कारपोरेटी मुनाफे के यज्ञ कुंड में मनु के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

कारपोरेटी मुनाफे के यज्ञ कुंड में मनु के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

16-May-2022

कारपोरेटी मुनाफे के यज्ञ कुंड में मनु के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

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आलेख : बादल सरोज

2 तथा 3 मई की दरमियानी रात मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के गाँव सिमरिया में जो हुआ, वह भयानक था। बाहर से गाड़ियों में लदकर पहुंचे बजरंग दल और राम सेना के गुंडा गिरोह ने पहले घर में सोते हुए आदिवासी धनसा इनवाती को निकाला, उसके बाद दूसरे आदिवासी सम्पत बट्टी को उनके घरों से निकाला और लाठियों से पीट-पीटकर ढेर कर दिया। चीखपुकार सुनकर जब आस-पड़ोस के दो गाँवों की भीड़ इकट्ठा हो गयी, तो इन गुंडों ने ही पुलिस को फोन किया। पुलिस आयी और बजाय हमलावरों के इन दोनों आदिवासियों को ही उठाकर ले गयी।  ग्रामीणों के मुताबिक़ रास्ते में और उसके बाद बादलपुर पुलिस चौकी में इस गुंडा गिरोह और पुलिस दोनों ने मिलकर फिर धनसा और सम्पत की पिटाई की। उसके बाद बजाय सिवनी के जिला अस्पताल ले जाने के उन्हें कुरई के उस अस्पताल में ले गयी, जहां कोई डॉक्टर ही नहीं था। सुबह होने से पहले धनसा और उसके बाद सम्पत ने दम तोड़ दिया। बजरंगदलियों और रामसैनिक नामधारियों का दावा था कि ये लोग गाय और गौ मांस की तस्करी में लिप्त थे ; हालांकि न तो ऐसी कोई जब्ती हुयी, ना हीं इस बिना पर खुदमुख्तियार बनने की किसी भी क़ानून में इजाजत ही है। जाहिर है यह, जैसा कि आमतौर से कहा गया, मॉब लिंचिंग (भीड़ हत्या) नहीं थी। यह बाकायदा तैयारी के साथ किया गया हमला और पूर्व नियोजित हत्या थीं।

बात यहीं तक नहीं रुकी। इस जघन्य बर्बरता पर भड़के रोष और विक्षोभ के बाद कुछ गिरफ्तारियां हुयी, लेकिन खुद मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा इन हत्यारों के समर्थन में कूद पड़े और आधिकारिक पत्रकार वार्ता में कहा कि "इस मामले में अब तक प्रथम दृष्टया बजरंग दल से जुड़े लोगों की बात सामने नहीं आयी है।" जबकि हमले में शामिल कुछ लोगों की गिरफ्तारी के बाद खुद सिवनी जिले के कुरई थाने के एसएचओ ने टीवी चैनलों से बात करते हुए कहा है कि "इस घटना में गिरफ्तार किये गए तीन आरोपी बजरंग दल के हैं और छह श्रीराम सेना के हैं।" इसके पहले इन सभी हत्यारों  के सिवनी भर में लगे फ्लैक्स और खुद इनके सोशल मीडिया के स्क्रीन शॉट वायरल हो चुके थे, जिनमें उनके इन दोनों संगठनों से जुड़ाव सामने आ चुके थे। इसके बाद भी गृहमंत्री का उनकी तरफदारी का बयान विवेचना और न्यायप्रणाली में लगे कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए साफ़ संकेत था।

सिवनी महाराष्ट्र के नागपुर से जुड़ा मध्य प्रदेश का सीमावर्ती जिला है। आरएसएस यहां आक्रामक रूप से सक्रिय है। मगर यह सिर्फ सिवनी भर का मामला नहीं है। इसके ठीक दो दिन पहले राजस्थान से बैल खरीद कर लौट रहे झाबुआ के दो आदिवासियों की चित्तौड़गढ़ में इसी तरह पिटाई लगाई गयी।  इनमे से एक की मौत हो चुकी है, दूसरा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। मामला सिर्फ आदिवासियों भर का भी नहीं है। सिवनी होने के ठीक एक दिन पहले गुना में एक दलित बुजुर्ग की चिता को श्मशान के चबूतरे से उठा दिया गया। उसे जमीन पर जलाने के लिए विवश किया गया। उसके कुछ दिन पहले मालवा में ही उज्जैन जिले के गांव चांदवासला, धार जिले के बदनावर पुलिस थाना के अंतर्गत गांव खंडीगारा, उज्जैन जिले के ही पुलिस थाना भाट पचलाना के गांव बर्दिया में दलित दूल्हों को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया गया। सिवनी के दो दिन बाद रीवा में आदिवासियों के झोपड़े चौथी बार जला दिए गए, जिनकी रिपोर्ट लेने से स्थानीय पुलिस थाने ने साफ़ इंकार कर दिया।

यह इधर-उधर हुयी फुटकर घटनाएं नहीं हैं। इनकी निरंतरता और आवृत्ति, तीव्रता और बर्बरता में लगातार बढ़त  हो रही है।  यह आरएसएस की राजनीतिक भुजा - भाजपा - के राज में मनुस्मृति के आधार पर राजकाज ढालने की प्रक्रिया है। इसकी व्याप्ति आदिवासियों से लेकर दलितों, महिलाओं, अति पिछड़ी जातियों के समुदायों सभी पर है। इन पंक्तियों में यहां सिर्फ आदिवासी समुदाय के साथ हो रहे बर्ताव के कुछ पहलुओं पर नजर डालना सामयिक होगा। 

वर्ष 2014 के बाद के आँकड़े बहुत कुछ कहते हैं। इनके अनुसार 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से आदिवासियों के उत्पीड़न के आंकड़ों में जबरदस्त तेजी आयी है। इन उत्पीड़न की घटनाओं में एक-तिहाई की मूल वजह भूमि संबंधी विवाद हैं। इन्हे "विवाद" इस लिहाज से माना जाता है कि सरकार आदिवासियों से उनकी जमीन छीनकर कॉरपोरेट को देने की साजिश रचती है। आदिवासी इसका विरोध करते हैं।  फारेस्ट गार्ड से लेकर तहसीलदार - कलेक्टर - कमिश्नर से होते हुए मुख्यमंत्री तक बेदखली की इस मुहिम में पूरी ताकत झोंक देते हैं। मनुष्यता के आरम्भ से जंगलों में निवास करने वाला आदिवासी अपनी ही बसाहटों में "पर्सोना नॉन ग्रेटा"  अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया जाता है। इसके लिए आदिवासियों को मनुष्य न मानने वाले नस्लवाद को उभार कर उनके सामाजिक बहिष्करण से लेकर इन इलाकों के मिलिटराइजेशन तक का सहारा लिया जाता है। खड़ी फसल को रौंद देने, जेलों को आदिवासियों से भरने से लेकर स्त्रियों और युवतियों के साथ वीभत्स यौन हिंसा तक के तरीके अपनाये जाते हैं। ऐसे मामलों में अव्वल तो उनकी शिकायतें ही दर्ज नहीं होतीं - यदि हों भी गयीं, तो अभियोजन और न्यायपालिका के पूर्वाग्रह के चलते वे किसी मुकाम पर नहीं पहुँचती। जैसे वर्ष 2009-18 के बीच सजा सुनाये जाने की दर मात्र 22.8% थी ; जबकि ठीक इसी अवधि में  इस तरह के प्रकरणों में 575.33% की रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुयी। इससे उलट मामले में जरूर भारतीय न्यायप्रणाली आदिवासियों पर मेहरबान है ;  वर्ष 2020 के आंकड़ों के मुताबिक़ जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों का  76% बंदी मुस्लिम, सिख, दलित और आदिवासी समुदायों के थे। राजसत्ता के दुराग्रही, दमनात्मक व्यवहार, इन तबकों के नागरिक अधिकारों तथा उनके अधिकार की सेवाओं के मामले में पक्षपात का यह जीवंत दस्तावेजी सबूत है। मध्यप्रदेश और राजस्थान इस मामले में सबसे बदतर हैं। 

आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी विशिष्टता को अस्वीकार करना आरएसएस और भाजपा की सोच  का अभिन्न हिस्सा है।  वे उन्हें आदिवासी मानते ही नहीं हैं, "वनवासी" कहते हैं और किसी भी धर्म के उदगम से भी पहले की संस्कृति वाले इन प्रकृति पूजकों के हिन्दूकरण की तिकड़मों में लगे रहते हैं।  हिन्दूकरण और बेदखली दोनों की संघी मुहिम एक साथ चलती है। अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व काल में जंगलों में निवास कर पीढ़ियों से वन भूमि पर खेती कर रहे करोड़ों आदिवासियों की बेदखली के लिए निकाले आदेश में कब्जादारों को सजा के साथ-साथ बेदखली में होने वाले प्रशासनिक खर्च सहित सारे खर्चे की वसूली भी उन्हीं से करने का आदेश जारी किया गया था। इसी ज्यादती और अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे अमानुषिक बर्ताब के बैकलॉग को भरने और सभ्य तथा लोकतांत्रिक समाज बनाने की दिशा में सीपीएम और वामपंथ के सशक्त हस्तक्षेप से यूपीए प्रथम के कार्यकाल में ठोस कदम उठाये गए। आदिवासी एवं परंपरागत वनवासियों के जंगल की जमीन पर अधिकार को कानूनी मान्यता प्रदान की गयी। आदिवासी बहुल प्रदेशों की भाजपा सरकारों ने इसे पहले तो लागू ही नहीं किया। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से जहां-जैसा-थोड़ा बहुत लागू भी हुआ था, वहां भी उसे अनकिया करने की तिकड़में शुरू कर दीं। वर्ष 2019 में आये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ; जिसमें जिन आदिवासियों के वनाधिकार आवेदन निरस्त किये जा चुके हैं, उन्हें बेदखल किये जाने की बात कही गयी थी, ने भी आदिवासी विस्थापन की इस आपराधिक प्रक्रिया को गति प्रदान की। इस फैसले, जो फिलहाल टल गया है, से करीब 20 लाख आदिवासी परिवारों का भविष्य अंधकारमय होने वाला था। 

विकास न होने और विकास होने ; दोनों ही तरह की स्थितियों में गाज आदिवासियों पर ही गिरी है। अपनी ही जमीन पर अधिकार मिलना तो दूर रहा, आदिवासी मामलों के लिए गठित समिति के अनुमानों के अनुसार पिछले कुछ वर्षो में विकास परियोजनाओं की आड़ में लगभग 2 करोड़ आदिवासियों को विस्थापित किया गया है। यह कुल आदिवासी आबादी का एक चौथाई हिस्सा है। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में खनन नीति के कारण आदिवासी प्रभावित हुए है। खनन के लिए विस्थापित हुए 20 लाख आदिवासियों में से केवल 25 प्रतिशत का ही पुनर्वास हुआ है। यही कारण है कि उनकी करीब आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है - देश की आबादी में उनका हिस्सा 8% है, मगर भारत के कुल गरीबों का 25% आदिवासी हैं। उनकी विपदाओं में बढ़त का एक और तथ्य है, और वह यह है कि जैसे-जैसे आदिवासियों के बीच साक्षरता और पढ़े लिखों की तादाद बढ़ी है, वैसे-वैसे उनके ऊपर हिंसा भी बढ़ी है।  विडम्बना यह है कि यही वह दौर है, जब एक के बाद एक हुए लोकसभा चुनावों में आदिवासियों ने बढ़-चढ़कर भाजपा को वोट दिए। जयंत पंकज के अध्ययन के अनुसार वर्ष 1996 में 21%, वर्ष 2014 में 37% तथा 2019 में 44% आदिवासियों ने भाजपा को वोट दिए थे। जैसे-जैसे वोट बढ़े, वैसे-वैसे उनकी यंत्रणायें बढ़ती गयीं।

सार यह है कि यह एक हाथ में कारपोरेट के लिए भारतीय खजाने की चाबी और दूसरे हाथ में मनुस्मृति के त्रिशूल लेकर उमड़ रही हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता की आंधी है और यह आँख मूंदने से टलने वाली नहीं है। नवउदारवाद के तीन जहाजों पर सवार इस आधुनिक कोलम्बस का 461 एथनिक समूहों, 174 अन्य छोटे कबीलों-समूहों में संगठित कोई साढ़े आठ करोड़ आदिवासियों के प्रति इरादा वही है, जो 500 साल पहले इंडिया समझकर अमरीका पहुँच गए समुद्री लुटेरे क्रिस्टोफर कोलम्बस का था। अफ्रीकी और लैटिन अमरीकी देशों ने इस बीमारी से बाहर आने के रास्ते तलाश लिए हैं। मुकाबले की ऐसी ही तजवीज़ें भारत के आदिवासियों को भी आजमानी हैं।  कारपोरेटी मुनाफे के यज्ञ कुंड में आहुति देते मनु के झांसों में मंत्रबिद्ध होकर स्वाहा होने से बचना है, तो दोनों से लड़ना होगा। सिवनी हत्याकांड के बाद सिवनी और बाकी मध्यप्रदेश में उमड़े विक्षोभ, रोष और आक्रोश ने इस सचाई को महसूस किया है। 9 मई को सिवनी बंद और उसी दिन प्रदेश भर में हुयी विरोध कार्यवाहियों में बाकी मांगों के साथ बजरंग दल तथा राम सेना को आतंकी संगठन घोषित करने की मांग भी उठाई गयी है। इस दिन हुए जलसे-जलूसों में युवाओं की भागीदारी यह उम्मीद पैदा करती है कि जल्द ही यह संदेश देश भर में प्रतिध्वनित होगा। 

किसान संगठनों ने इसे अपनी और आदिवासी संगठनों ने इसे किसानो के आम मुद्दों से भी जोड़ा है। उन्होंने पहचाना है कि इन सारी हत्याओं और उत्पीड़न के पीछे वे लोग हैं, जो आदिवासियों, दलितों, किसानों, मजदूरों, गरीबों को इंसान का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं है। जो भारत के संविधान को हटाकर उसकी जगह मनु का राज लाना चाहते हैं। जो गाय की आड़ लेकर किसानों और आदिवासियों से पशुपालन का अधिकार तथा पशुओं की खरीदी-बिक्री से होने वाली आमदनी छीन लेना चाहते हैं। जो कभी तीन कृषि क़ानून लाते हैं, कभी मंडियां बंद करते हैं, कभी उपज की खरीदा-बेचीं में अडानी अम्बानी और विदेशी कंपनियों को लाते हैं, तो कभी सिवनी और चित्तौड़ की तरह गाय-भैंस खरीद कर लाने पर हमला बोल देते हैं। कहीं वे बजरंग दल के नाम पर हमले करते हैं। कहीं श्रीराम सेना के नाम पर आदिवासियों का खून बहाते हैं और कहीं गौरक्षा के नाम पर आदिवासियों की पीट-पीट कर हत्या कर रहे हैं।

उन्होंने समझा है कि इन सब संगठनो को वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पाल पोस रहा है, जो केंद्र और मध्य प्रदेश में भाजपा के नाम पर सरकार में बैठा है। जो आदिवासियों की भाषा, संस्कृति और पहचान को खत्म कर देना चाहता है। इसके लिए वह कभी वनवासी कल्याण परिषद और कभी ऐसे ही अनेक नामों के साथ उनके बीच घुसपैठ करने की कोशिश भी करता है। उन्होंने महसूस किया है कि इनके मंसूबों को समझने, बाकियों को समझाने और अपनी पहचान, भाषा और संस्कृति को बचाने की जरूरत है। वे जानने लगे हैं कि पहले उन्होंने मुसलमानो को निशाना बनाया, अब आदिवासी और दलित निशाने पर हैं, कल बाकी किसानों और नागरिकों के साथ भी यही होगा। इन सबका मुकाबला मिलकर करना होगा।  यह एक बड़ा अहसास है - आज सिवनी और उसके बर्बर हत्याकांड से सूचित और विचलित लोगों में होना शुरू हुआ है। कल सबका बनेगा, क्योंकि अँधेरे दीर्घायु नहीं होते। 


क्यों सुलग और दहक रही है लंका

क्यों सुलग और दहक रही है लंका

14-May-2022

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क्यों सुलग और दहक रही है लंका 

आलेख : बादल सरोज

श्रीलंका धधक रही है। भीड़ से घिर जाने के चलते एक मंत्री खुद को कमरे में बंद करके गोली मार चुके हैं। एक मंत्री को खदेड़ते हुए जनता कार समेत नदी में धकेल चुकी है। भीड़ से घिरने के चलते एक सांसद आत्महत्या कर चुके हैं। दो सांसद मारे जा चुके हैं। सत्ता पार्टी से जुड़े पार्षदों को जनता दौड़ा;दौड़ा कर पीट रही है। राजधानी कोलंबो से लेकर छोटे-बड़े शहरों तक यही गुस्सा चार्रों तरफ दिखाई दे रहा है।  

श्रीलंका में जो कुछ होता दिखाई दे रहा है, उसे सही तरीके से पढ़ने के लिए पहली बात तो यह साफ़ होनी चाहिए कि यह हिंसा अपने आप नहीं भड़की। अप्रैल के आखिर में लाखों मजदूरों की आम हड़ताल, 5 मई को हुयी दूसरी आम हड़ताल के बाद हजारों नागरिक राजधानी में राष्ट्रपति निवास के सामने धरना दिए बैठे थे। बजाय उनकी मांगों पर चर्चा या संवाद के  राजपक्षे भाईयों - एक राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे, दूसरा प्रधान मंत्री महिंदा राजपक्षे, तीसरा वित्तमंत्री बासिल राजपक्षे - ने अपनी पार्टी श्रीलंका पोडुजाना पेरुमना के लोगो को बसों में भर-भर कर इकट्ठा किया और इस शांतिपूर्ण धरने पर बर्बर हमला बोल दिया। 

जिसे मीडिया का एक हिस्सा अराजकता कह रहा है, वह दरअसल सत्ता पार्टी की अराजक हिंसा के खिलाफ फूट  पड़ा जनता का आक्रोश है। 

राजपक्षे परिवार और उनकी पार्टी ने राजनीति के लिए धार्मिक कट्टरता को अपना जरिया बनाया था :
पहले अहिंसा के लिए जाने जाने वाले बौद्ध धर्म के भीतर कट्टरता पैदा की गयी, उसके बाद भाषाई गौरव के नाम पर संकीर्णता भड़काई गयी और,
इसी के साथ कथित अतीत के गौरव को लेकर अंधराष्ट्रवाद का उन्माद पैदा किया गया।  
विकास - विकास और विकास का शोर मचाया गया। 
विरोध और असहमतियों को कुचलने के लिए हिंसा और बर्बरता के हर संभव तरीके अपनाये गए। हमले करना और आग लगाना आम प्रचलन में लाया गया।  

पहले इन हमलों का निशाना तमिल हिन्दू बनाये गए, उसके बाद मुसलमानों को शिकार बनाया गया। जनता से विवेक पूरी तरह छीन लिया गया।  

और जैसा कि दुनिया भर के अनुभवों से जाहिर है, धर्मान्धता का सहारा लेकर राष्ट्रवादी उन्माद पैदा करने वाली ताकतें देश और जनता को आर्थिक रूप से लूटने वाले गिरोह की पक्की साथी होती हैं, यहां भी वही हुआ। जैसे-जैसे जनता बर्बाद होती गयी, वैसे-वैसे धर्मान्धता और कट्टरता हमलावर होती गयी। 

इस बीच राजपक्षे एंड ब्रदर्स और उनकी पार्टी ने जनता के पैसे लूटने के सारे तरीके आजमा डाले :
पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें आसमान छूने लगीं। सरकार के खजाने का दीवालिया पिट गया। इसके पीछे अतीत के गौरव की बेहूदी समझदारी के चलते अपनाई गयी मूर्खतापूर्ण नीतियां मुख्य रूप से जिम्मेदार थी।  
पुरातनपंथी पार्टी ने पूरे श्रीलंका में खेती में रासायनिक खाद के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। नतीजा यह निकला कि चावल, शक्कर सहित खाद्यान्नों की उपज घटकर एक तिहाई रह गयी। लोगों की भूख मिटाने के लिए खाद्यान्नों -- विशेषकर गेहूं, दाल, अनाज और चीनी का आयात करने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ा।  
नतीजा यह निकला कि विदेशी मुद्रा का 70 प्रतिशत से ज्यादा भण्डार खाली हो गया। आयात-निर्यात का संतुलन एकदम गड़बड़ा गया। श्रीलंका के खजाने में सिर्फ 2 अरब डॉलर रह गए, जबकि कर्ज चुकाने के लिए ही 4 अरब डॉलर से ज्यादा चाहिए थे। जीडीपी के 10 प्रतिशत से अधिक की आमदनी जिस पर्यटन से होती थी, कोरोना महामारी ने उसे ठप्प करके रख दिया। रही-सही कसर रूस यूक्रेन के युद्ध ने पूरी कर दी। 

