एम.एच.जकरीया 

मई माह का पहला दिन यानि आज 1 मई को श्रमिक दिवस के नाम से जानते हैं कभी पत्रकार भी श्रमजीवी कहलाया करते थे लेकिन आज के बदलते वक्त में अब श्रमजीवी पत्रकार मीडियाकर्मी बन गए हैं. भले ही शब्द बदल गए हो लेकिन आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो खुद को श्रमजीवी पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं श्रमजीवी कहलाने का अर्थ वे लोग बखूबी जानते हैं, जो आज भी श्रमजीवी बने हुए हैं किन्तु जो लोग मीडियाकर्मी बन गये हैं उन्हें एक श्रमजीवी होने का सुख भला कैसे मिल सकता है। एक श्रमजीवी और एक कर्मचारी के काम में ही नहीं, व्यवहार में भी अंतर होता है।

एक मीडियाकर्मी या कर्मचारी का लक्ष्य और उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ एक निश्चित कार्य को पूर्ण कर अधिकाधिक पैसा कमाना होता है किन्तु एक श्रमजीवी का अर्थ बहुत विस्तार लिये हुए है । उसका उद्देश्य और लक्ष्य पैसा कमाना नहीं होता पत्रकारिता में आने का ध्येय रूपये कमाना नहीं बल्कि सुख कमाना है अपनी लिखी खबर से निकम्मों के खिलाफ, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्यवाही होते देखना है कह सकते हैं ऐसे बेबाक एवं वास्तविक श्रमजीवी पत्रकार इसीलिए गरीबी में जीते हैं और गरीबी में ही मर जाते हैं । यही पत्रकार सेवा  भाव से कार्य करते हैं न कि कर्मचारी के भाव से।

कुछ ऐसे भी श्रमजीवी पत्रकार या पत्रकार संगठन के नेता हुए हैं जो वास्तविक श्रमजीवी  पत्रकारों का शोषण करते हैं इसका बड़ा उदहारण छत्तीसगढ़ में ही देखने को मिल जाएगा. ये पिछली सरकार के द्वारा पोषित थे, ये पत्रकार नेता संगठन का दबाव दिखाकर जनसम्पर्क विभाग से लम्बी चौड़ी राशि एजेंसी के नाम पर वसूल करते रहे यहां पर सवाल यह है कि यदि ये पत्रकार नेता खुद का न्यूज एजेंसी चलाते थे तो फिर ये श्रमजीवी पत्रकार कैसे हुए ?

कह सकते हैं तत्कालीन सरकार ने आँखे बंद कर फर्जी तरीके से चलने वाले न्यूज एजेंसियों जो कभी खुलते ही नहीं थे उन्हें आँख बंद कर पैसे बाँटे थे यही श्रमजीवी पत्रकार संगठन का नेता पत्रकारों का कम अपना हित ज्यादा साधते थे वे सरकार को संगठन का धौंस दिखाकर अपना काम निकलवाते रहे हैं. जिसे सीधे साधे पत्रकार बंधू समझ नहीं पाते है साल में एक दो बार किसी मंत्री या  मुख्यमंत्री  के आतिथ्य में सम्मेलन कराने के नाम पर पिछली सरकार से मोटा पैकेज और व्यापारियों से चंदा उगाही करते थे और सम्मलेन के नाम पर पत्रकारों से भी वसूली करके ये पत्रकारों के नेता अपनी जेबे भरते रहे वैसे इनमे से अधिकतर या तो पूर्व पत्रकार है  या पत्रकार ही नहीं है

जहाँ तक मेरी जानकारी है इन तथाकथित पत्रकारों के ना एक भी लेख प्रकाशित होते है और ना ही समाचार दिखाई देते है ये केवल वास्तविक पत्रकारों का शोषण करते है जागरूक पत्रकार भाइयो को समझना होगा और ऐसे फर्जी पत्रकार नेताओ को बे-नकाब किया जाना चाहिए तभी छत्तीसगढ़ में साफ सुथरी पत्रकारिता हो सकेगी !

 
01-May-2019

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