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सोशल मीडिया से डरी सरकार?

सोशल मीडिया से डरी सरकार?

12-Jun-2021

सोशल मीडिया से डरी सरकार? 

ये अभी देश में चर्चा का विषय है साथ ही टूल किट का मामला भी तुल पकड़ता जा रहा है ,भाजपा जवाब देने से बच रही है ! इन सभी बातो से ऐसा लगता है ,भाजपा कहीं जनता को देश के असल मुद्दे से गुमराह  करने का प्रयास तो नही कर रही  है?

सोशल मीडिया एक ऐसा मीडिया है, जो बाकी सारे मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और समानांतर मीडिया) से अलग है। सोशल मीडिया इंटरनेट के माध्यम से एक वर्चुअल वर्ल्ड बनाता है जिसके कारण आम आदमी तक हर खबर तत्काल पहुंच जाती है यही कारण है की अब मीडिया जगत और सत्ता पर बैठे सत्ता धीश, सोशल मीडिया से घबराये हुए हैं ? सोशल मीडिया का उपयोग करने वाला हर  व्यक्ति सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म (फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम) आदि का उपयोग कर लोगों तक अपनी पहुंच बनाता  जा रहा है। जिसके कारण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की TRP घटने लगी है और प्रिंट मीडिया से पहले सोशल मीडिया में सारी दुनिया की खबरे आ जाती हैं ,जिसके कारण अब अख़बार पढ़ने वाले पाठक कम होते जा रहे है, जिससे बड़े मीडिया घराने भी सोशल मीडिया को बन्द करने के समर्थन में दिखाई दे रहे है |

सोशल मीडिया के कारण बंगाल चुनाव में भा ज पा चुनाव हारी और , कोरोना महामारी के दूसरे दौर में जिस तरह की तबाही और मौतें हुई है मोदी सरकार के पास उसका कोई जवाब नहीं है अपनी इस नाकामियाबी और अव्यवस्था को छिपाने के लिए नित नए हथकण्डे इनके द्वारा अपनाये जाते  रहे है , इनकी सारी नकामियाबी की पोल सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने खोल कर रख दी, क्यों की  गोदी मीडिया तो जनता को झूठ दिखाकर  गुमराह करने का काम करने में लगी   है!
 
ऐसे में सोशल मीडिया ने कोरोना से हो रही भयानक मौतों , ऑक्सीजन की कमी  और अस्पतालों की अव्यवस्था और केन्द्रीय स्वास्थ मन्त्रालय की नाकमियाबी की पोल खोल कर रख दी , और देश की जनता सच्चाई से वाकिफ होने लगी इससे सरकार घबरा गई और शोसल मीडिया को बैन करने की ठान ली है ?
यह समाज की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी लगाने कुत्सित प्रयास है , और इसे कानूनी जामा पहनाने की कोशिश की जा रही हैं।
ये जितना झूठ बोलेंगे, सच उतना ही साफ होकर सामने आता जाएगा |

भारत देश  दुनिया में वैक्सीन के लिए सबसे ज़्यादा तरस रहा वहीं इन शासको को अपनी छवि सुधारने  की अधिक चिन्ता है, इन नेताओ की प्राथमिकता केवल हेडलाइन बनवाने की है। ये एक बड़े मुद्दे की तलाश में है जिससे इनकी गिरती छवि को ये  बचा सके जिसे सोशल मीडिया ने उजागर कर दिया और  इनकी IT सेल बदनामी से बचने मुद्दे ढूंढने  में लगी है, ताकि जनता पिछले 2-3 महीने के नरसंहार को भूल जाए।“

मतलब साफ है सरकार केवल जनता का ध्यान अपनी विफलताओं से भटकाने के लिए मौके खोज रही है। कभी ट्विटर की शर्तें ना मानकर तो कभी फ़ाइजर की सभी शर्तें मानकर।

रवीश कुमार ने अपने पोस्ट में चीन के साथ संबंधों पर भी सरकार पर सवाल उठाए हैं। चीन ने पिछले वर्ष गलवान घाटी में जब हमला किया तब भी सरकार ने कुछ बोला नहीं था खामोश थी और  बोला भी तो सीधा नकार दिया, कि कोई हमारी जमीन पर नहीं आया। जवाबी तौर पर बस टिकटॉक बंद कर दिया। ये तो सोशल मीडिया  पर पहला प्रहार था सरकार का जिसे जनता ने ख़ामोशी से बर्दास्त कर लिया था लेकिन वही सरकार

आज उसी चीन से पीपीई किट से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक खरीद रही है, लेकिन भाजपा के किसी नेता और प्रवक्ता या सरकार से इस प्रश्न पर कुछ भी बोला नहीं जाएगा।
सरकार की नाकामियां और अव्यवस्था ने ही कोरोना महामारी को नरसंहार का रूप दिया है। सरकार के पास करने और कहने को कुछ नहीं है। शायद इसलिए सरकार केवल जनता को मुद्दों से भटकाने के बहाने खोज रही है। 

शोसल मीडिया का बड़ा खुलासा
पीएम केयर के तहत सप्लाई किए गए वेंटिलेटर की खराब गुणवत्ता को लेकर एक साल से शोसल मीडिया इनकी पोल खोल  रही हैं. कभी मामूली खराबी तो कभी रखरखाव में कमी का बहाना बना कर इस मसले की सच्चाई छलकती रहती है. आखिर हज़ारों करोड़ रुपये से खरीदे गए इन वेंटिलेटर की दूसरी लहर में क्या भूमिका रही
बीते साल पीएम केयर्स फंड से 2000 करोड़ रुपए वेंटिलेटर्स के लिए दिए गए थे, उन वेंटिलेटर्स का क्या हुआ? बीबीसी ने अपनी पड़ताल में ये पाया -

पीएम केयर्स फंड से ऑर्डर किए गए 58 हज़ार 850 वेंटिलेटर्स में से तक़रीबन 30 हज़ार वेंटिलेटर्स ख़रीदे गए
कोरोना की पहली लहर का ज़ोर कम होने के बाद वेंटिलेटर की ख़रीद में ढील, एक ही स्पेसिफ़िकेशन वाले वेंटिलेटरों की क़ीमतों में भारी अंतर, बिहार, यूपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों के कई अस्पतालों में पीएम केयर्स के वेंटिलेटर धूल खा रहे हैं कई जगहों से मिल रही हैं वेंटिलेटरों के ठीक से काम न करने की शिकायतें कहीं प्रशिक्षित स्टाफ़ नहीं, कहीं वायरिंग ख़राब, कहीं एडॉप्टर नहीं

कोरोना महामारी के दौरान कई अस्पतालों में खराब वेंटिलेटर्स सप्लाई किए जाने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार को फटकार लगाई है।

दरअसल बीते साल कोरोना महामारी की शुरुआत के दौरान सरकार द्वारा शुरू किए गए पीएम केयर्स फंड से मिले 150 में से 113 वेंटिलेटर्स खराब पाए गए हैं।

कई अस्पतालों ने इस मामले में वेंटिलेटर्स की खराबी की शिकायत के चलते मरीजों की मौत होने की बात कही थी।
शोसल मीडिया का बड़ा खुलासा
इस कड़ी में पत्रकार रणविजय सिंह ने ट्वीट कर मोदी सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने लिखा है कि “बॉम्बे HC ने मोदी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा- सरकार को लोगों की जान की बजाय खराब वेंटिलेटर बनाने वाली कंपनी की ज्यादा चिंता है.

वेंटिलेटर बनाने वाली कंपनी का नाम ज्योति CNC है. ये कम्पनी सूरत के उस व्यापारी की है जिसने PM मोदी को सूट गिफ्ट किया था. इस सूट की कीमत पता कीजिए।”

दरअसल बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को मोदी सरकार से यह सवाल किया था कि खराब वेंटिलेटर्स के लिए उनके पास क्या उपाय है। जिस पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जवाब में यह कहा गया कि इन 150 वेंटिलेटर्स की सप्लाई पीएम केयर्स फंड के तहत नहीं की गई थी।

दरअसल अस्पतालों को सप्लाई किए गए इन खराब वेंटिलेटर्स को गुजरात की ज्योति सीएनसी ऑटोमेशन लिमिटेड कंपनी द्वारा बनाया गया है।

आपको बता दें कि गुजरात की इस कंपनी द्वारा निर्मित किए गए वेंटीलेटर्स काफी विवादों में रह चुके हैं।

दरअसल ज्योति सीएनसी ऑटोमेशन लिमिटेड कंपनी के प्रमोटर उस बिजनेस परिवार से जुड़े हुए हैं।

जिन्होंने साल 2015 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनका नाम लिखा हुआ सूट तोहफे में दिया था। जोकि काफी महंगा भी था और सोशल मीडिया पर इसके काफी चर्चे भी हुए थे।

 

 

 


नागरिकता के नाम पर सरकार कर रही है विभाजनकारी राजनीति- रिहाई मंच

नागरिकता के नाम पर सरकार कर रही है विभाजनकारी राजनीति- रिहाई मंच

11-Jun-2021

नागरिकता के नाम पर सरकार कर रही है विभाजनकारी राजनीति- रिहाई मंच

सै क़ासिम 
लखनऊ 11 जून 2021. रिहाई मंच ने केंद्र सरकार द्वारा विदेशी नागरिकों को भारत की नागरिकता देने के लिए आवेदन करने की शर्त के बतौर पड़ोसी देश के अल्पसंख्यक को पात्र बता कर मुस्लिम समुदाय को अलग करने की पैंतराबाज़ी की है. मंच ने कहा कि सरकार साम्प्रदायिक मानसिकता की तृप्ति के लिए ऐसा कर रही है नहीं तो बिना शर्त के सभी को नागरिककता दे सकती है. सरकार की यह संदेश देने की कोशिश है कि जो हमने कहा वो किया.

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून 2009 के अंतर्गत विदेशी नागरिकों को भारत की नागरिकता देने के लिए आवेदन करने हेतु पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यक होने की शर्त लगाई है, हालांकि इस कानून में ऐसी कोई शर्त मौजूद नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा 2019 में पारित करवाए गए नागरिकता कानून (सीएए) में सिर्फ विदेशी पड़ोसी देश के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने की शर्त लगाई थी जिसका व्यापक विरोध हुआ था. सरकार अब विदेशी नागरिकों को नागरिकता देने के पहले से मौजूद कानून के तहत नागरिकता देने के लिए आवेदन मांगा है, लेकिन शर्त सीएए वाली लगाई है. यह सरकार की हठधर्मिता और अहंकार को दर्शाता है.

नागरिकता कानून 2009 के तहत पहले भी विदेशी नागरिकों को भारत की नागरिकता दी जाती रही है और स्वयं भाजपा सरकार भी इस कानून के अंतर्गत नागरिकता प्रदान कर चुकी है. इससे साबित होता है कि नागरिकता देने के लिए सीएए जैसे साम्प्रदायिक और विभाजनकारी कानून की कोई ज़रूरत नहीं थी बल्कि पहले से मौजूद कानून को और सरल बनाया जा सकता था.

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि बेकाबू होती मंहगाई, बेरोज़गारी के मुद्दे पर सरकार बुरी तरह नाकाम है. शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र जर्जर स्थिति में है. कोराना महामारी की दूसरी लहर ने जो तबाही मचाई उसने सरकार द्वारा किए जा रहे निजीकरण के सुनहरे सपनों को तार-तार कर दिया. सरकारी सम्पत्तियों को कौड़ियों के दाम अपने पूंजीपति मित्रों को बेचने और कीमती सरकारी जमीने आवंटित किए जाने से जनता में रोष है. कृषि विधेयकों के माध्यम से पूंजीपति डकैतों को रोटी पर नियंत्रण देने के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन ने सरकार की नींद हराम कर रखी है.

सरकार को साम्प्रदायिकता की शरण में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा. इससे पहले भी इसी कानून के अंतर्गत विदेशी नागरिकों को भारत की नागरिकता दी जा चुकी है और उसमें उन देशों के अल्पसंख्यकों के अलावा अन्य की संख्या नगण्य ही रही है. पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यक की शर्त पर नागरिकता देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा अचानक आवेदन मांगने के पीछे देश में खासकर उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक माहौल बनाने का प्रयास प्रतीत होता है.

द्वारा-
राजीव यादव
महासचिव, रिहाई मंच
9452800752
_________________________
110/46, Harinath Banerjee Street, Naya Gaaon (E), Latouche Road, Lucknow                                                                      

 


गोरखनाथ मंदिर की सुरक्षा के नाम पर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के मसले पर रिहाई मंच ने पीड़ितों से की मुलाकात

गोरखनाथ मंदिर की सुरक्षा के नाम पर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के मसले पर रिहाई मंच ने पीड़ितों से की मुलाकात

10-Jun-2021

सै क़ासिम 
लखनऊ 9 जून 2021। रिहाई मंच ने गोरखनाथ मंदिर परिक्षेत्र में सुरक्षा के नाम पर पुलिस बल की तैनाती हेतु शासन के निर्णय के क्रम में मंदिर के दक्षिण पूर्वी कोने पर ग्राम पुराना गोरखपुर तप्पा कस्बा परगना हवेली तहसील सदर की मुस्लिम आबादी से सहमति पत्र पर हस्ताक्षर लिए जाने के बाद पीड़ितों से मुलाकात की।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि इस मुलाकात में लोग काफी भयभीत थे। उनसे बातचीत में तमाम सवाल उभर कर आए। आज तक मंदिर की तरफ से सुरक्षा की दृष्टि से कोई दिक्कत दर्ज नहीं की गई। जब भी कोई कार्यक्रम होता था पुलिस उनके घरों पर तैनात कर दी जाती थी। पीड़ितों ने कहा कि आज तक योगी आदित्यनाथ ने इस बावत कुछ नहीं बोला। वे आए भी नहीं। जब भी आएंगे उनसे हम मिलना चाहेंगे। 

लोगों ने बताया कि कुछ दिन पहले प्रशासन ने भूमि की पैमाइश करवाई थी। इस बारे में उन्हें कुछ पता ही नहीं चला और न ही उनको कोई सूचना दी गई थी। जब सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाया गया तो लगा कि यह आम तरह की कोई प्रक्रिया है। सोशल मीडिया पर आने के बाद एक बार फिर प्रशासन के लोग आए। पूछा कि क्यों बोला। इसके बाद फिर नहीं आए। लोगों ने कहा कि सहमति पत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल हैं। लोग डीएम के किसी बयान का जिक्र कर रहे थे। पर यहां सवाल है कि अगर प्रशासन के स्तर पर यह कार्रवाई नहीं थी तो प्रशासनिक अमला क्यों इसमें संलिप्त था।

गोरखनाथ मंदिर परिक्षेत्र में सुरक्षा के दृष्टिगत पुलिस बल की तैनाती हेतु शासन के निर्णय का जिक्र करते हुए प्रशासनिक अमले ने लोगों की भूमि की पैमाइश की और सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाया पर अब तक शासन के इस निर्णय का कोई अता-पता नहीं है। वह शासन का निर्णय क्या है, कब लिया गया, किसके इनपुट पर लिया गया और उसके पालन के लिए किस अधिकारी की नियुक्ति हुई।