इस अत्यंत संकटपूर्ण स्थिति में भी राजपक्षे और उनकी पार्टी एक तरफ अतीत के गौरव, दूसरी तरफ धर्मान्धता के रेडियो की आवाज तेज करती रही - बर्दाश्त की सारी सीमाएं टूट गयीं, तो 9 मई आ गयी और जनता का रोष सड़कों पर फूट कर बह निकला। 

श्रीलंका सिर्फ घटनाविकास नहीं है -- यह एक सबक है और वह यह है कि देश और दुनिया के लुटेरों की गोद में बैठकर घंटे-घंटरियाँ बजाने वाले, धर्म आधारित राष्ट्र का नारा लगाने वाले फर्जी राष्ट्रवादी खुद तो डूबते ही हैं, देश को भी डुबोकर मानते हैं।  

संयोग की बात है कि श्रीलंका में यह सब 9 मई को सडकों पर नजर आया -- वर्ष 1945 में 9 मई की यही तारीख थी, जब लाल झंडे की अगुआई में पूरी दुनिया की लोकतंत्र और इंसानियत पसंद जनता ने हिटलर को निर्णायक रूप से हराया था। श्रीलंका हिटलरी विचार और व्यवहार वाले नेताओं और संगठनो के लिए एक संदेश भी है। 

ध्यान दें : ऐसी ही परिस्थितियां भारत नाम के देश में भी नजर आ रही हैं। यदि लक्षण वही हैं, तो बीमारी भी वही होगी और यदि बीमारी वही है तो इलाज भी वही होगा। दुनिया में हुआ है - यहां भी होगा।

 


खुलती जा रही मोदी राज के झूठे दावों की पोल

खुलती जा रही मोदी राज के झूठे दावों की पोल

09-May-2022

खुलती जा रही मोदी राज के झूठे दावों की पोल

आलेख : राजेन्द्र शर्मा

हैरानी की बात यह नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, जो अपनी अनेक सीमाओं के बावजूद, कोविड-19 वायरस की महामारी से दुनिया की लड़ाई का नेतृत्व कर रहा था, इस महामारी की इंसानी जानों के रूप में सबसे भारी कीमत भारत ने ही चुकाई है। इस विश्व संगठन के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में इस महामारी से जो करीब डेढ़ करोड़ जानें गयी हैं, उनमें हरेक तीन में से एक यानी 47 लाख 29 हजार से कुछ ज्यादा मौतें भारत में ही हुई हैं। यह आंकड़ा 1 जनवरी 2020 से दिसंबर 2021 तक यानी भारत में कोविड की दोनों बड़ी लहरों का है। यह आंकड़ा न सिर्फ इस महामारी से मौतों के मामले में भारत की स्थिति दुनिया भर में सबसे बुरी रहने को दिखाता है, बल्कि यह भी ध्यान दिलाता है कि कोविड-19 से मौतों के मामले में दस लाख से ऊपर की संख्या वाली रूसी फैडरेशन व इंडोनेशिया और नौ लाख से कुछ ऊपर मौतों वाले अमेरिका से भारत में मौतों का आंकड़ा करीब पांच गुना ज्यादा रहा है।

लेकिन, जैसाकि हमने शुरू में ही कहा, इससे शायद ही किसी को हैरानी होगी। लेकिन, इसमें जरूर कुछ हैरानी हो सकती है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आखिकार, आधिकारिक रूप से भारत में कोविड-19 की मौतों का अपना अनुमान प्रकाशित कर दिया है और इस अनुमान के प्रकाशन के जरिए प्रकारांतर से यह भी कहा है कि नरेंद्र मोदी की सरकार, कोविड की हरेक दस मौतों में से एक ही दिखा रही थी और पूरी नौ मौतों को छुपा रही थी! याद रहे कि भारत सरकार कोविड-19 की मौतों की कुल संख्या 5.2 लाख ही बताती आई है। खैर! हैरानी इसलिए कि अब यह बात आम जानकारी में आ चुकी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोविड मौतों का अपना अनुमान तैयार करने के क्रम में भारत सरकार से किए गए परामर्श के दौरान, जब यह साफ हो गया कि यह विश्व संगठन कोविड मौतों के मोदी सरकार के आंकड़े को आंख मूंदकर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, तभी से वर्तमान सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के महामारी के नुकसान के आकलन के खिलाफ बाकायदा अभियान छेड़ा हुआ था। इस सिलसिले में चली लंबी रस्साकशी में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मौतों के आकलन की पद्घति की वैज्ञानिकता से लेकर विश्वसनीयता तक के सवाल उठाए गए थे।

इनमें भेदभाव का काफी प्रत्यक्ष आरोप भी शामिल था कि अमेरिका आदि की तरह, भारत सरकार द्वारा दिए जा रहे कोविड की मौतों के आंकड़े को बिना सवाल उठाए स्वीकार क्यों नहीं कर लिया जाता! मोदी सरकार की इस मुहिम के बावजूद, जिसमें उसने अपनी सारी कूटनीतिक ताकत झोंक दी थी, विश्व स्वास्थ्य संगठन का भारत में कोविड की मौतों का अपना स्वतंत्र अनुमान प्रकाशित करना, न सिर्फ अपने आप में किसी को हैरान कर सकता है, बल्कि सच्चाइयों को छुपाने में मोदी सरकार की सीमाओं की ओर भी इशारा करता है, जिसके निहितार्थ दूर तक जाते हैं।

बहरहाल, जैसाकि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था, मोदी सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के इन आंकड़ों को झुठलाने के लिए न सिर्फ बाकायदा अभियान छेड़ दिया है, बल्कि इस विवाद को विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यकारिणी में उठाने समेत तरह-तरह के कदमों की धमकी भी दी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की उक्त रिपोर्ट से ऐन पहले, 3 मई को विश्व प्रैस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर, एक और ऐसी ही रिपोर्ट आई, जो नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा झूठे प्रचार के शोर के पर्दे में छुपाई जा रही, भारतीय जनता की बदहाली की सच्चाई के, बाकी दुनिया द्वारा पहचाने जाने को दिखाती थी। हमारा इशारा, प्रेस की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्घ पत्रकारों की विश्व संस्था, रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर जारी किए गए, विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक की ओर है। यह सूचकांक दर्शाता है कि मोदी राज में भारत प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में, जोकि जनतंत्र की दशा का भी बहुत ही महत्वपूर्ण संकेतक है, दुनिया के कुल 180 देशों में 150वें स्थान पर पहुंच गया है। इतना ही महत्वपूर्ण यह है कि पिछले साल इसी सूचकांक पर भारत, 142वें स्थान पर था यानी कोविड के एक वर्ष में प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भी भारत पूरे 8 अंक नीचे खिसक गया है। यह मोदी के बढ़ती तानाशाही के राज में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट लगातार जारी रहने को ही दिखाता है। 2016 में, मोदी राज की शुरूआत में इसी सूचकांक पर भारत 133वें स्थान पर था, जहां से लगातार नीचे ही खिसकता गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में मोदी राज में भारत के तेजी से नीचे खिसकते जाने में भी शायद ही किसी को हैरानी होगी। मोदी राज में हर तरह से प्रेस की स्वतंत्रता कुचला जाना, कोविड की बेहिसाब मौतों की तरह, सब की देखी-जानी सच्चाई है।

वास्तव में मोदी राज ने अपने चौतरफा हमलों से मीडिया की स्वतंत्रता का करीब-करीब गला ही घोंट दिया है और भारत में मीडिया को, सच्चाई को बताने-दिखाने का नहीं, बल्कि उसे छुपाने का और इससे भी बढ़कर सच्चाइयों को नकारने के लिए, अपने झूठे आख्यानों के प्रचार का साधन बनाकर रख दिया है। मीडियाकर्मियों से लेकर मीडिया संस्थानों तक को, शासन की विभिन्न एजेंसियों का सहारा लेकर धौंस में लिया जा रहा है और उससे काम नहीं चले, तो उन पर झूठी-सच्ची कानूनी कार्रवाइयों की लाठी चलाई जा रही है। प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति मौजूदा निजाम का क्या रवैया है, इसका हालिया सबूत उत्तर प्रदेश में देखने को मिला, जहां देवरिया तथा एक अन्य जिले में, बोर्ड की परीक्षा के एक पर्चे के लीक होने की खबर प्रकाशित करने के लिए, योगी राज की पुलिस ने आधे दर्जन से ज्यादा पत्रकारों को ही जेल में बंद कर दिया।

अचरज नहीं कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक पर भारत के नीचे खिसकने के पीछे, पत्रकारों के यूएपीए तथा एनएसए जैसे अत्याचारी नजरबंदी कानूनों में जेल में डाले जाने के बढ़ते मामले भी शामिल हैं। कश्मीर में फहद शाह से लेकर उत्तर प्रदेश में सद्दीक कप्पन तक के मामले, इसी के उदाहरण हैं। अचरज नहीं कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक पर भारत के नीचे लुढ़कने की खबर आने के फौरन, सारी दुनिया ने इसे भी दर्ज किया है कि प्रधानमंत्री मोदी की हाल की जर्मनी की यात्रा के मौके पर, भारत के आग्रह पर ही, जर्मनी चांसलर के साथ प्रधानमंत्री मोदी की संयुक्त प्रेस वार्ता में, सामान्य परंपरा के विपरीत, पत्रकारों को सवाल ही नहीं पूछने दिया गया। मीडिया की स्वतंत्रता के प्रति मोदी राज की शत्रुता का इससे प्रभावशाली विज्ञापन दूसरा नहीं हो सकता था।

इसी तरह, मोदी सरकार के लाख इंकार करने के बावजूद, सारी दुनिया भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर खतरनाक ढंग से बढ़ते हमलों का, अब ज्यादा से ज्यादा खुलकर नोटिस लेती नजर आती है। यह संयोग ही नहीं है कि जब मोदी राज में बुलडोजर के खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ शासन की दमनकारी मनमानी के नये प्रतीक के रूप में उभरने की पृष्ठïभूमि में, अपनी हाल की भारत यात्रा में ब्रिटिश प्रधानमंत्री, बोरिस जॉन्सन ने अहमदाबाद में बुलडोजर यानी जेसीबी पर चढ़कर तस्वीर खिंचाई थी, अपने इस अविवेकी कदम के लिए उन्हें लौटने के बाद ब्रिटिश संसद में सवालों का सामना करना पड़ा था। उनसे पूछा जा रहा था कि क्या वह भारत में बुलडोजर के अल्पसंख्यकविरोधी सरकारी हिंसा के हथियार के रूप में इस्तेमाल का अनुमोदन कर रहे थे? उधर अमेरिकी संसद द्वारा गठित,  अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने लगातार तीसरे साल, धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में भारत को 'विशेष चिंता वाला देश' घोषित करने की सिफारिश की है।

इसके बाद अमरीकी प्रशासन भले ही अपने आर्थिक-भू-रणनीतिक फायदे के लिए औपचारिक रूप से भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के लिहाज से सबसे खराब देशों की उक्त श्रेणी में नहीं डाले, पर उसने दोनों देशों के हरेक उच्चस्तरीय संवाद में, धार्मिक स्वतंत्रताओं की स्थिति पर चिंता जताने की रस्मअदायगी तो शुरू भी कर दी है।

मोदी राज में न्यू इंडिया के धोखे में देश को सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक, हरेक लिहाज से पीछे धकेले जाने की सच्चाई को दबाने-छुपाने और झूठे प्रचार से ढांपने के सारे इंतजाम किए जाने के बावजूद, मोदी राज के झूठे दावों की पोल अब ज्यादा से ज्यादा खुलती जा रही है। और मौजूदा राज की सारी घेरेबंदी के बावजूद, खुद देश में भी धीरे-धीरे इसका असर दिखाई देता नजर आता है।


बुलडोज़र के डंके में बज रहा है भारत का डंका

बुलडोज़र के डंके में बज रहा है भारत का डंका

06-May-2022

बुलडोज़र के डंके में बज रहा है भारत का डंका

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व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा

बताइए, बुलडोजर चला हिंदुस्तान में। और लंदन में प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन से सवाल पूछे जा रहे हैं, और वह भी संसद में! और तर्ज यह कि कौन मान सकता है कि उन्हें हाल के भारत के दौरे पर रवाना होने से पहले इतना भी पता नहीं था कि भारत में बुलडोजर कहां चल रहा है, किस पर चल रहा है और कौन चला रहा है? फिर उन्होंने अपनी भारत यात्रा के दौरान, जेसीबी उर्फ बुलडोजर पर चढक़र तस्वीर क्यों खिंचाई? और तस्वीर भी खिंचाई, तो गुजरात में जाकर। वहां बुलडोजर पर सवार होकर क्या संदेश देना चाहते थे? कि ब्रिटिश सरकार इसके साथ है कि पहले मुसलमानों के घरों, मोहल्लों वगैरह पर धावे किए जाएं। फिर वे अगर इन धावों का जरा-बहुत भी विरोध करें, तो उनके घरों-दुकानों पर बुलडोजर चढ़ा दिए जाएं। बोरिस जॉन्सन ने इंडिया की ऐसी बुलडोजरबाजी का समर्थन किस से पूछकर किया? ऐसा कर के उन्होंने ब्रिटेन का नाम खराब क्यों किया? उन्हें ब्रिटेन को इस तरह बदनाम कराने का अधिकार पब्लिक ने कब दिया, वगैरह-वगैरह।

बस ये समझिए कि बोरिस जॉन्सन साहब माफी मांगने पर मजबूर होने से बाल-बाल बच गए। वर्ना बुलडोजर के दुश्मनों ने तो ऐसी हालत कर दी थी कि बुलडोजर चले खरगौन, जहांगीरपुरी वगैरह में; बुलडोजर चलवाएं बाबा, मामा, शाह जी वगैरह; चुप साधकर अनुमोदन करें दुनिया की सबसे बड़ी डैमोक्रेसी के पीएम जी; और माफी मांगे इंग्लैंड का पीएम!

माना कि मोदी के नये इंडिया में सारा इतिहास बदला जा रहा है, लेकिन पचहत्तर साल से पहले वाले इतिहास की यह क्या कुछ ज्यादा ही पल्टी नहीं हो जाती? खैर! बोरिस जॉन्सन साहब माफी मांगने से बच भी गए तो क्या हुआ, नये इंडिया के बुलडोजर का तो दुनिया भर में डंका बज ही गया।

अब इंग्लेंड में डंका बजे और अमरीका में नहीं बजे, यह तो हो ही नहीं सकता। उल्टे अमरीका वाले तो इंग्लेंड वालों से दोगुना नहीं, तो डेढ़ गुना तो डंका बजा ही रहे हैं। और सिर्फ मोदी सरकार के बुलडोजर का ही नहीं, उसकी भांति-भांति की करनियों-अकरनियों, सब का डंका बजा रहे हैं। यानी बुलडोजर के संग-संग हिजाब का भी, हलाल का भी, लव जेहाद से लेकर, धर्मांतरण कानूनों तक का और कौन जाने अब लाउडस्पीकर का भी। और ड्योढ़ा है, सो अमरीका में डंका संसद में इस या उस इक्का-दुक्का सांसद ने नहीं बजाया है, बल्कि उनकी संसद के बनाए, अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने, नये इंडिया को ‘विशेष चिंता वाला देश’ कहकर बजाया है।

संक्षेप में इसका मतलब है, सबसे जोरों का यानी अफगानिस्तान वगैरह की टक्कर का डंका। और इस आयोग ने नये इंडिया का डंका कोई पहली बार नहीं बजाया है, बल्कि पिछले तीन साल से तो लगातार ही बजा रहा है। यह दूसरी बात है कि अमरीका की सरकार ही अपने धंधे के ख्याल से बाकी दुनिया में खुद इसकी मुनादी कराने से बचती है! फिर भी इस साल इस आयोग ने डंका इसलिए कुछ और भी जोर से बजाया है कि पिछले साल मेें मोदी जी के राज ने अल्पसंख्यकों, दलितों आदि के अधिकारों पर बुलडोजर और भी जमकर चलाया है। खैर! बोरिस जॉन्सन की माफी की तरह, हमारे बुलडोजर का डंका, अमरीकी सरकार की मुनादी का मोहताज थोड़े ही है --डंका तो जोरों से बज रहा है।

और जब बाकी सारी दुनिया में हमारे बुलडोजर का डंका इतने जोरों से बज रहा है, तो स्वदेश में डंका कितने जोरों से बज रहा होगा, यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है। नौबत ये आ गयी है कि लोगों ने बाकायदा इसकी मांग करनी शुरू कर दी है कि बुलडोजर को किसी न किसी तरह से राष्ट्रीय चिह्न का दर्जा दिया जाना चाहिए। जब बुलडोजर को राष्ट्रीय चिह्न घोषित कर दिया जाएगा, उसके बाद तो बुलडोजर कहीं भी चले, उसका चलना खुद ब खुद राष्ट्रीय कार्य हो जाएगा। और बुलडोजर के नीचे आने वाला, खुद ब खुद अपराधी मान लिया जाएगा। बुलडोजर के मामलों में कानून, अदालत, किसी का कोई लफड़ा ही नहीं रह जाएगा। गाय को तो अब तक राष्ट्रीय पशु घोषित भी नहीं किया गया है, तब भी उससे जो टकराएगा, सीधे ऊपर जाएगा वाली नौबत है।

बुलडोजर को राष्ट्रीय चिह्न घोषित करने के बाद तो कुछ भी करने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी, न सरकार को और न संघ परिवार को। चुनाव प्रचार समेत जो भी करना होगा, बुलडोजर ही करेगा। पर एक ही प्राब्लम है कि गाय के होते हुए बुलडोलर को राष्ट्रीय पशु तो बना नहीं सकते और राष्ट्रीय पक्षी को मोदी जी अपने हाथ से दाना चुगाते आ रहे हैं, तो बनाएं तो क्या? कोई वेकेंसी नजर ही नहीं आती है। कुछ लोगों का ख्याल है कि जब 2025 में भागवत जी हिंदू राष्ट्र बनाएंगे, तो उसके केसरिया झंडे पर बीच में चक्र की जगह बुलडोजर को बैठा दिया जाए। एक पंथ दो काज हो जाएंगे, नया झंडा भी मुकम्मल हो जाएगा और बुलडोजर को उसका सही मुकाम भी मिल जाएगा। पर उसमें अभी कम से कम तीन साल और एक आम चुनाव की देर है। तब तक क्यों न मोदी जी की पार्टी में ही बुलडोजर को उसका मुकाम मिल जाए। या तो बीजेपी का ही पूरा नाम बुलडोजरी झंझट पार्टी घोषित कर दिया जाए या फिर कमल को हटाकर, बुलडोजर को ही पार्टी का निशान कर दिया जाए। वैसे भी कमल के कीचड़ में ही खिलने के ताने सुन-सुनकर बेचारों के कान पक गए हैं।

बस एक ही प्राब्लम है। बोरिस जॉन्सन ने बुलडोजर की सवारी की तो थी मोदी जी को खुश करने के लिए और उससे हमारे बुलडोजर का दुनिया भर में डंका भी खूब ही बजा, पर उसके चक्कर में अपने देश में एक प्राब्लम हो गयी। सब को पता चल गया कि मोदी जी का तो बुलडोजर भी अंगरेजों वाला है। राष्ट्रीय चिह्न बनाएंगे, तो मोदी जी आत्मनिर्भरता को किस पर्दे के पीछे छुपाएंगे। खैर! बुलडोजर राष्ट्रीय चिह्न न सही, सत्ताधारी पार्टी का चिह्न भी न सही, पर दुनिया भर में अपना डंका तो खूब बजवा रहा है। बुलडोजर का डंका बज रहा है, तो क्या उसमें भारत का डंका नहीं है?


