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परहित सरिस धर्म नहिं

परहित सरिस धर्म नहिं

29-Mar-2020

परहित सरिस धर्म नहिं
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इस लॉक डाउन के दौरान रोज कमाने खाने-वालों, प्रवासी मजदूरों और बेघरों के लिए प्रबंधन देशभर में चुनौती बनकर उभरा है। सात पड़ोसी राज्यों से सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से जुड़े छत्तीसगढ़ में भी ओडिशा, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों के प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में निवासरत हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश समेत अनेक राज्यों में छत्तीसगढ़ के मजदूर प्रवास करते हैं। इन मजदूरों का प्रबंधन यहां भी एक चुनौती हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। देश के दिगर इलाकों जैसी भगदड़ यहां नजर नहीं आई।
कोविड-19 के फैलाव के शुरुआती दिनों में ही छत्तीसगढ़ शासन ने इस स्पष्ट समझ के साथ काम करना शुरू कर दिया था कि यदि विदेशों से आ रहे संक्रमित लोगों को आइसोलेट कर उपचार करने के साथ-साथ दिहाड़ी मजदूरों को सुरक्षित नहीं किया गया तो जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। दो चीजें जरूरी थीं, एक तो इन मजदूरों को इस वायरस के खतरों के बारे में ठीक से समझाया जाए, दूसरी यह कि उन्हें उनकी दैनिक जरूरतों की पूर्ति को लेकर आश्वस्त किया जाए। इन दोनों ही मोर्चों पर सफलता हाथ लगी। 
लॉक-डाउन के दौरान देश के दिगर शहरों की तरह छत्तीसगढ़ के गांवों-शहरों में पुलिस को बल-प्रयोग की जरूरत नहीं पड़ी। लॉक-डाउन के महत्व को शासन ने इतने सफल तरीके से कम्युनिकेट किया गांव के गांव अपनी-अपनी सुरक्षा के उठ खड़े हुए। उन्होंने अपने नियम कायदे खुद तय किये और अपने तौर-तरीके भी। किसानों के ब्यारों के ‘राचर’ गांवों के मुख्यमार्गों के बैरियर बन गए। यह जागृति सरगुजा से लेकर बस्तर के सुदूर अबुझमाढ़ और सुकमा तक नजर आई।


शासन को अपनी जिम्मेदारियां तो निभानी ही थीं, सो पीडीएस के तहत दो माह के मुफ्त राशन का इंतजाम करने के साथ-साथ हर ग्राम पंचायत में जरूरतमंदों के लिए दो क्विंटल चांवल की अतिरिक्त व्यवस्था भी कर दी। खेती-किसानी कम से कम प्रभावित हो इसके लिए यह सुनिश्चित किया गया कि लॉक-डाउन के दौरान खाद, बीज और कीटनाशकों की दुकानें खुली रहें। किसानों को जरूरी ऐहतियात के साथ अपनी बाड़ियों और खेतों में काम करने दिया जाए, ताकि शहरी इलाकों में भी सब्जियों और दिगर जरूरी चीजों की आपूर्ति बनी रहे। मनरेगा के कार्यों में तेजी लाई जाए, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए। इन इंतजामों ने गांवों को रोटी और रोजगार के प्रति आश्वस्त किया।
शहरी क्षेत्रों के कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को रहने और भोजन की व्यवस्था की जिम्मेदारी कारखाना मालिकों को दी गई। साथ ही यह भी तय किया गया कि यदि मालिकों द्वारा अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया जाता है तो फिर जिला प्रशासन के माध्यम से मजदूरों के भोजन आदि का इंतजाम किया जाए।
इस लॉक-डाउन के दौरान छत्तीसगढ़ ने न केवल अपने गांवों और शहरों में मजदूरों को थामे रखा, बल्कि अन्य राज्यों में फंसे छत्तीसगढ़ के मजदूरों को वहीं पर बेहतर से बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए संबंधित मुख्यमंत्रियों से बात की। उन मजदूरों के खातों में नकद का इंतजाम किया। दूसरे राज्यों के जो मजदूर छत्तीसगढ़ में फंसे थे, उनके लिए भी यहां बेहतर से बेहतर इंतजाम किए गए। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने इन मजदूरों से अपील करते हुए कहा कि कोविड-19 के संकट से उबरने के लिए लॉक-डाउन को सफल बनाने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। इसलिए जो जहां है वह वहीं रहे। छत्तीसगढ़ के जो मजदूर अन्य प्रदेशों में वह अपनी चिंता हम पर छोड़ दें। अन्य प्रदेशों के जो मजदूर छत्तीसगढ़ में हैं, वे हमारे मेहमान हैं, हम उन्हें कोई कठिनाई नहीं आने देंगे। 
शासन द्वारा आम लोगों के साथ किए जा रहे निरंतर संवाद से ही यह संभव हो पाया कि इस व्यापक मुहिम में खासा जन सहयोग मिला। मजदूरों, बेघरों और भिक्षुओं की सेवा के लिए अनेक स्वयं सेवी संस्थाएं आगे आईं, अनेक लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर भी बड़ी मदद की। पेंड्रा में एक सेवानिवृत्त शिक्षक लोगों को मुफ्त में मास्क बांटते नजर आए तो नवागढ़ के लोग सौंरा जनजाति के लोगों के रहवास, राशन आदि की व्यवस्था में सक्रिय दिखे। गीदम के डेयरी संचालक दिनेश शर्मा ने तो अपने डेयरी उत्पादों के दाम 30 प्रतिशत तक घटा दिए, ताकि ऐसे समय में बुजुर्गों और बच्चों को सेहतमंद आहार सस्ते में, आसानी से सुलभ हो सके। जकात फाउंडेशन नाम की रायपुर की संस्था ने राशन के पैकेट बनाकर जरूरतमंदों को उपलब्ध कराए। नगरीय निकायों ने अपने स्तर पर भोजन आदि का इंतजाम किया। इन निकायों के प्रतिनिधियों ने भी अद्भुत सक्रियता दिखाई। इसी कड़ी में रायपुर नगर निगम ने 30 हजार जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने की व्यवस्था की। बिलासपुर में फूड सप्लाई सेंटर की स्थापना की गई। पहले ही दिन इस सेंटर के लिए दान दाताओं ने लगभग 2 लाख रुपए का दान दिया। 
मुख्यमंत्री जी ने जब प्रदेश के सहायता कोष में योगदान की अपील की तो देखते ही देखते खासी रकम जमा होने लगी। सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, शासकीय अधिकारियों, कर्मचारियों, शिक्षकों से लेकर गांवों के कोटवारों तक ने अपना आर्थिक योगदान दिया। कोटवार प्रशासन की सबसे अतिम कड़ी होते हैं। गांवों को सचेत करते रहने के साथ-साथ उन्होंने अपनी न्यून आय भी कोविड-19 पीड़ितों के लिए समर्पित कर दी।

