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भारत की स्वतंत्रता संघर्ष का महान कर्मयोद्धा

भारत की स्वतंत्रता संघर्ष का महान कर्मयोद्धा

22-Jan-2022

भारत की स्वतंत्रता संघर्ष का महान कर्मयोद्धा  
-ललित गर्ग-

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लम्बे इंतजार के बाद अच्छी बात हुई है कि देश के क्रांतिकारी आंदोलन के महानायक, कर्मयोद्धा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा करके देश के असंख्य लोगों की भावनाओं का सम्मान किया है। वास्तव में हमारी आजादी हमारे ऐसे ही वीरों के पराक्रम, शौर्य, समर्पण और साहस सेे मिली थी। यह सही है कि स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी का योगदान महत्वपूर्ण था, परंतु नेताजी के योगदान को कमतर आंकना या उनके योगदान का विस्मृत करना, किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। भारत के स्वाधीनता संग्राम में आजाद हिंद फौज एवं नेताजी का सर्वाधिक योगदान रहा है, उनके योगदान की अमर कहानी अभी लिखी जानी शेष है और इसकी शुभ शुरुआत हो गयी है।
आजाद हिन्द सरकार के माध्यम से सुभाषचन्द्र बोस ने एक ऐसा भारत बनाने का वादा किया था, जिसमें सभी के पास समान अधिकार हों, सभी के पास समान अवसर हों। जो अपनी प्राचीन परम्पराओं से प्रेरणा लेगा और गौरवपूर्ण बनाने वाले सुखी और समृद्ध सशक्त भारत का निर्माण करेगा। यह करोड़ों भारतीयों का सपना था, किंतु सुभाष बाबू से भय खाने वाले अंग्रेजों और बाद में उसी लीक पर चलकर सत्ता और परिवारवाद को मजबूत करने वाले राजनीतिक दलों एवं सत्ताधारियों ने उस महानायक के योगदान एवं सपनों को कुचलने का षड़यंत्रपूर्वक प्रयत्न किया। जब वर्ष 2018 को आजाद हिन्द सरकार के 75वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से तिरंगा फहराया तो देश को मानो उसका बिसराया प्यार, स्वतंत्रता संग्राम की अनूठी स्मृतियों की जीवंतता से देश को वास्तविक रूप में आजादी का स्वाद चगने का अवसर मिल गया है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जिस अमृत को अपने संघर्ष से बटोरो एवं सुरक्षित भारत की भावी पीढ़ियों के लिए रखा था, वह तो राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ गया। उस अमृत पर तो कोरी राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेकी गयी, अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध किये गये, देश को भूला दिया गया, नेताजी के योगदान को भूला दिया गया। यही कारण है कि 75 वर्षों के कालखण्ड में राष्ट्र मजबूत होने की बजाय दिन-ब-दिन कमजोर होता गया। राष्ट्र कभी भी केवल व्यवस्था पक्ष से ही नहीं बनता, उसका सिद्धांत, चरित्र पक्ष एवं राष्ट्रीय भावना भी सशक्त होनी चाहिए। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के नागरिकों के चरित्र से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है, उनके बलिदानी स्वतंत्रता संग्रामियों की जीवंतता से आंकी जाती है। हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि आजादी के 75वर्षों के बाद भी राष्ट्रीय चरित्र नहीं बन पाया, इसका कारण नेताजी जैसे नेताओं के योगदान को भूला देना है।
सुभाष चन्द्र बोस भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। आपका जन्म 23 जनवरी 1897 को को ओड़िशा के कटक शहर में हिन्दू कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। पहले वे सरकारी वकील थे मगर बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लम्बे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 सन्तानें थी जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष उनकी नौवीं सन्तान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरद चन्द्र से था।
सुभाषचन्द्र बोस आजीवन भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के लिये युद्ध तथा सैन्य संगठन में रत रहते हुए भारत को आजादी दिलाने के प्रभावी एवं सार्थक प्रयत्न किये। सुभाष बाबू के जीवन पर स्वामी विवेकानंद, उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा महर्षि अरविंद के गहन दर्शन और उच्च भावना का प्रभाव था। नेताजी ऋषि अरविंद की पत्रिका आर्य को बहुत ही लगाव से पढ़ते थे। पिताजी की इच्छा का निर्वाहन करते हुए उन्होनें उन दिनों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण परीक्षा आईसीएस में बैठने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा मात्र आठ माह में ही परीक्षा उत्तीर्ण कर ली किंतु राष्ट्रीय भाव एवं भारत को आजाद कराने के संकल्प के चलते उन्होंने आईसीएस की नौकरी का परित्याग करके एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। तब तक आइसीएस के इतिहास में किसी भारतीय ने ऐसा नहीं किया था। युवा सुभाष ने 16 जुलाई 1921 को बम्बई  में महात्मा गांधी से मिलने के बाद सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। उस समय देश में गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग की लहर थी तथा अंग्रेजी वस्त्रों का बहिष्कार, विधानसभा, अदालतों एवं शिक्षा  संस्थाओं का बहिष्कार भी इसमें शामिल था।
सुभाषचन्द्र बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा’ का नारा देकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ हुंकार भरी। आजाद हिन्द सरकार ने वादा किया था ‘बांटो और राज करो’ की उस नीति को जड़ से उखाड़ फेंकने का, जिसकी वजह से भारत सदियों तक गुलाम रहा था। इसके लिये नेताजी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में आज़ाद हिंद फौज की सेना को सम्बोधित करते हुए ‘दिल्ली चलो!’ का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इंफाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया। आजाद हिन्द फौज को छोड़कर विश्व-इतिहास में ऐसा कोई भी दृष्टांत या उदाहरण नहीं मिलता जहाँ तीस-पैंतीस हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष छेड़ा हो। उस समय देश में नेताजी और आजाद हिंद फौज के प्रति सहानुभूति की व्यापक लहर दौड़ रही थी। दमनचक्र के बावजूद देशवासियों का जोश, उत्साह व उमंग देखते ही बन रहा था। ब्रिटिश सरकार डर गयी थी। आजाद हिंद फौज ने जिस प्रकार से देश का वातावरण बनाया उससे अंग्रेजों को साफ पता चल गया था कि अब यहां अधिक समय तक रहा नहीं जा सकता, आजाद हिंद फौज का देश की आजादी में अप्रतिम योगदान है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
21 अक्टूबर 1943 को सुभाषचन्द्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज के सर्वाेच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। नेताजी उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। 1944 को आज़ाद हिंद फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं।
अपने संघर्षपूर्ण एवं अत्यधिक व्यस्त जीवन के बावजूद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्वाभाविक रूप से लेखन के प्रति भी उत्सुक रहे हैं। अपनी अपूर्ण आत्मकथा एक भारतीय यात्री-ऐन इंडियन पिलग्रिम के अतिरिक्त उन्होंने दो खंडों में एक पूरी पुस्तक भी लिखी भारत का संघर्ष-द इंडियन स्ट्रगल, जिसका लंदन से ही प्रथम प्रकाशन हुआ था। यह पुस्तक काफी प्रसिद्ध हुई थी। उनकी आत्मकथा यद्यपि अपूर्ण ही रही, लेकिन उसे पूर्ण करने की उनकी अभिलाषा रही थी। नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है। जहाँ जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किये? 16 जनवरी 2014 को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेताजी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की माँग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिये विशेष पीठ के गठन का आदेश दिया। सुभाषचन्द्र बोस की 125वीं जन्म जयन्ती मनाते हुए भारत को भारतीयता की नजर से देखना और समझना जरूरी है। ये आज जब हम देश की स्थिति देखते हैं तो और स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं कि स्वतंत्र भारत के बाद के दशकों में अगर देश को सुभाष बाबू, सरदार पटेल जैसे व्यक्तित्वों का मार्गदर्शन मिला होता, भारत को देखने के लिए विदेशी चश्मा नहीं होता तो स्थितियां बहुत भिन्न होतीं। नेताजी के विचारधारा के लोग इस देश में ही जीवित होने पर भी बिसराए जाते रहे हैं। लेकिन इन सब झंझावातों के बीच वह सपना सांस लेता रहा। उसे जीवित रहना ही था, क्योंकि उस सपने में नेताजी सरीखे अनगिनत राष्ट्रपुरुषों की जान बसी है। वह सपना है भारतीयता का सपना। यह सपना जीवित रहेगा, उसी सपने को आकार देकर ही सशक्त भारत का निर्माण होगा। जिसमें संघर्ष, समर्पण एवं शौर्य की सुभाषचन्द्र बोस की गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को उनके मूल्यों को अपनाने के लिये प्रेरित करती रहेगी। प्रेषकः


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अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी

अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी

21-Jan-2022

अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी

-ललित गर्ग-
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गरीबी-अमीरी के असंतुलन को कम करने की दिशा में काम करने वाली वैश्विक संस्था ऑक्सफैम ने अपनी ताजा आर्थिक असमानता रिपोर्ट में समृद्धि के नाम पर पनप रहे नये नजरिया, विसंगतिपूर्ण आर्थिक संरचना एवं अमीरी गरीबी के बीच बढ़ते फासले की तथ्यपरक प्रभावी प्रस्तुति देते हुए इसे घातक बताया है। आज देश एवं दुनिया की समृद्धि कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है, भारत में भी ऐसी तस्वीर दुनिया की तुलना में अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही है। देश में मानवीय मूल्यों और आर्थिक समानता को हाशिये पर डाल दिया गया है और येन-केन-प्रकारेण धन कमाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बनता जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृत्ति के बीज हमारी परंपराओं में रहे हैं या यह बाजार के दबाव का नतीजा है? कहीं शासन-व्यवस्थाएं गरीबी दूर करने का नारा देकर अमीरों को प्रोत्साहन तो नहीं दे रही है? इस तरह की मानसिकता राष्ट्र को कहां ले जाएगी? ये कुछ प्रश्न ऑक्सफैम की आर्थिक असमानता रिपोर्ट के सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण हैं, आम बजट से पूर्व इस रिपोर्ट का आना और उसके तथ्यों पर मंथन जरूरी है।

ताजा रिपोर्ट के चौंकाने वाले तथ्य है कि कोरोना महामारी के बावजूद दुनिया भर में धनपतियों का खजाना तेजी से बढ़ा है। भारत में भले 84 फीसदी परिवारों की आमदनी महामारी की वजह से कम हो गई, लेकिन अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई है। इतना ही नहीं, मार्च 2020 से लेकर 30 नवंबर, 2021 के बीच अरबपतियों की आमदनी में करीब 30 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है और वह 23.14 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 53.16 लाख करोड़ रुपये हो गई है, जबकि 2020 में 4.6 करोड़ से अधिक नए भारतीय अति-गरीब बनने को विवश हुए।
इस रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है कि पूरे विश्व में आर्थिक असमानता बहुत तेजी से फैल रही है। अमीर बहुत तेजी से ज्यादा अमीर हो रहे हैं। साम्राज्यवाद की पीठ पर सवार पूंजीवाद ने जहां एक ओर अमीरी को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी ओर गरीबी भी बढ़ती गई है। यह अमीरी और गरीबी का फासला कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है जिसके परिणामों के रूप में हम आतंकवाद को, नक्सलवाद को, सांप्रदायिकता को, प्रांतीयता को देख सकते हैं, जिनकी निष्पत्तियां समाज में हिंसा, नफरत, द्वेष, लोभ, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, रिश्तांे में दरारें आदि के रूप में देख सकते हैं। सर्वाधिक प्रभाव पर्यावरणीय असंतुलन एवं प्रदूषण के रूप में उभरा है। चंद हाथों में सिमटी समृद्धि की वजह से बड़े और तथाकथित संपन्न लोग ही नहीं बल्कि देश का एक बड़ा तबका मानवीयता से शून्य अपसंस्कृति का शिकार हो गया है। अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई तब तक नहीं कम होगी, जब तक सरकार की तरफ से इसको लेकर ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं। असमानता दूर करने के लिए सरकार को गरीबों के लिए विशेष नीतियां अमल में लानी होगी।
वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के सालाना सम्मेलन एवं भारत के आम बजट के आसपास ऑक्सफेम इस तरह की रिपोर्ट जारी कर बताना चाहता है कि भले वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम पूंजीपतियों की वकालत करे, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य दुनिया में बढ़ आर्थिक असमानता को दूर करने का भी होना चाहिए। अमीरी और गरीबी की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी इसलिये भी है कि पिछले दो वर्षों से हम महामारी से गुजर रहे हैं और यह उम्मीद थी कि कम से कम कोरोना काल में गरीबों को ज्यादा मदद दी जाएगी और उनकी आमदनी सुरक्षित रखी जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। आंकड़े यही बता रहे हैं कि महामारी में जिस वर्ग ने सबसे ज्यादा फायदा उठाया, वह धनाढ्य वर्ग है। उसकी संपत्ति और आमदनी बढ़ी है, जबकि गरीबों का जीना और दुश्वार हो गया है। इसके लिए सरकारों को निचले तबके की आमदनी में इजाफा करने और धनाढ्य तबके से जायज टैक्स वसूलने की कोशिश करनी होगी।
आर्थिक असमानता घटाने का तरीका ही यही है कि मजदूरों को उनकी वाजिब मजदूरी मिले, खेती करने वालों को अपनी उपज का उचित दाम मिले, मजदूरों को खून-पसीने की कमाई मिले और कोई भी इंसान व्यवस्था का लाभ उठाकर जरूरत से ज्यादा अपनी तिजोरी न भर सके। ऐसा होने से समाज में एक विद्रोह पनपेगा, जो हिंसक क्रांति का कारण बनेगा। भारत में सरकार की नीतियां गरीब दूर करने का स्वांग करती है। असलियत में सरकार अमीरों को ही लाभ पहुंचाती है। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने टैक्स में छूट देकर देश के पूंजीपति वर्ग को दो लाख करोड़ रुपये की माफी दे दी। मदद की जरूरत धनाढ्यों को नहीं, गरीबों को थी। असंगठित क्षेत्र के लोग थे, जिनको सहायता मिलनी चाहिए थी। मगर वे मुंह ताकते रह गए और मलाई धनाढ्य ले उड़े। सच यही है कि पिछले पांच साल से लोगों की वास्तविक आमदनी नहीं बढ़ी है। मनरेगा की मजदूरी, जो सरकार खुद तय करती है, वह भी बाजार में मिलने वाली मजदूरी से कम है। जबकि इसके बरक्स शेयर बाजार नित नई ऊंचाइयों पर दिखने लगा है। इन सबसे स्वाभाविक तौर पर अमीरी-गरीबी के बीच की खाई बढ़ रही है।
हमारे देश में जरूरत यह नहीं है कि चंद लोगों के हाथों में ही बहुत सारी पूंजी इकट्ठी हो जाये, पूंजी का वितरण ऐसा होना चाहिए कि विशाल देश के लाखों गांवों को आसानी से उपलब्ध हो सके। लेकिन क्या कारण है कि महात्मा गांधी को पूजने वाले सत्ताशीर्ष का नेतृत्व उनके ट्रस्टीशीप के सिद्धान्त को बड़ी चतुराई से किनारे कर रखा है। यही कारण है कि एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई, तो दूसरी ओर गरीबी तथा अभावों की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गईं। अर्थ की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, विलास और स्वार्थ से जोड़ दिया। नई आर्थिक प्रक्रिया को आजादी के बाद दो अर्थों में और बल मिला। एक तो हमारे राष्ट्र का लक्ष्य समग्र मानवीय विकास के स्थान पर आर्थिक विकास रह गया। दूसरा सारे देश में उपभोग का एक ऊंचा स्तर प्राप्त करने की दौड़ शुरू हो गई है। इस प्रक्रिया में सारा समाज ही अर्थ प्रधान हो गया है।
समाज को अर्थ नहीं, जीवन प्रधान बनाना होगा। इसके लिये सरकारों को लंबी अवधि और छोटी अवधि, दोनों के लिए योजनाएं बनानी होंगी। अल्पावधि कार्यक्रमों में जहां असंगठित क्षेत्र को समर्थन देना, उस तक सीधी नकदी पहुंचाना बहुत जरूरी है, मनरेगा जैसी योजनाओं का बजट बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि मजदूर वर्ग तक नकद राशि पहुंचे। हमारे गांवों में एक बड़ा तबका अब भी कृषि पर आधारित है। उन लोगों की आमदनी बढ़ाने के लिए जरूरी है कि उनकी लागत कम की जाए और आय बढ़ाई जाए। दीर्घावधि की योजनाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और रोजगार पर खर्च करने की जरूरत है। जबकि सरकारें इन जीवन से जुड़ी सेवाओं को अपने हाथ में रखने की बजाय निजी क्षेत्रों को सौंप रही है, जिससे ये सेवाएं अब व्यवसाय हो गयी है। इस प्रक्रिया में सारी सामाजिक मान्यताओं, मानवीय मूल्यों, मर्यादाओं को ताक पर रखकर कैसे भी धन एकत्र कर लेने को सफलता का मानक माने जाने लगा है जिससे राजनीति, साहित्य, कला, धर्म सभी को पैसे की तराजू पर तोला जाने लगा है। इस प्रवृत्ति के बड़े खतरनाक नतीजे सामने आ रहे हैं। अब तक के देश की आर्थिक नीतियां और विकास का लक्ष्य चंद लोगों की समृद्धि में चार चांद लगाना हो गया है। चंद लोगों के हाथों में समृद्धि को केन्द्रित कर भारत को महाशक्ति बनाने का सपना भी देखा जा रहा है। संभवतः यह महाशक्ति बनाने की बजाय हमें कमजोर राष्ट्र के रूप में आगे धकेलने की तथाकथित कोशिश है।                                                                                       प्रेषकः


