लोकतंत्र के स्तम्भ 'पत्रकारिता' पर फिर हमला।

दुखद घटना!
लोकतंत्र के स्तम्भ 'पत्रकारिता' पर एक बार फिर हमला हुआ है। एबीपी टीवी पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव जी की बेहरमी से हत्या कर दी गई है। हालांकि कुछ लोग इसको दुर्घटना का नाम भी दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी बाइक दुर्घटनाग्रस्त हो गई लेकिन मरने से 1 दिन पहले ही उन्होंने पुलिस के आला अधिकारियों को पत्र लिखकर अपनी और परिवार की सुरक्षा की मांग की थी। यह अपने आप में खुद एक कहानी बयान करता है।
प्रतापगढ़ के कटरा मेदनीगंज में एबीपी न्यूज़ चैनल के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव (45) रविवार रात संदिग्ध हाल में मृत पड़े मिले। घटना तब हुई जब वह समाचार कवरेज करके लालगंज से बाइक से घर लौट रहे थे। उनके सिर पर हल्की चोट के निशान मिले हैं। लेकिन देर रात तक यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि उनकी मौत कैसे हुई। खास बात यह है कि एक दिन पहले ही उन्होंने आला पुलिस अधिकारियों को पत्र भेज कर अपनी जान को खतरा बताया था। 
पुलिस ने ट्वीट करके बताया कि उक्त घटना के संबंध में घटनास्थल का निरीक्षण किया जा चुका है, मौके पर गवाहों का ब्यान लिया गया है, शव का पंचायतनामा की कार्यवाही कर पोस्टमार्टम हेतु भेजा जा रहा है, अपर पुलिस अधीक्षक पूर्वी स्थानीय पुलिस बल के साथ मौके पर मौजूद हैं, मामले की जांच/विधिक कार्यवाही की जा रही है।
लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या लोगों की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि जो जिसको चाहे मार देता है और पुलिस तथा सरकार के पास जांच बैठाने के अलावा कोई काम नहीं है।
प्राप्त जानकारी में कहा गया है कि प्रतापगढ़ में शराब माफिया के चेहरे पर से नकाब हटाने के बाद पत्रकार को धमकी दी जा रही थी। शराब माफिया पत्रकार से नाराज चल रहे थे। 
सवाल फिर उभर के सामने आता है कि सरकार शराब और शराब माफिया को इतना बढ़ावा क्यों देती है सिर्फ पैसा कमाने के लिए शराब के व्यवसाय को बढ़ावा क्यों दिया जाता है क्यों नहीं शराब की सारी दुकानें बंद कर दी जाती है जिससे शराब माफियाओं की कमर टूट जाए।क्या शराब माफिया भी सरकार में नेता है या किसी नेता का खास है?  
यहां फिर एक सवाल कि क्या मीडिया और पत्रकारिता अपना जमीर खो चुकी है कि वह अपने साथी की मौत के खिलाफ भी आवाज नहीं उठा सकते? सवाल यह भी है क्या अब भी पत्रकार और चैनल खामोश रहेंगे? 
मगर इस वक्त की सच्चाई यह है कि अगर कोई और सरकार होती तो मीडिया ने अब तक मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा मांग लिया होता और आरोपी जेल में होता। परन्तु अंधभक्तों की सरकार है सब खामोश हैं।
देश और प्रदेश में ब्यूरोक्रेसी बेलगाम है हर जगह, कोई किसी की नहीं सुनना चाहता बस अपनी सुनाना चाहते हैं, कोई मन की बात करता है कोई धन की बात करता है कोई गन की बात करता है। 
कहां चली गई वह ईमानदारी कहां चला गया वह जोश। वह पुराना दौर याद आता है, जब एक पत्रकार शब्द से जिम्मेदारों की पैंट गीली हो जाया करती थी। काश मीडिया और पत्रकारिता में काम करने वालों की आत्मा जाग जाए और फिर से वही दौर एक बार फिर से आ जाये।
बहरहाल इस घटना पर जितना दुख प्रकट किया जाए कम है। क्योंकि एक इंसान की हत्या से पूरा घर उसका उजड़ गया। लेकिन अफसोस वर्तमान समय में कुछ नहीं हो सकता है बस चिट्ठी जारी हो जायेगी, कि हम इस  घटना की निंदा करते हैं....बात खत्म
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
शिक्षाविद एवं पत्रकार
uritlucknow2016@gmail.com

 

15-Jun-2021

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