्र श्वेतकेतु को भी विद्वान बना दिया। पिता का स्थान इतना आदरणीय है कि इसे अति गुरू की संज्ञा दी गयी है। इसे माता और गुरु की कोटि में रखा गया है। मनुस्मृति में भी कहा गया है कि ‘पिता मूतिर्रूप्रजापतयते अर्थात् पिता अपनी संतान के लिए आदर्श होता है। तैतिरीय उपनिषद् में समावर्तन समारोह के अवसर पर आचार्य स्नातकों को उपदेश देते हुए कहते हैं ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’ अर्थात् पिता और माता को देवता मानो।
पिता हर संतान के लिए एक प्रेरणा हैं, एक प्रकाश हैं और संवेदनाओं के पुंज हैं। पिता गंगोत्री की वह बूंद है जो गंगा सागर तक एक-एक तट, एक-एक घाट को पवित्र करने के लिए धोता रहता है। पिता वह आग है जो घड़े को पकाता है, लेकिन जलाता नहीं जरा भी। वह ऐसी चिंगारी है जो जरूरत के वक्त बेटे को शोले में तब्दील करता है। वह ऐसा सूरज है, जो सुबह पक्षियों के कलरव के साथ धरती पर हलचल शुरू करता है, दोपहर में तपता है और शाम को धीरे से चांद को लिए रास्ता छोड़ देता है। पिता वह पूनम का चांद है जो बच्चे के बचपने में रहता है, तो धीरे-धीरे घटता हुआ क्रमशः अमावस का हो जाता है। पिता समंदर के जैसा भी है, जिसकी सतह पर असंख्य लहरें खेलती हैं, तो जिसकी गहराई में खामोशी ही खामोशी है। वह चखने में भले खारा लगे, लेकिन जब बारिश बन खेतों में आता है तो मीठे से मीठा हो जाता है ।
माता पिता ही है जो हमें सच्चे दिल से प्यार करते हैं बाकी इस दुनिया में सब नाते रिश्तेदार झुठे होते हैं। पता नहीं क्यों हमे हमारे पिता इतना प्यार करते हैं, दुनिया के बैंक खाली हो जाते हैं मगर पिता की जेब हमेशा हमारे लिए भरी रहती हैं। पता नहीं जरूरत के समय न होते हुए उनके पास अपने बच्चों के लिये कहां से पैसे आ जाते हैं। भगवान के रूप में माता-पिता हमें एक सौगात हैं जिनकी हमें सेवा करनी चाहिए और कभी उनका दिल नहीं तोडना चाहिए। एक बच्चे को बड़ा और सभ्य बनाने में उसके पिता का योगदान कम करके नहीं आंका जा सकता। मां का रिश्ता सबसे गहरा एवं पवित्र माना गया है, लेकिन बच्चे को जब कोई खरोंच लग जाती है तो जितना दर्द एक मां महसूस करती है, वही दर्द एक पिता भी महसूस करते हैं। पिता कठोर इसलिये होते हैं ताकि बेटा उन्हें देख कर जीवन की समस्याओं से लड़ने का पाठ सीखे, सख्त एवं निडर बनकर जिंदगी की तकलीफों का सामना करने में सक्षम हो। माँ ममता का सागर है पर पिता उसका किनारा है। माँ से ही बनता घर है पर पिता घर का सहारा है। माँ से स्वर्ग है माँ से बैकुंठ, माँ से ही चारों धाम है पर इन सब का द्वार तो पिता ही है। उन्हीं पिता के सम्मान में पितृ दिवस मनाया जाता है। आधुनिक समाज में पिता-पुत्र के संबंधों की संस्कृति को जीवंत बनाने की अपेक्षा है।
बचपन में जब कोई बच्चा चलना सीखता है तो सबसे पहले अपने पिता की उंगली थामता है। नन्हा सा बच्चा पिता की उँगली थामे और उसकी बाँहों में रहकर बहुत सुकून एवं शक्ति पाता है। एक बालक के निर्माण में पिता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बाहर से सख्त और कठोर दिल के दिखने वाले पिता हमारे दोस्त और कोच दोनों होते हैं। उनकी सलाह से हमेशा आगे बढ़ने की सीख मिलती है। जैसे एक शिल्पकार प्रतिमा बनाने के लिए जैसे पत्थर को कहीं काटता है, कहीं छांटता है, कहीं तल को चिकना करता है, कहीं तराशता है तथा कहीं आवृत को अनावृत करता है, वैसे ही पिता अपने संतान के जीवन को संवारते है, मेरे पूज्य पिताश्री रामस्वरूपजी गर्ग ने भी मेरे व्यक्तित्व को तराशकर उसे महनीय और सुघड़ रूप प्रदान किया। मां ने पंख दिये तो पिताजी ने उड़ना सिखाया। उन्होंने अपनी हैसियत से अधिक खुशियां दी। जितनी उन्होंने खुशियां दी, हमारी इच्छाओं को पूरा किया, उतना ही वे हमारे जीवन निर्माण के लिये सर्तक रहे। आज वे देह से विदेह होकर भी हर पल मेरे साथ प्रेरणा के रूप में, शक्ति के रूप में, संस्कार के रूप में रहते हैं। हर पिता अपने पुत्र की निषेधात्मक और दुष्प्रवृत्तियों को समाप्त करके नया जीवन प्रदान करता है। पिता की प्रेरणाएं पुत्र को मानसिक प्रसन्नता और परम शांति देती है। जैसे औषधि दुख, दर्द और पीड़ा का हरण करती है, वैसे ही पिता शिव शंकर की भांति पुत्र के सारे अवसाद और दुखों का हरण करते हैं।
विश्व के अधिकतर देशों की संस्कृति में माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा एवं प्रगाढ़ माना गया है। भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है। लेकिन एक विडम्बना है कि हिन्दी कविताओं में माँ के ऊपर जितना लिखा गया है उतना पिता के ऊपर नहीं। जबकि उनका योगदान कम नहीं है। इसीलिये पिता के चरणों में भी स्वर्ग एवं सर्व कहा गया है। क्योंकि वे हर क्षण परिवार एवं संतान के लिए छाया की भांति एक बड़ा सहारा बनते हैं और उनका रक्षा कवच परिवारजनों के जीवन को अनेक संकटों से बचाता है। इस अहसास को जीवंत करके ही हमें पिता-दिवस को मनाने की सार्थकता पा सकेंगे। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
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बढ़ता मरुस्थल गंभीर पर्यावरणीय संकट

बढ़ता मरुस्थल गंभीर पर्यावरणीय संकट

17-Jun-2021

अन्तर्राष्ट्रीय रेगिस्तान एवं सूखा रोकथाम दिवस-17 जून, 2021
- ललित गर्ग-

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विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस (डब्ल्यूडीसीडी) वर्ष 1995 से प्रतिवर्ष 17 जून को मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग से उपजाऊ भूमि को मरुस्थल होने से बचाना, बंजर और सूखे के प्रभाव का मुकाबला करना और दसके लिये  जन जागरुकता को बढ़ावा देना है। वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने एक प्रस्ताव में बंजर और सूखे से जुड़े मुद्दे पर जन जागृति का माहौल निर्मित करने के लिये विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम और सूखा दिवस की घोषणा की। बढ़ते मरुस्थल के प्रति सचेत होना इसलिये जरूरी है कि दुनिया हर साल 24 अरब टन उपजाऊ भूमि खो देती है। भूमि की गुणवत्ता खराब होने से राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद में हर साल आठ प्रतिशत तक की गिरावट आने एवं भूमि क्षरण और उसके दुष्प्रभावों से मानवता पर मंडराते जलवायु संकट के और गहराने की आशंकाओं को देखते हुए इस दिवस की उपयोगिता एवं सार्थकता है। मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े खतरे हैं जिनसे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, प्रभावित हो रहे हैं।

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मरुस्थलीकरण एक तरह से भूमि क्षरण का वह प्रकार है, जब शुष्क भूमि क्षेत्र निरंतर बंजर होता है और नम भूमि भी कम हो जाती है। साथ ही साथ, वन्य जीव व वनस्पति भी खत्म होती जाती है। इसकी कई वजह होती हैं, इसमें जलवायु परिवर्तन और इंसानी गतिविधियां प्रमुख हैं। इसे रेगिस्तान भी कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2025 तक दुनिया के दो-तिहाई लोग जल संकट की परिस्थितियों में रहने को मजबूर होंगे। उन्हें कुछ ऐसे दिनों का भी सामना करना पड़ेगा जब जल की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर होगा। ऐसे में मरुस्थलीकरण के परिणामस्वरूप विस्थापन बढ़ने की संभावना है और 2045 तक करीब 13 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है। विश्व में जमीन का मरुस्थल में परिवर्तन होना गंभीर समस्या एवं चिन्ता का विषय है। भारत में भी यह चिंता लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह यह है कि भारत की करीब 30 फीसदी जमीन मरुस्थल में बदल चुकी है। इसमें से 82 प्रतिशत हिस्सा केवल आठ राज्यों राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी “स्टेट ऑफ एनवायरमेंट इन फिगर्स 2019” की रिपोर्ट के मुताबिक 2003-05 से 2011-13 के बीच भारत में मरुस्थलीकरण 18.7 लाख हेक्टेयर बढ़ चुका है। सूखा प्रभावित 78 में से 21 जिले ऐसे हैं, जिनका 50 फीसदी से अधिक क्षेत्र मरुस्थलीकरण में बदल चुका है।
इस आपदा से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन को रोकना ही काफी नहीं है। इसके लिए खेती में बदलाव करने होंगे, शाकाहार को बढ़ावा देना होगा और जमीन का इस्तेमाल सोच-समझकर करना होगा। ऊपजाऊ भूमि भी रेगिस्तान में तब्दील हो रही है। तकनीकी तौर पर मरुस्थल उस इलाके को कहते हैं, जहां पेड़ नहीं सिर्फ झाड़ियां उगती हैं। जिन इलाकों में यह भू-जल के खात्मे के चलते हो रहा है, वहां इसे मरुस्थलीकरण का नाम दिया गया है। लेकिन शहरों का दायरा बढ़ने के साथ सड़क, पुल, कारखानों और रेलवे लाइनों के निर्माण से खेतिहर जमीन का खात्मा और बची जमीन की उर्वरा शक्ति कम होना भू-क्षरण का दूसरा रूप है, जिस पर कोई बात ही नहीं होती। लेकिन मोदी की पहल से इस पर बात ही नहीं हो रही, बल्कि इस समस्या से निजात पाने की दिशा में सार्थक कदम भी उठाये जा रहे हैं।
रेगिस्तान या मरुस्थल एक बंजर, शुष्क क्षेत्र है, जहाँ वनस्पति नहीं के बराबर होती है, यहाँ केवल वही पौधे पनप सकते हैं, जिनमें जल संचय करने की अथवा धरती के बहुत नीचे से जल प्राप्त करने की अदभुत क्षमता हो। इस क्षेत्र में बेहद शुष्क व गर्म स्थिति किसी भी पैदावार के लिए उपयुक्त नहीं होती है। वास्तविक मरुस्थल में बालू की प्रचुरता पाई जाती है। मरुस्थल कई प्रकार के हैं जैसे पथरीले मरुस्थल में कंकड़-पत्थर से युक्त भूमि पाई जाती है। इन्हें अल्जीरिया में रेग तथा लीबिया में सेरिर के नाम से जाना जाता है। चट्टानी मरुस्थल में चट्टानी भूमि का हिस्सा अधिकाधिक होता है। इन्हें सहारा क्षेत्र में हमादा कहा जाता है।
राजस्थान प्रदेश में थार का रेगिस्तान दबे पांव अरावली पर्वतमाला की दीवार पार कर पूर्वी राजस्थान के जयपुर, अलवर और दौसा जिलों की ओर बढ़ रहा है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राजस्थान में चल रहे प्रोजेक्ट में ऐसे संकेत मिल रहे हैं। अब तक 3000 किमी लंबे रेगिस्तानी इलाकों को उत्तर प्रदेश, बिहार और प. बंगाल तक पसरने से अरावली पर्वतमाला रोकती है। कुछ वर्षो से लगातार वैध-अवैध खनन के चलते कई जगहों से इसका सफाया हो गया है। उन्हीं दरारों और अंतरालों के बीच से रेगिस्तान पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ चला है। यही स्थिति रही तो आगे यह हरियाणा, दिल्ली, यूपी तक पहुंच सकता है।
भारत में लगातार बढ़ रहे रेगिस्तान की गंभीर चिन्ताजनक स्थिति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जागरूक है और अपनी दूसरी पारी में अब प्रकृति- पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण-मुक्ति के साथ बढ़तेे रेगिस्तान को रोकने के लिये उल्लेखनीय कदम उठाये हैं। बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने एवं पर्यावरण की रक्षा को लेकर प्रधानमंत्री का संकल्प एक शुभ संकेत है, नये भारत के अभ्युदय का प्रतीक है। उम्मीद करें कि सरकार की नीतियों में जल, जंगल, जमीन एवं जीवन की उन्नत संभावनाएं और भी प्रखर रूप में झलकेगी और धरती के मरुस्थलीकरण के विस्तार होते जाने की स्थितियों पर काबू पाने में सफलता मिलेगी।
उपजाऊ जमीनों का मरुस्थल में बदलना निश्चय ही पूरी दुनिया के लिए भारी चिंता का विषय है। इसे अब एक धीमी प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाने लगा है। यह देखा गया है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है, भूमि को बंजर करता जा रहा है, जिससे मरुस्थलीकरण का विस्तार हो रहा है। अगर प्रकृति के साथ इस प्रकार से खिलवाड़ होता रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब हमें शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा। आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया जाए, जिसमें मुख्यतः धूप, खनिज, वनस्पति, हवा, पानी, वातावरण, भूमि तथा जानवर आदि शामिल हैं। इन संसाधनों का अंधाधुंध दुरुपयोग किया जा रहा है, जिसके कारण ये संसाधन धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर हैं। इस जटिल होती समस्या की ओर प्रधानमंत्री का चिन्तीत होना एवं कुछ सार्थक कदम उठाने के लिये पहल करना मरुस्थल को उपजाऊ भूमि में बदलने की नयी संभावनाओं को उजागर करता है।
बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन- ये सब देश के लिए सबसे बडे़ खतरे हैं और इन खतरों का अहसास करना एवं कराना ही मोदी का ध्येय है। प्रतिवर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। हर चीज की उपलब्धता कम हो रही है। आक्सीजन की कमी हो रही है, इंसानों के लिये आक्सीजन की उपयोगिता को हमने कोरोना महामारी की दूसरी लहर में देखा। प्रकृति में आक्सीजन की कमी का कारण हमारा पर्यावरण के प्रति उदासीन होना है। यह उदासीनता, हमारा सुविधावादी नजरिया एवं तथाकथित आधुनिक जीवनशैली पर्यावरण एवं प्रकृति के लिये एक गंभीर खतरा बन कर प्रस्तुत हो रहा हैं। वन क्षेत्र का लगातार खत्म होना भी इसकी एक बड़ी वजह है लेकिन सबसे बड़ी वजह है निर्माण क्षेत्र का अराजक व्यवहार। शहरीकरण की तेज प्रक्रिया में इधर खेतों में कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं। इन स्थितियों के प्रति सावधान होकर ही हम बढ़ते मरूस्थल को रोक पाएंगे।
प्रेषकः

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कोरोना के दूसरी लहर ने गैर-कोविड बीमारियों से पीड़ित भारतीयों का बुरा हाल कर दिया : विशेष रिपोर्ट

कोरोना के दूसरी लहर ने गैर-कोविड बीमारियों से पीड़ित भारतीयों का बुरा हाल कर दिया : विशेष रिपोर्ट

10-Jun-2021

कोरोना के दूसरी लहर ने गैर-कोविड बीमारियों से पीड़ित भारतीयों का बुरा हाल कर दिया : विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली, महामारी की दूसरी लहर ने पिछले दो महीनों में, पहले से ही बोझिल स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को पंगु बना दिया है। इसने कैंसर, हृदय और गुर्दे की बीमारियों जैसी गैर-कोविड पुरानी बीमारियों से पीड़ित भारतीयों को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह बात मंगलवार को कही।

