ये सब धुआं है कोई आसमान थोड़ी है !

समकालीन उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय आवाज़ आज सदा के लिए ख़ामोश हो गई। कोरोना से संक्रमित हरदिलअज़ीज़ शायर राहत इंदौरी की आज शाम इंदौर के एक अस्पताल में हृदयगति रुक जाने से निधन स्तब्ध कर देने वाली ख़बर है जिस पर सहसा यक़ीन नहीं होता। ग़ज़लों में उनके नए प्रयोग, उनके ज़ुदा तेवर और लफ़्ज़ों के साथ खेलने का उनका सलीका हमेशा याद किए जाएंगे। देश और विदेश में भी बड़े मुशायरों की वे जान थे। कोमल मानवीय भावनाओं पर उनकी जबरदस्त पकड़, सियासत के पाखंड को बेनकाब करने का उनका वो बेख़ौफ़ अंदाज़ और समकालीन मुद्दों की पड़ताल की उनकी अदा मुशायरों को एक अलग स्तर तक ले जाती थी। मुशायरों की दुनिया में जो खालीपन वे छोड़ गए हैं उसे भरने में शायद लंबा वक़्त लगेगा। राहत साहब को खिराज़-ए-अक़ीदत, उनकी ही एक ग़ज़ल के साथ ! ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़ मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा मेरा जहाज़ ज़मीं पर उतरने वाला था मेरा नसीब मेरे हाथ कट गए वर्ना मैं तेरी मांग में सिंदूर भरने वाला था मेरे चिराग, मेरी शब, मेरी मुंडेरें हैं मैं कब शरीर हवाओं से डरने वाला था।


ध्रुव गुप्ता की क़लम से
11-Aug-2020

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