आधुनिक भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ किताब ‘जाति का विनाश’

आधुनिक भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ किताब ‘जाति का विनाश’

02-May-2022

आधुनिक भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ किताब ‘जाति का विनाश’

आधुनिक भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ किताब ‘जाति का विनाश’ यानी Annihilation of Caste है इस किताब के दूसरे संस्करण की भूमिका में डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि ‘ अगर मैं हिंदुओं को यह महसूस करा पाता हूं कि वे भारत के बीमार लोग हैं, और उनकी बीमारी अन्य भारतीयों के स्वास्थ्य और खुशी के लिए खतरे पैदा कर रही है, तो मेरी संतुष्टि के लिए इतना काफी होगा।’ 

आंबेडकर की नजर में यह बीमारी जाति की बीमारी है, जो सभी भारतीयों को ग्रसित किए हुए। वे बताते हैं कि इस बीमारी के शिकार भारत के मुसलमान और ईसाई भी हैं, भले ही उनका धर्म वर्ण-जाति को मान्यता न देता हो। जाति के खिलाफ संघर्ष को उन्होंने स्वराज के लिए संघर्ष से ज्यादा दुष्कर माना है। 

उन्होंने लिखा है कि “ जब आप स्वराज के लिए लड़ते हैं, तो सारा राष्ट्र आपके साथ होता है, किंतु जाति के विरुद्ध संग्राम को सारे राष्ट्र से संघर्ष करना होगा और वह राष्ट्र को दूसरा नहीं-स्वयं अपना ही है।”  

वे बार-बार इस बात पर जोर देते  हैं कि भारत में कोई भी व्यक्ति, समुदाय या वर्ग ऐसा नहीं है, जाति का शिकार न हो। जाति ने किसी ने किसी तरीके से सबको ग्रसित कर रखा है।

इस किताब में जाति व्यवस्था के पक्ष में दिए जाने वाले नस्ल की शुद्धता का सिद्धांत  को जीव वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर एक-एक करके वैज्ञानिक शोधों के निष्कर्षों, तथ्यों, अनुभवसंगत ज्ञान और तर्क के आधार पर खारिज करते हैं। फिर वे एक-एक करके भारतीय समाज और देश को जाति से होने वाले बुनियादी दुष्परिणाओं की विस्तार से चर्चा करते हैं। 

पहला जाति हिंदुओं को वास्तविक समाज और राष्ट्र बनने से रोकती है, दूसरा समाज विरोधी भावना जाति व्यवस्था का सबसे निकृष्टतम लक्षण है, तीसरा जाति आदिम जनजातियों की उन्नति और समावेशीकरण को रोकती है, तीसरा उच्च जातियों ने निम्न जातियों को निम्न बनाए रखने के लिए साजिश रची, चौथा जाति ने हिंदू धर्म को मिशनरी धर्म बनने से रोका, पांचवा जाति ने हिंदुओं को परस्पर सहयोग, विश्वास और वंधुता की अनुभूति से वंचित किया, छठा हर प्रकार के सुधारों को रोकने के लिए जाति ताकतवर हथियार है, सातवां जाति लोकभावना, लोक विचार और लोक उदारता का विनाश करती है। 

जाति के उपरोक्त सातों दुर्गुणों की विस्तार से चर्चा करने के बाद आंबेडकर अपने आदर्श समाज की रूप रेखा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि “ अगर आप जाति को नहीं चाहते हैं, तो आपका आदर्श समाज क्या है, यह प्रश्न आपके द्वारा पूछा जाना अश्वयंभावी है। अगर आप मुझसे पूछते हैं, तो मैं कहूंगा मेरा आदर्श एक ऐसा समाज होगा, जो स्वतंत्रता, समता और भातृत्व पर आधारित होगा और क्यों न हो?

आज भी भारत की सबसे बड़ी बीमारी जाति है


इतनी चौड़ी छाती वीरों की...

इतनी चौड़ी छाती वीरों की...

18-Apr-2022

इतनी चौड़ी छाती वीरों की...
(व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)

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विपक्ष वालो‚ अब मानने से किस मुंह से इनकार करोगे। हमारे हिस्से में सचमुच छप्पन इंच की छाती आई है। वर्ना श्रीलंका हमसे क्या दूर हैॽ बस राम सेतु जितना ही तो जाना है। पर श्रीलंका वाली आफत हमारे आस–पास भी कहीं आई क्याॽ तेल के दाम तो हमारे यहां भी बढ़ रहे हैं‚ पर प्राब्लम जरा सी भी नहीं है। सब चंगा सी। और पाकिस्तान‚ उसके लिए तो किसी सेतु पर भी नहीं चढ़ना है‚ बस बार्डर पार किया और पहुंचे। पर मजाल है जो उधर के संकट की आंच तो क्या, जरा सी गर्मी भी इस पार आई हो। नाम के वास्ते अविश्वास प्रस्ताव तक नहीं। यह छप्पन इंच का करिमा नहीं तो और क्या हैॽ 

पर एक बात समझ में नहीं आई। श्रीलंका वाले तो चलो फिलहाल हमारी देखा–देखी अपनी छाती फुला रहे हैं और हम भी बड़ा भाई बनकर दिखा रहे हैं। सो बंदे अपने संकट के मामले में आत्मनिर्भर हुए पड़े हैं यानी उन्हें लोकल के अलावा किसी इंटरनेशनल खलनायक की दरकार ही नहीं है। पर इमरान खान को तो विदेशी हाथ की जरूरत थी। जरूरत भी क्या थी‚ बाकायदा अगले ने विदेशी हाथ‚ पांव‚ सिर‚ सब खोज निकाला है। और विदेशी हाथ की जरूरत बढ़ती गई‚ जैसे–जैसे गिनती छोटी पड़ती गई। तब भी इमरान मियां ने विदेशी हाथ खोजा भी तो कहांॽ बगल में छोरा‚ पर जग में ढिंढोरा। नये इंडिया की तरफ देखा तक नहीं। क्रिकेट की हमारी इतनी पुरानी और पक्की रकबत तक का लिहाज नहीं किया। सात समंदर पार‚ अमेरिका में पहुंच गए विदेशी हाथ की तलाश में।

हम तो दक्षिण एशिया की आत्मनिर्भरता का ख्याल कर के अपने यहां कुछ भी हो, पाकिस्तान का हाथ खोजते हैं और इमरान को एक बार भी हमारे हाथ का ख्याल नहीं आया। भाई सीधे अमरीका पहुंच गया। हमारे छप्पन इंच का क्या फायदाॽ पड़ोसी तक खतरा मानने को तैयार नहीं हैं। सच्ची‚ बड़ी बेइज्जती की बात है भाई! फिर भी‚ हमारी छाती छप्पन इंची साबित होना‚ पड़ोसियों के खतरा मानने के ही भरोसे थोड़े ही है। अपने राम इसमें भी आत्मनिर्भर हो लिए हैं।

नौकरी‚ महंगाई‚ पढ़ाई‚ दवाई किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता है‚ सरकार तो सरकार पब्लिक को भी नहीं। बस हिंदू–हिंदू होती रहनी चाहिए। इससे बज्जर छाती क्या होगीॽ 

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)

 

 

 


मजदूर हड़ताल का संदेश : एक धक्का और दो!

मजदूर हड़ताल का संदेश : एक धक्का और दो!

31-Mar-2022

मजदूर हड़ताल का संदेश : एक धक्का और दो!

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आलेख : राजेंद्र शर्मा

देश भर में करोड़ों मजदूरों की दो दिन की हड़ताल और उसके साथ-साथ देश के बड़े हिस्से में किसानों तथा खेत मजदूरों के ग्रामीण बंद के प्रति मोदी सरकार के लगभग पूरी तरह से अनदेखा ही करने की मुद्रा अपनाने की वजह समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। देश के शहरी और ग्रामीण मेहनतकशों की इस सबसे बड़ी विरोध कार्रवाई के प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों ही तरह के संदेशों से मोदी सरकार, क्रिकेट की भाषा में कहें तो डॅक कर के यानी गैंद के सामने से हटकर, बचना चाहती है। जाहिर है कि इस देशव्यापी कार्रवाई के प्रत्यक्ष संदेश का सबसे प्रमुख पहलू तो इसकी मांगों के रूप में ही सामने आ रहा था। यह गौरतलब है कि मजदूरों तथा कर्मचारियों के सबसे बड़े तथा एकजुट मोर्चे की दो दिन की देशव्यापी हड़ताल में, जिसमें संघ परिवार के मजदूर संगठन केे अलावा देश के लगभग सभी ट्रेड यूनियन केंद्र व संगठन एकजुट थे, मजदूरों की मजदूरी आदि की कोई फौरी मांग केंद्र में नहीं थी। इसके बजाय, यह हड़ताल मुख्य रूप से मोदी सरकार की मजदूरविरोधी तथा जनविरोधी नीतियों के खिलाफ थी और ''देश को बचाने'' के नारे इसके केंद्र में थे।

हां! मजदूरों के पहले ही बहुत सीमित अधिकारों को तथा उन्हें हासिल बहुत ही अपर्याप्त सुरक्षाओं को भी छीनने के लिए, बिना किसी वास्तविक चर्चा के ही कोविड आपदा के दौरान संसद से धक्काशाही से पारित कराए गए चार श्रम कोडों के निरस्त किए जाने की मांग, इस कार्रवाई की एक महत्वपूर्ण मांग थी। और ऐसी ही महत्वपूर्ण मांग, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की बिक्री तथा उनके निजीकरण और सार्वजनिक सेवाओं की कीमत पर निजी धनपतियों के मुनाफों को आगे बढ़ाने की मुहिम को रोके जाने की थी। अचरज नहीं कि देश भर में औद्योगिक केंद्रों में लगभग मुकम्मल हड़ताल तथा देश के अनेक हिस्सों में परिवहन से लेकर बाजार, दफ्तर, कारोबारी प्रतिष्ठान बंद होने से बंद की-सी स्थिति बनने के साथ ही साथ, वाइजैग इस्पात संंयंत्र जैसे बिक्री के लिए बाजार में रखे गए कारखानों व उद्यमों के साथ ही साथ, देश के सार्वजनिक वित्त क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी सार्वजनिक बैंकों तथा बीमा संस्थाओं में भी कर्मचारियों ने मुकम्मल हड़ताल की। वे इन संस्थाओं में विभिन्न रूपों में निजी मिल्कियत को बढ़ाए जाने के जरिए, इस सार्वजनिक वित्तीय ढांचे के सार्वजनिक तथा इसलिए राष्ट्रीय चरित्र व भूमिका को ही कमजोर किए जाने के खिलाफ लड़ रहे हैं।

दूसरी ओर, ग्रामीण बंद तथा अन्य विरोध कार्रवाइयों के जरिए, देश के किसान तथा खेत मजदूर, न सिर्फ देश को बचाने की देश के मजदूरों-कर्मचारियों की इस ऐतिहासिक कार्रवाई के साथ अपनी एकजुटता प्रकट कर रहे थे बल्कि खेती-किसानी को बचाने के जरिए, देश को बचाने के देहात के एजेंडा को जोरदार तरीके से रख रहे थे। अचरज की बात नहीं है कि इसके पीछे न सिर्फ एक साल से ज्यादा चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन से उपजा आत्मविश्वास था, जिसने मोदी सरकार को तीन किसान विरोधी, कार्पोरेटपरस्त कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया था, बल्कि इसके पीछे इसका संकल्प भी था कि चूंकि मोदी सरकार ऐतिहासिक किसान आंदोलन की वापसी के समय किए गए अपने वादे पूरे करने में टाल-मटोल कर रही है, किसान फिर से आंदोलनात्मक कार्रवाइयों के लिए तैयार हैं। सिर्फ अपनी तबकाती फौरी आर्थिक मांगों के लिए नहीं, बल्कि मौजूदा सरकार की मजदूर-किसान विरोधी और देश विरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ने की यह बढ़ती चेतना भी और मजदूर-किसान एकता के रूप में उसकी बढ़ती तैयारी भी, ऐसा बाउंसर है, जिसके संदेश से बचाव में ही मोदी सरकार को बचाव दिखाई दे रहा है। आखिरकार यही वह मोर्चा है, जिसके सामने सांप्रदायिक विभाजन के संघ-भाजपा के हथियार भोंथरे पड़ जाते हैं।

शहरी व ग्रामीण मेहनतकशों की इस जबर्दस्त विरोध कार्रवाई का परोक्ष संदेश भी मोदी सरकार के लिए कम मुश्किल पैदा करने वाला नहीं है। यह संदेश, हाल के पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों में, चार राज्यों में अपनी सरकार बनाए रखने में कामयाबी के सहारे, नये सिरे से तथा बढ़े हुए जोर-शोर से, 'मोदी की अजेयता' का आख्यान, बल्कि मिथक गढ़ने की संघ-भाजपा की मुहिम में गंभीरता से खलल डालता है। 10 मार्च को चुनावी नतीजे आते ही और खासतौर पर उतर प्रदेश में भाजपा के दोबारा सत्ता में आने का फैसला होते ही, प्रधानमंत्री मोदी ने खुद इसका ऐलान करने में जरा सी देरी नहीं लगाई कि भाजपा की इस जीत ने, 2024 के चुनाव में उनकी तीसरी जीत पक्की कर दी है! कहने की जरूरत नहीं है कि 2024 के चुनाव में जीत पक्की होने की धारणा बनाने का यह खेल, मीडिया पर अपने लगभग मुकम्मल नियंत्रण के सहारे, यही धारणा बनाने के सहारे खेला जाना है कि इस चुनाव में मोदी की भाजपा को आम जनता का और खासतौर पर गरीबों का, जिनमें शहरी व ग्रामीण गरीब दोनों ही शामिल हैं, जबर्दस्त समर्थन मिला है, जो भाजपा से भी बढ़कर मोदी को अजेय बना देता है।

लेकिन, देश में भर में करोड़ों शहरी व ग्रामीण मेहनतकशों का मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरना, खासतौर पर आम जनता व गरीबों के मोदी राज में बहुत संतुष्ट होने के उनके आख्यान पर गंभीर सवाल खड़े कर देता है। ये सवाल इस तथ्य से और भी गंभीर हो जाते हैं कि यह एक बार होकर खत्म हो जाने वाली विरोध कार्रवाई का नहीं, बल्कि सरकार की देश विरोधी नीतियों के खिलाफ मेहनतकशों की बढ़ती लड़ाई का मामला है। मजदूर हड़ताल के बाद, अगले महीने के पहले पखवाड़े में संयुक्त किसान मोर्चा ने हफ्ते भर के अभियान का पहले ही ऐलान भी कर दिया है। यानी यह लड़ाई आगे भी न सिर्फ जारी रहने जा रही है, बल्कि और तेज होने जा रही है। जाहिर है कि ये 2024 के चुनाव में मोदी की जीत पक्की होने के लक्षण तो नहीं ही हैं।

दरअसल, 2022 के चुनाव से 2024 में मोदी की जीत पक्की हो जाने का चौतरफा प्रचार ही, खरीदे हुए चुनाव सर्वेक्षणों की तरह, ऐसा होने के लिए माहौल बनाने का एक बड़ा साधन है। वर्ना 2022 के विधानसभाई चुनाव को भी, मोदी की भाजपा के राज और उसकी नीतियों का जनता द्वारा अनुमोदन कहना, काफी अतिरंजनापूर्ण है। बेशक, इस चुनाव में भाजपा, अपनी चार की चार सरकारें बचाने में कामयाब हुई है, लेकिन उसकी कामयाबी इतनी ही है, न इससे कम न ज्यादा। गोवा तथा मणिपुर में, जहां भाजपा ने पिछले चुनाव में कांग्रेस से साफ तौर पर पिछड़ने के बाद भी, खरीद-फरोख्त कर के सरकारें बनाई थीं, बेशक इस बार भाजपा को कांग्र्रेस से काफी ज्यादा सीटें मिली हैं तथा करीब बहुमत ही मिल गया है।

लेकिन यह इन दोनों राज्यों में भाजपा के विरोधी वोटों के भारी विभाजन का ही नतीजा था। खासतौर पर गोवा में भाजपा की जीत का श्रेय नयी स्थानीय पार्टी गोवा रिवोल्यूशनरी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और आप पार्टी के विपक्षी वोट बांटने को ही जाता है। दूसरी ओर, अगर उत्तराखंड में भाजपा के बहुमत बचाए रखने के बावजूद, उसकी सीटों व मत फीसद में 2017 के मुकाबले भारी कमी हुई है, जिसे कम से कम जनता द्वारा अनुमोदन किसी भी तरह से नहीं कहा जा सकता है, तो उत्तर प्रदेश में तीन दशक से ज्यादा में पहली बार निवर्तमान मुख्यमंत्री के दोबारा पद पर आने की 'जबर्दस्त जीत' के पीछे, भाजपा तथा उसके सहयोगियों की सीटों में 50 से ज्यादा की गिरावट भी छुपी हुई है। और यह किस्सा इतने पर ही खत्म नहीं हो जाता है। इस चुनाव में भाजपा को बेशक, 41.3 फीसद वोट मिले हैं और यह 2017 के उसके वोट में 2 फीसद से कुछ कम की बढ़ोतरी को भी दिखाता है। सहयोगियों के वोट को जोड़ दिया जाए तो इस चुनाव में भाजपा के मोर्चे के वोट 43.8 फीसद हो जाते हैं।

लेकिन, इस सिलसिले में याद रखने की एक बात तो यही है कि 2019 के आम चुनाव में भाजपा तथा सहयोगियों को मिले 51 फीसद के करीब वोट के मुकाबले, यह 7 फीसद से ज्यादा की कमी को भी दिखाता है। दूसरे, सपा के 32.1 फीसद तथा रालोद के 2.85 फीसद के साथ अन्य सहयोगियों का वोट जोड़कर, सपा के मोर्चे का वोट 36.3 फीसद हो जाता है। यानी दोनों मोर्चों में 7.5 फीसद का अंतर रहा है। दूसरी ओर इसी चुनाव में बसपा को 12.9 फीसद और कांग्रेस को 2.33 फीसद वोट मिले हैं।

यानी इस चुनाव में सपा और बसपा का पिछले आम चुनाव की तरह एकजुट होना, आसानी से चुनाव नतीजे को पलट सकता था। वास्तव में प्रणंजय गुहा ठाकुर्ता व अन्य का उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों का सीटवार कुछ विस्तृत अध्ययन यह दिखाता है कि, 'ऐसी बहुत सारी सीटें हैं जहां भाजपा के विजयी उम्मीदवार और दूसरे नंबर पर रहे सपा गठबंधन के उम्मीदवार के बीच मतों का जो अंतर है, उससे अधिक वोट बसपा के उम्मीदवार या कांग्रेस या आईएमएम के उम्मीदवार को मिले हैं। इससे पता चलता है कि सरकार विरोधी मतों के बिखराव ने भाजपा की एक बार फिर देश के सबसे बड़े प्रदेश में अपनी सरकार बनाने में मदद की।' 11 सीटें भाजपा ने 500 से कम वोट से जीती हैं। 7 सीटों पर भाजपा की जीत के अंतर से ज्यादा वोट ओवैसी की एआईएमआईएम को मिले हैं।

कुल 53 सीटें भाजपा और उसके सहयोगियों ने 5000 से कम वोट के अंतर से जीती हैं, जहां विपक्षी वोट का एकजुट होना, चुनाव के नतीजे को बदलने के लिए काफी था। मोदी पलटन को इस सच्चाई का बखूबी पता है, इसीलिए अभूतपूर्व जीत और गरीबों के अनुमोदन के भारी प्रचार के तले, इस जीत के रेत के पांवों को छुपाने की अतिरिक्त कोशिश की जा रही है। मजदूरों की दो दिन की देशव्यापी हड़ताल और किसानों-खेत मजदूरों के ग्रामीण बंद ने, मोदी राज की इस हकीकत को एक बार फिर उजागर कर दिया है। हां! यह तो वक्त ही बताएगा कि क्या विपक्ष, संघ-भाजपा की इस कमजोरी को पहचान रहा है और उसे अपने विभाजन से फायदा उठाने से रोकेगा?


विपक्ष को और बांट सकते हैं नतीजे

विपक्ष को और बांट सकते हैं नतीजे

14-Mar-2022

आलेख : राजेंद्र शर्मा

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अप्रत्याशित भले नहीं हों, लेकिन कुछ हैरान करने वाले जरूर हैं ये नतीजे। विधानसभा चुनाव के मौजूदा चक्र में प्रभावशाली कामयाबी और उसमें भी खास तौर पर उत्तर प्रदेश में जोरदार कामयाबी के मौके पर भाजपा मुख्यालय में हुई समारोही सभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2024 के आम चुनाव के लिए अपना चुनाव प्रचार शुरू भी कर दिया। मोदी ने 2019 के आम चुनाव में अपनी प्रभावशाली जीत की याद दिलाते हुए कहा कि "विद्वानों' ने तब कहा था कि यह जीत तो तभी तय हो गई थी‚ जब 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जीत हुई थी। उम्मीद है कि 2022 की उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की जीत के बाद ‘विद्वान' इसे भी 2024 की जीत की शुरुआत कहेंगे!"

