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कोरोनारूपी रावण को जलाना होगा

कोरोनारूपी रावण को जलाना होगा

24-Oct-2020

दशहरा- 25 अक्टूबर 2020 पर विशेष
-ः ललित गर्ग:-

दशहरा बुराइयों से संघर्ष का प्रतीक पर्व है, कोरोना महामारी से पैदा हुए संकट से संघर्ष एवं उस पर विजय पाने का भी यह अवसर है। आज कोरोना जैसे अंधेरों से संघर्ष करने के लिये इस प्रेरक एवं प्रेरणादायी पर्व की संस्कृति को जीवंत बनाने की जरूरत है। प्रश्न है कौन इस संस्कृति को सुरक्षा दे? कौन आदर्शों के अभ्युदय की अगवानी करे? कौन जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठापना में अपना पहला नाम लिखवाये? बहुत कठिन है यह बुराइयों से संघर्ष करने का सफर। बहुत कठिन है तेजस्विता की यह साधना। आखिर कैसे संघर्ष करें घर में छिपी बुराइयों से, जब घर आंगन में रावण-ही-रावण पैदा हो रहे हों, चाहे पर्यावरण को विध्वंस करने वाले रावण हो या आम इंसान को जीवन को संकटग्रस्त करने वाले कोरोनारूपी रावण हो, चाहे भ्रष्टाचार के रूप में हो, चाहे राजनीतिक अपराधीकरण के रूप में, चाहे साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वालों के रूप में हो, चाहे चीन-पाकिस्तान जैसे पडौसी राष्ट्रों के द्वारा लगातार सीमाओें पर युद्ध जैसी स्थितियां पैदा करने वाले रावण हो, चाहे शिक्षा, चिकित्सा एवं न्याय को व्यापार बनाने वालों के रूप में? हमें जीने के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार कोरोना जैसी विकट स्थितिरूपी जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है। इन तरह-तरह के रावणों को पराजित करने, उनका जलाना जरूरी हो गया है, तभी जीवन में संतुलन एवं शांति स्थापित हो सकेगी।
विजयादशमी-दशहरा आश्विन शुक्ल दशमी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लंका के असुर राजा रावण पर भगवान राम की जीत को दर्शाता है दशहरा। भगवान राम सच्चाई के प्रतीक है और रावण बुराई की शक्ति का। इसलिए दशहरा बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पर्व है। इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले खुली जगह में जलाए जाते हैं। दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। यह देश की सांस्कृतिक एकता और अखण्डता को जोड़ने का पर्व भी है। देश के अलग-अलग भागों में वहां की संस्कृति के अनुरूप यह पर्व मनाया जाता है, इस पर्व के माध्यम से सभी का स्वर एवं उद्देश्य यही होता है कि बुराई का नाश किया जाये और अच्छाई को प्रोत्साहन दिया जाये। नवरात्रि के बाद दशहरा का अंतिम यानी दसवां दिन है  विजयदशमी, जिसका मतलब है कि आपने तमस, रजस या सत्व तीनों ही गुणों को जीत लिया है, उन पर विजय पा ली है। आप इन तीनों गुणों से होकर गुजरे, तीनों को देखा, तीनों में भागीदारी की, लेकिन आप इन तीनों में से किसी से भी, किसी भी तरह जुड़े या बंधे नहीं, आपने इन पर विजय पा ली। यही विजयदशमी है, आपकी विजय का दिन और इस वर्ष यह पर्व कोरोना जैसी महामारी पर विजय का भी पर्व बनकर प्रस्तुत होगी, और इस दिन जलने वाले रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद के साथ ही कोरोना के प्रकोप एवं संकट का भी दहन हो जायेगा।
दशहरा शक्ति की साधना, कर्म एवं पूजा का भी पर्व होता है, इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। आज दशहरा का पर्व मनाते हुए सबसे बड़ी जरूरत भीतर के रावण को जलाने की है। क्योंकि ईमानदार प्रयत्नों का सफर कैसे बढ़े आगे जब शुरूआत में ही लगने लगे कि जो काम मैं अब तक नहीं कर सका, भला दूसरों को भी हम कैसे करने दें? कितना बौना चिन्तन है आदमी के मन का कि मैं तो बुरा हूं ही पर दूसरा भी कोई अच्छा न बने। इस बौने चिन्तन के रावण को जलाना जरूरी है। भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता व शौर्य की समर्थक रही है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। आज पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भयावह रूप ले रही है, कोरोना महामारी कहर बनकर बरपी है।
दशहरे पर स्वयं के पापों को धोने के साथ-साथ जरूरत जन-जन के मनों को भी मांजने की है। जरूरत उन अंधेरी गलियों को बुहारने की है ताकि बाद में आने वाली पीढ़ी कभी अपने लक्ष्य से न भटक जाये। जरूरत है सत्य की तलाश शुरू करने की जहां न तर्क हो, न सन्देह हो, न जल्दबाजी हो, न ऊहापोह हो, न स्वार्थों का सौदा हो और न दिमागी बैशाखियों का सहारा हो। वहां हम स्वयं सत्य खोजंे। मनुष्य मनुष्य को जोड़े। दशहरा एक चुनौती बनना चाहिए उन लोगों के लिये जो अकर्मण्य, आलसी, निठल्ले, हताश, सत्वहीन बनकर सिर्फ सफलता की ऊंचाइयों के सपने देखते हैं पर अपनी दुर्बलताओं को मिटाकर नयी जीवनशैली की शुरूआत का संकल्प नहीं स्वीकारते।  दशहरा का पर्व जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं उत्सवप्रियता का पर्व है। जीवन के हर पहलू के प्रति एक उत्सव और उमंग का नजरिया रखना और उसे उत्सव की तरह मनाना सबसे महत्वपूर्ण है। जीवन का रहस्य यही है कि हर चीज को बिना गंभीरता के देखा जाए, लेकिन उसमें पूरी तरह से भाग लिया जाए- बिल्कुल एक खेल की तरह। अज्ञान मिटे, इस बात का प्रयत्न बहुत जरूरी है। आदमी बुराई को बुराई समझते हुए भी करता है, बार-बार करता है। यह एक समस्या है। छोटी-मोटी बुराई तो अनजाने में हो जाती है, किन्तु बड़ी बुराई कभी अनजाने में नहीं होती। बड़ी बुराई आदमी जानबूझ कर करता है। इस दुनिया में हर बड़ा पाप जानबूझ कर किया जा रहा है। कोरोना जैसा महापाप भी जानबूझ किया गया है। आप रास्ते पर चल रहे हैं। पैरों के नीचे दबकर चींटी मर जाए तो यह अनजाने में हुआ पाप है। किन्तु किसी का गला तो अनजाने में नहीं काटा जा सकता, समूची दुनिया का जीवन तो अनजाने में संकट में नहीं डाला सकता। उसे तो बहुत सोच-समझकर योजनाबद्ध ढंग से किया गया है। हम जानते हुए भी बुराई क्यों कर रहे हैं-इस बात का उत्तर खोजा जाना चाहिए और शायद इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ही दशहरा जैसे पर्व मनाये जाते हैं।
प्रेषकः

 

           (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133 मउंपसरू संसपजहंतह11/हउंपसण्बवउ


एजाज ढेबर  का बढ़ता कद,, आगामी  दक्षिण विधान से  तैयारी  का  आगाज़ तो नही है ?

एजाज ढेबर का बढ़ता कद,, आगामी दक्षिण विधान से तैयारी का आगाज़ तो नही है ?

19-Oct-2020

एजाज ढेबर  का बढ़ता कद,, आगामी  दक्षिण विधान से  तैयारी  का  आगाज़ तो नही है ? 
हाल ही में एजाज़ ढेबर महापौर संघ के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए  ,जिससे आभास होता है की इतने कम उम्र और इतने  कम समय में एजाज़ ढेबर ने जिस तरह से पार्षद का चुनाव लड़कर कड़े संघर्ष करने के  बाद  राजधानी रायपुर का महापौर बने  वह भी विपरीत परिस्थितियों में यह  राजनैतिक  मायने में गौर करने वाली बात है  ! जहाँ बड़े - बड़े  राजनीति  के  दिग्गज  खिलाडी  महापौर पद के लिए अपना  दांव् लगा रहे  थे  विशेष रूप से रायपु  दक्षिण  के विधायक बृजमोहंन  अग्रवाल की प्रतिस्ठा रायपुर  नगरनिगम  महापौर  के लिए  लगी हुई थी, और अप्रत्याक्ष् रूप से भी  अन्तिम  क्षण  में  भी  कुछ कांग्रेस के नेता   भी  एजाज़ ढेबर को महापौर बनते नही देखना चाहते थे ऐसी विपरीत परिस्थितियों में  उनका महापौर  बनकर चुना जाना यह संकेत देता  है  की अगला दमदार और मजबूत रायपुर दक्षिण  विधान सभा का कांग्रेस प्रत्यासी  एजाज़ ढेबर के रूप में हो सकता है  !

पिछले तीन दशकों से रायपुर शहर विधान सभा से  स्वरूपचंद जैन, के चुनाव लड़ने से इंकार करने के बाद   राजकमल सिंघानिया,  पारस चोपड़ा,  गजराज पगारिया,  योगेश तिवारी, श्रीमती किरणमयी नायक कन्हैया  अग्रवाल  तक क्रमशः चुनाव हारते गए और जीत का अंतर बढ़ता गया है और कांग्रेस   का मनोबल लगातार गिरता ही जा रहा है ,क्योंकि कुछ फूल छाप कांग्रेसी जिनकी विचार धारा भाजपाई रही हैं जिन्होंने  अपना भला किया और  उन लोगों ने सदेव् कांग्रेस को नुक्सान पहुँचाने का काम किया है जिसके खुद शिकार वर्तमान मुख्यमंत्री भुपेश बघेल भी हुए थे ?  ,जब उन्होंने रायपुर लोकसभा का चुनाव लड़ा था  ,और तत्कालीन महापौर श्रीमति किरण मई नायक भी इन्के  साजिश का शिकार  हुई थी  ,लेकिन  अंतिम  क्षणो में   उन्होंने बृज मोहन अग्रवाल को नाको चने चबावा दिया था ? किसी समय का रायपुर शहर विधान सभा और वर्तमान में  दक्षिण विधानसभा का भाजपाई चक्र व्यूह   “क्या एजाज़ ढेबर “ तोड़ पायेंगे 
 क्योंकि रायपुर  दक्षिण  विधान सभा  क्षेत्र  मे  कांग्रेस के परंपरागत वोटर  है  जो कि मौदहापारा, नायपारा, छोटा पारा बैजनाथपारा, बैरॉनबाजार, नेहरूनगर, टीकरा पारा  , संजयनगर, संतोषीनगर, कांग्रेस के प्रभाव वाले  क्षेत्र  माने जाते है फिर ये वोट कांग्रेस के पक्ष् में क्यों नही जाते ये महत्व पूर्ण  और सोचने वाली बात है ,क्योकि कुछ फूल छाप कोंग्रेसी इन वोटो को भा  ज  पा  के पक्ष में मैनेज करते है ,  कमाल तो ये देखा गया है की बूथ में बैठने वाले नदारद हो जाते है  जहाँ
कांग्रेस के निर्णय लेने वाले निति निर्धारक  लोग ही कांग्रेस की जड़ो मे मठा डालने और गड्ढा करने का काम करते हो  वहाँ जित कैसे हो सकती है इस अनुभव को समय रहते श्री भूपेश बघेल ने बेहतर समझ लिया था   प्रदेश कांग्रेस अध्याक्ष् का  बनने के बाद  उन फूल छाप लोगो को  नेपथ्य भेज दिया, क्योंकि उनका  रायपुर  लोकसभा  का कड़वा अनुभव  ही विधान सभा चुनाव में जीत दिलाने में कारगर साबित हुआ  है !
हमने इस मुद्दे को लेकर पिछले चुनाव में कांग्रेस के  जुड़े  चुनाव विश्लेषकों  से भी उनका अनुभव जानना चाहा उनका इस विषय पर यह कहना है की , रायपुर दक्षिण से प्रत्याशी बदलना या हारने के बाद प्रत्याशी द्वारा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और जनता को भगवान भरोसे छोड़ना कांग्रेस की हार का बड़ा कारण बनते रहा है । विधान सभा हारने के बाद एक दिन भी कार्यकर्ताओं  साथ नहीं छोड़ा,  जाना चाहिए बल्कि निरंतर कार्यकर्ताओ से जिवंत सम्पर्क नहीं रहने के कारण और  अंतिम समय में प्रत्यासी का चयन ही हार का बड़ा कारण रायपुर दक्षिण विधानसभा में चुनाव हारने का  रहा है  !
रायपुर दक्षिण की पराजय के लिए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार बताने वाले तथाकथित नेता ही हार के लिए जिम्मेदार हैं । कार्यकर्ता का कभी सौदा नहीं होता, उनके ही दम पर घर-घर तक प्रत्याशी पहुंचता है और वोटर निकलता है किन्तु बहुत से ऐसे लोग जिनकी जमीनी हकीकत शून्य होती है, स्वयंभू नेता बनकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाते और कार्यकर्ताओं को बदनाम करते हैं ।
अभी विधान सभा चुनाव को समय है तब तक कई परिस्थितियाँ बदलेंगी बिगड़ेंगी क्योंकि राजनीति में परिवर्तन होते रहते हैं हमने वर्तमान  परिस्थितियाँ का आंकलन करते हुए अपने विचार रखे हैं,   

मो  शोएब जकारिया 

डयरेक्टर 

*खुलासपोस्ट न्यूज़ नेटवर्क 
*गरजा छत्तीसगढ़ न्यूज़ डॉट कॉम 
*द  न्यूज़ इंडिया समाचार सेवा  हिन्दी / अंग्रेजी
संपर्क :- 9669667383 ​

 

 


गरीबी उन्मूलन दिवस- योजनाओं के केन्द्र में कौन? गरीब या सत्ता?

गरीबी उन्मूलन दिवस- योजनाओं के केन्द्र में कौन? गरीब या सत्ता?

16-Oct-2020

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-ललित गर्ग -

कोरोना महामारी के कारण अस्तव्यस्त हुई अर्थ-व्यवस्था एवं जीवन निर्वाह के संकट से गरीबी बढ़ी है। गरीबी पहले भी अभिशाप थी लेकिन अब यह संकट और गहराया है। गरीबी केवल भारत की ही नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है। दुनियाभर में फैली गरीबी के निराकरण के लिए ही संयुक्त राष्ट्र में साल 1992 में हर साल 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई। गरीबी एक गंभीर बीमारी है, किसी भी देश के लिए गरीबी एक बदनुमा दाग है। जब किसी राष्ट्र के लोगों को रहने को मकान, जीवन निर्वाह के लिये जरूरी भोजन, कपड़े, दवाइयां आदि जैसी चीजों की कमी महसूस होती है, तो वह राष्ट्र गरीब राष्ट्र की श्रेणी में आता है। इस गरीबी से मुुक्ति के लिये सरकारें व्यापक प्रयत्न करती हैं। हम जिन रास्तों पर चल कर एवं जिन योजनाओं को लागू करते हम देश में समतामूलक संतुलित समाज निर्माण की आशा करते हैं वे योजनाएं विषम और विषभरी होने के कारण सभी कुछ अभिनय लगता है, छलावा लगता है, भ्रम एवं फरेब लगता है। सब नकली, धोखा, गोलमाल, विषमताभरा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लोक राज्य, स्वराज्य, सुराज्य, रामराज्य का सुनहरा स्वप्न ऐसी नींव पर कैसे साकार होगा? क्योंकि यहां तो सारे राजनीति दल एवं लोकतंत्र को हांकने वाले सब अपना-अपना साम्राज्य खड़ा करने में लगे हैं। विश्व की सारी संपदा, सारे संसाधन गरीबी को मिटाने में लगते तो आज स्थिति बहुत भिन्न होती, किन्तु बीच में सत्ता की लालसा एवं विश्व पर साम्राज्य स्थापित करने की महत्वाकांक्षाओं ने व्यवधान खड़े कर दिये। इसी कारण जो संपदा है, वह मानव को सुखी, संतुलित या सामान्य बनाने की दिशा में नहीं लगी, संहारक अस्त्रों के निर्माण, आतंकवाद एवं कोरोना जैसी महामारी को पैदा करने एवं फैलाने में लगी। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र कोे भयभीत रखने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है, न कि गरीब इंसान की गरीबी दूर करने में।

आज का भौतिक दिमाग कहता है कि घर के बाहर और घर के अन्दर जो है, बस वही जीवन है। लेकिन राजनीतिक दिमाग मानता है कि जहां भी गरीब है, वही राजनीति के लिये जीवन है, क्योंकि राजनीति को उसी से जीवन ऊर्जा मिलती है। यही कारण है कि इस देश में सत्तर साल के बाद भी गरीबी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है, जितनी गरीबी बढ़ती है उतनी ही राजनीतिक जमीन मजबूती होती है। क्योंकि सत्ता पर काबिज होने का मार्ग गरीबी के रास्ते से ही आता है। बहुत बड़ी योजनाएं इसी गरीबी को खत्म करने के लिये बनती रही हैं और आज भी बन रही हैं। लेकिन गरीब खत्म होते गये और गरीबी आज भी कायम है।  

सरकारी योजनाओं की विसंगतियां ही है कि गांवों में जीवन ठहर गया है। बीमार, अशिक्षित, विपन्न मनुष्य मानो अपने को ढो रहा है। शहर सीमेन्ट और सरियों का जंगल हो गया है। मशीन बने सब भाग रहे हैं। मालूम नहीं खुद आगे जाने के लिए या दूसरों को पीछे छोड़ने के लिए। कह तो सभी यही रहे हैं--बाकी सब झूठ है, सच केवल रोटी है। रोटी केवल शब्द नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी परिभाषा समेटे हुए है अपने भीतर। जिसे आज का मनुष्य अपनी सुविधानुसार परिभाषित कर लेता है। रोटी कह रही है-मैं महंगी हूँ तू सस्ता है। यह मनुष्य का घोर अपमान है। रोटी कीमती, जीवन सस्ता। मनुष्य सस्ता, मनुष्यता सस्ती। और इस तरह गरीब को अपमानित किया जा रहा है, यह सबसे बड़ा खतरा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस खतरे को महसूस किया, जबकि लोकतंत्र को हांकने वालों को इसे पहले महसूस करना चाहिए।