तारन प्राकश सिन्हा जी के फेसबुक वाल से 


‘मंगल’ मिशन पार्ट-2 : तारन प्रकाश सिन्हा

‘मंगल’ मिशन पार्ट-2 : तारन प्रकाश सिन्हा

28-Mar-2020

‘मंगल’ मिशन पार्ट-2 TNIS
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जब युद्ध की परिस्थितियां हों तब हल के फालों को गलाकर तलवारें ढाल लेनी चाहिए।
देश इस समय यही कर रहा है। 
आटो मोबाइल सेक्टर की नामवर कंपनी महिंद्रा और महिंद्रा अब वैंटिलेटर्स के निर्माण के लिए आगे आ रही है। और खबरों के मुताबिक वह चार-पांच लाख रुपए के वैंटिलेटर्स साढ़े 7 हजार रुपए से भी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की तैयारी में है।
भारत में कोरोना वायरस को बड़ा खतरा इसलिए भी माना जा रहा था क्योंकि यहां संक्रमितों की संभावित संख्या की तुलना में वेंटिलेटर्स की संख्या बहुत कम है। महिंद्रा की पेशकश ने इस खतरे को न केवल कम कर दिया, बल्कि इस युद्ध को भी आसान कर दिया है।
अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए पलंग से लेकर सैनेटाइजर जैसे सामान कम न पड़े, इसके लिए रेलवे ने भी कमर कस रखी है। रेलवे ने अपने कई प्रोडक्शन इकाइयों को मेडिकल संबंधी सामान बनाने का आदेश जारी कर रखा है। खबर यह भी है कि कई वातानुकूलित ट्रेनों को भी अस्पतालों में तब्दील करने के बारे में विचार किया जा रहा है, यह इनोवेटिव आइडिया रेलवे को आमलोगों से ही मिला था।
कोरोना से रक्षा के लिए जब सेनेटाइजर्स कम पड़ने लगे तब शराब का उत्पादन करने वाली डिस्टिलरियों ने सेनेटाइजर्स का उत्पादन शुरू कर दिया। मास्क की कमी को दूर करने के लिए गांव-गांव में स्व सहायता समूह की महिलाएं अपनी सिलाई मशीनें लेकर जुट गईं।
संक्रमितों की जांच के लिए जब महंगे विदेशी किटों की उपलब्धता रोड़ा बनी तब पुणे के माईलैब डिस्कवरी साल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की देसी संस्था ने सस्ता किट तैयार कर दिखाया। इससे मरीजों की जांच अब एक-डेढ़ हजार रुपए में भी हो सकेगी, जिस पर पहले चार-पांच हजार रुपए तक खर्च हो जाया करते थे। भारत की यह उपलब्धि भी किसी मंगल मिशन से कम नहीं है।
इस तरह के उदाहरणों का लंबा सिलसिला है। 
हम वो लोग हैं जो पुड़ियों के लिए गर्म हो रहे तेल से राकेट साइंस सीख लेने की योग्यता रखते हैं। 
तारन प्रकाश सिन्हा

 


गम्भीर, वाकई गम्भीर

गम्भीर, वाकई गम्भीर

27-Mar-2020

टिप्पणी
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गम्भीर, वाकई गम्भीर
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पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 50 लाख रुपए दिए हैं और पत्र लिख कर कहा है कि करोना वायरस से लड़ने में पूरा देश आपके साथ है।
यह वो ही गौतम गम्भीर हैं जिन्होंने दिल्ली दंगों के दौरान कहा था कि भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए भले ही वो कपिल मिश्रा क्यों न हों। इस पर कुछ राष्ट्रभक्तों ने उन्हें ट्रोल किया था। हो सकता है कि अब भी करें। वो इस लिए कि उन्होंने ये फंड वाया मोदी या नड्डा के सीधा केजरीवाल को देने का राष्ट्र विरोधी काम किया है। फिर यह भी लिख दिया कि सारा देश आपके साथ है। अरे सारा देश तो मोदी जी के साथ है। राष्ट्रभक्त तो अभी तक ये ही नहीं पचा पा रहे हैं कि आधी से ज़्यादा दिल्ली केजरीवाल के साथ है। पर हमें गौतम गंभीर की इस खुली और ऊंची सोच की तारीफ करनी चाहिए। वह एक खिलाड़ी रहे हैं। खिलाड़ी टीम भावना से देश के लिए खेलता है, जबकि राजनीतिक नेता देश के नाम पर अपने लिए जनता को पेलता है। गम्भीर की तरह राजनीति से ऊपर उठ कर सद्भाव और सहयोग के तहत क़दम उठाने की उम्मीद हम दिल्ली के एक अन्य सांसद हंसराज हंस से भी करते हैं। क्योंकि वह मूलरूप से सूफ़ी गायक हैं। सूफ़ी विचारधारा धर्म और जाति के भेद को मिटा कर खुदा के इश्क़ में जीना सिखाती है। हंस गायन जैसे पवित्र सांस्कृतिक कर्म में लगे हैं, भेदभाव या दुर्भावना उनके लिए कोई मतलब ही नहीं रखती। उनसे भी गम्भीर जैसा कुछ करने की उम्मीद है।
संस्कृति कर्मी तो दिल्ली के एक और सांसद मनोज तिवारी भी हैं। वो भोजपुरी फिल्मों के एक्टर और गायक हैं। अगर ऐसे संकट के समय में वो भी राजनीतिक पूर्वाग्रहों और दुर्भावना से ऊपर उठ जाएं तो मज़ा ही आ जाए। लेखक -नवोदित ( वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 


हिम्मत वतन की हमसे है

हिम्मत वतन की हमसे है

27-Mar-2020

हिम्मत वतन की हमसे हैTNIS
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देश में कोविड-19 से होने वाली प्रभावितों का आंकड़ा 700 से पार हो चुका है। हालात बहुत चिंताजनक हैं, लेकिन राहत की बात है कि अब नियंत्रण में हैं। 
भारत इस महामारी से जिस कुशलता के साथ निपट रहा है, उसकी दुनियाभर में तारीफ हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हमारे प्रयासों की सराहना तो की है, इस महामारी की सबसे बड़ी चुनौती झेल चुके चीन ने भी तारीफ की है। कोविड-19 के जन्म से लेकर इस पर नकेल कसने तक चीन के पास लंबा अनुभव है, और वह कह रहा है कि भारत समय से पहले ही इस पर विजय पा लेगा।
ऐसे समय में जबकि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के हौसले पस्त हैं, इस भयंकर महामारी से निपटने के लिए भारत का मनोबल देखते ही बनता है। इसी मनोबल के बूते इस देश ने कोविड-19 को दूसरे चरण में ही अब तक थाम रखा है, अन्यथा अब तक तस्वीर कुछ और होती।
यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा है कि कोरोना को लेकर दुनिया का भविष्य भारत के प्रयासों पर निर्भर है, तो इसके गहरे निहितार्थ है। इसीलिए इन प्रयासों को लेकर उसके द्वारा प्रकट की गई प्रसन्नता बहुत व्यापक है। भारत के इन्हीं प्रयासों ने उसे उसके समानांतर देशों में कोरोना के विरूद्ध चल रहे अभियान में एक तरह से नेतृत्वकर्ता की भूमिका में स्वीकार्यता दी है। 
पहले जनता कर्फ्यू और बाद में 21 दिनों का लाक-डाउन जैसे कड़े फैसलों के दौरान जो परिदृश्य उभरा है, उसमें यह साफ नजर आता है कि हम न केवल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, बल्कि सबसे ताकतवर और एकजुट लोकतंत्र भी हैं। वह इसलिए कि भारत की तुलना में कोविड-19 से कई गुना अधिक पीड़ित होने के बावजूद अमेरिका अब तक ऐसे फैसलों की हिम्मत नहीं जुटा पाया है। 
चीन संभवतः इसीलिए चकित है कि लोकहित में कड़े फैसले तानाशाही के बिना भी लिए जा सकते हैं। 
कोविड-19 की पीड़ा के इस दौर में भारत न सिर्फ एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा है, बल्कि उसने अपने संघीय ढांचे की ताकत का भी अहसास करा दिया है। दुनिया देख रही है कि बहु-दलीय प्रणाली वाले इस देश के प्रत्येक राजनैतिक दल का मूल सिद्धांत एक है। जब देश और मानवता पर संकट आता है तो जाति, धर्म, संप्रदाय सबसे सब हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। इस समय यही राजनीतिक एकजुटता देश को ताकत दे रही है।
केंद्र और राज्य, शासन और प्रशासन, जनप्रतिनिधि और जनता, इन सबकी सीमाएं टूट चुकी हैं। सबके सब इस समय एकाकार हैं। अद्भुत समन्वय और तालमेल के साथ यह देश अपने अनदेखे दुशमन के साथ जंग लड़ रहा है। चाहे वह मेडिकल स्टाफ हो, या पुलिस के जवान, या फिर स्वच्छता-सैनिक, सभी ने साबित कर दिखाया है कि देश के लिए जो जज्बा सरहद पर लड़ने वाले सैनिक का होता है, वही जज्बा इस देश के जन-जन में है।
कोविड-19 पर हम निश्चित ही विजय पा लेंगे। उसके बाद नव-निर्माण का दौर होगा। हमें अपने हौसले पर भरोसा है। हम चीन जैसे देशों को एक और बार यह कहने पर मजबूर कर देंगे कि भारत समय से पहले उठ खड़ा होगा।

तारन प्रकाश सिन्हा

 

 

 


कोरोना वायरस- डिटेंशन सेंटर्स में रखे गए लोगों की रिहाई के लिए याचिका दायर

कोरोना वायरस- डिटेंशन सेंटर्स में रखे गए लोगों की रिहाई के लिए याचिका दायर

26-Mar-2020

नईदिल्ली: COVID-19 महामारी के मद्देनजर भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के समक्ष एक एक याचिका दायर की गई है  जिसमें  असम के डिटेंशन सेंटर्स में रखे गए सभी व्यक्तियों की रिहाई की मांग की गई  है। यह  याचिका “मानवीय आधार” पर  “न्याय और स्वतंत्रता पहल” नाम की स्वैच्छिक संस्था ने किया है ।