वैसे‚ उत्तर प्रदेश के 2022 के चुनाव का सीधा कनेक्शन 2024 के आम चुनाव से जोड़ने की शुरुआत खुद प्रधानमंत्री मोदी ने नहीं की है। विधानसभाई चुनाव के ताजा चक्र में प्रभावशाली जीत के मौके पर प्रधानमंत्री ने जिस चुनावी कनेक्शन की बाकायदा पुष्टि की है‚ उसकी शुरुआत उनकी सरकार के नंबर–टू माने जाने वाले अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में इस बार का चुनाव प्रचार शुरू करते हुए ही कर दी थी। यह दूसरी बात है कि इस कनेक्शन पर जोर देेने के पीछे तब भाजपा नेताओं का मकसद मोदी के प्रभाव तथा राजनैतिक प्रतिष्ठा की दुहाई का उत्तर प्रदेश में कठिन लगते चुनावी मुकाबले के लिए दोहन करना ही था। बहरहाल‚ अब इस कनेक्शन का अर्थ बदल गया है और प्रधानमंत्री 2024 के चुनाव की अपनी संभावनाओं को मजबूत प्रदर्शित करने और इसके जरिए संभावित रूप से अपने को मजबूत करने के लिए भी इस कनैक्शन की याद दिला रहे हैं।

फिर भी‚ अगर प्रधानमंत्री विधानसभाई चुनाव के ताजा चक्र में भाजपा की कामयाबी में दो साल बाद होने वाले अगले आम चुनाव में अपनी संभावनाओं की बढ़ोतरी देख रहे हैं‚ तो इसे निराधार भी नहीं कहा जाएगा। आखिरकार‚ विधानसभाई चुनाव के इस चक्र में सत्ताधारी पार्टी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ही सत्ता अपने हाथ में बनाए रहने में कामयाब नहीं रही है‚ बल्कि इस चक्र में तीन अन्य राज्यों में भी सत्ता अपने हाथ में बनाए रखने में कामयाब रही है। इस चक्र में चुनाव से गुजरे पांच राज्यों में से चार राज्योें में ही चुनाव से पहले भाजपा की सरकारें थीं। पंजाब अकेला राज्य है‚ जहां चुनाव से पहले भी कांग्रेस की सरकार थी और चुनाव में आप की सरकार के पक्ष में जनादेश आया है। पंजाब में भाजपा की सीटों में आई मामूली गिरावट और उत्तराखंड में उसकी सीटों में उल्लेखनीय कमी को छोड़ दिया जाए तो विधानसभाई चुनाव के इस चक्र में मोदी के नेतृत्व में भाजपा कुल मिलाकर कम से कम न नफा न नुकसान की स्थिति में तो जरूर ही रही है।

राजनीतिक संभावनाएं और नतीजे : 
भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं के लिए इस नतीजे का अर्थ इसलिए और भी बढ़ जाता है कि 2019 के आम चुनाव में मोदी की पहले से भी ज्यादा वोट तथा सीटों के साथ जीत के बाद से विधानसभाई चुनावों के सभी चक्रों में भाजपा को हार का नहीं, तो उल्लेखनीय नुकसान का मुंह जरूर देखना पड़ा था। 2019 के आम चुनाव के चंद महीने बाद आए विधानसभाई चुनाव के महत्वपूर्ण चक्र में भाजपा झारखंड तथा महाराष्ट्र में सरकारें गंवा बैठी थी‚ जबकि हरियाणा में बहुमत से काफी पीछे रह जाने के चलते उसे जजपा के साथ गठजोड़ सरकार बनानी पड़ी थी। फिर दिल्ली में विधानसभाई चुनाव में एक बार फिर भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा और कुछ ही आगे चलकर बिहार में विधानसभा चुनाव में जद यू–भाजपा गठजोड़ हारते–हारते बचा। 

विधानसभा चुनाव में अगले महत्वपूर्ण चुनाव को भाजपा की नाकामी की तरह ही देखा गया, जिसमें सारे संसाधन और ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा प. बंगाल में सत्ता के आसपास भी नहीं पहुंच पाई। इसी चक्र में भाजपा की सहयोगी अन्ना द्रमुक पार्टी‚ जोरदार तरीके से भाजपा विरोधी गठबंधन के हाथों सत्ता गंवा बैठी जबकि केरल में सीपीएम के नेतृत्व में एलडीएफ ने राज्य के आम चलन के उलट लगातार दूसरी बार जोरदार जनादेश हासिल किया, जबकि भाजपा इस राज्य में गत चुनाव में ही खुला अपना खाता भी बंद करा बैठी। असम में जरूर भाजपा‚ सत्ता पर कब्जा बनाए रखने में कामयाब रही, लेकिन बहुत–बहुत मामूली अंतर से ही। 

इस तरह‚ 2019 के आम चुनाव के बाद आए विधानसभाई चुनावों के सभी चक्रों में आम तौर पर यही छवि बन रही थी कि भाजपा का जनसमर्थन गिरावट पर था और 2019 की चुनावी कामयाबी संयोग ही ज्यादा थी‚ जो उसकी ताकत को वास्तविकता से बढ़ाकर दिखाती थी। इस छवि को ऐतिहासिक किसान आंदोलन समेत मेहनतकश जनता तथा विशेष तौर पर रोजगार की मांग को लेकर युवाओं के बढ़ते आंदोलनों ने और कोविड की महामारी के दौरान मोदी सरकार की घनघोर विफलताओं से पैदा हुई लोगों की नाराजगी ने और भी रेखांकित कर दिया था। इस सब की पृष्ठभूमि में विधानसभाई चुनाव के ताजा चक्र में भाजपा का कुल मिलाकर न नफा न नुकसान में रहना भी‚ इस गिरावट के अगर पलटे जाने का नहीं‚ तो थमने का तो संकेत करता ही है। अचरज नहीं कि मोदी की भाजपा इसे ही अपनी बड़ी भारी कामयाबी बनाकर दिखाने की कोशिश कर रही है और इसे भाजपा के शासन के खिलाफ कोई एंटी–इन्कम्बेंसी न होने के सबूत से खींचकर उसके लिए सकारात्मक समर्थन बनाकर चलाने की कोशिश कर रही है। 

विकल्प की संभावनाएं कठिन : 
कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी की भाजपा के ग्राफ में उसके दूसरे कार्यकाल के आधे गुजर जाने के बाद गिरावट का थमता नजर आना भी अगले आम चुनाव में उसके विकल्प की संभावनाओं को कठिन बनाता है। फिर इस गिरावट के थमते नजर आने का मोदी राज के पक्ष में हवा बनाने केे लिए वह कैसे इस्तेमाल करेगी‚ इसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं है। लेकिन अगले आम चुनाव में मोदी के विकल्प को उभारनेे के प्रयासों की मुश्किलें विधानसभाई चुनाव के ताजा चक्र के नतीजों से सिर्फ इसीलिए नहीं बढ़ी हैं कि आम चुनाव के बाद से भाजपा के समर्थन में नजर आ रही गिरावट इन नतीजों से थमती नजर आती है। 

2024 के चुनाव में मोदी की जीत की संभावनाओं में मददगार नजर आने वाला एक और कारक इस चक्र के चुनाव नतीजों से पुख्ता होता नजर आता है। और इसका संबंध विपक्षी एकता की संभावनाओं पर इस चक्र के नतीजोें के संभावित असर से है। सभी जानते हैं कि खास तौर पर प. बंगाल के चुनाव के बाद से विपक्षी एकता की संभावनाओं को कुछ न कुछ धक्का ही लगा था। बंगाल में मोदी को हराने के बाद ममता बनर्जी की प्रधानमंत्रित्व की आकांक्षाएं इसके पीछे प्रमुख कारक बनी रही थीं। इसी के हिस्से के तौर पर बनर्जी ने त्रिपुरा‚ गोवा तथा अन्यत्र में भी यहां–वहां अन्य विपक्षी पार्टियों तथा खास तौर पर कांग्रेस में तोड़–फोड़कर पांव फैलाने की कोशिश की थी। तृणमूल कांग्रेस की और आप की भी ऐसी ही कोशिशों का असर कम से कम गोवा में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने वाला साबित हुआ लगता है।

बहरहाल‚ अब पंजाब में आप की जबर्दस्त जीत के बाद‚ और वह भी कांग्रेस को हराकर‚ विपक्ष के बिखराव की इस प्रक्रिया के तेज होने के ही आसार नजर आते हैं। अचरज नहीं होगा कि इससे न सिर्फ कांग्रेस को किनारे करके गैर–कांग्रेसी विपक्षी एकता की पुकारें तेज हों‚ बल्कि कांग्रेस का स्थानापन्न बनने की कोशिश में आप जैसी पार्टियां गुजरात जैसे राज्यों में विपक्ष का वोट और विभाजित कर भाजपा की सत्ता को ही सुरक्षित करने में मददगार हों। याद रहे कि 2022 के बाद भी विपक्ष का विभाजन ही है, जो मोदी को 2024 में जीत का भरोसा दिलाता है, वर्ना उत्तर प्रदेश में मोदी–योगी की शानदार जीत के पीछे भी न सिर्फ भाजपा के करीब पचास सीटें गंवाने की‚ बल्कि 2019 के आम चुनाव की तुलना में करीब आठ फीसद वोट गंवाने की कहानी तो छुपी ही हुई है‚ सपा और बसपा का सम्मिलित वोट भाजपा से खासा ज्यादा रहने की कहानी भी छुपी हुई है। इस चुनाव के नतीजों से विपक्ष का बिखराव अगर बढ़ता है‚ तो वही 2024 में मोदी की जीत सुनिश्चित करेगा।


नारी’ की पूजा तो फिर अत्याचार क्यों ?

नारी’ की पूजा तो फिर अत्याचार क्यों ?

09-Mar-2022

विश्व महिला दिवस (8 मार्च, 2022) पर प्रकाशनार्थ

नारी’ की पूजा तो फिर अत्याचार क्यों ?

-ललित गर्ग -

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नारी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन तथा मातृशक्ति की अभिवंदना का एक स्वर्णिम अवसर है विश्व नारी दिवस, यह नारी की महिमा को उजागर करने वाला ऐतिहासिक दिन है। आखिर नारी को ही ‘माँ’ का महत्त्वपूर्ण पद और संबोधन मिला। कारण की मीमांसा करते हुए अनुभवविदों ने बताया-हमारी भारतीय परंपरा में भारतमाता, राजमाता, गौमाता की तरह धरती को भी माता कहा जाता है। वह इसलिए कि धरती पैदा करती है। वह निर्मात्री है, सृष्टा है, संरक्षण देती है, पोषण करती है, बीज को विस्तार देती है, अनाम उत्सर्ग करती है, समर्पण का सितार बजाती है, आश्रम देती है, ममता के आँचल में सबको समेट लेती है और सब कुछ चुपचाप सह लेती है। इसीलिए उसे ‘माता’ का गौरवपूर्ण पद मिला। माँ की भूमिका यही है।
‘मातृदेवो भवः’ यह सूक्त भारतीय संस्कृति का परिचय-पत्र है।  ऋषि-महर्षियों की तपः पूत साधना से अभिसिंचित इस धरती के जर्रे-जर्रे में गुरु, अतिथि आदि की तरह नारी भी देवरूप में प्रतिष्ठित रही है। रामायण उद्गार के आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की यह पंक्ति- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ जन-जन के मुख से उच्चारित है। प्रारंभ से ही यहाँ ‘नारीशक्ति’ की पूजा होती आई है फिर क्यों नारी अत्याचार बढ़ रहे हैं? फिर क्यों नारी का उत्पीड़न एवं अस्तित्व को नौंचा जाता है? वैदिक परंपरा दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी के रूप में, बौद्ध अनुयायी चिरंतन शक्ति प्रज्ञा के रूप में और जैन धर्म में श्रुतदेवी और शासनदेवी के रूप में नारी की आराधना होती है। लोक मान्यता के अनुसार मातृ वंदना से व्यक्ति को आयु, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुण्य, बल, लक्ष्मी पशुधन, सुख, धनधान्य आदि प्राप्त होता है, फिर क्यों नारी की अवमानना होती है?
नारी का दुनिया में सर्वाधिक गौरवपूर्ण सम्मानजनक स्थान है। नारी धरती की धुरा है। स्नेह का स्रोत है। मांगल्य का महामंदिर है। परिवार की पी़िढ़का है। पवित्रता का पैगाम है। उसके स्नेहिल साए में जिस सुरक्षा, शाीतलता और शांति की अनुभूति होती है वह हिमालय की हिमशिलाओं पर भी नहीं होती। सुप्रसिद्ध कवयित्रि महादेवी वर्मा ने ठीक कहा था-‘नारी सत्यं, शिवं और सुंदर का प्रतीक है। उसमें नारी का रूप ही सत्य, वात्सल्य ही शिव और ममता ही सुंदर है। इन विलक्षणताओं और आदर्श गुणों को धारण करने वाली नारी फिर क्यों बार-बार छली जाती है, लूटी जाती है?
विश्व महिला दिवस के सन्दर्भ में एक टीस से मन में उठती है कि आखिर नारी का जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा। बलात्कार, छेड़खानी, भू्रण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? भरी राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़कर खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने के प्रयास के संस्करण आखिर कब तक शक्ल बदल-बदल कर नारी चरित्र को धुंधलाते रहेंगे? ऐसी ही अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं- जिनमें नारी का दुरुपयोग, उसके साथ अश्लील हरकतें, उसका शोषण, उसकी इज्जत लूटना और हत्या कर देना- मानो आम बात हो गई हो। महिलाओं पर हो रहे अन्याय, अत्याचारों की एक लंबी सूची रोज बन सकती है। न मालूम कितनी महिलाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती यह कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं।
औरत जन्मती नहीं, बना दी जाती है, यह कहावत प्रचलित है और कई कट्ट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं। कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई हारती रही है। इसीलिये आज की औरत को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए। पूरे पृष्ठ, जितने पुरुषों को प्राप्त हैं। पर विडम्बना है कि उसके हिस्से के पृष्ठों को धार्मिकता के नाम पर ‘धर्मग्रंथ’ एवं सामाजिकता के नाम पर ‘खाप पंचायते’ घेरे बैठे हैं। पुरुष-समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज  है और विवेक अनियंत्रण हैं जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है।
नारी जाति को अपनी विशेषताओं से ही नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों से भी अवगत होना होगा। नारी को अपने आप से रूबरू होना होगा, जब तक ऐसा नहीं होता लक्ष्य की तलाश और तैयारी दोनों अधूरी रह जाती है। स्वयं की शक्ति और ईश्वर की भक्ति भी नाकाम सिद्ध होती है और यही कारण है कि जीने की हर दिशा में नारी औरों की मुहताज बनती हैं, औरों का हाथ थामती हैं, उनके पदचिन्ह खोजती हैं। कब तक नारी औरों से मांगकर उधार के सपने जीती रहेंगी। कब तक औरों के साथ स्वयं को तौलती रहेंगी और कब तक बैशाखियों के सहारे मिलों की दूरी तय करती रहेंगी यह जानते हुए भी कि बैशाखियां सिर्फ सहारा दे सकती है, गति नहीं? हम बदलना शुरू करें अपना चिंतन, विचार, व्यवहार, कर्म और भाव। मौलिकता को, स्वयं को एवं स्वतंत्र होकर जीने वालों को ही दुनिया सर-आंखों पर बिठाती है।
जिस घर में नारी सुघड़, समझदार, शालीन, शिक्षित, संयत एंव संस्कारी होती है वह घर स्वर्ग से भी ज्यादा सुंदर लगता है क्योंकि वहाँ प्रेम है, सम्मान है, सुख है, शांति है,सामंजस्य है, शांत सहवास है। सुख-दुख की सहभागिता है। एक दूसरे को समझने और सहने की विनम्रता है। नारी अनेेक रूपों जीवित है। वह माँ, पत्नी, बहन, भाभी, सास, ननंद, शिक्षिका आदि अनेेक दायरोें से जुड़कर सम्बधों के बीच अपनी विशेष पहचान बनाती है। उसका हर दायित्व, कर्तव्य, निष्ठा और आत्म धर्म से जुड़ा होता है। इसीलिए उसकी सोच, समझ, विचार, व्यवहार और कर्म सभी पर उसके चरित्रगत विशेषताओं की रोशनी पड़ती रहती है। वह सबके लिए आदर्श बन जाती है।
नारी अपने घर में अपने आदर्शों, परंपराओ, सिद्धांतो, विचारों एवं अनुशासन को सुदृढ़ता दे सकें, इसके लिए उसे कुछेक बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। नारी अपने परिवार में सबका सुख-दुख अपना सुख-दुख माने। सबके प्रति बिना भेदभाव के स्नेह रखे। सबंधों की हर इकाई के साथ तादात्मय संबंध जोड़े। घर की मान मर्यादा, रीति-परंपरा, आज्ञा- अनुशासन, सिद्धंात, आदर्श एंव रूचियों के प्रति अपना संतुलित विन्रम दृष्टिकोण रखें।अच्छाइयों का योगक्षेम करें एंव बुराइयों के परिष्कार में पुरषार्थी प्रयत्न करें। सबका दिल और दिमाग जीतकर ही नारी घर में सुखी रह सकती है।
बदलते परिवेश में आधुनिक महिलाओं के लिए यह आवश्यक है कि मैथिलीशरण गुप्त के इस वाक्य-”आँचल में है दूध“ को सदा याद रखें। उसकी लाज को बचाएँ रखें और भू्रणहत्या जैसा घिनौना कृत्य कर मातृत्व पर कलंक न लगाएँ। बल्कि एक ऐसा सेतु बने जो टूटते हुए को जोड़ सके, रुकते हुए को मोड़ सके और गिरते हुए को उठा सके। नन्हे उगते अंकुरों और पौधों में आदर्श जीवनशैली का अभिसिंचन दें ताकि वे शतशाखी वृक्ष बनकर अपनी उपयोगिता साबित कर सकें। जननी एक ऐसे घर का निर्माण करे जिसमें प्यार की छत हो, विश्वास की दीवारें हों, सहयोग के दरवाजे हों, अनुशासन की खिड़कियाँ हों और समता की फुलवारी हो। तथा उसका पवित्र आँचल सबके लिए स्नेह, सुरक्षा, सुविधा, स्वतंत्रता, सुख और शांति का आश्रय स्थल बने, ताकि इस सृष्टि में बलात्कार, गैंगरेप, नारी उत्पीड़न जैसे शब्दों का अस्तित्व ही समाज हो जाए।
प्रेषकः

 

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


लुक़मान हकीम और उनकी कुछ अनमोल नसीहतें,

लुक़मान हकीम और उनकी कुछ अनमोल नसीहतें,

02-Mar-2022

लुक़मान हकीम और उनकी कुछ अनमोल नसीहतें, 
वह हब्शी ग़ुलाम थे परंतु महान ईश्वर ने किस वजह से उन्हें हिकमत से नवाज़ा?

