कु. दिया माली  / कु. सुधा वर्मा 

मै पत्रकार नहीं हूँ ? क्योकि  अब पत्रकार कहलाने से मुझे शर्म आने लगा है, क्योकि पत्रकारिता करने के लिए रिपोर्टिंग और समाचार की नहीं बल्कि आपका पत्रकारों के किसी संगठन या क्लब का सदस्य होना जरूरी है, ना की मीडिया संस्थान चलाना या उस संस्था में काम करना !

पत्रकार होने के लिए आपसे कोई आपकी योग्यता नहीं जानना चाहेगा, लेकिन आपको अधिकारीयों- नेताओं को धमकाना चमकना आना अनिवार्य  योग्यता में शामिल माना जायेगा भले ही उस अधिकारी की योग्यता आम जनता और उस  क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण क्यो ना हो, पत्रकार संगठन के नेता को वो कथित IAS पसंद नहीं है तो उनके आदेश का पालन होना चाहिए नही तो खैर नही ? भले ही आपने कोई भी समाचार नही लिखा हो थाने में एक दो मामले आपके उपर दर्ज ना किये गए हो अगर ये सब योगयता आप में नहीं है, और किसी पत्रकारों की संस्था से नहीं जुड़े है तो आप पत्रकार कहलाने के हक़दार नहीं है ?

आप कोई भी मीडिया संस्थान से जुड़े ना हो भले ही आपकी कोई भी मीडिया नहीं हो या किसी समय में पत्रकारिता से जुड़े थे अब पत्रकारों का संगठन चला रहे हो या किसी प्रेस क्लब में बैठ कर कैरम या ताश खेलते हो तो आप पत्रकारों के सच्चे हित चिंतक है वर्ना नहीं है !

अगर आपके ऊपर एक बार पत्रकार का लेबल लग गया हो और आपके पड़ोसी या किसी भी नागरिक से आपका झगड़ा हो गया हो तो आपको पत्रकार सुरक्षा मिलनी चाहिए और उस नागरिक को जेल हो जानि चाहिए क्योकिं आप पत्रकार है और वो सामान्य नागरिक अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो आप पत्रकारों की संस्थान आन्दोलन करेगी, और ये पत्रकारों के नेता अधिकारी और प्रशासन को सरे आम गालियाँ देंगे और आपको जबरदस्ती सुनाना पड़ेगा क्योंकि आप पत्रकार सुरक्षा के अंतर्गत आते है क्योकि आप पत्रकारों संस्था या संगठन से है। क्योकि आप तथाकथित पत्रकार जो है और ये आप का पेशा बन गया है जो आये दिन पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारों का आड़ लेकर वैमनस्य फैलाने का काम करते है! इसमें एक बात गौर करने वाली है बार - बार इन्ही कुछ पत्रकारों पर हमले क्यो होते हैं, कुछ इन्ही से संबंधित पत्रकारों को ही ब्लैकमेलिंग में पुलिस थाने में क्यों बैठाती है, और इन्हें छुड़ाने वही पत्रकार संगठन और पत्रकार सुरक्षा की दुहाई देने वाले ही थाने में इकट्ठे हो जाते हैं क्योंकि ये बेचारे जो है? और इनके लिए थानेदार को फोन भी वही लोग करते है जिन्हे ये सरे आम गलियाँ देते है।

इससे बेहतर तो मै पत्रकार कहलाना ही नहीं चाहूंगी क्योकि बार बार आप जैसे लोगो के कारण पत्रकारिता कलंकित हो रही है, और आम जनता पत्रकार और पत्रकारिता का मखौल और मजाक  उड़ा  रहे है! ये अच्छी बात है क्योंकि इन्हे सबक मिलनी चाहिए क्योंकि यहाँ का जनसंपर्क तो कुछ खास लोगों को ही पत्रकार मानता है और यही बरसो बैठे मठाधीश इन पत्रकारों के खैरख्वाह है जिन्हे ये आशीर्वाद देते हैं, उन्हे प्रेस कॉन्फ्रेंस में बुलाया जाता हैं सारी सुविधाए मिलती हैं चाहे सरकार किसी की भी हो, विधान सभा की कमेटी हो तो वही चेहरा दिखता है कोई भी कार्यकर्मो मे इन्हे आगे देखेंगे और सरकार को गाली देने के समय यही आगे नज़र आते हैं।

इस मुश्किल घडी में जब हर तरफ कोरोना से हाहाकार  मचा हुआ है ऐसे समय में  पत्रकार के शब्द, पत्रकार की भाषा, पत्रकार की आवाज़, पत्रकार की कलम सब कुछ खौफ और ख़ामोशी की दौर से गुजर रही हो जब हर तरफ दहशत का माहौल हो, प्रवासी मज़दूर बेरोजगार हो गये है, बेटियों की इज्जत लूटकर मार दिया जा रहा हो तब पत्रकार अपने पत्रकारिता का धर्म भूल कर अपनी  निजी  झगड़ो को पत्रकारों  की लड़ाई बताकर माहौल बिगड़ने का प्रयास और युवा पत्रकारों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास क्या शर्मनाक नहीं है?, अभी तो सही वक्त था पत्रकारिता का धर्म निभाने का!

 

03-Oct-2020

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