ज़ालिम, ज़ुल्म और प्रवासी मजदूर।
कितना जुल्म ढायेगी “ये सरकार”!

दरअसल, मजदूर जब गाँव से शहर आए तो उसे हमने माइग्रेशन कहा और ऐसा करने वाले मज़दूरों को प्रवासी मजदूरों की संज्ञा दी गई।
भारत में लॉकडाउन मजदूरों के लिए एक मुसीबत बन कर आया। लाखों मज़दूर सड़क पर आ गए।
उत्तर प्रदेश और बिहार से प्रवासी मजदूर देश के दूसरे राज्यों में सबसे ज्यादा जाते हैं। फिर नंबर आता है मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड। जिन राज्यों में ये काम की तलाश में जाते हैं उनमें से सबसे आगे है दिल्ली-एनसीआर और महाराष्ट्र। इसके बाद नंबर आता है गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब का। लेकिन आज परिस्थितियां बदलीं हैं।
मजदूरों का कोई नहीं क्यूंकि मजदूर मजबूर हैं, लाचार हैं, बेबस हैं, भूखे हैं, ग़रीब हैं, नंगे पैर हैं, जेब में पैसा नहीं, खाने को अन्न नहीं, पीने को पानी नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं, पैरों में चप्पल नहीं, उनके पास अगर है तो सिर्फ आंसू है, भूख है, प्यास है, बेबसी है, लाचारी है और बद्दुआएं हैं।
जिन हवाई चप्पल वालों को जहाज़ में बिठाने का वादा कर सत्ता में आई थी भाजपा आज उन्हीं को ज़ुल्म का शिकार बनाया जा रहा है।
ये प्रवासी मजदूर ही प्रदेशों की आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक दशा व दिशा को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  वे विभिन्न प्रदेशों में रहते हैं, अलग भाषा बोलते हैं परन्तु वहां के विभिन्न क्रियाकलापों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जहां-जहां प्रवासी मजदूर बसे वहां उन्होंने आर्थिक तंत्र को मजबूती प्रदान की और बहुत कम समय में अपना स्थान बना लिया।
पिछले कुछ सप्ताह से जारी लॉकडाउन के चलते प्रवासी मज़दूरों ने अब अपने घरों की तरफ़ लौटना शुरू कर दिया है। हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए वे पैदल निकल पड़े हैं।  हाल ही में जब कर्नाटक सरकार ने प्रवासी मज़दूरों के लिए चलाई गई विशेष ट्रेन श्रमिक स्पेशल को रद्द कर दिया तो सैकड़ों मज़दूर इससे बेहद बेसब्र नज़र आए।
पहले तो राज्य सरकार की ओर से इन प्रवासी मज़दूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेन से जाने की अनुमति दी गई लेकिन बाद में बिल्डरों और डेवलपरों से बात करने के बाद सरकार ने अपना फ़ैसला बदल लिया। इस क़दम ने बेंगलुरु में फंसे हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को बुरी तरह हताश कर दिया है।
ऐसा पूरे देश में हो रहा है। एक तरफ जहां कोरोनावायरस पूरे देश में हाहाकार मचाये है वहीं सरकार ने मजदूरों पर ज़ुल्म करके हाहाकार मचा दिया है।
मजदूर बताते हैं कि ठेकेदारों ने साफ़ कहा है कि अगर लौटने का फ़ैसला कर चुके हो तो यह जगह छोड़नी होगी। जब मजदूर इस जगह को छोड़कर रेलवे स्टेशन जाते हैं और फिर उन्हें टिकट नहीं मिलता है। टिकट नहीं मिलने के बाद वह भटक रहे हैं। काम करने की हिम्मत नहीं बची है, वह अपने घर लौटना चाहते हैं।
मजदूरों की हालत यह है कि उनके पास एक कप चाय ख़रीदने तक के पैसे नहीं बचे हैं। मजदूर लोग अब बंधुआ मज़दूर बन कर रह गए हैैं।
"ट्रेन चलाने की बात कही गई पर मजदूरों को कोई जानकारी नहीं मिली कि उन्हें किस ट्रेन में टिकट मिली है। पूछताछ करने पर  लाठी मारकर उन्हें वहां से भगाया जा रहा है।"
बड़े बिल्डरों ने शुरुआत में मज़दूरों को फूड पैकेट ज़रूर मुहैया कराए लेकिन बाद में मज़दूरों को राशन का सामान मुहैया कराने लगे।
आज की वास्तविक सच्चाई यह है कि "यह अपने को श्रेष्ठ मानने और कामकाजी लोगों से अलग थलग दिखने का नज़रिया है। सरकार के पास कामकाजी मज़दूरों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। वे उपयोगी ज़रूर हैं लेकिन वे प्राथमिकताओं के दायरे से बाहर हैं।" उनके लिए सरकार ने "Use and throw" का नियम अपनाया हुआ है।
सच्चाई यह है कि दक्षिण और पश्चिम भारत के विकसित राज्यों के विकास में बीमारू राज्यों के मजदूरों की अहम भूमिका रही है।
कोरोनावायरस के कारण एक डर भी है रही कारण है कि मजदूर लोग घर जाना चाहते हैं। क्यूंकि इस वक़्त उन्हें अपने परिवार वालों के साथ रहना है। मजदूर लोग दस बाइ दस फीट वाली जगह में छह-सात लोग मिलकर रहते हैं। भगवान ना करे लेकिन अगर किसी एक को कोरोना हो गया तो बाकी मजदूरों का क्या होगा?"
