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लिखो, लिखो, जल्दी लिखो—नया इतिहास!

लिखो, लिखो, जल्दी लिखो—नया इतिहास!

08-Dec-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

लीजिए, अब इन सेकुलरवालों को मोदी जी के शिक्षक अवतार से भी दिक्कत है। बेचारे अमित शाह ने यह कहकर मोदी जी के शिक्षक अवतार की आरती ही तो उतारी थी कि गुजरात में मोदी जी के राज ने सबक सिखाया था। मोदी जी के राज ने पक्का सबक सिखाया था। मोदी के राज ने 2002 में ऐसा पक्का सबक सिखाया था कि पूरे बीस बरस बाद 2022 तक, सबक लेने वाले भूले नहीं हैं। और अंत में यह कि, 2022 के चुनाव में जो कोई मोदी जी की खड़ाऊं पर वोट चढ़ावै, 2002 के सबक का 2027 तक के लिए पक्का एक्सटेंशन पावे! यानी किसी भी तरह से देखा जाए, शाह साहब शुद्ध रूप से सीखने-सिखाने की बात कर रहे थे और विश्व गुरु के आसन के लिए मोदी जी के पर्सनली भी दावेदार होने की याद दिला रहे थे। पर सीखने-सिखाने की बात छोडक़र, सेकुलरवाले हैं कि खून, लाशें, खून से सने हाथ, वगैरह न जाने क्या-क्या आउट ऑफ कोर्स सवाल उठा रहे हैं।

वैसे ऐसा नहीं है कि सबक सिखाने में इन सब चीजों का कोई काम ही नहीं हो। पर वह सब मेडिकल कोर्स का मामला है और अमित शाह भले ही मेडिकल की पढ़ाई हिंदी में पढ़वाने के लिए कमर कसे हुए हों, फिर भी एंटायर पॉलिटिकल साइंस के एमए मोदी जी से मेडिकल की पढ़ाई तो शाह जी भी नहीं करवाना चाहेंगे। वैसे आने को तो सैन्य विज्ञान की पढ़ाई में भी खून वगैरह आते ही होंगे, पर उसके लिए अब अग्निवीरता का कोर्स है ही। वैसे भी गांधी के देश में मोदी जी मार-काट के सबक सिखाते क्या अच्छे लगे!

मोदी जी के सबक सिखाने को एहसान जाफ़री वगैरह के मामलों से जोड़ने की सेकुलरवालों की इसी शरारत की नाराजगी, शाह साहब ने नागपुरी फीताधारी इतिहास लेखकों पर निकाली लगती है। शाह साहब ने साफ-साफ कह दिया कि अब वह यानी उनके मोटा भाई इसका कोई बहाना नहीं सुनेंगे कि इतिहास में यह ऐसा लिखा है, इतिहास में वैसा लिखा है; इतिहास लिखने वालों ने उस महान हिंदू साम्राज्य को छोटा कर दिया है, इतिहास लिखने वालों ने उस महान हिंदू को कम तोल दिया है। अब शिकायती चिट्ठियां  नहीं नया इतिहास लिखकर लाओ। जैसा चाहिए वैसा गढ़वाओ। जैसे चाहिए वैसे इतिहास बनाओ। बस नया इतिहास लिखकर दिखाओ! अमृतकाल नया है, तो पुराने इतिहास का क्या काम? कोई इतिहास माने न माने, तुम तो बस लिखकर दिखाओ। एक नया चमचमाता हुआ इतिहास लिखने के अपने संकल्प को पूरा करने से हमें-आपको कोई नहीं रोक सकता है। तथ्य भी नहीं। साक्ष्य भी नहीं। सत्य भी नहीं। मन से लिखकर लाओ, बस लिखकर दिखाओ। मन की कल्पना का सत्य भी तो सत्य ही होता है, विशेष रूप से स्वधर्म और स्वदेश का गौरव दिखाने वाला सत्य। उन्हें महानतम बनाने वाली कल्पना का सत्य। और हां! जो अपने से किसी भी तरह भिन्न हैं, उन्हें नीचा दिखाने वाला सत्य भी।

वैसे शाह जी की  खीझ भी कुछ गलत नहीं है। नागपुरी फीताधारियों के लिए उनके मोटा भाई ने क्या-क्या नहीं किया है। पहली बार, आठ साल से ज्यादा का उनका अपना राज तो खैर दिया ही है, पद दिए हैं, अधिकार दिए हैं, नौकरियां दी हैं, पैसे दिए हैं, छपने-छपाने के सारे मौके दिए हैं, पुरस्कार दिए हैं और सबसे बड़ी बात, पढ़े-लिखों से प्रतियोगिता से उन्हें पूरा संरक्षण दिया है, देसी तो देसी, विदेशी पढ़े-लिखों से प्रतियोगिता से भी। पढ़े लिखों को नौकरियों से, शिक्षा संस्थाओं से, पाठ्य पुस्तकों से, छपने-छपाने के मौकों से, शोध के लिए साधनों से बाहर किया है। ज्यादा शोर मचाने वालों को यूएपीए तक में बंद किया है। इससे ज्यादा मोदी जी क्या कर सकते हैं! पर इन नागपुरी फीताधारियों ने बदले में उन्हें क्या दिया, दूसरों के इतिहास की शिकायतों के सिवा। आठ साल में इनसे एक ढंग का नया इतिहास तक लिखकर नहीं दिया गया। अरे कुछ भी लिख देते, मन से ही लिख देते, पर नया गौरवपूर्ण इतिहास तो लिख देते।

पर इनसे तो इतना भी नहीं हुआ कि मोदी जी के 2002 के सबक की ही ऐसी नयी व्याख्या कर देते कि हिंदू देखें तो उसमें हिंदू हृदय सम्राट नजर आए और दूसरे देखें तो सिर्फ अडानी-अंबानी प्रेम। देखा नहीं, कैसे इसी कमजोरी की वजह से अमरीकियों ने मौका पाते ही झट से कह दिया कि पत्रकार खशोगी की हत्या के मामलों-मुकद्दमों से सऊदी अरब के तानाशाह को न कम न ज्यादा, सिर्फ उतना ही संरक्षण दिया है, जितना संरक्षण हमारे मोदी जी को 2002 के सिलसिले में मुकद्दमों से दिया गया है। यानी मोदी जी को दस साल से ज्यादा वीसा नहीं देने की गलती के लिए माफी मांगने की तो छोड़ो, पटठे कह रहे हैं कि स्पेशल छतरी लगाकर अब भी मोदी जी को मुकद्दमों से बचाया हुआ है। वर्ना रॉक शो टाइप रैली की जगह, अमरीका में वारंट की तामील का रॉक शो नजर आता! बताइए, सुप्रीम कोर्ट तक ने मोदी जी को क्लीन चिट दे दी, बल्कि क्लीन चिट पर सवाल उठाने वालों को जेल तक भिजवा दिया, फिर भी नये इतिहासकार विदेशियों को इतना तक नहीं समझा पाए कि मोदी जी तो 2002 में भी राजधर्म का ही पालन कर रहे थे, बस अटल जी की ही राजधर्म की नागपुरी पढ़ाई में जरा सी कसर रह गयी थी। खुद को कवि जो समझते थे। कवियों को राजाओं के लिए नुकसानदेह यूं ही थोड़े ही माना गया है।

लेकिन, इससे कोई यह नहीं समझे कि मोदी जी या उनके हनुमान अमित शाह जी, लेखकों वगैरह के खिलाफ हैं। मोदी जी तो खुद भी छठे-छमाहे वाले कवि हैं और मोरों के लिए तो एक साथ कई कविताएं लिख चुके हैं; उनका राज लेखकों के खिलाफ कैसे हो सकता है। वास्तव में उनकी तरफ से शाह जी ठेके पर जो नया इतिहास लिखा रहे हैं, उसमें सबसे ज्यादा मौका तो लेखकों के लिए ही है। अब इतिहासकार कितनी ही खुदाई कर लें, नागपुरी पसंद के डेढ़ सौ साल या ज्यादा चले 30 साम्राज्य और 300 महान हिंदू राष्ट्र योद्धा, खोजे से तो मिलने से रहे। टार्गेट पूरा करने के लिए आखिर में तो लेखक यानी कथाकार ही काम आएंगे। कथाकारों के लिए शानदार मौका है -- इतिहास कहकर, अपने मन से कुछ भी लिखो। बस जल्दी लिखो। लिखो, लिखो, जल्दी लिखो-नया इतिहास।  


गुजरात चुनाव और ‘2002 का सबक’!

गुजरात चुनाव और ‘2002 का सबक’!

07-Dec-2022

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आलेख : राजेंद्र शर्मा

आखिरकार, अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 2002 के गुजरात के मुस्लिम-विरोधी नरसंहार के कर्ता या प्रायोजक के नाते, मोदी की भाजपा के लिए गुजरात के लोगों से वोट की मांग कर ही डाली। गुजरात के चुनाव के लिए प्रचार के अखिरी चरण में, मोदी के निर्विवाद नंबर-दो और देश के गृहमंत्री, अमित शाह ने खेड़ा जिले के महुधा शहर में एक चुनावी रैली में इसके श्रेय का दावा किया कि 2002 में मोदी जी के राज में ‘‘सबक सिखाया गया था’’, जिसके बाद से ‘उन’ तत्वों ने ‘वह रास्ता छोड़ दिया। वे लोग 2002 से 2022 तक हिंसा से दूर रहे। इस तरह मोदी के राज ने ‘गुजरात में स्थायी शांति कायम की है!’ कहने की जरूरत नहीं है कि वह इस ‘गर्वपूर्ण’ रिकार्ड के बल पर, दिसंबर के पहले सप्ताह में होने जा रहे मतदान में मोदी की भाजपा को एक बार फिर जिताने की गुजरात के लोगों से अपील कर रहे थे, ताकि 2002 के ‘‘सबक’’ से कायम हुई शांति को पांच साल और कायम रखा जा सके। याद रहे कि 2002 के नरसंहार के फौरन बाद एक जाने-माने गुजराती विद्वान और लेखक ने ठीक इन्हीं शब्दों में मुस्लिम विरोधी नरसंहार को सही ठहराया था कि, ‘उन्हें सबक तो सिखाना ही था।’ बेशक, यहां यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि 2022 के चुनाव में अमित शाह, जिस मोदी निजाम के रिकार्ड के आधार पर वोट मांग रहे हैं, जिसकी तुलना उस समय देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कुख्यात बादशाह नीरो से की थी, जिसके संबंध में मशहूर है कि ‘जब रोम जल रहा था, नीरो चैन से वायलिन बजा रहा था।’

बेशक, राजनीतिक रूप से बहुत ही भोले लोगों को छोडक़र, शायद ही किसी को इसमें अचरज हुआ होगा कि आखिरकार, मोदी की भाजपा चुनाव में 2002 के नरसंहार में अपनी भूमिका को खुलेआम भुनाने पर उतर आयी है। एक प्रकार से उसने 2002 के अपने सांप्रदायिक शौर्य को चुनाव में भुनाने की तैयारियां तो तभी शुरू कर दी थीं, जब उस नरसंहार के भयानकतम प्रसंगों में से एक के रूप में कुख्यात, बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार तथा एक दर्जन से ज्यादा हत्याओं के प्रकरण के 11 सजायाफ्ता अपराधियों को, आजीवन कारावास की उनकी सजा को माफ करते हुए, आजादी के अमृत महोत्सव के हिस्से के तौर पर, इसी पंद्रह अगस्त को जेल से छोड़ दिया गया था। यह कोई औचक समारोह के मौके पर लिया गया निर्णय नहीं था, बल्कि इन अपराधियों के प्रति, गुजरात में मोदी जी द्वारा स्थापित निजाम ‘‘सबक सिखाने’’ के अपने उक्त उद्यम के ‘बलिदानी योद्घाओं’ के नाते जिनके प्रति चिर कृतज्ञता का अनुभव करता था, बार-बार तथा लंबे अर्से तक पैरोल पर छोड़े जाने समेत दी जाती रहीं सारी रियायतों की शृंखला का ही अगला चरण था, जो चंद महीने में ही होने जा रहे विधानसभाई चुनावों में उसके काम भी आने वाला था।

अचरज नहीं कि उनकी सजा माफी के लिए केस तैयार करने के लिए गठित की गयी कमेटी में, स्थानीय उच्चाधिकारियों के अलावा, भाजपा के स्थानीय विधायक समेत, ‘‘सबक सिखाने’’ के उक्त उद्यम के पैरोकारों का ही बोलबाला सुनिश्चित किया गया था। संबंधित विधायक, रावल जी ने, जिसका टिकट 40 फीसद सिटिंग विधायकों के टिकट काटे जाने की आंधी में भी इस बार सुरक्षित रहा है, उक्त अपराधियों की सजा माफी का यह कहकर जोर-शोर से बचाव किया था कि वे तो निर्दोष थे जो झूठे ही फंसाए गए थे। वे तो ‘‘संस्कारी ब्राह्मïण’’ हैं, वे ऐसा अपराध कर ही कैसे सकते थे? बेशक, ज्यादा शोर मचने पर मोदी की ‘‘उत्तराधिकारी’’ तथा सीधे उसके द्वारा ही चुनी गयी, भूपेंद्र पटेल सरकार ने उक्त ‘व्यापकतर कमेटी’ के निर्णय की आड़ में शुरू में जिम्मेदारी से बचने की कोशिश भी की थी। लेकिन, बाद में सुप्रीम कोर्ट में उक्त सजा माफी को चुनौती दिए जाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट के सामने दिए अपने  हलफनामे में राज्य सरकार को कबूल करना पड़ा कि उक्त जघन्य अपराधियों की सजा, खुद अमित शाह के आधीन केंद्रीय गृहमंत्रालय के अनुमोदन से माफ की गयी थी। साफ है कि 2002 के ‘‘सबक’’ को इशारों में भुनाने की तैयारी तो तभी से शुरू हो गयी थी।

इसी के हिस्से के तौर पर आगे चलकर, नरोडा पाट्या तथा नरोडा गांव नरसंहार प्रकरणों की मुख्य मास्टर माइंड मानी गयीं तथा इसी कारगुजारी के लिए बाद में मोदी निजाम में मंत्रिपद से भी नवाजी गयीं, डा. माया कोडनानी की सीट पर, जिन्हें सीबीआइ की जांच तथा आरोपपत्र के आधार पर पहले 28 साल की सजा हुई थी, जिसे बाद में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष, अमित शाह की गवाही के बाद उच्चतर न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया, उक्त नरसंहार के ही एक और आजीवन कारावास की सजा पाए अपराधी की डॉक्टर बेटी को, इस चुनाव में भाजपा का टिकट भी दिया गया। और अब तो खैर, खुद अमित शाह ने अपने मुंह से 2002 में ‘‘सबक सिखाने’’ के श्रेय का दावा ही पेश कर दिया है। बेशक, शाह के खुलकर ऐसा दावा पेश करने में, इस बार गुजरात में विधानसभा चुनाव में नजर आते रुझानों के कुछ न कुछ संकेत जरूर छुपे हुए हैं। लेकिन, इन संकेतों की चर्चा करने से पहले, यह याद दिला देना जरूरी है कि मोदी-शाह की भाजपा ने जब तक खुलकर, 2002 के नरसंहार की अपनी वीरता के लिए खुलकर, वोट मांगने का सहारा नहीं लिया था, तब भी वह चुनाव में सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी धु्रवीकरण के ही आसरे थी, जिसके औजारों में नातिपरोक्ष तरीकों से 2002 की याद दिलाना भी शामिल था।

वास्तव में मोदी-शाह की भाजपा शुरू से ही और हर जगह, इसी तरह के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ही आसरे रही है, पर गुजरात में तो खासतौर पर इसी के आसरे रही है। 2002 का विधानसभाई चुनाव, जिसे मोदी सरकार ने नरसंहार के बाद जल्द से जल्द कराने की कोशिश की थी और तत्कालीन चुनाव आयोग ने ही चुनाव थोड़ा पीछे खिसकाया था, तो जाहिर है कि 2002 के कारनामे के बल पर मोदी ने लड़ा और जीता ही था, 2007 का अगला चुनाव भी मोदी ने ‘‘वो पांच, उनके पच्चीस’’ का मुकाबला करने के नारे पर लड़ा और जीता था! यहां तक कि 2017 का विधानसभाई चुनाव भी, नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से अपने चेहरे पर लडऩे की कोशिश से शुरूआत जरूर की थी, जिसमें ‘‘मुझे नीच कहा’’ का खूब शोर मचाया जा रहा था, लेकिन आगे चलकर मोदी ने कांग्रेस नेता अहमद पटेल के नाम के सहारे, मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की पाकिस्तान की साजिश झूठे प्रचार के रास्ते, सीधे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ही मुख्य सहारा बनाया था। इस बार भी, 2002 की ‘कीर्ति’ की ओर इशारों के अलावा, चुनाव सिर पर आता देखकर भाजपा, कॉमन सिविल कोड का अपना पुराना सांप्रदायिक ध्रुवीकरणकारी दांव निकाल लायी। इसके लिए भाजपा की राज्य सरकार ने एक दिन अचानक, कॉमन सिविल कोड के लिए हाई कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में, एक कमेटी के गठन के निर्णय का एलान कर दिया और अब हिमाचल की ही तरह गुजरात में भी भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इसे पहले नंबर पर रखा गया है। वैसे इसके अलावा भाजपा के घोषणापत्र में, जाहिर है कि सबसे बढक़र मुसलमानों को तंग करने के लिए ही, एंटीरेडीकलाइजेशन सैल के गठन का भी वादा किया गया है।

फिर भी शायद, इसके फौरन बहुत काम करते दिखाई न देने के चलते, गुजरात में भाजपा के लिए चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे, असम के भाजपायी मुख्यमंत्री, हेमंत बिश्व सरमा ने दिल्ली में हुई लिव-इन पार्टनर की जघन्य हत्या की वारदात को, हत्या के आरोपी के धर्म के आधार पर, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाते हुए, 2024 में नरेंद्र मोदी को तीसरी बार जिताने की दलील पेश कर दी, वर्ना शहर-शहर में ‘शहजादों को पैदा होने से नहीं रोका जा सकेगा।’ इसमें भी, एक खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक अपील के साथ ही, 2002 के ‘‘सबक’’ की ओर इशारा जरूर था। बहरहाल, अब जबकि अमित शाह ने खुलकर, उक्त ‘‘सबक सिखाने’’ के श्रेय का दावा कर ही दिया है, बस खुद नरेंद्र मोदी के अपने मुंह से ऐसा दावा करने की कमी रह जाती है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी भी, प्रचार के आखिरी चरण के आते-आते, अपने राजनीतिक विरोधियों को अपनी तुष्टीकरण की राजनीति के लिए आतंकवादियों की हिमायत करने वाले बताने के जरिए, खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों और आतंकवाद का पर्याय ठहराने तक तो जा भी चुके हैं, यहां से ‘हां मैंने सबक सिखाया’ कहना, एकाध ही कदम दूर रह जाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री मोदी खुद अपने मुंह से 2002 के ईनाम में वोट मांंगते हैं या बस इतना भर करने का जिम्मा अपने नंबर दो पर ही छोड़ देते हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी-शाह की भाजपा को अगर सीधे अपने बहुसंख्यकवादी समर्थकों को 2002 की याद दिलाना जरूरी लग रहा है, तो यह कम से कम इतना तो दिखाता ही है कि इस बार के विधानसभाई चुनाव में खुद भाजपा को आसान जीत की उम्मीद नहीं है। यह उसके नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लडऩे के बावजूद है। वैसे प्रधानमंत्री के चेहरे पर तो भाजपा अब दिल्ली नगर निगम का चुनाव भी लड़ रही है, फिर भी गुजरात में अपने पहले प्रधानमंत्री के चेहरे का आकर्षण कहीं ज्यादा काम करेगा। बेशक, इसके पीछे 2017 के गुजरात के चुनाव के अनुभव से निकली अतिरिक्त सावधानी भी होगी, जब कांग्रेस ने भाजपा के पसीने छुड़वा दिए थे और उसे 100 के आंकड़े से नीचे ही रोक दिया था। बेशक, उसके बाद से टार्गेटेड दलबदल-नेता खरीद आदि के जरिए, भाजपा ने राज्य में कांग्रेस को सांगठनिक तौर पर काफी कमजोर कर दिया है और दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के रूप में एक नये दावेदार के उभरने से, भाजपाविरोधी वोट का पिछले अनेक चुनावों की तुलना मेंं ज्यादा बंटना तय है। इसके बावजूद, मोदी-शाह की जोड़ी कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती है, क्योंकि उन्हें इसका बखूबी एहसास है कि कथित गुजरात मॉडल, मेहनतकशों के विशाल हिस्सों की तकलीफें दिन पर दिन बढ़ाने वाला मॉडल साबित हो रहा है। इसके चलते, हिंदुत्ववादी बहुसंख्यकवादी ध्रु,व पर शहरी-संपन्न-सवर्ण गोलबंदी का कोर काफी हद तक बचा रहने के बावजूद, उसके प्रभाव का दायरा घटता जा रहा है और दूसरी ओर मौजूदा निजाम से असंतुष्ट वंचितों का हिस्सा, बहुत एकजुट भले ही नहीं हो, बढ़ता जा रहा है। इसी बदलतेे संतुलन का डर है, जो अपने शहरी-संपन्न-सवर्ण समर्थन आधार को फिर से जोश दिलाने के लिए, मोदी-शाह की जोड़ी 2002 की याद दिला रहा है। अब यह तो 8 दिसंबर को ही पता चलेगा कि भाजपा, इस काठ की हांड़ी में पकाकर एक बार फिर गुजरात में सत्ता का स्वाद ले पाएगी या इस बार काठ की ये हांड़ी ही जल जाएगी।                                                                                              


ढाई दिन की बदशाहत क्या बदशाहत नहीं होती!

ढाई दिन की बदशाहत क्या बदशाहत नहीं होती!

