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बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ! यह नाम नहीं एक विचार है. वह सोच है जिसने भारत में सबसे पिछड़े समाज को भारत के मुख्य धारा में लाने का काम किया. आजादी के दशकों बाद भी दलित, समाज की मुख्यधारा से वंचित रखा गया , लेकिन बदलाव धीरे-धीरे आता है और आज भारत उस बदलाव के मोड़ पर खड़ा है, जब दलित खुद को दलित कहलाने से परहेज नहीं करता बल्कि उस पर फक्र करता है.

गुजरात के चुनावो में दलित एक ताक़त बनकर उभरे है जहां, इनकी एकता और ताक़त को दलितों की मसीहा कहलाने वाली मायावती ने रोकना चाहा उन्हें गुजरात के दलितों का साथ देना छोड़ खुद प्रत्याशी खड़े कर के दलितों और पिछडो को हराने का काम किया है | आपको याद दिला दे उत्तरप्रदेश सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलितों पर घटित ठाकुरों के दबंगई का ज़वाब भीम आर्मी ने दलितों की रोबिनहुड बन गयी. पिछले साल एक गांव में दलितों ने बोर्ड लगा दिया जिस पर लिख दिया- था (द ग्रेट चमार )

अपने आप को दलितों का मसीहा कहने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी की सुप्रीमो मायावती ही दलितों पिछडो और आदिवासियों की सब से बड़ी दुश्मन है, मायावती अपने झूठे अहंकार और वजूद को जिन्दा रखने के लिए अपनी ही जड़ो में मठा डालने का काम कर रही है, जिसे अब दलित और पिछड़ा समाज समझने लगा है जिसे अभी हाल ही के गुजरात विधानसभा सभा के हुए चुनावों से बेहतर समझा जा सकता 

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गुजरात चुनाव में दलित-पिछड़े और पाटीदार आन्दोलन को लेकर हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी – अल्पेश ठाकोर उभरे और उन लोगो ने जिस तरह से गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को टक्कर दी है यदि उसमे मायावती अपनी जिद में अड़ कर अपने प्रत्याशी ना खड़े किये होते और इनका समर्थन कर सहयोग करती तो चुनाव और भी दमदारी के साथ लड़ा जा सकता था ! लेकिन मायावती ने जानबूझ कर गुजरात चुनाव में वोट काटने के लिए अपने प्रत्याशी उतारे–जिससे दलित पिछड़े और आदिवासी क्षेत्र में कुछ वोट बंट गये शायद मायावती जी को ये गुमान हो चला है की पूरे देश के सर्वहारा बहुजन वर्ग इनकी निजी जागीर है – ये तब कहाँ चली गयी थी जब गुजरात में दलितों पर जुल्म ढहाया जा रहा था जिग्नेश और अल्पेश पर फर्जी केस दर्ज किये जा रहे थे.  मायावती जी की सोंच में दलितों के नाम पर अकेला खाउंगी  और किसी को खाने नहीं दूंगी वाली स्थिति है ? उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में ठाकुरों के द्वारा दलितों पर हमला किया गया और दलित समाज  की दलित आर्मी के युवा नेता रावण पर झूठे मुक़दमे बना कर जेल भेज दिया गया लेकिन उस पर कोई टिप्पणी नहीं और ना आन्दोलन और ना उसे छुड़ाने कोई प्रयास किया गया इसका सीधा सा मतलब है की दलितों में कोई नया नेतृत्व नहीं उभरने देना चाहती है मायावती ! दलितों को अपनी मुट्ठी में समझने वाली मायावती की झोली खाली हो गई 

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तीन दशक पहले बहुजन समाज पार्टी जिन मुद्दों, नारों, रणनीति, सामाजिक समीकरण और नेता के सहारे संसदीय राजनीति में उतरी थी, तीन दशक बाद भी उसी के सहारे खड़ी हैं। जबकि सच्चाई यह है कि तीन दशक में देश और प्रदेश की राजनीति और समाज में ढेर सारे परिवर्तन हो चुके हैं।

दलित और अति पिछड़े समाज में भी आर्थिक और शैक्षणिक उन्नति हुई है। लेकिन मायावती ने अपनी रणनीति में कोई ठोस बदलाव नहीं किया है। जो बदलाव किए, उसे महज सत्ता पाने तक सीमित रखा गया। पार्टी और संगठन के आंतरिक ढांचे में उन परिवर्तनों का कोई असर नहीं पड़ा।

चलिए चलते हैं 1996 में हुए वोटिंग पर जहाँ मायावती ने सहारनपुर के हरौड़ा और बदायूं की बिल्सी सीट से विधानसभा चुनाव जीता, मगर हरौड़ा से विधायकी कायम रखी। पहली बार 2007 में जब दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ के सहारे बसपा अपने बूते 206 सीटें जीती तो सहारनपुर की सात में पांच सीटें बसपा के खाते में गईं। लेकिन वर्तमान की राजनीति में इस बार हुए यूपी चुनाव में करीब 42 फीसदी मुस्लिम और 22 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी वाले सहारनपुर की सभी सीटों पर हार के साथ बसपा के भाईचारे का तिलिस्म टूट गया।

मायावती से यही मोहभंग ‘भीम आर्मी’ जैसे नए संगठनों की जमीन तैयार कर रहा है। लगातार तीन चुनाव में मायावती की नाकामी के बाद दलित भी सोचने पर मजबूर हुआ है। दलितों में अब जोश और जागृति आ चुकी है। इसी का नतीजा है कि सहारनपुर हिंसा के खिलाफ केवल सोशल मीडिया के जरिए 21 तारीख को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों की भीड़ उमड़ी। गुजरात में दलित नेता जिग्नेश मेवानी की जीत के बाद दलित राजनीति में एक नए दौर के आगाज के रूप में देखा जा रहा है। वक्त के साथ-साथ अब मायावती की ‘माया’ दलितों पर से खतम होती नजर आ रही है अब दलित समुदाय नए नेतृत्व को पसंद कर रहा है और अब वे युवा नेतृत्व पर भरोसा जता रहे हैं, हो सकता है समय बीतने के साथ-साथ मायावती भी बीते हुए समय की बात हो जाए ।

16-Feb-2018

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