(ललित गर्ग)
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आदमी को चाहिए... वक्त से डरकर रहें

आदमी को चाहिए... वक्त से डरकर रहें

19-Jan-2022

राजकुमार सोनी 

छत्तीसगढ़ : छत्तीसगढ़ के निलंबित पुलिस अफसर जीपी सिंह ने अपने जीवन में अगर पैसों के साथ-साथ थोड़े अच्छे लोग और संबंधों को कमा लिया होता तो यह तय था कि उन्हें जेल की हवा नहीं खानी पड़ती. जेल में भी उन्हें कालीचरण महाराज ( वहीं कालीचरण जिन्होंने बापू के हत्यारे गोडसे को रायपुर की धर्म संसद में सलाम ठोंका था ) की बैरक से सटी हुई एक बैरक में रखा गया है. 

अपनी नौकरी के दौरान जीपी सिंह ने ना जाने कितने बेगुनाहों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया था.अपने कंधे पर स्टार की संख्या को बढ़ाने के लिए ना जाने कितने बेकसूर ग्रामीणों को नक्सली साबित किया था. लोगों को एक आईपीएस राहुल शर्मा की आत्महत्या के पीछे का घटनाक्रम भी याद है. जीपी सिंह को अब वहीं सब कुछ भुगतना पड़ रहा है जो कभी उन्होंने दूसरों के लिए किया था. 

राजनीति हो या अफसरशाही...जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन को बेहद अहम माना गया है. जीपी सिंह अपने जीवन में संतुलन को कायम नहीं रख पाए. देर से ही सही मगर उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. ( इसे वे कितने दिनों तक भुगतेंगे फिलहाल यह भी साफ नहीं है ) जेल सूत्रों से जो जानकारी मिली है उस पर यकीन करें तो जीपी सिंह को खाने के लिए वहीं भोजन दिया गया है जो जेल मैन्युअल में तय है और सामान्य कैदियों को परोसा जाता है. सूत्र बताते हैं हैं कि जीपी ने जैसे-तैसे एक रोटी खाई है और बाकी भोजन को ग्रहण करने से इंकार कर दिया. चूंकि जेल में अभी जीपी सिंह की हैसियत एक विचाराधीन बंदी के तौर पर है सो वहां सामान्य कैदियों की तरह उनके शरीर में मौजूद प्रत्येक वस्त्र की बारीकी से जांच की गई है. यानी कि उनके शरीर के एक-एक कपड़े को उतारकर यह जांचा-परखा गया है कि कहीं वे ऐसी-वैसी चीज़ को लेकर तो प्रवेश नहीं कर रहे हैं जो घातक हैं या फिर जेल प्रशासन के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं ? 

जो भी पाठक इस टिप्पणी को पढ़ रहे हैं वे यह सोचकर कदापि विचलित ना होंवे कि यह कोई खतरनाक किस्म की आध्यात्मिक टिप्पणी है. देश के प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी जो ठेठ वामपंथी मिज़ाज के थे...वे भी अपने एक गीत में यह मानते हैं कि वक्त से बड़ा सिकन्दर कोई नहीं हैं. वे सभी लोग जो शोषित-पीड़ितों का खून चूसकर अकूत धन संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं और दर्प से भरे हुए हैं उन्हें साहिर के इस गीत के गहरे अर्थ पर एक बारगी मंथन अवश्य करना चाहिए. साहिर लुधियानवी ने बीआर चोपड़ा की मशहूर फिल्म वक्त के लिए यह गीत लिखा था. इस गीत का एक-एक शब्द आज भी मौजूं और प्रेरणादायक हैं- 

वक़्त से दिन और रात 
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शह ग़ुलाम 
वक़्त का हर शह पे राज
 
वक़्त की पाबन्द हैं 
आते जाते रौनके
वक़्त है फूलों की सेज
वक़्त है काँटों का ताज
वक़्त से दिन और रात ... 

आदमी को चाहिए 
वक़्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी 
वक़्त का बदले मिजाज़


भ्रष्टाचार है सशक्त भारत बनाने की बड़ी बाधा

भ्रष्टाचार है सशक्त भारत बनाने की बड़ी बाधा

19-Jan-2022

भ्रष्टाचार है सशक्त भारत बनाने की बड़ी बाधा

-ः ललित गर्ग:-

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भ्रष्टाचार एक दीमक की तरह है जो देश को, उसकी अर्थव्यवस्था को और कुल मिलाकर नैतिकता एवं मूल्यों को खोखला कर रहा है। यह उन्नत एवं मूल्याधारित समाज के विकास में बड़ी बाधा है, वही शासन व्यवस्था की भ्रष्टता सशक्त भारत निर्माण का बड़ा अपरोध है। बड़े पदों पर आसीन अधिकारियों एवं मंत्रियों-राजनेताओं के भ्रष्टाचार ज्यादा बड़ी समस्या है क्योंकि उनके उजागर होने, उजागर हो जाने पर उन्हें दबा दिये जाने की त्रासद स्थितियां अधिक चुनौतीपूर्ण है, उन पर लगाम लगाना ज्यादा जटिल है। यह बात हाल ही में भ्रष्टाचार के आरोप में गैस अथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड के मार्केटिंग निदेशक ईएस रंगनाथन की गिरफ्तारी बताती है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम नहीं लग पा रही है।
सीबीआइ ने रंगनाथन के साथ पांच अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया है। इनमें कुछ कारोबारी भी हैं। इन दिनों भ्रष्टाचार का एक अन्य मामला भी चर्चा में है जिसमें नेशनल सिक्योरिटी गार्ड के डिप्टी कमांडेंट प्रवीण यादव को 131 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया गया है। इस अधिकारी ने कितने बड़े पैमाने पर अपनी धोखाधड़ी का जाल फैला रखा था इसका पता इससे चलता है कि उसके करीब 45 खाते फ्रीज किए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ईमानदार एवं भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने के संकल्प के साथ कहा गया वाक्य कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा, का असर मंत्रियों, सांसदों पर तो ऊपरी तौर पर दिख रहा है, लेकिन विभिन्न सरकारी कम्पनियों में भ्रष्टाचार व्यापकता से आज भी पसरा है, गैल का ताजा भंडाफोड इसका उदाहरण है। सरकार को इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि अधिकारियों और कारोबारियों, अधिकारियों एवं गैर सरकारी संगठनों के बीच साठगांठ के चलते बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी भी हो रही है और सरकारी धन सेवा के नाम पर किन्हीं खास लोगों एवं संगठनों तक पहुंच रहा है। यह टैक्स चोरी या किन्हीं खास लोगों-संगठनों को स्व-लाभ की शर्तों पर लाभ पहुंचाना भी भ्रष्टाचार का ही रूप है। लिहाजा सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए नए उपायों पर विचार करे।
आसान शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार उन लोगों के द्वारा जिनमें पॉवर होती है एक प्रकार का बेईमान या धोखेबाज आचरण को दर्शाता है। यह समाज की बनावट को भी खराब एवं भ्रष्ट करता है। यह लोगों से उनकी आजादी, स्वास्थ्य, धन और कभी-कभी उनके जीवन को ही खत्म कर देता है। किसी ने सही कहा है कि भ्रष्टाचार एक मीठा जहर है। भारत में हर साल खरबों की राशि या तो रिश्वतखोरी या फिर भ्रष्ट तरीकों की भेंट चढ़ जाती है जिससे कानून के शासन की अहमियत तो कम होती ही है, साथ ही स्वस्थ शासन व्यवस्था का सपना चकनाचूर होता है। आज हमारे कंधे भी इसीलिये झुक गये कि भ्रष्टाचार का बोझ सहना हमारी आदत हो गयी है। भ्रष्टाचार के नशीले अहसास में रास्ते गलत पकड़ लिये और इसीलिये भ्रष्टाचार की भीड़ में हमारे साथ गलत साथी, संस्कार, सलाह, सहयोग जुड़ते गये। जब सभी कुछ गलत हो तो भला उसका जोड़, बाकी, गुणा या भाग का फल सही कैसे आएगा? तभी भ्रष्टाचार से एक नया भारत-सशक्त भारत बनाने के प्रयासों के रास्ते में भारी रुकावट पैदा हो रही है।
प्रवीण यादव हो या रंगनाथन-ये शासन व्यवस्था पर बदनुमा दाग है। भ्रष्टाचार के ये दोनों मामले महज अपवाद के रूप में नहीं देखे जाने चाहिए, क्योंकि तथ्य यह है कि इस तरह के मामले रह-रहकर सामने आते ही रहते हैं। सीबीआइ के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत जब भी छापेमारी होती है तो भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आते हैं। इनमें कुछ की गिरफ्तारी भी होती है, लेकिन इसके बाद भी यह मुश्किल से ही पता चलता है कि भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ क्या कठोर कार्रवाई हुई। विडम्बना तो यह भी है कि भ्रष्टाचार के जितने मामले प्रकाश में आते हैं, उन्हें दबाने में भी एक नये तरीके का भ्रष्टाचार होता है। भ्रष्टाचार में कमी कैसे आए इस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा। आवश्यक केवल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों की निगरानी हो और उनके खिलाफ समय-समय पर छापेमारी भी की जाए। इसके साथ ही आवश्यक यह भी है कि उन कारणों का निवारण भी किया जाए जिनके चलते अधिकारी भ्रष्टाचार करने में सक्षम बने हुए हैं। यदि भ्रष्ट अधिकारियों को यथाशीघ्र सजा देने में सफलता नहीं मिलती तो फिर भ्रष्ट तत्वों को हतोत्साहित नहीं किया जा सकता।
भ्रष्टाचार के ज्यादातर मामलों में यही सामने आता है कि अधिकारी और कारोबारी मिलकर मनमानी करते हैं। भ्रष्ट अधिकारियों और कारोबारियों के बीच मिलीभगत कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह चिंता की बात है कि इस मिलीभगत को तोड़ने में अपेक्षित सफलता मिलती हुई नहीं दिख रही है। यह ठीक है कि केंद्र सरकार के शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है और भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला पिछले छह-सात सालों में सामने नहीं आया है, लेकिन यह तो चिंताजनक है ही कि निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार में कोई उल्लेखनीय कमी आती नहीं दिख रही है।
भ्रष्टाचार एक गंभीर अपराध है जो सभी समाजों में नैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास को कमजोर करता है। आज के समय में भ्रष्टाचार से भारत का कोई क्षेत्र या समुदाय बचा नहीं है। यह देश के सभी हिस्सों में फैल गया है, जो राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों को भी कमजोर करता है, सरकारी अस्थिरता में योगदान देता है और आर्थिक विकास को भी धीमा करता है, तभी इस विकराल होती समस्या पर नियंत्रण पाने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ राजनीतिक एवं शासन-व्यवस्था के अरूचि के कठोर निर्णय लिये हैं, जिनके कारण मंत्रियों एवं सांसदों के मुख से दबे स्वरों में नाराजगी शासन-व्यवस्था के गलियारों में सुनी जाती है।
दुःखद स्थिति है कि भारत अपनी आजादी के अमृत महोत्सव तक पहुंचते हुए भी स्वयं को ईमानदार नहीं बना पाया, चरित्र सम्पन्न राष्ट्र नहीं बन पाया। यह सत्य है कि जब राजनीति भ्रष्ट होती है तो इसकी परछाइयां दूर-दूर तक जाती है। हमारी आजादी की लड़ाई सिर्फ आजादी के लिए थी- ईमानदार एवं आदर्श व्यवस्था के लिए नहीं थी। यही कारण है कि आजादी के बाद बनी सरकारों के भ्रष्टाचार का विष पीते-पीते भारत की जनता बेहाल हो गई। हजारों लोग बेकसूर जेलों में पड़े हैं। रोटी के लिए, शिक्षा के लिये, चिकित्सा के लिये, रोजगार के लिए तरसते हैं। उपचार के लिए अस्पतालों के धक्के खाते हैं। आयुष्मान जैसी योजना भी भारत में भ्रष्टाचार की शिकार हो गई। जबकि कुछ सत्तापतियों की सात पीढ़ियों सुरक्षित हो गयी। आज हमारी व्यवस्था चाहे राजनीति की हो, सामाजिक हो, पारिवारिक हो, धार्मिक हो, औद्योगिक हो, शैक्षणिक हो, चरमरा गई है। दोषग्रस्त एवं भ्रष्ट हो गई है। उसमें दुराग्रही इतना तेज चलते हैं कि ईमानदार बहुत पीछे रह जाता है। जो सद्प्रयास किए जा रहे हैं, वे निष्फल हो रहे हैं। प्रगतिशील कदम उठाने वालों ने और शासन नायकों ने अगर व्यवस्था सुधारने में मुक्त मन से सहयोग नहीं दिया तो आजादी के कितने ही वर्ष बीत जाये, हमें जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं हो पायेंगे, लगातार भ्रष्ट होते चले जायेंगे।
भारत अभी भी विकासशील देशों में से एक है। पूर्ण रूप से विकसित ना होने का सबसे बड़ा कारण यहां देश मे बढ़ता भ्रष्टाचार ही है। भ्रष्टाचार की बढ़ती विभीषिका को नियंत्रित करने के लिये 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा की थी। भारत में मोदी सरकार ने देश में एक नयी चुस्त-दुरूस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त कार्यसंस्कृति को जन्म दिया है, इस तथ्य से चाह कर भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। न खाऊंगा का प्रधानमंत्री का दावा अपनी जगह कायम है लेकिन न खाने दूंगा वाली हुंकार अभी अपना असर नहीं दिखा पा रही है।
सरकार को भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये सख्ती के साथ-साथ व्यावहारिक कदम उठाने की अपेक्षा है। पिछले 75 वर्षों की भ्रष्ट कार्यसंस्कृति ने देश के विकास को अवरूद्ध किया। आजादी के बाद से अब तक देश में हुये भ्रष्टाचार और घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो देश में विकास की गंगा बहायी जा सकती थी। दूषित राजनीतिक व्यवस्था, कमजोर विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत ने पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार के अंधेरे कुएं में धकेलने का काम किया। विडम्बना है कि पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा होना चाहिए, लेकिन कोई राजनीतिक दल इसे मुद्दा बनाने का साहस नहीं दिखा रहा है। देखना यह है कि क्या वास्तव में हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त होगा? यह प्रश्न आज देश के हर नागरिक के दिमाग में बार-बार उठ रहा है कि किस प्रकार देश की रगों में बह रहे भ्रष्टाचार के दूषित रक्त से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान सरकार की नीति और नियत दोनों देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है, लेकिन उसका असर दिखना चाहिए।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