06-Dec-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

देखा ना, मोदी विरोधियों की एंटीनेशनलता खुलकर सामने आ ही गयी। इनसे दुनिया पर भारत की बादशाहत तक नहीं देखी जा रही। उसमें भी पख लगाने लगे। बताइए, जब तक जी-20 की अध्यक्षता नहीं आयी थी, तब तक तो कह रहे थे कि अपना नंबर कब आएगा। इंडोनेशिया तक का नंबर आ गया, अपना नंबर कब आएगा? और अब मोदी जी दुनिया की बादशाहत ले आए हैं, तो भाई लोग कह रहे हैं कि जी-20 की अध्यक्षता तो इकदम्मे टेंपरेरी है। अग्निवीर से भी ज्यादा टेंपरेरी -- सिर्फ एक साल के लिए। और वह भी रोटेशन से। आज टोपी एक के सिर, तो कल वही टोपी किसी और के सिर। टोपी मत देखो, टोपी के नीचे का सिर देखो, जो हर साल बदलता रहता है। वह भी अपने आप। न ज्यादा जोश से सिर लगाने से टोपी, उसी सिर से चिपकी रह जाएगी और न लापरवाही से पहनने से, टैम पूरा होने से पहले उडक़र टोपी किसी और के सिर पर जाकर बैठ जाएगी। अव्वल तो टोपी है, उसे किसी का बादशाहत मानना ही गलत है। फिर भी अगर किसी ने टोपी का ही नाम बदलकर बादशाहत कर भी दिया हो, तब भी यह सिर्फ ढाई दिन की बादशाहत है। ढाई दिन की बदशाहत पर इतना गुमान! हम तो इंसान की पूरी जिंदगी पर गुमान को गलत मानने वालों में हैं और ये ढाई दिन की बादशाहत पर इतना गुमान दिखा रहे हैं। ये तो भारतीय परंपरा नहीं है।

देखा, कैसे मोदी जी के विरोधियों ने इसमें भी अपनी तुष्टीकरण की पॉलिटिक्स घुसा ही दी। ओहदा दिया भी तो बादशाह का। न संस्कृत, न तमिल, सीधे उर्दू का शब्द लिया। मोदी जी बादशाहत वाली बात पर ना करें तो, बिना बात सांप्रदायिक कहलाएं और इसके ताने सुनने पड़ें सो अलग कि अगर बादशाहत भी नहीं मानते, तो इतना शोर-शराबा क्यों? फिर सिर्फ बादशाहत की बात होती, तो मोदी जी हजम भी कर जाते, शहनवाज हुसैन, मुख्तार नकवी वगैरह की तरह। पर ढाई दिन के बादशाह का किस्सा मोदी जी ने भी सुन रखा है। तब अपनी बादशाहत ढाई दिन की कैसे मान लें? एक तो ढाई दिन वाली बादशाहत, मुगल बादशाह हुमायूं ने बख्शी थी और निजाम भिश्ती ने पायी थी। वह भी बादशाह की जान बचाकर, उसे अपनी मशक के सहारे गंगा पार कराने के ईनाम के तौर पर। यानी हर एंगल से तुष्टीकरण वाला मामला हुआ। उसके ऊपर से निजाम भिश्ती की ढाई दिन की बादशाहत को उसके एक ही काम के लिए याद किया जाता है -- भिश्ती ने चमड़े का सिक्का चलवाया! ये लोग क्या कहना चाहते हैं -- मोदी जी दुनिया पर अपनी बादशाहत में जो कुछ भी करेंगे या देश में जो कुछ भी कर रहे हैं, चमड़े के सिक्के चलाने जैसा है! यानी तमाशा ही तमाशा, काम-धाम एक पैसे का नहीं! मोदी जी के विरोधियो, अब तो आडवाणी जी की याद दिलाना छोड़ दो।

ये विरोधी जब मोदी जी के मन की बात सुनते ही नहीं हैं, तो समझेंगे कैसे? वर्ना यह समझना क्या मुश्किल है कि मोदी जी के मकसद के लिए ढाई दिन भी काफी हैं, फिर यह तो एक साल का मामला है। मोदी जी को कौन–सा अपने बाल-बच्चों को दुनिया की बादशाहत विरासत में देकर जाना है, जो वह बादशाहत लंबी चलवाने की सिरदर्दी मोल लेेंगे। उन्हें तो सिर्फ दुनिया का मार्गदर्शन करने के लिए एक संदेश देना है -- संस्कृत में ’वसुधैव कुटुम्बकम’ और अंगरेजी में ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य।’ अब प्लीज यह टैक्रीकल आब्जेक्शन मत करने लगना कि संस्कृत से अंगरेजी में पहुंचते-पहुंचते, यह ‘एक भविष्य’ कहां से आ गया। भूल गए मोदी जी का वैदिक गणित, ए प्लस बी करते हैं, तो एक एबी एक्स्ट्रा आ ही जाता है। यानी सिंपल है -- एक भविष्य, वसुधा और कुटुम्ब के जुडऩे से आया एक्स्ट्रा है। और हां! इस एक भविष्य के लिए भी मोदी जीे के पास एक फार्मूला है, पर यह संस्कृत में नहीं है। फार्मूला है -- सामूहिकता और अलग-अलग सुरों से मिलकर बनने वाली धुन। इतना रास्ता दिखाने के लिए, तो दुनिया के लिए विश्व गुरु का एक साल का क्रैश कोर्स ही काफी है।

हमें पता है कि मोदी जी के  विरोधियों को इसमें भी आब्जेक्शन जरूर होगा। और कुछ नहीं, तो यही पकडक़र बैठ जाएंगे कि जो अपने यहां वसुधैव कुटुम्बकम का पालन नहीं करता हो, सारी दुनिया को वसुधैव कुटुम्बकम कैसे पढ़ा सकता है? माने पढ़ा तो सकता है, पर जो खुद उसका पालन नहीं करता है, दूसरों को सारी दुनिया को कुटुम्ब मानना सिखा नहीं सकता है। सारी दुनिया की छोड़ो, मोदी जी का कुनबा पड़ौसी को तो दुश्मन बनाने में लगा है। ‘2002 के गुजरात’ का पूरे देश को सबक सिखाकर अभी से, 2024 के लिए मोदी जी की गद्दी पक्की कराने में लगा है। कभी लव जेहाद, तो कभी आबादी जेहाद के किस्से फैलाने में लगा है। वह किस मुंह से दुनिया को ‘‘सब एक हैं’’ का पाठ पढ़ाएगा और उसके पढ़ाने से दुनिया में कौन यह पाठ सीख जाएगा?

कोरोना तक को लेकर सांप्रदायिक नफरत फैलाने में तो मोदी जी का इंडिया पूरी दुनिया में नंबर वन पर आया है; उसने विष गुरु का ताज अपने सिर पर सजाया है। इस नफरत विशेषज्ञ का मोहब्बत का कोर्स करेगा कौन? लेकिन, ये सब मोदी जी की कामयाबी से जलने वालों की बहानेबाजियां हैं। वर्ना मोदी जी पढ़ाने के मामले में एकदम प्रोफेशनल हैं, चौबीसों घंटा सातों दिन वाले। चाहे चुनाव के लिए पब्लिक को पढ़ाना हो या विश्व गुरु बनकर बाकी दुनिया को, प्रोफेशनल अपने इमोशन्स को काम के साथ नहीं मिलाता। प्रोफेशनल, अपने पढ़ाने के लिए  पहले खुद करने-मानने की शर्त नहीं लगाता।

और ये जो विरोधी बहुत ढोल पीट दिया, बहुत प्रचार कर दिया का शोर मचा रहे हैं, यह तो कत्तई  झूठा है। एक साल में दो सौ अंतर्राष्ट्रीय बैठकें वह भी पचास जगहों पर यानी देश के सारे राज्यों में। लेकिन, विश्व गुरु के लिए इतना तो कोई ज्यादा नहीं है। इस सब के लिए ताम-झाम तो चाहिए ही चाहिए, वर्ना विदेशी मेहमान क्या कहेंगे! पर देश की  इज्जत बचाने के लिए जो करना जरूरी है, उसके सिवा मोदी जी ने एक छोटा सा फालतू आयोजन किया हो, तो कोई कह दे। और तो और 1 दिसंबर से दुनिया पर उनकी बादशाहत चालू भी हो गयी और एक मामूली–सा राज्याभिषेक तक नहीं किया! निजी गोमूत्र पार्टी तक नहीं। फिर भी विरोधी बात करते हैं, एक मामूली पट्टे का खामखां में ढोल पीटे जाने की।


बैतूल जिले की हरिराम नाई वाली पत्रकारिता सबको भाई

बैतूल जिले की हरिराम नाई वाली पत्रकारिता सबको भाई

03-Dec-2022

रामकिशोर पावर

आदिवासी बाहुल्य जिले में पत्रकारिता का  गिरता स्तर और पत्रकारिता की आड में अपराधी प्रवृति का बोलबाला

80 के दशक में 20 और 2022 के दशक में 420 पत्रकार, कालोनाइजर बिल्डर्स भूमाफिया शराब कारोबारी तक बन गए पत्रकार

बैतूल, अपने आप को पत्रकारिता  से जुड़े होने और  कई पत्रकार संगठनों  के सदस्य और पदाधिकारी होने का धौंस देने वाले  तथाकथित पत्रकारो की बाढ आ गई है। वर्ष 1980 के दशक में बैतूल जिले भर में 20 पत्रकार भी नहीं थे लेकिन आज जिला मुख्यालय पर 420 पत्रकार मिल जाएगें। पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे लोगो की भरमार हो गई है जिनका पत्रकारिता से कोई लेना - देना नहीं है। अपना ढंग से नाम तक लिखना नहीं जानने वाले पत्रकारो का शिक्षा का स्तर चौथी पास तीसरी फेल जैसा है। ऐसे ही लोगो के नित्य नए कारनामें सामने आने लगे है। बीते दिनो सूचना के अधिकार कानून के तहत प्राप्त दस्तावेजो में पता चला है कि समाचार पत्र में प्रकाशित विज्ञापन सरकारी रेट में छपा लेकिन उसका भुगतान समाचार पत्र के पत्रकार / एजेंट ने फिक्स रेट पर करवा लिया। प्रदेश की राजधानी से छपने वाले दैनिक समाचार पत्र का नगरीय निकाय एवं निगमो के द्वारा विज्ञापन दर निर्धारित कर रखी है। इस समाचार पत्र एवं उसके सहयोगी अग्रेंजी समाचार पत्र में बीते वर्ष 2021 संे लेकर अगस्त 2022 तक प्रकाशित 22 ऐसी निविदा है जिनका नगर पालिका एवं नगरीय निकाय तथा नगर निगम द्वारा स्वीकृत रेट पर किया जाना चाहिए था। लेकिन उक्त विज्ञापन का समाचार पत्र में भुगतान भी उसी दर पर किया जाना चाहिए था लेकिन फिक्स रेट पर विज्ञापन एजेंसी के नाम पर 12 लाख 23 हजार रूपये का भुगतान किया गया। उस समय नगर पालिका में पदस्थ लेखाधिकारी एवंआडिट आपत्ति का निराकरण भी दोनो एकाऊंट  एवं आडिट शाखा को गुमराह कर करवा दिया गया। सूचना के अधिकार नियम के तहत बैतूल नगर पालिका ने जिन 5674 पेजो का अवलोकन करवार उन पेजो में ऐसे भुगतान पत्रको की भरमार है जो सरकारी स्वीकृत रेट से दुगना एवं चौगुणा अधिक है। ऐसे मामलो में नगरीय निकायो से लेकर सरकारी विभागो में बडे पैमाने पर पत्रकारिता की आड में अवैध वसूली का कारनामा सामने आया है। गिरोह बना कर सरकारी  विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को ब्लैक मेल करने के आरोप में बैतूल जिले की पुलिस ने अनेको मामले दर्ज किए है। मामला दर्ज होने के बाद आमला में कुछ पत्रकारो को जालसाजी के मामले में अर्थदण्ड एवं सजा भी हुई है। हालांकि आमला के इस मामले में कुछ गेहूं के साथ घुन के भी पीसे गए है। ै। बैतूल पुलिस  और हमारे ब्यूरो से मिली जानकारी के अनुसार  इसके पहले भी  जिले के विभिन्न थानों में उमाकांत शर्मा जैसे कई तथाकथित पत्रकारो के विरूद्ध आपराधिक ममले पंजीबद्ध हुए है जिसमें ब्लैकमेलिंग, धोखाधड़ी,  शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न करने, मारपीट गाली गलौच के आरोप में दर्ज कर चालान किया पेश किया गया है। बगडोना में सारणी पुलिस ने एक फर्जी डाक्टर को गिरफ्तार  किया था जो बाद में तथाकथित पत्रकारिता के क्षेत्र में आकर पत्रकारो की नेतागिरी करने लग गया है। डाक्टर काफी समय तक बैतूल जेल में भी बंद रहा लेकिन उसकी आदत नहीं सुधरी। बैतूल जिले में आई पत्रकारो की बाढ और उस बाढ  की चपेट  में आ रहे बाढ  पीडितो में अब पडौसी जिले के लोग भी आने लगे है। बैतूल जिला मुख्यालय के एक होटल में काम करने वाले तथाकथित पत्रकार उमाकांत शर्मा पिता का नाम नामालूम के विरूद्ध पडौसी छिन्दवाडा जिले में भी आरटीओ अधिकारी बन कर लोगो को ठगने के मुकदमे के तीन अलग - अलग थानो में अपराधिक प्रकरण दर्ज होने की जानकारी मिली है। छिन्दवाडा जिला पुलिस अधीक्षक से इस संदर्भ में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्रस्तुत एक आवेदन के माध्यम से जानकारी चाही गई है कि छिन्दवाडा जिले में बैतूल जिले के किन - किन पत्रकारो के विरूद्ध किन - किन धारा किस - किस पुलिस थानो एवं पुलिस चौकियों में मुकदमे दर्ज हुए है। इसी प्रकार की जानकारी सिवनी एवं बालाघाट जिले की पुलिस से भी मांगी गई है। इधर जानकार सूत्रो ने बताया कि कृषि विभाग बैतूल ने भी जिले के कृषि सेवा केन्द्रो पर फर्जी कृषि अधिकारी बन कर दबीश देने वालो की जानकारी पुलिस एवं विभाग को देने को कहा है। बैतूल जिले की आठनेर पुलिस द्वारा दर्ज शासकीय कार्य में बाधा के मामले में आरोपियों के विरूद्ध जांच विवेचना उपरांत मारपीट का मुकदमा भी दर्ज होना बाकी है। बैतूल जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र में कालोनाइजर, भूमाफिया जमीन की कालााबाजरी एवं फर्जी रजिस्ट्री कांड से जुडे आरोपी भी पत्रकार बन गए है। बैतूल जिला मुख्यालय पर कालोनाइजर सुनील उदयपुरे और स्वर्गीय सुनील झोड के पत्रकार बनने की कहानी भी पत्रकारिता के गिरते स्तर को परिभाषित करती है। इसी कडी में मुलताई में शराब कारोबारी की श्रीमती एवं चिचोली में स्वंय शराब कारोबारी के पत्रकार बन जाने की घटना सबको अच्छी तरह से पता है। जिले में कोयला की कालाबाजारी में लिप्त एक कोयला चोर के अधिमान्य पत्रकार बन जाने की घटना पूरे मध्यप्रदेश में अधिमान्य पत्रकारिता के बाजारू होने की कहानी सुनाते है। पाथाखेडा - सारणी में चिट फण्ड कंपनी चलाने वाले संतोषदास एवं मंतोषदास बैतूल जिले में आने वाले सभी बडे बैनरो के पाथाखेडा - सारणी - बगडोना - शोभापुर कालोनी के नाम पर प्रेस कार्ड लेकर जिले के सबसे अधिक समाचार पत्र के विक्रेत्रा बन गए थे। संतोष दास एवं मंतोषदास के पास 22 समाचार पत्रो एवं 11 न्यूज चैनलो की पत्रकारिता थी। संतोषदास एवं मंतोषदास ने तो बकायदा आफसेट प्रेस तक लगा रखी थी। करोडो - अरबो रूपयो का चिट फण्ड करके नौ दो ग्यारह हो गए संतोषदास का आज तक पता नहीं चल सका है। जिले की पत्रकारिता मे टाक्स मीडिया और फाक्स फीडिया का दौर चल रहा है। सोशल मीडिया पर अपने सबसे अधिक यूजर बता कर लोगो को गुमराह करने वालो की लम्बी चौडी फौज जिले में अवैध एवं अनाधिकृत वसूली कर रही है। बैतूल जिले में अलस्या पारधी से लेकर रेत एवं कोयला माफिया के खैराती रजिस्ट्ररो में दर्ज पत्रकारो की संख्या और उनको मिलने वाली चढौती 2 सौ रूपैया से लेकर 25 हजार रूपैया सप्ताह तक दर्ज है। जिले में सडक निमार्ण करने आई बंसल कंपनी की पिछले बार की होली - दिवाली खैरात लिस्ट में 3 हजार से 10 हजार तक पाने वाले सवा सौ छोटे - बडे पत्रकारो के नाम मौजूद है। समाचार पत्रो के कार्यालयो में काम करने वाले मजदूरो से लेकर कम्प्यूटर आपरेटर तक के नाम जिले के आरटीओ बेरियर की लिस्ट में है। बैतूल जिले में हर सरकारी विभाग में पत्रकारिता कर हरिराम नाई मौजूद है जिसका काम विभाग से पत्रकारो के नाम पर मोटी रकम लेकर उसे छोटी - छोटी रकमो में चेहरा - मोहरा देख कर बाटने का काम ले रखा है। जिला मुख्यालय पर आज भी कई ऐसे लोग मौजूद है जिनका पत्रकारिता से कोई लेना - देना नहीं लेकिन पुलिस कप्तान से लेकर कलेक्टर यहां तक की मुख्यमंत्री की पत्रकारवार्ता मे सामने की पंक्ति में शेखी बघारते मिल जाएगें। ऐसा नहंी कि सरकारी विभाग ही पत्रकारो को पाल रहे है। जिले के कई नामचीन घरानो एवं उद्योग धंधो एवं शराब से लेकर कबाब तक के कारोबारियों ने कुछ लोगो की सेवाए ले रखी है अपनी महीमा को जन - जन तक पहुंचाने के लिए। ऐसे पेशेवर लोग सिर्फ कलम बेच कर पत्रकारिता की आड में धन्ना सेठो का जूठन चाट रहे है। बैतूल जिले की शर्मशार कर देने वाली पत्रकारिता में बाहारी जिले एवं प्रदेशो के लोगो की भी भरमार हो गई है। जिले के कुछ एनजीओ एवं तथाकथित सामाजिक संगठनो ने भी पोषित पत्रकारिता को सरंक्षण प्रदान कर रखा है। जिले में समय घरानो से लेकर रैन बसेरा तक की पत्रकारिता ने जिले को शर्मसार कर दिया है। जिले के अधिकारी बैतूल जिले की गिरती पत्रकारिता एवं उसके स्तरहीन होने का फायदा उठाते चले आ रहे है। जिले के टाप मोस्ट पापुलर अधिकारी प्रिंट मीडिया और चैनल मीडिया के पत्रकारो को अछूत समझ कर सोशल मीडिया के प्लेटफार्मो पर दुकान चलाने वालो के संग अपने जन्मदिन के केट काटते एवं फेसबुक लाइव पर अपनी मन की बात करते आपको मिल जाएगें। जिले के लिए सबसे शर्मनाक बात यह है कि बैतूल कलेक्टर ने लगभग बीते पौने दो वर्षो में एक बार भी बैतूल के पत्रकारो से टेबल टाक करने की कोशिस नहीं की है। ऐसे में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पीत पत्रकारिता के दंश से अधमरा कराह रहा है और जिले के माई बाप जिले के पत्रकारो की सुध लेने के बजाय फर्जी पत्रकारिता को बढावा देने का काम कर रहे है। 

 


आरती श्री संविधान जी की ...

आरती श्री संविधान जी की ...

30-Nov-2022

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आलेख : राजेंद्र शर्मा

राष्ट्रपति जी ने यह ठीक नहीं किया। संविधान दिवस का मौका था तो क्या हुआ, उन्हें मोदी की बात नहीं काटनी चाहिए थी। संविधान में उनकी कुर्सी सबसे ऊंची होने से क्या हुआ, उन्हें पीएम जी के कहे से बाहर नहीं जाना चाहिए था। बताइए, मोदी जी ने संविधान दिवस पर पब्लिक को उसके असली कर्तव्यों की याद दिलायी। पब्लिक को उसके कर्तव्यों की याद ही नहीं दिलायी, उसे इसका ज्ञान भी दिया कि अब जब अमृतकाल चल निकला है, पब्लिक का एक ही सबसे बड़ा काम है –कर्तव्यों का पालन करना। और कर्तव्यों में सबसे बड़ा कर्तव्य है, जय-जयकार करना और ऐसे जय-जयकार करना कि दुनिया सुने और कहे कि देश हो, तो ऐसा। सारी दुनिया के राज करने वाले सुनकर रश्क करें -- राज हो, तो मोदी जी जैसा। अब कामन सेंस की बात है कि मोदी जी के कर्तव्य का महत्व बताने से भी कोई सब तो अपने आप कर्तव्य का पालन नहीं करने लग जाएंगे। उल्टे पहले की तरह बहुत से तो अमृत काल में भी अधिकार-वधिकार का शोर मचाकर, जय-जयकार में विघ्र डालने लग ही जाएंगे। तब तो मोदी जी-शाह जी का कर्तव्य भी होगा और अधिकार भी कि चाहे यूएपीए लगाएं या सेडीशन लगाएं, पर अधिकार की आवाजों को बंद कराएं।

विरोध की कर्कश आवाजों को बंद कराना है, तो आवाज उठाने वालों को जेल में डालना होगा। देश यानी राज की जय-जयकार का विकास करना है, तो जेलों का विकास जरूरी है। पर राष्ट्रपति जी ने तो सब के सामने कह दिया कि जेलों का विकास तो कोई विकास ही नहीं है। विकास तो तब होगा, जब जेलें बंद की जा रही होंगी! कहां तो मोदी जी-शाह जी की सरकार सेडीशन के बाद, यूएपीए में जेल भेजने का हर रोज नया-नया रिकार्ड बनाने का कर्तव्य पूरा करने में लगी है और कहां राष्ट्रपति जी इसे विकास मानने से ही इंकार कर रही हैं! राष्ट्रपति का क्या यही कर्तव्य है? माना कि राष्ट्रपति जी राष्ट्र की प्रथम नागरिक हैं, पर हैं तो नागरिक ही! जय-जयकार करना तो उनका भी मौलिक कर्तव्य है। अगर प्रथम नागरिक ही जय-जयकार करने का अपना कर्तव्य पूरा करने में कोताही बरतेगा, तो आखिर वाले करोड़ों नागरिकों से शाह जी, मोदी जी की जय-जयकार कैसे कराएंगे। राष्ट्रपति जी गांधी जी का फार्मूला कैसे भूल गयीं--आखिर वाले बंदे पर नजर रखो!

