BY : KHULASAPOST MAGAZINE 

भारत युवाओं का विश्व में सबसे विशाल जनसंख्या वाला देश है। इसलिए भारत को अगर विकास की राह पर दूर तक ले जाना है तो हमें नौजवान आबादी को इसका इंजन बनाना होगा। देश की गाड़ी उसके हाथों में सौंपनी होगी। लेकिन वर्तमान में ऐसा होता कहीं से नजर नहीं आता। वह चाहे नीतियों और योजनाओं के निर्णय-स्थल यानी संसद की बात हो या फिर अन्य क्षेत्रों की, जरूरत के मुताबिक सही अनुपात में युवा वहां तक नहीं पहुंच पा रहे या फिर उसके लिए वह जगह खाली नहीं की जा रही। ऐसे में यह सोचने वाली बात है की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी आबादी युवाओं की राजनीति में क्या भूमिका होगी? क्या भारत अपने “डेमोग्राफिक डिविडेंड” का फ़ायदा उठाने में समर्थ होगा? क्या युवा देश प्रौढ़ एवं जर्जर हो चुकी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा संचालित होने को अभिशप्त होगा? क्या युवा उर्जा का इस्तेमाल ट्रोलिंग में किया जायेगा?

आज के युवा अपना कैरियर डॉक्टर,इंजीनियर या अन्य पेशे में बनाना चाहते हैं आखिर युवा राजनीति को अपना कैरियर क्यों नहीं बनाना चाहते हैं ? इस सवाल का जवाब ढूँढना जरुरी है लोकतंत्र होने के बावजूद राजनीति में युवाओं के प्रवेश की सबसे बड़ी समस्या एंट्री पॉइंट की है। वंशवाद युवाओं को राजनीति में प्रवेश की राह में रोड़ा अटकाये है। यह वंशवाद लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को कमज़ोर करता है। आज देश की तमाम पार्टियां किसी-न-किसी परिवार या व्यक्ति की जेब में है। ऐसी कोई भी पार्टी नहीं है जिसको यह बीमारी लगी न हो। परिवारवाद और वंशवाद ने देश के युवाओं को एक तरह से जकड़े रखा है। यह एक ऐसा घुन है जो देश को भीतर ही भीतर खोखला किये जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में पार्टियों के चरित्र में व्यक्ति की भूमिका बढ़ी है। संसदीय प्रणाली को आधार बनाकर चलने वाले लोकतंत्र में व्यक्तिवाद जहाँ एक तरफ संघीय भावना के ख़िलाफ़ है, वहीँ दूसरी ओर राजनीति में अंधश्रद्धा को भी बढ़ावा देता है। पर्सनालिटी कल्ट की वजह से कुछ युवा स्वतः राजनीति से दूरी बना लेते हैं। यह व्यक्तिवाद संगठनों के लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रियाओं को सीधे-सीधे प्रभावित करता है। इस प्रकार वंशवाद, परिवारवाद, और व्यक्तिवाद लोकतंत्र की बुनियाद पर ख़तरा है जो प्रतिभावान, सक्षम, और योग्य युवाओं को राजनीति में आने के अवसर से वंचित करता है। जबकि धन-बल और रसूखदार आदमी चाहे कितना भी भ्रष्ट और अनैतिक हो, ऐसे पार्टियों में आसानी से जगह पा लेता है। फिर इन्हें संगठन में ऊंचे पद मिल जाते हैं, और अगर उस खास परिवार/व्यक्ति के वफादार रहे तो सरकार में मंत्री भी बन जाते हैं। आज सभी छोटी-बड़ी पार्टियों की निर्णय प्रक्रियाओं में आंतरिक लोकतंत्र का नितांत अभाव है।

स्थापित दलों में ऐसा कम ही है,जहाँ 35 वर्ष से कम उम्र के युवा को पार्टी में शीर्ष नेतृत्व मिला हो। यही कारण है कि दूसरे क्षेत्रों में अच्छा कर रहे युवा राजनीति को गले लगाना नहीं चाहता। यह युवा के लिए राजनीति का चुनाव करने की आदर्श स्थिति नहीं है।

कुछ युवा यक़ीनन राजनीति में दख़ल देना चाहते हैं, परन्तु इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध, महंगा होते चुनाव, पारदर्शिता का अभाव, अनुशासन की कमी, नैतिकता का गिरता स्तर और आंतरिक लोकतंत्र का न होना इसे काजल की कोठरी बनाता है। अभाव, असुरक्षा और अपमान युवा और राजनीति के बीच खाई बनाती है। पिछले वर्ष वर्ष 2017 में सीएसडीएस-लोकनीति द्वारा किये गए एक सर्वे में रोचक तथ्य सामने आये हैं। इस सर्वे के मुताबिक़ 46% युवा राजनीति में किसी भी प्रकार की रुचि नहीं रखते। जबकि देश के 75 प्रतिशत यानी तीन-चौथाई युवा किसी भी चुनावी गतिविधियों में शामिल नहीं होते हैं।

युवाओं की भागीदारी के बिना यथास्थिति में बदलाव की आशा बेमानी होगी।युवाओं को ट्रोल और भीड़ बनने के बजाये राजनीति का विकल्प बनना होगा। सृजन और निर्माण से जुड़ना होगा। राजनीति को  युगधर्म मानते हुए जीवन पद्धति का हिस्सा बनाना होगा और उस मार्ग पर चलना होगा। इन्हें अपने कन्धों पर राष्ट्र-राज्य के संचालन की जिम्मेदारी लेनी होगी। युवाओं को राजनीति की मुख्यधारा में लाना और निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाना आज की ज़रूरत है। अन्यथा आबादी का एक बड़ा तपका चुनाव मशीन बन रह गए पार्टियों के कल-पुर्जे बनकर रह जाएंगे, ट्रोलिंग का काम करेंगे और उन्माद पैदा करेंगें। उनकी ऊर्जा, जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने में जाती रहेगी।

25-Aug-2018

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