 

 


रोहित वेमुला को उनकी छठी पुण्यतिथि पर नमन

रोहित वेमुला को उनकी छठी पुण्यतिथि पर नमन

18-Jan-2022

“एक आदमी का मूल्य उसकी तत्काल पहचान और निकटतम संभावना तक कम हो गया था। एक वोट को। एक नंबर को। किसी बात को। एक आदमी को कभी भी दिमाग के रूप में नहीं माना गया था। तारे की धूल से बनी एक शानदार चीज के रूप में। हर क्षेत्र में, पढ़ाई में, गलियों में, राजनीति में, और मरने और जीने में, ”पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने इस दिन छह साल पहले आत्महत्या करके मरने से पहले दुनिया को अपने अंतिम शब्दों में कहा था।

रोहित वेमुला के आख़िरी शब्द: 'मेरा जन्म एक भयंकर हादसा था' - BBC News हिंदी

हैदराबाद विश्वविद्यालय के 26 वर्षीय छात्र वेमुला की 17 जनवरी, 2016 को आत्महत्या से मृत्यु हो गई, क्योंकि उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की स्थानीय इकाई की शिकायत के बाद चार अन्य लोगों के साथ विश्वविद्यालय से निलंबित कर दिया गया था। , आरएसएस की छात्र शाखा।

वेमुला की मृत्यु ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिवाद के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ दिया।


एबीवीपी द्वारा एएसए के खिलाफ शिकायत के बाद, केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय द्वारा मामले को पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को सौंप दिया गया था। ईरानी ने विश्वविद्यालय को छात्र राजनीति के मामले को देखने का निर्देश दिया था, जिसके बाद वेमौल को निलंबित कर दिया गया था और उनकी 25,000 रुपये की फेलोशिप भी वापस ले ली गई थी।

वेमुला को यूओएच ने कथित तौर पर “अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के बैनर तले मुद्दों” (एएसए) को उठाने के लिए निलंबित कर दिया था।

जब वेल्मुला और अन्य को उनके छात्रावास के कमरों से बाहर निकाल दिया गया, और उन्हें बिना अनुदान के प्रबंधन करना मुश्किल लगा, तो उन्होंने भूख हड़ताल के साथ अनुचित निर्णय के विरोध में विश्वविद्यालय के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में शिविर स्थापित किया।

17 जनवरी, 2016 को, वेमुला ने अपने पीछे एक दिल दहला देने वाला नोट छोड़ कर फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली, जिसमें उनके संघर्ष का वर्णन किया गया था, और उनके जन्म को एक घातक दुर्घटना बताया।

“मेरा जन्म मेरी घातक दुर्घटना है। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं सकता। मेरे अतीत से अप्राप्य बच्चा, ”वेमुअल ने अपने सुसाइड लेटर में कहा।

कई छात्रों, कार्यकर्ताओं और शिक्षकों ने मांग की थी कि विश्वविद्यालय ‘रोहित अधिनियम’ लागू करें, जिसमें सामाजिक न्याय के लिए संयुक्त कार्रवाई समिति के सदस्य भी शामिल हैं। यह कानून शैक्षणिक संस्थानों में हाशिए के समुदायों के छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

फरवरी 2016 में, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) ने वेमुला की मौत के कारण तथ्यों और परिस्थितियों को देखने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमार रूपनवाल को नियुक्त किया।

एक दलित छात्र की मौत की जांच के लिए गठित एक व्यक्ति आयोग ने वेमुला के शुभचिंतकों में भय की भावना पैदा की क्योंकि यह अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति नहीं था।

15 अगस्त 2017 को प्रकाशित आयोग की रिपोर्ट ने न्यायिक प्रणाली में उनके विश्वास को हिलाते हुए उनके संदेह को सही साबित किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि वेमुला “एक परेशान व्यक्ति” था जिसने आत्महत्या की, न कि जातिगत भेदभाव के कारण। रिपोर्ट ने यह भी साबित करने की कोशिश की कि वेमुला दलित नहीं थे।

“उनका सुसाइड नोट रिकॉर्ड में है जो दर्शाता है कि रोहित वेमुला की अपनी समस्याएं थीं और वह सांसारिक मामलों से खुश नहीं थे। वह उन कारणों से निराश महसूस कर रहा था जो उसे सबसे अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने लिखा कि प्यार, दर्द, जीवन और मृत्यु को समझने की कोई जल्दी नहीं थी लेकिन वह उनके पीछे दौड़ रहा था। यह इंगित करता है कि वह अपने आसपास हो रही गतिविधियों से खुश नहीं था। उन्होंने यह भी लिखा कि वह बचपन से बिल्कुल अकेले थे और एक अनपढ़ व्यक्ति थे। यह उनकी हताशा को भी दर्शाता है, ”रिपोर्ट में कहा गया है।

रिपोर्ट ने सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए के छात्रों की समस्याओं और मुद्दों को समझाने और दोष देने का भी प्रयास किया, उनके लिए विफलता के अर्थ को परिभाषित किया और इसका वजन उन्हें किनारे पर धकेल दिया।

“असफलता का इन छात्रों के लिए एक विशिष्ट अर्थ है। कई कारणों से, गरीब, ग्रामीण छात्रों के लिए ‘बंद करना’ और घर वापस जाना एक व्यवहार्य विकल्प नहीं है, जो भविष्य में मौत का चयन कर सकते हैं, जिसमें उन्हें गरीब गरीब परिवारों को शिक्षित करने के लिए सब कुछ दांव पर लगाने में असमर्थता को देखना होगा। उन्हें। कई मामलों में वे गांव या समुदाय में अकादमिक ‘टॉपर्स’ भी थे और असफलताओं के रूप में लौटने की अपमान भी असहनीय होगी।”

रिपोर्ट को यूओएच के शिक्षकों और छात्रों के विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने रिपोर्ट की प्रतियां जला दीं और वेमुला को न्याय दिलाने के लिए अभियान चलाया।

वेमुला ने अपने पत्र में अपनी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया और पूरी जिम्मेदारी लेते हुए कहा, “यह मेरा फैसला है और इसके लिए मैं अकेला जिम्मेदार हूं। मेरे जाने के बाद मेरे दोस्तों और दुश्मनों को इस पर परेशान मत करो, ”लेकिन आम आदमी छह साल बाद भी वेमुला और समुदाय के साथ हुए अन्याय को भूलने से इनकार करता है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय में अम्बेडकर छात्र संघ ने 17 जनवरी, 2022 को वेमुला की छठी पुण्यतिथि मनाने के लिए एक ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया, क्योंकि उन्होंने जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार से लड़ते हुए अपना जीवन खो दिया था।

सियासत डॉट कॉम से साभार 


छत्तीसगढ़ में युवा प्रतिभाओं को संवारने, अवसर देने और आगे बढ़ाने की दिशा में हो रहे निरंतर कार्य : मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल

छत्तीसगढ़ में युवा प्रतिभाओं को संवारने, अवसर देने और आगे बढ़ाने की दिशा में हो रहे निरंतर कार्य : मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल

10-Jan-2022


लोकवाणी (आपकी बात- मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के साथ) की 25वीं कड़ी प्रसारित

मुख्यमंत्री ने ‘युवा सपने और छत्तीसगढ़ विषय‘ पर की बात


प्रदेश के 13 हजार 269 नगरीय निकायों एवं ग्राम पंचायतों में गठित होंगे ‘राजीव युवा मितान क्लब‘

राज्य में 09 खेल अकादमियां शुरू: छत्तीसगढ़ खेल विकास प्राधिकरण का गठन शीध्र

प्रदेश के 200 से अधिक विकासखंडों में फूडपार्क की स्थापना हेतु भूमि आबंटित

कोविड अनुकूल व्यवहार का पालन करने अपील

छत्तीसगढ़ में विगत तीन वर्षों में रोजगार के अवसरों में हुई बढ़ोत्तरी

रायपुर, 09 जनवरी 2022

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आकाशवाणी से आज प्रसारित रेडियो वार्ता लोकवाणी की 25वीं कड़ी में ‘युवा सपने और छत्तीसगढ़‘ विषय पर प्रदेशवासियों से चर्चा की। उन्होंने बातचीत की शुरूआत करते हुए पूरे छत्तीसगढ़ वासियों को नववर्ष की बधाई दी और कहा कि राज्य में विगत तीन वर्षों में जनभागीदारी और विकास का जो ताना-बाना बना है, उससे यह विश्वास जागा है कि नए वर्ष में सफलताओं और जन सशक्तिकरण के नए रंग भरे जाएंगे। हमारा छत्तीसगढ़ राज्य भी अब 21 वर्ष पूर्ण कर चुका, एक युवा राज्य है। 12 जनवरी को युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस है, जिसे हम युवा दिवस के रूप में मनाते हैं।
 
श्री बघेल ने कहा कि नया वर्ष, युवा सपने, युवा दिवस और नवा छत्तीसगढ़ के बीच एक अंतर्संबंध है। स्वामी विवेकानंद जी का रायपुर से अटूट नाता है। उसे चिरस्थायी बनाने के लिए हमने उनके जन्मदिन 12 जनवरी को ‘युवा महोत्सव’ का आयोजन करने की शुरुआत सन् 2020 में की थी। स्वामी जी ने कहा था कि अगर जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर हिंसा न होती तो आज का मानव समाज बहुत उन्नत होता। उस जमाने में भी स्वामी जी दुनिया में घूम-घूम कर कहते थे कि मैं यहां किसी एक धर्म का प्रचार करने नहीं आया बल्कि ऐसे दर्शन का प्रचार कर रहा हूं, जो दुनिया के सभी धर्माें में निहित है। उन्होंने कहा था कि मैं किसी धर्म का विरोधी नहीं हूं, हर धर्म के लोगों को तेजस्वी बनाने का प्रयास कर रहा हूं। आज जो स्वामी जी को आध्यात्मिक संत बताकर उनके योगदान को छोटा करना चाहते हैं उन्हें बताना चाहता हूं कि स्वामी जी विरक्ति की बात नहीं करते थे बल्कि क्रान्ति की बात करते थे। कुरीतियों से लड़ने और समाधान की बात करते थे।

मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ के युवाओं ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन पिछले दिनों किया है। यहां युवा प्रतिभाओं को संवारने, उन्हें अवसर देने और आगे बढ़ाने की दिशा में बहुत से नए कदम उठाए गए है, मेरा मानना है कि आज के जमाने में युवाओं का कॅरियर केवल सरकारी नौकरी से ही नहीं बनता, बल्कि हमारे युवा साथियों ने अपनी रुचि और प्रतिभा के बल पर संभावनाओं का नया आकाश खोल दिया है। आपमें जो संभावनाएं दिखाई पड़ी हैं, उन्हें साकार करने की दिशा में हम निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

