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छेड़खानी व यौन अपराध करने वालों के शहरों में लगेंगे पोस्टर ,योगी आदित्यनाथ

छेड़खानी व यौन अपराध करने वालों के शहरों में लगेंगे पोस्टर ,योगी आदित्यनाथ

24-Sep-2020

Report: Saeed Naqvi

Place:Lucknow

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ा आदेश जारी किया है। अब अगर कोई महिलाओं से छेड़खानी, दुर्व्यवहार या यौन अपराध करता है तो उसके पोस्टर शहरों में चौराहों पर लगाए जाएंगे।

बता दें कि ये काम उसी तर्ज पर किया जाएगा जैसे नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले आरोपियों के पोस्टर शहरों के प्रमुख चौराहों पर लगाए गए थे।

इस आदेश के तहत अब महिलाओं से दुर्व्यवहार करने वालों को महिला पुलिसकर्मियों से ही दंडित कराया जाएगा। सरकार का कहना है कि ऐसा कदम इसलिए उठाया जा रहा है जिससे कि महिलाओं व बच्चियों से दुर्व्यवहार करने वालों को पूरा समाज जान सके।


अपराधियों ने तबातोड़ फाइरिंग कर एटीएम से लाखों की लूट को दिया अंजाम

अपराधियों ने तबातोड़ फाइरिंग कर एटीएम से लाखों की लूट को दिया अंजाम

24-Sep-2020

पश्चिम बंगाल आसनसोल बर्नपुर के हिरापुर थाना अन्तर्गरत रिवरसाइड में अपराधियों ने तबातोड़ फाइरिंग कर लाखों की लूट कर हुए फ़रार।

 

Report:Abdul Kalam

Place:bengal

पश्चिम बंगाल आसनसोल बर्नपुर के हिरापुर थाना अन्तर्गरत स्टेट बैंक के एटीम में पैशे डालने गए भेन पर 3 अपराधियों ने अचानक से धाबा बोल दिया और तबातोड़ फायरिंग कर फरार हो गए इस घटना में एटीम में पैशे डालने गए बैंक स्टाफ मकसूद अली मल्लिक के हांथो में गोली लगी मकसूद अली आसनसोल के ही इस्लामपुर के रहने वाले आनन फानन में उनको आसनसोल के सदर अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया जहां उनकी इलाज चल रही है घटना के बाद से ही पुलिस ने अपराधियों को धर दबोचने के लिए जगह जगह नाकेबंदी कर जांच अभियान चला रही है


"तेज संवाद" कार्यक्रम में उमड़ा जन सैलाब। दूसरी बार किया रोड शो

23-Sep-2020

Report:Azad Idrisi

Place:Bihar

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बड़े पुत्र व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव अपने तेज संवाद कार्यक्रम के तहत मंगलवार को समस्तीपुर जिला के हसनपुर विधानसभा पहुंचे। तेजप्रताप दूसरी बार हसनपुर पहुंचे थे। तेज के रोड शो के बारे मे माना जा रहा है कि लालू के बड़े लाल तेज प्रताप यादव महुआ विधानसभा क्षेत्र के बजाय अब हसनपुर विधानसभा क्षेत्र से अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। जिसकी तैयारी को लेकर आज दूसरी बार हसनपुर पहुंचे थे। हसनपुर आने के दौरान जगह-जगह पर राजद समर्थकों के द्वारा तेज प्रताप यादव का स्वागत किया गया। वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उन्होंने हमला करते हुए कहा कि कहा कि रोजगार के नाम पर पलटू चाचा ने युवाओं को ठगने का काम किया है और नौजवानों ने रिपोर्ट कार्ड तैयार कर लिया है।


U.P में फिल्म सिटी बनाने को लेकर सीएम योगी ने बॉलीवुड से मांगे सुझाव

U.P में फिल्म सिटी बनाने को लेकर सीएम योगी ने बॉलीवुड से मांगे सुझाव

22-Sep-2020

Report:Saeed Naqvi

Place:Lucknow

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में फिल्म सिटी बनाने को लेकर बुलाई अहम मीटिंग शुरू हो चुकी है। सीएम अपने लखनऊ स्थित सरकारी आवास में फिल्म कलाकारों, निर्माता निर्देशकों, गीतकार, संगीतकार गायकों व लेखकों के साथ मीटिंग कर रहे हैं।

आपको बता दें कि सीएम के साथ जारी मीटिंग में सुपर स्टार रजनीकांत की बेटी सौन्दर्या रजनीकांत, निर्माता निर्देशक मधुर भंडारकर, अभिनेता प्रियदर्शन, रवीना टंडन, सुभाष घई, परेश रावल, गायक अनूप जलोटा, उदित नारायण, कैलाश खेर, लेखक विजयेंद्र प्रसाद, गीतकार मनोज मुन्तस्सिर शामिल हैं। इसके अलावा फिल्म उद्योग से जुड़े विनोद बच्चन, दीपक दल्वी, नितिन देसाई, ओम राउत, शैलेश सिंह, पदम कुमार भी मीटिंग में शामिल हैं।

इसके अलावा अनुपम खेर समेत कई अन्य फिल्मी हस्तियां वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए इस बैठक में शिरकत कर रहे हैं। यह सभी लोग फिल्म सिटी बनाने के लिए योगी सरकार को सुझाव दें रहे हैं। इस बीच नोएडा, यमुना एक्सप्रेस-वे व अथारिटी व ग्रेटर नोएडा ने अपने-अपने यहां फिल्म सिटी बनाने के लिए जमीन संबंधी ब्यौरा व प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेज दिया है। मुख्यमंत्री सबसे राय लेकर तय करेंगे कि कहां पर फिल्म सिटी बनाना उपयुक्त होगा। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की फिल्म सिटी संबंधी घोषणा का स्वागत किया है।

नोएडा के पास एक हजार एकड़ जमीन में नई फिल्म सिटी बसाने का प्रस्ताव
सीएम योगी आदित्यनाथ के फिल्म सिटी बनाने के ऐलान के बाद गौतमबुद्ध नगर जिले में एक और फिल्म सिटी बसाने की योजना तैयार की जा रही है। यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरण ने रविवार को दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस-वे पर यमुना सिटी के सेक्टर 21 में एक हजार एकड़ जमीन पर फिल्म सिटी बनाने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेज दिया है।


आसमान से जमीन पर गिरकर टुकड़े-टुकड़े हुआ हेलीकाप्टर, पायलट की मौत, अफरातफरी

आसमान से जमीन पर गिरकर टुकड़े-टुकड़े हुआ हेलीकाप्टर, पायलट की मौत, अफरातफरी

21-Sep-2020

Report:Mohd Usmani

Place:Azamgarh

आजमगढ़ जिले के सरायमीर स्थित कुशहा फरीदुनपुर में सोमवार की सुबह आसमान में उड़ रहा हेलीकाप्टर अचानक जमीन पर आ गिरा। इससे क्षेत्र में अफरातफरी मच गई। बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुट गए। सूचना मिलते ही पुलिस भी पहुंच गई। मौके से एक पायलट का शव भी मिला है। स्थानीय लोगों के अनुसार एक पायलट पैराशूट से नीचे कूदा था जो फिलहाल लापता है। पुलिस ने गांव वालों के सहयोग से शव को हटाया। वैसे तो हेलीकाप्टर गिरने की वहज खराब मौसम बताया जा रहा है। लेकिन जांच के बाद ही साफ हो पाएगा कि इसके दुर्घटनाग्रस्त होने की असल वजह क्या थी।

स्थानीय लोगों ने बताया कि सोमवार को मौसम काफी खराब था और आसमान में बादल छाए थेे। तेज बारिश की संभावना बन रही थी। तभी अचानक आसमान से गड़गड़ाता एक हेलीकाप्टर तेजी से नीचे की ओर आने लगा। लोगों ने बताया कि हेलीकाप्टर से एक व्यक्ति पैराशूट से नीचे कूदा जो संभवतः दूसरा पायलट रहा होगा। लोग कुछ समझ पाते तबतक जमीन से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो गया। गनीमत रही कि हेलीकाप्टर आबादी में न गिरकर खेत में गिरा। लोग भागकर मौके पर पहुंचे और राहत व बचाव कार्य में जुट गए। पायलट की मौत हो चुकी थी। गांव के लोगों ने ही पुलिस को भी सूचना दी। दूसरे व्यक्ति की तलाश ही जा रही है। हेलीकाप्टर कहां जा रहा था, कहां से आ रहा है इसका पता चलना बाकी है।


कोविड ने दिया हरित अर्थव्‍यवस्‍था बनाने का सुनहरा मौका: विशेषज्ञ

कोविड ने दिया हरित अर्थव्‍यवस्‍था बनाने का सुनहरा मौका: विशेषज्ञ

19-Sep-2020

दुनिया भर में पिछले कई महीनों से कोविड-19 महामारी ने पूरे विश्व को अस्थिर सा कर दिया है इससे दुनिया एक वैश्विक महामंदी के दौर की तरफ बढ़ रही है इसे रोकने के लिए अल्‍पकालिक और दीर्घकालिक दोनों ही तरह के कदम उठाने होंगे।

 

यह महामारी खासतौर पर भारत के लिए एक सुनहरा मौका भी लेकर आई है। मौजूदा हालात में बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था का सतत रूपांतरण किए जाने का अवसर है। हालांकि यह काम बहुत पहले ही शुरू करने की जरूरत थी। इसके लिए पर्यावरण के प्रति मित्रवत विकास योजना बनानी होगी, जिसमें अक्षय ऊर्जा को वरीयता दी जाए और प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन और उससे चलने वाली चीजों को हतोत्साहित करते हुए परिवहन के सतत विकल्पों को अपनाने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन हो।

 

कार्बन कॉपी ने शुक्रवार को इस सिलसिले में एक वेबिनार आयोजित किया, जिसमें विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए सतत आर्थिक भरपाई के तमाम अवसरों के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे।

 

इस वेबीनार में टेरी के निदेशक डॉक्टर अजय माथुर, सीपीआर-आईसीईई में प्रोफेसर और आईपीसीसी के कोऑर्डिनेटिंग लीड ऑथर नवरोज दुबाष, फिनलैंड की लप्‍पेरांता लाहती यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्‍नॉलॉजी के प्रोफेसर क्रिश्चियन ब्रेयर, ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्मिथ स्‍कूल आफ एंटरप्राइज एण्‍ड एनवॉयरमेंट के निदेशक कैमरन हेबर्न, क्‍लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला और इंडियास्‍पेंड के संस्‍थापक सम्‍पादक गोविंदराज एतिराज ने हिस्‍सा लिया।

 

वेबिनार में विशेषज्ञों ने कोविड-19 महामारी के कारण उपजे हालात में पहले से ही चिंता का कारण बने जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर सतत और सुरक्षित भविष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए आर्थिक भरपाई के उपाय सुझाये और इसकी राह में मौजूद चुनौतियों पर भी गहन विचार-विमर्श किया।

 

