लेख : एम.एच. जकरीया 

हमारी देश की संस्कृति में  औरत का मकाम सब से ऊंचा माना जाता है ,आज भी नारी को  परिवार व समाज की अस्मिता समझी जाती है । हमारे पूर्वजों और धार्मिक मान्यताओं में भी नारी जाती को देवी का स्थान प्राप्त है। लेकिन फिर भी आये दिन हमारे ही इस देश में महिलाओ के साथ उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाए बढ़ती जा रही है , हाल ही में एक  पत्रिका के संस्थापक और मुख्य सम्पादक  पर, बेटी की उम्र की सहयोगी महिला पत्रकार ने उत्पीड़न का आरोप लगाया और दूसरी घटना निर्भया की थी जैसे ही ये घटनाए हुई  मीडिया ने  चारों तरफ महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया, टी वी चेनलो में डिबेट और गहन मंथन का कार्यक्रम चल पड़ा ।

कोई भारतीय परम्परा को ही दोषी बता रहा है, तो कोई कानून व्यवस्था पर ऊँगली उठा रहा है; कोई पुरुषों की मानसिकता को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई नारी की कमजोरी को इसके लिए दोषी मान रहा है। नारी अस्मिता की रक्षा पर चिंतन करने के बजाय दोष किसका, इसपर मंथन चल रहा है। यह चिंताजनक बात है। ऐसे में भारतीय समाज में महिला विषयक दृष्टिकोण पर विचार करना होगा।अश्लीलता के कारण ही महिलाओ पर अपराधों में बढ़ोतरी हुई है | 

नारी उत्पीड़न के लिए इमेज परिणाम

हमारे समृद्ध व प्रबुद्ध समाज ने स्वच्छंदता के नाम पर इन नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ीं है । विशेषकर समाज के पढ़े-लिखे लोग जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतंत्रता का ढोल पीटते हैं, उन्होंने  स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता नारी शक्ति को सरेआम तमाशा और मनोरंजन का साधना बना दिया। मॉडलिंग, एक्टिंग और डांसिंग के नाम पर नारी अस्मिता को सरेआम बेचा जाने लगा है। फैशन और प्रदर्शन  के नाम पर लोकलु भावन बनने की होड़ लग सी गई है और मशहूर होने के भ्रामक चाह ने नारी की तरफ देखने की पुरुषों की दृष्टि को कामुक बना दिया है ।

हमारे बुद्धिजीवियों ने देश के विकास के लिए बहुत सी योजनाएं तो बनाईं, परंतु नारी की ओर देखने की पुरुष की दृष्टि पर कभी चिन्तन नहीं किया। यही कारण है कि आज के फिल्मों के गीत, कहानी और व्यवसाय जगत में नारी-अस्मिता की बोली लगाई जाने लगी है। ऐसी विडंबनाओं के चलते क्या अब नारी को पवित्रता की दृष्टि से देखने वाले समाज का निर्माण होगा?
 
विश्व के सभी देशों में किसी न किसी रूप में नारी उत्पीडि़त है, चाहे व विकसित देश हों या विकासशील. पुरुषों की तरह अधिकार व स्वतंत्रता पाने के लिए महिलाएं संगठन बना कर आवाज भी उठाती हैं लेकिन  वह भी सिर्फ हो हल्ला मचा कर ख़ामोशी  . आज के समय में हमारा  समाज स्त्री के अधिकारों को मान्यता देने का ढोल ज़रूर पीटता  है लेकिन पुरुष प्रधान समाज आज भी महिलाओ को  आगे बढ़ने के समय वह रोड़े भी अटकाता है क्योंकि पुरुष खुद अपने वर्चस्व में कमी नहीं आने देना चाहता. हर साल 8 मार्च को पूरा विश्व महिला दिवस के रूप में मनाता ज़रूर है.

लेकिन फ़िर वही खड़े नज़र आते है यहाँ बड़ी बड़ी बातें ज़रूर की जाती हैं.लेकिन धरातल पर परिणाम कुछ भी नहीं निकलता ? मानवाधिकार आयोग व संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी अपनी रिपोर्ट पेश करते हैं. गलतियों को सुधारने के लिए पहले किए गए प्रण को फिर से दोहराया जाता है, पर होता कुछ नहीं. उदाहरण के लिए आज भी भारत में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल संसद में वर्षों से लटक रहा है.

