( आकाश भट्ट की कलम से )

पत्रकार ‌और पत्रकारिता के अब मायने बदल चुके है, आज़ादी के बाद लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को बनाये रखने के लिए पत्रकारिता को एक सम्मानजनक स्थान दिया गया था जो दिन बा दिन अपनी गरिमा को खोता जा रहा है | एक समय में, और स्वतंत्रता से पूर्व छापे खाने में छपने वाले समाचार पत्रों का चलन था उस समय के पत्रकार की एक धुंधली सी छवि खादी का कुर्ता पाजामा बाज़ू में थैली लटकाये कलम लिए समाचारों के लिए जद्दोजहद करने वाला वो पत्रकार ही तो थे जिन्होंने देश की आज़ादी और अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था, तब ना इतने साधन थे न ही ऐसी सुविधएं वो प्रेस के मालिक भी होते, संपादक भी और पत्रकार भी तब के समाचारों में एक सच्चाई और क्रांति हुआ करती थी जो बड़े-बड़ो को हिलाकर रख दिया करती थी |

उस समय साधन कम थे लेकिन पत्रकारिता को साधना की तरह पत्रकार अपने जीवन का एक हिस्सा बना कर समर्पित हो कर पत्रकारिता किया करते थे | समय बदलता गया साधन बढ़ते गए समाचारों के माध्यम समाचार जगत और कार्पोरेट में तब्दील होते चले गए, प्रिंट मडिया से टी.वी. और अब इन्टरनेट से सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के मूलभूत स्वरुप को ही बदल कर रख दिया है | एक समय में ब्लिट्ज़ के एक लेख और नागरवाला काण्ड ने उस समय ऐसा तहलका मचाया था कि सरकार की चूले हिल गई थी तब समाचारों में दूसरा माध्यम रेडियो के समाचारों का हुआ करता था विविध भारती से सरकारी समाचार और BBC रेडियो ही एक निष्पक्ष समाचार का माध्यम हुआ करते थे जिनके समाचारों की अपनी विश्वसनीयता और  ,एक सच्चाई हुआ करती थी | 

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अब  का दौर ऐसा चल रहा है, जहाँ मीडिया और पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम अपनी दादागिरी भी बखूबी से चलाई है, चाहे अधिकारी हो या पुलिस या राज नेता  मीडिया के नाम पर धौसियाना और पत्रकार संगठन और क्लब के नाम पर डराना धमकाना और वसूली करना इनका शगल बन गया है |  ज़बकि वास्तविक में जो पत्रकारिता करते है उन्हें इन सब से कोई भी लेना देना नहीं रहता है | वास्तविकता में पत्रकारिता का सही उद्देश्य खबरों और घटनाओ को लोगो तक पहुँचाने का है लेकिन अब दौर बदल चूका है, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इन सभी को अब किनारे लगाना शुरू कर दिया है अब हर एक व्यक्ति पत्रकार की भूमिका अदाकार कर रहा है |

अब  समय के साथ अभिव्यक्ति का माध्यम भी बदल चूका है,  कुछ विशेष लोगो ने पत्रकारिता को अपने बाप की जागीर समझ लिया था उन्हें अब बोरिया बिस्तर बाँध ही लेना चाहिए क्योंकि अति का अन्त कभी ना कभी जरूर होता है। अब समय ई-पेपर डिजिटल मैगज़ीन का होता जा रहा है प्रिन्ट मीडिया भी दैनिक समाचारों से पहले खबरे तत्काल फेसबुक और ट्विटर, व्हाट्स एप पर वायरल कर दिए जाते है इस लिए अब दैनिक समाचारों को लोग लेट न्यूज़ के नाम से पढ़ते है, अब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारिता के नाम पर कुछ विशेष लोगों का ही मीडिया में दख़ल रहा है, वो अब समाप्त होना जरुरी है |
 
आप पत्रकार है और मीडिया से जुड़े है तो, क्या आपको सात ख़ून माफ़ है ? नियम और क़ानून सभी के लिए बराबर है संवैधानिक नियमो का पालन सभी को करना अनिवार्य है, लेकिन हमारे देश की ये कितनी बड़ी विडंबना है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के नाम पर कुछ लोगो को दादागिरी करने की खुली छूट मिली हुई है ।

चंद लोगों ने पत्रकारिता को शर्मसार किया हुआ है आये दिन ये तथाकथित पत्रकार मंत्रियों विधायकों के बंगलो के इर्दगिर्द खैरात के लिए घूमते है और होली दीवाली का लिफ़ाफ़ा माँगने वाले ये पत्रकार जिन्हें समाचार समूहों ने भी हर तरह से नकार दिया है और काम से निकाल/हटा दिए गए है ऐसे लोग  पत्रकार का लेबल लगाकर प्रेस संगठनो और क्लबो के पदाधिकारी बनकर पत्रकारिता जैसे पवित्र काम को बदनाम करने में लगें हुए है ।

आये दिन पत्रकार सुरक्षा का रोना रोने वाले ये पत्रकार हक़ीक़त में पत्रकारों के शोषण करने वाले और अपना जेब भरने वाले है जिन्हें बेनकाब किया जाना ज़रूरी है, इनकी और ये जिन संस्थाओ से जुड़े है  इनकी जाँच होनी चाहियें हम शासन और पुलिस प्रशासन से विनती करते है की इनकी गम्भीरता से जाँच होनी चाहिये और शासन से जो भी अधिमान्यता या अन्य सुविधाएं जो इनको शासन के द्वारा प्राप्त  है उन्हें वापस लिया जाना चाहियें और इनकी संस्थाओ का पंजीयन रद्द कर गंभीरता से जाँच की जानी चाहिए
 

 

08-Nov-2017

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