पर राष्ट्रपति जी संविधान को तो गलत समझीं सो समझीं, गांधी जी के अखिरी आदमी वाले फार्मूले को भी गलत समझ बैठीं। मोदी जी की तरह आखिरी आदमी को जय-जयकार करने का उसका कर्तव्य याद दिलाना तो दूर रहा, उसके अधिकारों की, बल्कि उसे अधिकार नहीं मिलने की ही याद दिलाने लगी गयीं। कहने लगीं कि वह जहां से आती हैं, वहां तो गरीबों को अपने अधिकारों का पता तक नहीं है, अधिकार हासिल करने की बात तो दूर रही। मामूली-मामूली बातों के लिए गरीबों की पूरी-पूरी जिंदगियां जेलों में गुजर जाती हैं। न जमानत, न सुनवाई, न रिहाई। सजा भी नहीं, बस जेल। घर वाले भी छुड़ाने के लिए कुछ करने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं, क्योंकि कुछ किया तो जेल गया बंदा तो नहीं छूटेगा, पर घर के बर्तन-भांडे तक बिक जाएंगे। और भी न जाने क्या-क्या? राष्ट्रपति जी क्या कहना चाहती हैं -- मोदी जी राज के साढ़े आठ साल बाद भी गरीबों के लिए अमृतकाल की जगह, गोरा राज काल ही चल रहा है! कहां तो मोदी जी भारत को विश्व गुरु बना रहे हैं, साल भर के लिए ही सही, जी-20 की अध्यक्षता की ट्राफी जीतकर ला रहे हैं और कहां राष्ट्रपति जी कह रही हैं कि गरीब प्रजा अब भी, गोरा राज काल में जी रही है। ऊपर से चीफ जस्टिस साहब उनकी हां में हां मिला रहे हैं। यह तो मोदी जी के साथ न्याय नहीं है।

राष्ट्रपति जी, आप भी तो प्रथम नागरिक कर्तव्य निभाओ, मोदी जी के राज के भारत के अमृत काल में गरीबों की बात कर के यूं बदनाम ना कराओ। अधिकार-वधिकार के चक्कर में मत पड़ो, बराबरी की बात तो खैर, जुबान पर भी मत लाओ। हां! चाहे तो संविधान का ही लगाओ, पर सिर्फ जयकारा लगाओ! अथ आरती श्री संविधान जी की जो कोई नर-नारी गावे...।   


करेंगे तो कहोगे कि करता है!

करेंगे तो कहोगे कि करता है!

28-Nov-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

अब क्या सुप्रीम कोर्ट को भी क्या मोदी विरोधियों वाली बीमारी लग गयी है। बताइए, मोदी जी जो भी करें, उसी से दिक्कत है। चुनाव आयोग में सीट छ: महीने से ज्यादा खाली रखी, तो प्राब्लम कि सीट इतने दिन खाली क्यों रखी। अब जब ताबड़तोड़ अरुण गोयल साहब को चुनाव आयोग में बैठाया है, तो कहते हैं कि ऐसी बिजली की–सी तेजी कैसे? इसमें कोई गड़बड़ी तो नहीं है! सरकार से अपाइंटमेंट की फाइल तलब कर के माने। पीएम जी करेंगे, तो भी कहेंगे कि करता है!

खैर! जब देसी विपक्ष वाले ही नहीं, दुनिया भर के विरोध करने वाले भी, मोदी जी को करने से नहीं रोक पाए, तो सुप्रीम कोर्ट क्या ही रोक लेगा। मोदी जी न रुकेंगे, न झुकेंगे और करने के पथ से पीछे कभी नहीं हटेंगे। और भाई जब करने वाला करता है, तो जाहिर है कि अपने मन की ही करेगा। आखिर, 130 करोड़ लोगों ने और किस लिए चुना है; दूसरों के मन की करने के लिए! दूसरों की मुंहदेखी करने की उम्मीद मोदी जी से कोई नहीं करे। जब गोयल साहब को कुर्सी पर बैठाने की मन में आ गयी, फिर देर क्यों लगती? इस्तीफा, अपाइंटमेंट, जॉइनिंग, सब फटाफट होना ही था। किस की हिम्मत है, जो पीएम के मन की बात पूरी होने में देरी कराए! नियम-कायदों की क्या औकात जो पीएम की मन की बात के रास्ते में आएं। रही बात बिजली की रफ्तार की, तो मोदी जी की सरकार की तो यही तूफानी चाल है। लटकाने, भटकाने, अटकाने के जमाने तो कब के जा चुके ; अब तो मोदी जी की मन की बात को अटकाने वाले कायदे-कानूनों को ही लटकाने के दिन चल रहे हैं। अगर एक सौ तीस करोड़ का पीएम भी अपने मन की नहीं कर सकता है, तो फिर कौन करेगा!

पचहत्तर साल बाद तो कहीं जाकर देश को एक करू नेता मिला है; उसके भी करने में कोर्ट-वोर्ट टांग अड़ाने लग जाएं, यह क्या अच्छी बात है! मोदी जी अब नहीं रुकेंगे। उल्टे जानकार सूत्रों से आयी लेटेस्ट खबर तो यह है कि मोदी जी ने पहले अठारह घंटे को बढ़ाकर बीस किया, अब बाईस घंटे काम कर रहे हैं। कोर्ट की टोका-टोकी के बाद, दो घंटे और बढ़ा दिए तो!


श्रद्धा के गिद्ध-भोज के लिए जुटान

श्रद्धा के गिद्ध-भोज के लिए जुटान

26-Nov-2022

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आलेख : बादल सरोज

दिल्ली के महरौली में 27 वर्ष की युवती श्रद्धा वाल्कर के साथ हुयी वीभत्सता ने पूरे देश के इंसानों को सन्न और स्तब्ध करके रख दिया है। उसकी पहले निर्ममता के साथ हत्या की गयी, उसके बाद उसके शरीर टुकड़े–टुकड़े करके अलग–अलग दिन इधर–उधर फेंक दिए गए।  हत्यारा  - जो श्रद्धा का लिव इन पार्टनर - था, गिरफ्तार कर किया जा चुका है। श्रद्धा नहीं हैं "यत्र नारी पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता" का जाप करने वाले देश में अकेलीl केवल नवम्बर महीने में, अभी तक, इस तरह की 5 वारदातें घट चुकी हैं।  

इसी दिल्ली के बदरपुर में एक 22 साल की लड़की आयुषी की पहले निर्ममता से पिटाई की गयी और उसके बाद सीधे सीने में  गोली मारकर हत्या करके लाश को ठिकाने लगाने के लिए लाल रंग के सूटकेस में बंद कर उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में यमुना एक्सप्रेस वे पर छोड़ दिया गया। आयुषी का अपराध अपनी पसंद का जीवन साथी चुनना था और उसके साथ यह वारदात अंजाम देने वाला खुद उसका पिता था।  

तीसरी वारदात आजमगढ़ के पश्चिम पट्टी गांव की है, जहां दो वर्षों तक साथ रहने वाली साधना प्रजापति को छोड़कर जब उसका पार्टनर विदेश चला गया और इस बीच साधना ने किसी और से शादी कर ली, तो उसके उस कथित पूर्व प्रेमी प्रिंस यादव ने उसे वापस लाने में असफल रहने पर गला दबाकर हत्या कर दी और उसके बाद उसकी देह के 5 टुकड़े कर दिए।  कटे हुए हाथ-पांव  कुएं में डाल दिए और सिर को गांव से करीब 6 किलोमीटर दूर एक पोखर में फेंक दिया। फिलहाल पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है।

मध्यप्रदेश में इस तरह की दो घटनाएं घटीं। जबलपुर में 25 साल की युवती शिल्पा झरिया की पहले गला काटकर हत्या की गयी, इसके बाद उसके तीन वीडियो शूट किए गए, जिसमें बिना किसी ग्लानि भाव के उसके हत्यारे कथित प्रेमी अभिजीत पाटीदार ने बाकायदा रनिंग कमेंट्री करते हुए "बाबू स्वर्ग में फिर मिलेंगे" का फेयरवेल सन्देश भी रिकॉर्ड किया है।

मध्य प्रदेश के ही शहडोल में एक पति राम किशोर पटेल अपनी पत्नी सरस्वती पटेल को जंगल में ले गया और कुल्हाड़ी से काटकर उसके टुकड़े–टुकड़े कर दिए। सिर और धड़ को अलग-अलग जगहों पर दफना दिया।  

जघन्यता को भी शर्मिन्दा करने वाली यह पाँचों वारदातें इसी नवम्बर महीने की हैं और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अभी इस नवंबर का एक सप्ताह बाकी है। किसी भी सभ्य समाज के लिए एक के बाद एक घट रही यह वारदातें चिंता का विषय होनी चाहिए। खुद के भीतर बढ़ रही सड़न के प्रति फ़िक्र और उससे निजात पाने की बेचैनी का कारण बनना चाहिए। देश भर में इसे लेकर एक बहस छिड़नी चाहिए कि आखिर यह हालत क्यों और कैसे आयी। यह बर्बरता जिसका नतीजा है, उस  महिला विरोधी मानसिकता को दूर करने के उपायों की तलाश और जो इस तरह के पुरुष ढाल रही है, उस परवरिश के तरीकों को पूरी तरह बदलने के कदम उठाने के लिए आम राय बनाई जानी चाहिए ; मगर हुआ इससे ठीक उलटा है।  बजाय इसके कि यह घिनौना वहशीपन चर्चा में आता, गिद्धों के झुण्ड श्रद्धा के गिद्ध भोज के लिए झपट पड़े और एक 27 साल की युवती की टुकड़े–टुकड़े की गयी देह को अपने विभाजनकारी  साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का एक जरिया बना लिया। गुजरात के विधानसभा चुनाव और दिल्ली की म्युनिसिपैलिटी के चुनाव अभियान का भी मुख्य मुद्दा बनाकर झंडे पर लगा लिया।  असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा गुजरात की चुनावी सभाओं में बोलते हुए चेतावनी दे गए कि "अगर उनके नरेंद्र मोदी जैसे सर्वशक्तिशाली नेता नहीं जीते, तो देश भर में आफताब पैदा हो जायेंगे।" दिल्ली तक आते–आते उनके भाषण और गरम हो गए और बिना किसी शर्म–लिहाज के उन्होंने इसे आफताब बनाम राम, आफताब बनाम मोदी बना डाला। दिल्ली की चुनावी सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि : "हमें दिल्ली को बचाना है, देश को बचाना है, इसके लिए शक्ति की जरूरत है. हमारे देश को आफताब नहीं चाहिए, भगवान राम चाहिए, मोदी जैसा नेता चाहिए।"  

यह अकेले असम के मुख्यमंत्री का प्रलाप नहीं है। यह साम्प्रदायिक की धमन भट्टी से पिघला लावा था, जिसे अकेले दिल्ली के म्युनिसिपल चुनाव में उतारे गए केंद्र सरकार के सभी मंत्रियों, चार मुख्यमंत्रियों, यूपी–बिहार के मंत्री–विधायकों सहित 450 सांसदों और विधायकों के श्रीमुखों से दिल्ली और गुजरात के हर गली–मोहल्ले–गांव तक फैलाया जा रहा है, ताकि केंद्र और राज्य सरकारों की हर मोर्चे पर विफलताओं पर पर्दा डालकर अकेले इस बहाने ध्रुवीकरण की लहर पैदा कर उसमें अपनी नैया पार की जा सके। अपने पिता के हाथों मारी गयी बदरपुर की आयुषी, मारने के बाद टुकड़े–टुकड़े की गयी आजमगढ़ की साधना प्रजापति, शहडोल की सरस्वती पटेल, जबलपुर की शिल्पा झरिया की इसी तरह की वहशियाना हत्याएं इन गिद्धों के किसी काम की नहीं है ; क्योंकि उन्हें मारने वालों के नाम  रामकिशोर, अभिजीत पाटीदार, प्रिंस यादव है, आफताब पूनावाला नहीं है। श्रद्धा या उसी की तरह की यातनापूर्ण मौत की शिकार हुए देश की बेटियों के साथ उनकी कोई हमदर्दी नहीं है -- अगर होती तो वे नवम्बर के अब तक गुजरे तीन सप्ताहों में शिकार बनी इन बाकी लड़कियों पर भी बोलते। अपनी पार्टी की अगुआई में चलने वाली प्रदेश सरकारों में स्त्रियों की लगातार बढ़ती दुर्दशा को रोकने के लिए कुछ करते।   

और जैसी कि इस हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता की लाक्षणिक विशेषता है, वे एक साथ सारे मोर्चे खोलते हैं। इस बार भी धर्म के आधार पर साम्प्रदायिकीकरण के साथ ही वे अपने सामाजिक एजेंडे को भी तेजी से आगे बढ़ा रहे है। श्रद्धा के बहाने सिर्फ वे अपनी चुनावी गोटी सर करने के लिए ध्रुवीकरण भर नहीं कर रहे हैं, अपने पूरे कुनबे और उसके भोंपुओं को महिलाओं को मध्ययुगीन दड़बे में वापस धकेलने का माहौल बनाने के काम पर भी लगा दिया है। "लिव इन" को धिक्कारा जा रहा है और भले हाल ही में सुप्रीम कोर्ट तक ने इसे वयस्क नागरिकों का अधिकार बताते हुए जायज करार दिया हो,  लिव–इन को ही सारे हादसों की एकमात्र वजह बताया जा रहा है। लिव–इन में रहने वाले जोड़ों को मकान किराए पर न देने और इस तरह एक प्रकार के सामाजिक बहिष्कार की यलगार लगाई जा रही। बिना पिता की मर्जी और परिवार की सहमति के शादी करने वाली लड़कियों पर फटकार सुनाई जा रही हैं।  सदियों की मुश्किल लड़ाईयों के बाद हासिल किये गए शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन में बराबरी के महिलाओं के अधिकार पर मनु की तोप तानी जा रही है। कन्यादान और कर्मकाण्ड से होने वाली शादियों का माहात्म्य उस देश को बताया जा रहा है, जहां पारम्परिक शादियों के बाद महिलाओं की क्या दशा है, इसे दोहराने की जरूरत नहीं है। खुद सरकारी आंकड़े इन विवरणों से भरे हुए हैं।   

श्रद्धा, आयुषी, साधना, शिल्पा और सरस्वती को इंसाफ मिलना चाहिए। अपराधियों को जल्द से जल्द अधिकतम संभव सजा मिलनी ही चाहिए। जो इन लगभग एक जैसी  हत्याओं के अपराध की जघन्यता की बजाय अपराधी का धर्म देखकर अपना रुख तय करते हैं, वे भी शरीके जुर्म हैं। उन्हें बेनकाब और अलग–थलग किया जाना चाहिए। यह पक्का किया जाना चाहिए कि उन्नाव और बदायूं के ऐसे ही अपराधियों की तरह वे छूट नहीं जाएंगे। हाथरस और कठुआ के वहशियों की तरह सम्मानित नहीं किये जायेंगे। किंतु सिर्फ इतना भर काफी नहीं होगा। यह सब करते हुए दिमाग में बैठे उस रोग से भी लड़ना होगा, जो स्त्री को इंसान के रूप में स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। महिलाओं को फिर से अँधेरे में धकेल सती युग में पहुँचा देने की साजिशों से भी जूझना होगा।  


आबादी की चिंता की आड़ में सांप्रदायिक राजनीति!

आबादी की चिंता की आड़ में सांप्रदायिक राजनीति!

25-Nov-2022

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आलेख : राजेंद्र शर्मा

पिछले हफ्ते दुनिया की आबादी ने 8 अरब का आंकड़ा पार कर लिया। यूनाइटेड नेशन्स पॅापूलेशन फंड ने मंगलवार को इसका एलान किया। बहरहाल, इसके साथ ही उसने हम भारतीयों के लिए ध्यान देने वाला एक आंकड़ा और दिया है। यह आंकड़ा बताता है कि दुनिया की आबादी में 100 करोड़ की पिछली बढ़ोतरी में, भारत ने ही 17.7 करोड़ जोड़े हैं यानी उसका योगदान 17.7 फीसद रहा है। दूसरी ओर, आबादी के मामले में भी भारत के मुख्य प्रतिद्वंद्वी, चीन ने इसमें 7.3 करोड़ यानी हमसे आधे से भी कम, 7.3 फीसद का ही योगदान दिया है। इतना ही नहीं, यूनाइटेड नेशन्स पॉपूलेशन फंड का ही आंकलन बताता है कि  विश्व आबादी में अगले एक अरब की बढ़ोतरी में, चीन का योगदान ऋणात्मक रहेगा यानी उसकी आबादी वृद्घि के रुकने के बाद, अब घटनी शुरू हो रही है। लेकिन, भारत के मामले में आबादी में वृद्घि अभी रुकने की मंजिल दूर है।

इसलिए, इस पर कोई विवाद नहीं होगा कि भारत में आबादी की बढ़ोतरी की चुनौती अब भी बनी हुई है, जिससे निपटने के लिए प्रयत्नों में कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन, सवाल यह है कि हमारे यहां बहुत बार जो इसे ‘आबादी विस्फोट’ कहकर सनसनी पैदा कर दी जाती है और जोर-जबर्दस्ती वाले उपायों की मांगें की जाने लगती हैं, क्या उसकी कोई वजह है? और इस समस्या को सांप्रदायिक रंग देने से तो लाभ की जगह वास्तव में नुकसान ही हो सकता है।

सचाई यह है कि भारत निश्चित रूप से और तेजी से, अपनी आबादी को स्थिर करने की ओर बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की उसी रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत में आबादी वृद्घि स्थिर होती नजर आती है और उसी रिपोर्ट के अनुसार, यह इसी का संकेतक है कि इस मामले में देश की नीतियां भी और स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाएं भी, जिसमें परिवार नियोजन सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी शामिल है, अपने प्रयासों में कामयाब हो रही हैं।

इस सिलसिले में सबसे महत्वपूर्ण रुझान है देश में कुल फर्टिलिटी रेट में गिरावट का। इस रेट का, जो मोटे तौर पर औसतन एक महिला के प्रसवों की संख्या को दर्शाती है, 2.1 पर आ जाना, आबादी के स्थिर होने के लिए काफी समझा जाता है। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 2.2 से घटकर, अब 2.0 ही रह गयी है। इसका अर्थ है, आबादी में वृद्घि की रफ्तार पर तेजी से ब्रेक लगना। बेशक, आबादी के बढऩे पर पूरी तरह ब्रेक लगना अभी भी दूर है, पर उसकी बढ़ोतरी की रफ्तार पर तेजी से ब्रेक लग रहा है।

बेशक, पूरे देश में फर्टिलिटी रेट एक जैसी ही नहीं है, फिर भी देश के कुल 31 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में, जहां देश की करीब 70 फीसद आबादी रहती है, यह दर पहले ही आबादी स्थिरता के लिए जरूरी 2.1 से नीचे जा चुकी है। साफ है कि आबादी नियंत्रित करने के सोच से भिन्न, ‘परिवार नियोजन’ की धारणा पर केंद्रित भारत के प्रयास, निश्चित रूप से कारगर हो रहे हैं और उन्हें ही आगे ले जाने की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र संगठन की वही रिपोर्ट बताती है कि फर्टिलिटी रेट में यह गिरावट परिवार नियोजन के आधुनिक तौर-तरीकों के बढ़ते पैमाने पर अपनाए जाने का परिणाम है। परिवार नियोजन के इन तरीकों का अपनाने वालों का हिस्सा 2015-16 में जहां 47.8 फीसद था, 2019-20 तक बढक़र 56.5 फीसद हो चुका था। दूसरी ओर इसी अवधि में परिवार नियोजन के उपायों की ‘पूरी न हो सकी मांग’ में पूरे चार फीसद की कमी हो गयी।

संयुक्त राष्ट्र संगठन का ही कहना है कि, ‘यह परिवार नियोजन से संबंधित जानकारियों तथा सेवाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय बढ़ोतरी को दिखाता है। संक्षेप में यह दिखाता है कि भारत की राष्ट्रीय आबादी नीतियां तथा स्वास्थ्य व्यवस्थाएं, काम कर रही हैं।’ विडंबना यह है कि वर्तमान निजाम और उसके संचालक संघ परिवार, अपने विचारधारात्मक दुराग्रह के चलते, आबादी के मोर्चे पर देश की यह प्रगति देखना ही नहीं चाहता है। उल्टे वह आबादी विस्फोट का हौवा खड़ाकर, एक तो आबादी बढऩे के वास्तविक कारणों के रूप में, गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन की सचाइयों पर पर्दा डालना चाहता है। इससे भी बढक़र वह आबादी के सवाल को, अपने सांप्रदायिक प्रचार का अभियान बनाना चाहता है, ताकि गरीबी तथा पिछड़ेपन के खिलाफ जन-असंतोष से, वर्तमान शासन को बचाया जा सके। अचरज नहीं कि मुसलमानों की बढ़ती आबादी से हिंदुओं के  लिए ‘‘खतरे’’ का प्रचार, आज आबादी के रुझानों की सारी सचाइयों पर हावी है।

वर्ना दुनिया भर में आबादी के रुझानों के सभी अध्ययन, एक स्वर से यह बात कहते हैं कि आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार का किसी समाज में बहुआयामी गरीबी यानी पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि के मामले में गरीबी की स्थिति से सीधा संबंध है। यह गरीबी जैसे-जैसे घटती है, वैसे-वैसे संतानोत्पत्ति और इसलिए आबादी भी, इन्हीं कारकों से मृत्यु दर में होने वाली कमी से भी तेजी से बढ़ती है। बेशक, सामाजिक-सांस्कृतिक कारक भी आबादी में वृद्घि पर प्रभाव डालते हैं, पर उनका प्रभाव बहुआयामी गरीबी की स्थिति से संचालित रुझान को धीमा या तेज करने की ही भूमिका अदा करता है।

इस मामले में शिक्षा की भूमिका तो इतनी महत्वपूर्ण है कि जनसांख्यिकीविदों का तो बहु-उद्धृत सूत्र ही है कि ‘शिक्षा ही बेहतरीन गर्भ निरोधक है।’ अपेक्षाकृत संपन्न विकसित देशों का अनुभव ही नहीं, खुद भारत में शिक्षा व स्वास्थ्य की दृष्टि से, देश की विशाल हिंदी पट्टी के मुकाबले कहीं संपन्न, केरल जैसे राज्यों का आबादी में वृद्घि की दर का अनुभव भी इसी की गवाही देता है। वास्तव में केरल का अनुभव तो, जहां आधी आबादी मुसलमानों तथा ईसाइयों की ही है, इस सचाई को भी रेखांकित करता है कि बड़े परिवारों का संबंध, धर्म या धार्मिक परंपराओं से कम है और शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं व आम जीवनस्तर से ही ज्यादा है।

आम तौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति व अल्पसंख्यक समुदाय चूंकि ज्यादा वंचितता का जीवन जी रहे हैं, उनके बीच जन्म दर संपन्नतर तबकों के मुकाबले ज्यादा है। फिर भी, शिक्षा समेत परिवार नियोजन की बढ़ती जागरूकता के चलते, आम तौर पर सभी तबकों के बीच आबादी में वृद्घि की रफ्तार घट रही है और जिन तबकों में यह रफ्तार ऐतिहासिक रूप से जितनी ज्यादा रही है, अब उतनी ही तेजी से घट भी रही है।अचरज नहीं कि इस सदी की पहली दहाई के दौरान यानी 2001 तथा 2011 की जनगणनाओं के बीच, हिंदुओं की आबादी में बढ़ोतरी दर 16.76 फीसद ही रह गयी, जो इससे पहले के एक दशक में दर्ज हुई 19.92 फीसद की वृद्घि दर से, 3.16 फीसद की कमी को दिखाता था। लेकिन, इसी एक दशक के दौरान मुस्लिम आबादी की वृद्घि में और तीखी गिरावट हुई और यह दर 24.60 फीसद पर आ गयी, जबकि इससे पहले के दशक यानी 1991-2001 के बीच यही दर 29.52 फीसद थी।

यानी आबादी में वृद्घि दर में दोनों मुख्य समुदायों के मामले में उल्लेखनीय कमी का रुझान है, लेकिन जहां हिंदुओं के मामले में एक दशक में वृद्घि दर 3.16 फीसद कमी हुई है, मुसलमानों के मामले में यह कमी और भी ज्यादा है, 4.92 फीसद। संकेत स्पष्ट है कि चंद दशकों में ही हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी की वृद्घि दर बराबर हो जाएगी। बेशक, तब तक देश की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा कुछ और बढ़ चुका होगा। लेकिन कितना?