पिछले दो महीनों के दौरान आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हुईं, क्योंकि कोविड के मामलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई, जिसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे के समाप्त होने के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं को कोविड देखभाल की ओर मोड़ दिया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, अन्य प्रमुख कारणों में कोविड के संक्रमण का डर, गलत सूचना और लॉकडाउन के कारण आवाजाही पर प्रतिबंध शामिल हैं।

एम्स, नई दिल्ली के सेंटर फॉर कम्युनिटी मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. हर्षल आर. साल्वे ने आईएएनएस को बताया कि कोविड-19 महामारी ने समुदाय से लेकर तृतीय स्तर तक स्वास्थ्य देखभाल के सभी स्तरों पर गैर-कोविड देखभाल को प्रभावित किया। कैंसर देखभाल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह प्रबंधन जैसी पुरानी बीमारियों की देखभाल की सेवाएं स्वास्थ्य सेवाओं को कोविड देखभाल में बदलने के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुईं। लोग महामारी के कारण लगे प्रतिबंधों और भय के कारण स्वास्थ्य सेवा लेने में सक्षम नहीं थे।

पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि दूसरी लहर में अधिकांश राज्य सरकारों ने प्रतिबंध और प्रोटोकॉल लगाए हैं, जिस कारण हृदय, गुर्दे, यकृत और फेफड़ों के रोगियों के नियमित उपचार और जांच से इनकार कर दिया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा, गैर-कोविड-19 रोगियों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सभी अस्पतालों में प्रमुख सर्जरी स्थगित कर दी गई है, क्योंकि डॉक्टर कोविड-19 रोगियों के इलाज में व्यस्त हैं .. हृदय रोगियों या गर्भवती महिलाओं के लिए अस्पताल में प्रवेश बहुत मुश्किल है।

जेपी अस्पताल, नोएडा के प्लास्टिक, सौंदर्य और पुनर्निर्माण सर्जरी विभाग के निदेशक डॉ. आशीष राय ने आईएएनएस को बताया कि कैंसर के मरीज खासकर बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा, कैंसर के बुजुर्ग मरीज अक्सर अस्पताल जाने में देरी करते हैं, यह सोचकर कि इससे उनके बच्चों को कोविड संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

फोर्टिस अस्पताल, गुरुग्राम में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. राहुल भार्गव ने कहा, कोरोनावायरस महामारी का खामियाजा कैंसर रोगियों को भुगतना पड़ा है। कुल मिलाकर, कैंसर से पीड़ित लोगों के लिए प्रारंभिक निदान, जांच और उपचार में देरी हुई और कोविड से संक्रमित लोगों में मृत्युदर का अधिक खतरा था।

प्रारंभिक दिनों में कैंसर का उपचार सफल हो सकता है, लेकिन रोग की उन्नत अवस्था में इसका उपचार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों ने कहा कि कोविड ने सक्रिय कैंसर रोगियों या पिछले पांच वर्षों से पीड़ित कैंसर रोगियों की मृत्युदर भी बढ़ी है।

Source: IANS 


भयावह है कोरोना की युगांतकारी जीवनशैली

भयावह है कोरोना की युगांतकारी जीवनशैली

07-Jun-2021

भयावह है कोरोना की युगांतकारी जीवनशैली
-ललित गर्ग-

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कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने भारी तबाही मचायी, अधिकांश परिवारों को संक्रमित किया, लम्बे समय तक जीवन ठहरा रहा, अनेक बंदिशों के बीच लोग घरों में कैद रहे, अब सोमवार से दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में जनजीवन फिर से चलने लगेगा।  कोरोना वायरस के कारण आत्मकेन्द्रित सत्ताओं एवं जीवनशैली के उदय होने की स्थितियों को आकार लेते हुए देखा गया है जिसमें दुनिया कहीं ज्यादा सिमटी और संकीर्णता से भरी उदासीन एवं अकेलेपन को ओढ़े हैं। मानवता के इस महासंकट के समय सबसे बड़ी कमी जो देखने को मिली है वो है किसी वैश्विक नेतृत्व का अभाव। जिसके न होने के कारण ही हम कोरोना वायरस के प्रकोप को बढ़ने से नहीं रोक सके। कोरोना वायरस की वजह से हमारे जीवन में व्यापक बदलाव आए हैं। विशेषतः स्वास्थ एवं चिकित्सा तंत्र लडखडाया है। अर्थव्यवस्था ध्वस्त हुई, बाजार एवं उद्योग सन्नाटे में रहे, इतना ही नहीं हमारे निजी जीवन और हमारे रिश्तों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा है।
आज नए कोरोना वायरस का संक्रमण दो सौ दस से अधिक संप्रभु देशों में फैल चुका है। इस वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या करोड़ों में है। जबकि इस महामारी ने अब तक लाखों लोगों को काल के गाल में डाल दिया है। इसलिए अब इस महामारी को वास्तविक रूप में हम वैश्विक महामारी कह सकते हैं। हालांकि, ये संकट इतना बड़ा है कि लोग ये सोच ही नहीं पा रहे हैं कि इस महामारी के संकट के बाद जो दुनिया बचेगी, उसका रंग रूप कैसा होगा? हमारी सामाजिकता एवं पारिवारिकता क्या आकार लेगी? रोजगार, व्यापार एवं जीवन निर्वाह का नजरिया कैसा होगा? शिक्षा एवं काम करने की शैली क्या रहेगी? ये नई दुनिया दिखने में कैसी होगी? हमारे सामाजिक एवं पारिवारिक उत्सवों, शादी-विवाह का स्वरूप कैसा रहेगा? क्या ये महामारी इक्कीसवीं सदी की पहले दोराहे पर खड़ी दुनिया की चुनौती है? ये वो प्रश्न हैं जिनके उत्तर तलाशने का प्रयास कोरोना की दूसरी लहर को मात देकर आगे बढ़ते हुए हमें करने होंगे।
दुनिया मानव इतिहास के सबसे सबसे बड़े संकट एवं खतरनाक दौर से रू-ब-रू है। अगर सामने मौत खड़ी हो, तो दिमाग में मौत और उसकी विभीषिका एवं तांडव के दृश्यों के सिवा कुछ और नहीं आता। इस वक्त दुनिया ठीक उसी मोड़ पर खड़ी है। एक सीमाविहीन विश्व से अब मानवता उस दिशा में बढ़ रही है जहां पर सरहदें हमारे घरों के दरवाजों तक आ गई हैं। चलती फिरती दुनिया अब सहम कर खड़ी हो गई है। वहीं, इसके उलट साइबर दुनिया में हलचल तेज हो गई है। ईंट और पत्थरों वाली जो मानव सभ्यता पिछले कई हजार वर्षों में विकसित हुई है, और वर्चुअल मानव समाज जो इनवर्षो  की देन है, वो दोनों ही नए रंग रूप में ढल रहे हैं। मानवता का इतिहास आज इन्हीं दो सभ्यताओं का मेल कराने वाले चैराहे पर खड़ा है सहमा हुआ, सिहरन एवं आशंकाओं से घिरा। आज सोशल डिस्टेंसिंग ही नई संप्रभुता है। उत्सवप्रियता से दूर एकांकीपन को जीने की विवशता को लिये अनेक भय एवं भयावहता की आशंका से घिरा। ये सभी घटनाएं अपने आप में युगांतकारी हैं। इनके पहले की दुनिया अलग थी। इनके बाद का विश्व परिदृश्य बिल्कुल ही अलग होगा।
कोरोना महामारी से दुनियाभर में तरह तरह की तबाहियों की खबरें सुनने को मिली हैं। जिनमें भारत सहित अनेक देशों में बच्चों एवं महिलाओं पर घरों की चारदिवारी में हिंसा, प्रताड़ना एवं यौन शोषण की घटनाएं बढ़ी है। एक नई तबाही का पता जापान में चला है। यह मनावैज्ञानिक संकट है अकेलापन का। महामारी से बचाव के उपाय के तौर पर अलगाव और सामाजिक दूरी का तरीका अपनाया गया था। जापान में शोध सर्वेक्षणों से पता चल रहा है कि इससे अकेलेपन की समस्या हद से ज्यादा भयावह हो गई और आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ गईं। संकट इतना बड़ा हो गया कि जापान सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए एक अलग से मंत्री बनाना पड़ा। इसका नाम ही है मिनिस्टर ऑफ लोनलीनेस। कोरोना काल यानी 2020 में जापान में 6976 महिलाओं ने खुदकुशी की। यानी मनोवैज्ञानिक रूप से महामारी का सबसे ज्यादा मारक असर महिलाओं पर पड़ा। बच्चें भी कम प्रभावित नहीं हुए है। बात केवल जापान की नहीं है, बल्कि इसे एक वैश्विक समस्या के रूप में भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि कोरोना संक्रमितों के लिए अलगाव का तरीका और कोरोना से बचाव के लिए सामाजिक दूरी का उपाय दुनिया के लगभग हर देश में अपनाया गया। यानी अभी दूसरे देशों से खबरें भले ही न आ रही हों लेकिन चिंता सभी को करनी पड़ेगी। कोरोना महामारी पर नियंत्रण पाने के लिये लगायी गयी बंदिशों एवं सामाजिक दूरी के पालन एवं अन्य सख्त हिदायतों ने हमारे जीवन को गहरे रूप में प्रभावित किया है, उसके प्रभाव एवं निष्पत्तियां लम्बे तक हमें झकझोरती रहेगी, उनसे हमें भी सावधानी बरतनी होगी।
दरअसल महामारी के दौरान दुनियाभर में जिन्होंने अपना रोजगार गंवाया, शिक्षा से वंचित हुए हैं, उनमें पुरूषों की तुलना में महिलाओं का आंकड़ा ही कम नहीं है। माना गया है कि खासतौर पर वर्क फ्राम होम की प्रक्रिया में महिलाओं पर काम का दबाव दोहरा पड़ा। घर में 24 घंटों मौजूदगी की बाध्यता ने ऑफिस के काम के साथ- साथ महिलाओं से परिवार पर अतिरिक्त ध्यान लगाने एवं घरेलू काम करने की अपेक्षाएं बढ़ा दीं और महिलाओं पर बोझ दुगना कर दिया। एक रिपोर्ट पहले ही आ चुकी है कि महामारी के दौरान पूरी दुनिया में घरेलू हिंसा और कलह की समस्या पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई। जापान की मानसिक स्वास्थ्य की विशेषज्ञ यूकी नीशीमूरा के मुताबिक जापान के समाज में वायरस से बचाव की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही ज्यादा डाली गई। यह देखा गया कि परिवार के स्वास्थ्य और साफ सफाई की देखरेख की जिम्मेदारी महिलाओं की ही ज्यादा रही। इसीलिए परिवार में कोरोना संक्रमण आने का अपराधबोध महिलाओं ने ही ज्यादा महसूस किया। लगभग यही स्थिति भारत में भी देखने को मिली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक पूरी दुनिया में कमोबेश 30 करोड़ लोग अवसाद और उस जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रहे हैं।
भारत में कोरोना महामारी के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों ने जीवन पर ही प्रश्नचिन्ह टांग दिये हैं। क्राइम ब्यूरों की रिपोर्ट के मुताबिक सन् 2019 में एक साल में भारत में एक लाख उनतालीस हजार लोगों ने आत्महत्याएं कीं। जिनमें अनेक विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियां अवसाद के कारण ऐसा करने को विवश हुई है। देश में इस समस्या की तीव्रता का अंदाजा इस बात से लगता है कि सवा लाख से ज्यादा आत्महत्या करने वालों में 67 फीसद यानी दो तिहाई युवा थे। एक साल में 18 साल से 45 साल के बीच के 93 हजार युवाओं का आत्महत्या करना कम से कम गंभीर चिन्ता का कारण तो है। लंबे खिंचे लॉकडाउन से बेरोजगारी और अकेलेपन से बने हालात का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। इस दौरान घर के भीतर रहने की बाध्यता ने लोगों को अकेलेपन में धकेला ही है। जो अपनी पढ़ाई या दूसरे कामकाज के कारण अपने परिवारो से भी अलग रहते थे, उनमें भी अवसाद एवं अकेलापन त्रासदी की हद तक देखने को मिला। भारत में इन मनोवैज्ञानिक प्रभावों एवं स्थितियों पर ध्यान देना एवं उचित कारगर कदम उठाना होगा। कोरोना महामारी की अगली लहर के प्रति सावधान होते हुए इन मनोवैज्ञानिक प्रभावों की भी पड़ताल करनी होगी।  
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
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दूसरी लहर से ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था की चिन्ता

दूसरी लहर से ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था की चिन्ता

24-May-2021

दूसरी लहर से ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था की चिन्ता
-ललित गर्ग -

