ललित गर्ग 

असल में भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी समस्या है। लेकिन भारत में इसने कहर बरपाया है। भ्रष्टाचार की यह आग हर घर को स्वाहा कर रही है। लेकिन यह आग घरों के साथ-साथ बैंकों को स्वाहा करने की ठानी है। नित-नये बैंकिंग घोटाले एक गंभीर समस्या बन गये हैं। बैंकिंग सैक्टर में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी फैल चुकी हैं, इस बात का अंदाजा रिजर्व बैंक के आंकड़ों से चलता है। बैंकिंग तंत्र में अनेक छेद हो चुके हैं। पीएनबी में अरबपति जौहरी नीरव मोदी और मेहुल चैकसी ने 11,300 करोड़ का घोटाला बैंक के ही कुछ अफसरों और कर्मचारियों के साथ मिलकर किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि बैंकिंग सैक्टर से जुडे़ अधिकांश घोटालों में आला अफसरों से लेकर कर्मचारी तक शामिल रहेे हैं। नोटबंदी के दौरान समूचा राष्ट्र बैंक मैनेजरों और कर्मचारियों के खुले भ्रष्टाचार का चश्मदीद बना है। नोटबन्दी को अगर किसी ने पलीता लगाया तो बैंकिंग सैक्टर ने ही लगाया।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारे देश में हर शाख पर उल्लू नहीं एक घोटालेबाज, एक भ्रष्ट आदमी बैठा है! भ्रष्टाचार के लिए ऐसे-ऐसे नायाब तरीके ढूंढे जाते हैं कि किसी को भनक तक नहीं लगे। बैंकों की घोटालों की मानसिकता एवं त्रासद स्थितियों ने न केवल बैंकों के प्रति विश्वास को धुंधला दिया है बल्कि बैंकों की कार्यप्रणाली को भी जटिल एवं दूषित कर दिया है।  बैंकों के चपरासी से लेकर आला अधिकारी तक बिना रिश्वत के सीधे मुंह बात तक नहीं करते। आम बैंक उपभोक्ता की आज कोई अहमियत नहीं रही, क्योंकि हर बैंक में कोई-न-कोई बड़ा घोटाला आकार ले रहा होता है और सभी उसी में व्यस्त होते हैं। बैंक भ्रष्टाचार से देश की अर्थव्यवस्था और प्रत्येक व्यक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और आज देश की गिरती अर्थ व्यवस्थ का बड़ा कारण बैंकिंग घोटाले ही है।

पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाला के सामने आते ही कठोर कार्रवाइयों के साथ-साथ बैंक के पूर्व चेयरमैन वरियाम सिंह एवं बैंक के पूर्व प्रबन्ध निदेशक जॉय थामस को गिरफ्तार कर लिया गया है। क्योंकि बैंक ने रियल एस्टेट की कंपनी एचडीआईएल को नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों का ऋण दिया। एचडीआईएल के चेयरमैन राकेश वाधवन और उनके बेटे सारंग वाधवन परिवार ने अपनी सम्पत्ति बना ली क्योंकि बैंक के अधिकारियों और वाधवन परिवार में सांठगांठ थी। अब घोटाले की परतें प्याज के छिलकों की तरह खुल रही हैं, ईडी ने परिवार की 12 महंगी कारें और उनकी 3,500 करोड़ की सम्पत्ति जब्त कर ली है।

वरियाम सिंह ने बैंक के चेयरमैन पद पर रहते एचडीआईएल को 4335 करोड़ का ऋण दिया था। वरियाम सिंह ही कम्पनी और राजनेताओं के बीच सम्पर्क सूत्र का काम करते थे। जब कम्पनी ने बैंक ऋण नहीं लौटाया तो बैंक की हालत खस्ता हो गई। इस घोटाले को छिपाने के लिए बैंक ने फर्जीवाड़े का सहारा लिया और 21 हजार से अधिक खाते खोले गए जिनमें अधिकतम खाते मृतकों के नाम थे। 45 दिनों में खाते सृजित किए गए और डिटेल भी आरबीआई को सौंप दी गई। प्रश्न है कि आरबीआई को ऑडिट के समय क्यों नहीं घोटाला का पता चला? जब घोटाला सामने आया तो लोगों के अपने ही धन को निकालने पर पाबंदियां लगा दीं गई। जब शोर मचा तो पहले दस हजार और फिर 25 हजार रुपए निकलवाने की अनुमति दे दी गई। डूब रहे बैंक के खाताधारक अपना धन मिलेगा या नहीं, इसको लेकर आशंकित हैं। इस तरह एक बार फिर भ्रष्ट सिस्टम के आगे आम आदमी लाचार हो चुका है। क्या आरबीआई लोगों के हितों की रक्षा कर पाएगा? यह सवाल सबके सामने है। जब लोग सड़कों पर आकर छाती पीटते हैं तो राजनीतिक दबाव के चलते सरकारें जांच बैठा देती हैं। थोड़ी देर के लिए तूफान थम जाता है और समय की आंधी सब कुछ उड़ाकर ले जाती है। घोटालों का नतीजा चाहे जो भी निकला हो, किसी को सजा हुई हो या नहीं, अगर इन घोटालों का भयावह एवं डरावना सच यही है कि हमारी व्यवस्था में छिद्र-ही-छिद्र हैं।