सहमति पत्र शासन के किस अधिकारी ने जारी किया इसका कोई उल्लेख नहीं। सहमति पत्र में किसी तिथि का उल्लेख भी नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह सहमति कब बनाई गई और किस प्रक्रिया का पालन किया गया। कानून में किसी भी व्यक्ति की जमीन लेने के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं हैं। सहमति पत्र को कानून की किस प्रक्रिया के तहत जारी किया गया है इसका कोई विवरण नहीं है। भूमि अधिग्रहण के लिए किसी प्रकार का गजट अखबार में प्रकाशित नहीं हुआ। न ही किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया गया। इससे प्रतीत होता है कि सुरक्षा के नाम पर दमनकारी रवैया अपनाते हुए मुस्लिम परिवारों की जमीन हड़पने की साजिश हो रही है।

रिहाई मंच ने सवाल किया कि मंदिर की सुरक्षा की दृष्टि से शासन द्वारा लिए गए निर्णय के बाद क्या कोई बातचीत वहां के स्थानीय निवासियों से की गई। क्या उन्होंने पूर्व में मंदिर की सुरक्षा में कोई बाधा उत्पन्न की जिससे शासन को ऐसा निर्णय लेना पड़ा। विदित है कि मंदिर से पहले वहां स्थानीय निवासी थे और इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि नवाब आसिफ उददौला ने जमीन दी थी।

लोगों से मुलाकात में किसी ने नहीं कहा कि वे अपनी भूमि या भवन को सरकार के पक्ष में हस्तांतरित करने के लिए सहमत हैं। उन्हें इस प्रक्रिया पर आपत्ति है। ऐसे में सवाल है कि कैसे सहमति पत्र बनाने का विचार आया। क्योंकि अगर वहां की जमीन शासन को चाहिए थी तो वह उसके मालिकों से वार्ता करती, भूमिअधिग्रहण के जो कानून हैं उनका पालन करती। न कोई कानून, न कोई दलील, न ही कोई वकील। दरअसल प्रशासन ने यह प्रक्रिया ऐसे चलाई जैसे कोई मंदिर को अपनी जमीन दान दे रहा है। इस प्रक्रिया के तहत वह उसके जमीन के मालिकाना हक, स्थापित रोजगार और जीवन जीने के अधिकार जैसे सवालों को खत्म कर देना चाहती है। ऐसे में यह किसी व्यक्ति की इच्छा के विपरीत जबरिया दान लेने जैसा दिखता है। यह अधर्म है, धर्म विरोधी कृत्य है।

लोग काफी भय में हैं। उन्हें लगता है कि जिस तरीके से बिना बताए पैमाइश करवा ली गई या सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन उनको उनके बाप-दादा की पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया जाए। लोग अपने परिवार और रोजगार को लेकर काफी चिंतित हैं। भविष्य की चिंता इस कदर है कि एक युवा तो फूट-फूट कर रोने लगा।

रिहाई मंच ने कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से गैर कानूनी है और सांप्रदायिक जेहनियत के तहत की गई है। यह मंदिर के पास मुस्लिम आबादी के रहने पर उसे सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक दिखाने की कोशिश है। मंच इस प्रकरण में पीड़ितों के साथ है। हर संभव कानूनी मदद दी जाएगी। इसमें मानवीय मूल्यों तक का ध्यान नहीं दिया गया। अगर राज्य को या मंदिर को वह जमीन चाहिए थी तो उसे स्थानीय लोगों से वार्ता करनी चाहिए थी। पर जिस तरह से सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराकर जमीन लेने की कोशिश की जा रही है वह  जबरिया है। इसकी इजाजत न  धर्म देता है और न ही  कानून-संविधान। मंदिर-मस्जिद जैसी जगहों का निर्माण आपसी सहयोग या दान दी गई प्रक्रिया के तहत होता है। ऐसा कर प्रशासन आने वाले समय में लोगों के लिए और जगहों पर मुश्किल खड़ा कर देगा। इसकी नजीर लेकर कल किसी और को भी बेदखल कर दिया जाएगा।

द्वारा जारी-
राजीव यादव
महासचिव, रिहाई मंच
9452800752         
_________________________
110/60, Harinath Banerjee Street, Naya Gaaon (E), Latouche Road, Lucknow                                                                      
 


कलाकार दिलीप कुमार के फेफड़ों में पानी भर गया है ,स्वास्थ बुलेटिन में तबीयत को लेकर डॉक्टर ने दिया बयान !

कलाकार दिलीप कुमार के फेफड़ों में पानी भर गया है ,स्वास्थ बुलेटिन में तबीयत को लेकर डॉक्टर ने दिया बयान !

08-Jun-2021

वेटरन एक्टर दिलीप कुमार को रविवार को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। दिलीप कुमार के फेफड़ों में पानी भर गया है।

भास्कर डॉट कॉम पर छपी खबर के अनुसार, इस स्थिति को बाइलिटरल प्ल्यूरल इफ्यूजन कहा जाता है। हिंदुजा अस्पताल के डॉ. जलील पारकर ने कहा, दिलीप कुमार अभी न तो वेंटिलेटर पर हैं और न ही उन्हें आईसीयू में रखा गया है।

अभी तो स्थिति ठीक है, लेकिन उम्र को देखते हुए आप ज्यादा कुछ नहीं कह सकते।

डॉ. पारकर ने कहा कि दिलीप साहब का कोविड टेस्ट करने की जरूरत नहीं पड़ी। फेफड़ों में पानी भरना उम्र संबंधी दिक्कत है।

फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें कब तक अस्पताल में रखना पड़ेगा। उनकी तबीयत को लेकर फिल्मफेयर मैग्जीन ने भी एक ट्वीट किया है

इसमें दिलीप कुमार का ऑक्सीजन लेवल घटने और ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखने की बात कही गई है।

दुआ कीजिए और खुद भी सुरक्षित रहिए- सायरा बानो
दिलीप कुमार की पत्नी सायरा बानो ने बताया कि दिलीप साहब को रुटीन चेकअप के लिए नॉन कोविड पीडी हिंदुजा अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।

उन्हें पिछले कई दिनों से सांस लेने में तकलीफ थी। हिंदुजा अस्पताल में डॉ. नितिन गोखले की टीम उनकी देखभाल कर रही है। सायरा बानो ने लोगों से अपील की है कि कृपया साहब के लिए दुआएं करते रहिए और आप भी सुरक्षित रहिए।


दिलीप कुमार पिछले महीने भी इसी हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे। तब भी यही कहा जा रहा था कि उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है।

बाद में उनकी पत्नी सायरा बानो ने आधिकारिक स्टेटमेंट जारी कर कहा कि वे रुटीन चेकअप के लिए अस्पताल में एडमिट हुए थे। सभी चेकअप के बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया था।

 

 

आचार्य ऋषभचन्द्र का मौन हो जाना

आचार्य ऋषभचन्द्र का मौन हो जाना

04-Jun-2021

आचार्य ऋषभचन्द्र का मौन हो जाना
 - ललित गर्ग-

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प्रख्यात जैन आचार्य, मोहनखेड़ा तीर्थ विकास प्रेरक व ज्योतिषाचार्य ऋषभचंद्र सूरीश्वरजी का 2 जून, 2021 की मध्यरात्रि में इंदौर के मोहक अस्पताल में देवलोकगमन हो गया। 64 वर्षीय जैन संत कोविड संक्रमित थे और पिछले छह दिन से उनका मोहक अस्पताल में सघन इलाज चल रहा था। साइटो काइंड स्टार्म के कारण उनके फेफड़ों में 80 प्रतिशत तक संक्रमण हो चुका था। अस्पताल में आने के बाद उन्हें आइसीयू में बाइपेप पर रखा गया। एक दिन बाद ही उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। इलाज के दौरान उन्हें एंटीबाडी, प्लाज्मा, रेमडेसिविर व टासलीजुबैम इंजेक्शन भी दिया गया। उन्हें डीआरडीओ द्वारा तैयार किया गया 2 डीजी पावडर और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प द्वारा उपयोग किया गया काकटेल इंजेक्शन भी दिया गया था। फिर भी वे बच नहीं सके। सचमुच! ज्योतिष सम्राट के नाम से चर्चित महान् तपोधनी, शांतमूर्ति, परोपकारी संत अपना कर्म करते-करते कृतकाम होे गया, कोरोना महामारी से हार गया। उनका देह से विदेह होना आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति है, क्योंकि उन्होंने संसार की असारत का बोध बताया, संयम जीवन का सार समझाया एवं मानवता के उपवन को महकाया।

आचार्य श्री ऋषभचन्द्रजी का जन्म ज्येष्ठ सुदी 7, संवत 2014 दिनांक 4 जून 1957 को सियाना (राजस्थान) में हुआ। आपकी दीक्षा द्वितीय ज्येष्ठ सुदी 10, दिनांक 23 जून 1980, श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ (म.प्र.) में आचार्यदेवेश श्री विद्याचंद्र सूरीश्वरजी ‘पथिक’ के करकमलों से हुई। आपने अपने गुरु से जैन दर्शन के साथ-साथ विशेषतः अध्ययन व्याकरण, न्याय, आगम, वास्तु, ज्योतिष, मंत्र विज्ञान, आयुर्वेद, शिल्प आदि का गहन अध्ययन किया। आपने 40 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिसमें अभिधान राजेन्द्र कोष (हिन्दी संस्करण) प्रथम भाग, अध्यात्म का समाधान (तत्वज्ञान), धर्मपुत्र (दादा गुरुदेव का जीवन वृत्त), पुण्यपुरुष, सफलता के सूत्र (प्रवचन), सुनयना, बोलती शिलाएं, कहानी किस्मत की, देवताओं के देश में, चुभन (उपन्यास), सोचकर जिओ, अध्यात्म नीति वचन (निबंध) आदि मुख्य हैं।
आचार्य ऋषभचंद्रविजयजी का जन्म और जीवन दोनों विशिष्ट अर्हताओं से जुड़ा दर्शन है जिसे जब भी पढ़ेंगे, सुनेंगे, कहेंगे, लिखेंगे और समझेंगे तब यह प्रशस्ति नहीं, प्रेरणा और पूजा का मुकाम बनेगा, क्योंकि ऋषभचंद्र विजय किसी व्यक्ति का नाम नहीं, पद नहीं, उपाधि नहीं, और अलंकरण भी नहीं। यह तो विनय और विवेक की समन्विति का आदर्श था। श्रद्धा और समर्पण की संस्कृति था। प्रज्ञा और पुरुषार्थ की प्रयोगशाला था। आशीष और अनुग्रह की फलश्रुति था। व्यक्तिगत निर्माण की रचनात्मक शैली था और अनुभूत सत्य की स्वस्थ प्रस्तुति था। यह वह सफर था, जिधर से भी गुजरता था उजाले बांटता हुआ आगे बढ़ता था। कहा जा सकता है कि निर्माण की प्रक्रिया में इकाई का अस्तित्व जन्म से ही इनके भीतर था, शून्य जुड़ते गए और संख्या की समृद्ध अक्षय बनती गई।
ऋषभचंद्र विजयजी का अतीत सृजनशील सफर का साक्षी बना। इसके हर पड़ाव पर शिशु-सी सहजता, युवा-सी तेजस्विता, प्रौढ़-सी विवेकशीलता और वृद्ध-सी अनुभवप्रवणता के पदचिन्ह हैं जो हमारे लिए सही दिशा में मील के पत्थर बनते हैं। आपका वर्तमान तेजस्विता और तपस्विता की ऊंची मीनार था जिसकी बुनियाद में जीए गए अनुभूत सत्यों का इतिहास संकलित है। जो साक्षी है सतत अध्यवसाय और पुरुषार्थ की कर्मचेतना का, परिणाम है तर्क और बुद्धि की समन्वयात्मक ज्ञान चेतना का और उदाहरण है निष्ठा तथा निष्काम भाव चेतना का। आपकी करुणा में सबसे साथ सह-अस्तित्व का भाव रहा। निष्पक्षता में सबके प्रति गहरा विश्वास रहा। न्याय प्रवणता में सूक्ष्म अन्वेषणा के साथ व्यक्ति की गलतियों के परिष्कार की मुख्य भूमिका थी। सापेक्ष चिंतन में अहं, आग्रह, विरोध और विवाद का अभाव है। विकास की यात्रा में सबके अभ्युदय की अभीप्सा थी। उनकी मूल प्रवृत्ति में रचनात्मकता और जुझारूपन दोनों था। वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जूझते रहते थे- अपनों से भी, परायों से भी और कई बार खुद से भी। इस जुनून में अपने मान-अपमान की भी प्रवाह नहीं करते। सिद्धांतों को साकार रूप देने की रचनात्मक प्रवृत्ति के कारण मुनियों के लिए ज्यादा करणीय माने जाने कार्यों की अपेक्षा जीवदया, मानव सेवा व तीर्थ विकास में उनकी रूचि ज्यादा परिलक्षित होती थी। जीवदया व मानवसेवा के कई प्रकल्प उन्होंने चला रखे हैं। मन्दिरों के निर्माण एवं जीर्णोद्धार के द्वारा वे न केवल जैन संस्कृति बल्कि भारतीय संस्कृति सुदृढ़ करते रहे हैं। वे गौरक्षा एवं गौसेवा के प्रेरक थे। गौशालाओं के साथ-साथ गौ-कल्याण के अनेक उपक्रम संचालित करते रहते थे।
संवेदना एवं संतुलित समाज रचना के संकल्प के चलते आपके मोहनखेड़ा तीर्थ पर गरीब एवं आदिवासी बच्चों के लिए विद्यालय भी संचालित कर रखा है। जहां सैकड़ों विद्यार्थी ज्ञानार्जन कर रहे हैं। वहां वे नेत्र, विकलांगता, नशामुक्ति, कटे हुए (कुरूप) होठों, कुष्ठ, मंदबुद्धि निवारण आदि के विशिष्ट सेवा प्रकल्प आपके  नेतृत्व में संचालित होते रहेे हैं। अपने गुरु के हॉस्पिटल, गौशाला एवं गुरुकुल आदि के सपनों को आकार देने में जुटे रहें। आपने पांच करोड़ की लागत से श्री महावीर पवित्र सरोवर को निर्मित कर जन आवश्यकता की पूर्ति की है। अलौकिक, अनुपम एवं विलक्षण जैन संस्कृति पार्क को निर्मित कर आपने अपनी मौलिक सोच का परिचय दिया है। जगह-जगह मन्दिरों का निर्माण, तीर्थ यात्राएं निकालना, कार सेवा एवं तीर्थशुद्धि एवं स्वच्छता अभियान तीर्थों की स्थापना आदि अनेक अद्भुत एवं संस्कृति प्रभावना के कार्य आपने करवाएं है। आपमें निर्माण की वृत्ति भी थी व निर्माण की शक्ति भी। राजगढ़ का मानव सेवा हॉस्पिटल, मोहनखेड़ा का नेत्र चिकित्सालय, सहकारी सोसायटियां, अनेक मंदिर व गौशालाएं इसी वृत्ति व शक्ति का परिचायक है। वे कार्य के प्रति अपनी लगन को दूसरे में भी उतार देते थे और ये दूसरे ही पल उनकी शक्ति बन जाते थे।
आचार्य ऋषभचन्द्र विजयजी के उदार और व्यापक दृष्टिकोण का ही प्रभाव है कि आज किसी भी जाति, वर्ग, धर्म, समुदाय या संप्रदाय से जुड़ा व्यक्ति, वह चाहे प्रबुद्ध हो या अप्रबुद्ध उनके करीब आता, उनको पूरे चाव से पढ़ता और सुनता, उनके कार्यक्रमों में सहभागी बनता। उनका व्यक्तित्व और कर्तृत्व इक्कीसवीं सदी के दो दशकों के क्षितिज पर पूरी तरह छाया हुआ था। उनके प्रकल्पों, विचारों व प्रवचनों में हमें कोरी आदर्शवादिता या सिद्धांतवादिता के दर्शन नहीं होते। उनमें हमें प्रयोग सिद्ध वैज्ञानिक स्वरूप उपलब्ध होता है। अपने ज्ञान गर्भित प्रवचनों व साहित्य के माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक एवं नैतिक क्रांति का शंखनाद किया है। वे धर्म को रूढ़ि या परंपरा के रूप में स्वीकार नहीं करते। धार्मिक आराधना-उपासना से व्यक्ति की जीवनशैली और वृत्तियों में बदलाव आए, उनके समग्र जीवनदर्शन का निचोड़ यही है। ऐसे महान् संत का असमय चला जाना, गहरी रिक्तता का आभास करा रहा है।
विश्व-क्षितिज पर हिंसा, युद्ध, विकृत राजनीति, कोरोना महामारी की काली छाया है। मानवीय चेतना का दम घुट रहा है। कारण चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक, आर्थिक हो या धार्मिक, आतंकवाद हो या सांप्रदायिक ज्वालामुखी- ये और ऐसी ही अन्य दर्दनाक घटनाएं हिंसा एवं संकीर्णता की पराकाष्ठा है। आर्थिक असंतुलन, जातीय संघर्ष, मानसिक तनाव, छुआछूत आदि राष्ट्र की मुख्य समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। जन-मानस चाहता है, अंधेरों से रोशनी में प्रस्थान। अशांति में शांति की प्रतिष्ठा किंतु दिशा दर्शन कौन दे? यह अभाव-सा प्रतीत हो रहा था। ऐसी स्थिति में आचार्य श्री ऋषभ का अहिंसक जीवन और विविध मानवतावादी उपक्रम ही वस्तुतः मानव-मानव के दिलो-दिमाग पर पड़े संत्रास के घावों पर मरहम का-सा चमत्कार करने की संभावनाओं को उजागर कर रहे थे, वे मनीषी एवं समाज-सुुधाकर आचार्य ऋषभचन्द्र विजयजी के बारे में सभी कह रहे हैं कि ऋषभचन्द्र विजयजी अब नहीं रहे, मगर धर्म कहता है कि आत्मा कभी नहीं मरती। इसलिये इस शाश्वत सत्य का विश्वास लिये हम सदियों जी लेंगे कि ऋषभचन्द्र विजयजी अभी यही हैं- हमारे पास, हमारे साथ, हमारी हर संास में, दिल की हर धड़कन में।
आचार्य श्री ऋषभचन्द्र विजयजी का व्यक्तित्व बुद्धिबल, आत्मबल, भक्तिबल, कीर्तिबल और वाग्बल का विलक्षण समवाय था। दृढ़-इच्छाशक्ति, आग्नेय संकल्प, पुरुषार्थ और पराक्रम के द्वारा उन्होंने उपलब्धियों के अनेक शिखर स्थापित किए हैं, जो उन जैसे गरिमामय व्यक्तित्व ही कर सकते हैं। दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजी के नेतृत्व में त्रिस्तुतिक श्रीसंघ एवं श्री मोहन खेड़ा महातीर्थ ने विकास की अलंघ्य ऊंचाइयों का स्पर्श किया, उसके नाभि केंद्र मुनि श्री ऋषभचन्द्र विजयजी ही थे। वे भारत की अध्यात्म विद्या और संस्कार-संपदा को पुनरुज्जीवित कर उसे जन-मानस में प्रतिष्ठित करने का भगीरथ प्रयत्न करते हुए चिरनिद्रा में लीन हो गये। ऐसे युग प्रचेता, युग निर्माता, अध्यात्मनायक के महाप्रयाण पर हार्दिक श्रद्धांजलि।  
प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन में इंदौर निवासी युवती की हत्या, का आरोपी युवक हुआ गिरफ्तार

नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन में इंदौर निवासी युवती की हत्या, का आरोपी युवक हुआ गिरफ्तार

03-Jun-2021

नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन में इंदौर निवासी युवती की हत्या, का आरोपी युवक हुआ गिरफ्तार

भोपाल : नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन में इंदौर निवासी एक युवती की हत्या के मामले में शासकीय रेल पुलिस (जीआरपी) भोपाल  एक युवक को गिरफ्तार कर हत्या में प्रयुक्त धारदार हथियार जब्त कर लिया है। मृत युवती की पहचान इंदौर के सुखलिया निवासी 23 वर्षीय मुस्कान हाड़ा के रूप में हुयी है, जो कल रात इंदौर से बिलासपुर जाने वाली नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन में इंदौर से भोपाल जाने के लिए सवार हुयी थी। लेकिन उसकी सागर सोनी नाम के युवक ने सीहोर स्टेशन आने के पहले ही धारदार हथियार से हत्या कर दी। ट्रेन के डी 3 कोच में सवार युवती ने हत्या के पहले अपने भाई को खबर की थी कि पूर्व से परिचित सागर सोनी नाम का युवक ट्रेन में उसका पीछा कर रहा है। इसके बाद भाई ने पुलिस को सूचना दी। लेकिन पुलिस के पहुंचने के पहले ही आरोपी युवती की हत्या की घटना को अंजाम दे चुका था।
 
जीआरपी सूत्रों के अनुसार पुलिस की विभिन्न टीम एक साथ सक्रिय हुयीं और कुछ ही घंटों में भोपाल के बजरिया क्षेत्र निवासी आरोपी युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने बताया कि वह और उसका परिवार पहले इंदौर में ही रहता था। इस दौरान उसकी मुस्कान से मुलाकात हुयी और दोनों के बीच मेलजोल था। दोनों के बीच कुछ विवाद भी हुए। इस वजह से सागर युवती को सबक सिखाना चाहता था। 
 
आरोपी ने बताया कि कल उसे मुस्कान के ट्रेन से इंदौर से भोपाल जाने की सूचना प्राप्त हुयी। वह किसी तरह रास्ते में पड़ने वाले स्टेशन शुजालपुर पहुंचा और ट्रेन में सवार हो गया। वह अपने साथ चाकू लाया था। आरोपी युवती के कोच में भी पहुंच गया। इसी दौरान दोनों के बीच विवाद हुआ और उसने युवती पर चाकू से प्रहार कर उसकी हत्या कर दी और सीहोर स्टेशन पहुंचने के पहले ट्रेन की गति धीरे होने पर वह उतर गया। बताया गया है कि युवती अपनी किसी सहेली से मिलने के लिए भोपाल आ रही थी। 


अस्पताल में भर्ती कोरोना संक्रमित नक्सली कमांडर कोरसा गंगा उर्फ आयतु की मौत

अस्पताल में भर्ती कोरोना संक्रमित नक्सली कमांडर कोरसा गंगा उर्फ आयतु की मौत

02-Jun-2021

खम्मम जिले से लगे तेलंगाना के कोत्तागुड़म अस्पताल में भर्ती कोरोना संक्रमित  छत्तीसगढ़ के  नक्सली कमांडर कोरसा गंगा उर्फ आयतु की मौत हो गई। लंबे समय से ये बात सामने आ रही है कि नक्सली लगातार कोरोना संक्रमण के शिकार हो रहे हैं। आज हुई इस घटना से नक्सलियों में कोरोना संक्रमण फैलने की पुष्टि भी हो गई। नक्सली कमांडर को अस्पताल में भर्ती कराकर लौट रहे तीन अन्य नक्सलियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया है।

नक्सली में कोरोना का खौफ
प्राप्त जानकारी के अनुसार तेलंगाना के कोत्तागुड़म के एसपी सुनील दत्त ने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि मृतक नक्सली कोरसा गंगा उर्फ आयतु उर्फ रमैया का कई दिनों से कैंप में ही इलाज किया जा रहा था। कोरोना संक्रमण के कारण जब उसकी हालत गंभीर हो गई, तो नक्सली उन्हें लेकर तेलंगाना के कोत्तागुड़म अस्तपाल पहुंचे, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। उन्होंने बताया कि नक्सली कैंप में कई नक्सली बीमार पड़े हैं।

वे डॉक्टर के पर्चे के बिना दवाओं का उपयोग कर रहे हैं। तीन गिरफ्तार नक्सलियों के बारे में कोत्तागुड़म एसपी ने बताया कि पुलिस निरीक्षण में सावलम पूज्य, सोदी सीतैया और कुंजा जोगैया को गिरफ्तार किया गया। उन्होंने पूछताछ में अपने आप को नक्सली गिरोह का सदस्य बताया। उनके पास से 10 जिलेटिन की छड़ें, 3 डेटोनेटर टेंडर, 4 बैटरी और एक तार का बंडल जब्त किया गया। कोरोना से मृत नक्सली को अस्पताल छोडक़र लौट रहे 3 नक्सलियों को गिरफ्तार कर जब उनका कोरोना टेस्ट किया गया, तो उनमें से एक नक्सली कोरोना संक्रमित मिला। जानकारी के अनुसार तेलंगाना के कोत्तागुड़म जिले में ही तीनों नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई है। इस बात की पुष्टि तेलंगाना के कोत्तागुड़म एसपी सुनील दत्त ने की है।

पुलिस अधीक्षक दत्त ने कहा कि कई और नक्सली कमांडर हैं, जो कोरोना से संक्रमित हैं। पुलिस ने बताया कि कोरोना संक्रमित मृतक नक्सली का नाम कोरसा गंगा उर्फ आयतु है, जो बीजापुर जिले के गोरना का निवासी है। कोत्तागुड़म मनुगुरु पुलिस ने नक्सली गिरोह के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया है। उन्होंने ये भी बताया कि पांच नक्सली नेता की कोरोना से मौत हो गई है। इसके साथ ही कई नक्सली अभी भी कोरोना से पीडि़त हैं।


विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर सीएमएचओ ने दिखाई यमराज को हरी झंडी

विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर सीएमएचओ ने दिखाई यमराज को हरी झंडी

01-Jun-2021

विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर सीएमएचओ ने दिखाई यमराज को हरी झंडी

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विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर तंबाकू और तंबाकू उत्पाद के सेवन से होने वाली बीमारियों और तंबाकू सेवन से मुक्ति के लियें जागरूकता लाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग द्वारा जागरूकता रथ के साथ-साथ यमराज को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। सीएमएचओ से झंडी मिलते ही यमराज पान दुकान पहुंच गए और वहॉ पर गुटका और तंबाकू उत्पाद के सेवन करने वाले प्रेमियों को पढ़ाया नशा मुक्ति का पूरा अध्याय ।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर मीरा बघेल के निर्देशन और जिला कार्यक्रम प्रबंधक मनीष मेजरवार के मार्गदर्शन में जिले के समस्त विकास खंडों में आयोजित किया गया ।इस अवसर पर  द यूनियन से संभाग समन्वयक प्रकाश श्रीवास्तव भी मौजूद रहे ।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर आयोजित हुई गतिविधि की जानकारी देते हुए ज़िला तंबाकू निषेध प्रकोष्ठ की ज़िला सलाहकार डॉ. सृष्टि यदु ने बताया ‘’तंबाकू निषेध दिवस पर इस बार की थीम 'commit to quit' है, जिसके माध्यम से लोगों को तंबाकू छोड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है । जागरूकता लाने के उद्देश्य सेमुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मीरा बघेल ने जागरूकता रथ को हरी झंडी  दिखाकर रवाना किया । तंबाकू और तंबाकू उत्पाद के सेवन से होने वाले नुकसान से जागरूकता रथ शहर के विभिन्न व्यस्तम चौराहों पर रुक कर लोगों को जागरूक करेगा” ।

साथ ही जिला चिकित्सालय पंडरी में संचालित नशा मुक्ति केंद्र के बारे में भी बताएगा जहां पर लोग पहुंच कर नशा मुक्ति के लिए उपचार करा सकते हैं । उनके नाम और पता गुप्त रखा जाता है सबसे ज्यादा आकर्षण का विषय लोगों के बीच यमदूत और चित्रगुप्त के किरदार में निकले साथियों को पसंद लोगों ने पसंद किया जिसे सीएमएचओ कार्यालय से मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मीरा बघेल ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया ।

 जब यमदूत पान दुकान पर पहुंचे गुटका खैनी और तंबाकू उत्पादों का सेवन करने वाले लोगों को तंबाकू से होने वाली हानियों के बारे में चित्रगुप्त ने बताया चित्रगुप्त ने कहा तंबाकू के सेवन से शरीर के विभिन्न अंग जैसे- मुंह, गला, आहार नली, फेफड़ा, आमाशय, लीवर, किडनी व मस्तिष्क आदि के खराब होने का खतरा रहता है। साथ ही तंबाकू के सेवन से कैंसर, मानसिक रोग व नपुंसकता जैसी गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं।अगर आप इनका सेवन करते हैं तो यमदूत कभी भी आपको अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हैं । सही समय है तंबाकू से तौबा कर लें । ताकि कोरोना संक्रमण से भी बचा जा सकता है।

गुटका प्रेमी संतोष नायक (बदला हुआ नाम) ने बताया,“जब गुटखा खाता हुआ आ रहा था तभी अचानक यमदूत ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा कि हम आ गए हैं । मैं तो एकदम डर ही गया था लेकिन उन्होंने बताया, तंबाकू और तंबाकू से बने उत्पाद हमारी आर्थिक और शारीरिक स्थिति को कितना नुकसान पहुंचाते हैं साथ ही सामाजिक सम्मान को भी काफी नुकसान होता है । गुटका खाने वालों को लोग अपने पास बैठाना पसंद नहीं करते हैं । इसलिए तंबाकू छोड़ो और जिंदगी चुनो”।

नायक कहते हैं कि मैंने कसम खा ली की अब मैं कभी गुटका नहीं खाऊंगा आज मुझे यमराज से सही सीख दी है कि तंबाकू से कितना नुकसान होता है ।डॉ. यदु ने कहा जागरुकता के लियें पंपलेट को बाटा गया। बिना मास्क लगाये लोगों को मास्क का वितरण किया गया। प्रमुख चौक चौराहा जैसे घड़ी चौक, रेलवे स्टेशन, मेकाहारा जिला अस्पताल में सूचना शिक्षा संचार के लियें बैनर लगाया गया ।

विभिन्न गतिविधियों को सफल बनाने में सामाजिक कार्यकर्ता नेहा सोनी और काउंसलर अजय बैस का महत्वपूर्ण सहयोग रहा ।


पुलिस कांस्टेबल से एसीपी तक का सफर : आईपीएस अफसर फिरोज आलम की परिश्रम के मील का पत्थर

पुलिस कांस्टेबल से एसीपी तक का सफर : आईपीएस अफसर फिरोज आलम की परिश्रम के मील का पत्थर

