-----------------------(-अमित संतोष मिश्रा )-----------------------------------
मैं यूपी के छोटे से शहर हरदोई में पला बढ़ा। पढ़ाई के लिए वाया इलाहाबाद दिल्ली पहुंचा। देश के हर छोटे शहर की तरह बचपन से मुसलमानों और दलितों को लेकर एक खास तरह की सीख में पला बढ़ा। ये सीखें असल में वो जहर है जिसने देश में एक जहरीली पीढ़ी तैयार की है। वह इनके खिलाफ जहर घोलने का कोई मौका नहीं छोड़ती। मैं अपने ऑफिस, घर-परिवार, रिश्तेदारों में मुसलमानों और दलितों को लेकर यह जहर रोज महसूस करता हूं। यह जहर तब और तीखा हो जाता है जब मुसलमान या दलित विरोध करते हैं। विरोध देखते ही इस हिंदूवादी (दलितों, आदिवासयों, पिछड़ों को छोड़कर) या ब्राह्मणवादी (सिर्फ जाति से ब्राह्मण नहीं) मानसिकता के जहर में दमन करने की नई तासीर उभर कर सामने आने लगती है। इनकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा करने की, साले यूनिवर्सिटी में पढ़ने जाते हैं या दंगा करने, 10-15 हजार मार डालें तो सही रहे, इन सालों को तो दबा कर ही रखना चाहिए, अगर इनकी संख्या बढ़ी तो ये हमें खत्म ही कर देंगे...ऐसी फब्तियां आजकल आम हैं। इस जहर का फायदा किसे मिलता है, यह किसी से छुपा नहीं है।
अब आते हैं उन जहरीली सीखों पर जो हमें बचपन से घुट्टी में पिलाई गई हैं-
- मुसलमानों और दलित साफ सुथरे नहीं होते। बहुत कम ही नहाते हैं।
- निरामिश या मैला कुचैला कुछ भी खाते हैं।
- एक खास बस्ती में रहते हैं और किसी से घुलते मिलते नहीं हैं। सिर्फ अपनों के ही साथ उठते बैठते हैं।
- मुसलमान हमेशा पाकिस्तान परस्ती की बात करते हैं। 
- धर्म को लेकर इतने कट्टर होते हैं कि कत्ल करने से भी गुरेज नहीं करते।