बता दें की 11 मार्च को राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री द्वारा दिए गए हालिया बयान का हवाला देते हुए, यह कहा गया है कि असम में छह हिरासत केंद्रों में 802 व्यक्ति बंद  हैं।


covid  19  #NPR की कवायद और जनगणना अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

covid 19 #NPR की कवायद और जनगणना अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

25-Mar-2020

लॉकडाउन की घोषणा के बाद नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) की कवायद और जनगणना का पहला चरण अनिश्चिकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है. अधिकारियों ने इस बात की जानकारी दी. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस के मद्देनजर आज रात 12 बजे से पूरे देश में 21 दिनों के लिए संपूर्ण लॉकडाउन लगाने का एलान किया.
इस एलान के बाद एनपीआर की कवायद और जनगणना के पहले चरण को लेकर ये फैसला लिया गया. ये दोनों एक्सरसाइज 1 अप्रैल 2020 से शुरू होने वाले थे. लेकिन अब इसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है.
एनपीआर क्या है?
नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर का उद्देश्य देश में रहने वाले प्रत्येक शख्स की पहचान का डेटाबेस तैयार करना है. साल 2010 में पहली बार एनपीआर बनाने की शुरुआत हुई थी. एनपीआर में मांग जाने वाले दस्तावेजों को लेकर बीते दिनों में देशभर में खूब  चर्चा हुई. हालांकि, गृहमंत्री अमित शाह ये साफ कर चुके है कि एनपीआर में कोई दस्तावेज नहीं मांगे जाएंगे. संसद में वे इस बात को कह चुके हैं कि जिन लोगों के पास जो जानकारी नहीं है उसे देने की जरूरत नहीं है.
14 अप्रैल को खत्म होगा लॉकडाउन
आज रात 12 बजे से शुरू हो रहा लॉकडाउन 14 अप्रैल को खत्म होगा. पीएम मोदी ने देश के लोगों से अपील की कि इन 21 दिनों के दौरान वे अपने घर में ही रहें. किसी भी हालत में बाहर न निकलें. उन्होंने कहा कि दुनिया के दूसरे देशों के अनुभव से ये पता चला है कि अगर इस वायरस को रोकना है तो सोशल डिस्टेंस का पालन करना होगा.
लॉकडाउन में खुली रहेंगी जरूरी सामान की दुकानें
इस बीच गृह मंत्रालय ने साफ किया कि 21 दिनों के लॉकडाउन के दौरान किराने की दुकान, फल, सब्जी, दूध, दवा और जरूरी सामान की दुकानें खुली रहेंगी. एटीएम सेवाएं भी चालू रहेंगी. दुकानों पर पैनिक कर समान खरीदने की ज़रूरत नहीं है.

 


ताली और थाली का तमाशा! अनिश्चितता का माहौल।

ताली और थाली का तमाशा! अनिश्चितता का माहौल।

23-Mar-2020

हमारा देश भी अजीब है ज़रा सी बात पर खुश हो जाते हैं और ज़रा सी बात पर गुस्सा भी।  कान टटोलते नहीं कौऐ के पीछे दौड़ पड़ते हैं। ऐसा ही नजारा कल शाम पांच बजे देखने को मिला। फिर उसके बाद सोशल मीडिया पर जो वीडियो आये उससे अंदाजा हो गया कि हम किस हद तक गुलाम हो चुके हैं। 
प्रधानमंत्री ने आह्वान क्या किया ऐसा लगा साक्षात आकाशवाणी हुई है। इस बेहद कठिन एवं दुखदाई घड़ी में लोग ऐसे ताली, थाली बजाने लगे जैसे कोई बड़ी जंग जीत ली हो। कुछ लोग आतिशबाज़ी करते दिखे। एक उत्सव का माहौल दिखाई दे रहा था। कोरोनावायरस से बचने की जगह सब एक जगह इकट्ठा हो गये। कोई थाली, कोई टीन, कोई सिलेंडर, कोई शटर, और हद यह है कि ड्रम पीटा जा रहा है। ये तो दिमाग की हालत है। प्रधानमंत्री ने पांच मिनट कहा था मगर अक्ल के अंधों ने जुलूस निकाल दिया। 
प्रधानमंत्री जी के ताली और थाली बजाने का आह्वान उल्टा पड़ गया क्योंकि दिन भर घरों में रहे लोग शाम 5 बजते ही इकट्ठा हुए और जश्न की शक्ल में ताली और थाली बजाना शुरू कर दिया। जबकि कोरोना से बचने के लिए एक दूसरे से उचित दूरी बनाए रखनी थी। क्या कोरोना और ज्यादा नही फैलेगा? प्रधानमंत्री की बातों को शायद ठीक से समझ नहीं सके या फिर देशभक्ति का सबूत दे रहे थे।
वैसे भी प्रधानमंत्री देश की जनता के कर्जदार हैं क्योंकि जब जब सहयोग या समय मांगा जनता ने दिया। जनता को क्या मिला???
कोई मेडिकल सुविधा नजर नहीं आ रही है। सेनेटाइजर, मास्क, या दूसरी तरह की सुविधाएं बिल्कुल नहीं है। डॉक्टर और नर्स को सुविधाएं नहीं मिल रही है तो जनता को कहां मिलेगी।
तमाम देशों की तरह कोरोना वायरस का क़हर भारत में भी फैल चुका है। इस महामारी से लड़ने के लिए हम सब एक हैं। देश का हर नागरिक खुद को और अपने देश को बचाने के लिए तैयार है। जनता कर्फ्यू के दिन सब ने पूरा सहयोग दिया। 
डाक्टर,  स्टाफ, पुलिस, इत्यादि जैसे अनगिनत लोग अपनी जान की बाज़ी लगाकर कोरोना के खिलाफ जंग मे सहयोग कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि ताली या थाली बजाने से प्रोत्साहित नहीं कर सकते और ना ही धन्यवाद दे सकते हैं। इसके लिए जमीनी सच्चाई को स्वीकार कर कार्य करने की जरूरत है। जो सरकार को करना है। स्टेच्यू, नाम बदलना, आफिस बनाना इन सब पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं। पर अब इस आपातकाल परिस्थितियों में सरकार क्या कर रही है?
सच्चाई यह है कि भारत सरकार ने कोशिश क्यों नहीं की इसे रोकने की ? बाहरी लोगों को भारत क्यों आने दिया गया? राहुल गांधी बार बार इस बात को कहते रहे मगर सरकार पप्पू समझती रही और अब चप्पू चलाने का वक़्त आ गया है।
सरकार अपने इंतजाम को क्यूं नहीं बताती।
रह रहकर सरकार ऐसे काम क्यूं करती है जिससे नुकसान हो। ताली और थाली के अलावा क्या हुआ?
मास्क और सेनीटाइजर वितरण क्यूं नहीं हो रहा है? 
हर शहर में डीएम, एमपी, एमएलए, पार्षद इनकी चेन बनाकर मुहल्ले में मास्क और सेनेटाइजर क्यूं नहीं वितरित किया जा रहा है?
सीएए और एन आर सी के खिलाफ प्रदर्शन स्थगित कर दिया गया। एक शब्द भी सरकार ने नहीं कहे। यह सब उदासीनता के लक्षण हैं।
इटली, चीन, ईरान और अमेरिका के हालात को देखने के बाद सरकार की उदासीनता चिंता का विषय है।
मेरा भारत सरकार से अनुरोध है कि जनता एवं जनता की सेवा में लगे लोगों की सुरक्षा हेतु जल्द सुविधा उपलब्ध करवाये अन्यथा जब बाज़ी हाथ से निकल जाएगी तो संभालने वाला कोई नहीं होगा।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 

 


केयर फॉर यू या नेवर फॉर यू!

केयर फॉर यू या नेवर फॉर यू!