एक दिन एक बहस चली कि गरीबी की परिभाषा क्या है? धनहीन, चरित्रहीन या विवेकहीन या जो व्यवहार नहीं जानता हो अथवा जिसकी समाज में कोई इज्जत न हो। ये सब मापदण्ड अभी मनुष्य के दिमाग में आये नहीं हैं। वह तो बस गरीब उसको मानता है जिसके पास धन उसकी जरूरत से कम हो या जो दो वक्त की रोटी की जुगाड़ नहीं कर सकता। जो अपनी बूढ़ी मां का इलाज नहीं करवा सकता। जो अपने बच्चों की फीस नहीं भरवा सकता। गरीबी व्यक्ति को बेहतर जीवन जीने में अक्षम बनाता है। गरीबी के कारण व्यक्ति को जीवन में शक्तिहीनता और आजादी की कमी महसूस होती है। गरीबी उस स्थिति की तरह है, जो व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने में अक्षम बनानी है।

गरीबी के अनेकों चेहरे हैं जो व्यक्ति, स्थान और समय के साथ बदलते रहते हैं। गरीबी ऐसी त्रासदी एवं दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति है जिसका कोई भी अनुभव नहीं करना चाहता। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि गरीबी कोई दैवीय अभिशाप नहीं है बल्कि यह मानवजाति द्वारा रचित सबसे बड़ी समस्या है। विश्व में सुरसा की तरह मुँह फैलाती हुई गरीबी शासनतंत्र की विफलता का भी द्योतक हैं। क्योंकि गरीबी से संबन्ध सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष की मासिक या सालाना आय से नहीं बल्कि स्वास्थ्य, राजनीतिक भागीदारी, देश की संस्कृति और सामाजिक संगठनों की उन्नति से भी है। भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, कमजोर कृषि, भ्रष्टाचार, रूढ़िवादी सोच, जातिवाद, अमीर-गरीब में ऊंच-नीच, नौकरी की कमी, अशिक्षा, बीमारी आदि हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसके बावजूद भारत में मौजूद सबसे ज्यादा संख्या मे किसान ही इस गरीबी के दंश को झेलने के लिए मजबूर हैं।

सरकार की गलत नीतियों, खराब कृषि और बेरोजगारी की वजह से लोगों को भोजन की कमी से जूझना पड़ता है। यही कारण है की महंगाई ने भी पंख फैला रखे हैं। वहीं भारत में बढ़ती जनसंख्या भी गरीबी का एक प्रमुख कारण है। अधिक जनसंख्या मतलब अधिक भोजन, पैसा और घर की जरूरत। मूल सुविधाओं की कमी के कारण गरीबी ने तेजी से अपने पांव पसारे हैं। अत्यधिक अमीर और भयंकर गरीब ने अमीर और गरीब के बीच की खाई खोद रखी है। सरकार भी ऐसे ही लोगों को गरीब मानती है जिनकी वार्षिक आय सरकार के निर्धारित आंकड़ों से कम हो। लेकिन गरीबी केवल आर्थिक ही नहीं होती। दार्शनिक गरीब उसको मानता है जो भयभीत है, जो थक गया है, जो अपनी बात नहीं कह सकता। साधारण आदमी, झोंपड़ी में रहने वाले को गरीब और महल में रहने वाले को अमीर मानता है। खैर! यह सत्य है कि गरीब की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। तब गरीबी की रेखा क्या? क्यों है? गरीबी को खत्म करने में जो चीज सबसे अहम है वो है असमानता को दूर करना। अगर ऐसा नहीं होता है तो गरीबों के लिए विकास का कोई मतलब नहीं होगा। एक आजाद मुल्क में, एक शोषणविहीन समाज में, एक समतावादी दृष्टिकोण में और एक कल्याणकारी समाजवादी व्यवस्था में यह गरीबी रेखा नहीं होनी चाहिए। यह रेखा उन कर्णधारों के लिए शर्म की रेखा है, जिसको देखकर उन्हें शर्म आनी चाहिए। यहां प्रश्न है कि जो रोटी नहीं दे सके वह सरकार कैसी? जो अभय नहीं बना सके, वह व्यवस्था कैसी? जो इज्जत व स्नेह नहीं दे सके, वह समाज कैसा? जो शिष्य को अच्छे-बुरे का भेद न बता सके, वह गुरु कैसा?

अगर तटस्थ दृष्टि से बिना रंगीन चश्मा लगाए देखें तो हम सब गरीब हैं। जैसे भय केवल मृत्यु में ही नहीं, जीवन में भी है। ठीक उसी प्रकार भय केवल गरीबी में ही नहीं, अमीरी में भी है। यह भय है आतंक मचाने वालों से, कोरोना फैलाने वालों से, युद्ध की मानसिकता रखने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से। गांधी और विनोबा ने सबके उदय एवं गरीबी उन्मूलन के लिए ‘सर्वोदय’ की बात की गई। लेकिन राजनीतिज्ञों ने उसे निज्योदय बना दिया। जे. पी. ने जाति धर्म से राजनीति को बाहर निकालने के लिए ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया। जो उनको दी गई श्रद्धांजलि के साथ ही समाप्त हो गया। ‘गरीबी हटाओ’ में गरीब हट गए। स्थिति ने बल्कि नया मोड़ लिया है कि जो गरीबी के नारे को जितना भुना सकते हैं, वे सत्ता प्राप्त कर सकते हैं। कैसे समतामूलक एवं संतुलित समाज का सुनहरा स्वप्न साकार होगा? कैसे मोदीजी का नया भारत निर्मित होगा? 


अहिंसा के सिवाय कोई सौन्दर्य नहीं

अहिंसा के सिवाय कोई सौन्दर्य नहीं

08-Oct-2020

- आचार्य डाॅ.लोकेशमुनि-

आज समूची दुनिया संकटग्रस्त है, अब तक के मानव जीवन में ऐसे विकराल एवं विनाशक संकट नहीं आये। एक तरफ कोरोना महामारी का संकट है तो दूसरी ओर विश्व-युद्ध का माहौल बना है। हमें उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं, इच्छाओं को अलविदा कहना होगा जिनका हाथ पकड़कर हम उस ढलान पर उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक का नियंत्रण खोते चले जा रहे है, जिसका परिणाम है, मानव का विनाश, जीवनमूल्यों का हृास एवं असंवेदना का साम्राज्य। आज की मुख्य समस्या यह है कि आदमी किसी दूसरे को आदमी की दृष्टि से नहीं देख रहा है। वह उसे देख रहा है धन के पैमाने से, पद और प्रतिष्ठा के पैमाने से, शक्ति एवं साधनों से।
हिंसा का उदय कहां से होता है? हिंसा कहीं आकाश से तो टपकती नहीं है, न जमीन से पैदा होती है। हिंसा पैदा होती है आदमी के मनोभावों से। हिंसा का मनोभाव न रहे तो हथियार बनाने वाले उद्योग अपने आप ठप्प हो जाएंगे। विकृत मानसिकता, हिंसा एवं महत्वाकांक्षाओं की ही निष्पत्ति है कोरोना महामारी। इंसान का भीतरी परिवेश विकृत हो गया है, उसी की निष्पत्तियां हैं युद्ध, महामारी, प्रदूषण, प्रकृति का दोहन, हिंसा एवं भ्रष्टाचार। जबकि भीतर का सौंदर्य है अहिंसा, करुणा, मैत्री, प्रेम, सद्भाव और आपसी सौहार्द। सबको समान रूप से देखने का मनोभाव। जब यह भीतर का सौंदर्य नहीं होता तो आदमी बहुत समृद्ध होकर भी बहुत दरिद्र-सा लगता है। सुंदर शरीर में कुष्ठरोग की तरह शरीर के सौंदर्य को खराब कर रही यह महामारी इस बात का खुला ऐलान कर रही हैं कि सृष्टि का चेहरा वैसा नहीं है, जैसा कोरोना महामारी एवं युद्ध के मंडराते बादलों के दर्पण में दिखता है। चेहरा अभी बहुत विदू्रप है। मानवता के जिस्म पर गहरे घाव हैं, जिन्हें पलस्तर और पैबंद लगाकर भरा नहीं जा सकता। दुनिया के निवासियों में गहरी असमानता है। कुछ लोगों के पास बेसूमार सुख-सुविधाओं के साधन, रिहाइसी बंगले और कोठियां हैं तो बाकी आबादी को मुश्किल से रात को छत उपलब्ध हो पाती है। यह असमानता एवं गरीबी-अमीरी का असंतुलन समस्याओं की जड़ है।
वर्तमान युग की समस्याओं का समाधान है अहिंसा, आपसी भाईचारा, अयुद्ध एवं करुणा। इस तरह बाहरी सौंदर्य को बढ़ाने के लिये पहले भीतर का सौंदर्य बढ़ाना होगा और उसके लिए अहिंसा सर्वोत्तम साधन है। उसमें दया है, प्रेम है, मैत्री, करुणा, समता है, संवेदनशीलता है। जितने भी गुण हैं, वे सब अहिंसा की ही परिक्रमा कर रहे हैं, उसके परिपाश्र्व में घूम रहे हैं। अहिंसा ही जीवन का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। उसका विकास होना चाहिए। कैसे हो, यह हमारे सामने एक प्रश्न है। प्रेरक वक्ता टॉनी रॉबिन्स कहते हैं, ‘हमारे जीवन की गुणवत्ता इस बात का दर्पण है कि हम खुद से क्या सवाल पूछते हैं।’

समाज में अनैतिकता इसलिए पैदा हो रही है और फल-फूल की है कि आदमी के मन में करुणा नहीं है, अहिंसा नहीं है, मैत्री और समानता का भाव नहीं है। आज मैं अपने दीक्षा के 38वें वर्ष में प्रवेश करते हुए सोच रहा था कि हमें जीने के तौर-तरीके ही नहीं बदलने है बल्कि उन कारणों की जड़े भी उखाड़नी होगी जिनकी पकड़ ने हमारे परिवेश, परिस्थिति और पहचान तक को नकार दिया। आधुनिकता के नाम पर बदलते संस्कारों ने जीवनशैली को ऐसा चेहरा और चरित्र दे दिया कि टूटती आस्थाएं, खुलेआम व्यवसाय एवं कर्म में अनैतिक साधनों की स्वीकृति, स्वार्थीपन, खानपान में विकृतियां, ड्रिंक-ड्रंग्स-डांस में डूबती हमारी नवपीढ़िया, आपसी संवादहीनता, दायित्व एवं कत्र्तव्य की सिमटती सीमाएं- अनेक ऐसे मुद्दें हैं जिन्होंने हमारे जीवन पर प्रश्नचिन्ह टांग दिये हैं। दिल्ली की सड़कों का दृश्य मेरे सामने आ गया। इस महानगर में जहां अनेक बड़े भवन रोज बनकर तैयार होते हैं, वहां की सड़कों की ऐसी हालत क्यों हो? लेकिन जैसा कि अभी कहा, स्वार्थ आड़े आता है। भवन मेरा अपना है, सड़क मेरी नहीं है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। माचिस, सूई, धागा आदि का आविष्कार जरूरत के अनुसार हुआ और आज इससे सारी दुनिया लाभान्वित हो रही है। अहिंसा विश्व भारती और उसके अहिंसा प्रशिक्षण एवं अहिंसक जीवनशैली आदि उपक्रमों में अगर प्राणवत्ता है, लोगों के लिए लाभदायी है तो एक दिन इन्हें सारी दुनिया स्वीकार करेगी। हम क्यों इस चिंता में दुबले हो कि सभी लोग हमारी बात को नहीं सुन रहे हैं या स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
भगवान महावीर की अनुभूतियों से जन्मा सच है-‘धम्मो शुद्धस्य चिट्ठई’ धर्म शुद्धात्मा में ठहरता है और शुद्धात्मा का दूसरा नाम है अपने स्वभाव में रमण करना, स्वयं के द्वारा स्वयं को देखना, अहिंसा, पवित्रता एवं नैतिकता को जीना। धर्म दिखावा नहीं है, आडम्बर नहीं है, बल्कि यह नितांत वैयक्तिक विकास की क्रांति है। जीवन की सफलता-असफलता का जिम्मेदार व्यक्ति स्वयं और उसके कृत्य हैं। इन कृत्यों को एवं जीवन के आचरणों को आदर्श रूप में जीना और उनकी नैतिकता-अनैतिकता, उनकी अच्छाई-बुराई आदि को स्वयं के द्वारा विश्लेषित करना, यही हमें स्वास्थ्य, शक्ति, आंतरिक सौन्दर्य, सम्यक् साधन-सुविधाओं एवं सुयश के साथ-साथ जीवन की शांति और समाधि की ओर अग्रसर कर सकते हैं।
प्रकाश के अभाव में सचाई का साक्षात्कार नहीं हो पाता। आदमी रस्सी को सांप समझ लेता है और सांप को रस्सी। प्रकाश भले ही कितना भी क्षीण हो, वह सचाई को प्रकट करने में बहुत सहायक होता है। इसी सचाई के आधार पर हम वास्तविकता की खोज करते रहे हैं, अच्छे आदमियों के निर्माण में लगे रहे हैं। आज से नहीं, 38 वर्षों से वह क्रम आगे से आगे चल रहा है। हमने जो उपाय खोजे, उन्हें अपने तक ही सीमित नहीं रखा, प्रसाद मानकर उसे जन-जन को बांटा। मेरी दृष्टि में आदमी की तलाश वही कर सकता है, जिसका तीसरा नेत्र खुल गया हो। दो आंखें तो सिर के बीचो बीच सामने की ओर होती हैं, किन्तु हमारी तीसरी आंख भृकुटी के बीच में होती है। आज की मेडिकल साइंस में इसे पीनियल ग्लैंड का स्थान माना गया है। तीसरी आंख का संबंध न तो प्रियता के साथ होता है, न अप्रियता के साथ होता है। इसका संबंध एकमात्र सचाई के साथ होता है और जो सचाई को देखने वाला है, वही आदमी को तलाश कर सकता है। जैसाकि लेखिका शेनॉन ब्राउन कहती हैं, ‘हम खुद को बदलें या हालात को, ये हिम्मत कहीं बाहर नहीं है। हमारे अपने भीतर है।’
आदमी के मूल्यांकन का मेरा अपना पैमाना है। आज सभी लोगों की प्रायः यह धारणा है कि जिसके पास बहुत ज्यादा धन-दौलत हो, उसे बड़ा मान लिया जाता है। लेकिन मेरी धारणा तो कुछ दूसरी है। ऐसे बहुत से करोड़पति मिलेंगे, जिन्हें बड़ा तो क्या आदमी मानने में भी संकोच होगा। अर्हता पर विचार न करें तो उन्हें आदमी की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता। संवेदनहीन, हृदयहीन और क्रूर आदमी को आदमी कैसे माना जा सकता है? आदमी वही है जिसमें आदमीयत हो।
हमें क्षण भर के लिए भी यह विस्मृति क्यों हो कि हम आदमी नहीं हैं। देखा जाए तो आज की मूल समस्या यही है कि आदमी की स्वयं की और दूसरों की पहचान खो गयी है। सारा संकट पहचान का है। जो हम हैं, वह मानने को तैयार नहीं और जो नहीं हैं, उसका लेबल जबर्दस्ती लगाए घूम रहे हैं। स्वयं का व्यवहार आदमी जैसा नहीं है फिर भी कहीं प्रसंग आता है तो कह देते हैं कि आदमी हूं, कोई जानवर तो नहीं हूं और अपने नौकर के साथ आदमी जैसा व्यवहार करने को तैयार नहीं है। इन्हीं जीवनगत विसंगतियों को दूर करके ही हम वर्तमान की समस्याओं का समाधान पा सकते हैं।
प्रेषक- आचार्य लोकेश आश्रम, 63/1 ओल्ड राजेन्द्र नगर, करोल बाग मेट्रो स्टेशन के समीप, नई दिल्ली-60 सम्पर्क सूत्रः 011-40393082, 9821462696,


बस्तर मे पत्रकारो की सुरक्षा को खतरा बता कर उनकी आड़ मे अपना उल्लु सीधा करने में लगे है कुछ अवसर वादी पत्रकार नेता?

बस्तर मे पत्रकारो की सुरक्षा को खतरा बता कर उनकी आड़ मे अपना उल्लु सीधा करने में लगे है कुछ अवसर वादी पत्रकार नेता?

05-Oct-2020

मो  शोएब जकारिया ....

बस्तर में पत्रकारो को खतरा किससे है, पुलिस से या माओवादियों से   !

छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर में  पत्रकारों की सुरक्षा को  हमेशा से एक बड़ा मुद्दा बना कर कुछ चन्द लोगो के ही द्वारा बार बार  सवाल क्यों उठाया जाता  रहा है ? "क्या" छत्तीसगढ़ के हालात कश्मीर से ज्यादा बद्तर है। "क्या" यहाँ अघोषित आपात काल लगा हुआ है ? "क्या" ये तथा कथित पत्रकारों के पैरोकार ये बताना चाहेंगे की बस्तर के पत्रकारों के लिए इन्होंने क्या किया है सिवाय आंदोलन की धमकी देने के, अगर  इनके बारे में  हक़ीकत लिखे तो सरकार के पैरोकार कहा जाता हैं, लेकिन सच तो सच ही है जिसे अब सामने लाना जरूरी हो गया है।
ये वही लोग है जो पिछली  भाजपा सरकार  को भी बस्तर मे पत्रकारों की सुरक्षा के नाम पर जी भर -भर  के गालियाँ दिया करते थे, तब डॉ रमन सिंह खलनायक थे अब भूपेश बघेल खलनायक बन गए है, अब समझना है की हक़ीकत में इनके पीछे कौन खलनायक है  ?
पिछली बार बस्तर के कथित एक  IPS  को खलनायक बनाने में  इन लोगों ने कोई कोर कसर् नही छोड़ रखा था  उस IPS अधिकारी को हटाने शोसल मीडिया में  दिन रात एक किये हुए थे, और उसको हटा कर ही दम लिया *ये वही तथाकथित पत्रकार लोग है*जिन्हे इसी तरह की हरकतो के लिए अवार्ड दिया जाता है । क्योंकि ये उस समय भी सरकार को दोषी ठहरकर शोसल मीडिया में  पोस्ट डाला करते थे ,अब कांकेर के IAS को हटाने की जिद में अड़ कर प्रतिष्ठा का सवाल बना कर  अब कांग्रेस की सरकार इनके लिए बुरी हो गई है। क्योकि इन पत्रकारों को कोई मीडिया भाव नहीं  देता , इनकी बहुत सी शिकायतों और आदतों के कारण ये वैसे भी पत्रकार जगत में बदनाम है   और अपना काला कारनामा छुपाने आये दिन पत्रकार सुरक्षा का आड़ लेकर अपने गुनाहो को छिपाते है  ? 
इन्ही के एक वरिष्ठ पत्रकार साथी का  डेरा एक समय में जेल रोड के पुराने अरण्य भवन में हुआ करता था, वह वरिष्ठ फॉरेस्ट अधिकारी  इनका सबसे बड़ा शिकार हुआ करता था ? इनके ब्लैकमेल के चलते बेचारा IFS इनके परिवार को नौकरी भी लगाया और ब्लैकमेल भी होता रहा याने जिस थाली में  इन लोगों खाया उसी में छेद कर दिया!बाद में वही और लोगों को नौकरी लगाने के नाम पर इन्ही लोगों ने उन बेरोजगार युवाओं से पैसे ऐंठे वो आज भी इनको ढूँढ रहे हैं, ये इतने गंदे है की बिलाईगढ़ की दुष्कर्म पीड़िता के मुवाएजे में मिले रकम हड़प लिए बेचारी रो रो कर शिकायत करती रही उसके लिखे आवेदन आज भी गवाही दे रहे हैं और ये शोसल मीडिया में अपने आपको रॉबिंनहूड दिखाने की  कोशिश में लगे रहते है वही ये पत्रकार सुरक्षा की माँग कर रहे हैं ।  ये वही लोग है जिन्होंने  छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ  IAS  अधिकारी को ब्लैकमेल करने के जुर्म में जेल दाख़िल होना पड़ा अभी भी अदलतो के चक्कर लगा रहे है, और माँग रहे हैं पत्रकार सुरक्षा ?
मेरे खुद के भी कई IAS IFS राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी दोस्त है  इसका मतलब ये तो नही की उन्ही को ब्लैकमेल करने लग जाऊ लेकिन इनमें से एक ने मेरे निकट के सभी लोगों की RTI से जानकारी मांगी, कुछ ना मिलने पर बगले झांकने लगे ,इनकी सबसे गलत आदत है अधिकारीयो और राज नेताओ की ब्लैकमेलिंग करना है मैंने इसी लिए ऐसे लोगों को अपने संस्थान से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जो संस्थान के नाम पर वसूली करते थे जिसके तथ्यात्मक सबूत है हमारे पास ।
लेकिन हर कोई इन जैसा नहीं है,
छत्तीसगढ़ में हज़ारो की तदात में पत्रकार ईमानदारि से मीडिया संस्थानों मे काम कर रहे है जिन्हे किसी संस्था या संगठन की जरूरत नहीं है । वैसे भी इनकी आदतों को खराब कुछ अवसर वादी भरष्ट् नेताओं ने किया है जो होली दिवाली में लाइफ़ाफ़े बाँट कर  इन्हे लालची बनाते रहे क्योंकि वे नेता भी भ्रष्ट थे और अपने साथ पत्रकारों को भी भ्रस्ट बना दिया।
पत्रकारिता एक सम्मान जनक कार्य है, जिसे सभी वर्ग सम्मान करता है, पत्रकार, एक शब्द नहीं है ? पत्रकारिता तपस्या है जिसे कुछ लोगों ने बदनाम किया हुआ है,
पत्रकार, एक शब्द नहीं है ? पत्रकार और पत्रकारिता एक साधना है, जिसे भारतीय सविधान ने लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना है, जिसका सम्मान देश का हर वर्ग करता है। पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो स्वतंत्रता के पूर्व पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्ति का लक्ष्य था। स्वतंत्रता के लिए चले आंदोलन और स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता ने अहम और सार्थक भूमिका निभाई। उस दौर में पत्रकारिता ने पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने के साथ-साथ पूरे समाज को स्वाधीनता की प्राप्ति के लक्ष्य से जोड़े रखा। तब तो पत्रकार सुरक्षा का कही नामों निशान नहीं था, लेकिन  अपने काले कारनामे पर पर्दा डालने चंद स्वार्थी  तत्वों ने पत्रकारो का हित चिंतक बनकर पत्रकारों के हितों का कम और पत्रकार संघ और संगठन का ज्यादा भला करने में लगे हुए हैं और कभी बस्तर के पत्रकारों कभी छत्तीसगढ़ के सभी पत्रकारों की दुहाई दे कर सुरक्षा की माँग करते हैं लेकिन आज इस बात को समझना जरूरी है की बस्तर में जिन से अपनी जान की हीफाज़त की दुहाई देते हैं हक़ीकत में उनकी विचारधारा उन्हीं से अधिक मिलती हैं, तभी तो पुलिस ने कडा कदम उठाने की कोशिश की और खलनायक बन गई!


 


मै पत्रकार नहीं हूँ ?

मै पत्रकार नहीं हूँ ?

03-Oct-2020

कु. दिया माली  / कु. सुधा वर्मा 

मै पत्रकार नहीं हूँ ? क्योकि  अब पत्रकार कहलाने से मुझे शर्म आने लगा है, क्योकि पत्रकारिता करने के लिए रिपोर्टिंग और समाचार की नहीं बल्कि आपका पत्रकारों के किसी संगठन या क्लब का सदस्य होना जरूरी है, ना की मीडिया संस्थान चलाना या उस संस्था में काम करना !

पत्रकार होने के लिए आपसे कोई आपकी योग्यता नहीं जानना चाहेगा, लेकिन आपको अधिकारीयों- नेताओं को धमकाना चमकना आना अनिवार्य  योग्यता में शामिल माना जायेगा भले ही उस अधिकारी की योग्यता आम जनता और उस  क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण क्यो ना हो, पत्रकार संगठन के नेता को वो कथित IAS पसंद नहीं है तो उनके आदेश का पालन होना चाहिए नही तो खैर नही ? भले ही आपने कोई भी समाचार नही लिखा हो थाने में एक दो मामले आपके उपर दर्ज ना किये गए हो अगर ये सब योगयता आप में नहीं है, और किसी पत्रकारों की संस्था से नहीं जुड़े है तो आप पत्रकार कहलाने के हक़दार नहीं है ?

आप कोई भी मीडिया संस्थान से जुड़े ना हो भले ही आपकी कोई भी मीडिया नहीं हो या किसी समय में पत्रकारिता से जुड़े थे अब पत्रकारों का संगठन चला रहे हो या किसी प्रेस क्लब में बैठ कर कैरम या ताश खेलते हो तो आप पत्रकारों के सच्चे हित चिंतक है वर्ना नहीं है !

अगर आपके ऊपर एक बार पत्रकार का लेबल लग गया हो और आपके पड़ोसी या किसी भी नागरिक से आपका झगड़ा हो गया हो तो आपको पत्रकार सुरक्षा मिलनी चाहिए और उस नागरिक को जेल हो जानि चाहिए क्योकिं आप पत्रकार है और वो सामान्य नागरिक अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो आप पत्रकारों की संस्थान आन्दोलन करेगी, और ये पत्रकारों के नेता अधिकारी और प्रशासन को सरे आम गालियाँ देंगे और आपको जबरदस्ती सुनाना पड़ेगा क्योंकि आप पत्रकार सुरक्षा के अंतर्गत आते है क्योकि आप पत्रकारों संस्था या संगठन से है। क्योकि आप तथाकथित पत्रकार जो है और ये आप का पेशा बन गया है जो आये दिन पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारों का आड़ लेकर वैमनस्य फैलाने का काम करते है! इसमें एक बात गौर करने वाली है बार - बार इन्ही कुछ पत्रकारों पर हमले क्यो होते हैं, कुछ इन्ही से संबंधित पत्रकारों को ही ब्लैकमेलिंग में पुलिस थाने में क्यों बैठाती है, और इन्हें छुड़ाने वही पत्रकार संगठन और पत्रकार सुरक्षा की दुहाई देने वाले ही थाने में इकट्ठे हो जाते हैं क्योंकि ये बेचारे जो है? और इनके लिए थानेदार को फोन भी वही लोग करते है जिन्हे ये सरे आम गलियाँ देते है।

इससे बेहतर तो मै पत्रकार कहलाना ही नहीं चाहूंगी क्योकि बार बार आप जैसे लोगो के कारण पत्रकारिता कलंकित हो रही है, और आम जनता पत्रकार और पत्रकारिता का मखौल और मजाक  उड़ा  रहे है! ये अच्छी बात है क्योंकि इन्हे सबक मिलनी चाहिए क्योंकि यहाँ का जनसंपर्क तो कुछ खास लोगों को ही पत्रकार मानता है और यही बरसो बैठे मठाधीश इन पत्रकारों के खैरख्वाह है जिन्हे ये आशीर्वाद देते हैं, उन्हे प्रेस कॉन्फ्रेंस में बुलाया जाता हैं सारी सुविधाए मिलती हैं चाहे सरकार किसी की भी हो, विधान सभा की कमेटी हो तो वही चेहरा दिखता है कोई भी कार्यकर्मो मे इन्हे आगे देखेंगे और सरकार को गाली देने के समय यही आगे नज़र आते हैं।

इस मुश्किल घडी में जब हर तरफ कोरोना से हाहाकार  मचा हुआ है ऐसे समय में  पत्रकार के शब्द, पत्रकार की भाषा, पत्रकार की आवाज़, पत्रकार की कलम सब कुछ खौफ और ख़ामोशी की दौर से गुजर रही हो जब हर तरफ दहशत का माहौल हो, प्रवासी मज़दूर बेरोजगार हो गये है, बेटियों की इज्जत लूटकर मार दिया जा रहा हो तब पत्रकार अपने पत्रकारिता का धर्म भूल कर अपनी  निजी  झगड़ो को पत्रकारों  की लड़ाई बताकर माहौल बिगड़ने का प्रयास और युवा पत्रकारों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास क्या शर्मनाक नहीं है?, अभी तो सही वक्त था पत्रकारिता का धर्म निभाने का!

 


त्रासदी है नारी का बार-बार नौंचा जाना!

त्रासदी है नारी का बार-बार नौंचा जाना!

02-Oct-2020

ललित गर्ग राजभाषा विभाग के हिंदी विद्वानों में चयनित

ललित गर्ग
दरिन्दों एवं वहशियों के चलते एक और निर्भया ने दम तोड़ दिया। एक बार फिर गैंगरेप और भीषण यातनाओं का शिकार हुई यूपी के हाथरस जिले की 19 साल की दलित लड़की ने 15 दिनों तक मौत से जूझने के बाद मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस जघन्य, वीभत्स एवं दरिन्दगीपूर्ण गैंगरेप कांड से न केवल समूचा देश अशांत एवं शर्मसार हुआ है बल्कि कलंकित भी हुआ है। एक बार फिर नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नौंचने वाली इस घटना ने हमें झकझोर दिया है। यह त्रासद घटना बता रही हैं कि देश में लड़कियां अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। समूचे देश को करुणा-संवेदनाओं में डूबोने इस घटना ने अनेक सवाल फिर से खड़े कर दिये हैं।

दिल्ली के निर्भया मामले के बाद जैसी जनक्रांति देखने को मिली थी, उससे यह उम्मीद बंधी थी कि अब शायद देश में महिलाओं को इस तरह की त्रासदियों से नहीं गुजरना पड़ेगा। लेकिन बलात्कार कानूनों के सख्ती के बावजूद ना बलात्कार रुके, ना दरिन्दगी, ना ही महिलाओं की हत्याएं। हाथरस की बेटी से दरिन्दगी हुई, इसकी पुष्टि उसकी मौत से होती है। उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ी गई और जीभ काटी गई। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों जैसा सिलसिला चल पड़ा है। इस राज्य को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित राज्य में शामिल कर दिया है। यह राज्य लम्बे समय से अपराध का गढ़ रहा है, यहां की पुलिस एवं प्रशासन भ्रष्ट एवं अराजक रही है, अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से इन अपराधी मानसिकताओं पर नियंत्रण पाने की कोशिशें हो रही है।

बेटी तो बेटी होती है, हाथरस की दलित बेटी भी बेटी ही है, भले उसे व्यक्तिगत रूप से कम ही लोग जानते रहे होंगे, लेकिन वह दरिन्दगी के 15 दिन तक जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने के बाद अंततः वह हार गयी। उसकी दर्दनाक दास्तान ने देश की करोड़ों महिलाओं की वेदना को मुखर ही नहीं किया है बल्कि उसने समाज को फिर सोचने को मजबूर कर गई। हाथरस की यह क्रूर एवं अमानवीय घटना महाभारतकालीन उस घटना का नया संस्करण है जिसमें राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़कर खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने का प्रयास हुआ था। इस वीभत्स घटना में मनुष्यता का ऐसा भद्दा एवं घिनौना स्वरूप सामने आया है। एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए हंै कि आखिर  कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती यह कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं।
इन ज्वलंत सवालों के उत्तर हमने निर्भया के समय भी तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन इस तलाश के बावजूद इन घटनाओं का बार-बार होना दुःखद है और एक गंभीर चुनौती भी है। इस मौत ने गैंगरेप जैसे अपराध से निपटने में प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की घोर विफलता को भी उजागर किया है, यह भी जाहिर किया है कि उत्तरप्रदेश की पुलिस एवं प्रशासन की जड़ो में भ्रष्टता एवं अराजकता तीव्रता से व्याप्त है, किसी बड़े क्रांतिकारी सफाई अभियान एवं सख्त उपायों से ही उनमें बदलाव लाया जा सकता है। भले ही अब स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि हाथरस के सभी दोषियों के लिए कठोरतम सजा सुनिश्चित की जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की जांच के लिए एसआईटी भी गठित कर दी है। हाथरस कांड की विडम्बना एवं वीभत्सता यह है कि कुछ लोग बाकायदा एक मंच का बैनर लेकर आरोपियों को बचाने की कोशिश करते नजर आए। यह घटना सीधे तौर पर बताती हैं कि निर्भया कांड के बाद जो भी कदम उठाए गए, वे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नाकाफी साबित हुए हैं।

एक बड़ा सवाल यह भी है कि जांच और सजा के लिए बनाए गए लंबे-चैड़े तंत्र का संभावित अपराधियों में कोई खौफ क्यों नहीं दिख रहा है? दिल्ली के निर्भया मामले के बाद उमड़े जनाक्रोश के दबाव में जो बदलाव कानूनों में किए गए उनका भी समाज पर कोई खास असर नहीं देखने को मिल रहा। कुछ असर हुआ है तो सिर्फ इतना कि बलात्कार के जघन्य मामलों में अपराधियों को तुरत-फुरत मृत्युदंड देने की मांग हर संभव मंच से उठने लगी है। इसका नतीजा हैदराबाद पुलिस मुठभेड़ के रूप में देखने को मिला, जहां बलात्कार के संदिग्ध अपराधियों को उससे भी ज्यादा संदिग्ध ढंग से मौत के घाट उतार दिया गया। अपराधियों को अदालत से जल्दी सजा मिलनी चाहिए, जिसके लिए न समाज में कोई आग्रह दिखता है, न सरकारी तंत्र में। युवती दलित पृष्ठभूमि से थी और गिरफ्तार चारों आरोपी उच्च जाति के हैं। यही कारण है कि अपराधियों को दंडित करने की बजाय उनकी जाति और धर्म के आधार पर उनके बचाव में खड़े होने की प्रवृत्ति जरूर दिखने लगी है जो कठुआ रेप कांड के बाद अब हाथरस कांड में भी सामने आई है। ऐसी सोच के रहते क्या भारत कभी सभ्य समाज बन पाएगा? पुलिस-प्रशासन पर संदेह करने के अनेक कारण है, रात के अंधेरे में बिना पारिवारिक भागीदारी के पीड़िता का अंतिम संस्कार क्यों किया गया? पुलिस एवं प्रशासन की मंशा एवं भूमिका पर सवाल ही सवाल हैं। उम्मीद करें कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश और मुख्यमंत्री योगी की तत्परता से इन सवालों के अधिक भरोसेमंद जवाब सामने आएंगे और ऐसी त्रासद घटनाओं पर नियंत्रित की दृष्टि से चेतना जगेगी।

हर बार की इस तरह की घिनौनी घटना सवाल तो खडे़ करती हंै, लेकिन बिना उत्तर के वे सवाल वहीं के वहीं खड़े रहते हैं। यह स्थिति हमारी कमजोर मानसिकता के साथ-साथ राजनीतिक विसंगतियों को भी दर्शाती है। शासन-व्यवस्था जब अपना राष्ट्रीय दायित्व नैतिकतापूर्ण नहीं निभा सके, तब सृजनशील शक्तियों का योगदान अधिक मूल्यवान साबित होता है। हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं हो रहा है, तभी बार-बार निर्भया, कठुआ एवं हाथरस जैसे कांड हमें झकझोर कर रह जाते हैं। हमारे सुषुप्तावस्था के कारण ही बलात्कार-व्यभिचार- गैंगरेप और बच्चियों के साथ भीषण यातनाओं बढ़ रही हैं बल्कि कड़े कानूनों की आड में निर्दोष लोगों को फंसाने का ध्ंाधा भी पनप रहा है। जिसमें असामाजिक तत्वों के साथ-साथ पुलिस भी नोट छाप रही है।


