लेख : एम .एच.जकारिया (प्रधान संपादक) 

कांग्रेस से मुसलमान और दलितों का मोह भंग हो चुका है क्योंकि हमेशा से ही प्रतिनिधित्व (निज़ाम) से वंचित करने का काम तो कांग्रेस की उस सामंतवादी व्यवस्था ने किया जिन्हें कांग्रेस ने प्रशासन में दायित्व दे कर बिठाया और दलित-मुस्लिम भाजपा के डर से कांग्रेस को वोट देते रहे, ये चाल चली गई, कांग्रेस कि ये सोच हमेशा से रही है के इनके लिए हमें कुछ करने की क्या ज़रूरत है इनका वोट तो कांग्रेस को ही मिलने वाला है ! ऐसी सोच और विचारधारा काँग्रेस में रखने वाले वही लोग हैं जो शीर्ष पदों पर रहे हैं जो की भारतीय जनता पार्टी की उस विचारधारा से भी बराबर समानता रखते हैं ।

जहाँ दलित और मुस्लिम विरोधी भाजपा का खुला एजेंडा रहा हैं, वहीं काँग्रेस का ये छुपा हुआ एजेंडा है  वार्ना जगजीवन राम प्रधानमंत्री नही बन गए होते ? आपने देखा होगा जब–जब कांग्रेस का शासन होता हैं तब भी वही चेहरे और उसी विचारधारा के लोग सत्ता के मुख्य पदों पर विराजमान होते है और भाजपा के शासन काल मे भी वही लोग राज कर रहे होते है, क्या ये गंभीरता से सोचने वाली बात नहीं है !

पिछले 60 /70 सालों से कांग्रेस मुसलमानों को और दलितों को सिर्फ झूठे सपने दिखाती आई है जिसका नतीजा वह अब भुगत रही है ! पिछले 25 /30 सालों से उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ होता चला जा रहा है । मेरे पिछले लेख “प्रदेशों में सिमटती जा रही हैं कांग्रेस” इसका उदाहरण हैं, कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक माने जाने वाले मुसलमान और दलित अब अपने अधिकार को समझने लगे हैं और सच्चर कमेटी को कूड़े दान में डाल दिया गया है। आज जो अत्याचार गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितो पर हो रहा है उसके जिम्मेदार यही सामन्तवादी सोच रखने वाले वर्ग विशेष के लोग हैं जो वक्त पर कांग्रेस और वक्त पर भाजपा में आते-जाते रहते है और सत्ता में काबिज़ हो कर शासन को केंद्रित करते हैं मॉब लिचींग तो पहले भी होते रहे है |

लेकिन अब ये समाज समझने लगा हैं  दलितों के कांग्रेस के जय-जयकार या मुसलमानों के हम पंजा में ही वोट देंगे और कट्टर कांग्रेसी वाली मिथ्या अब टूटने लगी है क्योंकि छुटभैये नेताओं के चक्कर मे मुस्लिम और दलित शोषण का शिकार हो कर अपने अधिकारों से वंचित होते रहे क्योंकि कांग्रेस हमेशा मुसलमानों को RSS और भाजपा के दंगों का डर दिखाती रही, वहीँ दलितों को बहुजन समाज काशीराम और मायावती जैसे नेताओं ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिये जागरूक किया जिसका परिणाम था उत्तरप्रदेश में दलितों को पिछड़ो को अपनी ताकत मिली वही मुसलमानों के नेता काँग्रेस परस्ती में तलुवे चाटने के सिवा कुछ भी नही कर सके, ये दाताद में ज्यादा थे लेकिन अधिकारों की लड़ाई में पिछड़ गए क्योंकि मुसलमान फिरको और मसलको की लड़ाई से कभी बाहर नहीं निकल सके तो अधिकार की क्या बात करेंगें ?

कांग्रेस पार्टी मे मुसलमानों को बतौर हिस्सेदारी कुछ ओहदा देने की बात हो या फिर टिकट बंटवारे की बात हो इस तरह के अधिकांश मौकों पर पार्टी हाईकमान उन्हें केवल वोटर मानकर चलती है। हिस्सेदारी देने के लिये शायद मुसलमानों की काबिलियत पर वो हमेशा शक करते रहे या फिर नियत मे खोट रहता हो ?

आज तो बुरी से बुरी हालत मे भी कांग्रेस नेताओं का रुख मुसलमान के प्रति पहले से भी बुरा होता जा रहा है। राष्ट्रीय यूथ कांग्रेस ने अनेक प्रदेशो मे अपने मीडिया कोर्डिनेटर मनोनीत किये है क्या राजस्थान मे एक भी मुस्लिम युवा इस लायक नही मिला होगा, जिसका नाम बनाये आठ मिडिया कोर्डिनेटर की इस लिस्ट मे लिखा जा सकता हो ?

क्या कांग्रेस हाईकमान की नजर मे काबिलियत के हिसाब से मुसलमान सिर्फ ज़ीरो है ?

मुस्लिम समाज को ये समझ लेना चाहिये कि अगर समाज को पिछड़ने से बचाना है तो उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण रूप से निभानी होगी और जो अधिकार और साथ देने की बात करता हो ऐसे प्रत्याशी और दल का साथ देना होगा क्योंकि वोटों की जरुरत तो सभी राजनैतिक दलों को पड़ती है, सत्ता सभी को चाहिए आप में इतना दम होना चाहिए की अपनी बातो को मनवा सके, मत लड़िये चुनाव लेकिन अपने वोटो की ताकत को ज़रूर पहचानिए जब बात अधिकार की हो तो भूल जाये फिरकापरस्ती और मस्लाको को और अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाये । आज मुस्लिम समाज को जिस तरह से पेश किया जा रहा है आगे आने वाले समय मे हमारा वज़ूद भी नही रहेगा भारतीय लोकतंत्र में । मुस्लिम समाज का देश के लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिसे हमें बरकरार रखना होगा। देश के कई राज्यों मे मुस्लिम समाज के बिना कोई भी राजनैतिक पार्टी सरकार नही बना सकती । कांग्रेस पार्टी मुस्लिमो को नज़र अंदाज़ कर रही हे उसे छोड़कर नये विकल्प को पहचाने आने वाले चुनावों मे मुस्लिम वोट ही निर्णायक होगे ।

20-Jul-2018

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