By : khulasapost magazine story

देश की राजनीति पर जातिगत राजनीति सबसे बड़ा धब्बा है. चुनाव सुधार और सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों के अलावा आम राजनीतिक बहसों पर भी गौर करें तो जातिगत राजनीति को देश के लिए सबसे मुश्किल कड़ी बताया जाता है. विडंबना देखिए कि पिछले तकरीबन 60-70 वर्षों से हमारे देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही लगभग इसी आधार पर खड़ी हुई है. उत्तर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में जातिगत राजनीती की विचार धारा आम बात है,  लेकिन आपको जानकर आश्चीर्य होगा कि दक्षिण भारतीय राज्यों में भी पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर लड़ी जाती है. हालांकि, भारत की जनता जातियों के आधार पर संगठित है । अत: न चाहते भी राजनीति को जातिगत व्यवस्था के साथ जोड़ा जाना सामाजिक विवशता है अतः राजनीतिक दलों को इस व्यवस्था का उपयोग करना ही पड़ता है अत: राजनीति मे जातिवाद का अर्थ जाति का राजनीतिकरण है ।

जाति को अपने दायरे में खींचकर राजनीति उसे अपने काम में लाने का प्रयत्न करती है । दूसरी ओर राजनीति द्वारा जाति या बिरादरी को देश की व्यवस्था में भाग लेने का मौका मिलता है । नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय संगठन का उपयोग करते हैं और जातियों के रूप में उनको बना-बनाया संगठन मिल जाता है जिससे राजनीतिक संगठन मे आसानी होती है भारत में जाति और राजनीति में आपसी सम्बध को समझने हेतु इन चार तथ्यों पर विचार आवश्यक है ।

धर्म के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण किए जाने की कोशिश होती रही है और अब देश में धर्म के नाम पर युवाओं का ध्रुवीकरण जोरों से किया जा रहा है. राजनीति के गलियारों में चलने वाली साम्प्रदायिकता की ज़हरीली हवा समाज में इस कदर घुल रही है कि इसका प्रभाव युवाओं पर हो रहा है. सभी समुदायों के धार्मिक और राजनीतिक नेता इस बात को अच्छे से जानते हैं कि नौजवान पीढ़ी के बीच ध्रुवीकरण का बीज बोने से आने वाले वक्त में उनकी सियासी फसल बेहतर हो सकती है. 

अब हालात ये हो गए हैं कि युवाओं के बीच साजिश रचने वाले धार्मिक चेहरों की सक्रियता तेजी से बढ़ी है. कर्नाटक हो, महाराष्ट्र हो या फिर हरियाणा व उत्तर प्रदेश. सभी राज्यों में अचानक युवाओं को धर्म का पाठ पढ़ाने की घटनाएं बढ़ गई हैं, जाहिर है जिनके पीछे कुछ विघटनकारी साम्प्रदायिक ताकतों का हाथ होता है शिक्षण संस्थाओं के बाहर और सार्वजिनक कार्यक्रमों में धर्म के ये राजनीतिक ठेकेदार अपना काम कर रहे हैं. युवाओं में एक-दूसरे के प्रति धर्म के नाम पर नफरत बढ़ाने का काम किया जा रहा है. छोटी-छोटी बातों पर दंगे-फसाद हो रहे हैं. मामला कोई भी हो, उसे धर्म से जोड़कर देखा जाता है.

एक तरफ दक्षिण भारत में कई सांप्रदायिक संगठन न केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपनी आक्रमक कार्रवाई को तेज करते नजर आते हैं बल्कि वैज्ञानिक सोच रखने वाले विद्वानों को भी ठिकाने लगाने पर आमादा हैं, तो दूसरी तरफ हैदराबाद के एक विवादित नेता भड़काऊ बयान देकर उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमानों के बीच जगह बनाने के लिए नई सियासी जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. 

हम किस समाज में रह रहे हैं?  एक ऐसा समाज जहाँ केवल एक शक की वजह से बिना बात के एक आदमी की जान ले ली जाती है. जहां गाय को माता बुलाने वाली हिन्दुत्व की फ़ौज 80 वर्ष की बुजुर्ग महिला की छाती पर अपने पैरों से हमला करती है. उन्हें अपने जूतों के नीचे रौंदती है. उन्ही की आँखों के सामने उनकी जवान लड़कियों के साथ अश्लील हरकतें की जाती हैं. और गौ रक्षा के नाम पर पूरे परिवार और गाँव की हज़ारों की भीड़ के सामने एक व्यक्ति को दिन-दहाड़े मौत के घाट उतार दिया जाता है. क्या हमारे देश में कानून नाम की कोई चीज़ है या नहीं? क्या हम एक सभ्य समाज में रह रहे हैं?  

इस विराट लोकतंत्र के लिए यह बेहद शर्मनाक है कि चुनाव का मुद्दा जनता की बुनियादी आवश्यकताएं न होकर अब गौ मांस बन गया है. यह नागरिक पतन की चरम परिणति है. सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाज में जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है. आए दिन कोई न कोई विवादित पोस्ट समाज में साम्प्रदायिक तनाव की वजह बन जाती है. फेक आईडी बनाकर फेसबुक और ट्वीटर पर धार्मिक उन्माद भड़काने की कोशिशें की जा रही है. देश का युवा वर्ग सोशल मीडिया पर खासा सक्रिय है. वो इससे कहीं न कहीं प्रभावित होता है. सरकार हर घटना के पीछे सियासी फायदा तो तलाशती है. लेकिन कार्रवाई करने में अक्सर देरी करती नजर आती है. 

दरअसल,  मजहबी और सियासी ठेकेदारों की ये कोशिश समाज में एक बड़ा ध्रुवीकरण करने के लिए हो सकती है. अगर भाजपा यह बात प्रचारित करती है कि उसे गत लोकसभा चुनाव में सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए डाले गये वोटों में से जो मत मिले हैं वे राजनीतिक रूप से चेतन मतदाताओं द्वारा बिना किसी लोभ लालच से दिये गये हैं, तो उसे यह भी मान लेना चाहिए कि जागरूक मतदाता बँधुआ नहीं होता है. दलों के कारनामों के प्रभाव में उसकी दिशा बदल भी सकती है. उल्लेखनीय है कि उक्त चुनाव में भाजपा की जीत काँग्रेस की अलोकप्रियता, व्यापक पैमाने पर दल बदलुओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय लोगों को चुनाव में उतारकर संसाधनों के तीव्र प्रवाह के कारण भी थी और लोगों के भावनात्मक-सांप्रदायिक उत्प्रेरण के कारण भी. 

देश की जनसंख्या का एक भाग आज भी साम्प्रदायिकता की राजनीति से प्रभावित है लेकिन वहीँ एक बड़ा हिस्सा इसमें विश्वास नहीं रखता. इस जनसमूह को वास्तविकता से परिचित कराने की जिम्मेदारी सचेत नागरिकों का है. सरकार आज दूसरे छोर पर है. जनतंत्र में सरकारें जनता की मर्जी से चुनी जाती हैं. वे तभी बेहतर होंगीं जब हम उनपर काबू रख सकेंगे. आज सरकारें बेकाबू हैं क्योंकि हम उनके जाल में स्वेच्छा से फंसे हुए हैं. अब समय है कि बहेलियों के जाल ध्वस्त किये जाएं और यह तभी संभव है जब जनता खासकर युवा असल में जाग जाएं.

08-Mar-2018

Leave a Comment