हमें जीने के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है। जरूरत सख्ती बरतने की है, अगर बलात्कारियों के बच निकलने के रास्ते बंद करने के साथ ही उनको दिया जाने वाला दंड बाकी समाज के लिए एक कठोर सबक का काम करेगा तभी यह अपराधी मानसिकता के लोगों को ऐसे अपराध करने से रोकेगा। लेकिन इसके बावजूद अगर ऐसी वारदात नहीं रुक रही हैं, तो यह सोचना जरूरी है कि इस दिशा में और क्या किया जाए? इस समस्या का केवल कानून में समाधान खोजना भी एक भ्रांति है, समस्या के समाधान की दिशा में आधा-अधूरा प्रयत्न है। सबसे जरूरी है उन स्थितियों को खत्म करना, जो ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं। बलात्कार जैसे अपराध कुंठित मानसिकता के लोग करते हैं, लेकिन ऐसी कुंठाएं कई बार महिलाओं के प्रति हमारी सामाजिक सोच से उपजती हैं। महिलाओं को सिर्फ कानूनों में ही नहीं, सामाजिक धारणा के स्तर पर बराबरी का दर्जा देकर और उनकी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ाकर ही इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है। इससे हम ऐसा समाज भी तैयार करेंगे, जो कुंठित मानसिकता वालों को बहिष्कृत कर सकेगा। प्रश्न यह भी है कि आखिर हमारे देश में महिलाओं को लेकर पुरुषों में ही इतनी कुंठाएं क्यों है? इन कुंठाओं को समाप्त कैसे किया जाये, इस पर भी तटस्थ चिन्तन जरूरी है।

 


अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस -2 अक्टूबर 2020 पर विशेष - गांधी की अहिंसा पर टिकी है दुनिया की नजरें

अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस -2 अक्टूबर 2020 पर विशेष - गांधी की अहिंसा पर टिकी है दुनिया की नजरें

01-Oct-2020


-ललित गर्ग -

यह हमारे लिये गौरव  की बात है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन 2 अक्टूबर  अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। गांधी ही नहीं, श्रीराम, बुद्ध, महावीर, नानक, दयानन्द सरस्वती, आचार्य तुलसी की अहिंसा ने भारत को गौरवान्वित किया है, भारत की संस्कृति के कण-कण में अहिंसा की अनुगंूज है, अहिंसा का क्षेत्र परिवार, कुटुम्ब, समाज एवं राष्ट्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। उसकी गोद में जगत् के समस्त प्राणी सुख-शांति-अमन की सांस लेते हैं।

गांधी ने अहिंसक क्रांति के बल पर भारत को आजादी दिलायी, यही कारण है कि भारत ही नहीं, दुनियाभर में अब उनकी जयन्ती को बड़े पैमाने पर अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यह बापू की अहिंसा की अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता का बड़ा प्रमाण है। यह एक तरह से गांधीजी को दुनिया की एक विनम्र श्रद्वांजलि है। यह अहिंसा के प्रति समूची दुनिया की स्वीकृति भी कही जा सकती है। पडोसी देश पाकिस्तान एवं चीन को भी अहिंसा की प्रासंगिकता और ताकत को समझते हुए युद्ध, आतंकवाद एवं सीमाओं पर हिंसक घटनाओं को प्रोत्साहन देना बन्द करना चाहिए।

आज विज्ञान ने भौगोलिक दूरी पर विजय प्राप्त की है। सारा संसार एक गंेद के समान छोटा हो गया है, पर दूसरी ओर भाई-भाई में मानसिक खाई चैड़ी होती जा रही है। इस विरोधाभास के कारण पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन में बिखराव और तनाव बढ़ रहा है। यदि अहिंसा और समता की व्यापक प्रतिष्ठा नहीं होगी तो भौतिक सुख-साधनों का विस्तार होने पर भी मानव शांति की नींद नहीं सोे सकेगा।

अध्यात्म के आचार्यों ने हिंसा और युद्ध की मनोवृत्ति को बदलने के लिए मनोवैज्ञानिक भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने कहा है- युद्ध करना परम धर्म है, पर सच्चा योद्धा वह है, जो दूसरों से नहीं स्वयं से युद्ध करता है, अपने विकारों और आवेगों पर विजय प्राप्त करता है।

जो इस सत्य को आत्मसात कर लेता है, उसके जीवन की सारी दिशाएं बदल जाती हैं। वह अपनी शक्तियों का उपयोग स्व-पर कल्याण के लिए करता है। जबकि एक हिंसक अपनी बुद्धि और शक्ति का उपयोग विनाश और विध्वंस के लिए करता है। पडौसी देशों को अपनी अवाम के बारे में सोचना चाहिए। शायद वह कभी भी हिंसा एवं युद्ध नहीं चाहती है।


हमारे लिये यह सन्तोष का विषय इसलिये हैे कि अहिंसा का जो प्रयोग भारत की भूमि से शुरू हुआ उसे संसार की सर्वोच्च संस्था ने जीवन के एक मूलभूत सूत्र के रूप में मान्यता दी। हम देशवासियों के लिये अपूर्व प्रसन्नता की बात है कि गांधी की प्रासंगिकता चमत्कारिक ढंग से बढ़ रही है। दुनिया उन्हें नए सिरे से खोज रही है। उनको खोजने का अर्थ है अपनी समस्याओं के समाधान खोजना, हिंसा, युद्ध एवं आतंकवाद की बढ़ती समस्या का समाधान खोजना।

शायद इसीलिये कई विश्वविद्यालयों में उनके विचारों को पढ़ाया जा रहा है, उन पर शोध हो रहे हैं। आज भी भारत के लोग गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए अहिंसा का समर्थन करते हंै। पडौसी देश के साथ भी हम लगातार अहिंसा से पेश आते रहे हैं, लेकिन उन्होंने हमारी अहिंसा को कायरता समझने की भूल की है।


गांधीजी आज संसार के सबसे लोकप्रिय भारतीय बन गये हैं, जिन्हें कोई हैरत से देख रहा है तो कोई कौतुक से। इन स्थितियों के बावजूद उनका विरोध भी जारी है। उनके व्यक्तित्व के कई अनजान और अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हुए उन्हें पतित साबित करने के भी लगातार प्रयास होते रहे हैं, लेकिन वे हर बार ज्यादा निखर कर सामने आए हैं, उनके सिद्धान्तों की चमक और भी बढ़ी है। वैसे यह लम्बे शोध का विषय है कि आज जब हिंसा और शस्त्र की ताकत बढ़ रही है, बड़ी शक्तियां हिंसा को तीक्ष्ण बनाने पर तुली हुई हंै, उस समय अहिंसा की ताकत को भी स्वीकारा जा रहा है।

यह बात भी थोड़ी अजीब सी लगती है कि पूंजी केन्द्रित विकास के इस तूफान में एक ऐसा शख्स हमें क्यों महत्वपूर्ण लगता है जो आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की वकालत करता रहा, जो छोटी पूंजी या लघु उत्पादन प्रणाली की बात करता रहा। सवाल यह भी उठता है कि मनुष्यता के पतन की बड़ी-बड़ी दास्तानों के बीच आदमी के हृदय परिवर्तन के प्रति विश्वास का क्या मतलब है? जब हथियार ही व्यवस्थाओं के नियामक बन गये हों तब अहिंसा की आवाज कितना असर डाल पाएगी? एक वैकल्पिक व्यवस्था और जीवन की तलाश में सक्रिय लोगों को गांधीवाद से ज्यादा मदद मिल रही है। कोरोना जैसी महाव्याधि में भी अहिंसक जीवनशैली की उपयोगिता उजागर हुई है।


आज जबकि समूची दुनिया में संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं, हर कोई विकास की दौड़ में स्वयं को शामिल करने के लिये लड़ने की मुद्रा में है, कहीं सम्प्रदाय के नाम पर तो कहीं जातीयता के नाम पर, कहीं अधिकारों के नाम पर तो कहीं भाषा के नाम पर संघर्ष हो रहे हैं, ऐसे जटिल दौर में भी संघर्षरत लोगों के लिये गांधी का सत्याग्रह ही सबसे माकूल हथियार नजर आ रहा है। पर्यावरणवादी हों या अपने विस्थापन के विरुद्ध लड़ रहे लोग, सबको गांधीजी से ही रोशनी मिल रही है।

क्योंकि अहिंसा ही एक ऐसा शस्त्र है जिसमें तमाम तरह की समस्याओं के समाधान निहित हंै। भारत की भूमि से यह स्वर लगातार उठता रहा है कि दुनिया की नई-नई उभरने वाली कोरोना जैसी समस्याओं के समाधान भारत के पास हंै। ऐसा इसलिये भी कहा जाता रहा है क्योंकि भारत के पास महावीर, बुद्ध, गांधी जैसे महापुरुषों की एक समृद्ध विरासत है।


कोरोना महामारी एक सबक है जीवनशैली को बदलने का, पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति जागरूक होने का। शरीर, मन, आत्मा एवं प्रकृति के प्रति सचेत रहने का। भगवान महावीर कितना सरल किन्तु सटीक कहते हैं- सुख सबको प्रिय है, दुःख अप्रिय। सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। हम जैसा व्यवहार स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। यही मानवता है और मानवता का आधार भी। मानवता बचाने में है, मारने में नहीं। किसी भी मानव, पशु-पक्षी या प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना स्पष्टतः अमानवीय है, क्रूरतापूर्ण है। हिंसा-हत्या और खून-खच्चर का मानवीय मूल्यों से कभी कोई सरोकार नहीं हो सकता। मूल्यों का सम्बन्ध तो ‘जियो और जीने दो’ जैसे सरल श्रेष्ठ उद्घोष से है।


सह-अस्तित्व के लिए अहिंसा अनिवार्य है। दूसरों का अस्तित्व मिटाकर अपना अस्तित्व बचाए रखने की कोशिशें व्यर्थ और अन्ततः घातक होती हैं। आचार्य श्री उमास्वाति की प्रसिद्ध सूक्ति है- ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ अर्थात् सभी एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं। पारस्परिक उपकार-अनुग्रह से ही जीवन गतिमान रहता है। समाज और सामाजिकता का विकास भी अहिंसा की इसी अवधारणा पर हुआ। इस प्रकार अहिंसा से सहयोग, सहकार, सहकारिता, समता और समन्वय जैसे उत्तम व उपयोगी मानवीय मूल्य जीवन्त होते हैं। केन्द्र से परिधि तक परिव्याप्त अहिंसा व्यक्ति से लेकर विश्व तक को आनन्द और अमृत प्रदान करती है। दुनिया में मानवीय-मूल्यों का ह्रास हो, मानवाधिकारों का हनन हो या अन्य समस्याएं-एक शब्द में ‘हिंसा’ प्रमुखतम और मूलभूत समस्या है अथवा समस्याओं का कारण है।

और समस्त समस्याओं का समाधान भी एक ही है, वह है-अहिंसा। अहिंसा व्यक्ति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विराट भावना का संचार करती है। मनुष्य जाति युद्ध, हिंसा और आतंकवाद के भयंकर दुष्परिणाम भोग चुकी है, भोग रही है और किसी भी तरह के खतरे का भय हमेशा बना हुआ है। मनुष्य, मनुष्यता और दुनिया को बचाने के लिए अहिंसा से बढ़कर कोई उपाय-आश्रय नहीं हो सकता। इस दृष्टि से अहिंसा दिवस सम्पूर्ण विश्व को अहिंसा की ताकत और प्रासंगिकता से अवगत कराने का सशक्त माध्यम है।


यह स्पष्ट है कि हिंसा मनुष्यता के भव्य प्रासाद को नींव से हिला देती है। मनुष्य जब दूसरे को मारता है तो स्वयं को ही मारता है, स्वयं की श्रेष्ठताओं को समाप्त करता है। एक हिंसा, हिंसा के अन्तहीन दुष्चक्र को गतिमान करती है। अहिंसा सबको अभय प्रदान करती है। वह सर्जनात्मक और समृद्धदायिनी है। मानवता का जन्म अहिंसा के गर्भ से हुआ। सारे मानवीय-मूल्य अहिंसा की आबोहवा में पल्लवित, विकसित होते हैं एवं जिन्दा रहते हैं। वस्तुतः अहिंसा मनुष्यता की प्राण-वायु आॅक्सीजन है। प्रकृति, पर्यावरण पृथ्वी, पानी और प्राणिमात्र की रक्षा करने वाली अहिंसा ही है।


मानव ने ज्ञान-विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परन्तु अपने और औरों के जीवन के प्रति सम्मान में कमी आई है। विचार-क्रान्तियां बहुत हुईं, किन्तु आचार-स्तर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन कम हुए। शान्ति, अहिंसा और मानवाधिकारों की बातें संसार में बहुत हो रही हैं, किन्तु सम्यक्-आचरण का अभाव अखरता है। गांधीजी ने इन स्थितियों को गहराई से समझा और अहिंसा को अपने जीवन का मूल सूत्र बनाया। आज यदि विश्व 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है, तो इसमें कोई अचंभे वाली बात नहीं है। यह गांधीजी का नहीं बल्कि अहिंसा का सम्मान है।


प्रेषकः


            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


कोरोना से लड़ाई में योग सबसे अहम

कोरोना से लड़ाई में योग सबसे अहम

18-Sep-2020

- ललित गर्ग -

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कोरोना महामारी से मुक्ति में योग की विशेष भूमिका है। कोरोना महाव्याधि से पीड़ित विश्व में योग इसलिये वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि नियमित योग करने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। जहां कोरोना श्वसन तंत्र पर हमला करता है, वहीं योग उसी श्वसन तंत्र को मजबूत बनाने का काम करता है। प्राणायाम का अभ्यास करने से हमें कोरोना से लड़ने में मदद मिलती है। लोगों का जीवन योगमय हो, इसी से कोरोना के प्रकोप को कम किया जा सकता है, कोरोना महासंकट से मुक्ति पायी जा सकती है। हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना से लड़ाई में योग को सबसे अहम बताया। इस बार कोरोना वायरस की महामारी के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम ‘सेहत के लिए योग, घर से योग’ रखा था।

कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप के कारण दुनियाभर में योग की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है। दुनियाभर में नये-नये शोध एवं चमत्कृत करने वाले योग के प्रभाव सामने आ रहे हैं। कोरोना महामारी ही नहीं जीवन में सुख, शांति, एकाग्रता, संतुलित विकास में भी योग की महत्वपूर्ण भूमिका है। हाल ही में फ्रांस की किल्यरमोंट एवेंजर यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने अपने नवीन शोध में योग के माध्यम से एकाग्रचित्त होने वाले लोगों की तुलना अन्य काम करने वालों से की, तो काफी दिलचस्प नतीजे निकले। प्लॉस वन नाम की शोध पत्रिका में छपे शोधपत्र में इन वैज्ञानिकों ने बताया है कि एकाग्रचित्त होने वालों के लिए समय का अर्थ बदल जाता है। यह शोध और उसके निष्कर्ष एक बार फिर भारतीय योग की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता को उजागर किया है। कोरोना महामारी में योग एक रोशनी बना है, कोरोना की बढ़ती तेज रफ्तार मनुष्य को अशांति, असंतुलन, तनाव, थकान तथा चिड़चिड़ाहट की ओर धकेल रही हैं, जिससे अस्त-व्यस्तता बढ़ रही है, रोग बढ़ रहे हैं और उनसे लड़ने की क्षमता कमजोर होती जा रही है। ऐसी विषमता एवं विसंगतिपूर्ण जिंदगी को स्वस्थ तथा ऊर्जावान बनाये रखने के लिये योग एक ऐसी रामबाण दवा है जो माइंड को कूल तथा बॉडी को फिट रखता है। योग से जीवन की गति को एक संगीतमय रफ्तार दी जा सकती है।
भारतीय योग में ध्यान लगाने के बहुत सारे फायदे गिनाए जाते हैं। इनमें से बहुत सारी बातों को विज्ञान ने भी स्वीकार किया है। न्यूरोसाइंस के एक से अधिक शोध में यह बात बार-बार जाहिर हुई है कि ध्यान लगाने से तनाव कम होता है, कार्यक्षमता एवं एकाग्रता बढ़ती है, रोगों से लड़ने की क्षमता का विकास होता है, जो मस्तिष्क व उसकी उत्पादकता को बढ़ाती है। एकाग्रचित्त होकर ध्यान लगाने की चर्चा इन दिनों पश्चिमी देशों में काफी होती है, जहां इसे माइंडफुलनेस कहा जाता है। इसकी मूल अवधारणा भी भारतीय योग की तरह ही है, जो यह कहती है कि आप जो भी करें, एकाग्रचित्त होकर करें और किसी भी काम को करते समय अपने वर्तमान में ही रहें। इस माइंडफुलनेस पर इस समय दुनिया भर में बहुत सारे शोध हो रहे हैं। हमारे आत्मविश्वास एवं एकाग्रता की योग्यता हमारे अंदर ही निहित होती है। उसके सबसे अच्छे निर्णायक हम स्वयं होते हैं। हमें यह पता रहता है कि हम जिस कार्य में हाथ डाल रहे हैं, उसे ठीक प्रकार से संपन्न कर सकेंगे या नहीं, उसकी कार्यविधि का हमको ज्ञान है या नहीं, उसके वांछित परिणाम हम प्राप्त कर सकेंगे या नहीं और इनके परिप्रेक्ष्य में ही हम स्वयं को वह कार्य कर सकने के योग्य या अयोग्य मानते हैं। इसलिये योग न केवल कोरोना जैसी महामारी से मुक्ति, शांति एवं संतुलित जीवन का माध्यम है बल्कि यह हमें अपने कार्यक्षेत्र में भी उल्लेखनीय परिणाम देने एवं सकारात्मक सोच को निर्मित करने का माध्यम बनता है।  
फ्रांस के इस शोध से एक दिलचस्प बात यह भी सामने आयी है कि ध्यान संगीत से अधिक प्रभावी एवं सरस तरीका है एकाग्रता को साधने का, बोरियत को दूर करने का, जबकि ध्यान एवं योग को हम अक्सर नीरस चीज मान लेते हैं। जबकि इस प्रयोग के नतीजे बिल्कुल उल्टी तरफ जाते दिख रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इसे अन्य तरह से भी समझाने की कोशिश की है। उनका कहना है कि जब आपको कोरोना जैसे संकट से लड़ना होता है, कई काम करने होते हैं और दिन भर उसी में उलझे होते हैं, तो आपके पास बहुत सारी दूसरी चीजों के बारे में सोचने की फुरसत तक नहीं होती। ऐसे में, अक्सर लगता है कि समय बहुत तेजी से भागा जा रहा है। एकाग्रचित्त होकर ध्यान लगाने पर भी लगभग यही होता है। वैज्ञानिक इस नतीजे पर भी पहुंचे कि ध्यान क्रिया का जिसका अनुभव जितना ज्यादा है, उसका समय-बोध भी उतना ही परिमार्जित होता है, वे अपने समय को अपने अनुकूल बनाने में उतने ही अधिक सक्षम है। फ्रांस के इन वैज्ञानिकों का यह शोध भारतीय योग को आम जनजीवन में प्रतिष्ठित करने का भी सशक्त माध्यम बना है। यह हमारे उन संन्यासियों और योगियों के बारे में भी बहुत कुछ कहता है, जो पहाड़ों और जंगलों में जाकर बरसों-बरस साधना करते हैं। यहां कोरोना की बंदिशों के बीच हमसे समय बिताए नहीं बीतता और हम हर समय खुद को बोरियत से बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं, जबकि वे वहां एकांत में भी चिंता-मुक्त एवं सुदीर्घ कालावधि तक ध्यानमग्न होते हैं।
निश्चित ही फ्रांस की यह नवीन शोध योग एवं ध्यान को दुनियाभर में लोगों की जीवनशैली बनाने का उपक्रम बनेगा। योग के फायदों को देखते हुए हर कोई अपनी भागती हुई जिंदगी एवं कोरोना महासंकट में इसे अपनाता हुआ दिख रहा है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन लोगों को यह बात समझ में आ रही है कि योग करने से ना केवल बड़ी से बड़ी बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है बल्कि अपने जीवन में खुशहाली भी लाई जा सकती है, जीवन को संतुलित किया जा सकता है, कार्य-क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है, शांति एवं अमन को स्थापित किया जा सकता है।
वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगिक क्रांति, बढ़ती हुई आबादी, शहरीकरण तथा आधुनिक जीवन के तनावपूर्ण वातावरण के कारण हर व्यक्ति बीमार है इनके अलावा कोरोना की महामारी किसी एक राष्ट्र के लिए नहीं, समूचे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इससे आज जीवन का हर क्षेत्र समस्याओं से घिरा हुआ है। दैनिक जीवन में अत्यधिक तनाव/दबाव महसूस किया जा रहा है। हर आदमी संदेह, अंतद्र्वंद्व और मानसिक उथल-पुथल की जिंदगी जी रहा है। मानसिक संतुलन अस्त-व्यस्त हो रहा है। एकाग्रता एवं मानसिक संतुलन का अर्थ है कोरोना से उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों में तालमेल स्थापित करना, जिसका सशक्त एवं प्रभावी माध्यम योग ही है।
दरअसल योग धर्म का प्रायोगिक स्वरूप है। परम्परागत धर्म तो लोगों को खूँटे से बाँधता है और योग सभी तरह के खूँटों से मुक्ति का मार्ग बताता है। इसीलिये मेेरी दृष्टि में योग मानवता की न्यूनतम जीवनशैली होनी चाहिए। आदमी को आदमी बनाने का यही एक सशक्त माध्यम है। एक-एक व्यक्ति को इससे परिचित-अवगत कराने और हर इंसान को अपने अन्दर झांकने के लिये प्रेरित करने हेतु योग अमृत-जीवनधारा है, जो इंसान में योगी बनने और अच्छा बनने की ललक पैदा करती है। योग मनुष्य जीवन की विसंगतियों पर नियंत्रण का माध्यम है।
किसी भी व्यक्ति की जीवन-पद्धति, जीवन के प्रति दृष्टिकोण, जीवन जीने की शैली-ये सब उसके विचार और व्यवहार से ही संचालित होते हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में, एक-दूसरे के साथ कदमताल से चलने की कोशिश में मनुष्य अपने वास्तविक रहन-सहन, खान-पान, बोलचाल तथा जीने के सारे तौर-तरीके भूल रहा है। यही कारण है, वह असमय में ही भांति-भांति के मानसिक/भावनात्मक दबावों के शिकार हो रहा है। मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाने से शारीरिक व्याधियां भी अपना प्रभाव जमाना चालू कर देती है। जितनी आर्थिक संपन्नता बढ़ी है, सुविधादायी संसाधनों का विकास हुआ है, जीवन उतना ही अधिक बोझिल बना है। कोरोना से जुड़ेे तनावों/दबावों के अंतहीन सिलसिले में मानवीय विकास की जड़ों को हिला कर रख दिया है। योग ही एक माध्यम है जो जीवन के असन्तुलन को नियोजित एवं एकाग्र कर सकता, रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकता है, जीवन के बेरंग हो रहे संगीत में नयी ऊर्जा का संचार कर सकता है।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 


अब ऑस्ट्रेलिया में आठ बच्चों ने छेड़ी जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ जंग

अब ऑस्ट्रेलिया में आठ बच्चों ने छेड़ी जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ जंग

16-Sep-2020


पहले पुर्तगाल, और अब ऑस्ट्रेलिया में बच्चों ने जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ कदम उठाया है। ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण मंत्री के कोयला खदान विस्तार को मंजूरी देने के फैसले को रोकने के लिए आठ टीनएज बच्चों ने, एक कैथोलिक नन के साथ मिल कर, न्याय की गुहार की है ।  विकरी कोयला खदान अपने जीवनकाल में 370 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन कर सकती है।

आठ युवा ऑस्ट्रेलियाई, इज़ी (उम्र 13, सिडनी), अंज (16, मेलबर्न), बेल्ला (14, बनबरी, WA) लौरा (16, सिडनी), वेरोनिका (17, सिडनी), एवा (17, सिडनी), टॉम ( 15, एडिलेड) और एम्ब्रोस (15, सिडनी) ने सिस्टर ब्रिगेड आर्थर (85, मेलबर्न) के समर्थन से मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया के फेडरल कोर्ट में एक मामला शुरू किया, जिससे पर्यावरण मंत्री सुसान ले, संसद सदस्य, को उत्तर पश्चिमी न्यू साउथ वेल्स में स्थित विकरी कोयला खदान विस्तार परियोजना को अंतिम मंजूरी देने से रोका जा सके।

यह ऑस्ट्रेलिया का पहला ऐसा मामला है, क्योंकि यह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ युवा लोगों की सुरक्षा के लिए मंत्री के सामान्य कानून कर्तव्य का आह्वान करने की बात करता है। मामले के अनुसार, जलवायु संकट को बढ़ाने में कोयला की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए, यह तर्कसंगत है कि एक प्रमुख नई कोयला खदान को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। यह जलवायु परिवर्तन पर ऑस्ट्रेलिया में पहली ऐसी कार्रवाई है जिसमें  18 साल से कम उम्र के बच्चों ने केस किया है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के असर से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होने की संभावना है।

इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा क्योंकि लोक-विधि (कॉमन लॉ ) या साधारण कानून के मामले अन्य न्यायालयों (जैसे यूके, भारत, कनाडा, आयरलैंड और न्यूजीलैंड) को प्रभावित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पर दुनिया के किसी भी देश  के बच्चे ऐसा कदम उठा सकते हैं ।

यह बच्चों द्वारा  जलवायु परिवर्तन  रोकने के लिए हाल ही में पुर्तगाल  में किये गया केस की तर्ज़ पर बढ़ रहे केसों की सूची में शामिल दूसरा मामला  है ।

मेलबर्न से 16 वर्षीय अंज शर्मा ने कहा कि "हर एक साल में, हमने अपने देश में जलवायु परिवर्तन से उपजी  उथल-पुथल देखी है -, आग -जो अधिक से अधिक संपत्ति को नष्ट करती है, बाढ़- जो जानें लेती है और तूफान जो तबाही का सबब  बनतें हैं," ।

 “हर गर्मी  के मौसम को पहला  ऑस्ट्रेलिया की अब तक की सबसे भीषण गर्मी' का लेबल देने के बावजूद भी इस मुश्किल को हल करने के बजाय, और अधिक खनन को हरी बत्ती दी जा रही है। इसे रोकना होगा और मुझे इसे रोकने में मदद करने के लिए कुछ करने पर गर्व है। ”

यह आठ बच्चे पहले भी  ऑस्ट्रेलिया में स्कूल स्ट्राइक फ़ॉर क्लाइमेट (SS4C) में शामिल हुए हैं, और उन्होंने पिछले साल 20 सितंबर को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था। वे अपने स्वयं के नामों में और दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित सभी बच्चों  के लिए एक बदलाव लाना चाहते हैं और जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों  को भावी पीढ़यों के लिए कम करना चाहते हैं  ।

उनके मुकदमे के संरक्षक हैं सिस्टर ब्रिजिट आर्थर,जो ब्रिगिडिन असाइलम सीकर्स प्रोजेक्ट में शामिल एक 85 वर्षीय नन हैं । इस केस में कानूनी प्रतिनिधित्व इक्विटी जनरेशन के वकीलों - बैरिस्टर एमेरिस नेकवापिल और स्टेफ़नी सी बी बेंकर द्वारा प्रो-बोनो( यानी बिना किसी फीस के मुफ्त ) किया जा रहा है।

“सरकार जलवायु संकट के कारणों और निहितार्थों को पूरी तरह से समझती है। युवा आस्ट्रेलियाई लोगों को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से बचाया जाना चाहिए, ”डेविड बार्न्डेन, इक्विटी जेनरेशन के प्रधान वकील ने कहा। " यह एक अनोखा मामला है, जो बच्चों को न्याय का अवसर प्रदान करता है इसलिए हमें इन साहसी बच्चों का प्रतिनिधित्व करने पर गर्व हैं "


कोरोना संक्रमण के चलते शरीर में जम रहे हैं खून के थक्के

कोरोना संक्रमण के चलते शरीर में जम रहे हैं खून के थक्के

15-Sep-2020

कोरोना को ले कर हुई नई रिसर्च से सामने आई ये बात

कोरोना संक्रमण के चलते शरीर में जम रहे हैं खून के थक्के

कोरोना संक्रमण के कारण धमनियों में खून के बड़े-बड़े थक्के बन रहे हैं.

गहरी नस के अंदर बनने वाले थक्के बेहद खतरनाक हो सकते हैं.

कोरोना वायरस के खतरे को लेकर हर दिन एक नई जानकारी सामने आ रही है. विभिन्न देशों के डॉक्टर और वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि जब वायरस शरीर पर  हमला करता है तो तब मानव शरीर कैसे प्रतिक्रिया करता और कैसे बचाव करता है.

स्वास्थ्य विशेज्ञषों के अनुसार कोरोना वायरस से गंभीर रूप से बीमार 30 फीसदी तक मरीजों को खून के थक्कों के बनने की स्थिति सामने आ रही है जो जानलेवा है. इन खून के थक्कों (क्लॉट्स) को थ्रोंबोसिस कहा जाता है. इन थक्कों के बनने की वजह से फेफड़ों में गंभीर सूजन पैदा होती है. कोरोना वायरस पीड़ित व्यक्ति का शरीर सामान्य प्रतिक्रिया के तौर पर फेफड़ों में सूजन पैदा करता है. गहरी नस के अंदर बनने वाले थक्के बेहद खतरनाक हो सकते हैं. ये थक्के अपने आप नहीं घुल सकते हैं, और वे रक्त के प्रवाह को रोक सकते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार, थ्रोबोंसिस अगर मस्तिष्क, हृदय या फेफड़ों तक पहुंचता है, तो यह जीवन के लिए खतरनाक स्थिति हो सकती है, जैसे कि दिल का दौरा या स्ट्रोक. क्लॉटिंग मानव शरीर में प्राकृतिक प्रतिक्रियाओं में से एक है लेकिन अगर कोरोना मरीजों के लिए स्थिति बेहद खतरनाक हो जाती है.

रिपोर्ट के अनुसार कोरोना संक्रमण के कारण धमनियों में खून के बड़े-बड़े थक्के बन रहे हैं, जिसके कारण शरीर के अन्य भाग में इसका प्रवाह बाधित हो रहा है. यह पता चला कि बड़ी धमनियों के साथ छोटी धमनियां भी इस वायरस के संक्रमण से प्रभावित हुईं हैं.

इन मरीजों में खून के थक्के जमने का अत्यधिक खतरा

ज्यादा उम्र वाले लोग

वजन ज़्यादा होना

उच्च रक्तचाप से पीड़ित

मौजूदा मधुमेह

दिल की बीमारी का इतिहास

निष्क्रियता की अवधि होने पर, जैसे कि लंबे समय तक बिस्तर पर आराम करना

हाल ही में सर्जरी हुई है

धूम्रपान करने वाले या धूम्रपान करने का इतिहास रखते हैं

जिन लोगों में रक्त का थक्का जमने की बीमारी होती है

कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों में खून के थक्के जमने से कई तरह समस्याएं सामने आ सकती है. रिसर्च के अनुसार जिन मरीजों में खून का थक्का जम रहा है उन्हें आईसीयू में उपचार की जरूरत होती है. इसके अलावा धमनियों में खून का थक्का दिल का दौरा पड़ने का कारण हो सकता है. वुहान के एक अस्पताल में कोविड-19 के 187 रोगियों पर हुए अध्ययन के अनुसार 27.8 फीसदी रोगियों के ह्दय को नुकसान पहुंचा था.

थक्के को रोकने के लिए इलाज में खून को पतला करने वाली दवा दी जाती है. हालांकि खून पतला करने वाली दवाई से रक्तस्त्राव का खतरा भी बढ़ जाता है. हालांकि कुछ रिपोर्ट के अनुसार जिन लोगों को रक्त पतला करने की दवा दी गई उनकी मृत्यु दर दवा नहीं लेने वाले लोगों की तुलना में कम थी. वर्तमान में शोधकर्ता रक्त के थक्कों को रोकने में मदद करने के लिए नए उपचार विकल्पों का परीक्षण कर रहे हैं.

डॉक्टर का सुझाव है कि कोरोना वायरस से संक्रमण को रोकने के लिए सबसे अच्छा तरीका है हाथ की सफाई और मास्क पहनना. रक्त के थक्कों के बढ़ते जोखिम वाले लोगों को अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए. कुछ मामलों में डॉक्टर रक्त को पतला करने वाली दवा का उपयोग करने की सलाह दे सकते हैं. हालांकि, ये दवाएं सभी के लिए उपयुक्त नहीं हैं.