शायद ही कोई ऐसा हो जिसने लुक़मान हकीम का नाम न सुना हो। सबसे पहले हम बहुत ही संक्षेप में यह बताना चाहते हैं कि लुक़मान हकीम कौन थे।

लुक़मान हकीम के बारे में विभिन्न रिवायतें हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के हवाले से जो रियावत आई है उसके मुताबिक़ लुक़मान हकीम एक काले इंसान थे। न पैसे वाले थे न खुबसूरत। एक रिवायत के अनुसार वह हब्शी ग़ुलाम थे।

एक बार किसी ने उनसे कहा कि तुम कितने बदशक्ल हो? उसके जवाब में हज़रत लुक़मान ने कहा तुम्हें रचना पर एतराज़ है या रचनाकार पर? हज़रत लुक़मान हकीम के जवाब से यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है कि किसी को भी यह नहीं कहना चाहिये कि फला व्यक्ति या फलां चीज़ कितनी बदसूरत है। क्योंकि जो भी इस प्रकार एतराज़ करता है वास्तव में वह रचना व पैदा करने वाले पर एतराज़ करता है। यह महान व सर्वसमर्थ ईश्वर है जिसने हर चीज़  व प्राणी की रचना की है और करता है।

ब्रह्मांड के विधाता ने सबकी रचना की है। हर चीज़ की रचना उसी अंदाज़ में की है जिसमें ज़रूरत थी और यह ज़रूरत वही जानता है जिसने रचना की है। अगर इंसान हर चीज़ से पहले यह सोचे कि इसे किसने बनाया है इसका बनाने वाला कौन है तो उसे कोई भी चीज़ बुरी नहीं लगेगी। महान ईश्वर को मानने वाले को कोई भी चीज़ बुरी नहीं दिखाई देगी चाहे वह कुत्ता और सुअर ही क्यों न हो।

एक सवाल यह है कि जब हज़रत लुक़मान हकीम एक हब्शी ग़ुलाम थे तो महान ईश्वर ने उन्हें हिकमत और ज्ञान क्यों प्रदान किया? उसका जवाब बहुत ही आसान है। महान ईश्वर की नज़र में वह इंसान प्रतिष्ठित है जिसके अंदर सदगुण हैं, उसका बातिन पाक हो और वह महान ईश्वर से डरता हो। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि ईश्वर ने लुक़मान को जो हिकमत अता की है वह न माल है न जमाल। वह एक अच्छे व सज्जन इंसान थे। खोमश रहते थे, प्रतिष्ठित और सदगुणों से सुसज्जित थे।

वह दिनों को नहीं सोते थे। वह हमेशा अपने आपको कंट्रोल में रखते थे और वह हमेशा सूक्ष्म आत्म निरीक्षण करते थे। वह गुनाहों के भय से कभी हंसे तक नहीं। न ग़ुस्सा करते थे न मज़ाक़। उन्हें ईश्वर ने बहुत औलाद दी थी और सबके सब उनसे पहले ही मर गये। इस पर उन्होंने सब्र किया और ईश्वर की रज़ा पर राज़ी रहे। किसी के लिए भी आंसू नहीं बहाया। जब भी दो लोगों में विवाद व झगड़ा हो जाता था दोनों में सुलह-सफाई करा देते थे और उनके बीच से दुश्मनी और द्वेष की आग बुझा देते थे।

यद्यपि वह काले थे परंतु उनका दिल ईमान से प्रकाशित था वह खुले विचार के इंसान थे। वह गुलाम थे परंतु बहुत समझदार और होशियार थे जिसकी वजह से उन्हें आज़ाद कर दिया गया था। वह अमीन थे, उन्होंने हराम कार्यों से अपनी नज़रों को बंद कर लिया था और ब्रह्मांड के बारे में बहुत सोचते थे और अपने अमल को ईश्वर की प्रसन्नता के लिए अंजाम देते थे। वह कभी भी किसी का मज़ाक़ नहीं उड़ाते थे।

दोस्तो लेख अधिक लंबा न हो जाये इसलिए उनके परिचय को यहीं विराम देते हैं और अब उनकी कुछ नसीहतों का उल्लेख करते हैं।

हज़रत लुक़मान हकीम विभिन्न अवसरों पर लोगों और अपने बेटों को नसीहत करते- रहते थे। एक दिन उन्होंने अपने बेटे से कहा बेटा आज तुम्हें तीन नसीहतें कर रहा हूं उन पर अमल करोगे तो कामयाब रहोगे। पहली नसीहत यह है कि कोशिश करो कि ज़िन्दगी में पूरी दुनिया का बेहतरीन खाना खाओ। दूसरी नसीहत यह है कि दुनिया के बेहतरीन बिस्तर पर सोने की कोशिश करो और तीसरी नसीहत यह है कि दुनिया के बेहतरीन महल व मकान में रहने की कोशिश करो।

हज़रत लुक़मान हकीम की इन बातों को सुनने के बाद उनके बेटे ने कहा हे पिता हम बहुत ही गरीब व निर्धन हैं किस तरह दुनिया का बेहतरीन खाना खा सकते हैं? इसके जवाब में लुक़मान हकीम ने कहा अगर थोड़ा देर से और थोड़ा कम खाना खाओ तो दुनिया के बेहतरीन खाने का स्वाद देगा और अगर थोड़ा ज़्यादा काम करो और थोड़ा देर से सोओ तो जहां भी सोओगे वहां यह एहसास करोगे कि दुनिया की बेहतरीन जगह सोये हो और अगर लोगों से दोस्ती करो तो उनके दिलों में जगह बना लोगे उस वक्त दुनिया का बेहतरीन महल व मकान तुम्हारा घर होगा।

बेटा हमेशा ईश्वर का शुक्र अदा करो, किसी को भी ईश्वर का शरीक क़रार मत दो। क्योंकि कमज़ोर और मोहताज मख़लूक़ को महान और आवश्यकतामुक्त ईश्वर का शरीक व समतुल्य करार देना बहुत बड़ा अन्याय व अत्याचार है।

बेटा अगर तुम्हारा अमल कण के बराबर भी छोटा हो और वह सरसों व राई के दाने की भांति ऊंचे पर्वत की चट्टान के अंदर हो या आसमानों में हो या ज़मीन व पाताल में हो तब भी ईश्वर की नज़र से ओझल नहीं है और प्रलय के दिन उसका हिसाब- किताब होगा और उसका प्रतिदान व दंड तुम्हें मिलेगा।

बेटा लोगों से अकड़ कर और घमंड से पेश न आओ। दूसरों पर गर्व न करो। ईश्वर घमंडी इंसान को पसंद नहीं करता है। बेटा लोगों के सामने अपने आपको न गिराओ वरना वे तुम्हें ज़लील करने का प्रयास करेंगे, न इतना मीठे बनो कि लोग तुम्हें खा जायें और न इतने कटु व तल्ख़ बन जाओ कि लोग तुम्हें दूर कर दें।

बेटा जब लोगों से बात करो तो नर्म आवाज़ और अंदाज़ में बात करो क्योंकि सीमा से अधिक ऊंची आवाज़ शिष्टाचार से अलग है।

बेटा दुनिया से दर्स लो और उसे छोड़ो नहीं कि तुम्हें लोगों की रोटी खाने पर मजबूर होना पड़ा और तुम फकीर हो जाओ और बहुत ज़्यादा दुनिया हासिल करने के चक्कर में मत पड़ जाओ। उसके फायदे और नुकसान की सोच में मत पड़ो कि उसका नुकसान तुम्हें आखेरत में पहुंचे और तुम हमेशा की कामयाबी से पीछे रह जाओ।

बेटा दुनिया बहुत गहरा समुद्र है और बहुत से विद्वान उसमें डूब गये। तो मेरे बेटा इस समुद्र को पार करने के लिए ईमान को नाव बनाओ, ईश्वर पर भरोसो को बादबान बनाओ, तक़वे को इस यात्रा का सामान बनाओ, बेटा जान लो कि अगर तुम इस ख़तरनाक रास्ते से निकल गये तो ईश्वर की रहमत का पात्र बनोगे और अगर तुम इस रास्ते में विचलित हो गये तो गुनाहों में ग्रस्त हो जाओगे।

बेटा दिन- रात की जेल में ज्ञान हासिल करने के लिए कोई समय निर्धारित करो और इस रास्ते में विद्वानों व ज्ञानियों के साथ हो जाओ और उनके साथ रहने में शिष्टाचार का ध्यान रखो और अर्थहीन बहस करने और हठधर्मी बनने से परहेज़ करो वरना तुम ज्ञान हासिल करने से वंचित रह जाओगे।

बेटा हज़ार दोस्त बनाओ और जान लो कि हज़ार दोस्त कम हैं और किसी से दुश्मनी न करो कि एक दुश्मन भी ज़्यादा है।

बेटा धर्म पेड़ की भांति है। ईश्वर पर ईमान उस पानी की भांति है जो उस पेड़ को उगाता व बड़ा करता है। नमाज़ उस पेड़ की जड़ है, ज़कात उस पेड़ का तना है, ईश्वर की राह में दोस्ती उसकी शाखायें, अच्छा अखलाक़ उसके पत्ते और हराम कार्यों से दूरी उसके फल हैं। जिस तरह पेड़ अच्छे फलों से परिपूर्ण होता है उसी तरह धर्म भी हराम कार्यों से दूरी से परिपूर्ण होता है।

बेटा कोई भी चीज़ ईश्वर की नज़र से पोशीदा नहीं रहती।

दूसरों द्वारा की गयी नसीहतों को मत भूलो।

बुरे लोगों से भलाई और मर्दानगी की अपेक्षा न रखो।

दूसरों पर चीखो- चिल्लाओ नहीं आराम से बात करो।

जितनी ज़रूरत हो उतनी ही बात करो।

दूसरों के हक को अच्छी तरह अदा करो।

अपने राज़ की रक्षा खुद अपने पास करो।

मुश्किल घड़ी में अपने दोस्त की परीक्षा लो

बुरे लोगों की संगत से बचो।

विद्वान व शिक्षित लोगों के साथ उठो- बैठो

छोटी सोच रखने वालों पर भरोसा न करो।

अक़लमंद ईमानदार लोगों से हमेशा सलाह- मशवेरा करो।

जवानी को ग़नीमत समझो।

दोस्त और दुश्मन दोनों से अख़लाक से पेश आओ।

उस्ताद को मां- बाप की तरह दोस्त रखो।

ख़र्च अपनी आमदनी से कम करो।

कम खाने, कम सोने और कम बोलने की आदत डालो।

अपने से बड़ों से मज़ाक़ न करो।

अपने से बड़ों से ज़्यादा लंबी बात न करो।

एसा काम न करो कि जाहिल व अज्ञानी भी तुमसे बदतमीज़ी करने लगें।

ज़रूरतमंदों को अपने माल से वंचित न करो।

पुरानी दुश्मनी को ज़िन्दा मत करो।

दूसरों के नेक काम को अपना न बताओ।

अपने माल को दोस्त व दुश्मन दोनों को न बताओ।

खड़े हुए लोगों के मध्य न बैठो।  

दूसरों की मौजूदगी में दांत साफ न करो।

सीरियस बात को मज़ाक़ के साथ न कहो।

दूसरों की मौजूदगी में नाक में उंगली मत करो।

किसी को शर्मिन्दा व ज़लील न करो।

बीवी- बच्चों की अनुचित बातों को न मानो। अल्लाह के सिवा किसी को भी अपना मददगार न समझो।

उम्र और रोज़ी का हिसाब- किताब है। तो न डरो न लालच करो।

अगर स्वर्ग चाहते हो तो अत्याचार, भ्रष्टाचार और उददंडता से परहेज़ करो।

दुनिया की मोहब्बत हर बुराई की जड़ है।

दूसरों की दुनिया को भूल जाओ।

दोस्तो अच्छी बातें कभी भी पुरानी नहीं होती हैं और उन्हें किसी ज़मान व मकान से सीमित नहीं किया जा सकता। कितने खुशनसीब वे लोग हैं जो अच्छी बातों पर अमल करते और दूसरों को अच्छी बातों व कार्यों के लिए नसीहत करते और बूरे कार्यों से रोकते हैं। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर से दुआ से है कि हम सब को अच्छी बातों पर अमल करने और बूरी बातों व कार्यों से दूर रहने की कृपा करे। आमीन

नोटः ये व्यक्तिगत विचार हैं। पार्सटूडे  MM


विश्व में शांति एवं सहजीवन के प्रेरक हैं शिव

विश्व में शांति एवं सहजीवन के प्रेरक हैं शिव

01-Mar-2022

विश्व में शांति एवं सहजीवन के प्रेरक हैं शिव

महाशिवरात्रि- 1 मार्च 2022 पर विशेष
-ः ललित गर्ग:-

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भगवान शिव शक्ति के प्रतीक ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की निशीथ काल में हुआ था, वे आदिदेव है, देवों के देव है, महादेव हैं। उनके जन्मोत्सव को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। शिव पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने इसी दिन रुद्र रूपी शिव को उत्पन्न किया था। शिव एवं हिमालय पुत्री पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। अतः यह शिव एवं शक्ति के पूर्ण समरस होने की रात्रि भी है। वे सृष्टि के सर्जक हैैं। वे मनुष्य जीवन के ही नहीं, सृष्टि के निर्माता, पालनहार एवं पोषक हैं। उन्होंने मनुष्य जाति को नया जीवन दर्शन दिया। जीने की शैली सिखलाई।
शिव सभी देवताओं में वे सर्वोच्च हैं, महानतम हैं, दुःखों को हरने वाले हैं। वे कल्याणकारी हैं तो संहारकर्ता भी हैं। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि को असंख्य श्रद्धालु शिव की भक्ति में मग्न होकर शिवत्व का जन्म दिवस मनाते हैं। यह शिव से मिलन की रात्रि का सुअवसर है। यह पर्व सांस्कृतिक एवं धार्मिक चेतना की ज्योति किरण है। इससे हमारी चेतना जाग्रत होती है, जीवन एवं जगत में प्रसन्नता, गति, संगति, सौहार्द, ऊर्जा, आत्मशुद्धि एवं नवप्रेरणा का प्रकाश परिव्याप्त होता है। यह पर्व जीवन के श्रेष्ठ एवं मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
भौतिक एवं भोगवादी भागदौड़ की दुनिया में शिवरात्रि का पर्व भी दुःखों को दूर करने एवं सुखों का सृजन करने का प्रेरक है। भोलेनाथ भाव के भूखे हैं, कोई भी उन्हें सच्ची श्रद्धा, आस्था और प्रेम के पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना कर सकता है। दिखावे, ढोंग एवं आडम्बर से मुक्त विद्वान-अनपढ़, धनी-निर्धन कोई भी अपनी सुविधा तथा सामर्थ्य से उनकी पूजा और अर्चना कर सकता है। शिव न काठ में रहता है, न पत्थर में, न मिट्टी की मूर्ति में, न मन्दिर की भव्यता में, वे तो भावों में निवास करते हैं।
भगवान शिव भोले भण्डारी है और जग का कल्याण करने वाले हैं। सृष्टि के कल्याण हेतु जीर्ण-शीर्ण वस्तुओं का विनाश आवश्यक है। इस विनाश में ही निर्माण के बीज छुपे हुए हैं। इसलिये शिव संहारकर्ता के रूप में निर्माण एवं नव-जीवन के प्रेरक भी है। सृष्टि पर जब कभी कोई संकट पड़ा तो उसके समाधान के लिये वे सबसे आगे रहे। जब भी कोई संकट देवताओं एवं असुरों पर पड़ा तो उन्होंने शिव को ही याद किया और शिव ने उनकी रक्षा की।
समुद्र-मंथन में देवता और राक्षस दोनों ही लगे हुए थे। सभी अमृत चाहते थे, अमृत मिला भी लेकिन उससे पहले हलाहल विष निकला जिसकी गर्मी, ताप एवं संकट ने सभी को व्याकुल कर दिया एवं संकट में डाल दिया, विष ऐसा की पूरी सृष्टि का नाश कर दें, प्रश्न था कौन ग्रहण करें इस विष को। भोलेनाथ को याद किया गया गया। वे उपस्थित हुए और इस विष को ग्रहण कर सृष्टि के सम्मुख उपस्थित संकट से रक्षा की। उन्होंने इस विष को कंठ तक ही रखा और वे नीलकंठ कहलाये। इसी प्रकार गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये भोले बाबा ने ही सहयोग किया। क्योंकि गंगा के प्रचंड दबाव और प्रवाह को पृथ्वी कैसे सहन करें, इस समस्या के समाधान के लिये शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को समाहित किया और फिर अनुकूल गति के साथ गंगा का प्रवाह उनकी जटाओं से हुआ। ऐसे अनेक सृष्टि से जुड़े संकट और उसकेे विकास से जुड़ी घटनाएं हैं जिनके लिये शिव ने अपनी शक्तियों, तप और साधना का प्रयोग करके दुनिया को नव-जीवन प्रदान किया। शिव का अर्थ ही कल्याण है, वही शंकर है, और वही रुद्र भी है। शंकर में शं का अर्थ कल्याण है और कर का अर्थ करने वाला। रुद्र में रु का अर्थ दुःख और द्र का अर्थ हरना- हटाना। इस प्रकार रुद्र का अर्थ हुआ, दुःख को दूर करने वाले अथवा कल्याण करने वाले।
यह पर्व महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूजा एवं अभिषेक करने पर उपासक को समस्त तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं। शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प तथा प्रसाद में भांग अति प्रिय हैं। लौकिक दृष्टि से दूध, दही, घी, शकर, शहद- इन पाँच अमृतों (पंचामृत) का पूजन में उपयोग करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। शिवरात्रि वह समय है जो पारलौकिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों प्रकार की व्यथाओं, संतापों, पाशों से मुक्त कर देता है। शिव की रात शरीर, मन और वाणी को विश्राम प्रदान करती है। लौकिक जगत में लिंग का सामान्य अर्थ चिह्न होता है जिससे पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग की पहचान होती है। शिव लिंग लौकिक के परे है। इस कारण एक लिंगी है। आत्मा है। शिव संहारक हैं। वे पापों के संहारक हैं। शिव की गोद में पहुंचकर हर व्यक्ति भय-ताप से मुक्त हो जाता है।
शिवरात्रि जागृति का पर्व है। जिसमें आत्मा का मंगलकारी शिव से मिलना होता है।  यह आत्म स्वरूप को जानने की रात्रि है। यह स्वयं के भीतर जाकर अथवा अंतश्चेतना की गहराइयों में उतरकर आत्म साक्षात्कार करने का दुर्लभ प्रयोग है। यह आत्मयुद्ध की प्रेरणा है, क्योंकि स्वयं को जीत लेना ही जीवन की सच्ची जीत है, शिवत्व की प्राप्ति है। काल के इस क्षण की सार्थकता शिवमय हो जाने में है। शक्ति माया नहीं है, मिथ्या नहीं है, प्रपंच नहीं है। इसके विपरीत शक्ति सत्य है। जीव और जगत भी सत्य है। सभी तत्वतः सत्य हैं। सभी शिवमय हैं।
शिवरात्रि भोगवादी मनोवृत्ति के विरुद्ध एक प्रेरणा है, संयम की, त्याग की, भक्ति की, संतुलन की। सुविधाओं के बीच रहने वालों के लिये सोचने का अवसर है कि वे आवश्यक जरूरतों के साथ जीते हैं या जरूरतों से ज्यादा आवश्यकताओं की मांग करते हैं। इस शिवभक्ति एवं उपवास की यात्रा में हर व्यक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि शिशुभाव जागता है। क्रोध नहीं, क्षमा शोभती है। कष्टों में मन का विचलन नहीं, सहने का धैर्य रहता है। यह तपस्या स्वयं के बदलाव की एक प्रक्रिया है। यह प्रदर्शन नहीं, आत्मा के अभ्युदय की प्रेरणा है। इसमें भौतिक परिणाम पाने की महत्वाकांक्षा नहीं, सभी चाहों का संन्यास है।
शिव ने जीवन को नई और परिपूर्ण शैली दी। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति की जीवन में आवश्यकता और उपयोगिता का प्रशिक्षण दिया। कला, साहित्य, शिल्प, मनोविज्ञान, विज्ञान, पराविज्ञान और शिक्षा के साथ साधना के मानक निश्चित किए। सबको काम, अर्थ, धर्म, मोक्ष की पुरुषार्थ चतुष्टयी की सार्थकता सिखलाई। वे भारतीय जीवन-दर्शन के पुरोधा हैं।
आज चारों ओर युद्ध, अनैतिकता, आतंक, अराजकता और अनुशासनहीनता का बोलबाला है। व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र- हर कहीं दरारे ही दरारे हैं, हर कहीं टूटन एवं बिखराव है। मानवीय दृष्टि एवं जीवन मूल्य खोजने पर भी नहीं मिल रहे हैं। मनुष्य आकृति से मनुष्य रह गया है, उसकी प्रकृति तो राक्षसी हो चली है। मानवता क्षत-विक्षत होकर कराह रही है। यूक्रेन एवं रूस के बीच चल रहा युद्ध मानवता के विनाश की कहानी लिख रहा है, विश्वयुद्ध की संभावनाएं गहराती जा रही है। इन सबका कारण है कि हमने आत्म पक्ष को भुला दिया है। इन विकट स्थितियों में महादेव ही हमें बचा सकते हैं, क्योंकि शिव ने जगत की रक्षा हेतु बार-बार और अनेक बार उपक्रम किये।
वस्तुतः अपने विरोधियों एवं शत्रुओं को मित्रवत बना लेना ही सच्ची शिव भक्ति है। जिन्हें समाज तिरस्कृत करता है उन्हें शिव गले लगाते हैं। तभी तो अछूत सर्प उनके गले का हार है, अधम रूपी भूत-पिशाच शिव के साथी एवं गण हैं। समाज जिनकी उपेक्षा करता है, शंकर उन्हें आमंत्रित करते हैं। शिव की बरात में आए नंग-धडं़ग, अंग-भंग, भूत-पिशाच इसी तथ्य को दृढ़ करते हैं। इस लिहाज से शिव सच्चे पतित पावन हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण देवताआंे के अलावा दानव भी शिव का आदर करते हैं। सचमुच! धन्य है उनकी तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता, दृढ़-संकल्पशक्ति, धैर्यशीलता, आत्मनिष्ठा और अखण्ड साधनाशीलता।
 भारतीय संस्कृति की भांति शिव परिवार में भी समन्वयकारी गुण दृष्टिगोचर होते हैं। वहां जन्मजात विरोधी स्वभाव के प्राणी भी शिव के प्रताप से परस्पर प्रेमपूर्वक निवास करते हैं। शंकर का वाहन बैल है तो पार्वती का वाहन सिंह, गणेश का वाहन चूहा है तो शिव के गले का हार सर्प एवं कार्तिकेय का वाहन मयूर है। ये सभी परस्पर वैर भाव को छोड़कर सहयोग एवं सद्भाव से रहते हैं। शिव परिवार का यह आदर्श रूप प्रत्येक परिवार एवं समाज के लिए ग्राह्य है, विश्व में शांति एवं सहजीवन का प्रेरक है। आज समाज एवं राष्ट्र में ऐसे ही सद्भाव, सौहार्द एवं समन्वय की आवश्यकता है।

  प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार एवं समाजसेवी
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई.पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 

 