1991 की जनगणना के समय देश की कुल आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 12.61 फीसद था। बीस साल में, 2011 की जनगणना के समय, यह 14.23 फीसद हो गया यानी बीस साल में डेढ़ फीसद से जरा सा ज्यादा बढ़ गया। गणनाओं के अनुसार, बढ़ोतरी की अगर यही दर बनी रहे तब भी मुसलमानों की आबादी को हिंदुओं से ज्यादा होने में 247 साल लग जाएंगे। यह तब है, जब आबादी में बढ़ोतरी की दरें ज्यों की त्यों रहें। लेकिन, जैसाकि हम पीछे देख आए हैं, ये दरें तो तेजी से गिर रही हैं और विभिन्न समुदायों की वृद्घि दरों में अंतर तेजी से सिमट रहा है।

इसके बावजूद, आबादी की चिंता के बहाने से संघ परिवार का अल्पसंख्यकविरोधी दुष्प्रचार मोदी के दूसरे कार्यकाल में न सिर्फ पहले से तेज हो गया है, बल्कि यह प्रचार सिर्फ यही झूठी धारणा फैलाने तक सीमित नहीं रहा है कि भारत में मुसलमानों की बढ़ती आबादी से, हिंदुओं के अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा है। आज बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक दुष्प्रचार में इसे पूरे देश में न सही, खास-खास इलाकों में, जिनमें सीमावर्ती इलाके खास हैं, आबादी का धार्मिक संतुलन बदलने यानी गैर-हिंदू आबादी अनुपातहीन तरीके से बढऩे के प्रचार पर खासतौर पर जोर दिया जाता है। और खास संघ परिवारी शैली में कथित रूप से गैर-हिंदू आबादी के बढऩे को, देश की सुरक्षा के लिए खतरे तक पहुंचा दिया जाता है।

वास्तव में देश के पूर्वी हिस्से में, खासतौर पर प0 बंगाल तथा असम समेत उत्तर-पूर्व में बंग्लादेशियों की अवैध बाढ़ के अतिरंजित प्रचार के सांप्रदायिक दावों से सभी परिचित हैं। इसी प्रचार के हिस्से के तौर पर मोदी के दूसरे कार्यकाल के पहले ही साल में नागरिकता कानून में ही संशोधन कर सांप्रदायिक तत्व जोडऩे के लिए, विवादास्पद नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लाया गया, जिसको बंगाल के विधानसभाई चुनावों में भाजपा ने भुनाने की पूरी-पूरी कोशिश भी की थी। उधर असम में, उसी अतिरंजित प्रचार के आधार पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की अपडेटिंग की आम असमवासियों के लिए बहुत ही तकलीफदेह तथा राज्य के लिए कुल मिलाकर बहुत नुकसानदेह कसरत की गयी, जिसके नतीजों से अब खुद संघ परिवार किसी न किसी बहाने से हाथ झाडऩे की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उनकी उम्मीद के विपरीत, इस पूरी कसरत में जिन करीब 18 लाख लोगों की नागरिकता पर सवालिया निशान लगे हैं, उनमें ज्यादा संख्या हिंदुओं की ही है।

कहने की जरूरत नहीं है कि आबादी के प्रश्न को अल्पसंख्यक विरोधी नफरत फैलाने का हथियार बनाया जाना, हमारे देश में आबादी का स्थिरीकरण करने की राह की मुश्किलें ही बढ़ा सकता है। लेकिन, संघ परिवार की विभाजनकारी राजनीति की ठीक यही भूमिका तो है। यह दूसरी बात है कि छोटे परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, न हिंदुत्ववादियों के ‘मुसलमानों की आबादी बढऩे के खतरे’ के शोर से धीमी पड़ रही है और न मुस्लिम तत्ववादियों के फरमानों से।                                                      


अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर!

अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर!

23-Nov-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

मोदी जी को इस देश को विश्व गुरु बनाने के लिए और क्या-क्या त्यागना पड़ेगा! पहले, भाई लोगों ने बेचारे से अच्छे दिनों का त्याग कराया। मजाल है, जो पिछले पांच-छ: साल में बेचारों ने एक बार भी अच्छे दिनों का जिक्र तक किया हो। वादा वगैरह करने की तो खैर बात ही भूल जाओ। उसके बाद भाई ने नये इंडिया को पकड़ा, तो वह भी बेचारे को राष्ट्र हित में जल्द ही छोडऩा पड़ गया। दूसरी पारी शुरू होने से पहले ही। दूसरी पारी शुरू होने के बाद तो अगले ने भूले से भी कभी नये इंडिया का जिक्र नहीं किया। अब स्वतंत्रता की 75वीं सालगिरह के बाद से अमृत काल पकड़ा जरूर है, पर लगता है कि साल पूरा होते-होते बेचारे को इस का भी त्याग करना पड़ेगा। अब बताइए, बेचारों के आठ साल के राज की एक विश्व स्तर की नयी और एकदम ऑरीजिनल खोज है -- बुलडोजर राज। अब वह भी खतरे मेें है और वह भी अदालत के हाथों।

असम की हाई कोर्ट कहती है कि -- सरकार बुलडोजर नहीं चला सकती। न किसी के घर पर, न दुकान पर। आदेश किसी का भी हो, सरकार बुलडोजर चला ही नहीं सकती है। कहां तो बेचारे हेमंत बिश्व सरमा जी गुजरात में मोदी जी के 2024 की जीत मांगने के साथ-साथ, गुजरातियों को बुलडोजर का महत्व समझा रहे थे और कहां पीछे से हाई कोर्ट ने उनका बुलडोजर ही जाम कर दिया। और सरकार के बुलडोजर चलाने पर रोक सिर्फ असम तक थोड़े ही रहेगी। कहते हैं -- बात निकलेगी, तो फिर दूर तक जाएगी। यूपी-एमपी वगैरह के बुलडोजर तक। और वहीं क्यों देश भर के बुलडोजरों तक। केसरिया सरकारों से जो इतने सारे बुलडोजर अर्जेंट आर्डर देकर खरीदवा लिए हैं, वे किस काम आएंगे? खड़े-खड़े जंग लग जाएगा बुलडोजरों में। डीजल चूहों के पीने के घोटालों का शोर मचेगा, सो ऊपर से। सच पूछिए तो फिर मोदी जी 2024 में जीत भी गए, तो क्या कर लेंगे, जब विजय जुलूस में सवार होने के लिए बुलडोजर ही नहीं होगा।

एक जमाना वो भी था, जब देश में बुलडोजर की ही चलती थी। सडक़ों पर भी, मोहल्लों में, चुनावों में भी, अदालतों में भी -- हर जगह सिर्फ बुलडोजर चलता था। यूपी से चला जरूर, पर मोदी जी के आशीर्वाद से बुलडोजर देश के कोने-कोने तक पहुंच गया। और तो और उत्तराखंड से लेकर, असम की पहाडिय़ों तक। और सिर्फ देश में भी कहां रुका बुलडोजर। इंग्लैंड तक के पीएम, जॉन्सन साहब सीधे अहमदाबाद में आए और बुलडोजर पर सवार होकर फोटो खिंचाए। और तो और, 75वीं सालगिरह के जश्न में अमरीका तक में भारतीय बुलडोजर पर सवार होकर जुलूस में पहुंच गए। पर जब लगने लगा कि बुलडोजर पर लादकर मोदी जी इंडिया को विश्व गुरु की गद्दी पर पहुंचा ही देेंगे, तभी भारत से जलने वालों ने भांजी मार दी। अमरीका में सिटी कार्पोरेशन ने बुलडोजर चलाने पर ही जुर्माना लगा दिया, भगवाप्रेमियों को माफी मांगनी पड़ी, सो ऊपर से। और अब, अमरीका तो अमरीका, भारत में भी अदालतों को बुलडोजरों के चलने पर कानून की चिंता होने लगी। अब तो बस सबसे बड़ी अदालत के यह कहने की ही कसर है कि उसकी इजाजत के बिना बुलडोजर नहीं चलेगा। अगर सवारी के लिए बुलडोजर ही नहीं होगा, तो अमृतकाल क्या पैदल चलकर आएगा!

शुक्र है कि केसरिया भाइयों ने वक्त पर बुलडोजर के दूसरे इस्तेमाल शुरू कर दिए हैं। सुना है कि गुजरात में, बुलडोजर दिन में शहरों में कूड़ा उठाते हैं और शाम में भगवाई नेताओं को। उधर एमपी में मंदिरों में भंडारे के लिए सब्जी बनाने से लेकर हलुआ मिलाने तक में बुलडोजर काम आ रहा है। यानी उम्मीद अब भी बाकी है। कौन जाने हमें बुलडोजर के भांति-भांति के उपयोगों का ही विश्व गुरु मान लिया जाए।                                                                                         


6/दिसंबर को इन अज़ीम रहनुमाओं, अली हुसैन आसिम बिहारी और बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की यौमे वफात पर तक़ारीब का करें इनेक़ाद

6/दिसंबर को इन अज़ीम रहनुमाओं, अली हुसैन आसिम बिहारी और बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की यौमे वफात पर तक़ारीब का करें इनेक़ाद

22-Nov-2022

एम. डब्लू. अंसारी 

भोपालः- 19 दिसम्बर (प्रेस विज्ञप्ति) भारत के दो अजीम रहनुमा मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी और बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ( जिन्होंने गरीबों, लाचारों और बे-बसों को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी सारी जिंदगी वक़्फ कर दीं। मजलूमों को इंसाफ दिलाने के लिए मुसलसल जद्दोजहद किए और हमेशा उनकी तालीम की फिक्र किए। उनका मानना था कि तालीम ही वह वाहिद जरिया है जिसके जरिए इंसाफ की बाला दस्ती क़ायम किया जा सकता है ) कि यौमे वफात पर 6 दिसंबर को मुल्क भर में तका़रीब का इलाज किया जाए। मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी और बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की मिशन तालीम को कायम किया जाए और जात पात की तफरीक़ को खत्म करने की मिशन को आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने जो नारा दिया था किः- ष्दलित-दलित एक समान - चाहे हिंदू हो या मुसलमानष् पर काम करने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि दोनों रहनुमाओं ने समाज के अंदर फैली तमाम तरह की बुराइयों को खत्म करने के हवाले से लोगों को बेदार करने की कोशिश करते हुए कहा कि तमाम तरह की बुराइयों को अगर समाज से खत्म करना है तो हमें तालीम याफ्ता बनना होगा। इसलिए दोनों ने अपनी सारी उम्र दबे कुचले लोगों को इंसाफ दिलाने और गुर्बती के शिकार लोगों की मदद करने में गुजार दी। दोनों रहनुमाओं ने हमेशा लोगों से तालीम याफ्ता बनने, मुत्ताहिद होने, मेहनत करने, अपने हुकू़क़ के लिए आवाज उठाने, समाज के अंदर फैली बुराइयों से लड़ने और उसको खत्म करने, नाइंसाफी व इस्तेहसाल के खिलाफ आवाज बुलंद करने, भेदभाव, जात-पात की रिवायत के खिलाफ लड़ने, हक़ तल्फी करने वालों और हक़-तल्फी करने वाली पॉलिसियों के खिलाफ लड़ने की बात कही।

बे-नज़ीर अंसार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी, जो गुलिस्ता कई सालों से उर्दू की और मिल्ली खिदमात अंजाम देती आ रही है। इसी सिलसिले को जारी रखते हुए सोसाइटी ने उखुव्वते इस्लामी का मुबल्लिग़, मुसलमानों का अंबेडकर और दलित मुसलमानों का मसीहा मौलवी अली हुसैन आसिम बिहारी की हालाते जिंदगी और कारनामे को कलम बंद कर किताब की शक्ल में शाए किया है और यह किताब मंजरे आम पर आ चुकी है।

बे-नज़ीर सोसाइटी ने उखुव्वते इस्लामी का मुबल्लिग़ और दलित मुसलमानों का मसीहा ष्मौलवी अली हुसैन आसिम बिहारीष् के नाम से किताब मुर्तब करके क़ौम को एक बेहतरीन तोहफा दिया है। अवाम को चाहिए कि इस किताब को तलब करके मौलवी साहब की हालते  जिंदगी और कारनामे को पढ़ें और तालीम हासिल करने और रोजगार हासिल करने और गुर्बती के खिलाफ जो उनकी लड़ाई थी, उनका जो मिशन था उसको आगे बढ़ाएं।

इस किताब को हासिल करने के लिए मकतबा जामिया लिमिटेड देहली, अलीगढ़, मुंबई और बुक एंपोरियम, सब्जीबाग पटना से राब्ता कायम कर सकते हैं। या बे-नज़ीर अंसार एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी उसिया रिसॉर्ट (क्वीन्स होम) अहमदाबाद पैलेस रोड, भोपाल 462001 मध्य प्रदेश से भी राब्ता कर सकते हैं। किताब से मुतअल्लिक़ मज़ीद तफसीलात के लिए इस नंबर पर 9425245544 राब्ता करें 


नेकी कर दरिया में डाल

नेकी कर दरिया में डाल

21-Nov-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

इंडिया में शरीफ आदमी की गुजर ही नहीं है। कुछ करे तो मुश्किल, नहीं करे तो मुश्किल। अपने मोदी जी चुनाव सभाओं में हाथ उठा-उठाकर वचन देते हैं, मैंने ये दिया, मैंने वो दिया, पर उसके लिए कभी थैंक यू मिलते देखा है? वोट कभी मिल भी जाए, पर थैंक यू कभी नहीं। उल्टे गालियां मिलती हैं, गालियां, वह भी किलो के हिसाब से। और कुछ नहीं तो इसके लिए ही गालियां कि हर बार नया वचन क्यों -- पहले वाले का क्या हुआ? विरोधी तो खैर कर्कश सुर में गाते ही रहते हैं -- क्या हुआ, पिछला वादा?

और जो कुछ करने का दावा ही नहीं करें तो? गालियां तब भी खाते हैं। पिछले दिनों नोटबंदी की छठी बरसी आयी और चली गयी। ढोल पीटना छोड़ो, मोदी जी ने एक ठो ट्वीट तक नहीं किया; न मैंने नोटबंदी करी का ट्वीट, न नोटबंदी हुई का ट्वीट। जिक्र ही नहीं किया। पर मिला कोई थैंक यू? उल्टे नोटबंदी को बुरा कहने वाले, मोदी जी को ही ताने देते रहे -- नोटबंदी को कैसे भूल गए। नोटबंदीवीर बनकर पब्लिक से वोट क्यों नहीं मांगते! 

पर मोदी जी भी गालियों से डरने वालों में से नहीं हैं। न नोटबंदी के टैम पर डरे। न जीएसटी के टैम पर डरे। और न कृषि कानूनों के टैम पर डरे। न कश्मीर बंदी के टैम पर, न लॉकडाउन के टैम पर। तभी तो दिन की दो-तीन किलो तक गालियां इकट्ठी कर लेते हैं और उनसे अपना निजी पॉवरहाउस चला लेते हैं। न कोई पावरकट और न सस्ती-महंगी बिजली का संकट। आत्मनिर्भरता की आत्मनिर्भरता, ऊपर से। और नेकी कर दरिया में डाल की फकीरी भी। अंत में इसका एहसान लादने का मौका भी कि हम भी चाहते तो कोविड के टीके के सर्टिफिकेट और गरीब कल्याण राशन के थैलों की तरह, विज्ञापनों से बाकी हर जगह भी अपनी तस्वीर चमकवा सकते थे। पर कितनी ही जगह नहीं चमकवायी, हम लोगों की जिंदगी को बदलने जो निकले थे।

सो नोटबंदी -- नेकी कर, दरिया में। जीएसटी -- नेकी कर, दरिया में। कृषि कानून -- नेकी कर, दरिया में। श्रम संहिताएं --नेकी कर दरिया में। लॉकडाउन -- नेकी कर दरिया में। कोवैक्सीन प्रमोशन -- नेकी कर दरिया में। सीएए -- नेकी कर दरिया में। कश्मीर फाइल्स प्रमोशन -- नेकी कर दरिया में। मोरबी झूला पुल -- नेकी जयसुख पटेल से, पब्लिक दरिया में।  


वर्ण और जाति मुक्त भारत का संघी अभियान : नौ सौ चूहे खाके बिल्ली का हज करने का ऐलान...

वर्ण और जाति मुक्त भारत का संघी अभियान : नौ सौ चूहे खाके बिल्ली का हज करने का ऐलान...

15-Nov-2022

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आलेख : बादल सरोज

यह समय जोरदार समय है। यह समय आजमाई और मुफीद समझी जाने वाली लोकोक्तियों, कहावतों और मुहावरों के पुराना पड़ जाने का समय है। वैसे विसंगतियों और एकदम उलट बर्ताब के लिए सामान्य रूप से प्रचलित कहावतों, मुहावरों में "शैतान के मुंह से कुरआन की आयतें" या "रावण का साधुवेश में आना" या "मुंह में राम बगल में छुरी" का उपयोग किया जाता रहा है। मगर इन दिनों लगातार ऐसी रोचक उलटबांसियां हो रही हैं कि उनके विरोधाभास को उजागर करने के लिए ये मुहावरे अपर्याप्त से लगने लगे हैं। नए रूपक गढ़ने की जरूरत आन पड़ी है। ऐसा ही एक घटनाविकास इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुयी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की  बैठक में लिया गया संकल्प है।  इस बैठक में आरएसएस द्वारा अपने  शताब्दी वर्ष में "सामाजिक समरसता और जाति-वर्ण मुक्त समाज की स्थापना का लक्ष्य हासिल करने के लिए कई तरह के अभियान शुरू करने" का निर्णय लिया गया है। उसने तय किया है कि इसके लिए वह "जाति-वर्ण मुक्त हिंदू समाज की स्थापना के लिए धर्मगुरुओं और समाज के प्रबुद्ध लोगों के जरिए अपने अभियान को धार देगा।" आरएसएस प्रवक्ता के अनुसार "सामाजिक समरसता और जाति-वर्ण व्यवस्था के खिलाफ अभियान कई स्तर पर चलेगा। खासतौर पर ग्रामीण अंचलों में स्वयंसेवक सभी वर्गों (पढ़ें ; जाति समूहों) की पूजास्थलों तक पहुंच, एक ही जगह सभी वर्गों का अंतिम संस्कार और एक ही जलस्रोत से सभी वर्गों के पानी पीने के लिए अभियान में तेजी लाएगा। इसके साथ ही, सभी गांवों में शाखा लगाने की गुंजाइश भी तलाशी जाएगी, जिनमें युवाओं को प्रेरित किया जाएगा।"  प्रयागराज की बैठक में जिस "वर्ण-जाति मुक्त भारत" का अभियान तय किया गया है, वह संघ के अब तक के किये–धरे व्यवहार और लिखे–कहे विचार दोनों के ही एकदम 180 डिग्री उलट और उसकी अब तक की सारी धारणाओं के सर्वथा प्रतिकूल है। हालांकि इसमें भी समरसता को जोड़ा गया है, जिसका मतलब विभेदों के साथ निबाह के सिवा और कुछ नहीं होता।  

बहरहाल  पहले उनके आचरण और बर्ताब के ही दो–तीन उदाहरण देख लें। मध्यप्रदेश में सत्ता से हटाई गयी और तब तक पूर्व हो चुकी मुख्यमंत्री उमा भारती ने जब बगावत की थी, तब तबके आरएसएस प्रमुख के सी सुदर्शन ने टिप्पणी करते हुए उनके महिला और उनकी जाति के बारे में साफ़ इशारा करते हुए इसे "अपेक्षित और स्वाभाविक" बताया था। उनका आशय साफ़ था कि चूँकि वे एक जाति  विशेष में जन्मी हैं और उस पर अतिरिक्त यह कि वे महिला हैं, इसलिए उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है। देश भर के अनेक मंदिर ऐसे हैं, जिनके बाहर शूद्रों का प्रवेश वर्जित होने की तख्तियाँ टँगी हुयी हैं। अकेले इसी वर्ष में दो दर्जन से अधिक ऐसे मामले राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा के विषय बने, जिनमें किसी दलित के मंदिर में घुसने या प्रतिमा को छू देने भर से पिटाई, यहाँ तक कि कुछ मामलों में मौत तक, का सामना करना पड़ा। इनके बारे में  काफी लिखा जा चुका है। कहने की आवश्यकता नहीं कि देश के अधिकांश मंदिरों, हिंदी भाषी इलाकों के तकरीबन सभी मंदिरों, पर आरएसएस का कब्जा हो चुका है। जिन शंकराचार्यों को आरएसएस और भाजपा ने अपनी पालकी का कहार बनाया हुआ है, उनमे से अनेक सार्वजनिक रूप से बयान दे चुके हैं, देते रहते हैं कि शूद्रों का मंदिरों में प्रवेश हिन्दू "धर्म सम्मत" नहीं है और इसकी अनुमति कदापि नहीं दी जा सकती।  पिछले कुछ वर्षों से जिन प्रवचनकर्ताओं की बाढ़–सी आयी हुयी है, जिनके लिए संसाधन और भीड़ जुटाने के लिए भाजपा की सरकारें बाकायदा लिखा–पढ़ी में आदेश जारी कर आंगनबाड़ीकर्मियों, सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगा रही हैं, जो प्रवचनकर्ता धार्मिक की बजाय सीधे–सीधे राजनीतिक और साम्प्रदायिक प्रवचन दे रहे हैं, अपने प्रवचनों में नाम लेकर मोदी और आरएसएस का गुणगान कर रहे हैं ; वे साफ़–साफ़ शब्दों में जातिश्रेणीक्रम की महत्ता और दलितों की निकृष्टता की बात कहते हैं और इसे धर्मसम्मत साबित करने में जुटे रहते हैं।  