इन तरीकों से कम कर सकते हैं जोखिम

जितना हो सके एक्टिव रहें

रक्त प्रवाह में सुधार के लिए विशेष मोज़ा पहनना

निर्जलीकरण को रोकने के लिए खूब पानी पीना

यदि आवश्यक हो तो वजन कम करना

शराब और तंबाकू के सेवन से बचना


बुनियाद से लेकर महल की तामीर में लगी ईंट दर ईंट हिलाने की कोशिश

बुनियाद से लेकर महल की तामीर में लगी ईंट दर ईंट हिलाने की कोशिश

05-Sep-2020
आज़ादी के बाद सब घावों के सहलाते हुए हिन्दुस्तान का नव निर्माण किया

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी 

राज्य मुख्यालय लखनऊ।आज़ादी के बाद देश में दो विचारधाराओं ने जन्म लिया एक विचारधारा ऐसी थी जिसमें सबको साथ लेकर चलने की रणनीति थी दूसरी विचारधारा देश को धार्मिक आधार पर लेकर चलने की थी एक ने अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा कर लिया था पाकिस्तान बनाकर उसी तरह की एक सोच हिन्दुस्तान में ही रह गई थी सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा धार्मिक आधार पर चलने वाली विचारधारा पर लगभग साँठ साल तक भारी रही और धमाकेदार चलती रही लेकिन धार्मिक आधार पर देश को चलाने का ख़्वाब रखने वाली विचारधारा ख़ामोश नही रही वह भी रफ्ते-रफ्ते कभी उस विचारधारा के साथ तो कभी अकेले ही अपने लक्ष्य को भेदने के लिए चलती गई जो आज अपने उफान पर है लेकिन इसी दौरान धार्मिक आधारित विचारधारा के लिए कुछ मुनाफिकों का उस विचारधारा का भी समर्थन मिलता रहा जो कहने को सबको साथ लेकर चलने की हामी थी।ऐसे कुछ मुनाफिक लोगों की उस विचारधारा में या तो पहचान नही हो सकी या राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पद चिन्हों पर चलने चलाने के ठेकेदार यह पता होते हुए भी उनको नज़रअंदाज़ करते रहे उसी का परिणाम है जो आज देश में हो रहा है वह किसी से छिपा नही है।राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के रास्ते पर चलने वाली विचारधारा ने देश को कहाँ से कहाँ तक पहुँचाया इस पर विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है अब इस पर लिखना उचित नही है यह सबको मालूम है हम क्या थे और क्या है।किसी विचारधारा पर चलने के परिणाम दूसरी विचारधारा के चलन में आने के बाद ही पता चलते है या हम जब ही महसूस करते है सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा ने 1989 में या उससे पहले दम तोड़ दिया था या दम तोड़ने की शुरूआत हो गई थी जब कांग्रेस के विरोध में एक दल बना जिसे जनता दल का नाम दिया गया था इसमें ज़्यादातर वही नेता शामिल थे जो अपने आपको सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा के हामी कहते थे लेकिन उनकी सत्ता को प्राप्त करने की लालशाह ने उस विचारधारा को भी शामिल कर लिया(यही फ़िलहाल बिहार में हो रहा है) जिसका एजेंडा आज़ादी से पूर्व ही तय हो गया था जो अंग्रेज़ों के लिए मुखबिरी कर आज़ादी के मतवालों को फाँसी के तख़्ते पर पहुँचाने से भी गुरेज़ नही करते थे और खुद माफ़ी माँग कर वीर कहलाते है।कमाल की बात देखिए जनता दल को वोट देने वाला वोटर भी धार्मिक आधारित विचारधारा की विरोधी था लेकिन कांग्रेस विरोध ने उसकी समझ में को भी निगल लिया और और धार्मिक आधारित विचारधारा ने सेकुलर विचारधारा कंधे पर सवार होकर दो सीट से 89 सीट तक पहुँच गए बस वही से धार्मिक विचारधारा का सफ़र शुरू हुआ जो आज हमारे सामने है।हिन्दुस्तान की आने वाली पीढ़ियाँ दोनों विचारधाराओं का जब तुलनात्मक गुणाभाग करेंगी तब ज्ञात होगा कि हमने क्या खोया और क्या पाया क्योंकि दोनों विचारधाराओं के परिणाम हमारी पीढ़ियों के सामने होंगे।कोई भी सकारात्मक या नकारात्मक थ्योरी जब तक क्रियान्वयन की कसौटी पर कसे बिना उसकी अच्छाई या बुराइयों का पैमाना नही बनाया जा सकता है जब तक क्रिया प्रतिक्रिया और उसके परिणाम तक न पहुँच जाए उसके मानने वालों को भी मलाल रहता है कि अगर हमारी विचारधारा मज़बूती से आ जाती तो हम या हमारी विचारधारा बहुत अच्छा कार्य करती देश की जनता ने धार्मिक आधारित विचारधारा को इतनी मज़बूती दी कि वह फिर यह कहने की स्थिति में नही है कि अगर ऐसा होता अगर वैसा होता किन्तु परन्तु सब पर विराम लगा दिया है।धार्मिक आधारित इस विचारधारा ने देश को क्या दिया और क्या देने की स्थिति में है इसका मूल्यांकन किया जा सकता है किया भी जा रहा है एक वर्ग इस विचारधारा पर चलने वालों की शुरू से ही मुख़ालिफ़त करता रहा है अगर मैं साफ़-साफ कहूँ तो उसमें सबसे अग्रणी मुसलमान को माना जाता है ऐसा भी नही है इसमें हिन्दू नही है उनकी भी बड़ी तादाद है लेकिन तुलनात्मक मुसलमान को ही माना जाता है क्योंकि आज़ादी मिलने की संभावनाओं के चलते ही मुसलमानों का एक गुट हिन्दुस्तान में रहने की मुख़ालिफ़त करने की ठान चुका था जिसकी हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलमानों ने ज़बरदस्त मुख़ालिफ़त की उसी का नतीजा है ज़्यादा मुसलमान हिन्दुस्तान में रहा और कुछ मुठ्ठी भर मुसलमानों ने पाकिस्तान को चुना क्योंकि उनका एजेंडा भी धार्मिक आधारित था इस लिए मुसलमानों की जब की कयादत करने वालों शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन देवबन्दी (रह) ,हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह) ,हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह) , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि ने सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा को माना और हिन्दुस्तान में ही रहने का फ़ैसला किया जिसका राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने समर्थन किया आज़ादी की लड़ाई के सभी अग्रणी विद्वानों ने इस मुल्क को एक गुलदस्ता बनाने का ख़्वाब देखा था जिसे उन्होंने काफ़ी हद तक निभाने की कोशिश की और निभाया भी कुछ छुटपुट वाद विवादों को छोड़ दिया जाए तो वास्तव में हमारा मुल्क एक गुलदस्ता ही है या था।ख़ैर काफ़ी दिनों तक दो विचारधाराएँ चलती रही एक विचारधारा का तो अंत हो गया था छोटा सा पाकिस्तान बनाकर जो आज तक भी एक अच्छा मुल्क नही बन पाया वही एक विचारधारा और थी जो इसी मुल्क में रह गई जो तभी से नफ़रतों का सियासी कारोबार करती चली आ रही थी लेकिन वह कामयाब नही हो पा रही थी उसको कामयाब जो विचारधारा सबको साथ लेकर चलने वाली थी उसी विचारधारा के कुछ जय चंदों का अंदरूनी समर्थन मिलता रहा जिससे वह फलती फूलती रही जैसे अभी पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निधन के बाद RSS चीफ़ मोहन भागवत ने कहा कि प्रणब दा के निधन से RSS को बहुत नुक़सान हुआ है हमने अपना एक गाइड खो दिया है और भी कई नाम है जो RSS को अंदरूनी मदद किया करते थे या है यह बात अपनी जगह है।शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन देवबन्दी (रह) हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह) ,हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह) , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि ने सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा को क्यों माना था और हिन्दुस्तान में ही रहने का फ़ैसला क्यों किया था जिसका राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू आदि सरीखे नेताओं विद्वानों ने क्यों स्वागत किया था क्या वह कुछ जानते नही थे ? इस विचारधारा में शांति, प्रेम, भाईचारा और सहिष्णुता का पक्का ठोंस वादा था यक़ीन था तभी तो हिन्दुस्तान का डंका बजता था कि हिन्दुस्तान में कितने धर्मों के लोग एक साथ मिलजुल करके एक साथ रहते है उसी से गुलदस्ता बनता था उसमें दबे कुचले समाज को ऊपर उठाने की रणनीति थी किसी को आतंकित न करने की नीति थी यह इतिहास के सुखद क्षणों को याद कर आहत करने वाले क्षणों भुलाने और आज़ादी के बाद मिलकर आगे क़दम बढ़ाने के लिए प्रेरणा पर ज़ोर देती थी।सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा ने इस देश को देश बनाने में चार दसक लगा दिए लोकतंत्र, संविधान, की पटरियाँ बिछाने में इसके बाद तीन दसक विकास और इसकी समृद्धि को दिए हिन्दुस्तान दुनियाँ के बड़े देशों में शुमार हो गया।इसकी बुनियाद में लगी हर वह ईंट हमारे बुजुर्गों की क़ुर्बानियों की गवाही दे रही है तब जाकर हिन्दुस्तान रूपी महल तैयार किया गया है।दूसरी विचारधारा इस महल की नींव को कमज़ोर करने की कोशिश करती चली आ रही है इस मुल्क को मुल्क बनाने में सत्तर साल लग गए ऐसे ही तबाह नही होने देंगे हिन्दुस्तान को अपनी जान की बाज़ी लगानी पड़े तब भी पीछे नही हटेंगे ऐसा जज़्बा आज भी ज़िन्दा है हिन्दुस्तानियों में यह भी सब जानते है।इस दौरान तीन पीढ़ियों ने यह वक़्त देखा है सत्तर साल पिछली दो पीढ़ियों ने साम्प्रदायिकता के घाव देखे ,विभाजन की पीड़ा देखी ,नफ़रतों के नताईज देखे , शोषण से पैदा हुई ग़रीबी देखी इन सब घावों के सहलाते हुए हिन्दुस्तान का नव निर्माण किया भारत वासियों ने हम उस हिन्दुस्तान के वासी है जहाँ यह सब क़ुर्बानियों के अंबार है।तीसरी नस्ल ने यह सब क़रीब से नही देखा है उसे यह सब बना बनाया मिला है इस लिए वह भटक गई है उसे इस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए जा रहे है जैसे पहले कुछ हुआ ही नही यही वजह है कि जिन्हें मुर्ख या भक्त का नाम दिया गया है वह ना मूर्ख है ना भक्त है भटके हुए है नौजवानों को भटकाने की पाठशाला RSS की शाखाओं मिलती है जहाँ सब कुछ ग़लत फ़ीड किया जा रहा है वह उसे सही करने की राह तलाश रहे है जिसके लिए वह मरने कटने के लिए भी तैयार है।जब तक शरीर बीमार न हो अच्छे स्वस्थ्य की क़ीमत पता या अहसास नही होता है जब तक मौत सर पर ना नाचे ज़िन्दगी की क़ीमत का भी अहसास नही होता।2014 में सबका साथ सबका विकास , अच्छे दिन आने वाले है ,पन्द्रह-पन्द्रह लाख खातों में आएँगे जैसे खोखले नारे के दम पर चुना था 2019 पुलवामा की शहादत और  क़ब्रिस्तान बनाम शमशान को चुना।शमशान और क़ब्रिस्तान को पूरा मौक़ा मिलना चाहिए पीढ़ियाँ याद रखेंगी इतिहास चिख चिख कर पुकारेगा कि कभी ऐसा भी होता था हिन्दुस्तान में सरकारें शमशान और क़ब्रिस्तान व हमारे सैनिकों की शहादतों पर बन जाती थी क्या इनको पूरा मौक़ा मिलना चाहिए ? अरमान अधूरा नही रहना चाहिए।इस विचारधारा पर चलने वाले हिन्दू मुसलमान करना बहुत अच्छा जानते है बाक़ी कुछ नही छह साल में यही अनुभव हुआ नोटबंदी कर देश की अच्छी खांसी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दी बिना सोचे समझे लगाई गई जीएसटी ने व्यापार चौपट कर दिया रही सही कसर देश में चार घंटे के नोटिस पर देशबंदी ने पूरी कर दी विदेश नीति की हालत क्या हो गई यह भी सबके सामने है सरकार में आने से पहले लाल लाल आँख दिखाने की बात करते गोली बोली साथ नही चलेगी बिना बुलाए पाकिस्तान चले जाते है नवाज़ शरीफ़ की बिरयानी खाने चलो पाकिस्तान और चीन की बात छोड़ देते है वह तो हमारे दुश्मन देश है नेपाल जिसके साथ हमारे रोटी और बेटी के रिसते थे वह भी हमें लाल आँख दिखा रहा है यही हाल बांग्लादेश का है जिसको बनाने में हमारा योगदान है श्रीलंका ,भूटान सब पड़ोसी देश चीन के पाले जाते दिख रहे है और चीन हमारी सीमाओं में घुसपैठ कर रहा है और हम कह रहे है कि ना कोई हमारी सीमा में घुसा है ना कोई घुसा हुआ है और ना ही किसी ने हमारी किसी पोस्ट पर क़ब्ज़ा किया है।नोटबंदी करने के बाद पचास दिन माँगे देशबंदी के लिए 21 दिन माँगे ना पचास दिन में कुछ हुआ ना 21 दिन में कुछ हुआ नोटबंदी के बाद पचास के बाद किसी चौराहे की बात की थी जो आज तक नही मिला उस पर क्या होना था सबको मालूम है।बेरोज़गारी का क्या आलम है यह भी सबके सामने है दो करोड़ लोगों का रोज़गार छिन्न गया और भी छिनने की क़तार में लगे है ये फ़र्क़ है सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा में और धार्मिक आधारित विचारधारा में फ़ैसला आपको करना है।एक बात तो है झूठ बड़ी मज़बूती और आत्म विश्वास के साथ बोलते है इनको सुनने के बाद सच बोलने की प्रेरणा मिलती है।
तू इधर-उधर की बात ना कर, ये बता कि कारवां क्यों लुटा।

मुझे रहजनों से गिला नही तेरी रहबरी पर मलाल है।

क्यों मोर नाचा तेरे आंगन में, क्यों बतखों का है नाच हुआ।

क्यों मजदूर लुटा,क्यों किसान लुटा, क्यों देश बेचने का कारोबार हुआ।

क्यों अर्थव्यवस्था बौनी हुई, क्यों सपनों का संसार लुटा।

क्यों बेरोजगारी बढ़ रही,क्यों दोष नेहरू और भगवान को मिला।

देश की सम्पदा बेचकर, तू क्यों ना अभी तक भी शर्मसार हुआ।

 

प्रणव दा: भारतीय राजनीति के अजातशत्रु

प्रणव दा: भारतीय राजनीति के अजातशत्रु

01-Sep-2020

-ः ललित गर्ग:-

भारत रत्न’, भारतीय राजनीति के शिखरपुरुष एवं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष करते हुए आखिर हमें छोड़कर चले गए। उनका राजनीतिक जीवन पांच दशक से भी लंबा रहा। उनके विरल व्यक्तित्व के इतने रूप हैं, इतने कौण हंै, इतने आयाम हैं कि उन्हें एक छवि में बांधना संभव है। जिस पर भी कौतूहल यह है कि जो सबसे बड़े आयाम हैं, वे तो इन सब परिभाषाओं के बाहर ही छूट गये। और वे हंै भारतीय लोकचेतना का लाड़ला नायक! राष्ट्रीयता का पोषक!! विविधता में एकता का प्रेरक !!! विरोधी विचारों में समन्वय-सेतु!!!! उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के इतने लंबे दौर में लगभग हर महत्त्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी को अनूठे ढंग से संभालीं। न केवल भारत में बल्कि दुनिया में अपने राजनीतिक कौशल एवं विलक्षण प्रबन्धन क्षमता से अपनी स्वतंत्र पहचान कायम की, विशेषतः विश्वस्तर पर उन्हें सबसे ज्यादा पहचान भारत के वित्तमंत्री के रूप में मिली। खासतौर पर 2008 की भयावह मंदी से बाहर निकालने में जिस तरह मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्रीय हुनर को याद किया जाता है उसी तरह मंदी से उबारने के काम के क्रियान्वयन के लिए प्रणब मुखर्जी का नाम लिया जाता है। न्यूयॉर्क से प्रकाशित पत्रिका, यूरोमनी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1984 में दुनिया के पाँच सर्वोत्तम वित्त मन्त्रियों में से एक प्रणव मुखर्जी भी थे। प्रणव दा एक अत्यंत शिष्ट, परिपक्व, संयत और मुखर राजनेता रहे हैं। वे भारतीय राजनीति में ‘अजातशत्रु’ के रूप में रहे। फिर भी एक बड़ा सत्य तो यही है कि प्रणव दा जैसे राजनेता युगों में एक होते हैं।

राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी को विद्वता और शालीन व्यक्तित्व के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में लीक से हटकर अनूठे एवं अविस्मरणीय फैसले लिए। राष्ट्रपति पद के साथ औपचारिक तौर पर लगाए जाने वाले ‘महामहिम’ के उद्बोधन को उन्होंने खत्म करने का निर्णय लिया। रायसीना की पहाड़ी पर बने राष्ट्रपति भवन में अब तक कई राष्ट्रपतियों ने अपनी छाप छोड़ी है। उनमें राष्ट्रपति के रूप में प्रणब दा का कार्यकाल ऐतिहासिक, यादगार, गैरविवादास्पद और सरकार से बिना किसी टकराव का रहा। आमतौर पर राष्ट्रपति को भेजी गईं दया याचिकाएं लंबे समय तक लंबित रहती हैं लेकिन प्रणब मुखर्जी कई आतंकवादियों की फांसी की सजा पर तुरंत फैसले लेने के लिए याद किए जाएंगे। मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब और संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की सजा पर मुहर लगाने में प्रणब मुखर्जी ने बिलकुल भी देर नहीं लगाई। राष्ट्रपति के तौर पर 5 साल के अपने कार्यकाल के दौरान प्रणब मुखर्जी ने राजनीतिक जुड़ाव से दूर रहकर काम किया। प्रणव दा जब केंद्र सरकार में थे तो उन्हें सरकार के संकटमोचक के तौर पर देखा जाता था, जब वे बातचीत के जरिए विभिन्न समस्याओं का समाधान निकालने वाले में माहिर माने जाते थे। पांच दशक के राजनीतिक जीवन में, जिसमे उन्होंने असंख्य शब्द कहे, एक भी अभद्र टिप्पणी उनकी आप याद नहीं कर सकते।
प्रणव दा के राजनीतिक जीवन की अनेक विशेषताएं एवं विलक्षणताएं रही हैं। कानून, सरकारी कामकाज की प्रक्रियाओं और संविधान की बारीकियों की बेहतरीन समझ रखने वाले प्रणब दा 2014 के बाद नई भाजपा सरकार से अच्छे संबंध बनाने में सफल रहे। देश की राजनीतिक परिस्थितियों, देश की घटनाओं से वे अपने आपको अवगत रखते थे। प्रधानमंत्री की विशेष पहल पर उन्होंने शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति भवन परिसर में बने स्कूल में छात्रों को पढ़ाया भी। इन्होंने राष्ट्रपति भवन में एक संग्रहालय का भी निर्माण करवाया, जहां आम लोग अपनी इस विरासत को देख सकते हैं।
प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में हुआ था। कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के घर जन्मे प्रणव का विवाह बाइस वर्ष की आयु में 13 जुलाई 1957 को शुभ्रा मुखर्जी के साथ हुआ था। उनके दो बेटे और एक बेटी - कुल तीन बच्चे हैं। पढ़ना, बागवानी करना और संगीत सुनना- उनके व्यक्तिगत शौक भी हैं। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई बीरभूम में की और बाद में राजनीति शास्त्र और इतिहास विषय में एमए किया। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की। वे 1969 से 5 बार राज्यसभा के लिए चुने गए। बाद में उन्होंने चुनावी राजनीति में भी कदम रखा और 2004 से लगातार 2 बार लोकसभा के लिए चुने गए। उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत साल 1969 में हुई, जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मदद से उन्होंने सन् 1969 में राजनीति में प्रवेश किया, जब वे कांग्रेस टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए। सन् 1973 में वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए और उन्हें औद्योगिक विकास विभाग में उपमंत्री की जिम्मेदारी दी गई। प्रणव दा ने अपनी आत्मकथा लिखा है कि वे इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और जब आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार हुई, तब वे इंदिरा गांधी के साथ उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी बनकर उभरे। दक्षिण भारत में जो कांग्रेस का जनाधार बनकर उभरा वह भी इनकी मेहनत एवं राजनीतिक कौशल का परिणाम था। सन् 1980 में वे राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता बनाए गए। इस दौरान मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था, पर तब कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया। 1984 में राजीव गांधी सरकार में उन्हें भारत का वित्तमंत्री बनाया गया। बाद में कुछ मतभेदों के कारण प्रणब मुखर्जी को वित्तमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। वे कांग्रेस से दूर हो गए और एक समय ऐसा आया, जब प्रणब मुखर्जी ने एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई। उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया। दरअसल, वे अपने मत में स्पष्ट थे और अपना विरोध दर्ज करवाना जानते थे इसलिए उन्होंने राजीव गांधी से दूरी बनाई। वीपी सिंह के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी की स्थिति डांवाडोल हो गई। बाद में कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी पर फिर भरोसा जताया और उन्हें मनाकर फिर पार्टी में लाया गया और उनकी पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया।
प्रणब मुखर्जी को पीवी नरसिंहराव सरकार ने योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। बाद में उन्हें विदेश मंत्री की जिम्मेदारी भी दी गई। 1997 में उन्हें संसद का उत्कृष्ट सांसद चुना गया। ये वो दौर था, जब कांग्रेस का जनाधार सिकुड़ने लगा था। केंद्र में मिली-जुली सरकारों का दौर चल रहा था और राष्ट्रीय राजनीति बदलाव के दौर से गुजर रही थी। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया, क्योंकि तब प्रधानमंत्री राज्यसभा के सदस्य थे। वरिष्ठ सदस्य होने के नाते गठबंधन सरकार में अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों को साथ लेकर चलने में प्रणब मुखर्जी की अहम भूमिका रहती थी। प्रणब मुखर्जी 23 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य भी रहे। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता होने के कारण अनेक अवसर ऐसे आये, जब लोग उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देख रहे थे, मगर नियति को शायद कुछ और मंजूर था। वे 2009 से 2012 तक मनमोहन सरकार में फिर से वे भारत के वित्तमंत्री रहे। जब कांग्रेस ने उन्हें अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार चुना, तब उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले वे पश्चिम बंगाल के पहले व्यक्ति बने। वे भारतीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। उन्हें पद्मविभूषण और ‘उत्कृष्ट सांसद’ जैसे पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उनके कार्यकाल को एक प्रखर राजनेता के राजनय के उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा।
हाल ही में एक किताब के विमोचन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुस्तक ‘प्रेसीडेंट प्रणब मुखर्जी ए स्टेट्समैन एट द राष्ट्रपति भवन’ को जारी किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रणब मुखर्जी के साथ अपने भावनात्मक जुड़ाव का उल्लेख किया और कहा कि प्रणब दा ने उनका ऐसा ख्याल रखा, जैसा कोई पिता अपने बेटे का रखता हो। प्रणव दा ने भी इस बात को स्वीकारा कि दोनों के बीच कभी मतभेद की नौबत नहीं आई, हालांकि दोनों की विचारधाराएं अलग-अलग हैं। वे लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंतता के लिये प्रयासरत रहे। संसद के काम में रुकावट पर उन्होंने चिंता जताई और कहा कि विपक्षी दलों को सदन को काम करने देना चाहिए।
मुखर्जी को पार्टी के भीतर तो सम्मान मिला ही, सामाजिक नीतियों के क्षेत्र में भी काफी सम्मान मिला है। अन्य प्रचार माध्यमों में उन्हें बेजोड़ स्मरणशक्ति वाला, आंकड़ाप्रेमी और अपना अस्तित्व बरकरार रखने की अचूक इच्छाशक्ति रखने वाले एक राजनेता के रूप में वर्णित किया जाता है। प्रणव मुखर्जी को 26 जनवरी 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
प्रेषकः


           (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133 


फेसबुक वॉट्सएप्प- भारत के वयस्क मतदाताओं की अभिरुचि प्रभावित करने का सशक्त माध्यम

फेसबुक वॉट्सएप्प- भारत के वयस्क मतदाताओं की अभिरुचि प्रभावित करने का सशक्त माध्यम

19-Aug-2020

By- Amit Kumar RG

राहुल गांधी द्वारा यह कहना कि बीजेपी और आरएसएस भारत में Facebook और व्हाट्सऐप का नियंत्रण करती है और नफ़रत फैलाती है अब एक ओपन ट्रूथ है| फेसबुक अब फेस और बुक तक ही नहीं रह गया है बल्कि यह किसी भी व्‍यक्ति के चरित्र को चरितार्थ करता है। भारत में फेसबुक के 50 फीसदी से ज्यादा यूजर्स की उम्र 25 साल से कम है। व्हाट्सएप का विस्तार तो अब फेसबुक से भी कही ज्यादा व्यापक है| इसलिए यह दोनों वयस्क मतदाता की राजनैतिक अभिरुचि को प्रभावित करने के सबसे सशक्त माध्यम बने हुए हैं आपको याद होगा कि अमित शाह ने कुछ साल पहले राजस्थान के कोटा में पार्टी कार्यकर्ताओं, शक्ति केंद्र कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया वॉलिंटियर्स को संबोधित करते हुए कहा कि उनका सोशल मीडिया संगठन इतना मजबूत है कि वो जैसा चाहें, वैसा संदेश जनता तक पहुंचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यूपी में उनके पास 32 लाख लोगों का व्हाट्सअप ग्रुप है, जिसमें सूचनाएं नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे तक जाती हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की इस ताकत के बल पर वो मनचाही सूचना जन-जन तक फैला सकते हैं।

शाह ने कहा, "हम जो चाहें वो संदेश जनता तक पहुंचा सकते हैं, चाहे खट्टा हो या मीठा हो, चाहे सच्चा हो या झूठा हो।" 2018 में हफ़पोस्ट के रचना खैरा और अमन सेठी ने बड़ी मेहनत से एक रिपोर्ट लिखी थी, जिसमें ABM ‘द एसोसिएशन ऑफ़ बिलियन माइंड्स’ नामक संस्था की पूरी पड़ताल की गयी थी इस रिपोर्ट में बताया गया था कि कि 166 लोगों की यह टीम देश के 12 जगहों पर अपना दफ्तर रखती है। इसका मुख्य काम है बीजेपी के समर्थन में व्हाट्स एप के लिए मीम तैयार करना, चुनावों के समय न्यूज़ वेबसाइट की शक्ल में प्रोपेगैंडा वेबसाइट लांच करना, बदनाम करने और अफवाह फैलाने का अभियान चलाना, जिस दिन कैंब्रिज़ एनालिटिका का भांडा फूटा था, उसी दिन ‘द गार्डियन’ में जूलिया कैरी वोंग ने लिखा था कि डेटा के ऐसे उपयोग ने दुनिया को तो बदल दिया, लेकिन फ़ेसबुक नहीं बदला है दरअसल बिहेवियर साइकोलॉजी के अध्ययन के आधार पर अब मतदाता के दिमाग को पूरी तरह से बदला जा सकता है भारत मे राजनीतिक दलों में बीजेपी इसमे दूसरे दलों से मीलों आगे है अब इन जैसी संस्थाओं के माध्यम से डाटा साइंस के जरिये वह विभिन्न तरह के डाटा की अंदरूना जानकारियां रिकॉर्ड कर उन्हें अलग-अलग ट्रेंड का अध्ययन करती है फेसबुक डाटा के जरिए यूजर्स की प्रोफाइलिंग करती हैं। यूजर के पर्सनल डाटा को ध्यान में रखकर उसकी राजनीतिक पसंद, नापसंद को देखते हुए उससे जुड़ी हुई पोस्ट ही दिखाती हैं। लंबे समय तक ऐसी पोस्ट देखने से व्यक्ति का झुकाव किसी भी राजनीतिक पार्टी की तरफ हो जाता है यह सब डाटा एनालिसिस के जरिए होता है इसके लिए फेसबुक के पब्लिक पॉलिसी मेकर्स को सेट किया जाता है आँखी दास भारत मे यही काम कर रही होगी |

म्यूनिख विश्वविद्यालय में डिजिटल राजनीति सिखाने वाली सहाना उडुपा ने कहा कि राजनीतिक चुनाव प्रचार के लिए डेटा एनालिटिक्स कंपनियों का उपयोग करने से "दुनिया भर में विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।"उडुपा ने कहा, "डेटा निगरानी पूंजी और राजनीतिक शक्ति के बीच मिलीभगत लोकतंत्र के लिए गहरी क्षति है, क्योंकि मतदाताओं के व्यवहार के पैटर्न का पता लगाया जाता है, साजिश रची जाती है, भविष्यवाणी की जाती है और उन पर नक़ल की जाती है। अब प्रश्न उठता है कि यह सब तो हो ही रहा है हम ओर आप इसमे कर क्या सकते हैं ?......आप अगर आज फेसबुक से बाहर हो जाते हो कल को व्हाट्सएप से बाहर हो जाओगे, ट्विटर का भी बहिष्कार कर दोगे इंस्टाग्राम से भी बाहर हो जाओगे उन्हें 15 से 20 लाख सक्रिय यूजर के भी बाहर होने से फर्क नही पड़ने वाला.........

हम फ़ेसबुक, गूगल व ट्विटर जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों से उम्मीद नहीं रख सकते हैं, कि वो अपने मे कोई बदलाव लेकर आएगी अब हमें ही स्वंय चौकस व जागरूक होना होगा.....हमे उनके ओजार से उन्हें मात देनी होगी, हमे यहाँ डटे रहकर ही मुकाबला करना होगा!


आदतों को खुद पर न होने दे हावी

आदतों को खुद पर न होने दे हावी

18-Aug-2020

ओसीडी का उपचार सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में निशुल्क उपलब्ध

रायपुर 
कोरोना महामारी के दौरान लोगों की बहुत-सी आदतों और व्यवहार में परिवर्तन देखने में आ रहा है ।कुछ परिवर्तन तो स्वाभाविक है लेकिन कुछ मन का डर भी दर्शाते हैं|

ऐसी ही एक मनोदशा से आजकल कई लोग गुज़र रहे हैं जिससे मनोग्रसित बाध्यता विकार यानि ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD) से जाना जाता है। इस विकार से रोगी कुछ अजीब सी आदतें का आदि हो जाता है जो कई बार डर का रूप लेती हैं ।

रायपुर मनोरोग स्पर्श क्लीनिक के चिकित्सा मनोवैज्ञानिक डीएस परिहार कहते है:‘’मनोग्रसित बाध्यता विकार एक चिंता विकार है, जो व्यक्ति के दिमाग में चल रहे विचारों से उत्पन्न होता है। यह ऐसे विचार हैंजिनके बारे में लगातार सोचते रहने से यह आदत बन जातेहै या फिर आपके डर का रूप भी लेते हैं।’’

कोरोना काल में ऐसे व्यक्तियों का आंकड़ा बढ रहा है।जुनूनी बाध्यता विकार के नाम से भी जाने जाए वाले इस विकार में व्यक्ति हमेशा एक तरह के डर से घिरा रहता है। एक ही क्रिया को न चाहते हुए भी बार-बार करता रहता  है।डर और खौफ के चलते जैसे दिनभर अकारण  हाथ धोते रहना, किसी भी चीज़ को छूने के बाद बार-बार हाथों को सेनेटाइज़ करना,या बार बार मुंह धोते रहना बिना कारण और ऐसी कोई क्रिया करना जिसका कोई औचित्य नहीं है ।विकार से परेशान व्यक्ति को पता नहीं होता वह जो कर रहा है, वह सही है या नहीं।

यह विकार होने पर व्यक्ति की सामान्य जिदंगी पर भी प्रभाव पड़ता है। यहां तक कि व्यक्ति के नियंत्रण में उसकी गतिविधियां नहीं होतीं।

ओसीडी(OCD) पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में आम है। गन्दगी से डरते रहना,दिन भर अकारण बार-बार हाथ धोना,सामान सलीके से रखते रहना,दिल दुखानेसे आहत होना,रंगों को अच्छा बुरा मानना,पलके झपकना,करिबियोंको विश्वासघाती समझना,पूर्ण हो गये कार्य पर संदेह करना,या दूसरों से हाथ मिलाते समय डरना इसके कुछ लक्षण है ।तनाव,अवसाद,दुर्घटना होने के कारण,या फिर बचपन में शारीरिक या यौन शोषण होने से यह स्थिति हो सकती है । इसके बाद जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, वैसे वैसे इसके लक्षण भी भयावह होते जाते हैं।

चिकित्सा मनोवैज्ञानिक परिहार का कहना है: इस विकार से निकला जा सकता है लेकिन पहले से बचा नहीं जा सकता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक मरीज को दवा और साइकोथैरेपी देते हैं।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मीरा बघेल ने कहा ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत ज़िला चिकित्सालय में स्पर्श क्लीनिक की स्थापना की गई है । किसी भी प्रकार की मानसिक समस्या होने पर व्यक्ति यहाँ  परामर्श कर सकते है । इसके अलावा पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के सहयोग से मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में 17 मनोवैज्ञानिकछात्र-छात्राओं  द्वारा स्वैच्छिक सेवा प्रदान कर काउंसलिंग की सुविधा दी जा रही ।

कहॉ से मिल रही है सेवा

आरंग में राहत केंद्र भानसोज ,सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र फरफ़ौद,रीवा,चंद्रखुरी,कुरुदकुटेला के स्वास्थ्य केंद्रों से सम्पर्क कर मनोवैज्ञानिक परामर्श मानसिक स्वास्थ्य से पीडित लोग ले सकते है ।

अभनपुर में उपरवारा, अभनपुर, गोबरा नवापारा,तोरला, खोरपा, गुढियारी,खिलोरा के स्वास्थ्य केंद्र से मनोवैज्ञानिक परामर्श पीडित लोग ले सकते है ।

धरसींवा में सिलयारी,मांढर और दोंदेकलॉ बिरगॉव के स्वास्थ्य केंद्र से सम्पर्क कर मनोवैज्ञानिक परामर्श पीडित लोग ले सकते है ।

तिल्दा में खरोरा, बंगोली,खैरखुट केस्वास्थ्य केंद्र से मनोवैज्ञानिक परामर्श ले सकते है ।

रायपुर में हिरापुर कबीरनगर और भाटागॉव, डीडी नगर के स्वास्थ्य केंद्र सेसम्पर्क कर मनोवैज्ञानिक परामर्श पीडित लोग ले सकते है ।


कोरोनारूपी अंधेरी सुरंगों से बाहर निकलने के रास्ते

कोरोनारूपी अंधेरी सुरंगों से बाहर निकलने के रास्ते

17-Aug-2020

-ःललित गर्गः-

कोरोना महाव्याधि एवं कहर के दौरान हर इंसान सुख, स्वास्थ्य, जीवन-सुरक्षा और शांति की खोज में हैं और पता लगाना चाहता है कि सुखी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शांति है कहां? उन्हें अपनी सोच पर दृष्टिपात करना चाहिए। सोच की संतुष्टि है तो आदमी सुखी होगा। सोच की संतुष्टि नहीं होती तो आदमी रोता-कलपता रहता है, दुखी बना रहता है। हमारी कठिनाई यह है कि हम अपनी भावनाओं एवं विचारों पर ध्यान नहीं देते। उन पर हमारी पकड़ और उन पर नियंत्रण भी नहीं है। मन में कैसे-कैसे भाव उमड़-घुमड़ रहे हैं, किसी को पता नहीं। लेकिन हमारे ये भाव ही हमारी जटिल एवं विकट परिस्थितियों के कारक है। हमारी सबसे बड़ी सोच की त्रुटि है कि हमने सुविधा को सुख मानने की भूल कर दी। सुविधा होने पर भी आदमी सुखी नहीं हो सकता। सुविधा में अगर सुख देने की सामथ्र्य होती तो कोरोना महासंकट में दुनिया की एक बड़ी आबादी सुख भोग रही होती। फिर तो ज्यादा खर्च करके इस व्याधि के नरक से भी बचा जा सकता है।

