लेखः- तेजबहादुर सिंह भुवाल

इतिहास गवाह है कि राजपूतों ने अपने वीरता और दृढ़ संकल्प के कारण हिन्दुस्तान की मातृभूमि के आन-बान और शान को कभी कम नहीं होने दिया। राजपूतों ने अपने बाजुओं के बल और फौलादी ताकत से दुश्मनों का सामना डट कर किया है। इसी कारण विभिन्न राजाओं ने अपने सेनापति के रूप में राजपूतों को ही नियुक्त किया करते थे।

राजपूत सूर्यवंश में ऐसे तो बहुत से वीर, बहादुर और प्रतापी राजा हुए पर वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह जैसा दूसरा कोई नहीं हुआ। महाराणा प्रताप ने मुगल सम्राट अकबर की आधीनता को स्वीकार नहीं करने के लिए राजपाठ छोड़कर जंगल में रहे और घास की रोटियां भी खाई। पर मरते दम तक वह मुगलों की आधीनता स्वीकार नहीं की। महाराणा प्रताप में इतनी शक्तियां थी कि वे एक बार में घोड़े पर सवार इंसान और घोड़े को दो हिस्सों में पूरा काट दिया करते थे। प्रताप में शेर की दहाड़, बाजुओं में फौलादी बल उनकी इच्छा शक्ति और आत्मबल के कारण हल्दीघाटी युद्ध में हजारों मुगल सैनिकों को अकेले मार गिराया।

उनका नाम कुंवर प्रताप सिंह, पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह था। उनका जन्म कुम्भलगढ़ राजस्थान में 9 मई 1540 ईस्वी में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह, दादा राणा संग्राम सिंह और परदादा महाराणा कुंभा सिंह थे। महाराणा प्रताप की माता महारानी जीवत कुंवर जी थी। उनकी पत्नि अजबदेह और पुत्र राणा अमर सिंह थे। उनकी राज्य सीमा मेवाड़ थी। उनका शासन काल 1568 से 1597 ईस्वी तक रही। उनके गुरू आचार्य राघवेन्द्र थे और उनको अस्त्र शस्त्र की शिक्षा राजा जयमल मड़ेतिया ने दी थी।

वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर मेवाड़ में सिसोदिया वंश के राजा थे। महाराणा प्रताप सिंह का नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिए अमर है। महाराणा प्रताप सिंह की जयंती विक्रय संवत कैलेन्डर के अनुसार प्रति वर्ष ज्येष्ठ शुल्क पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। महाराणा प्रताप सिंह का वजन 110 किलो और ऊॅंचाई 7 फीट 5 इंच थी। वे अपने पास हमेशा दो तलवार वाले म्यान और 80 किलो का भाला, 80 किलो का कवच रखते थे। उनकी तलवार, कवच, भाला, ढाल मिलाकर कुल 207 किलो का था।

हिन्दूस्तान की भूमि में राजपूतों को उनकी वीरता और बहादुरी के कारण राज्य की सुरक्षा का जिम्मा दिया जाता था। इसी प्रकार एक राजपूत के रूप में राजामान सिंह का अकबर की सेना में सेनापति के रूप में उदय हुआ और राजा मान सिंह सम्राट अकबर के एक विश्वसनीय पात्र बन गए थे। चूँकि राजा मान सिंह की बुआ का विवाह सम्राट अकबर से हुआ था और वास्तव में इसीलिए सम्राट अकबर के साथ उनका रिश्ता फूफा और भतीजे का था। दूसरी तरफ महाराणा प्रताप भी राजा मान सिंह के रिश्तेदार थे, लेकिन महाराणा प्रताप मुगलों से नफरत करते थे इसलिए मानसिंह को भी आक्रमणकारी मानने लगे थे। इस प्रकार जब अकबर ने एक संधि पर हस्ताक्षर कराने और मुगल संप्रभुता को स्वीकार करने के लिए मान सिंह को महाराणा प्रताप के पास भेजा, जिसमें उन्हें रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन वहाँ संधि नहीं होने पर दोनो राजपूतों में मदभेद उत्पन्न हो गया। वर्ष 1576 में मुगलों और महाराणा प्रताप के बीच हल्दी घाटी का भंयकर युद्ध हुआ।

मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था, वे प्रताप को अपना बेटा मानते थे, महाराणा प्रताप भी बिना भेदभाव के इनके साथ रहते थे, आज भी मेवाड़ के राज चिन्ह में एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील का चित्र अंकित है।

महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक वफादार घोड़ा चेतक और उनका स्वामी भक्त हाथी भी था, जिसका नाम रामप्रसाद था। उनका हाथी इतना समझदार व ताकतवर था कि उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही 13 हाथियों को मार गिराया था। उस हाथी को पकड़ने के लिए लिए अकबर ने 14 हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उस पर 14 महावतों को बिठाया गया, तब जाकर रामप्रसाद को बंदी बना पाये। मुगलों ने उस हाथी को गन्ने और पानी दिया, पर उस स्वामी भक्त ने 18 दिन तक मुगलों का खाना-पानी को छुआ तक नहीं और शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि ‘‘जिसके हाथी को मेरे सामने नहीं झुका पाया, उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाऊंगा’’।

हल्दीघाटी के युद्ध में मेवाड़ से 20 हजार सैनिक शामिल हुए थे और अकबर की ओर से 85 हजार सैनिक शामिल हुए थे। महाराणा प्रताप सिंह ने जब महल का त्याग किया तब उनके साथ लोहार जाति के लोगों ने भी अपना घर छोड़ा और दिन-रात महाराणा के फौज के लिए तलवारे बनाते थे। इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह ही विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला और राजपूतों ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।

सन् 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुगल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चैकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपुर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।

महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया, उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधारने के बाद वापस आगरा ले आया।

              एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए। उनकी यह वीरता देशवासियों के दिलों में सदा के लिए मातृभूमि के प्रति सच्ची निष्ठा, देश प्रेम और बलिदान की भावना को जागृत रखेगा। जय महाराणा-जय राजपूताना।  

 

09-Jul-2019

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