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कोरोना महाव्याधि एवं प्रकोप की दूसरी लहर जन-जीवन के लिये बहुत घातक साबित हो रही है और इसका न केवल स्वास्थ्य, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन पर बल्कि अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ रहा है। जीवन पर अनेक तरह के अंधेरे व्याप्त हुए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावित बाजार हुआ, बाजार के सन्नाटे ने अर्थव्यवस्था को चैपट किया। बाजार में मांग, खपत, उत्पादन, निवेश जैसे अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हिल गये हैं। अर्थव्यवस्था पटरी पर कब लौटेगी, यह अनिश्चिय में है। पूरी तरह से लॉकडाउन नहीं लगा है, फिर भी असंगठित क्षेत्र की कंपनियों पर कुछ ज्यादा ही असर पड़ रहा है। ऑटोमोबाइल व अन्य कुछ क्षेत्रों में अनेक छोटी कंपनियों ने अपने काम बंद कर दिए हैं। असर सभी पर है, लेकिन असंगठित क्षेत्र पर ज्यादा है और इसीलिए पलायन भी दिख रहा है। पिछले साल मार्च में देश में संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दूसरी लहर पर जोर देकर कहा कि देश को लॉकडाउन से बचाना जरूरी है, संभवतः वे भविष्य मंे संभावित आर्थिक परिदृश्यों की स्थितियों को देखकर ही ऐसा कहा था। उनके ऐसा कहने के पीछे ठोस वजहें हैं, मार्च 2020 से अप्रैल 2021 के तेरह महीनों में कोविड संक्रमण की वजह से पूरा देश भारी मुश्किलों और चुनौतियों के दौर से गुजरा है। लॉकडाउन के बाद अनलॉक की प्रक्रिया शुरू करके देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशें की गईं। लेकिन दूसरी लहर ने उन कोशिशों पर पानी फेर दिया।
अप्रैल-2021 में कोरोना वायरस की दूसरी भयावह लहर के कारण न केवल इस पटरी पर लौट रही अर्थव्यवस्था पर ब्रेक लगा है बल्कि रेटिंग एजेंसियों ने अपनी भविष्यवाणी में बदलाव करते हुए भारत की विकास दर को दो प्रतिशत घटा दिया है। निश्चित ही पहली एवं दूसरी लहर के बीच के छह महीने में आए आर्थिक उछाल पर पानी फिर गया है। पिछले दो माह में राज्य सरकारें लगभग रोज नए प्रतिबंधों की घोषणाएं करती रही हैं तो अर्थव्यवस्था के विकास में बाधाएं आना स्वाभाविक है। बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई के बढ़ने के पूरे संकेत मिल रहे हैं, उत्पाद अवरुद्ध हुआ और मजदूरों का बड़े शहरों से पलायन जारी है। इस बार अस्तव्यस्त होती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने एवं जनजीवन की आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिये सरकार ने किसी तरह के आर्थिक पैकेज नहीं दिये गये हंै। इसका असर ये होगा कि अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी, उत्पादन कम होगा और उपभोग नीचे जाएगा। अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर दूसरी लहर का असर पड़ेगा, चाहे वो ऑटो सेक्टर हो, या रियल एस्टेट, या बैंकिंग, एयरलाइंस, पर्यटन या फिर मनोरंजन।
‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ के आंकड़ों से पता चलता है कि 31 मार्च तक बेरोजगारी 6.5 प्रतिशत थी, यह 18 अप्रैल तक 8.4 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसके अलावा, कई ऐसे प्रभाव होंगे जिसे आसानी से मापा नहीं जा सकता, सरकार के कर संग्रह में कमी आएगी। कंपनियां नुकसान कम करने के लिए खर्च को कम करेंगी या चीजों के दाम बढ़ाएँगीं, यह अनिश्चिय में हैं। दिल्ली और मुंबई में लॉकडाउन लगाए जाने के बाद से इन शहरों से मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। बड़ी संख्या में मजदूर अपने घरों को लौट गए हैं। इससे खुदरा व्यापार, कंस्ट्रक्शन के कामों, मॉल और दुकानों पर फर्क पड़ना स्वाभाविक है। उदाहरण के तौर पर शॉपिंग सेंटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने एक बयान में कहा है कि देश भर के मॉल अपने व्यवसाय का 90 प्रतिशत तक दोबारा हासिल चुके थे, लेकिन अप्रैल-2021 के बाद से एक बार फिर स्थिति बदलने लगी है। उद्योग प्रति माह राजस्व में 15 हजार करोड़ रुपये कमा रहा था, लेकिन स्थानीय प्रतिबंधों के साथ लगभग 50 प्रतिशत राजस्व में गिरावट आई है। महाराष्ट्र में सरकारी प्रबंधों के कारण वाहनों के कारखानों में उत्पादन 50-60 प्रतिशत कम हो गया है। देश में वाहनों का सबसे अधिक प्रोडक्शन महाराष्ट्र में है। इकनोमिक टाइम्स अखबार के मुताबिक वाहन उत्पादन में इस कमी से रोजाना 100 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हो रहा है।
रियल एस्टेट पहले से ही संकट में है लेकिन इसका संकट और बढ़ गया है। रियल एस्टेट की एक कंसल्टिंग कंपनी कुशमैन एंड वेकफील्ड के अनुसार इस साल जनवरी से मार्च तक किराए पर दिए गए ऑफिस स्पेस का कारोबार 48 प्रतिशत घटा है। सर्विसेज उद्योग और पर्यटन क्षेत्र को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई देशों ने अपने नागरिकों को भारत जाने से बचने की सलाह दी है जबकि घरेलू पर्यटन भी कोरोना के डर से घटने लगा है। कहा जा रहा है कि कोरोना की पहली लहर के लपेट में सबसे अधिक आने वाले हॉस्पिटैलिटी, पर्यटन और एयरलाइंस पर दूसरी लहर का भी सबसे बुरा असर पड़ रहा है। 90 प्रतिशत रेस्टोरेंट बंद है। हॉस्पिटैलिटी उद्योग में पिछले साल से अब तक अगर किसी की कमाई बढ़ी है तो वो घर पर खाना डिलिवर करने वाले लोग हैं। इनमें जोमैटो और स्विगी सब से आगे हैं।
आम तौर से उद्योग जगत पूर्ण लॉकडाउन के खिलाफ रहा है लेकिन महाराष्ट्र और दिल्ली की सरकारों के पास कोरोना की रोकथाम के लिए लॉकडाउन का सहारा लेना पड़ा, हालाँकि ये लॉकडाउन पिछले साल की तरह सख्त नहीं हैं। कई और राज्य सरकारें अब इस उधेड़बुन में हैं कि जान और जहान, दोनों को मिल रही चुनौती के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस संतुलन के साथ अर्थव्यवस्था का नियोजित करना भी जरूरी है। भारतीय रिजर्व बैंक ऋण के मोर्चे पर कोशिश कर रहा है कि असंगठित क्षेत्र को कारोबार जारी रखने के लिए पैसा मिले, जिससे असंगठित क्षेत्र की इकाइयों की स्थिति और न बिगडे़। जो छोटे कारोबारी होते हैं, उनके पास पूंजी बहुत कम होती है और वह जल्दी खत्म हो जाती है। जब ऐसी इकाइयों में काम बंद होता है, तब इनके लिए खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसी कंपनियों को फिर शुरू करना भी कठिन होता है। इसीलिए छोटे कारोबारियों को पैकेज दिया गया है कि वे बैंक से ऋण ले सकें, लेकिन इससे स्थिति नहीं सुधरेगी।
अर्थ-व्यवस्था की चिन्ता में हम कोरोना संक्रमण बढ़ने के कारण से आंख भी नहीं मूंद सकते। मामले बढ़ते ही इसलिए हैं कि लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। जब लॉकडाउन लगा दिया जाता है, तब दो सप्ताह बाद मामले घटने लगते हैं। हमारे यहां फरवरी में दूसरी लहर शुरू हो गई थी, तीन महीने होने जा रहे हैं। लॉकडाउन न लगाने का खामियाजा यह है कि हमारे यहां रिकॉर्ड संख्या में मामले बढ़े हैं और लोगों की जान भी जा रही है। एक दिक्कत यह भी है कि आंकड़े पूरे आते नहीं हैं या उपलब्ध नहीं कराए जाते। आज चिकित्सा व्यवस्था को बहुत तेजी से सुधारने की जरूरत है। इसके लिए भी रिजर्व बैंक ने एक पैकेज दिया है। मेडिकल ढांचा विकसित करने के लिए विशेष ऋण की जरूरत पड़ेगी, उसे इस विशेष पैकेज के जरिए मुहैया कराया जाएगा। अभी विदेश से काफी सहायता आ रही है, जैसे कोई दवा दे रहा है, तो कोई ऑक्सीजन टैंक दे रहा है। तीसरी लहर एवं भविष्य की चिन्ताआंे को देखते हुए चिकित्सा क्षेत्र में आयात बढ़ाने के लिए हमें अपनी कोशिशों का विस्तार करना चाहिए। रिजर्व बैंक ने जो पैकेज घोषित किया है, वह अच्छा है, लेकिन तत्काल उससे फायदा नहीं होगा। सेना और आयात, दोनों से मदद लेनी पड़ेगी।
संक्रमण गांव-गांव पहुंच गया है, नदियों में लाशें गांवों से ही आ रही है। गांवों में चिकित्सा ढांचा मजबूत करना होगा। यह साल खतरे से खाली नहीं है। अब सरकार को आगे आकर इसमें जहां-जहां काम रुक गया, बेरोजगारी बढ़ी है, वहां-वहां मदद करनी चाहिए। गरीब लोगों को इस वक्त मदद की बहुत जरूरत है। मुफ्त अनाज, इलाज एवं जीवन निर्वाह के अन्य साधन जरूरी है। लोगों की हताशा-निराशा को दूर करने के लिए केन्द्र सरकार को ही कदम उठाने पड़ेंगे।
प्रेषकः

 

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


लाशों के ढेर पर सिसकता हिंदुस्तान, खतरे में है नागरिकों की जान

लाशों के ढेर पर सिसकता हिंदुस्तान, खतरे में है नागरिकों की जान

16-May-2021

लाशों के ढेर पर सिसकता हिंदुस्तान,
खतरे में है नागरिकों की जान

हिंदुस्तान यानी भारत जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था आज वह मजबूर लाचार बेबस सिसकता कराहता नजर आ रहा है। विश्व गुरु चेला भी नहीं बन पाये। पूरी दुनिया हंस रही है।
एक तरफ एक साल से ज़्यादा हो गये कोरोना के कहर ने हर किसी को खौफ के साए में जीने को मजबूर कर दिया है, उपर से हिंदुस्तान के कोने कोने से हर शहर हर गांव से ऐसी भवायह तस्वीरें सामने आईं कि हर किसी की रूह कांप उठी। इंसान इंसान से दूरी बनाने लगा लोग एक दूसरे से मिलने से परहेज करने लगे घरवालों ने आपस में एक दूसरे का साथ देना गवारा नहीं समझा। करुणा के इस दौर में इंसानियत का जनाजा उठ गया।
असंख्य नदियों, पहाड़ों, पार्कों, ऐतिहासिक इमारतों के लिए मशहूर भारत जैसे देश में गंगा नदी में लाशों का ढेर लग गया। ये वीभत्स तस्वीरों ने सबको विचलित कर दिया। अगर कोई नहीं विचलित हुआ तो वह देश की सरकार है।
सरकार सिर्फ अपने मन की बात तो कर लेती है लेकिन देश की जनता के मन में है कितने सवाल हैं इस पर ध्यान नहीं देती।
शाइनिंग इंडिया
डिजिटल इंडिया
आत्मनिर्भर भारत
विश्व गुरु
अच्छे दिन आने वाले हैं
सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास
काला धन
पन्द्रह लाख
न गुंडाराज, न भ्रष्टाचार, अबकी बार भाजपा सरकार
हर मोदी घर घर मोदी

यह सब वह नारे हैं जो पिछले 6-7 सालों में भारतीय जनता पार्टी द्वारा जनता के लिए परोसे गए यह सारे नारे जनता के दिलों में एक सवाल बनकर अभी भी मौजूद हैं।

आज सरकार के कर्मों से ऐसे हालात पैदा हो गए हैं कि कोरोना से अब देश की नदियों को भी खतरा पैदा हो गया है। बिहार के बक्सर में गंगा घाट पर लाशों की कतारें लग गई हैं। गंगा नदी में जिंदगी से जंग हार चुके लोगों के शव मौत के बाद भी हारते हुए दिखाई दे रहे हैं। जिंदगी से भी हारे और मौत से भी हार गए।
सवाल यह है कि आखिर ये दर्दनाक मंजर किसकी लापरवाही है? क्या यह मजबूरी का नतीजा है? इस लापरवाही का पूरे देश को भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
देश बेहाल है। जनता मजबूर है सरकार लापरवाही के चलते खामोश है ऐसे में नदियों में लाशें बहाने के चलते कई तरह की संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। साथ ही इस लापरवाही के चलते दूसरों को अपनी जान भी गंवानी पड़ सकती है।
हर तरफ जो तस्वीरें सामने आ रही है उसमें जल प्रदूषण और चील-कौवे, गिद्ध-कुत्तों का कहर दिखाई दे रहा है।
बक्सर के चौसा श्मशान घाट पर गंगा के किनारे भारी तादाद में लाशों को नदियों में बहा दिया गया, जिसके बाद शव गंगा के किनारे आकर लग गए फिर गिद्ध और कुत्ते शवों को नोच-नोच कर अपना आहार बना रहे हैं।
बक्सर में प्रधान सेवक की मां गंगा का किनारा शवों से पटा पड़ा है। कुत्ते शवों को नोच रहे हैं, मां गंगा सबका कष्ट हरती हैं और पाप धुलती हैं लेकिन इन दिनों बक्सर में खुद गंगा मईया कष्ट में हैं। उनका पुत्र नालायक और नाकारा साबित हुआ।
जो मर गए हैं उनको चिता की अग्नि नसीब नहीं हो रही है और जो जिंदा है उनके खाने को अन्न नसीब नहीं हो रहा है। सरकार गरीबों का मजाक उड़ा रही है खाने के नाम पर ₹1000 महीना देने की घोषणा की है मिलेगा या नहीं मिलेगा यह तो बाद का सवाल है लेकिन ₹1000 का मतलब हुआ ₹33 प्रतिदिन। आज के इस दौर में जब महंगाई इतनी ज्यादा है सरसों का तेल 180 से ₹200 किलो बिक रहा है ऐसे में गरीब आदमी है ₹33 में प्रतिदिन दो वक्त कैसे खाना खाएगा?
दूसरा बड़ा सवाल कि जो पंजीकृत है पैसा उन्हीं को दिया जाएगा सवाल है कि इस देश में पंजीकृत हैं कितने? 200 ₹300 प्रतिदिन कमाने वाले क्या फॉर्म भर के पंजीकरण करेंगे सरकार को इतना भी समझ में नहीं आता। जो भ्रष्टाचारी है उनके पास पैसा है उनको कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जो ईमानदार है और रोज खाने कमाने वाले है वाले वह कोरोना से अगर बच गए तो भूख से मर जाएंगे।
तबेला चलाने वाले देश कैसे चलाएंगे?

जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ 


हमारी हिन्दी के शिखर पुरुष का जाना

हमारी हिन्दी के शिखर पुरुष का जाना

03-May-2021

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ललित गर्ग 

हिंदी का एक मौन साधक, महर्षि, मनीषी, जिसके आगे हर हिंदी प्रेमी नतमस्तक है, जिसके कर्म से हिन्दी भाषा समृद्ध बनी, ऐसे सजग हिन्दीचेता, महान् रचनाकार एवं समन्वयवादी-जुनूनी व्यक्तित्व श्री अरविन्दकुमार का गत सप्ताह मौन हो जाना, हिन्दी भाषा एवं सृजन-संसार की एक अपूरणीय क्षति है। उन जैसा हिन्दी भाषा का तपस्वी ऋषि आज की तारीख में हिंदी में कोई दूसरा नहीं है। दसवें दशक की उम्र में आज भी वह हिंदी के लिए जी-जान लगाये हुए थे। रोज छः से आठ घंटे काम करते थे,  कंप्यूटर पर माउस और की बोर्ड के साथ उनकी अंगुलियां नाचती रहती थी हिन्दी भाषा को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाने के लिये। हिन्दी को यदि उनके जैसे दो-चार शब्द-शिल्पी और मिल जाते तो हिंदी के माथे से उपेक्षा का दंश हट जाता और वह दुनिया की प्रथम भाषा होने के साथ भारत की राष्ट्र-भाषा होने के गौरव को पा लेती।
अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस की रचना का जो विशाल, मौलिक, सार्थक और श्रमसाध्य कार्य किया है, उसने हिंदी को विश्व की सर्वाधिक विकसित भाषाओं के समकक्ष लाकर खड़ा किया है। उनका यह प्रयास न सिर्फ अद्भुत है, स्तुत्य है और चमत्कार-सरीखा है। निश्चित ही वे शब्दाचार्य थे, शब्द ऋषि थे, तभी हिंदी अकादमी, दिल्ली ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2010-2011 के हिंदी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित किया था। हिन्दी भाषा के लिये कुछ अनूठा एवं विलक्षण करने के लिये उम्र को अरविन्दकुमार ने बाधा नहीं बनने दिया, यही कारण है कि उम्र की शताब्दी की ओर बढ़ते पड़ाव पर भी उन्होंने खामोशी अख्तियार नहीं की है। वह लगातार काम पर काम कर रहे हैं। अरविन्दजी हिन्दी का जो स्वरून गढऋ रहे थे, वह बिलकुल नया एवं युगानुरूप था। वे अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को समृद्ध करना चाहते थे। उनका मानना था कि अंग्रेजी की स्पर्धा में यदि हिन्दी न खड़ी हो पाई तो हमारा सर्वस्व नष्ट हो जायेगा। इसलिये उनका नया काम थिसारस के बाद अरविंद लैक्सिकन है। आजकल हर कोई कंप्यूटर पर काम कर रहा है। किसी के पास न तो इतना समय है न धैर्य कि कोश या थिसारस के भारी भरकम पोथों के पन्ने पलटे। आज चाहिए कुछ ऐसा जो कंप्यूटर पर हो या इंटरनेट पर। अभी तक उनकी सहायता के लिए कंप्यूटर पर कोई आसान और तात्कालिक भाषाई उपकरण नहीं था। अरविंद कुमार ने यह दुविधा भी दूर कर दी थी। अरविंद लैक्सिकन दे कर। यह ई-कोश हर किसी का समय बचाने के काम आएगा।

