सियासत :अलग मिथिला राज्य के मांग की  राजनीति

  के डी सिंह
 बिहार की राजनीति में में अक्सर अलग मिथिला राज्य निर्माण की मांग उठती रही है जबकि मिथिला  का अधिकांश हिस्सा नेपाल में चला गया है.  लेकिन मिथिला राज्य की मांग करने वाले लोग मिथिला में उसी तरह है जैसे कोई हाथी रखने वाले जमींदार के पड़पोते सिकड. लेकर अब भी जमींदार होने के अहं में जीते हैं. राजनैतिक स्वार्थो के कारण ही एक वर्ग विशेष द्वारा  अक्सर मिथिला राज्य की मांग की जाती है जिसमें अन्यपिछड़ा वर्ग ,अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यों की  कोई भागीदारी नही होती है।
      बिहार राज्य की वर्तमान संरचना को यदि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्ट्रि से देखा जावे तो इस राज्य के गठन काल में ही जबरदस्त सास्कृतिक षड्यंत्र किया गया है। यहाँ बोली जानेवाली स्थानीय भाषाओं में मगही ,भोजपुरी,मैथिली और अंगिका प्रमुख है।
भोजपुरी भाषी इलाकों की तीन तिहाई हिस्सा उत्तर प्रदेश के पूर्वाचल वाला हिस्सा जबकि मिथिला का अधिकांश हिस्सा वर्तमान नेपाल में है।इसी तरह मूल मगध अर्थात मगही भाषी इलाकों की 10 जिले बिहार में ,8जिले क्षारखण्ड में और दो जिला वर्तमान पश्चिम बंगाल में हैं जहाँ आज भी प्रमुख स्प से मगही भाषा बोली जाती है ' अंगिका का बडा हिस्सा मगही भाषा से प्रभावित है व दोनो मामुली अन्तर है | इसीतरह मैथिली ब्राह्मणों की मैथिली और दलित पिछड़ों की ठेठ मैथिली में भी अंतर है. मिथिला की मांग करने वाले सामान्यतः पूर्व सामंतो  के पड़पोते खुद को सुसंस्कृत बोली से संस्कारित और उस इलाके के दलित पिछड़ों को हेय दृष्टि से देखते हैं. इसी कारण मैथली भाषा और मिथिला राज्य की मांग पर मैथिल ब्राम्हणों का एकाधिकार हैं जिसमें गैर बाम्हण सवर्णो ,      पिछड़ों ,दलितों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी लगभग शुन्य है।राजनैतिक तथा ऐतिहासिक दृष्ट्रि से देखा जाए तो बिहार के मैथिली भाषी क्षेत्रों में समाजवादी दलों के मजबूत पकड़ होने के बावजूद भी मैथिली ब्राह्मण कांग्रेस को तब तक न छोड़ें जब तक की भाजपा हावी नहीं हो गई । इस मांग के पीछे का षड्यंत्रकारी पक्ष यह है कि दरअसल मिथिला की मांग करने वाले असल में ब्राह्मणांचल की मांग कर रहे हैं. लेकिन दिक्कत यह  कि उन क्षेत्रों में भी मंडलधारी  समूह भी भारी संख्या में है और अब दलितो में अम्बेडकरवादी चेतना भी जागृत्त हो गई है। इसी तरह अल्पसंख्यकों की भी जबरदस्त जमावट हो गई है।
 
        मिथिला क्षेत्र से कई नेता बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं। केंद्र में भी दिग्गज मंत्री बने रहे। उनमें  अधिकांश ब्राह्मण ही थे। कथित तौर पर ब्राह्मण लोग अखंड विद्वान विजनरी और न जाने क्या क्या होते है।ऐसी स्थिति मे गंभीर प्रश्न तो यही है कि फिर भी मिथिला का विकास नहीं हुआ?मतलब यह हुआ कि मिथिला क्षेत्र में  नेता अयोग्य हुए। या फिर स्वार्थी और बेईमान थे?कुछ न कुछ तो कारण रहा होगा। जिसके वजह से मिथिला का विकास नहीं हो पाया। तभी तो
मिथिला का या फिर मैथिल समाज का सवाल उठता है। जिसका सीधा राजनैतिक और .सामाजिक  मतलब होता है मैथिल ब्राह्मणों और उसके नेतृत्व का सवाल? जिस का मुख्य उद्देश्य ही होता है ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को साबित करना और संसाधन पर कब्जा जमाना?  सर्वविदित है कि महाकवि    विद्यापति को छोड़कर यह  समाज किसी और को शायद ही कभी याद करता है। यह मिथिला की चौहद्दी कोसी को भी समेट लेगा। लेकिन कोसी की धरती पर पैदा हुए क्रांतिवीर कथाकार को अपना नायक नही मानेगा। वैसे रेणु को ब्राह्मण घोषित करने का चाल चला गया था लेकिन सफलता नही मिली।
                सीता भी मिथिला की ही थी। सीता की शादी उस वक़्त अयोध्या के राजा दशरथ राम से शादी हुई थी। शादी के बाद 14 वर्ष वनवास झेलने के बाद जब सीता अयोध्या लौटी। इसके बाद सीता के ऊपर जनता ने सवाल खड़ा किया तो राम ने अपनी गर्भवती पत्नी को अकेले जंगल मे छोड़ दिया। मिथिला के राजा ने अपनी बेटी की अपमान का बदला लेने के लिए कुछ किया हो। इसका प्रमाण नही मिलता। सीता नैतिकवान महिला थी । उन्होंने भी कभी मिथिला का रुख नही किया। बाल्मीकि ऋषि के आश्रम में जीवन गुजरना स्वीकार किया। फिर भी  लोग आज भी राम जैसा दामाद खोजता है। कथा के अनुसार राम ससुराल में 1 महीना तक रहे थे। उसी परंपरा को आज भी निभाया ' जाता है ।
           राममंदिर अयोध्या में बन रहा है। मिथिला अस्मिताधारी लठैत कभी इस सवाल को भी नही उठाया है कि राममंदिर क्यो बनेगा ? सीता के बिना राम का कोई अस्तित्व है ही नही। लोक परंपरा में भी सीताराम ही प्रसिद्ध है। आखिर चुप्पी के पीछे कोई जातीय दृष्टिकोण भी है क्या ? राम को तो क्षत्रियों ने हथिया लिया। कुर्मी कुशवाहा भी  राम को अपना लकर दादा मानता है। रामायण और महाभारत काल में कहीं भी राजपूत शब्द नही आया है ।फिर भी राम अगर राजपूत थे तो सीता की जाति भी राजपूत होनी चाहिए। लेकिन सीता स्वयंवर में लंका के राजा रावण भी पहुचे थे। जाति और वर्ण उस वक़्त भी किसी न किसी रूप में विद्यमान था और आज भी है। फिर भी सीता के सवाल को लेकर चुप्पी क्या साबित करता है ? क्या मैथिल समाज भी बड़ा ही कॉम्प्लेक्स में जीने वाला समाज है? 
 
 
 
 
 
 
07-Dec-2021

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