एक समय था जब भारत में चुनाव घर, पानी, किसान,रोजगार,शिक्षा , नाली , सड़क जैसे मुद्दों पर होते थे। अब धार्मिक मुद्दों को उछाल कर धर्म का अपमान किया जा रहा है। लोगों की आवश्यकताओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
जैसे आजकल एन आर सी, सी ए ए, एन पी आर जैसे विषयों को मुद्दा बना दिया गया है। सवाल यह है कि क्या यह चीज़ें पहले नहीं थीं? निश्चित तौर पर थीं। फिर अचानक क्या हुआ कि हिंसा और बवाल शुरू हो गया। इसका कारण है गंदी राजनीति।
जानकारी इकट्ठा करने पर यह बात सामने आई कि मशहूर संविधान विशेषज्ञ, एक्सपर्ट और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप जी ने दो साल पहले ही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को नागरिकता संशोधन बिल पर धर्मों के नाम का इस्तेमाल न करने की चेतावनी दी थी। उन्होंने सलाह दी थी कि कानून में “हिंदुओं, सिखों, पारसियों आदि जैसे धर्मों के नामों” को छोड़कर- केवल “उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों” का उपयोग करना चाहिए। CAB 2016 पर JPC के सामने सबूत पेश करते हुए कश्यप जी ने सुझाव दिया था कि “उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों” में वे सभी शामिल होंगे, जिन्हें सरकार कानून के जरिए सुरक्षा देने का लक्ष्य निर्धारित कर रही है। 
लेकिन सरकार ने इस बात को स्वीकार नहीं किया और परिणाम पूरा देश देख रहा है। जनता कराह रही है। अब जब संसद के दोनों सदनों ने इस बिल को पास कर दिया है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से यह कानून बन चुका है तो एक ही रास्ता बचा है कि इसे केवल अदालत के जरिए या फिर संसद में दोबारा संशोधन बिल के जरिए ही बदला जाये। जनता संविधान के अनुसार अपने अधिकारों के तहत शांति पूर्ण प्रदर्शन करने के लिए स्वतंत्र है। 
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन की मैं आलोचना करता हूं मगर सरकार की ज़िद की भी आलोचना करता हूं और प्रशासन के हिंसक रवैए की भी आलोचना एवं निंदा करता हूं। राजनीति की दुनिया में जनता भगवान है उसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। यह सही है कि “इस लोकतांत्रिक देश का संविधान संसद को सर्वोच्च मानता है” लेकिन यही संविधान धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता की भी बात करता है।
एक तरफ संविधान में विश्वास रखने वाली जनता को स्वीकार करना चाहिए कि इसे सही करने के तरीके हैं, न कि हिंसक विरोध प्रदर्शन करके सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाय।” वहीं दूसरी तरफ़ संविधान में विश्वास रखने वाली सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि जनता को जो अधिकार संविधान ने दिया है उसे छीना ना जाए। संविधान अधिकारों के हनन की आज्ञा नहीं देता है। प्रशासन को भी समझना चाहिए कि जनता के साथ हिंसक रवैया ना अपनाए। हम अपने ही देशवासियों को मार रहे हैं। यह निंदनीय है।
जनता एवं विपक्षी पार्टियों के पास एक रास्ता है कि (CAA) की वैधानिकता को अदालत में चुनौती दें या लोकतांत्रिक तरीके से इसे संसद में बदलने की कोशिश की जा सकती है। इसके लिए इंतेज़ार करना होगा। आने वाले चुनावों में लोकसभा में बहुमत के आंकड़े को जनादेश के जरिए बदलकर या अधिनियम में संशोधन करके परिवर्तन किया जा सकता है।
एक और बात जो चिंताजनक है वह यह है कि जो लोग संसद में बिल का विरोध कर रहे थे उनके पास बहुमत नहीं था इस लिए वह कुछ नहीं कर सके लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्होंने संसद में बिल पर सरकार का साथ दिया और अब विरोध कर रहे हैं वो वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। इसे समझने की जरूरत है।
एन आर सी, सी ए ए, एन पी आर जैसे विषयों पर ठंडे दिमाग से सोचने और एक प्लेटफार्म पर रहने की जरूरत है। हमें समझना होगा कि एकता में ही बल है। हम सब भारतवासी एक हैं। 
जय हिन्द।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ
उप-निदेशक- स्पेशल क्राइम ब्यूरो, लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com

29-Dec-2019

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