हम प्रदेश में युवाओं की शिक्षा-दीक्षा तथा रोजगार के अवसरों पर ध्यान देने के साथ ही एक संस्कारवान युवा पीढ़ी तैयार करने की पहल कर रहे हैं। मेरा मानना है कि पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में सक्रिय होने के साथ ही युवा अवस्था में अपने परिवेश, अपने आसपास के लोगों की जिंदगी को करीब से देखने समझने और बेहतरी के लिए स्वस्फूर्त कदम उठाने की भावना बहुत जरूरी है। अपना नाम तथा अपनी कमाई का सपना तो एक दिन पूरा हो जाता है, लेकिन लोगों के दुख-दर्द में शामिल होने, अपनी संस्कृति तथा कमजोर तबकों की भलाई के लिए योगदान करने की भावना एक बीज की तरह युवाओं में डाली जानी चाहिए। हम छत्तीसगढ़ में ऐसी ही संस्कारवान युवा पीढ़ी का विकास करना चाहते हैं।

छत्तीसगढ़ के युवाओं को संगठित करने, सामूहिक रूप से समाज और प्रदेश में सकारात्मक बदलाव का आह्वान करते हुए हमने राजीव युवा मितान क्लब गठित करने की घोषणा भी की है, ताकि युवा इस क्लब में शामिल होकर रचनात्मक कार्यों में अपना सहयोग कर सके। इसके तहत प्रदेश के 13 हजार 269 नगरीय निकायों एवं ग्राम पंचायतों में राजीव युवा मितान क्लब गठित करने हेतु कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। प्रत्येक क्लब में 20 से लेकर 40 तक युवा शामिल होंगे। जिनकी आयु 15 से 40 वर्ष के बीच हो। वर्षभर में इन क्लबों को 132 करोड़ 69 लाख रुपए की राशि अनुदान के रूप में प्रदान की जाएगी। इसकी पहली किस्त के रूप में 19 करोड़ 43 लाख रुपए की राशि जारी की जा चुकी है।

छत्तीसगढ़ में विगत तीन वर्षों में रोजगार के अवसरों में बहुत बढ़ोतरी हुई है तथा निश्चित तौर पर इसका लाभ युवाओं को भी मिला है। मुझे खुशी है कि पिछले तीन वर्षों में सरकारी, अर्द्धसरकारी कार्यालयों में सीधी भर्ती के अलावा अन्य माध्यमों से भी भर्ती की गई है, जिसके कारण 4 लाख 65 हजार से अधिक लोगों को सरकारी और अर्द्धसरकारी कार्यालयों में कार्य करने का अवसर मिला है, इसके अलावा 30 हजार नौकरियां नए उद्योगों में मिली हैं। प्रदेश में निजी क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर नौकरियों का सृजन हुआ है। हमने ग्रामीण अंचलों में युवाओं को निर्माण कार्यों से जोड़ने के लिए ई-श्रेणी पंजीयन कराया था, जिसके अंतर्गत 3 हजार से अधिक युवाओं ने पंजीयन कराया है, जिन्हें बिना टेंडर के निर्माण कार्य का ठेका दिया जा रहा है। अभी तक लगभग एक हजार पंजीकृत युवाओं को सड़क, भवन आदि निर्माण कार्य आवंटित किए जा चुके हैं।

छत्तीसगढ़ में हम युवाओं के सर्वांगीण विकास की बात करते हैं। राज्य में बहुत बड़ी आबादी की आजीविका का साधन आज भी कृषि है। बहुत लंबे अरसे का अनुभव रहा है कि हमारे युवा साथी कृषि को व्यवसाय की तरह अपनाने में हिचकते थे, लेकिन विगत तीन वर्षों में स्थिति-परिस्थितियां बदली हैं। हमने निश्चित तौर पर राज्य गठन के बाद सर्वाधिक सरकारी नौकरियों का सृजन किया है। छत्तीसगढ़ में परम्परागत रूप से रोजगार का सबसे बड़ा साधन कृषि क्षेत्र है। लेकिन गलत नीतियों के कारण डेढ़ दशक में खेती के काम को अंधेरी सुरंग बना दिया गया था, जहां से उजाले की किरण दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ती थी। हमने इस सुरंग में भी उजाला बिखेरने का काम किया है। हमने खेती-किसानी को बेहतर आय और प्रतिभा दिखाने के बेहतर अवसरों से जोड़ दिया है। एक ओर हमने छत्तीसगढ़ की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदने की बेहतर व्यवस्था की है, पशुधन पालन को लाभ का जरिया बनाया है। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, नई उपजों को बढ़ावा, उनकी प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग जैसी व्यवस्थाओं को संस्थागत रूप दिया है। कृषि की वैज्ञानिक शिक्षा के साथ शोध, अनुसंधान और आविष्कार के लिए बड़े पैमाने पर व्यवस्थाएं सुनिश्चित की हैं।

मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा कि युवा खतरे के खिलाड़ी होते है, उनमें न तो लगन की कमी है और न ही वे मेहनत से डरते है। हमारा मानना है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी तभी उनकी बुनियाद मजबूत होगी। तभी वे एक सक्षम युवा के रूप में बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो सकेंगे। शिक्षा में दो चीजे महत्वपूर्ण है, पहला उसकी व्यापकता अर्थात सभी को शिक्षा का अवसर तथा अधिकार मिलना चाहिए। वहीं दूसरी ओर शिक्षा उपयोगी, सार्थक हो इसके लिए शिक्षा का गुणवत्तापूर्ण होना आवश्यक है। हमने इन दोनों ही मोर्चों पर काम किया है। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार केे बच्चों को कक्षा 12वीं तक निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए देश में पहली बार हमने शिक्षा के अधिकार के प्रावधान को बढ़ाया है। बेटियों को स्नातकोत्तर तक निःशुल्क शिक्षा दिलाने की व्यवस्था की है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम विद्यालय योजना लागू की गई है। हिन्दी माध्यम की शालाओं के लिए भी यह सुविधा उपलब्ध कराने की शुरुआत कर दी गई है। स्कूल से लेकर कॉलेज तक सुविधाओं में वृद्धि की गई है। साथ ही कमजोर तबकों की सुविधाओं में भी वृद्धि की गई है जैसे स्कॉलरशिप, भोजन सहायता राशि आदि में बढ़ोतरी की गई ताकि वे अपनी पढ़ाई पूरी करके बेहतर रोजगार के अवसर हासिल कर सकें।

मुझे यह बताते हुए खुशी है कि हमने प्रयास आवासीय विद्यालयों की संख्या और गुणवत्ता भी बढ़ाई है, ताकि नक्सल प्रभावित जिलों और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रतिभावान बच्चे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में उच्च शिक्षा हासिल कर सकें। इन्हीं प्रयासों के कारण पहली बार नेशनल टैलेंट सर्च परीक्षा में छत्तीसगढ़ के 22 बच्चों ने सफलता पाई। वर्ष 2021 में आईआईटी में 27, एनआईटी एवं समकक्ष शैक्षणिक संस्थानों में 35, सीएस फाउंडेशन में 5, क्लैट में दो, इंजीनियरिंग कॉलेज में 61 विद्यार्थी सफल हुए हैं। प्रयास संस्थाओं की संख्या बढ़कर अब 9 हो गई है तथा इसमें सीटों की संख्या बढ़कर 4 हजार 500 कर दी गई है। यहां के नतीजे न सिर्फ शत्-प्रतिशत आए हैं बल्कि सभी बच्चे 80 प्रतिशत से अधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुए हैं।

छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार खेल प्रशिक्षण की समग्र अधोसंरचना का निर्माण किया गया है, जिसके अंतर्गत 9 अकादमी स्थापित की जा चुकी है। फुटबाल में बालिकाओं के लिए तथा कबड्डी, तीरंदाजी, एथलेटिक्स तथा हॉकी में बालक-बालिकाओं दोनों के लिए, इस तरह 9 अकादमियां शुरू हो चुकी हैं। टेनिस स्टेडियम और अकादमी भवन निर्माण के लिए राशि स्वीकृत की जा चुकी है। जहां तक ‘मुख्यमंत्री खिलाड़ी प्रोत्साहन योजना’ का सवाल है तो मैं यह बताना चाहता हूं कि हमारे राज्य के युवा खिलाड़ियों को आवश्यक सुविधाएं नहीं मिलने के कारण वे देश की अन्य संस्थाओं के लिए खेलते हैं। अब हम यह प्रयास कर रहे हैं कि हमारे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण तथा अन्य खर्चों की व्यवस्था छत्तीसगढ़ शासन की तरफ से हो, जिससे वे भविष्य में अपने राज्य की ओर से ही राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग ले सकें। छत्तीसगढ़ खेल विकास प्राधिकरण के गठन का काम शीघ्र पूरा करके, जल्दी ही इसका कामकाज शुरू कर दिया जाएगा।

मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा कि आपने थिंक बी के बारे में अच्छा सवाल किया है। मैं बताना चाहता हूं कि यह पहल बस्तर के युवाओं के लिए है। ‘थिंक बी’ का फुलफॉर्म है- ‘टेक्नोलॉजी हब एंड इनोवेशन फॉर नॉलेज बस्तर’। इस परियोजना के अंतर्गत हम बस्तर के युवाओं को नवाचार, स्वरोजगार और उद्यमिता के लिए प्रोत्साहित करेंगे। बादल का फुलफॉर्म है- ‘बस्तर अकादमी ऑफ डांस, आर्ट, लिटरेचर एण्ड लैंग्वेज’। इस संस्था के माध्यम से एक ओर जहां विभिन्न आदिवासी कलाओं, लोकगीत, नृत्यकला, शिल्पकला, संस्कृति, भाषा, साहित्य, खान-पान, वेशभूषा का संरक्षण तथा विकास किया जाएगा। इससे युवाओं को अपनी माटी से जुड़े रहते हुए अपनी रुचि का काम भी मिलेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर के युवाओं की बदौलत हम डेनेक्स रेडिमेड गॉरमेंट फैक्ट्री, काजू प्रसंस्करण इकाई, कॉफी उत्पादन से लेकर बंजर जमीन में पपीता उत्पादन तक के इंद्रधनुषी सपने पूरे कर पा रहे हैं। बस्तर के युवाओं ने यह साबित किया है कि थोड़ी मदद, थोड़ी सुविधाएं और थोड़ा मार्गदर्शन मिलने पर वे बस्तर को बदल सकते हैं। स्वावलंबन की नई कहानी लिखकर नक्सलवाद को पीछे हटा सकते हैं।

राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना, मुख्यमंत्री वृक्षारोपण प्रोत्साहन योजना, समर्थन मूल्य पर वनोपज खरीदी, वनोपज प्रसंस्करण, फूडपार्क की स्थापना जैसे प्रयासों से युवाओं को यह विश्वास हुआ है कि खेती-किसानी के काम में भी बहुत कुछ करने को है, जो नवीनता के अभाव में दिखाई नहीं पड़ता था। हमने तीन वर्षों में आधा दर्जन कृषि और उद्यानिकी महाविद्यालय खोले जैसे बेमेतरा, जशपुर, धमतरी, अर्जुन्दा, लोरमी में। महात्मा गांधी के नाम पर दुर्ग जिले के पाटन विकासखण्ड के ग्राम सांकरा में उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, जिसमें अब प्रवेश की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कोदो, कुटकी, रागी जैसी फसलों के लिए कांकेर जिले में तथा विभिन्न कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग हेतु दुर्ग जिले में प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जा रही है। 200 से अधिक विकासखंडों में फूडपार्क की स्थापना हेतु भूमि आवंटन किया जा चुका है। बंजर जमीन को कृषि के लिए उपयोगी बनाने हेतु डीएमएफ तथा अन्य मदों से सहायता दी जा रही है।     इस तरह अब युवाओं को यह दिखने लगा है कि छत्तीसगढ़ में खेती-किसानी अब लाभ का धंधा है। यही वजह है कि बहुत से किसान पुत्र तथा पुत्रियां उच्च शिक्षित होने के बावजूद अब खेती-किसानी तथा इससे जुड़े हुए कारोबार अपना रहे हैं।

विशेष पिछड़ी जनजाति के शिक्षित युवाओं के लिए नियम को शिथिल करते हुए उन्हीं बसाहटों में शिक्षक के रूप में नौकरी दी गई है। आदिवासी अंचलों में शिक्षा के प्रति रूझान बढ़ाने के लिए संभाग स्तर पर कनिष्ठ सेवा चयन बोर्ड का गठन कर स्थानीय युवाओं की भर्ती सुनिश्चित की गई है। हमारे युवाओं की उपलब्धियों और कीर्तिमानों की खबरें सुनकर मेरा यह विश्वास और अधिक मजबूत हो जाता है कि छत्तीसगढ़ के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भरोसा और सुविधाओं से ही हम वास्तविक युवा क्रांति कर सकते हैं।     

मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा कि वर्तमान में कोरोना के नए वेरिएंट को ओमिक्रॉन के नाम से पहचाना गया है। लेकिन इसके भी शुरुआती लक्षण सर्दी, बुखार, गले में खराश जैसे, पहले की तरह ही हैं। हमारा पुराना अनुभव है कि कोरोना को लेकर किसी भी तरह की दहशत नहीं होनी चाहिए। सबसे पहले तो इतनी सावधानी बरतनी चाहिए कि कोरोना हो ही नहीं। सरकार की ओर से हरसंभव तैयारी की गई है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति को सचेत रहकर निजी सावधानी बरतनी आवश्यक है। नाक, मुंह ढंककर रखें। फेस मास्क को सही ढंग से लगाएं। साबुन, पानी से हाथ धोते रहें। भीड़ वाली जगह से बचें। फिजिकल डिस्टेंसिंग रखकर ही किसी से मेल-मुलाकात करें। हमने जिला प्रशासन को निर्देशित किया है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सार्वजनिक प्रतिबंधात्मक उपाय किए जाएं। कोरोना प्रोटोकाल का पालन करें। कोरोना से बचने के लिए टीके का दोनों डोज लगवाना जरूरी है। जिन्होंने पहला डोज लेकर छोड़ दिया है वे दूसरा डोज पूरा करें। 15 से 18 वर्ष के उम्र के किशोर-किशोरियों के लिए टीकाकरण शुरू हो गया है और मुझे खुशी है कि हमारे नवयुवा बड़ी संख्या में टीका लगवा रहे हैं। मैं चाहूंगा कि यह अभियान शत-प्रतिशत सफल हो।