मामला सिर्फ गाँव, कस्बों की रियाया भर का नहीं है। सर्वोच्च पद पर बैठे राष्ट्रपतियों के मंदिर की सीढ़ियों से ही पूजा कर लौट आने और कार्यभार ग्रहण करने से पहले पुरोहितों द्वारा उनके शुद्धिकरण की सार्वजनिक घटनाओं तक जा पहुंचा है।  उत्तरप्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा कार्यभार लेने के साथ ही मुख्यमंत्री कार्यालय और निवास को गंगाजल से ओम पवित्रम-पवित्राय किये जाने की कारगुजारी पूरी दुनिया ने देखी है। आरएसएस और भाजपा ने कभी इन सब पर आपत्ति नहीं उठाई, उलटे किन्तु–परन्तु करके या तो इन सबकी अनदेखी की या इन्हीं के कुछ लोगों ने इसे उचित और सही ठहराया।  योगी राज में हाथरस की गैंग रेप पीड़िता की मृत देह को जलाने के समय हुयी वीभत्सता से लेकर सारे भाजपा शासित प्रदेशों में लगातार बढ़ती दलित–आदिवासी उत्पीड़न की वारदातें और शासन–प्रशासन का  उनके प्रति व्यवहार इस असली व्यवहार की कलुषित सच्चाई उजागर करता है। हाल में दशहरे के दिन दिल्ली में हुआ वाकया ताजा–ताजा है, जहां बाबा साहेब आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं को लेने पर केजरीवाल से कह कर एक मंत्री को हटवा दिया गया। इस आख्यान का असर अब न्यायपालिका के कई फैसलों और टिप्पणियों में भी दिखाई देने लगा है। 

इसके पहले संस्कृत पढ़ाने के लिए प्रामाणिक योग्यता के आधार पर नियुक्त हुए मुस्लिम और दलित शिक्षकों के विरोध में यह कुनबा कोहराम मचाकर उन्हें हटवा चुका है। जब प्रयागराज से जाति और वर्णमुक्त समाज की दुहाई दी गयी, ठीक उसी वक़्त बनारस के सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में अथर्व वेद पढ़ाने हेतु प्रोफेसर पद पर नियुक्त किये गए डॉ सतेंद्र यादव को लेकर इसी विचार गिरोह की  "अहीर होकर वेद पढ़ाओगे" की टिप्पणी आ रही थी ।  

संघ की विचारधारा और जिस तरह का हिन्दू राष्ट्र वे बनाना चाहते हैं, उसका सबसे बुनियादी आधार और सार तत्व जाति और वर्ण ही है। हिन्दू राष्ट्र का पूरा दुःस्वप्न ही उस कथित गौरवशाली अतीत की बहाली है, जो वर्णाश्रम पर टिका हुआ है और जिसने  भारत के बौद्धिक, सृजनात्मक, सामाजिक, आर्थिक विकास को ठप करके रख दिया था। विनायक दामोदर सावरकर से लेकर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से माधव सदाशिव गोलवलकर होते हुए आज तक के उनके सारे सैद्धांतिक सूत्रीकरण जिस नींव पर टिके हुए हैं, वह सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध हुए आंदोलनों के हासिल के निषेध और मनुस्मृति की पूर्णरूपेण बहाली के जरिये अतीत की महानता वाले समाज की पुनर्स्थापना की समझदारी है। आरएसएस ने इस सबसे कभी इंकार नहीं किया - कभी इस सबका खंडन नहीं किया। उनका लक्ष्य हिन्दू पद पादशाही की स्थापना है, जिसका एकमात्र मॉडल पुणे और उसके आसपास कुछ वर्ष रही पेशवाशाही है। वही हिन्दू पद पादशाही, जिसमे शूद्रों और पिछड़ों को गले में कटोरा और कमर में झाड़ू बाँध कर "हटो, बचो" चिल्लाते हुए निकलना पड़ता था, ताकि उनकी परछाईं भी पड़ने से कोई द्विज अशुद्ध और अपवित्र न हो जाये। यह वही पेशवाशाही थी, जिसके खिलाफ 1818 में भीमा कोरेगांव हुआ था। वही भीमा कोरेगांव, जिसकी 200 वी सालगिरह मनाने के अपराध में आज भी बाबा साहब आंबेडकर के पौत्र दामाद आनन्द तेलतुम्बड़े सहित दर्जन भर से अधिक बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट बिना जमानत जेलों में सड़ रहे हैं। क्या इसी व्यवहार और विचार के आधार पर आरएसएस जाति और वर्णमुक्त समाज की स्थापना करने जा रहा है? 

आरएसएस के एकमात्र गुरु एम एस गोलवलकर के ग्रंथ के ग्रंथ वर्ण व्यवस्था की महानता और निर्विकल्पता से भरे हुए हैं।  इसकी हिमायत में वे कहते हैं कि "ईरान, मिस्र, यूरोप तथा चीन के सभी राष्ट्रों को मुसलमानों ने जीत कर अपने  में मिला लिया, क्योंकि उनके यहां वर्ण व्यवस्था नहीं थी। सिंध, बलूचिस्तान, कश्मीर तथा उत्तर-पश्चिम के सीमान्त प्रदेश और पूर्वी बंगाल में लोग मुसलमान हो गए, क्योंकि इन क्षेत्रों में बौद्ध धर्म ने वर्ण व्यवस्था को कमजोर बना दिया था।" क्या आरएसएस अपने गुरूजी की इस बुनियादी प्रस्थापना का धिक्कार करने के लिए तैयार है? दलितों और पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए किये जाने वाले विशेष प्रावधानों का आरएसएस हमेशा से विरोधी रहा। इनके बारे में उनकी हिकारत इस कदर रही कि गोलवलकर ने इन तबकों को "माँस का टुकड़ा फेंकने पर इकट्ठे होने वाले कौए" तक बता दिया। उनको बराबरी का मताधिकार देने की निंदा की। वे यहीं तक नहीं रुके, उन्होंने इसका दार्शनिक और सैद्धांतिक सूत्रीकरण तक किया। असमानता और उंच-नीच को सनातन और प्राकृतिक बताते हुए उन्होंने लिखा है कि "हमारे दर्शन के अनुसार, ब्रह्माण्ड का उदय ही सत्व, रजस और तमस के तीन गुणों के बीच संतुलन बिगड़ने के कारण हुआ है और इन तीनो में यदि बिलकुल सही संतुलन 'गुणसाम्य' स्थापित हो जाए, तो ब्रह्माण्ड फिर शून्य में विलीन हो जाएगा। इसलिए असमानता प्रकृति का अविभाज्य अंग है। इसीलिये ऐसी कोई भी व्यवस्था, जो इस अन्तर्निहित असमानता को पूरी तरह समाप्त करना चाहती है, वह विफल होने के लिए बाध्य है। : (एम एस गोलवलकर, बंच ऑफ़ थॉट्स, 1960, पृष्ठ 31)  इसी पृष्ठ पर इसी बात को और आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि "जनता के द्वारा, 'जनता के लिए' की अवधारणा का अर्थ है : राजनीतिक प्रशासन में सबकी समान भागीदारी का होना। यह काफी हद तक एक भ्रम मात्र है।" हाल ही में सरसंघचालक मोहन भागवत ने जब गोल–मोल अंदाज में यह कहा था कि "मुमकिन है, वर्ण व्यवस्था कभी समाज के लिए लाभकारी रही हो, मगर अब नहीं है।" सवाल यह है कि क्या वे गोलवलकर के इस दार्शनिक सैद्धांतिक सूत्रीकरण को ठुकराने के लिए, इसे गलत बताते हुए संघ को इससे अलहदा करने के लिए तैयार हैं ? 

नहीं। प्रयागराज में इसी वर्ण और जाति व्यवस्था से मुक्त भारत की स्थापना का मुगालता देने वाली आरएसएस ने इन सब वैचारिक धारणाओं से पल्ला नहीं झाड़ा है। वे समानता की कायमी करके ब्रह्माण्ड के शून्य हो जाने का जोखिम नहीं लेने जा रहे हैं। उनका अभियान वर्ण और जाति का माहात्म्य समझाने, उसे हिन्दू धर्म की महानता प्रतिपादित करने और अवर्णो तथा कथित निम्न वर्णों को उनके छोटे–छोटे देवता और भगवान थमा कर उनके अनुरूप जीवन व्यवहार का सबक सिखाने के लिए है।  

यह  नारा सिर्फ कार्यनीतिक है - टैक्टिकल - है।  आरएसएस हिन्दुओं के लिए कॉमन सिविल कोड की बात नहीं करने जा रहा - यह असमानता और ऊंच  नीच को कॉमन सिविल कोड बताने की मुहिम शुरू कर रहा है। यह सत्ता और समाज पर सम्पूर्ण वर्चस्व कायम करने के रास्ते पर पड़ने वाली वैतरणी को पार करने के लिए नाव की तरह इस्तेमाल की जाने वाली उल्लू की लकड़ी है।  

कहते हैं कि जंगली चूहा सोते हुए मनुष्य को एक साथ नहीं कुतरता। एक बार कुतरता है, फिर फूंक मारकर राहत देता है, फिर कुतरता है और इस तरह जिसे कुतरा जाता है, उसे पता भी नहीं चलता। प्रयागराज से हुआ आव्हान ऐसी ही फूंक है - मगर यह फूँक सोते हुए मनुष्य पर ही काम आ सकती है, जागते इंसान पर नहीं। इस झाँसे और भ्रमजाल की फूंक का भी यही इलाज है : जागते हुए इंसानों के जाग्रत समाज का निर्माण। 


यहां चौड़ी छाती वीरों की...!

यहां चौड़ी छाती वीरों की...!

14-Nov-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

भाई, कम-से-कम अब यह झूठा प्रचार बंद होना चाहिए कि भगवाइयों को अपने पूरे कुनबे में दूसरा कोई वीर मिला नहीं, इसलिए धो-पोंछकर सावरकर को ही वीर बनाने में लगे रहते हैं। माफीनामों का, तगड़ी पेंशन का, गोरे राज की सेवा का और यहां तक कि गांधी मर्डर का कितना भी शोर मचता रहे, सावरकर की वीरता का ढोल पीटने से बाज नहीं आते हैं। उल्टे पलटकर सवाल करते हैं--माफीवीर क्या वीर नहीं होता है? खैर अब उस सब की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। अब तो खुद मोदी जी ने वीर के टाइटल के लिए बाकायदा अपनी दावेदारी पेश कर दी है। दावेदारी भी पब्लिक के सामने पेश की है। और वह भी अपने गुजरात में नहीं, घोर पराए बल्कि दुश्मन तेलंगाना में, बेगमपेट में। भक्तों के सामने खुद अपने मुंह से अपनी वीरता का बखान करते हुए, मोदी जी ने बताया कि वह तो दिन-रात लोगों की गालियां खाते हैं और आज से नहीं बीस-बाईस साल से खा रहे हैं। पर उन्होंने कभी गालियों की परवाह नहीं की, गालियां सिर्फ खाईं, बांटी किसी को नहीं। फिर उन्हें गालियां मिलने की उनके भक्त परवाह क्यों करें? भक्त तो बस उनका अनुकरण करें, उन्हें गालियां खाते देखें और मौज करें। अब सोचने वाली बात है कि अगर लिखकर माफियां मांगने वाला ऑफीशियली वीर घोषित किया जा सकता है, तो गालियां खाकर मजा लेने वाला तो महावीर ही हुआ! वीरता के मैदान में सावरकर के लिए अब वाकई गंभीर कंपटीशन है।

और मोदी जी की वीरता कोई सिर्फ बिना परेशान हुए गालियां सुनने की अकर्मक या रक्षात्मक वीरता ही नहीं है। गांधी जी ने कहा था -- अकर्मक वीरता से तो कायरता अच्छी। उनकी वीरता, सकर्मक है। और यह सकर्मकता, खुद अपने मुंह से सारी दुनिया को यह सुनाने की ही सकर्मकता भी नहीं है कि देखो, देखो, विरोधी मुझे गालियां दे रहे हैं ; कि मुझे हमेशा से ही गालियां सुननी पड़ी हैं, आदि-आदि। यह आए दिन यह दिखाने की सकर्मकता तो हर्गिज नहीं है कि विरोधी मेरे साथ बड़ा अन्याय कर रहे हैं, नाहक मुझे गालियां देते रहते हैं, आप चुनाव में मेरे साथ हुए इस अन्याय का बदला लेना, वगैरह-वगैरह। उनकी वीरता की सकर्मकता इसमें है कि रात-दिन खाने को मिलने वाली इन गालियों को, मोदी जी ने अपनी इनर्जी का स्रोत बना लिया है।

लोग मोदी जी से पूछते हैं कि आप कभी थकते क्यों नहीं हैं? उन्हें समझ लेना चाहिए कि क्लाउड कवर और नाला गैस की तरह, विरोधियों की गालियों के साथ भी मोदी जी ने जबर्दस्त चमत्कार किया है; गालियों को ऊर्जा का स्रोत बना दिया है। नतीजा यह कि बंदे की बैटरी कभी डाउन ही नहीं होती। और इस बार तो खैर मोदी जी ने बाकायदा तौलकर यह भी बता दिया कि हर रोज उन्हें दो-ढाई किलो गालियां खाने को मिलती हैं। दो-ढाई किलो गालियां खाने से उन्हें कितनी ऊर्जा मिलती होगी, यह अध्ययन का विषय है। हां! इतना जरूर है कि चार साल पहले, 2018 में मोदी जी ने गालियों की अपनी खुराक डेढ़-दो किलो प्रतिदिन बतायी थी। तब भी मोदी जी अठारह-अठारह घंटे काम किया करते थे। अब जब गालियों का हर रोज का आहार औसतन आधा किलो तो बढ़ ही गया है, बंदा काम के घंटे और कितने बढ़ा सकता हैै? अब इनटेक बढ़ेगा और ऊर्जा का उपयोग उसी अनुपात में नहीं बढ़ेगा, तो मोटापा चढ़ेगा! हमें लगता है कि जी-20 की टेंपरेरी अध्यक्षता आने के बाद अगले ही नाप में मोदी जी को अपनी छाती का साइज अपग्रेड करना पड़ेगा--छप्पन इंची से अट्ठावन इंची होने से अब कोई नहीं रोक सकता है। और हां, मोदी जी की गालियों की दैनिक खुराक में बढ़ोतरी में उनकी लोकप्रियता में किसी तरह की कमी खोजने की कोशिश कोई नहीं करे। 2018 से 2022 के बीच यानी चार साल में औसत निकालें तो पौने दो किलो से सवा दो किलो पर आंकड़ा पहुंचा है यानी चार साल में करीब 30 फीसद की यानी सालाना औसतन 7.5 फीसद  वृद्धि । इस तरह जीडीपी की वृद्धि दर के आस-पास ही चल रही है मोदी की गालियों की खुराक में वृद्धि की दर। निर्मला सिद्धांत से लोकप्रियता कम नहीं हुई है, बस गालियों की दर बढ़ गयी है!

हमने पहले ही कहा, विरोधियों की गालियों के मामले में मोदी जी की वीरता, सकर्मक है। गालियों का सामना करने में वीरता की इससे ऊंचे दर्जे की सकर्मकता क्या होगी कि गुजरात में चुनाव के लिए बाकायदा घर वापसी से पहले, मोदी जी दक्षिण के चार राज्यों के दो दिन का दूर-चुनावी दौरा भी कर आए, जिनमें से कम-से-कम दो में, मोदी जी के कृपा-प्राप्त राज्यपालों पर, चुनी हुई सरकारें बुरी तरह से भडक़ी हुई हैं। यानी वहां मोदी जी को गालियों की कुछ न कुछ एक्स्ट्रा खुराक मिलना तय था। आलम यह है कि तमिलनाडु में डीएमके के नेतृत्ववाले सत्ताधारी गठबंधन के सभी सांसदों ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर, उनसे राज्यपाल को वापस बुलाने की मांग की है, जबकि तेलंगाना में खुद राज्यपाल ने राज्य सरकार पर अपने फोन आदि टैप कराए जाने के आरोप लगाए हैं। दक्षिण के जिस इकलौते राज्य का मोदी जी ने न दौरा किया और न कोई उद्घाटन वगैरह किया, वह था केरल। वहां तो खैर, भगवा पार्टी की कमान राज्यपाल ने ही संभाल ली लगती है। राज्यपाल, विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलरों को हटाने के लिए भिड़ा हुआ है और सरकार, राज्यपाल को ही चांसलर के पद से हटाने में। और कर्नाटक में तो खैर डबल इंजन सरकार है यानी पीएम भी मोदी भक्त, राज्यपाल भी मोदी भक्त, सिर भी काटें तो कम से कम पब्लिकली थैंक यू मोदी जी के ही नारे लगेंगे। पर मोदी जी रत्ती भर नहीं डरे और विरोधियों की गालियों के सामने अपनी वीरता के झंडे गाड़ आए। और तो और आंध्र प्रदेश में विशाखापट्टनम में, जहां लोग किसान आंदोलन से पहले से सरकारी इस्पात कारखाने के बेचे जाने के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, मोदी जी हजारों करोड़ रुपए की ढांचागत विकास परियोजनाओं का उद्घाटन भी कर आए। इससे बड़ी वीरता क्या होगी?

और गुजरात में तो खैर मोदी जी की वीरता का पूछना ही क्या, वहां के शेर हैं, शेर! देखा नहीं, मोरवी के झूला पुल के टूटने के बाद, नदी में गिरे लोगों को बचाने का झूठा स्वांग रचने वालेे भगवाई विधायक तक तो टिकट पहुंच गया, पर मरम्मत की जगह पुल के गिरने का इंतजाम करने वाली निजी कंपनी के मालिक, जयसुख पटेल के आसपास भी पुलिस नहीं पहुंच पायी है। उधर चाहे दूसरे चालीस फीसद से ज्यादा विधायकों का टिकट गया, गोधरा के विधायक चंद्रसिंह राउलजी का टिकट एकदम सुरक्षित रहा है ; उन्होंने बिलकिस बानो केस के अपराधियों के ‘‘संस्कारी ब्राह्मïण’’ होने को पहचान कर, उनकी सजा माफ करने की सिफारिश करायी थी! और नरोडा पाटिया से टिकट मिला है, 2002 के हत्याकांड के अपराधी, पंकज कुलकर्णी की बेटी, डाक्टर पायल कुकरानी को। आखिर, हत्याकांड की मुख्य आरोपी, डॉ. माया कोडनानी की सीट को कोई योग्य उत्तराधिकारी भी तो मिलना चाहिए! जाहिर है कि वीर अपने मन की करते हैं; वीर इसकी परवाह नहीं किया करते कि लोग क्या कहेंगे!

और कोई वीर ही यह सब करने के बाद भी यह दावा कर सकता है कि हम तो, जनता की जिंदगी बदलने निकले हैं! पर यह तो देश ही वीर जवानों का है ; यहां चौड़ी छाती वीरों की!


एक देश, एक नेता : बस मेरा नाम याद रखो, मुझे वोट दो!

एक देश, एक नेता : बस मेरा नाम याद रखो, मुझे वोट दो!