संगीत एवं नृत्य परंपरा का सितारा थे बिरजू महाराज

संगीत एवं नृत्य परंपरा का सितारा थे बिरजू महाराज

18-Jan-2022

संगीत एवं नृत्य परंपरा का सितारा थे बिरजू महाराज

- ललित गर्ग -

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कत्थक के सरताज पंडित बिरजू महाराज नहीं रहे। उनके निधन से आज भारतीय संगीत की लय थम गई, सुर मौन हो गए, भाव शून्य हो गए। वे शास्त्रीय कथक नृत्य के लखनऊ कालिका-बिन्दादिन घराने के विश्वप्रसिद्ध अग्रणी नर्तक थे, जिन्होंने इस गौरवशाली परंपरा की सुगंध विश्व भर में प्रसारित की। बिरजू महाराज के अनंत में विलीन होने से गहन सन्नाटा छा गया है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत एवं कथक नृत्य का दुनिया में विशिष्ट स्थान है, क्योंकि यह सत्यं, शिवं और सौन्दर्य की युगपत् उपासना की सिद्ध एवं चमत्कारी अभिव्यक्ति है।
बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 को कत्थक नृत्य के लिये प्रसिद्ध जगन्नाथ महाराज के घर हुआ था, जिन्हें लखनऊ घराने के अच्छन महाराज कहा जाता था। ये रायगढ़ रजवाड़े में दरबारी नर्तक हुआ करते थे। बिरजू का नाम पहले दुखहरण रखा गया था, क्योंकि ये जिस अस्पताल पैदा हुए थे, उस दिन वहाँ उनके अलावा बाकी सब कन्याओं का ही जन्म हुआ था, यानी गोपियों के बीच श्रीकृष्ण, उसी कारण उनका नाम बृजमोहन रख दिया गया। यही नाम आगे चलकर ‘बिरजू’ और ‘बिरजू महाराज’ हो गया। वे भारतीय संगीत जगत का एक उज्जवल नक्षत्र थे। पारम्परिक कौशल, रचनात्मकता एवं संवेदनशीलता से युक्त कालिका-बिन्दादिन घराने के प्रतिनिधि गायक एवं नर्तक पद्मविभूषण बिरजू महाराज गायन एवं कथक नर्तन में कल्पनाशील विस्तार, गहन अलौकिकता और अचूक कलात्मक संयम एवं वैभव के लिये विख्यात हैं। हिन्दुस्तान के कथक नृत्य एवं गायन में सात दशकों के अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि वे अपनी कला के अकेले महारथि थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत एवं कला को लोकरंजन का साधन बनाने के लिये क्लिष्टता को दूर उसे सुगम बनाया। ईश्वर को आलोकपुंज मानते हुए उससे एकाकार होकर अपनी कला को प्रस्तुति देते हुए बिरजु महाराज ऐसा प्रतीत कराते थे, मानो उनका ईश्वर से सीधा साक्षात्कार हो रहा है। यही कारण है कि उनकी नृत्यकला एवं संगीत साधना से रू-ब-रू होने वाले असंख्य लोग उनकी साधना में गौता लगाते हुए मंत्रमुग्ध हो जाते थे। ऐसे गुणों के भंडार पंडित बिरजू महाराज के जीवन का वर्णन करना संभव नहीं। हम सभी जानते हैं कि बिरजू महाराज कथक नृत्य के एक मुर्धन्य कलाकार थे। परंतु इसके इलावा भी जो उनके अलग विषयों में भी दखल था जिनमें उनका तबला वादन भी अनूठा एवं बेजोड़ था। और उनकी ठुमरी गायकी पर जो दखल था वह हम सभी भली भांति जानते हैं। कुछ फिल्मों में भी उन्होंने अपना गायकी का परिचय दिया हैं। उनके कथक नृत्य के तो सभी दीवाने थे पर उनका यह चौमुखी विद्या गुण उन्हें सबसे अलग रखता था। जैसे संयम नटराज हमारे बीच से आज विदा लेकर चले गए। उनका यह स्थान कोई पूरा नहीं कर सकता। कत्थक संसार की एक पाठशाला आज वीरान हो गई।
पंडित बिरजूजी कथक नर्तकों के महाराज परिवार के वंशज थे जिसमें अन्य प्रमुख विभूतियों में इनके दो चाचा व ताऊ, शंभु महाराज एवं लच्छू महाराज तथा इनके स्वयं के पिता एवं गुरु अच्छन महाराज भी आते हैं। हालांकि इनका प्रथम जुड़ाव नृत्य से ही है, फिर भी इनकी गायकी पर भी अच्छी पकड़ थी, तथा ये एक अच्छे शास्त्रीय गायक भी थे। इन्होंने कत्थक नृत्य में नये आयाम नृत्य-नाटिकाओं को जोड़कर उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इन्होंने कत्थक हेतु ‘कलाश्रम’ की स्थापना भी की है। इसके अलावा इन्होंने विश्वपर्यन्त भ्रमण कर सहस्रों नृत्य कार्यक्रम करने के साथ-साथ कत्थक शिक्षार्थियों हेतु सैंकड़ों कार्यशालाएं भी आयोजित की। उन्होंने कत्थक के साथ कई प्रयोग किए और फिल्मों के लिए कोरिओग्राफ भी किया। उनकी तीन बेटियाँ और दो बेटे हैं। अपने चाचा, शम्भू महाराज के साथ नई दिल्ली स्थित भारतीय कला केन्द्र, जिसे बाद में कत्थक केन्द्र कहा जाने लगा, उसमें काम करने के बाद इस केन्द्र के अध्यक्ष पद पर भी कई वर्षों तक आसीन रहे। तत्पश्चात 1998 में वहां से सेवानिवृत्त होने पर अपना नृत्य विद्यालय कलाश्रम भी दिल्ली में ही खोला। इनको उनके चाचाओं लच्छू महाराज एवं शंभु महाराज से प्रशिक्षण मिला, तथा अपने जीवन का प्रथम गायन इन्होंने सात वर्ष की आयु में दिया। 20 मई, 1947 को जब ये मात्र 9 वर्ष के ही थे, इनके पिता का स्वर्गवास हो गया। परिश्रम के कुछ वर्षोपरान्त इनका परिवार दिल्ली में रहने लगा। बिरजू महाराज ने मात्र 13 वर्ष की आयु में ही नई दिल्ली के संगीत भारती में नृत्य की शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। उसके बाद उन्होंने दिल्ली में ही भारतीय कला केन्द्र में सिखाना आरम्भ किया।
बिरजू महाराज की ख्याति फिल्मी दुनिया तक भी पहुंची और इन्होंने सत्यजीत राय की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी की संगीत रचना की, तथा उसके दो गानों पर नृत्य के लिये गायन भी किया। इसके अलावा वर्ष 2002 में बनी हिन्दी फिल्म देवदास में एक गाने ‘काहे छेड़ छेड़ मोहे’ का नृत्य संयोजन भी किया। इसके अलावा अन्य कई हिन्दी फिल्मों जैसे डेढ़ इश्किया, उमराव जान तथा संजय लीला भंसाली निर्देशित बाजी राव मस्तानी में भी कत्थक नृत्य के संयोजन किये। दिल तो पागल है, गदर एक प्रेम कथा जैसी हिट फिल्मों में अपने गायन और अपने नृत्य से इन फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। बिरजू महाराज को अपने क्षेत्र में आरम्भ से ही काफी प्रशंसा एवं सम्मान मिले, जिनमें 1986 में पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा कालिदास सम्मान प्रमुख हैं। इनके साथ ही इन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं खैरागढ़ विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की मानद उपाधि मिली। 2016 में हिन्दी फिल्म बाजीराव मस्तानी में ‘मोहे रंग दो लाल’ गाने पर नृत्य-निर्देशन के लिये फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, 2002  में लता मंगेश्कर पुरस्कार से भी नवाजा गया।
पंडित बिरजू महाराज का सृजन, नृत्य एवं संगीत मनोरंजन एवं व्यावसायिकता के साथ आध्यात्मिकता एवं सृजनात्मकता का आभामंडल निर्मित करने वाला है। उनका संगीत, नृत्य एवं गायन का उद्देश्य आत्माभिव्यक्ति, प्रशंसा या किसी को प्रभावित करना नहीं, अपितु स्वान्तः सुखाय, पर-कल्याण एवं ईश्वर भक्ति की भावना है। इसी कारण उनका शास्त्रीय गायन, नर्तन एवं स्वरों की साधना सीमा को लांघकर असीम की ओर गति करती हुई दृष्टिगोचर होती है। उनका गायन एवं नृत्य हृदयग्राही एवं प्रेरक है क्योंकि वह सहज एवं हर इंसान को आत्ममुग्ध करने, झकझोरने एवं आनन्द-विभोर करने में सक्षम है। भगवान श्रीकृष्ण की जीवंतता को साकार करने वाला यह महान् कलाकार सदियों तक अपनी शास्त्रीय-संगीत साधना एवं कथक नृत्य के बल पर हिन्दुस्तान की जनता पर अपनी अमिट छाप कायम रखेगा।
पंडित बिरजू महाराज की आवाज एवं नृत्य की तासीर ही है कि उन्हें सुनते एवं देखते हुए कोई शख्स तनावों की भीड़ में शांति महसूस करता तो किसी के अशांत मन के लिये वह समाधि का नाद होता है। उनका संगीत एवं नर्तन चंचल चित्त के लिये एकाग्रता की प्रेरणा होता तो संघर्ष के क्षणों में संतुलन का उपदेश। वह एक दिव्य एवं विलक्षण चेतना थी जो स्वयं संगीत एवं नृत्य रस में जागृत रहती और असंख्य श्रोताओं के भीतर ज्योति जलाने का प्रयास करती। हर जगह यह बेजोड़ गायक एवं कथक नर्तक शास्त्रीयता की राह पर चलते हुए भक्ति का एक लोकपथ सृजित करता था, धरती से ब्रह्माण्ड तक, संगीतप्रेमियों से वैज्ञानिकों तक, राजनीतिज्ञों से साधकों तक सबकी नजरें इस अलौकिक एवं विलक्षण संगीतज्ञ एवं कथक नृतक के गायन एवं नृत्य पर लगी रहती थी। आधुनिक संदर्भांे में शास्त्रीय गायन कथक नृत्य के मूर्धन्य एवं सिद्ध उपासकों की कड़ी में पंडित बिरजू महाराज का देवलोकगमन होना एक महान संगीत एवं नृत्य परंपरा में गहरी रिक्तता एवं एक बड़े खालीपन का सबब है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रद्धांजलि स्वर में कहा है कि भारतीय नृत्य कला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाने वाले पंडित बिरजू महाराजजी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनका जाना संपूर्ण कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।’ अपनी संजीदा संगीत साधना, मधुरोपासना गायिकी, घराने की कठिन कंठ-साधना, भक्ति का विहंगम आकाश रचने की उदात्त जिजीविषा, कथक नृत्य और वैष्णवता के आंगन में शरणागति वाली पुकार के लिए पंडित बिरजू महाराज हमेशा याद किए जाएंगे। भले ही मृत्यु उन्हें छिपा ले और महत्तर मौन उन्हें घेर ले, फिर भी उनके स्वर, नृत्य एवं संगीत का नाद इस धरती को सुकोमलता का अहसास कराता रहेगा। प्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई पी एक्सटेंसन, पटपड़गंज
 दिल्ली-110092
फोन:-22727486, मोबाईल:- 9811051133

 

 


नये भारत के निर्माता थे स्वामी विवेकानन्द

नये भारत के निर्माता थे स्वामी विवेकानन्द

10-Jan-2022

नये भारत के निर्माता थे स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द जन्म जयन्ती-12 जनवरी 2022 पर विशेष

-ललित गर्ग-
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भारत को आर्थिक एवं भौतिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से शक्तिसम्पन्न राष्ट्र बनाने का सफल प्रयत्न करने वाले महानायक का नाम है स्वामी विवेकानन्दजी। वे एक सिद्धपुरुष एवं संस्कृतिपुरुष थे। नैतिक मूल्यों के विकास एवं युवा चेतना के जागरण हेतु कटिबद्ध, मानवीय मूल्यों के पुनरुत्थान के सजग प्रहरी, अध्यात्म दर्शन और संस्कृति को जीवंतता देने वाली संजीवनी बंूटी, भारतीय संस्कृति एवं भारतीयता के प्रखर प्रवक्ता, युगीन समस्याओं के समाधायक, अध्यात्म और विज्ञान के समन्वयक, वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु हैं स्वामी विवेकानन्द।
स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी,1863 में हुआ। नरेन्द्र ने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए। स्वामी विवेकानन्द का जन्म दिन भारत में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि स्वामीजी आज भी अधिकांश युवाओं के आदर्श हैं। उनकी हमेशा यही शिक्षा रही कि आज के युवक को शारीरिक प्रगति से ज्यादा आंतरिक प्रगति की जरूरत है। वे युवकों में जोश भरते हुए कहा करते थे कि उठो मेरे शेरांे! इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत निर्मित करने की बात कर रहे हैं, उसका आधार स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाएं एवं प्रेरणाएं ही है। मोदी स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते हैं। भारतीय संस्कृति एवं स्वामीजी की सोच ंको विश्वव्यापी विस्तार देने की प्रक्रिया के लिये आज मोदी निरन्तर अथक प्रयास कर रहे हैं। जब से उन्होंने देश की बागडोर अपने हाथों में ली है, तब से सनातन संस्कृति की शिक्षा को आधार मानते हुए इसके प्रसार के लिए वे ‘अग्रदूत’ की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। नरेन्द्रनाथ से नरेन्द्र मोदी की नया भारत बनाने की यह यात्रा भारत के सशक्तिकरण एवं विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया है।
  स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में उनके प्रयासों एवं प्रस्तुति के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक मूल्यों को सुदृढ़ कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। वे जहां आर्थिक समृद्धि के प्रबल समर्थक थे, वही लोकतांत्रिक मूल्यों को बल देने वाले महानायक भी थे। स्वामी विवेकानंद के अनुसार ‘‘लोकतंत्र में पूजा जनता की होनी चाहिए। क्योंकि दुनिया में जितने भी पशु-पक्षी तथा मानव हैं वे सभी परमात्मा के अंश हैं।’’ स्वामी जी ने युवाओं को जीवन का उच्चतम सफलता का अचूक मंत्र इस विचार के रूप में दिया था - ‘‘उठो, जागो और तब तक मत रूको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये।’’
कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं। इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उन्होंने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और मौजूदा स्थितियों का पहले ज्ञान हासिल किया। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया, सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है। वे अध्यात्म की अतल गहराइयों में डुबकी लगाने वाले योग साधक थे तो व्यवहार में जीने वाले गुरु भी थे। वे प्रज्ञा के पारगामी थे तो विनम्रता की बेमिशाल नजीर भी थे। वे करुणा के सागर थे तो प्रखर समाज सुधारक भी थे। उनमें वक्तृता थी तो शालीनता भी। कृशता थी तो तेजस्विता भी। आभिजात्य मुस्कानों के निधान, अतीन्द्रिय चेतना के धनी, प्रकृति में निहित गूढ़ रहस्यों को अनावृत्त करने में सतत् संलग्न, समर्पण और पुरुषार्थ की मशाल, सादगी और सरलता से ओतप्रोत, स्वामी विवेकानन्द का समग्र जीवन स्वयं एक प्रयोगशाला था।
स्वामी विवेकानन्द की मेघा के दर्पण से वेदान्त, दर्शन, न्याय, तर्कशास्त्र, समाजशास्त्र, योग, विज्ञान, मनोविज्ञान आदि बहुआयामी पावन एवं उज्ज्वल बिम्ब उभरते रहे। वे अतुलनीय संपदाओं के धनी थे। वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य के एक उत्साही पाठक थे। इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। उनको बचपन में भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। उन्होंने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन किया। 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।
विवेकानन्द बड़े स्वप्नदृष्टा थे। उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद न रहे। उन्होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। अध्यात्मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार उन्होंने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें। वे पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी-देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये। उनका यह कालजयी आह्वान एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिग्घी बँध गई थी।
अध्यात्म एवं विज्ञान में समन्वय एवं आर्थिक समृद्धि के प्रबल समर्थक विवेकानंद जी केवल भारत के ही गुरू नहीं वरन् वह जगत गुरू के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व करने की उपयुक्त योग्यता रखते थे उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस से विभिन्न धर्मों के सारभौतिक सत्य को आत्मसात किया था। नवयुग का नवीन दर्शन और नवीन विज्ञान है - वैज्ञानिक अध्यात्म। स्वामी जी का मानना था कि अध्यात्म एवं विज्ञान में समन्वय के विचारों में विश्व की सभी समस्याओं के समाधान निहित हैं। विज्ञान की कोशिश है कि लोगों का भौतिक जीवन बेहतर हो, जबकि अध्यात्म का प्रयास है कि प्रार्थना आदि उपायों से इन्सान सच्ची राह चले। विज्ञान और अध्यात्म के मिलन से तेजस्वी नागरिक का निर्माण होता है। तर्क और युक्ति विज्ञान व अध्यात्म के मूल तत्त्व हैं। धार्मिक व्यक्ति का लक्ष्य आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करना है, जबकि वैज्ञानिक का मकसद कोई महान् खोज या अविष्कार करना होता है। यदि जीवन के ये दो पहलू आपस में मिल जाएँ तो हम चिन्तन के उस शिखर पर पहुँच जाएँगे जहाँ उद्देश्य एवं कर्म एक हो जाते हैं। इस आधार पर उच्चतम विकसित समाज का निर्माण साकार होगा।
स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा के सिद्धान्त भारत की शिक्षा के अधूरेपन को दूर करने में सक्षम हैं। वे मैकाले द्वारा प्रतिपादित और उस समय प्रचलित अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के विरोधी थे, क्योंकि इस शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बाबुओं की संख्या बढ़ाना था। वह ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके। बालक की शिक्षा का उद्देश्य उसको आत्मनिर्भर बनाकर अपने पैरों पर खड़ा करना है। उन्होंने प्रचलित शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा की संज्ञा देते हुए कहा है कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ? अतः स्वामीजी सैद्धान्तिक शिक्षा के पक्ष में नहीं थे, वे व्यावहारिक शिक्षा को व्यक्ति के लिए उपयोगी मानते थे। व्यक्ति की शिक्षा ही उसे भविष्य के लिए तैयार करती है, इसलिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने नवीन शिक्षा पद्धति घोषित की है, जो स्वामीजी के आदर्शों पर नये नागरिकों का निर्माण करेंगी, नया भारत का निर्माण करंेगी। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है। स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस- युवा दिवस पर उनको हार्दिक नमन्!
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समाज में जहर घोलने वाले बुल्ली-सुल्ली ऐप