छत्तीसगढ़ सरगुजा में दक्षिण पंथी विचारधारा ने मुसलमानों का बहिष्कार करने संकल्प लिया(video)

छत्तीसगढ़ सरगुजा में दक्षिण पंथी विचारधारा ने मुसलमानों का बहिष्कार करने संकल्प लिया(video)

08-Jan-2022

खुलासा पोस्ट न्यूज़ नेटवर्क- सरगुजा ब्यूरों 

छत्तीसगढ़ सरगुजा में दक्षिण पंथी विचारधारा ने मुसलमानों का बहिष्कार करने संकल्प लिया

भारतीय जनता पार्टी के करारी हार होने के बाद से छत्तीसगढ़ में नफ़रत फ़ैलाने का खेल जारी है  ,कवर्धा और कालीचरण का मामला अभी थमा भी नहीं था की अब  छत्तीसगढ़ के शान्ति प्रिय छत्तीसगढ़ के सरगुजा लुंड्रा थाना अंतर्गत ग्राम कुंडी कला का मामला है दक्षिण पंथी विचारधारा  के एक समूह के द्वारा अल्पसंख्यकों को उनके समुदाय से अलग करके मुसलमानों  का बहिष्कार करने का संकल्प लिया गया । सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में, हिंदुत्ववादियों के एक बड़े समूह को छोटे बच्चों के साथ, मुसलमानों  के साथ व्यापार व्यव्हार  करने से इनकार करते हुए, उनके बहिष्कार का शपथ दिलाते स्पष्ट रूप से देखा और सुना जा सकता है। क्या है शपथ 

"आज से, हम हिंदू, किसी भी मुसलमान को अपनी जमीन नहीं बेचेंगे या पट्टे पर नहीं देंगे। अगर हमने अपनी जमीन मुसलमानों को लीज पर दी है तो हम उन्हें तुरंत वापस ले लेंगे। आज से हम किसी भी तरह के काम के लिए न तो मुसलमानों के लिए काम करेंगे और न ही उन्हें रोजगार देंगे”

“हम पहले एक विक्रेता के धर्म को सत्यापित करेंगे जो हमारे समुदाय या गांव में बेचने के लिए आता है और अगर वे हिंदू के रूप में पहचान करते हैं तो खरीदारी करेंगे और अन्यथा नहीं,” उन्होंने प्रतिज्ञा की।

यहां देखें विडियो -

शपथ का समापन “जय श्री राम” और “भारत माता की जय” के नारों के साथ हुआ, क्योंकि लोग इस कार्यक्रम में एकत्र हुए, अपने जीवन के अंत तक अपने निर्णय का पालन करने का संकल्प लिया।

हिंदुत्व नेता और मुखपत्र, यति नरसिंहानंद के नेतृत्व में हरिद्वार में तीन दिवसीय हेट कॉन्क्लेव के बाद, सोशल मीडिया पर सामने आए एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अभद्र भाषा देने की कई घटनाओं में से यह सिर्फ एक और घटना है।

हिंदुत्व नेताओं द्वारा मुसलमानों के खिलाफ नफरत भड़काने, अल्पसंख्यकों का बहिष्कार करने का वादा करने की एक और हालिया घटना में, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्कूली बच्चों को कथित तौर पर भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने का संकल्प दिलाया गया।

स्कूल की वर्दी पहने बच्चे स्कूल समय के बाद पार्क में जमा हो गए थे। अपने माता-पिता के साथ पार्क में आने वाले कुछ बच्चे भी शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा थे।


छात्रों को भारत को एक ‘हिंदू’ राष्ट्र बनाने का संकल्प दोहराने के लिए कहा गया। भारत को एक हिंदू राष्ट्र में बदलने के लिए “लड़ो, मरो और यदि आवश्यक हो तो मारो” की शपथ ली गई।

सोनभद्र जिले के नेहरू पार्क में स्कूली बच्चों को शपथ दिलाई गई और “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम” और “जय हिंद” के नारों के साथ समाप्त हुआ।

प्रतिज्ञा में कहा गया है: “हम भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने और बनाए रखने की दिशा में काम करने का वादा करते हैं। हम इसके लिए लड़ेंगे, इसके लिए मरेंगे और जरूरत पड़ी तो इसके लिए जान से मार देंगे। लेकिन हम एक पल के लिए भी पीछे नहीं हटेंगे, चाहे कितनी भी कुर्बानी दे दी जाए। हमारे पूर्वज, शिक्षक, भारत माता हमें इतनी शक्ति दें कि हम अपना संकल्प पूरा कर सकें। वे हमें जीत दिलाएं।”


देश में इस्लामोफोबिक और सेक्सिस्ट मानसिकता का सबूत है बुली बाई

देश में इस्लामोफोबिक और सेक्सिस्ट मानसिकता का सबूत है बुली बाई

06-Jan-2022

हाल ही में “बुली बाई ऐप” के संबंध में जिसमें भारतीय मुस्लिम महिलाओं की ऑनलाइन “नीलामी” की गई थी, यह सामने आया है कि इस मामले में आरोपी उत्तराखंड की 18 वर्षीय श्वेता सिंह, 21 वर्षीय विशाल झा हैं। – बंगलौर में पढ़ाई कर रहे वृद्ध और उत्तराखंड के रहने वाले मयंक रावल भी।

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हालांकि इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि ये तीन व्यक्ति “नीलामी” में किस हद तक शामिल थे, यह ध्यान देने योग्य है कि नीलामी स्वयं मुस्लिम महिलाओं के लिए अपमानजनक और आक्रामक थी क्योंकि यह देश में इस्लामोफोबिक और सेक्सिस्ट मानसिकता का सबूत है।

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जबकि इस अधिनियम को ही कड़ी निंदा मिली, अभियुक्तों को उप-महाद्वीप के प्रमुख चेहरों से गंभीर आलोचना नहीं मिली। उदाहरण के लिए, कवि और गीतकार जावेद अख्तर ने अपने ट्विटर प्रोफाइल पर ट्वीट किया, “अगर बुल्ली बाई ऐप मास्टरमाइंड 18 साल की है, तो श्वेता सिंह, जिन्होंने हाल ही में अपने माता-पिता के कैंसर और COVID-19 को खो दिया है, ने बुली बाई नीलामी के पीड़ितों से पूछा। युवा लड़की से मिलने और उसे समझाने के लिए कि उसने जो कुछ भी किया वह गलत क्यों था।”

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पत्रकार राहुल कंवल ने अपने ट्विटर प्रोफाइल पर ट्वीट किया कि एक 18 वर्षीय लड़की काफी असाधारण और अप्रत्याशित मास्टरमाइंड है और उसे उसके व्यक्तिगत नुकसान और वित्तीय संकट के प्रति सहानुभूति है।

नीलामी के बाद से निपटने वाली महिलाओं में से एक, सिदरा ने अपने ट्विटर प्रोफाइल को लिया और कंवल से ‘इस आपराधिकता को अपवादित करना बंद करने’ के लिए कहा।

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पीड़ितों के इस उत्तेजित आक्रोश के बीच, बॉलीवुड अभिनेता स्वरा भास्कर ने ट्वीट किया और आतंकवादी अजमल कसाब के समानांतर और श्वेता सिंह पर आरोप लगाया और कहा, अजमल कसाब जिसने 2008 के मुंबई हमलों में निर्दोष लोगों की हत्या की थी। वह अपने बिसवां दशा में था और अपंग गरीबी से आया था।

देश में दक्षिणपंथी ब्रिगेड को निशाना बनाते हुए वह सवाल करती हैं कि क्या गोदी मीडिया के दिग्गजों को लगता है कि संदर्भ अपराध को सही ठहराता है।


कोविड-19 संक्रमण की रोकथाम के लिए सभी कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक हर सम्भव उपाय करें- मुख्यमंत्री श्री बघेल

कोविड-19 संक्रमण की रोकथाम के लिए सभी कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक हर सम्भव उपाय करें- मुख्यमंत्री श्री बघेल

05-Jan-2022

सभी जिलों में जुलूस, रैलियों, पब्लिक गैदरिंग, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और खेल आयोजनों पर लगाई जाए रोक
चार प्रतिशत या अधिक पॉजिटिव रेट वाले जिलों में सभी स्कूलों, आंगनबाड़ी केन्द्रों, पुस्तकालयों, स्वीमिंग पूल और सार्वजनिक स्थानों को बंद रखा जाए: रात्रि 10 बजे से सुबह 6 बजे तक रात्रिकालीन क्लैम्प डाउन लगाएं
सार्वजनिक स्थानों, भीड़-भाड़ वाले बाजारों और दुकानों में संक्रमण से बचाव के लिए मास्क के उपयोग को सख्ती से लागू करें
सभी एयरपोर्ट पर आरटीपीसीआर जांच अनिवार्य की जाए
सभी रेल्वे स्टेशनों और राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण की रेन्डम टेस्टिंग के निर्देश
आवश्यतानुसार माइक्रो और मिनी कंटेनमेन्ट जोन बनाएं
होम आईसोलेशन वाले मरीजों के लिए सप्ताह में सातों दिन 24 घंटे कॉल सेंटर्स संचालित हों
कोविड-19 संक्रमण के नियंत्रण के लिए निजी डॉक्टरों, निजी अस्पतालों, एनजीओ, मीडिया प्रतिनिधियों के साथ आयोजित की जाएं बैठकें
हॉस्पिटल बेड, दवाईयों के स्टॉक, पीएसए प्लांट्स और ऑक्सीजन की उपलब्धता की डेली रिपोर्टिंग के निर्देश
चार प्रतिशत या अधिक पॉजिटिव रेट वाले स्थानों में मॉल, सिनेमा, स्वीमिंग पूल, मेरिज पैलेस, होटल, रेस्टोरेंट, ऑडिटोरियम पर प्रतिबंध लगाने और अन्य जिलों में एक तिहाई क्षमता से संचालित करने के निर्देश

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने प्रदेश मेें कोविड-19 के बढ़ते मामलों को देखते हुए सभी कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए कोविड-19 गाइडलाईन के तहत सख्ती से हर संभव उपाय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा है कि हमारा मुख्य उद्देश्य कोविड-19 संक्रमण और इससे संबंधित रिस्क को सीमित करना है, न कि आर्थिक गतिविधियों को धीमा करना।
इस संबंध में जारी निर्देश में कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों से कहा गया है कि प्रदेश के ऐसे जिले जहां पॉजिटिव रेट 4 प्रतिशत या इससे अधिक है, वहां रात्रि 10 बजे से सुबह 6 बजे तक रात्रिकालीन क्लैम्प डाउन लगाया जाए और नॉन कमर्शियल गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाई जाए। इसके लिए जहां जरूरी हो वहां धारा 144 तथा महामारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाए, जिन जिलों में पॉजिटिव रेट 4 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां सभी स्कूलों और आंगनबाड़ी केन्द्रों, पुस्तकालयों, स्वीमिंग पूल और ऐसे सार्वजनिक स्थानों को बंद रखा जाए। ऐसे जिले जहां बीते 7 दिनों में कोरोना पॉजिटिविटी रेट 4ः से कम है,  वहां कलेक्टर अन्य जिलो के प्रावधान लागू कर सकेंगे।
सभी जिलों में जुलूसों, रैलियों, पब्लिक गैदरिंग, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और खेल आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए गए हैं। जहां जरूरी हो वहां धारा 144 तथा महामारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करने को कहा गया है।
       सभी कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों से कहा गया है कि कोविड-19 संक्रमण के नियंत्रण के लिए निजी डॉक्टरों, निजी अस्पतालों, एनजीओ, मीडिया प्रतिनिधियों के साथ बैठकें आयोजित की जाएं। कोरोना संक्रमण नियंत्रण के उपायों का स्थानीय प्रचार माध्यमों में प्रचार-प्रसार सुनिश्चित किया जाए और नकारात्मक तथा असत्य खबरों पर सख्ती से रोक लगाई जाए। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक, चेम्बर ऑफ कामर्स के प्रतिनिधियों, मॉल के मालिकों, थोक विक्रेताओं, जिम, सिनेमा और थिएटर के मालिकों, होटल-रेस्टोरेंट, स्वीमिंग पूल, ऑडिटोरियम, मेरिज पैलेस, इवेंट मैनेजमेंट समूहों के साथ बैठक करके यह सुनिश्चित करें कि इन स्थानों में क्षमता के केवल एक तिहाई लोगों को प्रवेश दिया जाए। ऐसे जिलों में जहां पॉजिटिव रेट 4 प्रतिशत से अधिक है, वहां इनकी गतिविधियों पर रोक लगाई जाए।
    कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि प्रदेश के सभी एयरपोर्ट पर आरटीपीसीआर जांच अनिवार्य की जाए। ऐसे व्यक्ति जिन्हें कोविड-19 के दोनो टीके लगाए जा चुके हैं वे यात्रा की तिथि के 72 घंटे की आरटीपीसीआर की नेगेटिव रिपोर्ट प्रस्तुत करें। साथ ही एयरपोर्ट पर आने वाले सभी यात्रियों की आरटीपीसीआर जांच अनिवार्य रूप से की जाए। सभी रेल्वे स्टेशनों और राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण की रेन्डम जांच के निर्देश दिए गए हैं।
    मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को यह निर्देश भी दिए हैं कि जहां आवश्यक हो, वहां कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए माइक्रो या मिनी कंटेनमेंट जोन बनाए जाएं। जहां आवश्यक हो वहां संक्रमितों की पहचान के लिए ट्रेसिंग और ट्रेकिंग की जाए। होम आईसोलेशन वाले संक्रमितों के लिए सप्ताह में सातों दिन 24 घंटे कॉल सेंटर्स को सक्रिय किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में मितानिनों के माध्यम से संक्रमण की स्थिति पर नजर रखी जाए। उन्होंने जिला प्रशासन को हॉस्पिटल बेड, दवाईयों के स्टॉक, पीएसए प्लांट्स और ऑक्सीजन की उपलब्धता डेली रिपोर्टिंग के निर्देश भी दिए हैं। उन्होंने जिला प्रशासन को यह सुुनिश्चित करने के यह भी निर्देश दिए हैं कि कोरोना की पिछली दो लहर के दौरान सभी शासकीय और निजी अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता की जानकारी रियल टाईम में ऑनलाईन उपलब्ध कराई जाए। मुख्यमंत्री ने एनजीओ और निजी संगठनों को कोरोना नियंत्रण के उपायों के लिए सहयोग और आवश्यक सामाग्रियों के दान हेतु प्रोत्साहित किया जाए।
    मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक स्थानों, भीड़-भाड़ वाले बाजारों और दुकानों में संक्रमण से बचाव के लिए मास्क के उपयोग को सख्ती से लागू करने के निर्देश जिला प्रशासन को दिए हैं। ऐसे लोग जो मास्क नहीं लगाते हैं उनका पुलिस और नगर निगम के स्टाफ के माध्यम से सख्ती से चालान किया जाए। मुख्यमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकें आयोजित करने तथा शासकीय अधिकारियों, कर्मचारियों को जब तक बहुत जरूरी न हो हवाई यात्रा या रेल से यात्रा नहीं करने को कहा है।