10-Nov-2022

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आलेख : राजेंद्र शर्मा

‘‘और याद रखिए, हमारा भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार कौन है, आप को किसी को याद रखने की जरूरत नहीं है। सिर्फ कमल का फूल याद रखिए। मैं आप के पास कमल का फूल लेकर आया हूं...कमल का फूल पर आप का हरेक वोट सीधे मोदी के खाते में आशीर्वाद बनकर आएगा।’’

नरेंद्र मोदी का यह डॉयलाग, जो उन्होंने हिमाचल प्रदेश में सोलन में भाजपा की एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए बोला, सूत्र रूप में उस विकृत केंद्रीयकरण को उजागर कर देता है, जो करीब साढ़े आठ साल के अपने राज में नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति के विकेंद्रीकृत, जनतांत्रिक स्वभाव की जगह पर थोप दिया है।

इस एक डॉयलाग में प्रधानमंत्री मोदी कम से कम तीन पहलुओं से या तीन स्तरों पर, अपने राज में हुए इस अति-केंद्रीयकरण को स्वर देते हैं। बेशक, इस केंद्रीयकरण का पहला स्तर तो, जिसे शुरू से ही इंगित भी किया जाता रहा है, विकेंद्रीकृत प्रतिनिधित्व पर आधारित संसदीय प्रणाली की जगह पर, देश पर व्यावहारिक मानों में राष्ट्रपति-प्रणालीनुमा व्यवस्था थोपे जाने का ही है, जिसके केंद्र में एक की जगह है -- नरेंद्र मोदी। ‘‘आप का हरेक वोट सीधे मोदी के खाते में...आएगा’’ का आश्वासन, इस केंद्रीयकरण को बहुत ही सरल शब्दों में व्यक्त कर देता है। बेशक, इसे ‘‘नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता’’ का साक्ष्य बनाकर चलाने की कोशिशेंं की जाती हैं। लेकिन, कथित लोकप्रियता की दलील, इस तरह से प्रधानमंत्री द्वारा जिस तरह के विकृत-केंद्रीकरण को पुख्ता किया जाता है, उसकी सचाई को नकार नहीं सकती है।

हां! अगर इसके पीछे लोकप्रियता की बात स्वीकार भी कर ली जाए, तो भी यह इसी का सबूत है कि प्रधानमंत्री अपनी कथित लोकप्रियता का इस्तेमाल, इस प्रकार के विकृत केंद्रीयकरण को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। जाहिर है कि यह भारतीय जनतंत्र के स्वभाव के ही बदले जाने की ओर इशारा करता है। इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी कोई इस देश में सत्ता में आए पहले लोकप्रिय नेता नहीं हैं। स्वतंत्र भारत मेें प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले कम-से-कम दो शुरूआती नेता तो अवश्य ही अपने समय में जनसमर्थन के मामले में नरेंद्र मोदी से सवाए ही रहे थे, कम नहीं। नेहरू के नेतृत्व में लड़े गए विभिन्न आम चुनावों में उनकी पार्टी के मत फीसद और 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी और यहां तक कि 1984 के चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में उनकी पार्टी को मिले मत फीसद को, मोटे तौर पर उनकी लोकप्रियता का पैमाना मानकर, मोदी के नेतृत्व में भाजपा के 2014 तथा 2019 के मत फीसद से तुलना कर के हम, लोकप्रियता का एक मोटा तुलनात्मक ग्राफ तो बना ही सकते हैं।

इसके बावजूद, अगर इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने ‘आप का हरेक वोट सीधे मेरे खाते में’ का आश्वासन देने की जरूरत नहीं समझी थी, तो इसलिए नहीं कि उनके नाम के जुडऩे से उनकी पार्टी के उम्मीदवार की ताकत नहीं बढ़ती थी। ऐसा आश्वासन देने की जरूरत उन्हें इसलिए नहीं पड़ी होगी कि वे भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था की विकेंद्रीकृत प्रकृति की कद्र करते थे तथा उसे विकसित व संरक्षित करना चाहते थे। इसीलिए, स्वतंत्रता के बाद के पहले कई दशकों में इसकी एक विवेकपूर्ण कन्वेंशन जैसी स्वीकृत रही थी कि प्रधानमंत्री तथा केंद्र सरकार के मंत्री, राज्य या उससे निचले स्तर के चुनावों में बहुत ज्यादा नहीं उलझेंगे और विपक्ष के खिलाफ सीधे तलवारें नहीं भांजेंगे। जाहिर है कि ‘हरेक चुनाव मोदी की हार-जीत का चुनाव है’ के मौजूदा केंद्रीयकरण में, ऐसी तमाम विवेकपूर्ण जनतांत्रिक कन्वेंशनों को ही बुहारकर दरवाजे से बाहर नहीं कर दिया गया है, ‘हरेक वोट मोदी के लिए’ के दावे के जरिए, संघीय व्यवस्था समेत समूचे विकेंद्रीकृत ढांचे को ही, ज्यादा से ज्यादा एक नुमाइशी चीज बनाकर रख दिया गया है, जिसका कोई उपयोग ही नहीं है। जाहिर है कि ‘‘एक देश, एक नेता’’ के मॉडल के इस केंद्रीकरण के पीछे, विकेंद्रीयकरण के विभिन्न स्तरों का ही नहीं, उन स्तरों पर सक्रिय अपनी ही पार्टी के नेताओं का बेदखल किया जाना भी काम कर रहा है, लेकिन इसकी चर्चा हम जरा आगे करेंगे।

इस मोदी छाप केंद्रीयकरण के एक और स्तर की भी कुछ न कुछ चर्चा अवश्य होती रही है, जिसका सार है भारतीय संघीय व्यवस्था के दूसरे प्रमुख स्तंभ, राज्य का कमजोर या अधिकारहीन किया जाना। सोलन के उसी चुनावी भाषण का एक और डॉयलाग, सूत्र रूप में मोदी राज में बड़ी तेजी से हो रहे इस पहलू से केंद्रीयकरण को सामने ले आता है। प्रधानमंत्री मोदी का डॉयलाग था: ‘‘दिल्ली में मोदी हो तो यहां भी मोदी को मजबूती (यानी सत्ता) मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए।’’ केंद्र और राज्य, संघीय व्यवस्था के दो प्रमुख स्तरों पर सत्ता का इस तरह गड्डमड्ड और एकीकृत कर दिया जाना भी, मोदी राज में हो रहे केंद्रीयकरण की ही विशेषता है। बेशक, पहले भी भारत में संघीय व्यवस्था के राज्यों के स्तंभ को, उत्तरोत्तर कमजोर ही किया जाता रहा था। इसके अतिवादी रूप की शुरूआत, 1957 में केरल में आयी पहली कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करने से ही हो गयी थी और उसके बाद, खासतौर पर इंदिरा गांधी के राज में खुद सत्ताधारी पार्टी समेत, विभिन्न पार्टियों की कितनी ही सरकारों को मनमाने तरीके से बर्खास्त किया गया था। इसके बावजूद, ‘‘डबल इंजन की सरकार’’ के जनता के लिए ’स्वाभाविक रूप से फायदेमंद’ होने का दावा, मोदी राज की केंद्रीयकरण की मुहिम का ऐसा ‘अनोखा योगदान’ है, जो संघीयता के तर्क से ठीक उल्टे सिद्घांत को स्थापित करता है।

बहरहाल, मोदी राज में जारी अति-केंद्रीयकरण का तीसरा पहलू, जिसकी चर्चा कम ही हुई है, ‘एक देश, एक नेता’ और ‘एक देश, एक सरकार’ के केंद्रीयकरण को, खुद मोदी की अपनी पार्टी में भी दोहराता नजर आता है। इस प्रक्रिया में, नरेंद्र मोदी ने खुद को सत्ताधारी पार्टी का एकछत्र नेता या सुप्रीमो तो बना ही लिया है, दूसरे सिरे पर अपनी ही पार्टी के नेताओं को, पूरी तरह से अधिकारहीन या बेमानी भी बना दिया है। विधानसभाई चुनाव के लिए हुई सोलन की सभा में जब नरेंद्र मोदी बिना किसी संकोच के ‘‘आप का हरेक वोट सीधे मोदी के खाते में’’ का एलान करते हैं, तो वह सिर्फ अपनी सत्ता से अलग विधानसभाई सीट, विधानसभा तथा राज्य सरकार के निरर्थक होने का ही एलान नहीं कर रहे होते हैं, सीधे अपने खाते में वोट मांगकर, सत्ताधारी पार्टी की भी अर्थहीनता को स्थापित कर रहे होते हैें। और रही बात अपनी ही पार्टी द्वारा चुनाव में खड़े किए गए उम्मीदवारों की, तो नरेंद्र मोदी इसकी तो जरूरत तक नहीं समझते हैं कि उनके समर्थक, उनकी पार्टी के उम्मीदवार का ‘‘नाम’’ तक याद रखें। उनका स्पष्ट संदेश है -- सिर्फ और ‘‘सिर्फ कमल का फूल याद रखिए’’ और वह भी इसलिए कि, ‘‘मैं आप के पास कमल का फूल लाया हूं!’’ सोलन की सभा में जब मोदी मुंंह खोलकर अपना विराट रूप दिखाते हैं तो केंद्र की सरकार ही नहीं, भाजपा की राज्य सरकार ही नहीं, खुद सत्ताधारी पार्टी, उसके तमाम नेता, उनके अंदर समाए नजर आते हैं।

इसलिए, अचरज की बात नहीं है कि ‘हरेक वोट अपने नाम’ मांगने वाला प्रधानमंत्री, हिमाचल में अपनी पार्टी के बागी उम्मीदवारों को बैठाने की कोशिश में, खुद बागी उम्मीदवारों को फोन करता वीडियो में दर्ज हुआ है। फतेहपुर विधानसभाई क्षेत्र से भाजपा से बगावत कर, निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे कृपाल परमार को, प्रधानमंत्री ने खुद फोन करके अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश की, जिसे विक्षुब्ध परमार ने वीडियो पर रिकार्ड भी कर लिया। इसके प्रधानमंत्री के अपना पद का दुरुपयोग करने का मामला होने की कांग्रेस की शिकायत से कोई चाहे सहमत हो या नहीं हो, लेकिन इससे इस सचाई का कुछ अंदाजा तो लगाया जा ही सकता है कि ‘हर वोट अपने नाम’ मांगने वालेे प्रधानमंत्री को, हिमाचल में ‘‘हार’’ खतरा नजर आ रहा है।

वैसे इसमें कोई अचरज की बात भी नहीं है। हिमाचल प्रदेश का किसी सत्ताधारी पार्टी को लगातार दूसरी बार नहीं चुनने का जो इतिहास रहा है, उसके अलावा भी, उपचुनाव के पिछले ही चक्र में एक लोकसभाई और चार विधानसभाई सीटों में से सभी पर कांग्रेस ने जिस तरह जीत हासिल की थी, उसके बाद से इस बार कांग्रेस का ही पलड़ा भारी माना जा रहा था। इस रुझान को और पुख्ता कर दिया है, हिमाचल में आम आदमी पार्टी का शीराजा बिखर जाने ने, जिससे अब उससे विपक्ष के ज्यादा वोट काटकर मदद पहुंचाने की सत्ताधारी भाजपा उम्मीद नहीं कर सकती है। वैसे हिमाचल में भाजपा की हताशा का ‘‘मोदी फोन प्रकरण’’ जैसा ही एक और साक्ष्य भी सामने आ चुका है। यह साक्ष्य है, राज्य के लिए भाजपा द्वारा जिस 11 सूत्री चुनाव घोषणापत्र को जारी किया गया है, उसमें ‘‘समान नागरिक संहिता’’ को अपना वादा नंबर एक बनाया जाना। मुश्किल से दो फीसद मुस्लिम आबादी वाले इस पर्वतीय प्रदेश में भाजपा का इस हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तुरुप को खेलना, हार सामने देखकर मोदी राज के बदहवासी में, अपने आजमूदा हथियारों की शरण लेने को ही दिखाता है।

बेशक, यह भी कोई संयोग ही नहीं है कि गुजरात में भी भाजपा, आरएसएस के सांप्रदायिक तरकश के उसी तीर का सहारा ले रही है। और यह तब है, जबकि मोदी ने चुनाव आयोग की मदद से, तीन हफ्ते से ज्यादा फुल-टाइम गुजरात में चुनाव प्रचार में लगाने का इंतजाम कर लिया है और ‘मैंने गुजरात को बनाया’ जैसे अनाकार्थी नारे से, चुनाव को ज्यादा से ज्यादा अपने ऊपर केंद्रित करने का भी एलान कर दिया है। वैसे मोदीशाही के गुजरात में इस रास्ते पर बढऩे के संकेत तो तभी मिल गए थे, जब विधानसभाई चुनाव की पूर्व-संध्या में, बिलकिस बानो केस के सजायाफ्ता अपराधियों को राज्य सरकार की सिफारिश पर और केंद्र सरकार की मंजूरी से, स्वतंत्रता दिवस के नाम पर माफी दी गयी थी। लेकिन, ऐसा लगता है कि मोदीशाही को, गुजरात की जनता की नाराजगी को भटकाने के लिए, 2002 के नरसंहार के जख्मों को कुरेदना भी काफी नहीं लगा है और वह अब समान नागरिक संहिता के नाम पर राज्य और समाज को और नये सांप्रदायिक जख्म बनाने का आश्वासन देकर, अपने सांप्रदायिक समर्थकों को कुछ और जोश दिलाना चाहती है। विकास-फिकास सब भुलाए जा चुके हैं, अब तो बस एकमात्र नेता की एक ही पुकार है--तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हेें सांप्रदायिक नफरत दूंगा!                                  


कलिजुग केवल नाम अधारा!

कलिजुग केवल नाम अधारा!

08-Nov-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

भाई ये तो विरोधियों की हद्द है। फौज को भी चुनावी पॉलिटिक्स में खींचने से बाज नहीं आ रहे हैं। बताइए, हिमाचल में अपनी पार्टी के लिए वोट मांगने के लिए प्रियंका गांधी ने कह दिया कि कांग्रेस की सरकार आयी, तो अग्निवीर योजना को खत्म कर देंगे और पहले की तरह फौज में पक्की भर्ती शुरू करा देंगे। पहले कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन, अब नौजवानों के लिए फौज में पुरानी भर्ती! इनका बस चले, तो मोदी जी विरोधी उन्हें नया इंडिया कभी बनाने ही नहीं देंगे। आखिरकार, आरएसएस वाले इंद्रेश कुमार को ही अग्निवीर योजना लाने का असली राज खोलना पड़ गया। मोदी जी की मेहरबानी ही है कि शौकिया, सिर्फ परेड-वरेड के लिए ठेके के फौजी भी रखवा रहे हैं। वर्ना नये इंडिया को किसी फौज-वौज की जरूरत ही कहां है? जब 130 करोड़ भारतीयों की प्रार्थनाओं से पाकिस्तान के 75 साल के कब्जे से कश्मीर और चीन के उससे भी पुराने कब्जे से कैलाश-मानसरोवर छुड़ा सकते हैं, तो फौज पर भारी खर्चा करने की जरूरत ही क्या है?

वैसे भी पक्की भर्ती वाली फौज भी रखकर तो हमने देख ही लिया, उधर से बचा हुआ कश्मीर नहीं ले पाए, तो नहीं ही ले पाए। और इधर से कैलाश-मानसरोवर लेना तो छोड़ो, गलवान के लाले और पड़ गए। राम-राम कर के बड़ी मुश्किल से बहला-फुसला के चीनियों को पीछे हटवाया है। वैसे कवि रहीम दास तो पहले ही कह गए थे -- जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवार! बल्कि इसमें तो सुई का भी खर्चा नहीं है : बस प्रार्थनाएं ही काफी हैं! बाकी समझदार के लिए आरएसएस नेता का इशारा ही काफी है। चार साल वाले अग्निवीरों की भर्ती भी बस जब तक है, तभी तक है। वर्ना परेड दिखाने के लिए फौजियों पर इतना खर्चा कौन करता है जी! फिर इसमें तो बचत की बचत है और गांधी जी के अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते पर चलने का ठप्पा भी।

अब प्लीज ये मत कहने लगिएगा कि इंद्रेश जी आरएसएस के बहुत बड़े नेता सही, पर मोदी जी ने तो एक बार भी अपने मुंह से नहीं कहा है कि अमृतकाल में, प्रार्थनाएं ही फौज का काम करेंगी? मोदी जी और इंद्रेश जी में भेद ही क्या है? मोदी जी बिला नागा अपने मन की बात कहते हैं तो क्या हुआ, उनके मन की एकाध बात तो उनके संघ-भाई भी कह ही सकते हैं। फिर मोदी जी ने तो कोरोना के खिलाफ युद्घ के टैम पर ही बता दिया था कि असली ताकत तो भजन-पूजन में ही है। जब कोरोना जैसे अदृश्य शत्रु को दिया-बाती, घंटा-थाली से हराया जा सकता है, तो साक्षात दिखाई देने वाले शत्रुओं को प्रार्थनाओं से क्यों नहीं हराया जा सकता। और सच पूछिए तो पीछे कोविड के टैम तक जाने की भी जरूरत नहीं है। मोदी जी ने अभी हाल में बताया था कि भजन-पूजन से भूख को घटाया जा सकता है। जिस भजन-प्रार्थना से भूख जैसे अदृश्य राक्षस को हराया जा सकता है, उससे दृश्य शत्रुओं को हराना क्या मुश्किल होगा? वैसे भी मोदी जी कहने में नहीं, करने में विश्वास करते हैं। वह जो नहीं कहते हैं, वह तो जरूर ही करते हैं।

पर एक बात समझ में नहीं आयी : मोदी जी रुपए के नोट पर लक्ष्मी-गणेश की तस्वीर छपवाने में देरी क्यों कर रहे हैं? क्या सिर्फ इसलिए कि यह डिमांड केजरीवाल ने की है, नागपुरियों ने नहीं? धर्म में यूं पॉलिटिक्स को घुसाना तो ठीक नहीं है। और हां! जब ओरेवा के प्रतिनिधियों ने जांच कर के बता दिया है कि मोरबी का झूला पुल हरि-इच्छा से गिरा है, उसके बाद भी पकड़-धकड़, जांच-वांच का शोर क्यों? सत्तर साल जो हुआ -- सो हुआ, अब हरि इच्छा का सम्मान होगा। पक्की भर्ती की फौज जो नहीं कर सकी, पूजा-प्रार्थनाओं से ऐसा हरेक काम होगा।          


बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्लाह

बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्लाह

05-Nov-2022

आबादी नियंत्रण : संघ के सांप्रदायिक तरकश का एक और तीर (आलेख : राजेंद्र शर्मा)  -

आलेख : राजेंद्र शर्मा

पुरानी कहावत है कि मिट्टी की हांडी तो गयी, पर कुत्ते की जात का पता चल गया। इस साल के आखिर में होने जा रहे गुजरात के विशेष रूप से महत्वपूर्ण चुनाव के नतीजों पर, इस चुनाव में आप पार्टी सुप्रीमो, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में, इस पार्टी के अपनी पूरी ताकत झोंक देने का क्या और किस हद तक असर पड़ेगा, इस पर तो अलग-अलग रायें हो सकती हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि अभी जबकि चुनाव की तारीखों की घोषणा अभी-अभी हुई है, आप पार्टी के मूल चरित्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू उजागर भी हो चुका है। यह पहलू है, संघ-भाजपा के बहुसंख्यकवादी मंच के सामने समझौते करने या उसके आगे समर्पण ही कर देने से भी आगे बढक़र, उसको उसी के मैदान में पछाडऩे की, उससे बढक़र बहुसंख्यकवादी बनकर दिखाने की, होड़ करने की तत्परता का।

याद रहे कि आप पार्टी के सुप्रीमो ने अब इसमें भी किसी संदेह या दुविधा की गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि यह सिर्फ बहुसंख्यक हिंदू समुदाय का ‘‘अपना’’ बनकर दिखाने भर की होड़ का मामला नहीं है। यह बाकायदा बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिकता का चैंपियन बनने की होड़ का मामला है, जिसकी पहचान मुस्लिम अल्पसंख्यकविरोधी चेहरा दिखाकर, हिंदू बहुसंख्यकों को गोलबंद करने की कोशिशों से होती है। समान नागरिक संहिता या कॉमन सिविल कोड की मांंग के लिए अपने समर्थन का बाकायदा एलान करने के जरिए, अरविंद केजरीवाल ने उक्त होड़ के लिए, अपना मुस्लिम अल्पसंख्यकविरोधी चेहरा आगे कर दिया है।

यह तो किसी से छुपा हुआ नहीं है कि तथाकथित समान नागरिक संहिता या कॉमन सिविल कोड का मुद्दा भारत में हमेशा से, अपनी अल्पसंख्यकविरोधी धार के लिए ही जाना जाता रहा है। इसीलिए, हैरानी की बात नहीं है कि चुनाव आयोग द्वारा अंतत: चुनाव की तारीखें घोषित किए जाने से पहले के अपने संभवत: आखिरी उद्ïघाटन-विमोचन-घोषणा दौरे पर, प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात में पहुंचने से ठीक पहले ही, भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल की बैठक में समान नागरिक कानून बनाने का फैसला कर लिया गया और इसके लिए हाई कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में, एक कमेटी बनाने का एलान कर दिया गया। याद रहे कि भाजपा कोई पहली बार ऐसा नहीं कर रही थी। खुद नरेंद्र मोदी की ही छात्रछाया में, इससे पहले उत्तराखंड में भी चुनाव से ऐन पहले, समान नागरिक कानून के लिए कदम उठाने का ऐसा ही एलान किया गया था।

बहरहाल, गुजरात के मामले में नयी बात हुई कि इस बार आप पार्टी, इस मामले में भी भाजपा से होड़ लेने के लिए मैदान में कूद पड़ी। याद रहे कि उत्तराखंड के चुनाव में भी आप पार्टी गुजरात की तरह ही लंबे-चौड़े दावों के साथ और मुख्यमंत्री पद के अपने उम्मीदवार के एलान के साथ, पूरे जोर-शोर से चुनाव में कूदी थी, फिर भी तब तक वह समान नागरिक संहिता के मामले में भाजपा से होड़ लेने से दूर रहना ही बेहतर समझ रही थी। बहरहाल, अब गुजरात चुनाव की पूर्व-संध्या में वह इस मामले में भी भाजपा से होड़ लेने के लिए ताल ठोक रही है। बेशक, केजरीवाल ने इस मामले में भी भाजपा की नीयत सच्ची नहीं होने का आरोप लगाया और कहा कि ‘‘अगर इन (भाजपा) की नीयत समान नागरिक संहिता बनाने की है, तो वे इसे पूरे देश में लागू क्यों नहीं करते? लोकसभा चुनाव का इंतजार कर रहे हैं क्या?", आदि-आदि। लेकिन, आप सुप्रीमो यह कहकर इस मुद्दे को अपने चुनाव प्रचार का हथियार बनाने तथा इसके क्रम मेंं अप्रत्यक्ष रूप से समान नागरिक संहिता कानून बनाने का अनुमोदन करने तक ही नहीं रुक गए कि, ‘‘आप को समान नागरिक संहिता लागू करना ही नहीं है, आपकी नीयत खराब है।’’ इससे आगे बढक़र उन्होंने यह भी एलान किया कि, ‘‘समान नागरिक संहिता बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार को समान नागरिक संहिता बनानी चाहिए।’’

यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा शुरू से संघ परिवार के केंद्रीय या कोर मुद्दों में रहा है, जिन्हें वह अपनी मूल पहचान के मुद्दे मानता है। बहरहाल, उसके अलावा भी बहुसंख्यकवाद की अपनी पैरोकारी को छुपाने के लिए, तरह-तरह की झूठी-सच्ची दलीलों से समान नागरिक संहिता की पैरवी करने वालों को भी, दो-टूक तरीके से यह कहना कभी मंजूर नहीं होता है कि विवाह, उत्तराधिकार आदि के मामलों से हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि, सभी पर्सनल कानूनों की जगह पर, तमाम धार्मिक विधि-निषेधों से ऊपर, बराबरी के जनतांत्रिक दावों पर आधारित समान नागरिक संहिता की जरूरत है। और कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी कोई जनतांत्रिक जरूरत तो जनतांत्रिक तरीके से यानी जनजागरण के जरिए, उक्त निजी कानूनों की जगह पर, ऐसे जनतांत्रिक समान निजी कानून की जरूरत जनता से मनवाने, उसे ऐसे कानून के पक्ष में करने के जरिए ही, पूरी की जा सकती है। इसके उलट, समान नागरिक संहिता के मुद्दे को आम तौर पर अल्पसंख्यकविरोधी तथा खासतौर पर मुस्लिमविरोधी गोलबंदी का हथियार बनाना, ठीक इसी की मांग करता है कि इसे मुस्लिमविरोधी हथियार के रूप में भांजा जाए या इसके थोपे जाने के जरिए, मुसलमानों की चूड़ी टाइट करने का, बहुसंख्यकवादी कतारों को आश्वासन दिया जाए! यही खेल है, जिसमें भाजपा को टक्कर देने के लिए, अब केजरीवाल ने अपनी आप पार्टी को उतार दिया है।