नेहरू से मोदी तक की सत्ता-पालकी की यात्रा, लोहिया से राहुल-सोनिया तक का विपक्षी किरदार, पटेल से अमित शाह तक ही गृह स्थिति, हरिदास से हसन अली तक के घोटालों की साईज। बैलगाड़ी से मारुति, धोती से जीन्स, देसी घी से पाम-आॅयल, लस्सी से पेप्सी और वंदे मातरम् से गौधन तक होना हमारी संस्कृति का अवमूल्यन- ये सब भारत हैं। हमारी कहानी अपनी जुबानी कह रहे हैं। जिसमें भ्रष्टाचार व्याप्त है और अब जनता के धन का सबसे सुरक्षित स्थान भी असुरक्षित हो गया है। पिछले कुछ वर्षों से भारत में इस नए तरह के भ्रष्टाचार ने समूची अर्थ-व्यवस्था को अस्थिर एवं डांवाडोल बना दिया है। बड़े घपले-घोटालों के रूप में सामने आया यह भ्रष्टाचार बैंकों एवं कारपोरेट जगत-बड़े घरानों से जुड़ा हुआ है। भारत में नेताओं, कारपोरेट जगत के बडे-बड़े उद्योगपति तथा बिल्डरों ने देश की सारी सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिए आपस में गठजोड़ कर रखा है। इस गठजोड़ में नौकरशाही के शामिल होने, न्यायपालिका की लचर व्यवस्था तथा भ्रष्ट होने के कारण देश की सारी सम्पदा यह गठजोड़ सुनियोजित रूप से लूटकर अरबपति-खरबपति बन गया है। बड़ी दूरदर्शिता से 21 दिसम्बर 1963 को भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे पर संसद में हुई बहस में डॉ. राममनोहर लोहिया ने जो भाषण दिया था वह आज भी प्रासंगिक है। उस वक्त डॉ. लोहिया ने कहा था सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है।

यह सच है कि आज भी ऐसे बड़े घराने हैं जो जब चाहें किसी भी सीएम और पीएम के यहां जब चाहें दस्तक दें तो दरवाजे उनके लिए खुल जाते हैं। देश में आदर्श सोसायटी घोटाला, टू जी स्पैक्ट्रम, कामनवैल्थ घोटाला और कोयला आवंटन को लेकर हुआ घोटाला आदि कारपोरेट घोटाले के उदाहरण हैं। अब इस सूची में बैंकों के घोटालों की भी लम्बी सूची है। चाहे सहकारी बैक हो या पंजाब नेशनल बैंक, चाहे बडौदा बैंक हो या आईसीआई बैंक- जनता की मेहनत की कमाई का इन सभी ने दुरुपयोग किया।

अब तो हालत यह हो गई है कि हमारा देश भ्रष्टाचार के मामले में भी लगातार तरक्की कर रहा है। विकास के मामले में भारत दुनिया में कितना ही पीछे क्यों न हो, मगर भ्रष्टाचार के मामले में नित नये कीर्तिमान बना रहा है। इन स्थितियों में भारत कैसे महाशक्ति बन सकेगा? महाशक्ति बनने की बड़ी कसौटी भ्रष्टाचार की है। सरकार भ्रष्ट हो तो जनता की ऊर्जा भटक जाती है। देश की पूंजी का रिसाव हो जाता है। भ्रष्ट अधिकारी और नेता धन को स्विट्जरलैण्ड भेज देते हैं। इस कसौटी पर अमरीका आगे हैं। ’ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल’ द्वारा बनाई गयी रैंकिंग में अमरीका को 19वें स्थान पर रखा गया है जबकि चीन को 79वें तथा भारत का 84वां स्थान दिया गया है। इन स्थितियों में वह कैसे अमेरिका एवं चीन से आगे निकल सकेगा?

हमारे राष्ट्र के सामने अनैतिकता, महंगाई, बढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण, आर्थिक अपराध आदि बहुत सी बड़ी चुनौतियां पहले से ही हैं, उनके साथ भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। राष्ट्र के लोगों के मन में भय, आशंका एवं असुरक्षा की भावना घर कर गयी है। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होेता है। पर यहां तो निराशा, असुरक्षा और भय की लम्बी रात की काली छाया व्याप्त है। मोदी के रूप में एक भरोसा जगा क्योंकि मनमोहन सिंह की सरकार ‘जैसा चलता है, वैसे चलता रहे’ में विश्वास रखती थी, जिससे भ्रष्टाचार की समस्या को नये पंख मिले। भ्रष्ट स्थितियों पर नियंत्रण के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसी खूबसूरत मोड को तलाशने की कोशिश की।  भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ सार्थक करने का प्रयत्न किया। लेकिन प्रश्न है मोदी अपनी नेकनीयत का बखान तो कर रहे हैं, वे ईमानदार एवं नेकनीयत है भी, लेकिन शासन व्यवस्था एवं बैंकिंग प्रणाली को कब ईमानदार एवं नेकनीयत बनायेंगे? देखना यह है कि वे भ्रष्टाचार को समाप्त करने में कितने सफल होते हैं। 

10-Oct-2019

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