अरविंद लैक्सिकन पर 6 लाख से ज्यादा अंग्रेजी और हिंदी अभिव्यक्तियां हैं। माउस से क्लिक कीजिए- पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा। किसी भी एक शब्द के लिए अरविंद लैक्सिकन इंग्लिश और हिंदी पर्याय, सपर्याय और विपर्याय देता है, साथ ही देता है परिभाषा, उदाहरण, संबद्ध और विपरीतार्थी कोटियों के लिंक। उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश में 200 और हिंदी में 500 से ज्यादा पर्याय हैं। किसी एकल इंग्लिश ई-कोश के पास भी इतना विशाल डाटाबेस नहीं है। लेकिन अरविंद लैक्सिकन का सॉफ्टवेयर बड़ी आसानी से शब्द कोश, थिसॉरस और मिनी ऐनसाइक्लोपीडिया बन जाता है। इसका पूरा डाटाबेस अंतर्सांस्कृतिक है, अनेक सभ्यताओं के सामान्य ज्ञान की रचना करता है। अरविंद लैक्सिकन को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के साथ-साथ ओपन ऑफिस में पिरोया गया है। इस का मतलब है कि आप इनमें से किसी भी एप्लीकेशन में अपने डॉक्यूमेंट पर काम कर सकते हैं। सुखद यह है कि दिल्ली सरकार के सचिवालय ने अरविंद लैक्सिकन को पूरी तरह उपयोग में ले लिया है। अरविंद कहते हैं कि शब्द मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है, प्रगति के साधन और ज्ञान-विज्ञान के भंडार हैं, शब्दों की शक्ति अनंत है। वह संस्कृत के महान व्याकरण महर्षि पतंजलि को कोट करते हैं, ‘सही तरह समझे और इस्तेमाल किए गए शब्द इच्छाओं की पूर्ति का साधन हैं।’ वह मार्क ट्वेन को भी कोट करते हैं, ‘सही शब्द और लगभग सही शब्द में वही अंतर है जो बिजली की चकाचैंध और जुगनू की टिमटिमाहट में होता है।’ वह बताते हैं, ‘यह जो सही शब्द है और इस सही शब्द की ही हमें अकसर तलाश रहती है।’

हिंदी और अंगरेजी के शब्दों से जूझते हुए वह जीवन में आ रहे नित नए शब्दों को अपने कोश में गूंथते रहते थे, ऐसे जैसे कोई माली हों और फूलों की माला पिरो रहे हों। ऐसे जैसे कोई कुम्हार हों और शब्दों के चाक पर नए-नए बर्तन गढ़ रहे हों। ऐसे जैसे कोई जौहरी हों और कोयले में से चुन-चुन कर हीरा चुन रहे हों। ऐसे जैसे कोई गोताखोर हों और समुद्र में गोता मार-मार कर एक-एक मोती बिन रहे हों शब्दों का। जैसे कोई चिड़िया अपने बच्चों के लिए एक-एक दाना चुनती है अपनी चोंच में और फिर बच्चों की चोंच में अपनी चोंच डाल कर उन्हें वह चुना हुआ दाना खिलाती है और खुश हो जाती है। ठीक वैसे ही अरविंद कुमार एक-एक शब्द चुनते हैं और शब्दों को चुन-चुन कर अपने कोश में सहेजते थे और सहेज कर खुश हो जाते थे उस चिड़िया की तरह ही। कोई चार दशक से वह इस तपस्या में लीन थे सभी तरह की सुध-बुध खोकर। काम है कि खत्म नहीं होता और वह हैं कि थकते नहीं। वह किसी बच्चे की तरह शब्दों से खेलते रहते हैं। एक नया इतिहास बनाया और फिर दूसरा नया इतिहास बनाने चल पड़ते।

अरविन्द कुमार का जन्म 17 जनवरी 1930 को उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर में हुआ। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा मेरठ के नगरपालिका विद्यालय में हुई। सन 1943 में उनका परिवार दिल्ली आ गया। यहां उन्होने मैट्रिक किया। वे अंग्रेजी साहित्य में एमए हैं। उन्होंने  अपनी धर्मपत्नी कुसुमकुमार के साथ मिलकर हिन्दी का प्रथम समान्तर कोश (थिसारस) रचा,  उन्हांेने संसार का सबसे अद्वितीय द्विभाषी थिसारस द पेंगुइन इंग्लिश-हिन्दी-हिन्दी-इंग्लिश थिसॉरस एण्ड डिक्शनरी भी तैयार की जो अपनी तरह का एकमात्र और अद्भुत भाषाई संसाधन है। यह किसी भी शब्दकोश और थिसारस से आगे की चीज है और संसार में कोशकारिता का एक नया कीर्तिमान स्थापित करता है। इतना बड़ा और इतने अधिक शीर्षकों उपशीर्षकों वाला संयुक्त द्विभाषी थिसारस और कोश इससे पहले नहीं था।

अरविंद फिल्म पत्रिका माधुरी और सर्वोत्तम (रीडर्स डाईजेस्ट का हिन्दी संस्करण) के प्रथम संपादक थे। पत्रकारिता में उनका प्रवेश दिल्ली प्रेस समूह की पत्रिका सरिता से हुआ। कई वर्ष इसी समूह की अंग्रेजी पत्रिका कैरेवान के सहायक संपादक भी रहे। कला, नाटक और फिल्म समीक्षाओं के अतिरिक्त उनकी अनेक फुटकर कवितायें, लेख व कहानियां प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनके काव्यानुवाद शेक्सपीयर के जूलियस सीजर का मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिये इब्राहम अल्काजी के निर्देशन में हुआ। 1998 में जूलियस सीजर का मंचन अरविन्द गौड़ के निर्देशन में शेक्सपियर नाटक महोत्सव (असम) और पृथ्वी थिएटर महोत्सव, भारत पर्यावास केन्द्र (इंडिया हैबिटेट सेंटर) में अस्मिता नाट्य संस्था ने किया। अरविंद कुमार ने सिंधु घाटी सभ्यता की पृष्ठभूमि में इसी नाटक का काव्य रूपान्तर भी किया है, जिसका नाम है - विक्रम सैंधव।

‘सर्वोत्तम’ अंग्रेजी परिवेश की हिन्दी पत्रिका है, इस पत्रिका को उन्होंने अपने हिन्दी-प्रेम के कारण हिन्दी की अद्भुत पत्रिका बनाया। उसके स्तंभों के नाम, उसकी भाषा और उसके विषय इतने अनूठे हुआ करते थे कि कहीं से भी अंग्रेजी की बू नहीं आती थी। शुरू से लेकर अंत तक अपनी तमाम विशेषताओं एवं अनूठेपन के साथ-साथ चलते हुए भी वे जिस एक विशेषता को हमेशा अपने साथ रखते थे, वह था उनका भाषा ज्ञान। शब्दों की उनकी जानकारी। वे जितना जटिल काम अपने हाथ में लेते हैं, उतनी ही सफलता से उसे शिखर भी देते थे। काम के प्रति कठोर एवं क्रांतिकारी होकर भी वे अपने निजी जीवन में उतने ही सरल, उतने ही सहज और उतने ही व्यावहारिक थे, तो शायद इसलिए भी कि उनका जीवन इतना संघर्षशील रहा है कि कल्पना करना भी मुश्किल होता है कि कैसे यह आदमी बाल-मजदूरी से अपनी जीवन-यात्रा प्रारंभ कर सफलता के इन मुकामों पर पहुंचा। हिन्दी के लिये उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज सचमुच हिन्दी का यह शब्दशिल्पी हमसे जुदा हो गया है, तो शायद ही उनकी कमी को कोई कभी भर पाए।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


रोहित सरदाना राष्ट्रवादी सोच के शिखर थे...

रोहित सरदाना राष्ट्रवादी सोच के शिखर थे...

01-May-2021

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 ललित गर्ग 

मशहूर न्यूज एंकर, टीवी पत्रकारिता के एक महान् पुरोधा पुरुष, मजबूत राष्ट्रवादी सोच एवं निर्भीक वैचारिक क्रांति के सूत्रधार, उत्कृष्ट राष्ट्रवादी के धनी रोहित सरदाना की असामयिक मौत अंचभित कर रही है। एक संभावनाओं भरी टीवी पत्रकारिता का सफर ठहर गया, उनका निधन न केवल पत्रकारिता के लिये बल्कि भारत की राष्ट्रवादी सोच के लिये एक गहरा आघात है, अपूरणीय क्षति है। उनका निधन एक युग की समाप्ति है। भले ही कोरोना संक्रमण और दिल का दौरा पड़ने से वह दुनिया छोड़कर चले गए, लेकिन एक दिन पहले तक वह लोगों की मदद के लिए सक्रिय थे। कोरोना का शिकार हुए लोगों के इलाज के लिए रेमडेसिविर इंजेक्शन, ऑक्सीजन, बेड आदि तक की व्यवस्था के लिए वह लगातार सोशल मीडिया पर एक्टिव थे और लोगों से सहयोग की अपील कर रहे थे। उन्होंने लोगों से प्लाज्मा डोनेट करने की भी अपील की थी।

लंबे समय तक जी न्यूज में एंकर रहे रोहित सरदाना इन दिनों आज तक न्यूज चैनल में एंकर के तौर पर काम कर रहे थे। कोरोना वायरस ने देश की अनेक प्रतिभाओं को काल का ग्रास बनाया है, लेकिन सरदाना को उठा ले जाएगा, ये कल्पना नहीं की थी। लंबे समय से टीवी मीडिया का चमकता-दमकता, साहसी एवं बेवाक वैचारिकी का चेहरा रहे रोहित सरदाना इन दिनों ‘आज तक’ न्यूज चैनल पर प्रसारित होने वाले शो ‘दंगल’ की एंकरिंग करते थे। उन्होंने सशक्त एवं प्रभावी टीवी पत्रकारिता से नये मानक गढ़े। भले ही उनकी तेज एवं तीखी पत्रकारिता से एक वर्ग-विशेष खफा था, पत्रकारिता जगत में भी कुछ लोग उनसे विचार-भेद रखते थे। लेकिन इसके बावजूद वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई जैसे लोगों को भी रोहित सरदाना की मौत ने विचलित किया, उन्होंने ट्विटर पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘दोस्तों बेहद दुखद खबर है। रोहित मेरे बीच राजनीतिक मतभेद थे, लेकिन हमने हमेशा बहस को एंजॉय किया।

रोहित सरदाना एक जुनूनी एंकर पत्रकार थे। उनके टीवी शो को देखने वाले लोगों की संख्या करोड़ों में है और अपने निर्भीक एवं साहसी राष्ट्रवादी सोच से वे काफी लोगों के चहेते थे। तमाम उग्रपंथी ताकतों की तरफ से लगातार धमकियां मिलने के बावजूद उन्होंने अपनी टीवी पत्रकारिता की धार को कम नहीं होने दिया। विडम्बना है कि कट्टरवादी शक्तियां उनकी मौत पर भी खुशियां मना रही है, यह कैसा जहर वातावरण में घुला है। जबकि रोहित ने पत्रकारिता में उच्चतम मानक स्थापित किये। वे न केवल अपने शो के जरिये राष्ट्र की ज्वलंत समस्याओं को सशक्त तरीके से प्रस्तुति देते रहे बल्कि गरीबों, अभावग्रस्तों, पीडितों और मजलूमों की आवाज बनते रहे और उनकी बेखौफ सोच एवं वाणी के सामने सत्ताएं हिल जाती थी। अपनी कलम, विचार एवं प्रस्तुति के जरिये उन्होंने लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके शो एवं टीवी कार्यक्रमों ने लाखों लोगों की समस्याओं को सरकारों और प्रशासन के सामने रखा और भारतीय लोकतंत्र में लोगों की आस्था को और मजबूत बनाने में योगदान दिया।

रोहित सरदाना एक प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार, एंकर, स्तंभकार, संपादक ही नहीं थे, बल्कि वे एक संवेदनशील राष्ट्रवादी व्यक्तित्व थे। उनको हम भारतीयता, पत्रकारिता एवं भारतीय राजनीति का अक्षयकोष कह सकते हैं, वे चित्रता में मित्रता के प्रतीक थे तो गहन मानवीय चेतना के चितेरे जुझारु, नीडर, साहसिक एवं प्रखर व्यक्तित्व थे। वे एक ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व थे, जिन्हें पत्रकार जगत का एक यशस्वी योद्धा माना जाता है। उन्होंने आमजन के बीच, हर जगह अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। लाखों-लाखों की भीड़ में कोई-कोई रोहित सरदाना जैसा विलक्षण एवं प्रतिभाशाली व्यक्ति जीवन-विकास की प्रयोगशाला मेें विभिन्न प्रशिक्षणों-परीक्षणों से गुजरकर महानता का वरन करता है, विकास के उच्च शिखरों पर आरूढ़ होता है और अपनी मौलिक सोच, कर्मठता, कलम, जिजीविषा, पुरुषार्थ एवं राष्ट्र-भावना से समाज एवं राष्ट्र को अभिप्रेरित करता है। देश और देशवासियों के लिये कुछ खास करने का जज्बा उनमें कूट-कूट कर भरा था।

रोहित सरदाना का जन्म 22 सिंतंबर, 1979 को कुरुक्षेत्र, हरियाणा में हुआ था। रोहित ने वहीं से अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी की और आगे की पढ़ाई के लिए वह हिसार चले गए और उन्होंने गुरु जम्बेश्वर विश्वविद्यालय विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दाखिला लिया। उन्होंने वहां से मनोविज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की है और उसी यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। रोहित सरदाना शादीशुदा हैं और उनकी दो बेटियां भी हैं। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में भी दाखिला लिया था क्योंकि वह हमेशा से अभिनेता बनना चाहते थे लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया, यही समय था जब उन्होंने पत्रकार बनने का फैसला किया। 2004 में, सहारा के लिए उन्हें सहायक निर्माता के रूप में काम करने का मौका मिला और जी न्यूज में कार्यकारी संपादक के रूप में शामिल होने से पहले उन्होंने सहारा में दो साल तक काम किया। वर्तमान में, वह एक शो कर रहे है जहाँ वह संसद सदस्यों के लिए एक रिपोर्ट कार्ड बनाते थे, जिसमें उनके संसदीय क्षेत्र में उनके काम का सारा विवरण होता है। इसके अलावा, उनके शो मतदाताओं को अपना नेता तय करने में मदद करते हैं। जी न्यूज में एक डिबेट शो “ताल-ठोक” के किया करते थे, जिसमे वे समकालीन और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते थे। इस शौ से उन्होंने काफी नाम कमाया। 2017 में, उन्होंने जी न्यूज को छोड़, आजतक में ज्वाइन कर लिया और इनदिनों वे डिबेट शो दंगल की मेजबानी करते थे। रोहित सरदाना को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है और उन पुरस्कारों में संसुई बेस्ट न्यूज प्रोग्राम अवार्ड, माधव ज्योति सम्मान और सर्वश्रेष्ठ समाचार एंकर अवार्ड शामिल हैं जो दिल्ली एजुकेशन सोसाइटी द्वारा प्रायोजित किया गया था। 2018 में ही रोहित सरदाना को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से नवाजा गया था।

रोहित सरदाना एक ऐसे जीवन की दास्तान है जिन्होंने अपने जीवन को बिन्दु से सिन्धु बनाया है। उनके जीवन की दास्तान को पढ़ते हुए जीवन के बारे में एक नई सोच पैदा होती है। जीवन सभी जीते हैं पर सार्थक जीवन जीने की कला बहुत कम व्यक्ति जान पाते हैं। रोहितजी के जीवन कथानक की प्रस्तुति को देखते हुए सुखद आश्चर्य होता है एवं प्रेरणा मिलती है कि किस तरह से दूषित राजनीतिक, साम्प्रदायिक परिवेश एवं आधुनिक युग के संकुचित दृष्टिकोण वाले समाज में जमीन से जुड़कर आदर्श जीवन जिया जा सकता है, आदर्श स्थापित किया जा सकता है। और उन आदर्शों के माध्यम से देश की पत्रकारिता, राजनीति, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और वैयक्तिक जीवन की अनेक सार्थक दिशाएँ उद्घाटित की जा सकती हैं। उन्होंने व्यापक संदर्भों में जीवन के सार्थक आयामों को प्रकट किया है, वे आदर्श जीवन का एक अनुकरणीय उदाहरण हंै, मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता, समाजसेवा एवं राष्ट्रवादी सोच को समर्पित एक लोककर्मी का जीवनवृत्त है। उनके जीवन से कुछ नया करने, कुछ मौलिक सोचने, पत्रकारिता एवं राजनीति को राष्ट्र प्रेरित बनाने, सेवा का संसार रचने, सद्प्रवृत्तियों को जागृत करने की प्रेरणा मिलती रहेगी। उनके जीवन से जुड़ी राष्ट्रवादी धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया। वे जितने उच्च नैतिक-चारित्रिक पत्रकार थे, उससे अधिक मानवीय एवं सामाजिक थे। उनके निधन को सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की पत्रकारिता की समाप्ति समझा जा सकता है। वे समर्पित-भाव से पत्रकारिता-धर्म के लिये प्रतिबद्ध थे। आपके जीवन की खिड़कियाँ समाज एवं राष्ट्र को नई राष्ट्रवादी दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। उनकी सहजता और सरलता में गोता लगाने से ज्ञात होता है कि वे गहरे मानवीय सरोकार से ओतप्रोत एक अल्हड़ व्यक्तित्व थे। बेशक रोहितजी अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन अपने सफल पत्रकार जीवन के दम पर वे हमेशा भारतीय पत्रकारिता के आसमान में एक सितारे की तरह टिमटिमाते रहेंगे।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट, 25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92, फोनः 22727486, 9811051133