यह भी याद रहे कि आप पार्टी इस होड़ में उस गुजरात में उतरी है, जिसने 2002 के आरंभ में आजादी के बाद का सबसे बड़ा और सबसे प्रत्यक्ष रूप से शासन अनुमोदित, मुस्लिमविरोधी नरसंहार देखा था। बेशक, यह भी याद रखा जाना चाहिए कि उस नरसंहार के ही बल पर कथित ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बनकर उभरे और अपने इसी चेहरे का, ‘कारपोरेट हृृदय सम्राट’ के चेहरे से योग कायम कर, उस नरसंहार के बारह साल बाद भारत के प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे तथा अब तक खुद को लगभग चक्रवर्ती सम्राट के रूप में स्थापित कर चुके, नरेंद्र मोदी की खड़ाऊं से बल्कि कहना चाहिए कि स्वयं मोदी से ही, आप सुप्रीमो केजरीवाल का, बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के मैदान में यह मुकाबला होना है। इस मुकाबले में क्या नतीजा आ सकता है, इसका अनुमान लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं होना चाहिए।  फिर भी, चुनावी नतीजे की अटकलों में न जाकर, यहां हम सिर्फ इतना रेखांकित करना चाहेंगे कि हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता की दुहाई का सहारा लेने के मैदान में, आप सुप्रीमो केजरीवाल, भाजपा सुप्रीमो नरेंद्र मोदी से होड़ ले रहे हैं। और यही चीज है, जो केजरीवाल और उनकी आप पार्टी को, कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी सत्ताधारी वर्गीय पार्टियों से भी अलग कर देती है। चुनावी सफलता मिलना-न मिलना अपनी जगह, केजरीवाल की आप पार्टी विकल्प के नाम पर, मोदी की भाजपा की हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता का, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक विकल्प ही पेश करने की कोशिश कर रही है, जो कोई विकल्प ही नहीं है। 

जाहिर है कि केजरीवाल की आप पार्टी ने हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता के मैदान तक की अपनी यह यात्रा कोई एक झटके में या अचानक ही तय नहीं की है। उसने यह यात्रा धीरे-धीरे तय की है। ‘‘लोकपाल कानून’’ की मांग को लेकर चले जिस भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन की कोख से एक राजनीतिक नेता के रूप में केजरीवाल तथा उनकी आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ था, पर्दे के पीछे से उसके आरएसएस के साथ रिश्तों की कहानी अब काफी हद तक सामने आ चुकी है। लेकिन, उसकी अर्थव्यवस्था पर कारपोरेट नियंत्रण तथा भ्रष्टाचार से उसके रिश्तों से लेकर, बढ़ती सांप्रदायिकता तक पर मुखर चुप्पियों की सचाई तो, तब भी एक खुला राज थी। बाद में दिल्ली में, आम तौर पर भाजपा-समर्थक जनाधार के एक बड़े हिस्से की ‘‘स्थानीय पसंद’’ के रूप में मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने के साथ ही केजरीवाल ने, तथाकथित हिंदू भावनाओं-संवेदनशीलताओं का वीटो, बिना किसी ना-नुकुर के स्वीकार कर लिया।

लेकिन, केजरीवाल की आप पार्टी इतने पर ही नहीं रुकी। मोदी के विरोध के अपने सारे प्रदर्शन के बावजूद, पहले जेएनयू के छात्र नेताओं व आम तौर पर छात्र आंदोलन के खिलाफ सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों से लेकर संघ परिवार की सडक़ हिंसा तक पर, केजरीवाल ने न सिर्फ चुप्पी साधे रखी, बल्कि आगे चलकर, जेएनयू के वामपंथी छात्र नेताओं के खिलाफ राजद्रोह के सरासर फर्जी मामले चलाने के लिए भी, उनकी सरकार ने इजाजत दे दी। और आगे चलकर, सीएएविरोधी प्रदर्शनों तथा खासतौर पर शहीनबाग के ऐतिहासिक प्रदर्शन और इन प्रदर्शनों के खिलाफ मोदी-शाह सरकार की दमनलीला के खिलाफ केजरीवाल सरकार और आप पार्टी ने, दिल्ली के चुनावों तक बाकायदा चुप्पी ही साधे रखी।

और चुनाव के नतीजे आने के चंद हफ्तों में ही, सीएएविरोधी प्रदर्शन के विरोध के नाम पर, संघ द्वारा प्रायोजित हिंसा तथा पूर्वी दिल्ली के दंगों के समय भी, केजरीवाल सरकार और आप पार्टी ने आम तौर पर चुप्पी ही नहीं साधे रखी, बल्कि दंगों में हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति के मामले में, मुसलमानों के साथ बाकायदा भेदभाव भी बरता। इसी बीच, खासतौर पर 2020 के चुनाव में पहले से कम बहुमत से जीत के बाद, केजरीवाल और उनकी पार्टी ने बाकायदा भाजपा के हिंदुत्ववादी ‘‘जय श्रीराम’’ के नारे का जवाब ‘‘जय हनुमान’’ के नारे से देने का बहुसंख्यकवादी खेल शुरू कर दिया था। इससे पहले ही केजरीवाल ‘‘श्रवण कुमार’’ बनकर, बुजुर्गों को तीर्थयात्रा कराने की योजना शुरू कर चुके थे! अचरज नहीं कि गुजरात के चुनाव प्रचार के लिए इस सिलसिले को बाकायदा इसकी मांग किए जाने तक पहुंचा दिया गया कि भारतीय नोट पर, गांधी की तस्वीर के दूसरी ओर, लक्ष्मी-गणेश की तस्वीर छापी जानी चाहिए, जिससे भारतीयों को देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिल सके और इस दैवीय आशीर्वाद से भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सके।

यही खेल अब ‘‘समान नागरिक संहिता’’ का सच्चा झंडाबरदार होने के दावे तक पहुंच चुका है। लेकिन, हिंदू-हितचिंतक से मुस्लिमविरोधी बहुसंख्यकवादी तक की यह यात्रा भी केजरीवाल ने उत्तरोत्तर तय की है। पूर्वी दिल्ली के दंगे के बाद, कोविड की पहली लहर के दौरान, तबलीगी जमात के बहाने मुस्लिम समुदाय का ही दानवीकरण करने में केजरीवाल और उनकी सरकार ने, मोदी-शाह जोड़ी की सरकार से सचमुच होड़ लेकर दिखाई थी। इसके बाद तो जैसे उनका धडक़ा ही खुल गया। 2022 में ही, जब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का अनुकरण करते हुए, दिल्ली में जहांगीरपुरी में हनुमान जयंती के जुलूस के नाम पर हिंसा कराने के बाद, मुसलमानों के खिलाफ बुलडोजर-अस्त्र को मैदान में उतारा गया, आम आदमी पार्टी और उसकी सरकार ने बाकायदा भाजपा-शासित एमसीडी तथा केंद्र सरकार पर ही, ‘रोहिंगियाओं को पनाह देने’ के आरोप लगाने शुरू कर दिए। यहां से भावनगर की केजरीवाल की प्रैस कान्फ्रेंस एक कदम ही दूर रहती थी। यह दूसरी बात है कि इससे पहले, दिल्ली में हिंदुत्ववादी-जातिवादी दावों के सामने समर्पण करते हुए, अपनी सरकार के एकलौते दलित मंत्री से इस्तीफा दिलवाने के बाद, गुजरात में प्रचार के दौरान केजरीवाल खुद को लगभग कृष्णावतार ही घोषित कर चुके थे, जिसका जन्म ही ‘‘कंस की औलादों’’ का विनाश करने के लिए हुआ था! मोदी का अगर अवतार होने का दावा है, तो केजरीवाल भी क्यों ऐसा दावा करने से पीछे रहें!

और जैसे संघ-भाजपा की हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता की अपनी नकल को पूरा करने के लिए ही, दिल्ली में केजरीवाल सरकार, जगह-जगह बड़े-बड़े तिरंगे लगाने से लेकर, छात्रों को ‘‘कट्टर देशभक्ति’’ की शिक्षा दिलाने तक के राष्ट्रवादी पाखंड के जरिए, अपने ज्यादा से ज्यादा बहुसंख्यकवादी होते चेहरे पर, देशभक्ति का नकाब डालने की भी कोशिश करती रही है। मोदी राज के आचार और विचार की प्रतिलिपि बनकर दिखाने में लगी केजरीवाल की आप पार्टी को गुजरात की जनता विकल्प के तौर पर खास तवज्जो दे, इसकी तो शायद ही कोई तुक होगी। फिर भी वह हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता के मोदी ब्रांड के विकल्प के तौर पर केजरीवाला ब्रांड पेश करने के जरिए, पूरा मैदान हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता के लिए सुरक्षित करने में मदद तो कर ही सकती है। वह मोदी राज के किसी विकल्प की संभावनाओं को कमजोर करने के जरिए, इस बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक जनविरोधी निजाम को कुछ सहारा भी दे ही सकती है। आप पार्टी का अकेले अपने दम पर देश भर में भाजपा का विकल्प पेश करने का दावा करना और उसका मुकाबला करने के लिए विपक्षी ताकतों के साथ आने की जन-भावना के खिलाफ, उसका अपने इकलौता विकल्प होने के इस दावे के अनुरूप हर जगह सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने की चुनावी-राजनीतिक कार्यनीति अपनाना, उसकी इसी भूमिका का इशारा है।                                               


"राज्यपाल-रोग" : एक महामारी, जो बड़ी तेजी से फैल रही है भारत में

01-Nov-2022

संजय पराते

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जिन राज्यों में गैर-भाजपा दल शासन कर रहे हैं, वहां केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार के दिशा-निर्देशन में नीतिगत और शासन के मामलों में राज्यपालों द्वारा अभूतपूर्व ढंग से हस्तक्षेप किया जा रहा है। पहले बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, तेलंगाना, दिल्ली, पुडुचेरी और निश्चित रूप से अब केरल -- ऐसे राज्य हैं, जिनका उल्लेख "राज्यपाल-रोग" से पीड़ित राज्यों के रूप में किया जा सकता है। यह रोग कई रूपों में प्रकट हो रहा है। इनमें से कुछ उदाहरण इस तरह हैं : विधायिका द्वारा पारित विशिष्ट अधिनियमों द्वारा शासित शैक्षणिक संस्थानों के विधिवत नियुक्त अधिकारियों को 24 घंटे के भीतर इस्तीफा देने का आदेश देना, ऐसा आदेश देने का अधिकार संविधान ने राज्यपाल को नहीं दिया है और यह राज्यपाल द्वारा संविधानेत्तर शक्तियों को हथियाने का प्रयास है ; अलाने और फलाने मंत्री से "मैंने अपनी खुशी वापस ले ली है" - जैसे विचित्र बयानों के बाद, उन्हें पद से हटाने के लिए मुख्यमंत्री को निर्देश देना, जबकि औपनिवेशिक "खुशी का सिद्धांत" सिविल सेवकों पर लागू होता है, न कि निर्वाचित मंत्रियों पर ; निर्वाचित राज्य सरकार के खिलाफ सार्वजनिक आलोचना की दैनिक खुराक जारी करना और सरकार के कामकाज में बाधा डालना ; राज्य सरकार द्वारा पारित विधेयकों की स्वीकृति में देरी करने के लिए, "मेरे पास पूर्ण विवेक और शक्ति है"- जैसे बेहूदा तर्क देना ;  या यह नीतिगत घोषणा करना कि कोरोना टीका का डोज लगवाने वालों को ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा ; आदि।

लेकिन इस "गवर्नर-रोग" को किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत व्यक्तित्व-विशेषता की कमजोरी तक सीमित रखना और भारत के संविधान को कमतर आंकना गलत होगा। व्यक्तिगत स्तर पर कोई व्यक्ति सबसे सभ्य और अच्छा इंसान हो सकता है। लेकिन वास्तव में यह केंद्र सरकार द्वारा राज्यों में चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने का एक नपा -तुला और सधा राजनैतिक कदम है, क्योंकि भाजपा का मिशन 2024 किसी भी तरह से सभी गैर-भाजपा सरकारों को निगलना है। इसके लिए एक तरीका हमने विधायकों की खरीद-फरोख्त का देखा है। 2014 के बाद से 12 राज्यों में भाजपा ने ऐसे प्रयास किए हैं और राजस्थान और झारखंड के दो मामलों को छोड़कर सभी में वह सफल रही है।

दूसरा तरीका यह है कि सत्तारूढ़ दल की इच्छाओं के आगे झुकने से इंकार करने वाले विपक्षी दलों के नेताओं को निशाना बनाने के लिए भाजपाई त्रिशूल - सीबीआई, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय - का इस्तेमाल किया जाए। जो लोग असम के वर्तमान मुख्यमंत्री या तृणमूल नेताओं की तरह कमल की ओर पाला बदलते हैं, तो वे पहले के सभी आरोपों और मामलो से बरी होकर शुद्धतम बन जाते हैं और जब तक वे अच्छे बच्चे बने रहते हैं, उनके खिलाफ तमाम मामले ठंडे बस्ते में पड़े रहते हैं।

तीसरा और अधिक हालिया प्रयास "गवर्नर-रोग" को उजागर करता है, जिसका प्रमुख लक्ष्य राज्यों में अस्थिरता पैदा करना है। इस पद्धति का एक और मूलभूत पहलू है, जो भाजपा के केंद्रीकरण के एजेंडा से जुड़ता है और संविधान के संघीय चरित्र पर हमला करता है। केंद्रीकरण का एक प्रमुख लक्ष्य है, शिक्षा पर हमला और शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को बेरहमी से कुचलना। भाजपा ने भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायीकरण, सांप्रदायिकता और केंद्रीकरण के जहरीले मिश्रण को पेश करने के अपने एजेंडे को प्राथमिकता दी है। इसके लिए उसे इन संस्थाओं का नेतृत्व करने के लिए अपने स्वयं के चुने हुए लोगों की आवश्यकता है। गुजरात में यही हुआ था, जब मोदी मुख्यमंत्री थे। गुजरात विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत, किसी कुलपति की नियुक्ति करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और राज्यपाल की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। गुजरात में आज भी यही स्थिति है। लेकिन अब शिक्षा के क्षेत्र में भाजपा के केंद्रीय एजेंडे का कैनवास गुजरात से आगे पूरे देश में फैल गया है। इसके लिए मोदी सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का उपयोग पूरे भारत में कुलपतियों की नियुक्ति में राज्यपालों की भूमिका को मजबूत करने के लिए कर रही है, भले ही इसका मतलब है -- अपनी ही राज्य सरकारों पर ऊपर से शासन करना। हाल ही में, गुजरात में एसपी विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति से संबंधित एक विशेष व्यक्तिगत मामले में, मार्च 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर इस नियुक्ति को रद्द कर दिया कि उसने यूजीसी के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया है। यह निर्णय एक खतरनाक मिसाल कायम करता है, क्योंकि यह विभिन्न विश्वविद्यालयों को संचालित करने वाले राज्य के कानूनों पर यूजीसी के दिशा-निर्देशों की सर्वोच्चता को कायम रखता है। यह पूरी तरह से केंद्रीकरण के ढांचे के अनुकूल है। गौरतलब है कि गुजरात सरकार ने अभी तक इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं की है।

यह कोई संयोग नहीं है कि लगभग सभी गैर-भाजपा राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच उच्च शिक्षा के क्षेत्र में टकराव पैदा हो गया है। विपक्ष द्वारा शासित कम-से-कम पांच राज्यों में - 2019 में बंगाल, दिसंबर 2021 में महाराष्ट्र, इस साल की शुरुआत में तमिलनाडु, हाल ही में तेलंगाना में, और अब केरल में, उच्च शिक्षण संस्थानों में कुलपतियों की नियुक्ति की कानूनी प्रक्रिया पर केंद्र सरकार द्वारा राज्यपालों के माध्यम से किए जा रहे अतिक्रमण के खिलाफ राज्य सरकारों को विरोध करने और अपनी स्वायत्तता की रक्षा के लिए कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। 

इससे राज्यपालों की नियुक्ति की वर्तमान पद्धति और उनकी शक्तियों पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। केंद्र-राज्य संबंधों पर सरकारिया आयोग की व्यापक सिफारिशों के बाद, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम एम पुंछी के नेतृत्व में अप्रैल 2007 में एक दूसरा आयोग गठित किया गया था। इसने मार्च 2010 में 247 सिफारिशों वाली अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट के उस खंड को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा, जो राज्यपालों की नियुक्ति और उनको हटाने से संबंधित है।

पहली और सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह है कि "राज्यपाल पद पर नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति को अपनी नियुक्ति से कम-से-कम दो साल पहले तक सक्रिय राजनीति (स्थानीय स्तर की राजनीति से भी) से दूर रहना चाहिए।" अगर यह सिफारिश लागू हो जाती है, तो देश को "गवर्नर-रोग" के हमले से बचाया जा सकता है। अब यदि हम भाजपा द्वारा नियुक्त राज्यपालों की सूची को देखेंगे, तो ऊपर वर्णित राज्यों में, प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, भाजपा के एक प्रमुख सदस्य के रूप में सक्रिय राजनीति में रहा है। यह दावा किया गया था कि केरल का राज्यपाल एक अपवाद हैं, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार ही, वे 2004 में भाजपा में शामिल हो गए थे और उन्होंने पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था, हालांकि असफल रहे और "दागी" लोगों को टिकट देने के विरोध में 2007 में उन्होंने भाजपा छोड़ दी थी। नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद 2015 में वे फिर से इसमें शामिल हो गए।

राज्यपाल अपनी नियुक्ति पर जो शपथ लेता है, वह यह है कि वह "संविधान की संरक्षा, सुरक्षा और बचाव" करेगा/करेगी और "अपने आप को (उस राज्य का नाम जिसमें उसे राज्यपाल नियुक्त किया गया है) सेवा और लोगों की भलाई के लिए समर्पित करेगा/करेगी। राज्यपाल के रूप में नियुक्त एक सक्रिय राजनेता के उस राज्य में अपनी पार्टी के हितों की सेवा करने की ही अधिक संभावना होती है, न कि आम जनता की सेवा करने की, जैसा कि प्रतिज्ञा में घोषित किया गया है। इसलिए इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के लिए यह सिफारिश लागू करना आवश्यक है। इसका मतलब होगा कि मोदी सरकार को केंद्र द्वारा नियुक्त लगभग सभी राज्यपालों को हटाना पड़ेगा।

पुंछी आयोग की दूसरी महत्वपूर्ण सिफारिश यह है कि "राज्यपाल की नियुक्ति करते समय राज्य के मुख्यमंत्री की सहमति होना चाहिए।" यदि इसे लागू किया गया होता और राज्यपाल की नियुक्तियों में मुख्यमंत्रियों की हामी ली जाती, तो जिन लोगों को चुनावी जनादेश प्राप्त होता है, उनका राजभवनों में लगातार चक्कर काटने से कितना समय और ऊर्जा बच जाता!

वर्तमान चर्चा के लिए तीसरी और बहुत प्रासंगिक यह सिफारिश है कि "विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में राज्यपालों की नियुक्ति की प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए।" शिक्षा समवर्ती सूची में है। शैक्षणिक अधिकारियों की नियुक्ति सहित अपने राज्य के शिक्षा संस्थानों के विकास में राज्य सरकारों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राज्यों का यह एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा राज्यपालों के जरिए वर्तमान हमले से उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता की रक्षा के लिए विपक्षी दलों को व्यापक शैक्षणिक समुदाय के साथ एकजुट होना चाहिए। इसे एक राज्य या पार्टी के मुद्दे के रूप में देखना अदूरदर्शी होगा।


कबूतर बड़ा या चीता!

कबूतर बड़ा या चीता!

29-Oct-2022

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व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

मोदी जी के इन विरोधियों ने लगता है कि भारत को बदनाम करने की सुपारी ही ले रखी है। बताइए, पहले जिस देश के पीएम कबूतर छोड़ा करते थे, मोदी जी उस देश में अब चीेते छुड़वा रहे हैं कि नहीं! देशी नहीं मिले, तो विदेश से मंगवाकर छुड़वा रहे हैं, पर चीते छुड़वा रहे हैं कि नहीं!! कहां बेचारा कबूतर और कहां शिकारी चीता; मोदी जी इंडिया की शान बढ़ा रहे हैं कि नहीं? पर मजाल है जो ये विपक्षी मोदी जी का जरा सा थैंक यू कर दें। उल्टे कह रहे हैं कि यह तो अक्ल बड़ी या भैंस 2.0 हो गया -- कबूतर बड़ा या चीता! मोदी जी का नाम बदलते-बदलते मुहावरे बदलने तक पहुंच गए -- कभी कुछ तो ऑरीजनल भी कर लेते!

चीते का कनैक्शन भैंस से जोडऩे की विरोधियों की चाल, मोदी जी बखूबी समझते हैं। पर विपक्षी यह कैसे भूल गए कि भैंस को मोदी जी के राज में वंश प्रमोशन देकर, गोवंश में शामिल किया जा चुका है। और क्यों नहीं किया जाता? सिर्फ रंग जरा गहरा होने के अलावा हमारी भैंस, गाय से किसी बात में कम है क्या? और मोदी जी का नया इंडिया रंगभेद बर्दाश्त नहीं कर सकता, हां! जाति की बात दूसरी है। और तो और चीता तक गाय और भैंस के मांस में अंतर नहीं करता है। इसलिए, विरोधी अगर भैंस का मजाक उड़ाने के जरिए, चीते को नीचा की कोशिश करते हैं, तो उन्हें हिंदुओं की भावनाओं का सामना करना पड़ेगा। चीता छोडऩे को, गोवंश विरोधी मामला बनाने की उनकी साजिश, हर्गिज कामयाब नहीं हो सकती। और प्लीज, कबूतर को, शाकाहारी और इसलिए शांतिवादी होने के नाम पर, चीते से बड़ा बताने की कोशिश कोई नहीं करे। चीता विदेशी मेहमान है और अगर उसके संस्कार मांसाहारी हैं तो, उनका भी सम्मान करना हमारा फर्ज हो जाता है। वर्ना कहां कबूतर और कहां छप्पन इंची छाती वाला चीता। कबूतर में और खासियत की क्या है, शाकाहारीपन के अलावा!  

