आजादी का अमृत महत्सव- मुख्तार अहमद अंसारी का जीवन और सेवाएं

मुख्तार अहमद अंसारी का जन्म 25 दिसंबर, 1880 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के यूसुफपुर-मुहम्मदाबाद शहर में हुआ था। वह एक भारतीय राष्ट्रवादी और राजनीतिक नेता थे, और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के पूर्व अध्यक्ष थे। वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक हैं। वह 1928 से 1936 तक इसके चांसलर भी रहे।

            उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा विक्टोरिया स्कूल से प्राप्त की उसके बाद अंसारी और उनका परिवार हैदराबाद चला गया। जिसके चलते अंसारी साहब ने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की डिग्री हासिल की और स्कॉलरशिप पर इंग्लैंड चले गए। जहां से उन्होंने 1905 में एम.डी और एम.एस. की डिग्री प्राप्त किया। 1910 में, अंसारी साहब ने अपने शोध प्रबंध के लिए एडिनबरा विश्वविद्यालय से सिफलिस के इलाज के लिए मास्टर ऑफ सर्जरी (सी.एच.एम) प्राप्त किया। वह आला दर्जे के छात्र थे, और लंदन के लॉक हॉस्पिटल और चीयरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में काम करते थे। वह सर्जरी के एक भारतीय अलमबरदार (अग्रणी) थे, उनके काम के सम्मान में आज भी लंदन के चीरिंग क्रॉस अस्पताल में एक अंसारी वार्ड है।

            1921 से 1935 तक, अंसारी साहब ने प्रसिद्ध मूत्र रोग विशेषज्ञों से मुलाकात के लिए विएना, पेरिस, ल्यूसर्न (स्विट्जरलैंड) और लंदन की यात्रा की, जिसमें रॉबर्ट लिक्टेनस्टर्न, यूजीन स्टीनच और सर्ज वोरोनोव शामिल हैं। जिन्होंने जानवरों के अंडकोष का प्रदर्शन मनुष्यों पर प्रत्यारोपण करने के अग्रणी थे।  अपने जीवन के अंतिम समय में, अंसारी साहब ने 700 से अधिक ग्राफ्टिंग ऑपरेशन किए, जिनमें से 440 को सावधानीपूर्वक रिकॉर्ड किया गया। इन अनुभवों से उन्होंने अपनी पुस्तक रीजेनरेशन ऑफ मैन प्रकाशित की, जिसे उन्होंने अपने करीबी दोस्त महात्मा गांधी के साथ साझा किया।

            राष्ट्रवादी गतिविधियाँः 1898 में, जब मद्रास में एक छात्र, अंसारी साहब ने अपनी पहली अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक में भाग लिया, जिसकी अध्यक्षता आनंद मोहन बोस ने की, और 1927 में जब मद्रास में फिर से बैठक हुई तो अंसारी साहब ने बैठक की अध्यक्षता की।

            डॉ. अंसारी इंग्लैंड प्रवास के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। और वापस दिल्ली आकर वह भारतीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों में शामिल हो गए। उन्होंने 1916 के लखनऊ समझौते पर बातचीत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1918 और 1920 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

            अंसारी ने 1927 के सत्र के दौरान ए.आई.सी.सी. के महासचिव साथ साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कई बार कार्य किया। अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव समिति के सदस्य में से थे और 1927 में इसके संस्थापक हकीम अजमल खान की मृत्यु के तुरंत बाद दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के चान्सलर (कुलधिपति) के रूप में भी कार्य किया।

            अंसारी साहब एक मोहल्लाती मकान में रहते थे, जिसे दार-उस-सलाम या शांति का घर कहा जाता है। महात्मा गांधी जब दिल्ली आते थे, तो वे अक्सर अतिथि होते थे, और यह घर कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों के लिए एक नियमित आधार था। अंसारी साहब की मृत्यु 1936 में मिसौरी से दिल्ली जाने के दौरान ट्रेन में दिल का दौरा पड़ने से हुई। उन्हें दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के परिसर में दफनाया गया है।

            अंसारी साहब के परिवार के सदस्य 1947 में विभाजन के बाद भारत में ही रहे और स्वतंत्र भारत में राजनेता बन गए। वे जीवन भर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। और इसके लिए उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लेकिन बहुत जल्द उनका समय समाप्त हो गया और 10 मई, 1936 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। यदि वे अधिक समय तक रहते, तो भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में और प्रगति करता। लेकिन यह सच है कि एक दिन सभी को जाना है।

             देश के महान नेताओं में से एक जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की आजादी और विकास के लिए समर्पित कर दिया। आज बहुत कम लोग उन्हें याद करते हैं और जानते हैं। न ही सरकार आने वाली पीढि़यों को उनके बारे में जानकारी देने के लिए कोई विशेष पहल कर रही है। यहां तक कि कांग्रस पार्टी केवल खाना पूर्ती के लिए कांग्रस कार्यालय में रसमन आयोजन करते है। न उनके  बारे में किसी अखबार में विज्ञापन देते हैं, और न ही लोगों की जहन साजी के लिए कोई कदम उठाती है. आज हमें उनकी सेवाओं से सीखने की जरूरत है। शिक्षा के क्षेत्र से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक, उन्होंने जो बलिदान दिए, समाज को शिक्षा और विकास के क्षेत्र में इन्हें अपना आदर्श बनाना चाहिए। अवाम को जागरूक करने के शिक्षा के लिए तैयार करने की जरूरत है। क्योंकि जब तक हम शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति नहीं करेंगे तब तक समाज और हमारा देश विकसित नहीं हो सकता।

             इस संबंध में, हम भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से उनके गृहनगर और गाजीपुर जिले में एक मेडिकल कॉलेज, शोध संस्थान खोलने और उनके नाम पर एक केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग करते हैं, और उन्हें उनकी सेवाओं के योग्य उनको याद किया जाए ये भी मांग करते है।

24-Dec-2021

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