. "ज़माने भर में मुहम्मद के नूर ए ऐन के बाद, कोई हुसैन न होगा कहीं हुसैन के बाद।" हज़रत इमाम हुसैन साहब ने दुनिया के सामने एक मिसाल क़ायम की है कि हथियारों से जंग जीतना तो आसान है लेकिन दिल सिर्फ क़िरदार से ही जीता जा सकता है नतीजे में पूरी दुनिया ने बहुत से दर्दनाक और दिल दहला देने वाले मुआमलात में आंसुओं का दरिया बहते देखे होंगे मगर किसी भी दौर में इतने आंसू ना बहाए गए होंगे जितने क़र्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन साहब की शहादत पर बहाए गए ! हम उनकी क़ुर्बानी को तसलीम करते हैं और यज़ीदियत पर लानत भेजते हैं। नब़ी साहब के प्यारे दुलारे हज़रत इमाम हुसैन साहब इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से तीन शाबान चार हिजरी यानी 08 जनवरी सन् 626 ई० दिन पीर को सऊदी अरब के शहर मदीना में रसूल ए मकबूल हज़रत मोहम्मद साहब की प्यारी बेटी हज़रत फ़़ातिमा ज़हरा के मुकद्दस सिकम से पैदा हुए थे, आपके वालिद साहब का नाम हज़रत अली था, मौला ए कायनात हज़रत अली जैसा कोई दूसरा शख़्स नहीं जिसने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ अल्लाह की इबादत में गुजारा हो, वो यतीमों की मदद इस तरह से किया करते थे कि यतीमों को पता ही नही चलता था कि मदद करने वाला है कौन ? उधर हज़रत मोहम्मद साहब अक्सर सहाबा ए क़राम से कहा करते थे कि "हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूं" चूंकि हज़रत इमाम हुसैन की परवरिश नाना हज़रत मोहम्मद साहब व सहाबा ए कराम की देखरेख में हुआ था जिसकी वजह से उनके अंदर रवादारी, हक़्कानियत, इंसाफ पसंदी, सच्चाई जैसी ख़ासियत खुद ही आ गई थी और इसी ख़ासियत की वजह से उन्होंने आख़िरी सांस तक यज़ीद और उसकी फौज का मुकाबला किया था। मुहर्रम का महीना अल्लाह को बहुत अज़ीज़ है मोहर्रम के महीने में पहली से नवीं दिनों को अशरा ए मुहर्रम व दसवीं को यौमे आशूरा कहा जाता है, यौमे आशूरा वो दिन है जिस दिन हक़, सच्चाई, इंसाफ़ और इंसानियत के लिए हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे हुसैन इब्न अली की कर्बला के लड़ाई में उनके बहत्तर अपनों और ख़ास के साथ शहादत हुई थी इसी दसवीं के दिन तमाम मुहिब्बान ए हुसैन याद ए हुसैन में उनकी क़ुर्बानी को याद करते हुए जुलूस निकालते हैं, इराक़ की दारालहुक़ूमत बगदाद से 120 किलोमीटर के फासले पर वाके कर्बला में 3 दिन तक जलती रेत, तपते सूरज और बच्चों की भूख और प्यास की शिद्दत में नवासा ए रसूल को यज़ीदी लश्कर द्वारा क़त्ल किए जाने और ख़ानवाद ए रसूल पर ढाए गए ज़ुल्म की दास्तां का ज़िक्र कर दूं तो अक़ीदतमंदो की आंखों से आंसू बरसने लगेंगी, ये क़र्बला हमें सिखाती है कि दुश्मन चाहे कितना ही मज़बूत क्यों ना हो हमें हमेशा हक़ और सच्चाई के रास्ते पर चलकर ख़ुद में