टेरी के महानिदेशक डॉक्‍टर अजय माथुर ने कहा कि भारत समेत पूरी दुनिया रिकवरी पैकेज के मामले में तीन चीजों पर ध्यान दे रही है। पहला, आर्थिक विकास, दूसरा ऐसा विकास जो रोजगार दे और तीसरा, टिकाऊ रोजीरोटी। सरकार के पास कृषि और एमएसएमई सेक्टरों के रूप में बेहतरीन अवसर हैं। इन दोनों विशाल क्षेत्रों के जरिये आर्थिक विकास के साथ—साथ रोजगार दिया जा सकता है। हमे अक्षय ऊर्जायुक्‍त भविष्‍य की तरफ बढ़ना सुनिश्चित करने के लिये ग्रीन इक्विटी सुनिश्चित करनी होगी। अगर आप कोल्ड स्टोरेज को ही देखें तो दो तिहाई अवशीतनगृह शहरी इलाकों में है, क्‍योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की स्थिति बहुत खराब है। इस स्थिति को बदलना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सतत ऊर्जा की उपलब्धता से आर्थिक विकास,, रोजगार और बेहतर जीवन मिलेगा। इस तरफ बढ़ने से हम इस ग्रीन इक्विटी को बेहतर तरीके से लाकर खुशहाल भविष्य बना सकते हैं।

उन्‍होंने कहा कि हमारे पास मौजूद अवसर बहुत संकरे हैं। हमें बहुत गहराई से ध्यान देना होगा, ताकि इनका पूरा फायदा उठाया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आने—जाने का कोई समय नहीं है। इससे पूरी कृषि व्यवस्था और उसके विपणन पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। अगर हम अक्षय ऊर्जा की तरफ जाते हैं तो इन समस्याओं से काफी हद तक निजात मिल सकती है। अंतर्राष्‍ट्रीय स्रोतों, घरेलू वित्‍तपोषण से आने वाली इक्विटी दरअसल क्रेडिट आधारित होनी चाहिये। हमें घरेलू फंडिंग का जरिया निकालना होगा, ताकि उसके एवज में फायदा हासिल हो।

डॉक्‍टर माथुर ने कहा कि वर्ष 2050 के लिये अभी से तैयारी करना अच्‍छी बात है लेकिन 2050 अभी 30 साल दूर है। इस पर ध्यान होगा कि हमें अभी क्या करना है। बिजली वितरण कम्‍पनियों की वित्‍तीय स्थिति खराब है। अगर उनकी खस्‍ताहाली जल्‍द दूर नहीं की गयी तो हो सकता है कि वे अक्षय ऊर्जा को खरीदना ही बंद कर दें। इसके अलावा हमें अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को रास आने वाली क्षमताओं को भी विस्‍तार देना होगा। साथ ही नये लोगों को प्रशिक्षण देने के अलावा नगरीय इलाकों और छोटे कस्‍बों में पहले से ही काम कर रहे कामगारों जैसे प्‍लम्‍बर और इलेक्ट्रिीशियन की क्षमताओं को भी बढ़ाना होगा।

सीपीआर-आईसीईई के प्रोफेसर और आईपीसीसी कोऑर्डिनेटिंग लीड ऑथर नवरोज दुबाष ने कहा ‘‘मेरा मानना है कि कोविड संकट भारत में बहुत लम्बे वक्त तक रहने वाला है। यह भारत के लिये गहरी आर्थिक क्षति लेकर आयी है जीडीपी में जबर्दस्त गिरावट इसकी गवाह है। इसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। इस बीच, अंतर्राष्ट्रीय विमर्श का केन्द्र अब भी अनिश्चितता से घिरा हुआ है। हालात को लेकर दुनियावी स्‍तर पर और भारत के स्‍तर पर भी आंतरिक विचार-विमर्श भी बेहतर नहीं हो रहे हैं। अनेक डिस्कनेक्ट्स हैं। हमें ऐसे अवसर देखने होंगे जो भरपाई के लिये जरूरी माहौल बनाएं, जिनसे रोजगार मिले। हमारे पास मौजूदा और दीर्घकालिक दोनों ही तरह की चुनौतियां हैं।

 

उन्‍होंने कहा ‘‘हम अल्पकालिक और दीर्घकालिक योजनाएं बनानी होंगी। ग्रिड से मिलने वाली बिजली का कोई भरोसा नहीं है लिहाजा हमें ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से कदम बढ़ाते हुए ‘प्रोडक्टिव पॉवर’ विकसित करनी होगी जिससे ऊर्जा उत्पादन को विकेंद्रित तरीके से बढ़ाया जा सके और प्रवासी श्रमिकों पर निर्भर रहने वाली अर्थव्यवस्था को संभाला जा सके। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के लिए वित्त आयोग द्वारा मंजूर की गई धनराशि को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हमें इसे अब बिल्कुल भी नहीं टालना चाहिए।’’

 

उन्‍होंने कहा कि इस लिहाज से बिजली सेक्टर बहुत दिलचस्प भूमिका में है। अक्षय ऊर्जा से ग्रामीण क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ेगी, जिससे भारत के बड़े हिस्से की तस्वीर बदल सकती है। दूसरी बात यह है हमें पहले से ही हिली हुई ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और खराब नहीं होने देना है। हमें खेती के पैटर्न (तर्ज) को बदलना होगा और क्षमताओं को बढ़ाना होगा। एग्रीकल्चर मार्केंटिंग के अलावा न्‍यूनतम परामर्शी मूल्‍य  (एमएसपी) प्रणाली को भी बदलना होगा। यह राजनीतिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है लेकिन हमें इसे करना होगा। हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है। हमें साथ ही दीर्घकालिक ढांचागत विकास के लिये भी गुंजाइश रखनी होगी।

लप्‍पेरांता लाहती यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्‍नॉलॉजी के प्रोफेसर क्रिश्चियन ब्रेयर ने कहा कि भविष्य में ऊर्जा की जरूरत बढ़ने वाली है। अक्षय ऊर्जा क्षेत्र से वर्ष 2050 तक 50 लाख रोजगार अवसर मिलेंगे। हम बिजली के लिये कोयले के बजाय हाइड्रोजन का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। इससे बहुत बड़े बाजार स्थापित होंगे। यह सस्ती बिजली का बेहतरीन विकल्प होगा। स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य और त्रुटिरहित क्रियान्वयन से ही हम दहलीज पर खड़े सौर युग में बहुत आगे जा सकते हैं और इसके बेशुमार फायदे ले सकते हैं। हम 2050 तक बिजली की सम्‍पूर्ण मांग को सतततापूर्ण तरीके से पूरा कर सकते हैं।

क्रिश्चियन ने उत्तर भारत में ग्रीन रिकवरी के लिए ऊर्जा रूपांतरण से संबंधित अपने अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 2050 तक उत्तर भारत 100 फीसद अक्षय ऊर्जा और ग्रीन हाउस गैसों के शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल कर सकता है और यह तकनीकी और आर्थिक दोनों ही तरीकों से मुमकिन है। वर्ष 2050 में ग्रीन हाउस गैसों को मौजूदा 825 एमटी CO2 इक्‍वेलेंट से घटाकर शून्य तक लाया जा सकता है। इससे वायु प्रदूषण में भी कमी लाने में मदद मिलेगी जो इस वक्त उत्तर भारत के ज्यादातर शहरों पर खतरा बनकर मंडरा रहा है।

 

उन्होंने कहा कि वर्ष 2050 में अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में सालाना करीब पांच लाख प्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा होंगे जिससे देश में बेरोजगारी के बढ़ते स्तर को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही 100 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा की प्रणाली ज्यादा भरोसेमंद और किफायती होगी। साथ ही इससे पेरिस समझौते के तहत तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने में भी आसानी होगी।

 

क्रिश्चियन ने कहा कि पूरे भारत में अनेक स्थानों पर अक्षय ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने की रफ्तार में तेजी आई है लेकिन उत्तरी ग्रिड क्षेत्र के कुछ राज्य अब भी इस दौड़ में पीछे हैं। उन्होंने दिल्ली का उदाहरण देते हुए कहा कि इस राज्य में इस वक्त कुल ऊर्जा उत्पादन मिश्रण में 98% हिस्सा जीवाश्म ईंधन, कोयले और गैस से बनने वाली बिजली का है जबकि बाकी सिर्फ दो फीसद हिस्सा सोलर पीवी तथा अन्य बायो एनर्जी का है।

क्रिश्चियन ने बताया कि वर्ष 2050 तक उत्तर भारत में 100% अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता होने से 50 लाख से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होंगे जो कि वर्तमान में जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली प्रणाली में रोजगार के 30 लाख अवसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। बिजली स्टोरेज की व्यवस्था वर्ष 2030 के बाद देश में रोजगार पैदा करने वाले शीर्ष क्षेत्रों में  शामिल होगी। संचालन और मेंटेनेंस के साथ-साथ ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में रोजगार के ज्यादा अवसर मिलेंगे। उन्होंने बताया कि वर्ष 2030 तक सोलर पीवी की आपूर्ति 40 प्रतिशत होगी जो 2050 तक बढ़कर 95 फीसद तक हो जाएगी। इसके साथ ही यह सबसे सस्ती बिजली का स्रोत बन जाएगी।

 

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्मिथ स्‍कूल आफ एंटरप्राइज एण्‍ड एनवॉयरमेंट के निदेशक कैमरन हेबर्न ने कहा कि वैश्विक स्तर पर एसिमेट्रिक (असममित) खर्च से भविष्य में उद्योग के स्वरूप में आमूलचूल बदलाव हो सकते हैं और प्रतिस्पर्धी लैंडस्केप का रूपांतरण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पुनर्निधारित प्रौद्योगिकियों और मंदी के कारण अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के प्रति दिलचस्‍पी में अचानक हुई बढ़ोत्‍तरी इसकी मुख्य वजह है। इसके अलावा आज किया गया निवेश भविष्य के बाजारों में प्रतिस्पर्धा के लिहाज से उल्लेखनीय फायदा दिला सकता है।

उन्होंने कहा कि स्वच्छ भौतिक मूलभूत ढांचे में निवेश, क्षमता निर्माण पर खर्च, शिक्षा और प्रशिक्षण पर निवेश, नेचुरल कैपिटल में निवेश और स्वच्छ अनुसंधान एवं विकास पर खर्च जैसी भरपाई संबंधी नीतियों से जलवायु संरक्षण और आर्थिक लक्ष्यों दोनों को ही हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा ऐसी भरपाई नीतियों से सामाजिक, पर्यावरणीय स्वास्थ्य तथा राजनीतिक लाभ भी मिल सकेंगे।

 

उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्तर पर प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन पर असर डाला है लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव कहीं ज्यादा बड़े हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि कोविड-19 संबंधी नीतियों की कामयाबी और नाकामी हमें यह सीखने का मौका देती है कि कैसे हम दीर्घकालिक जलवायु नीति और उसके क्रियान्वयन को बेहतर कर सकते हैं।

 

हेबर ने कहा कि यूरोपीय यूनियन क्लीन रिकवरी स्टिमुलस के तौर पर 400 अरब डॉलर का खर्च कर रही है। अगर इसका 50 फीसद हिस्सा भी खर्च हुआ तो यह दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा व्यय होगा।

 