कोरोना महासंकट में लोकतंत्र भी संकट में

कोरोना महासंकट में लोकतंत्र भी संकट में

28-Apr-2021

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ललित गर्ग 

कुछ सरकारों एवं राजनीतिक दलों ने अनियंत्रित होती कोरोना महामारी एवं बढ़ती मौतों के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन किया है। असंख्य लोगों की जीवन-रक्षा जैसे मुद्दों के बीच में भी राजनीति करने एवं राजनीतिक लाभ तलाशने की कोशिशें जमकर हुई है। कोरोना की त्रासदी एवं पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ-साथ होने के कारण समूचे चुनाव-प्रचार के दौरान हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने एक गैर-जिम्मेदाराना  अलोकतांत्रिक व्यवहार का उदाहरण ही पेश किया है। सत्ता की राजनीति को प्राथमिकता देने वाले हमारे नेता यह भूल गये कि जनतंत्र में राजनीति सत्ता के लिए नहीं, जनता के लिए, जनता की रक्षा के लिये होनी चाहिए।

स्वतंत्र भारत का लोकतंत्रात्मक संविधान एवं व्यवस्था पूर्णतः सह-अस्तित्व, जनता की रक्षा, समता और संयम पर आधारित है। जनतंत्र में जनता की सरकार होती है और जनता के लिए होती है। इन सरकारों को चुनने का कार्य चुनाव के द्वारा होता है, जब ये चुनाव ही आम जनता के हितों की उपेक्षा करने वाले हो तो इन्हें लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। इन चुनावों में कोरोना महामारी के लिये जारी किये गये प्रावधानों, बंदिशों एवं निर्देशों का उल्लंघन होना एक त्रासदी से कम नहीं है। इन चुनावों में भारी भीड़ जुटाना, रैलियां करना, राजनैतिक सभाओं का आयोजन करना  और ये सब आम जनता की रक्षा की उपेक्षा पर होना, भयंकर भूल है, लोकतंत्र के लिये अभिशाप है।

भारत में कोरोना की स्थिति भयावह है एवं दुनिया में सर्वाधिक चरम स्थिति यही देखने को मिल रही है। यह दूसरी लहर कुछ ज्यादा ही खतरनाक सिद्ध हो रही है। लोगों के कोरोनाग्रस्त होने, मरीज के लिए अस्पतालों के दरवाजे बंद होने, जरूरी दवाओं और ऑक्सीजन की कमी होने, श्मशान में लगातार चिताओं को जलाने के लिये स्थान कम होने की खबरें जब डराने लगी थी, तब चुनाव प्रचार जारी रहना हमारे राजनीतिक दलों एवं राजनेताओं के विडम्बनापूर्ण व्यवहार को उजागर कर रहा था, उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि राजनेताओं की नासमझी एवं दुर्भाग्यपूर्ण सोच ने कोरोना महामारी को फैलाने एवं जनता के जीवन को संकट में डालने का ही काम किया है। संभवतः इसके लिये चुनाव आयोग की भूमिका भी संदेहास्पद बनी है और यही कारण है कि मद्रास हाई कोर्ट ने दूसरी लहर के तेजी से फैलने के लिये अकेले चुनाव आयोग को जिम्मेदार करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग सबसे जिम्मेदार संस्थान है, इसके अधिकारियों के खिलाफ हत्या के आरोपों का मामला दर्ज किया जा सकता है। निश्चित रूप से जब स्कूल-कालेज बन्द किये जा सकते हैं, 10वीं बोर्ड की परीक्षाएं न करके बच्चों को सीधे ग्यारहवीं में ले जाने एवं 12वीं बोर्ड की परीक्षाएं टाली जा सकती है, हरिद्वार में लगे कुंभ के मेले को बीच में ही रोक देने का निर्णय लिया जा सका तो चुनाव पर ऐसे निर्णय लेने में क्यों कोताही बरती गयी?

निश्चित ही कोरोना महामारी की दूसरी लहर को तेजी से जानलेवा बनाने में चुनाव की भूमिका रही है। देश के अनेक हिस्सों में जब कड़े नियम सामने आ रहे थे। ऐसे निर्णय करने वाले राजनीति के शीर्ष लोगों द्वारा पश्चिम बंगाल में जाकर विशाल चुनावी सभाएं करना आखिर क्या दर्शाता है? कोरोना की बढ़ती सुनामी पर चिंता जताने वाले चुनावी-सभा में उमड़ी भीड़ को देखकर क्यों आनंदित हो रहे थे! ‘जहां तक नजर जाती है वहां तक लोगों की भीड़’ देखकर पुलकित होने वालों को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी कि उस भीड़ में आधे से अधिक लोगों ने मास्क नहीं पहन रखे थे। जिस ‘दो गज दूरी’ की बात हमारे राजनेता बढ़-चढ़ कर रहे थे, चुनाव के परिप्रेक्ष्य में उसे क्यों भूल गये? जनता की जीवन-रक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों हो गया चुनाव-प्रचार? सभी दलों के नेताओं को ‘मास्क’ या ‘दूरी’ की बात क्यों नहीं याद रही? हमारे नेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए जिस तरह की लापरवाही बरती है, उससे चुनावों में भले ही उन्हें कुछ लाभ मिल जाये, पर देश की जनता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, यह लोकतंत्र के इतिहास के काले पृष्ठ के रूप में अंकित रहेगा।

इन जटिल एवं परेशान करने वाली स्थितियों में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी अधिक प्रभावपूर्ण तरीके से सामने आने की थी, चुनाव आयोग चाहता तो विवेक एवं अपने जिम्मेदारी का परिचय देते हुए चुनावी रैलियों पर प्रतिबंध लगा सकता था। पर उसने पता नहीं क्या सोच कर ऐसा नहीं है? क्यों नहीं किया? चुनाव प्रचार को रोकने का निर्णय उसे लेना ही चाहिए था, क्योंकि यह सीधे रूप से कोरोना महामारी के फैलने का कारण था। चुनाव आयोग के साथ-साथ यह कदम चुनावी प्रचार में लगे हर नेता को उठाना चाहिए था। सत्तारूढ़ पक्ष, भले ही वह केंद्र का हो या पश्चिम बंगाल का, को इस दिशा में पहल करनी चाहिए थी। वह विफल रहा, यह विफलता लोकतंत्र को धुंधलाने एवं कमजोर करने का बड़ा कारण बनी है।

कोरोना के विरुद्ध लड़ाई के हर मोर्चे पर केवल प्रधानमंत्री ही दृढ़ता से खड़े और लड़ते नजर आते रहे हैं। फिर उन्होंने चुनाव-प्रचार में अपनी ‘जनता के लिये शासन’ की नीति को क्यों भूला दिया? अपनी इस भूल को उन्होंने जल्दी ही सुधार भी लिया। अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री ने देर से ही सही, यह निर्णय लिया है कि अब प्रचार के लिए विशाल सभाएं नहीं होंगी। उन्होंने इसी के साथ लोकतंत्र के सजग एवं सक्षम प्रहरी के रूप में कोरोना महामारी पर नियंत्रित स्थापित करने की कमान को अपने हाथ में ले लिया, उसी का प्रभाव है कि बहुत कम समय में कोरोना के बढ़ते मामलों में ठहराव ही नहीं आया, बल्कि गिरावट भी देखने को मिली है।
प्रधानमंत्री आक्सीजन, दवाओं की व्यवस्था के साथ विदेशों से सहयोग के लिये भी हाथ फैलाये हैं। उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि दुनियाभर से हमें मदद मिलने लगी है। अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन ने कहा है कि जब हम मुश्किल में थे, भारत हमारे साथ था। अब भारत मुश्किल में है तो हम उसके साथ है। बात अमेरिका की नहीं है दुनिया के बड़े एवं शक्ति-सम्पन्न राष्ट्र आॅक्सिजन, वेटिलेटर, पीपीई किट भेज रहे हैं। यह वातावरण तभी संभव हुआ है जब भारत ने जरूरत के समय इन देशों की मदद की थी। उस समय विपक्ष ने केन्द्र सरकार के इस मानवीय निर्णय की खूब आलोचना की थी।

लोकतंत्र के सफल संचालन में जितनी सत्ता पक्ष की भूमिका होती है, उतनी ही विपक्ष की भी। समूचे कोरोना संकटकाल में विपक्ष ने केन्द्र सरकार की टांग खिंचाई के अलावा कोई भूमिका नहीं निभाई। जब पहली बार लॉकडाउन लगाया गया तो विपक्ष ने आक्रामक होकर इस पर आपत्ति की। कहा कि ये मजदूरों की रोजी-रोटी छीनने और अंबानी-अडानी को फायदा पहुँचाने की साजिश है! फिर उन्होंने प्रवासी मजदूरों को इतना डराया-बहकाया-भरमाया कि वे पैदल घर की ओर निकल पड़े। उल्लेखनीय है कि उस समय भी उन्होंने उनकी कोई मदद नहीं की, उलटे उनमें डर और घबराहट का माहौल तैयार किया। फिर वैक्सीन पर सवाल खड़े किये और कहा कि ये वैक्सीन प्रामाणिक एवं विश्वसनीय नहीं हैं, ये वैश्विक मानकों पर खरे नहीं उतरते। वैक्सीन के प्रति जनमानस के मन में अविश्वास पैदा करने में उन्होंने कोई कोर-कसर छोड़ी हो तो बताएँ? फिर वैक्सीन के कथित दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट्स) का रोना रोया। फिर अब कहना शुरु किया कि वैक्सीन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। और अब वैक्सीन के आवंटन में भेदभाव का आरोप। विपक्ष ने हमेशा गलत का साथ दिया, देश के सम्मुख खड़े संकट को कम करने की बजाय बढ़ाने में ही भूमिका निभाई। नासिक का होला-मोहल्ला कार्यक्रम में सरदारों का उपद्रव हो या दिल्ली के बोर्डर पर किसान आन्दोलन के नाम पर पनप रही कोरोना महासंकट की स्थितियां, विपक्ष कहीं भी अपनी भूमिका को सकारात्मक नहीं कर पाया। टिकैत अभी भी धरने पर बैठने और पचास हजार से अधिक की भीड़ जुटाने के दावे व अपील कर रहा है। लोग मर रहे हैं और वह तथाकथित किसान एकता के नाम पर इफ्तार पार्टियों का आयोजन हो रहे हैं, ऐसी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में साथ देकर विपक्ष क्या जताना चाहता है? जब विपक्ष के लिए जानलेवा विपदा भी सत्ता हथियाने एवं सरकार को नाकाम साबित करने का एक मौका मात्र हो तो लोकतंत्र कैसे मजबूत हो सकता है?  राजनीतिक दलों की सकारात्मकता ही कोरोना महामारी एवं उससे जुड़ी समस्याओं का समाधान है। उनके जितने भी नकारात्मक भाव (नेगेटिव एटीट्यूट) हैं, वे कोरोना महामारी एवं उससे जुड़ी समस्याओं से लडने की प्रणाली को कमजोर बनाते हैं और इससे लोकतंत्र की ताकत भी कमजोर होती है।  


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कोरोना को परास्त करने हेतु कठोर होना होगा

कोरोना को परास्त करने हेतु कठोर होना होगा

23-Apr-2021

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लेख- ललित गर्ग

कोरोना संक्रमण के तीन लाख से अधिक प्रतिदिन पीड़ितों की भयावहता भारतीयों को न केवल डरा रही है, बल्कि पीड़ित भी कर रही है। कोरोना के शिकार लोगों की तादाद का हर दिन नया आंकड़ा छूता दर्दनाक मंजर किसी बड़ी तबाही से कम नहीं है। पिछले दिनों महाराष्ट्र सहित देश के के कुछ अस्पतालों से विचलित करने वाली कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आयी, जिन्हें देखकर समूचा देश दहल गया। कल कहीं हमारी बारी तो नहीं? तय है, दर्दनाक दिन लौट आए हैं, अंधेरा घना है। सम्पूर्ण भारतीयों का जीवन संकट में है। लेकिन विडम्बना देखिये कि जब देश की स्वास्थ्य सेवाएं चैपट हो चुकी है, सरकारें पस्त है, जीवन दांव पर लगा है, तब भी प्रांतों की सरकारें एवं राजनीतिक दल औछी राजनीति कर रहे हैं।

बिगडे़ हालात एवं अनियंत्रित होती परिस्थितियों में सबसे बड़ी जरूरत राजनीति करने की बजाय कोरोना महामारी पर काबू पाने के मिशन में एकजुट होने की है, एक सकारात्मक एवं सर्वमान्य सोच को विकसित करने की है। भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जन-संबोधन में लाॅकडाउन को अन्तिम हथियार के रूप में काम में लेने की बात कहीं, लेकिन त्रासदी बनते एवं मौत का तांडव रचते कोरोना को काबू पाने के लिये कुछ तो कठोर निर्णय लेने ही होंगे, भले ही उससे कुछ समय के लिये अर्थ-व्यवस्था बाधित हो। मुंबई में रात्रि कफ्र्यू लगाते वक्त उद्धव ठाकरे ने कहा था कि हमें इससे भी कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। वह जैसे लोगों को चेता रहे थे, भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, कौन जाने? फिलहाल दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश सहित तमाम राज्यों के शहरों में रात्रि कफ्र्यू या साप्ताहिक बंदी का एलान किया गया है।

स्कूल-कॉलेज, कोचिंग संस्थान बंद कर दिये गये, 10वीं की परीक्षाएं स्थगित कर दी गयी तो 12वीं को कुछ समय के लिये टाल दिया गया, इन स्थितियों पर छात्रों का एक तर्क सामने आया था कि चुनावी रैलियों से अगर कोरोना नहीं फैलता, तो हमारी पढ़ाई से कैसे फैल सकता है? ठीक इसी तरह पंजाब में होटल, रिजॉर्ट और रेस्तरां मालिकों का तर्क भी सामने आया कि- ‘यदि सरकार अपना अस्तित्व बचाने के लिए राजनीतिक रैलियां कर सकती है, तो फिर हम अपना वजूद बचाने के लिए व्यापार क्यों नहीं कर सकते?’ इन तर्कों में वजन है, लेकिन ये जीवनदायी तर्क नहीं है। बड़े शहरों से श्रमिकों का पलायन पुनः शुरू हो गया है। मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश पहुंचने वाली सभी ट्रेनें खचाखच भरी हैं। जिन्हें जगह नहीं मिलती, वे सड़क परिवहन का सहारा ले रहे हैं। फैक्टरी मालिकों के चेहरों पर हवाइयां उड़ी हैं। उन्हें लगता है कि श्रमिकों के पलायन से उनका उत्पादन फिर से बाधित हो जाएगा। यही नहीं, श्रमबल के साथ बौद्धिकबल एवं कार्यबल के महंगा होने का भी भय सताने लगा है। तय है, महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली का दूसरा दौर हमारे दरवाजे खटखटा रहा है। सवाल उठता है कि ऐसे में क्या किया जाए? सरकार ने पाबंदियों के अलावा टीकाकरण अभियान तेज करने का फैसला किया है, पर इसकी अपनी सीमाएं हैं।