22-Mar-2020

प्रधानमंत्री नये नये शब्दों के जनक हैं। नोटबंदी, चौकीदार, हाउडी, झोलाछाप, फ़कीर इत्यादि। अब एक नयी उत्पत्ति हुई है जनता कर्फ्यू। 
कोरोनावायरस को देखते हुए 22 मार्च को प्रधानमंत्री ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया है। स्वागत योग्य कदम है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से कर्फ्यू जैसा माहौल दिखाई दे रहा है। जो सही भी है और सबके लिए सुरक्षित भी। और शायद अभी कई दिनों तक कर्फ्यू जैसे हालात का सामना करना पड़े।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों को संबोधित किया और कहा कि जनता से, भारतवासियों से अपील है इसका मतलब शायद प्रधानमंत्री ने मान लिया कि देश में रहने वाली जनसंख्या जनता जनार्दन है। सब देशवासी हैं।
क्या इसका मतलब यह समझा जाये कि अब सी ए ए और एन आर सी का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि सब तो देश की जनता है। घुसपैठिए नहीं हैं। कोरोनावायरस से बचाव के जो उपाय किए जा रहे हैं वह पूरे देश में किये जा रहे हैं। सबके लिए किया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि सब बराबर हैं। मंदिर में पूजा और मस्जिद में नमाज दोनों बंद करने की अपील की गई। इसका मतलब दोनों बराबर। अगर सब बराबर हैं तो इतना हाहाकार क्यूं?
प्रदर्शन कर रही महिलाओं के पास प्रधानमंत्री अपना प्रतिनिधि भेजें और टीवी के माध्यम से प्रदर्शन कर रहे देशवासियों से अपील करें कि सब कुछ ख़त्म ना सी ए ए और ना एन आर सी। आइये मिलकर कोरोनावायरस को खत्म करें। इसमें क्या समस्या है?
देश की सुरक्षा और उन्नति सबसे प्रमुख है। उसपर ध्यान देना जरूरी है। वैसे जो आसार दिख रहे हैं उसके अनुसार ये लाकडाउन लम्बा होने की उम्मीद है। ऐसे में जनता को परेशानी होगी। खासकर वह लोग जो प्रतिदिन कार्यों पर निर्भर हैं। जो लोग किस्तों के माध्यम से सामान खरीदते हैं और सेविंग नहीं है वह क्या करेंगे? छोटे दुकानदारों और कुआं खोद के पानी पीने वालों का क्या होगा? हालांकि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने कुछ ऐलान किया है मगर वह खानापूर्ति है। क्यूंकि यह समस्या प्रादेशिक स्तर की नहीं है बल्कि देश की समस्या है। 
प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था या ख़र्च को लेकर कोई बात नहीं की। वैसे भी जब जेब में पैसा नहीं हो और घर में राशन ना हो तो सिवाय ताली, थाली और घंटी बजाने के जनता करेगी क्या?
पूरी दुनिया जिस महामारी की चपेट में है उससे सिर्फ ईश्वर बचा सकता है मगर हमें अपनी अक्ल का भी इस्तेमाल करना होगा। सुरक्षा और सतर्कता सबसे बड़ा हथियार है।
प्रधानमंत्री को सोचना चाहिए कि जो प्राइवेट संस्थान हैं, व्यक्तिगत छोटे कामगार हैं वह सब बंद हैं। जब इनकम नहीं होगी तो उसके काम कैसे होंगे। शायद भगवान प्रधानमंत्री का इम्तेहान ले रहा है। शायद भगवान ने एक मौका दिया है कि अपने वादों को पूरा करें और पन्द्रह लाख नागरिकों के खाते में डाल दें। जनता की परेशानी खत्म और आशीर्वाद अलग से, 2024 भी पक्का।
बहरहाल घर में रहें, सुरक्षित रहें, आशान्वित रहें।
पन्द्रह लाख आयेंगे, अच्छे दिन आयेंगे।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com


फंसे हुए भारतीयों को लाने के लिए इटली की राजधानी रोम जायेगी एयर इंडिया!

फंसे हुए भारतीयों को लाने के लिए इटली की राजधानी रोम जायेगी एयर इंडिया!

21-Mar-2020

एयर इंडिया शनिवार को 787-ड्रीमलाइनर को इटली की राजधानी रोम भेजेगा। इस दौरान मकसद वहां फंसे छात्रों और अन्य यात्रियों के साथ अगर वहां कोई भारतीय भी फंसा है तो उन्हें वापस लाना है।

जागरण डॉट कॉम पर छपी खबर के अनुसार, भारत का एक मात्र मकसद लोगों को इटली से बाहर निकालना है, जहां कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा महामारी फैली हुई है।
चीन से इस वायरस की शुरुआत हुई थी, जहां 3200 से ज्यादा लोग मर गए हैं, लेकिन इटली में हर दिन कई सौ लोगों की मौत से अब इटली में मृत्यु दर चीन से ज्यादा हो गया है।
इससे पहले भी पिछले हफ्ते इटली में फंसे भारतीयों को लाने के लिए एयर इंडिया का विमान पहुंचा था। उस दौरान भारतीयों में कोरोना वायरस की जांच करने के लिए डॉक्टरों का एक दल भी रोम पहुंच गया था।
बता दें कि चीन से फैला ये वायरस अब लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका है।
भारत में भी इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अभी फिलहाल इस खतरनाक वायरस से भारत में 4 मौतें हुईं हैं, लेकिन देश में काफी लोगों में इस वायरस से संक्रमित पाया गया है, जिनका इलाज चल रहा है।
 

कोरोना वायरस से  घर से काम करने को लेकर जागरूकता जरुरी!

कोरोना वायरस से घर से काम करने को लेकर जागरूकता जरुरी!

21-Mar-2020

कोराेना वायरस तेजी से भारत में पैर पसारता ही जा रहा है। भारत में कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 271 तक पहुंच गई हैं।

एजेंसी की  खबर के अनुसार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि भारत में कोरोना वायरस से अब तक 4 लोगों की मौत हो गई है। जबकि संक्रमितों के संपर्क में आने वाले 6,700 से अधिक लोगों को कड़ी निगरानी में रखा गया है।
सैन्य मुख्यालय में तैनात 35 फीसदी अधिकारी और 50 प्रतिशत जूनियर कमीशंड अधिकारी (JCO) 23 मार्च से एक सप्ताह तक घर से कमा करेंगे। अधिकारियों और जेसीओ का दूसरा समूह 30 मार्च से घर से काम होगा।

सेना ने कहा कि समूहों को एक दूसरे से मिलने से बचाया जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वे कार्य के समय हर वक्त फोन और इलेक्ट्रानिक माध्यमों पर उपलब्ध रहें।
मुख्यालय के प्रवेश और निकास द्वारों पर भीड़ से बचने के लिए सैन्य कर्मियों को अलग-अलग ड्यूटी टाइम पर बुलाने का निर्णय किया है।
कोरोना वायरस से निपटने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ ने बड़ा ऐलान कर दिया है। रोजाना कमाने वाले मजदूरों के लिए 1 हजार रुपए का भत्ता दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से जनता कर्फ्यू रविवार को लगाने का आह्वान किया है। इसी को ध्यान में रखकर भारतीय रेलवे ने 3700 ट्रेनें रद्द कर दी हैं और इंडिगो और गोएयर ने 1000 विमानों को स्थगित कर दिया है।
मंत्रालय ने बताया कि देश में कोरोना वायरस से संक्रमितों में 32 विदेशी हैं, जिनमें 17 इतालवी, तीन फिलीपीन के, दो ब्रिटेन और एक-एक कनाडा, इंडोनेशिया और सिंगापुर का निवासी है। इनमें अबतक दिल्ली, कर्नाटक, पंजाब और महाराष्ट्र में हुई चार मौतें भी शामिल है।

गायिका कनिका कपूर के खिलाफ यूपी सरकार ने मामला दर्ज कर लिया है। कनिका 15 मार्च को लंदन से वापस आई थीं। मगर एयरपोर्ट पर उन्होंने अपना चेकअप नहीं कराने का आरोप है।

इसी बात पर यूपी सरकार ने उनपर सख्त कदम उठाने का निर्णय लिया है, उनपर कानूनी कार्रवाई कर दी गई है। कनिका पर संवेदनशील मुद्दे पर जानकारी छिपाने के आरोप में कार्रवाई की गई है।
शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में पहली बार कोरोना वायरस के पॉजिटिव सामने आए। हिमाचल में 2 तो मध्य प्रदेश में 4 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए।
केरल में अभी तक कोरोना वायरस के मरीजों के 40 मामलों की पुष्टि हो गई है। यहां 24 घंटे के अंदर यहां 12 नए मामले सामने आए।
गुजरात में भी कोरोना वायरस पैर पसारता जा रहा है। पिछले 24 घंटे में यहां इस वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 7 पर पहुंच गई।
अहमदाबाद में 3, वडोदरा में 2, सूरत और राजकोट में 1-1 मामले सामने आए। वहीं, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी एक-एक नए मामले की पुष्टि हो गई है।


मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा: CAA किसी का हनन नहीं करता

मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा: CAA किसी का हनन नहीं करता

18-Mar-2020

केंद्र ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में दावा किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA), 2019 संविधान में प्रदत्त किसी भी मौलिक अधिकार का हनन नहीं करता है. केंद्र ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपने 129 पेज के जवाब में नागरिकता संशोधन कानून को वैध बताया और कहा कि इसके द्वारा किसी भी प्रकार की संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन होने का सवाल ही नहीं है.
केन्द्र की ओर से गृह मंत्रालय में निदेशक बीसी जोशी ने यह हलफनामा दाखिल किया

केंद्र ने हलफनामे में कहा कि यह कानून कार्यपालिका को किसी भी प्रकार के मनमाने और अनियंत्रित अधिकार प्रदान नहीं करता है, क्योंकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में उत्पीड़न का शिकार हुए अल्पसंख्यकों को इस कानून के अंतर्गत विर्निदिष्ट तरीके से ही नागरिकता प्रदान की जाएगी. केन्द्र की ओर से गृह मंत्रालय में निदेशक बीसी जोशी ने यह हलफनामा दाखिल किया है.
शीर्ष अदालत ने पिछले साल 18 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता का परीक्षण करने का निश्चय किया था, लेकिन उसे इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था. संशोधित नागरिकता कानून में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कथित रूप से उत्पीड़न का शिकार हुये हिन्दू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन और पारसी अल्पसंख्यक समुदाय के उन सदस्यों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है जो 31 दिसंबर, 2014 तक यहां आ गये थे.

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ केरल और राजस्थान सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 का सहारा लेते हुये वाद दायर किया है जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, माकपा, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस के जयराम रमेश, द्रमुक मुन्नेत्र कषगम, एआईएमआईएम, भाकपा और कई अन्य संगठनों ने 160 से अधिक याचिकायें शीर्ष अदालत में दायर की गयी हैं.


 सुप्रसिद्ध चर्चित कार्टूनिस्ट काक साहब के जन्मदिवस पर विशेष !

सुप्रसिद्ध चर्चित कार्टूनिस्ट काक साहब के जन्मदिवस पर विशेष !

17-Mar-2020

अरविंद गौर का लेख

अपने समय के सुप्रसिद्ध चर्चित कार्टूनिस्ट काक आज 80 के हो गए। आदरणीय काक साहब को जन्म दिन पर हार्दिक शुभकामनाएं। आज की पीढ़ी इस नाम से ज्यादा परिचित ना हो, पर 1983 से 1990 के थोड़ा आगे तक का एक ऐसा भी दौर था, जब ज़्यादातर पाठक अखबार हाथ में आते ही काक का कार्टून पहले देखते थे, हेडलाइन बाद में पढ़ते थे। उनकी सेंस ऑफ ह्यूमर और कटाक्ष में गजब की ताजगी थी। उनके कार्टूनों मे रोजाना की देशव्यापी राजनीतिक  हलचलों का पोस्टमार्टम दिखता था।
उनकी तीखी 'काक' दृष्टि वाले करारे कार्टून शुरुआत मे जनसत्ता में छपते थे। बाद में काक ने नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया। हिंदी पत्रकारिता के दिग्गज प्रभाष जोशी से लेकर राजेन्द्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह तक उनके कायल थे।
उस समय काक स्टार थे। यह वह वक्त था, जब जनसत्ता में तेज तर्रार खोजी और खांटी पत्रकारिता की नई जमीन तैयार हो रही थी। काक के कार्टून पहले पेज पर प्रकाशित हो रहे थे। काक पहले दैनिक जागरण, धर्मयुग से लेकर दिनमान और शंकर वीकली में छप चुके थे, पर जनसत्ता में नियमित प्रकाशित बेबाक और तीक्ष्ण कार्टूनों से उन्हें देशव्यापी पहचान मिली। तभी 1985 में अचानक उन्होंने जनसत्ता छोड़ नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया। कारण कुछ भी रहा हो, पर उनका जाना हमारे जैसे जनसत्ता के हजारों पाठकों के लिए पीड़ादायक था।
उन दिनों मैं थियेटर के साथ साथ फ्रीलांस पत्रकारिता करता यहां वहां भटकता रहता था। काक सेलिब्रिटी थे, वो मुझे शायद ही पहचानते हो, पर हम खफा थे, सो कुछ दिनों तक सामने दिखने पर भी पहले की तरह भागकर नमस्ते करने की कोशिश, चाहकर भी नहीं हुई। पर उनके कार्टूनों का नशा था, सो अब घर में दो अखबार आने शुरू हो गए। फिर वही रोजाना सुबह उनके कार्टूनों को देखकर ही खबरों को पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ।
ऐसा ही कुछ दिवंगत सुथीर तैलंग के नवभारत टाइम्स से अंग्रेजी के हिन्दुस्तान टाइम्स मे जाने के बाद भी हुआ था। हिन्दुस्तान टाइम्स उनकी वजह से ही घर में आना शुरू हुआ था।
यह वह समय था जब हिंदी अखबारों में युवा कार्टूनिस्ट अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाने लगे थे। सुधीर तैलंग, इरफान, राजेन्द्र धोड़पकर से लेकर चंदर तक कार्टूनिस्टों की नई जमीन तैयार कर रहे थे। इन सबका गजब का फैन क्लब बन रहा था। राजनैतिक कार्टून्स को लोकप्रियता दिलाने में इस नई पीढ़ी का अद्भूत योगदान है।
बाद में इससे आगे की  हिंदी अखबारों की दास्तानें, विशुद्ध व्यापारीकरण, उत्थान-पतन के साथ भटकाव, बिखराव के क़िस्से है। आज इसका प्रभाव दैनिक अखबारों की खबरों से लेकर कार्टूनों तक भी दिखता है। 

खैर बात काक साहब को जन्म दिन की बधाई से शुरू हुई थी। सो उनका असली नाम और परिचय भी जान लिजिए। काक का जन्मजात नाम हरीश चंद्र शुक्ल (काक)  है। काक उनका बतौर कार्टूनिस्ट सिग्नेचर है।  
इनका जन्म 16 मार्च 1940 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव के गाँव पुरा में हुआ था। वह पेशे से भूतपूर्व मैकेनिकल इंजीनियर थे। काक जी के पिता, शोभा नाथ शुक्ला, एक स्वतंत्रता सेनानी थे।
अखबारों से सेवानिवृत्त होने के बाद  काक साहब आज भी लगातार कार्टून बना रहे हैं। गाहे-बगाहे अभी भी उनके पेज पर जाकर कार्टून देखता रहता हूं। हम उनके छोटे पर पक्के वाले पुराने फैन हैं। उनके स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी की हार्दिक मंगलकामनाएं। 
काक साहब का पेज  Cartoonist : काक

सौजन्य सै क़ासिन लखनऊ 


एन पी आर, सी ए ए, एन आर सी या अमित शाह- D कौन?

एन पी आर, सी ए ए, एन आर सी या अमित शाह- D कौन?

15-Mar-2020

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भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि एन पी आर में कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा और किसी के नाम के आगे D अर्थात डाउटफुल नहीं लिखा जाएगा, यह बयान कोई माने या न माने निश्चित रूप से तीन महीने से चल रहे आंदोलन के दबाव तथा साथ ही साथ अंतराष्ट्रीय स्तर के दबाव का परिणाम है,लेकिन जबानी बयानबाजी की ना तो कोई हैसियत होती है और ना ही कोई भरोसा। वैसे भी भाजपा सरकार क़लाबाज़ी में माहिर है और आज के भारत में D का बोलबाला है। नौकरी D, अमन- सुकून-चैन D, एकता एवं अखंडता D, अर्थव्यवस्था D, रोजगार D, सुरक्षा D, महिला उत्थान D, सबकुछ D अर्थात डाउटफुल है।
एनपीआर का आधार नागरिकता नियम 2003 का अनुच्छेद 4 है, जिसके अनुसार एनपीआर एनआरसी का पहला कदम है। 31 जुलाई, 2019 को,केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार देश भर में एनआरसी करने के लिए केंद्र सरकार तैयार है,उससे पहले एनपीआर अपडेट किया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 14 जून 2014 से 31 जुलाई 2019 तक 9 बार लोकसभा और राज्यसभा में गृह मंत्रालय द्वारा यह कहा गया कि पहले एनपीआर किया जाएगा और फिर एनआरसी तैयार की जाएगी।
*अब नियम देखिए और सरकार की पैतरेबाजी समझिए।