समाज में जहर घोलने वाले बुल्ली-सुल्ली ऐप

08-Jan-2022

समाज में जहर घोलने वाले बुल्ली-सुल्ली ऐप

- ललित गर्ग-

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राष्ट्र एवं समाज में नफरत, द्वेष, साम्प्रदायिक संकीर्णता एवं बिखराव पैदा करने के लिये अनेक शक्तियां सक्रिय हंै। इन जोड़ने की बजाय तोड़ने वाली शक्तियों की सोच इतनी जहरीली एवं घातक है कि समाज को कमजोर ही नहीं बनाती बल्कि तोड़ भी देती है। ऐसी ही शक्तियों ने अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं की जानकारी और इजाजत के बगैर उनकी तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें नीलामी के लिए इंटरनेट पर डालने का निन्दनीय एवं त्रासद कार्य किया है। इससे जुड़े बुल्ली बाई ऐप केस में हुए खुलासे हैरान भी करते हैं, शर्मनाक और अक्षम्य अपराध भी है। नए साल के पहले दिन कुछ महिला पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के जरिए सामने आया यह मामला सबको सकते में डालने वाला था। हालांकि इससे मिलता-जुलता एक मामला पिछले साल जुलाई में भी उठा था, जो सुल्ली डील के नाम से चर्चित हुआ था।
बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया साइटों पर महिलाओं को निशाना बनाने का मुद्दा देश में काफी तूल पकड़ रहा है। बुल्ली बाई ऐप हो या सुल्ली डील इनसे जुड़े कुछ लोग जानते नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। उससे कितना नुकसान हो रहा है या हो सकता है। उनके इन शरारतपूर्ण आपराधिक कार्याें से समाज में एक-दूसरे वर्ग के लिये बेवजह नफरत, घृणा एवं द्वेष पनप रहा है। समाज को तोड़ने की इन नापाक कोशिशों को लेकर राहत की बात यह रही कि इस बार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और विचारधाराओं ने एक स्वर में इसकी कड़ी निंदा की। मुंबई पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया, जिसका नतीजा कुछ गिरफ्तारियों के रूप में सामने आया है। ‘बुली बाई’ ऐप मामले की जांच कर रहे मुंबई पुलिस के साइबर प्रकोष्ठ ने उत्तराखंड से मामले की मास्टरमाइंड बताई जा रही 18 साल की लड़की को गिरफ्तार किया है, लेकिन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सहानुभूति पैदा करने वाली है। साल 2011 में उसकी मां की कैंसर से और 2021 में पिता की कोरोना से मौत हो चुकी है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं है। लेकिन अक्सर ऐसे हालात के मारे लोगों को ही षडयंत्रकारी बड़े आपराधिक कारनामों के लिए इस्तेमाल करते हैं। समझना जरूरी है कि इस मामले की जांच अभी शुरू ही हुई है। जो लोग अभी नजर में आए हैं और पकड़े गए हैं उनकी जड़ का पता लगना बाकी है।
यह भी देखा जाना शेष है कि ये लोग दरअसल किस तरह की परिस्थितियों में और किन लोगों के कहने से इस मामले में जुड़े थे। जब तक परदे के पीछे से इन लोगों का इस्तेमाल कर रहे किरदारों का खुलासा नहीं होता, तब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि किशोरों एवं युवाओं को मोहरा बनाकर इस तरह के घृणित कांड को अंजाम देने वाले असली खलनायक कौन हैं। मगर यह भी सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। ऐसे मामले महज प्रशासनिक और कानूनी नजरिए से नहीं समझे जा सकते। ट्विटर और खास ऐप के सहारे खास कम्युनिटी की महिलाओं को निशाना बनाना न केवल महिला विरोधी पुरुषवादी सोच को दर्शाता है बल्कि उस खास समूह के खिलाफ सांप्रदायिक नफरत की भावना की भी पुष्टि करता है। ऐसी खलनायकी शक्तियां तो थोक के भाव बिखरी पड़ी हैं। हर दिखते समर्पण की पीठ पर स्वार्थ चढ़ा हुआ है। इसी प्रकार हर घातक एवं जघन्य कृत्य में कहीं न कहीं स्वार्थ एवं राष्ट्र विरोधी भावना है, किसी न किसी वर्ग, जाति, धर्म, सम्प्रदाय  को नुकसान पहुंचाने की ओछी मनोवृत्ति है। आज जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं वे तथाकथित ताकतवर हैं। जिनके पास खोने के लिए बहुत कुछ मान, प्रतिष्ठा, छवि, सिद्धांत, पद, सम्पत्ति, सज्जनता है, वे कमजोर हैं। यह वक्त की विडम्बना है।
इन समाज में जहर घोलने वाले ऐप के ट्विटर हैंडल पर दी गई जानकारी में दावा किया गया है कि इसका निर्माता ‘केएसएफ खालसा सिख फोर्स’ है, जबकि एक अन्य ट्विटर हैंडल, खालसा सुप्रीमैसिस्ट, इसका फॉलोअर था। पुलिस के मुताबिक, सिख समुदाय से संबंधित नामों का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया गया कि ये ट्विटर हैंडल उस समुदाय के लोगों द्वारा बनाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि जिन महिलाओं को निशाना बनाया गया, वे मुस्लिम थीं, इसलिए ऐसी संभावना थी कि इससे दो समुदायों के बीच दुश्मनी एवं नफरत पैदा हो सकती थी और सार्वजनिक शांति भंग हो सकती थी। पुलिस ने कहा कि गिटहब प्लेटफॉर्म पर होस्ट किए गए बुल्ली बाई ऐप के माध्यम से वर्चुअल नीलामी के लिए महिलाओं की तस्वीरें प्रदर्शित की गईं और यह ‘सुल्ली डील्स’ ऐप मामले के समान था जो छह महीने पहले सामने आया था। इससे पहले, मुंबई के पुलिस आयुक्त हेमंत नगराले ने कहा था कि पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि ऐसे उपनामों का इस्तेमाल क्यों किया गया? निश्चित रूप से यह कोई साधारण नहीं बल्कि एक बड़ा षडयंत्र है, जिसके झूठ एवं बनावटी नामों का सहारा लिया है और किशोरों एवं युवाओं को मोहरा बनाया गया है। इनके असली मास्टरमाइंड का पता लगाना ज्यादा जरूरी है। क्योंकि आये दिन ऐसे लोग, विषवमन करते हैं, प्रहार करते रहते हैं, चरित्र-हनन करते रहते हैं, सद्भावना, साम्प्रदायिक सौहार्द और शांति को भंग करते रहते हैं। उन्हंे राष्ट्रीयता, भाईचारे और एकता से कोई वास्ता नहीं होता। वे ऐसे घाव कर देते हैं जो हथियार भी नहीं करते। किसी भी टूट, गिरावट, दंगों व युद्धों तक की शुरूआत ऐसी ही बातों से होती है।
आज हर हाथ में पत्थर है। आज हम समाज में नायक कम खलनायक ज्यादा हैं। प्रसिद्ध शायर नज्मी ने कहा है कि अपनी खिड़कियों के कांच न बदलो नज्मी, अभी लोगों ने अपने हाथ से पत्थर नहीं फैंके हैं। डर पत्थर से नहीं, डर उस हाथ से है, जिसने पत्थर पकड़ रखा है। बंदूक अगर महावीर-गांधी के हाथ में है तो डर नहीं। वही बंदूक अगर हिटलर के हाथ में है तो डर है। हर झूठ में एक सच्चाई का दर्शन होता है....... कि ‘पत्थर भी उन पेड़ों की तरफ फैंके जाते हैं जो फलदार होते हैं।’
भारत की विविधता में एकता एवं सर्वधर्म सम्भाव संस्कृृति को कुचलने की कोशिशें लगातार होती रही है, लेकिन महिलाओं को आधार बनाकर भारतीय संस्कृति एवं संविधान को देखते हुए षडयंत्रपूर्वक नफरत एवं घृणा फैलाना अनुचित ही नहीं, आपराधिक कृत्य है।
मुस्लिम महिलाओं की बोली लगाना हो या हिन्दू महिलाओं के चरित्रहनन की कोशिशें-यह समाज को विकृत करने एवं राष्ट्र की एकता को विखंड़ित करने की कुचेष्टाएं हंै। यह समझने के लिए किसी जांच-पड़ताल की जरूरत नहीं है कि मौजूदा प्रकरण में जो भी लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल रहे हैं, वे नफरत से भरी सांप्रदायिक और पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। जहां तक इस प्रकरण की बात है तो पुलिस की जांच सही ढंग से आगे बढ़ाकर इसके सभी दोषियों को कानून के अनुरूप सजा दिलाई जा सकती है। लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है समाज को इस जहरीली सोच के चंगुल से निकालना। यह बड़ी लड़ाई है और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को वैसी ही एकजुटता दिखानी होगी जैसी उन्होंने इस प्रकरण की निंदा करने में दिखाई।
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पंजाब चुनाव अंधेरा नहीं, रोशनी के दीप जलाये

पंजाब चुनाव अंधेरा नहीं, रोशनी के दीप जलाये

27-Dec-2021

पंजाब चुनाव अंधेरा नहीं, रोशनी के दीप जलाये

- ललित गर्ग -

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जब-जब चुनाव का माहौल बनता है एवं चुनाव की आहट होती है, हिंसा, द्वेष, नफरत एवं साम्प्रदायिकता की आग सुलगने लगती है, एकाएक शांत एवं सौहार्दपूर्ण माहौल में ऐसी चिंनगारियों का फूटना एवं स्थितियों का पनपना स्पष्टतः राजनीति के हिंसक एवं अराजक होने का संकेत देता है। पंजाब में माहौल का निरंतर संवेदनशील, हिंसक एवं अराजक होते जाना चिंताजनक है। पिछले दिनों से बेअदबी की घटनाओं को लेकर वैसे ही तनाव है और अब गुरुवार दोपहर लुधियाना कोर्ट परिसर में हुए विस्फोट ने एक अलग ही चिंता का संचार कर दिया है। विस्फोट में दो लोगों की मौत भी हुई है और करीब पांच घायल हुए हैं। ये घटनाएं निश्चित रूप से पंजाब में होने वाले चुनाव से पहले हिंसा, अशांति एवं द्वेष  पैदा करने का प्रयास है। इन घटनाओं का सिलसिला बताता है कि कुछ राष्ट्रविरोधी शक्तियां पंजाब के शांतिपूर्ण माहौल को अचानक भय, आतंक, तनाव एवं कलहपूर्ण कर देना चाहती है। पंजाब एक मजबूत रक्षा-कवच है, पाकिस्तान से होने वाले षडयंत्रों एवं आतंकवादी हमलों से सुरक्षा देने में। अपनी गौरवपूर्ण छवि को कायम रखते हुए पंजाब के लोगों को अपने राष्ट्रप्रेम, एवं देशभक्ति के संस्कारों को बल देते हुए ऐसी घटनाओं के सिलसिले को रोकने में अहम भूमिका निभानी चाहिए। पंजाब ने भले ही आतंकवाद के गहरे घाव अपने सीने पर झेले हैं, लेकिन शांति एवं अमन के दीप भी उसी ने जलाये हैं, राष्ट्र की एकता एवं साख को उसी ने बढ़ाया है।
निस्संदेह, पंजाब बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, पंजाब की संवेदनशीलता को आहत करने का अर्थ है देश की संवेदनाओं को आहत करना। राज्य में अगले साल के प्रारंभ में होने वाले विधानसभा चुनाव में निहित स्वार्थी तत्वों एवं राष्ट्रविरोधी शक्तियों द्वारा राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव बाधित करने, आतंकवाद पनपाने, हिंसा एवं अराजकता फैलाने के कुत्सित प्रयास हो सकते हैं, जिसके चलते राजनीतिक दलों को जिम्मेदाराना व्यवहार करने, आम जनता को जागरूक रहने तथा पुलिस-प्रशासन द्वारा चौकस रहने की आवश्यकता है। इन तमाम हालात को देखते हुए पंजाब सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि कानून-व्यवस्था बनाये रखने को लेकर सतर्क रहे और असामाजिक तत्वों से सख्ती से निपटे। ऐसे संवेदनशील समय में सत्तापक्ष के साथ ही विपक्षी दलों की भी जवाबदेही बनती है कि वे ज्वलनशील मुद्दों को हवा देने से बचें। राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखना प्राथमिकता होनी चाहिए। भीड़ द्वारा हिंसा की घटना पर राजनीतिक दलों का प्रतिक्रिया से परहेज हिंसा की अनदेखी करने के समान ही है। इसमें दो राय नहीं कि देश के विभिन्न राज्यों में भीड़ की हिंसा को रोकने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी लगातार सामने आती रही है। कभी कभी तो ऐसी घटनाएं राजनीतिक प्रेरित होने के संकेत भी मिलते रहे हैं। हमें राजनीति को हिंसा नहीं शांति का, तोड़ने नहीं जोड़ने का, नफरत नहीं प्रेम का माध्यम बनाना होगा।  
आज देश को जोड़ने वाली सोच, जोड़ने वाली राजनीति चाहिए। पर हमारे राजनेता, जोड़ने वाली बात तो करते हैं, पर राजनीति तोड़ने वाली ही कर रहे हैं। धार्मिक संतुलन की बात करने वाले नेता और जाति के आधार पर वोट बांटने का गणित लगाने वाले चुनावी-रणनीतिकार देश को जोड़ते नहीं, तोड़ते हैं। सच तो यह है कि देश नारों से या स्वार्थी मंत्रों से नहीं जुड़ता, देश के जोड़ने के लिए भारतीयता की पहचान को स्वीकारना होगा। समझना और कहना होगा कि मैं पहले भारतीय हूं, राष्ट्रीयता मेरी पहली प्राथमिकता है, मानवता मेरा आदर्श है।  
लेकिन यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई ही है कि आज जब देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, हमारी भारतीयता और मनुष्यता, दोनों, सवालिया निशानों के घेरे में है। धर्म व्यक्ति को जोड़ता है, पर हमने धर्म को राजनीति का हथियार बनाकर तोड़ने का जरिया बना दिया है। जाति मनुष्य के कर्म की पहचान होनी चाहिए, पर हम जाति के नाम पर राजनीतिक पहचान को मज़बूत बनाने के नफा-नुकसान का गणित लगाने में लगे हैं। भाषा एक व्यक्ति को दूसरे से जोड़ने का माध्यम होती है, हम आज भाषा के नाम पर राजनीति स्वार्थ की रोटियां सेकते हुए एक-दूसरे से अलग करनेे का काम कर रहे हैं। बड़ी त्रासदी यह है कि यह सब अनज़ाने में नहीं हो रहा, हम जानबूझकर यह कर रहे हैं, अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिये कर रहे हैं। सोच-समझ कर, रणनीतियां बना कर राजनीति की शतरंज पर शह-मात का खेल खेला जा रहा है और इस प्रक्रिया में हम लगातार कमज़ोर हो रहे हैं, हमारी राष्ट्रीयता आहत हो रही है। विडम्बना यह भी है कि हम इसके परिणामों की भयावहता को समझना भी नहीं चाहते।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। समूची दुनिया की नजरे भारतीय लोकतंत्र पर टिकी रहती है, अतः यहां होने वाले चुनाव निष्पक्ष एवं शान्तिपूर्वक संचालित हो, यह सुनिश्चित करना सरकार के साथ-साथ राजनीतिक दलों एवं आम मतदाताओं का बड़ा दायित्व है। राष्ट्र में आज ईमानदारी, सौहार्द एवं निष्पक्षता हर क्षेत्र मंे चाहिए, पर चूँकि अनेक गलत बातों की जड़ चुनाव है इसलिए वहां इसकी शुरूआत होना ज्यादा जरूरी है। पंजाब के इस चुनावी कुंभ में इस प्रकार की शांति, आदेशांे की पालना तथा कानूनी कार्यवाही का भय दिखना चाहिए। इन परिस्थितियों में फिर एक बार देश में ‘भारत जोड़ो’ की बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कही है। ‘मन की बात’ के अपने मासिक-कार्यक्रम में उन्होंने देश का आह्वान किया है कि वह आज़ादी के अमृत-महोत्सव वाले वर्ष में एक-दूसरे से जुड़ने का संकल्प है। यह बात सुन कर अच्छा लगा, यह भारतीयता का अहसास जगाने का आह्वान है, मनुष्यता को सही अर्थों में समझने की प्रेरणा है, जनता के बीच मुफ्त की संस्कृति को पनपाने की बजाय राष्ट्रीयता को बल देने का उपक्रम है। जब राष्ट्र मजबूत होता है तो उसके नागरिक भी मजबूत होते हैं, फिर उन्हें किसी भी साधन या सुविधाओं को मुफ्त में लेने की जरूरत नहीं होती।
डर लगता है यह मुफ्त की संस्कृति को पनपाने वाले राजनेताओं से। प्रश्न है कि हमारी राजनीति में इस तरह की प्रवृत्तियों को पनपने क्यों दिया जा रहा है? यह स्वार्थ की राजनीति है और जनतांत्रिक व्यवस्था में इसके लिए कोई स्थान नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। पंजाब में इस तरह की घटनाओं का होना हमारे लिए एक चेतावनी होनी चाहिए। यह हिंसक प्रवृत्ति, स्वार्थ की राजनीति, यह मुफ्त की संस्कृति इसका अर्थ यह नहीं है कि यह पंजाब तक सीमित है। हमने देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में इस हिंसा एवं अराजकता को पनपते देखा है। कभी यह प्रवृत्ति गौहत्या के नाम पर पीट-पीट कर मार देने में दिखती है और कभी ‘बच्चा चोरों’ का आतंक दिखा कर किसी को मार दिया जाता है। अब पंजाब में इसकी नयी शक्ल सामने आयी है, इससे सावधान एवं सर्तक रहने की जरूरत है। जनतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की भाषा और प्रवृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं है, कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यह दुर्भाग्य की ही बात है कि हमारा नेतृत्व इस बात की गम्भीरता को समझने की आवश्यकता महसूस नहीं कर रहा। हमारी राजनीति का आधार गोली नहीं, वोट होना चाहिए। स्वार्थ नहीं, स्वावलम्बन होना चाहिए, नफरत-द्वेष नहीं, प्रेम एवं सौहार्द होना चाहिए।  इसलिए ऐसी हर कोशिश को नाकामयाब बनाना उस हर नागरिक का कर्तव्य है जो जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करता है, जो भारत को सशक्त-स्वावलम्बी भारत बनाना चाहता है। हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी प्रकार की हिंसा, अराजकता एवं नफरत को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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आजादी का अमृत महत्सव- मुख्तार अहमद अंसारी का जीवन और सेवाएं

आजादी का अमृत महत्सव- मुख्तार अहमद अंसारी का जीवन और सेवाएं

24-Dec-2021

आजादी का अमृत महत्सव- मुख्तार अहमद अंसारी का जीवन और सेवाएं

मुख्तार अहमद अंसारी का जन्म 25 दिसंबर, 1880 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के यूसुफपुर-मुहम्मदाबाद शहर में हुआ था। वह एक भारतीय राष्ट्रवादी और राजनीतिक नेता थे, और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के पूर्व अध्यक्ष थे। वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक हैं। वह 1928 से 1936 तक इसके चांसलर भी रहे।

            उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा विक्टोरिया स्कूल से प्राप्त की उसके बाद अंसारी और उनका परिवार हैदराबाद चला गया। जिसके चलते अंसारी साहब ने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की डिग्री हासिल की और स्कॉलरशिप पर इंग्लैंड चले गए। जहां से उन्होंने 1905 में एम.डी और एम.एस. की डिग्री प्राप्त किया। 1910 में, अंसारी साहब ने अपने शोध प्रबंध के लिए एडिनबरा विश्वविद्यालय से सिफलिस के इलाज के लिए मास्टर ऑफ सर्जरी (सी.एच.एम) प्राप्त किया। वह आला दर्जे के छात्र थे, और लंदन के लॉक हॉस्पिटल और चीयरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में काम करते थे। वह सर्जरी के एक भारतीय अलमबरदार (अग्रणी) थे, उनके काम के सम्मान में आज भी लंदन के चीरिंग क्रॉस अस्पताल में एक अंसारी वार्ड है।

            1921 से 1935 तक, अंसारी साहब ने प्रसिद्ध मूत्र रोग विशेषज्ञों से मुलाकात के लिए विएना, पेरिस, ल्यूसर्न (स्विट्जरलैंड) और लंदन की यात्रा की, जिसमें रॉबर्ट लिक्टेनस्टर्न, यूजीन स्टीनच और सर्ज वोरोनोव शामिल हैं। जिन्होंने जानवरों के अंडकोष का प्रदर्शन मनुष्यों पर प्रत्यारोपण करने के अग्रणी थे।  अपने जीवन के अंतिम समय में, अंसारी साहब ने 700 से अधिक ग्राफ्टिंग ऑपरेशन किए, जिनमें से 440 को सावधानीपूर्वक रिकॉर्ड किया गया। इन अनुभवों से उन्होंने अपनी पुस्तक रीजेनरेशन ऑफ मैन प्रकाशित की, जिसे उन्होंने अपने करीबी दोस्त महात्मा गांधी के साथ साझा किया।

            राष्ट्रवादी गतिविधियाँः 1898 में, जब मद्रास में एक छात्र, अंसारी साहब ने अपनी पहली अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक में भाग लिया, जिसकी अध्यक्षता आनंद मोहन बोस ने की, और 1927 में जब मद्रास में फिर से बैठक हुई तो अंसारी साहब ने बैठक की अध्यक्षता की।

            डॉ. अंसारी इंग्लैंड प्रवास के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। और वापस दिल्ली आकर वह भारतीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों में शामिल हो गए। उन्होंने 1916 के लखनऊ समझौते पर बातचीत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1918 और 1920 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

            अंसारी ने 1927 के सत्र के दौरान ए.आई.सी.सी. के महासचिव साथ साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कई बार कार्य किया। अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव समिति के सदस्य में से थे और 1927 में इसके संस्थापक हकीम अजमल खान की मृत्यु के तुरंत बाद दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के चान्सलर (कुलधिपति) के रूप में भी कार्य किया।

            अंसारी साहब एक मोहल्लाती मकान में रहते थे, जिसे दार-उस-सलाम या शांति का घर कहा जाता है। महात्मा गांधी जब दिल्ली आते थे, तो वे अक्सर अतिथि होते थे, और यह घर कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों के लिए एक नियमित आधार था। अंसारी साहब की मृत्यु 1936 में मिसौरी से दिल्ली जाने के दौरान ट्रेन में दिल का दौरा पड़ने से हुई। उन्हें दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के परिसर में दफनाया गया है।

            अंसारी साहब के परिवार के सदस्य 1947 में विभाजन के बाद भारत में ही रहे और स्वतंत्र भारत में राजनेता बन गए। वे जीवन भर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। और इसके लिए उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लेकिन बहुत जल्द उनका समय समाप्त हो गया और 10 मई, 1936 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। यदि वे अधिक समय तक रहते, तो भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में और प्रगति करता। लेकिन यह सच है कि एक दिन सभी को जाना है।