इन बातों का जहर मेरे भीतर भी गया। बचपन में मुसलमानों और दलित साथियों के लिए घर पर अलग चाय या पानी का कप रखना मेरे लिए सामान्य था। हरदोई में मेरा एक साथी आयूब जब घर आता तो उसके साथ ऐसा ही बर्ताव होता। मुझे यह सब एक व्यवस्था का हिस्सा ही लगता। जब इलाहाबाद पहुंचा तो पहला भ्रम दलितों को लेकर टूटा। कुछ अच्छे पढ़ने लिखने वाले और समृद्ध परिवार के एससी-एसटी सहपाठियों के साथ उठना बैठना हुआ। मेरे संसाधनों के हिसाब से वे मुझसे बेहतर खाते-पीते और रहते थे। मुझे लेकर उनके भीतर कभी जहर भी नजर नहीं आया। हां मैंने पूर्वांचल में ब्राह्मणों को लेकर क्षत्रिय और भूमिहारों के बीच में दया और उपेक्षा का भाव जरूर देखा। मजाक में ही सही वे हमेशा कहते- बाबा हमारी तरफ कहावत है ब्राह्मण के घर दावत में जाओ तो घर से खाकर जाओ क्योंकि वह कद्दू-पूड़ी ही खिलाएगा। बात मजाक की मजाक में ही रही और आज तक मजाक ही है। 
इसके बाद मेरा सामना मुस्लिम कम्यूनिटी के कुछ सीनियर स्टूडेंट्स से हुआ। मुझे वे बहुत नॉर्मल लगे। कई तो जूनियर होने के नाते कभी चाय-नाश्ते के पैसे भी नहीं देने देते। चूंकि इलाहाबाद में माइनॉरिटी हॉस्टल था तो उसमें भी आनाजाना होता। यह वह वक्त था जब सिमी एक्टिव था। तब सिमी आतंकी संगठन न होकर एक स्टूडेंट विंग होता था। कई बार मैं मुस्लिम हॉस्टल में होता तो सिमी वाले अपनी तकरीर देने चले आते। मेरे ज्यादातर मुस्लिम सहपाठी या तो उनका मजाक बनाते या लोड ही नहीं लेते। एक बार मुस्लिम सीनियर के साथ कमरे पर गेस्ट के रूप में रुके एक क्षत्रिय मित्र ने जब कमरे से निकल कर सुबह सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया तो कुछ स्वंयंभू मुस्लिम स्कॉलरों ने इसका विरोध किया। मेरे मुस्लिम सीनियर ने इलाहाबाद की गंदी गालियों से उनके स्कॉलर होने का भ्रम हमेशा के लिए उतार दिया। यह सब देखकर मेरा जहर हर कदम पर बुझता गया। मैं दिल्ली आया। यह शहर सही मायने में 'जात न पूछो साधो की' भावना को चरित्रार्थ करता है। कोई किसी की जात नहीं पूछता, न ही सरनेम से जाति का अंदाजा लगाता है। यहां पैसा और पोजिशन ही आपकी जात है। वैसे यहां क्या, दुनिया के हर बड़े शहर में ऐसा ही है। मैंने अपनी मर्जी से दिल्ली की रहने वाली ब्राह्मण से इतर जाति की कन्या से विवाह किया। जो थोड़ा बहुत पुराना जहर बचा था वह उसकी संगत में उतर गया। इस शहर में कई एससी-एसटी, मुस्लिम, पंजाबी, क्रिश्चियन, हिंदू, सिख सभी के अपने से बेहतर इंसानों से मिला। 
मैं खुशकिस्मत हूं कि घर से 20 साल से भी ज्यादा वक्त से बाहर निकलने और बेहतर अनुभवों की वजह से मेरा जहर खत्म हो गया। मेरे कई साथियों के बारे में मैं ऐसा नहीं कह सकता। कुछ मुझसे ओहदे, पैसे और रहन-सहन में तो बहुत आगे निकल गए लेकिन उनके जहर की तासीर वक्त के साथ घटने की बजाय और गहरी हो गई। लेकिन मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि ज्यादातर का जहर बचपन में सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई से ज्यादा नहीं है। मैं चैलेंज के साथ कह सकता हूं कि जो लोग मुस्लिम और दलितों के खिलाफ जहर उगलते हैं वह कभी भी इनके करीब नहीं रहे। उनका शायद ही कोई दोस्त इनमें से आता हो। वह यह नहीं जानते कि इनके जहर को एक खास राजनैतिक विचारधारा अपना हथियार बनाती है। 

अब बात करते हैं विरोध के विरोध की। मुस्लिम अपना हक मांगे तो कुचल दो, दलित हक मांगे तो कुचल दो, आदिवासी हक मांगे तो कुचल दो। साथ में यह ललकार भी लगाओ की एकबार हो जाए। लेकिन एक बात याद रखना देश में कुल आबादी का 80 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम-दलित-आदिवासी है। इन्होंने कभी सवर्णों और खुद पर हुए अत्याचार पर परचम उठाकर बदला नहीं मांगा। 
मेरी राय मानकर एक सोशल एक्सपेरिमेंट करके देखिएगा। किसी छोटी जगह से आए दलित या आदिवासी से ऊंची जाति के हिंदुओं को लेकर आपबीती सुनिएगा। जो किस्से उनके पास हैं उन्हें सुनकर आपका हिंदूराष्ट्र और रामराज्य डोलने लगेगा। वे हिंदूराष्ट्र की बेइमानी वैसे ही जानते हैं जैसे मुस्लिम NRC और CAB को लेकर जानते हैं।

उत्तर प्रदेश ब्यूरो सै काशिम के सौजन्य से 

 

 

17-Dec-2019

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