लेख : एम.एच.जकरीया 

गुजरात में भीतर ही भीतर बदलाव की बयार बह रही है, लेकिन ‘कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि मतदान के दिन वोट किस पाले में गिरेगा ! गुजरात चुनाव के नतीजों के बारे में अभी से अनुमान लगाने में तो महारथियों के भी पसीने छूटने लगे है. गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों के सन्दर्भ में जिस तरह के अनुमान लगाये जा रहे है, उससे  असामंजस्य की स्थिति दिखाई दे रही है, अभी भी किसी भी पार्टी के लिए राह इतना आसां नहीं है, यहाँ हर दिन इतने बदलाव गुजरात की राजनीति में देखे जा रहे है उससे सारे अनुमान धरे के धरे रह जाते है ,इस बार के विधानसभा चुनाव में सब कुछ सीधा दिखाई जरुर दे रहा है लेकिन चुनाव में रोज जिस  तरह के समीकरण बदल रहे है, उससे कुछ भी समझना मुश्किल जान पड़ता है | चुनाव अभियान की शुरूआत के एक पखवाड़े बाद दो चीजें बिल्कुल साफ हैं | एक तो यह कि दोनों दल खुले मैदान में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं लेकिन अपने ऑफिस के एकांत में बिल्कुल असमंजस में हैं. दूसरी बात कि हिंदुत्व के जुमले की जगह जातिगत पहचान के मुहावरे ने ले ली है और इस तरह बीजेपी से उसका सबसे बड़ा हथियार छिन गया है !

चुनावी गुणा-भाग और समीकरण बैठाने के मामले में वीरता का कोई अवॉर्ड दिया जाता हो तो फिर शौर्य और पराक्रम के ऐसे सबसे ऊंचे अवार्ड के हकदार निश्चित ही अमित शाह होंगे. गुजरात के चुनाव में एक अकेले वही हैं जो बीजेपी को 150 सीट मिलने की भविष्यवाणी कर रहे हैं. इसे दुर्भाग्य कहिए कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं तक को लग रहा है कि अमित शाह कुछ ऐसा देख पा रहे हैं जिसे हम माइक्रोस्कोप लगाकर भी ना देख पाएं.

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तो फिर, बीजेपी इतने असमंजस में क्यों है?  विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अभी जुमले बाज़ी से काम नहीं चलने वाला है क्योकि अभी सारे के सारे समीकरण पहले की तरह नहीं रह गए है, पटेल पाटीदार समाज दलित समाज और ओ.बी.सी. के मिजाज़ बदले हुए दिखाई दे रहे है | 

हाल ही में गुजरात के राजकोट विधानसभा में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय भाई रूपाणि के नामांकन सभा से हार्दिक पटेल की सभा की तुलना की जाये तो हार्दिक पटेल की सभा में जुटने वाली भीड़ की तादाद बहुत अधिक दिखाई दी वहीँ अल्पेश पटेल की सभा में भी उन्हें सुनने वालो की तादाद काफी संख्या में दिखाई दे रही है | अब कहा जा सकता है की बीजेपी 150 सीटें जीतने जा रही है,  वह दो महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी पर टिका है. एक तो यह कि राहुल गांधी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर को सुनने के लिए भारी भीड़ जुट रही है. यह तीन नेता बीजेपी के खिलाफ चुनावी जंग की अगुवाई कर रहे हैं. अब यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि नया नेता और नई बात सुनने के ख्याल से इतनी भारी भीड़ राहुल गांधी, हार्दिक पटेल या फिर अल्पेश ठाकोर की सभा में कैसे जुट रही है स्वस्फूर्त या लायी हुई भीड़ कहा जाये 

राहुल गांधी की सभा के बारे में तो यह बात निश्चित तौर पर गलत है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी की रैलियां कमाल आर खान की फिल्मों से भी ज्यादा फ्लॉप साबित हो रही थीं. जाहिर है, कोई ना कोई व्याख्या होनी चाहिए कि आखिर राहुल गांधी की राजनीति ने केआरके (कमाल आर खान) वाला चोला उतारकर एसआरके (शाहरुख खान) वाला बाना कैसे धारण कर लिया.

दूसरी बात यह कि बीजेपी अभी तक अपने चुनावी अभियान का मुहावरा नहीं तय कर पाई है. अब चाहे इसे बीजेपी के लिए आप अच्छा मानें या बुरा लेकिन फिलहाल बीजेपी राहुल, हार्दिक, अल्पेश और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की बातों पर सिर्फ प्रतिक्रिया करती नजर आ रही है. बीजेपी के लिए परेशानी का सबब यह भी है कि जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी और आरक्षण की मांग उसके चुनावी अभियान की राह में रोड़ा बनकर खड़े हैं. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ध्रुवीकरण या कह लें भावनाओं का उभार लोगों में जोर पकड़ता नहीं दिख रहा.

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बीजेपी सियासत के आसमान में अपनी पसंद के गुब्बारे बेशक उड़ा रही है. वह कश्मीर, पाकिस्तान और रोहिंग्या जैसे विषयों के गुब्बारे बीच-बीच में चुनावी फिजां में तैराने में लगी है. नवसारी (सूरत के नजदीक) की सभा में अमित शाह ने तो यह भी कहा कि हम गुजरात को कर्फ्यू-मुक्त जिंदगी देंगे. बीजेपी की चुनावी रैलियों में हिंदुत्व के आगे बढ़ते जाने की टेक वाले गीत बजते सुने जा सकते हैं. इन गीतों के बोल हैं 'राजनीति की करो तैयारी, आते हैं अब भगवाधारी'. लेकिन अभी तक दिख यही रहा है कि हिंदुत्व के आगमन की सूचना देते ऐसे गीतों से लोगों को अब जम्हाई आ रही है.