27-May-2021

सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई) पास करने और सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) बनने वाले आईपीएस अधिकारी फिरोज आलम ने यह साबित कर दिया कि दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ किसी भी सपने को साकार किया जा सकता है।

पुलिस कांस्टेबल से एसीपी तक का सफर : आईपीएस अफसर फिरोज आलम की परिश्रम के मील का पत्थर 

हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, फिरोज आलम, जो 2010 में दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के रूप में शामिल हुए थे, इस साल अप्रैल में एसीपी के रूप में फिर से सेना में शामिल हुए।
आलम जिन्होंने UPSC CSE 2019 को क्रैक किया और 645वीं रैंक हासिल की, उन्होंने कहा कि वह ड्यूटी के बाद मिलने वाले हर मिनट का उपयोग करते थे। उन्होंने कहा कि तैयारी के दौरान उनके सहयोगियों और वरिष्ठों ने उनका समर्थन किया है।

कॉन्स्टेबल से एसीपी बनने के अपने सफर के बारे में आगे बात करते हुए उन्होंने कहा कि 2010 में बल में शामिल होने के बाद, उन्होंने अपनी शिक्षा बंद नहीं करने का फैसला किया और यूपीएससी सीएसई को क्रैक करने का लक्ष्य रखा। आखिरकार इसी साल अप्रैल में उन्हें आईपीएस अधिकारी बनने के अपने सपने को साकार करने में सफलता मिली।

अन्य कांस्टेबलों की मदद करने के उद्देश्य से जो यूपीएससी सीएसई को क्रैक करना चाहते हैं, फिरोज आलम ने एक व्हाट्सएप ग्रुप ‘दिल्ली पुलिस फैमिली फॉर यूपीएससी’ शुरू किया है। अड़सठ कांस्टेबल पहले ही समूह में शामिल हो चुके हैं।

एक पुलिस अधिकारी बनने के बाद जो बदलाव वह अनुभव कर रहे हैं, उसके बारे में बोलते हुए, उन्होंने कहा कि कभी-कभी, यह अजीब हो जाता है जब उनके कांस्टेबल दोस्त जो सालों से ‘भाई’ कहते थे, उन्हें ‘सर’ कहते थे।

उल्लेखनीय है कि आलम उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के पिलखुवा कस्बे के एक कबाड़ व्यापारी का बेटा है. अपनी प्रेरक यात्रा के दौरान, वह हमेशा UPSC CSE को क्रैक करने के अपने उद्देश्य पर केंद्रित रहे क्योंकि उन्होंने महसूस किया था कि शिक्षा केवल उनके सपने को पूरा करने में उनकी मदद कर सकती है।

 
 

कोरोना मुक्ति का सशक्त माध्यम है बुद्ध का संदेश

कोरोना मुक्ति का सशक्त माध्यम है बुद्ध का संदेश

26-May-2021

बुद्ध पूर्णिमा- 26 मई 2021 पर विशेष
- ललित गर्ग -

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गौतम बुद्ध एक प्रकाशस्तंभ हैं, बुद्ध पूर्णिमा को उनकी जयंती मनाई जाती है, उनको ज्ञान की प्राप्ति भी पूर्णिमा की चांदनी रात में ही हुई थी और उनका निर्वाण दिवस भी बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। यानी यही वह दिन था जब बुद्ध ने जन्म लिया, ज्ञान पाया, शरीर का त्याग किया था और मोक्ष प्राप्त किया। बुद्ध को ‘तथागत’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है- आत्मज्ञान की साधना से परम सत्य को पाना। ढाई हजार साल पहले उन्होंने जिस ज्ञान को आत्मसात किया, उस ज्ञान का जो उपदेश उन्होंने अपने अनुयायियों में बांटा, उस संदेश की प्रासंगिकता आज भी है और उसमें कोरोना-मुक्ति के सूत्र निहित है। चाहे दुःख कोरोना महामारी का हो या अन्य कोई दुःख-दूसरा व्यक्ति कितना ही बड़ा महाज्ञानी और महात्मा हो, उसे नष्ट नहीं कर सकता। इसके लिये उन्होंने ‘अप्प दीपो भव’ का मंत्र दिया, यानी स्वयं उजाला बनो, दूसरे की बैशाखी से मंजिल तक नहीं पहुंचा जा सकता।
बुद्ध पूर्णिमा न केवल बौध धर्म के अनुयायियों के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिये एक महत्वपूर्ण दिन है। अपनी ऊच्च संतता एवं ज्ञान से बुद्ध सबसे महत्वपूर्ण भारतीय आध्यात्मिक महामनीषी, सिद्ध-संन्यासी, समाज-सुधारक धर्मगुरु बने। उन्होंने न केवल अनेक प्रभावी व्यक्तियों बल्कि आम जन के हृदय को छुआ और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए। हम उन्हें धर्मक्रांति के साथ-साथ व्यक्ति एवं विचारक्रांति के सूत्रधार भी कह सकते हैं। उनकी क्रांतिवाणी उनके क्रांत व्यक्तित्व की द्योतक ही नहीं वरन् धार्मिक, सामाजिक विकृतियों एवं अंधरूढ़ियों पर तीव्र कटाक्ष एवं परिवर्तन की प्रेरणा भी है, जिसने असंख्य मनुष्यों की जीवन दिशा को बदला। उनकी प्रेरणाएं कोरोना महाव्याधि में रोशनी का काम कर रही है। उन्होंने ‘दुःख निरोध’ का उपदेश देते हुए कहा था कि यह संसार दुःखों एवं कष्टों से भरा है, किन्तु दुःखों का अंत संभव है और इसी जन्म में संभव है, जिसे उन्होंने निर्वाण कहा है।
बुद्ध संन्यासी बनने से पहले कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ थे। शांति की खोज में वे 27 वर्ष की उम्र में घर-परिवार, राजपाट आदि छोड़कर चले गए थे। भ्रमण करते हुए सिद्धार्थ काशी के समीप सारनाथ पहुंचे, जहाँ उन्होंने धर्म परिवर्तन किया। यहाँ उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे कठोर तप किया। कठोर तपस्या के बाद सिद्धार्थ को बुद्धत्व यानी ज्ञान की प्राप्ति हुई और वह महान संन्यासी गौतम बुद्ध के नाम से प्रचलित हुए और अपने ज्ञान से समूचे विश्व को ज्योतिर्मय किया। बुद्ध ने जब अपने युग की जनता को धार्मिक-सामाजिक, आध्यात्मिक एवं अन्य यज्ञादि अनुष्ठानों को लेकर अज्ञान में घिरा देखा, साधारण जनता को धर्म के नाम पर अज्ञान में पाया, नारी को अपमानित होते देखा, शुद्रों के प्रति अत्याचार होते देखे-तो उनका मन जनता की सहानुभूति में उद्वेलित हो उठा। वे महलों में बंद न रह सके। उन्होंने स्वयं प्रथम ज्ञान-प्राप्ति का व्रत लिया था और वर्षों तक वनों में घूम-घूम कर तपस्या करके आत्मा को ज्ञान से आलोकित किया। उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को जिस चैतन्य एवं प्रकाश के साथ जीया है, वह भारतीय ऋषि परम्परा के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। स्वयं ने सत्य की ज्योति प्राप्त की, प्रेरक जीवन जीया और फिर जनता में बुराइयों के खिलाफ आवाज बुलन्द की। लोकजीवन को ऊंचा उठाने के उन्होंने जो हिमालयी प्रयत्न किये, वे अद्भुत और आश्चर्यकारी हैं। उन्होंने अपने ज्ञान का सार व्यक्त करते हुए कहा कि हर दुःख की कोई वजह होती है। कोरोना महामारी के विश्वस्तर पर इतने विकराल होने का सबसे अहम कारण मनुष्य की अज्ञानता, भोगवादी जीवनशैली, अनुशासनहीनता एवं विकृत खानपान है। बुद्ध कहते हैं कि जिन चीजों में लोग सुख ढूंढ़ते हैं, उनके मूल में आखिरकार दुःख ही दुःख निकलता है। मौजूदा वक्त में कोरोना संकट के संक्रमण के दौर में भी देखा जाये तो जो व्यक्ति खुद को जितना ज्यादा भोग-विलास, सुविधावाद एवं नशीले पदार्थों में डूबकर सुखों की तलाश में लगा है, उसका अंत उतना ही अधिक दुःखभरा एवं पीड़ादायक होना निश्चित है। इसलिये व्यक्ति को अपनी जीवनशैली को सात्विक एवं नशामुक्त बनाना जरूरी है।
इस तरह संन्यासी बनकर गौतम बुद्ध ने अपने आप को आत्मा और परमात्मा के निरर्थक विवादों में फँसाने की अपेक्षा समाज कल्याण की ओर अधिक ध्यान दिया। उनके उपदेश मानव को दुःख एवं पीड़ा से मुक्ति के माध्यम बने, साथ-ही-साथ  सामाजिक एवं संासारिक समस्याओं के समाधान के प्रेरक बने, जो जीवन को सुन्दर बनाने एवं माननीय मूल्यों को लोकचित्त में संचरित करने में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। यही कारण है कि उनकी बात लोगों की समझ में सहज रूप से ही आने लगी। महात्मा बुद्ध ने मध्यममार्ग अपनाते हुए अहिंसा युक्त दस शीलों का प्रचार किया तो लोगों ने उनकी बातों से स्वयं को सहज ही जुड़ा हुआ पाया। उनका मानना था कि मनुष्य यदि अपनी तृष्णाओं पर विजय प्राप्त कर ले तो वह निर्वाण प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उन्होंने पुरोहितवाद पर करारा प्रहार किया और व्यक्ति के महत्त्व को प्रतिष्ठित किया।
गौतम बुद्ध ने बौद्ध धर्म का प्रवर्तन किया और अत्यन्त कुशलता से बौद्ध भिक्षुओं को संगठित किया और लोकतांत्रिक रूप में उनमें एकता की भावना का विकास किया। इसका अहिंसा एवं करुणा का सिद्धांत इतना लुभावना था कि सम्राट अशोक ने दो हजार वर्ष बाद इससे प्रभावित होकर बौद्ध मत को स्वीकार किया और युद्धों पर रोक लगा दी। इस प्रकार बौद्ध मत देश की सीमाएँ लांघ कर विश्व के कोने-कोने तक अपनी ज्योति फैलाने लगा। आज भी इस धर्म की मानवतावादी, बुद्धिवादी और जनवादी परिकल्पनाओं को नकारा नहीं जा सकता और इनके माध्यम से भेद भावों से भरी व्यवस्था पर जोरदार प्रहार किया जा सकता है। यही बौद्ध धर्म कोरोना संकट में आज भी दुःखी, पीड़ित एवं अशान्त मानवता को शान्ति एवं स्वस्थता प्रदान करने में सक्षम है। ऊँच-नीच, भेदभाव, जातिवाद पर प्रहार करते हुए यह लोगों के मन में धार्मिक एकता का विकास कर रहा है। विश्व शान्ति एवं परस्पर भाईचारे का वातावरण निर्मित करके कला, साहित्य और संस्कृति के विकास के मार्ग को प्रशस्त करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
महात्मा बुद्ध सामाजिक क्रांति के शिखर पुरुष थे। उनका दर्शन अहिंसा और करुणा का ही दर्शन नहीं है बल्कि क्रांति का दर्शन है। उन्होंने केवल धर्म तीर्थ का ही प्रवर्तन ही नहीं किया बल्कि एक उन्नत और स्वस्थ समाज के लिए नये मूल्य-मानक गढ़े। उन्होंने प्रगतिशील विचारों को सही दिशा ही नहीं दी बल्कि उनमें आये ठहराव को तोड़कर नयी क्रांति का सूत्रपात किया। बुद्ध ने कहा -पुण्य करने में जल्दी करो, कहीं पाप पुण्य का विश्वास ही न खो दे। समााजिक क्रांति के संदर्भ में उनका जो अवदान है, उसे उजागर करना वर्तमान युग की बड़ी अपेक्षा है। ऐसा करके ही हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकेंगे। बुद्ध ने समतामूलक समाज का उपदेश दिया। जहां राग, द्वेष होता है, वहां विषमता पनपती है। इस दृष्टि से सभी समस्याओं का उत्स है-राग और द्वेष। व्यक्ति अपने स्वार्थों का पोषण करने, अहं को प्रदर्शित करने, दूसरों को नीचा दिखाने, सत्ता और सम्पत्ति हथियाने के लिए विषमता के गलियारे में भटकता रहता है।
बुद्ध ने जन-जन के बीच आने से पहले, अपने जीवन के अनुभवों को बांटने से पहले, कठोर तप करने से पहले, स्वयं को अकेला बनाया, खाली बनाया। तप तपा। जीवन का सच जाना। फिर उन्होंने कहा अपने भीतर कुछ भी ऐसा न आने दो जिससे भीतर का संसार प्रदूषित हो। न बुरा देखो, न बुरा सुनो, न बुरा कहो। यही खालीपन का संदेश सुख, शांति, समाधि एवं उत्तम स्वास्थ्य का मार्ग है। उन्होंने अप्प दीपो भव- अपने दीपक स्वयं बनने की बात कही। क्योंकि दिन-रात संकल्पों-विकल्पों, सुख-दुख, हर्ष-विषाद से घिरे रहना, कल की चिंता में झुलसना तनाव का भार ढोना, ऐसी स्थिति में भला मन कब कैसे खाली हो सकता है? कैसे संतुलित हो सकता है? कैसे समाधिस्थ हो सकता है? कैसे कोरोना से मुक्ति दिलाने में सक्षम हो सकता है? इन स्थितियों को पाने के लिए वर्तमान में जीने का अभ्यास जरूरी है। न अतीत की स्मृति और न भविष्य की चिंता। जो आज को जीना सीख लेता है, समझना चाहिए उसने मनुष्य जीवन की सार्थकता को पा लिया है और ऐसे मनुष्यों से बना समाज ही संतुलित, स्वस्थ, समतामूलक एवं कोरोनामुक्त हो सकता है। जरूरत है कोरोना मुक्ति एवं संतुलित समाज निर्माण के लिए महात्मा बुद्ध के उपदेशों को जीवन में ढालने की। बुद्ध-सी गुणात्मकता को जन-जन में स्थापित करने की। ऐसा करके ही समाज को स्वस्थ बना सकेंगे। कोरा उपदेश तक बुद्ध को सीमित न बनाएं, बल्कि बुद्ध को जीवन का हिस्सा बनाएं, जीवन में ढालें। प्रेषकः
 
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई0पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92 फोनरू 22727486 मो. 9811051133

 


हिंदू श्मशान गृह में मुस्लिम महिला दाहसंस्कार सहित सभी  व्यवस्था देखने का काम  कर रही हैं !

हिंदू श्मशान गृह में मुस्लिम महिला दाहसंस्कार सहित सभी व्यवस्था देखने का काम कर रही हैं !