क्यों ओमिक्रोन संस्करण इतनी तेजी से फैल रहा है, रिपोर्ट

क्यों ओमिक्रोन संस्करण इतनी तेजी से फैल रहा है, रिपोर्ट

04-Jan-2022

 भारत ओमिक्रॉन के साथ अन्य सभी मौजूदा रूपों को लेने के साथ तीसरी कोविड लहर के चरम के लिए तैयार है, वैज्ञानिक यह पता लगाने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं कि यह भारी-उत्परिवर्तित वायरस इतनी जल्दी कैसे फैलता है और लोगों को खतरनाक रूप से उच्च दर पर प्रभावित करता है, फिर भी फेफड़ों को बख्शता है कोविड -19 श्वसन रोग की चपेट में आने वाला प्रमुख अंग।

 

हांगकांग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, ओमाइक्रोन संस्करण डेल्टा संस्करण की तुलना में मानव श्वसन पथ के ऊतकों के अंदर लगभग 70 गुना तेजी से गुणा करता है।

संक्रमण के 48 घंटे बाद डेल्टा की तुलना में ओमाइक्रोन भी ऊतक में उच्च स्तर तक पहुंच जाता है।

“निष्कर्ष इंगित करता है कि ओमाइक्रोन में उत्परिवर्तन ने ऊतक के अंदर प्रवेश या प्रतिकृति (या दोनों) की प्रक्रिया को तेज कर दिया है,” एनपीआर की रिपोर्ट।

हालांकि, यह पिछले वेरिएंट की तुलना में कम गंभीर है क्योंकि यह फेफड़ों में उतना नुकसान नहीं पहुंचाता है, जैसा कि कई अध्ययनों ने सुझाव दिया है।

हैम्स्टर्स और चूहों पर अमेरिकी और जापानी वैज्ञानिकों के एक संघ द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि ओमाइक्रोन से संक्रमित लोगों के फेफड़ों की क्षति कम थी, उनका वजन कम था और अन्य प्रकार के लोगों की तुलना में उनके मरने की संभावना कम थी।

स्पाइक प्रोटीन में 36 उत्परिवर्तन तक ओमिक्रॉन संस्करण, टीका प्रभावकारिता से बचने के लिए जाना जाता है।

मैसाचुसेट्स जनरल अस्पताल (एमजीएच), हार्वर्ड और एमआईटी के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में एक और हालिया अध्ययन ने उन लोगों के रक्त का परीक्षण किया, जिन्होंने ओमाइक्रोन संस्करण के समान दिखने वाले स्यूडोवायरस के खिलाफ मॉडर्न, जॉनसन एंड जॉनसन, और फाइजर/बायोएनटेक टीके प्राप्त किए।

इनमें ऐसे व्यक्ति शामिल थे जिन्हें हाल ही में टीका लगाया गया था या जिन्होंने हाल ही में बूस्टर खुराक ली थी, और उन्हें पहले SARS-CoV-2 संक्रमण भी था।

निष्कर्षों से पता चला है कि अधिकांश टीकाकरण वाले व्यक्तियों में ओमाइक्रोन का निष्प्रभावीकरण “पता नहीं” था।

“अध्ययन दर्शाता है कि एमआरएनए-1273 (मॉडर्ना), बीएनटी162बी2 (फाइजरबायोएनटेक) या एड26.सीओवी2.एस (जॉनसन एंड जॉनसन/जेनसेन) के साथ प्राथमिक टीकाकरण श्रृंखला के बाद ओमाइक्रोन वैक्सीन-प्रेरित प्रतिरक्षा से काफी हद तक बच जाता है और इन विट्रो में बढ़ी हुई संक्रामकता को प्रदर्शित करता है। बढ़ी हुई संप्रेषणीयता की संभावना, ”विल्फ्रेडो एफ। गार्सिया-बेलट्रान, पैथोलॉजी विभाग, बोस्टन में एमजीएच ने कहा।

गार्सिया-बेलट्रान और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन में लिखा है, “आश्चर्यजनक रूप से, ओमाइक्रोन जंगली प्रकार (वायरस का मूल संस्करण) से 4 गुना अधिक संक्रामक था और डेल्टा की तुलना में 2 गुना अधिक संक्रामक था।”

डेटा से पता चलता है कि ओमाइक्रोन डेल्टा या मूल संस्करण की तुलना में कम खुराक पर लोगों को संक्रमित करने में सक्षम हो सकता है।

फेफड़े के ऊतकों के अंदर, ओमाइक्रोन को डेल्टा या वायरस के मूल संस्करण की तुलना में कोशिकाओं को संक्रमित करने में कम कुशल बताया गया है।

लिस्बन विश्वविद्यालय के एक इम्यूनोलॉजिस्ट मार्क वेल्डोएन ने ट्विटर पर पोस्ट किया, “संक्रमण फेफड़ों की तुलना में ब्रोन्किया पर अधिक केंद्रित है और बहुत तेज है।”

वैज्ञानिकों को अब लोगों के श्वसन तंत्र के अंदर वायरल लोड को मापने की जरूरत है।

डेल्टा के साथ, लोगों के श्वसन पथ में मूल रूपों की तुलना में औसतन 1,000 गुना अधिक वायरस कण होते हैं।

“मैं देखना चाहता हूं कि ओमाइक्रोन के लिए वायरल लोड कैसा दिखता है। वास्तव में संक्रमित लोगों के नमूने – यही स्वर्ण मानक है। यहीं पर कार्रवाई होती है, ”गार्सिया-बेलट्रान ने कहा।

26 नवंबर, 2021 को, WHO ने वेरिएंट B.1.1.1.529 को चिंता का एक प्रकार नामित किया, जिसका नाम Omicron रखा गया।

दक्षिण अफ्रीका और दुनिया भर के शोधकर्ता ओमाइक्रोन के कई पहलुओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए अध्ययन कर रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, “कोविड -19 के सभी प्रकार, डेल्टा संस्करण सहित, जो दुनिया भर में प्रमुख है, विशेष रूप से सबसे कमजोर लोगों के लिए गंभीर बीमारी या मृत्यु का कारण बन सकता है, और इस प्रकार रोकथाम हमेशा महत्वपूर्ण है।”

कोविड-19 वायरस के प्रसार को कम करने के लिए व्यक्ति सबसे प्रभावी कदम उठा सकते हैं, दूसरों से कम से कम 1 मीटर की शारीरिक दूरी बनाए रखना, अच्छी तरह से फिट होने वाला मास्क पहनना, वेंटिलेशन में सुधार के लिए खिड़कियां खोलना, खराब हवादार या भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचना है। , हाथों को साफ रखें, खांसें या छींकें, मुड़ी हुई कोहनी या टिश्यू में रखें और जब उनकी बारी हो तो टीका लगवाएं।

 

द फॉरगॉटेन एजुकेशनिस्टः सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख

द फॉरगॉटेन एजुकेशनिस्टः सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख

03-Jan-2022

भोपाल: छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी श्री एम. डब्ल्यू अंसारी साहब ने आज 3 जनवरी को सावित्री बाई फुले की जन्मदिन के अवसर पर सावित्री बाई फुले और शेख फातिमा (9 जनवरी, 1827) को श्रद्धांजलि दी.

उन्होंने कहा कि फातिमा शेख एक भारतीय महिला शिक्षाविद् थीं. जो समाज सुधारक ज्योति बा फुले और सावित्री बा फुले के साथी थीं। फातिमा शेख मियां उस्मान शेख की बहन थीं जिनके घर पर ज्योति बाई और सौत्री बाई फुले का ने रिहाइश इख्तियार कीं (रहीं)। उन्होंने विस्तार से बताते हुए कहा कि, “आज के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में, किसी से यह पूछना हास्यास्पद होगा कि क्या वे महिला शिक्षा का समर्थन करते हैं, क्योंकि  यह न केवल हमारे संविधान में निहित है, बल्कि मुख्यधारा के सार्व जनिक प्रवचन में भी समर्थित है। जाति या धर्म की परवाह किए बिना लड़कियों की शिक्षा के लिए समर्पित कई सरकारी कार्यक्रम और योजनाएं हैं। हालाँकि, 175 साल से भी अधिक पहले, यह मुख्यधारा के सामाजिक-राजनीतिक प्रवचन का हिस्सा भी नहीं था, और वास्तव में , जिन लोगों ने इस
पर जोर दिया, उन्हें गंभीर शत्रुता और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा।

वाजेह रहे कि भारत में शिक्षा के पीछे के इतिहास का सरसरी ज्ञान रखने वालों ने सावित्री बाई फुले के बारे में सुना होगा, जिन्होंने अस्पृश्यता को चुनौती देने और लड़कियों को शिक्षित करने के लिए जाति और लिंग के दमनकारी वर्गीकरण के खिलाफ बहादुरी से  लड़ाई लड़ीं, और फातिमा शेख वह महिला थीं जिन्होंने अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक हस्तक्षेपों  का सामना किया। और 1847 के दशक मे ं “बेटी पढ़ाओ“ आंदोलन शुरू किया गया। सभी नियम तोड़ते हुए फातिमा शेख और सावित्री बाई ने एक स्कूल की स्थापना की और यहां तक कि पेशावर शिक्षक बनने के लिए एक प्रशिक्षण संस्थान में भी गईं। उनके विद्यालय का पाठ्यक्रम ब्राह्मण शिक्षकों द्वारा उनके गृह विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम से भिन्न था। इसमें वेद और शास्त्र जैसे ब्राह्मणवादी ग्रंथों के बजाय गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान शामिल थे। अधिकांश पुरुष शिक्षा तक सार्व भौमिक पहुंचने से डरते थे, जो उस वक्त तक केवल उच्च जाति के पुरुषों के लिए एक सम्मान था। उच्च जातियों ने इन स्कूलों के खुलने पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और यहां तक कि हिंसक रूप से भी इसकी निंदा की। उन्होंने रास्ते में  फातिमा और सावित्री बाई पर पथराव किया और गोबर भी फेंके। कहा जाता है कि फातिमा और सावित्री बाई स्कूल जाते समय एक अतिरिक्त साड़ी ले जाती थीं क्योंकि लोगों ने गाली-गलौज के अलावा उन पर पत्थर और गोबर फेंकते थे। लेकिन दोनों महिलाओं ने इन सभी अत्याचारों का डटकर सामना किया। फातिमा ने 1856 तक स्कूल में पढ़ाया और भारत में उन्हें पहली मुस्लिम महिला शिक्षक के रूप में जानी जाती हैं। लड़कियों को शिक्षित बनाने के लिए उन्हें कई तरह के दुव्र्यवहार और बद सुलूकी का शिकार होना पड़ा।

इन महान महिलाओं ने शिक्षित महिलाओं के लिए हर तरह के अत्याचार सहे, लेकिन आज उन्हें कम ही लोग जानते हैं। हम सभी लोगों से अपील करते हैं कि जिस तरह सीवी रमन की याद में जवाहरलाल नेहरू की याद में “बाल दिवस“ और “राष्ट्रीय विज्ञान दिवस“ मनाया जाता है।


जमीन हड़पने को लेकर चीन का नाम लेने से क्यों कतरा रहे हैं मोदी: कांग्रेस

जमीन हड़पने को लेकर चीन का नाम लेने से क्यों कतरा रहे हैं मोदी: कांग्रेस

31-Dec-2021

चीनी सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश के 15 स्थानों का नाम बदलने के बाद, कांग्रेस ने शुक्रवार को मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को ‘निष्क्रियता और भारतीय क्षेत्र की भूमि हड़पने के लिए चीन का नाम लेने से कतराने’ के लिए नारा दिया।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, ‘चीन अरुणाचल प्रदेश में 15 जगहों का ‘नाम बदल रहा है। सैटेलाइट इमेज ने हाल ही में दिखाया था कि चीन ने हमारे क्षेत्र में दो गांव भी बनाए हैं। पीएम मोदी और उनकी बीजिंग जनता पार्टी के नेता चीन का नाम लेने से भी कतराते हैं! वे बस इतना करते हैं कि चीनियों द्वारा इस जमीन पर कब्जा करने से इनकार करते हैं। ”

यह प्रतिक्रिया चीन द्वारा अपने नए सीमा कानून को लागू करने से पहले आती है, चीनी सरकार ने अपने नक्शे में अरुणाचल प्रदेश के 15 स्थानों का नाम बदल दिया था।

चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि उनके पास अरुणाचल प्रदेश में 15 स्थानों के लिए ‘मानकीकृत’ नाम हैं, जिनका उपयोग चीनी मानचित्रों पर किया जाएगा।

यह दूसरी बार है जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश के कुछ स्थानों का नाम बदला है। 2017 में चीन ने छह जगहों के नाम बदल दिए थे।

23 अक्टूबर को, चीन के शीर्ष विधायी निकाय, नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति ने “देश के भूमि सीमा क्षेत्रों के संरक्षण और शोषण” का हवाला देते हुए एक नया कानून पारित किया। समिति ने कहा था कि नया कानून एक जनवरी से लागू होगा।

कानून विशेष रूप से भारत के साथ सीमा के लिए नहीं है। चीन भारत सहित 14 देशों के साथ अपनी 22,457 किलोमीटर भूमि सीमा साझा करता है, जो मंगोलिया और रूस के साथ सीमाओं के बाद तीसरी सबसे लंबी सीमा है।

नए सीमा कानून में 62 अनुच्छेद और सात अध्याय हैं। कानून के अनुसार, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना सीमा को स्पष्ट रूप से चिह्नित करने के लिए अपनी सभी भूमि सीमाओं पर सीमा चिह्न स्थापित करेगा।

संबंधित पड़ोसी राज्य के साथ समझौते में मार्कर का प्रकार तय किया जाना है।

कांग्रेस चीन के साथ विवादों से निपटने के लिए सरकार की आलोचना करती रही है।


संत कालीचरण महाराज गिरफ्तार...(video)

संत कालीचरण महाराज गिरफ्तार...(video)

30-Dec-2021

संत कालीचरण महाराज गिरफ्तार...