महिला हाउसिंग सेवा ट्रस्‍ट की निदेशक बीजल ब्रह्मभट्ट ने इस मौके पर कहा कि आवासीय परियोजनाएं और बिजली की मांग एक-दूसरे से जुड़ी चीजें हैं। हमारा संगठन सरकार की मदद से सस्ते मकानों की उपलब्‍धता की तरफ ध्यान दे रहा है ताकि लोग झुग्‍गी-झोपड़ी से निकलकर पक्के घर में आ सकें। इससे बिजली की मांग भी बढ़ेगी। देश में कोयले से चलने वाले बिजलीघर खुद नुकसान से घिरे हैं और अक्षय ऊर्जा विकल्‍पों की बढ़ती मांग ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। बहरहाल, अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ता रुझान सतत भविष्‍य के लिये बेहत अच्‍छा संकेत है।

उन्‍होंने कहा कि देश में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में अच्‍छा काम जरूर हो रहा है लेकिन इसमें और तेजी लाये जाने की जरूरत है। नीतियों को जमीन पर लागू किया जाना चाहिये। जब ऐसा होता है, तभी उसकी सार्थकता होती है।


रिहाई मंच ने पूर्वांचल सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप की गिरफ्तारी पर उठाया सवाल, तत्काल रिहा करे योगी सरकार

रिहाई मंच ने पूर्वांचल सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप की गिरफ्तारी पर उठाया सवाल, तत्काल रिहा करे योगी सरकार

18-Sep-2020

पूर्वांचल के दलित कार्यकर्ता धीरेन्द्र प्रताप और उनके भाई योगेंद्र प्रताप को बीती रात 2 बजे पुलिस ने उठाया, परिवार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित

Report:Saeed Naqvi

Place:Lucknow

लखनऊ 18 सितम्बर 2020. पूर्वांचल सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्वांचल में दलित उत्पीड़न के खिलाफ सक्रिय दलित कार्यकर्ता धीरेन्द्र प्रताप और उनके भाई योगेंद्र प्रताप को कल बीती रात उ. प्र, पुलिस ने उठा लिया।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि वरिष्ठ बुद्धिजीवी सिद्धार्थ रामू ने बताया है कि जब उनके पिता रामगुलाम भारती कैंट थाना गए और अपने बेटों के बारे में पूछा कि वे कहां हैं और उन्हें कहा ले जाया गया है, तो पुलिस का कहना है कि हमें नहीं पता है पुलिस ने उन लोगों को उठाया है कि नहीं? और वे कहां हैं।

परिवार और संगठन के सदस्यों को आशंका है कि पुलिस उनका इनकाउंटर कर सकती है।

पूर्वांचल सेना का गठन 2006 में हुआ था। तब से यह संगठन दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ कार्य कर रहा है। इसके छात्र विंग का नाम असुर।

सिद्धार्थ रामू ने असुर के गोरखपुर जिला अध्यक्ष मंजेश से बात की तो उन्होंने बताया कि पुलिस कुछ भी बता नहीं रही है।

गौरतलब है कि चंद दिनों पहले गोरखपुर के गांव कुसमौल में प्रधान विवेकशाही द्वारा भावी प्रधान प्रत्याशी सोनू जाटव को भद्दी-भद्दी गालियां दी गई थीं। इसके खिलाफ पूर्वांचल सेना और धीरेंद्र ने मोर्चा खोल दिया था और पुलिस को बाध्य होकर  प्रधान के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट लगाना पड़ा था, लेकिन प्रधान की गिरफ्तारी नहीं हुई और उसने बाद में पुलिस के सामने दलित टोले में जाकर दलितों को गालियां दी और पुलिस मूकदर्शक देखती रही। इसके वीडियो भी है।

धीरेंद्र लगातार अपने साथियों के साथ विवेक शाही की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे।

द्वारा-

राजीव यादव

महासचिव, रिहाई मंच

9452800752


भारी बारिश के कारण गिरी दीवार/ छात्रा की मौत

भारी बारिश के कारण गिरी दीवार/ छात्रा की मौत

18-Sep-2020

Report:Abdul kalam

Place: Bengal
पश्चिम बंगाल में देर रात से ही रुक रुक कर हो रही लगातार मुश्लाधार बारिश के कारण दुर्गापुर के उखड़ा इलाके में स्थित दीवार गिरने के कारण उससे कुचलकर एक छात्रा की मौत हो गई।घटना गुरुवार  अंडाल के खान्द्रा गांव में बख्शीपाड़ा में हुई। मृतक की पहचान  सौमी मजुमदार(14) के रूप में हुई।बताया जाता है कि  गुरुवार रात डेढ़ बजे से इलाके में बारिश होने लगी। उस समय सोमनाथ मजुमदार परिवार के अन्य सदस्यों के साथ घर पर सो रहे थे। लगभग 2 बजे, भारी बारिश के कारण, एक जीर्ण-शीर्ण दीवार सोमनाथ बाबू के घर की छत की छत पर गिर गई। घर में सो रही बेटी सौमी मजुमदार पर दीवार  ढह गयी। जिसमें दबने से उसकी मौत हो गयी। घटना में सोमनाथ बाबू और उनकी पत्नी संकिता मजुमदार घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। सोमनाथ  ने कहा कि मृतक सौमी खान्द्रा स्कूल में सातवीं की छात्रा थी। लोगों का आरोप है कि वहां दो परिवार के बीच झगड़े के कारण कई टूटी हुई दीवारों को लंबे समय के लिए छोड़ दिया गया है। उन्होंने मांग की कि उन दीवारों को तुरंत ध्वस्त कर दिया जाए।


नीलांजना की तलाश में आसनसोल पहोंची बांकुड़ा की सुप्रिया

नीलांजना की तलाश में आसनसोल पहोंची बांकुड़ा की सुप्रिया

18-Sep-2020

पोकेट में 500 रुपए लेकर किया 58 किलोमीटर का सफर तय/अपनी दोस्त नीलांजना की खराब आंखों को ठीक करने के लिए दान देना चाहती हैं सुप्रिया 150 रुपए खत्म होने के बाद भी नही टूटी है अपनी जान से भी प्यारी दोस्त को ढूंढने की आस

Reprot:Abdul Kalam

Place:Bengal

पश्चिम बंगाल आसनसोल के रेलवे स्टेशन के बाहर लोगों से पूछती और अपनी जिगरी दोस्त की खोज खबर लेती सुप्रिया को देख और उससे मिलने की बेचैनी को देख भले ही लोग उसे पागल समझे पर इस पागल पंती के पीछे की जो कहानी है उस कहानी को जान आप भी हैरान और परेशान हो जाएंगे जी हां कडकों की तरह दिखने वाली उनके तरह भेष भूषा में रहने वाली इस युवती का नाम है सुप्रिया बैनर्जी -सुप्रिया बैनर्जी बांकुड़ा जिले के छतना की रहने वाली है सुप्रिया को कुछ वर्ष पहले ही फ़ोन पर बर्दवान के काटवा की रहने वाली किसी नीलांजना दास से दोस्ती हो गई इन दोनों की दोस्ती फोन पर कुछ इस कदर आगे बढ़ी के दोनों एक दूसरे से बे इम्तिहां प्यार भी करने लगी हालांकि इन दोनों ने एक दूसरे को कभी नही देखा पर फोन के जरिए ये दोनों एक दूसरे के संपर्क में हैं फोन के जरिए ही ये दोनों एक दूसरे से अपनी दिल की हर बातें करती हैं एक दूसरे के सुख दुख के हिंस्सा भी बनती हैं एक दूसरे पर बिना कभी मिले जान भी छिड़कती हैं यही कारण है के जब सुप्रिया को मालूम चला के उसकी जान से भी प्यारी दोस्त नीलांजना की एक आंख में समस्या है और वो उस आंख से सही तरीके से देख नही सकती तो सुप्रिया बिना किसी की परवाह किए बिना किसी की फिक्र किए अपना घर छोड़ अपनी दोस्त को अपनी आंखें दान करने निकल पड़ी है और राह चलते लोगों को अपनी दोस्त का फोटो दिखाकर उसके पास काटवा  पहोंचा देने की गुहार लगाती दिखाई दे रही है पर अपने-अपने जिंदगी में मग्न लोगों के पास इतना समय कहाँ के सुप्रिया की आवाज उनके कानों तक पहोंच सके या फिर कोई उनकी मदद कर सके  सुप्रिया की अगर माने तो वो घर से 500 रुपए लेकर अपनी दोस्त के पास जाने के लिए निकली थी उन पैसों में से करीब 150 रुपए खर्च हो चुके हैं अब मात्र 350 रुपए ही बचे हैं पैशे खत्म होने से पहले उसको अपने दोस्त तक पहोंचना है अगर पैशे खत्म हो गए तो वो कभी भी अपने दोस्त तक नही पहोंच पाएगी और ना ही वो उसकी कोई मदद ही कर पाएगी हालांकि कुछ लोगों ने उसे आसनसोल के साउथ थाने का पता बता दिया और ये कहा के उसको थाने से मदद मिल सकती है वो थाने से संपर्क करे लोगों के कहने पर सुप्रिया साउथ थाना पहोंच अपनी दोस्त से मिलाने की गुहार थाने के अधिकारियों से लगा रही है


क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब कम होने लगी है? आखिर सहयोगी दल क्यों छोड़ रहे हैं भाजपा का साथ? - प्रकाशपुन्ज पाण्डेय

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब कम होने लगी है? आखिर सहयोगी दल क्यों छोड़ रहे हैं भाजपा का साथ? - प्रकाशपुन्ज पाण्डेय

