By : khulasapost magazine story

Writer : Akash Bhatt

अभी हाल ही में महाराष्ट्र के कोरे गांव में दलितों पर हमले हुए आखिर इन सभी घटनाओं के पीछे एक ही कारण हैं राजनीति , हर शक्तिशाली वर्ग कमज़ोरों पर हावी होना चाहता हैं | और यह सदियों से होता आ रहा है ,पर इसका वर्तमान स्वरूप काफी व्यथित करने वाला और भयावाह है। भीमा-कोरे गांव लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर हुई हिंसा से पूरे महाराष्ट्र में तनाव का माहौल बना हुआ है अखबारों के पन्नो और न्यूज चैनलों में इस हिंसा की खबर देखने के बाद दिमाग में कई सवाल उपजते हैं की आखिर यह भीमा-कोरे गांव लड़ाई की सालगिरह क्या है, क्यों दलित इस लड़ाई की सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं ? इन सवालों के जवाब के लिए हमें इतिहास के पन्नो पर झाँकना होगा की आखिर भीमा-कोरे गांव लड़ाई क्या है. 

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई आज से 200 साल 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी. यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी. अंग्रेजों की तरफ से महार समुदाय के 500 लड़ाकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 सैनिकों को हराया था. यह बात आपको सोचने के लिए जरुर मजबूर करेगा की आखिर महारों ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ाई क्यों लड़ी तो इस संबंध में दलित मामलों के जानकार डॉ. शैलेंद्र लेंडे के मुताबिक, 

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“जब शिवाजी ने मराठा राज्य स्थापित किया तब उनकी सेना में दलित भी हुआ करते थे. बाद में जब पेशवा शासकों के हाथ सत्ता आई तो दलितों का शोषण होने लगा. उस वक्त दलित चाहते थे कि वो पेशवा की सेना में शामिल हों, लेकिन जाति प्रथा और सामाजिक धारणाओं के कारण उन्हें सेना में शामिल नहीं किया गया. बता दें कि पेशवा ब्राह्मण समाज से आते थे. छूआछूत जैसी प्रथा के कारण दलित और ब्राह्मणों में हमेशा मतभेद रहा” 

इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ. उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए. वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

उस समय अंग्रेज भारत में दमनकारी नीति के तहत सभी सियासतों पर कब्ज़ा चाहते थे. उस दौर में पुणे में पेशवा शक्तिशाली माने जाते थे. अंग्रेजों ने उनपर कई बार हमले किये, इसके बावजूद वे कामयाब नहीं हो पा रहे थे. बाद में जब महार समुदाय की बगावत सामने आई तो अंग्रेजों ने उन्हें अपने साथ मिलाया और कोरेगांव युद्ध में जीत हासिल की. ऐसा कहा जाता है कि इस हार के बाद पेशवाओं का बाकी इलाकों में राज कमजोर हो गया.

उस लड़ाई में मारे गए महार सैनिकों को उनकी वीरता और साहस के लिए सम्मानित किया गया और उनके सम्मान में भीमा कोरेगांव में स्मारक भी बनवाया, जिन पर महारों के नाम लिखे गए. इसके बाद से पिछले कई दशकों से भीमा कोरेगांव की इस लड़ाई का महाराष्ट्र के दलित जश्न मनाते आ रहे हैं. हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं. 

यही वो जयस्तंभ है, जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी. कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं

जनरल थॉमस हिस्लोप ने इस युद्ध को "सेना के इतिहास में दर्ज किए गए सबसे वीर और शानदार उपलब्धियों में से एक" कहा। एमएस नारावने के अनुसार, "एक विशाल संख्या में मराठा सेना के खिलाफ कंपनी के सैनिकों की एक छोटी संख्या द्वारा दिखाई गई वीरता सही रूप में कंपनी की सेनाओं के इतिहास में वीरता और धैर्य का सबसे गौरवशाली उदाहरण माना जाता है।"

माना जाता है कि युद्ध में किसी भी पक्ष ने निर्णायक जीत हासिल नहीं की थी लेकिन पेशवा की बड़ी सेना को महारों की बहुलता वाली कंपनी की एक छोटी टुकड़ी से कड़ी टक्कर मिली, यह बात महत्व रखती है। हालांकि आज इस युद्ध को ऊंची जाति पेशवाओं पर निचली जाति की जीत के रूप में चित्रित किया जाता है । अभी ताजा संघर्ष की शुरुआत 1 जनवरी को हुई जब भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं बरसी पर दलित समुदाय ने हर साल की तरह जुलूस निकाला. जिस पर कुछ कथित हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पथराव करने का आरोप है. इससे हिंसा और भड़क गई और एक व्यक्ति की मौत हो गई. यह हिंसा एक क्षेत्र से निकल के लगभग पूरे महाराष्ट्र में फैल गई  

 
05-Jan-2018

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