NPR 2020 मैनुअल और नागरिकता नियम 2003 खंड 4 में कहा गया है कि NPR करने वाले अधिकारी को जिसकी नागरिकता पर संदेह होगा वह उस व्यक्ति के सामने D अर्थात संदिग्ध नागरिक(डाउटफुल) लिखने का पूर्ण अधिकार है। साथ ही साथ यह भी लिखा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी नागरिक की नागरिकता पर आपत्ति करता है, तो मजिस्ट्रेट या रजिस्ट्रार उस नागरिक को संदिग्ध घोषित करेगा और 30 दिनों के भीतर उसकी नागरिकता साबित करने के लिए उसे एक नोटिस भेजा जाएगा। यदि वह फिर भी नागरिकता साबित नहीं कर पाता तो उसकी जमीन, जायदाद, बैंक बैलेंस आदि सबकुछ सीज कर दिया जाएगा।
यह कानून न होकर एक मज़ाक है जहां दुश्मनी निभाने वाले लोगों के लिए एक मौका सरकार ने दे दिया।
2020 एनपीआर में,आठ अतिरिक्त डेटा फ़ील्ड हैं जो माता-पिता के जन्म और जन्म की तारीख,एक व्यक्ति के वर्तमान और स्थायी पता,मातृ भाषा और राष्ट्रीयता के बारे में पूछते हैं। साथ ही,शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को जिन्हें देश भर में अब तक प्रशिक्षित किया गया है। यह कहा जा रहा है कि जिस व्यक्ति की मातृभाषा उसके आवासीय क्षेत्र के अनुसार नहीं है, उसके नाम के सामने D लिखा जाए,साथ ही उस व्यक्ति या उसके माता-पिता के सामने भी D लिखा जाएगा जिसकी जन्म तिथि या जन्म स्थान संदिग्ध है।

अब इस विवरण और बयान में अंतर साफ दिखाई दे रहा है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा को गुमराह किया है और कुछ नहीं। वैसे भी पिछले पांच सालों का अनुभव अच्छा नहीं रहा जनता के लिए इसलिए कोई भरोसा नहीं कर रहा है। दूसरी बात यह है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में है, विदेशों में भी भारत की भाजपा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। इसलिए वह इस तरह का बयान देकर माहौल को सामान्य करना चाहते हैं। काले कानून के बहिष्कार अभियान और देशव्यापी विरोध प्रदर्शन को समाप्त करने के लिए शायद यह बयान दिया गया है।

बहरहाल गृह मंत्री यदि अपने बयान के प्रति ईमानदार हैं और देशवासियों से प्रेम करते हैं तो जनता में उत्पन्न भय को ख़त्म करें जिसके लिए
1.नागरिकता नियम 2003 सरकार के अनुच्छेद 3,4,5 के नियम को समाप्त करें ।
2.गृह मंत्रालय अधिसूचना जारी करे जिसमें किसी भी नागरिक को एनपीआर में संदिग्ध नहीं मानने का आदेश हो।
3.सरकार को एनपीआर 2020 के मैनुअल और प्रश्नों को वापस लेना चाहिए और एक आदेश पारित करना चाहिए कि किसी भी नागरिक से कोई कागज नहीं मांगा जाएगा,न ही किसी को संदिग्ध बनाया जाएगा।
4.गृह मंत्रालय एक नया गजट नोटिफिकेशन जारी करे जिसमें कहा जाए कि एनआरसी नहीं लायेंगे। 

सरकार को एनपीआर के उद्देश्य को स्पष्ट करना चाहिए, क्योंकि वास्तव में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत एवं राज्य सभा में लिखित बयान देना चाहिए जिससे जनता को यकीन आये। 
मैं अपने देश के गृह मंत्री से निवेदन करना चाहता हूं कि आप गृह मंत्री होने के कारण देशहित में कदम उठाएं।
यदि गृह मंत्री इन मांगों को स्वीकार करते हैं और उन्हें लिखित रूप में जारी करते हैं, तो यह स्वागत योग्य है,अन्यथा एनपीआर का बहिष्कार पूरे देश में जोरों पर है और आगे भी जारी रहेगा क्योंकि एनपीआर का आधार नागरिकता नियम 2003 है,जो एनआरसी का पहला कदम है और एन आर सी भारतीय नागरिकों के जनहित के खिलाफ है,साथ ही मानव अधिकारों का हनन और गोपनीयता के अधिकार को छीनने वाला है।
आंखें खोलो। यह बात जनता और सरकार दोनों के लिए है। जनता के लिए इसलिए क्योंकि जागो तो सवेरा है, सरकार के लिए इसलिए क्योंकि जनता से टकराने वाले कभी कामयाब नही हुए। कहीं ऐसा न हो कि जनता सरकार के आगे D लिख दे।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 


ज्योतिरादित्य सिन्धिया और मध्यप्रदेश की सियासत कही साज़िश का शिकार तो नहीं ?

ज्योतिरादित्य सिन्धिया और मध्यप्रदेश की सियासत कही साज़िश का शिकार तो नहीं ?

14-Mar-2020

लेख : एम.एच.जकरीया 

मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार को बड़ा झटका लगा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया । ऐसी क्या मज़बूरी थी की ज्योतिआदित्य सिंधिया की राजनीतिक शुरुवात कांग्रेस से शुरू हुई और पिता माधव राव सिंधिया के आकस्मिक दुर्घटना में निधन होने के बाद अपने पिता के स्थान पर ग्वालियर और गुना से अपनी राजनीति के सफर की शुरुवात की ज्योतिरादित्य बीते 18 सालों से कांग्रेस के साथ रहे हैं. उनके पिता माधवराव सिंधिया भी पार्टी के आला नेताओं में शुमार किए जाते थे. 30 सितंबर 2001 को ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया की उत्तर प्रदेश में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई. वे मध्य प्रदेश की गुना सीट से सांसद थे.

2001 में पिता माधवराव के निधन के तीन महीने बाद ज्योतिरादित्य कांग्रेस में शामिल हो गए और इसके अगले साल उन्होंने गुना से चुनाव लड़ा जहाँ की सीट उनके पिता के निधन से ख़ाली हो गई थी. वो भारी बहुमत से जीते. 2002 की जीत के बाद वो 2004, 2009 और 2014 में भी सांसद निर्वाचित हुए. मगर 2019 के चुनाव में वे अपने ही एक पूर्व निजी सचिव केपीएस यादव से हार गए. केपीएस यादव ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था.

ज्योतिरादित्य केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों (2004-2014) में मंत्री रहे. 2007 में उन्हें संचार और सूचना तकनीक मामलों का मंत्री बनाया गया, 2009 में वे वाणिज्य व उद्योग मामलों के राज्य मंत्री बने और 2014 में वे ऊर्जा मंत्री बने.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ ज्योतिरादित्य की नज़दीकी कई मौक़ों पर साफ़ दिखाई दी. 2014  के चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद भी दोनों नेता कई बार साथ दिखे थे. लेकिन मध्य प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ उनके रिश्ते उतने मधुर नहीं रहे. वो पहले भी राज्य में सरकार के कामकाज से नाराज़गी जता चुके थे लेकिन ये कोई इतना बड़ा मसला नहीं था यूँ तो कांग्रेस के कई दिग्गज बड़े नेता चुनाव हार चुके है जिसमे पी चिदंबरम भी है जिन्हे कई तरह की जांच और जेल जाना पड़ा था लेकिन उन्होंने समझौता नहीं किया क्या  ज्योतिरादित्य भी किसी दबाव में थे ?

क्योकि इतना बड़ा फैसला नासमझी भरा तो नहीं कहा जा सकता है जो वर्षो पुरानी अपनी स्वतः की राजनीति को छेड़ने का प्रयास करे क्योकि वे बेहतर जानते है की उन्हें और उनके सहयोगियों को भारतीय जनता पार्टी में ज़ीरो से शुरुवात करनी होगी क्योकि मध्यप्रदेश की राजनीति में पहले से ही कई बड़े राजनीतिक दिग्गज मौजूद है क्या उन्हें कांग्रेस जैसा सम्मान मिल पायेगा क्या वैसा स्थान भारतीय जनता पार्टी म ज्योतिआदित्य सिंधिया बना सकेंगे ?

