लेख : एम.एच.जकरीया (khulasapost magazine article)

आज लोकतंत्र में नेता मदारी और जनता मूक दर्शक बनकर तमाशा देख रही है, और ये मदारी बनाम नेता नित् नये-नये पैतरे दिखा कर जनता को हर दिन हसीन सपने दिखा कर बेवकूफ बना रहे है ! भारत में राजनीतिक नेता होना बड़े काम की चीज है आप जिंदगी भर भूखे नहीं मरेंगे। इसकी गारंटी कोई भी आंख बंद कर के दे सकता है। अगर आप किसी कद्दावर नेता के पोते-सोते हैं तो मानना पड़ेगा कि आप सोने का चमच्चा मुंह में लेकर पैदा हुए हैं।

आजादी के 70 वर्ष बाद भी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर वंशवाद की बेल अमरबेल कि तरह पनप रही है और भारतीय लोकतंत्र रूपी बटवृक्ष कि जीवन रेखा को निचोड़ दे रही है। भारतीय राजनीति में ये महत्वपूर्ण है कि आप किसके बेटे है या दामाद या बेटी, भतीजे हैं।

भारत के संविधान के अंतर्गत विधायिका और भारतीय नेतृत्व आता है, जो देश के नागरिकों के वोटों  के आधार पर जन प्रतिनधियों को चुनने का अधिकार देता है और यही जन-प्रतिनिधि जब चुन लिए जाते है तब सांसद और विधायक बनकर नियम-कानून बनाने का काम करता है, लेकिन वास्तविक में क्या ऐसा हो रहा है ! भारतीय संविधान में सभी व्यक्तियों को बराबर के अधिकार प्राप्त हैं पर दलितों, पिछड़ों, उपेक्षितों के साथ ही स्त्रियों को विशेषाधिकार दिए गए हैं लेकिन क्या हक़ीक़त में उन्हें इतने अधिकार मिल रहे है ! 

नेता के लिए चित्र परिणाम

वर्तमान भारतीय समाज में साम्प्रदायिक ताकतें अपने चरम पर हैं वो भारतीय संविधान के निर्माता भीम राव अम्बेडकर के चिन्तन को सिरे से नकारने और आलोचना में व्यस्त हैं. इसका ताज़ा तरीन उदाहरण उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जातीय संघर्ष से बेहतर देखा समझा जा सकता है, जो की ठाकुर बनाम दलित था दलितों के द्वारा की गई एफआईआर में कहा गया कि  “राजपूत समुदाय के लोग जुलूस निकाल रहे थे। उनके हाथों में तलवारें थी और वो ‘जय श्री राम’ व ‘अंबेडकर मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। जब हमने उन्हें ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने हमें पीटना शुरू कर दिया।

उन्होंने बाबा रविदास की मूर्ती तोड़ दी  हमारे घरों को लूटा, महिलाओं को प्रताड़ित किया, शब्बीरपुर और महेशपुर गांव में जानवरों को आग लगाई व दुकानों को लूटा। ” वहीं, पत्रकार अशोक पुंडीर ने आरोप लगाया कि जब वह इस मामले को कवर कर रहे थे तो उनपर हमला किया गया। पत्रकार ने कहा, “दलितों ने मुझे मारने की धमकी दी और मुझे पीटा। मेरे सिर और सीने में चोट आई है। हमलावरों ने मुझसे 20 हजार नकदी, सोने की अंगूठी और मेरा कैमरा भी छीन लिया।

 ऐसा पहले कभी भी नहीं देखा गया है ,दलितों पर सवर्णों ने अत्याचार किया और स्वतः स्फूर्त तरीके से कुछ दलितों ने भी प्रतिरोध का साहस किया। लेकिन सहारनपुर में पहली बार 9 मई को साफ तौर पर यह दिखा कि दलित नौजवानों ने प्रतीकात्मक तरीके से पुरजोर विरोध किया। भगवा रंग का जो अंगोछा वे अपनी शान और पहचान के लिए लगाए फिरते थे, वह उनके जान का जंजाल बन गया, अधिकांश ने डर के मारे अंगोछे फेंक दिए। गाड़ियों पर ‘राणा’ या ‘दी ग्रेट’ राजपूत लिखकर तथाकथित उंची जाति का होने के जिस दंभ का प्रदर्शन वे करते थे, उस दिन उनकों यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसका वे क्या करें, अपनी-अपनी गाड़ियाँ खड़ी करके भागे।