24-May-2021

सुबीना रहमान 29 साल की कॉमर्स ग्रेजुएट हैं और उनके पति और आठ साल का बेटा है और वह अब एक ऐसा काम कर रही हैं जिससे ज्यादातर लोग कतराएंगे। वह केरल के त्रिशूर जिले के इरिंगलक्कुडा में एक हिंदू श्मशान में एक श्मशान के रूप में काम करने में व्यस्त हैं।

बढ़ती बेरोजगारी दर और असंभव के बगल में नौकरी पाने के साथ, सुबीना एक की तलाश में थी और उसे पता चला कि स्थानीय हिंदू एझावा समुदाय नियंत्रित श्मशान में एक लिपिक था, इरिंगलक्कुडा में एसएनबीएस समाजम और आवेदन किया। उसे नौकरी मिल गई और वह दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों के लिए एक रजिस्टर रख रही थी, जिसमें दाह संस्कार की संख्या और मृतकों के नाम और विवरण शामिल थे।

हालांकि, वह ऊब गई और शवों का अंतिम संस्कार करने में हाथ आजमाया, शायद केरल में ऐसा करने वाली पहली मुस्लिम महिला।

चूंकि हिंदू रीति-रिवाज महिलाओं को उनके प्रियजनों के दाह संस्कार के दौरान भी श्मशान में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते हैं, इसलिए सुबीना के श्मशान बनने का निर्णय समाज द्वारा अच्छी तरह से स्वीकार नहीं किया गया था। लेकिन वह दृढ़ थी और अपने फैसले पर अड़ी रही। मुस्लिम समुदाय के भीतर से कई आलोचनाएँ हुईं कि उन्हें एक हिंदू श्मशान में श्मशान का काम नहीं करना चाहिए था, लेकिन सुबीना बेपरवाह थी और नौकरी जारी रखी।

सुबीना कहती हैं, ”कोविड से पहले के दिनों में एक या दो लाशें हुआ करती थीं, लेकिन अब दूसरी लहर के दौरान हम हर दिन सात से आठ शवों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं जो इस श्मशान की क्षमता से बाहर है.”
वह आगे कहती हैं, “एक शरीर को साफ करने और उसकी राख पाने में 2 घंटे लगते हैं लेकिन अब हम 14 घंटे काम कर रहे हैं और फिर भी हम इसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं और अक्सर इसे अगले दिन के लिए टाल दिया जाता है। यह वास्तव में दुखद और भयानक स्थिति है क्योंकि महामारी की दूसरी लहर में मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है।”

29 वर्षीय मुस्लिम महिला को समाज के खिलाफ लड़ाई लड़नी है जिसमें करीबी दोस्त, स्कूल और कॉलेजों में सहपाठी, करीबी रिश्तेदार और कई अन्य ज्ञात लोग शामिल हैं और कोई भी उसके फैसले का समर्थन नहीं कर रहा था लेकिन केवल एक व्यक्ति ने उसका समर्थन किया और वह उनके पति कुझीकंदथिल वीटिल रहमान थे।

हालाँकि वह ईमानदार और सीधी थी जब उसने कहा कि वह यह काम अपने परिवार का समर्थन करने के लिए कर रही है न कि महिला सशक्तिकरण के रूप में। उनके पति रहमान, एक राजमिस्त्री, उनके परिवार का एकमात्र सहारा थे, जिसमें उनके पिता, माता और एक 8 वर्षीय पुत्र शामिल हैं।

सुबीना ने कहा कि उसके पिता जो पेड़ काट रहे थे, गिर गए और बिस्तर पर पड़े हैं और उनकी मां एक गृहिणी हैं। उसने कहा कि वह श्मशान में काम करने के दौरान बचाए गए पैसों से अपनी बहन की शादी कर सकती है।

धर्म के नाम पर लोगों के बीच बाधाओं और दीवारों के निर्माण के साथ, सुबीना रहमान का उदाहरण अनुकरणीय है, भले ही उसने स्वीकार किया था कि यह उसका पेशा था।

siyasat.com से साभार 
 

कोरोना योद्धा बिना सुरक्षा किट के :निगम कंगाल

कोरोना योद्धा बिना सुरक्षा किट के :निगम कंगाल

22-May-2021

कोरोना योद्धा बिना सुरक्षा किट के :निगम कंगाल

माकपा पार्षद ने की व्यवस्था, कहा -- माकपा कार्यकर्ता महापौर के साथ मिलकर चंदा इकट्ठा करने के लिए तैयार

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कोरबा। कोरोना महामारी की इस दूसरी भयानक लहर में भी कोरोना योद्धा बिना सुरक्षा किट के काम कर रहे हैं। कोरबा निगम क्षेत्र के अंतर्गत सैकड़ों मितानिनों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को घर-घर जाकर कोरोना पीड़ितों का सर्वे करने और कोरोना से बचाव के लिए जागरूकता फैलाने का काम दिया गया है, लेकिन ये 'कोरोना योद्धा' बिना किसी सुरक्षा किट के मजबूरी में अपनी जान जोखिम में डालकर यह काम कर रहे हैं।

यह कड़वी सच्चाई तब उजागर हुई, जब दसियों कोरोना योद्धा निगम के मोंगरा वार्ड में बिना सेनेटाइजर और बिना मास्क और ग्लव्स के सर्वे के लिए पहुंचे। इन कोरोना योद्धाओं से माकपा पार्षद राजकुमारी कंवर द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि निगम द्वारा उन्हें ये सब सुरक्षा सामग्री नहीं दी जा रही है। तब निगम की इस कंगाली से व्यथित माकपा पार्षद ने तुरत-फुरत इन कोरोना योद्धाओं के लिए स्वयं सुरक्षा किट की व्यवस्था की तथा सर्वे दल के सभी सदस्यों के बीच वितरित किया। इस सुरक्षा किट में थर्मामीटर, साबुन, सेनेटाइजर, मास्क व दस्ताने आदि शामिल है।

कोरोना योद्धाओं के प्रति निगम प्रशासन के संवेदनहीन व लापरवाहीपूर्ण रूख की पार्षद राजकुमारी कंवर ने तीखी निंदा की है तथा कहा है कि निगम प्रशासन न केवल कोरोना योद्धाओं की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहा है, बल्कि इससे पूरे वार्ड में संक्रमण फैलने के खतरे की भी अनदेखी कर रहा है। उन्होंने कहा कि बिना सुरक्षा किट के यदि एक भी कोरोना योद्धा संक्रमित हो जाता है, तो वह अनजाने में अपने पूरे सर्वे दल के साथ ही पूरे गांव को भी संक्रमित करेगा। 

माकपा जिला सचिव प्रशांत झा ने निगम प्रशासन पर कोरोना योद्धाओं की सुरक्षा के लिए उपलब्ध फंड में लाखों की हेराफेरी करने का आरोप लगाया है तथा कहा है कि कोरोना संकट से निपटने के लिए जिम्मेदार निगम प्रशासन खुद कोरोना के फैलाव का काम कर रहा है। उन्होंने मांग की है कि निगम क्षेत्र में कार्यरत सभी कोरोना योद्धाओं को ऑक्सीमीटर व थर्मामीटर के साथ नियमित अंतराल में सुरक्षा किट उपलब्ध कराया जाये, जिसमे सेनेटाइजर, साबुन, मास्क व दस्ताने आदि भी शामिल हो। उन्होंने कहा कि मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरनाक हो चुके इस वायरस के खिलाफ लड़ाई में निगम की कंगाली के तर्क को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस काम के लिए निगम में फंड की कमी को दूर करने के लिए माकपा कार्यकर्ता महापौर के साथ मिलकर चंदा इकट्ठा करने के लिए भी तैयार है।

*प्रशांत झा*
सचिव, माकपा, जिला कोरबा
(मो) 076940-98022


राजीव गांधी किसान न्याय योजना: किसानों को खरीफ सीजन 2020-21 की पहली किश्त का भुगतान आज

राजीव गांधी किसान न्याय योजना: किसानों को खरीफ सीजन 2020-21 की पहली किश्त का भुगतान आज

21-May-2021

प्रदेश के 22 लाख किसानों के खाते में कृषि आदान सहायता (इनपुट सब्सिडी) के रूप में दी जाएगी 1500 करोड़ रूपए की राशि

गोधन न्याय योजना: पशुपालकों से 15 मार्च से 15 मई तक खरीदे गए गोबर के एवज में होगा 7.17 करोड़ रूपए का भुगतान

गौठान समितियों और महिला स्व-सहायता समूहों को दिए जाएंगे 3.6 करोड़ रूपए

दिल्ली से श्रीमती सोनिया गांधी और श्री राहुल गांधी वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए कार्यक्रम में होंगे शामिल

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल कृषि आदान सहायता राशि और गोधन न्याय योजना की राशि का करेंगे ऑनलाईन अंतरण

मंत्रीपरिषद के सदस्यगण, सांसद, विधायक सहित अन्य जनप्रतिनिधि होंगे शामिल

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रायपुर, 

 पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय श्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत खरीफ सीजन 2020-21 की पहली किश्त के रूप में प्रदेश के 22 लाख किसानों को 1500 करोड़ रूपए की कृषि आदान सहायता राशि (इनपुट सब्सिडी) प्रदान की जाएगी। इसके साथ ही गोधन न्याय योजना के तहत राज्य के करीब 72 हजार पशुपालकों को गोबर खरीदी के एवज में 7 करोड़ 17 लाख रूपए तथा गौठान समितियों और महिला स्व-सहायता समूहों को 3.6 करोड़ रूपए की राशि ऑनलाइन अंतरित की जाएगी। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सांसद श्रीमती सोनिया गांधी और सांसद श्री राहुल गांधी की उपस्थिति में यह कार्यक्रम आयोजित होगा। 

 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल अपने मंत्रीमण्डल के सदस्यों के साथ 21 मई को दोपहर 12 बजे अपने निवास कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में सर्वप्रथम स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे, इसके पश्चात् प्रदेश के 22 लाख किसानों को कृषि आदान सहायता राशि की प्रथम किश्त के रूप में 1500 करोड़ रूपए कृषकों के खातों में तथा गोधन न्याय योजना के तहत 15 मार्च से 15 मई तक पशुपालकों से गोबर खरीदी की राशि 7.17 करोड़ रूपए का ऑनलाईन अंतरण करेंगे। इस कार्यक्रम में जिलों से सांसद, विधायक, अन्य जनप्रतिनिधि, किसान और पशुपालक भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ेंगे।

 गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में फसल उत्पादकता को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से 21 मई 2020 को पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय श्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर राजीव गांधी किसान न्याय योजना की शुरूआत की गई है। इस योजना के तहत खरीफ सीजन 2019-20 में पंजीकृत लगभग 19 लाख किसानों को कृषि आदान सहायता के रूप में 5628 करोड़ रूपए की आदान सहायता राशि दी गई है। चार किश्तों में यह राशि किसानों के बैंक खाते में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा अंतरित की गई है।

 मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में बीते 19 मई को आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के हित में कई अहम निर्णय लिए हैं। जिसमें अब खरीफ वर्ष 2020-21 में किसानों से क्रय किये गये धान पर 9,000 रूपए प्रति एकड़ की दर से इनपुट सब्सिडी दी जायेगी। आगामी वर्षाें में भी खरीफ सीजन में धान उत्पादक कृषकों को प्रति वर्ष 9 हजार रूपए प्रति एकड़ की दर से इनपुट सब्सिडी दी जाएगी। 

 इसी तरह सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि वर्ष 2020-21 में जिन किसानों ने समर्थन मूल्य पर धान का विक्रय किया था, वह यदि धान के बदले कोदो कुटकी, गन्ना, अरहर, मक्का, सोयाबीन, दलहन, तिलहन, सुगन्धित धान, अन्य फोर्टिफाइड धान की फसल उत्पादित करते हैं अथवा वृक्षारोपण करते हैं तो उसे प्रति एकड़ 9,000 रूपए के स्थान पर 10,000 रूपए की इनपुट सब्सिडी दी जाएगी। वृक्षारोपण करने वालों को 3 वर्षों तक यह अनुदान मिलेगा। राज्य सरकार ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। जिसके तहत खरीफ वर्ष 2021-22 में धान के साथ ही खरीफ की सभी प्रमुख फसलों मक्का, सोयाबीन, गन्ना, कोदो कुटकी तथा अरहर के उत्पादकों को भी प्रतिवर्ष 9000 रूपए प्रति एकड़ की दर से इनपुट सब्सिडी दी जायेगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने कोदो-कुटकी का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,000 रूपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है।

  मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल 21 मई को छत्तीसगढ़ सरकार की बहुआयामी गोधन न्याय योजना के तहत राज्य के करीब 72 हजार पशुपालकों एवं ग्रामीणों को 15 मार्च से 15 मई तक गोबर खरीदी के एवज में 7 करोड़ 17 लाख रूपए की राशि सीधे उनके खाते में भी अंतरित करेंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि 20 जुलाई 2020 हरेली पर्व के दिन से शुरू हुई गोधन न्याय योजना के तहत राज्य के पशुपालकों एवं ग्रामीणों को अब तक कुल 88 करोड़ 15 लाख रूपए का भुगतान किया जा चुका है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री श्री बघेल गौठान समितियों और महिला स्व-सहायता समूहों को 3.6 करोड़ रूपए की राशि का भी अंतरण करेंगे।