क्योकि कांग्रेस को उनके पिता माधवराव सिंधिया ने भी छोड़कर देखा था परिणाम क्या हुआ सबने देखा था ।  तो क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया किसी साजिश का शिकार हो गए है या किसी बड़े दबाव के चलते उन्हें कांग्रेस छोड़ने को मज़बूर होना पड़ा है क्योकि सामने राज्यसभा के चुनाव है और वर्तमान केंद्र सरकार हर तरह से राज्यों में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती है और उसके लिए हर तरह के हथकंडे अपना रही है गोवा, कर्नाटक, असम, कई उदाहरण सामने देखे जा सकते है और जानकारी के अनुसार और भी कांग्रेस शासित राज्यों को प्रभावित करने की इनकी योजना है जिससे सावधान रहने की आवश्यकता है ।  


दिल्ली में नफरत की फसल

दिल्ली में नफरत की फसल

13-Mar-2020

खुलासा पोस्ट मैगजीन लेख 

देश की जनता फिर से कांग्रेस के शासन काल को याद कर रही हैं, जिस तरह से वर्तमान भाजपा की सरकार ने देश का हाल किया है और देश मे जिस तरह की स्थिति है उससे लगता हैं कि  UPA सरकार के मनमोहन सिंह का कार्यकाल एक स्वर्णिम काल था आज भारत देश की आर्थिक स्थिति डावाडोल है और मोदी सरकार फिजूल खर्ची मे मशगूल है। मोदी सरकार को देश की विषम परिस्थिति  दिखाई नहीं दे रही है, इस सरकार ने  CAA, NPR, NRC जैसे कानून  का डर दिखा कर देश की जनता को उलझाने का काम किया है जबकि वर्तमान समय मे आर्थिक विसंगति से लड़ने और सार्थक नीति बनाने की जरूरत थी ना की नागरिकता संसोधन कानून की ।

मोदी सरकार के द्वारा लाया गया यह बिल देश की जनता को देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति से दिग्भ्रमित करने की कोशिश है ताकि लोग CAA, NPR, NRC, को लेकर आपस में ही उलझी रहे ? दिल्ली की भयावह तस्वीर इसका ताजा तरीन उदाहरण है, जहाँ दिल्ली जलती रही और पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बन देखती रही ये सोशल मीडिया के वीडियो फुटेज बता रहे है। दिल्ली की हिंसा में 100 से अधिक घायल हुए 20 से अधिक मारे जा चुके, घायलो मे कई की स्थिति नाजुक है लेकिन कोई संवेदना नहीं. कहाँ है केजरीवाल की सरकार ? इन्ही गरीब लोगों ने आम आदमी पार्टी को जिताया था दिल्ली में अब जीतने के बाद वे अपनी जिम्मेदारी से हाथ खड़े कर रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी के हारे हुए नेता ने दिल्ली को दंगे की आग मे झोंक दिया है, ये किसने किया इसे सबने देखा लेकिन बेबस जनता मूक दर्शक बनकर खामोशी से देखती रही । देश की राजधानी दिल्ली जलती रही और देश के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति के स्वागत मे लगे रहे। उनका राज धर्म था देश की जनता की संवेदना जो वे भूल गए ?

अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष भारत में हमारे ही खर्च पर दिनभर प्राइवेट पार्टी करते हैं और दूसरे दिन की सरकारी यात्रा में अकेले प्रेस के सवालों के जवाब देते हैं। कश्मीर पर मध्यस्थता की बात करते हैं। दिल्ली में हिंसा के सवाल को चतुराई से मोदीजी के पाले में डाल सवालों को टालते रहे । ऐसा लगा की भारतीय पक्ष की नुमाइंदगी करने वाला कोई नहीं। प्रेस के सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं। ट्रम्प के मित्र मोदीजी साथ में नहीं हैं। भारत की कोई संप्रभुता बची ही नहीं। ट्रम्प भारत के राष्ट्रपति नहीं, पर लगता है कि मोदीजी उनके प्रधानमंत्री हैं। प्रेस वार्ता के फुटेज देखिए समझ मे आ जायेगा भारत की संप्रभुता को गिरवी रखने का काम किया गया है।

अमेरिकी सांसदों ने भी दिल्ली हिंसा को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल ने कहा कि भारत में धार्मिक असहिष्णुता में वृद्धि भयावह है. जयपाल ने ट्वीट किया, ‘लोकतांत्रिक देशों को विभाजन और भेदभाव बर्दाशत नहीं करना चाहिए या ऐसे कानून को बढ़ावा नहीं देना चाहिए जो धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करता हो.' उन्होंने कहा, ‘‘दुनिया देख रही है.'सांसद एलन लोवेन्थाल ने भी हिंसा को ‘नैतिक नेतृत्व की दुखद विफलता' करार दिया. उन्होंने कहा, ‘‘हमें भारत में मानवाधिकार पर खतरे के बारे में बोलना चाहिए.'

राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की दावेदार एवं सांसद एलिजाबेथ वारेन ने कहा, ‘भारत जैसे लोकतांत्रिक साझेदारों के साथ संबंधों को मजबूत करना अहम है लेकिन हमें मूल्यों पर सच्चाई से बात करनी चाहिए जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शामिल है. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा स्वीकार्य नहीं है.'' मीडिया ने भी इन घटनाओं को पूरी तवज्जो दी है. वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा, ‘‘ये दंगे विवादित नागरिकता कानून पर महीनों तक चले प्रदर्शनों के बाद चरम पर पहुंचे तनाव को दिखाते हैं. साथ ही यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के समर्थकों और आलोचकों के बीच बढ़ रहे मतभेद को भी दिखाता है.'' वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘‘राष्ट्रपति ट्रंप जब भारत की राजधानी की यात्रा पर थे उसी दौरान वहां हुए साम्प्रदायिक दंगों में कम से कम 11 लोग मारे गए.'

‘अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग' ने ट्वीट कर कहा कि नयी दिल्ली में मुसलमानों को निशाना बनाने वाली भयानक भीड़ हिंसा की खबरों से चिंतित है. आयोग ने मोदी सरकार से भीड़ को नियंत्रित करने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने की अपील की है. हमेशा ऐसा होता देखा गया है कि भड़काऊ भाषण-बयान देने वाले नेताओं के घर-परिवार सुरक्षित होते हैं वे भड़काऊ बयान इसलिए देते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि उनका परिवार सुरक्षित हैं उनके बच्चे सुरक्षित है भड़काऊ भाषण देने वाले नेताओं के बच्चे हिंसा में मरे हैं ऐसा कम ही सुनने या देखने को मिलेगा लेकिन उन्हें अपना आदर्श मानकर हिंसा के लिए सड़क में उतरने वालों के परिवार तक खत्म हो जाते हैं ।

और यह ऐसे ही चलता रहेगा जब तक किसी पार्टी का समर्थक ऐसे भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं से यह सवाल नहीं करते की आप अपने बच्चो, रिश्तेदारों को कब सड़क पर उतार रहे हैं ? याद कीजिए ये वही कांग्रेस पार्टी है जिसने मुम्बई हमलो के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल से इस्तीफा ले लिया था क्या पीएम मोदी की सरकार ऐसा कर पाएगी ?


दिल्ली हिंसा: हेट स्पीच देने वाले नेताओं के खिलाफ एक और याचिका दाखिल

दिल्ली हिंसा: हेट स्पीच देने वाले नेताओं के खिलाफ एक और याचिका दाखिल

12-Mar-2020

नई दिल्ली, दिल्ली हाई कोर्ट में एक ताजा याचिका दायर की गई है। जिसमें कथित रूप से नफरत फैलाने वाले भाषण देने और दिल्ली हिंसा के दौरान आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने के लिए कई नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
इसके साथ ही सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान के लिए उनकी संपत्तियों की जब्त की भी मांग की गई है। बता दे उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर अब तक 53 हो गई है। गुरु तेग बहादुर अस्पताल में गुरुवार को मौत के छह और मामले आने के बाद यह संख्या बढ़कर 44 हो गई।

 


दिल्ली हिंसा एक तरफा सुनियोजित थी, पुलिस ने ही दी थी दंगा करने कि इजाजत : अल्पसंख्यक आयोग

दिल्ली हिंसा एक तरफा सुनियोजित थी, पुलिस ने ही दी थी दंगा करने कि इजाजत : अल्पसंख्यक आयोग

08-Mar-2020

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने हाल ही में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुयी हिंसा की घटनाओ का आकलन रिपोर्ट प्रस्तुति किया जिसमे कहा गया जो हिंसा भड़की, वह “एकतरफा, सुनियोजित” थी और इसमें स्थानीय लोगों का समर्थन था।