कुछ घटनाएं तो ऐसी भी हुईं कि दलित नौजवानों के झुंड़ को देखकर अपने आप को दलित साबित करने के लिए सवर्ण, खास करके राजपूत जय भीम नारा लगाने लगे, आंबेडकर जिंदाबाद बोलने लगे। पहली बार सवर्णों के दिल में यह खौफ समाया कि दलित सीधे उन पर हमला बोल कर अपने तथा अपने समुदाय पर हुए अत्याचार का प्रतिकार कर सकते हैं, जिस तरह हजारों साल से दलितों के मान-सम्मान को सवर्ण रौंदते आए हैं,  अब उनका भी मान-सम्मान खतरे में पड़ सकता है।

अब ऐसा नहीं रह गया है कि वे जैसे चाहें दलितों के साथ बर्ताव करते रहें और दलित चुपचाप सह लेंगे, या शासन-प्रशासन से न्याय की बाट जोहेंगे। सहारनपुर और उसके बाद 21 मई को जंतर-मंतर पर जुटान ने साबित किया कि अब दलित युवा जाति के आधार पर होने वाले अत्याचारों पर चुप नहीं बैठने वाले हैं।

पिछले कई युगों से पिछड़े और दलितो का दमन किया जाता रहा है । लेकिन आज़ादी के बाद भारतीय संविधान ने इस प्रकार के जातिगत भेदभाव को ख़ारिज कर दिया था, लेकिन 2013 -14  के बाद से जात पात और धर्म की राजनीती का रंग चढ़ने लग गया जो अलग अलग तरह से कभी गौ-रक्षा के नाम पर कभी एंटी रोमियो, कभी दलितों पर अत्याचार के रूप में फैलने लगा है जिसके भयानक अमानवीय परिणाम देखने को मिल रहे है । 

भारत की राजनीति में जातिगत राजनीति सबसे अधिक होती है यहाँ यादव, ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित आदि बटें हुए है और अधिकतर अपने जाति के उमीद्वार को ही वोट देते है. भले ही उस उमीद्वार पे कितने ही आपराधिक मामले दर्ज हो. इन्ही सब कारणों से समाज में विकास कहीं पीछे छुट गया है. हम यह पूरी तरह नही कह सकते की समाज में बदलाव की उम्मीद नही है क्योंकि हमने कई बार लोगो को जाति के इतर भी वोट करते देखा है. जैसे आपातकाल के बाद देश की पूरी जनता कांग्रेस विरोधी हो गई थी और जाति से हट कर उनके विरुद्ध वोट किया था. ऐसा ही बदलाव इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था जब कांग्रेस अब तक के सबसे ज्यादा सीटों के बाद सत्ता में लौटी थी. इसके बाद एक हाल ही का उदाहरण लोकसभा चुनाव 2014 है, जिसमे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यो में लोगो ने जाति से इतर वोट किया था.

वर्तमान परोक्ष में यह तो सिद्ध है की कुछ लोग बदलाव चाहते है लेकिन या तो उनके पास कोई विकल्प नही है और है भी तो सही नही है. इसके विपरीत कुछ यह सोचते है की उनकी जाति का नेता उनके लिए अधिक सुविधाओं को उपलब्ध कराएगा जिससे की समाज में उनका दबदबा होगा. वहीँ एक कारण यह है की आज भी हम स्वर्ण, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, दलित आदि सामाजिक व्यवस्था में उलझे हुए है और हमारी इन कमजोरियों का फायदा उठा कर राजनेता जाति की राजनीति करते है और देश और समाज के विकास की कोई चर्चा नही करते है | इसलिए मेरा मानना है की हमें जाति, धर्म आदि से ऊपर उठकर अपने समाज के विकास के लिए वोट देना चाहिए. जो भी हमें धर्म या जाति में बाँटने की कोशिश करे उसका बहिष्कार करना चाहिए और यह बता देना चाहिए की हमें जाति, धर्म नही, रोटी, कपडा, मकान और विकास चाहिए..!!

किसी ने क्या खूब कहा है - इस भारत के भीतर भी एक भारत है जिसे हम उसके बाह्य रूप से भी अधिक अच्छी तरह जानते तो हैं पर न जानने का दिखावा करते हैं. क्योंकि ये वो भारत है जो हमारी वास्तविकता है, हमारी दुखती रग है, पर हम इस असलियत से शुतुरमुर्ग की तरह मुंह चुराते फिर रहे हैं. ये हमारी पुरानी आदत है जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते. 

17-Oct-2017

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