18-Sep-2020

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समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने देश के ताज़ा राजनीतिक हालात पर अपने लेख द्वारा मीडिया के माध्यम से देश की जनता से एक बड़ा प्रश्न किया है कि, 'क्या मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी आई है?' 
प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि 2014 के बाद से जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी देश में राजनीति के महानायक के रूप में उभरे थे, वह पूरे विश्व में देखा। भारत की 137 करोड़ जनता में से अधिकांश लोगों ने उन्हें अपने सर आंखों पर बिठाया और उनका चेहरा देखते हुए भारतीय जनता पार्टी को 2014 और उसके बाद 2019 में भी अपार बहुमत से देश के लोकसभा चुनाव में विजय कराया और 2014 के बाद 2019 में दोबारा नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। भारत गणराज्य का प्रधानमंत्री बनना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है लेकिन साथ ही उसने ही बड़ी ज़िम्मेदारी भी है, क्योंकि 137 करोड़ आबादी वाले इस देश में विभिन्न जातियों, विभिन्न धर्म समुदायों, विभिन्न वर्गों और विभिन्न क्षेत्रों में रहते हैं। यहां बोली - भाषा - विचार - खान-पान - सोच, हर चीज़ एक दूसरे से अलग है फिर भी भारत एक है। इसीलिए ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी थी। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि 2020 आते-आते भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कि एक लोकप्रिय और सर्वस्वीकार्य नेता हैं, उनकी लोकप्रियता घटती जा रही है। यह सब ने देखा है कि वर्ष 2019 के चुनाव से पहले भी भारतीय जनता पार्टी के बहुत से सहयोगी दलों ने एनडीए का साथ छोड़ दिया। 
प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि छोटी मोटी पार्टियों के साथ ही बड़ी पार्टियों ने भी भारतीय जनता पार्टी का साथ समय-समय पर छोड़ा जैसे तेलुगू देशम पार्टी हो उसके बाद पीडीपी हो या शिवसेना हो या फिर कोई और पार्टी। इसका क्या कारण है? यह जानना जरूरी है। आज एक और खबर आ रही है की केंद्रीय मंत्री और शिरोमणि अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है। यह किस ओर इशारा कर रहा है। यह जानना ज़रूरी है। लोगों की माने तो भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष नेतृत्व और सहयोगी दलों में वार्तालाप की कमी साफ़ दिखाई देती है। सूत्र बताते हैं कि अपने अहंकार के चलते वे लोग किसी की बातें समझना तो दूर सुनना भी पसंद नहीं करते हैं। शायद यही कारण था कि भारतीय जनता पार्टी के भी बहुत से नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी, तो सहयोगियों के क्या कहने! हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के कई बड़े नेताओं की वर्चुअल मीटिंग जो की यूट्यूब पर लाइव होती थी उसमें भी लाइक (पसंद) से ज्यादा अनलाइक (नापसंद) आए हैं। मतलब कि युवाओं ने भी नरेंद्र मोदी को अब अपनी राय बता दी है। 
प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि असल बात यह है कि मोदी जी को जितना इस देश की जनता ने प्यार दिया था वह इसलिए दिया था कि वह देश में जिन वादों के साथ चुनाव में आए थे उन वादों को पूरा करें। लेकिन ना दो करोड़ रोज़गार प्रतिवर्ष मिले, न 15 लाख रुपये प्रत्येक व्यक्ति के खाते में आए, न 50 दिनों में नोटबंदी से देश उबर पाया, ना जीडीपी में बढ़ोतरी हुई, उल्टा ऐतिहासिक स्तर पर गिर गई, न ही जीएसटी के नियमों को सुचारू रूप से लागू किया गया, ना ही  महंगाई पर काबू पाया जा सका  ना ही आप की विदेश नीति सही रही उल्टा पड़ोसी राज्यों से हमारे देश के रिश्ते खराब होते चले गए  नाही सीमा पर  हमने  काबू पाया नाही आतंकवाद और नक्सलवाद पर हमने काबू पाया  ना ही शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुई तरक्की की  और उसके बाद कोरोना काल के बाद देशव्यापी लॉकडाउन में न ही देश ने 21 दिनों पर कोरोना पर विजय हासिल की। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने भी यह खुलासा किया कि अन्ना आंदोलन भी एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था जिसके कारण यूपीए की सरकार को गिराया जा सके। क्योंकि अन्ना हजारे को अब देश में कोई कमी नजर नहीं आती और उस समय बहुत तेजी से उभरे स्वामी रामदेव को भी अब देश में कोई भ्रष्टाचार या काला धन दिखाई नहीं देता। यह बहुत बड़ी विडंबना है। 
प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने अंत में कहा कि अब देश की जनता को "सत्याग्रह, आत्मनिग्रह और आत्मचिंतन" करने की आवश्यकता है, क्योंकि सरकारें तो आएंगीं और जाएंगीं, पर यह देश हमेशा विजय पथ पर चलते रहे यही हम सभी भारतीयों की आशा है। 
 प्रकाशपुन्ज पाण्डेय, राजनीतिक विश्लेषक, रायपुर, छत्तीसगढ़ 
7987394898, 9111777044

 

 


कॉंग्रेश ने पकौड़ा तल मनाई PM नरेंद्र मोदी का जन्मदिन

कॉंग्रेश ने पकौड़ा तल मनाई PM नरेंद्र मोदी का जन्मदिन

17-Sep-2020

देश मे बढ़ती बेरोजगारी का दिलाया याद

 

Report:Abdul kalam

Place:bengal

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में आज कोंग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देश मे बढ़ती बेरोजगारी का अहसास दिलाते हुवे बीच सड़क पर पकौड़ा तल राह चलते लोगों को खिलाकर एक अनोखे आंदोलन की शुरुआत की और ये कहा के केंद्र की मोदी सरकार पूरे देश में बेरोजगारी को बढ़ावा दे रही है के देश के पढ़े लिखे युवा डॉक्टर,इंजीनियर,न बनकर पकौड़ा तल अपना रोजगार करें प्रधानमंत्री की ये सोंच अब देश के युवा वर्ग को कुछ इस कदर अपमानित कर रही है के अब देश के युवा अपने PM व उनके नीतियों के खिलाफ जोरदार आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं यही कारण है के उन युवाओं की आवाज बनकर अब कौंग्रेस केंद्र की नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतर आंदोलन करने को विवश हो गई है


सुशांत की माँ की मूर्ति बनाने वाले मूर्तिकार ने कहा वो सुशांत के कितने बड़े थे फैन

सुशांत की माँ की मूर्ति बनाने वाले मूर्तिकार ने कहा वो सुशांत के कितने बड़े थे फैन

17-Sep-2020

Report:Abdul kalam

Place:Bengal

पश्चिम बंगाल आसनसोल के रहने वाले मूर्तिकार सुशांत राय ने अपने जीवन मे कई मूर्तियां बनाई पर उन्होंने उन तमाम मूर्तियों में एक ऐसी मूर्ति बनाई जिस मूर्ति की प्रसंसा करते वो नही थकते जी हां हम बात कर रहे हैं सुशांत सिंह राजपूत की जो देश की अभी सबसे बड़ी अनसुलझी मिस्ट्री है एक ऐसी मिस्ट्री जो सुलझने के वजाए दिन प्रतिदिन उलझती ही जा रही है और इस मामले ने पूरी देश की जनता का धयान अपनी तरफ खींच लिया है देश की जनता हर दिन हर समय और हर एक लम्हा ये जानना चाहती है के आखिरकार सुशांत सिंह की मौत का राज है क्या पर इस बीच ही पश्चिम बंगाल आसनसोल के रहने वाले मूर्तिकार सुशांत राय की अगर माने तो वो फ़िल्म एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के फिल्मों के खूब दीवाने थे उनकी फिल्में देखना उनकी फिल्मों के गाने सुनना उनको बहोत पसंद था यही कारण था के वो उनके बहोत बड़े फैन हो चुके थे उनका ये मानना है के सुशांत के हर एक किरदार में उन्हें उनकी अपनी जिंदगी में कुछ सीखने को मिलता था जिससे वो प्रेरणा तो लेते ही थे साथ ही वो अपने परिवार के सदस्यों को भी देते थे पर सुशांत की मौत की खबर ने उन्हें अंदर से झंकझोर कर रख दिया और वो शिल्पिकार सुशांत उदास हो गए मानो उनकी जीवन मे अंधेरा छा गया हो फिल्मों के जरिए उनको उनके जीवन मे मार्ग दर्शन देने वाला उनका वो चहिता हीरो अब वो उनको हमेशा -हमेशा के लिए छोड़कर जा चुका था पर शिल्पीकार सुशांत के परिजनों ने उनका होंसला बढ़ाया और उनको हिम्मत दी परिजनों ने उनसे ये कहा के अन्य बड़ी हस्तियों के साथ -साथ वो अपने चहिते हीरो सुशांत सिंह का भी एक मूर्ति बनाएं जो मूर्ति उनके जीवन मे सुशांत सिंह की कमी को दूर करेगी और उनके जीवन मे उसी प्रकार ऊर्जा भरेगी जैसे के वो अपने जीवन काल मे अपने फिल्मों के जरिए उन्हें देते थे परिजनों के कहने पर शिल्पिकार सुशांत ने अपने हीरो सुशांत का मोम की मूर्ति बना डाली और अब वो जब भी खुदको अकेला पाते हैं वो सुशांत की मूर्ति के पास आकर उनसे बाते करते हैं उनसे सिख लेते हैं शिल्पिकार सुशांत ने कहा के वो इस मूर्ति को हमेशा हमेशा के लिए अपने घर मे बने म्यूजियम में रखेंगे और देखभाल करेंगे अगर उनके परिजन उनसे कहेंगे तो वो उनके लिए उनकी मूर्ति बनाकर भेंट करेंगे


खैरागढ़ : लेखापाल कुलदीप झा एवं सी एम ओ नगरपालिका सीमा बक्सी द्वारा लाखों रुपये का रिश्वत लेकर पदोन्नति किये जाने का मामला हो रहा उजागर ।

खैरागढ़ : लेखापाल कुलदीप झा एवं सी एम ओ नगरपालिका सीमा बक्सी द्वारा लाखों रुपये का रिश्वत लेकर पदोन्नति किये जाने का मामला हो रहा उजागर ।

17-Sep-2020

नितिन कुमार भांडेकर :―
(9589050550)

खुलासपोस्ट  अपने स्वाभाव के मुताबिक खोजी पत्रकारिता करता है और हमेशा बड़े खुलासे   के  लिए पहचाना जाता है!

राजनांदगांव / खैरागढ़ ।  हाल ही के कुछ महीनों से नगरपालिका  खैरागढ़ पर जल आवर्धन पर लाखों  रुपये के भ्रस्टाचार का आरोप नगर पालिका के ही उपाध्यक्ष ने लगाया था जिसकी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं प्रिंट अखबारों ने प्रमुखता से ख़बर प्रकाशन की थी । वहीं इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने भी विधान सभा सत्र में इस मामले पर ध्यानाकर्षण करवाया था जिसकी गूंज छत्तीसगढ़ के विधानसभा तक में गूंजी थी ।  जिसे पूरा प्रदेश ने देखा ,  सुना और पड़ा था । यह मामला शांत हुवा नहीं था कि अब उक्त पालिका पर एक और आरोप लग रहे हैं , जी हां ,  आपको बता दें की उक्त पालिका में कार्यरत लेखापाल कुलदीप झा ने  भृत्य पीयूष चन्द्रयदु से  ग्रेड 3 ( क्लर्क )के पद पर पदोन्नत करने हेतु दुर्ग के चयन समिति में अपना तगड़ा सेटिंग का जाल फेंक कर इनसे  एक लाख रुपये की रिश्वत माँग ली , जिस पर उक्त भृत्य यदु ने झा को एक लाख रुपये इस शर्त पर दे दी थी की ताकि इन्हें भृत्य से क्लर्क के पद पर ही पदोन्नत किया जा सके ।  परन्तु इन्हें  सहायक राजस्व निरीक्षक का पद पदोन्नत कर थमा दिया गया ।     
 खैर नगरपालिका खैरागढ़  जो आज कल  अपने अच्छे कार्यों के लिये नहीं बल्कि भ्रष्ट आचरण एवं आर्थिक अनियमितता के लिए शुमारी लिए बैठा है। जो इनके लिए अब कोई नई बात नहीं है  । 


      