मनोज शुक्ला 

रायपुर : राजधानी रायपुर में आयोजित धर्म संसद में ‘अपमानजनक' टिप्पणी करने और उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे की तारीफ करने के आरोप में कालीचरण महाराज को गिरफ्तार कर लिया गया है. मध्यप्रदेश के खजुराहो से कालीचरण की गिरफ्तारी हुई है.रायपुर एसएसपी प्रशांत अग्रवाल ने कालीचरण की गिरफ्तारी की पुष्टि की है.

प्राप्त जानकारी के मुताबिक कालीचरण ने खजुराहो में एक गेस्ट हाउस में बुकिंग कराई थी लेकिन वो वहां रूका नहीं था, उस गेस्ट हाउस से उसने चेक आउट भी नहीं किया ताकि पुलिस को चकमा दे सके. कालीचरण खजुराहो से 25 किलोमीटर दूर बाघेश्वरी धाम के करीब एक शख्स के घर पर रुका था. पुलिस से बचने के लिये उसके तमाम साथियों ने भी फोन बंद कर दिये थे. पूरे दिन पुलिस ने सुराग तलाशे और सुबह तड़के 8-10 पुलिसकर्मियों की टीम उसे गिरफ्तार कर रायपुर रवाना हो गई. आज शाम तक उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा.

देखें विडियो - 

कालीचरण का संबोधन- 
कालीचरण महाराज ने अपने संबोधन में कहा था कि इस्लाम का उद्देश्य राजनीति के माध्यम से राष्ट्र पर कब्जा करना है. उसने यह भी घोषणा की 'मोहनदास करमचंद गांधी ने देश को नष्ट कर दिया... नाथूराम गोडसे को सलाम, जिन्होंने उन्हें मार डाला.


ये कैसा धर्म संसद : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान और हत्यारें गोडसे का सम्मान ?(video)

ये कैसा धर्म संसद : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान और हत्यारें गोडसे का सम्मान ?(video)

27-Dec-2021

ये कैसा धर्म संसद : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान और हत्यारें गोडसे का सम्मान ?

खुलासा पोस्ट न्यूज़ नेटवर्क 

राजधानी रायपुर में धर्म संकट को लेकर आयोजित धर्म संसद में अचानक एक संत हिंदुत्व की चर्चा को छोड़ महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे की चर्चा करने लगे, महाराष्ट्र से आए संत कालीचरण ने मोहनदास करमचंद गांधी पर विवादित बयान दिया  कालीचरण ने महात्मा गांधी के लिए अपशब्द का प्रयोग करते हुए गोडसे को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी की वजह से देश का विभाजन हुआ, गोडसे को नमस्कार है कि उन्होंने महात्मा गांधी को गोली मार दी. उनको मार डाला।

वहीं उन्होंने कहा कि इस्लाम का मकसद राजनीति के जरिए राष्ट्र पर कब्जा करना है। 1947 में हमने अपनी आंखों से देखा कि कैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश पर इस्लामाबाद ने कब्जा किया। मोहनदास करमचंद गांधी ने उस वक्त देश का सत्यानाश किया।

देखें विडियो- 

इस बयान के बाद धर्म संसद में हंगामा मच गया। कुछ लोगों ने इसका भारी विरोध भी किया। अमन और शांति का पदेश के राजधानी रायपुर में जहां सभी जाती और समुदाय के लोग एक साथ सहजता से रहते है लेकिन बहर से आये कुछ लोग धर्म के नाम पर यहां नफरत का जहर घोल रहे है जो कभी कामयाब नहीं होगा इसमें बहुंत हद तक आयोजक भी जिम्मेदार है जिन्होंने इस तरह की आयोजन सभा किया | 

 


भूपेश का भरोसा जीता छत्तीसगढ़ शहरी निकाय चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत !

भूपेश का भरोसा जीता छत्तीसगढ़ शहरी निकाय चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत !

25-Dec-2021

खुलासपोस्ट न्यूज़ नेटवर्क 

 

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने कार्यकुशलता का लोहा मनवा ही लिया, छत्तीसगढ़ में हुए शहरी निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का सूपड़ा साफ़ करते हुए  कांग्रेस ने 300 वार्डों में से 174 वार्डों में जीत दर्ज की है, जिसके लिए मतगणना पूरी हो चुकी है। छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने निकाय चुनाव परिणामों पर कहा कि बस्तर, सरगुजा, सारंगढ़ से लेकर भिलाई और भीरगांव तक हमें अच्छे परिणाम मिले हैं।चुनाव अधिकारी के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 89 में जीत दर्ज की है, जबकि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने 6 में जीत दर्ज की है।


सीएम भूपेश बघेल ने विजयी उम्मीदवारों को बधाई दी.

बस्तर, सरगुजा, सारंगढ़ से लेकर भिलाई और भीरगांव तक अच्छे परिणाम मिले हैं। मैं अपने सभी विजयी उम्मीदवारों और पार्टी कार्यकर्ताओं को बधाई देता हूं।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा, ‘हमने सेमीफाइनल जीता है और फाइनल मैच भी जीतेंगे. 2023 में कांग्रेस राज्य में सत्ता में वापस आएगी।

चुनाव 20 दिसंबर को हुए थे।


यूपी चुनाव में शोसल मीडिया और भक्तो के व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के द्वारा भ्रम फ़ैलाने का प्रयास

यूपी चुनाव में शोसल मीडिया और भक्तो के व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के द्वारा भ्रम फ़ैलाने का प्रयास

23-Dec-2021

'द न्यूज़ इंडिया समाचार सेवा' से साभार 

यूपी चुनाव में शोसल मीडिया और भक्तो के व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के द्वारा भ्रम फ़ैलाने का प्रयास

शकील अख्तर ने अपने ट्विटर हैण्डल से यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बागी तेवर दिखाने वाले कांग्रेस के गिग्ज नेता हरीश रावत पर हमला करते हुए कहा कि हरीश रावत को लगा कि उनके बिना कांग्रेस कि नैया पार नहीं हो सकती तो वे समुद्र, तैराकी की ऊंची ऊंची बातें करने लगे। उन्हें पता है कि कांग्रेस दब जाती है नहीं तो भाजपा का रास्ता खुला ही है।
 
उधर छत्तीसगढ़ में एक और क्षत्रप कांग्रेस की अच्छी भली चलती राज्य सरकार को हिलाने में लगे हैं लेकिन मुख्यमंत्री बघेल ने यूपी में कांग्रेस का इतना विस्तृत ढांचा खड़ा कर दिया है की प्रियंका और राहुल उन्हें डिस्टर्ब नहीं करेंगे।
 
लेकिन हर हाल में सरकार को अस्थिर करने में लगे क्षत्रप के बारे में नई सूचना यह है कि उन्होंने किसी भी हद तक जाने की तैयारी कर ली है। बंगाल की किसी क्षेत्रीय पार्टी तक में जाने तक। क्षत्रपों में जब केंद्रीय सत्ता का भय खत्म हो जाता है तो इतिहास गवाह है कि ऐसे विद्रोह रोज होने लगते हैं। एक संभालो, जैसा राजस्थान में संभाला तो चार नई जगह शुरु हो जाता है। कड़ा मैसेज ही एकमात्र उपाय होता है। और राहुल अगर यह नहीं कर सके तो उनकी मुश्किलें बढ़ती जाएंगी।

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शकील अख्तर ने कहा जो समझते हैं कि कांग्रेस वही चला रहे हैं। उनमें से एक अमरिंदर सिंह चले गए भाजपा को चलाने। अजय माकन ने बहुत धीरज, राजनीतिक कुशलता से राजस्थान में स्थिति संभाल ली।


मेरे बच्चों के इंस्टाग्राम अकाउंट हैक करा रही BJP सरकार: प्रियंका का बड़ा आरोप

मेरे बच्चों के इंस्टाग्राम अकाउंट हैक करा रही BJP सरकार: प्रियंका का बड़ा आरोप

23-Dec-2021

मेरे बच्चों के इंस्टाग्राम अकाउंट हैक करा रही BJP सरकार: प्रियंका का बड़ा आरोप

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के फोन टैपिंग के आरोप के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर बड़ा आरोप जड़ा है। उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस में जोश भरने के काम में जुटीं प्रियंका गांधी वाड्रा ने लखनऊ में केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार उनके बच्चों के इंस्टाग्राम अकाउंट हैक कर रही है। 
 
कांग्रेस की यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि अखिलेश यादव तो फोन टैपिंग की बात कर रहे हैं, मेरे तो बच्चों का इंस्टाग्राम अकाउंट भी हैक कराया जा रहा है। भाजपा की सरकार तो विपक्षी दलों के खिलाफ दमन का रवैया अपना रही है। प्रियंका ने लखनऊ में मीडिया से बातचीत में कहा कि आप लोग फोन टैपिंग की बात कर रहे हैं, वे लोग तो मेरे बच्चों के इंस्टाग्राम अकाउंट भी हैक कर रहे हैं। क्या उनके पास और कोई काम नहीं है। उन्होंने प्रयागराज में महिला सशक्तिकरण सम्मेलन को लेकर भी भाजपा पर हमला किया।
 
प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी निशाना साधा। मंगलवार को प्रयागराज में महिला सशक्तिकरण सम्मेलन में महिलाओं से संवाद के आयोजन पर प्रियंका ने कहा कि मैं लड़की हूं लड़ सकती हूं के नारे के बाद इस देश की महिलाएं जाग गई हैं। वे सभी अपना हक मांग रही हैं। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रयागराज में आज महिलाओं के सामने झुक गए। मैं उनसे पूछना चाहती हूं इतने वर्षों से उनको महिलाओं की चिंता क्यों नहीं थी। पहले ये घोषणाएं क्यों नहीं की, जो वह आज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं आज बहुत खुश हूं कि पीएम नरेन्द्र मोदी को देश की महिलाओं के आगे झुकना पड़ा।
 
बता दें कि आयकर विभाग ने शनिवार को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के करीबियों के लखनऊ, मऊ, मैनपुरी, आगरा व बेंगलुरु स्थित ठिकानों पर छापेमारी की थी। इनमें सपा के राष्ट्रीय सचिव राजीव राय व अखिलेश यादव के पूर्व ओएसडी जैनेंद्र यादव के आवासों के अलावा आरसीएल ग्रुप के निदेशक मनोज यादव व लखनऊ के कारोबारी राहुल भसीन के ठिकाने भी शामिल हैं। अखिलेश यादव ने आयकर छापों को लेकर राज्य सरकार पर निशाना भी साधा। इस कार्रवाई के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी कहा था कि केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार विपक्षी दलों पर दबाव बनाने के लिए अपनी एजेंसियों का ऐसे ही इस्तेमाल करती है। 
एजेंसी इन पुट 


हेलमेट और सीट बेल्ट न लगाने की वजह से होती हैं मौतें

हेलमेट और सीट बेल्ट न लगाने की वजह से होती हैं मौतें

22-Dec-2021

हेलमेट और सीट बेल्ट न लगाने की वजह से होती हैं मौतें
 

-जनजागरूकता और सेफ्टी रूल्स की सजग मानिटरिंग से काफी संख्या में कम हो सकती हैं दुर्घटना में मौत
- सुप्रीम कोर्ट कमेटी आन रोड सेफ्टी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री अभय मनोहर सप्रे, पूर्व न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट ने ली रोड सेफ्टी को लेकर जिले में प्रदेश स्तरीय समीक्षा बैठक