कांग्रेस अपने बदले अवतार में हिंदुत्व की बहस से एकदम दूर है. कांग्रेस पर एक ठप्पा मुस्लिम समर्थक होने का है. इस ठप्पे से छुटकारा पाने के लिए राहुल गांधी मंदिरों में जा रहे हैं, भगवान शंकर का नाम ले रहे हैं और सभाओं में माथे पर सिंदूर तिलक लगाये नजर आ रहे हैं. वो अब भाषणों में गुजरात दंगे का जिक्र नहीं करते. उनके भाषणों में अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, दलित, पाटीदार और अन्य जाति समुदाय के लोगों के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का जिक्र आता है.

यह रणनीति चुनावी कथानक को अभी तक परंपरागत सांप्रदायिक लाइन पर जाने से रोक रखने में कामयाब हुई है. सूबे में बीते 22 वर्षों से चले आ रहे शासन के कारण कुछ जोर एंटी इंकंबेंसी का भी है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती और आरक्षण की मांग को लेकर उठे आंदोलन ने भी लोगों के मन में अपने लिए जगह बनाई है. इन तमाम बातों ने एक साथ मिलकर बीजेपी को चुनावी अभियान में हलाकान कर रखा है.

लेकिन बाजी मार ले जाने का भरोसा कांग्रेस को भी नहीं है. कांग्रेस के एक स्टार-प्रचारक ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने एक न्यूज वेबसाइट से बातचीत में बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि गुजरात में भीतर ही भीतर बदलाव की बयार बह रही है लेकिन ‘कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि मतदान के दिन वोट किस पाले में पड़ेगा.’
कांग्रेस इतने पसोपेश में क्यों हैं? एक बड़ी वजह है पार्टी में आत्मविश्वास की कमी. कांग्रेस को नहीं लगता कि वह अकेले अपने दम पर बीजेपी को हरा पाएगी. कांग्रेस की मनोदशा कुछ वैसी ही है जैसी कि 2003 के क्रिकेट वर्ल्डकप में केन्याई टीम की थी. जीत के करीब (सेमीफाइनल) पहुंचकर केन्या की टीम को लगा अरे इतनी लंबी दूरी तक आ गए, यहां तक तो सिर्फ क्रिकेट की धाकड़ मानी जाने वाली टीमें पहुंचती हैं. आत्मविश्वास की इसी कमी के कारण भारत के खिलाफ मैच में वो लड़ाई ठानने से पहले ही अखाड़े से बाहर हो गए.

कांग्रेस के पांव पीछे खींचने वाली एक और बात भी है. कांग्रेस अभी तक गुजरात में अपने नेता का नाम नहीं बता पाई है. लोग सड़क-चौराहे पर कहते-सुनते मिलते जाते हैं कि ‘कांग्रेस ने कोई नेता नथी जो मुख्यमंत्री बनी सके’. कई लोगों का मानना है कि अगर बापू (शंकर सिंह बाघेला) ने कांग्रेस नहीं छोड़ा होता तो वो लड़ाई में विपक्ष का चेहरा बनकर उभरते.
कांग्रेस में विश्वास की कमी और बीजेपी में भरोसे के अभाव के कारण गुजरात में एक कहावत चल पड़ी है कि इस बार बीजेपी की हजामत बनने वाली है. लेकिन कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि हजामत में उस्तरा किस हद तक चलेगा, वह कनपटी दुरुस्त करने तक सीमित रहेगा या बात आगे बढ़कर माथा मूड़ने तक पहुंचेगी. एक बात यह भी है कि गांवों में मतदाता एकदम से बीजेपी के खिलाफ है लेकिन शहरों में वह मोदी-समर्थक है.

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मतदान के रुझान से भी कांग्रेस को कुछ उम्मीद है. साल 2012 के गुजरात चुनाव में, जब नरेंद्र मोदी की नजर दिल्ली के सिंहासन पर थी, कांग्रेस को बीजेपी से 9 फीसदी कम वोट मिले थे. इस बार के चुनाव में कांग्रेस को अलग से तीन नेताओं का समर्थन हासिल है और यह नेता मतदान का रुख कांग्रेस की तरफ मोड़ सकते हैं. अल्पेश का दावा है कि वो गुजरात के 20 फीसद ठाकोर वोट का प्रतिनिधित्व करते हैं. हार्दिक पटेल का कहना है कि गुजरात की आबादी में 15 फीसद की तादाद में मौजूद पाटीदार उनको अपना नेता मानते हैं और जिग्नेश मेवाणी गुजरात की 7 फीसद दलित आबादी के नेता हैं. कागजी गणित के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की जीत पक्की लग रही है.

इसके उलट जमीनी माहौल कुछ और बयां कर रहा है. सरकार के आलोचक तक यह नहीं मान पा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को उनके ही घरेलू मैदान पर पटखनी देना मुमकिन है. ऐसे में बीजेपी की हार तकरीबन असंभव नजर आ रही है. शरलॉक होम्स का एक वाक्य बड़ा मशहूर है कि 'एक बार आप असंभव को नकार दें तो इसके बात जो कुछ बचता है, वह चाहे कितना भी हैरतअंगेज जान पड़े लेकिन होता वह सच ही है.' लेकिन गुजरात में शरलॉक होम्स के भी यह बताने में छक्के छूट जाएंगे कि नतीजों के लिहाज से क्या बात असंभव है और क्या कुछ हैरतअंगेज हकीकत. शरलॉक होम्स अपने साथी वाटसन से बस यही कह पायेगा- मामला बड़ा उलझा हुआ है!

11-Dec-2017

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