   कहते हैं  बेवज उंगली नहीं उठती कहीं न कहीं मामला गड़बड़ होता है तभी आरोप लगते हैं । हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के एकमात्र ऐसे तहसील की जो पूरे एशिया में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है जहाँ पर देश एवं विदेश से युवा वर्ग अध्ययन करने यहाँ पर आते हैं । 
          नगर  पालिका के लेखापाल कुलदीप झा ने कर्मचारियों से लाखों रुपये लेकर उन्हें पदोन्नति का वादा किया था और अपने किये हुए वादे को निभाया भी , पर एक कर्मचारी को उनके मन मुताबिक पदोन्नति करने में वह असफल हो गए । जो अब उनके गले की हड्डी बनते नजर आ रही है । अपने साथ पदोन्नती में हुए अन्याय से असंतुष्ट कर्मचारी ने नाराजगी जाहिर करते हुए पालिका के कुछ जिम्मेदार लोंगों से बात की , जैसे मनराखन देवांगन सभापति नगरपालिका , पी आई सी के बैठक में अनुपस्थित रहे भाजपा पार्टी के नगरपालिका उपाध्यक्ष रामाधार रजक , जहाँ पर पदोन्नति में हुए घोटाले का सभी राज अपने मुंह से उगल डाली जो शहर में अब आग की तरह धीरे धीरे फैल रही है । मामले की जानकारी मीडिया को भी लगी जिसकी सच्चाई जानने मीडिया ने अपने विवेक से पड़ताल कर सबूत इक्कठा करना प्रारंभ कर दिया तथा  पीयूषचन्द्र यदु नाम के कर्मचारी को मोबाइल से मामले की हकीकत पूछी गयी। जहां पर उन्होंने फोन पर  लेखापाल कुलदीप झा एवं सी एम ओ सीमा बक्सी को इस पदोन्नति के रिस्वत कांड का अहम भूमिका निभाने वाला किरदार बताया और साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उसने एक लाख रुपये  सहायक ग्रेड 3 में पदोन्नति हेतु दिया है किंतु उनकी पदोन्नति सहायक राजस्व निरीक्षक के पद पर कर कर दी गयी जिससे वह असंतुष्ट हैं एवं  इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए आपत्ति दर्ज कराई है । हमने इस मामले पर और भी बात की जिस पर उन्होंने बताया  की उन्हें 17 से 18 अगस्त तक के गुमराह करके रखा गया था कि उन्हें क्लर्क के पद पर पदोन्नत किया जा रहा है यहां तक के पी आई सी के बैठक होने के पूर्व तक के भी उन्हें भरोसा दिलाया गया था , पर जब पदोन्नत की सूची जारी हुई तो सूची में उन्हें सहायक राजस्व निरीक्षक के पद पर पदोन्नत कर दिया गया जिसे देख कर इनका चेहरा मुरझा सा गया । जिसका यदु जी ने कुलदीप झा को  विरोध दर्ज करवाते हुए। पैसे वापस करने की मांग की जिस पर झा के द्वारा वापस करने की बात कही जा रही है । भृत्य ने कहा है कि मैंने दिया है उसने लिया है और यह सच है । एक लाख रुपये का रिश्वत लेकर भी बाबू नहीं बनाने पर भृत्य कर्मि ने मीडिया को बताया कि वह अपने भाई रिंकू से इस मसले पर और  सलाह लेगा की आगे इस पर क्या करना है। हमने पूरी जांच पड़ताल , कर सारी बातें खबर प्रकाशन हेतु रिकॉर्ड कर ली जो सबूत के तौर पर भविष्य में अधिकारियों के जांच में एवं खबर के प्रकाशन में सहायक होगी।    
  
 नगरपालिका उपाध्यक्ष खैरागढ़  रामाधार रजक (भाजपा)  :-----   उपाध्यक्ष ने उक्त मामले को जिला  कलेक्टर से शिकायत करने की बात कही है । उन्होंने बताया कि जल आवर्धन में हुए हाल ही में भ्रस्टाचार की उन्होंने उच्च स्तर पर शिकायत की थी जिसकी जांच हेतु आज दिनाँक 31 अगस्त को जिला कलेक्टर राजनांदगांव द्वारा गठित जांच टीम की जानकारी मुझे उक्त जिला कार्यालय से पत्र के माध्यम से प्राप्त हुई है । जिसमें आगे जांच होने पर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। ये मामला अभी गरम ही था कि अब एक और नया भ्रष्टाचार का मामला नगर पालिका खैरागढ़ का प्रकाश में आया है । जिसमें पालिका में पदस्थ एक भृत्य का पत्रकार के साथ हुई बात चीत का ऑडियो वायरल हो रहा है जिसमें भृत्य ने पत्रकार से फोन पर बात करते हुए जानकारी देते हुए स्वीकार किया है कि उसने पालिका के लेखापाल कुलदीप झा को  पदोन्नति हेतु एक लाख रुपये की रिश्वत दी है जिस बात को वो ऑडियो में बेहिचक कुबूल कर रहा है।  लाख रुपये देने के बाउजूद भृत्य कर्मी का पदोन्नति  संतुष्टि पूर्ण नहीं हुवा है । जिस पर उसने संबंधित लेखापाल  को फोन लगाकर पैसे वापस करने की बात को भी बता रहा है । नियमतः यह गलत है इनके द्वारा खुलेआम भ्रस्टाचार किया गया है  । जो आपके साथ बात किये आडियो से पता चल रहा है । मैं भांडेकर जी आपको धन्यवाद देता हूँ कि हमारे खैरगढ़ में आपके जैसे खोजी एवं प्रतिभा के धनी पत्रकार हैं जो अन्याय एवं भ्रस्टाचार के विरुद्ध निरंतर लेख लिख रहे हैं । आपको इसकी जानकारी मिलते ही

 

 


16 अक्तूबर से खुलेगी भारत नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा

16 अक्तूबर से खुलेगी भारत नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा

16-Sep-2020

Report:Saeed Naqvi

Place:Lucknow

भारत नेपाल की प्रमुख अंतराष्ट्रीय सीमा को 16 अक्तूबर से नेपाल सरकार ने खोलने का फैसला किया है। मंगलवार की देर शाम कैबिनेट की बैठक के फैसले की घोषणा करते हुए विदेश मंत्री एवं प्रवक्ता प्रदीप ग्यावली ने कहा कि नेपाल में 16 अक्तूबर से पर्यटकों के प्रवेश के लिए खोलने का निर्णय लिया गया है।

विदेश मंत्री ने कहा कि नेपाल आने वाले पर्यटकों को स्वास्थ्य संबंधी मानकों को पूरी तरह अपनाना होगा। वहीं सरकार ने शिक्षण संस्थानों को बंद करने, परीक्षाओं, सेमिनारों, प्रशिक्षण और खेल गतिविधियों को अगली सूचना तक बंद करने का निर्णय लिया है।

साथ ही सभी प्रकार के प्रदर्शन सभा, सिनेमा हॉल, डांस बार, सार्वजनिक स्थान, सैलून, ब्यूटी पार्लर, मसाज और स्पा सेंटर, स्विमिंग पूल, जिम, ग्रुप गेम्स, फील्ड गेम्स, अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रशिक्षण, सभी प्रकार के धार्मिक क्षेत्र, चिड़ियाघर और पुस्तकालय अगले निर्णय तक बंद रहेंगे।

रूपनदेही जिले के नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री गुलजारी यादव ने बताया कि सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की समस्याओं से पार्टी के नेताओं को अवगत कराया गया था। जिसके बाद कैबिनेट की बैठक में 16 अक्तूबर से सोनौली सहित दस प्रमुख सीमा से आवागमन सुचारू करने का फैसला सरकार द्वारा लिया गया है।


हिन्दी के बिना देश की तरक्की अधूरी

हिन्दी के बिना देश की तरक्की अधूरी

15-Sep-2020

- ललित गर्ग-

प्रत्येक 14 सितबंर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। देश की आजादी के पश्चात 14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई और आज इस दिवस की अधिक प्रासंगिकता क्यों उभर रही है? क्योंकि हमारे देश में दिन-प्रतिदिन हिंदी की उपेक्षा होती जा रही है, हिन्दी पर अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नही है जब हिन्दी हमारे अपने ही देश में विलुप्तता के कगार पर पहुंच जायेगी। जबकि हिन्दी राष्ट्रीयता की प्रतीक भाषा है, उसको राजभाषा बनाने एवं राष्ट्रीयता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठापित करना हिन्दी दिवस की प्राथमिकता होना ही चाहिए।