दुर्ग 21 दिसंबर 2021/यदि 40 किमी प्रति घंटा की स्पीड हो तो दुर्घटना में बचने की पूर्ण संभावना होती है। यदि यह रफ्तार दोगुनी हो तो बचने की संभावना केवल 20 फीसदी रह जाती है। यह बात सुप्रीम कोर्ट कमेटी आन रोड सेफ्टी के अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश श्री अभय मनोहर सप्रे ने रोड सेफ्टी को लेकर जिले में हुई प्रदेश स्तरीय समीक्षा बैठक में बताई। उन्होंने छत्तीसगढ़, भारत और दुनिया के अनेक देशों में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों की जानकारी दी तथा तुलनात्मक समीक्षा भी की। उन्होंने बताया कि जिन देशों में रोड सेफ्टी को लेकर ज्यादा जागरूकता है वहां इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आई है। वियतनाम का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इस संबंध में बेहद गंभीर उपाय बरतने से वहां सड़क दुर्घटना में मौतों की संख्या में काफी गिरावट आई। उन्होंने कहा कि अधिकतम मौत तेज रफ्तार गाड़ी चलाने से होती हैं इसके बाद हेल्मेट नहीं पहनने, सीट बेल्ट आदि नहीं लगाने जैसे सुरक्षा उपाय नहीं अपनाने से मौतें होती हैं। शराब पीकर गाड़ी चलाने से भी बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। उन्होंने कहा कि लोग अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक होकर सेफ्टी रूल्स अपनायें तो ज्यादातर मौतें घट सकती हैं। सड़क सुरक्षा से जुड़े अधिकारी इस बात में बेहद गंभीरता से काम करते हुए सेफ्टी रूल्स का अनुपालन सुनिश्चित कराएं। सख्त मानिटरिंग से स्वतः ही लोग ट्रैफिक नियमों को अपनाने लगते हैं। बैठक में सचिव यातायात श्री टोपेश्वर वर्मा भी उपस्थित थे। उन्होंने बताया कि सड़क सुरक्षा को लेकर शासन ने विशेष रूप से फंड दिया है। सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इंस्टीट्यूट आफ ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट 17 करोड़ की लागत से तेंदुआ में बनाया गया है। 5.22 करोड़ रुपए की लागत से क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय रायपुर में ई-ट्रैक बनाया गया है। आईजी श्री ओपी पाल ने बताया कि प्रशासन द्वारा नियमित रूप से मोटर व्हीकल एक्ट के गाइडलाइन के मुताबिक जांच की जा रही है। जागरूकता कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। कलेक्टर डा. सर्वेश्वर नरेंद्र भुरे ने बताया कि सड़क सुरक्षा को लेकर नियमित रूप से समीक्षा बैठक होती है और इसके अनुरूप निर्णय लिये जाते हैं। लोगों की सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देकर कार्य किया जा रहा है। एसपी श्री बद्रीनारायण मीणा ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अंजोर रथ के माध्यम से यातायात जागरूकता के लिए कार्य किया जा रहा है। ट्रैफिक डीएसपी श्री गुरजीत सिंह ने बताया कि दुर्ग जिले में लगातार एहतियाती कदम उठाये जाने से सड़क दुर्घटना में मौतों की संख्या में कमी आई है।
छत्तीसगढ़ में हो रहे ये उपाय- सड़क सुरक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों के बारे में जानकारी इंटर डिपार्टमेंट लीड एजेंसी के चेयरमैन श्री संजय शर्मा ने दी। उन्होंने बताया कि तेंदुवा में ड्राइविंग ट्रेनिंग एवं रिसर्च सेंटर में अभी 200 वाहन चालकों को विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर में ट्रेनिंग दी जा रही है। स्कूल में सिलेबस में रोड सेफ्टी को शामिल किया गया है। सड़क सुरक्षा को लेकर रायपुर जिले में पायलेट प्रोजेक्ट चल रहा है  इसमें अधिक दुर्घटना वाले 83 गांवों में सड़क सुरक्षा को लेकर चौपाल आयोजित कराई गई है। इससे दुर्घटनाओं में कमी परीलक्षित हुई है। उन्होंने बताया कि ओवर लोडेड वाहनों पर इस साल 4 लाख 81 हजार प्रकरण प्रदेश भर में दर्ज किये गये। मुख्य सड़कों की सुरक्षा आडिट कराई गई और 53 सड़कों में सुधार कार्य किया गया। जंक्शन सुधार के 1797 कार्य किये गये। यातायात नियमों के उल्लंघन के 3 लाख 59 हजार प्रकरणों पर कार्रवाई की गई। सड़क सुरक्षा के लिए रंबल स्ट्रिप, ब्लिंकर्स आदि भी बनाये गये।
रोड सेफ्टी अब सीएसआर में भी शामिल- अध्यक्ष श्री सप्रे ने बताया कि रोड सेफ्टी अब सीएसआर में भी शामिल है। कोयंबटूर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यहां पर होंडा सिटी कंपनी ने सीएसआर से मोटर व्हीकल एक्ट की जागरूकता को लेकर पार्क बनाया है। उन्होंने कहा कि इसी तरह से सोशल मीडिया में वीडियो आदि के माध्यम से व्यापक जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा सकता है।

 


अफगान की ओर मैत्री एवं मदद के भारतीय कदम

अफगान की ओर मैत्री एवं मदद के भारतीय कदम

14-Dec-2021

अफगान की ओर मैत्री एवं मदद के भारतीय कदम

-ः ललित गर्ग:-
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जब दुश्मनी निश्चित हो जाए तो उससे दोस्ती कर लेनी चाहिए-इस एक पंक्ति में फलसफा है, कूटनीति है, अहिंसा है, मानवीयता है एवं जीवन का सत्य है और यही भारतीयता भी है। इसी भारतीयता का एक अनूठा उदाहरण तमाम विपरीत स्थितियों के बावजूद अफगानिस्तान की मदद करके भारत ने प्रस्तुत किया है। भारत ने फिर से सहयोग, संवेदना एवं मानवीय सोच से कदम बढ़ाया है। संकट से जूझ रहे अफगान नागरिकों के लिए यहां से भारी मात्रा में जीवनरक्षक दवाओं की खेप भेजी गई है। जो विमान काबुल से भारतीय और अफगान नागरिकों को लेकर यहां आया था, उसी के जरिए यह खेप भेजी गई। यह भारत का सराहनीय कदम है, मानवीयता से जुड़ा है।
समस्या जब बहुत चिन्तनीय बन जाती है तो उसे बड़ी गंभीरता एवं चातुर्य से नया मोड़ देना होता है। भारत ने ऐसा ही किया गया है। जबसे अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता कायम हुई है, तबसे वहां भारत की गतिविधियां लगभग रुकी हुई थीं। वहां भारत के द्वारा चल रहे विकास के आयाम भी अवरुद्ध हो गये थे। तालिबानी मानसिकता एवं भारत विरोधी गतिविधियों के कारण शुरू में तो भारत लंबे समय तक यही तय नहीं कर पा रहा था कि वह तालिबान को मान्यता दे या न दे, क्योंकि पूरी दुनिया में तालिबान को एक दहशतगर्द, आतंकवादी एवं हिंसक संगठन माना जाता है और इस तरह किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कब्जा करके सत्ता बनाने वाली शक्तियों को मान्यता देना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध माना जाता है। इन स्थितियों के कारण भारत द्वंद्व में रहा। समस्याएं अनेक रही हैं, चीन और रूस ने तालिबान की सत्ता को समर्थन देना भी एक समस्या रही है। भारत के सामने एक समस्या यह भी थी कि उसे अमेरिका का रुख भी देखना था। अमेरिका को पसंद नहीं कि कोई देश अफगानिस्तान की मदद करता। जब उसकी सेना वहां से हटी, तभी तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था। इसलिए दुनिया के वे सभी देश तालिबान के विरोध में खड़े थे, जो अमेरिका के मित्र थे। लेकिन इन सब समस्याओं एवं स्थितियों के बावजूद भारत का एक स्वतंत्र वजूद भी रहा है, उसकी सोच राजनीति के साथ-साथ मानवीय एवं उदारवादी रही है। शायद यही वजह है कि भारत ने एक बार फिर अफगानिस्तान की जनता की खेर-खबर लेना जरूरी समझा है।
आज अफगानिस्तान के सम्मुख संकट इसलिए उत्पन्न हुआ कि वहां सब कुछ बनने लगा पर राष्ट्रीय चरित्र नहीं बना और बिन चरित्र सब सून........। तभी आतंकवाद जैसी स्थितियों के लिये उसका इस्तेमाल बेधड़क होने लगा, अहिंसा और शांति चरित्र के बिना ठहरती नहीं, क्योंकि यह उपदेश की नहीं, जीने की चीज है। उसे इस तरह जीने के लिये भारत ने वातावरण दिया, लेकिन उनका पडौसी पाकिस्तान इस वातावरण को पनपने नहीं दिया। अफगानिस्तान भारत का पड़ोसी है और पाकिस्तान का भी। पाकिस्तान के भारत से रिश्ते हमेशा तनाव भरे ही रहते हैं। ऐसे में अगर अफगानिस्तान का झुकाव भी उसकी तरफ रहेगा, तो भारत के लिए मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। इसलिए भारत ने शुरू से अफगानिस्तान के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखा है। तालिबान के कब्जे से पहले वहां भारत ने अनेक विकास परियोजनाओं में भारी धन लगा रखा है। तालिबान के आने के बाद उन परियोजनाओं पर प्रश्नचिह्न लग गया था।
जगजाहिर है कि अफगानिस्तान तालीबानी बर्बरता एवं पाकिस्तानी कुचेष्ठाओं के चलते इस वक्त भयानक संकटों का सामना कर रहा है। देश में भुखमरी के हालात हैं, आम जीवन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विकास की जगह आतंकवाद मुख्य मुद्दा बना हुआ है। लाखों लोग पहले ही पलायन कर चुके हैं। सत्ता को लेकर तालिबान के उग्र तेवर एवं भीतर ही भीतर वहां के राजनीतिक गुटों में तना-तनी का माहौल है। देश के अंदरूनी मामलों में पाकिस्तान का दखल मुश्किलों को और बढ़ा रहा है, अधिक चिन्ता की बात तो यह है कि अफगानिस्तान की जमीन का उपयोग आतंकवाद के लिये हो रहा है। एक विकास की ओर अग्रसर शांत देश के लिये ये स्थितियां एवं रोजाना हो रहे आतंकी हमलों में निर्दोष नागरिकों का मारा जाना, भूख-अभाव का बढ़ना, चिन्ताजनक है। भारत यदि इन चिन्ताओं को दूर करने के लिये आगे आया है तो यह एक सराहनीय कदम है।
इस तरह भारत ने अफगानिस्तान को जीवनरक्षक दवाओं की खेप भेज कर न सिर्फ दुनिया के सामने अपना मानवीय पक्ष स्पष्ट किया है, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों का दिल जीतने का भी प्रयास किया है और कूटनीतिक दृष्टि से भी बड़ा कदम उठाया है। चीन और अमेरिका दोनों को इससे स्पष्ट संकेत मिल गया है। भारत अभी अफगानिस्तान को पचास हजार टन अनाज और दवाओं की कुछ और खेप भेजने वाला है। यह खेप पाकिस्तान के रास्ते जानी है। पाकिस्तान ने इसके लिए रास्ता दे दिया है, उस पर दोनों तरफ के अधिकारी अंतिम बातचीत के दौर में हैं। तालिबानी हमले की वजह से अफगानिस्तान में बड़ी तबाही मची है, वहां के पारंपरिक कामकाज भी लगभग ठप हैं। ऐसे में वहां के लोगों के लिए भोजन और दवाओं की किल्लत झेलनी पड़ रही है। भारत से पहुंची यह मदद वहां के लोगों के लिए बड़ी राहत पहुंचाएगी। इससे वहां की जनता में भारत के प्रति मानवीय सोच पनपेगी। भारत चाहता है कि अफगानी लोग अहिंसा, शांति, मानवीयता एवं आतंकमुक्ति का जीवन जीये। न अहिंसा आसमान से उतरती है, न शांति धरती से उगती है। इसके लिए पूरे राष्ट्र का एक चरित्र बनाना जरूरी होता है, भारत ऐसी ही कोशिश कर रहा है। वही सोने का पात्र होता है, जिसमें अहिंसा रूपी शेरनी का दूध ठहरता है। वही उर्वरा धरती होती है, जहां शांति का कल्पवृक्ष फलता है। ऐसी संभावनाओं को तलाशते हुए ही भारत सहयोग के लिये आगे आया है।
भारत ने तो अफगानिस्तान का लम्बे समय तक सहयोग किया है। वहां के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो भारत वहां का विकास चाहता है, शांति चाहता है, उन्नत चरित्र गढ़ना चाहता है, वहां उन्नत जीवनशैली चाहता है, हर इंसान को साधन-सुविधाएं, शिक्षा-चिकित्सा देना चाहता है, उस देश का भी भारत के साथ प्रगाढ़ मै़त्री संबंध है, इन सुखद स्थितियों के बीच उस जमीन का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिये हो, यह कैसे औचित्यपूर्ण हो सकता है? यह तो विरोधाभासी स्थिति है। भारत तो वहां लंबे समय से विकास की बहुआयामी एवं विकासमूलक योजनाओं में सहयोग के लिये तत्पर है। वहां संसद भवन के निर्माण, सड़कों का नेटवर्क खड़ा करने से लेकर बांध, पुलों के निर्माण तक में भारत ने मदद की है। लेकिन अब मुश्किल तालिबान सत्ता को मान्यता देने को लेकर बनी हुई है। दो दशक पहले भी भारत ने तालिबान की सत्ता को मान्यता नहीं दी थी। जाहिर है, इसमें बड़ी अड़चन खुद तालिबान ही है। जब तक तालिबान अपनी आदिम एवं आतंकी सोच नहीं छोड़ता, मानवाधिकारों का सम्मान करना नहीं सीखता, तब तक कौन उसकी मदद के लिए आगे आएगा? अब यह तालिबान पर निर्भर है कि वह गतदिनों दिल्ली में हुए क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद को किस तरह लेता है और कैसे सकारात्मक कदम बढ़ाता है। लेकिन उसकी मानसिकता बदलने तक भारत इंतजार नहीं कर सकता है, इसलिये उसने अफगानी लोगों के सहयोग के लिये अपने कदम बढ़ा दिये हैं, जो सराहनीय है, मानवीय सोच से जुड़े हैं, निश्चित ही इन सहयोगी कदमों का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा।
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(ललित गर्ग)
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बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर सपा, बसपा, कांग्रेस ने आंखें मूंद लीं: असदुद्दीन ओवैसी

बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर सपा, बसपा, कांग्रेस ने आंखें मूंद लीं: असदुद्दीन ओवैसी

13-Dec-2021

समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस की आलोचना करते हुए एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने रविवार को कहा कि बाबरी मस्जिद को गिराए जाने पर उन्होंने आंखें मूंद लीं।

ओवैसी ने यहां एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “मेरी मस्जिद (बाबरी) को गिरा दिया गया। जिन लोगों ने इसे ध्वस्त किया, भारत की नींव और कानून के शासन को बाधित किया … क्या सपा, बसपा या कांग्रेस में से किसी ने कुछ कहा? उन्होंने आंखें मूंद लीं क्योंकि मेरी मस्जिद तोड़ी गई लेकिन उनकी नहीं।”

एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा कि उनकी पार्टी आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में 100 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि एआईएमआईएम गठबंधन बनाने के लिए तैयार है।

सरकार और नीति निर्माण में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर जोर देते हुए ओवैसी ने कहा, “यादवों ने मुलायम सिंह और अखिलेश की सरकार बनाई। मायावती को दलितों ने मुख्यमंत्री बनाया। ठाकुर और ब्राह्मणों ने उत्तर प्रदेश में वर्तमान भाजपा सरकार बनाई है। अब दलाल यह तय नहीं करेंगे कि मुसलमान वोट कहां डालेंगे। मैं उत्तर प्रदेश के मुसलमानों से कहता हूं कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं है और अगर उत्तर प्रदेश के मुसलमान आगे बढ़ना चाहते हैं तो उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा।

उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों में, भारतीय जनता पार्टी ने 403 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में से 312 सीटें हासिल कीं, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) ने 47 सीटें हासिल कीं, बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) ने 19 सीटें जीतीं और कांग्रेस केवल जीतने का प्रबंधन कर सकी। सात सीटें। बाकी सीटों पर अन्य उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया।


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