लेख : एम.एच.जकरीया 

हम इतना डरे हुए क्यों हैं ? जी हाँ, यह सवाल आप पर, हम पर, हम सब पर लागू होता है,  आज एक आम इंसान जब भी घर से निकलता है तो उसे सही सलामत अपनी घर वापसी का भरोसा नहीं रह गया है चंद लोग सत्ता के मद में इतना चूर हो गए है कि इन्हें जानवर से ज़्यादा सस्ती इंसान की जिंदगी नज़र आने लगी है, किसी जमाने में हम तालिबानों को उनकी इन्ही हरकतों पर हँसते थे आज हमारे देश में धर्म के नाम पर उन मज़लूमों पर ज़ुल्म हुए है वो क्या तालिबानियों से बत्तर नही है ?

ये हो क्या रहा है ? इस देश मे.  कहाँ है कानून का राज ? क्या तालिबानी फरमानो से देश चलेगा ? शर्म करो सत्ताधीशो, तुम्हारे वोट बैंक की राजनीति ने इस देश को गृह युद्ध की कगार पर पहुंचा दिया है । जितने मरेंगे, कटेंगे उतना राजनीतिक फायदा की उम्मीद मत करो अब जनता समझने लगी है तुम्हें ?  इलाहाबाद का दलित युवक सड़को पर बेदर्दी से मार दिया जाता है, लेकिन हत्या के जिम्मेदारों के लिए सिंहासन पर बैठे लोगो ने कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी क्योकि वो एक गरीब दलित परिवार से था वोट लेने के समय तो इन्हे सर पर बिठाते है और सत्ता मिल जाने पर ‘डेटॉल’ और साबुन से हाथ धोकर छूने को कहते है ये इंसान ना हुए भगवान हो गए । धर्म के आडम्बर में इंसानियत का खून सफ़ेद हो गया 

दलित युवक की मौत दु:खद है, शर्मनाक है । लेकिन समाज के कुछ लोग खुलेआम हत्यारो को मारने की सुपारी दे रहे है ? अभी कुछ दिनो से तमाम जाति व समाज के लोग किसी को मारने उसका सिर काटने पर ईनाम की घोषणा कर रहे है । और वहां की राज्य सरकारे मूकदर्शक बनकर हाथो पर हाथ धरे बैठी है जो की शर्मनाक है !

आखिर कब तक डर और दहशत दिखा कर राज करोगे,  कहीं ऐसा ना हो जाए की जिनकी अटूट आस्था तुम पर थी वह भी तुम्हारे वहशियाना फैसलों से तुम से दूर भागने लगे,  जब भी कोई किसी पर अत्याचार करे हिंसा को जन्म दे तो वो ही आतंकवाद होता है आप माने या न माने मुझको इससे कोई फर्क नही पड़ता है, पर सच्चाई तो यही है। आपको जनता ने एक बार मौका दिया है क्या यही आप के लिए अंतिम अवसर मान कर चल रहे है, दोबारा क्या मुंह लेकर जाओगे जनता के पास क्योकि ये प्रजातंत्र है | धर्म के नाम पर ISIS, अल कायदा, LTT आदि आतंकवादी संगठनों का इतिहास को पढ़े तो आपको मालूम होगा के वे भी धर्म के नाम पर धर्म की रक्षा के लिए या अपनी रक्षा के लिए खड़े हुवे और फिर दिन प्रति दिन क्रूर होते चले गए यही हाल अब हमारे देश का है भारत देश में कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है यदि कोई देश भक्ति के नाम पर हिंसा, और आतंक फैला कर दहशत फैलाता है तो ऐसे लोग रक्षक नही राक्षस कहलाने के हकदार होंगे ।

यह कहना कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, अब हास्यास्पद ही लगता है। विभिन्नता में भी एकता है यह नारा भी अब चुभने लगा है। भारत में कोई भी सरकार रही हो, उसने भारत की समस्याओं के हल पर गंभीरता से विचार और कार्यवाही कभी नहीं की। गैर-जिम्मेदार राजनीति के फैसलों के चलते हर वर्ष ये सम्याएँ बढ़ती चली जा रही है । दादरी में अखलाक की हत्या, फिर 2016 में ऊना (गुजरात) में गाय का चमड़ा उतार रहे चार दलित युवकों की पिटाई, इसी वर्ष राजस्थान के अलवर में पहलू खान की हत्या हो या इलाहाबाद के युवक दिलीप सरोज़ की पीट पीटकर हत्या हो इसे कोई भी कानून जायज नहीं ठहरा सकता। भीड़ की मानसिकता वाले लोगों के हौसले क्यों बुलन्द हैं क्योंकि उनमें यह विश्वास है कि हम सड़क पर उतरकर जो चाहें कर सकते हैं। पुलिस हमारे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी, फिर अफवाहें, तथ्यों की अनदेखी, एक खास समुदाय के पहनावे पर धार्मिक विश्वासों के प्रति पूर्वाग्रह या घृणा जैसी कई चीजें सड़क पर तुरन्त मरने-मारने का फैसला करने को प्रेरित करती हैं।

23-Feb-2018

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