और छोडऩे से याद आया। जब से अमृतकाल आया है, सजायाफ्ता बलात्कारी भी तो धड़ाधड़ छोड़े जा रहे हैं। बिलकीस वालों से लेकर राम-रहीम तक। देसी चीतों की फसल आ गयी लगती है। यानी चीते छोडऩे में भी इतनी जल्दी आत्मनिर्भरता -- वाह मोदी जी, वाह!       


 सर सैयद अहमद खान और उनके सियासी अफकार

सर सैयद अहमद खान और उनके सियासी अफकार

27-Oct-2022

एम. डब्लू. अंसारी 

हर साल की तरह इस को भारत समेत पूरी दुनिया डे" धूम धाम से मनाया गया। अहमद खान और अलीगढ डालते हुए कई अहम पहलुओं इजहार किया गया और सभी ए-हिन्द से मुतालबा किया अहमद खान को "भारत रत्न"

साल भी 17 अक्टूबर में "205 वां सर सैयद इस मौके पर सर सैयद तहरीक पर रोशनी पर अपने ख्यालात का जगहों गया कि से हुकूमत - सर सैयद से नवाजा जाए।

सर सैयद अहमद मिशन और अदबी कारनामे जगह बात होती है, लेकिन खान ने जो तालीमी अंजाम दिए इस पर हर सर सैयद के सियासी अफकार को लेकर बहुत ही कम सीमीनार, प्रोग्राम और संपोजियम का इनेकाद किया जाता है या नहीं के बराबर चर्चा की जाती है। जिसकी आज के दौर में काफी मानवीयत है। आज के दौर में फिर से हमें सर सैयद के सियासी अफकार को अपनाने की जरूरत है और वक्त का तकाजा भी यही है ।

वजेह रहे कि 1857 की जंग के बाद मुसलमानों को बिल्कुल बेबस और लाचार कर दिया गया था। मुसलमान सियासी लिहाज से कमजोर तरीन हो गए थे। तालीमी इदारों के दरवाजे उन पर तकरीबन बंद कर दिए गए थे। मजलूमियत का शिकार मुसलमान गुलामी की जिंदगी गुजारने पर मजबूर हो गए थे ऐसे दिलगीर और दिलसोज हालात में मुसलमानों की डूबती नाव को सहारा देने के लिए दर्द दिल रखने वाले जो चंद मुखलिस लोग आगे आए, इनमें से एक नाम सर सैयद अहमद खान का भी है। सर सैयद अहमद खान का ख्याल था कि चालाक व अय्यार अंग्रेजों के साथ मफाहमत करके मुसलमानों को पहले तालीमी और मआशी तौर पर मजबूत किया जाए फिर मुसलमान अपना खोया हुआ शनाखत, वकार और अहद वापस छीन ले । जिससे वह पहली जंग ए आजादी के बाद से महरूम हो गए थे। जो एक साथ फातेह कौम थी मफतूह कौम बन कर रह गई है।

सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों को मशवरा दिया कि सियासत की नब्ज को पहचानते हुए, हालात ए हाजरा को भांपते हुए और सियासत से दूर रहते हुए अपनी तमाम तर तवज्जोहात तालीम के हुसूल और मआशी व मुआशरती के तौर पर बहाली पर दें। ताकि वह दीगर मजाहिब के बराबर मुकाम हासिल कर सकें। सर सैयद हिंदू मुस्लिम इख्तिलाफात को खत्म करके तआउन और इत्तेहाद की राह पर गामजन करने के हक में थे। उन्होंने दोनों मज़ाहिब को एक दूसरे के करीब लाने की मुसलसल कोशिशें की। अपने तालीमी इदारों में हिंदू असातजा की तकरूरी की और हिंदू तलबा को दाखिले दिए । सर सैयद अहमद खान ने मुल्क के लोगों के हुकूक के तहफ्फुज के लिए अपनी तहरीक के जरिए काम शुरू किया।

सर सैयद ने लोगों से अपील की और कहा कि:

"Remember that the words Hindu and Muslim are only meant for religious distinction: otherwise all persons who reside in this country belong to one and the same nation"

इसके साथ ही सर सैयद ने भारत को एक खूबसूरत दुल्हन और हिंदू मुस्लिम को उस दुल्हन की दो आंखों से ताबीर की लेकिन आज हिंदू-मुस्लिम में तमाम तरह की खालिश, दरार और खाई पैदा की जा रही है। इसके लिए सरकार सरकारी व गैर सरकारी तौर पर हर वह काम किए जा रहे हैं और अकल्लियतों के खिलाफ हर मुमकिन कोशिश की जा रही है कि यह दोयम दर्जे के बाशिंदे बन जाए। वहीं मुसलमानों की हालत भी बद से बदतर होती जा रही है।

आज मुसलमानों के खिलाफ गोदी मीडिया, Communal Media, बड़े बड़े अखबार जो सरकार के PayRoll पर हैं, जानबूझकर गलत प्रोपेगेंडा के तहत झूठ और अफवाह फैलाकर (जिसकी कोई बुनियाद नहीं है) कौम व मिल्लत को बदनाम करने की शब-व- रोज कोशिशें की जा रही हैं और मुल्क को कमजोर करने पर आमादा हो चुके हैं। इसके साथ ही सरकार अपनी तमाम तरह की नाकामी को छुपाने के लिए अपने तमाम नाकामी का ठीकरा भी मुसलमानों के सर फोड़ रही हैं।

सरकार अपनी नाकामी को छुपाने के लिए हर वह हथकंडा अपना रही है जिसमें हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, भारत-पाकिस्तान वगैरह वगैरह का जाविया और तडका लगा हुआ हो। और इस तरह आम शायरियों को उनका खास मुद्दा तालिम, रोजगार, सेहत और महंगाई वगैरह वगैरह से भटकाया और बहकाया जा रहा है। भारत वासियों का ध्यान भी इन खास मुद्दों की तरफ नहीं जा रहा है वरना आज भारत की आम जनता सड़कों पर होती ।

आज मुल्क की अकसरियत आबादी अमनो- अमान चाहती है। दलितों, गरीबों दलितों पर हो रहे जुल्मो-ज्यादती, तफरीक के सख्त खिलाफ हैं। मगर हर क्षेत्र में, हर जगह बरसरे इक्तेदार मनुवादी और पूंजीवादी अनासिर सरकारी अमला का इस्तेमाल कर आवाज को कुचल दिया जा रहा है। हर जुल्म ज्यादती के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाया जा रहा है। और इन सब से निजात पाने का वाहिद तरीका समाजी और सियासी शऊर पैदा करना है। ताकि एकजुट होकर इसका मुकाबला किया जा सके।

फखरे अरब व अजम हजरत अली मियां हसनी नदवी रहमतुल्लाही अलैह ने कौम के लोगों को खेताब करते हुए कहा कि:

"अगर कॉम को पंज वक्ता फीसद तहज्जुद गुजार सियासी शऊर बेदार ना मुल्क में आइंदा तहज्जुद भी पाबंदी आयद हो जाए नदवी अलैहिर रहमा में

नमाजी ही नहीं बल्कि 100 बना दिया जाए, लेकिन उसके किया जाए तो मुम्किन है इस तो दूर पांच वक्त की नमाजों पर ( कौल अबुल हसन अली एक सबक आमोज नसीहत )

1857 के बाद (तालिमी, सियासी, मुसलमानों की जो सूरते हाल मआशी) समेत दीगर तमाम मसाइल से जैसे उस वक्त दो-चार थे। आज भी मुसलमानों की सूरत हाल वही है। मुल्क भर में जहां कहीं भी सरकारी या गैर सरकारी तौर पर जो भी इवेंट्स हो रहे हैं, हर जगह से मुसलमानों के खिलाफ बोला जा रहा है। मुसलमानों की शिनाख्त को, मुसलमानों की निशानी को खत्म करने की कोशिशें की जा रही है।

गुजिश्ता कई सालों से मुसलमानों पर लव जिहाद, हिजाब जिहाद, आबादी जिहाद और दीगर खिताब देकर मुसलमानों के खिलाफ लोगों को मुश्तइल किया जा रहा है। मुस्लिम इदारों जैसे अकल्लियती कमीशन, हज हाउस / हज कमेटी, वक्फ बोर्ड / वक्फ प्रॉपर्टी, उर्दू अकैडमी / उर्दू बोर्ड, मदरसा कमेटी / मदरसा बोर्ड, मसाजिद, इबादतगाह और ईदगाह समेत जितने भी इदारे हैं उन पर हमले हो रहे हैं। उन को कमजोर किया जा रहा है। यहां तक कि आज अकल्लियतों, गरीबों और कमजोर तबका पर जब जुल्मो-ज्यादती होती है तो कोई भी कमीशन जो उसके लिए बनाई गई है, खुलकर बात नहीं करती, सामने तक नहीं आती है। यहां तक कि आवाज बुलंद नहीं करती है।

मुल्क के नौजवान तबके में समाजी और सियासी बेदारी और शऊर आया है और वह जान चुके हैं कि सेकुलर, सेकुलारिजम और सेकुलर पार्टियां अब नहीं रही। आज सियासी पार्टियों को मुसलमानों का वोट तो चाहिए लेकिन उनके साथ हो रहे मजालिम के वक्त यह पार्टियां खामोश रहती हैं। यहां तक कि दिखावे के तौर पर भी आवाज बुलंद नहीं करती।

आखिर क्या बात है कि मध्यप्रदेश के बुरहानपुर, उज्जैन समेत कई जगहों पर मुसलमानों पर जुल्म होता है और इन मामलों पर यहां की कांग्रेस पार्टी के सीनियर लीडर खामोश हैं। यहां तक कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जी जो खुद को सेकुलर बता रहे हैं इन मामलों की मजम्मत तक नहीं किए। वहीं गुजरात के खेड़ा वाकिआ और बिलकिस बानो मामले पर आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल खामोश रहे यहां तक कि सी.ए. ए- एन.आर.सी और दिल्ली दंगा के वक्त केजरीवाल चुप्पी साधे रहे। न ही आम आदमी पार्टी के दीगर लीडरान ने इस मौके पर कुछ कहा। इसी तरह गुजरात वाकिआ पर जिग्नेश मेवानी और कन्हैया कुमार ने भी मजम्मत नहीं कि ना ही गुजरात कांग्रेस के दीगर लीडरान ने मजम्मत की। राजस्थान की गहलोत सरकार भी खामोश है और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव (जिनको 99% मुसलमानों ने वोट दिया) और मायावती समेत मुल्क भर की तमाम सियासी पार्टियां और तमाम सीनियर लीडरान, मुसलमानों पर हो रहे जुल्मो-ज्यादती पर तमाशाई बने रहते हैं। बी.जे.पी से तो उम्मीद नहीं की जा सकती ।

अलबत्ता मुसलमान जो पहले से ही 72 फिरकों में बंटे हुए हैं, मुसलमानों को आगे और बांटने का काम करते हुए कौमी सतह पर तमाम मुस्लिम भाजपाई लीडरों को खत्म किया जा रहा है और उत्तर प्रदेश में एक पसमांदा तबके से वजीर बनाया गया है। और पसमांदा समाज उसी को लेकर झुनझुना बजा रही है। जबकि अगर इतनी हमदर्दी है तो 1950 के Presidential order को बी.जे.पी खत्म क्यों नहीं करती? जो कांग्रेस नहीं कर सकी। यह तो सरासर Constitutional Discrimination है। अब ऐसे में मुसलमानों को क्या करना चाहिए?

सर सैयद के सियासी अफकार और हजरत अली मियां नदवी के कौल के मुताबिक आज मुसलमानों को अपने तालीम, रोजी-रोटी अपनी हिफाजत और आपनी शिनाख्त की हिफाजत आईन के मुताबिक करना चाहिए। तमाम मुस्लिम में इदारे जैसे अकल्लियती कमीशन, हज हाउस / हज कमेटी, वक्फ बोर्ड / वक्फ प्रॉपर्टी, उर्दू अकैडमी / उर्दू बोर्ड, मदरसा कमेटी/मदरसा बोर्ड, मसाजिद, इबादतगाह और ईदगाह समेत जितने भी इदारे हैं उनको बचाने की लाहिया अमल बनाना चाहिए और इस पर अमल करना चाहिए। इसके साथ ही दलितों, गरीबों और समाज के कमजोर तबके पर जहां कहीं भी मजालिम हो रहे हैं उनके खिलाफ तमाम तंजीमों और सोसाइटीज को साथ मिलकर आईन के दायरे में रहकर अपनी आवाज बुलंद करना चाहिए और एक दूसरे की मदद करनी चाहिए।

एम डब्लू अंसारी (आई.पी.एस)

रिटायर्ड डी.जी

mwansari1984@gmail.com


दो फैसले : एक सजा और एक पैरोल

दो फैसले : एक सजा और एक पैरोल

22-Oct-2022

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आलेख : बादल सरोज

गुजरा सप्ताह भारत की न्यायिक प्रणाली के लिए ख़ास रहा। छुट्टी के दिन सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम आर शाह ने एक प्रस्थापना  दी  कि : "दिमाग ही सारे झगड़े की जड़ है, इसलिए भले हाईकोर्ट द्वारा रिहा किया गया अभियुक्त देह से 90% विकलांग हो, उसका दिमाग काम कर रहा है। इसलिए उसे जेल में ही रखना चाहिए।" यह तत्व ज्ञान उनकी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की खंडपीठ ने एक दिन पहले बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ द्वारा निर्दोष करार दिए गए दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जी एन साईंबाबा के मामले में महाराष्ट्र की भाजपा सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान दिया ।  

प्रो. साईंबाबा कथित आपराधिक विचार रखने और सत्ता गिरोह की नई वर्तनी के हिसाब से अर्बन नक्सल होने के जुर्म में 2014 से ही जेल में थे। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की एक सत्र अदालत ने उन्हें और 6 अन्य को दोषी करार दिया था।  शुक्रवार 14 अक्टूबर को जस्टिस राहुल देव और अनिल पानसरे की बेंच ने प्रोफेसर को रिहा करने का आदेश जारी कर दिया, 15 अक्टूबर छुट्टी के दिन सुप्रीम कोर्ट की इस विशेष रूप से गठित खंडपीठ ने उसे रोक दिया।  

हालांकि महाराष्ट्र सरकार रिहा किये जाने का आदेश जारी होते ही आनन-फानन में  शुक्रवार की शाम को ही सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गयी थी और भावी चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की अदालत में इस आदेश को स्थगित करने की याचिका पेश कर दी थी। लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसे अत्यावश्यक मानने से इंकार करते हुए सुनने से मना कर दिया और कहा कि इसे दो दिन शनिवार-इतवार की छुट्टियों के बाद सोमवार को भी प्रस्तुत किया जा सकता है। बहरहाल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के ज्यादा अड़ने पर चंद्रचूड़ ने मामला वर्तमान चीफ जस्टिस के विवेक पर छोड़ दिया और उन्होंने छुट्टी के दिन शनिवार को विशेष सुनवाई करने के लिए एक आपात बेंच गठित कर दी। 

दिमाग की सक्रियता को आतंकवादी कार्यवाहियों का मुख्य स्रोत बताने वाली ऊपर लिखी टिप्पणी जस्टिस एम आर शाह ने उस वक़्त की, जब उनके ध्यान में लाया गया कि प्रोफेसर साईंबाबा तो चल फिर भी नहीं सकते, उनका शरीर 90 फीसद से ज्यादा निष्क्रिय है, उनका कोई नया-पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने तक घर में ही नजरबन्द रखा जा सकता है। मामला यहीं तक नहीं रुका, जो सर्वोच्च खंडपीठ बॉम्बे हाईकोर्ट के रिहाई के फैसले पर सुनवाई असामान्य और अत्यावश्यक मान रही थी, उसी ने उस रिहाई के आदेश को रोकने के बाद अगली सुनवाई की तारीख तीन हफ्ते बाद की, 8 दिसंबर निर्धारित की है। एक और फैसला दिल्ली हाईकोर्ट का है, जिसे 9 सितम्बर को सुरक्षित कर लिया था, मगर सुनाया 18 अक्टूबर को और  जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद की जमानत याचिका एक बार फिर निरस्त कर दी गयी है, क्योंकि पुलिस के अनुसार उसने दिल्ली दंगों से पहले "कुछ मीटिंगों में भाग लिया था।"  यह बात अलग है कि दंगा कराने वाले खुद यह दावा करते हुए घूम रहे हैं कि दंगा उन्होने ही किया था। 

भारत का संविधान सुनिश्चित करता है कि नागरिक स्वतन्त्रता  सिर्फ भारत के नागरिकों की ही नहीं, भारत की धरती पर रहने वाले विदेशी नागरिकों सहित सभी मनुष्यों के लिए है। जब तक दोष सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक अभियुक्त को निर्दोष मानने की अवधारणा पर टिकी भारत की न्याय व्यवस्था के इस सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान की यह असाधारण टिप्पणी पिछले सप्ताह न्यायपालिका के गलियारों से निकली अकेली शीतलहर नहीं हैं।  

इससे ठीक उलट साबित प्रमाणित अपराधी के दोषी पाए जाने पर उसे "सजा सुनाये जाने" का भी है। दादरी के अख़लाक़ हत्याकांड के मामले में  योगी के उत्तरप्रदेश के ग्रेटर नोएडा के कोर्ट में करीब 7 साल से बिसाहड़ा कांड मामले में बीजेपी के पूर्व विधायक संगीत सोम पर मुकदमा चल रहा था। वे उस वक्त मेरठ के सरधना से बीजेपी के विधायक हुआ करते थे। 28 सितंबर 2015 की रात गोकशी का आरोप लगाकर भीड़ ने अखलाक की हत्या कर दी गयी थी। अखलाक के बेटे दानिश को भी भीड़ ने पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। इस घटना के बाद बीजेपी के पूर्व विधायक संगीत सोम ने ग्रेटर नोएडा के दादरी के बिसाहड़ा गांव में जाकर धारा-144 का उल्लंघन किया था और दंगा करने के लिए भीड़ को भड़काया था। इस आरोप के सत्य सिद्ध पाए जाने पर अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2 की अदालत ने सजा सुनाई है। इसमें संगीत सोम को दोषी तो ठहराया गया है, मगर सजा सिर्फ 800 रुपये के जुर्माने की दी गयी है। 

होने को तो गुजरात के तुलसी राम प्रजापति और सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी के फर्जी एनकाउंटर से लेकर इनकी सुनवाई करने वाले जस्टिस लोया की सन्देहास्पद मौत के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले, एहसान जाफरी मामले को खारिज करते में मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और पूर्व डीजीपी श्रीकुमार के मामले में सुप्रीमकोर्ट के "निर्देश", गुजरात दंगों की सुनवाई के हाल से लेकर बिलकिस बानो प्रकरण के दोष साबित अपराधियों की फूल, माला, तिलक और गाजे-बाजे के साथ रिहाई जैसे अनगिनत मामले हैं, जो चिंता पैदा करते हैं। न्यायप्रणाली में जनता के विश्वास को प्रभावित करते हैं। मगर एक ही सप्ताह में आये यह दो तरह के एकदम परस्पर विरोधी फैसले बहुत कुछ कहते हैं। इन फैसलों से निकले संदेशे अनेकानेक अंदेशों से भरे हैं। थोड़ा रूककर सोचने के लिए विवश करते हैं।  

सुप्रीम कोर्ट के जानेमाने जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर ने कहा था कि "यह भारत का सर्वोच्च न्यायालय - सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया - नहीं है, यह सभी भारतीयों का सर्वोच्च न्यायालय - सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडियन्स - है।" इन दोनों फैसलों और एक "सजा" ने उनके इस कथन पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। "न्याय सब के लिए बराबर है" की धारणा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। यह सचमुच में गंभीर बात है। इस पर चर्चा होनी चाहिए, होगी भी - यह चर्चा जरूरी इसलिए भी है कि इसमें यदि कोई सुधार हो सकता है, तो वह उन भारतीयों की पहलकदमी पर हो सकता है, जिनका यह न्यायालय है और जिनके पास अब जो थोड़ा-बहुत शेष है, तो यह न्यायप्रणाली ही है। 

इसी बीच हत्याओं सहित अन्य जघन्य अपराधों में 20 साल के आजीवन कारावास की सजा पाए गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर पैरोल मिल गयी है। इस बाबा का यह पहला पैरोल नहीं है। वर्ष 2021 में यह तीन बार और 2022 में फरवरी और जून में दो बार लम्बे-लम्बे पैरोल पर छूट चुका है।   इस बार यह पैरोल 40 दिन की है और इन चालीस दिनों में यह बाबा हवन नहीं करेगा - वही करेगा, जिसके लिए रिहा किया गया है : भाजपा के लिए चुनाव प्रचार और अपने डेरे के मतांधों का उनके लिए ध्रुवीकरण। हरियाणा के पंचायत चुनावों और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद इन्हे पैरोल मिलने की आशंका थी भी। मोदी और खट्टर की और बाकी भाजपा सरकारे आशाओं और उम्मीदों पर भले कभी खरी न उतरें, आशंकाओं पर हमेशा खरी उतरती हैं।  

यह वही सरकार है, जिसने फादर स्टेन स्वामी को अत्यंत गंभीर बीमारी में भी पैरोल नहीं दिया था, वे जेल में ही मर गए।  वरवरा राव जैसे कवि को पैरोल नहीं दिया - मौजूदा प्रकरण वाले प्रो. जी एन साईंबाबा की माँ के मरने पर भी उन्हें पैरोल नहीं दिया। नताशा नरवाल को मृत्यशय्या पर पहुंचे उनके पिता के अंतिम दर्शन करने के लिए भी छूट नहीं दी। 

यह वह समय है जब तानाशाही अपने बघनखे खोलकर न्याय, संविधान और लोकतंत्र की ताजी हवा के सारे रास्ते बंद करने पर आमादा है। जो घोषित इमरजेंसी में भी नहीं हुआ, उसे बिना इमरजेंसी का एलान किये कर रही है। मगर हर बार तानाशाह इतनी सी बात भूल जाते हैं कि अंततः यह जनता होती है, जो आख़िरी इन्साफ करती है और अपना फैसला सुनाती है।


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