तथाकथित पदार्थवादी एवं भौतिकवादी सोच को बदल कर ही हम समस्यामुक्त जीवन जी सकते हैं, कोरोना मुक्ति की राह पर अग्रसर हो सकते है। इस बात को समझ लेने की ज्यादा जरूरत है कि बाहर की दुनिया में न सुख है, न दुख है, न शांति है, न अशांति है। जो कुछ सकारात्मक और नकारात्मक है, वह हमारे भीतर है। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम किसे चुनते हैं? विचारक रूपलीन ने कहा है कि किसी भी तरह की मानसिक बाधा की स्थिति खतरनाक होती है। खुद को स्वतंत्र करिए। बाधाओं के पत्थरों को अपनी सफलता के किले की दीवारों में लगाने का काम करिए। सोच को सकारात्मक बनाये। जहां भी सोच-विचार में विकृति पनपे, वह जगह छोड़ दिजिये। ऐसा करके ही न केवल हम अपने जीवन को बल्कि राष्ट्र के जीवन को भी आत्म-निर्भर बना सकेंगे।
आदमी का स्वार्थ इतना प्रखर हो गया है कि उसे दूसरे का हित-अनहित देखने का अवकाश ही नहीं है, यही कारण है कि आज चारों ओर कोरोनारूपी विकृतियां ही विकृतियां दिखाई देती हैं। मनोविश्लेषण के जनक सिग्मंड फ्रायड ने कहा है कि यह इंसान का दिमाग ही है, बाहर का कोई बैरी नहीं, जो उसे गलत कामों की ओर ले जाता है।’ पदार्थ के मोह ने व्यक्ति के विवेक पर पर्दा डाल दिया है तो बुद्धि ने जीने के तौर-तरीकों को उलझा दिया है। बुद्धि का काम भी विचित्र है। वह एक समस्या को सुलझाती है, दूसरी को उलझाती है और तीसरी को पैदा करती है। अगर ऐसा है तो फिर हम बुद्धि पर ही क्यों ठहर जाते हैं? उसके आगे भी कुछ है, जो हमारे लिए बहुत कारगर और उपयोगी हो सकता है।
स्वयं को जानने का अर्थ है, अपने शक्तियों से परिचित होना। स्वयं का स्वयं के द्वारा मूल्यांकन। सकारात्मक सोच का निर्माण। यह वह अवस्था है जिसमें हम जीवन को आनन्द, स्वस्थ, सुरक्षित एवं सुखमय बना सकते हैं। जीवन में असफलता को सफलता में, दुःख को सुख में, विषाद को हर्ष बदल सकते हैं। सचमुच जीवन उनका सार्थक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुरातेे हैं। मेरे गुरु आचार्य तुलसी ने कहा है कि इतिहास साक्षी है कि मनुष्य के संकल्प के सम्मुख देव, दानव सभी पराजित होते हैं।
जीवन को विषाक्त बनाने वाले और अंधेरी सुरंगों में ले जाने वाले तत्व अभी भी हमारे भीतर ज्यों के त्यों कुंडली मारे बैठे हुए हैं। इनसे छुटकारे का प्रयत्न ही कोरोना से मुकाबला करने एवं नये जीवन की शुरूआत हो सकती है। लेकिन ऐसा नहीं होने का कारण है कि मनुष्य जीवन में अनेक छेद हो रहे हैं, जिसके कारण अनेक विसंगतियों को जीवन में घुसपैठ करने का मौका मिल रहा है। हमें उन छेदों को रोकना है। प्रयत्न अवश्य परिणाम देता है, जरूरत कदम उठाकर चलने की होती है, विश्वास की शक्ति को जागृत करने की होती है। विलियम जेम्स ने कहा भी है कि विश्वास उन शक्तियों में से एक है जो मनुष्य को जीवित रखती है, विश्वास का पूर्ण अभाव ही जीवन का अवसान है।
मनुष्य जीवन में नफरत की इतनी बड़ी-बड़ी चट्टानें पड़ी हुई हैं, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच व्यवधान पैदा कर रही हैं। विश्वास की शक्ति इतनी मजबूत हैं कि उन चट्टानों को हटाकर आदमी को आदमी से मिला सकता है। स्वेट मार्डेन ने कहा भी है कि मनुष्य उसी काम को ठीक तरह से कर सकता है, उसी में सफलता प्राप्त कर सकता है जिसकी सिद्धि में उसका सच्चा विश्वास है।
शेक्सपीयर कहते थे, हमारा शरीर एक बगीचे की तरह है और दृढ़ इच्छाशक्ति इसके लिए माली का काम करती है, जो इस बगिया को बहुत सुंदर और महकती हुई बना सकती है। एक और विचारक रूपलीन ने कहा है कि किसी भी तरह की मानसिक बाधा की स्थिति खतरनाक होती है। खुद को स्वतंत्र करिए। बाधाओं के पत्थरों को अपनी सफलता के किले की दीवारों में लगाने का काम करिए। कुछ लोग इन्हीं स्थितियों में मजबूत होते हैं और खराब समय को ही अपने जीवन को स्वर्णिम ढंग से रूपांतरित करने वाला समय बना देते हैं। रिचर्ड सील ने कहा भी है आत्मशक्ति इतनी दृढ़ और गतिशील है कि इससे दुनिया को टुकड़ों में तोड़कर सिंहासन गढ़े जा सकते हैं। कुछ लोग विशिष्ट अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं। वे लोग भाग्यवादी एवं सुविधावादी होते हैं, ऐसे लोग कुंठित तो होते ही है, जड़ भी होते हैं। कल्पना और प्रतीक्षा में वे अपना समय व्यर्थ गंवा देते हैं। किसी शायर ने कहा भी है तू इंकलाब की आमद का इंतजार न कर, जो हो सके तो अभी इंकलाब पैदा कर।

कोरोना कहर के बावजूद हम कहां बदल पाये हैं स्वयं को और अपनी दूषित सोच को। हम देख भी रहे हैं कि बुरे विचार जितना दूसरों का नुकसान करते हैं, उतना ही स्वयं अपना भी। कारण अपनी ही सुरक्षा को लेकर डरा दिमाग ढंग से नहीं सोच पाता। हम स्वार्थी हो उठते हैं, केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। लेखक इजरायलमोर एयवोर कहते हैं, ‘आपके विचार वहां तक ले जाते हैं, जहां आप जाना चाहते हैं। पर कमजोर विचारों में दूर तक ले जाने की ताकत नहीं होती।’
गलतियों को गलत मानने पर भी गलतियां निरस्त नहीं हो रही हैं, यह भी एक आश्चर्य है। ‘पानी में मीन पियासी’ वाली कहावत किसी ऐसे ही परिप्रेक्ष्य में प्रचलित हुई होगी। त्रुटियों एवं गलतियों की धुलाई का काम भगवान महावीर का अनेकांतवाद बखूबी कर सकता है। मनुष्य गलत आदतों, सोच एवं व्यवहार से आक्रान्त है, पीड़ित है। पीड़ा का दंश उसकी सुख और नींद तक छीन रहा है, किन्तु वह आग्रह नहीं छोड़ रहा है। अनेकांत का राजपथ उसके सामने है, पर उसके पैर डगमगा रहे हैं। वह चल नहीं पा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार गलतियों का परिमार्जन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे आप सामाजिक बने रहते हैं और लोगों के साथ जुड़े रहने पर आपको तनाव या अवसाद जैसी समस्या नहीं सताती हैं। बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा है कि हमारी खुशी का स्रोत हमारे ही भीतर है, यह स्रोत दूसरों के प्रति संवेदना से पनपता है।
कोरोना महामारी के बढ़ते संक्रमण के दौर में हम जी रहे हैं, उसके समाधान के सशक्त माध्यमों को अनदेखा कैसे कर सकते हैं? लेकिन हम बार-बार गलतियों पर गलतियां करते हुए कोरोना मुक्ति के मार्ग को बाधित कर रहे हैं। कोरोना महासंकट से जुड़ी समस्याओं के अनेक कोण हैं। समाधान भी अनेक कोणों से खोजे जा सकते हैं। जिन-जिन कोणों से हम इस जटिल समस्या को देख रहे हैं, उन्हीं के आधार पर समाधान भी खोजने होंगे। जितने स्रोतों से समाधान मिल सके, उन सबको जोड़कर भी कोई रास्ता निकाल लिया जाए तो युग-चेतना को नयी दिशा मिल सकती है। प्रेषकः


           (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92


समकालीन उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय आवाज़ आज सदा के लिए ख़ामोश हो गई।

समकालीन उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय आवाज़ आज सदा के लिए ख़ामोश हो गई।

11-Aug-2020
ये सब धुआं है कोई आसमान थोड़ी है !

समकालीन उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय आवाज़ आज सदा के लिए ख़ामोश हो गई। कोरोना से संक्रमित हरदिलअज़ीज़ शायर राहत इंदौरी की आज शाम इंदौर के एक अस्पताल में हृदयगति रुक जाने से निधन स्तब्ध कर देने वाली ख़बर है जिस पर सहसा यक़ीन नहीं होता। ग़ज़लों में उनके नए प्रयोग, उनके ज़ुदा तेवर और लफ़्ज़ों के साथ खेलने का उनका सलीका हमेशा याद किए जाएंगे। देश और विदेश में भी बड़े मुशायरों की वे जान थे। कोमल मानवीय भावनाओं पर उनकी जबरदस्त पकड़, सियासत के पाखंड को बेनकाब करने का उनका वो बेख़ौफ़ अंदाज़ और समकालीन मुद्दों की पड़ताल की उनकी अदा मुशायरों को एक अलग स्तर तक ले जाती थी। मुशायरों की दुनिया में जो खालीपन वे छोड़ गए हैं उसे भरने में शायद लंबा वक़्त लगेगा। राहत साहब को खिराज़-ए-अक़ीदत, उनकी ही एक ग़ज़ल के साथ ! ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़ मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा मेरा जहाज़ ज़मीं पर उतरने वाला था मेरा नसीब मेरे हाथ कट गए वर्ना मैं तेरी मांग में सिंदूर भरने वाला था मेरे चिराग, मेरी शब, मेरी मुंडेरें हैं मैं कब शरीर हवाओं से डरने वाला था।


ध्रुव गुप्ता की क़लम से

जन्माष्टमी भारतीय संस्कृति के शिखर पुरुषों में एक कृष्ण का जन्मदिन है

जन्माष्टमी भारतीय संस्कृति के शिखर पुरुषों में एक कृष्ण का जन्मदिन है

11-Aug-2020
जन्माष्टमी भारतीय संस्कृति के शिखर पुरुषों में एक कृष्ण का जन्मदिन है। कृष्ण की स्मृति से उनकी अनगिनत छवियां एक साथ उपस्थित हो जाती हैं - एक नटखट बच्चा, एक पराक्रमी किशोर, एक विनम्र शिष्य, एक आत्मीय मित्र, एक अद्भुत बांसुरी वादक, एक उत्कट प्रेमी, एक प्रचंड योद्धा, एक मौलिक विचारक, एक महान योगी, एक दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ और एक विलक्षण दार्शनिक। अपने समय की स्थापित रूढ़ियों का बार-बार अतिक्रमण करने वाला ऐसा महामानव जिसने अपने कालखंड को अपने इशारों पर नचाया। उन्होंने शांति की भूमिका भी लिखी और युद्ध की पटकथा भी। उनमें निर्माण की परिकल्पना भी है और विनाश की योजना भी। अथाह मोह भी और असीमित वैराग्य भी। पत्नियों की भीड़ भी और प्रेम का एकांत कोना भी। हम जिसे उनकी लीला कहते हैं, वह वस्तुतः जीवन के समग्र स्वीकार का उत्सव है। हमारी संस्कृति के ढेरों महानायकों के बीच कृष्ण अकेले हैं जिन्हें संपूर्ण पुरूष का दर्ज़ा हासिल है।अब यह बहस निरर्थक है कि कृष्ण हमारी और आपकी तरह मानव थे अथवा ईश्वर के अंश या अवतार। ईश्वर हमारा स्रष्टा है तो हम सब ईश्वर के ही अंश या अवतार हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कृष्ण ने अपने भीतर का ईश्वरत्व पहचान लिया था और हम अपने वास्तविक स्वरुप की तलाश में भटक रहे हैं। देशवासियों को कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई धुव्र गुप्त पूर्व आईपीएस

प्रदेश कोरोना संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहा है, खासतौर पर लखनऊ की हालत चिंताजनक

प्रदेश कोरोना संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहा है, खासतौर पर लखनऊ की हालत चिंताजनक

10-Aug-2020

By- Amit Kumar RG

लखनऊ। 

प्रदेश कोरोना संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहा है, खासतौर पर लखनऊ की हालत चिंताजनक बनी हुई है। लखनऊ में सबसे अधिक सक्रिय केस है, लेकिन अस्पतालों में बेड सीमित संख्या में ही है। एसजीपीजीआई, केजीएमयू और राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पास काफी बेड है, लेकिन कोरोना मरीजो के लिए चंद बेड ही आरक्षित किये गये है। लखनऊ में सबसे अधिक भार निजी मेडिकल कॉलेजो पर है। एसजीपीजीआई, केजीएमयू और राम मनोहर लोहिया अस्पताल की क्षमता
पर नज़र डालें तो एसजीपीजीआई के पास कुल 1500 बेड है लेकिन कोरोना मरीजो के लिए सिर्फ 210 बेड ही आरक्षित किये गए है। इसी तरह 
केजीएमयू के 4300 बेड में से 200 
और राम मनोहर लोहिया के 1000 बेड में से 125 बेड कोरोना मरीजो को दिए गए है।
मुख्यमंत्री कई बार अस्पतालों में बेड बढ़ाने का निर्देश दे चुके हैं, लेकिन अधिकारी ऊसर अनसुना कर रहे है। अगर अधिकारी सरकार के निर्देश का पालन करते और 
पीजीआई, केजीएमयू व लोहिया  चिकित्सा संस्थानों में क्षमतानुरूप कोविड बेड आरक्षित करते हैं तो तस्वीर कुछ और होती। शहर में कोरोना मरीजों की संख्या तेजी से बढ रही है। रोगियों का आंकडा 13000 के करीब है जबकि कोविड अस्पतालों में बेड की संख्या रोगियों की तुलना में काफी कम है। यही कारण है कि सरकार ने निजी अस्पतालों व मेडिकल कालेजों पर मरीजों की भर्ती का दबाव बढा दिया है।
कुछ इसी तरह का हाल लखनऊ के कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों का भी है। इस वैश्विक महामारी में भी लखनऊ में स्थित कॉर्पोरेट हॉस्पिटल  अपने दायित्व का निर्वाहन नही कर रहे है। इन निजी चिकित्सालवो द्वारा सरकार के निर्देशों की अवहेलना की जा रही है। जिस वजह से बड़ी संख्या में संक्रमित रोगियों को चिकित्सा सुविधा का लाभ नही मिल पा रहा है। अगर देखा जाए तो दिल्ली, मुम्बई और चेन्नई सहित सभी महानगरों में स्थित कॉर्पोरेट और निजी चिकित्सालय इस वैश्विक लड़ाई में सरकार के कंधे के कंधा मिला कर चल रहे है, इनका बड़ी संख्या में कोरोना मरीजों को मिल रहा है। जबकि लखनऊ में इनका रवैया उदासीन है। लखनऊ में मेदांता और अपोलो जैसे कॉर्पोरेट हॉस्पिटल से साथ साथ बड़ी संख्या में निजी अस्पताल मौजूद है। सरकार ने एक निश्चित संख्या में बेड निर्धारित करते हुए प्रदेश भर के निजी अस्पतालों को कोरोना मरीजों के उपचार की अनुमति दे दी है फिर भी लखनऊ के कॉर्पोरेट हॉस्पिटल अपनी जिम्मेदारी नही निभा रहे है। गत 17 जुलाई को अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य अमित मोहन प्रसाद ने बताया था कि प्रदेश सरकार ने डॉक्टर विनोद पाल की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश पर प्रदेश के प्राइवेट अस्पतालों में कोविड के इलाज की इजाजत दे दी है. प्रदेश सरकार ने इसको लेकर अधिसूचना जारी कर दी है। प्राइवेट अस्पताल अब अपने यहां कोरोना के मरीजो का इलाज कर सकेंगे. इस तरह के लिए इलाज की कितनी फीस ली जाएगी, इसे भी सरकार ने अधिसूचित कर दिया है।
इसके बाद भी लखनऊ का कोई भी कॉर्पोरेट अस्पताल कोरोना मरोजो के उपचार के लिए आगे नही आ रहा है।


दिमाग की ऊपरी सतह पर मुश्किल से एक ग्राम वजन का एक जाति नाम का कीड़ा आपसे आगे क्या क्या करवा सकता है-

दिमाग की ऊपरी सतह पर मुश्किल से एक ग्राम वजन का एक जाति नाम का कीड़ा आपसे आगे क्या क्या करवा सकता है-

09-Aug-2020
☸️☸️☸️ ☸️☸️☸️ *भाइयों और बहनों* दिमाग की ऊपरी सतह पर मुश्किल से एक ग्राम वजन का एक जाति नाम का कीड़ा आपसे आगे क्या क्या करवा सकता है- ❓ *1*-एक ग्राम का यह कीड़ा 500 ग्राम का झाड़ू और एक किलो का मटका लटकवा सकता है। *2*-जब तक ये कीड़ा दिमाग मे घूमता रहेगा आपको घुमा फिराकर अंतरजातीय शादी नही करने देगा तो मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर नश्ले पैदा होगी जो आपकी कमाई का अधिकांश हिस्सा दवाई में चला जायेगा। *3*-ये कीड़ा आपकी दवाई पढ़ाई महगाई और रोजगार से वंचित करवाकर वापस मनुतंत्र में एक एक कुंटल का वजन ढोने के लिए मजबूर करवाएगा। *4*-ये कीड़ा आपके बिके हुए नेता को वोट दिलवाएगा और आपको अंत मे घंटा बजाने के अलावा कुछ नही मिलेगा। *5*-ये कीड़ा आपके अधिकारी बन जाने के बाद भी हवा में उड़ने वाले हनुमान जी के दरबार मे पहुचायेगा जो बेचारा 5 सेकंड ठीक से उड़ जाए तो टांग अस्पताल में जुड़वाता हुआ मिलेगा। *6*-ये कीड़ा अपने महापुरुषों को पढ़ने नही देगा क्योकि उसको पता ही नही है कि ये विषमता का कीड़ा समता को स्थापित करने वाले महापुरुषों को इतिहास भूगोल से गायब करके मीडिया और बाबाओ द्वारा विषमता स्थापित करने वाले लोगो को हीरो बना दिया है। *7*-ये कीड़ा एक वायरस है जो मोबाइल की तरह दिमाग को हैंग कर दिया है इसलिए इसको शूद्र नाम के एंटीवायरस से डिलीट किया जा सकता है कि शूद्र सभी (ओबीसी/sc/st/माइनॉरिटी) है जो हिन्दू नाम के एक दो ग्राम कीड़े ने ढक कर रखा है। ❓ जब पढ़ा लिखा आदमी तर्क करता है तो गणेश में मुंडी हाथी की नही लग सकती उसी तरह शूद्र नभ जल थल में सब कुछ बनाकर नीच कैसे हो सकता है। ----------------------------- जाति में ऊंच नीच ब्राह्मण के आगे सारे नीच *तो गर्व से कैसे कहे हम हिन्दू है* *देवेंद्र यादव* *भारतीय शूद्र संघ* *(BSS)*

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