"कोविड-19 से एक सकारात्मक परिदृश्य जो सामने आया है वह यह है कि इसने प्रवासी मज़दूरों को लाइम लाइट में ला दिया है। ये मजदूर लोग ही भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन हैं और अब तक हर किसी को उनके होने के बारे में मालूम तो था लेकिन कोई उनके अस्तित्व को स्वीकार करने तक के लिए तैयार नहीं था।" और आज पूरे देश में सिर्फ मजदूर नज़र आ रहा है। और सरकार परेशान है।
क्या प्रवासी मज़दूरों के लिए कोई सम्मान नहीं है? क्यूंकि उन्होंने खुद को बेहद मामूली समझा वे दरअसल सम्मान चाहते हैं लेकिन इस बात को हम में से कोई समझना नहीं चाहता। कुल मिलाकर हालात और भी ख़राब होने वाले हैं।
प्रोफेसर गुप्ता जापान और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि इन देशों ने साबित किया है कि अर्थव्यवस्था के लिए श्रमिक को ख़राब समझा जाना सही विचार नहीं है। लेकिन हमारी सरकार को तो सिर्फ़ ताली और थाली पर विश्वास है।
सोशल मीडिया पर मजदूरों का दर्द साफ़ दिखाई दे रहा है क्योंकि गोदी मीडिया तो सच्चाई पर पर्दा डालने का काम कर रही है। एक वीडियो में छत्तीसगढ़ के एक लड़के ने कहा- बहुत हो गया तमाशा, सरकार का। सरकार से ज़्यादा हमें अपने पांवों पर भरोसा है। सोचिए ज़रा कि लोगों का पहला भरोसा तो यही टूटा है कि सरकार उनके लिए कुछ करेगी! अब इस पर उनका यक़ीन नहीं रहा।
भरोसा टूटने की दूसरी वजह उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने दिया है जहां योगी सरकार ने श्रम क़ानून को ही निलंबित कर दिया गया है। वहां के अध्यादेश के मुताबिक तीन साल के लिए श्रम क़ानून को निलंबित कर दिया गया है। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यही है कि आप बंधुआ मज़दूरी और गुलामी को संस्थागत शक्ल दे रहे हैं। प्रवासी मज़दूरों की वास्तिवक स्थिति और उनके उत्पीड़न की सामाजिक सच्चाई का पता एक महामारी के प्रकोप में चल रहा है। यह बताता है कि सरकार अपने लोगों को कैसे और कितना समझती है। इसलिए सरकार पर लोगों का कोई भरोसा नहीं रहा है।
इस वक़्त भारत में दो महामारी फैल रही है एक कोरोनावायरस दूसरे मजदूरों के उत्पीड़न की महामारी।
आज स्थिति यह है कि अब जब उनके आय का ज़रिया ही नहीं बचा तो ये प्रवासी मज़दूर अपने गाँव वापस लौट रहे हैं और यही है नेताओं और मंत्रियों के लिए असल चिंता का सबब। जिससे बौखलाई सरकार अनाप-शनाप कार्य कर रही है।
ये प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा खेतों में या फिर निर्माण कार्यों में मजदूरी करते हैं। वहाँ काम ना मिला तो फिर घरों और सोसाइटी में मेड और सुरक्षा गार्ड को तौर पर काम करते हैं। इसके आलावा एक बड़ा वर्ग कारखानों में भी काम करता है। अभी कई राज्यों में खेतों में बुआई का काम शुरू होने वाला है। और वहाँ के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर अपने घर लौट चुके हैं। किसानी के लिए मजदूर नहीं मिल रहे। ऐसे में आने वाले दिनों में बड़ा संकट खेती पर आने वाला है जिसका सीधा असर अनाज की पैदावार पर पड़ेगा। फिर सप्लाई कम, डिमांड ज्यादा, मंहगाई इत्यादि।
देश के सामने एक बड़ा सवाल है।
क्या अर्थव्यवस्था ठप नहीं होगी?
क्या दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों में इन मजदूरों के बिना कामकाज ठप हो जाएगा?
इसका जवाब बहुत आसान है कि मुश्किलें ज्यादा बढ़ जाएंगी और जिस दिन ऐसे सब मजदूर वापस चले जाएंगे, उस दिन अर्थव्यवस्था ठप पड़ सकती है।
आपको घरों में काम करने के लिए लोग नहीं मिलेंगे, ड्राइवर रखने के लिए ज्यादा पैसे ख़र्च करने पड़ सकता है। लोगों को मजदूरी पर रखने के लिए आपको और बेहतर सुविधाएं देनी पड़ेंगी। जिस राज्य से ये मजदूर निकल कर जा रहे हैं, वहां लेबर की कमी ज्यादा होगी। फिर डिमांड सप्लाई का गैप बढ़ेगा और फिर मजदूरी ज्यादा देना पड़ेगा। यानी बहुत खराब परिस्थितियां आ जायेंगी।
फिलहाल पूरे भारत की सड़कों पर मजदूर पैदल, नंगे पैर, भूखा चलता दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया पर आने वाली तस्वीरें, वीडियोज बहुत भयावह है। जनता इन मजदूरों को अपनी जेब से पैसे बांट रही है मगर बेशर्म सरकार को शर्म नहीं आती।
प्रधानमंत्री मोदी ने एलान कर दिया है कि 'लॉकडाउन 4' नए रूप रंग का होगा। जो आज से शुरू हो गया है। इसमें पहले के तीन लॉकडाउन के मुकाबले ज्यादा छूट मिलने की बात कही गई है। ऐसे में जब फैक्ट्रियों में, खेतों में और घरों में दोबारा से काम करने की इनको इजाजत मिलेगी तो मजदूर कहां से आएंगे?
एक बड़ा सवाल?
सोचिए और जागिये।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

 

18-May-2020

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