इन जटिल एवं हताश माहौल में सरकारों को कोसने से काम नहीं चलेगा, सरकारों के हाथ में भी कोई जादूई चिराग नहीं है। केंद्र की सरकार हो या राज्य सरकारें, सबने मिलकर, जो हो सका, अच्छा किया। भले ही कुछ सरकारों ने इस महामारी एवं असंख्य लोगों की जीवन-रक्षा जैसे मुद्दे में भी राजनीति करने एवं राजनीतिक लाभ तलाशने की कोशिशें की है। जबकि कुछ सरकारों ने राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर मानवीयता का उदाहरण प्रस्तुत किया। अपनी सारी शक्ति इस महामारी से जन-जन को बचाने एवं उनके उपचार के उपक्रमों में नियोजित कर दी। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश की योगी सरकार है। उनकी सरकार ने घोषणा कर दी है कि 18 वर्ष से 45 वर्ष तक के लोगों को सरकार अपने चिकित्सा केन्द्रों में मुफ्त वैक्सीन लगावयेगी और राज्य के बाहर से आने वाले प्रवासी मजदूरों का स्वागत भी करेगी परन्तु इसे समस्या का सम्पूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता क्योंकि बड़े शहरों से अपनी रोजी- रोटी छोड़ कर उत्तर प्रदेश आने वाले मजदूरों को दैनिक जीवन चलाने के लिए कमाई की जरूरत होगी। अतः योगी सरकार को इन प्रवासी मजदूरों की आर्थिक मदद करने की भी योजना अभी से तैयार कर लेनी चाहिए।

केन्द्र सरकार एवं कुछ राज्य सरकार की दलील है कि सम्पूर्ण लाॅकडाउन से आर्थिक गतिविधियां ठप्प होने का खतरा है जिससे लाखों लोगों की आजीविका व रोजगार प्रभावित होगा, अतः सरकारें कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए आवश्यक सभी कारगर कदम उठा रही है और कोशिश कर रही है कि संक्रमण कम से कम फैले। प्रशासनिक अधिकारों से लैस सरकार का प्राथमिक दायित्व लोगों की जानमाल की सुरक्षा का बनता है। सरकार का दायित्व यह भी है कि वह मानव-सृष्टि के प्रादुर्भाव से लेकर अब तक के इतिहास के सबसे भयावह संकट से निबटने में कुछ कठोर कदम उठाये। जैसाकि कोरोना दवाइयों एवं उपचार प्रक्रियाओं में घोर आर्थिक अपराध एवं भ्रष्टाचार होने की तस्वीरें सामने आयी है, रेमडेसिविर दवा की कालाबाजारी ने कुछ अधिक ही परेशान किया। आक्सीजन सिलेडरों की उपलब्धता में भी घोर लापरवाही देखने को मिली है, महाराष्ट्र के नासिक में आॅक्सीजन लीक होने एवं 24 कोरोना पीड़ितों की मौत की खबर ने तो लापरवाही की हदें ही पार कर दी है।

इन हालातों में कोरोना मरीजों को तत्काल राहत देने के लिये जरूरी है कि देश में सभी कोरोना उपचार की आर्थिक गतिविधियों को कुछ समय के लिये बन्द कर दिया जाये और सरकारी के साथ गैर-सरकारी अस्पतालों को कोरोना उपचार के लिये निःशुल्क कर दिया जाये। सरकारी-गैरसरकारी अस्पतालों में मंत्रियों एवं राजनेताओं के प्रभाव से उपचार को भी नियंत्रित करने की व्यवस्था हो। अन्यथा सारा उपचार वीवीआईपी केन्द्रित होने से अफरा-तफरी एवं अराजकता का माहौल बनने से रोकना संभव नहीं होगा। लोकतन्त्र में लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की ही बनती है क्योंकि वह लोगों की सरकार ही होती है। इसके साथ ही सरकारों की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि वे कोरोना के खिलाफ उठाये जाने वाले कदमों और लोगों की आजीविका से जुड़े मुद्दों का भी ध्यान रखें और इन दोनों के बीच इस प्रकार सामंजस्य बनायें जिससे आम जनता का दैनिक जीवन भी चलता रहे और कोरोना पर नियन्त्रण भी पाया जा सके।

केन्द्र सरकार एवं प्रांतों की सरकारों के मंत्री एवं राजनेता एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार से बाज नहीं आ रहे, यह बड़ी विडम्बना है। कोरोना के टीकों के वितरण पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यही वजह है कि गुरुवार की शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कमान संभाल ली। उन्होंने मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की, पर क्या इससे राजनीति खत्म, काम शुरू का दौर आरंभ हो सकेगा? जनता को भी जागना होगा, याद रखिए, यदि कोरोना से बचना है, तो हमें मास्क, शारीरिक दूरी, स्वच्छता और संतुलित खान-पान का ख्याल रखना ही होगा। यदि आप इसके लिए भी सरकारी निर्देशों-बंदिशों या पुलिस के डंडे की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो गलती कर रहे हैं।

यह सही है कि देश के आठ राज्यों से 80 प्रतिशत मरीज आते हैं, पर यह भी सच है कि जब हवाई, रेल और सड़क यातायात जारी हों, तब वहां से संक्रमण के अन्य जगह फैलने की आशंका से कदापि इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिये कुछ समय के लिये कोरोना फैलाने से जुड़ी सभी संभावनाओं पर विराम लगाना ही होगा। हमारे लिये एक सबक है कि पिछले वर्ष वुहान को अगर समय रहते अंतरराष्ट्रीय हवाई उड़ानों से अलग-थलग कर दिया गया होता, तो दुनिया इस महासंकट में न फंसती। क्या अपने देश में भी कुछ दिनों के लिये यात्रागत निषेध लागू किए जाएंगे? सरकारें चिंतित हैं, पर उनकी मजबूरी है। पिछले वर्ष के 68 दिन लंबे लॉकडाउन ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। अब अगर दोबारा लंबा लॉकडाउन लगा, तो हालात और दुरूह हो सकते हैं। भारत के सामने ऐसी अनेक चुनौतियां हंै, लेकिन इन चुनौतियांे से पार पाते हुए भारत को अब इस महासंकट से बचाने के लिये राजनीतिक-स्वार्थों से ऊपर उठना ही होगा, मानवीयता से चीजों को देखना होगा औा कठोर निर्णय लेने ही होंगे। ऐसा क्या हुआ कि एक वर्ष पहले ही स्थितियों की तुलना में कोरोना अधिक भयावह एवं जानलेवा होने के बावजूद कठोर निर्णय लेने से सरकारें बच रही है?
प्रेषकः  

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92


खौफ में जिंदगी, मौज में बेगर्द  वैध

खौफ में जिंदगी, मौज में बेगर्द वैध

21-Apr-2021

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लेख- हेमेन्द्र क्षीरसागर

विडंबना कहें या दुर्भाग्य नामचीन बड़ी-बड़ी डिग्री धारी डाक्टर इस विषम परिस्थितियों में भी जहां मानव जीवन घनघोर संकट में है, वहां कोरोना तो छोड़िए सामान्य बीमारियों का इलाज करने से कतरा रहा रहे हैं। और कर भी रहे तो आरटीपीसीआर टेस्ट की नेगेटिव रिपोर्ट मांगते नहीं अघाते। जो आने में तीन से चार दिन लग जाते हैं। इस बात को यह दंत कथित ईश्वर रूपी चिकित्सक भी भलीभांति जानते हैं। बावजूद बीमारों को परिवार के साथ रोता बिलखते मरने के लिए छोड़ देते हैं। दुर्दशा में लाचारों ने बिन कोरोना उपचार के अभाव में जान गवां दी। इतने पर भी कलयुगी भगवान कहें या दानव अपने कर्तव्य से मुंह फेर रहे हैं।

अलबत्ता, इनकी लंबी-लंबी डिग्री किस काम की, जो विपदा में इंसान के काम ना आऐ। हां! काम आएगी भी कैसे इनका पेशा व्यवसाय जो बन चुका। बरबस खौफ में जिदंगी, मौज में बेगर्द वैध ये कहां की नैतिकता और सेवा है। आखिर! कोरोना त्रासदी में उपचार से परहेज़ क्यों? क्या कभी किसी सैनिक को रणभूमि से भागते देखा है? भागा तो सीधा कोर्ट मार्शल। फिर इलाज से तौबा करते डाक्टरों के लिए क्या? इसका तो इलाज ढूंढ़ना ही होगा। अब! तो भला इसी में है की महामारी के बाद इन तथाकथितों से दूर से ही राम-राम!  की जाऐ। इनमें अब भी! जरा सी भी! इंसानियत बची हो तो मरीजों और गंभीरो का इलाज कर अपना फर्ज निभाऐ, वरना आने वाली पीढ़ियां इन्हें कोसते नहीं अघाऐंगी। येही वक्त की जरूरत और सच्ची मानवता है। 

ग्लानि, बेवजह इन चंद बेपरवाह डाक्टरों के चक्कर में चिकित्सकीय जैसा पवित्र काज शर्मसार होगा। जिसके लिए इन्हें कदापि माफ नहीं किया जाएगा। खैर! इनसे भले तो गांव और गलियों के बदकिस्मती से झोला छाप कहें जाने वाले डाक्टर जो मुसिबत में भी फरिश्ते बनकर जी जान से जिदंगी बचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लानत! है ऐसे मौकापरस्त चिकित्सकों पर जो मूल धर्म भूलकर जिंदगियां नहीं बचा पा रहें हैं। वीभत्स! यह जानते हुए कि इस समय कोरोना के प्रकोप से देश ही नहीं अपितु सारा विश्व जूझ रहा है वहां लापरवाह चिकित्सकों की नाफरमानी मानव दोषी और राष्ट्र विरोधी कृत्य से कम नहीं है। इसकी सजा तो इन्हें हर हाल में मिलनी चाहिए। लिहाजा ऐसे बेगर्जो की उदासीनता और हठधर्मिता के मद्देनजर इनकी लाइसेंस ही फ़ौरी तौर पर रद्द कर देना ही वक्त की नजाकत होगी। या सरकारी फरमान सुना कर काम पर लगा देना चाहिए। 

बेहतरीन, दूसरी ओर इन्हीं के कुल के दूसरे डाक्टर और पैरामेडिकल समेत पूरा अमला कोरोना वायरस का चारों पहर मुकाबला कर आमजन की बेपनाह सेवा में प्राणपण से जुटा हुआ हैं। जिनकी जितनी भी तारीफ की जाए उतनी कम होगी। सही मायनों में ऐसे कोरोना योद्धाओं को बारंबार प्रणाम करने का मन करता है। वाकई में यह सच्चे देशभक्त और मानव रक्षक हैं। इन्हीं के सांगोपांग समर्पण की वजह से आज जन-जीवन कोरोना के आगोश से मुक्त होकर स्वछंद मन से कह रहा है। जान है तो जहान है। मेरा डाक्टर, मेरा भगवान हैं। इसीलिए मेरा हिंदुस्तान महान हैं।


सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?

सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?

06-Apr-2021

सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?
- ललित गर्ग-

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भारतीय राजनीति में चुनाव का मौसम सबसे ज्यादा ठगाई, गुमराह एवं सपने दिखाने का मौसम होता है, भले ही उस समय असल में कोई भी मौसम क्यों न चल रहा हो। बिन मौसम  राजनेता अपनी निष्ठा बदलने की वर्षा करते हैं तो राजनीतिक दल चुनावी वायदों के जरिये स्वर्ग को ही धरती पर उतार लाने के ओले बरसाते हैं। यह खेल हर चुनाव से पहले खेला जाता है, फिर भी मतदाता खुद को भरमाने से नहीं बचा पाते। हर बार ठगा जाता है। कहने को चुनाव लोकतंत्र का महाकुंभ होता है, लेकिन इसी महाकुंभ में सर्वाधिक लोकतंत्र के हनन की घटनाएं होती है, जो चिन्ता का कारण बननी चाहिए।
चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी में वर्तमान चुनाव में आज जो राजनीतिक माहौल बन रहा है, जिस तरह रोज नए समीकरण बन या बिगड़ रहे हैं और जिस तरह सत्ता के खेल में आदर्शों पर आधारित सारे नियम ताक पर रखे जा रहे हैं, उसको देखते हुए किसी भी दल के किसी भी राजनेता की कथनी पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है। वैसे अपने आप में यह बहुत अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रहित की अपनी परिभाषाओं पर टिके रहने का साहस दिखाया है। इस साहस की प्रशंसा होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनावी महासंग्राम में जो कुछ हो रहा है, जिस तरह सत्ता को केंद्र बनाकर समीकरण बनाए जा रहे हैं एवं येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने के षडयंत्र रचे जा रहे हैं, उससे देश के समझदार तबके को चिंतित होना ही चाहिए। यह सही है कि मूल्य आधारित राजनीति की बात करना आज थोथा आदर्शवाद माना जाता है, लेकिन कहीं-न-कहीं तो हमें यह स्वीकारना ही होगा कि जिस तरह की अवसरवादी राजनीति हमारे लोकतंत्र पर हावी होती जा रही है, उससे देश के वास्तविक और व्यापक हितों पर विपरीत असर ही पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में हो रहे राजनीतिक तमाशे और राजनेताओं के बदलते चेहरे में हमें इस अवसर के बारे में भी जागरूक रहना होगा।
 पश्चिम बंगाल के चुनाव ने जिस तरह के भयावह परिवेश को निर्मित किया है, उसमें आम मतदाता उलझन में है, एक बड़ा सवाल है कि न केवल मतदाता बल्कि राजनेता को भी अचानक ही किसी दल में घुटन क्यों महसूस होने लगी? या फलां दल अचानक ही क्यों भाने लगा? आज जो शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में जंगल राज का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम में चुनौती दे रहे हैं, वह कल तक उन्हीं के विश्वासपात्र हुआ करते थे। पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार जिस युद्धस्तर पर लड़ा जा रहा है, उसमें युद्ध से ऐन पहले पाला बदलने वाले शुभेंदु पहले राजनेता नहीं हैं। ऐसे दलबदलु अवसरवादियों की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, जो कल तक किसी और दल व नेता के प्रति निष्ठा की कसमें खाते थे, पर अब किसी दूसरे दल-नेता के विश्वासी बनने का दम भर रहे हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल अनुत्तरित ही है कि जो उनके विश्वासी नहीं हुए, वे इनके विश्वासी कैसे होंगे? महाराष्ट्र में सुदृढ़ निष्ठाएं भी धराशायी होती हुई हमने देखी है। राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार के अपने भतीजे अजित पवार ने रात के अंधेरे में भाजपा से सत्ता की सौदेबाजी कर राकांपा तोड़ने की साजिश रची थी। यह अलग बात है कि उस सरकार की वैसी ही बेआबरू विदाई हुई, जैसी होनी चाहिए थी। आश्चर्यजनक यह भी रहा कि अजित पवार फिर अपनी निष्ठा बदल कर राकांपा में लौट आये और शिवसेना-कांग्रेस के साथ मिल कर बनी नयी सरकार में भी बिना शर्मिंदगी के उपमुख्यमंत्री बन गये। वैसे भारतीय राजनीति का अब शर्म से कोई रिश्ता रह नहीं गया है। कोई भी राजनीतिक दुर्भावना एवं विकृति शर्मसार क्यों नहीं करती?
लोकतंत्र की बुनियाद इसलिये भी खोखली होती जा रही है कि राजनीतिक दल अपनी कथनी-करनी का औचित्य साबित करने की चिंता ही नहीं करते। उन्हें इस बात की चिंता होती ही नहीं कि आज जो वे कह या कर रहे हैं, उसे यदि उनके बीते हुए कल की कथनी-करनी से तौला जाएगा तो उनकी क्या स्थिति होगी? वे यह भी नहीं सोचना चाहते कि आम लोग उनकी बात पर विश्वास क्यों करें? क्यों वे आम जनता को बेवकूफ समझते है? जनता के विश्वास से खेलना कब तक जारी रहेगी? लम्बे इंतजार करने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमल थाम लिया, जिसकी परिणति मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के पतन और शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन के रूप में हुई। जमीनी एवं जीवनदानी भाजपा कार्यकर्ताओं की कीमत पर सिंधिया समर्थकों को शिवराज सरकार में हिस्सेदारी मिल चुकी है। खुद ज्योतिरादित्य कोे नरेंद्र मोदी सरकार में प्रवेश का इंतजार है। पिछले साल ही राजस्थान में भी मध्य प्रदेश प्रकरण की पुनरावृत्ति के आसार नजर आये थे, पर अंतिम क्षणों में कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को मनाने में सफल हो गया और अशोक गहलोत सरकार बच गयी। अभी भी राजस्थान में सत्ता परिवर्तन का खेल कभी भी हो सकता है। ऐसी मिसालें कम नहीं हैं, जब हमारे राजनेताओं के रातोंरात हुए हृदय परिवर्तन ने सरकार गिरायी और बनायी हैं। विडम्बना तो यह है कि हृदय परिवर्तन अक्सर सत्ता परिवर्तन के लिए ही होता है, लोकतंत्र के लिये कोई आदर्श उदाहरण बनने के लिये नहीं।
इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण राजनीतिक स्थितियों को लेकर ढेरों मुहावरे एवं कहावतें बन चुकी हैं- राजनीति बदमाशों की अंतिम शरणस्थली है, प्यार, युद्ध और राजनीति में सब कुछ जायज है, राजनीति में कोई स्थायी मित्र या कोई स्थायी शत्रु नहीं होता, राजनीति अवसर भुनाने की कला है, राजनीति असंभव साधने की कला है आदि-आदि। और यह एक रोचक स्थिति है कि पिछले कुछ ही दिनों में देश ने इन और ऐसे सारे मुहावरों की हकीकत की बानगी किसी न किसी रूप में देख ली है। पश्चिम बंगाल चुनावों में जिस तरह के राजनीतिक समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं, जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उस सबसे हमारी राजनीति का अवसरवादी एवं विद्रूप चेहरा जरूर अलग-अलग रूपों में सामने आ रहा है। ऐसा नहीं कि पहले हमारी राजनीति के विरोधाभासी समीकरण कभी सामने नहीं आए, लेकिन जिस रूप में अब सामने आ रहे हैं, वह अपने आप में हमारी राजनीति को परिभाषित कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के तेवर पर देश में काफी चर्चा हो चुकी है, हो रही है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह समीकरण बनाए-बिगाड़े जा रहे हैं, उसे देखकर यह चिंता उभरनी ही चाहिए कि सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति हमें कहां पहुंचाएगी।
राजनीति और चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से 2020 के बीच हुए चुनावों में लड़ने वाले 405 में से 182 विधायक दल बदल कर भाजपा में शामिल हुए जबकि 38 विधायक कांग्रेस में और 25 विधायक टीआरएस में शामिल हुए। जिन नेताओं और दलों की निष्ठा और वफादारी का यह आलम है, उनके चुनावी वायदों के वफा होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? राजनीति की दूषित हवाओं ने लोकतंत्र की चेतना को प्रदूषित कर दिया है। जबकि लोकतंत्र की बुनियाद है राजनीति, जिसकी जनता की आंखों में पारदर्शिता होनी चाहिए। मगर आज राजनीति ने इतने मुखौटे पहन लिये हैं, छलनाओं के मकड़ जाल बुन लिये हैं कि उसका सही चेहरा एवं चरित्र पहचानना आम मतदाता के लिये बहुत कठिन हो गया है। कैसे राजनीति के प्रति मन श्रद्धा से झुके? क्योंकि वहां किसी मौलिक मुद्दे पर स्थिरता नहीं और जहां स्थिरता नहीं वहां विश्वास और आस्था कैसे संभव होगी?
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 