आयोग ने यह भी कहा कि हिंसा के कारण हुई क्षति की सीमा को देखते हुए, दिल्ली सरकार द्वारा घोषित मुआवजा अपर्याप्त है। उन्होंने कहा, “हमने हर जगह मुस्लिम घरों, दुकानों और कार्यशालाओं को अधिक क्षतिग्रस्त पाया।

पैनल ने कहा कि लोग 24-25 फरवरी को भाग जाने के बाद पहली बार अपने क्षतिग्रस्त घरों का दौरा किया। जिसमे अधिकतर घर क्षतिग्रस्त है जो बुरी तरह बर्बाद हो गए है। मलबा पड़ा हुआ था, इसलिए कोई सवाल ही नहीं था इन बर्बाद घरो में जल्द से नहीं रहा जा सकता है।
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पैनल की रिपोर्ट में खजूरी खास में गली नंबर 5 के निवासियों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें दावा किया गया है कि भाजपा नेता कपिल मिश्रा द्वारा धमकी और अल्टीमेटम के तुरंत बाद 23 फरवरी को हिंसा शुरू हो गई थी।

पैनल ने कहा – “यह ‘गली’ एक अंधी गली है जहाँ 100 व्यक्ति रहते थे और वे मुख्य सड़क से अपने स्वयं के पलायन पर नहीं जा सकते थे। उन्होंने 25 फरवरी की सुबह पुलिस सुरक्षा के तहत जगह छोड़ दी। इस ‘गली’ में, हमें बीएसएफ जवान मोहम्मद अनीस का घर मिला, जो बुरी तरह क्षतिग्रस्त था।
रिपोर्ट में कहा गया है- “सड़क के एक तरफ मुस्लिम घर और दुकानें हैं, जबकि दूसरी तरफ हिंदू घर और दुकानें हैं। दोनों क्षेत्र लूटपाट और जलाने से प्रभावित थे। एक चार्टेड पेट्रोल पंप पर, मालिक महिंदर अग्रवाल ने दावा किया कि 30 वाहनों को वहां रखा गया था।”

एक स्कूल सञ्चालन का कहना है कि 24 फरवरीको लगभग 500 लोगों ने शाम 6. 30 बजे के आसपास उनके स्कूल में प्रवेश किया। उन्होंने हेलमेट पहना और अपना चेहरा छिपा लिया।
वे अगले 24 घंटों तक वहां रहे और इलाके में पुलिस बल के आने के बाद शाम को चले गए। वे युवा लोग थे जिनके पास हथियार और विशाल प्रताप थे, जो वे स्कूल की छतों से पेट्रोल बम फेंकते थे, “


महिला संघर्ष के 50 दिन, आओ संघर्ष के साथ चलो

महिला संघर्ष के 50 दिन, आओ संघर्ष के साथ चलो

07-Mar-2020

यू पी ब्यूरो 
लखनऊ घंटाघर धरने के 50 दिन पूरा होने पर घंटाघर धरने पर संघर्ष कर रही महिलाओं ने नारा दिया कि "महिला संघर्ष के 50 दिन, आओ संघर्ष के साथ चलो।" महिलाओं के संघर्ष के 50 दिन पूरे होने पर महिलाओं ने इसे संघर्ष उत्सव के नाम पर मनाया।

भारी बारिश के बावजूद घंटाघर और उजरियांव धरने पर बैठी हुई महिलाएं ने इंक़लाब का नारा बुलंद कर रखा है। आज महिला संघर्ष के 50 दिन पूरे होने पर बनारस से फादर आंनद की टीम प्रेरणा कला मंच काशी द्वारा गीत-नाटक की प्रस्तुति की गई।

फादर आनंद ने नागरिकता संशोधन कानून को काला कानून बताते हुए कहा कि यह कानून धर्म के आधार पर देश को बांटने की साजिश है। उन्होंने कहा कि देश हम भारत के लोग से मिलकर बना है, हमें कोई अलग नहीं कर सकता है।

महिला संघर्ष के 50 दिन अनिश्चितकालीन धरना पूरा होने पर भाजपा सरकार को बता दिया कि अघोषित आपातकाल और दमनकारी नीतियों को अवाम सिरे से खारिज करती है। घन्टाघर, उजरियावं में बैठी हुई महिलाओं समेत दूर-दराज से आई महिलाओं ने काले कानून के खिलाफ जमकर हल्ला बोला और संकल्प लिया है कि वो भी अपने गांव, कस्बा, शहर में घंटाघर, शाहीन बाग़ बनाएंगी।

जारी
घंटाघर/उजरियावं लखनऊ की संघर्षशील महिलाएं

 

 


कड़े कानून के बावज़ूद नहीं रुक रहा है महिलाओ से  दुष्कर्म !

कड़े कानून के बावज़ूद नहीं रुक रहा है महिलाओ से दुष्कर्म !

07-Mar-2020

ऐसा लगता है कि POCSO अधिनियम और अन्य कड़े कानून बच्चों के खिलाफ अपराध करने वाले व्यक्तियों के बीच भय पैदा करने में विफल रहे हैं। कई नाबालिग लड़कियां यौन अपराधों का शिकार हो रही हैं।

अपराध स्कूल परिसर में हुए
ऐसे ही एक अपराध में, एक 26 वर्षीय स्कूल शिक्षक ने 11 नाबालिग लड़कियों के साथ कथित रूप से बलात्कार किया। बताया गया है कि कुछ बलात्कार तेलंगाना राज्य के वानापर्थी जिले में स्थित स्कूल परिसर में किए गए थे।
मामले के विवरण के अनुसार, आरोपी ने चौथी कक्षा में पढ़ने वाली 11 छात्राओं के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया। 10 साल की उम्र के पीड़ितों में से एक के माता-पिता को खून बहने की शिकायत के बाद यह अपराध सामने आया।
पुलिस गिरफ्त में आरोपी

जब मामला पुलिस स्टेशन में पहुंचा, तो पुलिस ने आरोपियों पर POCSO अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।


पूर्व संसद पेंशन घोटाला ?

पूर्व संसद पेंशन घोटाला ?

06-Mar-2020

राजेश यादव
जन सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई एक जानकारी से खुलासा हुआ है कि पूर्व सांसदों की पेंशन पर कुल 70,50,00000 रु (70 करोड़ 50 लाख ) वार्षिक खर्च किया जाता है। ज्ञात हो कि सांसदों की न्यूनतम पेंशन 25000 प्रतिमाह होती है। जिसमे 5 वर्ष से ज़्यादा कार्यकाल के लिए अगले हर वर्ष पर 2000 रु प्रति माह अतिरिक्त वृद्धि होती है।

यहाँ तक तो सब ठीक है। अब असली खेल की तरफ ध्यान दीजिए। जब लोकसभा सचिवालय से कुल पेंशनर सांसदों की संख्या पूछी गयी तो जबाब 3849 बताया गया। इसी प्रकार राज्यसभा के पेंशनर्स एमपी की संख्या 847 बताई गई। कुल मिलाकर योग 4796 हुआ। 

ठीक यही संख्या जब पेंशन देने वाले केंद्रीय पेंशन लेखा विभाग से पूछी गयी तो जबाब चौंकाने वाला था। इस विभाग के अनुसार लोकसभा के कुल पेंशनर्स एमपी 1470 और राज्यसभा के कुल पेंशनर्स 708 हैं। जिनका कुल योग 2170 है।

गौर कीजिए सचिवालय कुल पेंशनर्स सांसदों की संख्या 4796 बता रहा है और वित्त मंत्रालय के अधीन आने वाला केंद्रीय पेंशन लेख विभाग ये संख्या 2170 बता रहा है। अब सवाल ये है कि दोनों की संख्या के अंतर 2618 वाले पेंशनर्स एमपी कौन हैं ? ये बहुत बड़ा घोटाला प्रतीत होता है।

ये वो देश है जिसमे करोड़ों रु का विज्ञापन देकर आम जनता से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील की जाती है। रेलवे में सफर करने वाले लाखों बुजुर्गों से सब्सिडी छीन ली जाती है और राहुल बजाज, संजय डालमिया जैसे उद्योगपति पूर्व सांसद की पेंशन पाते हैं। 2618 फर्जी लोग भूतपूर्व सांसद बने पेंशन उठा रहे हैं। काश आर्थिक रूप से मजबूत पूर्व सांसदों, विधायकों को भी पेंशन छोड़ने के लिये कहा जाता ! कहावत भी है कि 'पर उपदेश,कुशल बहुतेरे ।

 

 


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