बर्दाश्त करने की इतनी ताक़त पैदा करनी चाहिए कि दुश्मन वार करते करते थक जाए। याद रखें ये हज़रत इमाम हुसैन ही थे जिन्होंने कहा था कि इज्ज़त की मौत जिल्लत की जिंदगी से बेहतर है लेहाजा बच्चों को सिर्फ ताजिया न दिखायें उनको बतायें कि मोहर्रम हमें ये पैग़ाम देने आता है कि अगर सर ज़िस्म से जुदा कर दिया जाए तो भी ज़ालिम खूंखार बादशाह के सामने हमेशा हक़ की बात पर कायम रहें उन्हें ये मत समझाइए कि इमाम हुसैन कैसे शहीद हुए बल्कि ये बताइए कि क्यों शहीद हुए ? कर्बला का सबसे बड़ा सबक़ ज़ुल्म ओ जब्र के खिलाफ खड़े होना है और हक़, इंसाफ़ व सच्चाई के लिए लड़ने में जान की क़ुरबानी भी देनी पड़े तो पीछे न हटना ही हुसैनियत है, बच्चों को सुनाइए जिसे सुनकर हर हस्सास इंसान की आंखें नम हो जायेंगी के- . "कब था पसंद रसूल को रोना हुसैन का, आग़ोश ए फ़ातिमा थी बिछौना हुसैन का, बेगौर ओ बेकफ़न है क़यामत से कम नहीं, सहरा की गर्म रेत पे सोना हुसैन का। जहान में सिर्फ यही एक घराना ऐसा है जो सिफ़त से जाना जाता है और वो घराना है अहलेबैत का, किसी ने जब अमीन कहा रसूल ए अकरम समझ में आए, मुश्किल कुशा कहा मौला अली समझ में आए, आबिद कहा इमाम जैनुल आब्दीन जेहन में आ गए और वफ़ादार कहा तो गाजी अब्बास अलमदार समझ में आए ! हज़रत अली के दूसरे बेटे हज़रत इमाम हुसैन का मक़सद था खुद फ़ना हो जाएं लेकिन वो इस्लाम जिंदा रहे जिसको नाना मोहम्मद साहब लेकर आए थे, इनके दीन ए इस्लाम को बचाने के लिए एक से बढ़कर एक कुर्बानियां देने के बाद भी शराबी, झूठा, अय्याश, इस्लाम व उसके तरबीत के मुख़ालिफ़ और अल्लाह के वज़ूद से इंकार करने वाले लानत ज़दा यज़ीद ने उनको कुंद धार के खंजर से नमाज़ की हालत में बहन ज़ैनब के सामने शिम्र नाम के दुश्मन ए इस्लाम से इसलिए क़त्ल करा दिया क्योंकि किसी भी सूरत में उन्होंने उसकी बैअत लेने से इनकार कर दिया था। हज़रत इमाम हुसैन साहब महज़ मुसलमान भाइयों के ही नहीं, सबके हैं, चूंके हज़रत इमाम हुसैन साहब की ज़ात लाइक़े अदब है लेहाज़ा आप सब भी जब हज़रत इमाम हुसैन, उनके बेटों, भाइयों, हामी, ज़ौजा, भांजों, भतीजों, दोस्तों यहां तक कि हज़रत इमाम हुसैन के 6 महीने के बच्चे पर 10 मोहर्रम को कर्बला के मैदान में हुए मुज़ालम का जिक्र नीचे लिखे नामी किताबों में पढ़ेंगे तो अहलेबैत से मोहब्बत करने वालों के अश्क ख़ुद ब ख़ुद बहने लगेंगे। "शहादत हुसैन की, दास्तां ए कर्बला, शब्बीर का का़तिल, नेजों के साए में हुसैन, ज़न्नत के सरदार, अली के लाल " अंत में - . "ग़ुरूर टूट गया कोई मर्तबा न मिला, सितम के बाद भी हासिल ए जफ़ा न मिला, सर ए हुसैन तो मिल गया यज़ीद को लेकिन, शिकस्त ये है कि फिर भी झुका हुआ न मिला।" --शिव प्रकाश गुप्ता--
30-Aug-2021

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