लेख : एम.एच. जकरीया 

वर्तमान समय में पत्रकारिता ने कॉर्पोरेट मीडिया का रूप ले लिया है और क्यों न हो ज़रूरते तो सभी की है,  चाहे पत्रकार हो या सम्पादक या मीडिया का मालिक सभी की अपनी तरह से अपनी ज़रूरते है जिसे पूरी करने के लिए वह काम करता है कोई कह दे की मै भूखे पेट रहकर काम कर लू तो ये बाते हजम नहीं होती,  हां ये ज़रूर है की पत्रकारिता में जो इमानदारी होनी चाहिये वह अब समाप्त  होती चली जा रही है । एक दौर था जब भारत के मीडिया हाउसो को संपादक चलाया करते थे जो आज कही न कही कॉर्पोरेट हाउस के मालिकों के हाथो में चला गया है जो अब मीडिया को अपने मन मुताबिक इस्तेमाल कर रहे हैं। और यही वजह है कि संपादक और पत्रकारों में एक किसम का डर सा समा गया है। जिसके चलते वो समाज से सरोकार रखने वाली ख़बरों को छोड़ कर अपने मालिक की कही गई बेमतलब की अफवाहों को ख़बरों में तब्दील कर रहे 

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 मीडिया हाउस के कॉर्पोरेट हाउस में बदलते ही उनमें राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप भी बढ़ने लगते हैं जिसका उदहारण आपको आपके टीवी में रोज दखने को मिल ही जाता है। कुछ मीडिया चैनलों ने तो मानो किसी न किसी राजनीतिक पार्टी और उसकी विचारधारा के प्रचार का पूरा ठेका ही उठा रखा है। देखा जा रहा है की पत्रकारिता ने आज के इस आधुनिक परिवेश में तुच्छ पत्रकारिता का रूप ले लिया है, वर्तमान न्यूज़ चैनलो में अब देश हित के मुद्दे और घटनाओ के स्थान पर बे मतलब की प्रायोजित बहसों ने ले लिया है जिससे समाज में एक नई मानसिकता को जन्म देने का काम कर रही है और यही मानसिकता लोगों को धर्म के आधार पर एक दुसरे से बाँटने का काम कर रही है, और यह मानसिकता अब क्रूरता का भयानक रूप लेते जा रही है,  हाल की दिल दहला देने वाली घटनाओ को देखे तो इंसानियत पर से भरोसा ही उठता चला जा रहा है और यह सवाल जहन में आता है की क्या यही लोकतंत्र है ?

वर्तमान में पत्रकारिता को पूंजीवाद ने ज़कड़ रखा है जिसका ताज़ातरीन उदाहरण है गुजरात का चुनाव जहां कॉर्पोरेट प्रायोजित मीडिया ने जिस तरह से भ्रम फ़ैलाने का काम किया उसे सभी ने महसूस किया है ? क्या यही पत्रकारिता है ? क्या पत्रकारिता का स्तर इतना नीचे गिरता जा रहा है, इन प्रयोजित मीडिया ने समाज में अपनी जड़ता बिखेरे दी है,  पैसे लेकर किसी एक पक्ष/राजनितिक पार्टी विशेष के हित में खबरों का प्रचार एवं प्रसार किया जा रहा है,  

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मीडिया चैनल भी दलगत विशेष हो चुके है, जिसका जीता जागता उदाहरण हमने हालिया चुनावो में देखा है जहाँ जनता और सच्चाई की आवाज़ को दबा दिया गया और कुछ राजनितिक दल इन चैनलो के मालिकों को पैसे, पद, प्रतिष्ठा का  लालच देकर अपना एवं अपनी राजनितिक दलों का काम आसानी से करवा रहीं है. और मन चाहा झूठ जनता के सामने खबरों के रूप में परोसने का काम कर रहे है ? अब पत्रकारों की विश्वसनीयता और पत्रकारिता के मूल्यों पर सवाल खड़े होने लगा है. अब लोग पत्रकारों को बड़े ही हेय दृष्टि से देखने लगे है | आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद अहम करार देने से हम नहीं हिचकिचाते. और कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के साथ हम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हवाला देकर  हम वे पत्रकार हैं जो उनसे सवाल पूछते हैं जो हम पर और देश पर राज करते हैं, उन्हें हर मौके पर चुनौती देते हैं. हम दिन भर के अहम मुद्दों पर सार्वजिनक बहस करते हैं, जब वही निर्णय करने वाले गलती करते हैं तो हम उनकी आलोचना करते नहीं थकते हैं और उन लोगों पर फैसला सुनाते हैं

लेकिन अब अपने आप को "निष्पक्ष" घोषित करने वाली मीडिया जगत से जुड़े हुए मठाधीशों को अब आंच महसूस होने लगी है, लगता है, जिनकी भाषा में अब बदलाव आने लगा है । कभी "असहिष्णुता" पर तीख़ी बहस और मन्दिर मस्जिद और 3 तलाक के नाम पर डिबेट करने वाले न्यूज़ चैनलो को भी अपनी खोती लोकप्रियता का अहसास होने लगा है ? आप हर रोज़ जनता को नाराज़ करने लायक हरकतें करते रहेंगे तो जनता आपको कब तक बर्दास्त करेगी । एक ना एक दिन तो जनता के सब्र का बाँध टूटने ही वाला है ! कब तक आप के अनर्गल प्रलाप को जनता देखेगी  ।   लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला भारतीय पत्रकारिता बस राजनेताओ की एक ताकत बन कर रह गया है। वर्तमान समाचार जगत- मीडिया, के हाव-भाव देखकर लगता नहीं कि अब इन्हें देश की कोई चिंता है। चिंता बची है तो केवल टीआरपी की।

08-Feb-2018

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