खुलासा पोस्ट पत्रिका का लेख 

हवस की शिकार होती मासूमियत जो की जानती भी नहीं हैं कि उसके साथ क्या हुआ है? हमारे देश में नारी को शक्ति के अनेक रूपों में पूजा जाता है, उसी भारत देश मे स्त्रियों और अबोध बचपन पर इतना वीभत्सता और घिनौना कृत क्यों हो रहा है ? अब तो महिलाओं के साथ साथ अब मासूम अबोध बालिकाओं पर भी यौन शोषण देश में लगातार बढ़ता ही चला जा रहा है जो निश्चित रूप से गम्भीर चिंता का विषय है,  आखिर वासना की हवस इतना अधिक क्यों बढ़ गया हैं ? समाज में बढ़ती अश्लीलता और आसानी से अश्लील क्लिप उपलब्ध होना इन घटनाओ के जिम्मेदार हैं, हाल ही में घटित अनेकों घटनाएं इनके उदाहरण के रूप में देखें जा सकते हैं। ऐसी घटनाओं के कारणों पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत हैं,  और इस बात पर भी सोचना होगा कि फाँसी की सजा का ऐलान कर देंने से क्या ये घटनाएं रुक जाएँगी ?

जबकि मासूम बच्चियां जिस यौन शोषण की शिकार हो रही हैं उसका कर्ता-धर्ता तो पुरुष ही है . ‘बाल यौन शोषण’  का एक प्रकार है जिसमें एक वयस्क या बड़ा किशोर अपने अपने यौन सुख के लिये एक बच्चें का यौन शोषण करता है, जितना घृणित ये परिभाषा से लग रहा है, वास्तविकता में भी इतना ही शर्मनाक है |  भारत भी उन कुख्यात देशों में आता है जहाँ मासूम बच्चों के साथ दुराचार बड़े पैमाने पर होता है। यौन शोषण के सबसे ज़्यादा मामले जो नज़र में आये हैं उसमें ज़्यादातर में घर के पुरुष/रिश्तेदार, टीचर्स यहाँ तक की कई बार पिता भी ज़िम्मेदार पाये गए है।

अकेला बुजुर्ग बच्चों पर यौन अत्याचार करने वाला सबसे बड़ा शिकारी होता है। बच्चों को लात मारना, बहिष्कार करना, खरोंच करना, किसी कमरे में बन्द करना, उनके स्किन को काटना,कान खींचना, बच्चों को असुविधाजनक स्थिति में रहने के खातिर दबाव डालना, जलाना, बच्चों के मुंह को साबुन से धोना या उन्हें गर्म मसालों को निगलने के लिए मजबूर करना आदि शारीरिक शोषण के अंतर्गत आते हैं

बाल यौन शोषण हमारे समाज द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक बुराईयों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित बुराई है. इसकी उपेक्षा के कारण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही है. इस पर ध्यान देने की जरुरत है कि इस बुराई के बहुत से आयाम है जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है. बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है. भारत में बाल यौन शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता क्योंकि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने पर परिवार खुद को असहज महसूस करता है,  इसके बारे में एक सामान्य धारणा है कि, “ऐसी बातें घर की चार-दिवारी के अन्दर ही रहनी चाहिये.” बाल यौन शोषण की बात के सार्वजनिक हो जाने पर परिवार की गरिमा के खराब होने के बारे में लगातार भय बना रहता है.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2007 में नेशनल स्टडी ऑन चाइल्ड एब्यूज-इंडिया 2007 के आँकड़े आँखें खोलने के लिए काफी हैं। इसके मुताबिक देश भर में 53.22 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी रूप में यौन अत्याचार के शिकार हो जाते हैं। जागरूकता इस समस्या का सबसे बड़ा इलाज है। विडंबना यह है कि हर साल विश्व बाल यौन अत्याचार दिवस आता है और चले जाता है लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं होती।

एमवाय अस्पताल में मनोरोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वीएस पाल ने बताया कि बचपन में हुए यौन अत्याचार के जख्म जिंदगी भर नहीं भरते। ये दोनों केसेस उदाहरण भर हैं लेकिन इलाज के लिए आने वाले अधिकांश मनोरोगी ऐसी ही किसी न किसी समस्या से ग्रस्त पाए जाते हैं। हम यह स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि भारत में ऐसा भी होता है लेकिन सच्चाई महिला एवं बाल मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन से उजागर हो रही है। पालकों को अपने बच्चों के प्रति इस दृष्टिकोण से भी जागरूक होना चाहिए।

बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध लंबे समय से सामाजिक चिंता का विषय रहे हैं। लेकिन तमाम अध्ययनों में इन अपराधों का ग्राफ बढ़ने के बावजूद इस दिशा में शायद कुछ ऐसा नहीं किया जा सका है, जिससे हालात में सुधार हो। इन जटिल एवं संकटग्रस्त होती स्थितियों का समाधान न होना, सरकार की असफलता को भी उजागर करता है। भले ही सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अनेक बार चिंता जताई गई, समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने के दावे किए गए। मगर इस दौरान आपराधिक घटनाओं के शिकार होने वाले मासूमों की संख्या में कमी आने के बजाय और बढ़ोतरी ही होती गई।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के मुकाबले 2016 में बच्चों के प्रति अपराध के मामलों में ग्यारह फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें भी कुल अपराधों के आधे से ज्यादा सिर्फ पांच बड़े राज्यों- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में हुए। सबसे ज्यादा मामले अपहरण और उसके बाद बलात्कार के पाए गए। बच्चों के खिलाफ अपराधों में यौन शोषण एक ऐसा जटिल पहलू है, जिसमें ज्यादातर अपराधी पीड़ित बच्चे के संबंधी या परिचित ही होते हैं।

यद्यपि, भारतीय दंड संहिता, 1860, महिलाओं के खिलाफ होने वाले बहुत प्रकार के यौन अपराधों से निपटने के लिये प्रावधान (जैसे: धारा 376, 354 आदि) प्रदान करती है और महिला या पुरुष दोनों के खिलाफ किसी भी प्रकार के अप्राकृतिक यौन संबंध के लिये धारा 377 प्रदान करती है, लेकिन दोनों ही लिंगों के बच्चों (लड़का/लड़की) के साथ होने वाले किसी प्रकार के यौन शोषण या उत्पीड़न के लिये कोई विशेष वैधानिक प्रावधान नहीं था जिसे वर्तमान सरकार ने मौत की सजा में बदलने का प्रस्ताव ला रही है । वैसे वर्ष 2012 में संसद ने यौन (लैंगिक) अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 के जरिये इस सामाजिक बुराई से दोनों लिंगों के बच्चों की रक्षा करने और अपराधियों को दंडित करने के लिए एक विशेष अधिनियम बनाया। इस अधिनियम से पहले, गोवा बाल अधिनियम, 2003 के अन्तर्गत व्यवहारिकता में कार्य लिया जाता था। इस नए अधिनियम में बच्चों के खिलाफ बेशर्मी या छेड़छाड़ के कृत्यों का अपराधीकरण किया गया है।

01-May-2018

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