 

 


अंतिम सांसे लेता वामपंथ

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

24-Mar-2021

प्रीतीश नंदी

Pritish Nandy Blog - Times of India Blog

मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं लेकिन, मैं ऐसे राज्य में बड़ा हुआ, जहां कम्युनिस्टों ने 34 साल राज किया और भारत को कुछ बेहतरीन और ईमानदार नेता दिए. हालांकि, कार्यकर्ताओं के बारे में मैं उतनी निश्चतता से नहीं कह सकता. लेकिन, राजनीति में नेता और कार्यकर्ता हमेशा एक जैसा व्यवहार नहीं करते.

वामपंथ

कॉलेज में मैंने कुछ बहुत ही प्रखर और बुद्धिमान मित्रों को पढ़ाई छोड़कर एक उद्‌देश्य के लिए नक्सलबाड़ी में लड़ने जाते देखा. उद्‌देश्य था ऐसे राष्ट्र में किसानों को हक दिलाना, जिसे उनकी रत्तीभर परवाह नहीं थी- और आज भी नहीं है.

कल की ही बात है मैंने अपनी खिड़की के बाहर हंसिया व हथौड़े वाले लाल झंडों का सागर लहराते देखा, जब हजारों किसान मुंबई चले आए. मीलों पैदल चलने के कारण उनके पैरे जख्मी हो गए, उनमें छाले पड़ गए थे, तो मुझे उन दिनों के लाल झंडे की ताकत याद आई. इतने दशकों में इन किसानों के लिए कुछ भी नहीं बदला. परिवार बढ़ने से उनकी जमीनें सिकुड़ती गई है.

आज भी बारिश देर से या अपर्याप्त हो तो उनकी फसलें बर्बाद हो जाती हैं. सिंचाई पर खर्च की गई अपार राशि हवा में गायब हो गई. कम से कम महाराष्ट्र में तो यही हालत है. सरकारों से मिले वादे, वादे ही रहे. कर्ज, दरिद्रता और घोर निराशा के कारण किसानों की आत्महत्या की दर खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है.

मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं फिर चाहे मैंने एक युवक के रूप में प्रशंसा की नज़रों से कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं को साहसपूर्वक कोलकाता के सांप्रदायिक दंगों के बीच जाकर तत्काल शांति स्थापित करते देखा है.

वे बहादुर लोग थे और उनका बड़ा सम्मान था. धर्म-जाति उनकी राजनीति के हिस्से नहीं थे. वे महान विज़नरी नहीं थे. उन्होंने कभी अच्छे दिनों का वादा नहीं किया. किंतु वे लोगों की सुनते थे और सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करते थे जो (ईमानदारी से कहें तो) प्राय: पर्याप्त अच्छा नहीं होता था.

उनके हीरो सारी जगहों से थे. लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग, फिदेल कास्त्रों, हो चि मिन्ह. न तो कास्त्रो और न हो चि मिन्ह कम्युनिस्ट थे. वे तो सिर्फ देशभक्त थे, जो अपने देश के लिए लड़ रहे थे. लेकिन अमेरिकी दुष्प्रचार ने दिन-रात एक करके उन पर कम्युनिस्ट का लेबल लगा दिया.

मैं युवा था और मेरे हीरो अलग थे. चे, 1968 के वसंत में पेरिस में छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले डेनी द रेड और कोलंबियाई पादरी व मार्क्सवाद और कैथोलिक आस्था को मिलाने वाले मुक्ति शास्त्र के अग्रदूत कैमिलो टॉरेस.

उनमें से कोई भी सोवियत शैली की तानाशाही सत्ता में भरोसा नहीं करता था. वे अपने देश के लिए, एक सपने के लिए लड़ रहे थे. उन दिनों कम्युनिज्म कोई सुगठित विचारधारा नहीं थी, यह तो कुछ करने का आह्वान भर था. इसलिए जब पूर्वी और मध्य यूरोप ने सोवियतों को बाहर निकालने का फैसला किया तो मुझे खुशी हुई.

9 नवंबर 1989 की रात को पूर्व व पश्चिम जर्मनी को विभाजित करने वाली 96 मील लंबी बर्लिन की दीवार- जो कम्युनिस्ट व स्वतंत्र यूरोप के बीच दिल तोड़ देने वाले विभाजन की प्रतीक थी- भरभरागर गिर गई.

पेरिस्त्राइका और ग्लासनोस्त जैसे शब्द राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बन गए. और जॉन एफ केनेडी की प्रसिद्ध घोषणा ‘इश बिन आइन बर्लिनेर’ (मैं बर्लिनवासी हूं) 26 साल बाद नए यूरोप में फिर गूंजने लगी, जहां स्वतंत्रता ही सब कुछ थी. दो साल बाद 25 दिसंबर को क्रेमलिन से सोवियत ध्वज आखिरी बार नीचे लाया गया.

इसके पहले उसी दिन गोर्बाचेव राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे चुके थे. नया रूस जन्म ले चुका था और कई राष्ट्र अस्तित्व में आए थे. तब पहली बार लेनिन का आसन डावांडोल हुआ. कीव के अच्छे लोगों ने उन्हें काफी बाद में धरती पर गिराया. सोवियत संघ के पतन के साथ लाल झंडे का रोमांस यहां भी काफी कम हो गया. पश्चिम बंगाल का गढ़ सबसे पहले ध्वस्त हुआ.

हालांकि, ममता बनर्जी ने वामपंथ की इमारत ढहाई थी पर वामपंथी कार्यकर्ता अब तृणमूल के थे. सिर्फ नाम बदला था. केरल अब कम्युनिस्टों का गढ़ था. फिर त्रिपुरा था, जहां माणिक सरकार 20 साल से मुख्यमंत्री थे. वे हाल ही में चुनाव हार गए और चूंकि उनका कोई घर नहीं है (और बैंक में 9,720 रुपए होने के कारण घर खरीद नहीं सकते थे) तो वे अब पत्नी के साथ पार्टी दफ्तर में रहते हैं. उन्हें निर्धनतम मुख्यमंत्री माना गया है.

चित्र:H1N1 India map per confirmed cases.svg - विकिपीडिया

ज्योति बसु के बाद आए बुद्धदेब भट्‌टाचारजी 2011 में ममता बनर्जी से चुनाव हारने के पहले 11 साल तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे. वे छोटे-छोटे दो कमरों के सरकारी प्लैट में पत्नी और बेटी के साथ रहते हैं. उन्होंने बैंक खाते में पड़े 5000 रुपए के साथ चुनाव लड़ा था. कई लोग कम्युनिस्टों के जाने से खुश हैं पर मुझे बुद्धदेब और माणिक सरकार जैसे लोगों की कमी खलेगी. केवल वामपंथ ही ऐसे लोग दे सकता था : ईमानदार, किफायती और किसी कांड से अछूते.

एक और कम्युनिस्ट थे, जिनका मैं प्रशंसक था: ज्योति बसु, जो 23 साल मुख्यमंत्री रहे. विद्वता के कारण उनका बहुत सम्मान था .1996 में वे प्रधानमंत्री होते. राजीव ने उनका सुझाया था और उन पर आम सहमति थी लेकिन, प्रकाश करात के नेतृत्व वाले पार्टी सहयोगियों ने उनका समर्थन नहीं किया. भारत ने पहला कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री होने का मौका गंवा दिया, जो सत्यजीत राय और रविशंकर के साथ उतने ही सहज थे, जितने कार्ल मार्क्स के साथ.

नहीं, मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं लेकिन, मैं जिन कुछ बेहतरीन कलाकार, कवि, संगीतकार और विचारकों को जानता था वे किसी न किसी तरह वामपंथ से प्रेरित थे. मुझे बरसों पहले समर सेन और सुभाष मुखोपाध्याय का अनुवाद करना याद है.  वे अद्‌भुत कवि थे. मैंने साहिर व कैफी आज़मी तथा फैज़ और सरदार जाफरी का भी अनुवाद किया था. ये सब बहुत अच्छे संवेदनशील कवि थे, जो अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के विचार से प्रेरित थे.

मुझे श्री श्री और गद्‌दार याद आते हैं जिनके गीत लोगों को प्रेरित करते थे. बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी याद है? मुझे अमृता प्रीतम याद आती हैं, जिनकी कविताओं का भी मैंने अनुवाद किया है. और सलील चौधरी, जिनके अमर गीत हेमंत मुखर्जी ने गाए? कम्युनिज्म अपने अंतिम चरण में है. हर कोई यह जानता है. यह साबित करने के लिए आपको लेनिन की प्रतिमा गिराने की जरूरत नहीं है. दुनिया आगे बढ़ गई है.

 