देश में क्रूरता की हदें पार हो रही हैं।

देश में क्रूरता की हदें पार हो रही हैं।

20-May-2021

देश में क्रूरता की हदें पार हो रही हैं। 
देश में सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है जनता की मदद के लिए चुनी जाती है लेकिन शायद अब लगता है कि सरकार ने तय कर लिया है कि ना हम किसी की मदद करेंगे और ना किसी को करने देंगे।
पिछले कुछ दिनों से जो तस्वीरें दिखाई दे रही है उससे तो यही जाहिर होता है कि काम करने वालों को काम नहीं करने दिया जा रहा है हर किसी को शक के दायरे में रखा जा रहा है यानी चोर की दाढ़ी में तिनका। क्रूरता की हदें बढ़ रही है। इंसानियत शर्मसार हो रही है। मानवता चीख रही है।
ताजा मामला भी लखनऊ में सामने आया जब आप पार्टी के ऑक्सीजन युक्त ऑटो सीज कर दिए गए और ड्राइवर और सहायक को थाने पर बैठाया गया। जिसके विरोध में आप कार्यकर्ताओं ने हजरतगंज कोतवाली घेर ली।
आप पार्टी ने लखनऊ में ऑक्सीजन युक्त ऑटो सर्विस फ्री में शुरु की थी। पुलिस कार्रवाई पर सांसद संजय सिंह भड़क गए और कहा कि बीजेपी क्रूर सोच वाली पार्टी है।
उन्होंने कहा कि हमें गरीबों की मदद नहीं करने दिया जा रहा। लेकिन शायद सांसद संजय सिंह को यह नहीं मालूम है या वह यह भूल गए हैं कि इससे पहले भी काम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की गई है चाहे वह पप्पू यादव हों या यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी।इससे पहले गिरफ्तार होने वाले पूर्व सांसद हैं जन अधिकार पार्टी के प्रमुख राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जो मधेपुरा से सांसद रहे हैं। पप्पू यादव ने कुछ दिन पहले छपरा के बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी के क्षेत्र में एंबुलेंस को छिपाकर रखने का मामला उठाया था। और यही बात शायद कुछ लोगों को खल गई। इस प्रकरण में पप्पू यादव के खिलाफ सारण के अमनौर थाने में दो एफआइआर दर्ज हैं। 
जबकि अगर देखा जाए तो कोरोना महामारी की इस विकट घड़ी में पप्पू यादव जरूरतमंद लोगों को ऑक्सीजन, बेड व जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे थे। कई लोगों को इनकी वजह से मदद भी मिली। पटना में पहले तो उन्हें कोविड वार्ड में हंगामा करने व लॉकडाउन के उल्लंघन में हिरासत में लिया गया फिर उन्हें वर्षों पुराने अपहरण के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। पिछले वर्षों में जब भी कोई समस्या आई है बिहार में पप्पू यादव लोगों की सहायता करते देखे गए हैं
क्रूरता की और निर्दयता की और संवेदनहीनता की एक और मिसाल दिल्ली में देखने को मिली जहां दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा  ने इंडियन यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बी वी  से पूछताछ की। श्रीनिवास ने कोरोना महामारी के दौरान लोगों को मदद मुहैया कराई थी। उनके द्वारा की जा रही मदद को लेकर वह काफी चर्चा में भी आ गए थे।
मीडिया खामोश है मीडिया संवेदनहीन हो गया वह भी सरकार से सवाल नहीं कर रहा है कि जो लोग मदद कर रहे हैं उनको क्यों रोका जा रहा है? क्यों परेशान किया जा रहा है? क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है? क्यों पूछताछ की जा रही है?
शायद सरकार ने तय कर लिया है कि ना हम काम करेंगे और ना किसी को करने देंगे। या तो फिर सरकार ने यह सोच लिया है कि काम तो सिर्फ़ हम करेंगे और दूसरों को नहीं करने देंगे भले ही काम नकारात्मक हो।
और विपक्ष तो शायद भारत में शून्य हो चुकी हैं क्योंकि अगर विपक्ष के अंदर ताकत होती हिम्मत होती मजबूती होती तो शायद एक पार्टी देश में इस तरह की हरकतें ना करती।
सरकार को इस बात पर सोचना चाहिए और विचार करना चाहिए कि देश सभी पार्टी और सभी पार्टी के नेताओं को साथ लेकर के चलने से तरक्की करता है भले ही सरकार एक पार्टी की हो लेकिन विपक्षी पार्टियों को साथ में लेकर चलने से देश में उन्नति होती है कोरोना संक्रमण के इस भयानक दौर में अगर जो सरकार कर रही है और उसके अलावा दूसरी पार्टी के नेता अगर व्यक्तिगत रूप से जनता की सहायता कर रहे हैं तो सरकार को ऐसी पार्टियों से नेताओं की सराहना करनी चाहिए।
सैय्यद एम अली तक़वी
लखनऊ  

 


स्वास्थ्य-क्रांति के जनक थे डॉ. के. के. अग्रवाल

स्वास्थ्य-क्रांति के जनक थे डॉ. के. के. अग्रवाल

19-May-2021

स्वास्थ्य-क्रांति के जनक थे डॉ. के. के. अग्रवाल
- ललित गर्ग  -

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देश में कोविड-19 महामारी में एक रोशनी एवं उम्मीद बने डॉ. के. क.े अग्रवाल ने आखिर स्वयं कोरोना संक्रमण से अपनी जान गंवा दी है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य-सेवा का अनूठा इतिहास रचते-रचते 17 मई 2021 को उनका निधन हो गया, उनका निधन न केवल चिकित्सा जगत के लिये, बल्कि राष्ट्र एवं समाजसेवा के क्षेत्र लिये एक बड़ा आघात है, अपूरणीय क्षति है। चिकित्सा जगत के उज्ज्वल नक्षत्र, जनसेवा और स्वास्थ्य जागरूकता के पुरोधा के निधन को हम एक युग की समाप्ति कह सकते हंै। वे असंख्य लोगों के जीवन रक्षक बने, कोरोना महामारी में अग्रणी योद्धा के रूप में उन्होंने अनेक लोगों की जीवन-रक्षा की। वे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्वास्थ्य-क्रांति के जनक थे। कोविड महामारी के दौरान उन्होंने कई वीडियो और शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से जनता को जागरूक करने और 10 करोड़ से अधिक लोगों तक कोरोना रक्षा के सूत्र पहुंचाने का कीर्तिमान स्थापित किया। एक हृदय रोग विशेषज्ञ के साथ डॉ. अग्रवाल हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रमुख भी थे। कोरोना संक्रमित होने के बाद उन्हें नई दिल्ली के अखिल भारत आयुरोलॉजी संस्थान में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था, जहां वे पिछले सप्ताह से वेंटीलेटर की मदद से जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष करते हुए आखिरकार 62 साल की उम्र में उन्होंने अपनी जान दे दी है।
डॉ. कृष्ण कुमार अग्रवाल यानी डॉ. के. क.े अग्रवाल का जन्म 5 सितम्बर 1958 नई दिल्ली में पिता श्री कीमतराय अग्रवाल और मां श्रीमती सत्यवती अग्रवाल के यहां हुआ। आपकी धर्मपत्नी डॉ. वीना अग्रवाल एवं दो बच्चे निलेश और नैना है। आपको 2010 में मेडिकल क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार की तरफ से पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। डॉ. अग्रवाल ने 1979 में नागपुर यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद इसी विश्वविद्यालय से 1983 में एमएस की डिग्री हासिल की। दिल्ली के दरियागंज में प्रारभिक शिक्षा हासिल की। साल 2005 में डाॅ. अग्रवाल को डॉ. बीसी रॉय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है, यह पुरस्कार मेडिकल के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें चिकित्सा से जुड़े अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों से नवाजा गया। वे राष्ट्रीय विज्ञान संचार पुरस्कार से भी सम्मानित हुए। उनका हिन्दी भाषा के प्रति विशेष रुझान रहा एवं उसकी समृद्धि एवं प्रतिष्ठा के लिये व्यापक प्रयत्न किये, उनकी हिन्दी के प्रति की गयी उल्लेखनीय सेवाओं के लिये विश्व हिंदी सम्मान भी प्रदत्त किया गया। उन्होंने पुरातन वैदिक दवाओं और आधुनिक दवाओं के मेलजोल को लेकर कई किताबें लिखी हैं। डॉ अग्रवाल प्रतिभा से भरपूर बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वह सीनियर फिजिशियन, कार्डियोलॉजिस्ट और माइंड बॉडी कंसल्टेंट और एक विश्व स्तरीय क्लिनिकल इको कार्डियोग्राफर, लेखक, एंकर, वक्ता, स्तंभकार, स्वास्थ्य संचारक, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, प्रशिक्षक एवं मोटीवेटर थे। उन्होंने आध्यात्मिक चिकित्सा में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया और 1988 में सैन डिएगो से डॉ. दीपक चोपड़ा के अधीन एक प्रमाणित ध्यान शिक्षक बन गए।

डॉ. के.के. अग्रवाल के जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें। बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वे उनके बीच में ना हों। इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिलों पर छाये रहे। उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आदर्श व्यक्तित्व हैं जिन्हें चिकित्सा, समाजसेवा और सुधारवाद का अक्षय कोश कहा जा सकता है। उनका आम व्यक्ति से सीधा संपर्क रहा। यही कारण है कि आपके जीवन की दिशाएं विविध एवं बहुआयामी रही हैं। डाॅक्टरी पेशे से जुड़े होने के बावजूद आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया। यही कारण है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र एवं कोई भी महत्वपूर्ण चिकित्सा-पद आपके जीवन से अछूता रहा हो, संभव नहीं लगता। आपके जीवन की खिड़कियाँ राष्ट्र एवं समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। इन्हीं खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा के झोंकों का अहसास भारत की जनता सुदीर्घ काल तक करती रहेगी।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी डाॅ. अग्रवाल ने नये-नये प्रयोग एवं अनुष्ठान किये। आपने स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में राष्ट्र को कई मौलिक एवं अभिनव सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉड्यूल दिए हैं। उन्होंने 1991 में पहली बार परफेक्ट हेल्थ मेला का शुभारंभ किया जो दिल्ली में नियमित आयोजित हो रहा है। ‘रन फॉर योर हार्ट’ की अवधारणा भी उन्होंने दी और हार्ट के मजबूत बनाने के लिये दिल्ली की जनता को खूब दौडाया। इन दोनों अवसरों पर भारत सरकार ने राष्ट्रीय डाक स्मारक टिकट जारी किया। उन्होंने 1993 में दिल्ली प्रशासन के साथ मिलकर तालकटोरा गार्डन में परफेक्ट हेल्थ मेला आयोजित किया जिसे बीबीसी ने एशिया में सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम स्वास्थ्य घोषित किया था। भारत सरकार ने बाद में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत इस मॉड्यूल को अपनाया। लाॅयन क्लब नई दिल्ली अलकनंदा की अध्यक्ष रही डाॅ. चंचलपाल ने क्लब के स्वास्थ्य-कार्यक्रमों में उनकी सन्निधि का लाभ दिया। दोनों ही मूलचन्द अस्पताल से जुड़े होने से यह संभव हो पाया।
डॉ. के.के. अग्रवाल एक प्रेरणास्पद एवं रचनात्मक लेखक और चिकित्सा पत्रकारिता में अग्रणी रहें। स्वास्थ्य जागरूकता एवं भारतीय संस्कृति के अनुरूप आध्यात्मिक-योगमय जीवन के लिये उन्होंने समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में जीवंत एवं प्रखर लेखों से योगदान दिया है और स्वास्थ्य पर रेडियो और टीवी वार्ताओं में लगाचार एवं बढ़-चढ़कर भाग लिया है। वह स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे अधिक उद्धृत डॉक्टरों में से एक हैं।  वे एक बहुमुखी उपचारक और एक अध्यात्म उपदेशक थे। उन्होंने चिकित्सा की सभी प्रणालियों को बढ़ावा दिया। उन्होंने सन् 2000 में अपोलो अस्पताल में समग्र चिकित्सा विभाग की स्थापना की। वे नवभारत टाइम्स के कल्पवृक्ष और आनंद योग स्तंभ  और दैनिक जागरण के आध्यात्मिक काॅलम में नियमित रूप से लिखते थे। डीडी न्यूज पर ‘बॉडी माइंड एंड सोल’ पर 52 एपिसोड का एक प्रभावी एवं जीवनोपयोग सिरियल का निर्माण और सह-निर्देशन किया। अनेक प्रमुख एवं राष्ट्रीय टीवी चैनलस् पर वे उत्तम स्वास्थ्य के लिये सलाह देते रहे। उन्होंने ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘कर्म योद्धा’ जैसी फिल्मों के साथ स्वास्थ्य जागरूकता पैदा करने के लिए फिल्म प्रीमियर का उपयोग किया।
डॉ. के.के. अग्रवाल ने एक कर्मयोगी की भांति जीवन जीया। वे स्वास्थ्य-सेवा के क्षेत्र के दुर्लभ व्यक्तित्व थे। उदात्त संस्कार, लोकजीवन से इतनी निकटता, इतनी सादगी-सरलता, इतना संस्कृतिप्रेम, इतना समाजसेवा का संस्कार और इतनी सचाई से समाज निर्माण के संकल्प ने उनके व्यक्तित्व को बहुत और बहुत ऊँचा बना दिया था। वे अन्तिम साँस तक देश की सेवा करते रहे। उनका निधन एक राष्ट्रवादी स्वास्थ्य-सोच के सेवाआयाम का अंत है। वे सिद्धांतों एवं आदर्शों पर जीने वाले व्यक्तियों की श्रृंखला के प्रतीक थे। उनके जीवन से जुड़ी सेवाभावना, विधायक धारणा और यथार्थपरक सोच ऐसे शक्तिशाली हथियार थे जिसका वार कभी खाली नहीं गया। वे सबके प्रिय एवं चेहते थे। जरूरतमंदों की सहायता करते हुए, नये स्वास्थ्य-आयामों को गढ़ते हुए, मुस्कराते हुए और हंसते हुए छोटों से स्नेहपूर्ण व्यवहार और हम उम्र लोगों से बेलौस हंसी-मजाक करने वाले डॉ. अग्रवाल की जिंदगी प्रेरक, अनूठी एवं विलक्षण इस मायने में मानी जाएगी कि उन्होंने जिंदगी के सारे सरोकारों को छुआ। वे समाजसेवी थे तो उन्होंने पर्यावरण व संस्कृति उत्थान की भी अलख जगायी। वे दिल्ली की जनता के लिए हमेशा सुलभ रहते थे। उन्होंने युवावस्था से ही काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की। वे नंगे पांव चलने वाले एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाले समाजसेवियों में थे, उनके दिलो-दिमाग में दिल्ली एवं वहां की जनता हर समय बसी रहती थी। निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया। वे चिकित्सा-जगत के एक रत्न थे। उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने या पद के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। उन्होंने देश में जो स्वास्थ्य-सेवा का रचनात्मक सृजनात्मक संसार रचा, उनकी रोशनी युग-युगों तक पथ-दर्शन करती रहेगी।
प्रेषकः

 

