बहुत सारे मानव मानवीय मूल्यों को लेकर कोई सामाजिक लड़ाई लड़ते हैं फिर वह लड़ाई जीत लेते हैं और फिर उसके बाद शुरू होता है मानव कुंठाओ का एक नया खेल। 

मिसाल के तौर पर अन्ना हजारे के नेतृत्व में बहुत सारे लोग अच्छी भावना लेकर आंदोलन में शामिल हुए सारा देश आंदोलन के साथ जुड़ गया आंदोलन कुछ सफलताओं को चार सफलताओं के साथ देश की हर गली कूचे तक पहुंचा इसमें कुछ मुख्य नाम याद कीजिए अन्ना हजारे केजरीवाल कुमार विश्वास योगेंद्र यादव शांति प्रशांत कपिल मिश्रा शाजिया इलमी किरण बेदी और भी कई नाम

इनमें से कुछ ने अन्ना हजारे के साथ संगठन चलाने और आंदोलन चलाने की अपनी सहमति जारी रखें कुछ नहीं पॉलीटिकल पार्टी बना ली कुछ दूसरी पॉलिटिकल पार्टियों में शामिल हो गए हैं

गौर करने की बात यह है यह सभी लोग एक मंच से एक आवाज लगा रहे थे एक ही विचारधारा पर काम कर रहे थे एक ही कदमताल करते नजर आ रहे थे मगर जैसे-जैसे कामयाबी मिलती गई उस कामयाबी की सीट पर छीना झपटी इन्हें आपस में बांट दी गई और इनमें से बहुत अच्छे दिखने वाले लोग अपने निजी फायदे के लिए कुछ उस वक्त की भ्रष्टाचारी पार्टी में जाने वाली में शामिल हो गए तो कुछ एक धर्म को सीधे गोली मारो गाली देने लगे और कुछ नहीं नई पार्टी बना कर वोट मांगने की प्रक्रिया शुरू कर दी

असल में मानव की कोई विचारधारा है ही नहीं मानव सिर्फ अपनी कुंठाओं से भरा होता है और जैसे ही उसे वक्त मिलता है मौका मिलता है वह अपनी शराफत का लबादा उतार कर फेंक देता है विचारधारा को रोटी के साथ निगल जाता है और जिसे ईमान कहता है उसे दो टके में बेच डालता है

यह बात सिर्फ राजनेताओं या आंदोलनकारियों पर ही लाजिम नहीं होती यह बात नबियों के साथियों पर भी लागू होती है देवताओं के अनुयायियों पर भी लागू होती है और सभी प्रकार के धर्म गुरुओं पर सबसे पहले लागू होती है

यह बात पत्रकारों पर भी लागू होती है और यही सोच अमीर गरीब सभी इंसानों पर लागू होती है
सभी अपनी अपनी पसंद के मिनिमम कॉमन प्रोग्राम देखते हैं और ऐसे संगठनों में शामिल हो जाते हैं जहां उनके मिनिमम कॉमन प्रोग्राम को सफलता मिलने की संभावना हो

इसलिए मेरा मानना यह है कि दुनिया में बुद्धि जीविता और मानवता दोनों ही एक वहम है भरम हैं दरअसल ऐसी कोई चीज दुनिया में है ही नहीं

कोई धर्म की दुकान लगाता है तो कोई कर्म की दुकान लगाता है कोई बहन की दुकान लगाता है तो कोई छल की दुकान लगाता है और अगर कोई सचमुच मानव हो तो आपने ही जैसे दिखने वाली प्रजातियों से हार जाता है और खामोश एकांत की तरफ चला जाता है

अर्थात हमारे पास चंद सांसे हैं जो हमें लेनी है और इन सांसों को लेने के लिए न जाने कितनी सांसें छीन लेनी है यही दुनिया है यही देश है यही धर्म है

आज के दौर दुनिया भर में दानव राज का है और दानव अपनी इच्छा पूर्ति करेंगे और कर रहे हैं
मुझे दानव राज से भी कोई गिला नहीं क्योंकि यह भी एक प्रक्रिया का हिस्सा है दानव राज ना होगा तो फिर नरभक्षी कैसे लिखा जाएगा अगर नरभक्षी होगा तो तभी शाकाहार की कोई व्याख्या घड़ी जा सकती है

ऐसे ही मन हुआ कि चलो आपको चिढ़ा दूं धैर्य के साथ बकवास पढ़ने के लिए धन्यवाद { वाहिद नसीम वरिष्ठ पत्रकार हैं )

 

 

31-Jan-2020

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