रविवार से साभार 


जीवन को अपसेट नहीं, परफेट बनाये

जीवन को अपसेट नहीं, परफेट बनाये

15-Mar-2021

जीवन को अपसेट नहीं, परफेट बनाये
ललित गर्ग 

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आज सुविधाओं का बहुत विस्तार हुआ है, जो साधन किसी समय में विरले व्यक्तियों के लिए सुलभ थे, वे आज सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं, आज साधारण परिवारों में भी टी.वी. है, लेपटाप है, मोबाइल है, कार है, सोफा-सेट है, गोल्डन-सेट है, डायमण्ड-सेट है, पर इन सारे कीमती सेटों के बावजूद मन ‘अपसेट’ है? व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तनाव, टकराव और बिखराव बढ़ रहे हैं। हमारे जीवन में मन की शांति साधन-सुविधाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण है, लेकिन हमारा ध्यान उस ओर नहीं जा रहा है। नतीजा इंसान का मिजाज बिगड़ रहा है, जिससे वह स्वयं भी अशांत रहता है, पारिवारिक जीवन भी अशांत और अव्यवस्थित रहता है और इसका प्रभाव समाज एवं देश में भी देखने को मिलता है।
‘मूड-आॅफ’ की बात मम्मी-पापा ही नहीं, छोटे-छोटे बच्चों में देखने को मिलती है। जब तक मन को प्रशिक्षित, संतुलित और अनुशासित बनाने की दिशा में मानव समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक बौद्धिक और आर्थिक समृद्धि भी तलवार की धार बन सकती है, विकास और उल्लास का साधन नहीं होकर विषाद और विनाश का कारण हो सकती है। जीवन अवसर नहीं, अनुभव का नाम है। हर समय की तेरी-मेरी, हार-जीत और हरेक चीज को अपने काबू में करने की उठापटक बेचैनी के सिवा कुछ नहीं देती। हर पल आशंकाओं से घिरा मन जिंदगी के मायने ही नहीं समझ पा रहा है। ओशो तो कहते हैं कि जीवन तथ्य नहीं, केवल एक संभावना है-जैसे बीज, बीज में छिपे हैं हजारों फूल, पर प्रकट नहीं, अप्रकट हैं। बहुत गहरी खोज करोगे तो ही पा सकोगे।
किसी न किसी रूप में दुख हरेक की जिंदगी में होता है। कई बार कचोट इतनी गहरी होती है कि जैसे-जैसे समय बीतता है, उसकी कड़वाहट हर चीज को अपनी गिरफ्त में लेने लगती है। पर दार्शनिक रूमी कहते हैं, ‘ देखना, तुम्हारे दुख और दर्द जहरीले न हो जाएं। अपने दर्द को प्रेम और धैर्य के धागे के साथ गूंथना।’ ऐसा करने का एक ही माध्यम है मन को समझाना, उसे तैयार करना। मन के संतुलन एवं सशक्त स्थिति से, मन की भावना और कल्पना से ही मनुष्य सम्राट और भिखारी होता है। जिसका मन प्रसन्न और स्वस्थ है, वह अकिंचन होकर भी सम्राट है। जो अशांति और व्याकुलता के दावानल में जलता रहता है, वह संपन्न और समृद्ध होकर भी भिखारी के समान है। मानसिक स्वास्थ्य एवं संतुलन के अभाव में थोड़ी-सी प्रतिकूलता भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती है। उस स्थिति में जीना भी भार प्रतीत होने लगता है। ऐसे लोगों के सिर संसार की कोई भी शक्ति आलंबन नहीं हो सकती। ‘मन के जीते जीत है, मन के हारे हार’-यह कहावत बिल्कुल सही है। अनुकूलता और प्रतिकूलता, सरलता और कठिनता तथा सुख व दुःख की अनुभूति के साथ मन की कल्पना का संबंध निश्चित होता है।
जिस प्रकार दिन और रात का अभिन्न संबंध है उसी प्रकार सुख-दुःख, हर्ष-शोक, लाभ-अलाभ व संयोग-वियोग का संबंध भी अटल है। हमें सच्चाई को गहराई से आत्मसात् करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति और परिस्थिति के प्रति शिकायत, ईष्र्या, धृणा, द्वेष और गिला-शिकवा की भाषा में नहीं सोचना चाहिए। जब मन में शांति के फूल खिलते हैं, तो कांटों में भी फूलों का दर्शन होता है। जब मन में अशांति के कांटे होते हैं तो फूलों से भी चुभन और पीड़ा का अनुभव होता है।
कहा जाता रहा है- ईष्र्या मत करो, धृणा और द्वेष मत करो। क्योंकि ये समस्या के कारण हैं। यह उपदेश धर्म की दृष्टि से ही नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है। विज्ञान ने यह प्रमाणित कर दिया है- जो व्यक्ति स्वस्थ रहना चाहता है, उसे निषेधत्मक भावों से बचना चाहिए। बार-बार क्रोध करना, चिड़चिड़ापन आना, मूड का बिगड़ते रहना- ये सारे भाव हमारी समस्याओं से लडने की शक्ति को प्रतिहत करते हैं। इनसे ग्रस्त व्यक्ति खुशियों से वंचित होकर बहुत जल्दी बीमार पड़ जाता है। खुशियों की एक कीमत होती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि सर्वश्रेष्ठ खुशियों का कोई दाम नहीं होता। जितना हो सके झप्पियां, मुस्कराहटें, दोस्त, परिवार, नींद, प्यार, हंसी और अच्छी यादों के खजाने बढ़ाते रहें।
 धूप और छांव की तरह जीवन में कभी दुःख ज्यादा तो कभी सुख ज्यादा होते हैं। जिन्दगी की सोच का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि जिन्दगी में जितनी अधिक समस्याएं होती हैं, सफलताएं भी उतनी ही तेजी से कदमों को चुमती हैं। बिना समस्याओं के जीवन के कोई मायने नहीं हैं। समस्याएं क्यों होती हैं, यह एक चिन्तनीय प्रश्न है। यह भी एक प्रश्न है कि हम समस्याओं को कैसे कम कर सकते हैं। इस प्रश्न का समाधान आध्यात्मिक परिवेश में ही खोजा जा सकता है।
अति चिन्तन, अति स्मृति और अति कल्पना- ये तीनों समस्या पैदा करते हैं। शरीर, मन और वाणी- इन सबका उचित उपयोग होना चाहिए। यदि इनका उपयोग न हो, इन्हें बिल्कुल काम में न लें तो ये निकम्मे बन जायेंगे। यदि इन्हें बहुत ज्यादा काम में लें, अतियोग हो जाए तो ये समस्या पैदा करेंगे। इस समस्या का कारण व्यक्ति स्वयं है और वह समाधान खोजता है दवा में, डाॅक्टर में या बाहर आॅफिस में। यही समस्या व्यक्ति को अशांत बनाती है। जरूरत है संतुलित जीवनशैली की। जीवनशैली के शुभ मुहूर्त पर हमारा मन उगती धूप  की तरह ताजगी-भरा होना चाहिए, क्योंकि अनुत्साह भयाक्रांत, शंकालु, अधमरा मन समस्याओं का जनक होता है। यदि हमारे पास विश्वास, साहस, उमंग और संकल्पित मन है तो दुनिया की कोई ताकत हमें अपने पथ से विचलित नहीं कर सकती और सफलता का राजमार्ग भी यही है। व्यक्ति के उन्नत प्रयास ही सौभाग्य बनते हंै।
छोटे-छोटे सुख हासिल करने की इच्छा के चलते हम कई बार पूरे माहौल एवं जीवन को प्रभावित करते हैं, दूषित बना देते हंै। किसी के घर के आगे गाड़ी पार्क करने से लेकर पीने के पानी से वाहन की धुलाई करने तक, ऐसी ही नकारात्मकताएं पसरी है। ये उन्नत जीवन की राह में रोड़े हैं। हमें और भी कई तरह के गिले-शिकवे, निंदा, चुगली और उठा-पटक से गुजरना पड़ता है। गुस्सा आता है और कई तरह की कुंठाएं सिर उठाने लगती हैं। लेखक टी. एफ. होग कहते हैं, ‘ कुंठाओं से पार पाने का एक ही तरीका है कि हम बाधाओं की बजाय नतीजों पर नजर रखें।’ हम सबसे पहले यह खोजें- जो समस्या है, उसका समाधान मेरे भीतर है या नहीं? बीमारी पैदा हुई, डाॅक्टर को बुलाया और दवा ले ली। यह एक समाधान है पर ठीक समाधान नहीं है। पहला समाधान अपने भीतर खोजना चाहिए। एक व्यक्ति स्वस्थ रहता है। क्या वह दवा या डाक्टर के बल पर स्वस्थ रहता है? या अपने मानसिक बल यानी सकारात्मक सोच पर स्वस्थ रहता है? हमारी सकारात्मकता अनेक बीमारियों एवं समस्याओं का समाधान है। जितने नकारात्मक भाव (नेगेटिव एटीट्यूट) हैं, वे हमारी बीमारियांे एवं समस्याओं से लडने की प्रणाली को कमजोर बनाते हैं।


प्रेषकः-(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
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शुभ के सृजन का दुर्लभ अवसर है महाशिवरात्रि

शुभ के सृजन का दुर्लभ अवसर है महाशिवरात्रि

13-Mar-2021

महाशिवरात्रि-11 मार्च, 2021 पर विशेष
-ः ललित गर्ग:-

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फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है, यह हिंदुओं का एक धार्मिक त्योहार है, जिसे हिंदू धर्म के प्रमुख देवता महादेव अर्थात शिवजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह शिव से मिलन की रात्रि का सुअवसर है। इसी दिन निशीथ अर्धरात्रि में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये यह पुनीत पर्व सम्पूर्ण देश एवं दुनिया में उल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सांस्कृतिक एवं धार्मिक चेतना की ज्योति किरण है। इससे हमारी चेतना जाग्रत होती है, जीवन एवं जगत में प्रसन्नता, गति, संगति, सौहार्द, ऊर्जा, आत्मशुद्धि एवं नवप्रेरणा का प्रकाश परिव्याप्त होता है। यह पर्व जीवन के श्रेष्ठ एवं मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
आध्यात्मिक पथ पर चलने वालों के लिए महाशिवरात्रि का पर्व बहुत महत्वपूर्ण है। पारिवारिक परिस्थितियों में जी रहे लोगों तथा महत्वाकांक्षियों के लिए भी यह उत्सव बहुत महत्व रखता है। जो लोग परिवार के बीच गृहस्थ हैं, वे महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव के रूप में मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं से घिरे लोगों को यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि शिव ने अपने सभी शत्रुओं पर विजय पा ली थी। महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है। ये आपको, हर मनुष्य के भीतर छिपे उस अथाह शून्य के अनुभव के पास ले जाती है, जो सारे सृजन का स्त्रोत है।
भगवान शिव आदिदेव है, देवों के देव है, महादेव हैं। सभी देवताओं में वे सर्वोच्च हंै, महानतम हंै, दुःखों को हरने वाले हंै। वे कल्याणकारी हंै तो संहारकर्ता भी हैं। शिव भोले भण्डारी है और जग का कल्याण करने वाले हैं। सृष्टि के कल्याण हेतु जीर्ण-शीर्ण वस्तुओं का विनाश आवश्यक है। इस विनाश में ही निर्माण के बीज छुपे हुए हैं। इसलिये शिव संहारकर्ता के रूप में निर्माण एवं नव-जीवन के प्रेरक भी है। सृष्टि पर जब कभी कोई संकट पड़ा तो उसके समाधान के लिये वे सबसे आगे रहे। जब भी कोई संकट देवताओं एवं असुरों पर पड़ा तो उन्होंने शिव को ही याद किया और शिव ने उनकी रक्षा की। समुद्र-मंथन में देवता और राक्षस दोनों ही लगे हुए थे। सभी अमृत चाहते थे, अमृत मिला भी लेकिन उससे पहले हलाहल विष निकला जिसकी गर्मी, ताप एवं संकट ने सभी को व्याकुल कर दिया एवं संकट में डाल दिया, विष ऐसा की पूरी सृष्टि का नाश कर दें, प्रश्न था कौन ग्रहण करें इस विष को। भोलेनाथ को याद किया गया गया। वे उपस्थित हुए और इस विष को ग्रहण कर सृष्टि के सम्मुख उपस्थित संकट से रक्षा की। उन्होंने इस विष को कंठ तक ही रखा और वे नीलकंठ कहलाये। इसी प्रकार गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये भोले बाबा ने ही सहयोग किया। क्योंकि गंगा के प्रचंड दबाव और प्रवाह को पृथ्वी कैसे सहन करें, इस समस्या के समाधान के लिये शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को समाहित किया और फिर अनुकूल गति के साथ गंगा का प्रवाह उनकी जटाओं से हुआ।
सृष्टि से जुड़े अनेक संकट और उनसे मुक्ति के शिव-प्रयत्नों केे घटना-क्रम हैं जिनके लिये शिव ने अपनी शक्तियों, तप और साधना का प्रयोग करके दुनिया को नव-जीवन प्रदान किया। शिव का अर्थ ही कल्याण है, वही शंकर है, और वही रुद्र भी है। शंकर में शं का अर्थ कल्याण है और कर का अर्थ करने वाला। रुद्र में रु का अर्थ दुःख और द्र का अर्थ हरना- हटाना। इस प्रकार रुद्र का अर्थ हुआ, दुःख को दूर करने वाले अथवा कल्याण करने वाले। शिव की प्रतिमाओं में तीसरा नेत्र अवश्य बनाया जाता है, शिवालयों की रचना बिना नन्दी की मूर्ति के पूर्ण नहीं होती, प्रश्न है कि ये केवल आस्था एवं पूजा-विधान की बात है या इसके गूढ़ एवं सृजनकारी अर्थ भी है? शिव का तीसरा नेत्र भौतिक नेत्र नहीं हैख् वहीं नंदी भी केवल एक बेल मात्र नहीं है, ये दोनों जीवन एवं सृष्टि से जुड़ी अर्थपूर्ण संरचनाएं है, इसके मर्म को समझकर ही हम शिव की साधना के सक्षम पात्र हो सकते हैं। असल में ये अद्भुत प्रेरणा एवं शक्ति है जो हमें शिव की तरह जीवन को देखने के लिये प्रेरित करती है।
 भौतिक एवं भोगवादी भागदौड़ की दुनिया में शिवरात्रि का पर्व भी दुःखों को दूर करने एवं सुखों का सृजन करने का प्रेरक है। भोलेनाथ भाव के भूखे हैं, कोई भी उन्हें सच्ची श्रद्धा, आस्था और प्रेम के पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना कर सकता है। दिखावे, ढोंग एवं आडम्बर से मुक्त विद्वान-अनपढ़, धनी-निर्धन कोई भी अपनी सुविधा तथा सामथ्र्य से उनकी पूजा और अर्चना कर सकता है। शिव न काठ में रहता है, न पत्थर में, न मिट्टी की मूर्ति में, न मन्दिर की भव्यता में, वे तो भावों में निवास करते हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूजा एवं अभिषेक करने पर उपासक को समस्त तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं। शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प तथा प्रसाद में भांग अति प्रिय हैं। लौकिक दृष्टि से दूध, दही, घी, शकर, शहद- इन पाँच अमृतों (पंचामृत) का पूजन में उपयोग करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। शिवरात्रि वह समय है जो पारलौकिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों प्रकार की व्यथाओं, संतापों, पाशों से मुक्त कर देता है। शिव की रात शरीर, मन और वाणी को विश्राम प्रदान करती है। शरीर, मन और आत्मा को ऐसी शान्ति प्रदान करती है जिससे शिव तत्व की प्राप्ति सम्भव हो पाती है। शिव और शक्ति का मिलन गतिशील ऊर्जा का अन्तर्जगत से एकात्म होना है। लौकिक जगत में लिंग का सामान्य अर्थ चिह्न होता है जिससे पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग की पहचान होती है। शिव लिंग लौकिक के परे है। इस कारण एक लिंगी है। आत्मा है। शिव संहारक हैं। वे पापों के संहारक हैं। शिव की गोद में पहुंचकर हर व्यक्ति भय-ताप से मुक्त हो जाता है।
शिव पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने इसी दिन रुद्र रूपी शिव को उत्पन्न किया था। शिव एवं हिमालय पुत्री पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। अतः यह शिव एवं शक्ति के पूर्ण समरस होने की रात्रि भी है। वे सृष्टि के सर्जक हैंै। वे मनुष्य जीवन के ही नहीं, सृष्टि के निर्माता, पालनहार एवं पोषक हैं। उन्होंने मनुष्य जाति को नया जीवन दर्शन दिया। जीने की शैली सिखलाई। शिवरात्रि भोगवादी मनोवृत्ति के विरुद्ध एक प्रेरणा है, संयम की, त्याग की, भक्ति की, संतुलन की। सुविधाओं के बीच रहने वालों के लिये सोचने का अवसर है कि वे आवश्यक जरूरतों के साथ जीते हैं या जरूरतों से ज्यादा आवश्यकताओं की मांग करते हैं। इस शिवभक्ति एवं उपवास की यात्रा में हर व्यक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि शिशुभाव जागता है। क्रोध नहीं, क्षमा शोभती है। कष्टों में मन का विचलन नहीं, सहने का धैर्य रहता है। यह तपस्या स्वयं के बदलाव की एक प्रक्रिया है। यह प्रदर्शन नहीं, आत्मा के अभ्युदय की प्रेरणा है। इसमें भौतिक परिणाम पाने की महत्वाकांक्षा नहीं, सभी चाहों का संन्यास है।
शिव ने संसार और संन्यास दोनों को जीया है। उन्होंने जीवन को नई और परिपूर्ण शैली दी। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति की जीवन में आवश्यकता और उपयोगिता का प्रशिक्षण दिया। कला, साहित्य, शिल्प, मनोविज्ञान, विज्ञान, पराविज्ञान और शिक्षा के साथ साधना के मानक निश्चित किए। सबको काम, अर्थ, धर्म, मोक्ष की पुरुषार्थ चतुष्टयी की सार्थकता सिखलाई। वे भारतीय जीवन-दर्शन के पुरोधा हैं। आज उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व सृष्टि के इतिहास का एक अमिट आलेख बन चुका है। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रेरणास्रोत है। लेकिन हम इतने भोले हैं कि अपने शंकर को नहीं समझ पाए, उनको समझना, जानना एवं आत्मसात करना हमारे लिये स्वाभिमान और आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला अनुभव सिद्ध हो सकता है। मानवीय जीवन के सभी आयाम शिव से ही पूर्णत्व को पाते हैं।  
आज चारों ओर अनैतिकता, आतंक, अराजकता और अनुशासनहीनता का बोलबाला है। व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र- हर कहीं दरारे ही दरारे हैं, हर कहीं टूटन एवं बिखराव है। मानवीय दृष्टि एवं जीवन मूल्य खोजने पर भी नहीं मिल रहे हैं। मनुष्य आकृति से मनुष्य रह गया है, उसकी प्रकृति तो राक्षसी हो चली है। मानवता क्षत-विक्षत होकर कराह रही है। इन सबका कारण है कि हमने आत्म पक्ष को भुला दिया है। इन विकट स्थितियों में महादेव ही हमें बचा सकते हैं, क्योंकि शिव ने जगत की रक्षा हेतु बार-बार और अनेक बार उपक्रम किये।
वस्तुतः अपने विरोधियों एवं शत्रुओं को मित्रवत बना लेना ही सच्ची शिव भक्ति है। जिन्हें समाज तिरस्कृत करता है उन्हें शिव गले लगाते हैं। तभी तो अछूत सर्प उनके गले का हार है, अधम रूपी भूत-पिशाच शिव के साथी एवं गण हैं। समाज जिनकी उपेक्षा करता है, शंकर उन्हें आमंत्रित करते हैं। शिव की बरात में आए नंग-धडं़ग, अंग-भंग, भूत-पिशाच इसी तथ्य को दृढ़ करते हैं। इस लिहाज से शिव सच्चे पतित पावन हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण देवताआंे के अलावा दानव भी शिव का आदर करते हैं। सचमुच! धन्य है उनकी तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता, दृढ़-संकल्पशक्ति, धैर्यशीलता, आत्मनिष्ठा और अखण्ड साधनाशीलता।
प्रे्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


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