             देश के महान नेताओं में से एक जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की आजादी और विकास के लिए समर्पित कर दिया। आज बहुत कम लोग उन्हें याद करते हैं और जानते हैं। न ही सरकार आने वाली पीढि़यों को उनके बारे में जानकारी देने के लिए कोई विशेष पहल कर रही है। यहां तक कि कांग्रस पार्टी केवल खाना पूर्ती के लिए कांग्रस कार्यालय में रसमन आयोजन करते है। न उनके  बारे में किसी अखबार में विज्ञापन देते हैं, और न ही लोगों की जहन साजी के लिए कोई कदम उठाती है. आज हमें उनकी सेवाओं से सीखने की जरूरत है। शिक्षा के क्षेत्र से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक, उन्होंने जो बलिदान दिए, समाज को शिक्षा और विकास के क्षेत्र में इन्हें अपना आदर्श बनाना चाहिए। अवाम को जागरूक करने के शिक्षा के लिए तैयार करने की जरूरत है। क्योंकि जब तक हम शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति नहीं करेंगे तब तक समाज और हमारा देश विकसित नहीं हो सकता।

             इस संबंध में, हम भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से उनके गृहनगर और गाजीपुर जिले में एक मेडिकल कॉलेज, शोध संस्थान खोलने और उनके नाम पर एक केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग करते हैं, और उन्हें उनकी सेवाओं के योग्य उनको याद किया जाए ये भी मांग करते है।


बच्चों पर आभासी दुनिया के तिलिस्मी संसार का कहर

बच्चों पर आभासी दुनिया के तिलिस्मी संसार का कहर

21-Dec-2021

बच्चों पर आभासी दुनिया के तिलिस्मी संसार का कहर
 

-ः ललित गर्ग :-
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आजकल ज्यादातर बच्चों को मूड स्विंग की समस्या रहती है, वे असंतुलित मानसिकता से ग्रस्त होते जा रहे हैं। वे पल भर में खुश, तो दूसरे ही पल चिड़चिड़े, तनावग्रस्त व मायूस हो जाते हैं। दरअसल, मूड स्विंग का एक बहुत बड़ा कारण मोबाइल का अधिक इस्तेमाल है। जो बच्चे स्मार्टफोन पर हमेशा अलग-अलग तरह की एप्लिकेशन ट्राई करने में बिजी रहते हैं। कोरोना महामारी के लॉकडाउन के कारण स्कूली शिक्षा ऑनलाइन हुई तो अभिभावकों ने छोटे-छोटे बच्चों को स्मार्टफोन थमा दिये और वे इंटरनेट की दुनिया एवं इंटरनेट गेमों से जुड़ गये। ये गेम एवं इंटरनेट की बढ़ती लत बच्चों में अनेक विसंगतियों, मानसिक असंतुलन, विकारों एवं अस्वास्थ्य के पनपने का कारण बनी है, यह आदत बच्चों को एकाकीपन की ओर ले जाती है। बच्चे धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई और सामाजिक हकीकत से दूर होकर आभासी दुनिया के तिलिस्मी संसार में रमते जा रहे हैं। यह नये बनते समाज के लिये बहुत ही चिन्ता का विषय है।
इसी चिन्ता के मद्देनजर साइबर मीडिया रिसर्च ( सी.एम.आर.) ने ‘स्मार्टफोन और मानव संबंध’ विषय पर सर्वेक्षण करके एक नई रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें बच्चों के जीवन से जुड़े अनेक चौकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं। इसमें रेखांकित किया गया है कि स्मार्टफोन पर बिताया जाने वाला औसत समय कोविड के बाद के युग में खतरनाक स्तर पर बना हुआ है, क्योंकि पूर्व कोविड अवधि से स्मार्टफोन पर बिताए गए समय में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जहां 85 प्रतिशत माता-पिता महसूस करते हैं कि उनके बच्चों को सामाजिक परिवेश में अन्य बच्चों के साथ घुलना-मिलना मुश्किल है और कुल मिलाकर बाहरी अनुभव कठिन है। मोबाइल पर कुल निर्भरता बढ़ गई है। लोग अपने फोन का इस्तेमाल खाना खाते समय 70 फीसदी, लिविंग रूम में 72 फीसदी और यहां तक कि परिवार के साथ बैठकर 75 फीसदी उपयोग करते हैं। शीर्ष 8 भारतीय शहर जिनमें नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आदि शामिल हैं, यह सर्वेक्षण किया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बच्चों और परिवार के साथ बिताया जाने वाला समय सामान्य रूप से बढ़ गया है, लेकिन बिताए गए समय की गुणवत्ता बिगड़ गई है। कम से कम अस्सी प्रतिशत स्मार्टफोन उपयोगकर्ता अपने फोन पर तब भी होते हैं, जब वे अपने बच्चों के साथ समय बिता रहे होते हैं और 75 प्रतिशत अपने स्मार्टफोन से विचलित होने और बच्चों के साथ रहते हुए भी ध्यान नहीं देने की बात स्वीकार करते हैं। कम से कम 69 प्रतिशत माता-पिता का मानना है कि जब वे अपने स्मार्टफोन में डूबे रहते हैं तो वे अपने बच्चों, परिवेश पर ध्यान नहीं देते हैं और 74 प्रतिशत मानते हैं कि जब उनके बच्चे उनसे कुछ पूछते हैं तो वे चिढ़ जाते हैं।
आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी जरूरत बन गया है। एक तरफ जहां इसके काफी फायदे हैं, वहीं इससे कुछ नुकसान भी हैं। मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन को घातक बताया जाता है। रोजाना 50 मिनट तक लगातार मोबाइल का इस्तेमाल करने से दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। जिससे कैंसर एवं ब्रेन ट्यूमर जैसा खतरनाक रोग होने की संभावना रहती है। हालांकि, एक्सपर्ट्स के मुताबिक अभी तक किसी भी रिसर्च में यह सिद्ध नहीं हो पाया है कि किसी व्यक्ति को कैंसर या ब्रेन ट्यूमर या कोई दूसरी घातक बीमारी मोबाइल रेडिएशन के कारण हुई हो।
आजकल स्मार्टफोन तो बच्चों का खिलौना हो गया है, दिनोंदिन हाईटेक होती टेक्नोलॉजी और उसकी आसान उपलब्धता के कारण बच्चों के पढ़ने का तरीका भी बदल गया है। अब वे हमारी और आपकी तरह पढ़ने के लिए दिमाग ज्यादा खर्च नहीं करते, क्योंकि इंटरनेट के कारण एक क्लिक पर ही उन्हें सारी जानकारी मिल जाती है, तो उन्हें कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती। मैथ्स के कठिन से कठिन सवाल को मोबाइल, जो अब मिनी कॉम्प्यूटर बन गया है कि मदद से सॉल्व कर देते हैं। अब उन्हें रफ पेपर पर गुणा-भाग करने की जरूरत नहीं पड़ती, इसका नतीजा ये हो रहा है कि बच्चे नॉर्मल तरीके से पढ़ना भूल गए हैं। साधारण-सी कैलकुलेशन भी वो बिना कैलकुलेटर के नहीं कर पाते।
बच्चों के हाथ में मोबाइल होने के कारण उनका दिमाग हर समय उसी में लगा रहता है। कभी गेम्स खेलने, कभी सोशल साइट्स, तो कभी कुछ सर्च करने में यानी उनके दिमाग को आराम नहीं मिल पाता। दिमाग को शांति व सुकून न मिल पाने के कारण उनका व्यवहार आक्रामक हो जाता है। कभी किसी के साथ साधारण बातचीत के दौरान भी वो उग्र व चिड़चिड़े हो जाते हैं। ऐसे बच्चे किसी दूसरे के साथ जल्दी घुलमिल नहीं पाते, दूसरों का साथ उन्हें असहज कर देता है। बच्चें हमेशा अकेले रहना ही पसंद करते हैं। बच्चों के दिमाग में हमेशा मोबाइल ही घूमता रहता है, जैसे- फलां गेम में नेक्स्ट लेवल तक कैसे पहुंचा जाए? यदि सोशल साइट पर है, तो नया क्या अपडेट है? आदि। इस तरह की बातें दिमाग में घूमते रहने के कारण वो अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पातें। जाहिर है ऐसे में उन्हें पैरेंट्स व टीचर से डांट सुननी पड़ती है। बार-बार घर व स्कूल में शर्मिंदा किए जाने के कारण वो धीरे-धीरे तनावग्रस्त भी होने लगते हैं। नतीजतन पढ़ाई और बाकी चीजों में वो पिछड़ते चले जाते हैं। आभासी दुनिया में खोए रहने के कारण उनकी सोशल लाइफ बिल्कुल खत्म हो जाती है, जो भविष्य में उनके लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है।
गतदिनों दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि वह बच्चों को ऑनलाइन गेम की लत से बचाने के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने पर गंभीरता से विचार करें। दरअसल, बच्चों के बीच ऑनलाइन गेम खेलने की लत अब एक व्यापक समस्या बनती जा रही है, इसके घातक परिणाम भी सामने आ रहे हैं और लोगों के बीच इसे लेकर चिंता बढ़ रही हैं। आज इंटरनेट का दायरा इतना असीमित है कि अगर उसमें सारी सकारात्मक उपयोग की सामग्री उपलब्ध हैं तो बेहद नुकसानदेह, आपराधिक और सोचने-समझने की प्रक्रिया को बाधित करने वाली गतिविधियां भी बहुतायत में मौजूद हैं। आवश्यक सलाह या निर्देश के अभाव में बच्चे ऑनलाइन गेम या दूसरी इंटरनेट गतिविधियों के तिलिस्मी दुनिया में एक बार जब उलझ जाते हैं तो उससे निकला मुश्किल हो जाता है।
पांच वर्ष से अठारह वर्ष के बच्चों में मोबाइल या टेक्नोलॉजी एडिक्शन की लत बढ़ रही है, जिनमें स्मार्ट फोन, स्मार्ट वॉच, टैब, लैपटॉप आदि सभी शामिल हैं। यह समस्या केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया के हर देश की है। ऐसे अनेक रोगी बच्चें अस्पतालों में पहुंच रहे हैं, जिनमें इस लत के चलते बच्चे बुरी तरह तनावग्रस्त थे। कुछ दोस्त व परिवार से कट गए, कुछ तो ऐसे थे जो मोबाइल न देने पर पेरेंट्स पर हमला तक कर देते थे। बच्चे आज के समय में अपने आप को बहुत जल्दी ही अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ा महसूस करने लगे हैं। अपने ऊपर किसी भी पाबंदी को बुरा समझते हैं, चाहे वह उनके हित में ही क्यों ना हो।
इंटरनेट की यह आभासी दुनिया ना जाने और कितने सूरज व छोटे बच्चों को अपनी जाल में फंसाएगी और उनका जीवन तबाह करेगी। बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर निगरानी व उन्हें उसके उपयोग की सही दिशा दिखाना बेहद ज़रूरी है। यदि मोबाइल की स्क्रिन और अंगुलियों के बीच सिमटते बच्चों के बचपन को बचाना है, तो एक बार फिर से उन्हें मिट्टी से जुड़े खेल, दिन भर धमा-चौकड़ी मचाने वाले और शरारतों वाली बचपन की ओर ले जाना होगा। ऐसा करने से उन्हें भी खुशी मिलेगी और वे तथाकथित इंटरनेट से जुड़े खतरों से दूर होते चले जाएंगे। इंटरनेट के बढ़ते प्रयोग की वजह से साइबर अपराधों की संख्या भी बढ़ रही है। हमारी सरकार एवं सुरक्षा एजेंसियां इन अपराधों से निपटने में विफल साबित हो रही हैं।
प्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई पी एक्सटेंसन, पटपड़गंज
 दिल्ली-110092
फोन:-22727486, मोबाईल:- 9811051133


रक्तदान हमारा कर्तव्य एवं मानवता की बड़ी सेवा: गोविन्दराम चौधरी

रक्तदान हमारा कर्तव्य एवं मानवता की बड़ी सेवा: गोविन्दराम चौधरी

13-Dec-2021

लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा का विशाल रक्तदान शिविर

नई दिल्ली, 13 नवम्बर 2021

लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा द्वारा अनमोल इंडस्ट्रीज लिमिटेड, ग्रेटर नोएडा में 13वां विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें 96 यूनिट रक्तदान किया गया। जिसमें छात्रों, लायन सदस्यों, अनमोल के कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उत्साह से रक्तदान किया। विभिन्न चिकित्सीय कारणों से 26 रक्तदान के इच्छुक लोगों का रक्त नहीं लिया जा सका।  शिविर में रोटरी ब्लड बैंक की टीम ने सेवाएं दी।
अनमोल इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डाइरेक्टर गोविन्दराम चौधरी ने कहा कि रक्त के साथ शरीर व जीवन के बीच का रिश्ता बहुत करीबी है, इस दृष्टि से यह स्पष्ट है कि रक्तदान एक महादान है। ऐसे कार्य में सक्रिय भाग लेना हमारा कर्तव्य है, मानवता की बड़ी सेवा है। रक्तदान कर हम दूसरों की जान बचा सकते है। कोरोना महामारी के कारण अपेक्षित रक्त की पूर्ति नहीं हो पा रही है, रक्तदान दाताओं का अनुपात कम हुआ है। इसलिये ऐसे शिविरों की ज्यादा उपयोगिता है। इसके लिये लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा एवं उनकी टीम अच्छा काम कर रही है।
क्लब के अध्यक्ष लॉयन ललित गर्ग ने कहा कि पीड़ित एवं बीमार रोगियों के रक्त की आपूर्ति के लिए सरकारी प्रयत्नों के साथ-साथ गैर सरकारी प्रयत्नों की जरूरत है, विशेषतः जनचेतना को जगाना होगा। लायंस क्लब इसी सोच को क्रियान्विति देने के लिए निरन्तर तत्पर है। मौके पर सीए लायन सुनीलकुमार अग्रवाल ने कहा कि हम लायंस क्लब द्वारा सेवा भाव से नेक कार्य करते रहते हैं। रक्तदान पूरे भारत की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की जरूरत है। इस इसके लिए व्यापक प्रयत्न करने होंगे। रोटरी ब्लड बैंक के डॉ. राज ने कहा कि ब्लड बैंक द्वारा अभी तक हजारों व्यक्तियों को समय पर खून उपलब्ध करवाकर जरूरतमंदों की जान बचाई है। रक्तदान करने से किसी प्रकार की बीमारी नहीं होती है। उन्होंने कहा कि रक्तदान से दिल की बीमारियों और स्ट्रोक के खतरे को कम करता है। माना जाता है कि खून में आयरन की ज्यादा मात्रा दिल के खतरे को बढ़ा सकती है। नियमित रूप से रक्तदान करने से आयरन की अतिरिक्त मात्रा नियंत्रित हो जाती है। जो दिल की सेहत के लिए अच्छा है। उन्होंने कहा रक्तदान के वक्त शरीर से मात्र 350 एमएल ब्लड ही निकाली जाती है। इतने ब्लड निकाले जाने से कमजोरी बिल्कुल नहीं होती। स्वस्थ मनुष्य के शरीर से ही रोगी के शरीर में ब्लड डाला जाता है। इस प्रक्रिया में काफी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं।
विदित  हो लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के इस विशाल रक्तदान शिविर में लायंस क्लब शक्ति, मारवाड़ी युवा मंच साऊथ दिल्ली, मारवाड़ी युवामंच प्रगतिशील शाखा के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने पूरे दिन अपनी सेवाएं प्रदत्त की। रक्तदाताओं को लैमन सेट, टी-शर्ट, बिस्कुट एवं गिफ्ट लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा ने प्रदत्त किये, जिसके प्रायोजक लॉयन सुनीलकुमार अग्रवाल एवं अन्य थे। इस अवसर पर क्लब की ओर से अनमोल इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डाइरेक्टर गोविन्दराम चौधरी का गुलदस्ता, शॉल एवं माला पहनाकर क्लब के अध्यक्ष ललित गर्ग, लॉयन राजेश गुप्ता, लॉयन सुनीलकुमार अग्रवाल, लॉयन विक्रम राठी ने अभिनन्दन किया एवं उनके सहयोग के लिये आभार व्यक्त किया। अनमोल इंडस्ट्रीज लिमिटेड के जनरल मैनेजर नन्दलाल स्वामी, श्री बी.एस. शर्मा ने इंडस्ट्रीज के कर्मियों एवं सहयोगियों को भी उपहार प्रदत्त कर आभार जताया।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024, मो. 9811051133
फोटो परिचय:
लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के रक्तदान शिविर में रक्तदान करते हुए रक्तदाता एवं क्लब के अध्यक्ष ललित गर्ग, गोविन्दराम चौधरी, सुनीलकुमार अग्रवाल, राजेश गुप्ता, विक्रम राठी आदि 


पालतू कुत्ते ने अपनी ही मालकिन की 9 साल की बेटी का रेप किया !

पालतू कुत्ते ने अपनी ही मालकिन की 9 साल की बेटी का रेप किया !

04-Dec-2021

पालतू कुत्ते ने अपनी ही मालकिन की 9 साल की बेटी का रेप किया !

मैक्सिको सिटी। उत्तरी अमेरिका के देश मैक्सिको से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि यहां एक पालतू कुत्ते ने अपनी ही मालकिन की 9 साल की बेटी का रेप कर दिया। पुलिस ने आरोपी कुत्ते को गिरफ्तार कर लिया है। मामले की जांच जारी है। ये खौफनाक वारदात मैक्सिको सिटी के Tlahuac इलाके में हुआ। पीड़ित बच्ची की मां ने आरोप लगाया है कि पालतू कुत्ते ने ही उनकी बेटी का यौन शोषण किया है। बता दें कि महिला खुद अपनी पीड़ित बच्ची को लेकर पुलिस स्टेशन पहुंची और शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस कई एंगल से इस मामले की जांच कर रही है। पुलिस को शक है कि महिला अपने पति को बचाने के लिए बच्ची के रेप का आरोप पालतू कुत्ते पर लगा रही है।
 
पुलिस अधिकारी ने बताया कि पालूत कुत्ते को अरेस्ट कर लिया गया है और पीड़ित बच्ची को इलाज के लिए हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया है। अभी उसकी मेडिकल रिपोर्ट आनी बाकी है। मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद केस को सुलझाने में मदद मिलेगी। पीड़ित बच्ची की मां ने बताया कि वारदात के वक्त उनकी बच्ची के साथ घर में केवल उनका पालतू कुत्ता ही था। पालतू कुत्ते ने ही उनकी बेटी का रेप किया है। हालांकि पुलिस का कहना है कि महिला के बयान पर भरोसा करना मुश्किल है। पुलिस ने कुत्ते के अलावा पीड़ित बच्ची के सौतेले पिता और महिला के पति को भी गिरफ्तार कर लिया है। उससे पूछताछ की जा रही है।
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महिला ने पति को तलाक देने के बाद कुत्ते से शादी कर ली।

महिला ने पति को तलाक देने के बाद कुत्ते से शादी कर ली।

25-Nov-2021

लंदन। ब्रिटेन की एक महिला ने कुछ ऐसा किया, वह वाकई में हैरान कर देने वाला है। महिला ने तलाक देने के बाद कुत्ते से शादी कर ली। यही नहीं, महिला का दावा है कि कुत्ते के साथ वह ज्यादा खुश है। तो आइए जानते हैं इस अजीबोगरीब मामले के बारे में। अमांडा रोजर्स नाम की यह महिला लंदन की रहने वाली है। 47 साल की उम्र में अमांडा ने पति को तलाक देने के बाद अपने पालतू कुत्ते से शादी कर ली। अमांडा की मानें, तो वह अपने पालतू कुत्ते को हमसफर चुनकर काफी खुश हैं। वेबसाइट द सन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अमांडा ने 2014 में यह शादी धूमधाम से की थी। तब उन्होंने 200 लोगों की मौजूदगी में अपने पालतू कुत्ते शीबा को अपना हमसफर चुन लिया था। इस महिला का कहना है कि तब से वे एक खुशहाल जिंदगी रही हैं।
 
पति को तलाक देने के बाद से अमांडा अकेले जीवन जी रही थीं। एक दिन उन्होंने अपने पालतू कुत्ते के साथ पूरे रीति-रिवाजों के साथ शादी कर ली। अमांडा का कहना है कि शीबा आज उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है। शीबा न केवल उनका खयाल रखती है, बल्कि उनकी उदासी को दूर करने में भी उनकी मदद करती है। एक टीवी शो के दौरान अमांडा ने बताया कि शीबा जब 2 महीने की थी, तब से ही उन्हें उससे काफी प्यार हो गया था। इस महिला की मानें, तो उसे अपने पालतू कुत्ते की आंखों में सच्चा प्यार नजर आता है। अमांडा का कहना है कि उन्होंने शीबा को अपना हमसफर चुनने से पहले उसे घुटनों पर बैठकर प्रपोज किया था। जिसका शीबा ने पूंछ हिलाकर जवाब दिया था। अमांडा और शीबा के बीच का यह प्यार भले ही लोगों को पागलपन लगे, लेकिन अमांडा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका कहना है कि वह शीबा के साथ बेहद खुशहाल जीवन जी रही हैं।