            (ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133


शिक्षा के बहाने स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक।

शिक्षा के बहाने स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक।

18-May-2021

शिक्षा के बहाने स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक।

यूं तो यह ऐसा दौर चल रहा है कि पिछले 1 साल से इंसान की जिंदगी पूरी तरीके से नरक बन गई है इंसान परेशान है स्थिति डांवाडोल है कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या होगा आने वाला समय कैसा होगा। कोरोनावायरस के साथ-साथ महंगाई, रोजगार, व्यवसाय और आर्थिक स्थिति ने इंसान को खून के आंसू रुला दिया है। मगर शायद जिम्मेदारों की आंखों पर गुलाबी रंग का चश्मा चढ़ा हुआ है।
वैसे भी पिछले कुछ सालों से सर्जिकल स्ट्राइक में महारत रखने वाले लगातार सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं। कभी जीएसटी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी नोटबंदी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी महंगाई सर्जिकल स्ट्राइक, कभी किसान सर्जिकल स्ट्राइक, कभी सीएए एनआरसी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी चुनाव सर्जिकल स्ट्राइक, कभी वैक्सीन सर्जिकल स्ट्राइक, कभी चिकित्सा व्यवस्था सर्जिकल स्ट्राइक और अब सरकार ने शिक्षा सर्जिकल स्ट्राइक भी कर दिया है। घुस के मारा।
आज हर इंसान बस एक ही बात को लेकर परेशान है कि उसकी जिंदगी कैसे चलेगी आने वाले समय में उसे किन चीजों का सामना करना पड़ेगा? 2020 में कोरोना संक्रमण के कारण जिन स्थितियों का सामना करना पड़ा था उसे किसी तरह पार पाने की उम्मीद के साथ जनवरी में लोगों के अंदर यह आस जगी थी कि शायद अब स्थिति कुछ बेहतर हो जाए लेकिन मार्च से फिर एक बार स्थिति की पुनरावृत्ति होने से अब लोग परेशान हैं कि अगर स्थिति पूरी तरह से ठीक नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में क्या होगा। 
लोग अपना रोजगार खो देने से, पेट्रोल डीजल का दाम बढ़ जाने से , व्यवसाय खत्म हो जाने से, महंगाई बढ़ जाने से, अपने परिचितों और घरवालों को खो देने से बहुत खराब मानसिक स्थिति में हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में प्राइवेट अनऐडेड स्कूल एसोसिएशन अभिभावकों का मजाक उड़ा रहा है और सरकार भी दबाव में आकर पूरा साथ दे रही है। 
शिक्षा की चिंता वाकई वाजिब भी है। कोरोना वायरस का भारत की शिक्षा पर बड़ा असर पड़ा है। मगर छात्र एवं छात्राएं शिक्षा तभी ग्रहण करेंगी जब जिंदा रहेगी घर में लोग स्वस्थ होंगे जेब में पैसा होगा। तभी अभिभावक भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकते हैं। 
माननीय मुख्यमंत्री महोदय से शिकायत करने के बाद ऑनलाइन क्लास बंद करने का फरमान जारी हुआ था लेकिन प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष द्वारा सरकार को चेतावनी देने और दबाव बनाने के बाद सरकार ने ऑनलाइन क्लास कराने की इजाजत दे दी। जो किसी भी प्रकार उचित नहीं है और निंदनीय है। कायदे से तो सरकार को 30 जून तक पूरी तरीके से ऑनलाइन क्लासेज वगैरह बंद कर देनी चाहिए फिर जुलाई से जब स्थिति नियंत्रण में होती तो ऑनलाइन क्लास प्रारंभ किए जाते।
कुछ निजी स्कूल मीटिंग एप्लिकेशन जैसे जूम, वाइज़ एप्प आदि के जरिए पढ़ा रहे हैं। लेकिन एक सर्वे के अनुसार, हर पांच में से दो माता-पिता के पास बच्चों की ऑनलाइन कक्षाओं के लिए जरूरी सामान ही मौजूद नहीं हैं, बल्कि समस्या ये भी है कि इस समय अधिकतर लोग घर से बैठे ऑफिस का काम कर रहे हैं। ऐसे में या तो उनके बच्चे की पढ़ाई का नुकसान होगा या उनके काम का।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि 6 इंच के मोबाइल पर ऑनलाइन क्लास कराना सिर्फ माता-पिता को धोखा देना है और वह स्कूल इसलिए कर रहा है ताकि अभिभावकों से वह पूरी फीस वसूल सके जैसा कि पिछले साल भी देखने में आया के सभी स्कूलों ने दबाव बनाकर अभिभावकों से फीस वसूल की। जिन अभिभावकों ने फीस नहीं जमा की बहुत से स्कूलों ने उनके बच्चों के परीक्षा परिणाम नहीं दिए और लगातार फीस के लिए कॉल और मैसेज करते रहे यह भी एक शोषण और कष्ट देने का तरीका है। 
ऑनलाइन क्लास के नाम पर हो क्या रहा है खासतौर से कक्षा 5 या कक्षा 6 तक के बच्चों को सिर्फ और सिर्फ फोटो भेज दिए जाते हैं क्वेश्चन के, एक्सरसाइज के, डायग्राम्स के, बच्चे को उसको बनाकर के पोस्ट करना होता है यह किस तरह की ऑनलाइन क्लासेस हैं। 
सरकारों को भी इस चिंता के बारे में पता है लेकिन सही फैसले नहीं ले पा रही है।
कोरोना के संक्रमण काल में लाखों लोगों ने अपनी जान से हाथ धो दिया तो ऐसे में अगर भारत के लगभग 26 करोड़ छात्र चार छह महीना नहीं पढेंगे तो कौन सी कयामत आ जाएगी।
प्राइवेट एसोसिएशन का अध्यक्ष कहता है कि ऑनलाइन सामानों की बिक्री हो रही है खाने के चीजें ऑनलाइन बिक रही हैं तो ऑनलाइन क्लास क्यों नहीं हो सकती! पता नहीं किसने ऐसे संवेदनहीन व्यक्ति को एसोसिएशन का अध्यक्ष बना दिया जिसको इतना भी नहीं पता है कि ऑनलाइन जो खाद्य पदार्थ है जो सामग्रियां मिल रहीं है वह जीविका के लिए जरूरी है इंसान को जिंदा रहने के लिए जरूरी है। चार छः महीने के लिए अगर शिक्षा रोक दी जाएगी तो कयामत नहीं आ जाएगी।
दूसरी बात ऑनलाइन परचेसिंग का जो तरीका है उसमें 4 से 6 घंटा नहीं बैठना पड़ता है कुछ सेकेंड और मिनट में इंसान ऑर्डर कर देता है लेकिन ऑनलाइन क्लासेस जो 4 से 6 घंटे चल रही है उससे बच्चों की आंखों को काफी नुकसान पहुंच रहा है बच्चों में आंखों की रोशनी कम हो रही है सरकार जिम्मेदार है सरकार को इस बात को समझना चाहिए यह प्राइवेट एसोसिएशन के अध्यक्ष और यह एसोसिएशन यह सब तो व्यवसाय कर रहे हैं इनको तो फीस चाहिए यह सब इंसानियत के दुश्मन बन चुके हैं।
सरकार संवेदनशील होने का परिचय दे और इस पर बहुत ग़ौर और फिक्र करके पुनर्विचार करके अभिभावकों के हक़ में फैसला सुनाए।
सैय्यद एम अली तक़वी
 लखनऊ


दिखावा भगीरथ प्रयत्न का,जीरा ऊंट के मुंह में डालने लायक भी नही

दिखावा भगीरथ प्रयत्न का,जीरा ऊंट के मुंह में डालने लायक भी नही

17-May-2021

दिखावा भगीरथ प्रयत्न का,जीरा ऊंट के मुंह में डालने लायक भी नही

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(डॉ जनार्दन यादव,  पॉलिटिकल एडिटर,ब्यूरोक्रेसी टाइम,पूर्व बीएसएफ़,दिल्ली)

:::::::आज के माहौल को देखकर  मंटो की एक लघु कथा याद आ रही है। एक व्यक्ति मंदिर में जाता है। पुजारी कहता है – मांगो, भगवान से मांगो। जो मांगोगे सब मिलेगा। व्यक्ति ने हाथ ऊपर किए, आंखें बंद कीं और भगवान से अपनी मुराद पूरी करने की याचना की। आंख खुलने पर पुजारी ने पूछा-क्या मांगा। व्यक्ति ने सहज भाव से बताया- बहुत भूख लगी है रोटी मांगी, कपड़े नहीं हैं, कपड़े मांगे और रहने के लिए झोपड़ी मांगी। पुजारी तिलमिला गया। गुस्से में बोला। ये भी कोई मांगने की चीज है। अरे मांगना ही है तो धर्म मांगो, आध्यात्म मांगो, भक्ति मांगो। व्यक्ति चुपचाप खड़ा हुआ और जाते-जाते बुदबुदाया-जिसके पास जो नहीं होता है वही तो मांगता है।
आज के कोरोना काल में भी वही स्थिति है। लोग अस्पताल चाहते हैं, दवाएं चाहते हैं, बेड चाहते हैं, ऑक्सीजन चाहते हैं और वेंटिलेटर चाहते हैं। लेकिन पुजारी की तरह कुछ लोग कह रहे हैं कि इसकी बात ही मत करो। सकारात्मक सोचो। सकारात्मक बात करो। आखिर जब लोगों को इलाज नहीं मिल रहा, अस्पताल के चक्कर लगा रहे हैं, लाशें जलाने के लिए श्मशान में इंतजार कर रहे हैं, पैसा न होने के कारण अपनों का अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रहे हैं। लाशों को पवित्र गंगा में बहाने का पाप कर रहे हैं। ऐसे में वे क्या और कैसी सकारात्मक बात करें। पर नहीं बात सकारात्मक करनी है। तुम्हें नहीं सूझ रहा तो सरकार और आईटी सेल विषय बता रहा है। फिलहाल नया सकारात्मक विषय है वैक्सिनेशन। सरकार से लेकर आईटी सेल और उसके भक्तों की फौज यह बात फैलाने में लगी है कि भारत में वैक्सिनेशन किसी भी देश की तुलना में कम नहीं है, बल्कि ज्यादा ही है। भारत सरकार की ओर से आंकड़े जारी कर दिये गए कि भारत ने 17 करोड़ से ज्यादा लोगों का वैक्सीनेशन करके अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। क्या सचमुच ?
आइए अब इस वैक्सीनेशन की ही सच्चाई जानते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सोमवार को बताया कि भारत में 17 करोड़ लोगों को वैक्सीन लग चुकी है। यह बाकी देशों की तुलना में बहुत तेज रफ्तार है।  क्योंकि इस संख्या तक वैक्सीनेशन करने में चीन को 119 दिन लगा तो अमेरिका को 115 दिन। भारत में टीकाकरण अभियान 16 जनवरी को शुरू हुआ था। यानि उन देशों से पहले ही वैक्सिनेशन की इस संख्या तक पहुंच गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के इस आंकड़े को लेकर आई टी सेल और भक्त टूट पड़े हैं। लेकिन कोई भी यह नहीं बता रहा है कि ताजा हालात क्या हैं... अमेरिका, ब्रिटेन और चीन में कितने लोगों या कितने प्रतिशत लोगों का वैक्सीनेशन हो गया है और भारत में कितने प्रतिशत लोगों का हुआ है। आप इसकी उम्मीद भारत सरकार के किसी मंत्रालय, आईटी सेल या भक्तों से न करें। ये आपको मैं बता दे रहा हूं। मेरे पास भी ब्रिटेन, अमेरिका और चीन का ताजा तरीन आंकड़ा नहीं है पर बहुत पीछे का भी नहीं है। भारत में अभी जितने लोगों का वैक्सीनेशन हुआ है वह कुल आबादी का करीब 12 प्रतिशत है। जबकि महीने भर पहले ही ब्रिटेन ने अपनी 29.6 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण कर दिया था। अमेरिका भी उससे बहुत पीछे नहीं था। उसने भी अपनी आबादी का 29.1 प्रतिशत टीकाकरण कर दिया है। अब तो दोनों देशों ने लगभग अपनी आधी आबादी का टीकाकरण कर दिया है। अमेरिका ने मई के अंत तक अपनी पूरी आबादी के टीकाकरण का प्लान बनाया हुआ है। ब्रिटेन में भी जुलाई तक पूरी वयस्क आबादी के टीकाकरण की योजना है। जबकि भारत की क्या योजना है ? आपको मालूम है ?
भारत ने पहले जो लोग कोरोना से लड़ रहे थे-डॉक्टर, नर्सें, स्वास्थ्य कर्मचारी आदि का टीकाकरण किया। फिर 60 वर्ष से ऊपर के लोगों का टीकाकरण शुरू किया। बाद में 45 साल के ऊपर वालों का टीकाकरण किया जाने लगा। और अब सरकार ने 18 साल के ऊपर वालों का भी टीकाकरण का फैसला किया है। सरकार ने 18 साल के ऊपर वालों के टीकाकरण का फैसला तो ले लिया लेकिन हकीकत यह है कि देश में टीके ही नहीं हैं। अभी तक स्थिति ये है कि 60 साल के ऊपर वाले लोगों में से ज्यादातर को टीके की दोनों खुराकें लग चुकी हैं। लेकिन 45 से ऊपर वालों में से अभी काफी लोगों को दूसरे डोज नहीं लगे हैं। 18 से 44 के बीच की उम्र के लोगों में से सिर्फ 84,599 लोगों को ही टीके का पहला डोज लग सका है। यह ऊंट के मुंह में जीरे से भी छोटी संख्या है। टीकों की कमी के कारण उन्हें दूसरा डोज लगवाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मुझे खुद पहला डोज तो आसानी से लग गया जबकि दूसरे डोज के लिए लंबी लाइन का इंतजार करना पड़ा। हमारे एक मित्र उत्तराखंड में हैं। उन्हें अपना दूसरा डोज लगवाने के लिए अपने आवास से 40 किलो मीटर दूर जाना पड़ा और वहां भी लंबी लाइन। उन्होंने 18 साल से ऊपर की कैटेगरी में आने वाली अपनी बेटी का भी पहला डोज लगवाया लेकिन इसके लिए उन्हें अपने घर से दूर 70 किलो मीटर की यात्रा करनी पड़ी। साधन संपन्न हैं इसलिए इन दिक्कतों के बावजूद लगवा लिया। पर देश में कितने ऐस लोग हैं जो 40 किलो मीटर और 70 किलो मीटर दूर जाकर लंबी लाइन में लगकर वैक्सीन लगवा पाएंगे ?
देश की कुल आबादी 138 करोड़ है। इसमें 44 से ऊपर की उम्र वाले 44 करोड़, 18 से 44 के बीच 62 करोड़ और 18 से कम उम्र के 32 करोड़ लोग हैं। 45 से ऊपर वाले 44 करोड़ लोगों में से 16 करोड़ डोज लग चुके हैं। इस तरह इनके लिए 72 करोड़ और डोज की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह 18 से  44 करोड़ लोगों को दो डोज लगाने के लिए 124 करोड़ डोज की जरूरत पड़ेगी। और 18 साल के कम उम्र के 32 करोड़ लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी 106 करोड़ लोगों को एक साल के भीतर अगर टीका लगाना हो तो प्रति दिन 54 लाख लोगों को टीके लगाने होंगे। अगर एक साल में 70 प्रतिशत आबादी को ही टीके लगाने हों तो भी प्रति दिन 40 लाख टीके लगाने होंगे। जबकि इतनी वाहवाही के बावजूद प्रति दिन 20 से 25 लाख ही टीके लग पा रहे हैं। बीच में तो कभी-कभी एक दिन में केवल 10-12 लाख ही टीके लगे। इस तरह देखें तो जिस रफ्तार से अभी टीकाकरण चल रहा है उससे सबको टीका लगाने में दो साल से ज्यादा का समय लगेगा। टीकाकरण को लेकर जिस तेजी की बात की जा रही है, वो पर्याप्त नहीं है बल्कि जरूरत की तुलना में इसे पचास प्रतिशत से भी धीमा माना जाएगा। दूसरी यह कि इतनी वैक्सीन की उपलब्धता ही देश में नहीं है। वेक्सीन की कमी के कारण कई राज्यों ने 18 साल से ऊपर वालों का वैक्सीनेशन करने से मना कर दिया है। इसमें दिल्ली और गैर बीजेपी सरकारें ही नहीं कई बीजेपी शासित राज्य भी शामिल हैं। इसलिए इसे राजनीतिक रंग भी नहीं दिया जा सकता। 
द्वारा पूजा सिंह लखनऊ 


कोरोना महामारी से लड़ने में सही जानकारी और सावधानी ही कारगर  है

कोरोना महामारी से लड़ने में सही जानकारी और सावधानी ही कारगर  है

15-May-2021

कोरोना महामारी से लड़ने में सही जानकारी और सावधानी ही
कारगर  है

No description available.
-कोविडकाल में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पर जोर
- जिलों में संचालित मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत मरीजों को
कर रहे जागरूक

