सैय्यद तक़वी

आज का युग बीते समय को काफ़ी पीछे छोड़ आया है। आज के नवजवान छात्रों में काफ़ी तेज़ी आ गई है। विद्यार्थियों में उनके शिक्षकों द्वारा महत्वपूर्ण विषयों के प्रति रुचि उत्पन्न की जा रही है। इससे फायदा यह होगा कि विद्यार्थियों को भविष्य में होने वाली राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषमताओं का भली भांति ज्ञान प्राप्त होगा। देश का भविष्य नवजवानों के हाथ में होता है। स्कूल, विद्यालय और महाविद्यालय की  स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि छात्र राष्ट्र के आपसी मतभेदों को भुलाकर पूरे देश को अपनी शिक्षा के द्वारा शांति और अमन का पैग़ाम देंगे और लोकतंत्र की रक्षा करेंगे। मगर यहां तो कहानी उल्टी लिखी जा रही है। 

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लोकतंत्र के रक्षकों को मारा जा रहा है। विधा के मंदिर को तोड़ा जा रहा है। 
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार छात्रों के साथ  समस्याओं पर सर्वसम्मति बनाएं और लोकतंत्र की मजबूती में छात्रों को अपनी भूमिका निभाने का मौका दे। भारत सरकार को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। 
मेरा सभी युवाओं एवं छात्रों से निवेदन है कि भारत में मौजूदा विषयों पर अपनी राय बनाएं और अपने देश तथा विश्व में लोकतंत्र की ओर अपनी भागीदारी को मजबूत करें जिससे देश मजबूत हो।

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हम गर्व होना चाहिए कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन लोकतंत्र की पहली सीढ़ी को ही सरकार बाधित करने पर तुली हुई है। इसमें कोई शक  नहीं है कि छात्र स्कूल, कालेज के जरिए लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता है लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोस की बात है कि आज देश के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय राजनीतिक उद्दंडता का शिकार हो रहे हैं। 
ऐसा वही लोग कर सकते हैं जो कभी विश्वविद्यालय नहीं गये और ना शिक्षा हासिल की।
इतिहास गवाह है कि जब जब छात्र सड़कों पर आया है एक क्रांति आई है। शायद सरकार को इतिहास की जानकारी नहीं।
भारत में छात्र आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है। छात्रों ने हमेशा समाज-परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की एक आवाज पर लाखों छात्रों ने अपने कैरियर को दांव पर लगाते हुए स्कूल और कॉलेजों का बहिष्कार किया था। वर्ष 1973 में गुजरात विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन, 1974 में बिहार में छात्रों ने आंदोलन प्रारंभ किया। बाद में इस आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। पूर्व प्रधानमंत्री एवं आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित किए गए आपातकाल को इसी आंदोलन के बूते चुनौती दी गई और व्यवस्था परिवर्तन हुआ।  सन् 1988 में बोफोर्स कांड को लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में छात्र संगठनों द्वारा संघर्ष चलाया गया। नब्बे के दशक में शिक्षा के व्यावसायीकरण के विरोध में छात्रों ने कैम्पसों में अभियान चलाया। जे एन यू में निजीकरण के खिलाफ सशक्त आंदोलन हुआ। 
ना जाने कितने ऐसे उदाहरण हमारे सामने है जब छात्र शक्ति ने देश की दिशा बदल दी।
आज एक बार फिर छात्र शक्ति देश में मौजूद मानसिक रोगियों से लड़ने को तैयार दिखाई दे रही है। देश की जनता भी जान रही है कि छात्र संगठन को ख़त्म करने की कोशिश कौन कर रहा है? इसलिए अगर छात्रों एवं देश की जागरूक जनता द्वारा देश में एक नई क्रांति आ जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
syedtaqvi12@gmail.com

09-Jan-2020

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