लेख : एम.एच.जकरीया 

छत्तीसगढ़ में राहुल गाँधी का दौरा बहुत से मायनों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिये कई सारे सवाल छोड़ गया है ?  की छत्तीसगढ़ में काँग्रेस का मुख्य प्रतिद्वंदी कौन है ? भा.ज.पा या अजित जोगी की जोगी कांग्रेस, क्योंकि जिस तरह से काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भाजपा को दर किनार कर के प्रदेश कांग्रेस के जिम्मेदार लोगो के द्वारा अजित जोगी के क्षेत्र में राहुल गांधी जी की सभा का आयोजन किया जाना क्या राष्ट्रीय अध्यक्ष को सीधे जोगी परिवार से भिड़ाने की जुगत तो नहीं थी खैर जो भी हो लेकिन मरवाही की उस सभा से राहुल गांघी जी की शख्सियत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, क्योंकि मरवाही विधानसभा क्षेत्र की दोनों सभाओं में आने वाले तो कांग्रेसी विचारधारा के लोग ही थे या राहुल गांघी जी को देखने औऱ सुनने आई भीड़ थी ?

 जिस तरह से कांग्रेस के लोकप्रियता का ग्राफ इन प्रदेश के नेताओं के कारण गिरता जा रहा है उसका ताजातरीन उदाहरण कर्नाटक से बेहतर समझा जा सकता है, छत्तीसगढ़ में होने वाले आगामी  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कितनी मज़बूती के साथ चुनावी समर में कूदती है  ये तो आने वाला समय ही बताएगा.  लेकिन, यह छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय ज़रूर बना हुआ है की काँग्रेस का असली प्रतिद्वंदी कौन है भा.ज.पा या जोगी जनता कांग्रेस ?

जनता जानती भी है और अच्छे से समझती भी हैं और प्रदेश के कई बड़े दिग्गज नेता भी दबी जुबान से कह रहे है की राहुल गाँधी जी की सभा मरवाही में नहीं होना था अब ये काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांघी जी को तय करना है कि छत्तीसगढ़ के इस दौरे में जो हुआ वो कितना उचित - था और कितना अनुचित इसका नतीजा तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन उसी दिन अजित जोगी की सभा का होना और जन सैलाब का उमड़ना राहुल गांधी जी को सीधे जोगी जी से भिड़ाने वाली गुस्ताखी ही कही जा सकती है, क्योकि काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को क्या इतने से छोटे क्षेत्र  में सभा करना कितना ज़रूरी था उनकी सभा छत्तीसगढ़ में अन्यत्र कही भी हो सकता था, क्योंकि सरगुजा में हाल ही में आदिवासी समाज के पत्थलगड़ी का ताजातरीन मामला एक मुद्दा बना हुआ था ये सभा वहाँ भी किया जा सकता था जो की आदिवासियों का राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन सकता था.

क्या ये बात काँग्रेस के प्रभारी पी.एल. पुनिया नहीं जानते थे कि अभी छत्तीसगढ़ में क्या राजनीतिक मुद्दा बेहतर होगा या जान बूझकर अजित जोगी परिवार से सीधे भिड़ाने की क्यों कोशिश की गई ? 

 अभी हाल ही में कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को जिस तरह से JDS से समझौता करना पड़ा और जिस तरह से सत्ता गंवानी पड़ी है उससे तो सबक ले सकते थे " राजनीति में विरोधी पार्टी से दुश्मनी करो लेकिन इतनी ही करो की दोस्ती की इतनी गुंजाइश रहे  की आगे जब मिले तो शर्मिंदा ना हों" "  अब ये अलग बात है कि प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष की निजी दुश्मनी काँग्रेस के लिये इस चुनाव में कहीं काल ना बन जाये ।

ये जग जाहिर है, की छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के समय से प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष महोदय का जोगी जी से नहीं बनता है,  और मध्यप्रदेश के कथित उनके राजनीतिक आका की भी जोगी जी से खुन्नस रही हैं, और उन्ही के इशारों पर ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का नेतृत्व तय होता रहा है, अब ये अलग बात है कि गोवा में काँग्रेस के मात खाने के बाद उनके आका नेपथ्य में चले गए हैं। 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को इसका नतीजा आज तक भुगतना पड़ रहा है । क्योंकि झीरम घाटी में कांग्रेस के सभी नेता शहीद हो गए और काँग्रेस का नेतृत्व लगभग शून्य हो गया था, अब बचे हुए अन्य नेताओं को काँग्रेस का नेतृत्व मिला जो संगठन और कार्यकर्ताओ को सम्भाल नहीं पा रहे है, इससे बेहतर अध्यक्ष तो चरणदास महन्त ही है जो छत्तीसगढ़ की राजनीति में पकड़ रखते हैं और कार्यकर्ताओ की नब्ज को ठीक से पहचानते तो है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें सही ढंग से सम्हलने का समय नहीं मिला जिसके चलते काँग्रेस सत्ता से दूर हो गई लेकिन वोटों का आंकलन किया जाए तो काँग्रेस का प्रदर्शन 2013 में बेहतर था ।

 

21-May-2018

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