हिंदी को दबाने की नहीं, ऊपर उठाने की आवश्यकता है। हमने जिस त्वरता से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में पहल की, उसी त्वरा से राजनैतिक कारणों से हिन्दी की उपेक्षा भी है, यही कारण है कि आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। राष्ट्र भाषा सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। भारत का परिपक्व लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता, समृद्ध संस्कृति तथा अनूठा संविधान विश्व भर में एक उच्च स्थान रखता है, उसी तरह भारत की गरिमा एवं गौरव की प्रतीक राष्ट्र भाषा हिन्दी को हर कीमत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में स्कूलों, काॅलेजों, अदालतों, सरकारी कार्यालयों और सचिवालयों में कामकाज एवं लोकव्यवहार की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिलना चाहिए।
महात्मा गांधी ने अपनी अन्तर्वेदना  प्रकट करते हुए कहा था कि भाषा संबंधी आवश्यक परिवर्तन अर्थात हिन्दी को लागू करने में एक दिन का विलम्ब भी सांस्कृतिक हानि है। मेरा तर्क है कि जिस प्रकार हमने अंग्रेज लुटेरों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया, उसी प्रकार सांस्कृतिक लुटेरे रूपी अंग्रेजी को भी तत्काल निर्वासित करें।’ लगभग सात दशक के आजाद भारत में भी हमने हिन्दी को उसका गरिमापूर्ण स्थान न दिला सके, यह विडम्बनापूर्ण एवं हमारी राष्ट्रीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है। गतदिनों उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू ने हिन्दी के बारे में ऐसी ही बात कही थी, जिसे कहने की हिम्मत महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया में ही थी। उन्होंने कहा कि ‘अंग्रेजी एक भयंकर बीमारी है, जिसे अंग्रेज छोड़ गए हैं।’’ आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है। वैंकय्या नायडू का हिन्दी को लेकर जो दर्द एवं संवेदना है, वही स्थिति सरकार से जुडे़ हर व्यक्ति के साथ-साथ जन-जन की होनी चाहिए। हिन्दी के लिये दर्द, संवेदना एवं अपनापन जागना जरूरी है। कोई भी देश बिना अपने राजभाषा के ज्ञान के तरक्की नहीं कर सकता है। लोगांे को समझना होगा की अंग्रेजी बस एक विदेशी भाषा है ना कि तरक्की पर्याय, इसके विपरीत हिंदी हमारी अपनी भाषा है जिसे हम और भी सरलता से समझ सकते हैं। हम अपने इन छोटे-छोटे प्रयासों द्वारा समाज में बड़े परिवर्तन ला सकते हैं, जो आने वाले समय में हिंदी के विकास में अपना महत्वपूर्ण स्थान दे सकता है। राष्ट्रभाषा को प्रतिष्ठापित करने एवं सांस्कृतिक सुरक्षा के लिये अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने व्यापक प्रयत्न किये। सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा और आगरा के सांसद सेठ गोविन्ददासजी ने अंग्रेजी के विरोध में अपनी पद्मभूषण की उपाधि केन्द्र सरकार को वापिस लौटा दी। वर्तमान में हिन्दी की दयनीय दशा देखकर मन में प्रश्न खड़ा होता है कि कौन महापुरुष हिन्दी को प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करेगा? हिन्दी राष्ट्रीयता एवं राष्ट्र का प्रतीक है, उसकी उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है जिससे छांटने के लिये ईमानदार प्रयत्न करने होंगे। क्योंकि हिन्दी ही भारत को सामाजिक-राजनीतिक-भौगोलिक और भाषायिक दृष्टि से जोड़नेवाली भाषा है।
कुछ राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सीधा करने के लिये भाषायी विवाद खड़े करते रहे हैं और वर्तमान में भी कर रहे हैं। यह देश के साथ मजाक है। जब तक राष्ट्र के लिये निजी-स्वार्थ को विसर्जित करने की भावना पुष्ट नहीं होगी, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उन्नयन एवं सशक्त भारत का नारा सार्थक नहीं होगा। हिन्दी को सम्मान एवं सुदृढ़ता दिलाने के लिये केन्द्र सरकार के साथ-साथ प्रांतों की सरकारों को संकल्पित होना ही होगा। नरेन्द्र मोदी ने विदेशों में हिन्दी की प्रतिष्ठा के अनेक प्रयास किये हैं, लेकिन उनके शासन में देश में यदि हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं किया जा सका तो भविष्य में इसकी उपेक्षा के बादल घनघोर ही होंगे, यह एक दिवास्वप्न बनकर रह जायेगा। हाल में कर्नाटक एवं तमिलनाडू में हिन्दी विरोध की स्थितियां उग्र बनी। हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी दक्षिण भारत में इसकी इतनी उपेक्षा क्यों? क्षेत्रीय भाषा के नाम पर हिन्दी की अवमानना एवं उपेक्षा के दृश्य उभरते रहे हैं, लेकिन प्रश्न है कि हिन्दी को इन जटिल स्थितियों में कैसे राष्ट्रीय गौरव प्राप्त होगा। भाषायी संकीर्णता न राष्ट्रीय एकता के हित में है और न ही प्रान्त के हित में। प्रान्तीय भाषा के प्रेम को इतना उभार देना, जिससे राष्ट्रीय भाषा के साथ टकराहट पैदा हो जाये, यह देश के लिये उचित कैसे हो सकता है?
आज हिन्दी भाषा को भारत के जन-जन की भाषा बनाने के लिये उदार दृष्टि से चिन्तन किये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि यदि देश की एक सर्वमान्य भाषा होती है तो हर प्रांत के व्यक्ति का दूसरे प्रांत के व्यक्ति के साथ सम्पर्क जुड़ सकता है, विकास के रास्ते खुल सकते हैं। देश की एकता एवं संप्रभु अखण्डता के लिये राष्ट्र में एक भाषा का होना अत्यन्त आवश्यक है। अतीत के विपरीत लोग अब हिंदी विरोधी के इरादों और तमिल-कन्नड़ की सुरक्षा के नाम पर की जा रही राजनीति को समझते हैं। दरअसल बाजार और रोजगार की बड़ी संभावनाओं के बीच हिंदी विरोध की राजनीति को अब उतना महत्व नहीं मिलता, क्योंकि लोग हिंदी की ताकत को समझते हैं। पहले की तरह उन्हें हिंदी विरोध के नाम पर बरगलाया नहीं जा सकता।
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा था - जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं! वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं!! हिन्दी भाषा का मामला भावुकता का नहीं, ठोस यथार्थ का है, राष्ट्रीयता का है। हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। हिन्दी के महान कवि एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने देश की हिन्दी भाषा, अपने देश की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महान संस्कृति में सारी मानव जाति की भलाई को देखते थे। गांधीजी ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की वकालत की थी। वे स्वयं संवाद में हिन्दी को प्राथमिकता देते थे। आजादी के बाद सरकारी काम शीघ्रता से हिन्दी में होने लगे, ऐसा वे चाहते थे। राजनीतिक दलों से अपेक्षा थी कि वे हिन्दी को लेकर ठोस एवं गंभीर कदम उठायेंगे। लेकिन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से आक्सीजन लेने वाले दल भी अंग्रेजी में दहाड़ते देखे गये हैं। राजनेता बात हिन्दी की करते हैं, पर उनका दिमाग अंग्रेजीपरस्त है, क्या यह अन्तर्विरोध नहीं है? हिन्दी को वोट मांगने और अंग्रेजी को राज करने की भाषा बनाना हमारी राष्ट्रीयता का अपमान नहीं हैं? कुछ लोगों की संकीर्ण मानसिकता है कि केन्द्र में राजनीतिक सक्रियता के लिये अंग्रेजी जरूरी है। ऐसा सोचते वक्त यह भुला दिया जाता है कि श्री नरेन्द्र मोदी की शानदार एवं सुनामी जीत का माध्यम यही हिन्दी बनी हैं। विश्व में सबसे अधिक 138 करोड़ लोग चीनी भाषी हैं। विश्व में हिन्दी भाषी 120 करोड़ लोग हैं। भारत में इनकी संख्या 100 करोड़ है तथा अन्य देशों में हिन्दी बोलने तथा जानने वाले 20 करोड़ लोग हैं। हिन्दी विश्व में दूसरे नम्बर की भाषा है। ज्यादातर अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में बोली जाने वाली अंग्रेजी भाषा को लगभग 50 करोड़ लोग बोलते हैं। यह दुनिया में तीसरे नम्बर की बोली जाने वाली भाषा है। हमारी राष्ट्रभाषा दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे नम्बर पर है, फिर हमें क्यों इसे बोलने एवं उपयोग करने में शर्म महसूस होती है? महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।’ यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उसकी घोर उपेक्षा हो रही है, हिन्दी दिवस पर इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति को नरेन्द्र मोदी सरकार कुछ ठोस संकल्पों एवं अनूठे प्रयोगों से दूर करने के लिये प्रतिबद्ध हो, हिन्दी को मूल्यवान अधिमान दिया जाये। ऐसा होना हमारी सांस्कृतिक परतंत्रता से मुक्ति का एक नया इतिहास होना। प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 


डरा रहे हैं आर्थिक गिरावट के आंकड़े

डरा रहे हैं आर्थिक गिरावट के आंकड़े

14-Sep-2020

-ललित गर्ग-

कोरोना महामारी के कारण न केवल भारत बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गयी है।   भारत में लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था की स्थिति न केवल बिगड़ी है, बल्कि रसातल में चली गयी है। हालही में जारी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों ने किसी खुशफहमी के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी है। सबको पता था कि आंकड़े गिरावट वाले होंगे लेकिन गिरावट 23.9 फीसदी की हो जाएगी, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा। निश्चित रूप से सरकारी आंकडे एवं विश्व की प्रमुख रेटिंग एजेंसियों के आंकड़े गंभीर हैं, चिन्ताजनक है एवं डराने वाले हैं। लेकिन जीडीपी में गिरावट का गवाह बनने वाली हमारी कोई इकलौती अर्थव्यवस्था नहीं हैं। कहीं कम और कहीं ज्यादा, लेकिन लगभग सारी दुनिया के देश विकास दर में अच्छी-खासी गिरावट का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में खराब आंकड़ों के पीछे सीधे तौर पर यह वजह काम कर रही है कि इस तिमाही के दौरान 68 दिन से भी ज्यादा समय तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू रहा, जिसमें तमाम आर्थिक गतिविधियां करीब-करीब ठप हो गई थीं। अकेला कृषि क्षेत्र इससे मुक्त रहा। नतीजा यह कि जहां तमाम सेक्टर गिरावट दिखा रहे हैं वहीं कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