नारी  ही  परिवार की रीढ़ होती है परन्तु फिर भी नारी का उत्पीड़न व शोषण होता हुआ आ रहा है, लेकिन क्यो? देश मे अनगिनत संस्थाऐ है जो महिला उत्थान के लिये प्रयासरत है और सरकार भी अनेकानेक प्रयास कर रही है परन्तु फिर भी अच्छा परिणाम नही मिलता। महिला उत्थान को समर्पित संस्थाएं महिलाओ को उनके अधिकार व शोषण के प्रति जागरूक कर रही है परन्तु अधिकतर गॉव-देहात मे नारियो की मानसिकता अभी भी वैसी ही है अर्थात पुरानी मानसिकता वाली महिलाऐ जिनकी वजह से आने वाली भावी नारियो के उत्पीड़न को बढ़ावा मिल रहा है क्योकि क्योकि वे चाहती है उनकी परम्परा चलती रहे या यह कह सकते है कि महिलाऐ ही महिलाओ के उत्पीड़न की जिममेदार है जिनके विचार पुरानी रिती रिवाजो वाले है जो अपनी बहू मे भी वो ही संस्कार देखना चाहती है

जो उन्होने झेले है, कुछ इन शब्दो मे कह सकते है जो उन पर जो बीती है वे वही सब कुछ अपनी बहु पर करना चाहती है। वो महिला चाहती है कि मेरी बहु बहु बनकर ही रहे। इसके साथ ही पुराने रिति रिवाजो वाले टी0वी0 सीरियल भी महिला उत्पीड़न को बढ़ावा दे रहे है जिसे अधिकतर महिला ही देखती हुई मिल जायेगी और उसके किरदार का असर घरेलू महिलाओ मे धीरे-धीरे घर करने लगा है उन्हे पता भी चलता कि कब वह उस किरदार के जैसी हो गई। शहरो मे भी पुरानी मानसिकता वाली महिलाऐ भी कम नही है आये दिन समाचार पत्रो, न्यूज चैनलो मे उत्पीड़न सम्बन्धी खबर पढ़ने को मिल जाती है।

महिलाओ की ये पुराने ख्यालो की सोच से सिर्फ देश के विकास को ही नही बल्कि स्वतन्त्र विचारो वाली महिला को भी कैद कर लिया है। ऐसी मानसिकता वाली महिलाऐ आज भी हर घर मे देखने को मिल जाएंगी। फिर भी आज का पुरूष महिला उत्थान को बढावा देने का प्रयास कर रहा है और उसको अपने बराबर का समझने की कोशिश कर रहा है परन्तु एक महिला जो रूढ़िवादी मानसिकता वाली है वह किसी ओर महिला आफिस जाते हुए या किसी महिला को बाहर काम करने को लेकर उसे बदनाम करने मे कोई कसर नही छोड़ती। छोटी छोटी बातो पर उसे बदचलन अवारा एवं अन्य गन्दी बातो से उसकी अवहेलना करना उनकी मानसिकता है। मेरे विचार से जो संस्थाऐ महिला उत्थान के लिये कार्य कर रही है उन्हे सर्वप्रथम महिलाओ की मानसिकता को बदलना होगा।

यह आम बात है कि जब कोई भी महिला अपने घर के काम से खाली हो जाती है तो वह सिर्फ मोहल्ले या गॉव मे इकटठी होकर कुछ भी ऐसा कार्य नही करती जो समाज या देश के लिये लाभदायक हो बल्कि इधर की उधर करना उनकी आदत मे शामिल होता है। देखियो रि उसकी शादी को अभी साल भर नही हुआ वो आफिस भी जाने लगी आदि। शादी के बाद लड़का न हो तो ससुरालियो की नजर मे अपशगुन मानी जाती है और सास नन्द की नजरो मे उसकी कोई इज्जत नही होती। इन सब बातो को लेकर पुरूष भी खुद को अपमानित महसूस करता है और महिला का उत्पीड़न करना शुरू कर देता है।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ पुरानी मानसिकता वाली सासो का ही है। यदि एक महिला चाहे तो यह सब कुछ बदल सकता है लेकिन क्यो उठाये ये कदम क्योकि उन्हे तो अपनी परम्परा निभानी है। ऐसी परम्परा का क्या फायदा जो ना समाज के उत्थान मे है और ना ही घर के उत्थान में ।

यदि कोई विधुर विवाह करता है तो समाज उसे सम्मानजनक दृष्टि से देखता है लेकिन कोई विधवा विवाह करती है तो उसे समाज टेढ़ी नजरो से देखता है। आस पडोस की महिलाऐ उस विधवा को कोसती है कि डायन होगी तभी तो पहले पति को खा गई? इसके पैर ही अपशगुन है जो पहला पति मर गया। कहने का तात्पर्य यह है कि महिला ही महिला के जान की दुश्मन बनी हुई है वो किसी दूसरी महिला के आगे बढने पर खुश नही है।

28-Dec-2017

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