रायपुर.. कोरोना महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग जुटा हुआ है।
महामारी को लेकर हर व्यक्ति कई तरह के मानसिक अवसादों से जूझ रहा है। इसे देखते हुए राज्य
के विभिन्न जिलों में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके तहत जहां
मरीजों की काउंसिलिंग हो रही है तो दूसरी ओर सामान्य लोगों को भी मानसिक अवसाद, तनाव से
निपटने एवं कोविड महामारी से बचने के जरूरी उपायों की जानकारी दी जा रही है।
कोविड पॉजिटिव मरीजों के साथ-साथ पोस्ट कोविड मरीजों को भी विभिन्न माध्यमों से मानसिक
स्वास्थ्य और बीमारी के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसी क्रम में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
अधिकारी डॉ.खेम राज सोनवानी के नेतृत्व में जिला मानिसक स्वास्थ्य कार्यक्रम बलौदाबाजार की
ओर से नवजागरण टार्गेट इंटरवेंशन ऑनलाइन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुआ। कोरोना महामारी
से लड़ने में सहीं जानकारी और सावधानी ही कारगर है। नवजागरण की इस पहल में जिला कोविड
अधिकारी डॉ राकेश कुमार प्रेमी और जिला कार्यक्रम सलाहकार,राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम डॉ
सुजाता पांडेय ने मुख्य रूप से लोगों की शंकाओं और जिज्ञासा रूपी प्रश्नों का उत्तर देकर मानसिक
स्वास्थ्य जागरूकता का प्रयास किया। डॉ. राकेश कुमार प्रेमी का कहना है कि डर और इधर-उधर की
आधा-अधूरी जानकारी की वजह से लोग कोरोना को लेकर ज्यादा डरे हुए हैं। ऐसे समय में उनके मन
से डर को हटाना बेहद जरूरी है। वहीं डॉ. सुजाता का कहना है ऐसे वक्त सकारात्मक और पॉजिटिव
विचार रखना जरूरी है। इससे कोरोना बीमारी पर विजय के साथ-साथ खुद के मानसिक स्वास्थ्य पर
भी जीत हासिल की जा सकती है। उक्त कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य और कोविड से संबंधित एक
महत्वपूर्ण चर्चा हुई जिसमें कोविड के दौरान और पोस्ट कोविड मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चेतना
जगाई गई। उक्त कार्यक्रम को फेसबुक पेज पर भी अपलोड कर लोगों को जानकारी देने का प्रयास
किया गया।
अलग-अलग तरीके से जागरूकता- सीएमएचओ महासमुंद डॉ.एन.के. मनडपे के नेतृत्व में एनसीडी
स्पेशल सेल, जिला अस्पताल महासमुंद में पोस्ट कोविड पेशेंट को मानसिक स्वास्थ्य परामर्श प्रदान

किया जा रहा है। सीएमएचओ डॉ. मनडपे के अनुसार अस्पताल के डॉ. नागेश्वर राव, डॉ.छत्रपाल एवं
काउंसिलर्स की टीम द्वारा पोस्ट कोविड मरीजों को विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक
किया जा रहा है। इसी तरह धमतरी जिला अस्पताल एवं कोविड सेंटर में सीएमएचओ डॉ. डी.के. तुर्रे
के नेतृत्व में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट द्वारा कोविड सेंटर में और टेली काउंसिलिंग भी की जा रही
है।
ऑनलाइन एवं ऑफलाइन काउंसिलिंग बना सहारा- जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत
कोविड पोजिटिव मरीजों एवं पोस्ट कोविड मरीजों की विभिन्न मानसिक समस्याओं का समाधान
विशेषज्ञों द्वारा काउंसिलिंग के माध्यम से किया जा रहा है। जिला अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य
कार्यक्रम से संबद्ध विशेषज्ञ मरीजों को ऑनलाइन ही उनकी समस्याओं और उनके मन के डर,
कोविड के संंबंध में सही जानकारी, सुरक्षात्मक उपायों की जानकारी के साथ ही अवसाद, तनाव को
दूर करने के उपाय सुझा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक रोजाना अमुमन 20-30 मरीजों की ऑनलाइन
काउंसिलिंग भी की जा रही है। वहीं कोविड सेंटरों में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्टों के माध्यम से
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारी की वजह से मन के डर को दूर करने के उपाय सुझा रहे


जीवन का सौन्दर्य एवं शक्ति है परिवार

जीवन का सौन्दर्य एवं शक्ति है परिवार

13-May-2021

अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस, 15 मई 2021 पर विशेष
ललित गर्ग 

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अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस हर साल 15 मई को मनाया जाता है। देश एवं दुनिया को परिवार के महत्व को बताने के लिए यह दिवस मनाया जाता हैं। प्राणी जगत एवं सामाजिक संगठन में परिवार सबसे छोटी इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज के संचालन की कल्पना भी दुष्कर है, इस बात को हमने कोरोना महासंकट में भलीभांति समझा है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य होकर ही अपनी जीवन यात्रा को सुखद, समृद्ध, विकासोन्मुख बना पाता है। उससे अलग होकर उसके अस्तित्व को सोचा नहीं जा सकता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता अनेक परिवर्तनों से गुजर कर अपने को परिष्कृत करती रही है, लेकिन परिवार संस्था के अस्तित्व पर कोई भी आंच नहीं आई। वह बने और बन कर भले टूटे हों लेकिन उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और उसके मूल्यों में परिवर्तन हुआ लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हो लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि एवं जीवन की परिपूर्णता-सार्थकता अनुभव करते हैं। परिवार का महत्व न केवल भारत में बल्कि दुनिया में सर्वत्र है, यही कारण है कि अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस परिवार संस्था को मजबूती देने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य युवाओं को परिवार के प्रति जागरूक करना है ताकि युवा तथाकथित आधुनिक के प्रवाह में अपने परिवार से दूर न हों।
परिवार संस्था अनेक संघर्षों एवं बदलावों से रू-ब-रू होते हुए भी कायम है। अगर हम पुराने युगों की बात करें या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर भी बात करें तो आज की ही तरह पहले भी परिवारों का विघटन हुआ करता था। लेकिन आधुनिक समाज में परिवार का विघटन आम बात हो चुकी है। ऐसे में परिवार न टूटे इस मिशन एवं विजन के साथ अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। परिवार के बीच में रहने से आप तनावमुक्त व प्रसन्नचित्त रहते हैं, साथ ही आप अकेलेपन या डिप्रेशन के शिकार भी नहीं होते, कोरोना जैसी महामारी का मुकाबला करने में सक्षम होते हैं। यही नहीं परिवार के साथ रहने से आप कई सामाजिक बुराइयों से अछूते भी रहते हैं। समाज की परिकल्पना परिवार के बगैर अधूरी है और परिवार बनाने के लिए लोगों का मिलजुल कर रहना व जुड़ना बहुत जरुरी है।

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परिवार दो प्रकार के होते हैं- एक एकल परिवार और दूसरा संयुक्त परिवार। एकल परिवार में पापा- मम्मी और बच्चे रहते हैं। संयुक्त परिवार में पापा- मम्मी, बच्चे, दादा दादी, चाचा, चाची, बड़े पापा, बड़ी मम्मी, बुआ इत्यादि रहते हैं। इस दिवस मानाने की घोषणा सर्वप्रथम 15 मई 1994 को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने की थी। संयुक्त परिवार टूटने एवं बिखरने की त्रासदी को भोग रहे लोगों के लिये यह दिवस बहुत अहमियत रखता है। वास्तव में मानव सभ्यता की अनूठी पहचान है संयुक्त परिवार और वह जहाँ है वहीं स्वर्ग है। रिश्तों और प्यार की अहमियत को छिन्न-भिन्न करने वाले पारिवारिक सदस्यों की हरकतों एवं तथाकथित आधुनिकतावादी सोच से बुढ़ापा कांप उठता है। संयुक्त परिवारांे का विघटन और एकल परिवार के उद्भव ने जहंा बुजुर्गांे को दर्द दिया है वहीं बच्चों की दुनिया को भी बहुत सारे आयोजनों से बेदखल कर दिया है। दुख सहने और कष्ट झेलने की शक्ति जो संयुक्त परिवारों में देखी जाती है वह एकल रूप से रहने वालो में दूर-दूर तक नही होती है। आज के अत्याधुनिक युग में बढ़ती महंगाई और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए संयुक्त परिवार समय की मांग कहे जा सकते हंै।
हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में हम पल रहे हो लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ कर परिवार में परिवर्तित करने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं। भारत गांवों का देश है, परिवारों का देश है, शायद यही कारण है कि न चाहते हुए भी आज हम विश्व के सबसे बड़े जनसंख्या वाले राष्ट्र के रूप में उभर चुके हैं और शायद यही कारण है कि आज तक जनसंख्या दबाव से उपजी चुनौतियों के बावजूद, एक ‘परिवार’ के रूप में, जनसंख्या नीति बनाये जाने की जरूरत महसूस नहीं की। ईंट, पत्थर, चूने से बनी दीवारों से घिरा जमीं का एक हिस्सा घर-परिवार कहलाता है जिसके साथ ‘मैं’ और ‘मेरापन’ जुड़ा है। संस्कारों से प्रतिबद्ध संबंधों की संगठनात्मक इकाई उस घर-परिवार का एक-एक सदस्य है। हर सदस्य का सुख-दुख एक-दूसरे के मन को छूता है। प्रियता-अप्रियता के भावों से मन प्रभावित होता है।
घर-परिवार जहां हर सुबह रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा की समुचित व्यवस्था की जुगाड़ में धूप चढ़ती है और आधी-अधूरी चिंताओं का बोझ ढोती हुई हर शाम घर-परिवार आकर ठहरती है। कभी लाभ, कभी हानि, कभी सुख, कभी दुख, कभी संयोग, कभी वियोग, इन द्वंद्वात्मक परिस्थितियों के बीच जिंदगी का कालचक्र गति करता है। भाग्य और पुरुषार्थ का संघर्ष चलता है। आदमी की हर कोशिश ‘घर-परिवार’ बनाने की रहती है। सही अर्थों में घर-परिवार वह जगह है जहां स्नेह, सौहार्द, सहयोग, संगठन सुख-दुख की साझेदारी, सबमें सबक होने की स्वीकृति जैसे जीवन-मूल्यों को जीया जाता है। जहां सबको सहने और समझने का पूरा अवकाश है। अनुशासन के साथ रचनात्मक स्वतंत्रता है। निष्ठा के साथ निर्णय का अधिकार है। जहां बचपन सत्संस्कारों में पलता है। युवकत्व सापेक्ष जीवनशैली से जीता है। वृद्धत्व जीए गए अनुभवों को सबके बीच बांटता हुआ सहिष्णु और संतुलित रहता है। ऐसा घर-परिवार निश्चित रूप से पूजा का मंदिर बनता है।
परिवार एक संसाधन की तरह होता है। फिर क्या कारण है कि आज किसी भी घर-परिवार के वातायन से झांककर देख लें-दुख, चिंता, कलह, ईष्र्या, घृणा, पक्षपात, विवाद, विरोध, विद्रोह के साये चलते हुए दीखेंगे। अपनों के बीच भी परायेपन का अहसास पसरा हुआ होगा। विचारभेद मनभेद तक पहुंचा देगा। विश्वास संदेह में उतर आएगा। ऐसी अनकही तनावों की भीड़ में आदमी सुख के एक पल को पाने के लिए तड़प जाता है। कोई किसी के सहने/समझने की कोशिश नहीं करता। क्योंकि उस घर-परिवार में उसके ही अस्तित्व के दायरे में उद्देश्य, आदर्श, उम्मीदें, आस्था, विश्वास की बदलती परिधियां केंद्र को ओझल कर भटक जाती हैं। विघटन शुरू हो जाता है। इस बिखराव एवं विघटन पर नियंत्रण पाने के लिये हमने गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में सुखी परिवार अभियान चलाया, जिससे परिवार संस्था को मजबूती देने के व्यापक उपक्रम किये जा रहे हैं।
कोरोना महामारी ने हमें पारिवारिक रिश्तों के महत्व को समझाया है। हमने इस दौरान रिश्तों की अहमियत को गहराई से समझा। लॉकडाउन ने रिश्तों को फिर से बनाने और विशेषकर बुजुर्गों के साथ स्नेह व सहयोग बढ़ाने को प्रेरित किया है। हालांकि भारत में एकल परिवारवाद अभी ज्यादा नहीं फैला है। आज भी भारत में ऐसे कई परिवार हैं जिनकी कई पीढ़ियां एक साथ रहती हैं और कदम-कदम पर साथ निभाती हैं। लेकिन दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ने लगी है। उम्मीद है जल्द ही समाज में संयुक्त परिवार की अहमियत दुबारा बढ़ने लगेगी और लोगों में जागरूकता फैलेगी कि वह एक साथ एक परिवार में रहें जिसके कई फायदे हैं। इंसानी रिश्तों एवं पारिवारिक परम्परा के नाम पर उठा जिन्दगी का यही कदम एवं संकल्प कल की अगवानी में परिवार के नाम एक नायाब तोहफा होगा।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133


अयोध्या के हिंदू बहुल गांव में मुस्लिम धर्मगुरु जीत कर बने ग्राम प्रधान !

अयोध्या के हिंदू बहुल गांव में मुस्लिम धर्मगुरु जीत कर बने ग्राम प्रधान !

12-May-2021

ऐसी घटना में जिसे हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का एक आदर्श उदाहरण माना जा सकता है, एक अकेला मुस्लिम उम्मीदवार उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राजनपुर गाँव के ग्राम प्रधान (ग्राम प्रमुख) के रूप में चुना गया है।

हाफिज अजीमुद्दीन खान रुदौली विधानसभा क्षेत्र में मवई ब्लॉक के गाँव राजनपुर के निर्वाचित ग्राम प्रधान हैं। वह मुख्यतः हिंदू गांव में एकमात्र मुस्लिम परिवार से है।

ग्राम प्रधानों की इस चुनावी लड़ाई में आठ उम्मीदवार थे। हाफिज अजीमुद्दीन एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार थे।

अन्य सात हिंदू उम्मीदवारों ने पीएम आवास योजना के तहत भूमि, पेंशन योजनाओं और घरों के आवंटन का वादा करके चुनाव जीतने की कोशिश की। ग्रामीणों ने अभी भी हाफिज अजीमुद्दीन को वोट दिया, जिसने उसे जीत दिलाई।

चुनाव जीतने के बाद, अजीमुद्दीन ने कहा: “मेरी जीत न केवल गाँव राजनपुर बल्कि पूरे अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम आत्मीयता का एक उदाहरण है।”

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उनके अनुसार, ग्राम प्रधानों के लिए आवंटित सभी धन का उपयोग गाँव के विकास के लिए किया जाएगा। बुनियादी सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी, और मनरेगा के तहत उन सभी को रोजगार प्रदान किया जाएगा।

जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा बताया गया है – गाँव राजनपुर के मूल निवासी 53 वर्षीय राधेश्याम अजीमुद्दीन की जीत से खुश थे।

“अज़ीमुद्दीन की जीत इस गांव और बाकी अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम एकता का संकेत है। जिस दिन अजीमुद्दीन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए पर्चा दाखिल किया, हममें से ज्यादातर ने उनके लिए वोट करने का फैसला किया। ”

COVID-19 प्रोटोकॉल के बाद, राज्य सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों और जिला पंचायत सदस्यों के शपथ ग्रहण समारोह को स्थगित कर दिया गया है।

अध्यक्ष, जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुखों के चुनाव भी स्थगित कर दिए गए हैं।

 
 

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