चाहे देशी-विदेशी रेटिंग हों या फिर सरकार के हाल के आंकड़े, लब्बोलुआब सबका यही है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना अब आसान नहीं है। आने वाली तिमाहियों में हालात सुधरेंगे, इसके आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। रेटिंग एजेंसियों के आकलन के जो पैमाने होते हैं, उनमें जीडीपी का आंकड़ा काफी महत्व रखता है। इसके अलावा शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भूमिका बड़ा कारक होता है। हालांकि इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देश भयानक मंदी का सामना कर रहे हैं। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था तो पिछले दो साल से मुश्किलों से जूझ रही है। ऐसे में वैश्विक रेटिंग एजेंसियों को भारतीय अर्थव्यवस्था में जल्दी सुधार की उम्मीदें लग नहीं रही। भारत में जीडीपी में अभी जो चैबीस फीसद की गिरावट आई है वह संगठित क्षेत्र के आंकड़े आने के बाद और ज्यादा हो सकती है। असंगठित क्षेत्र ही भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज मंदी की मार सबसे ज्यादा यही क्षेत्र झेल रहा है। छोटे व्यापारियों का व्यापार ठप्प होने, नौकरी चले जाने, कमाई बंद होने के कारण आम व्यक्ति का आर्थिक संतुलन बिगड़ गया है, रोजमर्रा के खर्च के लिए प्रॉविडेंट फंड और बचत योजनाओं से पैसा निकालने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सोने का भाव रेकॉर्ड तोड़ ऊंचाइयों पर चले जाना वित्तीय असुरक्षा एवं आर्थिक असंतुलन को दर्शाता है। इन आर्थिक असंतुलन एवं असुरक्षा की स्थितियों से उबारने केे लिये नरेन्द्र मोदी सरकार व्यापक प्रयत्न कर रही है, नयी-नयी घोषणाएं एवं आर्थिक नीतियां लागू कर रही है, जिनसे अंधेरों के बीच उजालों की संभावनाएं दिखना भी जटिल होता जा रहा है।
आने वाले वक्त में आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में सुधार को लेकर रेटिंग एजेंसियों में भले असहमति हो, लेकिन इस बात को लेकर सभी एकमत हैं कि हालात से निपटने के लिए सरकार के पास कोई जादूई चिराग नहीं हैं। भारत में जब पूर्णबंदी लागू की गई थी, तब अनुमान यह था कि जीडीपी में गिरावट अठारह से बीस फीसद रहेगी। लेकिन चैबीस फीसद गिरावट का मतलब यह है कि इन तीन चार महीनों में सब कुछ ठप हो गया। इससे कंपनियों की आय में भारी गिरावट आई और करोड़ों लोगों का रोजगार चला गया। यही वह सबसे जटिल एवं भयावह स्थिति है, जिसके समाधान के लिए सरकार को अपने फैसलों का अपेक्षित असर देखने को मिल नहीं रहा। लेकिन रेटिंग एजेंसियों को उम्मीद की जो किरण दिख रही है, उसके लिए अभी लम्बा इंतजार करना पड़ेगा।
सवाल है कि अकेले कृषि क्षेत्र की बढ़ोतरी अर्थव्यवस्था को कितना सहारा दे पाएगी। इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह है कि इस भीषण गिरावट से उबरने की क्या सूरत हो सकती है। इन दोनों सवालों का जवाब खोजने के सूत्र हमें रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास के उन पांच कारकों में दिखाई देते हैं, जो आने वाले समय में आर्थिक उजाला बन सकते हैं। जिनमेें है कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर, वैकल्पिक ऊर्जा, इन्फॉर्मेशन एंड कम्यूनिकेशन टेक्नॉलजी।  स्टार्टअप्स को उन्होंने ऐसे स्पॉट्स के रूप में चिह्नित किया जो मौजूदा आर्थिक चुनौतियों एवं खतरों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने की सामथ्र्य रखते हैं। जिनसे हमारी आर्थिक रफ्तार एवं आकांक्षा की उड़ान को तीव्र गति दी जा सकेगी। उनके द्वारा कहीं गयी बातों की उपयोगिता और उनके द्वारा चिह्नित क्षेत्रों में मौजूद संभावनाओं को भला कौन खारिज कर सकता है, लेकिन असल बात बड़ी चुनौतियों से निपटने एवं कृषि एवं ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को पहचानने की है, जिसके बगैर बड़ी से बड़ी संभावना भी अभी के माहौल में खुद को साकार नहीं कर पाएगी।
अर्थ का कोमल बिरवा कोरोना के अनियंत्रित प्रकोप के साए में कुम्हला न जाये, इसके लिये इन संभावनाओं को तलाशते हुए कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था को भी बल देने की जरूरत है। आरबीआई की प्रमुख प्राथमिकता देश की बैंकिंग व्यवस्था को बचाने की होनी चाहिए, क्योंकि यहां कोई बड़ा संकट शुरू हुआ तो किसी संभावना का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। ऐसे में धूर्त, चालाक, धोखेबाज और अक्षम कारोबारियों के विपरीत बहुत सारे वास्तविक उद्यमी भी धंधा बिल्कुल न चल पाने के कारण कर्ज वापसी को लेकर हाथ खड़े करने को मजबूर हो सकते हैं। इसके संकेत कई तरफ से मिल रहे हैं। इन स्थितियों पर नियंत्रण भी जरूरी है।
अर्थव्यवस्था के जानकारों के अनुसार भारतीय अर्थ व्यवस्था को स्वस्थ करने के लिये जरूरी है कि हम अपने बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं को पटरी पर लाने के सकारात्मक प्रयत्न करें। पिछले कई सालों से बड़े कर्जों के डूबने की स्थितियों ने हमारी बैंकिंग प्रणाली को तबाह कर दिया हैं। कुछ बड़े कारोबारी बैंकों से भारी-भरकम कर्ज लेकर विदेश भाग गये हैं, तो कुछ दिवालिया घोषित हो चुके हैं या इसके करीब पहुंच रहे हैं। सख्ती एवं तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद कर्जे की वसूली सपना ही बनी हुई है, जो अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने की एक बड़ी बाधा है। सरकारी बैंकों या बीमा कंपनियों में लगा धन एकाधिकारी, व्यावसायिक घरानों की खिदमत और बढ़ोतरी के लिए इस्तेमाल होना भले ही आर्थिक विकास की सुनहरी तस्वीर प्रस्तुत करता हो, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से आर्थिक तनाव, हिंसा एवं असंतुलन का बड़ा कारण है। जिससे सामाजिक चेतना या न्याय भावना आहत होती है। इस बड़ी विसंगति एवं विडम्बना को दूर करने के लिये नरेन्द्र मोदी की आर्थिक नीतियों में छोटे व्यापारियों, कृषि एवं ग्रामीण उद्योगों को ऋण देने एवं स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने के उपक्रम हो रहे हैं। लेकिन बैंकों के आर्थिक भ्रष्टाचार को नियंत्रित किये बिना मोदी की आर्थिक नीतियों को भी गति नहीं दी जा सकेगी। लोकतांत्रिक तत्वों से परिपूर्ण आर्थिक निर्णयों की खोज भी कम मुश्किल काम नहीं है।
कोरोना महामारी एवं उसके बढ़ते प्रकोप के कारण अर्थव्यवस्था हिल गई है, आर्थिक जीवन ठहर सा गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 लाख करोड़ की योजनाओं की घोषणा के साथ राष्ट्र को संबोधित किया ताकि बाजार जीवन्त हो उठे, उद्योग ऊर्जावान हो जाये, ट्रेड बढ़ जाये, कृषि में नयी संभावनाएं जागे, ग्रामीण आर्थिक योजनाओं को बल मिले और भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाये। लेकिन दूसरी ओर कोरोना ने पूरे समाज को निठल्ला भी बना दिया है। आम नागरिकों और सम्पन्न तबके के बीच की खाई गहरी हो गई है, गरीब की गरीबी बढ़ी है तो अमीर अपनी अमीरी को कायम रखने में सफल रहा है, ज्यादा मार मध्यम वर्ग की हुई है। कोरोना ने निर्धन को केवल आँसू दिये हैं और धनवान को धन देने के बावजूद जीवन के लुत्फ उठाने वंचित किया है। इन विकट स्थितियों के बीच संतुलित आर्थिक विकास की तीव्र अपेक्षा है। मोदी की आर्थिक नीतियों एवं प्रक्रियाओं का निरंतर जारी रहना बदलाव के संघर्ष को दिन-प्रतिदिन सरल बनाये, व्यावहारिक बनाये, यह आत्म निर्भर भारत की प्राथमिक अपेक्षा है। जरूरत यह भी है कि मजदूरों-कर्मचारियों के काम और उनके वेतन की गारंटी की जाए और उनमें यह भरोसा कायम किया जाए कि उनकी नौकरी आगे भी बची रहेगी। ज्यादातर दफ्तरों-कारखानों-व्यापारिक गतिविधियों को बंद होने से रोका जा सका तो बाजार का संकुचन ज्यादा नहीं खिंचेगा और भारत लंबी मंदी का शिकार होने से बच जाएगा। जाहिर है, देश के सामने आर्थिक संकट बहुत बड़ा है, लेकिन एक अच्छी बात भी है कि सुरंग के दूसरे छोर से रोशनी की किरणें दिखनी बंद नहीं हुई हैं, विश्व की रेटिंग एजेन्सियों तक वह रोशनी पहुंचेगी और उनके आकलन भी बदलेंगे।
 प्रेषकः

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

 
 

 


उतरप्रदेश में कोरोना के 6239 नए मामले, मृतकों की संख्या 4429 तक पहुंची

उतरप्रदेश में कोरोना के 6239 नए मामले, मृतकों की संख्या 4429 तक पहुंची

13-Sep-2020

Report:Saeed Naqvi

Place:Lucknow

उत्तर प्रदेश में बीते 24 घंटे में कोरोना वायरस संक्रमण के 6239 नए मामले सामने आए हैं। राज्य में कोरोना के एक्टिव केस की संख्या अब 68 हजार को पार कर गई है। यूपी में कोरोना की चपेट में आकर जान गंवाने वालों की संख्या अब 4429 हो गई है। रविवार को उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य अमित मोहन प्रसाद ने इस बात की जानकारी दी।

प्रसाद ने कहा कि 6239 नए मामलों के साथ ही प्रदेश में कुल संक्रमितों की संख्या अब 3 लाख 12 हजार 036 हो गई है। इसमें से 2 लाख 39 हजार 485 मरीज इलाज के बाद पूरी तरह ठीक हो चुके हैं और उन्हें डिस्चार्ज किया जा चुका है। राज्य में फिलहाल कोरोना के 68 हजार 122 सक्रिय मामले हैं, जिनका अलग-अलग अस्पतालों में इलाज चल रहा है।

अमित मोहन प्रसाद ने बताया कि 68 हजार 122 एक्टिव केस में से 36 हजार 329 लोग होम आइसोलेशन में हैं। अभी तक 1 लाक 53 हजार 543 लोगों ने होम आइसोलेशन का विकल्प चुना है। इनमें से 1 लाख 17 हजार 214 लोगों की होम आइसोलेश की अवधि समाप्त हो चुकी है यानी ये लोग ठीक हो चुके हैं।

अपर मुख्य सचिव ने बताया कि शनिवार को राज्य में कुल 1 लाख 47 हजार 082 सैंपल्स की जांच हुई। उत्तर प्रदेश में अभी तक 75 लाख से अधिक टेस्टिंग हो चुकी है। इतना टेस्टिंग करना वाला यूपी देश का पहला राज्य है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने अब दो लाख टेस्ट प्रतिदिन करने की बात कही है। हम जल्द ही इसे भी हासिल कर लेंगे। प्रसाद ने कहा कि यूपी कुछ ही दिन में एक करोड़ टेस्टिंग करने वाला राज्य बन जाएगा।

 


कोरोना संक्रमण की बढ़ती रफ्तार की चिन्ता

कोरोना संक्रमण की बढ़ती रफ्तार की चिन्ता

12-Sep-2020

- ललित गर्ग-

कोरोना महामारी के प्रकोप से निपटने की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं हर दिन संक्रमण और संक्रमण से होने वाली मौतों के आंकड़े नई ऊंचाई छू रहे हैं। भारत में कोरोना मामलों का रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ना जारी है। दुनिया में सबसे तेजी से कोरोना संक्रमण अपने देश में ही बढ़ रहा है। देश में बुधवार को रिकॉर्ड 95,735 नये संक्रमण के एवं 1172 मौत के मामले सामने आए हैं। इस सप्ताह में संक्रमण के लगभग हर दिन नब्बे हजार मामले एवं हर दिन एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या 44 लाख पार पहुंच गई है। दुनिया में अभी संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले अमेरिका में है। लेकिन हम अमेरिका, ब्राजील जैसे उन देशों को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ गए हैं, जहां दुनिया में अभी तक सबसे अधिक मामले दर्ज हो रहे थे। यह निस्संदेह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। कहा जा रहा है कि जांच में तेजी आने के कारण संक्रमितों की पहचान भी तेजी से हो रही है, इसलिए आंकड़े कुछ बढ़े हुए दर्ज हो रहे हैं। पर कुछ लोगों को शिकायत है कि जांच में अपेक्षित गति नहीं आ पा रही है। पुख्ता जांच एवं वैक्सीन का आश्वासन, उजाले का भरोसा सुनते-सुनते लोग थक गए हैं। अब तो कोरोना मुक्ति का उजाला एवं उपचार हमारे सामने होना चाहिए। इस अभूतपूर्व संकट के लिए अभूतपूर्व समाधान खोजना ही होगा। प्रारंभिक दौर में सरकार एवं शासकों ने जिस तरह की सक्रियता, कोरोना पर विजय पाने का संकल्प एवं अपेक्षित प्रयत्नों का कर्म एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखने को मिला, अब वैसा वातावरण न बनना लोगों को अधिक निराश कर रहा है।

भारतीय जीवन में कोरोना महामारी इतनी तेजी से फैल रही है कि उसे थामकर रोक पाना किसी एक व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है। अभी अनिश्चितताएं एवं आशंकाएं बनी हुई है कि अगर सामान्य जनजीवन पर लगी बंदिशें इसी तरह कम की जाती रही तो कोरोना के बेकाबू होकर घर-घर पहुंच जाने का खतरा बढ़ने की संभावनाएं अधिक है। कोरोना संक्रमण के वास्तविक तथ्यों की बात करें तो हालात पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण एवं जटिल हुए हैं, अभी अंधेरा घना है। खुद केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने भी असंतोष व्यक्त किया है कि कुछ राज्यों ने जांच के मामले में मुस्तैदी नहीं दिखाई, जिसके चलते वहां संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े। जब जांच में तेजी नहीं आ पा रही तब कोरोना के मामले दुनिया के अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं, तो इसमें और तेजी आने पर क्या स्थिति सामने आएगी, अंदाजा लगाया जा सकता है।
कोरोना महामारी को नियंत्रित करने के लिये लाॅकडाउन, बंदी और सामाजिक दूरी के पालन को लेकर सख्ती आदि उपाय आजमाए जा चुकने के बाद भी संक्रमण तेजी से फैल रहा है, तो इस पर काबू पाने के लिए कोई नई, प्रभावी और व्यावहारिक रणनीति बनाने पर विचार होना चाहिए। यह सही है कि जांच में तेजी आएगी तो संक्रमितों की पहचान भी जल्दी हो सकेगी और उन्हें समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा। मगर जांच के मामले में राज्य सरकारों का रवैया कुछ ढीला-ढाला एवं उदासीनताभरा ही नजर आ रहा है। दिल्ली सरकार ने जरूर इजाजत दे दी है कि अब बिना डाॅक्टर की पर्ची के भी लोग खुद जांच करा सकते हैं। दिल्ली में जांच एवं उपचार की सुविधाएं दूरदराज के गावों से अधिक हैं, उन गांवों के लोगों की परेशानियों का अंदाज लगाया जा सकता है, जो इस वक्त बाढ़ की विभीषिका झेल रहे या फिर जिन गावांे तक सड़क भी नहीं पहुंची है और लोगों को मरीज को चारपाई पर ढोकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। वे तो इसी उजाले की बाट जोह रहे हैं कि सरकारी सहायता मिले और उनकी मुफ्त जांच हो सके। राज्यांे के पास ऐसा नेतृत्व नहीं है, जो कोरोना महाव्याधि का सर्वमान्य हल दे सके एवं सब कसौटियों पर खरा उतरता हो, तो क्या नेतृत्व उदासीन हो जाये? ऐसा दवा या वैक्सीन नहीं, जो कोरोना के घाव भर सके, तो क्या उपचार के प्रयास ही न हो?
दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में संक्रमितों के स्वस्थ होने की रफ्तार अधिक और मौतों का आंकड़ा बेशक हमारे यहां कम हो, पर इस आधार पर लापरवाही बरतने का मौका नहीं मिल सकता। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और कंेद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि आरटीपीसीआर जांच सबसे बेहतर है। आरटीपीसीआर जांच करना जरूरी है। मगर राज्य सरकारें इसे गंभीरता से नहीं ले रहीं हैं। देश में बेहतर जांच की सुविधाएं तक हम नहीं जुटा पा रहे हैं, कई राज्य सरकारों इस महामारी से पार पाने के लिए आर्थिक संसाधनों पर्याप्त न होने का रोना रो रही है। ऐसे में यह ठीक है कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर राज्य सरकारों को ही अगली कतार में लड़ना है, पर उन्हें जरूरी संसाधन और सहयोग उपलब्ध कराने के मामले में केंद्र को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
भारत सहित समूची दुनिया को कोरोना के उपचार की वैक्सीन का सबसे ज्यादा इंतजार है, लेकिन उसके मार्ग में नई-नई बाधाएं आना अफसोस की बात है, बहुराष्ट्रीय एस्ट्राजेनेका कंपनी से संसार भर के लोग खुशखबरी की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन कंपनी ने अपने अंतिम चरण के वैक्सीन परीक्षण को इसलिये रोक दिया है कि परीक्षण में शामिल एक व्यक्ति बीमार पड़ गया। संभव है यदि परीक्षण में शामिल उस व्यक्ति के बीमार पड़ने का कोई अन्य कारण सामने आया, तो फिर वैक्सीन के प्रयोग को आगे बढ़ाया जाएगा। दुनिया भर में अभी 100 ज्यादा जगह कोरोना के वैक्सीन या दवा की तलाश जारी है। कहीं भी कोई कामयाबी या नाकामी सामने आए, तो उसे कम से कम वैज्ञानिकों के बीच साझा करना न केवल यथोचित, बल्कि मानवीयता भी है। आज दुनिया जिस निर्णायक मोड़ पर है, वहां हर देश चीन की तरह गोपनीय एवं मतलबी नहीं हो सकता। चीन वुहान में कोरोना को नियंत्रित करने के बाद स्वयं को महिमामंडित करने में जुटा है, लेकिन उसने दुनिया को यह नहीं बताया कि उसके यहां कोरोना की वास्तविक स्थिति क्या है? आखिर वुहान में सामान्य जन-जीवन की वापसी कैसे हुई? वह दुनिया को बीमारी देने के बाद खुद को कोरोना चिंता से मुक्त और मस्त दिखाने की अमानवीय कृत करने में जुटा है, जबकि विशेष रूप अमेरिका, यूरोप, भारत, ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक कोरोना वैक्सीन बनाने में दिन-रात एक किए हुए हैं। अभी तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर दवा विकसित करने में जुटी एस्ट्राजेनेका को सबसे आगे माना जा रहा था, लेकिन अब इंतजार का समय और लंबा हो गया है, लेकिन निराश कतई नहीं होना चाहिए।
भारत में भी कोरोना मुक्ति की दवा पर प्रयत्न हो रहे है, यहां प्लाज्मा थेरेपी को रामबाण माना जा रहा था, दिल्ली, मुंबई और कुछ अन्य शहरों में प्लाज्मा बैंक भी बन गए थे, लेकिन आईसीएमआर ने इस थेरेपी को बहुत कारगर नहीं माना है। देश के 39 अस्पतालों में किए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि यह थेरेपी सभी में समान रूप से काम नहीं कर रही है। यह थेरेपी करीब 13.6 प्रतिशत लोगों की जान नहीं बचा पाई है, इसलिए इसे पुख्ता नहीं माना जा सकता। इन नतीजों को भी नाकामी नहीं कहा जा सकता, हो सकता है, प्लाज्मा थेरेपी पर भी अलग ढंग से काम करने की जरूरत हो। बहरहाल, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के साथ-साथ सरकारों एवं आम जनता को कतई निराश नहीं होना चाहिए। हम कठिन समय को भी खुशनुमा बना सकते हैं। हम जमीन पर धूल में सने होने के बाद भी खड़े हो सकते हैं। हम वास्तव में जो चाहते हैं, उसे प्राप्त कर खुद को हैरान कर सकते हैं। ये कल्पनाएं सुखद तभी है जब हम कोविड-19 के साथ जीते हुए सभी एहतियात का पालन करें, सोशल डिस्टेंसिंग का कड़ाई से पालन करने और सार्वजनिक स्थानों के लिये जब भी निकले मास्क का प्रयोग जरूरी करें एवं अपना चेहरा ढके रखे। कुल मिलाकर सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल की स्थिति एवं अधिक से अधिक लंबा खींचने के उपाय से ही हम कोरोना से युद्ध को कम से कम नुकसानदायी बना सकते हैं। आज देश ही नहीं समूची दुनिया पंजों के बल खड़ा कोरोना मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहा है। कब होगा वह सूर्योदय जिस दिन घर के दरवाजों पर कोरोना संक्रमण को रोकने के लिये बंदिशें नहीं लगाने पड़ेंगी?

प्रेषकः

 

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92

 

 


उत्तर प्रदेश में फिर मिले सब से ज़ियादा 7103 नए Covid-19 के पॉजिटिव केस

उत्तर प्रदेश में फिर मिले सब से ज़ियादा 7103 नए Covid-19 के पॉजिटिव केस

11-Sep-2020

Report:Pooja Singh

Place:Lucknow

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लगातार प्रयासों के बावजूद राज्य में कोरोना वायरस का संक्रमण रोज नए कीर्तिमान बना रहा है। शुक्रवार को फिर रिकॉर्ड 7103 नए पॉजिटिव केस मिले हैं। यह संख्या अब तक एक दिन में मिले कोरोना संक्रमितों में सर्वाधिक है। बीते 24 घंटे में कोरोना वायरस के 1,50,652 नमूनों की जांच की गई। इससे पहले 10 सितंबर को 7042 नए मरीज मिले थे और उस दिन 1,49,311 नमूनों की जांच की गई थी। अब राज्य में कुल मरीजों का आंकड़ा 2,99,045 पहुंच गया है। वहीं अभी तक कुल 2,27,442 रोगी स्वस्थ हो चुके हैं। यानी अभी तक 75.8 प्रतिशत मरीज ठीक हुए हैं। वहीं शुक्रवार को 76 लोगों की मौत हुई। अब तक कुल 4282 लोगों की जान यह खतरनाक वायरस ले चुका है। अब राज्य में एक्टिव केस बढ़कर 67321 हो गए हैं। अब तक राज्य में कुल 72,17,980 लोगों की कोरोना जांच की जा चुकी है।

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा खराब स्थिति लखनऊ की है। शुक्रवार को यहां राज्य में सबसे ज्याद 1181 नए कोरोना संक्रमित केस मिले हैं। इस वक्त यहां 9260 एक्टिव केस हैं, जो भी राज्य में सर्वाधिक है। एक्टिव केस में दूसरे स्थान पर कानपुर है। यहां 4445 एक्टिव केस हैं। 3728 एक्टिव केस के साथ तीसरे नंबर प्रयागराज, चौथे नंबर पर गोरखपुर में 2918 एक्टिव केस और पांचवें नंबर पर वाराणसी में 2053 एक्टिव केस हैं।

पॉजिटिविटी रेट 4.14 फीसदयूपी के अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य अमित मोहन प्रसाद ने बताया कि प्रदेश में सरकारी क्षेत्र के आरटी-पीसीआर लैब में 50,076 टेस्ट किए गए। प्रदेश में कुल 1,50,652 सैंपल्स की जांच की गई। अब तक कुल 72,17,980 सैंपल्स की जांच की जा चुकी है। प्रदेश की पॉजिटिविटी रेट 4.14 फीसद है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में 34,920 लोग होम आइसोलेशन में हैं। अब तक 1,44,147 लोगों ने होम आइसोलेशन का विकल्प लिया है, जिसमें से 109,227 की होम आइसोलेशन अवधि समाप्त हो चुकी है।  


बकरी चोरी के आरोप में चार महिलाओं को जमकर पीटा

बकरी चोरी के आरोप में चार महिलाओं को जमकर पीटा

10-Sep-2020

Report:Abdul Kalam

Place:Bengal

पश्चिम बंगाल आसनसोल के नियामतपुर इलाके में 4 महिलाओं को बकरी चोरी करना तब महंगा पड़ गया जब उन महिलाओं को बकरी चोरी करते इलाके के ही कुछ लोगों ने देख लिया चारो महिलाएं बकरी चोरी कर दुपट्टे में लपेटकर बकरी को ले जा रही थी तभी लोगों ने उन महिकाओं को सक के आधार पर उन्हें रोक दिया और उनकी तलासी लेने लगे तलासी के दौरान उन महिलाओं के पास चोरी की बकरी भी बरामद हो गई फिर तब क्या था भीड़ में मौजूद कई महिलाओं ने उन महिलाओं के ऊपर धाबा बोल दिया और उन्हें बांध कर बीच सड़क पर सरेआम बेरहमी से पिटाई की कई घंटों तक सड़क जाम हो गया वहीं घटना की खबर सुन मौके पर नियामत पुर पुलिस पहोंच गई और उन महिलाओं को अपने कब्जे में ले लिया


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